कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
५६२
- गोपालोत्तरतापनीयोपनिषद् *
अतः रजोगुणसे अर्थात् त्रिगुणमयी प्रकृतिसे परेजो भगवान् गोपाल हैं, 'वह मैं ही हूँ'—इस प्रकार निश्चय करके अपने आत्मा- मे गोपालकी भावना करे । जो यों करता है, वह मोक्ष-सुख का अनुभव करता है, ब्रह्मभावको प्राप्त होता है तथा ब्रह्मवेत्ता होता है। जो गोपों अर्थात् जीवोंको सृष्टिसे लेकर प्रलयतक सदा ही आत्मीय मानकर स्वीकार करते तथा सदा उनकी रक्षा एव पालनमे सलग्न रहते हैं, वे प्रणववाच्य भगवान् ही गोपाल हैं । 'वे तत्, सत्, परब्रह्म श्रीकृष्ण ही मेरे आत्मा हैं, नित्यानन्दरूप जो गोपाल हैं, वह मै हूँ। ॐ वे गोपाल- देव ही तीनों कालोसे अबाधित परम सत्य है । वह मैं हूँ' --इस प्रकार अपने को लेकर मनसे भगवान्के साथ एकता करे । अपनेको इस भावसे देखे-अपने विषयमें यह निश्चय करे कि 'मै गोपाल हूँ—वे ही गोपाल, जो अव्यक्त, अनन्त एव नित्य हैं' ॥ ४१-४४ ॥ भगवान् कहते हैं—ब्रह्मन् ! मथुरापुरीमे मेरा निवास सदा ही बना रहेगा । निश्चय ही मै वहाँ शङ्ख, चक्र, गदा, पद्म और वनमालासे विभूषित होकर रहूँगा । ब्रह्मन् ! मेरा स्वरूप चिन्मय है, सर्वोत्कृष्ट और स्वप्रकाशरूप है, इसमें प्राकृत रूपकी गन्ध भी नहीं है । इस प्रकार जो सदा मेरे स्वरूपका चिन्तन करता है, वह निश्चय ही मेरे परमधामको प्राप्त होता है । जो मुख्यतः मथुरामण्डलमे अथवा जम्बूद्वीपके किसी भी प्रदेशमें रहकर मेरी प्रतिमाका सामग्रियोंद्वारा पूजन करता है तथा मेरा भी ध्यानके द्वारा समाराधन करता है, वह इस भूमण्डलपर मुझे सर्वाधिक प्रियहै। ब्रह्मन् ! मथुरार्ये में श्रीकृष्ण- रूपसे ही सदा वास करता हूँ, अतः वहाँ तुम्हे उसी रूपमे मेरा पूजन करना चाहिये । अधिकारभेदसे विभिन्न युगोका अनुसरण करनेवाले उत्तम बुद्धिसम्पन्न भक्तजन चार रूपोंमें मेरी उपासना-मेरा पूजन करते हैं। वे पीछे प्रकट हुए प्रद्युम्न और अनिरुद्धके साथ गोपाल श्रीकृष्णकी और बलरामकी पूजा करते हैं (ये ही चार व्यूह हैं) । इसके सिवा देवी रुक्मिणीके साथ उनके परम प्रियतम भगवान् वासुदेवकी भी पूजा करते हैं। (युग क्रमसे सत्ययुगमें श्वेतवर्ण बलरामकी, त्रेतामे रक्तवर्ण प्रद्युम्नकी, द्वापरमें पीतवर्ण अनिरुद्धकी और कलिमें श्यामवर्ण श्रीकृष्णकी आराधना करते हैं) ॥ ४५-४९ ॥ विद्वान् पुरुष ऐसी भावना करे कि 'मै नित्य अजन्मा गोपाल हूँ, सनातन प्रद्युम्न हूँ, बलराम हूँ तथा अनिरुद्ध हूँ।' इस प्रकार अपने आत्मारूपसे भगवान्का चिन्तन करके उनकी पूजा करे। मैंने वेद, पाञ्चरात्र तथा अन्यान्य शास्त्रोमें जो विभागपूर्वक वर्णाश्रम-धर्मका उपदेश दिया है, उसके अनुसार निष्काम भावमे स्वधर्मका अनुष्ठान करते हुए उसके द्वारा मेरा पूजन करना चाहिये । भद्रवन एव कृष्णवनके निवासियोको वहाँ विराजमान मेरे स्वरूपकी आराधना करनी चाहिये ॥ ५०-५१ ॥ जो (सकाम या निष्काम) धर्माचरणसे प्राप्त होनेवाली (स्वर्ग-अपवर्गंरूप) मद्गतिसे वञ्चित ह (अतएव मनुष्य- रूपमें जन्मे ह), कलिकालने जिन्हें अपना ग्रास बना लिया है तथा जो मथुरामे रहकर मेरे भजनमें सलग्न रहते हैं, उनकी वहाँ अवश्य स्थिति होती है। (वे वहाँ रहनेके अधिकारी हैं तथा वहाँ रहकर भजन करनेसे उन्हे निश्चय ही अभीष्ट- सिद्धि प्राप्त होती है ।) ब्रह्मन् ! जैसे तुम अपने सनक- सनन्दन आदि पुत्रोके साथ स्नेहयुक्त सम्बन्ध रखते हो, जैसे महादेवजी प्रमथगणोंके साथ स्नेह सम्बन्ध रखते हैं तथा जैसे लक्ष्मीके साथ मेरा प्रेमपूर्ण सम्बन्ध हे, उसी प्रकार मेरा भक्त भी मुझे परम प्रिय है ॥ ५२ ५३ ॥ तदनन्तर उन पद्मसम्भव ब्रह्माजीने पूछा-'भगवन् ! एक ही देव-आप परमेश्वर चार देवताओं (चतुर्व्यूहों) के रूपमे कैसे हो गये ? और उसी प्रकार जो एक अक्षरके रूपमे विख्यात ॐकार है, वह अनेक अक्षर-अकार, उकार, मकार तथा अर्धमात्रा आदिके रूपमे कैसे हो गया ?' यह प्रश्न सुनकर भगवान् नारायणने उन प्रसिद्ध ब्रह्माजीमे कहा- सृष्टिके पूर्व एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म ही सर्वत्र विराजमान था । सर्गकालमें उस ब्रह्मसे अव्यक्त (अव्याकृत मूल प्रकृति) का प्रादुर्भाव हुआ । (अक्षर-अविनाशी ब्रह्मसे उत्पन्न होनेके कारण) अव्यक्त (प्रकृति) भी अक्षर (ब्रह्म) ही है। उस अक्षर अर्थात् अव्यक्त प्रकृतिसे महत्तत्त्व प्रकट हुआ । महत्तत्त्वसे (सात्त्विक, राजस और तामस भेदवाला त्रिविध) अहङ्कार उत्पन्न हुआ । उस (तामस) अहङ्कारसे शब्द आदि पाँच तन्मात्राएँ प्रकट हुईं और उनसे क्रमश. आकाश आदि पाँच महाभूतोंकी सृष्टि हुई । (इसी प्रकार राजस अहङ्कारसे इन्द्रियों तथा सात्विक अहङ्कारसे उनके अधिष्ठाता देवोंकी उत्पत्ति हुई ।) इस प्रकार शरीर- इन्द्रिय आदिके रूपमे स्थित उन महत्तत्त्व आदिसे तथा भूतोंसे वह अक्षर परमात्मा आवृत्त है । (इन प्राकृत आवरणोसे छिपे हुए अक्षर परमात्माको प्राय. ससारी मनुष्य देख नहीं पाते । वास्तवमे वह अक्षर परमात्मा सर्व-
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सच्चिदानन्द नारायण श्रीवत्सलाञ्छनं हृत्स्थं कौस्तुभं प्रभया युतम् । चतुर्भुजं शङ्खचक्राशिशार्ङ्गगदान्वितम् ॥ सुकेयूरान्वित बाहु कण्ठ मालासुशोभितम् । द्युमत्किरीट वलय स्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥ हिरण्मय सौम्यतनु समकाषायमप्रदम् । (गो० उ० ६१-६२)
भगवान् श्रीगोविन्द नमो विज्ञानरूपाय परमानन्दरूपिणे । कृष्णाय गोपीनाथाय गोविन्दाय नमो नमः ॥ (गो० पू० ५।७)
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* महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * [Page 563: ५६३] [बायाँ स्तम्भ] का अन्तर्यामी आत्मा है, अतः उनको अपनेसे अभिन्न मान कर ऐसी भावना करनी चाहिये कि) 'मैं अक्षर हूँ—मैं साक्षात् अविनाशी परमात्मा हूँ, उन परमात्माका वाचक जो प्रणव ( ॐ ) अक्षर है, वह भी मैं हूँ। इसी प्रकार मैं अमर हूँ, निर्भय हूँ और अमृत हूँ। वह जो भयशून्य ब्रह्म है, निःसंदेह वह मैं हूँ। मैं मुक्त हूँ और अक्षर भी मैं हूँ।' (तात्पर्य यह कि जैसे एक ही ब्रह्म महत्तत्त्वादि रूपों- में प्रकट और अनन्त नाम रूपवाले जगत्के आकारमे प्रादुर्भूत हो गया, उसी प्रकार एक ही तत्त्व चतुर्व्यूहरूपमें प्रकट हुआ है और एक ही अक्षरसे अनेक अक्षरोंका भी आविर्भाव हुआ है।) नित्य सत्ता जिसका स्वरूप है, सम्पूर्ण विश्व जिसका ही आकार है तथा जो प्रकाशस्वरूप एव सर्वत्र व्यापक है, वह एकमात्र अद्वितीय ब्रह्म अपनी लीलासे चार व्यूहोंके रूपोंमे प्रकाशित हो रहा है ॥ ५४ ॥ रोहिणीनन्दन बलरामजी प्रणवके 'अ' अक्षरके द्वारा प्रति- पादित होते हैं। ये जाग्रत्-अवस्थाके अभिमानी होनेके कारण 'विश्व' कहे गये हैं। स्वप्नावस्थाके अभिमानी प्रद्युम्नजी 'तैजस' कहलाते हैं। प्रणवके 'उ' अक्षरसे इनका ही बोध होता है। अनिरुद्धजी सुषुप्तिके अभिमानी 'प्राज्ञ' कहे गये हैं। प्रणवके 'म्' अक्षरसे इनका ही प्रतिपादन होता है। जहाँ यह सम्पूर्ण विश्व प्रतिष्ठित है, वे श्रीकृष्ण तुरीय तत्त्व हैं। इन्हें अर्धमात्रात्मक नादरूप या प्रणवका सम्पूर्ण स्वरूप बताया गया है। पूर्वोक्त विश्व, तैजस आदि इन्हींमें अन्तर्हित हैं ॥ ५५-५६ ॥ समस्त जगत्की रचना करनेवाली मूलप्रकृतिरूपा देवी रुक्मिणी श्रीकृष्णकी अन्तरङ्गा शक्ति हैं, अतएव श्रीकृष्ण- स्वरूपा हैं। गोपियोंके रूपमें प्रकट होनेवाली जो श्रुतियाँ हैं, उनकी अपेक्षा प्रणवके साथ ब्रह्मका अधिक घनिष्ठ सम्बन्ध है, श्रुतियाँ और श्रुतिरूपा गोपियाँ दूरसे श्रीकृष्णका आराधन करती हैं, और प्रणव एव रुक्मिणी आदि शक्तियाँ ब्रह्मके साथ अभिन्नता रखती हैं। अतः ब्रह्मका साक्षात् वाचक प्रणव जिस प्रकार ब्रह्मकी प्रकृति है, उसी प्रकार रुक्मिणीको भी ब्रह्मसे साक्षात् सम्बन्ध रखनेके कारण ब्रह्मवादीजन प्रकृति ही बताते हैं। इसलिये सम्पूर्ण विश्वके आधारभूत भगवान् गोपाल ही ॐकाररूपमें प्रतिष्ठित हैं। ब्रह्मवादीजन 'क्लीम्' तथा ॐकारका एक ही अर्थमें पाठ करते हैं। (अतः कृष्णके बीजभूत 'क्लीम्' तथा 'ॐ'में अर्थतः कोई अन्तर [दायाँ स्तम्भ] नहीं है।) विशेषतः मथुरापुरीमें जो चतुर्भुजरूपमें मेरा ध्यान करता है, वह मोक्ष-सुखका अनुभव करता है ॥ ५७–५९ ॥ ध्यानका स्वरूप यों है—भक्तका अष्टदल हृदय-कमल प्रसन्नतासे विकसित है, उसमें भगवान् विराज रहे हैं। उनके दोनों चरण शङ्ख, ध्वजा और छत्रादिके चिह्नोंसे सुशोभित हैं। हृदयमें श्रीवत्स-चिह्न शोभा पा रहा है। वहीं कौस्तुभमणि अपनी अद्भुत प्रभासे प्रकाशित हो रही है। भगवान्के चार हाथ हैं। उनमें शङ्ख, चक्र, शार्ङ्गधनुष, पद्म और गदा—ये सुशोभित हैं। बाँहोंमें भुजबद शोभा दे रहा है। कण्ठ- में धारण की हुई वनमाला भगवान्की स्वाभाविक शोभाको और भी बढा रही है। मस्तकपर किरीट चमचमा रहा है और कलाइयोंमें चमकीले कङ्कण शोभा पा रहे हैं। दोनो कानोंमें मकराकृति कुण्डल झलमला रहे हैं। सुवर्णमय पीताम्बरसे सुशोभित श्यामसुन्दर श्रीविग्रह है। भगवान् इस मुद्रासे स्थित हैं, मानो अपने भक्तजनोंको अभय प्रदान कर रहे हैं। इस प्रकार प्रतिदिन मेरे चतुर्भुजरूपका मन ही मन चिन्तन करे। अथवा मुरली तथा सींग धारण करनेवाले मेरे द्विभुज रूप (श्रीकृष्ण-विग्रह) का ध्यान करे* ॥ ६०–६३ ॥ जिस ब्रह्मज्ञानसे सम्पूर्ण जगत् मथ डाला जाता है, उसके सार (विषय) परब्रह्म—लीला-पुरुषोत्तम जिस पुरीमें विराजमान रहते हों, उसे मथुरा कहते हैं। वहाँ आठ दिक्पालारूपी दलों- से विभूषित मेरा यह भूमिरूपी कमल जगत्के रूपमें प्रकाशित हो रहा है। यह कमल संसार-समुद्रसे ही प्रकट हुआ है तथा जिनका अन्तःकरण राग द्वेष आदिसे शून्य—पूर्णतः सम है, वे ही हंस या भ्रमररूपसे उस कमलका सेवन करते हैं। चन्द्रमा और सूर्यकी दिव्य किरणें पताकाएँ हैं और सुवर्ण- मय पर्वत मेरु मेरा ध्वज है। ब्रह्मलोक मेरा छत्र और नीचे- ऊपरके क्रमसे स्थित सात पाताल लोक मेरे चरण हैं। लक्ष्मी- का निवासभूत जो श्रीवत्स है, वह मेरा स्वरूप ही है। वह [पाद-टिप्पणी / श्लोक] * श्रीवत्सताञ्छन हृत्स्थ कौस्तुभ प्रभया युतम् । – चतुर्भुज शङ्खचक्रशार्ङ्गपद्मगदान्वितम् ॥ – सुकेयूरान्वित बाहु कण्ठ मालासुशोभितम् । द्युमत्किरीट वलय स्फुरन्मकरकुण्डलम् ॥ हिरण्मय सौम्यतनु स्वभक्तायाभयप्रदम् । ध्यायेन्मनसि मा नित्य वेणुशृङ्गधर तु वा ॥
