कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)
५ ६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३ ४०५ आचमनीय कहा जाया करता है अथवा केवल जल ही दे और मिश्रित नहीं दे । सुगन्धित पदार्थों से उस जल को वासित करे । आचमनीय का समर्पण करके साधक आयु, बल और यश एवं बुद्धि प्राप्त किया करता है । साधक अपने हृदय में उठे हुए मनोरथों की भी प्राप्ति किया करता है । सभी देवों की तुष्टि के लिए मधुपर्क दिया करता है । दधि, घृत, जल, मधु, मिश्री, इन्हीं पाँचों में मिश्रित करके मधुपर्क बनाया जाता है । इसमें जल तो बहुत ही थोड़ा होना चाहिए और मिश्री, घृत और दधि समान परिमाण में होने चाहिए । इन सबसे अधिक मधु मधुपर्क में प्रयुक्त करे । यह मधुपर्क काँसे के पात्र के द्वारा, सुवर्ण, अथवा चाँदी के पात्र से ही समर्पित करे । ज्योतिष्टोम और अश्वमेध आदि में, पूर्व में और इष्ट में पूजन में यह मधुपर्क प्रविष्ट होता है । जो सभी देवों के समुदाय की तुष्टि के लिए हुआ करता है । यह मधुपर्क धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का साधन कीर्तित किया गया है । मधुपर्क सांख्य, भोग्य, तुष्टि, पुष्टि का प्रदान करने वाला हुआ करता है । पिष्टातक, कस्तूरी, रोचन, कुंकुम, गुड़, मधु, पंचगव्य, सर्वोषधियों का समुदाय, सित्ता, (मिश्री), निर्णेजन, तैर, स्निग्ध स्नेह से तिल, प्रान्त में जल, ये सभी पदार्थों को काव्य कोविदी के द्वारा स्नानीय अर्थात् स्नान का जल कहा गया है । इस स्नानीय जल को स्वर्ण और रत्नी का जल जो कपूर आदि सुगन्धित पदार्थों से अधिवासित करे और उसको तैजस अर्थात् उत्तम धातु पात्रों के द्वारा, काँसे के पात्रों से अथवा शंखों के द्वारा निवेदित करना चाहिए । आदित्य की प्रतिमाओं में मण्डल और केशर से देना चाहिए । शिवजी के लिंग में तथा भोग में, पीठ में तथा देवता के तनु में देना चाहिए । सद्य स्निग्ध में, मुक्तिका से निर्मित में, घृत और सिन्दूर से निर्मित में अथवा श्री चन्दन प्रतिष्ठ में प्रतिमा के तुने में लेपन करना चाहिए । स्वास्तिक में स्थापित में, खंड अथवा दर्पण में स्नपन कराना चाहिए । इसी प्रकार से और विशेष रूप से महादेवी के लिए स्नानीय
४०६ ॐ श्रीकालिका पुराणे ॐ
को समर्पित करना चाहिए । सूर्य, विष्णु, शिव के लिए जहाँ-तहाँ पर पूजन में पूजक स्नानीय के समर्पण करने से पूजक कल्प के अन्त तक स्वर्ग के निवास का अधिकारी हो जाया करता है । जिस समय में ही पाद्य तथा गन्ध और पुष्प प्रभृति दिए जाया करते हैं तथा सभी उपचार समर्पित किए जाते हैं । इन सबको अर्घ्य पात्र में अवदित जलों में अमृतीकरण आदि करे तथा सुसंस्कृत करे और फिर उसके द्वारा अभिसिञ्चन करना चाहिए । इसके उपरान्त ही इष्ट देवों की सेवा में समर्पित करना चाहिए । उस समर्पित को वह स्वयं ही ग्रहण किया करते हैं । अर्घ्य पात्रों को उस प्रकार के जलों के बिना जो निवेदन किया जाता है । ऐसा जो समर्पण है जो अपने इष्ट देवों के लिए किया जाता है । वह सभी समर्पण निष्फल ही हुआ करता है जो राग से, प्रसाद अथवा लोभ से किया जाया करता है वह फल ही नहीं होता है । अर्घ्य पात्र में अमृतीकृत होना चाहिए । पात्र से जल स्रुत होता है फिर उसको अमृत करना चाहिए । अमृतीकृत जब पात्र में स्वल्प अवशेष रहे तो उस समय में उसमें अन्य जल दे दें । वह उससे ही अमृत हो जाया करता है । यदि बहुत से पुष्प हों और यदि प्रचुर मालायें हों तो अर्घ्य पात्र में स्थित जल से सिञ्चन करके दी जाया करती हैं । दूसरे जलों से अर्घ्य पात्र में स्थित से भिन्न हों जो उत्सृजन किया जाये तो सैंकड़ों विधियों से भी समर्पित किए गए को इष्टदेव ग्रहण नहीं किया करते हैं । नवीन प्रतिपत्तियों के द्वारा संस्कृत अर्थात् संस्कार किए हुए अर्घ्यपात्र में जो स्थित रहते हैं । वहाँ पर तो सभी तीर्थ और सभी और से पीयूष स्वरूप स्थित रहा करते हैं । इस कारण से उसमें स्थित रहने वाले जल से ही अभ्युक्षण करके ही उपचारों का उत्सृजन करना चाहिए । अर्घ्य पात्रों में योग्य को निधान न करके जो निवेदन करे वह निवेदन करना उचित नहीं होता है । हे भैरव! आपके सामने यह आसन आदि का वर्णन करके बता दिया गया है । अब वस्त्रादि को बताऊँगा । उसका आप श्रवण विज्ञान की बुद्धि के लिए करिए ।
