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कल्याण: उपनिषद् अङ्क

Kalyan Upanishad Ank

गीताप्रेस द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished832 पृष्ठ

है । जो सब विशेषोंसे रहित परानन्दरूप तत्त्व है, वहाँ शब्दकी प्रवृत्ति कैसे हो । इस कारण यह मन सूक्ष्म और व्यावृत्त अर्थात् सीमित शक्तिसम्पन्न होकर सर्वत्र गमन करता है । क्योंकि श्रोत्र, त्वक्, नेत्र आदि ज्ञानेन्द्रियाँ तथा शब्द, स्पर्श आदि उनके विषय एवं वाक्, पाणि आदि कर्मेन्द्रियाँ सीमित शक्तिसम्पन्न हैं । अतएव परतत्त्वको प्राप्त करनेमें ये समर्थ नहीं हैं । जो साधक उस द्वन्द्वरहित, निर्गुण, सत्य स्वरूप और विज्ञानघन ब्रह्मानन्दको 'यह मेरा ही स्वरूप है'— इस प्रकार जान लेता है, उसे कहीं भी भय नहीं होता । इस प्रकार जो अपने इन्द्रियोंका स्वामी अपने गुरुके उपदेशसे आत्मसाक्षात्कारके द्वारा ब्रह्मानन्दको जानता है, वह साधु- असाधु कर्मोंके द्वारा कभी सतत नहीं होता । विषय तापक हैं और चित्त ताप्य है, चित्त और उसके विषयोंसे यह अखिल जगत् विभासित हो रहा है । परन्तु वेदान्त-शास्त्रके वाक्योंके ज्ञानसे यह प्रत्यगात्माके रूपमें अनुभूत होता है । शुद्ध-बुद्ध-मुक्त- स्वभाव ब्रह्म, ईश्वर चैतन्य, जीव-चैतन्य, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और फल—ये सप्तविध तत्त्व कहे गये हैं, जिनमें व्यवहारोंकों लेकर भेद है । मायाकृत उपाधियोंसे अत्यन्त मुक्त ब्रह्म —शुद्ध चैतन्य कहलाता है । मायाके सम्बन्धसे वह ईश है, अविद्याके वशीभूत वही जीव है, तथा अन्तःकरणके सम्बन्धसे वही प्रमाता—ज्ञाता कहलाता है । उस अन्तःकरणकी वृत्तिके सम्बन्धसे वह प्रमाण संज्ञाको प्राप्त होता है । वह चैतन्य जबतक अज्ञात है, तबतक प्रमेय-कोटिमें आता है और वही ज्ञात हो जानेपर फल कहलाता है । अतएव बुद्धिमान् पुरुष अपने-आपको 'मैं सब उपाधियोंसे मुक्त हूँ'—इस प्रकार चिन्तन करे । इस प्रकार जो तत्त्वतः जानता है, वह ब्रह्मतत्त्वको प्राप्त करनेयोग्य हो जाता है । मैंने समस्त वेदान्तके सिद्धान्तोंका सार यथार्थतः कहा है । जीव स्वयं—अपने ही कर्मोंसे उत्पन्न होता है, स्वयं ही मरता है और स्वय ही अवशिष्ट रहता है । यह सब आत्माकी क्रीडा है, आत्माके सिवा कोई दूसरा तत्त्व नहीं है । यही उपनिषद्—रहस्य है" ॥ २६-४३ ॥

॥ कृष्णयजुर्वेदीय कठरुद्रोपनिषद् समाप्त ॥

शान्तिपाठ

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

देहनाशसे आत्माका नाश नहीं

घटावभासको भानुर्घटनाशे न नश्यति । देहावभासकः साक्षी देहनाशे न नश्यति ॥ (आत्मप्रबोध० १८)

'जैसे घड़ेका प्रकाशक सूर्य घड़ेके नाश हो जानेपर नष्ट नहीं होता, वैसे ही देहका प्रकाशक साक्षी (आत्मा) देहके नाशने नाशको नहीं प्राप्त होता ।'

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ कृष्णयजुर्वेदीय रुद्रहृदयोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भगवान् रुद्रकी सर्वश्रेष्ठता, सर्वस्वरूपता और ब्रह्मस्वरूपता हरिः ॐ रुद्रहृदय, योगकुण्डली, भस्मजाबाल, रुद्राक्षजाबाल और गणपति-ये पाँच उपनिषद् प्रणवके मूल तत्त्वको बतलाते हैं । ये श्रुतिके महावाक्य हैं, ब्रह्म- ज्ञानात्मक अग्निहोत्रके ये पाँच महामन्त्र हैं, अथवा मुक्तिकी प्राप्तिके लिये पाँच ब्रह्म अर्थात् मन्त्रात्मक अग्निहोत्र हैं ॥ १ ॥ श्रीशुकदेवजीने व्यासजीके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया और बोले, 'भगवन् ! बतलाइये, सब वेदोंमें किस एक देवताका प्रतिपादन हुआ है और किसमें सारे देवता वास करते हैं ? किसकी सेवा पूजा करनेसे सर्वदा सब देवता मुझपर प्रसन्न रहेंगे ?' श्रीशुकदेवजीकी इस बातको सुनकर उनके पिता उनसे बोले- 'शुक ! सुनो - भगवान् रुद्र सर्वदेवस्वरूप हैं, और सब देवता रुद्रस्वरूप हैं । रुद्रके दक्षिण पार्श्वमें सूर्यभगवान्, ब्रह्माजी तथा गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि और आहवनीय-ये तीन प्रकारके अग्निदेव स्थित हैं। वामपार्श्वमें भगवती उमा, विष्णुभगवान् और सोम- ये तीन हैं । जो भगवती उमा हैं, वही विष्णुभगवान् हैं और जो विष्णुभगवान् हैं, वही चन्द्रमा हैं। जो गोविन्दको नमस्कार करते हैं, वे शङ्करजीको नमस्कार करते हैं। और जो भक्तिपूर्वक विष्णुभगवान्‌की "अर्चना करते हैं, वे वृषभध्वज अर्थात् शङ्करजीकी ही पूजा करते हैं। जो विरूपाक्ष अर्थात् भगवान् आशुतोषसे द्वेष करते हैं, वे जनार्दनसे ही द्वेष करते हैं। जो रुद्रको नहीं जानते, वे केशवको भी नहीं जानते । रुद्रसे बीज उत्पन्न होता है और उस बीजकी योनि (अर्थात् क्षेत्र) विष्णुभगवान् हैं । जो रुद्र हैं, वे स्वयं ब्रह्मा हैं और जो ब्रह्मा हैं, वे अग्निदेव हैं। रुद्र ब्रह्मा और विष्णुस्वरूप हैं। और अग्नि-सोमात्मक समस्त जगत् भी रुद्र ही है। सृष्टिमें जितने पुँल्लिङ्ग प्राणी हैं, सब महेश्वर हैं और जितने स्त्रीलिङ्ग प्राणी हैं, सब भगवती उमा हैं। सारी स्थावर और जङ्गमस्वरूप सृष्टि उमा-महेश्वररूप है । समस्त व्यक्त जगत् उमाका स्वरूप है । और अव्यक्त जगत् महेश्वरका स्वरूप है । उमा और शङ्करका योग ही विष्णु कहलाता है । जो उन विष्णुभगवान्‌को भक्तिपूर्वक नमस्कार करते हैं, वे आत्मा, परमात्मा और अन्तरात्मा - इस त्रिविध आत्माको जानकर परमात्माको प्राप्त होते हैं । अन्तरात्मा ब्रह्मा हैं और परमात्मा महेश्वर हैं । और सभी प्राणियोंके सनातन आत्मा विष्णुभगवान् हैं । इस त्रिलोकी- रूप वृक्षके, जिसके तने और शाखाएँ भूमिपर फैली हुई हैं, अग्रभाग विष्णु है । मध्य (तना) ब्रह्मा हैं और मूलभाग भगवान् महेश्वर हैं । विष्णु कार्यरूप हैं, ब्रह्मा क्रियारूप हैं और महेश्वर कारण-स्वरूप हैं । प्रयोजनके अनुसार रुद्रने अपनी एक ही मूर्तिको तीन प्रकारसे व्यवस्थित किया है । धर्म रुद्रस्वरूप है, जगत् विष्णुस्वरूप है और समस्त ज्ञान ब्रह्मस्वरूप हैं । 'श्रीरुद्र रुद्र रुद्र' इस प्रकारसे जो बुद्धिमान् जपता है, इससे समस्त देवोंका कीर्तन हो जानेके कारण वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २-१६ ॥ “पुरुष रुद्रस्वरूप हैं और स्त्रियाँ उमास्वरूपा हैं-इन दोनों प्रकारके रूपोंमें भगवान् रुद्र और भगवती उमाको

६३८ * रुद्रहृदयोपनिषद् *


[बायाँ स्तम्भ]

नमस्कार है। रुद्र ब्रह्मा हैं और उमा वाणी हैं। इन दोनों रूपोंमें रुद्र और उमाको नमस्कार। रुद्र विष्णु हैं और उमा लक्ष्मी हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र सूर्य हैं और उमा छाया हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र चन्द्रमा हैं और उमा तारा हैं, उनको और उनको नमस्कार। रुद्र दिवस हैं और उमा रात्रि हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र यज्ञ हैं और उमा वेदी हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र अग्निदेव हैं और उमा स्वाहा हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र वेद हैं और उमा शास्त्र हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र वृक्ष हैं और उमा लता हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र गन्ध हैं और उमा पुष्प हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र अर्थ हैं और उमा अक्षर हैं। उनको और उनको नमस्कार। रुद्र लिङ्ग हैं और उमा पीठ हैं। उनको और उनको नमस्कार। इस प्रकार सर्वदेवात्मक रुद्रको पृथक् पृथक् नमस्कार करे। मैं भी इन्हीं मन्त्रपदोंके द्वारा महेश्वर और पार्वतीको नमस्कार करता हूँ। मनुष्य जहाँ-जहाँ रहे, इस अर्धालीसहित मन्त्रका उच्चारण करता रहे। ब्रह्महत्यारा भी यदि जलमे प्रविष्ट होकर इस मन्त्रका जाप करे तो सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १७-२५ ॥