५६४ * गोपालोत्तरतापनीयोपनिषद् *
[बायाँ पृष्ठभाग / Left Column]
लाञ्छन अर्थात् चन्द्राकृति रोम पङ्क्तिके चिह्नसे युक्त है, इसलिये ब्रह्मवादीजन उसे श्रीवत्स लाञ्छन कहते हैं। भगवत्स्वरूपभृत जिस तेजसे सूर्य, चन्द्रमा, अग्नि तथा वाक् आदि तेज भी प्रकाश प्राप्त करते हैं, उस चिन्मय आलोक- को परमेश्वरके भक्तजन कौस्तुभमणि कहते हैं। सत्त्व, रज, तम और अहङ्कार—ये ही मेरी चार भुजाएँ हैं। मेरे रजोगुणमय हाथमे पञ्चभूतात्मक पाञ्चजन्य नामक शङ्ख स्थित है। अत्यन्त चञ्चल समष्टि-मन ही मेरे हाथमे चक्र कहलाता है, आदिमाया ही शार्ङ्ग नामक धनुष है तथा सम्पूर्ण विश्व ही कमलरूपसे मेरे हाथमे विराजमान है। आदि- विद्याको ही गदा समझना चाहिये, जो सदा मेरे हाथमें स्थित रहती है। कभी प्रतिहत न होनेवाले धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी चार दिव्य केयूरों (भुजबंदों) से मेरी चारो भुजाएँ विभूषित हैं। ब्रह्मन् ! मेरा कण्ठ निर्गुण तत्त्व कहा गया है, वह अजन्मा मायाद्वारा मालित (आवृत) होता है, इसलिये तुम्हारे मानस पुत्र सनकादि मुनि उस अविद्याको मेरी माला बताते हैं। मेरा जो कूटस्थ 'सत्' स्वरूप है, उस रूपमें मुझको ही किरीट कहते हैं। क्षर (सम्पूर्ण विनाशी शरीर) और उत्तम (जीव)—ये दोनों मेरे कानोंमे झलमलाते हुए युगल कुण्डल माने गये हैं।
इस प्रकार जो नित्य मनमें मेरा ध्यान करता है, वह मोक्ष- को प्राप्त होता है। वह मुक्त हो जाता है, निश्चय ही उसे मैं अपने- आपको दे डालता हूँ। ब्रह्मन् ! मैंने तुमसे अपने सगुण और निर्गुण-द्विविध स्वरूपके विषयमें जो कुछ बताया है, यह सब सत्य है और भविष्यमें होनेवाला है ॥ ६४--७५ ॥
तब कमलयोनि ब्रह्माजीने पूछा—'भगवन् ! आपके द्वारा बतायी हुई जो आपकी व्यक्त मूर्तियाँ हैं, उनका अवधारण (निश्चय) कैसे हो सकता है ? कैसे देवता उनका पूजन करते हैं ? कैसे रुद्र पूजन करते हैं, कैसे यह ब्रह्मा पूजन कर सकता है ? कैसे विनायकगण पूजन करते हैं ? कैसे बारह सूर्य पूजन करते हैं ? कैसे वसुगण पूजन करते हैं ? कैसे अप्सराएँ पूजन करती हैं ? कैसे गन्धर्व पूजन करते हैं ? जो अपने पदपर ही प्रतिष्ठित रहकर अदृश्यरूपसे स्थित है, वह कौन है और उसकी पूजा कैसे होती है ? तथा मनुष्यगण किसकी और किम प्रकार पूजा करते हैं ?' ॥ ७६ ॥
तत्र वे प्रसिद्ध भगवान् नारायण ब्रह्माजीसे बोले—मेरी
[दायाँ पृष्ठभाग / Right Column]
बारह अव्यक्त मूर्तियाँ हैं, जो सबकी आदिभूता हैं। वे सब लोकोंमें, सब देवोंमें तथा सब मनुष्योंमें स्थित हैं ॥ ७७ ॥
वे अव्यक्त मूर्तियाँ इस प्रकार हैं-रुद्रगणोमे रौद्री मूर्ति, ब्रह्मामे ब्राह्मी मूर्ति, देवताओमे दैवी मूर्ति, मानवोंमें मानवी मूर्ति, विनायकगणोमे विघ्ननाशिनी मूर्ति, बारह सूर्योंमे ज्योति- र्मूर्ति, गन्धर्वोंमें गान्धर्वी मूर्ति, अप्सराओंम गौ, वसुओंमें काम्या तथा अन्तर्धानमे अप्रकाशिनी मूर्ति है। इसके सिवा, जो आविर्भाव तिरोभावरूपा केवला मूर्ति है, वह अपने पदमें (अपनी महिमा एव परमधाममे) प्रतिष्ठित है। मानुषी मूर्ति सात्त्विकी, राजसी और तामसी—तीन प्रकारकी होती है। केवल सच्चिदानन्दैकरमरूप भक्तियोगमे ही 'विज्ञानघन और आनन्दघन मूर्ति प्रतिष्ठित है ॥ ७८-७९ ॥
ॐ प्राणात्मने ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै वै प्राणात्मने नमो नमः॥ ८० ॥
ॐ श्रीकृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ८१ ॥
ॐ अपानात्मने ॐ तत्सद् भूर्भुवः स्वस्तस्मै अपानात्मने वै नमो नमः ॥ ८२ ॥
ॐ कृष्णाय प्रद्युम्नायानिरुद्धाय ॐ तत्सद् भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ८३ ॥
ॐ व्यानात्मने ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै व्यानात्मने वै नमो नमः ॥ ८४ ॥
ॐ श्रीकृष्णाय रामाय ॐ तत्सद भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ८५ ॥
ॐ उदानात्मने ॐ तत्सद् भूर्भुवः स्वस्तस्मै उदानात्मने वै नमो नमः ॥ ८६ ॥
ॐ कृष्णाय देवकीनन्दनाय ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ८७ ॥
ॐ समानात्मने ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै समानात्मने वै नमो नमः ॥ ८८ ॥
ॐ गोपालाय अनिरुद्धाय निजस्वरूपाय ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ८९ ॥
ॐ योऽसौ प्रधानात्मा गोपालः ॐ तत्सद् भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ९० ॥
ॐ योऽसाविन्द्रियात्मा गोपालः ॐ तत्सद् भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ९१ ॥
- महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५६५ ॐ योऽसौ भूतात्मा गोपाल. ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ९२ ॥ ॐ योऽसावुत्तमपुरुषो गोपाल ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ९३ ॥ ॐ योऽसौ परब्रह्म गोपाल ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ९४ ॥ ॐ योऽसौ सर्वभूतात्मा गोपाल. ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ९५ ॥ ॐ योऽसौ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिमतीत्य तुर्यातीत ॐ तत्सद् भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ९६ ॥ ॐ (सच्चिदानन्दस्वरूप) प्राणात्माको नमस्कार है। ॐ तत्, सत्—इन तीनों नामोंसे प्रतिपादित होनेवाले 'भूर्भुव स्वः'— तीनों लोकरूप प्राणात्मा परमेश्वरको बारबार नमस्कार है। ॐ सबका आकर्षण करनेवाले कृष्ण, गौओंके स्वामी गोविन्द एव. गोपीजनोंके प्राणवल्लभ उन श्यामसुन्दरको बारबार नमस्कार है, जो 'ॐ, तत्, सत्' इन तीनों नामोंसे प्रतिपादित होनेवाले हैं तथा 'भूर्भुवः स्वः' इन तीनों लोकोंके रूपमें प्रकट हैं। 'ॐ, तत्, सत्' ये तीन जिनके नाम हैं तथा 'भू भुव, स्व'—ये तीनों जिनके रूप हैं, उन अपानवायुरूप अपानात्मा परमेश्वरको बारबार नमस्कार है। 'ॐ, तत्, सत्'—इन तीनों नामोंसे कहे जानेवाले 'भूर्भुव. स्व.'स्वरूप उन श्रीकृष्ण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धको अवश्य बारबार नमस्कार है। 'ॐ, तत् सत्'—इन तीन नामोंवाले तथा 'भू', मुव. और स्व'—इन तीन रूपोंवाले उन व्यानवायुरूप व्यानात्मा परमेश्वरको बारबार नमस्कार है। 'ॐ, तत्, सत्'—इन तीनों नामोंसे कहे जानेवाले भूतल, अन्तरिक्ष एव स्वर्गरूप उन श्रीकृष्ण और बलरामको निश्चय ही अनेक बार नमस्कार हैं। 'ॐ, तत्, सत्'—इन तीनों नामोंसे कहे जानेवाले, 'भूर्भुव स्व.'स्वरूप उन उदानवायुके रूपमें प्रकट उदानात्मा परमेश्वरको बारबार नमस्कार है। 'ॐ, तत्, सत्'—इन त्रिविध नामोंवाले तथा 'भूर्भुव. स्व.'—इन त्रिविध रूपोंवाले उन सच्चिदानन्दमय देवकीनन्दन श्रीकृष्णको अवश्य ही बारबार नमस्कार है। 'ॐ, तत्, सत्'—इन नामोंसे प्रतिपादित होनेवाले 'भूर्भुव स्व.'स्वरूप उन समान- वायुरूप समानात्मा परमेश्वरको नमस्कार है, नमस्कार है।
'ॐ, तत्, सत्'—इन तीन नामोंसे प्रसिद्ध और 'भूर्भुवः स्व'—इन तीन रूपोंवाले उन स्वस्वरूपभूत सच्चिदानन्दमय गोपालको निश्चय ही नमस्कार है, नमस्कार है। ॐ जो वे प्रधानात्मा गोपाल ह, वे ही 'ॐ, तत्, सत्'—इन तीनों नामों- द्वारा प्रतिपादित होनेवाले तथा 'भूर्भुव स्व.'—इन तीनों लोकों- के रूपमें प्रकट हैं, उन्हें अवश्य ही नमस्कार है, नमस्कार है। ॐ वे जो इन्द्रियात्मा गोपाल हैं, वे ही 'ॐ, तत्, सत्' नामोंसे प्रसिद्ध हैं और वे ही भूतल, अन्तरिक्ष एव स्वर्गरूप हैं; उन्हें निश्चय ही बारबार नमस्कार है। ॐ वे जो भूतात्मा गोपाल हैं, वे ही 'ॐ, तत्, सत्' नामोंसे प्रसिद्ध हैं और वे ही भूतल, अन्तरिक्ष एव स्वर्गरूप हैं, उन्हें निश्चय ही बारबार नमस्कार है। ॐ वे जो उत्तम पुरुष ( पुरुषोत्तम ) गोपाल हैं, वे ही 'ॐ, तत्, सत्'—इन तीनों नामोंसे कहे जानेवाले और भूतल, अन्तरिक्ष एव स्वर्गरूप हैं, उनके लिये निश्चय ही बारबार नमस्कार है। ॐ वे जो परब्रह्म गोपाल हैं, वे ही 'ॐ, तत्, सत्'—ये तीन नाम धारण करते हैं तथा वे ही 'भूर्भुव. स्वः'— इन तीनों लोकोंके रूपमें प्रकट होते हैं, उनको निश्चय ही बारबार नमस्कार है। ॐ वे जो सर्वभूतात्मा गोपाल हैं, वे ही 'ॐ, तत्, सत्'—ये तीन नाम धारण करते हैं और वे ही 'भूर्भुवः स्व.'—इन तीनों लोकोंके रूपमें प्रकट होते हैं, उनके लिये निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है। ॐ वे जो जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—इन तीनों अवस्थाओंको पार करके तुरीय पदपर प्रतिष्ठित भगवान् गोपाल हैं, वे ही 'ॐ, तत्, सत्' कहे जाते हैं और वे ही भूतल, अन्तरिक्ष तथा स्वर्गरूप हैं। उनको निश्चय ही मेरा बारबार नमस्कार है ॥ ८०-९६ ॥ वे एकमात्र देवता भगवान् गोपाल ही सम्पूर्ण भूतोंमें अन्तर्यामीरूपसे छिपे हुए हैं। वे सर्वत्र व्यापक और सब प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं। वे ही सम्पूर्ण कर्मोंके अध्यक्ष (फल- दाता स्वामी ), समस्त भूतोंके निवासस्थान, सबके साक्षी, चैतन्यस्वरूप, केवल और निर्गुण हैं ॥ ९७ ॥ ( भगवान् गोपालकी विभूतिस्वरूप देवता भी वन्दनीय हैं—) रुद्रको नमस्कार है। आदित्यको नमस्कार है। विनायकको नमस्कार है। सूर्यको नमस्कार है। विद्या (सरस्वती)-को नमस्कार है। इन्द्रको नमस्कार है। अग्निको नमस्कार है। यमको नमस्कार है। निर्ऋतिको नमस्कार है।
