कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
पंचम लम्बक ५७
पंचम लम्बक ५७ तदुपरान्त वह शिव और माधव परस्पर मिलकर पुरोहित का धन उड़ाते हुए स्वतन्त्र रूप से रहने लगे ॥१७६॥ कुछ समय के पश्चात् पुरोहित रत्न और आभूषण बेचकर रुपये लेने के लिए जौहरी के बाजार में गया और उन आभूषणों में से एक कड़ा या हाथ का कंगन बेचने लगा ॥१७७॥ वहाँ पर रत्नपरीक्षक जौहरियों ने उसको परीक्षा करके पुरोहित से कहा—'यह कौन चतुर कारीगर है जिसने इस नकली माल को बनाया है ॥१७८॥ भिन्न-भिन्न रंगों में रँगे हुए कांच और स्फटिक के टुकड़ों को पीतल में ऐसा जड़ दिया गया है कि वे सच्चे रत्न-से प्रतीत होते हैं। किन्तु ये सब नकली रत्न हैं असली एक भी नहीं ॥१७९॥ यह सुनकर घबराया हुआ पुरोहित घर से सब आभूषणों को लेकर माधव को दिखाने के लिए उसके पास ले गया ॥१८०॥ यह देखकर माधव बोला कि 'यह तो तुम्हारे ही सब असली गहन या आभूषण हैं। तुमने असली आभूषण पहले ही निकाल लिये और नकली बनवाकर रख दिये ॥१८१॥ यह सुनकर पुरोहित पर मानो वज्रपात-सा हुआ और वह तुरन्त शिव के पास जाकर कहने लगा कि अपने आभूषण ले लो और मेरा धन मुझे दे दो ॥१८२॥ उत्तर में शिव ने कहा—अब मेरे पास तुम्हारा धन कहाँ रह गया वह तो मैंने इतने समय तक खा डाला' ॥१८३॥ इस प्रकार झगड़ते हुए वे दोनों शिव और पुरोहित माधव को साथ लेकर राजा के पास गये। राजा से पुरोहित ने प्रार्थना की—महाराज ! पीतल में विशेष प्रकार से जड़े हुए काँच और स्फटिक के रंगीन टुकड़ों से बने हुए नकली आभूषणों से मुझे ठगकर शिव ने मेरा सर्वस्व नष्ट किया' ॥१८४-१८५॥ तब शिव ने राजा से कहा—'राजन् ! मैं बाल्यावस्था से ही तपस्वी ब्रह्मचारी रहा। इसी ने आग्रह करके मुझ पर दान लेने के लिए बाध्य किया। मैंने इस सम्बन्ध में अपनी मूर्खता (अनभिज्ञता) बताते हुए इससे उसी समय कह दिया था कि मैं रत्न और सोने के सम्बन्ध में सर्वथा अनभिज्ञ हूँ और मुझे इनका कुछ पता नहीं। इस सम्बन्ध में मुझ जैसा समझो करो ॥१८६-१८८॥ 'मैं तुम्हारे कथन से तृप्त हो गया हूँ'—इसने इस बात को स्वीकार किया था। इसीलिए मैंने दान लेकर उसे उसी समय इसे सौंप दिया था ॥१८९॥
गताजन पुरीतं गच्छन्तो मुञ्चन य प्रभो। भिदन पादयोरत्र त्यक्तसङ्गिस मिष॥१२०॥ पन्था पदं गणय्य परं प्रानाय्यत प्रभु। तव शिर गतालोकात्तन्नाम स च मापय ॥१२१॥ परमान्ति मान्येऽन्यमरण्यो ममान च। न गृहीतं मदा किञ्चिद् भरता वा विस्रज्य वा॥१२२॥ पश्चात् पश्चादनुव्रज्य मामाहारं विधत्सन्। मनः संशय मानीत महा भाग विनिर्गमन्॥१२३॥ यद्य दो यन्मदत्तं म च स्नानि तानि यद्। शङ्कितानिस्ततोऽनानां प्रवनात्तु स पश्यन्॥१२४॥ निर्व्याजं भजन मानं च प्रत्यया मम। दत्तः पञ्चादिशोऽस्मि दशगणविपुस्तगम् ॥१२५॥ जन्निप्रवणस्त्वामस्याय यद माधवा व्रजन् मागंणां चा गदा तस्य सुधार षा॥१२६॥ परम तत्त्वं विनिश्चयाधस्त्वं नित्यन्तः बार परिहृत्य समार्गात् सनार्थमन्चितः॥१२७॥ पुराण्डि माथ दत्तो जरितार्थो विरञ्चितः। काल वि मानं रघुतिस्यानपङ्किलः॥१२८॥ तो व पृथ्वी मन्वाग मन्दानु विरमादशे। ऽनेकशतसहस्रान्तर्भावितानो विमृष्टः॥१२९॥ एव मन्वान सविद्वान कर्म नयम्। अनाशानैः १ पूर्णां कातश पावन २४॥ ॥ लब्धं लब्धं कस्यैचिद् दर्शितं वपुः। राजोऽथ कस्यचित् तस्मै व्यभाष्ट विलोकिनः ॥२५॥ स महामुनेः रूपं दृष्ट्वा सुदृष्टवान्। किञ्चिदुवाच तत् सर्वं शृणुध्वं सविस्तरम् विदाः ॥ ॥ रतिवर्मसुतो राजा रतिषेणोऽभवत् पुरा। विदेह विषये पूर्वं नगरे पुरसञ्चये ॥ पुरन्दर इवासीत् सौन्दर्येण समो नृणाम्। प्रियंवदस्य नृपतेः प्रियंवदाभवत् सुता ॥
पंचम लम्बक ५०९
पंचम लम्बक ५०९ इसने अपने इच्छानुसार ही उसका मूल्य देकर वह मुझसे खरीद किया। इस विषय में हम दोनों के क्रय-विक्रय-सम्बन्धी लिखित प्रमाण भी सुरक्षित हैं॥१९१॥ अब क्या करना चाहिए, यह आप स्वयं जानते हैं। ऐसा कहकर शिव के चुप हो जाने पर पुरोहित से माधव कहने लगा—'ऐसा न कहो। मेरा इसमें क्या अपराध है। न मैंने तुम्हारा कुछ लिया है और न शिव का॥१९१ १ २॥ यह मेरा पैतृक धन यहीं अमानत में रखा था। मैंने उसे लाकर पुरोहित को दे दिया। और पुनः उसी के नाम पर मैंने ब्राह्मण को दान दे दिया। यदि यह आपकी मातृगण नहीं है तो मुझे सीसा और पीतल के दान देने का क्या फल होगा॥१ ९४॥ मैंने निष्कपट भाव से दान दिया और परिणामस्वरुप तत्काल ही भीषण रोग से छुटकारा भी पा गया। इसलिए मुझे तो अपने दान पर पूरा विश्वास है'॥१९५॥ इस प्रकार अपनी मुखमुद्रा को बिना किसी रूप में विकृत किये स्वाभाविक रूप से माधव के कहने पर मंत्रियों के साथ राजा हँसने लगा॥१९६॥ तब सभी सभासदों ने मन ही मन मुस्काते हुए कहा कि 'इसमें माधव या शिव का कोई अपराध नहीं है। सच है, अत्यन्त लोभ से अन्धा हो जाना किसके लिए विपत्ति का कारण नहीं होता है॥१९७॥ तदनन्तर वह पुरोहित अपना धन गंवाकर राज-दरबार से भी हँसी का पात्र बनकर अत्यन्त लज्जित होकर अपने घर आ गया॥१९८॥ वे दोनों धूर्त शिव और माधव प्रसन्न राजा की कृपा से आनन्द लेते हुए उसी उज्जयिनी में आनन्दपूर्वक रहने लगे॥१९९॥ इस प्रकार इस कथा को सुनाकर राजकुमारी ने अपने पिता से कहा कि 'इसी प्रकार इस पृथ्वी पर आग (दाव) से जीनेवाले धूर्त अपनी जिह्वा के जाल बुनते रहते हैं जिसमें सरल- हृदय मनुष्य मछलियों के समान फँसते रहते हैं॥२००॥ इसी प्रकार 'मैंने कनकपुरी देखी है'—ऐसा कहकर यह धूर्त ब्राह्मण मुझे ठगकर मुझ और युवराज-पद को प्राप्त करना चाहता है॥२०१॥ इसलिए मेरे विवाह के लिए तुम्हें शीघ्रता न करनी चाहिए। अभी मैं कुमारी अवस्था में ही हूँ। देखती हूँ क्या होता है ॥२०२॥ कन्या कनकप्रभा के इस प्रकार कहने पर राजा सोच-विचार करने लगा—'बेटी! युवावस्था में अधिक समय तक कन्या बना रहना उचित नहीं है। गुप्त में दाह करनेवाले मत्सरी व्यक्ति मिथ्या कलंक लगा देते हैं॥२ १२ ४॥
५१ कथासरित्सागर
५१ कथासरित्सागर उत्तमस्य विशेषेण कलङ्कोत्पादको जनः। हरस्वामिकथामत्र शृण्वेतौ कथयामि ते ॥२५॥ हरस्वामिनः कथा गङ्गोपकण्ठे कुसुमपुर नामास्ति यत्पुरम्। हरस्वामीति कोऽप्यासीत्तीर्थार्थी तत्र तापसः ॥२६॥ स भैक्षवृत्तिर्विप्रोऽत्र गङ्गातीरे कृतोटजः। सप्रकर्षाल्लोकस्य गौरवास्पदतां ययौ ॥२७॥ कदाचिच्चात्र तं दृष्ट्वा दूराद् भिक्षाविनिर्गमम्। जनमध्ये जगादैदस्तद्गुणासहनः खलः ॥२८॥ अपि जानीथ ज्ञातोऽयं कीदृक्कपटतापसः। अनेनैवार्मकाः सर्वे नगरेऽमुत्र भक्षिताः ॥२९॥ तच्छ्रुत्वा च द्वितीयोऽत्र तमायोधत तादृशः। सत्यं श्रुतं मयाप्येतदुच्यमानं जनैरिति ॥३०॥ एवमेतदिति स्माह तृतीयोऽपि समर्थयन्। वञ्चनात्यार्यपरीवादं खलस्वभावशृङ्खला ॥३१॥ तेनैव च क्रमेणैषा गता कर्णपरम्पराम्। प्रवादा बहुलीभावं सर्वत्राऽत्र पुरे ययौ ॥३२॥ पौराश्च सर्वे गेहेभ्यो बलाद् बालान सारयन्। हरस्वामी शिशून् नीत्वा भक्षयत्यखिलानिति ॥३३॥ ततश्च ब्राह्मणास्तत्र सन्ततिक्षयभीरवः। सम्भूय मन्त्रयामासुः पुरातस्य प्रवासनम् ॥३४॥ ग्रसेत कुपितः सोऽस्मानिति साक्षाद् भयान्न ते। यदा तस्याशकन् वक्तुं दूतान् विससृजुस्तदा ॥३५॥ स च गत्वा सदा धूता दूरादेव समब्रुवन्। नगराद् गम्यतामस्मादिरापाङ्कस्त्वं द्विजातम ॥३६॥ किं निमित्तमिति प्रोक्ता विस्मितमाथ सन तः। पुनरुचुस्त्वमश्नासि बालकांमिहति तम् ॥३७॥ तच्छ्रुत्वा स हरस्वामी स्वय प्रत्ययानयच्छया। विप्राणां निकटं तेषां भीतिनदयग्रनो ययौ ॥३८॥
मैं तुम्हें हरस्वामी की एक कथा सुनाता हूँ, सुनो' ॥२ ५॥
विशेषकर उच्च व्यक्तियों को तो अधिकतर झूठे ही कलंकित कर देते हैं। इस प्रसंग में मैं तुम्हें हरस्वामी की एक कथा सुनाता हूँ, सुनो' ॥२ ५॥
हरस्वामी की कथा
गंगा के तट पर कुसुमपुर¹ नाम का जो नगर है, उसमें हरस्वामी नाम का एक तपस्वी तीर्थ-यात्री रहता था॥२ ६॥ वह भिक्षावृत्ति से जीवन-निर्वाह करता हुआ वहीं पर्णकुटी बनाकर रहता था। वह अपनी कठोर तपस्या के प्रभाव से जनता के सम्मान एवं श्रद्धा का भाजन बन गया॥२ ७॥ एकबार भिक्षा के लिए निकले हुए उस शूर से जलकर उससे ईर्ष्या करनेवाले एक दुष्ट ने लोगों के सम्मुख कहा—॥२ ८॥ 'क्या आप लोग जानते हैं कि यह कैसा कपटी तपस्वी है। इसी ने इस नगर के सभी बच्चों को खा डाला' ॥२ ९॥ यह सुनकर उसी के समान एक दूसरा मनुष्य बोला—'सच है, मैंने भी लोगों को ऐसा कहते हुए सुना है' ॥२१०॥ 'यह ठीक है' इन शब्दों से एक तीसरे ने भी उसका समर्थन किया। कारण यह है कि दुष्टों की चर्चा सज्जन व्यक्तियों की निन्दा की लड़ी बाँध देती है॥२११॥ इसी क्रम से यह चर्चा (अफवाह) सारे नगर में फैल गई। फलतः उसने व्यापक रूप धारण कर लिया॥२१२॥ नगरनिवासी अब अपने बच्चों को घरों से निकलने नहीं देते थे कि 'हरस्वामी बच्चों को ले जाकर खा जाता है॥२१३॥ तब नगर के ब्राह्मणों ने बच्चों के भय से डरकर एक गोष्ठी करके निश्चय किया कि जिससे हरस्वामी को नगर से निकाल दिया जाय॥२१४॥ यह निश्चय करके भी भयभीत ब्राह्मण उससे स्पष्ट रूप से यह कहने में डरते थे कि कहीं वह हम लोगों को ही न खा जाय। इसलिए दूतों के द्वारा वे ब्राह्मण उसके पास सन्देश भेजने लगे। वे दूत दूर से ही उस हरस्वामी से कहने लगे कि 'तुम इस नगर से बाहर चले जाओ। ऐसा तुम्हें ब्राह्मणों ने कहलाया है' ॥२१५-२१६॥ आश्चर्यचकित हरस्वामी के यह पूछने पर कि 'किस कारण मुझे निकाला जा रहा है' दूतों ने उत्तर दिया कि 'तुम यहाँ छोटे बच्चों को खा जाते हो' ॥२१७॥ यह सुनकर वह स्वयं विश्वास दिलाने के लिए ब्राह्मणों के पास गया, जब कि उसके भय से वे लोग दूर भाग रहे थे॥२१८॥