६८९ श्रीकालिका पुराण ६८९ ४०७ देव पूजा के अन्य उपचार श्री भगवान् ने कहा-कपास का अर्थात् सूत निर्मित, कम्बल, वल्कल अर्थात् छाल से रचित और कोशज वस्त्र ही अभीष्ट हुआ करता है । उसको ही पूर्व में मन्त्रों के द्वारा पूजन करके देवों के लिए उत्सृजित करना चाहिए । कीड़ों के द्वारा कटा तथा कुतरा हुआ मैला, जीर्ण, छिन्न और गाय से अर्वालंगित अर्थात् अंग पर धारण किया हुआ और चूहों के द्वारा काटा हुआ, सुई से विद्ध तथा उषित, गुप्त केश और विधोत एवं श्लेष्मा, मूत्र आदि से दूषित देवताओं के लिए प्रदान में और दैव तथा पित्रकर्म में वर्जित कर देना चाहिए । पताका और ध्वजा तथा कुण्डाडि में सिले हुए वस्त्र का प्रयोग करना चाहिए । और अन्यत्र आवरणादि में उसके विनाश के होने से रक्त वस्त्र और कौशेय वस्त्र महादेव के लिए उत्सृजन करना चाहिए । परमात्मा शिव के लिए रक्तवर्ण का कम्बल समर्पित करे । समस्त देवों के लिए देवियों के लिए विचित्र वस्त्र का निवेदन करना चाहिए । कपास का सर्वतोभद्र सभी के लिए निवेदित करे । बहुत ही लाल वस्त्र भगवान् वासुदेव के लिए नहीं निवेदन करना चाहिए । नील और रक्त जो भी वस्त्र है वह सभी जगह पर विशेष रूप से वर्जित कर देना चाहिए । जो बुध पुरुष प्रसाद से नील अथवा रक्त वस्त्र को भगवान् विष्णु के लिए निवेदित करता है हे भैरव! उसकी वह पूजा निष्फल ही हुआ करती है । विचित्र वस्त्र में जो कोई नीले वर्ण की विरंज्जित हुई हो तो ऐसे वस्त्र को महादेव के लिए निवेदित करना चाहिए । अन्य किसी देवता को कभी भी निवेदित न करे । जिस रीति से दो पदों वालों में ब्राह्मण और देवों में इन्द्रदेव होते हैं । उसी भाँति भूषण वर्गों में उत्तम कहा जाया करता है । वस्त्र से लज्जा जीर्ण होती है और वस्त्र के द्वारा पाप हीन अर्थात् नष्ट हो जाता है, वस्त्र से सभी प्रकार की सिद्धि होती हैं अतः वस्त्र चारों वर्गों के फल का प्रदान करने वाला होता है । हे पुत्र! आपके सामने यह वस्त्र सब प्रीति का देने वाला कह दिया गया है । अब भूषणों के विषय में मुझ से श्रवण करो ।
४०८ श्रीकालिका पुराण आभूषणों के नाम व प्रकार आदि भूषण बताये जाते हैं, किरीट शिरोरत्न, कुण्डल, ललाटिक, ताल पत्र, हार, ग्रैवैषक, उर्मिका, प्रालम्बिका, रत्न सूत्र, उत्तुंग, तक्ष मालिका, पार्श्वद्योत, नखद्योत, अंगुलीच्छादक, अंगद, बाहुवलय, शिखाभूषण, इंगिका, प्राग्दण्वन्ध, नीवी, मुष्टिबन्ध, प्रकीर्णक, पादांद, हंसक, भूपुर, क्षुद्रघण्टीका, मुखपट्ट, ये परम सुशोभन अलंकार कहे गए हैं। ये कुल चालीस होते हैं जो देवलोक में सौम्य के प्रदान करने वाले हैं। अलंकारों के प्रदान करने से चारों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) वर्गों का प्रसाधन होता है। इसका पूजन करके ही इष्ट की सिद्धि के लिए समर्पण करना चाहिए। विचक्षण पुरुष को उनके दैवत का उच्चारण करके ही पूजन करना चाहिए। अथवा शिरोगतं सौवर्णों को सर्वदा समर्पित करना चाहिए। हे भैरव! चूड़ारत्न आदि भूषण ग्रैवेयक से आदि लेकर हंस के अन्त तक सब सुवर्ण से निर्मित हों अथवा रजत (चाँदी) से रचित होने चाहिए। इन्हीं को देवताओं के लिए समर्पित करना चाहिए और अन्य तेजस अर्थात् धातुओं से विरचितों को निवेदित नहीं करना चाहिए। रीति रंग आदि से निर्मित पात्र और उपकरण आदि ही होने चाहिए। इन भूषणों की बीच में इससे उपभूषण देवे। सब ताम्रमय जो कुछ भी भूषण आदि हैं उन्हें निवेदित करे। सर्वत्र ताम्र आभूषण भी स्वर्ण की ही तरह से दे और अर्घ्य पात्र में अधिक देना चाहिए। पूजा का अर्घ्य पात्र, नैवेद्य का आधार पात्र, पालक है। भगवान् विष्णु के लिए सदा उदुम्बर (गूलर वृक्ष) से निर्मित प्रीति तथा सन्तोष देने वाले होते हैं। ताम्रपात्र में देवगण प्रसन्न हुआ करते हैं क्योंकि ताम्र में देव सदा स्थित रहा करते हैं। ताम्र सबके लिए प्रीति का करने वाला हुआ करता है। अतएव ताम्र का प्रयोग करना चाहिए। हे भैरव! अपने उपयोग में भी ताम्र का ही प्रयोग करे और देवगणों के भी उपयोग में इसका प्रयोग करना चाहिए। ग्रीवा के ऊपर के भाग में कभी भी रौप्य (चाँदी का भूषण का प्रयोग न करे)।
8023 श्रीकालिका पुराण 8023 ४०९ अब उपभूषण बताये जाते हैं । प्रावार, दान पात्र, गण्डक और गृह हैं । पर्य्यंक आदि जो और दूसरे हैं। वे सब आभूषण हैं । जो सौम्य परिपूर्ण के बिना और काँसे के बिना भूषण होता है वह सुवर्ण और रौप्य के अभाव में शरीर में नीचे नियोजित करना चाहिए । इन भूषण आदि में जो भी नरों के द्वारा दिया जा सकता है, वही सम्भव होने पर सब ही देना चाहिए । इस प्रकार से भूषण चतुर्वर्ग का दाता और सब सौख्य का प्रदान करने वाला हुआ करता है । अपनी शक्ति के ही अनुसार तुष्टि और पुष्टि के करने वाला भूषण कहा गया है । हे पुत्रों! हे वेताल और भैरव! अब भली भाँति गन्ध का श्रवण कीजिए । यह गन्ध पाँच प्रकार का होता है, जो देवों की प्राप्ति को प्रदान करने वाला है । चूर्णीकृत, घृष्ट अर्थात् घिसा हुआ, दाह को आकर्षित करने वाला, सम्मर्दन से समुत्पन्न रस अथवा प्राणी के अंग से उद्मन ये ही पाँच भेद हैं । गन्ध का चूर्ण, गन्ध पत्र, पुष्यों का चूर्ण प्रशस्त गन्ध से युक्तों के पत्रों का चूर्ण जो है वे सब गन्ध वह होते हैं । घृष्ट मलय से समुत्पन्न गन्ध है जो मेरु के द्वारा चूर्णीकृत हैं । अगुरु प्रभृति भी गन्ध है जिसका पंक प्रदान किया जाया करता है । घिस कर भी अघृष्ट गन्ध प्रियादि का जो दग्ध करके ग्रहण किया जाता है वह दाह से समुत्पन्न रस हैं । दाह के साथ आकर्षित गन्ध तीसरा कहा जाता है