५६६ * गोपालोत्तरतापनीयोपनिषद् * वरुणको नमस्कार है । मरुत्को नमस्कार है । कुबेरको तापनीय स्तुति प्रदान करके तथा सम्पूर्ण भूतोंकी सृष्टिका नमस्कार है। महादेवजीको नमस्कार है। ब्रह्माको नमस्कार सामर्थ्य देकर वहींपे अन्तर्धान हो गये ॥ ९९ ॥ है और सम्पूर्ण देवताओंको नमस्कार है ॥ ९८ ॥ राधिके ! मैंने ब्रह्मासे, ब्रह्मपुत्र सनकादि मुनियोंसे तथा दुर्वासाजी कहते हैं—इस प्रकार वे भगवान् नारायण श्रीनारदजीसे भी जैसे सुना था, वैसे ही यहाँ वर्णन किया अपने ही स्वरूपभूत ब्रह्माको यह परम पवित्र गोपालोत्तर- है। अब तुम अपने घरकी ओर जाओ ॥१००॥ ॥ अथर्ववेदीय गोपालोत्तरतापनीयोपनिषद् समाप्त ॥ शान्तिपाठ ॐ भ॒द्रं कर्णे॑भिः शृणु॒याम॑ देवा भ॒द्रं प॑श्येमा॒क्षभि॒र्यज॑त्राः । स्थि॒रैरङ्गैᳵस्तुष्टु॒वाग्ँस॑स्त॒नूभि॒र्व्यशे॑म दे॒वहि॑तं॒ यदायुः॑ ॥ स्व॒स्ति न॒ इन्द्रो॑ वृ॒द्धश्र॑वाः स्व॒स्ति नः॑ पू॒षा वि॒श्ववे॑दाः । स्व॒स्ति न॒स्ताक्ष्र्यो॒ अरि॑ष्टनेमिः स्व॒स्ति नो॒ बृह॒स्पति॑र्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! परम पद यत्र न सूर्यस्तपति यत्र न वायुर्वाति यत्र न चन्द्रमा भाति यत्र न नक्षत्राणि भान्ति यत्र नाग्निर्दहति यत्र न मृत्युः प्रविशति यत्र न दुःखानि प्रविशन्ति सदानन्दं परमानन्दं शान्तं शाश्वतं सदाशिवं ब्रह्मादिवन्दितं योगिध्येयं परं पदं यत्र गत्वा न निवर्तन्ते योगिनः ॥ ( बृहज्जाबाल० ८ । ६ ) जहाँ सूर्य नहीं तपता, जहाँ वायु नहीं बहता, जहाँ चन्द्रमा प्रकाशित नहीं होता, जहाँ तारे प्रकाशित नहीं होते, जहाँ अग्नि नहीं जलता, जहाँ मृत्यु प्रवेश नहीं करती, जहाँ दुःख प्रवेश नहीं करते, जो सदानन्द, परमानन्द, शान्त, शाश्वत, सदाशिव ( नित्य कल्याणमय ) और ब्रह्मादि देवताओंके द्वारा वन्दित है, वही योगियोंका ध्येय परमपद है, जिसको प्राप्त करके योगी लौटते नहीं ।
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नम ॥ नृसिंहपू र्पनीयोपनिषद् शान्तिपाठ ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाꣲसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायूः ॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः । स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!! प्रथम उपनिषद् नरसिंह-मन्त्रराजकी महिमा तथा उसके अङ्गोंका वर्णन
कहते हैं, पूर्वकालमें यह सब कुछ जल ही था। सर्वत्र सलिलराशि ही भरी हुई थी। उस जलमें वे प्रसिद्ध प्रजापति ब्रह्माजी कमलपत्रपर प्रकट हुए। उनके मनमे यह कामना हुई कि मैं इस जगत्की रचना करूँ। लोकमें यह प्रसिद्ध है कि पुरुष मनसे जिसकी भावना करता है, उसीको वाणीद्वारा बोलता है और फिर उसीको क्रियाद्वारा सिद्ध करता है। इसी सम्बन्धमें एक ऋचा है, जिसका भाव इस प्रकार है— पूर्वकालमें सृष्टिके अवसरपर मनसे काम—सृष्टि उत्पन्न करनेकी इच्छा प्रकट हुई। सृष्टिके पूर्व जो जलमात्र विद्यमान था, वही सबका कारण है। अपने अन्तःकरणमे स्थित अन्तरात्मापर दृष्टि रखनेवाले ज्ञानीजन उस कामको सत्यरूप आत्माका बन्धन मानते हैं। उन्होंने अपनी बुद्धिसे यह निश्चित किया कि असत् (प्रकृति) के कार्यभूत मनमे ही कामका उदय होता है। जो इस बातको जानता है, वह जिस वस्तुकी कामना करता है, वह उसे प्राप्त हो जाती है। उन प्रसिद्ध प्रजापतिने तपस्या आरम्भ की। उन्होंने तपस्या करके इस नारसिंह-मन्त्रराजका, जो अनुष्टुप् छन्दमें आबद्ध है, साक्षात्कार किया। निश्चय ही उस मन्त्रराजके प्रभावसे, उन्होंने जो कुछ यह प्रत्यक्ष उपलब्ध हो रहा है, उस सम्पूर्ण जगत्की रचना की। इसलिये यह जो कुछ भी जगत्रूपसे दृष्टिगोचर हो रहा है, इसे मन्त्रराज-आनुष्टुभमय ही कहते हैं। इस अनुष्टुप्-मन्त्रसे ही ये सम्पूर्ण प्राणी उत्पन्न होते हँ, उत्पन्न होनेपर वे अनुष्टुप्-मन्त्रसे ही जीवित रहते है और मृत्युके समय इस लोकसे प्रयाण करनेपर वे अनुष्टुप्-मन्त्रमें ही सब ओरसे प्रवेश कर जाते हैं। मन्त्रराजकी यह अनुष्टुप्- वृत्ति समस्त सृष्टिकी आदिभूता एव प्रधान कारण है। निश्चय ही वाणीमात्र अनुष्टुप् है, क्योंकि वाणीसे ही प्राणी मृत्यु- को प्राप्त होते हैं और वाणीसे ही उत्पन्न होते हैं। यह जो अनुष्टुप् छन्द है, वह निश्चय ही सब छन्दोंमें श्रेष्ठ है ॥ १ ॥ समुद्र, पर्वत और सातों द्वीपोंसहित जो यह पृथ्वी है, इसे मन्त्रराजरूप सामका प्रथम चरण जाने। यक्ष, गन्धर्व तथा अप्सराओंसे सेवित जो अन्तरिक्ष लोक है, उसे सामका द्वितीय चरण जाने। वसु, रुद्र और आदित्य आदि सम्पूर्ण देवताओं- से सेवित जो द्युलोक है, उसे सामका तृतीय चरण जाने। तथा जो निरञ्जन—मायारूप मलसे रहित, विशुद्ध परम व्योममय ब्रह्मस्वरूप है, उसे सामका चतुर्थ चरण जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। ऋक्, यजुः, साम और अथर्व—ये अङ्गो और शाखाओंसहित चार वेद उपर्युक्त मन्त्रराजके चार पाद हैं। उस मन्त्रराजका ध्यान क्या है? देवता कौन-सा है? कौन-कौन-से अङ्ग है ? कौन-सा
५६८ * नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् १
देवताओंका गण है ? कौन-सा छन्द है और कौन सा ऋषि है ? ॥ २ ॥
वे प्रसिद्ध प्रजापति ब्रह्माजी बोले---निश्चय ही वह पुरुष जो श्रीबीज ( श्रीं ) से अभिपिक्त गायत्री मन्त्रके आठ अक्षरवाले चरणको इस मन्त्रराजरूप सामका अङ्ग जानता है, वह श्री ( शोभा एव सम्पत्ति ) से सुशोभित होता है। सम्पूर्ण वेद प्रणवादि हैं, उनके आदिमे प्रणव---ॐकारका ही उच्चारण किया जाता है। उस प्रणवको जो इस सामका अङ्ग समझता है, वह तीनों लोकोंपर विजय पा लेता है। चौबीस अक्षरों- वाला महालक्ष्मी-मन्त्र यजुःस्वरूप है, उसे जो सामका अङ्ग जानता है, वह आयु, यश, कीर्ति, ज्ञान और ऐश्वर्यसे सम्पन्न होता है । इसलिये अङ्गोंसहित इस सामको जाने । जो अङ्गोंसहित सामको जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है । गायत्री, प्रणव तथा यजुःस्वरूप महालक्ष्मी मन्त्रका उपदेश ज्ञानीजन स्त्री और शूद्रों को नहीं देना चाहते । बत्तीस अक्षरोंवाले सामको जाने, जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। गायत्री, प्रणव और यजुर्वेदमय महालक्ष्मी मन्त्रको यदि स्त्री और शूद्र जान लें तो वे मरनेपर अधोगति को प्राप्त होते हैं---नरक और नीची योनियोमे गिरते हैं । इसलिये सदा ही सावधान रहकर उनको इन मन्त्रोंका उपदेश न दे। यदि कोई उन्हें उपदेश देता है, तो वह आचार्य भी उन्हींके साथ मरनेपर अधोगतिको प्राप्त होता है---नरकादिमे पड़ता है ॥ ३ ॥
प्रजापतिने फिर कहा---निश्चय ही अग्नि, सारे वेद, यह सम्पूर्ण जगत्, समस्त प्राणी, प्राण, इन्द्रिय, पशु, अन्न, अमृत, सम्राट्, स्वराट् और विराट्---इन सबको इस मन्त्र- राजरूप सामका प्रथम चरण जाने । ये ऋक्, यजुः, साम और अथर्वरूप सूर्य तथा सूर्यमण्डलके भीतर स्थित रहनेवाले हिरण्मय पुरुष---इनको सामका द्वितीय पाद जाने । जो समस्त ओषधियों ( अन्नों और फलों ) के स्वामी तारापति चन्द्रमा हैं, उनको सामका तृतीय चरण जाने । वे ब्रह्मा, वे शिव, वे विष्णु, वे इन्द्र, वे अग्नि, वे अविनाशी परमात्मा स्वराट्--- इन सबको उस सामका चतुर्थ चरण समझे । जो इस प्रकार जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है ।
'उग्रम्' यह पद मन्त्रराज अनुष्टुप्के प्रथम चरणका आदि अग है । 'ज्वल' यह उसके द्वितीय चरणका आदि अग है । 'नृसिं' यह अश तृतीय चरणका आदि भाग है तथा 'मृत्यु' पद चतुर्थ चरणका आदि भाग है। इन सबको साम- स्वरूप समझे । जो यों समझता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है । इसलिये इस सामको जहाँ-तहाँ---सबको न बताये । यदि यह मन्त्र किसीको देनेकी इच्छा हो तो सेवापरायण एव सुननेके लिये उत्सुक पुत्रको दे, अथवा दूसरे किसी शिष्यको भी दिया जा सकता है ॥ ४ ॥