१. कुसुमपुर = फूलों का नगर, आधुनिक पटना नगर। २. गोष्ठी = सभा, समिति (Meeting)।
५१२ कथासरित्सागर
५१२ कथासरित्सागर विप्रांश्चापारुहंस्त्रासात् दृष्ट्वैव मथोपरि। प्रवादमोहित प्रायो न विचारक्षमो जनः॥२१९॥ अथ द्विजान् हरस्वामी तानेकमधःस्थितः। नामग्राहं समाहूय स जगादोपरि स्थितान्॥२२०॥ कोऽयं मोहोऽद्य वो विप्रा नावेक्षध्वं परस्परम्। कियन्तो बालकाः कस्य मया कुत्र च भक्षिताः॥२२१॥ तच्छ्रुत्वा यावदन्योन्यं विप्रा परिमृशन्ति ते। तावत्सर्वेऽपि सर्वेषां जीवन्तो बालका स्थिताः॥२२२॥ क्रमाभियुक्ताश्चान्येऽपि पौरास्तत्र तथैव तत्। प्रत्यपद्यन्त सर्वेऽपि सविप्रवणिजोऽब्रुवन्॥२२३॥ अहो विमूढैरस्माभिः साधुर्मिथ्यैव दूषितः। जीवन्ति बालाः सर्वेषां तत्कस्यानेन भक्षिताः॥२२४॥ इत्युक्तवत्सु सर्वेषु हरस्वामी तथैव सः। सम्पन्नशुद्धिर्नगरात् गन्तुं प्रवृवृते ततः॥२२५॥ दुर्जनोत्पादितापद्यविरक्तीकृतचेतसा । मविवेकिनि दुर्देशे रतिः का हि मनस्विनः॥२२६॥ ततो वणिग्भिर्विप्रैश्च प्रार्थितश्चरणानतैः। कथञ्चित् स हरस्वामी तत्र वस्तुममन्यत॥२२७॥ इत्थं सञ्चरितावलोकनमसद्विशेषवाञ्छिता मिथ्यावूपजमेवमेव ददति प्रायः सतां दुर्जनाः। किञ्चित्कि पुनराप्नुवन्ति यदि ते तत्रावकाशं ममाग् द्रष्टुं तज्ज्वलितज्वाले निपतितं प्राप्याग्मघारोत्करम्॥२२८॥ तस्माद् विद्यालयमितुमच्छसि मां यदि त्वं वत्से ! वर्तुमर्हसि नूतनयौवनऽस्मिन्। न स्वेच्छमर्हसि चिरं खलु कन्यकात्वं भासयितुं सुलभदुर्भनपुष्प्रवादम्॥२२९॥ इत्युक्ता नरपतिना पित्रा प्रायेण कनकरेखा सा। निजगाद राजतनया तमवस्थितनिश्चया भूयः॥२३०॥ दृष्ट्वा कनकपुरीं सा विप्रेण क्षत्रियण वा यतः। तर्हि तमाशु गवेषय तस्मै मां देहि भाषितं हि मया॥२३१॥
पंचम लम्बक ५१३
पंचम लम्बक ५१३ उसे आते देखकर वे ब्राह्मण मठ के ऊपर भाग गये। सच है, अफवाहों से भीत व्यक्तियों में विचार करने का सामर्थ्य नहीं होता॥२१९॥ यह देखकर मन्द ही हँस हरस्वामी ने मठ के ऊपर चढ़े हुए ब्राह्मणों में से एक-एक का नाम लेकर बुलाया और कहा॥२२०॥ 'अरे ब्राह्मणो! यह क्या मूढ़ता तुममें आ गई है। क्या तुम परस्पर नहीं देख रहे हो कि मैंने कितने बच्चे कहाँ खाये ? ॥२२१॥ यह सुनकर जब सभी जाँच करने लगे तब देखा कि सभी के बच्चे जागते खेल रहे हैं॥२२२॥ तब सभी ब्राह्मण और वणिक विश्वस्त हुए और हरस्वामी की बात सच मानकर देखने लगे कि सभी के बालक जीवित हैं। तब वे कहने लगे कि 'हमने झूठे ही बेचारे तपस्वी को दूषित किया सभी के बच्चे तो जीवित हैं। तब किसके बच्चे इसने खाये ? ॥२२३-२२४॥ जब सभी एकस्वर से इस प्रकार कहने लगे तब निष्कलंक हरस्वामी उस नगर से जाने को उद्यत हुआ क्योंकि पहले उठाई गई अपनी निन्दा से उसका मन विरक्त हो गया था॥२२५॥ स्वतन्त्र विचारवाले मनस्वी का दुष्ट देश में रहने वाले विचारहीनों के साथ प्रेम कैसे हो सकता है ? तदनन्तर चरणों में गिरे हुए ब्राह्मणों और वणिकों के प्रार्थना करने पर किसी प्रकार हरस्वामी ने वहाँ रहना स्वीकार किया॥२२६-२२७॥ इस प्रकार सज्जनों के सच्चरित्रों को देखकर जलते हुए तथा उनकी नाना प्रकार से निन्दा करते हुए दुष्टजन सज्जनों को प्रायः झूठे कलंक लगा देते हैं। यदि उन्हें सचमुच ही कोई छोटा-सा भी अवसर मिल जाय तो वह उनके लिए जलती हुई आग में घी का-सा काम करता है॥२२८॥ इसलिए हे बेटी! यदि तू मेरे हृदय का काँटा निकालकर मुझे स्वस्थ देखना चाहती है, तो इस उमड़ते हुए नव यौवन में अपनी इच्छा से कुमारी नहीं रह सकती। यह दुष्ट लोगों के लिए निन्दा करने का सुलभ अवसर है' ॥२२९॥ राजा से इस प्रकार कही गई कनकरेखा अपने दृढ़ निश्चय के साथ फिर राजा से बोली कि 'जिस ब्राह्मण या क्षत्रिय युवक ने वह कनकपुरी देखी हो उसे शीघ्र ढूँढ़ो और मुझे उसके लिए दान कर दो। यह मैंने पहले ही कह दिया है' ॥२३०-२३१॥ ६५
५१४ कथासरित्सागर
