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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

१६६ कथासरित्सागरे

१६६ कथासरित्सागरे धीवतोऽपि स सत्रैव निपसाद तदन्तिके। अथाकस्मात्प्रववृते तया साध्व्या प्ररोदितम्॥३६॥ निपेतु स्तनयोस्तस्याः सम्प्राप्ता बाष्पबिन्दवः। श्रीदत्तस्य च तत्काल कारुण्य हृदय गतम्॥३७॥ तत स चैनां पप्रच्छ का त्व दुःख च किं तव। वद सुन्दरि शक्तोऽह तन्निवारयितु यत ॥३८॥ तत कथञ्चित्सावादीद् वय दैत्यपतेर्बले । पौत्र्यो बभूविम तासां ज्येष्ठा विद्युत्प्रभत्यहम्॥३९॥ स नः पितामहो नीतो विष्णुना दीर्घबन्धनम्। पिता च बाहुयुद्धेन हतस्तनैव शौरिणा॥४०॥ तं हृत्वा तन च निजात्पुरान्निर्वासिता वयम्। प्रवेशरोधकृत्तत्र सिंहश्च स्थापितोऽन्तर॥४१॥ आवृत तत्पद तन दुःखन हृदय च नः। स च यक्षः कुबेरस्य शापात् सिंहत्वमागत ॥४२॥ मर्त्येश्चाभिभवस्तस्य शापान्त कथित पुरा। पुरप्रवेशोपायार्थं विज्ञप्तो विष्णुरार्ययात्॥४३॥ अत स द्वयुरस्माकं केशरी जीयतां त्वया। तदर्थमेव चानीतो मया वीर! भवानिह॥४४॥ मृगाङ्ककास्य खड्ग च जितात्तस्मादवाप्स्यसि। पृथिवीं यत्प्रभावेण जित्वा राजा भविष्यसि॥४५॥ तच्छ्रुत्वा स सधैर्येण धीदत्तोऽसीत्तदहिन। अन्यद्युर्वर्त्समन्यास्ताः कृत्वाग्रे तत्पुर ययौ॥४६॥ जिगाय बाहुयुद्धेन तत्र च सिंहमुद्धतम्। सोऽपि शापविमुक्त सन्बभूव पुरुषाकृतिः॥४७॥ दत्त्वा चास्मै स खड्गं स्वं तुष्टः शापान्तकारिण। सहासुराङ्गनादुःखमारेणावक्षन ययौ॥४८॥ सोऽथ सानुजया सार्धं श्रीदत्तो दैत्यकन्यया। बहिर्गतमिवामन्द तद्विवेश पुरोत्तमम्॥४९॥ मङ्गुलीय द्विपद्मं च सास्मै दैत्यसुता ददौ। तत सोऽत्र स्थितस्तस्यां साभिलाषोऽभवद्युवा॥५०॥

द्वितीय लम्बक १४७

द्वितीय लम्बक १४७ साथ जाता हुआ धीदत्त भी उसी पलंग पर उसके साथ ही बैठ गया। इसके उपरान्त उस खड़ी स्त्री ने सहसा रोना प्रारम्भ किया॥३६॥ उसके उष्ण अश्रुबिन्दु स्तनों पर गिरते गये इस प्रकार उसका रुदन देखकर धीदत्त के हृदय में दया आ गई॥३७॥ धीदत्त न उससे पूछा-'तुम कौन हो? तुम्हें क्या दुःख है? बताओ सुन्दरि ! मैं तुम्हारे दुःख को दूर करने में समर्थ हूँ'॥३८॥ तब उसने अत्यन्त कठिनता से कहा-'हम दैत्यराज बलि की एक सहस्र पुत्रियां हैं जिनमें सबसे बड़ी विद्युत्प्रभा मैं हूँ'॥३९॥ विष्णु ने मेरे पितामह (दादा) बलि को लम्बे बन्धन में डाल दिया है और हमारे पिता को मरुद्बुद्ध में मार डाला॥४०॥ मेरे पिता को मारकर उस विष्णु ने हम अपने नगर से निर्वासित कर दिया। साथ ही नगर में जाने की रोक के लिए बीच में एक सिंह को खड़ा कर दिया है॥४१॥ उस सिंह ने वह स्थान और हमारा हृदय दोनों आक्रान्त कर दिया। वह सिंह एक यक्ष है, जो कुबेर के शाप से सिंह बन गया है॥४२॥ जब पुर-प्रवेश के लिए हम लोगों ने विष्णु से प्रार्थना की तब उन्होंने इस यक्ष का शाप नष्ट होने की बात कही थी। (मनुष्य द्वारा इस सिंह की हत्या होगी तब इसका शाप नष्ट होगा) ॥४३॥ इसलिए तुम हमारे शत्रु उस सिंह को जीतो या मार डालो। हे वीर ! मैं तुम्हें इसीलिए यहाँ लाई हूँ॥४४॥ उस सिंह को मार डालने पर उससे मृगांक नामक खड्ग भी तुम्हें प्राप्त होगा जिसके प्रभाव से तुम पृथ्वी को जीतकर राजा बनोगे॥४५॥ ऐसा सुनकर और ठीक है यह कहकर धीदत्त ने वह दिन वहीं व्यतीत किया और अगले दिन उन दैत्य-कन्याओं को आगे करके उस नगर को गया॥४६॥ यहाँ पर उसने मल्लयुद्ध से उस सिंह को जीत लिया। वह सिंह भी शापमुक्त होकर पुरुष के आकार में बदल गया॥४७॥ शाप से छुड़ानेवाले धीदत्त पर प्रसन्न होकर उस पुरुष ने उसे एक तलवार दी और दैत्यकन्याओं के मुख के साथ ही अदृश्य हो गया॥४८॥ तदनन्तर धीदत्त छोटी बहनों के साथ उस दैत्य-कन्या को लिये हुए उस नगर में गया॥४९॥ दैत्य-कन्या ने धीदत्त को विषनाश करनेवाली एक अंगूठी दी। वहाँ रहते हुए युवा धीदत्त का हृदय उस दैत्य-कन्या की ओर आकृष्ट हुआ॥५०॥ १८

१४ कथासरित्सागर

१४ कथासरित्सागर एव निष्ठुरकाच्छ्रुत्वा पितरावनुशोच्य स। निदधे प्रतिसारास्यामिव खड्गे दृशं मुहु ॥६७॥ कालं प्रतीक्षमाणोऽथ वीरो निष्ठुरकान्वितः। प्रतस्थे तान् सखीन् प्राप्तुं स तामूज्जयिनीं पुरीम् ॥६८॥ भ्रामज्जनान्ते वृत्तान्तं सस्यूतस्तस्य च वर्णयन्। धीदत्तः स ददर्शैकां क्रोशन्तीमवलां पथि ॥६९॥ अबला भ्रष्टमार्गाहि मालवं प्रस्थितेति ताम्। ब्रुवन्तीं वयसा सोऽथ सह प्रस्थायिनीं व्यधात् ॥७० ॥ तया दयानुरोधाच्च स्त्रिया निष्ठुरकान्वितः। कस्मिंश्चिञ्छून्यनगरे दिनं तस्मिन्नुवास स ॥७१॥ तत्र रात्रावकस्माच्च मुक्तनिद्रो ददर्श ताम्। स्त्रियं निष्ठुरकं हत्वा हृष्टात मांसमश्नतीम् ॥७२॥ उत्तिष्ठत्समाकृष्य सोऽथ खड्गं मृगाङ्ककम्। सापि स्त्री राक्षसीरूपं घोरं स्वं प्रत्यपद्यत ॥७३॥ स च केशेषु जग्राह निहन्तुं तां निशाचरीम्। तत्क्षणं दिव्यरूपत्वं सम्प्राप्ता समुवाच सा ॥७४॥ मा मां वधीर्महाभाग मुञ्च नैवास्मि राक्षसी। अयमेवविधः शापो ममाभूत्कौशिका मुनेः ॥७५॥ तपस्यतो हि तस्याहं धनाधिपतिनामुना। विघ्नाय प्रेषिता पूर्वं तत्पदप्राप्तिकांक्षिणः ॥७६॥ तस्य कान्तेन रूपेण न क्षोभयितुमक्षमा। लज्जिता त्रासयन्त्यनमकार्षं भैरवं वपुः ॥७७॥ तद्दृष्ट्वा स मुनिः शापं सदृशं मय्यथो दधौ। राक्षसी भव पापे त्वं निघ्नन्ती मानुषानिति ॥७८॥ स्वतः केशग्रहे प्राप्ते शापान्तं मे स चाकरोत्। इत्यहं राक्षसीभावमिमं कष्टमुपागमम् ॥७९॥ मयैव नगरं ह्येतद् ग्रस्तमद्य च मे चिरात्। त्वया कृतः स शापान्तस्तद्गृहाणाधुना वरम् ॥८०॥ इति तस्या वचः श्रुत्वा धीदत्तः सादरोऽभ्यधात्। किमन्येन वरेणाद्य जीवत्वेष सखा मम ॥८१॥