वे सुप्रसिद्ध प्रजापति फिर बोले---भगवान्का जो क्षीरसागरमे शयन करनेवाला नृसिंह-विग्रह है, वह योगियोंके लिये भी ध्यान करनेयोग्य परमपद है। उसे सामस्वरूप समझे। यों समझनेवाला अमृतत्वको प्राप्त होता है । 'वीरं' इस पद- को मन्त्रराज अनुष्टुप्के प्रथम चरणके पूर्वार्धका अन्तिम अश जाने । 'तं स' इस अगको द्वितीय चरणके पूर्वार्धका अन्तिम भाग समझे । 'ह भी' इस अगको तृतीय चरणके पूर्वार्धका अन्तिम भाग माने और 'मृत्युम्'पदको चतुर्थ चरणके पूर्वार्ध- का अन्तिम भाग समझे तथा इन सबको साम जाने । जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। इसलिये इस सामको जो जिस किसी भी आचार्यके मुखसे इस प्रकार जानता है, वह उसी शरीरमे रहते हुए ससारसे मुक्त हो जाता है, दूसरोंको भी मुक्त करता है तथा यदि वह ससारमे आसक्त रहा हो तो इस सामके ज्ञानसे मुमुक्षु बन जाता है। इस मन्त्ररूप सामका जप करनेमे वह उसी शरीरसे आराध्य देवता ( भगवान् नृसिंह ) का प्रत्यक्ष दर्शन कर लेता है। अतः कलियुगमे यही मोक्षका द्वार है । दूसरोंको मोक्षकी प्राप्ति सहजमे नहीं होती । इसलिये इस सामको अङ्गोंसहित जाने । जो जानता है, वह अमृतत्व- को प्राप्त होता है ॥ ५ ॥
भगवान् नृसिंहको ऋत और सत्य समझे । वे सर्वव्यापी परमात्मा एव अन्तर्यामी पुरुष हे। वे मनुष्य और सिंहकी सम्मिलित आकृति धारण करनेसे कृष्ण और पिङ्गल वर्णके दिखायी देते हैं। वे ऊर्ध्वरेता ( नैष्ठिक ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न ) हैं। उनके नेत्र बड़े विकराल एव भयङ्कर हं। तथापि वे शङ्कर हैं, सबका कल्याण करनेवाले है। कण्ठप्रदेशमे नील एव उसके ऊर्ध्वभागमें तेजोमय लोहित वर्ण होनेसे वे ही 'नीललोहित' नाम धारण करते हैं । ये सर्वदेवमय भगवान् नृसिह ही दूसरे रूपमें गिरिराजकन्या उमाके स्वामी, पशुपति, पिनाकधारी एव अपार तेजस्वी महेश्वर हैं। ये ही सम्पूर्ण विद्याओंके अधीश्वर और समस्त भूतोंके अधिपति है। जो ब्रह्म ( वेद ) के अधिपति हैं, ब्रह्माजीके भी स्वामी है तथा जो यजुर्वेदके वाच्यार्थ हैं, उन भगवान् नृसिंहको साम जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। 'महा' शब्द मन्त्रराज
उपनिषद् २] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५६९ अनुष्टुप्के प्रथम चरणके उत्तरार्धका आदि भाग है। 'र्वतो' शब्द द्वितीय चरणके उत्तरार्धका आदि भाग है। 'पण' शब्द तृतीय चरणके उत्तरार्धका आदि भाग है तथा 'नमा' शब्द चतुर्थ चरणके उत्तरार्धका आदि भाग है। इन सबको साम जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। अतः यह साम सच्चिदानन्दमय परब्रह्मस्वरूप है। उसे इस रूपमे जाननेवाला यहाँ—इसी जीवनमे अमृतस्वरूप हो जाता है। इसलिये इस सामको अङ्गोंसहित जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है॥६॥ विश्वस्रष्टा प्रजापतिगणोंने इस साममय मन्त्रके प्रभावसे ही सम्पूर्ण विश्वकी सृष्टि की है। उन्होंने विश्वकी रचना की है, इसलिये वे विश्वस्रष्टा हैं। यह विश्व उन्हींसे उत्पन्न होता है, इस रहस्यको जाननेवाले उपासक ब्रह्माजीके लोकको तथा उनके सायुज्यको प्राप्त होते हैं—उन्हींमे लीन हो जाते है, इसलिये अङ्गोंसहित इस सामको जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। 'विष्णुं' पद पूर्वोक्त आनुष्टुभ नारसिंह मन्त्रराजके प्रथम चरणका अन्तिम पद है। 'मुखम्' द्वितीय पादका अन्तिम पद है। 'भद्रं' तृतीय चरणका अन्तिम पद है। 'म्यहम्' चतुर्थ पादका अन्तिम पद है। यह सब साम है—इस प्रकार जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। वे जो प्रसिद्ध प्रजापति हैं, उन्होंने ही यह सब कुछ (जो पहले बतायी हुई उपासना आदिका तत्त्व है) जाना। सबके 'आत्मा' रूप ब्रह्ममें ही जिसकी स्थिति है, ऐसे इस आनुष्टुभ मन्त्रको जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। उपासना करनेवाले स्त्री-पुरुषोंमें जो भी निश्चितरूपसे यहाँ उत्कृष्ट स्थितिमें रहनेकी इच्छा करते हैं, उन्हें भगवान् नृसिंह सम्पूर्ण ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। वह जहाँ-कहीं भी प्राण त्याग करता है, अन्तकालमें भगवान् नृसिंह वहीं उसे परब्रह्ममय तारक-मन्त्रका उपदेश करते हैं, जिससे वह अमृत- स्वरूप होकर अमृतत्व (मोक्ष)को प्राप्त होता है। इसलिये साममध्यवर्ती तारकमन्त्र (एव सामोपासनाके अङ्गभूत प्रणव)- का जप करना चाहिये। अत (मन्त्रद्रष्टा ऋषि होनेके कारण) सामके अङ्गभूत प्रजापति ही यह तारक मन्त्र है। इसलिये साम- के अङ्गभूत प्रजापति ही यह तारक-मन्त्र हूं—इस प्रकार जो जानता है, वही यथार्थ उपासक है। यह महोपनिषद् है (जिसके द्वारा महान् परमेश्वरके तत्त्वका यथार्थ ज्ञान हो, उसीका नाम महोपनिषद् है)। जो इस महोपनिषद्को जानता है—इसमें बताये अनुसार उपासना करता है, वह मानो सारा पुरश्चरण पूरा करके महाविष्णुरूप हो जाता है, महाविष्णु- रूप हो जाता है॥७॥ -o0o0o- द्वितीय उपनिषद् मन्त्रराजकी शरण लेनेका फल, उसके अङ्गोंका विशद वर्णन, न्यासकी विधि तथा मन्त्रके प्रत्येक पदकी व्याख्या कहते हैं, एक बार सब देवताओंको मृत्यु, पाप और संसारसे बड़ा भय हुआ। वे भागकर प्रजापति ब्रह्माजीकी शरणमें गये। प्रजापतिने उनको भगवान् नृसिंहके इस मन्त्र- राज आनुष्टुभका उपदेश दिया। इस मन्त्रके प्रभावसे उन सब देवताओंने मृत्युको जीत लिया। वे सब पापसे तर गये तथा इस संसारसे भी पार हो गये। इसलिये जो मृत्यु, पाप तथा संसारसे भी डरता हो, उसे भगवान् नृसिंहके इस मन्त्र- राज आनुष्टुभकी शरण लेनी चाहिये। जो इसकी शरण लेता है, वह मृत्युको पार कर जाता है। वह पापसे तर जाता है तथा वह संसारसे भी पार हो जाता है।१ १ मन्त्रराज यह है— ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥ उ० अ० ७२– पूर्वोक्त सुप्रसिद्ध मन्त्रराजका अङ्गभूत जो प्रणव है, उस प्रणवकी पहली मात्रा अकार है, उसका पृथ्वी लोक है, ऋचाओंसे उपलक्षित ऋग्वेद ही वेद है, ब्रह्मा देवता हैं, वसु- नामक देवताओंका गण है, गायत्री छन्द है तथा गार्हपत्य अग्नि है। यह सब प्रणवकी पहली मात्राके अन्तर्गत है और वह पहली मात्रा ही मन्त्ररूप सामका प्रथम पाद है। उक्त प्रणवकी दूसरी मात्रा उकार है, इसीके अन्तर्गत अन्तरिक्ष लोक, यजुर्मन्त्रों- से उपलक्षित यजुर्वेद, विष्णु देवता, रुद्र नामक देवताओंका गण, त्रिष्टुप् छन्द और दक्षिणात्मक अग्नि है। यह दूसरी मात्रा ही साम अर्थात् मन्त्रका द्वितीय पाद है। तीसरी मात्रा मकार है, इसीके अन्तर्गत द्युलोकनामक लोक, सामोपलक्षित सामवेद वेद, रुद्र देवता, आदित्यनामक देवताओंका गण, जगती छन्द तथा
५७० * नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् २ आहवनीय अग्नि है। वह तीसरी मात्रा ही इस सामका तीसरा चरण है। प्रणवके उच्चारणकी समाप्ति होनेपर उसकी चौथी मात्राके रूपमें जो नादात्मक अर्धमात्रा सुनायी देती है, उसीके अन्तर्गत सोमलोक नामक लोक, ॐकार वाच्य परब्रह्म देवता, अथर्व-मन्त्रोंसहित अथर्ववेद ही वेद, संवर्तकनामक अग्नि, मरुन्नामक देवताओंका गण तथा विराट् छन्द है। इस चतुर्थ मात्राविशिष्ट ॐकारके एक ही ऋषि हैं—ब्रह्माजी। यह चौथी मात्रा तुरीया ब्रह्म-स्वरूपा होनेके कारण परम प्रकाशमयी है। यही सामका चतुर्थ पाद है* ॥ १ ॥ अनुष्टुप्-मन्त्रका प्रथम चरण आठ अक्षरोंका है। शेष तीन चरण भी आठ-आठ अक्षरोंके ही हैं। इस प्रकार कुल बत्तीस अक्षर होते हैं। निश्चय ही अनुष्टुप्-वृत्ति बत्तीस अक्षरोंकी होती है। अनुष्टुप्से ही इस सम्पूर्ण विश्वकी रचना हुई है। अनुष्टुप्के द्वारा ही सबका उपसहार होता है। उस अनुष्टुप्-मन्त्रके पाँच अङ्ग हैं। इसके चार चरण ही चार अङ्ग हैं तथा प्रणवको साथ लेकर सम्पूर्ण मन्त्र पाँचवाँ अङ्ग होता है। हृदयाय नमः, शिरसे स्वाहा, शिखायै वषट्, कवचाय हुम्, अस्त्राय फट्—इनमें शरीरके पाँच अङ्गोंका उल्लेख है। ऊपर अनुष्टुप्-मन्त्रके भी पाँच अङ्ग बताये गये हैं, अतः मन्त्रके प्रथम अङ्गका हृदय- रूप प्रथम अङ्गसे संयोग कराना चाहिये। इसी प्रकार दूसरे अङ्गका दूसरे मस्तकरूप अङ्गसे, तीसरे अङ्गका तीसरे शिखारूप अङ्गसे, चतुर्थ अङ्गका चौथे उभय बाहुमूलरूप अङ्गसे और पञ्चम अङ्गका पाँचवें मस्तकरूप अङ्गसे सम्बन्ध होता है।† निश्चय ही ये सम्पूर्ण लोक एक दूसरेसे सम्बद्ध हैं, इसलिये उक्त अङ्ग भी परस्पर सम्बद्ध होते हैं। ॐ यह अक्षर ही यह सम्पूर्ण जगत् है। इसलिये अनुष्टुप्- मन्त्रके प्रत्येक अक्षरके दोनों ओर—पहले और पीछे ॐकारका सम्पुट लगाना चाहिये। ब्रह्मवादी महात्मा उक्त मन्त्रके प्रत्येक अक्षरके न्यासका उपदेश करते हैं* ॥ २ ॥ निश्चय ही ‘उग्रम्’ इस पदको उस प्रसिद्ध अनुष्टुप्- मन्त्रका प्रथम स्थान जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। ‘वीरम्’ यह पद द्वितीय स्थान है। ‘महाविष्णुम्’ पद तृतीय स्थान है। ‘ज्वलन्तम्’ पद चतुर्थ स्थान है। ‘सर्वतोमुखम्’ पद पञ्चम स्थान है। ‘नृसिंहम्’ पद छठा स्थान है। ‘भीषणम्’ पद सातवाँ स्थान है। ‘भद्रम्’ पद आठवाँ स्थान है। ‘मृत्युमृत्युम्’ पद नवाँ स्थान है। ‘नमामि’ पद दसवाँ स्थान है। ‘अहम्’ पद ग्यारहवाँ स्थान है। इस प्रकार जानना चाहिये। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है। निश्चय ही यह अनुष्टुप्वृत्ति ग्यारह पदोंकी है। इस अनुष्टुप्- मन्त्रके द्वारा ही इस सम्पूर्ण विश्वकी रचना हुई है। तथा अनुष्टुप्के द्वारा ही सबका उपसहार होता है। इसलिये सब कुछ अनुष्टुप्-मन्त्रका ही विस्तार है—यों जाने। जो जानता है, वह अमृतत्वको प्राप्त होता है॥ ३ ॥ कहते हैं, देवताओंने प्रजापतिसे पूछा—‘‘भगवान् नृसिंहके लिये ‘उग्रम्’ यह विशेषण क्यों दिया जाता है ? उन्हें उग्र क्यों कहा जाता है ?’’ तब वे प्रसिद्ध प्रजापति बोले—‘‘क्योंकि भगवान् नृसिंह अपनी महिमासे सम्पूर्ण लोको, समस्त देवों, सभी आत्माओं तथा सभी भूतोंको ऊपर उठाये रखते हैं, निरन्तर उनकी सृष्टि करते हैं, नाना