५१४ कथासरित्सागर तच्छ्रुत्वा दृढनिश्चयां विगणयञ्जातिस्मरां तां सुताम् नास्याश्चायमभीष्टमर्थघटने पश्यन्नुपायक्रमम्। देशे सत्र ततः प्रभृत्यनुदिनं प्रष्टुं नवागन्तुकान्। भूयो भूमिपतिः स नित्यपटहप्रोद्घोषणामादिशत् ॥२१२॥ ‘यो विप्रः क्षत्रियो वा ननु कनकपुरीं दृष्टवान्सोऽभिधत्तां तस्मै राजा किल स्वां वितरति तनयां यौवराज्येन साकम्’ । सर्वत्राघोष्यतैव पुनरपि पटहानन्तरं नाप दास्य श्च त्वेकः कोऽपि साक्षात्कृतकनकपुरीदर्शनो लभ्यते स्म॥२१३॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे चतुर्दारिकालम्बके प्रथमस्तरङ्गः।
द्वितीयस्तरङ्गः कनकपुरीदर्शनार्थं शक्तिदेवस्य प्रस्थानम् अत्रान्तरे द्विजयुवा शक्तिदेवः स दुर्मनाः। अचिन्तयदभिप्रतराजकन्यावमानितः ॥१॥ मयेह मिथ्याकनकपुरीदर्शनवादिना। विमानना परं प्राप्ता न त्वसौ राजकन्यका॥२॥ तदेतत्प्राप्तये तावद् भ्रमणीया मही मया। यावत्सा नगरी दृष्टा प्राणैरपि गतैर्मम॥३॥ तां हि दृष्ट्वा पुरीमस्य तत्पणोपार्जितां न चेत्। रुन्धेय राजतनयामहं किं जीवितेन तत् ॥४॥ एवं कृतप्रतिज्ञः सन् वर्धमानपुरात्ततः। दक्षिणां दिशमारभ्य स प्रतस्थे स ततो द्विजः ॥५॥ क्रमञ्च गच्छंश्च प्राप गोव्यं विन्ध्यमहाटवीम्। विवेश च निजां वाञ्छामिव तां गहनायताम् ॥६॥ तस्यां च मारुताधूतमुदुपाञ्चत्पल्लवैः। वीजयन्त्यामिवात्मानं तज्जमश्रकरोस्तरः ॥७॥ भूरिखोरपशभूतिदुःखान्दि दिवानिशम् । श्रोदन्यो तीव्रमद्वान्द्रिह्व्यमानमृपारवः ॥८॥
पंचम लम्बक ५१५
पंचम लम्बक ५१५ राजा ने पूर्वजन्म का स्मरण करनेवाली उस कन्या को अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ देखकर और उसके मनानुकूल वर मिलने में कोई दूसरा उपाय न देखकर अपने देश में आये हुए यात्रियों के लिए प्रतिदिन इसी प्रकार का डिंडोरा पीटने की आज्ञा दे दी ॥२३२॥ 'जिस ब्राह्मण या क्षत्रिय युवक ने कनकपुरी देखी हो, वह बताये राजा उस युवराज-पद के साथ अपनी कन्या देंगे'। इस प्रकार ललकारने से सभी जगह घोषणा होने लगी किन्तु कनकपुरी देखा हुआ एक व्यक्ति भी नहीं मिल पाया ॥२३३॥ प्रथम तरङ्ग समाप्त। द्वितीय तरंग शक्तिदेव का कनकपुरी देखने के लिए जाना इसी बीच चाही हुई राजकन्या द्वारा अपमानित अतएव दुःखित वह युवक ब्राह्मण शक्ति- देव सोचने लगा ॥१॥ 'कनकपुरी मैंने देखी है'—इस प्रकार झूठ बोलकर मैंने उस राजकन्या के बदले अत्यन्त अपमान प्राप्त किया है ॥२॥ अत उस राजकन्या की प्राप्ति के लिए मुझे तबतक सारी पृथ्वी का चक्कर काटना पड़ेगा जबतक मैं उस नगरी को न देख लूँ या प्राणों का त्याग न कर दूँ ॥३॥ उस नगरी को देखकर उसी शर्त पर मैं राजकन्या को न ब्याह लूं, तो मेरे इस जीवन से ही क्या लाभ है ? ॥४॥ ऐसी प्रतिज्ञा करके वह उस वर्धमान नगर से दक्षिण दिशा का मार्ग पकड़कर चल पड़ा ॥५॥ क्रमशः चलते हुए उस शक्तिदेव को मार्ग में विन्ध्य भाग का महान् और घोर वन- प्रान्त मिला। वह ब्राह्मण-युवक अपनी लम्बी और दृढ़ इच्छा के समान उस महान् वनप्रान्त में प्रविष्ट हुआ ॥६॥ वायु से हिलाये गये कोमल पल्लवों से वह वन अत्यन्त उष्ण सूर्य की किरणों से सन्तप्त उसके शरीर पर मानों पंखा झल रहा था ॥७॥ सिंह आदि हिंस्र जन्तुओं से मारे जाते हुए मृग आदिकी करुण चीत्कारों के बहाने अनेका- नैक चोर-डाकुओं के पराभव-दुःख के कारण मानो वह वन दिन-रात रोता रहता था ॥८॥
स्वच्छन्दोच्छलदुद्दाममहामरुमरीचिभिः । भिगीषन्त्यामिवात्यूष्मव्याप्येव तेजांसि भास्वतः ॥९॥ जलसङ्गतिहीनायामप्यहो सुरुभापवि । सततोल्लङ्घ्यमानायामपि दूरीभवद्भुवि ॥१०॥ दिवसैर्बूरमध्वानमतिक्रम्य ददर्श सः । एकान्ते शीतलस्वच्छसलिलं सुमहत्सरः ॥११॥ पुण्डरीकोत्थितच्छत्रं प्रोल्लसद्धंसचामरम् । कुर्वन्तमिव सर्वेषां सरसामधिराजताम् ॥१२॥ तस्मिन्स्नानादिकं कृत्वा च तत्पार्श्वे पुनरुत्तरे । अपश्यदाश्रमपदं सफलस्निग्धपादपम् ॥१३॥ तत्राश्वत्थतरोर्मूले निषण्णं तापसंवृतम् । स सूर्यतपसं नाम स्थविरं मुनिमक्षत ॥१४॥ स्ववयोऽब्दशतग्रन्थिसङ्ख्येवाक्षमालया । जराधवलकर्णाग्रसस्थियिया विराजितम् ॥१५॥ प्रणामपूर्वकं तं च मुनिमभ्याजगाम सः । तेनाप्यतिथिसत्कारैर्मुनिना सोऽभ्यनन्द्यत ॥१६॥ अपृच्छ्यत च तेनैव सविभज्य फलादिभिः । कुत प्राप्तोऽसि गन्तासि क्व च मद्गोच्यतामिति ॥१७॥ वर्धमानपुरात्तावद् भगवन्नहमागतः । गन्तुं प्रवृत्तः कनकपुरीमस्मि प्रतिज्ञया ॥१८॥ न जाने क्व भवेत्सा तु भगवान्वस्तु वेत्ति चेत् । इति तं शक्तिदेवोऽपि स प्राज्ञो मुनिमभ्यधात् ॥१९॥ वत्स ! वर्षशतान्यष्टौ ममाश्रमपदे त्विह । व्यतिक्रान्तानि न च सा श्रुतापि नगरी मया ॥२०॥ इति सेनापि मुनिना गदितः स विषादवान् । पुनरेवाब्रवीत्तर्हि मृतोऽस्मि क्षमो भ्रमन्विह ॥२१॥ ततः श्रमण शान्तार्थं स मुनिस्तमभाषत । यदि ते निष्प्रपस्तर्हि यदहं वच्मि तत्कुरु ॥२२॥ अस्ति काम्पिल्यविषयो योजनानां शतद्वितः । त्रिषु तत्रोत्तरास्यादौ गिरिरस्त्यपि मध्यमः ॥२३॥
