कल्याण: उपनिषद् अङ्क
Kalyan Upanishad Ank
गीताप्रेस द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (उद्गम)
खण्ड ९ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४२९ पश्चिम दिक्कला, दक्षिण दिक्कला और उत्तर दिक्कला, हे इस चतुष्कल पादकी 'प्रकाशवान्' इस गुणसे युक्त उपासना सोम्य ! यह ब्रह्मका 'प्रकाशवान्' नामक चार कलाओंवाला करता है, इस लोकमें प्रकाशवान् होता है और प्रकाशवान् पाद है।' वह, जो इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके लोकोंको जीत लेता है ॥ १-३ ॥ षष्ठ खण्ड अग्निद्वारा द्वितीय पादका उपदेश 'अग्नि तुझे [ दूसरा ] पाद बतलावेगा'—ऐसा कहकर तब ] [ सत्यकामने कहा-] 'भगवन् ! मुझे [ अवश्य ] ऋषभ मौन हो गया । दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुल- बतलावें ।' तब उसने उससे कहा-'पृथ्वी कला है, अन्तरिक्ष की ओर हाँक दिया । वे सायंकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं कला है, द्युलोक कला है और समुद्र कला है । सोम्य ! यह अग्नि प्रज्वलित कर गौओंको रोक समिधाधान कर अग्निके ब्रह्मका चतुष्कल पाद 'अनन्तवान्' नामवाला है।' वह, जो पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया । उससे अग्निने 'सत्यकाम !' इसे इस प्रकार जाननेवाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी ऐसा कहा । तब उसने 'भगवन् !' ऐसा प्रत्युत्तर दिया । 'अनन्तवान्' इस गुणसे युक्त उपासना करता है, इस लोकमें 'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका एक पाद बतलाऊँ ?' [अग्निने कहा, अनन्तवान् होता है और अनन्तवान् लोकोंको जीत लेता है।१-४। सप्तम खण्ड हंसद्वारा तृतीय पादका उपदेश 'हंस तुझे [तीसरा] पाद बतलावेगा' ऐसा [कहकर अग्नि [ सत्यकाम बोला--] 'भगवन् ! मुझे बतलावें ।' तब वह निवृत्त हो गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको आचार्यकुलकी उससे बोला-'अग्नि कला है, सूर्य कला है, चन्द्रमा कला है ओर हाँक दिया। वे सायङ्कालमें जहाँ एकत्रित हुईं वह उसी जगह और विद्युत् कला है । सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद अग्नि प्रज्वलित कर, गौओंको रोक और समिधाधान कर 'ज्योतिष्मान्' नामवाला है।' जो कोई इसे इस प्रकार जानने- अग्निके पश्चिम पूर्वाभिमुख होकर बैठा । तब हंसने उसके समीप वाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादको 'ज्योतिष्मान्' ऐसे उतरकर कहा—'सत्यकाम !' उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' गुणसे युक्त उपासना करता है, वह इस लोकमें ज्योतिष्मान् होता [ इसने कहा— ] 'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' है तथा ज्योतिष्मान् लोकोंको जीत लेता है ॥ १-४॥ अष्टम खण्ड मद्गुद्वारा चतुर्थ पादका उपदेश 'मद्गु तुझे [ चौथा ] पाद बतलावेगा' ऐसा [ कहकर [ सत्यकाम बोला-] 'भगवन् ! मुझे अवश्य बतलावें ।' वह हंस चला गया ] । दूसरे दिन उसने गौओंको गुरुकुलकी ओर उससे बोला-'प्राण कला है, चक्षु कला है, श्रोत्र कला है हाँक दिया। वे सायकालमें जहाँ एकत्रित हुईं वहीं अग्नि और मन कला है । सोम्य ! यह ब्रह्मका चतुष्कल पाद प्रज्वलित कर गायोंको रोक समिधाधान कर अग्निके पीछे 'आयतनवान्' नामवाला है।' वह, जो इसे इस प्रकार जानने- पूर्वाभिमुख होकर बैठ गया । मद्गुने उसके पास उतरकर वाला पुरुष ब्रह्मके इस चतुष्कल पादकी 'आयतनवान्' ऐसे कहा—'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' गुणसे युक्त उपासना करता है, इस लोकमें आयतनवान् होता [ मद्गु बोला— ] 'सोम्य ! मैं तुझे ब्रह्मका पाद बतलाऊँ ?' है और आयतनवान् लोकोंको जीत लेता है ॥ १-४ ॥ नवम खण्ड सत्यकामका आचार्यसे पुनः उपदेश-ग्रहण सत्यकाम आचार्यकुलमें पहुँचा । उससे आचार्यने कहा- तू ब्रह्मवेत्ता-सा दिखलायी दे रहा है; तुझे किसने उपदेश दिया 'सत्यकाम !' तब उसने उत्तर दिया-'भगवन् !' 'सोम्य ! है ?' ऐसा [ आचार्यने पूछा ] । तब उसने उत्तर दिया,
४३० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४
४३० * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ४ 'मनुष्योंसे भिन्न [देवताओं] ने मुझे उपदेश दिया है, अब मेरी इच्छाके अनुसार आप पूज्यपाद ही मुझे विद्याका उपदेश करें। मैंने श्रीमान् जैसे ऋषियोंसे सुना है कि आचार्यसे जानी गयी विद्या ही अतिशय साधुताको प्राप्त होती है।' तब आचार्यने उसे उसी विद्याका उपदेश किया। उसमें कुछ भी न्यून नहीं हुआ, न्यून नहीं हुआ [अर्थात् उसकी विद्या पूर्ण ही रही ] ॥ १-३ ॥ दशम खण्ड उपकोसलको अग्नियोंद्वारा ब्रह्मविद्याका उपदेश उपकोसल नामसे प्रसिद्ध कमलका पुत्र सत्यकाम जाबालके यहाँ ब्रह्मचर्य ग्रहण करके रहता था। उसने बारह वर्षतक उस आचार्यके अग्नियोंकी सेवा की, किंतु आचार्यने अन्य ब्रह्मचारियोंका तो समावर्तन संस्कार कर दिया, किंतु केवल इसीका नहीं किया। आचार्यसे उसकी भार्या ने कहा- 'यह ब्रह्मचारी खूब तपस्या कर चुका है, इसने अच्छी तरह अग्नियों- की सेवा की है। देखिये, अग्नियां आपकी निन्दा न करें। अतः इसे विद्याका उपदेश कर दीजिये।' किंतु वह उसे उपदेश किये बिना ही बाहर चला गया। उस उपकोसलने मानसिक खेदसे अनशन करनेका निश्चय किया। उससे आचार्यपत्नीने कहा- 'अरे ब्रह्मचारिन् ! तू भोजन कर, क्यों नहीं भोजन करता ?' वह बोला-'माताजी ! इस मनुष्यमें अनेक ओर जानेवाली बहुत-सी कामनाएँ रहती हैं। मैं व्याधियोंसे परिपूर्ण हूँ, इसलिये भोजन नहीं करूँगा' ॥ १-३ ॥ फिर अग्नियोंने एकत्रित होकर कहा- 'यह ब्रह्मचारी तपस्या कर चुका है; इसने हमारी अच्छी तरह सेवा की है। अच्छा, हम इसे उपदेश करें' ऐसा निश्चयकर वे उससे बोले- 'प्राण' ब्रह्म है, 'कं' ब्रह्म है, 'खं' ब्रह्म है। वह बोला-'यह तो मैं जानता हूँ कि प्राण ब्रह्म है; किंतु 'कं' और 'ख' को नहीं जानता।' तब वे बोले- 'निश्चय जो 'कं' है वही 'ख' है और जो 'ख' है वही 'कं' है।' इस प्रकार उन्होंने उसे प्राण और उसके [आश्रयभूत] आकाशका उपदेश किया ॥४-५॥ एकादश खण्ड अकेले गार्हपत्याग्निद्वारा शिक्षा फिर उसे गार्हपत्याग्निने शिक्षा दी- 'पृथ्वी, अग्नि, अन्न और आदित्य-ये मेरे चार शरीर हैं। आदित्यके अन्तर्गत जो यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।' वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, पापकर्मोंको नष्ट कर देता है, अभिलोकान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है, उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है तथा इसके उत्तरवर्ती पुरुष क्षीण नहीं होते। तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है उसका हम इस लोक और परलोकमें भी पालन करते हैं ॥ १-२ ॥ द्वादश खण्ड अन्वाहार्यपचन नामक दूसरे अग्निद्वारा शिक्षा फिर उसे अन्वाहार्यपचनने शिक्षा दी- 'जल, दिशा, नक्षत्र और चन्द्रमा-ये मेरे चार शरीर हैं। चन्द्रमामें जो यह पुरुष दिखायी देता है वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।' वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इस (चार भागोंमें विभक्त अग्नि) की उपासना करता है, पापकर्मोंका नाश कर देता है, लोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है और उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। उसके पीछे होनेवाले पुरुष क्षीण नहीं होते तथा जो इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है हम उसका इस लोक और परलोकमें भी पालन करते हैं ॥ १-२ ॥ त्रयोदश खण्ड ॐ आहवनीय-अग्निद्वारा शिक्षा तदनन्तर उसे आहवनीयाग्निने उपदेश किया- 'प्राण, आकाश, द्युलोक और विद्युत्-ये मेरे चार शरीर हैं। यह जो विद्युत्में पुरुष दिखायी देता है, वह मैं हूँ, वही मैं हूँ।' वह पुरुष, जो इसे इस प्रकार जानकर इस (चार भागोंमें विभक्त अग्नि) की उपासना करता है, पापकर्मों को नष्ट कर देता है, लोकवान् होता है, पूर्ण आयुको प्राप्त होता है तथा उज्ज्वल जीवन व्यतीत करता है। जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, उसके पश्चाद्वर्ती पुरुष क्षीण नहीं होते तथा उसका हम इस लोक और परलोकमें भी पालन करते हैं ॥ १-२॥