द्वितीय लम्बक १४१

द्वितीय लम्बक १४१ निष्ठुरक की बातें सुनकर धीवत्त ने माता-पिता की मृत्यु पर शोक किया और मानों बदला लेने की भावना से अपनी आँखों को खड्ग पर डाला ॥६७॥ इसके पश्चात् प्रतिशोध के लिए अवसर की प्रतीक्षा करता हुआ धीवत्त निष्ठुरक को साथ लेकर अपने मित्रों से मिलने के लिए उज्जयिनी पुरी को गया ॥६८॥ गंगा में गोता लगाने के बाद का अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त मित्र निष्ठुरक को मार्ग में सुनाते हुए धीवत्त ने एक रोती हुई स्त्री को देखा ॥६९॥ 'मैं असहाय अबला हूँ मालव देश को जाती हुई मार्ग भूल गई हूँ'—उस अबला के ऐसा कहने पर धीवत्त ने दया करके उसे अपने साथ ले लिया ॥७०॥ दया और अनुरोध के कारण उस स्त्री और निष्ठुरक को साथ लेकर धीवत्त उस दिन किसी उजड़े हुए, वल्लभ शून्य नगर में ठहर गया ॥७१॥ इस यात्रा में एक दिन अकस्मात् रात को सोकर उठे हुए धीवत्त ने उस स्त्री को जो निष्ठुरक को मारकर उसका मांस खा रही थी देखा ॥७२॥ यह देखते ही धीवत्त मृगांक नामक खड्ग को खींचकर उसे मारने के लिए उठा। उधर उस स्त्री ने भी अपना रूप छोड़कर भीषण राक्षसी का रूप धारण कर लिया ॥७३॥ धीवत्त ने उस राक्षसी को मारने के लिए उसके केशों को पकड़ा तो इतने ही में वह राक्षसी का रूप छोड़कर दिव्य स्त्री का रूप धारण करके कहने लगी— ॥७४॥ "महाभाग! मुझे मत मारो। मैं राक्षसी नहीं हूँ। मुझे कौशिक ऋषि का शाप था ॥७५॥ जब कौशिक मुनि तपस्या कर रहे थे उस समय कुबेर ने मुझे उसकी तपस्या में विघ्न करने के लिए भेजा था क्योंकि वह कुबेर का पद पाने के लिए तपस्या कर रहा था ॥७६॥ इस सुन्दर रूप से मुनि को लुभाने में असमर्थ एवं लज्जित होकर उसे डराने के लिए मैंने यह भीषण रूप धारण किया ॥७७॥ मेरे राक्षसी-रूप को देखकर उस मुनि ने मुझे समुचित शाप दिया कि 'पापिन्! तू मनुष्यों को खाती हुई राक्षसी बन जा' ॥७८॥ उस ऋषि ने तुम्हारे द्वारा बालों के पकड़े जाने पर शाप का अन्त बताया था। इस प्रकार इस दुःखप्रद राक्षसीपन को प्राप्त हुई ॥७९॥ मैंने ही बहुत समय से इस नगर को ग्रस रखा है। आज तुमने मेरे शाप का अन्त कर दिया अतः अब तुम मुझसे वरदान ग्रहण करो' ॥८०॥ उसकी इस प्रकार बातें सुनकर धीवत्त ने आदर के साथ कहा— 'इस समय और दूसरा वर क्या माँगूँ? यह मेरा मित्र जी जाय यही वर दो' ॥८१॥

११८ कथासरित्सागरे

११८ कथासरित्सागरे साथ युक्त्या जगादैनं वाप्यां स्नानमितः कुरु। आदायैनं च मज्जस्व खड्गं ग्राहभयापहम् ॥५१॥ तथेति वाप्यां मग्नः सन् श्रीदत्तो जाह्नवीतटात्। तस्मादेव समुत्तस्थौ यस्मात्पूर्वमवातरत् ॥५२॥ खड्गाङ्गुलीयकं पश्यन्पातालादुत्थितोऽथ सः। विषण्णो विस्मितश्चासीद् वञ्चितोऽसुरकन्यया ॥५३॥ ततस्तान्सुहृदोऽन्वेष्टुं स्वगृहाभिमुखं ययौ। गच्छंश्चिष्टूरकाख्यं च मित्रं मार्गे ददर्श सः ॥५४॥ स चोपैत्य प्रणम्याथ नीत्वैकान्तं च सत्वरम्। तं पृष्टस्वजनोदन्तमेवं निष्ठुरकोऽब्रवीत् ॥५५॥ गङ्खान्तस्थां तदा भग्नमन्विष्य दिवसान्वहून। स्वशिरंसि शुचा छेत्तुमभूम वयनुद्यताः ॥५६॥ न पुत्राः साहस कार्य जीवन्नेष्यति वः सखा। इत्यन्तरिक्षाद् वाणी नस्तमुद्योगं न्यवारयत् ॥५७॥ ततश्च त्वत्पितुः पार्श्वमस्मासु प्रतिगच्छताम्। मार्गे सत्वरमभ्येत्य पुमानेकोऽब्रवीदिदम् ॥५८॥ नगरं न प्रवेष्टव्यं युष्माभिरिह साम्प्रतम्। यतो वल्लभशक्तिः स विपन्नोऽद्य महीपतिः ॥५९॥ दत्तो विक्रमशक्तिश्च राज्ये सम्भूय मन्त्रिभिः। प्राप्तराज्यः स चान्वेषु कालनेमेरगाद् गृहम् ॥६०॥ धीमन् क्व स ते पुत्र इति क्षामपनिर्भरैः। घस्रैरुच्छ्रसंश्चाप्येनं प्राह वेद्मीत्यथापतत् ॥६१॥ प्रच्छादितोऽमुना पुत्र इति तं निपूदितः। कालनेमिः स शूखायां राज्ञा चौर इति क्रुधा ॥६२॥ तद्दृष्ट्वा तस्य भार्यायाः स्वयं हृदयमस्फुटत्। पापं पापानुरागेणक्रूरं हि क्रूरकर्मणाम् ॥६३॥ तन चान्विष्यते द्रष्टुं सोऽपि विक्रमशक्तिना। धीदत्तस्तद्वयस्याश्च यूयं तद्गम्यतामितः ॥६४॥ इति तेनोदिताः पुंसा शोकार्तास्ते निजां भुवम्। बाहुपात्यान्य पञ्च सम्मन्त्र्योज्जयिनीं गताः ॥६५॥ प्रच्छन्नस्यापिनाद्याहं स्वदद्यमिह तं मग। तदेहि तावद् गच्छावस्तत्रैव सुहृदन्तिकम् ॥६६॥