“जो सबका अधिष्ठान है, द्वन्द्वातीत है, सच्चिदानन्दस्वरूप, सनातन परम ब्रह्म है, मन और वाणीके अगोचर है, शुक ! उसके भलीभाँति जान लेनेपर यह सब ज्ञात हो जाता है, क्योंकि सब कुछ उसका ही स्वरूप है, उससे भिन्न कुछ भी नहीं है। दो विद्याएँ जानने योग्य हैं—वे हैं परा और अपरा। उनमें अपरा विद्या यह है—ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष, तथा मुनीश्वर ! इस अपरा विद्यामें आत्मविषयके अतिरिक्त सब प्रकारके बौद्धिक ज्ञानका समावेश हो जाता है। अब परा विद्या वह है, जिसके द्वारा आत्मविषयका ज्ञान होता है। वह आत्मतत्त्व परम अविनाशी है। वह देखनेमें नहीं आता, ग्रहण नहीं किया जाता। नाम-रूप और गोत्रसे वर्जित है। उसके चक्षु और श्रोत्र नहीं हैं। वह विषयातीत है, उसके हाथ-पैर नहीं हैं, वह नित्य है, विभु है, सर्वगत है, सूक्ष्मसे सूक्ष्म है तथा वह कभी विकारको प्राप्त नहीं होता। वह सब भूतोंका प्रभव स्थान है, उस परमात्माको धीर पुरुष अपने आत्मामें देखते हैं ॥ २६-३२ ॥


[दायाँ स्तम्भ]

“जो सर्वज्ञ है—जिसे भूत-भविष्य-वर्तमानका ज्ञान है, जो सम्पूर्ण विद्याओंका आश्रय है, ज्ञान ही जिसका तप है, उसीसे भोक्ता एव अन्नरूपमें यह समस्त जगत् उत्पन्न होता है। जो जगत् सत्यकी तरह प्रतीत होता है, वह सब ब्रह्ममें उसी प्रकार स्थित है, जैसे रज्जुमे सर्प। वही यह अविनाशी ब्रह्म सत्य है, जो इसको जानता है, वह मुक्त हो जाता है। ज्ञानसे ही संसार-बन्धनका नाश होता है, कर्मसे नहीं। अतएव मुमुक्षुको विधिपूर्वक श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ अपने गुरुके पास जाना चाहिये। तब गुरु उसे ब्रह्म और आत्माके एकत्वका ज्ञान करानेवाली पराविद्या प्रदान करे। यदि पुरुष गुहामें निहित उस अक्षरब्रह्मको साक्षात् कर लेता है तो अविद्यारूपी महाग्रन्थिको काटकर वह सनातन शिवके पास पहुँच जाता है। यही वह अमृतरूप सत्य है, जो मुमुक्षुओंको जानना चाहिये ॥ ३३-३७ ॥

“प्रणव धनुष है, आत्मा बाण है और ब्रह्म वह लक्ष्य कहलाता है। उसको प्रमादरहित होकर बींधना (चिन्तन करना) चाहिये तथा लक्ष्यमे घुसे हुए बाणकी भाँति ही उस ब्रह्ममें तन्मय हो जाना चाहिये। लक्ष्य अर्थात् ब्रह्म सर्वगत है। शर अर्थात् आत्मा सब ओर मुखवाला है और वेद्धा अर्थात् साधक यदि सर्वगत हो तो शिवरूप लक्ष्यकी प्राप्तिमें संशय नहीं रह जाता। जहाँ चन्द्रमा और सूर्यका विग्रह प्रकाशित नहीं होता, जहाँ वायु तथा सम्पूर्ण देवताओंकी भी गति नहीं है, वे ही ये तेजोमय परमात्मा साधकके द्वारा चिन्तन करनेपर अपने विशुद्ध एव रजोगुणरहित स्वरूपसे प्रकाशित होते हैं। इस शरीररूपी वृक्षमें जीव और ईश्वर नामके दो पक्षी निवास करते हैं। उनमें जीव कर्मोंका फल भोगता है, महेश्वर नहीं। महेश्वर कर्मफलका भोग न करते हुए केवल साक्षीरूपमें प्रकाशित हो रहा है, उसमें जीव और ईश्वरका भेद मायाके द्वारा कल्पित है। जिस प्रकार घटाकाश और महाकाश आकाशके ही कल्पित भेद हैं, उसी प्रकार परमात्माके जीव और ईश्वररूप भेद भी कल्पित हैं। वस्तुतः तो चिन्मय जीवात्मा सदा स्वतः साक्षात् शिव है। जीव और ईश्वरमें जो चित् है, वह चित्के औपाधिक आकार-भेदसे भिन्न-भिन्न प्रतीत होती है, स्वरूपतः भिन्न नहीं है, क्योंकि स्वरूपतः भेद होनेपर तो दोनोंकी चित्स्वरूपताकी ही हानि हो जायगी। (जड वस्तुमें ही स्वरूपगत भेद होता है, चित्में नहीं।) चित्से जो चित्का भेद कहा जाता है, वह चिदाकारता (चिन्मयता) से

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६३९ नहीं, अपितु जडरूप उपाधिके ही कारण है। यदि भेद स्वरूप सर्वसाक्षी परमात्माको वे ही पुरुष देखते हैं, जिनके है तो वह भेद जडरूप ही है। चित् तो सर्वत्र एक दोष क्षीण हो गये हैं; जो मायासे आवृत्त हैं, वे इतर प्राणी ही होती है। युक्ति और प्रमाणसे चित्की एकता नहीं देख सकते। जिस महायोगीको इस प्रकार स्वरूप-ज्ञान ही निश्चित होती है, इसलिये जब पुरुषको चित्‌के हो गया है, उस पूर्णस्वरूपताको प्राप्त हुए सिद्ध महात्माका एकत्वका परिज्ञान हो जाता है, तब वह न शोकको प्राप्त होता कहीं आना-जाना नहीं होता। जिस प्रकार एक और पूर्ण है न मोहको। वह केवल अद्वैत परमानन्दस्वरूप शिव- आकाश कहीं नहीं जाता, उसी प्रकार अपने आत्मतत्त्वका भावको प्राप्त हो जाता है। समस्त जगत्‌का अधिष्ठान वह अनुभव करनेवाला ज्ञानी महात्मा कहीं नहीं जाता। जो सत्यस्वरूप चिद्घन परमात्मा है। मुनिलोग उसे ‘अहम् मुनि निश्चयपूर्वक उस परम ब्रह्मको जानता है, वह अपने अस्मि’ (वह परमात्मा मैं ही हूँ) ऐसा निश्चय करके स्वरूपमें स्थित हो, सच्चिदानन्दस्वरूप ब्रह्म ही हो जाता शोकरहित हो जाते हैं। अपने अन्तःकरणमें स्वयञ्ज्योतिः- है” ॥ ३८-५२ ॥ ॥ कृष्णयजुर्वेदीय रुद्रहृदयोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै। ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! आठ गुणोंसे युक्त आत्माको जाननेका फल य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः सोऽन्वेष्टव्यः स विजिज्ञासितव्यः स सर्वाँश्च लोकानाप्नोति सर्वाँश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच। (छान्दोग्य० ८। ७। १) प्रजापतिने कहा-जो आत्मा पापरहित, जरा (बुढ़ापा) रहित, मृत्युरहित, शोकहीन, भूखसे रहित, प्याससे रहित, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प (इन आठ स्वभावगत गुणोंसे युक्त) है, उसे खोजना चाहिये, उसे जानना चाहिये। जो उसको खोजकर जान लेता है, वह सब लोकोंको और समस्त कामनाओंको प्राप्त हो जाता है।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय नीलरुद्रोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣲसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! भगवान् नीलरुद्रकी महिमा और शिव-विष्णुकी एकता

भगवान् नीलकण्ठ ! आपको हम अपने दिव्यधामसे नीचे पृथिवीपर अवतीर्ण होते देखते हैं। हम देखते हैं कि आप दुष्टोंका विनाश करते हुए अपने उग्र रुद्ररूपसे मयूर- पिच्छके समान गगनको ही मुकुट बनाये पृथिवीपर अवतीर्ण होते है और पृथिवीमें प्रतिष्ठित होते हैं, क्योंकि आप ही भूमिके अधीश्वर हैं। (तात्पर्य यह कि नीलकण्ठ भगवान् रुद्र अपने गगनव्यापी स्वरूपसे दिव्यधामसे पृथिवीपर अवतीर्ण होकर दुष्टोंका नाश करके पृथिवीकी रक्षा करते हैं। वे पृथिवीके अधिदेवता हैं। उनकी अष्टविध मूर्तियोंमें पृथिवी भी एक मूर्ति है। इस मन्त्रमें भगवान् शिवकी भूमिमयी मूर्तिका निर्देश है।) लोगो ! इन भगवान् नीलकण्ठको देखो, जिनका वर्ण अत्यन्त लाल है। ये प्राणियोंके जीवनस्वरूप हैं। ये भगवान् रुद्र जलमें निक्षिप्त ओषधियोंमें पधारकर पापोंका विनाश करते हैं। (जलमें ओषधियाँ डालकर उसके द्वारा अभिषेक करनेसे पापनाश होता है।) निश्चय ही तुम्हारे अकल्याणको नष्ट करनेके लिये और तुम्हारे अप्राप्त अभीष्टको प्राप्त करानेके लिये वे (योगक्षेमकारी ओषधियुक्त जलरूप भगवान् रुद्र) तुम्हारे समीप आयें। (इस मन्त्रमें भगवान् रुद्रकी जलमयी मूर्तिका निर्देश है।) क्रोधस्वरूप भगवान् रुद्र ! आपको नमस्कार। मन्यु (क्रोधावेश)-स्वरूप भगवान् भव ! आपको नमस्कार। भगवान् नीलकण्ठ ! आपकी दोनों भुजाओंको नमस्कार और आपके 'बाणको भी नमस्कार। कैलासवासी ! आप पर्वतपर (संसारसे अलग) रहकर सबका मङ्गल करते हैं। भगवन् ! जिस बाणको दुष्टोंपर फेंकनेके लिये आपने अपने हाथमें धारण किया है, गिरित्राता ! उस बाणको हमारे लिये कल्याणकारी बनाइये। उसके द्वारा पुरुषों (हमारे स्वजनो) का वध मत कीजिये।