पंचम लम्बक ५१७
पंचम लम्बक ५१७ स्वतन्त्रता से उछलती हुई मरुभूमि की किरणों से वह वन मानों सूर्य के उग्र तेज को जीतना चाहता था॥९॥ जल के सम्पर्क से रहित निरन्तर चलते रहने पर भी समाप्त न होनेवाले एवं पग-पग पर विपत्तियों से भरे रम्य रास्तोंवाले उस वन को कुछ दिनों में लांघकर उसने एकान्त और शान्त स्थान में शीतल और स्वच्छ जल से भरे हुए एक बड़े सरोवर को देखा॥१०-११॥ उस सरोवर में खिले हुए कमल ऊपर उठे हुए छत्र के समान लग रहे थे और हंस-रूपी चँवर इधर-उधर चलायमान हो रहे थे। मानों वह सरोवर, सभी सरोवरों के राजा की शोभा धारण कर रहा था॥१२॥ शक्तिदेव ने उसमें स्नान आदि किया और तत्पश्चात् उसने उस सरोवर के उत्तर की ओर सफल एवं सघन वृक्षों से भरे हुए आश्रम-स्थल को देखा। उसमें एक पीपल-वृक्ष के नीचे अनेक तपस्वियों से घिरे हुए सूर्यतपा नामक ऋषि को देखा। वह ऋषि अपनी अवस्था के सौ वर्षों के समान मानों सौ गाँठों से गूँथी हुई एवं वृद्धावस्था से श्वेत कनपटी में लटकती हुई स्फटिक की माला से शोभित हो रहा था॥१३-१५॥ वह शक्तिदेव प्रणाम करके उस मुनि के समीप गया और मुनि ने भी अतिथि-सत्कार करते हुए उसका स्वागत किया॥१६॥ मुनि ने भोजन के लिए फल आदि देकर उससे पूछा—'हे भद्र कहाँ से आये हो और कहाँ जाओगे बताओ'॥१७॥ 'भगवन् ! मैं वर्धमान नगर से आया हूँ और प्रतिज्ञा करके कनकपुरी जाने के लिए उद्यत हूँ ॥१८॥ पता नहीं वह नगरी कहाँ है यदि आप जानते हों तो कृपाकर कहें। इस प्रकार नम्रता पूर्वक शक्तिदेव ने मुनि से कहा॥१९॥ 'बेटा मुझे इस आश्रम स्थान में एक सौ आठ वर्ष व्यतीत हो गये। आज तक मैंने कनक पुरी का नाम भी नहीं सुना। इस प्रकार मुनि से कहा गया शक्तिदेव अत्यन्त निराश और दुःखी हुआ॥२० ॥ तब फिर वह बोला-'यदि ऐसा है तो मैं इस पृथ्वी पर घूमते-घूमते मर जाऊंगा। क्रमशः उसकी सारी बातें सुनकर मुनि उससे बोला—'यदि तुम्हारा यह निश्चय है, तो मैं तुमसे कहता हूँ सुनो।' यहाँ से तीन सौ योजन (अर्थात् बारह सौ कोस) पर काम्पिल्य नाम का नगर है। वहाँ पर उत्तर नाम का पर्वत है उनमें एक आश्रम है॥२१ २३॥
५१८ कथासरित्सगर
५१८ कथासरित्सगर
सत्राथार्योऽस्ति मम भ्राता ज्येष्ठो दीर्घतपा इति। तत्पार्श्वं व्रज जानीयात्स वृद्धो जातु तां पुरीम् ॥२४॥ एतच्छ्रुत्वा सधृत्युक्त्वा जातास्त्यस्तत्र तां निशाम्। नीत्वा प्रतस्थे स प्रातः शक्तिदेवो द्रुतं सतः ॥२५॥ कृशातिक्रान्तकान्तारशतश्वासाद्य तं चिरात्। कामिल्यविषयं तस्मिन्नाहरोहोत्तरे गिरौ ॥२६॥ तत्र तं दीर्घतपसं मुनिमाध्यमवर्त्तिनम्। दृष्ट्वा प्रणम्य च प्रीतः कृतातिथ्यमुपाययौ ॥२७॥ व्यजिज्ञपच्च कनकपुरीं राजसुतोदिताम्। प्रस्थितोऽहं न जानामि भगवन्क्वास्ति सा पुरी ॥२८॥ सा च मेऽवश्यं गन्तव्या सतस्तुवुपलब्धये। ऋषिणा सूयतपसा प्रेषितोऽस्मि तवान्तिकम् ॥२९॥ इत्युक्तवन्तं तं शक्तिदेवं सोऽप्यब्रवीन्मुनिः। इयता वयसा पुत्र ! पुरी साद्य श्रुता मया ॥३०॥ देशान्तरागते के नैर्जाति परिचयो न मे। न च तां श्रुतवानस्मि दूरे तद्दर्शनं पुनः ॥३१॥ जामाम्यहं च नियतं दवीयसि तया क्वचित्। भाव्यं द्वीपान्तरे वत्स तत्रोपायं च वच्मि ते ॥३२॥ अस्ति वारिनिधेर्मध्ये द्वीपमुत्स्थलसंज्ञकम्। तत्र सत्यव्रताख्योऽस्ति निषादाधिपतिर्धनी ॥३३॥ तस्य द्वीपान्तरेष्वस्ति सर्वेष्वपि गतागतम्। तेन सा नगरी जातु भवेद्दृष्टा श्रुतापि वा ॥३४॥ तस्मात्प्रयाहि जलधेरुपकण्ठप्रतिष्ठितम्। नगरं प्रथमं तावद् विटङ्कपुरसंज्ञकम् ॥३५॥ तत केनापि वणिजा समं प्रवहणेन तत्। निषादस्यास्पदं गच्छ द्वीप तस्येष्टसिद्धये ॥३६॥ इत्युक्तस्तेन मुनिना शक्तिदेवः स तत्क्षणम्। तथेत्युक्त्वा तमामन्त्र्य प्रयाति स्म तदाश्रमात् ॥३७॥ काञ्चन प्राप्य चोत्लङ्घ्य दशान् कौशाम्बकूहस्ततः। वारिधेस्तीरतिलकं तद्विटङ्कपुरं परम् ॥३८॥
पंचम लम्बक ५१९