वह निपीडन करके ही परिग्रहीत किया जाया करता है । वही सम्मर्द से उत्पन्न गन्ध सम्मर्द से, इस नाम से अभीष्ट हुआ करता है । मृग की नाभि से समुत्पन्न, उसके कोप उद्भूत गन्ध प्राणी के अंग से जायमान कहा गया है जो स्वर्ग के निवासियों का भी मोह देनेवाला है । कर्पूर गन्ध, साराद्यक्षोद के धृष्टि होने पर संस्थित होते हैं । चन्द्र भाग आदि भी रस में और पंक में संगत हैं । गन्धसार, सर्वरस और गन्धादि में प्रयुक्त किया जाता है । मृग नाभि और घृष्ट, चूर्ण भी अन्य के योग से होता है । रीति से सभी जगह पर गन्ध पाँच प्रकार का होता है । जो मलराज गन्ध है वह दैव कार्य और पितृगण के कार्य में सम्मत होता है । उसका पंकरस अथवा चूर्ण भी भगवान्
४१० श्रीकालिका पुराण विष्णु की तुष्टि प्रदान करने वाला होता है । समस्त गन्धों में मलय से समुत्पन्न गन्ध परम प्रशस्त होता है इस प्रकार होता है । इस कारण सम्पूर्ण प्रयत्न करना चाहिए । हे भैरव! कर्पूर के सहित कृष्ण अगुरु मलयोद्भूत के साथ वैष्णवी प्रीति का देने वाला होता है तथा यह गन्ध चण्डी देवी के लिए भी प्रशस्त माना जाता है । साधक को चाहिए कि देवता के उद्देश्य के पूर्व में गन्ध का सम्पूजन करे फिर अपने इष्टदेव के लिए उसका वितरण करे तो यह सदा समस्त सिद्धियों के प्रदान करने वाला हुआ करता है । गन्ध के द्वारा मनुष्य अपनी कामनाओं का भला किया करता है और गन्ध सदा ही धर्म देने वाला होता है । गन्ध अर्थों का भी साधन हुआ करता है और गन्ध में मोक्ष भी प्रतिष्ठित है । हे वेताल और भैरव! यह गन्ध आप दोनों को बता दिया गया है । अब वैष्णवी देवी के परम प्रिय जो पुष्प हैं उनके विषय में श्रवण कीजिए । वैष्णवी देवी, कामाख्यादेवी तथा त्रिपुरा देवी का अर्चन निम्नांकित पुष्पों द्वारा करना चाहिए । वकुल, मन्दार, कुन्द, कुरुण्टक, करवीर, अर्क, शाल्मल, अपराजित, दमन, सिन्धुवार, सुरभी, कुरुवक, ब्रह्मावृक्ष की लता, कोमल दुर्वा के अंकुर, दशाओं की मञ्जरी, सुशोभव विल्वपत्र, इनसे यजन करे और अन्य जो भगवान् शिव की प्रीति के लिए पुष्पों की जातियाँ होती हैं । हे वैताल भैरव! उनका भी अब आप श्रवण कीजिए जो मेरे द्वारा अभी कही जा रही है । मल्लिका, मालती, जाती, यूथिका, माधवी, पाटला, करवीर, जवा, तार्परिका, कुब्जक, नगर, कर्णिकार, रोचना, चम्पक, आम्रतक, वाण, वर्वरामल्लिका, अशोक, लोध्र, तिलक, अष्टरूप, शिरीष, शमी, द्रोण, पद्म, उत्पल, वकारुण, श्वेतारुण, विसन्ध्य, पलाश, खादिर, वनमाला सेवन्ती, कुमुद, कदम्ब, चक्र कोकन्द, तण्डिल, गिरिकर्णिका, नागकेशर, पुन्नाग, केतकी, अञ्जलिका, दोहदा, बीजापुर, नमेरु, शाल, त्रपुषी, चण्डविल, झिंठरी पाँचों प्रकार की ऐवमादि कथित पुष्पों के द्वारा वरदा शिवा का अर्चन करना चाहिए । अपामार्ग के पत्र, भृंगार के पत्र, गन्धिनी के पत्र, वलाहक इससे भी पर हैं । खदिर का पत्र, वञ्जुलान्तवक,
वृद्धि के लिए संस्कार की हुई अग्नि में हवन करना चाहिए । कामना की वृद्धि के लिए संख्या से जो जप संकल्प किया गया है उसके अन्त में पूजन किया है वह द्विजों के द्वारा करना चाहिए । श्रेष्ठ द्विजों ने जिसको पुरश्चरण के नाम से कीर्तित किया हैं उसमें पूर्व में पुराण पूर्वोक्त और विस्तार से वर्णित विधानों के द्वारा कामाख्या और वैष्णवी देवी का पूजन करे । जहाँ तक भी सम्भव हो साधक को यहाँ पर सोलह उपचार समर्पित करने ही चाहिए । उसी भाँति षोडश पूर्वोक्त उपचारों का और विधान के कृत्यों का लंघन नहीं करना चाहिए । सम्पूर्ण पूजन करके कल्पोक्त का सौ बार जप करे । जाप के अन्त में अग्नि में होम करे और होम के अन्त में तीन बलि दे । तीन जाति के बलियों का वितरण करे तथा इसके उपरान्त नृत्य गीत करना चाहिए । पत्नी स्वयं अथवा भाई या गुरु, अपना पुत्र अथवा शिष्य नैवेद्य आदि का विनियोजन करना चाहिए । यज्ञ की समाप्ति पर श्री गुरुदेव को शुभ दक्षिणा देनी चाहिए । सुवर्ण, तिल, गौएं दक्षिणा में देवे और इनके देने की शक्ति न हो तो केवल चेटक ही निवेदित करे । मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि में ब्रह्मचर्य रखने वाला तथा इन्द्रियों को जीत लेने वाला रहे और नवमी में अथवा चतुर्दशी में महादेवी का पुरश्चरण करे । हे भैरव ! श्री गुरुदेव के मुख से आदान करना करना चाहिए । जो भी विधि और विस्तार कल्प में कहा गया हो उससे इन उक्त तिथियों में भली भाँति पूजन करे । सम्पूर्ण पूजा को न करके ईप्सित मन्त्र को नहीं देना चाहिए अथवा पुरश्चरण भी नहीं करे । यदि ऐसा करता है तो अवसाद प्राप्त किया करता है । जो नित्य पूजा है, यदि की जा सकती है तो सम्पूर्ण पूजा करे और उस समय में अतीन्द्रिय होकर की कल्प में वर्णित पूजन करना चाहिए । हे भैरव! यदि विस्तार से देवी की पूजा करना न हो तो कल्प में कथित अन्य देव की पूजा करे । अर्घ्य पात्र में आठ बार जप कर उपचारों का प्रसेचन करना चाहिए । आधार शक्ति के प्रमुख मूल वर्गों का प्रयोग करे और हृदय