कैलासवासिन् ! ( अपनी ) कल्याणमयी ( पवित्र ) वाणीके द्वारा हम आपके निर्मल गुणोंका वर्णन करते हैं। क्योकि यो करनेसे हमारे लिये यह समस्त जगत् दुःख- रहित तथा अनुकूल हो जायगा। आपके जो बाण हैं, वे कल्याणमय हैं। आपका धनुष कल्याणकारी होता है। आपके धनुषकी प्रत्यञ्चा भी कल्याणरूपिणी है। हे मृड ! हे मङ्गल- स्वरूप ! इन सबके द्वारा आप हमे जीवन प्रदान करते हैं। ( तात्पर्य यह कि भगवान् रुद्रका विनाशक रूप एव विनाशके समस्त साधन भगवद्भक्तोंके लिये तथा जगत्के लिये नव- जीवनका विधान करनेके लिये हैं और वास्तविक रूपमें कल्याणस्वरूप हैं।) भगवान् रुद्र ! आप पर्वतपर रहकर सबका कल्याण करनेवाले हैं। आपका जो पापहारी अघोर ( सौम्य ) स्वरूप है, आप अपने उस कल्याणकारी स्वरूपके द्वारा हमें सब ओरसे प्रकाशित करें। अर्थात् हमारे सम्मुख सदा सब ओर आपका सौम्य मङ्गलमय स्वरूप ही रहे। ये जो आपकी ताम्रवर्ण, हल्की लाल, भूरी, अत्यन्त लाल तथा और भी सहस्रों रुद्रमूर्तियाँ (किरणें) चारो ओर दिशाओंमें व्याप्त है, निश्चय ही हम स्तुतिके लिये उनकी कामना करते हैं। (यहाँ अन्तमें भगवान् रुद्रके सूर्यरूपका निर्देश है) ॥१॥ विलोहित ( अधिक रक्तवर्ण ) नीलकण्ठ भगवान् ! हमने अवतार ग्रहण करते हुए आपको देखा है। आपको (उस अवताररूपमें) या तो गोपोंने देखा है या जल भरनेवाली गोपसुन्दरियोंने देखा है। योगियोंके लिये भी दुर्दर्श आपको (उस श्यामसुन्दर-स्वरूपमें) विश्वके समस्त प्राणियोंने देखा है। उस देखे हुए श्रीकृष्णस्वरूपधारी आपको नमस्कार। (यहाँ श्रुति भगवान् रुद्र एव अवतार-विग्रहोंके एकत्वका निर्देश करती है।) मयूरपिच्छधारी (मयूर- मुकुटी) ! आपको हम नमस्कार करते हैं। आप ही महान्

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६४१ शक्तिशाली इन्द्र हैं । (देवराज इन्द्र नहीं, जो अनुगोमे पराजित होते हैं । यहाँ गोविन्दसे तात्पर्य है ।) अथवा आप अपने भक्तोंके सामने हजारों (असंख्य) नेत्रोंसे सम्पन्न विराट्रूपम भी प्रकट होते हैं। और आपके उस (श्रीकृष्ण) स्वरूपके जो सत्त्वात्मक सहचर (गोपाल, गोपिकाएँ आदि) हैं, उन्हें हम नमस्कार करते हैं । भगवन् ! आपके शक्तिशाली किंतु इस समय प्रयुक्त न होनेवाले आयुधोंको अनेक नमस्कार ! दोनों हाथ जोड़कर मैं आपके धनुषको नमस्कार करता हूँ । अपने और शत्रुके- इन दोनों पक्षोंके गजाओंके लिये आप अपने धनुषकी प्रत्यञ्चाको उतार दीजिये । अर्थात् आप शान्तस्वरूप धारण कर लें और युद्धकी आकाङ्क्षा ही मिटा दें। भगवन् ! आपके हाथमें जो बाण हैं, उन्हें लौटा लें-तूणीरमे रख लें। अर्थात् अपनी महार मूर्ति का त्याग करके अपने परम सौम्य शिवरूपमे मुझे दर्शन दं । सहस्राक्ष, शितिखण्डी, शत बाणोंके युगपत्सन्धानकर्ता ! आप अपने धनुषको चढ़ाकर, अपने बाणोंके मुखाग्रों तीक्ष्ण करके हमारे कल्याण एवं सुखके लिये उन्हें धनुषपर चढ़ायें । (हमारे शत्रुओंके नष्ट होनेपर) आपका धनुष प्रत्यञ्चा रहित हो। वधकी क्रिया छोड़कर बाण तूणीरमे रख दिये जायँ। आपके बाण, जो पर्वतोंको भी चूर्ण करनेवाले हैं, हम आपके निषङ्ग (तरङ्ग) में प्रवेश करके कल्याणमय हों । आपके धनुषमे संधान किया हुआ बाण विश्वमें चारों ओरसे हमारी रक्षा करे। इस रक्षणके अनन्तर आप अपने उस बाणको अपने तूणीरमे रख दें। भक्तोंपर अत्यधिक कृपाकी वर्षा करनेवाले ! आपके समीप जो अमोघ बाण हैं और आपके हाथमें जो धनुष है, उनके द्वारा आप चारों ओरसे हमारा परिपालन करें । उन सर्पों (डसनेवाले जीवों) को नमस्कार, जो पृथिवी- पर रहते हैं। जो आकाशमें रहते हैं और जो स्वर्गमे रहते हैं, उन सर्पों (कष्ट देनेवाली शक्तियो) को नमस्कार । जो प्रकाशमय लोकोंमें (ग्रहोंमें) रहते हैं तथा जो सूर्यकी किरणोंम रहते हैं, जो इस जलमें रहनेवाले हैं, उन सब सर्पों (क्लेश- दायिका शक्तियो) को नमस्कार । जो वृक्षोंके बाणके रूपमे हैं, जो वनस्पतियोम रहते हैं और जो गड्डोंमें पड़े हैं, उन सब सर्पोंको नमस्कार । (इस मन्त्रमे सर्वत्र व्यापक भगवान् रुद्रके कालरूपत्वका निर्देश है।) जो भगवान् शङ्कर अपने भक्तोंके लिये नीलकण्ठ स्वरूप धारण करते हैं, अर्थात् भक्तोंके कल्याणके लिये ही जिन्होंने हालाहल पान करके उसे चिह्न रूपमें अपने गलेमें धारण किया हे, जो भगवान् अपने निज जनोंके लिये हरितवर्ण श्रीहरि रूप बन जाते हैं (यहाँ भगवान् शिव एवं भगवान् विष्णुका एकत्व प्रतिपादित है), हे ओषधियो ! उन काली पूँछवाले (महिषरूपधारी भगवान् केदारेश्वर) के लिये शीघ्र अमोघ शक्तिसम्पन्न बनो क्योंकि इससे तुम उन्हें सन्तुष्ट कर सकोगी। वे पिङ्गलवर्ण एव पिङ्गल कानोंवाले, नीलकण्ठधारी भगवान् शिव वही हैं, जिन सर्वस्वरूप, नीलशिखण्डधारी (सर्वव्यापक) भगवान् विरूपाक्ष भत्र (शङ्कर) के द्वारा देवताओके ही नहीं, अपितु वाणीका प्रयोग करनेवाले- चेतन प्राणिमात्रके पिता ब्रह्माजी मारे गये। हे वीर ! सर्व- व्यापक स्वरूपसे उन्हें ही प्रत्येक कर्ममे (व्यापक एंव कर्मरूप) देखो । यह उन (भगवान् शङ्कर) के सम्बन्धमें पूछनेकी इच्छा (शङ्का) को छोड़ दो, जिसके द्वारा हम तुम विश्वको उनसे विभिन्न कर देते हैं-उनमे अलग भाग्य मान लेते हैं। अर्थात् हम विश्वको उन्हींका रूप मानना चाहिये । जगत्कारणस्वरूप भगवान् भवको नमस्कार, महारकर्ता रुद्रको नमस्कार, जगत्का नाश करनेके लिये शत्रुरूप बने हुए प्रभुको नमस्कार, उन नीलशिखण्डधारी (गगनमुकुटी) को अथवा काले सींगोंवाले (महिषरूप केदारेश्वर नीलरुद्र) को नमस्कार तथा उन (दक्षकी) सभा (विवाहमण्डप) को सुशोभित करनेवाले कुमाररूप प्रभुको नमस्कार । जिनमे घोड़े उत्पन्न हुए, गच्चर हुए तथा चारों ओर दौड़नेवाले गधे हुए, उन नीलशिखण्डधारी (महिषरूप केदारेश्वर नीलरुद्र) को नमस्कार । सभामण्डपकी शोभा बढ़ानेवाले उन भगवान्‌को नमस्कार, नमस्कार ॥ ३ ॥ || अथर्ववेदीय नीलरुद्रोपनिषद् समाप्त || शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳ सस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! उ० अ० ८१-८२-