- इस प्रकरणका सारांश यह है कि प्रणवकी चार मात्राएँ हैं— अ उ म् और अर्धमात्रा । क्रमशः इनके चार लोक हैं— पृथ्वीलोक, अन्तरिक्षलोक, स्वर्गलोक और सोमलोक । चार ही वेद हैं—ऋक्, यजु, साम तथा अथर्व । चार ही देवता हैं—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र तथा ॐकारवाच्य परब्रह्म । चार ही छन्द हैं—गायत्री, त्रिष्टुप्, जगती तथा विराट् । चार ही अग्नियाँ हैं—गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय और संवर्तक । ये सब मिलकर प्रणवरूप हैं, इस विश्वरूप प्रणवमें अन्तर्यामीरूपसे स्थित उपास्यदेव भगवान् नृसिंहकी उपासना करनी चाहिये । † यहाँ अङ्गन्यासका विधान किया गया है। इसके अनुसार न्यासका क्रम इस प्रकार होगा—‘ॐ उग्रं वीरं महाविष्णुम्’ हृदयाय नम—यों कहकर दाहिने हाथकी पाँचों अङ्गुलियोंसे हृदयका स्पर्श करे । फिर ‘ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्’ शिरसे स्वाहा— यों कहकर उक्त अङ्गुलियोंसे ही मस्तकका स्पर्श करे । तत्पश्चात् ‘नृसिंहं भीषणं भद्रं’ शिखायै वषट्—इसका उच्चारण करके पूर्ववत् शिखाका स्पर्श करे । तदनन्तर ‘मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्’ कवचाय हुम्—इसका उच्चारण करके दाहिने हाथकी अङ्गुलियोंसे बायें कंधेका और बायें हाथकी अङ्गुलियोंसे दायें कंधेका एक साथ ही स्पर्श करे । फिर प्रणवसहित पूरे मन्त्रके साथ ‘अस्त्राय फट्’ कहकर दाहिने हाथको मस्तकके ऊपर बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिनी ओरसे आगेकी ओर ले आये और तर्जनी तथा मध्यमा अङ्गुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये ।
- अनुष्टुप्-मन्त्रमें कुल बत्तीस अक्षर हैं, उनमेंसे प्रत्येक अक्षरको प्रणवसे सम्पुटित करके शिखासे लेकर पैरतकके बत्तीस अङ्गोंमें क्रमश न्यास करना चाहिये । यथा—‘ॐ उँ ॐ नम. शिखायाम्’, ‘ॐ ग्रँ ॐ नम दक्षिणानेत्रे’ इत्यादि ।
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और यथावत् लिप्यन्तरण (transcription) प्रस्तुत है:
उपनिषद् २ ] $\quad\quad\quad\quad$ * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * $\quad\quad\quad\quad$ ५७१
[बायाँ स्तम्भ]
प्रकारसे उनकी सृष्टिका विस्तार तथा संहार करते हैं, उन सबको अपने ही भीतर बसाते—लीन कर लेते हैं, दूसरोंसे इस जगत्पर उद्वह (अनुग्रह) करवाते हैं तथा स्वयं भी इसपर अनुग्रह करते हैं, इसलिये 'उग्र' कहलाते हैं। इस विषयमें ऋग्वेदका मन्त्र भी है, जिसका भाव इस प्रकार है—'श्रुतियाँ जिनकी स्तुतिमें संलग्न हैं, उन उपास्यदेव परमात्माका स्तवन करो। वे गर्तमें—हृदयरूपी गुफामें स्थित हैं (अथवा व्यूहरूप महाचक्र ही यहाँ गर्त है, उसमें स्थित हैं)। नवतारुण्यसे सुशोभित हैं। मृग अर्थात् सिंहके रूपमें प्रकट होकर भी भक्तजनोंके लिये भयङ्कर नहीं हैं। सदा सबपर अनुग्रह करनेके लिये सर्वत्र सबके निकट पहुँचनेवाले हैं तथा उग्र हैं—साधु पुरुषोंपर अनुग्रह और दुष्टजनोंका निग्रह करनेवाले हैं। हे नृसिंहदेव ! आपकी स्तुति की जाती है, इससे संतुष्ट होकर आप स्तवन करनेवाले मुझ भक्तको सुखी बनाइये। आपकी भयङ्कर सेना हमें छोड़कर अन्यत्र आक्रमण करे।' अर्थात् दुष्टोंका संहार और भक्तोंकी रक्षा करे। इस मन्त्रमें भगवान् नृसिंहका 'उग्र' के नामसे स्तवन किया गया है, इसलिये वे 'उग्र' कहे जाते हैं।” देवताओंने पूछा—"प्रजापते ! अब यह बताइये, भगवान्- के लिये 'वीरम्' यह विशेषण क्यों दिया जाता है—वे 'वीर' क्यों कहे जाते हैं ?" इसपर प्रजापति उत्तर देते हैं— “क्योंकि अपनी महिमासे वे सब लोको, सब देवों, सब आत्माओं और सम्पूर्ण भूतोंके साथ विविध प्रकारसे क्रीड़ा करते, सबको विश्राम देते, निरन्तर सृष्टि और पालन करते, उपसंहार करते और अपने अदर लीन करते हैं, अतः 'वीर' कहे जाते हैं। ऋग्वेदका वचन है—भगवान् शूरवीर हैं, कर्मठ हैं, भक्तोंपर अनुग्रह करनेमे पूर्णतः दक्ष हैं, सोमयागमें पत्थर हाथमें लिये रहनेवाले 'अध्वर्यु' आदिके रूपमें भगवान् नृसिंह ही हैं। ये ही देवकाम हैं—देवताओंको उत्पन्न करनेके अभिलाषी हैं।” (प्रश्न) अब यह बतायें—भगवान् 'महाविष्णुम्' क्यों कहे जाते हैं ? (उत्तर) वे अपनी ही महिमासे सब लोकोंको, सब देवताओंको, समस्त आत्माओंको तथा सब भूतोंको व्याप्त करके स्थित हैं। जैसे चिकनाई मास-पिण्डमें व्याप्त रहती है, उसी प्रकार वे शरीरके अवयवोंमे सर्वत्र व्यापक हैं। उन्हींमें यह विश्व लीन होता है। उन्हींमें यह सर्वथा ओतप्रोत एवं सम्बद्ध है। वे इसमें निरन्तर व्याप्त रहते हैं। इससे निरन्तर सम्बन्ध रखकर ही वे व्याप्त और
[दायाँ स्तम्भ]
व्यापक होते हैं। ऋग्वेदमें कहा है—'जिनसे बढ़कर दूसरा कोई उत्पन्न ही नहीं हुआ, जो सर्वव्यापी होनेके कारण सम्पूर्ण विश्वमें समानरूपसे आविष्ट (व्याप्त) हैं, जो प्रजाके पालक हैं और प्रजाके द्वारा जिनकी उपासना होती रहती है, वे भगवान् नृसिंह षोडशकला-विशिष्ट होकर त्रिविध ज्योतियोंमें व्याप्त रहते हैं।' इसीलिये वे 'महाविष्णु' कहलाते हैं। (प्रश्न) अब यह बतायें—भगवान्के लिये 'ज्वलन्तम्' इस विशेषणका प्रयोग क्यों किया जाता है ? (उत्तर) वे अपनी ही महिमासे सब लोकोंको, सब देवताओंको, सब आत्माओंको और सम्पूर्ण भूतोंको अपने तेजसे प्रकाशित करते तथा स्वयं भी प्रज्वलित एव प्रकाशित होते हैं। सब लोक उन भगवान्के ही प्रकाशमे प्रकाशित होते और दूसरोंको भी प्रकाशित करते हैं। ऋग्वेदका वचन है—'वे ही सविता (प्रकाशक) और प्रसबिता (उत्पादक) हैं। वे स्वयं दीप्तिमान् हैं। दूसरोंको उद्दीप्त करते और स्वयं भी उद्दीप्त होते हैं। स्वयं प्रज्वलित होते हुए दूसरोंको प्रज्वलित करते हैं। तपते हुए तपाते हैं तथा संताप देते हैं। स्वयं कान्तिमान् होकर दूसरोंको भी कान्तिमान् बनाते हैं। स्वयं शोभायमान होकर दूसरोंको भी सुशोभित करते हैं तथा परम कल्याणस्वरूप हैं।' इसीलिये उनके लिये 'ज्वलन्तम्' विशेषण- का प्रयोग किया गया है। (प्रश्न) अब यह बतायें—भगवान्को 'सर्वतोमुखम्' क्यों कहा जाता है ? (उत्तर) वे अपनी ही महिमासे सब लोकों, सब देवताओं, सब आत्माओं और सम्पूर्ण भूतोंको, स्वयं इन्द्रियरहित होते हुए भी, सब ओरसे देखते हैं, सब ओरसे सुनते हैं, सब ओरसे जाते हैं, सब ओरसे ग्रहण करते हैं। सर्वत्रगामी होते हुए सब स्थानोंमें विद्यमान रहते हैं। ऋग्वेदमें कहा है—'जो सबसे पहले अकेले था, जो स्वय इस जगत्के रूपमें प्रकट हो गये, जिनसे इस विश्वकी उत्पत्ति हुई है, जो सम्पूर्ण भुवनके पालक हैं, प्रलयकालमें समस्त भुवन जिनमें विलीन होता है, उन सर्वतोमुख (सब ओर मुखोंवाले) भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ।' इस श्रुतिमें उनका 'सर्वतोमुख' नाम प्रयुक्त हुआ है, इसीलिये उन्हें 'सर्वतोमुख' कहते हैं। (प्रश्न) अब यह बतानेकी कृपा करें कि भगवान्को 'नृसिंहम्' क्यों कहा गया है ? (उत्तर) सम्पूर्ण प्राणियोंमें नर (मनुष्य) अधिक पराक्रमी तथा सबसे श्रेष्ठ है। इसी प्रकार सिंह भी सबसे अधिक शक्तिशाली और सबसे अधिक
५७२ * नृसिंहपूर्वतपनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् २ श्रेष्ठ है, इसलिये परमेश्वर नर और सिंह दोनोंका सयुक्त रूप धारण करके प्रकट हुए। निश्चय ही उनका यह स्वरूप जगत्का कल्याण करनेके लिये ही है। यह स्वरूप सनातन एव अविनाशी है। ऋचा कहती है—'भगवान् विष्णु मृग अर्थात् सिंहरूपमे स्थित होकर उपासकोंद्वारा स्तुत होते हैं। विभिन्न उपासक स्तोत्रोंद्वारा उनकी स्तुति करते हैं। स्तुतिका उद्देश्य है—नाना प्रकारकी शक्ति प्राप्त करना। भगवान् सिंहरूपमें प्रकट होकर भी भक्तजनोंके लिये भयङ्कर नहीं हैं। वे पृथिवीपर भी विचरते हैं और पर्वतपर भी स्थित होते हैं। अथवा वे कहाँ नहीं हैं—सभी रूपोंमें हैं, स्तुति करनेवालोंकी वाणीमे भी हैं। ये वे ही भगवान् हैं, जिनके तीन बड़े-बड़े डगोंमें सम्पूर्ण विश्व (तीनों लोक) समा जाते हैं। अथवा जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव—तीन रूपोंमें लीला करते हैं।' इन्हीं सब कारणोंसे इन्हें नृसिंह कहते हैं। (प्रश्न) अब यह बतायें कि भगवान्के लिये 'भीषणम्' विशेषणका प्रयोग क्यों किया जाता है? (उत्तर) इनके भीषण रूपको देखकर सब लोक, समस्त देवता और सम्पूर्ण भूत प्राणी भयसे घबराकर भागने लगते हैं, किंतु ये स्वयं किसीसे भी भयभीत नहीं होते। इनके विषयमें ऋचा कहती है—'इनके भयसे ही वायु चलती है, इनके भयसे ही सूर्य ठीक समयसे उदित होता है, इन्द्र, अग्नि और पाँचवीं मृत्यु—ये सब भी इनके भयसे ही