द्वितीय लम्बक १३१

द्वितीय लम्बक १३१ धीदत्त की भावना को समझकर दैत्य-कन्या ने उससे कहा कि 'तुम इस वापी में खड्ग को लेकर स्नान करो जिससे ग्राह का भय न रहे' ॥५१॥ दैत्य-कन्या के कथनानुसार उस वापी में गोता लगाते ही श्रीदत्त फिर उसी गंगा-तट पर जा निकला जहाँ से वह जल में उतरा था ॥५२॥ पाताल से गंगा-तट पर निकला हुआ धीदत्त खड्ग और अंगूठी को देखता हुआ दुःखी और चकित हो रहा था क्योंकि उस कन्या ने उसे पुनः यहाँ भेजकर ठग लिया ॥५३॥ गंगा-तट पर उन छोड़े हुए अपने मित्रों को ढूँढ़ने के लिए वह अपने घर की ओर चला। जाते हुए उसने निष्ठुरक नामक मित्र को मार्ग में देखा ॥५४॥ निष्ठुरक उसे देखकर उसके समीप आकर प्रणामपूर्वक उससे अपने मित्रों का समाचार पूछते हुए उसे एकान्त में ले जाकर बोला—॥५५॥ “तुम्हें उस समय गंगा में डूबा हुआ देखकर तुम्हारे शोक के कारण हम लोग अपने-अपने गले काटने के लिए उद्यत हुए ॥५६॥ ‘बेटो ! ऐसा साहस न करो’—इस प्रकार की आकाशवाणी ने हमारे गले काटने के प्रयत्न को रोक दिया ॥५७॥ जब तुम्हारे पिता के समीप समाचार कहने के लिए जाते हुए हम लोगों को मार्ग में मिलकर एक पुरुष ने इस प्रकार कहा—॥५८॥ ‘तुम लोगों को नगर में प्रवेश नहीं करना चाहिए। नगर का राजा वल्लभशक्ति इस समय मर गया है और उसके पुत्र विक्रमशक्ति को मन्त्रियों ने सम्मति करके राजा बना दिया है। विक्रमशक्ति राज्य पाते ही दूसरे दिन कालनेमि (तुम्हारे पिता) के घर पहुँचा और पूछा कि वह तुम्हारा बेटा श्रीदत्त कहाँ है ? उत्तर में कालनेमि ने कहा—कि ‘मैं नहीं जानता’ ॥५९ ६०-६१॥ ‘इसने अपने लड़के को छिपा दिया’—ऐसा अपराध लगाकर राजा विक्रमशक्ति ने क्रुद्ध होकर कालनेमि को फाँसी दे दी ॥६२॥ पति की इस परिस्थिति को देखकर उसकी स्त्री (तुम्हारी माता) का हृदय स्वयं फट गया। सच है क्रूर व्यक्तियों का पाप उनके लिए किये गये अन्यान्य पापों के कारण अत्यन्त क्रूर हो जाता है ॥६३॥ अब विक्रमशक्ति श्रीदत्त और उसके मित्रों को वध करने के लिए ढूँढ़ रहा है। इसलिए तुम लोग नगर में न जाकर और कहीं चले जाओ' ॥६४॥ इस प्रकार किसी नागरिक पुरुष के कहने पर शोक-सन्तप्त बाहुशाली आदि हम पाँचों मित्र परस्पर सम्मति करके अपनी मातृभूमि उज्जयिनी को चल गये। और तुम्हारे लिए मुझे छिपकर यहाँ रहने का आदेश दे गये। तो चलो उज्जयिनी में मित्रों के समीप चलें” ॥६५ ६६॥

१४ कथासरित्सागर

१४ कथासरित्सागर एवं निष्ठुरकाच्छ्रुत्वा पितरावनुशोच्य स। निदधे प्रतिनाराच्यामिव खड्गे दृशं मुहुः॥६७॥ काल प्रतीक्षमाणोऽथ वीरो निष्ठुरकान्वितः। प्रतस्थे तान् सखीन् प्राप्तुं स तामूज्जयिनीं पुरीम्॥६८॥ आमज्जनान्तं वृत्तान्तं सख्युस्तस्य च वर्णयन्। धीदत्तः स ददर्शाकां क्रोशन्तीमबलां पथि॥६९॥ अबला भ्रष्टमार्गाहि मालवं प्रस्थितेति ताम्। ब्रुवतीं वयया सोऽथ सह प्रस्थायिनीं व्यधात्॥७०॥ तया वयानुरोधाच्च स्त्रिया निष्ठुरकान्वितः। कस्मिंश्चिच्छून्यनगरे दिने तस्मिन्नुवास स॥७१॥ तत्र रात्रावकस्माच्च मुक्तनिद्रो ददर्श ताम्। स्त्रियं निष्ठुरकं हत्वा हृष्टां मांसमश्नतीम्॥७२॥ उदतिष्ठत्समाकृष्य सोऽथ खड्गं मृगाङ्ककम्। सापि स्त्री राक्षसीरूपं घोरं स्वं प्रत्यपद्यत॥७३॥ स च केशेषु जग्राह निहन्तुं तां निशाचरीम्। तत्क्षणं दिव्यरूपञ्च सम्प्राप्ता समुवाच सा॥७४॥ मा मां वधीर्महाभाग मुञ्च नैवास्मि राक्षसी। अयमेवविधः शापो ममाभूत्कौशिका मुनेः॥७५॥ तपस्यतो हि तस्याहं धनाधिपतिनामुया। विघ्नाय प्रहिता पूर्वं तत्पदप्राप्तिकांक्षिणः॥७६॥ तत कान्तेन रूपेण तं क्षोभयितुमक्षमा। लज्जिता त्रासयन्त्यन्यमकार्षं भैरवं वपुः॥७७॥ तद्दृष्ट्वा स मुनिः शापं सदृशं मय्यथो दधे। राक्षसी भव पापे त्वं निघ्नन्ती मानुषानिति॥७८॥ त्वत् केशग्रहे प्राप्ते शापान्तं मे स चाब्रवीत्। इत्यहं राक्षसीभावमिमं कष्टमुपागमम्॥७९॥ मयैवं नगरं यत्तद् ग्रस्तमद्य च मे चिरात्। त्वया कृतः स शापान्तस्तद्गृहाणाधुना वरम्॥८०॥ इति तस्या वचः श्रुत्वा धीदत्तः सादरमभ्यधात्। किमन्येन वरेणायं जीवत्वेष सखा मम॥८१॥