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ऋग्वेदीय सरस्वतीरहस्योपनिषद् शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! दस बीजमन्त्रोंसे युक्त ऋग्वेदके मन्त्रोंसे सरस्वतीदेवीकी स्तुति, उसका फल, नाम-रूपके सम्बन्धसे ब्रह्मकी जगत्-स्वरूपता और समाधिका वर्णन

हरिः ॐ । कथा है कि एक समय ऋषियोंने भगवान् आश्वलायनकी विधिपूर्वक पूजा करके पूछा—"भगवन् ! जिससे 'तत्' पदके अर्थभूत परमात्माका स्पष्ट बोध होता है, वह ज्ञान किस उपायसे प्राप्त हो सकता है ? किस देवताकी उपासनासे आपको तत्त्वका ज्ञान हुआ है, उसे बतलाइये ।” भगवान् आश्वलायन बोले—'मुनिवरो ! बीजमन्त्रसे युक्त दस ऋचाओंसहित सरस्वती-दशश्लोकीके द्वारा स्तुति और जप करके मैंने परासिद्धि प्राप्त की है ।' ऋषियोंने पूछा— 'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर ! किस प्रकार और किस ध्यानसे आपको सारस्वत-मन्त्रकी प्राप्ति हुई है तथा जिससे भगवती महासरस्वती प्रसन्न हुई हैं, वह उपाय बतलाइये ।' तब वे प्रसिद्ध आश्वलायन मुनि बोले, 'इस श्री- सरस्वती दशश्लोकी महामन्त्रका मैं आश्वलायन ही ऋषि हूँ, अनुष्टुप् छन्द है, श्रीवागीश्वरी देवता हैं, 'यदवाग्' यह बीज है, 'देवी वाच' यह शक्ति है, 'प्र णो देवी' यह कीलक है, श्रीवागीश्वरी देवताके प्रीत्यर्थ इसका विनियोग है । श्रद्धा, मेधा, प्रज्ञा, धारणा, वाग्देवता तथा महासरस्वती—इन नाम- मन्त्रोंके द्वारा अङ्गन्यास किया जाता है। (जैसे, ॐ श्रद्धायै नमो हृदयाय नम, ॐ मेधायै नमः शिरसे स्वाहा, ॐ प्रज्ञायै नम शिखायै वषट्, ॐ धारणायै नम कवचाय हुम्, ॐ वाग्देवतायै । नेत्रत्रयाय वौषट्, ॐ महासरस्वत्यै नम अस्त्राय फट् । )

ध्यान हिम, मुक्ताहार, कर्पूर तथा चन्द्रमाकी आभाके समान शुभ्र कान्तिवाली, कल्याण प्रदान करनेवाली, सुवर्णसदृश पीत चम्पक पुष्पोंकी मालासे विभूषित, उठे हुए सुपुष्ट कुचकुम्भोंसे मनोहर अङ्गवाली वाणी अर्थात् सरस्वतीदेवीको मैं, त्रिभूति (अष्टविध ऐश्वर्य एव निःश्रेयस )के लिये, मन और वाणी- द्वारा नमस्कार करता हूँ । 'ॐ प्र णो देवी' इस मन्त्रके भरद्वाज ऋषि हैं, गायत्री छन्द है, श्रीसरस्वती देवता हैं । ॐ नम—यह बीज, शक्ति और कीलक तीनों है। इष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये इसका विनियोग है । मन्त्रके द्वारा अङ्गन्यास होता है । 'वस्तुतः वेदान्त शास्त्रका अर्थभूत ब्रह्मतत्त्व ही एकमात्र जिनका स्वरूप है और जो नाना प्रकारके नाम-रूपोंमें व्यक्त हो रही हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें ।' ॐ प्र णो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती धीना- मवित्र्यवतु ॥ १ ॥ ॐ-दानसे शोभा पानेवाली, अन्नसे सम्पन्न तथा स्तुति करनेवाले उपासकोंकी रक्षा करनेवाली सरस्वतीदेवी हमे अन्नसे सुरक्षित करें (अर्थात् हमे अधिक अन्न प्रदान करें) ॥१॥ 'आ नो दिव ०' इस मन्त्रके अत्रि ऋषि हैं, त्रिष्टुप् छन्द है, सरस्वती देवता हैं, ह्रीं-यह बीज, शक्ति और कीलक तीनों है।

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६४३ अभीष्ट प्रयोजनकी सिद्धिके लिये इसका विनियोग है। इसी देनेवाली तथा उत्तम बुद्धिवाले क्रियापरायण पुरुषोंको उन- मन्त्रके द्वारा अङ्गन्यास करे। का कर्तव्य सुझाती हुई सचेत करनेवाली हैं, उन सरस्वती- 'अङ्गों और उपाङ्गोंके सहित चारों वेदोंमें जिन एक ही देवीने इस यज्ञको धारण किया है॥४॥ देवताका स्तुति-गान होता है, जो ब्रह्मकी अद्वैत-शक्ति हैं, 'महो अर्ण'—इस मन्त्रके मधुच्छन्दा ऋषि हैं, गायत्री वे सरस्वतीदेवी हमारी रक्षा करें।' छन्द है, सरस्वती देवता हैं, 'सौ'—यह बीज, शक्ति और 'ह्रीं' आ नो दिवो बृहत पर्वतादा कीलक तीनों है। मन्त्रके द्वारा न्यास करे। सरस्वती यजता गन्तु यज्ञम् । 'जो अन्तर्यामीरूपसे समस्त त्रिलोकीका नियन्त्रण करती हवं देवी जुजुषाणा घृताची हैं, जो रुद्र-आदित्य आदि देवताओंके रूपमें स्थित हैं, शग्मां नो वाचमुशती शृणोतु ॥ २ ॥ वे सरस्वतीदेवी हमारी रक्षा करें।' ह्रीं-हम लोगोंके द्वारा यष्टव्य सरस्वती देवी प्रकाशमय 'सौ' महो अर्ण सरस्वती प्रचेतयति केतुना। धियो द्युलोकसे उतरकर महान् पर्वताकार मेघोंके बीचमें होती हुई विश्वा विराजति ॥ ५ ॥ हमारे यज्ञमें आगमन करें। हमारी स्तुतिसे प्रसन्न होकर वे सौं —(इस मन्त्रमें नदीरूपा सरस्वतीका स्तवन किया देवी स्वेच्छापूर्वक हमारे सम्पूर्ण सुखरूप स्तोत्रोंको सुनें ॥२॥ गया है) नदीरूपमें प्रकट हुई सरस्वतीदेवी अपने प्रवाहरूप 'पावका न' इस मन्त्रके मधुच्छन्दा ऋषि हैं, गायत्री कर्मके द्वारा अपनी अगाध जलराशिका परिचय देती हैं। और छन्द है, सरस्वती देवता है, 'श्रीं' यह बीज, शक्ति और कीलक ये ही अपने देवतारूपसे सब प्रकारकी कर्त्तव्यविषयक बुद्धि- तीनों है। इष्टार्थसिद्धिके लिये इस मन्त्रका विनियोग है। मन्त्रके को उद्दीप्त (जाग्रत्) करती हैं ॥ ५ ॥ द्वारा ही अङ्गन्यास करे। 'चत्वारि वाक्०'—इस मन्त्रके उचथ्यपुत्र दीर्घतमा 'जो वस्तुतः वर्ण, पद, वाक्य—तथा उनके अर्थोंके ऋषि हैं, त्रिष्टुप् छन्द है, सरस्वती देवता हैं, ऐं—यह बीज, रूपमें सर्वत्र व्याप्त हैं, जिनका आदि और अन्त नहीं है, जो शक्ति और कीलक तीनों है। (इष्टसिद्धिके लिये विनियोग है।) अनन्त स्वरूपवाली हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें।' मन्त्रके द्वारा न्यास करे। 'श्रीं' पावका न सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु 'जो अन्तर्दृष्टिवाले प्राणियोंके लिये नाना प्रकारके रूपोंमें धिया वसु ॥ ३ ॥ व्यक्त होकर अनुभूत हो रही हैं। जो सर्वत्र एकमात्र ज्ञप्ति— श्रीं-जो सबको पवित्र करनेवाली, अन्नसे सम्पन्न तथा बोधरूपसे व्याप्त हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें।' कर्मोंद्वारा प्राप्त होनेवाली धनकी उपलब्धिमें कारण हैं, वे 'ऐं' चत्वारि वाक् परिमिता पदानि सरस्वतीदेवी हमारे यज्ञमें पधारनेकी कामना करें (अर्थात् तानि विदुब्राह्मणा ये मनीषिण.। यज्ञमें पधारकर उसे पूर्ण करनेमें सहायक बनें ॥ ३ ॥ गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति 'चोदयित्री०' इस मन्त्रके मधुच्छन्दा ऋषि हैं, गायत्री तुरीय वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ ६ ॥ छन्द है, सरस्वती देवता है। 'क्लूं'—यह बीज, शक्ति और ऐं—वाणीके चार पद हैं अर्थात् समस्त वाणी चार कीलक तीनों है अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये विनियोग है। भागोंमें विभक्त है—परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी । मन्त्रके द्वारा ही न्यास करे। इन सबको मनीषी—विद्वान् ब्राह्मण जानते हैं। इनमेंसे तीन 'जो अध्यात्म और अधिदैवरूपा है तथा जो देवताओं- —परा, पश्यन्ती और मध्यमा तो हृदयगुहामे स्थित हैं; की सम्यक् ईश्वरी अर्थात् प्रेरणात्मिका शक्ति हैं, जो हमारे अत वे बाहर प्रकट नहीं होतीं। परन्तु जो चौथी वाणी वैखरी भीतर मध्यमा वाणीके रूपमें स्थित हैं, वे सरस्वती- है, उसे ही मनुष्य बोलते हैं। (इस प्रकार यहाँ वाणीरूपमें देवी मेरी रक्षा करें।' सरस्वतीदेवीकी स्तुति है) ॥ ६ ॥ 'क्लूं' चोदयित्री सूनृताना चेतन्ती सुमतीना यज्ञ दधे 'यद्वाग्वदन्ति०' इस मन्त्रके भार्गव ऋषि हैं, त्रिष्टुप् सरस्वती ॥ ४ ॥ छन्द है, सरस्वती देवता हैं। ह्रीं—यह बीज, शक्ति और क्लूं-जो प्रिय एवं सत्य वचन बोलनेके लिये प्रेरणा कीलक तीनों है। मन्त्रके द्वारा न्यास करे।