अपने-अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये दौड़ लगाते रहते हैं।' इसीलिये इनको 'भीषण' कहा जाता है। (प्रश्न) अब यह बताना चाहिये कि भगवान्को 'भद्रम्' क्यों कहा गया है? (उत्तर) इसलिये कि भगवान् स्वयं भद्र (कल्याण)-स्वरूप होकर सदा सबको भद्र (कल्याण) प्रदान करते हैं। वे कान्तिमान् होकर दूसरोंको कान्तिमान् बनाते और स्वयं शोभासम्पन्न होकर दूसरोंको भी सुशोभित करते हैं तथा साक्षात् कल्याणमय हैं। ऋग्वेद भी कहता है—'देवताओ ! यजन (भगवान्का आराधन) करते हुए हमलोग अपने कानोंसे भद्र (कल्याण) का श्रवण करें। नेत्रोंसे भद्र (कल्याण) का ही दर्शन करें। अपने सुदृढ अङ्गों तथा त्रिविध शरीरोंद्वारा भगवान्का स्तवन करते हुए हमलोग ऐसी आयुका उपभोग करें, जो हमारे उपास्य- देव भगवान्के काम आ सके।' इस श्रुतिमे भगवान्का नाम 'भद्र' आया है। इसलिये उनको 'भद्र' कहते हैं।' (प्रश्न) अब यह बताना चाहिये कि भगवान्के लिये 'मृत्युमृत्युम्' यह विशेषण क्यों प्रयुक्त हुआ है? (उत्तर) इसलिये कि वे स्मरण करते ही अपनी ही महिमाद्वारा अपने भक्तोंकी मृत्यु और अपमृत्यु—अकालमृत्युको भी मार डालते हैं। ऋचा भी कहती है—'जो आत्मा (अपना स्वरूप) और बल प्रदान करनेवाले हैं, सम्पूर्ण देवता जिनके अनुशासनका नतमस्तक होकर पालन करते हैं, जिनकी छाया—जिनका आश्रय अमृतरूप है, जो मृत्युके लिये भी मृत्युरूप हैं, ऐसे एक देवता—भगवान् नृसिंहकी हम हविष्यद्वारा—अपनी ही भेट अर्पण करके उपासना करते हैं।' इस श्रुतिके अनुसार भगवान्का नाम मृत्युमृत्यु भी है, इसीलिये उन्हें 'मृत्युमृत्यु' कहा जाता है। (प्रश्न) अब यह बताना चाहिये कि मन्त्रराज आनुष्टुभमें 'नमामि' इस पदका प्रयोग क्यों किया जाता है? (उत्तर) इसलिये कि जिन्हें सम्पूर्ण देवता, मुमुक्षु तथा ब्रह्मवादी (मुक्त पुरुष) भी नमस्कार करते हैं, उन्हें नमस्कार करना उचित ही है। ऋचा भी कहती है—'वे ब्रह्मा और वेदोंका भी पालन करनेवाले हैं, उन्हींको लक्ष्य करके ब्रह्मा स्तुतिके उपयुक्त मन्त्रोका पाठ करके भगवान्को नमस्कार करते हैं, उन्हींमें इन्द्र, वरुण, मित्र तथा अर्यमा आदि देवताओेने अपना आश्रय बनाया है। इसीलिये उनके प्रति 'नमामि' (नमस्कार करता हूँ) यो कहा जाता है। (प्रश्न) अब यह बतानेकी कृपा करें कि उक्त मन्त्र- मे 'अहम्' इस पदका प्रयोग क्यो किया जाता है? (उत्तर) इसलिये कि श्रुति कहती है—'मैं इस मूर्त और अमूर्त जगत्- से प्रथम उत्पन्न होनेवाला चेतन आत्मा हूँ। देवताओं- से भी पहले मेरी स्थिति है। मैं अमृतका केन्द्र हूँ। हे देव! जो मुझे धारण या स्वीकार करते हैं अथवा जो मुझे अपना आश्रय प्रदान करते हैं, उन्हीं आपने मेरा रक्षण भी किया है। मैं अन्न हूँ। मैं अन्नके भक्षण करनेवालेको भी खा जाता हूँ। मै सम्पूर्ण विश्वको सूर्यकी ज्योतिकी भाँति अपने तेजसे तिरस्कृत कर सकता हूँ।' जो इस प्रकार जानता है, वही यथार्थ उपासक है। यह महोपनिषद् है।
उपनिषद् ४ ] : महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५७३ तृतीय उपनिषद् मन्त्रराज आनुष्टुभकी शक्ति तथा बीज कहते हैं, देवताओंने जिज्ञासापूर्वक प्रजापतिसे कहा- भगवन् ! भगवान् नृसिंहके मन्त्रराज आनुष्टुभकी शक्ति और बीज क्या हैं, यह हमे बताइये।' तब उन सुप्रसिद्ध प्रजापतिने कहा-भगवान् नृसिंहकी शक्तिभूता जो यह माया है, निश्चय वही इस सम्पूर्ण जगत्की रचना करती है, इस सम्पूर्ण जगत्की रक्षा करती है तथा इस सम्पूर्ण जगत्का सहार करती है। अतः इस मायाको ही शक्ति जाने। जो इस मायारूप शक्तिको जानता है, वह पापसे तर जाता है, वह मृत्युसे पार हो जाता है, वह ससारसे भी तर जाता है तथा वह अमृतत्वको भी प्राप्त कर लेता है। इस लोकमें वह महती समृद्धि प्राप्त करता है। ब्रह्मवादी विचार करते हैं कि यह माया शक्ति ह्रस्व है या दीर्घ है अथवा प्लुत है ? यदि ह्रस्व है तो इसे इस रूपमे जाननेसे यह सम्पूर्ण पापोंको दग्ध कर देती है और उपासक अमृतत्वको प्राप्त होता है। यदि दीर्घ है तो इसे इस रूपमें जाननेसे साधक महान् ऐश्वर्यको प्राप्त होता है और अमृतत्व को भी प्राप्त कर लेता है। यदि यह प्लुत है तो इसे इस रूपमे जाननेसे मनुष्य ज्ञानवान् होता है और अमृतत्वको भी प्राप्त हो जाता है। इस विषयमें ऋषिने यह उदाहरण प्रस्तुत किया है-'हे मायाशक्तिरूप बिन्दुयुक्त स्वर ! मैं सरलभावका इच्छुक तथा ससार-सिन्धुसे तरनेके लिये प्रयत्नशील होकर साधनके लिये उपयोगी दीर्घ आयु प्राप्त करनेके उद्देश्यसे भगवान् विष्णुकी शक्ति श्रीदेवीकी, श्रीलक्ष्मीजीकी ( जो नृसिंहदेवकी शक्ति हैं), शङ्करजीकी शक्ति पर्वतराजपुत्री अम्बिकाकी, ब्रह्माजीकी शक्ति सरस्वतीदेवीकी, षष्ठीदेवी (स्कन्दशक्ति)- की, इन्द्रसेना नामसे प्रसिद्ध इन्द्रशक्तिकी तथा ब्रह्मप्राप्तिकी कारणभूता एव साकाररूपमें प्रकट हुई विद्या-शक्तिकी शरण लेता हूँ। आप उपर्युक्त शक्तियोंकी तथा मुझ उपासककी रक्षा करें।' निश्चय ही सम्पूर्ण भूतोंका यह आकाश ही परम आधार है। ये सम्पूर्ण भूत आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं। उत्पन्न होनेपर आकाशसे ही जीवन धारण करते है तथा मृत्यु होनेपर आकाशमें ही लीन हो जाते हैं, इसलिये आकाशको ही बीज- सबका मूल कारण जाने। इस विषयमें ऋषि (मन्त्र) ने यह दृष्टान्त रक्खा है-'विशुद्ध परम धाममे अथवा बुद्धिमे रहनेवाले जो स्वयम्प्रकाश पुरुषोत्तम हैं, वे ही अन्तरिक्ष- निवासी वसु हैं, घरोंमे उपस्थित होनेवाले अतिथि हैं, यज्ञकी वेदीपर स्थापित होनेवाले अग्निदेव तथा उनमें आहुति डालने- वाले होता भी वे ही हैं, समस्त मनुष्योंमें अर्थात् भूलोकमें, उससे श्रेष्ठ स्वर्गलोकमे तथा सर्वश्रेष्ठ सत्यलोकमें भी उन्हीं- का निवास है। वे ही आकाशमें रहनेवाले हैं। जल, पृथ्वी, सत्कर्म तथा पर्वतोंमें प्रकट होनेवाले भी वे ही हैं, वे ही सबसे महान् परम सत्य हैं।' जो इस प्रकार जानता है, वह भी पूर्वोक्त फलका भागी होता है। यह महोपनिषद् है। चतुर्थ उपनिषद् मन्त्रराज आनुष्टुभके अङ्गभूत मन्त्र, प्रणव वाच्यरूप भगवान् नृसिंहदेवके चार पाद, स्तुतिके मन्त्र उन प्रसिद्ध देवताओंने प्रजापति ब्रह्माजीसे जिज्ञासापूर्वक कहा-'भगवन् ! नृसिंहदेवके मन्त्रराज आनुष्टुभके अङ्गभूत मन्त्रोंका हमारे लिये वर्णन कीजिये।' यह सुनकर वे सुप्रसिद्ध प्रजापति बोले-प्रणव (ॐकार), गायत्री, यजुलैक्ष्मी तथा नृसिंहगायत्री-ये इस मन्त्रराजके अङ्गभूत मन्त्र हैं। इन सबको जानना चाहिये। जो जानता है, वह (लौकिक लाभके साथ ही) अमृतत्वको भी प्राप्त करता है ॥ १॥ 'ॐ' यह अक्षर (अविनाशी परमात्मा) है। यह दृश्यमान सम्पूर्ण जगत् इस परमात्मस्वरूप ॐकारकी ही उपव्याख्या-महिमाका विस्तार है । भूत, वर्तमान और भविष्य-इन तीनों कालोंसे सम्बन्ध रखनेवाला सब कुछ ॐकार ही है। तथा उपर्युक्त तीनों कालोंसे अतीत जो कोई दूसरा तत्त्व है, वह भी ॐकार ही है। निश्चय ही यह सब कुछ ब्रह्म है। ये परमात्मा (भगवान् नृसिंहदेव) ब्रह्म हैं। उन सर्वात्मा श्रीनृसिंहदेवके चार पाद हैं। उनके
५७४ * नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् ४ समग्ररूपका तत्त्व समझानेके लिये श्रुतिने यहाँ चार पादोंकी कल्पना की है। जाग्रत्-अवस्था तथा उसके द्वारा उपलक्षित यह सम्पूर्ण स्थूल जगत् ही जिनका स्थान—शरीर है, अर्थात् जो सम्पूर्ण विश्वमें व्याप्त हो रहे हैं; जिनका ज्ञान इस बाह्य जगत्मे फैला हुआ है अथवा जो बाह्य (स्थूल) जगत्को ही अपनी प्रज्ञाका विषय बनाते हैं; भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य—ये सात लोक ही जिनके अङ्ग हैं; पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच प्राण तथा चार अन्तःकरण—ये उन्नीस समष्टि करण ही जिनके मुख हैं, जो स्थूल जगत्के भोक्ता (अनुभव और पालन करनेवाले) हैं तथा जो विश्व शरीरमे स्थित नर (अन्तर्यामी पुरुष) होनेके कारण 'वैश्वानर' नाम धारण करते हैं, वे सर्वरूप 'वैश्वानर' ही पूर्णतम परमात्मा श्रीनृसिंहदेवके प्रथम पाद हैं। (चार व्यूहोंमें ये ही बलभद्र- स्वरूप हैं।) स्वप्नावस्था और उसके द्वारा उपलक्षित सूक्ष्म जगत् ही जिनका स्थान (शरीर) है, जिनका ज्ञान बाह्य जगत्की अपेक्षा आन्तरिक अर्थात् सूक्ष्म जगत्में व्याप्त है, जो पूर्वोक्त सात अङ्गों और उन्नीस मुखोंवाले हैं, जो सूक्ष्म जगत्के सूक्ष्म तत्त्वोंका अनुभव और पालन करनेवाले हैं, वे तैजस पुरुष (प्रकाशके स्वामी सूत्रात्मा—हिरण्यगर्भ) उन पूर्णब्रह्म परमात्मा श्रीनृसिंहदेवके द्वितीय पाद हैं। (चतुर्व्यूहोंमें ये ही प्रद्युम्नरूप हैं।) जिस अवस्थामें सोया हुआ पुरुष किसी भी भोगकी कामना नहीं करता, कोई भी स्वप्न नहीं देखता, वह सुषुप्ति- अवस्था है। ऐसी सुषुप्ति तथा उसके द्वारा उपलक्षित सम्पूर्ण जगत्की प्रलयावस्था (जब कि सारा विश्व अपने कारणमें विलीन हो जाता है) जिनका स्थान (शरीर) है, अर्थात् समष्टि कारण-तत्त्वमें जिनकी स्थिति है, जो एक रूपमें ही स्थित हैं अर्थात् जिनकी अभी नाना रूपोंमें अभिव्यक्ति नहीं हुई है, घनीभूत विज्ञान ही जिनका स्वरूप है, जो केवल आनन्दमय ही हैं, चिन्मय प्रकाश ही जिनका मुख है तथा जो एकमात्र अपने स्वरूपभूत आनन्दके ही