६०९ श्रीकालिका पुराण ६०९ ४१३ में संस्थित देवता का ध्यान करके और वायु के द्वारा बाहर करके मण्डल में आरेहण करके विधि के अनुसार उपचारों को देना चाहिए । अंगों का पूजन करके उसी भाँति दल देवताओं का यजन करे । फिर तीन पुष्पांजलियों को देकर, जप करके, स्तवन करके और प्रणाम करे । देवता के सामने मुद्रा को प्रदर्शित करके पीछे विसर्जन करना चाहिए । सभी देवताओं की यह ही विधि कही गई है । यदि कल्प में कही हुई पूजा भली भाँति नहीं की जा सकती है तो उपचारों को उस भाँति देने के लिए उस समय में इन पाँचों को सदा वितरित करे । गन्ध, पुष्प, दीप और नैवेद्य, ये पाँच हैं । अभाव में पुष्प और दीप के द्वारा करे, इनके भी अभाव में भक्ति की भावना से ही करना चाहिए । यह संक्षेप पूजा कह दी गई है । दीप पूजा का विधान हे भैरव! पुरश्चरण के कृत्य में प्रदीप के विषय में आप श्रवण कीजिए । दीप को तेजोमय बताया गया है । यह दीप चारों वर्गों के प्रदान करने वाला हुआ करता है इस कारण से दीपों के द्वारा श्री के ऊपर जप प्राप्त करना चाहिए । जो पुरुष निरन्तर ही पुष्पों और दीपों के द्वारा देवता का अर्चन किया करता है । इन दोनों ही से चारों वर्गों की प्राप्ति कही गयी है, इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है । पुष्पों में रहने वाली परम ज्योति है अतएव पुष्प से ही प्रसन्न होती है । तीन वर्गों का अर्थात् धर्म, अर्थ, और काम का साधन हैं । यह पुष्प तुष्टि, पुष्टि और मोक्ष प्रदान करने वाला है । पुष्प के मूल में ब्रह्माजी रहा करते हैं और पुष्प के मध्य में केशव का निवास है । पुष्प के अग्रभाग में महादेवजी विराजमान रहा करते हैं और सभी देवगण दल में संस्थित रहते हैं । इस कारण से पुष्पों के द्वारा देवों का यजन करना चाहिए और भक्ति की भावना से संयुत होकर नित्य ही अर्चन करे । नाममात्र का उच्चारण करना सब विभूति के लिए होता है । अब दीपक के भेदों के विषय में बताया जाता है,
४१४ श्रीकालिका पुराण घृत का दीप, जो सर्वप्रथम होता है, तिलों के तैल से बनाया हुआ दीप, रानिक अर्थात् राई के तेल से तैयार किया हुआ दीपक, दधि से बनाया हुआ और अन्न से किया दीपक, ये सात प्रकार के दीप कहे गए हैं । दीप में वर्तिकारी पाँच प्रकार की होती है, पद्म के सूत्र से बनी हुई, दर्भ के मध्यस्थ सूत्र से निर्माण की गयी, शण से निर्मित बदरी, फलकोष से उद्भूत हुई वर्तिका । दीपक के कृत्यों में वर्तिका सदा ही पाँच तरह की बतायी गयी है । किसी धातु से निर्मित जो भी उत्तम धातु हो । काष्ठ से बना हुआ, लोहे का, मृत्तिका से निर्मित, नारियल से बनाया हुआ अथवा तृण ध्वज से उद्भूत दीपक का पात्र प्रशस्त होता है । हे भैरव! दीप वृक्ष अर्थात् दीवट तैजस अर्थात् उत्तम धातुओं की ही बनानी चाहिए । दीवट पर ही दीप रखना चाहिए । भूमि पर दीपक कभी भी नहीं रखना चाहिए । यह भूमि सभी को सहन करने वाली होती है किन्तु दो कामों को यह सहन नहीं किया करती है, एक तो बिना ही किसी कार्य के पादों का घात करना और दूसरा दीपक का ताप, यह नहीं सहा करती है । इस कारण जिस तरह से भी यह पृथ्वी ताप प्राप्त न करे वैसे ही करना चाहिए अर्थात् दीपक को भूमि पर कभी नहीं रखना चाहिए । हे भैरव! महादेव के लिए तथा अन्य देवों के लिए भी दीप समर्पितं करे । जो मानव पृथ्वी को ताप देता हुआ दीपक का उत्सृजन किया करता है वह मनुष्य ताम्रताप नामक नरक को सौ वर्ष तक निश्चित रूप से प्राप्त किया करता ही है, इसमें कुछ संशय नहीं है । सुवृत्त बत्ती वाला, सुन्दर स्नेह से युक्त, अर्थात् घृतादि से संयुत, देखने में भी अच्छा दीपक होना चाहिए । सुन्दर ऊँचाई से युक्त वृक्ष की कोटि पर ही प्रयत्न पूर्वक दीपक रखना उचित है और उसका ही देवता के लिए उत्सृजन करे । चार अंगुल से जिस दीप का ताप प्राप्त किया जाया करता है वह दीपक, इस नाम से ख्यात नहीं होता है । वह तो वह्नि का एक समूह ही है, ऐसा सुना गया है । दीपक नेत्रों को आह्लाद करने वाला, सुन्दर लौ वाला और दूरी से नाम से रहित ही होना चाहिए ।
Ꮚ श्रीकालिका पुराण Ꮚ ४१५ सुन्दर शिखा से युक्त, शब्द से रहित, बिना धुआँ वाला, अत्यधिक छोटा भी न हो और जिसमें बत्ती दक्षिणावर्त्त वाली हो ऐसा प्रदीप हो वह श्री की वृद्धि के लिए हुआ करता है । दीपक का पात्र दीवट पर स्थित हो और शुद्ध घृतादि से भरा हुआ हो तथा जिनकी वर्त्तिका को दक्षिण की ओर होनी चाहिए । हे पुत्र! ऐसा ही दीपक उत्तम कहा जाया करता है जो सबकी तुष्टि के देनेवाला हो । जो दीपक दीवट से रहित होता है वह मध्यम कहा जाता है । दीपक के लिए निरन्तर नूतन की बत्ती ही ग्रहण करे । इसी से श्री की वृद्धि होती है । कोष से उत्पन्न रोम से उद्भूत वस्त्र को बत्ती के लिए कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए और दीपक में स्नेह घृतादि का मिश्रण करके कभी भी न दे । जो घृतादिक का दीपक में