खण्ड १६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४३१ चतुर्दश खण्ड आचार्य और उपकोसलका संवाद उन्होंने कहा—'उपकोसल ! सौम्य ! यह अपनी विद्या और आत्मविद्या तेरे प्रति कही । आचार्य तुझे इसके फलकी प्राप्तिका मार्ग बतलायेंगे ।' तदनन्तर उसके आचार्य आये । उससे आचार्यने कहा—'उपकोसल !' उसने 'भगवन् !' ऐसा उत्तर दिया । [ आचार्य बोले—] 'सौम्य ! तेरा मुख ब्रह्मवेत्ताके समान जान पड़ता है; तुझे किसने उपदेश किया है ?' 'गुरुजी ! मुझे कौन उपदेश करता' ऐसा कहकर वह मानो उसे छिपाने लगा । [ फिर अग्नियोंकी ओर संकेत करके बोला—] 'निश्चय इन्होंने उपदेश किया है जो अन्य प्रकारके थे और अब ऐसे हैं'—ऐसा कहकर उसने अग्नियोको बतलाया । [ तब आचार्यने पूछा—] 'सौम्य ! इन्होंने तुझे क्या बतलाया है ?' तब उसने 'यह बतलाया है' ऐसा कहकर उत्तर दिया । [ इसपर आचार्यने कहा—] 'हे सौम्य ! इन्होंने तो तुझे केवल लोकोंका ही उपदेश किया है, अब मै तुझे वह बतलाता हूँ जिसे जाननेवालेसे पाप-कर्मका उसी प्रकार सम्बन्ध नहीं होता जैसे कमलपत्रसे जलका सम्बन्ध नहीं होता।' वह बोला—'भगवन् ! मुझे बतलावें ।' तब आचार्य उससे बोले ॥ १-३ ॥ पञ्चदश खण्ड आचार्यद्वारा उपदेश, ब्रह्मवेत्ताकी गतिका वर्णन 'यह जो नेत्रमें पुरुष दिखायी देता है, यह आत्मा है'— ऐसा उसने कहा 'यह अमृत है, अभय है और ब्रह्म है। उस ( पुरुषके स्थानरूप नेत्र ) में यदि घृत या जल डाले तो वह पलकोंमें ही चला जाता है। इसे 'संयद्वाम' ऐसा कहते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण सेवनीय वस्तुएँ सब ओरसे इसीको प्राप्त होती हैं; जो इस प्रकार जानता है, उसे सम्पूर्ण सेवनीय वस्तुएँ सब ओरसे प्राप्त होती हैं। यही वामनी है, क्योंकि यही सम्पूर्ण वामोंका वहन करता है। जो ऐसा जानता है, वह सम्पूर्ण वामोंको वहन करता है। यही भामनी है, क्योंकि यही सम्पूर्ण लोकोंमें भासमान होता है। जो ऐसा जानता है, वह सम्पूर्ण लोकोंमें भासमानी होता है ॥ १-४ ॥ अब [ श्रुति पूर्वोक्त ब्रह्मवेत्ताकी गति बतलाती है—] इसके लिये शवकर्म करें अथवा न करें—वह अर्चि-अभिमानी देवताको ही प्राप्त होता है। फिर अर्चि-अभिमानी देवतासे दिवसाभिमानी देवताको, दिवसाभिमानीसे शुक्लपक्षाभिमानी देवताको और शुक्लपक्षाभिमानी देवतासे उत्तरायणके छः मासोंको प्राप्त होता है। मासोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे आदित्यको, आदित्यसे चन्द्रमाको और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होता है। वहाँसे अमानव पुरुष इसे ब्रह्मको प्राप्त करा देता है। यह देवमार्ग—ब्रह्ममार्ग है। इससे जानेवाले पुरुष इस मानव- मण्डलमें नहीं लौटते, नहीं लौटते ॥ ५ ॥ षोडश खण्ड पवनकी यज्ञरूपमें उपासना यह जो चलता है निश्चय यज्ञ ही है। यह चलता हुआ निश्चय ही इस सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करता है, क्योंकि यह गमन करता हुआ इस समस्त संसारको पवित्र कर देता है इसलिये यही यज्ञ है। मन और वाक्—ये दोनों इसके मार्ग हैं। इनमेंसे एक मार्गका ब्रह्मा मनके द्वारा सस्कार करता है तथा होता, अध्वर्यु और उद्गाता ये वाणीद्वारा दूसरे मार्गका संस्कार करते हैं। यदि प्रातरनुवाकके आरम्भ हो जानेपर परिधानीया ऋचाके उच्चारणसे पूर्व ब्रह्मा बोल उठता है तो वह केवल एक मार्गका ही सस्कार करता है, दूसरा मार्ग नष्ट हो जाता है। जिस प्रकार एक पैरसे चलनेवाला पुरुष अथवा एक पहियेसे चलनेवाला रथ नष्ट हो जाता है उसी प्रकार इसका यज्ञ भी नाशको प्राप्त हो जाता है। यज्ञके नष्ट होनेके पश्चात् यजमानका नाश होता,है, इस प्रकारका यज्ञ करनेपर वह और भी अधिक पापी हो जाता है। और यदि प्रातरनुवाकका आरम्भ होनेके अनन्तर परिधानीया ऋचासे पूर्व ब्रह्मा नहीं बोलता है तो समस्त ऋत्विक् मिलकर दोनों ही मागोंका सस्कार कर देते हैं। तब कोई भी मार्ग नष्ट नहीं होता। जिस प्रकार दोनों पैरोंसे चलनेवाला पुरुष अथवा दोनों पहियोंसे चलनेवाला रथ स्थित रहता है इसी प्रकार इसका यज्ञ स्थित रहता है, यज्ञके स्थित रहनेपर यजमान भी स्थित रहता है। वह ऐसा यज्ञ करके श्रेष्ठ होता है ॥१—५॥
४३२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ ४ सप्तदश खण्ड यज्ञमें योग्य ब्रह्माकी आवश्यकता प्रजापतिने लोकोंको लक्ष्य बनाकर ध्यानरूप तप किया । उन तप किये जाते हुए लोकोंसे उसने रस निकाले । पृथ्वीसे अग्नि, अन्तरिक्षसे वायु और द्युलोकसे आदित्यको निकाला । फिर उसने इन तीन देवताओंको लक्ष्य करके तप किया । उन तप किये जाते हुए देवताओंसे उसने रस निकाले । अग्निसे ऋक्, वायुसे यजुः और आदित्यसे साम ग्रहण किये । तदनन्तर उसने इस त्रयीविद्याको लक्ष्य करके तप किया । उस तप की जाती हुई विद्यासे उसने रस निकाले । ऋक्- श्रुतियोंसे भूः, यजुःश्रुतियोंसे भुवः तथा सामश्रुतियोंसे स्वः इन रसोंको ग्रहण किया। उस यज्ञमें यदि ऋक्-श्रुतियोंके सम्बन्धसे क्षत हो तो 'भूः स्वाहा' ऐसा कहकर गार्हपत्याग्निमें हवन करे । इस प्रकार वह ऋचाओंके रससे ऋचाओंके वीर्यद्वारा ऋक्सम्बन्धी यज्ञके क्षतकी पूर्ति करता है। और यदि यजुःश्रुतियोंके कारण क्षत हो तो 'भुवः स्वाहा' ऐसा कहकर दक्षिणाग्निमे हवन करे । इस प्रकार वह यजुओंके रससे यजुओंके वीर्यद्वारा यज्ञके यजुःसम्बन्धी क्षतकी पूर्ति करता है। और यदि सामश्रुतियोंके कारण क्षत हो तो 'स्वः स्वाहा' ऐसा कहकर आहवनीयाग्निमे हवन करे। इस प्रकार वह सामके रससे सामके वीर्यद्वारा यज्ञके सामसम्बन्धी क्षतिकी पूर्ति करता है। इस विषयमे ऐसा समझना चाहिये कि जिस प्रकार लवण (क्षार) से सुवर्णको, सुवर्णसे चाँदीको, चाँदीसे त्रपुको, त्रपुसे सीसेको, सीसेसे लोहेको और लोहेसे काष्ठको अथवा चमड़ेमे काष्ठको जोड़ा जाता है। उसी प्रकार इन लोक, देवता और त्रयीविद्याके वीर्यसे यज्ञके क्षतका प्रतिसन्धान किया जाता है। जिसमे इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ निश्चय ही मानो ओषधियोद्वारा संस्कृत होता है। जहाँ इस प्रकार जाननेवाला ब्रह्मा होता है वह यज्ञ उदक्प्रवण होता है। इस प्रकार जाननेवाले ब्रह्माके उद्देश्यसे ही यह गाया प्रसिद्ध है कि 'जहाँ जहाँ कर्म आवृत्त होता है वहीं वह पहुँच जाता है' ॥ १-९॥ एक मानव ब्रह्मा ही ऋत्विक् है। जिस प्रकार युद्धमें घोड़ी योद्धाओकी रक्षा करती है उसी प्रकार ऐसा जाननेवाला ब्रह्मा यज्ञ, यजमान और अन्य समस्त ऋत्विजोंकी भी सब ओरसे रक्षा करता है। अतः इस प्रकार जाननेवालेको ही ब्रह्मा बनाये, ऐसा न जाननेवालेको नहीं, ऐसा न जाननेवाले- को नहीं ॥ १० ॥ ॥ चतुर्थ अध्याय समाप्त ॥ ४ ॥
पञ्चम अध्याय
ॐ पञ्चम अध्याय प्रथम खण्ड प्राणकी सर्वश्रेष्ठता जो ज्येष्ठ और श्रेष्ठको जानता है, वह ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हो जाता है । निश्चय ही प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। जो कोई वसिष्ठको जानता है, वह स्वजातियोंमें वसिष्ठ होता है, निश्चय वाक् ही वसिष्ठ है । जो कोई प्रतिष्ठाको जानता है, वह इस लोक और परलोकमें प्रतिष्ठित होता है, चक्षु ही प्रतिष्ठा है। जो कोई समृद्धिको जानता है, उसे दैव और मानुष भोग सम्यक् प्रकारसे प्राप्त होते हैं। श्रोत्र ही समृद्धि है। जो आयतनको जानता है, वह स्वजातीयोंका आयतन—आश्रय होता है। निश्चय मन ही आयतन है ॥ १-५ ॥ एक बार प्राण ( इन्द्रियाँ ) 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ' इस प्रकार अपनी श्रेष्ठताके लिये विवाद करने लगे । उन प्राणोंने अपने पिता प्रजापतिके पास जाकर कहा—'भगवन् ! हममें कौन श्रेष्ठ है ?' प्रजापतिने उनसे कहा—'तुममेंसे जिसके उत्क्रमण करनेपर शरीर अत्यन्त पापिष्ठ-सा दिखायी देने लगे, वही तुममें श्रेष्ठ है।' तब वाक्-इन्द्रियने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा— 'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [उन्होंने कहा—] 'जिस प्रकार गूँगेलोग बिना बोले प्राणसे प्राणनक्रिया करते, नेत्रसे देखते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे।' ऐसा सुनकर वाक्- इन्द्रियने शरीरमें प्रवेश किया । फिर चक्षुने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा— 'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा— ] 'जिस प्रकार अन्धेलोग बिना देखे प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, कानसे सुनते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे।' ऐसा सुनकर चक्षु- ने प्रवेश किया । तदनन्तर श्रोत्रने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास करनेके अनन्तर फिर लौटकर पूछा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके?' [ उन्होंने कहा— ] 'जिस प्रकार बहरे मनुष्य बिना सुने प्राणसे प्राणन करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और मनसे चिन्तन करते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे ।' यह सुनकर श्रोत्रने शरीरमें प्रवेश किया । तत्पश्चात् मनने उत्क्रमण किया । उसने एक वर्ष प्रवास कर फिर लौटकर कहा—'मेरे बिना तुम कैसे जीवित रह सके ?' [ उन्होंने कहा—] 'जिस प्रकार बच्चे, जिनका कि मन विकसित नहीं होता, प्राणसे प्राणनक्रिया करते, वाणीसे बोलते, नेत्रसे देखते और कानसे सुनते हुए जीवित रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे।' यह सुनकर मनने भी प्रवेश किया। फिर प्राणने उत्क्रमण करनेकी इच्छा की। उसने, जिस प्रकार अच्छा घोड़ा अपने पैर बाँधनेके कीलोंको उखाड़ डालता है, उसी प्रकार अन्य प्राणोंको भी उखाड़ दिया। तब उन सबने उसके सामने जाकर कहा— 'भगवन् ! आप [ हमारे स्वामी ] रहें, आप ही हम सबमें श्रेष्ठ हैं, आप उत्क्रमण न करें' ॥ ६-१२ ॥ फिर उससे वाक्-इन्द्रियने कहा—'मैं जो वसिष्ठ हूँ सो तुम्हीं वसिष्ठ हो ।' तदनन्तर उससे चक्षुने कहा—'मैं जो प्रतिष्ठा हूँ सो तुम्हीं प्रतिष्ठा हो ।' फिर उससे श्रोत्रने कहा— 'मैं जो समृद्धि हूँ सो तुम्हीं समृद्धि हो ।' तत्पश्चात् उससे मन बोला—'मैं जो आयतन हूँ, सो तुम्हीं आयतन हो।' [ लोकमें समस्त इन्द्रियोंको ] न वाक्, न चक्षु, न श्रोत्र और न मन ही कहते हैं, परंतु 'प्राण' ऐसा कहते हैं, क्योंकि ये सब प्राण- ही हैं ॥ १३-१५ ॥ द्वितीय खण्ड महत्त्वप्राप्तिके लिये मन्थोपासना उसने कहा—'मेरा अन्न क्या होगा ?' तब वागादिने कहा—'कुत्तों और पक्षियोंसे लेकर सब जीवोका यह जो कुछ अन्न है [ सब तुम्हारा अन्न है ]'; सो यह सब अन ( प्राण ) का अन्न है । 'अन' यह प्राणका प्रत्यक्ष नाम है । इस प्रकार जाननेवालेके लिये भी कुछ अनन्न (अभक्ष्य) नहीं होता है । उसने कहा—'मेरा वस्त्र क्या होगा ?' तब वागादि बोले— 'जल' । इसीसे भोजन करनेवाले पुरुष भोजनके पूर्व और पश्चात् इसका जलसे आच्छादन करते हैं। ऐसा करनेसे वह वस्त्र प्राप्त करनेवाला और अनग्न होता है ॥ १-२ ॥ उस इस ( प्राणदर्शन ) को सत्यकाम जावालने वैयाघ्रपद्य गो-श्रुतिके प्रति निरूपित करके कहा—'यदि इसे सूखे ठूँठके प्रति कहे तो उसमे शाखा उत्पन्न हो जायगी और पत्ते फूट आयेंगे' ॥ ३ ॥ अब यदि वह महत्त्वको प्राप्त होना चाहे तो उसे.
४३४ - छान्दोग्योपनिषद् - [ अध्याय ५
अमावस्याको दीक्षित होकर पूर्णिमाकी रात्रिको सर्वौषधके दधि और मधुसम्बन्धी मन्थका मन्थन कर 'ज्येष्ठाय श्रेष्ठाय स्वाहा' ऐसा कहते हुए अग्निमें घृतका हवन कर मन्थपर उसका अवशेष डालना चाहिये। इसी प्रकार 'वसिष्ठाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले, 'प्रतिष्ठायै स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमे घृतका स्राव डाले, 'सपदे स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमे घृताहुति देकर मन्थमे घृतका स्राव डाले तथा 'आयत्नाय स्वाहा' इस मन्त्रसे अग्निमें घृताहुति देकर मन्थमें घृतका स्राव डाले। तदनन्तर अग्निसे कुछ दूर हटकर मन्थको अञ्जलिमे ले वह 'अमो नामासि' इत्यादि मन्त्रका जप करे। [अमो नामासि आदि मन्त्रका अर्थ—] 'हे मन्थ ! तू 'अम' नामवाला है, क्योंकि यह सारा जगत् [अपने प्राणभूत] तेरे साथ अवस्थित है। वह तू ज्येष्ठ, श्रेष्ठ राजा (दीप्तिमान्) और सबका अधिपति है। वह तू मुझे ज्येष्ठत्व, श्रेष्ठत्व, राज्य और आधिपत्यको प्राप्त करा। मैं ही यह सर्वरूप हो जाऊँ।' फिर वह इस ऋचासेऽ पादशः [उस मन्थका] भक्षण करता है। 'तत्स॑वितुर्वृणीमहे' ऐसा कहकर भक्षण करता है; 'व॒यं दे॒वस्य॑ भोजनम्' ऐसा कहकर भक्षण करता है, 'श्रेष्ठ सर्वधातमम्' ऐसा कहकर भोजन करता है तथा 'तुरं॒ भग॑स्य धीमहि' ऐसा कहकर कस (कटोरे) या चमस (चम्मच) को धोकर सारा मन्थलेप पी जाता है। तत्पश्चात् वह अग्निके पीछे चर्म अथवा स्थण्डिल (पवित्र यज्ञभूमि) पर वाणीका संयम कर [अनिष्ट स्वप्नदर्शनसे] अभिभूत न होता हुआ शयन करता है। उस समय यदि वह [स्वप्नमें] स्त्रीको देखे तो ऐसा समझे कि कर्म सफल हो गया। इस विषयमे यह श्लोक है— जिस समय काम्यकर्ममें स्वप्नमे स्त्रीको देखे तो उस स्वप्नदर्शनके होनेपर उस कर्ममें समृद्धि जाने ॥ ४-८ ॥
तृतीय खण्ड
श्वेतकेतु और प्रवाहणका संवाद; श्वेतकेतुके पिताका राजासे उपदेश माँगना
आरुणिका पुत्र श्वेतकेतु पञ्चालदेशीय लोगोंकी सभामे आया। उससे जीवकके पुत्र प्रवाहणने कहा—'कुमार ! क्या पिताने तुझे शिक्षा दी है?' इसपर उसने कहा—'हाँ, भगवन् !' ॥ १ ॥
'क्या तुझे मालूम है कि इस लोकसे जानेपर प्रजा कहाँ जाती है?' [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! नहीं।' [प्रवाहण—] 'क्या तू जानता है कि वह फिर इस लोकमें कैसे आती है?' [श्वेतकेतु—] 'नहीं, भगवन् !' [प्रवाहण—] 'देवयान और पितृयान—इन दोनों मार्गोंका पारस्परिक वियोगस्थान तुझे मालूम है?' [श्वेतकेतु—] 'नहीं भगवन् !' [प्रवाहण—] 'तुझे मालूम है, वह पितृलोक भरता क्यों नहीं है?' [श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! नहीं।' [प्रवाहण—] 'क्या तू जानता है कि पाँचवीं आहुतिके हवन कर दिये जानेपर आप (सोमामृतादि रस) 'पुरुष' सज्ञाको कैसे प्राप्त होते हैं?' [श्वेतकेतु—] 'नहीं, भगवन् ! नहीं।' 'तो फिर तू अपनेको 'मुझे शिक्षा दी गयी है' ऐसा क्यों कहता था? जो इन बातोंको नहीं जानता वह अपनेको शिक्षित कैसे कह सकता है?' तब वह त्रस्त होकर अपने पिताके स्थानपर आया और उससे बोला—'श्रीमान्ने मुझे शिक्षा दिये बिना ही कह दिया था कि मैंने तुझे शिक्षा दे दी है। उस क्षत्रियबन्धुने मुझसे पाँच प्रश्न पूछे; किंतु मैं उनमेंसे एकका भी विवेचन नहीं कर सका।' पिताने कहा—'तुमने उस समय (आते ही) जैसे ये प्रश्न मुझे सुनाये हैं उनमेंसे मैं एकको भी नहीं जानता। यदि मैं इन्हें जानता होता तो तुम्हे क्यों न बतलाता?' ॥ २-५ ॥
तब वह गौतम गोत्रोत्पन्न ऋषि राजा (जैवलि) के स्थानपर आया। राजाने अपने यहाँ आये हुए उसकी पूजा की। [दूसरे दिन] प्रातःकाल होते ही राजाके सभामे पहुँचनेपर वह गौतम उसके पास गया। राजाने उससे कहा—'भगवन् गौतम ! आप मनुष्यसम्बन्धी धनका वर माँग लीजिये। उसने कहा—'राजन् ! ये मनुष्यसम्बन्धी धन आपहीके पास रहें, आपने मेरे पुत्रके प्रति जो बात प्रश्नरूपसे कही थी वही मुझे बतलाइये।' तब वह सङ्कटमे पड़ गया। उसे 'यहाँ चिरकालतक रहो' ऐसी आज्ञा दी, और उससे कहा—'गौतम ! जिस प्रकार तुमने मुझसे कहा है [उससे तुम यह समझो कि] पूर्वकालमें तुमसे पहले यह विद्या ब्राह्मणोंके पास नहीं गयी। इसीसे सम्पूर्ण लोकोंमें [इस विद्याद्वारा] क्षत्रियोंका ही [शिष्योंके प्रति] अनुशासन होता रहा है।' ऐसा कहकर वह गौतमसे बोला— ॥ ६-७ ॥
* इस ऋचाका अर्थ इस प्रकार है—'हम प्रकाशमान सविताके उस सर्वविषयक श्रेष्ठतम भोजनकी प्रार्थना करते हैं और शीघ्र ही उस देवताके स्वरूपका ध्यान करते हैं।'