द्वितीय लम्बक १४१

द्वितीय लम्बक १४१ निष्ठुरक की बातें सुनकर धीदत्त ने माता-पिता की मृत्यु पर शोक किया और मानों ढाढस देने की भावना से अपनी आँखों को हृदय पर डाला ॥६७॥ इसके पश्चात् प्रतिशोध के लिए अवसर की प्रतीक्षा करता हुआ धीदत्त निष्ठुरक को साथ लेकर अपने मित्रों से मिलने के लिए उज्जयिनी पुरी को गया ॥६८॥ गंगा में गोता लगाने के बाद का अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त मित्र निष्ठुरक को मार्ग में सुनाते हुए धीदत्त ने एक रोती हुई स्त्री को देखा ॥६९॥ मैं असहाय अबला हूँ मालव देश को जाती हुई मार्ग भूल गई हूँ—उस अबला के ऐसा कहने पर धीदत्त ने दया करके उसे अपने साथ ले लिया ॥७०॥ दया और अनुरोध के कारण उस स्त्री और निष्ठुरक को साथ लेकर धीदत्त उस दिन किसी उजड़े हुए, अतएव शून्य नगर में ठहर गया ॥७१॥ इस यात्रा में एक दिन अकस्मात् रात को सोकर उठे हुए धीदत्त ने उस स्त्री को जो निष्ठुरक को मारकर उसका मांस खा रही थी देखा ॥७२॥ यह देखते ही धीदत्त मृगांक नामक खड्ग को खींचकर उसे मारने के लिए उठा। उधर उस स्त्री ने भी अपना रूप छोड़कर भीषण राक्षसी का रूप धारण कर लिया ॥७३॥ धीदत्त ने उस राक्षसी को मारने के लिए उसके केशों को पकड़ा तो इतने ही में वह राक्षसी का रूप छोड़कर दिव्य स्त्री का रूप धारण करके कहने लगी— ॥७४॥ "महाभाग ! मुझे मत मारो। मैं राक्षसी नहीं हूँ। मुझे कौशिक ऋषि का शाप था ॥७५॥ जब कौशिक मुनि तपस्या कर रहे थे उस समय कुबेर ने मुझे उनकी तपस्या में विघ्न करने के लिए भेजा था क्योंकि वह कुबेर का पद पाने के लिए तपस्या कर रहा था ॥७६॥ इस सुन्दर रूप से मुनि को लुभाने में असमर्थ एवं लज्जित होकर उसे डराने के लिए मैंने यह भीषण रूप धारण किया ॥७७॥ मेरे राक्षसी-रूप को देखकर उस मुनि ने मुझे समुचित शाप दिया कि 'पापिन् ! तू मनुष्यों को खाती हुई राक्षसी बन जा' ॥७८॥ उस ऋषि ने तुम्हारे द्वारा बालों के पकड़े जाने पर शाप का अन्त बताया था। इस प्रकार मैं इस दुःखप्रद राक्षसीपन को प्राप्त हुई ॥७९॥ मैंने ही बहुत समय से इस नगर को त्रस्त रखा है। आज तुमने मेरे शाप का अन्त कर दिया अतः अब तुम मुझसे वरदान ग्रहण करो" ॥८०॥ उसकी इस प्रकार बातें सुनकर धीदत्त ने आदर के साथ कहा— 'इस समय और दूसरा वर क्या माँगूँ ? यह मेरा मित्र जी जाय यही वर दो' ॥८१॥

१४९ कथासरित्सागर

१४९ कथासरित्सागर एवमस्त्विति सा चास्मै वरं दत्त्वा तिरोदधे। अक्षताङ्गः स चोत्तस्थौ जीवन्पिष्ठुरकः पुनः ॥८२॥ सेनेव सह च प्रातः प्रहृष्टो विस्मितश्च सः। ततः प्रतस्थे धीदत्तः प्राप चोज्जयिनीं क्रमात् ॥८३॥ तत्र सम्भावयामास सखीन्मार्गोन्मुखान्स तान्। दर्शनेन यथाकालो नीलकण्ठानिवाम्बुदः ॥८४॥ कृतातिथ्यविधिश्चासौ स्वगृहं बाहुशालिना। नीतोऽभूत् कथितशेषनिजवृत्तान्तकौतुकः ॥८५॥ तत्रोपचर्यमाणः सन् पितृभ्यां बाहुशालिनः। स उवास समं मित्रैः धीदत्तः स्वगृहे यथा ॥८६॥ कदाचित्सोऽथ सम्प्राप्ते मधुमासमहोत्सवे। यात्रामुपवनं द्रष्टुं जगाम सखिभिः सह ॥८७॥ तत्र कन्यां ददर्शैकां राज्ञः श्रीबिम्बकेः सुताम्। आगतामाकृतिमतीं साक्षादिव मधुश्रियम् ॥८८॥ सा मृगाङ्कवती नाम हृदयं तस्य तत्क्षणम्। विवेश दत्तमार्गेव दृष्ट्यास्य सविलासया ॥८९॥ तस्या अपि मुहुः स्निग्धा प्रथमप्रमदासिनी। न्यस्ता च प्रति दूतीव दृष्टिञ्चक्रे गतागतम् ॥९०॥ प्रविष्टां वृक्षगहनं तामपश्यंश्च क्षणात्। श्रीदत्तः शून्यहृदयो तिष्ठोऽपि न ददर्श सः ॥९१॥ ज्ञातं मया ते हृदयं सखे! मापहृतं वृथा। तदेहि तत्र गच्छावो यत्र राजसुता गता ॥९२॥ इत्युक्तश्चेङ्गितज्ञेन सुहृदा बाहुशालिना। तथेति स ययौ तस्याः सन्निकर्षं सुहृत्सखः ॥९३॥ हा कष्टमहिना दष्टा राजपुत्रीति तत्क्षणम्। आक्रन्द उदभूत्तत्र श्रीदत्तहृदयज्वरः ॥९४॥ विषघ्नमाङ्गुलीयं च विद्या च सुहृदोऽस्य मे। अस्तीति गत्वा जगदे कञ्चुकी बाहुशालिना ॥९५॥ स च तत्क्षणमभ्येत्य कञ्चुकी चरणानतः। निकटं राजदुहितुः धीदत्तमनयद्द्रुतम् ॥९६॥

द्वितीय लम्बक १४३

द्वितीय लम्बक १४३ 'ऐसा ही हो'—इस प्रकार वर देकर वह अन्तर्धान हो गई। और वह निष्ठुरक सम्पूर्ण अंगों से अक्षत रहकर जीवित हो उठा॥८२॥ प्रातःकाल चकित और प्रसन्न धीदत्त उठा और निष्ठुरक के साथ क्रमशः उज्जैन पहुँचा॥८३॥ उज्जैन जाकर उत्सुकतापूर्वक राह देखते मित्रों को उसने ऐसा आनन्दित किया जैसे मेघ मयूरों को आनन्दित करता है॥८४॥ अपने आश्चर्यपूर्ण समस्त वृत्तान्त को कहने के पश्चात् बाहुशाली विधिपूर्वक आतिथ्य सत्कार करके धीदत्त को अपने घर ले गया॥८५॥ वहाँ पर बाहुशाली के माता-पिता द्वारा अपने बालक के समान उनका प्रेम प्राप्त करता हुआ धीदत्त अपने घर के समान ही रहने लगा॥८६॥ किसी समय वसन्तोत्सव के अवसर पर धीदत्त अपने मित्रों के साथ किसी उद्यान में मेला देखने गया॥८७॥ वहाँ मेले में उसने राजा धीबिम्बट की कन्या को मूर्ति धारण करके आई हुई साक्षात् वसन्त-लक्ष्मी (शोभा) के समान देखा॥८८॥ तदनन्तर वह मृगाङ्कवती नाम की राजकुमारी विकसित नेत्रों के मार्ग से धीदत्त के हृदय में प्रवेश कर गई॥८९॥ राजकुमारी की प्रेममयी सरल दृष्टि भी दूती के समान धीदत्त के साथ यातायात करने लगी॥९०॥ घूमती-फिरती राजकुमारी के वृक्षों के झुरमुट में छिप जाने के कारण धीदत्त को विभ्रम होने लगा। उसे कुछ सूझता न था॥९१॥ 'मित्र! मैंने तुम्हारा हृदय जान लिया छिपायो नहीं आओ, इधर ही चलें जिधर राजकुमारी गई है'॥९२॥ ऐसा कहकर धीदत्त को उसका मित्र बाहुशाली राजकुमारी के समीप ले गया॥९३॥ इतने ही में वहाँ अरे रे राजकुमारी को साँप ने काट लिया—इस प्रकार कोलाहल सुनाई दिया जिसे सुनकर धीदत्त के हृदय में ज्वर-सा हो गया॥९४॥ इतने में बाहुशाली ने राजकुमारी के कंचुकी से कहा कि मेरे इस मित्र के पास विष दूर करनेवाली एक ओषधी है और यही विष उतारने का मंत्र भी जानता है॥९५॥ उसी समय वह कंचुकी धीदत्त के चरणों में झुककर प्रणाम करके धीदत्त को राजकुमारी के समीप ले गया॥९६॥