मिश्रण करके रखता है वह तामिस्र नरक में जाता है । वसा, मज्जा, अस्थियों का निर्यास के स्नेहों (चिकनाई) से तथा किसी भी प्राणी के अंग से समुत्पन्न स्नेह से दीपक की रचना कभी भी नहीं करनी चाहिए । यदि ऐसा कोई भी मनुष्य करता है तो वह पंक में अवसाद प्राप्त किया करता है । ऐसा दीपक विवृद्ध पुरुषों के द्वारा श्री की विशेष वृद्धि के लिए कभी भी नहीं देना चाहिए । दीपक को यत्नपूर्वक कदाचित भी निर्वापति नहीं करे । निरन्तर ही देवों के लिए सुन्दर लक्षणों से युक्त ही दीपक कल्पित करना चाहिए । ज्ञानपूर्वक तथा लोभ आदि से मनुष्य को दीपक का हरण नहीं करना चाहिए । जो दीपक का हरण किया करता है वह अन्धा और जो दीपक को बुझा दिया करता है वह काना हुआ करता है । उदीप्त दीप्त की प्रतिमा के युक्त काष्ठ के काण्ड से समुद्भव विल्व के मध्य से उत्पन्न का ही दीपक के अभाव में निवेदन करना चाहिए । दीपक के लिए उल्मुक का कभी भी उत्सृजन न करे । इस प्रकार से दीपक के विषय में सब कुछ कह दिया गया है । अब आप लोग धूप के विषय में श्रवण करिए । धूप भी ऐसी ही होनी चाहिए । जो नासिका के रन्ध्रों (छिद्रों) के लिए सुख प्रदान करने वाली हो और मन का हरण करने वाला सुन्दर गन्ध से युक्त हो, दाह
४१६ श्रीकालिका पुराण दिए गए काष्ठ अथवा पराग का जिसका धूप ताप रहित हो वह धूप देवगणों की तुष्टि के देने वाला होता हैं, ऐसा जान लेना चाहिए । उन द्रव्यों को सबको एक समूह में एकत्रित करके परिधूपित नहीं करे । तुषाग्नि से वर्त्तुन करके धूप न दे । ऐसा करने से धूप देने का जो भी कुछ फल हुआ करता है वह कभी भी प्राप्त नहीं होता है । जब उसका कोई भी फल नहीं है तो वैसा न करें । अब यह बताया जाता है किन-किन वृक्षों को धूप के लिए ग्रहण करना चाहिए । श्री चन्दन, सरल शाल तथा कृष्ण गुरु, उदय, सुरथ, स्कन्द, काशल, नमेरु, नेदेव दारु, विम्बसार, खादिर, सन्तान, पारिजात, हरिचन्दन, वल्लभ, इन वृक्षों की धूप सभी देवों के लिए प्रीति देने वाली परिकीर्तित की गई है । सूत्र के साथ अराल, श्री बास, पट्ट वासक, कर्पूर, श्रीकर, पराग, श्रीहर, आमल, सर्वोषधीय, जातीय वराह, चूर्ण, उत्कल, जाती कोप का चूर्ण, गन्ध, कस्तूरिका, क्षोद वृत्त में कही हुई ये उदाहृत हैं । यक्ष धूप, वृक्ष धूप, श्रीपिटट, अगुर, झर्झर, हवि, वाहा, पिण्डधूप, रुगोल, दण्ठ, अन्योन्य योग, निर्यास, ये धूप कीर्तित किए गए हैं । इन धूपों के द्वारा देवों को धूपित करना चाहिए । जिनकी धूपों से उद्भूत घ्राणों के द्वारा जन्तुगण तुष्टि को प्राप्त हुआ करते हैं । निर्यास, परांग, काष्ठ, गन्ध और कृत्रिम, ये पाँच धूप परम प्रीति के करने वाला हुआ करते हैं । भगवान् माधव प्रभु के लिए किसी भी समय में यक्ष धूप का वितरण नहीं करना चाहिए । मेरे लिए रक्त विद्रुम तथा सुरथ, कद्रिल का भी वितरण न करे । यक्ष धूप, पुत्र बाद, पिण्ड धूप, सुगोलक, कृष्णा गुरु, कपूर से युक्त, यह महामाया का प्रिय धूप कहा गया है । वृक धूप द्वारा महामाया देवी का प्रकृष्ट पूजन करना चाहिए । जो धूप में मेद और मज्जा से समायुक्त हों उनका विनियोग कभी भी नहीं करना चाहिए । परकीय अर्थात् दूसरों के आघ्रात अर्थात् जिनका घ्राण कर लिया गया हो, कृत्या से अभिमर्दित पुष्प, धूप और गन्ध को तथा दूसरे भी उपचारों को घ्राण करके जो
൰०४ श्रीकालिका पुराण ൰०४ ४१७ देवगणों के लिए समर्पित किया करता है वह मनुष्य घोर नरक में प्राप्त हुआ करता है । धूप को कभी आसन पर तथा घट पर वितरण नहीं करना चाहिए । जैसा-जैसा भी कोई आधार बनाकर ही उनको विनवेदित करना चाहिए । रक्त विद्रुम, शाल, सुरथ, सुरल, सन्तानक, नमेरु, काला गुरु से समन्वित, जाती से संयुक्त धूप कामेश्वरी को प्रिय हुआ करता है । हे पुत्र! उसी भाँति यह त्रिपुण्या को तथा नित्य ही मातृकाओं को और समस्त पीठदेवों को और रुद्र आदि को भी प्रिय हुआ करता है । धूप हमने आपको बता दिया है । अब नेत्रों के अञ्जन के विषय में आप श्रवण करिए जिसके द्वारा कामाख्या देवी त्रिपुरा देवी वैष्णवी देवी परम प्रसन्न हुआ करती हैं । अञ्जन छः प्रकार के हुआ करते हैं उनके नाम ये हैं-सौवीर, यामुन, तुत्य, मयूरयामुन, दूर्विका, मेघनील, ये छः होते हैं । ये घिसे हुए ग्रहण करने के योग्य होते हैं । चाहे शिला पर घिसे हुए हों या किसी उत्तम धातु पर घृष्ट किए गए हों । हे पुत्र! यह सभी देवों के लिए समर्पित करे और सभी देवियों की सेवा में निवेदित करना चाहिए । धृत और तैल आदि के योग्य से ताम्र आदि पर दीपक की अग्नि के द्वारा जो अञ्जन बनाया जाता है वही दर्विका कहा गया है । यदि सबका अभाव हो तो देवियों की सेवा में इस दाह से समुत्पन्न अञ्जन को ही समर्पित करना चाहिए । महामाया देवी, जगत् की धात्री कामाख्या देवी तथा त्रिपुरा देवी इन उपर्युक्त छः प्रकार के अञ्जनों से जब ये निवेदित किए गए हों तो सदा ही महान तोष को प्राप्त हुआ करती है अर्थात् उनको परमाधिक प्रसन्नता इनको हुआ करती है । महामाया के लिए प्रस्तुत इस उत्तम अंजन को विधवा नारी को कभी अपने उपयोग में नहीं लेनी चाहिए । इसका तात्पर्य यही है कि विधवा नारी के द्वारा यह अंजन नहीं बनाया जाना चाहिए । वैष्णवी देवी कभी भी विधवा नारी के द्वारा तैयार किया अञ्जन स्वीकार नहीं करती हैं । साधना करने वाले को चाहिए कि मिट्टी के