खण्ड १० ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४३५ चतुर्थ खण्ड द्युलोककी अग्निके रूपमें उपासना हे गौतम ! यह प्रसिद्ध द्युलोक ही अग्नि है । उसका इस द्युलोकरूप अग्निमें देवगण श्रद्धाका हवन करते हैं । उस आदित्य ही समिध् है, किरणें धूम हैं, दिन ज्वाला है, चन्द्रमा आहुतिसे सोम राजाकी उत्पत्ति होती है ॥ १-२ ॥ अङ्गार है और नक्षत्र विस्फुलिङ्ग ( चिनगारियाँ ) हैं । उस पञ्चम खण्ड पर्जन्यकी अग्निके रूपमें उपासना गौतम ! पर्जन्य ही अग्नि है; उसका वायु ही समिध् है, विस्फुलिङ्ग हैं । उस अग्निमें देवगण राजा सोमका हवन करते बादल धूम है, विद्युत् ज्वाला है, वज्र अङ्गार है तथा गर्जन हैं, उस आहुतिसे वर्षा होती है ॥ १-२ ॥ षष्ठ खण्ड पृथिवीकी अग्निके रूपमें उपासना गौतम ! पृथिवी ही अग्नि है । उसका संवत्सर ही समिध् अवान्तर दिशाएँ विस्फुलिङ्ग हैं । उस इस अग्निमें देवगण है, आकाश धूम है, रात्रि ज्वाला है, दिशाएँ अङ्गारे हैं तथा वर्षाका हवन करते हैं; उस आहुतिसे अन्न होता है ॥ १-२॥ सप्तम खण्ड पुरुषकी अग्निके रूपमें उपासना गौतम ! पुरुष ही अग्नि है । उसकी वाक् ही समिध् है, विस्फुलिङ्ग हैं । उस इस अग्निमें देवगण अन्नका होम करते प्राण धूम है, जिह्वा ज्वाला है, चक्षु अङ्गार है और श्रोत्र हैं । उस आहुतिसे वीर्य उत्पन्न होता है ॥ १-२ ॥ अष्टम खण्ड स्त्रीकी अग्निके रूपमें उपासना गौतम ! स्त्री ही अग्नि है । उसका उपस्थ ही समिध् है, जो सुख होता है, वह विस्फुलिङ्ग है । उस इस अग्निमें देवगण पुरुष जो उपमन्त्रण करता है वह धूम है, योनि ज्वाला है वीर्यका हवन करते हैं; उस आहुतिसे गर्भ उत्पन्न होता तथा जो भीतरकी ओर करता है, वह अङ्गार है और उससे है ॥ १-२ ॥ नवम खण्ड पाँचवीं आहुतिसे 'पुरुष' की उत्पत्ति इस प्रकार पाँचवीं आहुतिके दिये जानेपर आप 'पुरुष' है । इस प्रकार उत्पन्न होनेपर वह आयुःपर्यन्त जीवित रहता शब्दवाची हो जाते हैं । वह जरायुसे आवृत्त हुआ गर्भ दस है । फिर मरनेपर कर्मफल भोगनेके लिये प्रस्थित हुए उस जीवको या नौ महीने अथवा जबतक पूर्णायु नहीं होता तबतक माताकी अग्निके प्रति ही ले जाते हैं, जहाँसे कि वह आया था और कुक्षिके भीतर ही शयन करनेके अनन्तर फिर उत्पन्न होता जिससे उत्पन्न हुआ था ॥ १-२ ॥ दशम खण्ड जीवोंकी त्रिविध गति वे जो इस प्रकार जानते हैं तथा वे जो वनमें श्रद्धा और अर्चि-अभिमानी देवताओंको प्राप्त होते हैं. अर्चि-अभिमानी तप इनकी उपासना करते हैं [ प्राणप्रयाणके अनन्तर ] देवताओंसे दिवसाभिमानी देवताओंको; दिवसाभिमानियोंसे
४३६ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
४३६ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ५ शुक्लपक्षाभिमानी देवताओंको, शुक्लपक्षाभिमानियोंसे जिन छः महीनोंमें सूर्य उत्तरकी ओर जाता है, उन छः महीनोंको, उन महीनोंसे संवत्सरको, संवत्सरसे आदित्यको, आदित्यसे चन्द्रमा- को और चन्द्रमासे विद्युत्को प्राप्त होते हैं। वहाँ एक अमानव पुरुष है, वह उन्हें ब्रह्मको प्राप्त करा देता है। यह देवयान मार्ग है ॥ १-२ ॥ तथा जो ये गृहस्थलोग ग्राममे इष्ट, पूर्त्त और दत्त—ऐसी उपासना करते हैं वे धूमको प्राप्त होते हैं, धूमसे रात्रिको, रात्रिसे कृष्णपक्षको तथा कृष्णपक्षसे जिन छ. महीनोंमें सूर्य दक्षिण मार्गसे जाता है उनको प्राप्त होते है। ये लोग संवत्सरको प्राप्त नहीं होते। दक्षिणायनके महीनोंसे पितृलोकको, पितृलोकसे आकाशको और आकाशसे चन्द्रमाको प्राप्त होते हैं। यह चन्द्रमा राजा सोम है। वह देवताओंका अन्न है, देवतालोग उसका भक्षण करते हैं। वहाँ कर्मोंका क्षय होनेतक रहकर वे फिर इसी मार्गसे जिस प्रकार गये थे उसी प्रकार लौटते हैं। [वे पहले] आकाशको प्राप्त होते हैं और आकाशसे वायुको, वायु होकर वे धूम होते हैं और धूम होकर अभ्र होते हैं। वह अभ्र होकर मेघ होता है, मेघ होकर बरसता है। तब वे जीव इस लोकमे धान, जौ, ओषधि, वनस्पति, तिल और उड़द आदि होकर उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार यह निष्क्रमण निश्चय ही अत्यन्त कष्टप्रद है। उस अन्नको जो-जो भक्षण करता है और जो-जो वीर्यसेचन करता है तद्रूप ही वह जीव हो जाता है ॥ ३-६ ॥ उन (अनुशयी जीवों) मे जो अच्छे आचरणवाले होते हे वे शीघ्र ही उत्तम योनिको प्राप्त होते हैं। वे ब्राह्मणयोनि, क्षत्रिययोनि अथवा वैश्ययोनि प्राप्त करते हैं तथा जो अशुभ आचरणवाले होते हे वे तत्काल अशुभ योनिको प्राप्त होते हैं। वे कुत्तेकी योनि, सूकरयोनि अथवा चाण्डालयोनि प्राप्त करते हैं ॥ ७ ॥ इनमेसे वे किसी मार्गद्वारा नहीं जाते । वे ये क्षुद्र और बारम्बार आने जानेवाले प्राणी होते हैं। 'उत्पन्न होओ और मरो' यही उनका तृतीय स्थान होता है। इसी कारण यह परलोक नही भरता। अतः [इस संसारगतिसे] घृणा करनी चाहिये। इस विषयमे यह मन्त्र है—सुवर्णका चोर, मद्य पीनेवाला, गुरुस्त्रीगामी, ब्रह्महत्यारा—ये चारों पतित होते हैं और पाँचवाँ उनके साथ संसर्ग करनेवाला भी। किंतु जो इस प्रकार इन पञ्चाग्नियोंको जानता है वह उनके साथ आचरण (संसर्ग) करता हुआ भी पापसे लिप्त नहीं होता। वह शुद्ध पवित्र और पुण्यलोकका भागी होता है, जो इस प्रकार जानता है, जो इस प्रकार जानता है ॥ ८-१० ॥ एकादश खण्ड प्राचीनशाल आदिका राजा अश्वपतिसे वैश्वानर आत्माके सम्बन्धमें प्रश्न उपमन्युका पुत्र प्राचीनशाल, पुलुषका पुत्र सत्ययज्ञ, भल्लविका पुत्रका पुत्र इन्द्रद्युम्न, शर्कराक्षका पुत्र जन और अश्वतराश्वका पुत्र बुडिल—ये महागृहस्थ और परम श्रोत्रिय एकत्रित होकर परस्पर विचार करने लगे कि हमारा आत्मा कौन है और ब्रह्म क्या है ? ॥ १ ॥ उन पूजनीयोंने स्थिर किया कि यह अरुणका पुत्र उद्दालक इस समय इस वैश्वानर आत्माको जानता है; अतः हम उसके पास चलें। ऐसा निश्चय कर वे उसके पास गये। उसने निश्चय किया कि 'ये परम श्रोत्रिय महागृहस्थ मुझसे प्रश्न करेंगे, किंतु मै इन्हें पूरी तरहसे नहीं बतला सकूँगा, अतः मैं इन्हें दूसरा उपदेष्टा बतला दूँ।' उसने इनसे कहा—'हे पूजनीयगण ! इस समय केकयकुमार अश्वपति इस वैश्वानरसंजक आत्माको अच्छी तरह जानता है। आइये, हम उसीके पास चलें।' ऐसा कहकर वे उसके पास चले गये ॥ २-४ ॥ अपने पास आये हुए उन ऋषियोंका राजाने अलग- अलग सत्कार कराया। [ दूसरे दिन ] प्रातःकाल उठते ही उसने कहा—'मेरे राज्यमे न तो कोई चोर ही है तथा न अदात्ता, मद्यप, अनाहिताग्नि, अविद्वान् और परस्त्रीगामी ही है, फिर कुलटा स्त्री तो आयी ही कहाँसे ? हे पूज्यगण ! मै भी यज्ञ करनेवाला हूँ। मे एक-एक ऋत्विक्को जितना धन दूँगा, उतना ही आपको भी दूँगा, अतः आपलोग यही ठहरिये।' वे बोले—'जिस प्रयोजनसे कोई पुरुष कहीं जाता है उसे चाहिये कि वह अपने उसी प्रयोजनको कहे। इस समय आप वैश्वानर आत्माको जानते हैं, उसीका आप हमारे प्रति वर्णन कीजिये।' वह उनसे बोला—'अच्छा, मैं प्रातःकाल आपलोगोंको इसका उत्तर दूंगा।' तब दूसरे दिन पूर्वाह्नमें वे हाथमें समिधाएँ लेकर राजाके पास गये। उनका उपनयन न करके ही राजाने उन्हें उस विद्याका उपदेश किया ॥ ५-७ ॥
कल्याण सत्यकाम और उपकोशल राजा अश्वपतिके भवनमें उद्दालक
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खण्ड १५ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ४३७ द्वादश खण्ड अश्वपति और औपमन्यवका संवाद [राजाने कहा-] 'उपमन्युकुमार ! तुम किस आत्माकी और प्रियका दर्शन करते हो। जो इस वैश्वानर आत्माकी इस उपासना करते हो ?' 'पूज्य राजन् ! मैं द्युलोककी ही उपासना प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका करता हूँ' ऐसा उसने उत्तर दिया । [ राजा-] 'तुम जिस दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। यह आत्माकी उपासना करते हो यह निश्चय ही 'सुतेजा' नामसे वैश्वानर आत्माका मस्तक है।' ऐसा राजाने कहा, और यह प्रसिद्ध वैश्वानर आत्मा है, इसीसे तुम्हारे कुलमे सुत, प्रसूत भी कहा कि-'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा मस्तक और आसुत दिखायी देते हैं। तुम अन्न भक्षण करते हो गिर जाता' ॥ १ २ ॥ त्रयोदश खण्ड अश्वपति और सत्ययज्ञका संवाद फिर उसने पुलुषके पुत्र सत्ययज्ञसे कहा- 'प्राचीनयोग्य ! रथ और दासियोंके सहित हार प्राप्त है । तुम अन्न भक्षण तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला-'पूज्य करते हो और प्रियका दर्शन करते हो। जो इस प्रकार इस राजन् ! मैं आदित्यकी ही उपासना करता हूँ ।' [ राजाने वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, कहा-] 'यह निश्चय ही विश्वरूप वैश्वानर आत्मा है, जिस प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। आत्माकी तुम उपासना करते हो, इसीसे तुम्हारे कुलमें बहुत- किंतु यह आत्माका नेत्र ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी सा विश्वरूप साधन दिखायी देता है। खच्चरियोंसे जुता हुआ कहा कि-'यदि तुम मेरे पास न आते तो अन्धे हो जाते' ॥१-२॥ चतुर्दश खण्ड अश्वपति और इन्द्रद्युम्नका संवाद तदनन्तर राजाने भाल्लवेय इन्द्रद्युम्नसे कहा- 'वैयाघ्रपद्य ! चलती है । तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' वह बोला-'पूज्य करते हो। जो कोई इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी- राजन् ! मैं वायुकी ही उपासना करता हूँ।' [राजाने कहा-] उपासना करता है, यह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन 'जिस आत्माकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही पृथग्वर्मा करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह वैश्वानर आत्मा है, इसीसे तुम्हारे प्रति पृथक् पृथक् उपहार आत्माका प्राण ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा आते हैं और तुम्हारे पीछे पृथक् पृथक् रथकी पङ्क्तियाँ कि-'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा प्राण उत्क्रमण कर जाता' ॥ १-२ ॥ पञ्चदश खण्ड अश्वपति और जनका संवाद तदनन्तर राजाने जनसे कहा- 'शार्कराक्ष्य ! तुम किस करते हो। जो इस प्रकार इस वैश्वानर आत्माकी उपासना आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा- 'पूज्य राजन् ! करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन करता है मैं आकाशकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा बोला-] और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है। किंतु यह आत्माका 'यह निश्चय ही बहुलसञ्ज्ञक वैश्वानर आत्मा है जिसकी कि संदेह (शरीरका मध्यभाग) ही है।' ऐसा राजाने कहा और तुम उपासना करते हो। इसीसे तुम प्रजा और धनके कारण यह भी कहा कि- 'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा संदेह बहुल हो। तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका दर्शन (शरीरका मध्यभाग) नष्ट हो जाता' ॥ १-२ ॥
४३८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ५
४३८ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ५ षोडश खण्ड अश्वपति और बुडिलका संवाद फिर उसने अश्वतराश्वके पुत्र बुडिलसे कहा—'वैयाघ्रपद्य ! दर्शन करते हो। जो पुरुष इस वैश्वानर आत्माकी इस प्रकार तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'पूज्य उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता है, प्रियका दर्शन राजन् ! मैं तो जलकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता है, किंतु यह बोला—] 'जिसकी तुम उपासना करते हो वह निश्चय ही आत्माका वस्ति ही है।' ऐसा राजाने कहा और यह भी कहा रयिसंज्ञक वैश्वानर आत्मा है, इसीसे तुम रयिमान् (धनवान्) कि—'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारा वस्तिस्थान फट और पुष्टिमन् हो। तुम अन्न भक्षण करते हो और प्रियका जाता' ॥ १-२ ॥ सप्तदश खण्ड अश्वपति और उद्दालकका संवाद तत्पश्चात् राजाने अरुणके पुत्र उद्दालकसे कहा—'गौतम ! और प्रियका दर्शन करते हो। जो कोई इस वैश्वानर तुम किस आत्माकी उपासना करते हो ?' उसने कहा—'पूज्य आत्माकी इस प्रकार उपासना करता है वह अन्न भक्षण करता राजन् ! मै तो पृथिवीकी ही उपासना करता हूँ।' [ राजा है, प्रियका दर्शन करता है और उसके कुलमें ब्रह्मतेज होता बोला—] 'जिसकी तुम उपासना करते हो यह निश्चय ही है। किन्तु यह आत्माके चरण ही है।' ऐसा उसने कहा और प्रतिष्ठासंज्ञक वैश्वानर आत्मा है। इसीसे तुम प्रजा और यह भी कहा कि—'यदि तुम मेरे पास न आते तो तुम्हारे चरण पशुओंके कारण प्रतिष्ठित हो। तुम अन्न भक्षण करते हो शिथिल हो जाते' ॥ १-२ ॥ अष्टादश खण्ड अश्वपतिक वैश्वानर आत्माके सम्बन्धमे उपदेश राजाने उनसे कहा—'तुम सब लोग इस वैश्वानर (द्युलोक) है, चक्षु विश्वरूप (सूर्य) है, प्राण पृथग्वर्त्मा आत्माको अलग-सा जानकर अन्न भक्षण करते हो। जो कोई (वायु) है, देहका मध्यभाग बहुल (आकाश) है, वस्ति ही 'यही मैं हूँ' इस प्रकार अभिमानका विषय होनेवाले इस रयि (जल) है, पृथिवी ही दोनों चरण ह, वक्षःस्थल वेदी प्रादेशमात्र वैश्वानर आत्माकी उपासना करता है वह समस्त है, लोम दर्भ हैं, हृदय गार्हपत्याग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन लोकोंमें, समस्त प्राणियोंमें और समस्त आत्माओंमें अन्न भक्षण करता है। उस इस वैश्वानर आत्माका मस्तक ही सुतेजा है और मुख आहवनीय है' ॥ १-२ ॥ एकोनविंश खण्ड 'प्राणाय स्वाहा' से पहली आहुति अतः जो अन्न पहले आवे उसका हवन करना चाहिये, द्युलोकके तृप्त होनेपर जिस किसीपर द्युलोक और आदित्य उस समय वह भोक्ता जो पहली आहुति दे उसे 'प्राणाय स्वाहा' (स्वामिभावसे) अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है और उसकी ऐसा कहकर दे। इस प्रकार प्राण तृप्त होता है। प्राणके तृप्त तृप्ति होनेपर स्वय भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और होनेपर नेत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, नेत्रेन्द्रियके तृप्त होनेपर सूर्य ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ १-२ ॥ तृप्त होता है, सूर्यके तृप्त होनेपर द्युलोक तृप्त होता है तथा विंश खण्ड 'व्यानाय स्वाहा' से दूसरी आहुति तत्पश्चात् जो दूसरी आहुति दे उसे 'व्यानाय स्वाहा' ऐसा होनेपर श्रोत्रेन्द्रिय तृप्त होती है, श्रोत्रके तृप्त होनेपर चन्द्रमा कहकर देना चाहिये। इससे व्यान तृप्त होता है। व्यानके तृप्त तृप्त होता है, चन्द्रमाके तृप्त होनेपर दिशाएँ तृप्त होती हैं तथा
खण्ड २४ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४३९
दिशाओंके तृप्त होनेपर जिस किसीपर चन्द्रमा और दिशाएँ पश्चात् वह भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके [स्वामिभावसे] अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है। उसकी तृप्तिके द्वारा तृप्त होता है ॥ १-२ ॥
एकविंश खण्ड 'अपान्याय स्वाहा' से तीसरी आहुति फिर जो तीसरी आहुति दे उसे 'अपान्याय स्वाहा' ऐसा तृप्त होनेपर जिस किसीपर पृथिवी और अग्नि [स्वामिभावसे] कहकर देना चाहिये । इससे अपान तृप्त होता है । अपानके तृप्त अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, एवं उसकी तृप्तिके पश्चात् होनेपर वागिन्द्रिय तृप्त होती है, वाक्के तृप्त होनेपर अग्नि तृप्त भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है, अग्निके तृप्त होनेपर पृथिवी तृप्त होती है तथा पृथिवीके होता है ॥ १-२ ॥
द्वाविंश खण्ड ‘ स्वाहा' से चौथी आहुति तदनन्तर जो चौथी आहुति दे उसे 'समानाय स्वाहा' है तथा विद्युत्के तृप्त होनेपर जिस किसीके ऊपर विद्युत् और ऐसा कहकर देना चाहिये । इससे समान तृप्त होता है । पर्जन्य अधिष्ठित हैं वह तृप्त होता है, एवं उसकी तृप्तिके अनन्तर समानके तृप्त होनेपर मन तृप्त होता है, मनके तृप्त होनेपर भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त पर्जन्य तृप्त होता है, पर्जन्यके तृप्त होनेपर विद्युत् तृप्त होती होता है ॥ १-२ ॥
त्रयोविंश खण्ड 'उदानाय स्वाहा' से पाँचवीं आहुति फिर जो पाँचवीं आहुति दे उसे 'उदानाय स्वाहा' ऐसा आकाशके तृप्त होनेपर जिस किसीपर वायु और आकाश कहकर देना चाहिये । इससे उदान तृप्त होता है। उदानके [स्वामिभावसे] अधिष्ठित हे वह तृप्त होता है, और उसकी तृप्त होनेपर त्वचा तृप्त होती है, त्वचाके तृप्त होनेपर वायु तृप्तिके पश्चात् स्वय भोक्ता प्रजा, पशु, अन्नाद्य, तेज और तृप्त होता है, वायुके तृप्त होनेपर आकाश तृप्त होता है तथा ब्रह्मतेजके द्वारा तृप्त होता है ॥ १-२ ॥
• चतुर्विंश खण्ड भोजनकी अग्निहोत्रत्वसिद्धिके लिये इस प्रकार हवन करनेका फल वह, जो कि इस वैश्वानरविद्याको न जानकर हवन करता जो इस प्रकार जाननेवाला होकर अग्निहोत्र करता है उसके है उसका वह हवन ऐसा है, जैसे अङ्गारोंको हटाकर भस्ममें समस्त पाप भस्म हो जाते हैं । अतः वह इस प्रकार जानने- हवन करे, क्योंकि जो इस (वैश्वानर) को इस प्रकार जानने- वाला यदि चाण्डालको उच्छिष्ट भी दे तो भी उसका वह अन्न वाला पुरुष अग्निहोत्र करता है उसका समस्त लोक, सारे भूत वैश्वानर आत्मामें ही हुत होगा । इस विषयमें यह मन्त्र है। और सम्पूर्ण आत्माओंमें हवन हो जाता है ॥ १-२ ॥ जिस प्रकार इस लोकमें भूखे बालक सब प्रकार माताकी इस विषयमें यह दृष्टान्त भी है—जिस प्रकार सींकका उपासना करते हैं उसी प्रकार सम्पूर्ण प्राणी अग्निहोत्रकी उपासना अग्रभाग अग्निमें घुसा देनेसे तत्काल जल जाता है उसी प्रकार करते हैं, अग्निहोत्रकी उपासना करते हैं ॥ ३-५ ॥
॥ पञ्चम अध्याय ॥ ५ ॥
षष्ठ अध्याय
ॐ षष्ठ अध्याय प्रथम खण्ड आरुणिका अपने पुत्र श्वेतकेतुसे प्रश्न