१४४ कथासरित्सागरः

१४४ कथासरित्सागरः सोऽपि तस्यास्तदङ्गुल्यां निक्षिपारङ्गुलीयकम्। ततो जजाप विद्यां च तेन प्रत्युज्जिजीव सा ॥९७॥ अथ सवजने दृष्टे धीदत्तस्तुतितत्पर। तत्रैव ज्ञातवृत्तान्तो राजा बिम्बचिराययौ ॥९८॥ सेनासौ सखिभि सार्धमगृहीताङ्गुलीयकः । प्रत्याजगाम धीदत्तो भवनं बाहुशालिनः ॥९९॥ तत्र तस्मै सुवर्णादि यत्प्रीतः प्राहिणोन्नृपः। तद्बाहुशालिनः पित्रे समग्रं स समर्पयत् ॥१०० ॥ अथ तां चिन्तयन्कान्तां स तथा पर्यतप्यत। यथा किङ्कर्यतामूढा वयस्यास्तस्य जज्ञिरे ॥१०१॥ ततो भावनिका नाम राजपुत्र्या प्रिया सखी। अङ्गुलीयार्पणव्याजात्तस्यान्तिकमुपाययौ ॥१०२॥ उवाच चाम मस्सख्यास्तस्याः सुभग! साम्प्रतम्। त्वं वा प्राणप्रदो भर्त्ता मृत्युर्वाप्येष निश्चयः ॥१०३॥ इत्युक्ते भावनिकया धीदत्तः स च सापि च। बाहुशाली च तेऽन्ये च मन्त्रं सम्भूय चक्रिरे ॥१०४॥ हरामो निभृतं युक्त्या राजपुत्रीमिमां वयम्। निवासहेतोर्गूप्तं च गच्छामो मधुरांमित ॥१०५॥ इति सम्मन्त्रित सम्यक्कार्यसिद्धय च संविदि। अन्योन्यं स्थापितायां सा ययौ भावनिका ततः ॥१०६॥ अन्यद्युर्बाहुशाला च वयस्यमितयाचत। वणिज्याव्यपदशन जगाम मधुरां प्रति ॥१०७॥ स गच्छन्स्थापयामाम वाहनानि पदे पदे। राजपुत्र्यभिमारार्थं गूढानि चतुराणि च ॥१०८॥ धीदत्तोऽपि ततः काञ्चिद्बहुहिम्ना सहितां स्त्रियम्। माम राजमुतावास पाययित्वा मधु न्यधात् ॥१०९॥ ततोऽत्र दीपोद्देशेन दत्वाग्नि वासवेश्मनि। प्रच्छन्नं भावनिकया निन्ये राजसुता बहिः ॥११०॥ तदाण तां च सम्प्राप्य धीदत्तः स बहिःस्थितः । प्राप्तप्रस्थितस्य निकटं प्राहिणोद् वाहनासिनः ॥१११॥ इतो मित्रद्वयं यास्या पश्चाद्भावनिका तया।

द्वितीय लम्बक १४५

द्वितीय लम्बक १४५ श्रीदत्त ने जाकर राजकुमारी की अँगुली में अंगूठी पहना दी और मंत्र भी पढ़ा। इससे वह पुनर्जीवित हो उठी ॥९७॥ राजकुमारी के स्वस्थ होते ही वहाँ एकत्र सभी व्यक्ति श्रीदत्त की प्रशंसा करने लगे। यह समाचार सुनकर राजा बिम्बकि भी वहाँ आ पहुँचा ॥९८॥ राजा के आने पर श्रीदत्त अपनी अंगूठी बिना लिये ही अपने मित्र बाहुशाली के साथ उसके घर लौट आया ॥९९॥ राजा बिम्बकि ने प्रसन्न होकर श्रीदत्त के लिए जो सोना आदि उपहार के रूप में भेजे थे उन्हें श्रीदत्त ने बाहुशाली के पिता को दे दिया ॥१००॥ तदनन्तर श्रीदत्त उस राजकुमारी के विरह में इतना व्याकुल रहने लगा कि उसके मित्र भी घबराकर किंकर्तव्यविमूढ़-से हो गये ॥१०१॥ कुछ समय के पश्चात् राजकुमारी की प्रिय सहेली भावनिका अंगूठी लौटाने के बहाने श्रीदत्त के समीप आई ॥१०२॥ और बोली- हे सौभाग्यशालिन् ! मेरी सहेली को प्राणदान करनेवाले तुम उसके स्वामी बनो अन्यथा उसकी मृत्यु हो जायगी इसमें सन्देह नहीं ॥१०३॥ भावनिका के इस प्रकार कहने पर श्रीदत्त भावनिका बाहुशाली तथा अन्य मित्र मिलकर गुप्त मंत्रणा करने लगे ॥१०४॥ हम लोग किसी भी उपाय से राजकुमारी का हरण कर लें और रहने के लिए गुप्त रूप से यहाँ से मथुरा चलें ॥१०५॥ कार्य सिद्धि के लिए इन लोगों की सम्मति में परस्पर ऐसा निश्चय करके भावनिका अपने घर लौट गई ॥१०६॥ दूसरे दिन अपने तीन मित्रों के साथ बाहुशाली व्यापार के बहाने मथुरा चला गया ॥१०७॥ उसने मथुरा जाते हुए मार्ग में स्थान-स्थान पर सवारी का प्रबन्ध करके राजकुमारी के आने के लिए चारों ओर से गुप्त प्रबन्ध किया ॥१०८॥ श्रीदत्त ने भी कन्या के साथ किसी परदेशी स्त्री को सायंकाल राजकुमारी के निवास-स्थान में ठहरा दिया ॥१०९॥ उधर भावनिका ने दीपक जलाने के बहाने से उस घर में आग लगा दी और गुप्त रूप से राजकुमारी को लेकर बाहर आ गई ॥११०॥ बाहर प्रतीक्षा करते हुए श्रीदत्त ने उसी समय अपने दो मित्रों के साथ राजकुमारी को आगे गये हुए बाहुशाली के समीप भेज दिया ॥१११॥ और, उसके पीछे (या साथ) भावनिका भी गई। १९