४१८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ पात्र में विहित अञ्जन को निवेदित करने से पूजा के फल की भी प्राप्ति कभी नहीं हुआ करती है । ऐसा अञ्जन नहीं देना चाहिए क्योंकि जब इस अञ्जन को देवी स्वीकार ही नहीं किया करती है तो वह पूजा अधूरी होकर निष्फल हो जाया करती है । धूप और नेत्र अञ्जन इन दोनों का ही देवगणों के लिए भक्ति की भावना द्वारा मनुष्य को समर्पण करना चाहिए । इस प्रकार से हमने आप दोनों के समक्ष धूप और नेत्र अंजन इन दोनों को बता दिया है । अब एकाग्र मन वाले होकर महादेवी के लिए जो भी नैवेद्य समर्पित करना चाहिए उसके विषय में श्रवण करिए । प्रदक्षिणा और प्रणाम निर्णय श्री भगवान् ने कहा-दक्षिण हाथ को प्रसारित करके फिर स्वयं नग्न शिर वाला हो और दाहिने पार्श्व को दर्शित करता हुआ एक बार अथवा तीन बार वेष्टित करें । इसके करने से देवी को प्रीति हुआ करती है । और जो एक सौ आठ बार देवी की प्रदक्षिणा किया करता है वह पुरुष अपनी समस्त कामनाओं को प्राप्त करके पीछे अन्त समय में मोक्ष की प्राप्ति का लाभ किया करता है । जो मन से भी भक्ति की भावना से देवी के लिए प्रदक्षिणा (परिक्रमा) दिया करता है वह इस प्रदक्षिणा के ही पुण्य-प्रभाव से ही यमराज गृह में अर्थात् समय पुरी में जाकर नरकों को कभी नहीं देखा करता है । नमस्कार भी काया से होने वाला, वाणी के द्वारा समुत्पन्न हुआ और मन से किया हुआ तीन प्रकार का हुआ करता है । जो उसके ज्ञान रखने वालों के द्वारा उत्तम, मध्यम और अधम तीन प्रकार का सुना गया है । इस नमस्कार करने का भी उक्त तीनों श्रेणियों में करने का क्रम है । जो अपने दोनों हाथों को और पैरों को फैलाकर भूमि में एक दण्ड की भाँति गिरकर अपने घुटनों से भूमि में जाकर शिर से फिर भूमि गमन करके अर्थात् शिर से भूमि का स्पर्श करके नमस्कार अपने आठों अंगों के सहित किया जाता है वही उत्तम नमस्कार होता है । जो काया के ही द्वारा किया
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४९९ जाया करता है, इसी को कायिक कहा गया है । जो अपने घुटनों से भूमि का स्पर्श करके और शिर से पृथ्वी का स्पर्श करके किया जाता है वह नमस्कार मध्यम श्रेणी कायिक कहा गया है । जो अपने दोनों करों को जोड़ कर किसी प्रकार से अपने शिर में ही लगाकर नमस्कार किया जाता है और जिसमें घुटनों और मस्तक को भूमि में स्पर्श नहीं करके ही किया जाता है वह नमस्कार अधम कोटि का कहा जाया करता है । ये तीन तरह के नमस्कार काया से किए जाने वाले होते हैं तथा जो नमस्कार गद्य तथा पद्य के द्वारा घटित करके किया जाता है और भक्ति की भावना से होता है वह वाचिक अर्थात् वाणी के द्वारा किए जाने वाले उत्तम श्रेणी का नमस्कार किया जाया करता है वह सदा ही वाणी के द्वारा किया हुआ मध्यम कोटि का नमस्कार होता है और जो मनुष्य के वाक्य के ही द्वारा सदा नमस्कार किया जाता है । हे पुत्रों! वह वाणी से ही किया हुआ अधम श्रेणी वाला नमस्कार समझना चाहिए । मन के द्वारा भी किया हुआ नमस्कार उत्तम, मध्यम और अधम ये तीन प्रकार का कहा गया है । जो मन को पूर्णतया संलग्न करके किया जावे तथा आधे मन से केवल खाना पूरी ही की जावे अथवा मन को इष्टवत न करके ही किया जाया करता है ये तीन प्रकारों वाला अर्थात् उत्तम, मध्यम और अधम मानस नमस्कार होता है । इन तीनों प्रकार के नमस्कारों में कायिक अर्थात् शरीर के द्वारा किए जाने वाला नमस्कार ही उत्तम होता है । कायिक नमस्कारों से ही देवगण नित्य परम प्रसन्न हुआ करते हैं । यह ही नमस्कार जो दण्ड आदि के द्वारा प्रतिनामों से पूर्व में प्रतिपादित किया गया है उसी को प्रणाम जान लेना चाहिए ।
◯ नैवेद्य अर्पण
नैवेद्य के द्वारा सभी कुछ होता है और नैवेद्य से अमृत होता है । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ये चारों परम पुरुषार्थ नैवेद्यों में ही प्रतिष्ठित रहा करते हैं । नैवेद्य नित्य ही समस्त यज्ञों से परिपूर्ण होता