६४४ * सरस्वतीरहस्योपनिषद् * 'जो नाम-जाति आदि भेदोंसे अष्टधा विकल्पित हो रही | नहीं सुन पाता, किंतु किसी किसीके लिये तो ये वाग्देवी हैं तथा साथ ही निर्विकल्पस्वरूपमे भी व्यक्त हो रही हैं, वे | अपने स्वरूपको उसी प्रकार प्रकट कर देती हैं, जैसे पतिकी सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें।' | कामना करनेवाली सुन्दर वस्त्रोंसे सुशोभित भार्या अपनेको 'छ्रीं' यद् वाग्वदन्त्यविचेतनानि | पतिके समक्ष अनावृतरूपमें उपस्थित करती है ॥ ९॥ राष्ट्री देवानां निषसाद मन्द्रा। | अम्बितमे—इस मन्त्रके गृत्समद ऋषि हैं, अनुष्टुप् चतस्र ऊर्जं दुदुहे पयांसि | छन्द है, सरस्वती देवता हं, ऐं—यह बीज, शक्ति और क्व स्विद्द्या परमं जगाम ॥७॥ | कीलक तीनो है। मन्त्रके द्वारा न्यास करे । छ्रीं—राष्ट्री अर्थात् दिव्यभावको प्रकाशित करनेवाली | 'ब्रह्मज्ञानीलोग दम नाम-रूपात्मक अखिल प्रपञ्चको तथा देवताओंको आनन्दमग्न कर देनेवाली देवी वाणी | जिनमें आविष्टकर पुन' उनका ध्यान करते हैं, वे एकमात्र जिस समय अज्ञानियोको ज्ञान देती हुई यज्ञमें आसीन | ब्रह्मस्वरूपा सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करें।' (विराजमान) होती हैं, उस समय वे चारो दिशाओके लिये | 'ऐं' अम्बितमे नदीतमे देवितमे सरस्वति । अन्न और जलका दोहन करती ह । इन मध्यमा वाक्में जो | अप्रशस्ता इव स्मसि प्रशस्तिमम्ब नस्कृधि ॥१०॥ श्रेष्ठ है, वह कहाँ जाता है? ॥ ७॥ | ऐं—(परम कल्याणमयी )—माताओमें सर्वश्रेष्ठ, 'देवी वाचं' इस मन्त्रके भार्गव ऋषि हैं, त्रिष्टुप् छन्द | नदियोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा देवियोंमें सर्वश्रेष्ठ हे सरस्वती देवी ! है, सरस्वती देवता हैं, 'सौ'—यह बीज, शक्ति और कीलक | धनाभावके कारण हम अप्रशस्त (निन्दित) मे हो रहे हैं, मा! तीनों है। मन्त्रके द्वारा न्यास करे । | हमे प्रशस्ति (धन-समृद्धि) प्रदान करो ॥ १० ॥ 'व्यक्त और अव्यक्त वाणीवाले देवादि समस्त प्राणी | जो ब्रह्माजीके मुखरूपी कमलोंके वनमें विचरनेवाली जिनका उच्चारण करते है, जो सब अभीष्ट वस्तुओंको दुग्धके | राजहंसी हं, वे सब ओरसे श्वेत कान्तिवाली सरस्वतीदेवी हमारे रूपमें प्रदान करनेवाली कामधेनु हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी | मनरूपी मानसमें नित्य विहार करें । हे काश्मीरपुरमें निवास रक्षा करें।' | करनेवाली शारदादेवी ! तुम्हें नमस्कार है । म नित्य तुम्हारी 'सौ.' देवी वाचमजनयन्त देवास्तां | प्रार्थना करता हूँ । मुझे विद्या (ज्ञान) प्रदान करो। अपने विश्वरूपा पशवो वदन्ति । | चार हाथोमे अक्षसूत्र, अङ्कुश, पाश और पुस्तक धारण सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना | करनेवाली तथा मुक्ताहारसे सुशोभित सरस्वती देवी मेरी धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु ॥८॥ | वाणीमे सदा निवास करें । शङ्खके समान सुन्दर कण्ठ सौ—प्राणरूप देवोंने जिस प्रज्ञागमान वैखरी वाणीको | एव सुन्दर लाल ओठोंवाली, सब प्रकारके भूषणोंसे विभूषिता उत्पन्न किया, उसको अनेक प्रकारके प्राणी बोलते है । वे | महासरस्वती देवी मेरी जिह्वाके अग्रभागमे सुखपूर्वक कामधेनुतुल्य आनन्ददायक तथा अन्न और बल देनेवाली | विराजमान हों । जो ब्रह्माजीकी प्रियतमा सरस्वतीदेवी वाग्रूपिणी भगवती उत्तम स्तुतियोंसे सन्तुष्ट होकर हमारे | श्रद्धा, धारणा और मेधा-स्वरूपा है, वे भक्तोंके जिह्वाग्रमे समीप आयें ॥८॥ | निवासकर शम दमादि गुणोंको प्रदान करती हैं। जिनके 'उत त्व ०' इस मन्त्रके बृहस्पति ऋषि हैं, त्रिष्टुप् छन्द | केश पाश चन्द्रकलासे अलङ्कृत है तथा जो भव-सन्तापको है, सरस्वती देवता हैं, 'स'—यह बीज, शक्ति और कीलक | शमन करनेवाली सुधा-नदी हैं, उन सरस्वतीरूपा भवानीको तीनों है। (विनियोग पूर्ववत् है) मन्त्रके द्वारा न्यास करे । | मै नमस्कार करता हूँ । जिसको कवित्व, निर्भयता, भोग और 'जिनको ब्रह्मविद्यारूपसे जानकर योगी सारे बन्धनोंको | मुक्तिकी इच्छा हो, वह इन दस मन्त्रोंके द्वारा सरस्वतीदेवीकी नष्ट कर डालते और पूर्ण मार्गके द्वारा परम पदको प्राप्त होते | भक्तिपूर्वक अर्चना करके स्तुति करे । भक्ति और श्रद्धापूर्वक हैं, वे सरस्वतीदेवी मेरी रक्षा करे।' | सरस्वतीदेवीकी विधिपूर्वक अर्चना करके नित्य स्तवन करनेवाले 'स' उत त्व पश्यन्न ददर्श वाच- | भक्तको छ. महीनेके भीतर ही उनकी कृपाकी प्रतीति हो जाती मुत त्व. शृण्वन्न शृणोत्येनाम् । | है। तदनन्तर उसके मुखसे अनुपम अप्रमेय गद्य-पद्यात्मक शब्दोंके उतो त्वस्मै तन्वं विसस्रे | रूपमें ललित अक्षरोंवाली वाणी स्वयमेव निकलने लगती है । जायेव पत्य उशती सुवासा ॥९॥ | प्रायः सरस्वतीका भक्त कवि बिना दूसरोंसे सुने हुए ही ग्रन्थोंके स—कोई-कोई वाणीको देखते हुए भी नही देखता | अभिप्रायको समझ लेता है। ब्राह्मणो ! इस प्रकारका निश्चय (समझकर भी नही समझ पाता), कोई इन्हें सुनकर भी | सरस्वती देवीने अपने श्रीमुखसे ही प्रकट कियाथा। ब्रह्माके

कल्याण श्रीसरस्वती अक्षसूत्राङ्कुशधरा पाशपुस्तकधारिणी। मुक्ताहारसमायुक्ता वाचि तिष्ठतु मे सदा ॥ ( सरस्वती हृ० )

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* महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति *      ६४५


[बायाँ स्तम्भ]

द्वारा ही मैंने सनातनी आत्मविद्याको प्राप्त किया और सन्- चित्-आनन्दरूपसे मुझे नित्य ब्रह्मत्व प्राप्त है ॥ १-११ ॥