१४६ कथासरित्सागर

१४६ कथासरित्सागर सम्मन्दिरं च दग्धा सा धीवा स्त्री सुतया सह ॥११२॥ लोकस्तु तां सखीयुक्तां मेन दग्धां नृपात्मजाम्। प्रातश्च पूर्ववत्तत्र श्रीदत्तो ददृशे जनैः ॥११३॥ ततो रात्रौ द्वितीयायां स गृहीतमृगाङ्ककः। श्रीदत्तः प्रययौ पूर्वं प्रस्थितां तां प्रियां प्रति ॥११४॥ तया च रात्र्यातिक्रम्य दूरमध्वानमुत्सुकः। विन्ध्याटवीमथ प्राप स प्रातः प्रहरे गते ॥११५॥ तत्राधावनिमिषाक्षि पश्चादपि ददर्श तान्। सर्वान्निहाराभिहतान्सपद्मवनिकान् सखीन् ॥११६॥ ते च दृष्ट्वा निजगुस्तं सम्भ्रान्तमुपागतम्। मुषिताः स्मो निपत्याथ बह्वश्वारोहसेनया ॥११७॥ एकेन चाश्वारोहेण राजपुत्री भयाकुला। अस्मास्वतदवस्थेषु नीताश्वमभिरोप्य सा ॥११८॥ दूरं न यावन्नीता च तावद् गच्छानया दिशा। अस्माकमन्तिकं मा स्थाः सर्वषामभ्यधिका च सा ॥११९॥ इति तैः प्रेषितो मित्रैर्मुहुः पश्यन्निवृत्त सः। जवेन राजतनयां श्रीदत्तोऽनुससार ताम् ॥१२०॥ गत्वा सुदूरं लेभे च तामश्वारोहवाहिनीम्। युवानमेकं तन्मध्ये क्षत्रियं स ददर्श च ॥१२१॥ तेनोपरि तुरङ्गस्य गृहीतां तां नृपात्मजाम्। अपश्यच्च ययौ चास्य क्षत्रसूनोऽन्तिकं क्रमात् ॥१२२॥ सास्त्रेण राजपुत्रीं ताममुञ्चन्तं च पावतः। अश्वादाक्षिप्य दृषदि श्रीदत्तस्तमचूर्णयत् ॥१२३॥ तं हत्वा च तमेवाश्वमारुह्य निजघान तान्। अन्यान्यपि बहून्क्रुद्धानश्वारोहान् प्रभाववान् ॥१२४॥ हतशेषास्ततस्ते च तद्दृष्ट्वा तस्य तादृशम्। वीरस्यामानुषं वीर्यं पलाय्य त्रस्य युः ॥१२५॥ स चापि तुरगारूढो राजपुत्र्या तया सह। मृगाङ्कवत्या श्रीदत्तः प्रययौ तान् सखीन् प्रति ॥१२६॥ स्तोकं गत्वा च तस्याश्वः सङ्ग्रामे व्रणितो भृशम्। समाग्रस्यावतीर्णस्य पपात प्राप पञ्चताम् ॥१२७॥

द्वितीय लम्बक १४७

द्वितीय लम्बक १४७ इधर कुमारी के भवन में आग लगने से धीदत्त की भेजी हुई वह पायक-स्त्री कन्या के साथ जल गई॥११२॥ वहाँ के लोगों ने भावनिका के साथ राजकुमारी को जला हुआ समझ लिया और प्रातःकाल धीदत्त को वहाँ उपस्थित देखा॥११३॥ दूसरी रात को धीदत्त 'मृगांक' नामक खड्ग को हाथ में लेकर पहले से भागी हुई प्रिया (राजकुमारी) से मिलने के लिए चल पड़ा॥११४॥ उत्सुक धीदत्त रात में ही लम्बा रास्ता तै करके प्रातःकाल एक प्रहर व्यतीत होने पर विन्ध्याचल के घोर जंगल में जा पहुँचा ॥११५॥ धीदत्त ने प्रस्थान करते हुए पहले अशुभसूचक शकुन देखे और पीछे भावनिका के साथ आक्रमण से व्याकुल अपने मित्रों को देखा ॥११६॥ वे लोग घबराकर भागे हुए धीदत्त से बोले—'हम लोग बहुत बड़ी घुड़सवार-सेना द्वारा घेर लिये गये हैं॥११७॥ हम लोगों के घायल होने पर एक घुड़सवार सैनिक राजकुमारी को घोड़े पर बैठा कर ले भागा॥११८॥ अतः जबतक वे लोग दूर नहीं चले जाते तबतक इसी मार्ग से उस ओर जाओ। हम लोगों के पास न रहो। उस (राजकुमारी) की रक्षा प्रधान कर्त्तव्य है' ॥११९॥ इस प्रकार उन मित्रों का भेजा हुआ धीदत्त लौटकर वेग से घोड़ा दौड़ाता हुआ गया। कुछ ही दूर आगे उसने घुड़सवार-सेना को देखा और उसके बीच एक युवा क्षत्रिय को भी उसने देखा॥१२०-१२१॥ उस युवा द्वारा घोड़े पर चढ़ाकर पकड़ी हुई राजकुमारी को भी उसने देखा और क्रमशः उन दोनों के समीप आ गया॥१२२॥ शान्तिपूर्वक राजकुमारी को न छोड़ते हुए उस युवक को धीदत्त ने पैरों से खींचकर पत्थर पर दे मारा और घोड़े से गिराकर चूर-चूर कर दिया ॥१२३॥ उसने उसे मारकर और उसी के घोड़े पर सवार होकर अन्यान्य क्रुद्ध एवं भागते हुए उसके सिपाहियों को भी मारा। बचे हुए सिपाही धीदत्त के अमानुष पराक्रम को देखकर डर से इधर-उधर भाग गये॥१२४-१२५॥ अकस्मात् धीदत्त भी राजकुमारी मृगांकवती को साथ लेकर अपने मित्रों की ओर लौटा ॥१२६॥ कुछ दूर जाने पर लड़ाई में घायल हुआ उसका घोड़ा गिर गया। धीदत्त जब अपनी पत्नी को लेकर उससे उतरा तब वह घोड़ा मर गया ॥१२७॥

१४८ कथासरित्सागर

१४८ कथासरित्सागर तत्कालं चास्य सत्रेण सा मृगाङ्कवती प्रिया । त्रासायासपरिश्रान्ता तृषार्त्ता समपद्यत ॥१२८॥ स्नापयित्वा च तां तत्र गत्वा दूरमितस्ततः । जलमन्विष्यतश्चास्य सवितास्तमुपाययौ ॥१२९॥ ततः स लब्धेऽपि जले मार्गनाशवशाद् भ्रमन् । चक्रवाकवधूकूजां निनाय निशां वने ॥१३०॥ प्रातः प्राप च तत्स्थानं पतिताश्वोपलक्षितम् । न च तत्र क्वचित् कान्तां राजपुत्रीं ददर्श ताम् ॥१३१॥ ततः स मोहाद् विन्यस्य भुवि खड्गं मृगाङ्ककम् । वृक्षाग्रमारुहोन्नामवेक्षितुमितस्ततः ॥१३२॥ तत्क्षणं तेन मार्गेण कोऽप्यागच्छच्छबराधिपः । स चागत्यैव जग्राह वृक्षमूलान् मृगाङ्ककम् ॥१३३॥ तं दृष्ट्वापि स वृक्षाग्रादवतीर्यैव पृष्टवान् । प्रियाप्रवृत्तिमार्त्तं धीदस्तं शबराधिपम् ॥१३४॥ इतस्त्वं गच्छ मत्पल्लीं जाने सा तत्र ते गता । अह्रं तत्रैव चैष्यामि दास्याम्यसिमिमं च ते ॥१३५॥ इत्युक्त्वा प्रेषितस्तेन शबरेण स चोत्सुकः । धीवरस्तां ययौ पल्लीं तदीये पुरुषैः सह ॥१३६॥ श्रमं तावद् विमुञ्चेति तत्रोक्तः पुरुषैश्च सः । प्राप्य पल्लीपतेर्गेहं श्रान्तो निद्रां क्षणाद्ययौ ॥१३७॥ प्रबुद्धश्च ददर्श स्वौ पादौ निगडसंयुतौ । असम्यर्थद्गतौ कान्ताप्राप्त्युपायोधमाविव ॥१३८॥ अथ क्षण दरासुखां क्षणान्तरविभाविनीम् । दैवस्य च गतिं शोचन् तस्थौ शोचन् स तां प्रियाम् ॥१३९॥ एकदा तमुवाचास्य चटी मोषणिकामिषा । आगतोऽसि महाभाग कुनेहं बत मृत्यवे ॥१४०॥ कार्यसिद्धय स हि क्वापि प्रयातः शबराधिपः । आगत्य चण्डिकायास्त्वामुपहारीकरिष्यति ॥१४१॥ एतदर्थं हि तेन त्वमितो विन्ध्याटवीतलात् । प्राप्य युक्त्या विसृज्येह नीतः सम्प्रति बन्धनम् ॥१४२॥