उपभोक्ता हैं, जिनके अतिरिक्त और कोई है ही नहीं, वे प्राज्ञ पुरुष ही पूर्ण ब्रह्म परमात्मा श्रीनृसिंहदेवके तृतीय पाद हैं। (चतुर्व्यूहोंमें इन्हीं को अनिरुद्ध कहा गया है।) १ विषय-ग्रहणमे द्वारभूत होनेके कारण इनको मुख कहा गया है। इस प्रकार तीनों पादोंके रूपमें उपवर्णित ये परमात्मा सबके ईश्वर हैं। ये सर्वज्ञ हैं। ये अन्तर्यामी हैं। ये सम्पूर्ण विश्वके कारण हैं। तथा समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति, (स्थिति) और प्रलयके स्थान भी ये ही हैं। जो न सूक्ष्मको जानता है न स्थूलको जानता है, और न दोनोंको ही जानता है, जिसे जाननेवाला और न जानने- वाला—कुछ भी नहीं कहा जा सकता और जो न प्रज्ञानका ही घनीभूत रूप है, जो देखा नहीं जा सकता, व्यवहारमें नहीं लाया जा सकता और न पकड़नेमें ही आ सकता है; जिसका कोई लक्षण अथवा चिह्न—आकार भी नहीं है; जो चिन्तन करनेमें नहीं आ सकता और न बतलानेमें ही आ सकता है; एकमात्र आत्मसत्ताकी प्रतीति—अनुभूति ही जिसका सार अथवा स्वरूप है तथा जिसमें प्रपञ्चका सर्वथा अभाव है—ऐसा सर्वथा शान्त, कल्याणमय, अद्वितीय तत्त्व उन पूर्णब्रह्म परमात्मा नृसिंहदेवका चतुर्थ पाद है। यों ज्ञानी महात्मा मानते हैं। इस प्रकार चार पादोंमें जिनका वर्णन किया गया है, वे ही प्रणववाच्य परमात्मा भगवान् नृसिंहदेव हैं और वे ही जानने- योग्य हैं (उन्हींकी महिमाका इस उपनिषद्में वर्णन है) ॥ २ ॥ अब सावित्रीका परिचय देते हैं। (यद्यपि मन्त्रराजके पदोंमें 'सवितृ'-वाचक शब्दका उपादान नहीं हुआ है, तथापि तिमिरविनाशक सूर्यकी भाँति वह उपासकोंके अन्तस्तमको दूर करनेवाला है—यह प्रदर्शित करनेके लिये ही 'सावित्री' को अङ्ग-मन्त्र माना गया है।) यह सावित्री-मन्त्र गायत्री-छन्द- विशिष्ट यजुर्मन्त्रके रूपमें निरूपित हुआ है। उसके द्वारा ही यह सब कुछ व्याप्त है। आठ अक्षरोंका मन्त्र होनेसे ही उसको गायत्री कहा गया है। मन्त्र इस प्रकार है—'घृणि सूर्य आदित्यः।' 'घृणिः' ये दो अक्षर हैं। 'सूर्यः' ये तीन अक्षर हैं। * तथा 'आदित्यः' ये तीन अक्षर हैं। यह सावित्र-मन्त्रका आठ अक्षरोंवाला पद है, इसको आरम्भमें श्रीबीज (श्रीं) से विभूषित किया जाता है। जो इस प्रकार इस मन्त्रको जानता है, वह लक्ष्मीके द्वारा अभिषिक्त होता है। यही बात ऋचा- द्वारा कही गयी है—'ऋग्वेदकी ऋचाएँ अविनाशी परम- व्योमरूप स्वप्रकाश परमात्मामे प्रतिष्ठित हैं, जहाँ कि सम्पूर्ण
- यद्यपि इसमें दो ही अक्षर सस्वर हैं, तथापि वैदिक छन्दोंके लिये स्वीकृत व्यूहके नियमानुसार 'सूर्य' के स्थानमें 'सूरिय' पाठ मानकर गणना करनेसे तीन अक्षर होते हैं। गायत्री-मन्त्रमें भी 'वरेण्यम्' के स्थानमें 'वरेणियम्' मानकर गणना करनेसे ही चौबीस अक्षर पूरे होते हैं।
उपनिषद् ४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५७५ देवता भलीभाँति निवास करते हैं। जो उपासक उन स्वप्रकाश परमात्माको नहीं जानता, वह ऋचाओंके स्वाध्यायसे क्या कर लेगा ? तथा जो उन परमात्माको जानते हैं, वे ही ये उपासक उनके परमधाममें सुखपूर्वक निवास करते हैं।' इसी प्रकार जो सावित्र-मन्त्रको जानता है, उसको ऋक्, साम और यजुर्वेदके मन्त्रोंसे कोई प्रयोजन नहीं है। ॐ भूर्लक्ष्मीर्भुवर्लक्ष्मी स्वर्लक्ष्मी कालकर्णी तन्नो महा- लक्ष्मीः प्रचोदयात् । 'जो सच्चिदानन्दमयी देवी भूर्लोककी लक्ष्मी-शोभा, भुवर्लोककी लक्ष्मी तथा स्वर्लोककी लक्ष्मी हैं, जो कालकर्णी नामसे विख्यात हैं, वे भगवती महालक्ष्मी हमें सत्कमोंके लिये प्रेरणा देती रहें।' निश्चय ही यह महालक्ष्मीकी यजुर्वेदोक्त गायत्री है, जो चौबीस अक्षरोंकी है। यह सब—जो कुछ यह प्रतीत हो रहा है, निःसन्देह गायत्री ही है। इसलिये जो इस यजुर्वेदसम्बन्धिनी महालक्ष्मी गायत्रीको जानता है, वह बड़ी भारी सम्पत्तिको प्राप्त होता है। ॐ नृसिंहाय विद्महे वज्रनखाय धीमहि तन्नः सिंहः प्रचोदयात् । 'ॐश्रीनृसिंहदेवकी प्राप्तिके लिये हम उपासना करते हैं, वज्रके समान नखोंवाले उन भगवान्के लिये ही उनके स्वरूपका हम चिन्तन करते हैं, वे भगवान् नरसिंह हमे प्रेरणा दें।' यही नृसिंहगायत्री है, जो देवताओं और वेदोंका भी आदि कारण है। जो इस प्रकार जानता है, वह आदि- कारणभूत भगवान्से संयुक्त होता है ॥ ३ ॥ देवताओंने प्रजापतिसे फिर पूछा—'भगवन् ! किन मन्त्रोंसे स्तुति करनेपर भगवान् नृसिंहदेव प्रसन्न होते और अपने स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कराते हैं, यह हमें बतलायें।' यह सुनकर उन सुप्रसिद्ध प्रजापतिने कहा- ॐ उं ॐ यो ह वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च ब्रह्मा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १ ॥ ॐ ग्रं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च विष्णुर्भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २ ॥ ॐ वीं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च महेश्वरो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३ ॥ ॐ रं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च पुरुषो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ४ ॥ ॐ मं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्चेश्वरो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ५ ॥ ॐ हां ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्या सरस्वती भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ६ ॥ ॐ विं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्या श्रीर्भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ७ ॥ ॐ ष्णु ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्या गौरी भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ८ ॥ ॐ ज्व ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्या प्रकृति- र्भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ९ ॥ ॐ ल ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्या विद्या भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १० ॥ ॐ त ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्चोङ्कारो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ ११ ॥ ॐ स ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्याश्चतस्रोऽर्ध- मात्रा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १२ ॥ ॐ वं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये च वेदाः साङ्गाः सशाखा भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ १३ ॥ ॐ तों ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये पञ्चाग्नयो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ १४ ॥ ॐ मु ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्या सप्तव्याहृतयो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ १५ ॥ ॐ खं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये चाष्टौ लोक- पाला भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १६ ॥ ॐ नृं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये चाष्टौ वसवो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १७ ॥ ॐ सिं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये च रुद्रा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १८ ॥ ॐ हूं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये च आदित्या भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ १९ ॥ ॐ मी ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्ये चाष्टौ ग्रहा भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २० ॥ ॐ पं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यानि पञ्च महा- भूतानि भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २१ ॥ ॐ णं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च कालो भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २२ ॥ ॐ भ ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च मनुर्भूर्भुवः स्वस्तस्मै वै नमो नमः ॥ २३ ॥