अरुणका सुप्रसिद्ध पौत्र श्वेतकेतु था, उससे पिताने कहा— ‘श्वेतकेतो ! तू ब्रह्मचर्यवास कर, क्योंकि सौम्य ! हमारे कुलमे उत्पन्न हुआ कोई भी पुरुष अध्ययन न करके ब्रह्मबन्धु-सा नहीं होता’ ॥ १ ॥ वह श्वेतकेतु बारह वर्षकी अवस्थामे उपनयन करा चौबीस वर्षका होनेपर सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन कर अपनेको बड़ा बुद्धिमान् और व्याख्यान करनेवाला मानते हुए अनम्रभावसे घर लौटा। उससे पिताने कहा— ‘सौम्य ! तू जो ऐसा महामना, पाण्डित्यका अभिमानी और अविनीत है सो क्या तूने वह आदेश पूछा है जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता है, अमत मत हो जाता है और अविज्ञात विशेषरूपसे ज्ञात हो जाता है।’ [यह सुनकर श्वेतकेतुने पूछा—] ‘भगवन् ! वह आदेश कैसा है ?’ ॥ २ ३ ॥ [पिताने कहा—] ‘सौम्य ! जिस प्रकार एक मृत्तिकाके पिण्डके द्वारा सम्पूर्ण मृन्मय पदार्थोंका ज्ञान हो जाता है कि विकार केवल वाणीके आश्रयभूत नाममात्र हैं, सत्य तो केवल मृत्तिका ही है। सौम्य ! जिस प्रकार एक लोहमणिका ज्ञान होनेपर सम्पूर्ण लोहमय (सुवर्णमय) पदार्थ जान लिये जाते हैं, क्योंकि विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, सत्य केवल सुवर्ण ही है। सौम्य ! जिस प्रकार एक नखकृन्तन (नहन्ना) के ज्ञानसे सम्पूर्ण लोहेके पदार्थ जान लिये जाते हैं, क्योंकि विकार वाणीपर अवलम्बित केवल नाममात्र है, सत्य केवल लोहा ही है; सौम्य ! ऐसा ही वह आदेश भी है’ ॥ ४-६ ॥ [श्वेतकेतुने कहा—] ‘निश्चय ही वे मेरे पूज्य गुरुदेव इसे नहीं जानते थे। यदि वे जानते तो मुझसे क्यों न कहते। अब आप ही मुझे यह बतलाइये।’ तब पिताने कहा— ‘अच्छा, सौम्य ! बतलाता हूँ’ ॥ ७ ॥
द्वितीय खण्ड सद्रूप परमात्मासे जगत्की उत्पत्ति सौम्य ! आरम्भमें यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था। उसीके विषयमें किन्हींने ऐसा भी कहा है कि आरम्भमे यह एकमात्र अद्वितीय असत् ही था। उस असत्से सत्की उत्पत्ति होती है। किंतु हे सौम्य ! ऐसा कैसे हो सकता है, भला असत्से सत्की उत्पत्ति कैसे हो सकती है ? अतः हे सौम्य ! आरम्भमे यह एकमात्र अद्वितीय सत् ही था, ऐसे [आरुणिने] कहा। उस (सत्) ने ईक्षण किया ‘मैं बहुत हो जाऊँ— अनेक प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’। इस प्रकार [ईक्षणकर] उसने तेज उत्पन्न [किया] । उस तेजने ईक्षण किया, ‘मैं बहुत हो जाऊँ—नाना प्रकारसे उत्पन्न होऊँ’। इस प्रकार [ईक्षणकर] उसने जलकी रचना की। इसीसे जहाँ कहीं पुरुष शोक (सन्ताप) करता है उसे पसीने आ जाते हैं। उस समय वह तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है। उस जलने ईक्षण किया, ‘हम बहुत हो जायँ—अनेक रूपसे उत्पन्न हों।’ उसने अन्नकी रचना की। इसीसे जहाँ कहीं वर्षा होती है वहीं बहुत-सा अन्न होता है। वह अन्नाद्य जलसे ही उत्पन्न होता है ॥ १-४ ॥
तृतीय खण्ड आण्डज, जीवज और उद्भिज्जरूपमें त्रिविध सृष्टि उन इन [पक्षी आदि] प्रसिद्ध प्राणियोंके तीन ही बीज होते हैं—आण्डज, जीवज और उद्भिज्ज। उस इस [‘सत्’ नामवाली देवताने ईक्षण किया, ‘मैं इस जीवात्मरूपसे इन तीनों देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम और रूपकी अभिव्यक्ति करूँ और उनमेंसे एक-एक देवताको त्रिवृत्-त्रिवृत् करूँ।’ ऐसा विचारकर उस इस देवताने इस जीवात्मरूपसे ही उन तीन देवताओंमें अनुप्रवेश कर नाम-रूपका व्याकरण किया। उस देवताने उनमेंसे प्रत्येकको त्रिवृत्-त्रिवृत् किया। सौम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवता एक एक करके प्रत्येक त्रिवृत्- त्रिवृत् हैं वह मेरेद्वारा जान ॥ १-४ ॥
खण्ड ६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४१ चतुर्थ खण्ड त्रिवृत्करण अग्निका जो रोहित ( लाल ) रूप है वह तेजका ही रूप वह अन्नका है । इस प्रकार विद्युत्से विद्युत्त्वकी निवृत्ति हो है; जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण है वह अन्न- गयी, क्योंकि [ विद्युद्रूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाम- का है। इस प्रकार अग्निसे अग्नित्व निवृत्त हो गया, क्योंकि मात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है ॥ १-४ ॥ [ अग्निरूप ] विकार वाणीसे कहनेके लिये नाममात्र है; केवल इस ( त्रिवृत्करण ) को जाननेवाले पूर्ववर्ती महागृहस्थ तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है । आदित्यका जो रोहित रूप और महाश्रोत्रियोंने यह कहा था कि इस समय हमारे कुलमें है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कोई बात अश्रुत, अमत अथवा अविज्ञात है—ऐसा कोई नहीं कृष्ण रूप है वह अन्नका है। इस प्रकार आदित्यसे आदित्यत्व कह सकेगा; क्योंकि इन अग्नि आदिके दृष्टान्तद्वारा वे सब निवृत्त हो गया, क्योंकि [ आदित्यरूप ] विकार वाणीपर कुछ जानते थे । जो कुछ रोहित-सा है वह तेजका रूप है— अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं—इतना ही सत्य है । ऐसा उन्होंने जाना है; जो शुक्ल सा है वह जलका रूप है— चन्द्रमाका जो रोहित रूप है वह तेजका रूप है, जो शुक्ल रूप ऐसा उन्होंने जाना है तथा जो कृष्ण-सा है वह अन्नका रूप है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है वह अन्नका है । इस है—ऐसा उन्होंने जाना है। तथा जो कुछ विज्ञात-सा है वह प्रकार चन्द्रमासे चन्द्रत्व निवृत्त हो गया, क्योंकि [ चन्द्रमा- इन देवताओंका ही समुदाय है—ऐसा उन्होंने जाना है। रूप ] विकार वाणीपर अवलम्बित नाममात्र है, तीन रूप हैं सोम्य ! अब तू मेरेद्वारा यह जान कि किस प्रकार ये तीनों —इतना ही सत्य है । विद्युत्का जो रोहित रूप है वह तेजका देवता पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत्-त्रिवृत् हो रूप है, जो शुक्ल रूप है वह जलका है और जो कृष्ण रूप है जाती है ॥ ५-७ ॥ पञ्चम खण्ड मन अन्नमय, प्राण और वाक् तेजोमय है खाया हुआ अन्न तीन प्रकारका हो जाता है । उसका [ घृतादि ] तेज तीन प्रकारका हो जाता है । उसका जो जो अत्यन्त स्थूल भाग होता है, वह मल हो जाता है, जो स्थूलतम भाग होता है वह हड्डी हो जाता है, जो मध्यम भाग मध्यम भाग है वह मास हो जाता है और जो अत्यन्त सूक्ष्म है वह मज्जा हो जाता है और जो सूक्ष्मतम भाग है वह वाक् होता है वह मन हो जाता है। पीया हुआ जल तीन प्रकारका हो हो जाता है । [ इसलिये ] सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जाता है । उसका जो स्थूलतम भाग होता है वह मूत्र हो जलमय है और वाक् तेजोमयी है। ऐसा कहे जानेपर श्वेतकेतु जाता है, जो मध्यम भाग है वह रक्त हो जाता है और जो बोला—'भगवन् ! आप मुझे फिर समझाइये ।' तब आरुणिने सूक्ष्मतम भाग है वह प्राण हो जाता है । खाया हुआ 'अच्छा सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-४ ॥ षष्ठ खण्ड मथे जाते हुए दहीका सोम्य ! मथे जाते हुए दहीका जो सूक्ष्म भाग होता है जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ जाता है, वह ऊपर इकट्ठा हो जाता है; वह घृत होता है । उसी प्रकार और वह वाणी होता है । इस प्रकार हे सोम्य ! मन अन्नमय हे सोम्य ! खाये हुए अन्नका जो सूक्ष्म अंश होता है वह सम्यक् है, प्राण जलमय है और वाणी तेजोमयी है—ऐसा [ आरुणिने प्रकारसे ऊपर आ जाता है, वह मन होता है । सोम्य ! पीये कहा ] । [ तब श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर हुए जलका जो सूक्ष्म भाग होता है वह इकट्ठा होकर ऊपर आ समझाइये ।' इसपर आरुणिने कहा—'सोम्य ! अच्छा' ॥ १-५ ॥ जाता है; वह प्राण होता है । सोम्य ! भक्षण किये हुए तेजका उ० मं० ५६—
४४२ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