तदनन्तर सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंके साम्यसे प्रकृतिकी सृष्टि हुई । दर्पणमें प्रतिबिम्बके समान प्रकृतिमें पड़ी चेतनकी छाया ही सत्यवत् प्रतीत होती है । उस चेतनकी छायासे प्रकृति तीन प्रकारकी प्रतीत होती है, प्रकृतिके द्वारा अवच्छिन्न होनेके कारण ही तुम्हे जीवत्व प्राप्त हुआ है । शुद्ध सत्त्वप्रधाना प्रकृति माया कहलाती है। उस शुद्ध सत्त्वप्रधाना मायामें प्रतिबिम्बित चेतन ही अज (ब्रह्मा) कहा गया है। वह माया सर्वज्ञ ईश्वरकी अपने अधीन रहनेवाली उपाधि है। मायाको वशमें रखना, एक (अद्वितीय) होना और सर्वज्ञत्व—ये उन ईश्वरके लक्षण हैं। सात्त्विक, समष्टिरूप तथा सब लोकोंके साक्षी होनेके कारण वे ईश्वर जगत्‌की सृष्टि करने, न करने तथा अन्यथा करनेमें समर्थ हैं। इस प्रकार सर्वज्ञत्व आदि गुणोंमे युक्त वह चेतन ईश्वर कहलाता है। मायाकी दो शक्तियाँ हैं—विक्षेप और आवरण । विक्षेप-शक्ति लिङ्ग शरीरसे लेकर ब्रह्माण्डतकके जगत्‌की सृष्टि करती है। दूसरी आवरण- शक्ति है, जो भीतर द्रष्टा और दृश्यके भेदको तथा बाहर ब्रह्म और सृष्टिके भेदको आवृत करती है। वही संसार-बन्धनका कारण है, साक्षीको वह अपने सामने लिङ्ग-शरीरसे युक्त प्रतीत होती है। कारणरूपा प्रकृतिमें चेतनकी छायाका समावेश होनेसे व्यावहारिक जगत्में कार्य करनेवाला जीव प्रकट होता है। उसका यह जीवत्व आरोपवश साक्षीमें भी आभासित होता है। आवरण शक्ति के नष्ट होनेपर भेदकी स्पष्ट प्रतीति होने लगती है (इससे चेतनका जड़में आत्मभाव नहीं रहता, अत ) जीवत्व चला जाता है। तथा जो शक्ति सृष्टि और ब्रह्मके भेदको आवृत करके स्थित होती है, उसके वशीभूत हुआ ब्रह्म विकारको प्राप्त हुआ सा भासित होता है, वहाँ भी आवरणके नष्ट होनेपर ब्रह्म और सृष्टिका भेद स्पष्टरूपसे प्रतीत होने लगता है । उन दोनोमेंसे सृष्टिमें ही विकारकी स्थिति होती है, ब्रह्ममें नहीं। अस्ति (है), भाति (प्रतीत होता है), प्रिय (आनन्दमय), रूप और


[दायाँ स्तम्भ]

नाम—ये पाँच अंश हे । इनमें अस्ति, भाति और प्रिय—ये तीनों ब्रह्मके स्वरूप है तथा नाम और रूप—ये दोनों जगत्‌के स्वरूप हैं। इन दोनो—नाम-रूपोंके सम्बन्धसे ही सच्चिदानन्द परब्रह्म जगत्-रूप बनता है ॥ १२—२४ ॥

साधकको हृदयमे अथवा बाहर सर्वदा समाधि साधन करना चाहिये । हृदयमें दो प्रकारकी समाधि होती है—सविकल्प और निर्विकल्परूप । सविकल्प समाधि भी दो प्रकारकी होती है— एक दृश्यानुविद्ध और दूसरी शब्दानुविद्ध । चित्तमें उत्पन्न होने- वाले कामादि विकार दृश्य हैं तथा चेतन आत्मा उनका साक्षी है—इस प्रकार ध्यान करना चाहिये । यह दृश्यानुविद्ध सविकल्प समाधि है । मे असङ्ग, सच्चिदानन्द, स्वयम्प्रकाश, अद्वैतस्वरूप हूँ—इस प्रकारकी सविकल्प समाधि शब्दानुविद्ध कहलाती है। आत्मानुभूति रसके आवेगवश दृश्य और शब्दादिकी उपेक्षा करनेवाले साधकके हृदयमें निर्विकल्प समाधि होती है । उस समय योगीकी स्थिति वायुशून्य प्रदेशमें रखे हुए दीपककी भाँति अविचल होती है । यह हृदयमे होनेवाली निर्विकल्प और सविकल्प समाधि है । इसी तरह बाह्य- देशमें भी जिस-किसी वस्तुको लक्ष्य करके चित्त एकाग्र हो जाता है, उसमें समाधि लग जाती है । पहली समाधि द्रष्टा और दृश्यके विवेकसे होती है, दूसरी प्रकारकी समाधि वह है, जिसमें प्रत्येक वस्तुसे उसके नाम और रूपको पृथक् करके उसके अधिष्ठानभूत चेतनका चिन्तन होता है। और तीसरी समाधि पूर्ववत् है, जिसमें सर्वत्र व्यापक चैतन्य रसानुभूतिजनित आवेगसे स्तब्धता छा जाती है। इन छः प्रकारकी समाधियोंके साधनमे ही निरन्तर अपना समय व्यतीत करे । देहाभिमानके नष्ट हो जाने और परमात्म-ज्ञान होनेपर जहाँ-जहाँ मन जाता है, वहीं वहीं परम अमृतत्वका अनुभव होता है। हृदयकी गाँठें खुल जाती हैं, सारे संशय नष्ट हो जाते हैं, उस निष्फल और सकल ब्रह्मका साक्षात्कार होनेपर विद्वान् पुरुषके समस्त कर्म क्षीण हो जाते हैं। 'मुझमें जीवत्व और ईश्वरत्व कल्पित हैं, वास्तविक नहीं' इस प्रकार जो जानता है, वह मुक्त है—इसमे तनिक भी सन्देह नहीं है॥ २५-३३॥

॥ ऋग्वेदीय सरस्वतीरहस्योपनिषद् समाप्त ॥


शान्तिपाठ

ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ अथर्ववेदीय देव्युपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! देवीकी ब्रह्मस्वरूपता, देवताओंद्वारा देवीकी स्तुति, देवी-महिमा और इसके पाठका फल


[बायाँ स्तम्भ] सभी देवता, देवीके समीप जाकर, प्रार्थना करने लगे— 'महादेवि ! तुम कौन हो ?' ॥ १ ॥ उन्होंने कहा-'मैं ब्रह्मस्वरूपा हूँ। मुझसे प्रकृति पुरुषात्मक कारणरूप और कार्यरूप जगत् उत्पन्न हुआ है। मैं आनन्द और अनानन्दरूपा हूँ । मैं विज्ञान और अविज्ञानरूपा हूँ । अवश्य जाननेयोग्य ब्रह्म और अब्रह्म भी मैं ही हूँ। पञ्चीकृत और अपञ्चीकृत महाभूत भी मैं ही हूँ। यह सारा दृश्य जगत् मैं ही हूँ। वेद और अवेद मैं हूँ। विद्या और अविद्या भी मैं, अजा और अनजा (प्रकृति और उससे भिन्न) भी मैं हूँ, नीचे ऊपर, अगल-बगल भी मे ही हूँ। मैं रुद्रों और वसुओं- के रूपमें सञ्चार करती हूँ । मैं आदित्यों और विश्वेदेवोंके रूपोंमें फिरा करती हूँ । मैं मित्र और वरुण दोनोंका, इन्द्र एव अग्निका और दोनों अश्विनीकुमारोंका भरण पोषण करती हूँ । मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भगको धारण करती हूँ । त्रैलोक्यको आक्रान्त करनेके लिये विस्तीर्ण पादक्षेप करनेवाले विष्णु, ब्रह्मदेव और प्रजापतिको मै ही धारण करती हूँ । देवोंको हवि पहुँचानेवाले और सावधानीसे सोमरस निकालनेवाले यजमानके लिये हविर्द्रव्योंसे युक्त धनको धारण करती हूँ। मे सम्पूर्ण जगत्की ईश्वरी, उपासकोंको धन देनेवाली, ज्ञानवती और यज्ञाहोंमें (यजन करने योग्य देवोंमें) मुख्य हूँ। मैं ही इस जगत्‌के पितारूप आकाशको सर्वाधिष्ठान-


[दायाँ स्तम्भ] स्वरूप परमात्माके ऊपर उत्पन्न करती हूँ । मेरा स्थान आत्मस्वरूपको धारण करनेवाली बुद्धिवृत्तिमें है। जो इस प्रकार जानता है, वह दैवी सम्पत्ति लाभ करता है' ॥२-७॥ तत्र उन देवोंने कहा—'देवीको नमस्कार है। बड़े-बड़ोंको अपने-अपने कर्तव्यमे प्रवृत्त करनेवाली कल्याणकर्त्री महादेवीको सदा नमस्कार है। गुण-साम्यावस्थारूपिणी मङ्गलमयी देवीको नमस्कार है । नियमयुक्त होकर हम उन्हे प्रणाम करते ह । उन अग्निके से वर्णवाली, ज्ञानसे जगमगानेवाली, दीप्तिमती, कर्मफलप्राप्तिके हेतु सेवन की जानेवाली दुर्गा-देवीकी हम शरणमें हैं । असुरोका नाश करनेवाली देवि ! तुम्हें नमस्कार है। प्राणरूप देवोंने जिस प्रकाशमान वैखरी वाणीको उत्पन्न किया, उसको अनेक प्रकारके प्राणी बोलते हे । वे कामधेनु- तुल्य आनन्ददायक और अन्न तथा बल देनेवाली वाग्रूपिणी भगवती उत्तम स्तुतिसे सतुष्ट होकर हमारे समीप आयें । कालका भी नाश करनेवाली, वेदोंद्वारा स्तुत विष्णुशक्ति, स्कन्दमाता ( शिवशक्ति ), सरस्वती ( ब्रह्मशक्ति ), देवमाता अदिति और दक्ष कन्या ( सती ), पापनाशिनी एव कल्याण- कारिणी भगवतीको हम प्रणाम करते हैं। हम महालक्ष्मीको जानते हैं और उन सर्वशक्तिरूपिणीका ही ध्यान करते हे । वे देवी हमें उस विषयमें ( ज्ञान-ध्यानमें ) प्रवृत्त करें । हे दक्ष ! आपकी जो कन्या अदिति हैं, वे प्रसूता हुईं और

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कल्याण सच्चिदानन्दमयी देवी जगन्नाथ हृत्पुण्डरीकमध्यस्थां प्रातःसूर्यसमप्रभाम् । पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम् । त्रिनेत्रां रक्तवसनां भक्तकामदुघां भजे ॥ (देव्युपनिषद्)

  • महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ६४७ उनके स्तुत्यर्ह और मृत्युरहित देवता उत्पन्न हुए। काम ( क ), योनि ( ए ), कमला ( ई ), वज्रपाणि—इन्द्र ( ल ), गुहा ( ह्रीँ )। ह, स—वर्ण, मातरिश्वा—वायु ( क ), अभ्र ( ह ), इन्द्र ( ल ), पुन. गुहा ( ह्रीँ )। स, क, ल—वर्ण, और माया ( ह्रीँ ), यह सर्वात्मिका जगन्माताकी मूल विद्या है और यह ब्रह्मरूपिणी है। ( शिवशक्त्यभेदरूपा, ब्रह्म विष्णु-शिवात्मिका, सरस्वती- लक्ष्मी-गौरीरूपा, अशुद्ध मिश्र शुद्धोपासनात्मिका, समरसीभूत शिवशक्त्यात्मक ब्रह्मस्वरूपका निर्विकल्प ज्ञान देनेवाली, सर्वतत्त्वात्मिका महात्रिपुरसुन्दरी—यही इस मन्त्रका भावार्थ है। यह मन्त्र सब मन्त्रोंका मुकुटमणि है और मन्त्रशास्त्रमें पञ्चदशी कादि श्रीविद्याके नामसे प्रसिद्ध है। इसके छ. प्रकार- के अर्थ अर्थात् भावार्थ, वाच्यार्थ, सम्प्रदायार्थ, कौलिकार्थ, रहस्यार्थ और तत्त्वार्थ 'नित्या षोडशिकार्णव' ग्रन्थमे बताये गये हैं। इसी प्रकार 'वरिवस्यारहस्य' आदि ग्रन्थोंमें इसके और भी अनेक अर्थ दर्शाये हैं। श्रुतिमे भी ये मन्त्र इस प्रकारसे अर्थात् कचित् स्वरूपोद्धार, क्वचित् लक्षणा और लक्षित लक्षणासे और कहीं वर्णके पृथक् पृथक् अवयव दरसाकर जान बूझकर विश्रृङ्खलरूपसे कहे गये हैं। इससे यह मालूम होगा कि ये मन्त्र कितने गोपनीय और महत्त्वपूर्ण हैं।) ये परमात्माकी शक्ति हैं। ये विश्वमोहिनी हैं। पाश, अङ्कुश, धनुष और बाण धारण करनेवाली हैं। ये 'श्रीमहा- विद्या' हैं। जो इस प्रकार जानता है, वह शोकको पार कर जाता है। भगवती ! तुम्हें नमस्कार है। माता ! सब प्रकारसे हमारी रक्षा करो ॥ ८—१६ ॥ ( मन्त्रद्रष्टा ऋषि कहते हैं— ) वही ये अष्ट वसु हैं, वही ये एकादश रुद्र हैं, वही ये द्वादश आदित्य हैं, वही ये सोमपान करनेवाले और न करनेवाले विश्वेदेव हैं, वही ये यातुधान ( एक प्रकारके राक्षस ), असुर, राक्षस, पिशाच, यक्ष और सिद्ध हैं, वही ये सत्त्व रज-तम हैं, वही ये ब्रह्म- विष्णु-रुद्ररूपिणी हैं, वही ये प्रजापति इन्द्र-मनु हैं, वही ये ग्रह, नक्षत्र और तारे हैं, वही कला-काष्ठादि कालरूपिणी हैं, पापका नाश करनेवाली, भोग-मोक्ष देनेवाली, अन्तरहित, विजयाधिष्ठात्री, निर्दोष, शरण लेने योग्य, कल्याणदात्री और मङ्गलरूपिणी उन देवीको हम सदा प्रणाम करते हैं। वियत्—आकाश ( ह ) तथा 'ई' कारसे युक्त, वीतिहोत्र— अग्नि ( र ) सहित, अर्धचन्द्र ( ँ ) से अलंकृत जो देवी- का बीज (ह्रीँ) है, वह सब मनोरथोंको पूर्ण करनेवाला है। इस एकाक्षर ब्रह्मका ऐसे यति ध्यान करते हैं, जिनका चित्त शुद्ध है, जो निरतिशयानन्दपूर्ण हैं और जो ज्ञानके सागर हैं। ( यह मन्त्र देवीप्रणव माना जाता है। ॐकारके समान ही यह प्रणव भी व्यापक अर्थसे भरा है। सक्षेपमें इसका अर्थ इच्छा-ज्ञान-क्रियाधार, अद्वैत, अखण्ड, सच्चिदानन्द समरसीभूत शिव-शक्ति-स्फुरण है।) वाणी ( ऐँ ), माया ( ही ), ब्रह्मासू—काम ( क्लीँ ), इसके आगे वक्त्र अर्थात् आकारसे युक्त छठा व्यञ्जन ( चा ), 'अवाम श्रोत्र'— दक्षिण कर्ण ( उ ) और बिन्दु अर्थात् अनुस्वारसे युक्त सूर्य ( मु ), नारायण अर्थात् 'आ'से युक्त टकारसे तीसरा वर्ण (डा), अधर अर्थात् 'ऐ'से युक्त वायु ( यै ) और 'विच्चे'—यह नवार्णमन्त्र उपासकोंको आनन्द और ब्रह्मसायुज्य देनेवाला है। (इस मन्त्रका अर्थ—हे चित्स्वरूपाणी महासरस्वती ! हे सद्रूपिणी महालक्ष्मी ! हे आनन्दरूपिणी महाकाली ! ब्रह्मविद्या पानेके लिये हम सब समय तुम्हारा ध्यान करते हैं। हे महाकाली- महालक्ष्मी-महासरस्वतीस्वरूपिणी चण्डिके ! तुम्हें नमस्कार है। अविद्यारूप रज्जुकी दृढ ग्रन्थिको खोलकर मुझे मुक्त करो।) जो हृदयरूप कमलके मध्यमें रहती हैं, प्रातःकालीन सूर्यके समान जिनकी प्रभा है, जो पाश और अङ्कुश धारण किये रहती हैं, जिनका मनोहर रूप है, जिनके हाथ वरद और अभय मुद्राओंसे युक्त हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो लाल वस्त्र पहने रहती हैं और भक्तोंके मनोरथ पूर्ण करती हैं, उन देवीको मै भजता हूँ। महाभयका नाश करनेवाली, महासङ्कटको शान्त करनेवाली और महान् करुणाकी साक्षात् मूर्ति तुम महादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ। जिनका स्वरूप ब्रह्मादिक भी नहीं जानते— इसलिये जिन्हें अज्ञेया कहते हैं, जिनका अन्त नहीं मिलता— इसलिये जिन्हें अनन्ता कहते हैं, जिनका स्वरूप देख नहीं पड़ता—इसलिये जिन्हें अलक्ष्या कहते हैं, जिनका जन्म समझमे नहीं आता—इसलिये जिन्हें अजा कहते हैं, जो अकेली ही सर्वत्र है—इसलिये जिन्हें एका कहते है, जो अकेली ही विश्वरूपमें सजी हुई हैं—इसलिये जिन्हे नैका कहते हैं, वे इसीलिये अज्ञेया, अनन्ता, अजा, एका और नैका कहाती हैं। सब मन्त्रोंमें 'मातृका'—मूलाक्षररूपसे रहनेवाली, शब्दोंमें अर्थरूपसे रहनेवाली ज्ञानोंमे 'चिन्मयातीता', शून्यों- में 'शून्यसाक्षिणी' तथा जिनसे और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है, वे दुर्गा नामसे प्रसिद्ध हैं। उन दुर्विज्ञेया, दुराचारनाशिनी और ससार-सागरसे तारनेवाली दुर्गादेवीको ससारसे डरा हुआ मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १७—२५ ॥

यहाँ पृष्ठ का देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

६४८ -- देव्युपनिषद् -- इस अथर्वशीर्षका जो अध्ययन करता है, उसे पाँचों पापोंका नाश करता है, प्रातःकालमें अध्ययन करनेवाला रात्रि- अथर्वशीर्षके जपका फल प्राप्त होता है। इस अथर्वशीर्षको में किये हुए पापोंका नाश करता है, दोनो समय अध्ययन न जानकर जो प्रतिमास्थापन करता है, वह सैकड़ों लाख जप करनेवाला पहलेका पापी भी निष्पाप होता है । मध्यरात्रिमे करके भी अर्चासिद्धि नहीं प्राप्त करता । अष्टोत्तरशत (१०८ तुरीय* सन्ध्याके समय जप करनेसे वाक्सिद्धि प्राप्त होती है। नयी बार ) जप (इत्यादि ) इसकी पुरश्चरणविधि है। जो इसका दस प्रतिमापर जप करनेसे देवताका सान्निध्य प्राप्त होता है । बार पाठ करता है, वह उसी क्षण पापोंसे मुक्त हो जाता है मौमाश्विनी (अमृतसिद्धि) योगमें महादेवीकी सन्निधिमे जप और महादेवीके प्रसादसे बडे दुस्तर सकटोंको पार कर जाता करनेसे महामृत्युसे तर जाता है। जो इस प्रकार जानता है, वह है। इसका सायङ्कालमे अध्ययन करनेवाल दिनमे किये हुए महामृत्युसे तर जाता है । इस प्रकार यह अविद्यानाशिनी ब्रह्मविद्या है ॥ २६ ॥ ॥ अथर्ववेदीय देव्युपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣳसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्ताक्ष्र्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्ति . ! शान्ति . !! शान्ति . !!! सब ब्रह्म है सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत । अथ खलु क्रतुमय' पुरुषो यथाक्रतुरस्मिल्लोके पुरुषो भवति तथेत' प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत । (छान्दोग्य ३ । १४ । १) यह सब ब्रह्म ही है । ब्रह्मसे ही जगत् उत्पन्न होता है, ब्रह्ममें ही विलीन होता है और ब्रह्ममें ही चेष्टा करता है। शान्त (मयत) होकर ब्रह्मकी उपासना करनी चाहिये । पुरुष कर्ममय है। इस लोकमें जैसा कुछ कर्म करता है, मरनेके बाद प लोकमें वह वैसा ही होता है। इसलिये सत्कर्मका अनुष्ठान करना चाहिये ।

  • श्रीविद्याके उपासकोंके लिये चार सन्ध्याएँ आवश्यक हैं । इनमें तुरीय-सन्ध्या मध्यरात्रिमें होती है ।

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥

ऋग्वेदीय

बह्वृचोपनिषद्

शान्तिपाठ

ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि। वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि। सत्यं वदिष्यामि। तन्मामवतु। तद्वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम्॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!