पंचम लम्बक ५१९ 'वहाँ पर मेरा माननीय बड़ा भाई दीर्घतपा नाम का ऋषि है। उसके पास जाओ। वह बहुत वृद्ध है। सम्भव है वह उस पुरी को जानता हो' ॥२४॥ यह सुनकर 'ठीक है' ऐसा कहकर और मुनि की बातों में विश्वास करके शक्तिदेव ने वह रात वहीं व्यतीत की और प्रातःकाल ही काम्पिल्य नगरी की ओर शीघ्रता से चला गया ॥२५॥ अनेक कष्टों से सैकड़ों दुर्गम पथ पार करते हुए बहुत दिनों के पश्चात् वह काम्पिल्य नगर में पहुँचा और उस पर्वत पर चढ़ा ॥२६॥ वहाँ जाकर उसने आश्रम में रहनेवाले दीप्ततपा मुनि को देखा और प्रणाम करके उसके समीप गया। मुनि ने भी उसका स्वागत किया ॥२७॥ तत्पश्चात् शक्तिदेव ने राजकुमारी द्वारा बताई हुई कनकपुरी नगरी के सम्बन्ध में निवेदन किया और कहा कि मैं उसी ओर जा रहा हूँ किन्तु ज्ञात नहीं कि वह नगरी कहाँ है ॥२८॥ मुझे वहाँ अवश्य जाना है। उसका पता प्राप्त करने के लिए ही सूर्यतप ऋषि ने आपके पास मुझे भेजा है ॥२९॥ इस प्रकार कहते हुए शक्तिदेव से मुनि ने कहा— बेटा ! इतनी लम्बी अवस्था में भी मैंने आजतक इस नगरी का नाम नहीं सुना था ॥३०॥ दूर-दूर देशों से आये हुए किन-किन से मेरा परिचय नहीं हुआ किन्तु किसी से भी यह नाम मैंने नहीं सुना दर्शन तो दूर की बात है ॥३१॥ बेटा ! मैं तो समझता हूँ कि वह दूर कहीं किसी दूसरे ही द्वीप में है। उसका उपाय तुम्हें बताता हूँ ॥३२॥ समुद्र के मध्य में उत्स्थल नाम का एक द्वीप है वहाँ न यदत्त नाम का एक धनी निषादराज है। उसका नाव सदा दूर-दूर के द्वीपों में आना-जाना है। इसलिए सम्भव है कि उसने वह नगरी कहीं देखी या सुनी हो। इसलिए तुम यहाँ से पहले समुद्र के गम्भीर-स्थित विटंकपुर नामक नगर को जाओ। वहाँ से किसी बनिये के साथ उसकी नाव में उस निषादराज के पास अपनी इष्टसिद्धि के लिए जाओ ॥३३-३६॥ इस प्रकार उस मुनि से कहा हुआ शक्तिदेव उसी समय मुनि से आज्ञा लेकर उसके आश्रम से चला गया ॥३७॥ क्रमानुक्रम से वह कष्टों से देशों और वनों को पार करके समुद्र-तट के भूषण उस विटंकपुर में पहुँचा ॥३८॥
५२ कथासरित्सागर
५२ कथासरित्सागर तस्मिन् समुद्रदत्ताख्यमुत्पलद्वीपयायिनम्। अविश्य वणिजं तेन सह सख्यं चकार सः॥३९॥ तदीयं यानपात्रं च समं समाधिरुह्य सः। तत्प्रीतिपूर्णपाथेयः प्रतस्थेऽम्बुधिवर्त्मना ॥४०॥ ततोऽन्यदेश गन्तव्ये समुत्तस्थावशक्तिकम्। काले विद्युल्लसज्जिह्वो गर्जज्जलधराक्षसः ॥४१॥ क्षुभ्यन्नुद्यम्य पाषाणानूरूनप्यवपातयन् । ववौ विधेरिवाऽरम्भः प्रचण्डश्च प्रभञ्जनः ॥४२॥ वाताहताश्च जलभूदतिष्ठन्महोर्मयः। आश्लेषाभिभवक्रोधादिव क्षमाः सपक्षकः ॥४३॥ ययौ च तत्प्रवहणं क्षणमूर्ध्वमधः क्षणम्। उच्छ्रायपातपर्य्याय¹ दक्षयद्वनितामिव ॥४४॥ क्षणान्तरं च वणिजामाक्रन्दस्तीव्रपूरितम्। भरादिव लघूत्पत्य वहनं सममज्जयत् ॥४५॥ मग्ने च तस्मिंस्तत्स्वामी स बणिक्पतितोऽम्बुधौ। तीर्णश्च फलकास्तम्बं प्राप्यान्यद् वहनं चिरात् ॥४६॥ शक्तिदेवः पतंस्तं सु तं व्यात्तमुखकन्दरः। अपरिक्षतसर्वाङ्गं महामत्स्यो निगीर्णवान् ॥४७॥ स च मत्स्योऽब्धिमध्येन तत्काल स्वच्छया चरन्। उत्पलद्वीपनिकटं जगाम विधियोगतः ॥४८॥ तत्र तस्यव कैवर्त्तपतेः सत्यव्रतस्य सः। शफरग्राहिमितृत्यैः प्राप्य दैवादगृह्यत ॥४९॥ ते च तं सुमहाकायं निन्युराकृष्य कौतुकात्। सर्वेष धीवरास्तस्य निजस्य स्वामिनोऽन्तिकम् ॥५०॥ सोऽपि तं तादृशं दृष्ट्वा तैरेव सकुतूहलः। पाठीनं पाटयामास मुख्यैः सत्यव्रतो निजैः ॥५१॥ पाटितस्योदराञ्जीवञ्छक्तिदेवोऽथ तस्य सः। मनुभूतापराश्चर्य्यगर्भवाशो विनिर्ययौ ॥५२॥ १ कर्मणित्पर्य्यः
पंचम लम्बक ५२१
पंचम लम्बक ५२१ वहाँ उसने पता लगाकर उत्पल द्वीप जानेवाले समुद्रदत्त नामक बनिये से मित्रता की और उसी के जहाज पर प्रेमपूर्ण पाथेय लेकर समुद्री मार्ग से वह उत्पल द्वीप को चला ॥३९-४०॥ समुद्र में कुछ दूर जाने पर बिजली-रूपी जीभ को लपलपाता हुआ काल-रूपी मेघ-घटाटोप एकाएक उमड़ पड़ा। साथ ही विधि के समान भारी को हल्का और हल्के को भारी करता हुआ प्रचंड पवन भी चलने लगा ॥४१-४२॥ समुद्र में वायु से विताड़ित बड़ी-बड़ी पर्वताकार लहरें उठने लगीं। मानो अपने आधार का अपमान होने के कारण पक्षाधारी पर्वत उठ खड़े हुए हों ॥४३॥ वह जहाज कभी ऊपर और कभी नीचे इस प्रकार उछलने लगा मानो बनिकों में उत्थान और पतन का आदर्श उपस्थित कर रहा हो ॥४४॥ कुछ ही समय में बनियों की चिल्लाहट से शब्दायमान वह जहाज मानो भार वहन न कर सकने के कारण टूट गया ॥४५॥ जहाज के टूटने पर उसका स्वामी एक तख्ते के सहारे तैरता हुआ दूसरे जहाज के मिल जाने पर उसके द्वारा पार हो गया ॥४६॥ गिरते हुए शक्तिदेव को मुँह बाये हुए एक बड़े मत्स्य (ह्वेल) ने समूचा ही निगल लिया ॥४७॥ वह मत्स्य समुद्र में स्वच्छन्दता से घूमता हुआ दैवयोग से उत्पल द्वीप के समीप जा पहुँचा ॥४८॥ वहाँ पर उसी मत्स्येन्द्र मण्डल के मछली पकड़नेवाले व्यक्तियों (केवटियाओं) द्वारा दैववश वह पकड़ लिया गया ॥४९॥ वे उस महामत्स्य को खींचकर अपने स्वामी मत्स्येन्द्र के पास ले गये ॥५०॥ मत्स्येन्द्र ने भी उस भारी मत्स्य को देखकर कौतुकवश उन दासों से उसे फड़वा दिया ॥५१॥ उसके फाड़ने पर, उसके पेट से आश्चर्यजनक दूसरे गर्भवास का अनुभव करनेवाला जीवित शक्तिदेव निकल पड़ा ॥५२॥ ६६