है और यह नैवेद्य से देवों की तुष्टि के प्रदान करने वाला है । यह नैवेद्य ज्ञान का देने वाला एवं सभी भोग्यों से परिपूर्ण हुआ करता है । जो मनुष्य महादेवी के लिए मन के द्वारा भी नैवेद्य के समर्पित करने की इच्छा किया करता है वह मानव भक्ति से युक्त होता हुआ दीर्घ आयु वाला और सुखी हुआ करता है । जो मनुष्य सदा ही महामाया देवी की भक्ति से अनेक प्रकार के नैवेद्यों के द्वारा अर्चना करूँगा, ऐसी चिन्ता से आकुलित रहा करता है वह सभी मन की कामनाओं की प्राप्ति करके अन्त में मेरे ही लोक में प्रतिष्ठित हुआ करता है । जो पुरुष मन से भी देवी के लिए भक्तिभाव से प्रदक्षिणा देता है वह फिर यमराज की पुरी में कभी भी नरकों को नहीं देखा करता है । नमस्कार का बड़ा भारी महत्व होता है । इससे देव, मनुष्य, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पन्नग प्रसन्न हुआ करते हैं । महती मति वाला पुरुष नमस्कार द्वारा चारों वर्गों का लाभ प्राप्त किया करता है । सभी जगह सबकी सिद्धि के लिए नमस्कार ही प्रशस्त किया करता है अर्थात् नमस्कार सबकी प्राप्ति के लिए परम उत्तम साधन माना है । नमस्कार से लोकों पर मानव विजय प्राप्त किया करता है और नमस्कार से आयु की भी वृद्धि होती है, नमन करने से मानव दीर्घ आयु वाला होता है और नमस्कार से अविच्छिन्न सन्तति का लाभ प्राप्त किया करता है जो कि सन्ततियों का क्रम कभी भी टूटता नहीं है । अतएव महादेवी के लिए नमस्कार करो और प्रदक्षिण होकर ही नमस्कार करो । तात्पर्य यह है कि देवों को दक्षिण भाग में स्थित करके ही नमस्कार करना चाहिए । जो निरन्तर नैवेद्य दीजिए-यह कहा करता है और बार-बार बोलता है वह मानव भी अपने समस्त मनोरथों की प्राप्ति किया करता है । इस तरह से आप दोनों को मैंने षोडश (सोलह) उपचार जो अभ्यर्चन के हुआ करते हैं बता दिए हैं । अब आप दोनों को क्या रुचिर है अर्थात् अब आप दोनों क्या पूछना पसन्द करते हैं उसी को बता दूँगा ।
कामाख्या कवच माहात्म्य वर्णन
ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४२१ कामाख्या कवच माहात्म्य वर्णन आप दोनों श्रवण कीजिए मैं कामाख्या देवी के माहात्म्य का वर्णन करूँगा । हे वेताल! हे भैरव! अंगों के सहित उस रहस्य से युक्त को आप दोनों सुनिए । एक समय भगवान विष्णु शीघ्र ही अपने वाहन गरुड़ के द्वारा गमन करते हुए नीलपर्वत पर विराजमान कामाख्या देवी के समीप में प्राप्त हुए थे । उस परम श्रेष्ठ पर्वत पर पहुँचकर उनका ज्ञान प्राप्त करके उन भगवान् शिव ने गरुड़ को गमन करने की गति में 'चलो-चलो' इस प्रकार से प्रेरित किया था । समस्त जगतों को समुत्पन्न करने वाली महामाया कामाख्या देवी ने उन भगवान् श्री विष्णु को गरुड़ के साथ आते हुए जान कर आकाश में ही स्तम्भित कर दिया था । वे गमन करने के लिए समुद्यत थे किन्तु महामाया की भी माया से ऐसे मोहित हो गए थे कि न तो आगे गमन करने में और न वापिस आगमन करने में समर्थ हुए और विद्ध की ही भाँति वहीं पर स्थित रह गए थे । भगवान् गरुड़ध्वज गरुड़ को गमन करने में असमर्थ देखकर बहुत क्रुद्ध हुए थे और उस श्रेष्ठ पर्वत को उत्साहित करने के लिए समुद्यत हुए थे । इसके अनन्तर जगतों के स्वामी श्री विष्णु ने अपने करों के द्वारा उस पर्वत को हिलाने में समर्थ नहीं हुए थे अर्थात् तनिक भी न हिला सके थे । जिस समय में उस पर्वत को चालित करने की इच्छा और प्रयत्न करते हुए केशव भगवान को देखा था तो महादेवी कामाख्या बहुत ही क्रोधित हुई थीं और उस देवी ने सिद्धसूत्र के द्वारा भगवान् बैकुण्ठनाथ को गरुड़ के साथ बाँध दिया था । उनको सिद्धसूत्र से बाँधकर ग्राहाग्र क्षीर समुद्र में देवी ने वहीं से उनको प्रक्षिप्त कर दिया था और वे संक्षेपण करने से तल में प्रपतित हो गए थे । सागर के तले में प्राप्त हुए उन भगवान् केशव को फिर भी अपनी माया से मन्त्रित करके वहाँ पर समाक्रान्त होकर सागर के तल में स्थित हुए उनको ग्रहण कर लिया था । उन केशव प्रभु ने बड़ा भारी प्रयत्न किया था । सागर के तले से ऊपर और महान् प्रयत्न करते हुए भी रहें कि पुन: उन्मज्जित हो जायेंगे
४२२ ൠ श्रीकालिका पुराण ൠ हरि ने सब कुछ यत्न किया था कि उनके असार और प्रसार को उस देव ने रोक दिया था । इसके अनन्तर वे प्रज्ञान से रहित हो गए तथा असार प्रसार से अर्थात् हिलने से भी डुलने से भी शून्य हो गए थे और गरुड़ के ही साथ से चिरकाल तक सागर के जल के तले में ही शीर्ण रहे थे । सृजन करने के लिए जब उनकी बहुत खोज की तो उनको सागर के तले में समवस्थित हुए हरि को पाया था और वे ऐसे विशीर्ण हो रहे थे और कोई साधारण प्राणी होता है । सृजन करने वाले लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने गरुड़ के सहित उनको प्राप्त करके उन्होंने अपने दोनों करों के द्वारा लाने की भी इच्छा की थी । किन्तु लोकों के पितामह भी उनको उत्प्लावित करने करने के समर्थ नहीं हुए थे और स्वयं भी देवी की माया से बुद्ध होकर विस्मय करते हुए ही स्थित रह गए थे । फिर समस्त देवगण जिनमें इन्द्र सबके नायक थे सबके सब खोज करते हुए बहुत अधिक समय में उन्होंने सागर के दूषित जल के मध्य में उन दोनों को प्राप्त किया था और फिर सब इन्द्र आदि देवों ने उनको से ऊपर लाने का बड़ा भारी प्रयत्न किया था किन्तु वे भी ऐसा न कर सके थे । इसके अनन्तर वे सब देवगण भी देवी की माया से अत्यधिक मोहित हो गए थे । जिस रीति से जल के तले में भगवान् विष्णु और ब्रह्माजी स्थित