देवीसे सबकी उत्पत्ति और देवीकी ब्रह्मरूपता

हरिः ॐ। एकमात्र देवी ही सृष्टिसे पूर्व थीं, उन्होंने ब्रह्माण्डकी सृष्टि की। वे कामकलाके नामसे विख्यात हैं, वे ही शृङ्गारकला कहलाती हैं। उन्हींसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए, विष्णु प्रकट हुए, रुद्र प्रादुर्भूत हुए। उन्हींसे समस्त मरुद्गण उत्पन्न हुए। उन्हींसे गानेवाले गन्धर्व, नाचनेवाली अप्सराएँ और वाद्य बजानेवाले किन्नर सब ओर उत्पन्न हुए। उन्हींसे भोग-सामग्री उत्पन्न हुई, सब कुछ उत्पन्न हुआ, सब कुछ शक्तिसे ही उत्पन्न हुआ। अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज तथा जरायुज—जितने स्थावर जङ्गम प्राणी हैं, उनकी तथा मनुष्यकी सृष्टि भी उन्हींसे हुई। वे ही अपरा शक्ति हैं, वे ही वैशाम्भवी विद्या, कादि विद्या, हादि विद्या या सादि विद्या कहलाती हैं, वे ही रहस्यरूपा हैं। वे ही प्रणववाच्य अक्षर तत्त्व हैं, ॐ अर्थात् सच्चिदानन्दस्वरूपा वे वाणीमात्रमें प्रतिष्ठित हैं। वे ही जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों पुरों तथा स्थूल, सूक्ष्म और कारण—इन तीनों प्रकारके शरीरोंको व्याप्तकर बाहर और भीतर प्रकाश फैला रही हैं। देश, काल और वस्तुके भीतर असङ्ग होकर रहती हुई वे महात्रिपुरसुन्दरी प्रत्यक्चेतना हैं। वे ही आत्मा हैं, उनके अतिरिक्त सब असत्य है, अनात्मा है। ये ब्रह्मविद्या हैं, भावाभाव-कलासे विनिर्मुक्त चिन्मयी विद्या-शक्ति हैं तथा अद्वितीय ब्रह्मका बोध करानेवाली हैं। वे सत्, चित् और आनन्दरूप लहरोंवाली श्रीमद्महात्रिपुरसुन्दरी बाहर और भीतर प्रविष्ट होकर स्वयं अकेली ही विराजमान हो रही हैं। उनके अस्ति, भाति और प्रिय—इन तीन रूपोंमें जो अस्ति है, वह सन्मात्रका बोधक है। जो भाति है, वह चिन्मात्र है और जो प्रिय है, वह आनन्द है। इस प्रकार सब आकारोंमें श्रीमद्महात्रिपुरसुन्दरी ही विराजमान हैं, तुम और मैं, सारा विश्व और सारे देवता तथा अन्य सब कुछ श्रीमद्महात्रिपुरसुन्दरी ही हैं। ललिता नामकी वस्तु ही एकमात्र सत्य है, वही अद्वितीय, अखण्ड परब्रह्म तत्त्व है। पाँचों रूप अर्थात् अस्ति, भाति, प्रिय, नाम और रूपके परित्यागसे तथा अपने स्वरूपके अपरित्योगसे अधिष्ठानरूप जो एक सत्ता बच रहती है, वही महान् परम तत्त्व है॥ २॥

उसीको ‘प्रज्ञान ही ब्रह्म है’ अथवा ‘मैं ब्रह्म हूँ’ इत्यादि वाक्योंसे प्रकट किया जाता है। ‘वह तू है’ इत्यादि वाक्योंसे उसीका कथन किया जाता है। ‘यह आत्मा ब्रह्म है’, ‘ब्रह्म ही मे हूँ’, ‘जो मै हूँ’, ‘वह मे हूँ’, ‘जो वह है, सो मै हूँ’—इत्यादि श्रुतिवाक्योंके द्वारा जिनका निरूपण होता है, वे यही षोडशी श्रीविद्या हैं। वही पञ्चदशाक्षर मन्त्रवाली श्रीमद्महात्रिपुरसुन्दरी, बाला, अम्बिका, बगला, मातङ्गी, स्वयंवर-कल्याणी, भुवनेश्वरी, चामुण्डा, चण्डा, वाराही, तिरस्करिणी, राजमातङ्गी, शुकश्यामला, लघुश्यामला, अश्वारूढा, प्रत्यङ्गिरा, धूमावती, सावित्री, सरस्वती, ब्रह्मानन्दकला इत्यादि नामोंसे अभिहित होती हैं। ऋचाएँ एक अविनाशी परम आकाशमें प्रतिष्ठित हैं, जिसमे सारे देवता भलीभाँति निवास करते हैं, उसको जाननेका प्रयत्न जिसने नहीं किया, वह ऋचाओंके अध्ययनसे क्या कर सकता है। निश्चय ही उसको जो जान लेते हैं, वे ही उसमे सदाके लिये स्थित हो जाते हैं।

॥ ऋग्वेदीय बह्वृचोपनिषद् समाप्त ॥

ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!

॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ ऋग्वेदीय सौभाग्यलक्ष्म्युपनि द् शान्तिपाठ ॐ वाङ् मे मनसि प्रतिष्ठिता मनो मे वाचि प्रतिष्ठितमाविरावीर्म एधि । वेदस्य म आणीस्थः श्रुतं मे मा प्रहासीः । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् संदधाम्यृतं वदिष्यामि । सत्यं वदिष्यामि । तन्मामवतु । तद्वक्तारमवतु । अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम खण्ड श्रीमहालक्ष्मीका श्रीसूक्तके अनुसार ध्यान, न्यास, पूजन और यन्त्रकी विधि हरि ॐ। एक समय देवताओंने भगवान् आदिनारायण- ॐ हिरण्मय्यै नमः हृदयाय नमः। ॐ चन्द्रायै नमः शिरसे से कहा—'भगवन् ! हमारे लिये सौभाग्यलक्ष्मी विद्याका स्वाहा। ॐ रजतस्रजायै नमः शिखायै वषट्। ॐ हिरण्य- उपदेश कीजिये।' भगवान्ने कहा—'बहुत अच्छा, आप स्रजायै नमः कवचाय हुम्। ॐ हिरण्यायै नमः नेत्रत्रयाय सब देवगण एकाग्रचित्त होकर सुनें । जो स्थूल, सूक्ष्म एव कारण- वौषट्। ॐ हिरण्यवर्णायै नमः अस्त्राय फट् । रूप तीनों अवस्थाओंसे परे तुरीयस्वरूपा है—नहीं-नहीं, तुरीय- —पश्चात् श्रीसूक्तके मन्त्रोंसे अङ्गन्यास करे। सिर, नेत्र, मे भी अतीत अर्थात् निर्गुणस्वरूपा है, सबसे बढ़कर उत्कृष्ट कर्ण, नासिका, मुख, कण्ठ, दोनों भुजाएँ, हृदय, नाभि, लिङ्ग, अर्थात् भयङ्कर रूपवाली है, तथा जो सभी मन्त्रोंको आसन गुदा, ऊरु (जाँघ), जानु, जङ्घा (पिंडली)—इन स्थानोंमें बनाकर उनपर विराजमान हैं, पीठों और उपपीठोमे प्रतिष्ठित श्रीसूक्तके मन्त्रोंसे क्रमशः न्यास करे। इसके बाद निम्नलिखित देवताओंसे आवृत्त है, चार भुजाओंसे युक्त है—उन श्री मन्त्रके अनुसार ध्यान करे— अर्थात् लक्ष्मीदेवीका 'हिरण्यवर्णीम्०' इत्यादि श्रीसूक्तकी अरुणकमलसंस्था तद्रजःपुञ्जवर्णा पञ्चदश ऋचाओंके द्वारा ध्यान करें । करकमलधृतेष्टाभीतीयुग्माम्बुजा च । मणिकटकविचित्राऽऽलङ्कृताऽऽल्पजालै सकलभुवनमाता सन्ततं श्रीः श्रियै नः ॥ अर्थात् हल्के लाल (गुलाबी) रंगके कमलदल- पर बैठी हुईं, कमल परागकी राशिके समान पीत वर्णवाली, चारो हाथोंमें क्रमशः वर मुद्रा, अभय मुद्रा और दो कमल-पुष्प धारण किये हुए, मणिमय कड़ोंसे विचित्र शोभा धारण करने- वाली और अलङ्कारसमूहोंसे अलङ्कृत, समस्त लोकोंकी जननी श्रीमहालक्ष्मीदेवी निरन्तर हमें श्रीसम्पन्न करें ॥ १ ॥ (तत्पश्चात् यन्त्र लिखकर उसकी पूजा करे। यन्त्रके कर्णिकावृत्तके ऊपर अष्टदल, उसपर द्वादशदल तथा उदशदलके ऊपर षोडशदल बनाकर तीनोंको एक एक वृत्तसे ेर दे।) पीठकर्णिका अर्थात् बीजकोषके भीतर साध्य-कार्यसहित श्रीबीज (श्रीं) को लिखे। उसके बाद अष्टदल, द्वादशदल और

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