५२२ कथासरित्सागर
५२२ कथासरित्सागर निर्याति च कृतस्वस्तिकार तं च सविस्मयम् । युवानं वीक्ष्य पप्रच्छ दाशः सत्यव्रतस्ततः ॥५३॥ कस्त्वं कथं कुतश्चैषा शफरोदरशामिता । वृथास्त्वयाप्ता कोऽयं ते वृत्तान्तोऽप्यन्तमद्भुतः ॥५४॥ तच्छ्रुत्वा शक्तिदेवस्तं दाशेन्द्रं प्रत्यभाषत । ब्राह्मणः शक्तिदेवाख्यो वर्धमानपुरावहम् ॥५५॥ अवश्यगम्या कनकपुरी च नगरी मया । अजानानश्च तां दूराद् भ्रान्तोऽस्मि सुचिरं भुवम् ॥५६॥ ततो दीर्घतपोवाक्यात्सम्भाव्य द्वीपगां च ताम् । तज्जन्मज दाशपतेरस्यैतद्द्दीपवासिनः ॥५७॥ पार्श्वं सत्यव्रतस्याहं गच्छन्वहनभङ्गतः । मग्नोऽम्बुधौ निगीर्णोऽस्मि मत्स्येन प्रापितोऽधुना ॥५८॥ इत्युक्तवन्तं च शक्तिदेवं सत्यव्रतोऽब्रवीत् । सत्यव्रतोऽहमेवेन्द्रद्वीपे सम्मदमव ते ॥५९॥ किन्तु दृष्टा बहुद्वीपद्रुत्वेनापि१ न सा मया । नगरी त्वदभिप्रेता द्वीपान्तपु श्रुता पुन ॥६०॥ इत्युक्त्वा शक्तिदेवं च विषण्णं वीक्ष्य तत्क्षणम् । पुनरभ्यागतप्रीत्या तं स सत्यव्रतोऽभ्यधात् ॥६१॥ ब्रह्मन् ! मा गा विषादं त्वमिहैवाद्य निशां वस । प्रातः कश्चिन्दुपायं तं विधास्यामीप्सितद्धये ॥६२॥ इत्याश्वास्य स तेनैव दाशेन प्रहितोऽथ । मुख्यमातिथ्यसत्कारं द्विजो विप्रमठं ययौ ॥६३॥ तत्र मठासिनस्तेन कृताहारो द्विजन्मना । विष्णुदत्ताभिधानेन सह चक्रे कथाक्रमम् ॥६४॥ तत्प्रसङ्गाच्च तेनैव पृष्टस्तस्मै शशंस तत् । निजं दशं कृतं कृत्स्नं वृत्तान्तं च शनैः सः ॥६५॥ तद्बद्धया परिरभ्यमं विष्णुदत्तः स तत्क्षणम् । बभाषे हर्षवाष्पाम्बुधर्मराजशरर्जरम् ॥६६॥ शिष्या मातृष्वसुपुत्रस्त्वंमवत्त्वद्गमञ्च मे। १ दृष्टवत्तेत्यर्थः ।
पंचम लम्बक ५२१
पंचम लम्बक ५२१ मच्छ के पेट से निकले हुए और कल्याण-कामना करते हुए उस युवक को देखकर चकित सत्यव्रत ने पूछा—'हे ब्राह्मण ! तुम कौन हो ? कैसे हो ? इस मत्स्य के पेट में तुमने शयन कैसे किया ? तुम्हारा यह वृत्तान्त अत्यन्त अद्भुत है' ।।५३-५४।। यह सुनकर शक्तिदेव उस निषादराज से बोला—'मैं शक्तिदेव नामक ब्राह्मण वर्धमान नगर से आया हूँ। मुझे कनकपुरी अवश्य जाना है। उसका पता न जानने के कारण चिरकाल तक दूर-दूर घूमा हूँ। तत्पश्चात् दीर्घतपा मुनि के कथन से उसके किसी द्वीपान्तर में होने का अनुमान करके उत्पल द्वीप-निवासी निषादराज सत्यव्रत के पास जाने के लिए जहाज पर आया और जहाज के टूट जाने पर मुझे मत्स्य ने निगल लिया और उसीने मुझे यहाँ पहुँचा दिया' ।।५५- ५८।। इस प्रकार कहते हुए शक्तिदेव को सत्यव्रत ने पुनः कहा—'मैं ही सत्यव्रत हूँ और यही उत्पलक द्वीप है। किन्तु अनेक द्वीपों को देखनेवाले मैंने तुम्हारी ईप्सित कनकपुरी नहीं देखी है। हाँ द्वीपों के अन्त में है ऐसा सुना गया है' ।।५९-६०॥ उसके ऐसा कहने पर शक्तिदेव को निराश और खिन्न देखकर अतिथि-प्रेम से सत्यव्रत बोला—॥६१॥ 'हे ब्राह्मणदेवता खेद न करो। आज रात को यहीं निवास करो। प्रातःकाल तुम्हारी सफलता के लिए कोई उपाय करूँगा' ।।६२।। ऐसा आश्वासन देकर निषाद के द्वारा भेजा गया वह शक्तिदेव एक ब्राह्मण-मठ में गया जहाँ अतिथियों का सत्कार सुलभ था। उस मठ में रहनेवाले विष्णुदत्त नामक एक ब्राह्मण द्वारा भोजन कराने पर शक्तिदेव ने उसके साथ अपनी जीवन-चर्चा प्रारम्भ की ।।६३-६४।। उसका परिचय सुनकर तुरन्त ही विष्णुदत्त ने उसका आलिङ्गन करके हर्ष के आँसुओं के कारण रुँधे हुए कण्ठ से गद्गद होकर कहा—'भाग्य से तू मेरे मामा का लड़का (ममेरा भाई) है और हम दोनों एक ही देश में उत्पन्न हुए हैं ।।६५-६७।।
५२४ कथासरित्सागर
५२४ कथासरित्सागर अहं च बाल्य एव प्राक्तस्माद्देशादिहागतः ॥६७॥ तदिहस्वास्व न चिरात् साधयिष्यसि चात्र ते । इष्टं द्वीपान्तरगच्छद्वणिक्कणपरम्परा ॥६८॥ इत्युक्त्वानयमावेशं विष्णुदत्तो यथोचितम् । तं शक्तिदेवं तत्कारमुपचारमथाचरत् ॥६९॥ शक्तिदेवोऽपि सम्प्राप्य विस्मृताध्वक्लमो मुदम् । विदधे वायुलाभो हि मराब्मुसनिर्मंरः ॥७०॥ अमन्यत च निजाभीष्टसिद्धिमप्यनवर्तिनीम् । अन्तरापाति हि श्रेयः कार्यसम्पत्तिसूचकम् ॥७१॥ ततो रात्रावनिद्रस्य शयनीयं निपेयुषः । अभिवाञ्छितसम्प्राप्तिगतचित्तस्य तस्य सः ॥७२॥ शक्तिदेवस्य पार्श्वस्थो विष्णुदत्तः समथनम् । विनोदपूर्वकं कुर्वन्कथां कथितवानिमाम् ॥