४४२ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ६ सप्तम खण्ड मनकी अन्नमयताका निश्चय सोम्य ! पुरुष सोलह कलाओंवाला है। तू पन्द्रह दिन भोजन मत कर, केवल यथेच्छ जलपान कर । प्राण जलमय है, इसलिये जल पीते रहनेसे उसका नाश नहीं होगा। उसने पन्द्रह दिन भोजन नहीं किया। तत्पश्चात् वह उस (आरुणि) के पास आया [और बोला]-'भगवन् ! क्या बोलूँ !' [पिताने कहा-] 'सोम्य ! ऋक्, यजुः और सामका पाठ करो।' तब उसने कहा- 'भगवन् ! मुझे उनका स्फुरण नहीं होता।' वह उससे बोला-'सोम्य ! जिस प्रकार बहुत से ईंधनसे प्रज्वलित हुए अग्निका एक जुगनूके बराबर अङ्गारा रह जाय तो वह उससे अधिक दाह नहीं कर सकता, उसी प्रकार सोम्य ! तेरी सोलह कलाओंमेंसे केवल एक ही कला रह गयी है। उसके द्वारा इस समय तू वेदका अनुभव नहीं कर सकता। अच्छा, अब भोजन कर; तब तू मेरी बात समझ जायगा' ॥ १-३ ॥ उसने भोजन किया और फिर उसके (आरुणिके) पास आया । तब उसने जो कुछ पूछा वह सब उसे उपस्थित हो गया। उससे [आरुणिने] कहा-'सोम्य ! जिस प्रकार बहुत से ईंधनसे बढे हुए अग्निका एक खद्योतमात्र अङ्गारा रह जाय और उसे तृणसे सम्पन्नकर प्रज्वलित कर दिया जाय तो वह उसकी (अपने पूर्व परिमाणकी) अपेक्षा भी अधिक दाह कर सकता है । इसी प्रकार सोम्य ! तेरी सोलह कलाओं- मेंसे एक कला अवशिष्ट रह गयी थी। वह अन्नद्वारा वृद्धिको प्राप्त अर्थात् प्रज्वलित कर दी गयी। अब उसीसे तू वेदोंका अनुभव कर रहा है। अतः हे सोम्य ! मन अन्नमय है, प्राण जलमय है और वाक् तेजोमयी है।' इस प्रकार [श्वेतकेतु] उसके इस कथनको विशेषरूपसे समझ गया, समझ गया ॥४-६॥ अष्टम खण्ड सत्-आत्मा ही सबका मूल है उद्दालक नामसे प्रसिद्ध अरुणके पुत्रने अपने पुत्र श्वेत- केतुसे कहा-'सोम्य ! तू मेरेद्वारा स्वप्नान्त (सुषुप्ति अथवा स्वप्नके स्वरूप) को विशेषरूपसे समझ ले; जिस अवस्थामें यह पुरुष 'सोता है' ऐसा कहा जाता है उस समय सोम्य ! यह सत्से सम्पन्न हो जाता है-यह अपने स्वरूपको प्राप्त हो जाता है। इसीसे इसे 'स्वपिति' ऐसा कहते हैं, क्योंकि उस समय यह स्व-अपनेको ही प्राप्त हो जाता है। जिस प्रकार डोरीमें बँधा हुआ पक्षी दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेपर अपने बन्धनस्थानका ही आश्रय लेता है उसी प्रकार निश्चय ही सोम्य ! यह मन दिशा-विदिशाओंमें उड़कर अन्यत्र स्थान न मिलनेसे प्राणका ही आश्रय लेता है, क्योंकि सोम्य ! मन प्राणरूप बन्धनवाला ही है ॥ १-२ ॥ सकता। अन्नको छोड़कर इसका मूल और कहाँ हो सकता है ! इसी प्रकार सोम्य ! तू अन्नरूप अङ्कुरके द्वारा जलरूप मूलको खोज और हे सोम्य ! जलरूप अङ्कुरके द्वारा तेजोरूप मूलको खोज तथा तेजोरूप अङ्कुरके द्वारा सद्रूप मूलका अनुसन्धान कर। सोम्य ! इस प्रकार यह सारी प्रजा सन्मूलक है तथा सत् ही इसका आश्रय है और सत् ही प्रतिष्ठा है ॥ ३-४॥ अब जिस समय यह पुरुष 'पिपासति' (पीना चाहता है) ऐसे नामवाला होता है तो उसके पीये हुए जलको तेज ही ले जाता है। अतः जिस प्रकार गोनाय, अश्वनाय एव पुरुषनाय कहलाते हैं उसी प्रकार उस तेजको 'उदन्या' ऐसा कहकर पुकारते हैं। हे सोम्य ! उस (जलरूप मूल) से यह शरीररूप अङ्कुर उत्पन्न हुआ है-ऐसा जान, क्योंकि यह मूल- रहित नहीं हो सकता ॥ ५ ॥ 'सोम्य ! तू मेरेद्वारा भूख और प्यासको जान। जिस समय यह पुरुष 'अशिशिषति' (खाना चाहता है) ऐसे नाम- वाला होता है उस समय जल ही इसके भक्षण किये हुए अन्न- को ले जाता है। जिस प्रकार लोकमें [गौ के जानेवालेको] गोनाय, [अश्व ले जानेवालेको] अश्वनाय और [पुरुषोंको ले जानेवाले राजा या सेनापतिको ] पुरुषनाय कहते हैं उसी प्रकार जलको 'अशनाय' ऐसा कहकर पुकारते हैं। हे सोम्य ! उस जलसे ही तू इस [ शरीररूप ] शृङ्ग (अङ्कुर) को उत्पन्न हुआ समझ, क्योंकि यह निर्मूल (कारणरहित) नहीं हो सोम्य ! उस (जलके परिणामभूत शरीर) का जलके सिवा और कहाँ मूल हो सकता है ? हे प्रियदर्शन ! जलरूप अङ्कुरके द्वारा तू तेजोरूप मूलकी खोज कर और हे सोम्य ! तेजोरूप अङ्कुरके द्वारा सद्रूप मूलकी शोध कर। हे सोम्य ! यह सम्पूर्ण प्रजा सन्मूलक तथा सद्रूप आयतन और सद्रूप प्रतिष्ठा (लयस्थान) वाली है। हे सोम्य ! जिस प्रकार ये तीनों देवताएँ पुरुषको प्राप्त होकर उनमेंसे प्रत्येक त्रिवृत् त्रिवृत्
खण्ड १२ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४३ हो जाती हैं वह मैंने पहले ही कह दिया । हे सोम्य ! मरणको सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है । प्राप्त होते हुए इस पुरुषकी वाक् मनमें लीन हो जाती है तथा [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मन प्राणमें, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो जाता मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा है । वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह कहा ॥ ६-७ ॥ नवम खण्ड मधुका दृष्टान्त सोम्य ! जिस प्रकार मधुमक्खियाँ मधु निष्पन्न करती हैं पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो-जो भी [ सुषुप्ति आदिसे पूर्व ] तो नाना दिशाओंके वृक्षोंका रस लाकर एकताको प्राप्त करा होते हैं वे ही पुनः हो जाते हैं ॥ १-३ ॥ देती हैं । वे रस जिस प्रकार उस मधुमें इस प्रकारका विवेक वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह प्राप्त नहीं कर सकते कि 'मै इस वृक्षका रस हूँ और मै इस सत्य है, वह आत्मा है और श्वेतकेतो ! वही तू है । [ आरुणिके वृक्षका रस हूँ' हे सोम्य ! ठीक इसी प्रकार यह सम्पूर्ण प्रजा इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर सत्को प्राप्त होकर यह नहीं जानती कि हम सत्को प्राप्त हो समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा गये हैं । वे इस लोकमें व्याघ्र, सिंह, भेड़िया, शूकर, कीट, कहा ॥ ४ ॥ दशम खण्ड नदियोंका सोम्य ! ये नदियाँ पूर्ववाहिनी होकर पूर्वकी ओर बहती सत्के पाससे आयी हैं। इस लोकमें वे व्याघ्र, सिंह, शूकर, हैं तथा पश्चिमवाहिनी होकर पश्चिमकी ओर । वे समुद्रसे कीट, पतङ्ग, डाँस अथवा मच्छर जो-जो भी होते हैं वे ही निकलकर फिर समुद्रमें ही मिल जाती हैं और वह समुद्र ही फिर हो जाते हैं। वह जो यह अणिमा है, एतद्रूप ही यह हो जाता है । वे सब जिस प्रकार वहाँ ( समुद्रमें ) यह नहीं सब है । वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही जानतीं कि 'यह मैं हूँ, यह मैं हूँ' । ठीक इसी प्रकार सोम्य ! तू है । [ आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—] ये सम्पूर्ण प्रजाएँ सत्से आनेपर यह नहीं जानतीं कि हम 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-३ ॥ एकादश खण्ड वृक्षका हे सोम्य ! यदि कोई इस महान् वृक्षके मूलमें आघात वृक्षको छोड़ देता है तो सारा वृक्ष सूख जाता है। 'सोम्य ! करे तो यह जीवित रहते हुए केवल रसस्त्राव करेगा और यदि ठीक इसी प्रकार तू जान कि जीवसे रहित होनेपर यह शरीर इसके अग्रभागमें आघात करे तो भी यह जीवित रहते हुए ही मर जाता है, जीव नहीं मरता'—ऐसा [ आरुणिने ] कहा, रसस्त्राव करेगा । यह वृक्ष जीव—आत्मासे ओतप्रोत है और 'वह जो यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है । वह सत्य है, जलपान करता हुआ आनन्दपूर्वक स्थित है । यदि इस वृक्षकी वह आत्मा है और हे श्वेतकेतो ! वही तू है ।' [ आरुणिके एक शाखाको जीव छोड़ देता है तो वह सूख जाती है; यदि इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला—] 'भगवन् ! मुझे फिर दूसरीको छोड़ देता है तो वह सूख जाती है और तीसरीको समझाइये ।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा छोड़ देता है तो वह भी सूख जाती है, इसी प्रकार यदि सारे कहा ॥ १-३ ॥ द्वादश खण्ड वट-बीजका दृष्टान्त इस ( सामनेवाले वटवृक्ष ) से एक बड़का फल ले आ । फोड़।' [श्वेत०—] 'भगवन् ! फोड़ दिया ।' [आरुणि—] श्वेतकेतु—] 'भगवन् ! यह ले आया ।' [ आरुणि—] 'इसे 'इसमें क्या देखता है ?' [ श्वेत०—] 'भगवन् ! इसमें ये
४४८ छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ६