५७६ * नृसिंहपूर्वतापनीयोपनिषद् * [ उपनिषद् ४ ॐ द्रूं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च मृत्युर्भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २४ ॥ ॐ मूं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च यमो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २५ ॥ ॐ त्युं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्चान्तको भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २६ ॥ ॐ मृं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च प्राणो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २७ ॥ ॐ त्युं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च सूर्यो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २८ ॥ ॐ नं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च सोमो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ २९ ॥ ॐ मा ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च विराट् पुरुषो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३० ॥ ॐ म्य ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च जीवो भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३१ ॥ ॐ हुं ॐ यो वै नृसिंहो देवो भगवान्यश्च सर्वं भूर्भुव स्वस्तस्मै वै नमो नम ॥ ३२ ॥ 'ॐ (उ) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि ब्रह्मा एव भू भुवःस्व - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हीं को हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ग्र) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि विष्णु एव भू-भुवःस्वः - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (वीं) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि महेश्वर तथा भू-भुव. और स्व - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (र) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेन हैं, जो कि पुरुष एव भू-भुव स्व.-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (म) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि ईश्वर एव भू-भुव.- स्व - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (हा) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि सरस्वती एव भू-भुव स्व - त्रिभुवनरूप है, उन्हें ही हमारा वारंवार नमस्कार है। ॐ (विं) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि श्री एव भू-भुव- स्व - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ष्णु) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि गौरी एव भू भुव स्व - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हे ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ज्व) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव है, जो कि प्रकृति एव भू.- भुवः स्वः-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ल) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि विद्या एव भूः-भुवः स्वः-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हे ही हमारा वारवार नमस्कार है। ॐ (त) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि ॐकार एव भू. भुव' स्व.- त्रिभुवनरूप है, उन्हे ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (स) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि चार अर्धमात्रा एव भूः-भुव.- स्व'- त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (वं) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि अङ्ग, शाखा और इतिहाससहित वेद एव भू.- भुव स्व - त्रिभुवनरूप है, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (तों) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि पाँच अग्नियों एव भूः-भुवःस्वः - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हे ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (मु) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि सात महाव्याहृतियाँ एव भू'-भुव, स्वः- त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ख) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि आठ लोकपाल एव भू'-भुवः स्व.-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (तृ) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव है, जो कि आठ वसु एव भूः-भुवः- स्वः- त्रिभुवनरूप हैं, उन्हे ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (सिं) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव है, जो कि ग्यारह रुद्र एव भू'-भुवः-स्व.-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हे ही हमारा वारवार नमस्कार है। ॐ (ह) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि बारह आदित्य एव भू.-भुव. स्व-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा वारवार नमस्कार है। ॐ (र्भी) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि आठ ग्रह एव भूः-भुव.- स्व - त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ष) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि पञ्च महाभूत एव भू'-भुव. स्वः- त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (ण) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि काल एव भूः-भुव स्व.-त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारवार नमस्कार है। ॐ (भ) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान्
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उपनिषद् ५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ५७७ नृसिंहदेव हैं, जो कि मनु एव भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (द्र) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि मृत्यु एवं भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (मृ) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि यम एवं भूः भुव.-स्व'— त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (त्युं) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि अन्तक एव भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (मृ) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि प्राण एव भूः- भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (त्यु) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि सूर्य एव भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (न) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि सोम एवं भूः-भुवः-स्व.-—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (ग) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि विराट् पुरुष एव भूः-भुवः- स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (म्य) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि जीव एव भूः-भुवः-स्वः—त्रिभुवनरूप हे, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है। ॐ (ह) निश्चय ही जो वे परम प्रसिद्ध भगवान् नृसिंहदेव हैं, जो कि सर्वरूप एव भूः- भुव स्वः—त्रिभुवनरूप हैं, उन्हें ही हमारा बारंबार नमस्कार है॥ १-३२॥ ये (मन्त्रराजके ३२ अक्षरोंके अनुसार) बत्तीस मन्त्र हैं। इन मन्त्रोंको बताकर प्रजापतिने उन देवताओंसे कहा— 'देवगण ! तुमलोग इन मन्त्रोंसे प्रतिदिन भगवान्का स्तवन करो। इससे भगवान् नृसिंहदेव प्रसन्न होते और अपने स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कराते हैं। इसलिये जो इन मन्त्रोंद्वारा नित्य भगवान् नरसिंहदेवकी स्तुति करता है, वह उनका प्रत्यक्ष दर्शन पाता है तथा उनके विश्वरूपको देख लेता है। साथ ही वह अमृतत्वको भी प्राप्त होता है। जो इस प्रकार जानता है, उसे भी वही फल मिलता है। यह महोपनिषद् है॥ ४॥
पञ्चम उपनिषद् आनुष्टुभ मन्त्रराजके सुदर्शन नामक महाचक्रका वर्णन, मन्त्रराजके जपका फल
कहते हैं, देवताओंने श्रद्धापूर्वक प्रजापतिसे कहा— "भगवन् ! श्रीमन्नृसिंहदेवके आनुष्टुभ मन्त्रराजका जो 'महाचक्र' नामक चक्र है, उसका हमसे वर्णन कीजिये। यह चक्र सम्पूर्ण कामनाओंको पूर्ण करनेवाला तथा मोक्षका द्वार है—इस प्रकार योगीजन वर्णन करते हैं।" यह सुनकर वे प्रसिद्ध प्रजापति बोले—निश्चय ही यह सुदर्शन नामक महाचक्र छः अक्षरोंका है, इसीलिये यह छः अरोंसे युक्त होता है—छः दलोंवाला चक्र बनता है। छः ही ऋतुएँ होती हैं, ऋतुओंसे ही इसके अरोंकी समानता की जाती है। अर्थात् इसके छः दलोंमें छः ऋतुओंकी भावना करनी चाहिये। इसके मध्यमें नाभि होती है। नाभिमे ही ये अरे प्रतिष्ठित होते हैं। फिर यह सारा चक्र मायारूप नेमिसे आवेष्टित होता है। माया आत्माका स्पर्श नहीं करती, इसलिये वह षड्दल चक्र बाहरकी ओरसे ही मायाद्वारा आवेष्टित होता है। इसके बाद आठ अरोंसे युक्त अष्टदल चक्र बनता है। आठ अक्षरोंकी ही एक पादवाली गायत्री होती है; गायत्रीके अक्षरोंसे ही इस चक्रके अरोंकी तुलना की जाती है। (इसके आठ दलोंमे गायत्रीके एक पादकी भावना करे।) यह भी बाहरकी ओरसे मायाद्वारा आवेष्टित होता है। निश्चय ही यह माया प्रत्येक क्षेत्रको व्याप्त किये रहती है। इसके बाद द्वादश अरोंसे युक्त द्वादशदलका चक्र होता है। बारह अक्षरोंका ही जगती छन्द (का एक पाद) होता है। जगतीकी अक्षर संख्यासे ही यह चक्र संतुलित होता है। (इसके द्वादश दलोंमें जगतीके एक पादकी भावना करे।) यह भी बाहरसे मायाद्वारा आवेष्टित होता है। तदनन्तर षोडशारचक्र है, जो सोलह दलोंसे सम्पन्न होता है। निश्चय ही पुरुष सोलह कलाओंसे युक्त है। पुरुष (परमात्मा) ही यह सब कुछ है। अतः षोडशार चक्रके अरोंको पुरुषकी कलाओंकी उपमा दी जाती है। (इसके षोडश दलोंमें पुरुषकी— अन्तर्यामी परमात्माकी सोलह कलाओंकी भावना करे।) यह भी बाहरकी ओरसे मायाद्वारा आवेष्टित होता है। तत्पश्चात् बत्तीस अरोंसे युक्त अर्थात् बत्तीस दलोंवाला चक्र है। बत्तीस अक्षरों- का ही अनुष्टुप् छन्द होता है। अनुष्टुप्के अक्षरोंसे ही इसके उ० अं० ७३—