७३॥ अशोकदत्तस्य कपालस्फोटराक्षसाधिपतेश्च कथा पुरामूत् सुमहाविप्रो गोविन्दस्वामिसंज्ञकः । महाप्रहारे कालिन्द्या उपकण्ठनिवेशिनि ॥७४॥ जायेते स्म च तस्य द्वौ सदृशौ गुणशालिनः । अशोकदत्तो विजयदत्तश्चेति सुतौ क्रमात् ॥७५॥ कालेन तत्र वसतां तेषामजनि दारुणम् । दुर्भिक्षं तत्र गोविन्दस्वामी भार्यामुवाच सः ॥७६॥ अयं दुर्भिक्षदोषेण देशस्तावद् विनाशितः । तन्न शक्नोम्यहं द्रष्टुं सुहृद्बान्धवदुर्गतिम् ॥७७॥ दीयतां च कियत् कस्य तस्मादन्नं यदस्ति नः । तद्गृह्या मित्रबन्धुभ्यां व्रजामो विषयादितः ॥७८॥ वाराणसीं च मासाय सकुडुम्बा धयामहे । इत्युक्तया सोऽनुमतो भार्ययाऽस्मदाशिजम् ॥७९॥ सदारसुतभृत्यश्च स देशात्प्रययौ ततः । उत्सहन्ते न हि । द्रष्टमुत्तमाः स्वजनापदम् ॥८०॥
पंचम लम्बक ५२५
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मैं बहुत पहले अपने देश से यहाँ आ गया था। अब तुम यहीं रहो। शीघ्र ही द्वीपान्तरों से आनेवाले व्यापारी बनियों के कानों-कान तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा॥६७-६८॥ ऐसा कहकर अपने कुल का पता लगाकर विष्णुदत्त ने उस समय के योग्य उपचारों से शक्तिदेव की सेवा की॥६९॥ शक्तिदेव भी उसे पाकर मार्ग के दुःसह कष्टों को भूल गया। विदेश में अपने बन्धु जन का मिलना मरुभूमि में अमृत के झरने के समान सुखद होता है॥७०॥ उसने अपने अभीष्ट कार्य की सिद्धि को भी समीप आया हुआ समझा। किसी कार्य के प्रसंग के बीच में आनेवाला क्षेम कार्य की समृद्धि का सूचक होता है॥७१॥ तब रात्रि में शय्या पर लेटे हुए, अपनी कार्य-सिद्धि की चिन्ता में जागते हुए शक्तिदेव के पास सोया हुआ विष्णुदत्त उसकी कार्य-सिद्धि का समर्थन करता हुआ इस प्रकार की कथा उसको सुनाने लगा—॥७२-७३॥
अशोकदत्त और राक्षसराज कपालस्फोट की कथा
पुराने समय में यमुना नदी के तट पर एक विशाल गाँव में गोविन्दस्वामी नाम का एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहता था॥७४॥ उस गुणी ब्राह्मण के उसी के समान दो पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें बड़े का नाम अशोकदत्त और छोटे का नाम विजयदत्त था॥७५॥ उसके वहाँ रहते हुए दैवयोग से उस ग्राम में भीषण अकाल पड़ गया। तब गोविन्द स्वामी ने अपनी पत्नी से कहा—अकाल के कारण यह देश नष्ट हो रहा है। अतः मैं अपने सामने अपने मित्रों और बन्धु-बान्धवों की दुर्दशा नहीं देख सकता॥७६-७७॥ इसलिए हमारे घर में जितना अन्न है उसे 'किसे कितना देना है'—यह निश्चय करके मित्रों और बन्धुओं को दे डालो। तब यहाँ से किसी दूसरे देश को चलें॥७८॥ यहाँ से चलकर कुटुम्ब के साथ वाराणशी नगरी को चलें। इस प्रकार अपनी पत्नी से परामर्श करके उसने अपने घर का सारा अन्न बाँट दिया॥७९॥ तदनन्तर, अपनी स्त्री बालक और सेवक के साथ उस देश से चल पड़ा। उच्चकोटि के व्यक्ति अपने व्यक्तियों का कष्ट नहीं देखना चाहते॥८०॥
गच्छंश्च मार्गे जटिलं भस्मपाण्डुं कपालिनम्। सार्धचन्द्रमिवेशानं महाव्रतिनमक्षत॥८१॥ उपेत्य ज्ञानिनं तं च नत्वा स्नेहेन पुत्रयोः। शुभाशुभं स पप्रच्छ सोऽप्य योगी जगाद तम्॥८२॥ पुत्रौ त भाविकल्याणौ किं स्वनेन कनीयसा। ब्रह्मन्विजयदत्तेन वियोगस्ते भविष्यति॥८३॥ ततोऽन्याशोकदत्तस्य द्वितीयस्य प्रभावतः। एतेन सह युष्माकं भूयो भावी समागमः॥८४॥ इत्युक्तस्तेन गोविन्दस्वामी स ज्ञानिना सदा। मुमुचुः साद्भुताश्चान्तस्तमामन्त्र्य ततो ययौ॥८५॥ प्राप्य वाराणस्रीं तां च तद्वाह्ये चण्डिकागृहे। न्नि तत्प्रातिषेन्नाम देवीपूजादिकर्मणा॥८६॥ भाया च तत्रैव बहिः सकुडुम्बस्तरास्तलम्। समावसद कार्पटिकः सोऽन्यदेशागतैः सह॥८७॥ रात्रौ च तत्र सुप्तेषु सर्वेष्वधिगताध्वसु। श्रान्तेष्वास्तीर्णपर्णादिपान्थशय्यानिपातिषु ॥८८॥ तदीयस्य विबुद्धस्य तस्याकस्मात्कनीयसः। सूनोर्विजयदत्तस्य महान् शीतज्वरोऽजनि॥८९॥ स तमं सहसा भावि बन्धुविश्लेषहेतुना। भयेनेव ज्वरेणाभूदूर्ध्वरोमा सबाष्पयुः॥९०॥ शीतातंश्च प्रबोध्यैव पितरं स्वमवाच तम्। बाधत तात तीव्रो मामिह शीतज्वरोऽधुना॥९१॥ तन्मे समिधमानीय शीतघ्नं ज्वलयानलम्। नान्यथा मम शास्तिः स्यान्नयय न च यामिनीम्॥९२॥ तच्छ्रुत्वा तं स गोविन्दस्वामी तद्वेदनाकुलः। तावत्कुतोऽधुना वह्निर्वत्सेति च समन्यथात्॥९३॥ नन्वयं निकटे तात पश्यत्यग्निर्ज्वलन्नितः। भूमिष्ठेऽत्रव तद्गत्वा किं नाङ्गं तापयाम्यहम्॥९४॥ तस्मात् सकम्पं हस्ते मां गृहीत्वा प्रापय द्रुतम्। इत्युक्तस्तेन पुत्रेण पुनर्विप्रोऽपि सोऽब्रवीत्॥९५॥