थे उसी प्रकार से वे सब भी वहीं पर संस्थित रह गए थे । उस समय में देवगुरु बृहस्पति भी सबकी खोज करते हुए चले गए थे और हिमालय की शिखा पर विराजमान महादेवी के समीप पहुँचे । देवों के द्वारा पूजित महादेवजी ने देवों का सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे पूछा था तब बड़े आदर के साथ देवगुरु ने उनको प्रणाम करके यथाविधि करके निवेदन किया था । देवगुरु ने कहा-हे महादेव! आप तो समस्त जगतों के धाम हैं तथा जगत् के प्रशमन के कारणस्वरूप हैं । मैं इन्द्र आदि देवों की खोज करता हुआ ही इस समय आपकी सेवा में उपस्थित हुआ हूँ । इस समय ब्रह्माजी और विष्णु भगवान् न तो ब्रह्मा सदन में हैं और न स्वर्ग में ही है । इनमें वे कहीं पर भी समवस्थित नहीं जाने जाते हैं । जैसे अन्य
समय या स्थान में हों ऐसा भी नहीं जाने जाते हैं। हे देव! आप तो देवों के भी देव हैं। मेरे इस महान् संशय का छेदन कीजिए। इस माया में कहाँ पर स्थित हैं, किस कारण से स्थित हो रहे हैं और ऐसे किस प्रकार से वे अवस्थित हो रहे हैं। हे प्रभो! मैं अब आपके ही उपदेश से उन सबके पीछे अनुगमन करूँगा। यदि आपके हृदय में दया हो तो अब उन सबकी स्थित के विषय में मुझे बताइये। महादेवजी ने देवगुरु के उन वचनों का श्रवण किया था और उनके उपदेश का भी ज्ञान प्राप्त कर लिया था। फिर महादेव ने कहा था जो कि कर्म हुआ था और जिस प्रकार से वे सब माया में बद्ध हुए थे, यह सभी कुछ बता दिया था। महामाया महादेवी को भी अब ज्ञात करा दिया था इसी कारण से उस देवी की माया में बद्ध हुए भगवान् विष्णु सागर के जल में स्थित हैं। उसकी खोज करते हुए देवगण ब्रह्मा आदि सब फिर माया से बद्ध हुए उनके ही समीप में अत्यन्त संयत होते हुए स्थित रहते हैं। यदि आप भी उनकी खोज करते हुए वहाँ पर जाते हैं और मेरे बिना अकेले ही वहाँ पर गमन करते हैं तो आप भी वहाँ पर उसी भाँति बद्ध हो जायेंगे और फिर जहाँ से आने में समर्थ नहीं हो सकेंगे। इस कारण से मैं ही वहाँ पर जाता हूँ जहाँ पर गरुड़ध्वज प्रभु स्थित हैं। मैं ही ब्रह्मा और इन्द्र आदि उन सबका क्रम से मोचन करा दूँगा। इस प्रकार से देवगुरु के साथ मिलकर वृषभध्वज ने कहा था और फिर जहाँ पर देवों के समुदाय स्थित थे वहीं पर वे महेश्वर गए थे। वहाँ पर जाकर महादेवजी ने भगवान् विष्णु और ब्रह्माजी से तथा अन्य सब देवगणों से बातचीत करके पूछा था कि आप सब वहाँ पर किसलिए स्थित हो रहे हैं। आप सब तो गमन और आगमन से रहित हो रहे हैं तथा एक जड़ की भाँति ज्ञान से वर्जित हो रहे हैं आप सब ऐसे किसलिए हो गए हैं ? हे देवगणों! यह सब मुझे बताइए। उन महादेवजी के इस वचन का श्रवण करके केशव भगवान् ने धीरे से ब्रह्मा आदि देवों के आगे उस समय में महादेवजी से यह कहा था। श्री भगवान् ने कहा-नीलकूट के शिखर पर से ऊपर की ओर
४२४ श्रीकालिका पुराण आकाश में गरुड़ के द्वारा गमन करते हुए मैंने महान् नीलगिरि को हाथ से पकड़ लिया था और मैं उसको ऊपर उठाना चाहता था क्योंकि वह गरुड़ की गति का कारण करने वाला था। वहाँ पर कामरूपों वाली उस कामाख्या योगनिद्रा ने मुझको पकड़कर महासागर के जल में फेंक दिया था। फिर मैं तल में पहुँच कर जो समुद्र का था अपने वाहन के सहित गिर गया था। हे अन्धक के सूदन करने वाले! मैं यहाँ पर बहुत अधिक समय से निवास कर रहा हूँ। मैं यहाँ पर ही इस महासागर के जल में ही चिरकाल से ही रहता हूँ। हे महेश्वर! वह महामाया मेरे ऊपर दया नहीं कर रही हैं और अभी तक भी मैं वैसा ही हो रहा हूँ। मेरे ही लिए सभी ओर से ब्रह्मा आदिक अब समागत हुए थे। महादेवी ने हठ से उन सबको भी माया के पाश से बद्ध कर दिया था। इस कारण से आप हमारे ऊपर अनुग्रह कीजिए और अब मुझको शिवालय में ही ले चलिए और हम लोग इस बन्धन की विशेष हिंसा से उस महादेवी को प्रसन्न करेंगे। भगवान् हरि के उस वचन को सुनकर मैं करुणा से युक्त हो गया था अर्थात् मुझे दया आ गई थी। फिर मैं परम प्रीति से स्वयं ही ब्रह्माजी और भगवान् विष्णु से बोला था। यह कामपूर्वा ईश्वर का एक सुमनोहर कवच है। उस कवच को शरीर में बाँधकर और आप्लावित होकर पीछे मेरी और गमन करें। मैं भी कवच बाँधे हुए हूँ। इस कारण से माया के द्वारा यहाँ पर मेरे संसर्ग से ही बृहस्पति को निवृद्ध नहीं किया गया है। इस कारण से तुम लोग मेरे वचन से उस कवच का श्रवण कर लीजिए। जिसके द्वारा सुख के साथ भली-भाँति उपप्लुत होकर परमेश्वरी का दर्शन करेगा। ॐ कामाख्या कवच के ऋषि बृहस्पति कहे गए हैं। उसकी देवी कामेश्वरी देवी है तथा छन्द अनुष्टुप् होता है। उसका विनियोग सबकी सिद्धि में होता है। हे देवताओं ! उसका आप श्रवण कीजिए। कण्ठ में महामाया रक्षा करें फिर हृदय में कामेश्वरी रक्षा करें। कामाख्या जठर में रक्षा करें और शारदा मुझको नाभि में रक्षा करें। त्रिपुरी दोनों पाश्र्वों में रक्षा करे। मेदन में महामाया रक्षा करे। गुद में कामेश्वरी रक्षा करे और