द्वितीय लम्बक १४९

द्वितीय लम्बक १४९ वहाँ उतरने पर उसकी प्यारी मृगांकवती भय और थकावट के कारण प्यास से व्याकुल हो गई ॥१२८॥ धीरदत्त मृगांकवती को वहीं ठहराकर इधर-उधर पानी ढूंढने लगा। पानी ढूंढते-ढूंढ़ते सन्ध्या हो गई, सूर्य अस्त हो गया ॥१२९॥ जल मिल जाने पर भी राह भूल जाने के कारण धीरदत्त ने चकवे के समान बिलखते- बिलखते रात व्यतीत की ॥१३०॥ प्रातःकाल मरे हुए लीढ़ेवाले उस स्थान को तो उसने पाया किन्तु उस प्यारी राजकुमारी को कहीं न देखा ॥१३१॥ तब धीरदत्त व्याकुलता के कारण मृगांक खड्ग को वृक्ष की जड़ में रखकर उसे देखने के लिए पेड़ पर चढ़ गया ॥१३२॥ उसी समय उस मार्ग से कोई जंगली भिल्लराज उधर आ निकला। उसने आते ही पहले पेड़ की जड़ में रखी हुई तलवार उठा ली ॥१३३॥ उसे देखकर धीरदत्त पेड़ से नीचे उतरा और उसने उतरते ही भिल्लराज से दीनतापूर्वक राजपुत्री का समाचार पूछा ॥१३४॥ 'यहाँ से तुम मेरे गाँव पर जाओ सम्भवतः वह वहीं गई होगी मैं वहीं आ रहा हूँ और तुम्हारी तलवार भी साथ ला रहा हूँ' ॥१३५॥ ऐसा कहकर भिल्लराज द्वारा अपने गाँव को भेजा हुआ धीरदत्त उसके आदमियों के साथ उसके गाँव आ गया ॥१३६॥ वहाँ जाकर उसने आदमियों के 'थकावट मिटा लो'—कहने पर धीरदत्त वहाँ सो गया ॥१३७॥ जागने पर उसने अपने पैरों को बेड़ियों से बँधा पाया। मानों वे पैर मृगांकवती का पता न लगा सकने के कारण दण्डित किये गये हों ॥१३८॥ क्षण भर में सुख देनेवाली और क्षण भर में दारुण दुःख देनेवाली प्यारी मृगांकवती को दैवगति१ के समान सोचता हुआ धीरदत्त बँधे पैरों से पड़ा रहा ॥१३९॥ इस प्रकार सोच में पड़े हुए धीरदत्त के समीप आकर मोषणिका नामक एक दासी ने कहा—'हे महाभाग ! मृत्यु के लिए तुम यहाँ कहाँ आ गये हो ? ॥१४०॥ यह भिल्लराज अपनी किसी कार्य-सिद्धि के लिए कहीं गया है आकर चंडिका देवी के आगे तुम्हारा बलिदान करेगा ॥१४१॥ इसीलिए तुम्हें विन्ध्य के जंगल से युक्तिपूर्वक यहाँ भेजकर कैद कर दिया गया है ॥ १४२॥ १ दैवगति भी क्षण भर में दुःख और दूसरे ही क्षण सुख देती है। उसी प्रकार मृगांक- वती भी धीरदत्त को क्षण-क्षण में सुख और दुःख का अनुभव करा रही थी। —अनु

१५० कथासरित्सागर

[Page Header] १५० कथासरित्सागर

भगवत्युपहारत्वं यत एवासि कल्पितः। अत एव सदा वस्त्रभोजनैश्चोपचर्यसे ॥१४३॥ एकस्तु मुक्त्युपायस्ते विद्यते यदि मन्यसे। अस्त्यस्य सुन्दरी नाम शबराधिपतेः सुता ॥१४४॥ अयमर्थे सा च दृष्ट्वा त्वां जायते मदनातुरा। तां भजस्व वयस्यां मे ततः क्षेममवाप्स्यसि ॥१४५॥ तमित्युक्तो विमुक्त्यर्थी स धीवस्तस्तदन्विति ताम्। गान्धर्वविधिना गुप्तां भार्यां व्यधित सुन्दरीम् ॥१४६॥ रात्रौ रात्रौ च सा तस्य बन्धनानि व्यवारयत्। अचिराच्च सगर्भा सा सुन्दरी समपद्यत ॥१४७॥ तत्सर्वमथ तन्माता बुद्ध्वा मोचनिकामुखात्। जामातुस्तद्रहो गत्वा स्वैरं श्रीदत्तमब्रवीत् ॥१४८॥ पुत्र! श्रीचण्डनामासौ कोपनः सुन्दरीपिता। न त्वां क्षमेत तद् गच्छ विस्मर्तव्या न सुन्दरी ॥१४९॥ इत्युक्त्वा मोचितः श्वश्र्वा खड्गं श्रीचण्डहस्तगम्। सुन्दर्यै निजमावेद्य श्रीदत्तः प्रययौ ततः ॥१५०॥ विवेश बाह्यां तामेव चिन्ताक्रान्तो निजाटवीम्। मृगाङ्कवत्याः पदवीं तस्या जिज्ञासितुं पुनः ॥१५१॥ निमित्तं च शुभं दृष्ट्वा तमेवोद्देशमाययौ। यत्रास्याश्वो मृतः सोऽथ यत्र सा हारिता वधूः ॥१५२॥ तत्र चैकं ददर्शार्त्तस्तुलुब्धकं सम्मुखागतम्। दृष्ट्वा च पृष्टवांस्तस्याः प्रवृत्तिं हरिणीदृशः ॥१५३॥ किं श्रीदत्तस्त्वमित्युक्तो लुब्धकेन च तत्र सः। स एव मन्दभाग्योऽहमित्युवाच विनिश्वसन् ॥१५४॥ ततः स लुब्धकोऽवादीत्सखि वच्मि सखे! शृणु। दृष्टा सा ते मया भार्या क्रन्दन्ती त्वामितस्ततः ॥१५५॥ पृष्ट्वा ततश्च वृत्तान्तमाश्वास्य च कृपाकुरुः। निजां पल्लीमितोऽरण्याद्दीनां तां नीतवानहम् ॥१५६॥ तत्र चालोक्य तरुणान्पुलिन्दांत्सभयेन सा। मथुरानिकटं ग्रामं नीता नागम्बरुं मया ॥१५७॥