४४८ * छान्दोग्योपनिषद् * [ अध्याय ६ अणुके समान दाने हैं। [अरुणि-] 'अच्छा, वत्स ! सोम्य ! तू [ इस कथनमे ] श्रद्धा कर।' वह जो यह अणिमा इनमेंसे एकको फोड़।' [श्वेत०-] 'फोड़ दिया भगवन् !' है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और [आरुणि-] 'इसमें क्या देखता है ? [श्वेत०-] 'कुछ श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर नहीं भगवन् ! तब उससे [आरुणिने] कहा-'हे सोम्य ! श्वेतकेतु बोला-] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब इस वटबीजकी जिस अणिमाको तू नहीं देखता सोम्य ! उस आरुणिने ] 'अच्छा सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-३ ॥ अणिमाका ही यह इतना बड़ा वटवृक्ष खड़ा हुआ है। हे त्रयोदश खण्ड नमकका दृष्टान्त 'इस नमकको जलमें डालकर कल प्रातःकाल मेरे पास कैसा है ?' [ श्वेत०-] 'नमकीन है।' [आरुणि-] आना । आरुणिके इस प्रकार कहनेपर श्वेतकेतुने वैसा ही 'अच्छा अब इस जलको फेंककर मेरे पास आ।' उसने वैसा किया। तब आरुणिने उससे कहा-'वत्स ! रात तुमने जो ही किया [और बोला-] 'उस जलमे नमक सदा ही नमक जलमें डाला था उसे ले आओ। किंतु उसने ढूँढ़नेपर विद्यमान था। तब उससे पिताने कहा-'सोम्य ! उसे उसमें न पाया। [आरुणि-] 'जिस प्रकार वह नमक [इसी प्रकार] वह सत् भी निश्चय यहीं विद्यमान है, तू उसे इसीमें विलीन हो गया है [इसलिये तू उसे नेत्रसे नहीं देख देखता नहीं है; परन्तु वह निश्चय यहीं विद्यमान है।' वह जो सकता, उसे यदि जानना चाहता है तो] इस जलको ऊपरसे यह अणिमा है एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आचमन कर।' [उसके आचमन करनेपर आरुणिने पूछा-] आत्मा है और श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस 'कैसा है ?' [ श्वेत०-] 'नमकीन है।' [आरुणि-] प्रकार कहनेपर श्वेतकेतु बोला-] 'भगवन् ! मुझे फिर 'बीचमेंसे आचमन कर' 'अब कैसा है ?' [श्वेत०-] समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा 'नमकीन है।' [आरुणि-] 'नीचेसे आचमन कर' 'अब कहा ॥ १-३ ॥ चतुर्दश खण्ड आँख बँधे हुए पुरुषका दृष्टान्त हे सोम्य ! जिस प्रकार [कोई चोर ] जिसकी आँखें ग्राम पूछता हुआ गान्धारमें ही पहुँच जाता है, इसी प्रकार बँधी हुई हों ऐसे किसी पुरुषको गान्धार देशसे लाकर जनशून्य इस लोकमें आचार्यवान् पुरुष ही [सत्को ] जानता है; उसके स्थानमें छोड़ दे। उस जगह जिस प्रकार वह पूर्व उत्तर, लिये [मोक्ष होनेमें ] उतना ही विलम्ब है जबतक कि वह दक्षिण अथवा पश्चिमकी ओर मुख करके चिल्लावे कि 'मुझे [देहबन्धनसे ] मुक्त नहीं होता । उसके पश्चात् तो वह आँखें बाँधकर यहाँ लाया गया है और आँखें बँधे हुए ही सत्सम्पन्न (ब्रह्मको प्राप्त) हो जाता है। वह जो यह अणिमा छोड़ दिया गया है। उस पुरुषके बन्धनको खोलकर जैसे है, एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और कोई कहे कि 'गान्धार देश इस दिशामें है, अतः इसी दिशाको हे श्वेतकेतो ! वही तू है। [आरुणिके इस प्रकार कहनेपर जा तो वह बुद्धिमान् और समझदार पुरुष एक ग्रामसे दूसरा श्वेतकेतु बोला-] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये।' [ तब आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-३ ॥ पञ्चदश खण्ड मुमूर्षु का दृष्टान्त सोम्य ! [ज्वरादिसे ] सन्तप्त [ मुमूर्षु ] पुरुषको चारों और तेज परदेवतामें लीन नहीं होता तबतक वह पहचान ओरसे घेरकर उसके बान्धवगण पूछा करते हैं-'क्या तू मुझे लेता है। फिर जिस समय उसकी वाणी मनमें लीन हो जाती जानता है ? क्या तू मुझे पहचानता है ! जबतक उसकी है तथा मन प्राणमे, प्राण तेजमें और तेज परदेवतामें लीन हो वाणी मनमें लीन नहीं होती तथा मन प्राणमे, प्राण तेजमे जाता है, तब वह नहीं पहचानता। वह जो यह अणिमा है,
खण्ड १६ ] * महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति * ४४५
एतद्रूप ही यह सब है। वह सत्य है, वह आत्मा है और हे श्वेतकेतु बोला— ] 'भगवन् ! मुझे फिर समझाइये ।' [ तब
श्वेतकेतो ! वही तू है। [ आरुणि के इस प्रकार कहनेपर आरुणिने ] 'अच्छा, सोम्य !' ऐसा कहा ॥ १-३ ॥
००९००
षोडश खण्ड
मिथ्या ज्ञानी और सच्चे ज्ञानीकी पहचान
हे सोम्य ! [ राजकर्मचारी ] किसी पुरुषको हाथ बाँधकर सत्य प्रमाणित करता है। वह सत्याभिसन्ध अपनेको सत्यसे
लाते हैं [ और कहते हैं— ] 'इसने धनका अपहरण किया आवृत कर उस तपे हुए परशुको पकड़ लेता है। वह उससे
है, चोरी की है इसके लिये परशु तपाओ।' वह यदि उसका नहीं जलता और तत्काल छोड़ दिया जाता है। वह जिस
(चोरीका) करनेवाला होता है तो अपनेको मिथ्यावादी प्रकार उस [ परीक्षाके ] समय नहीं जलता [ उसी प्रकार
प्रमाणित करता है। वह मिथ्याभिनिवेशवाला पुरुष अपनेको विद्वान्का पुनरावर्तन नहीं होता और अविद्वान्का होता है ]।
मिथ्यासे छिपाता हुआ तपे हुए परशुको ग्रहण करता है, किंतु यह सब एतद्रूप ही है, वह सत्य है, वह आत्मा है और हे
वह उससे दग्ध होता है और मारा जाता है। और यदि वह श्वेतकेतो ! वही तू है। तब वह (श्वेतकेतु) उसे जान
उस (चोरी) का करनेवाला नहीं होता तो उसीसे वह अपनेको गया—उसे जान गया ॥ १-३ ॥
॥ षष्ठ अध्याय समाप्त ॥ ६ ॥
सप्तम अध्याय
ॐ सप्तम अध्याय प्रथम खण्ड नामकी ब्रह्मरूपमे उपासना 'भगवन् ! मुझे उपदेश कीजिये' ऐसा कहते हुए नारदजी सनत्कुमारजीके पास गये । उनसे सनत्कुमारजीने कहा—'तुम जो कुछ जानते हो उसे बतलाते हुए मेरे प्रति उपसन्न होओ; तब मैं तुम्हें उससे आगे बतलाऊँगा ।' तब नारदने कहा—॥ १ ॥ 'भगवन् ! मैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और चौथा अथर्ववेद जानता हूँ, [ इनके सिवा ] इतिहास-पुराणरूप पाँचवाँ वेद, वेदोंका वेद ( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिशास्त्र, तर्कशास्त्र, नीति, देवविद्या, ब्रह्मविद्या, भूतविद्या, क्षत्रविद्या, नक्षत्रविद्या, सर्पविद्या ( गारुड मन्त्र ) और देवजनविद्या—नृत्य-संगीत आदि—हे भगवन् ! यह सब मैं जानता हूँ। हे भगवन् ! वह मैं केवल मन्त्रवेत्ता ही हूँ, आत्मवेत्ता नहीं हूँ। मैंने आप-जैसोंसे सुना है कि आत्मवेत्ता शोकको पार कर लेता है, परंतु भगवन् ! मैं शोक करता हूँ; ऐसे मुझको हे भगवन् ! शोकसे पार कर दीजिये ।' तब सनत्कुमारने उनसे कहा—'तुम यह जो कुछ जानते हो वह नाम ही है। ऋग्वेद नाम है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चौथा आथर्वण वेद, पाँचवाँ वेद इतिहास-पुराण, वेदोंका वेद ( व्याकरण ), श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातज्ञान, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति- शास्त्र, निरुक्त, वेदविद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गरुड, संगीतादि कला और शिल्पविद्या—ये सब भी नाम ही हैं। तुम नामकी उपासना करो। वह जो कि नामकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है, उसकी जहाँतक नामकी गति होती है वहाँतक यथेच्छ गति हो जाती है, जो कि नामकी 'यह ब्रह्म है' ऐसी उपासना करता है।' [ नारद---] 'भगवन् ! क्या नामसे भी अधिक कुछ है ?' [ सनत्कुमार—] 'नामसे भी अधिक है।' [नारद---] 'तो भगवन् ! मुझे वही बतलावें ।'२-५ द्वितीय खण्ड वाक्की ब्रह्मरूपमें उपासना वाक् ही नामसे बढ़कर है; वाक् ही ऋग्वेदको विज्ञापित करती है तथा यजुर्वेद, सामवेद, चतुर्थ आथर्वण वेद, पञ्चम वेद इतिहास-पुराण, वेदोंके वेद व्याकरण, श्राद्धकल्प, गणित, उत्पातशास्त्र, निधिज्ञान, तर्कशास्त्र, नीति, निरुक्त, वेदविद्या, भूतविद्या, धनुर्वेद, ज्योतिष, गरुड, संगीतशास्त्र, द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, जल, तेज, देव, मनुष्य, पशु, पक्षी, तृण-वनस्पति, श्वापद (हिंस्र जन्तु ), कीट-पतंग, पिपीलिका- पर्यन्त प्राणी, धर्म और अधर्म, सत्य और असत्य, साधु और असाधु, मनोज्ञ और अमनोज्ञ जो कुछ भी है [उसे वाक् ही विज्ञापित करती है ]। यदि वाणी न होती तो न धर्मका और न अधर्मका ही ज्ञान होता; तथा न सत्य, न असत्य, न साधु, न असाधु, न मनोज्ञ और न अमनोज्ञका ही ज्ञान हो सकता। वाणी ही इन सबका ज्ञान कराती है; अतः तुम वाक्की उपासना करो। वह जो वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है उसकी जहाँतक वाणीकी गति है वहाँतक स्वेच्छागति हो जाती है, जो कि वाणीकी 'यह ब्रह्म है' इस प्रकार उपासना करता है । .[नारद-] 'भगवन् ! क्या वाणीसे भी बढ़कर कुछ है ?' [ सनत्कुमार-] 'वाणीसे भी बढ़कर है ही।' [ नारद-] 'भगवन् ! वह मुझे बतलाइये' ॥ १-२ ॥ तृतीय खण्ड मनकी ब्रह्मरूपमें उपासना मन ही वाणीसे उत्कृष्ट है। जिस प्रकार दो आँवले, दो बेर अथवा दो बहेड़े मुट्ठीमें आ जाते हैं, उसी प्रकार वाक् और नामका मनमे अन्तर्भाव हो जाता है। यह पुरुष जिस समय मनसे विचार करता है कि 'मन्त्रोंका पाठ करूँ' तभी पाठ करता है, जिस समय सोचता है 'काम करूँ' तभी काम करता है, जब विचारता है 'पुत्र और पशुओंकी इच्छा करूँ' तभी उनकी इच्छा करता है और जब ऐसा सङ्कल्प करता है कि 'इस लोक और परलोककी कामना करूँ' तभी उनकी