द्वितीय लम्बक १५१

द्वितीय लम्बक १५१ चूंकि तुम्हें देवी के सम्मुख बलिदान के लिए निश्चित किया गया है इसीलिए अच्छे भोजन और वस्त्रों से तुम्हारा सत्कार किया जा रहा है ॥१४३॥ यदि तुम मानो तो तुम्हारी मुक्ति का एक उपाय है। वह यह कि इस भिल्लराज की सुन्दरी नाम की एक कन्या है॥१४४॥ वह तुम्हें देख अत्यन्त कामातुर हो रही है। मेरी उस सहेली को यदि तुम पत्नी बना लो तो तुम्हारा कल्याण होगा ॥१४५॥ धीवर ने भी उसके इस प्रस्ताव को स्वीकार कर गान्धर्व विधि से उस भिल्लराज की कन्या के साथ गुप्त विवाह कर उसे पत्नी बना लिया॥१४६॥ वह सुन्दरी प्रतिदिन रात में धीवर के बन्धन खोल देती थी इस प्रकार कुछ दिनों में वह गर्भवती हो गई॥१४७॥ कुछ समय के अनन्तर सुन्दरी की माता ने मोचनिका से सब समाचार ज्ञात किया और वह जामाता के स्नेह से बोली—बेटा ! धीचण्डनामक सुन्दरी का पिता अति क्रोधी है, वह तुम्हें छोड़ेगा नहीं अतः तुम जाओ किन्तु सुन्दरी को मत भूलना ॥१४८-१४९॥ ऐसा कहकर सास के द्वारा कैद से छुड़ाया गया धीवर भिल्लराज के हाथ लगे अपने कङ्कण के लिए सुन्दरी को समझाकर, चिन्ता से आक्रान्तहृदय होकर, मृगांकवती का पता लगाने के लिए फिर उसी विन्ध्यारण्य में गया ॥१५०-१५१॥ चलने के समय शुभ शकुनों को देखकर वह फिर उसी स्थान पर आ गया जहाँ घोड़ा मरा था और जहाँ से मृगांकवती खो गई थी॥१५२॥ वहाँ पर एक व्याध (बहेलिया) को सामने आते हुए देखकर धीवर ने उससे मृगभवनी का समाचार पूछा ॥१५३॥ 'क्या तुम्हीं धीवर हो ?' बहेलिये के इस प्रकार पूछने पर धीवर ने लम्बी सांस लेते हुए कहा 'हाँ मैं ही वह अभागा हूँ' ॥१५४॥ तब बहेलिये ने कहा 'मित्र बताता हूँ सुनो। तुम्हारा नाम लेकर विलाप करती हुई तुम्हारी भार्या को इधर-उधर भटकते हुए देखा तो मैंने उससे सारे समाचार जानकर और धीरज बँधाकर (समझा-बुझाकर) यथावत् उसे मैं अपने गाँव ले गया॥१५५-१५६॥ वहाँ गाँव में जबान भीलों को देखकर उनके भय से मैं उसे मथुरा के समीप नागस्थल नामक स्थान को ले गया ॥१५७॥

१५२ कथासरित्सागरे

१५२ कथासरित्सागरे तत्र च स्थापिता गेहे स्थविरस्य द्विजन्मनः । विश्वदत्ताभिधानस्य न्यासीकृत्य सगौरवम् ॥१५८॥ ततश्चाहमिहायातो वुबुद्ध्वा त्वन्नाम तन्मुखात् । तामन्वेष्टुं ततो गच्छ शीघ्रं नागस्थलं प्रति ॥१५९॥ इत्युक्तो लुब्धकेनाथ स श्रीदत्तस्ततो ययौ । तं च नागस्थलं प्रापवपरेद्युर्विनात्यये ॥१६० ॥ भवनं विश्वदत्तस्य प्रविश्याथ विलोक्य तम् । ययाचे देहि मे भार्या लुब्धकस्थापितामिति ॥१६१॥ तच्छ्रुत्वा विश्वदत्तस्तं श्रीदत्तं निजगाद सः । मथुरायां सुहृन्मेऽस्ति ब्राह्मणो गुणिनां प्रियः ॥१६२॥ उपाध्यायश्च मन्त्री च शूरसेनस्य भूपतेः । तस्य हस्ते त्वदीया सा गृहिणी स्थापिता मया १६३॥ अयं हि विजनो ग्रामो न तत्रक्षाक्षमा भवेत् । तत्प्रातस्तत्र गच्छ त्वमद्य क्षम्यतामिह ॥१६४॥ इत्युक्तो विश्वदत्तेन स नीत्वाथ तां निशाम् । प्रातः प्रतस्थे प्रापञ्च मथुरामपरे दिने ॥१६५॥ दीर्घाध्वम्लानस्तस्मिन्नगरे बहिरेव सः । स्नानं चक्रे परिश्रान्तो निर्मले दीर्घिकाजले ॥१६६॥ सत एषाम्बुमध्याच्च वस्त्रं चौरनिवेष्टितम् । प्राप्तवानञ्चलप्रन्थिबद्धहारमसञ्जितम् ॥१६७॥ अथ तद्वस्त्रमादाय स तं हारमलक्षयन् । प्रियां दिवृक्षुः श्रीदत्तो विवेश मथुरां पुरीम् ॥१६८॥ तत्र तत्प्रत्यभिज्ञाय वस्त्रं हारमवाप्य च । स चौर इत्यवष्टभ्य निग्ये नगररक्षिभिः ॥१६९॥ दर्शितश्च तथाभूतो नगराधिपतेश्च तैः । तेनाप्यावदिता राजे राजाप्यस्याविदधाद् वधम् ॥१७०॥ ततो वध्यभुवं हन्तुं नीयमानं ददर्श तम् । सा मृगाङ्कवती दूरात् पश्चादाहतडिण्डिमम् ॥१७१॥ योऽयं मे नीयते भर्ता वधायेति ससम्भ्रमम् । सा गत्वा मन्त्रिमुख्यं तमब्रवीद्गृह स्थिता ॥१७२॥

द्वितीय लम्बक १५३

द्वितीय लम्बक १५३ वहाँ (नागस्थल में) मैंने उसे विश्वदत्त नामक वृद्ध ब्राह्मण के घर में गौरव के साथ धरोहर के रूप में रख दिया है। उसी से तुम्हारा नाम जानकर मैं तुम्हें ढूँढ़ने के लिए यहाँ आया हूँ ॥१५८-१५९॥ बहेलिये से इस प्रकार कहा गया धीरदत्त शीघ्र ही वहाँ से चल पड़ा और दूसरे दिन सायंकाल नागस्थल पहुँच गया ॥१६०॥ वहाँ विश्वदत्त के घर आकर और उससे मिलकर धीरदत्त ने कहा कि 'बहेलिये द्वारा रखी गई मेरी भार्या मुझे दे दो' ॥१६१॥ यह सुनकर विश्वदत्त ने धीरदत्त से कहा— मथुरा में मेरा एक मित्र गुणग्राही ब्राह्मण है। वह उपाध्याय है और राजा शूरसेन का मन्त्री भी है। मैंने उसी के पास तुम्हारी पत्नी को रख दिया है ॥१६२-१६३॥ यह ग्राम निर्जन है अतः यहाँ उसकी रक्षा सम्भव न थी। अब तुम प्रातःकाल वहाँ जाओ। आज यहीं विश्राम करो ॥१६४॥ विश्वदत्त से इस प्रकार कथित धीरदत्त उस रात को वहीं बिताकर दूसरे दिन प्रातःकाल मथुरा पहुँचा ॥१६५॥ लम्बे रास्ते के कारण मैला-कुचैला तथा थका हुआ धीरदत्त नगर के बाहर ही ठहर गया और निर्मल बावली के जल में स्नान करने लगा ॥१६६॥ स्नान करते हुए उसे चोरों द्वारा बावली में छिपाये हुए कुछ वस्त्र मिले जिनकी गाँठ में एक बहुमूल्य हार बँधा हुआ था। उसे धीरदत्त ने वहीं देखा ॥१६७॥ उन कपड़ों को लेकर मृगांकवती से मिलने की इच्छा से धीरदत्त ने मथुरा में प्रवेश किया ॥१६८॥ नगर में जाने पर सिपाहियों ने उन कपड़ों और उसकी गाँठ में बँधे हुए चोरी के हार को पाकर धीरदत्त को पकड़ लिया और उसे सामान के सहित नगराधिपति के सामने उपस्थित किया ॥१६९॥ इसने (नगराधिपति ने) राजा से निवेदन किया और राजा ने उसे (धीरदत्त को) फाँसी के लिए सिपाहियों को आदेश दे दिया ॥१७०॥ पीछे-पीछे बज रही ढग-ढगी के साथ फाँसी के स्थान पर ले जाये जाते हुए धीरदत्त को देखकर मृगांकवती ने राज्य के उस दूसरे मुख्यमन्त्री से जिसके घर में वह ठहरी थी, जाकर कहा कि 'मेरा पति फाँसी पर लटकाने के लिए ले जाया जा रहा है' ॥१७१-१७२॥ २