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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

एक वही विष्णुदत्त अकेला जागता रहा क्योंकि जिस घर में वह ठहरा था उसमें एक उस युवती के अतिरिक्त दूसरा कोई पुरुष न था। मुग्ध जन निश्चेष्ट होकर सो जाते हैं किन्तु विचारशीलों को नींद कहाँ ? ॥६०॥ इसी बीच कोई एक युवा व्यक्ति छिपे तौर से उस स्त्री की कोठरी में स्त्री के पास गया ॥६१॥ गुप्त रूप से बातें करती हुई वह स्त्री उस पुरुष के साथ रमण करने लगी। कुछ समय पश्चात् रति की श्रान्ति एवं घोर नींद से विवश होकर वे दोनों सो गये ॥६२॥ विष्णुदत्त दरवाजे की दरार से दीपक के प्रकाश से प्रकाशित उस कोठरी में यह सब देखता रहा और दुःखी होकर सोचने लगा—॥६३॥ कष्ट है कि हमलोग इस दुराचारिणी स्त्री के घर में आ गये। निश्चय है कि यह इसका विवाहित पति नहीं है। यदि विवाहित पति होता तो इसकी गति इस प्रकार सशंक और छिपी न होती। मैंने पहले ही समझ लिया था कि यह स्त्री वंचका है। इस प्रकार सोचते-सोचते उसने घर के बाहर कुछ मनुष्यों के शब्द सुने ॥६४-६५॥ उसने अपनी-अपनी जगहों पर तैनात अनुचरों के साथ तलवार लेकर आते हुए भीलों के युवा सरदार को देखा ॥६६॥ 'तुम कौन कौन हो'—ऐसा पूछते हुए भीलराज से विष्णुदत्त ने कहा—'हमलोग पथिक (बटोही) हैं ॥६८॥ तदनन्तर अन्दर आकर और इस प्रकार प्रेमी (जार) के साथ सोई हुई देखकर भीलराज ने पत्नी के उस प्रेमी का सिर तलवार से काट डाला ॥६९॥ किन्तु स्त्री को न मारा और न जगाया। वह तलवार को भूमि पर रखकर पलंग पर सो गया ॥७०॥ दीप से प्रकाशित घर में इस घटना को देखकर विष्णुदत्त ने सोचा इसने उचित ही किया कि स्त्री समझकर पत्नी को नहीं मारा और उसका हरण करनेवाले को मार डाला ॥७१॥ किन्तु यह आश्चर्य है कि ऐसा कर्म करके भी यह विश्वासपूर्वक सो रहा है। बड़े हुए मनवालों का ऐसा पराक्रम अवश्य आश्चर्यजनक होता है ॥७२॥ विष्णुदत्त यह सोच ही रहा था कि उस दुष्टा स्त्री ने जागकर जार को मरा हुआ और पति को सोता हुआ देखा ॥७३॥ और, पलंग से उठकर अपने यार के शव को कन्धे पर रखकर एक हाथ से उसके सिर को लेकर वह घर से बाहर निकली ॥७४॥

७२८ कथासरित्सागर

७२८ कथासरित्सागर गत्वा बहिदृढं निक्षिप्य भस्मस्कूटान्तरे द्रुतम्। कबन्धं सशिरस्तं तमाययौ निभृतं ततः ॥७५॥ विष्णुदत्तश्च निर्गत्य सर्वं दूराद् विलोक्य सत्। मध्ये सखीनां सुप्तानां प्रविश्यासीत्तथैव सः ॥७६॥ स चागत्य प्रविश्याऽत्र पत्युः सुप्तस्य दुर्जनी। तेनैव तत्कृपाणेन तस्य मूर्धानमच्छिनत् ॥७७॥ निर्गत्य धावयन्ती च मृत्वाऽऽक्रन्दं चकार सा। हा हतास्मि हतो भर्त्ता ममैभिः पथिभैरिति ॥७८॥ ततः परिजनः श्रुत्वा प्रधाव्यालोक्य तं प्रभुम्। हतं तान्विष्णुदत्तादीनम्यधावन्नुदायुधः ॥७९॥ एतैश्चाहन्यमानेषु तेषु त्रस्तोत्थितेष्वथ। अन्येषु तत्सहायेषु विष्णुदत्तोऽब्रवीद्द्रुतम् ॥८०॥ अलं वो ब्रह्महत्यामिर्नैवास्माभिरिदं कृतम्। एतयैव कृतं ह्येतत्कुस्त्रियाऽप्रसभंस्तथा ॥८१॥ मया पाषावृतद्वारमार्गेणामूरुमीक्षितम् । निर्गत्य च बहिर्दृष्टं क्षमञ्चं यदि वच्मि सत् ॥८२॥ इत्युक्त्वा तान् स शबरान्विष्णुदत्तो निवार्य च। तेभ्यो निशोथमामूलाद् वृत्तान्तं तमवर्णयत् ॥८३॥ नीत्वा चादर्शयत्तेषां कबन्धं तं शिरोऽन्वितम्। सद्यो हृतं तया क्षिप्तं स्त्रिया सम्भिन्नवस्करम् ॥८४॥ तत स्वेन विवर्णेन मुखेनाङ्गीकृते तया। कुलटां तां तिरस्कृत्य सर्वे तत्रैवमब्रुवन् ॥८५॥ स्मराकृष्टा तनोत्येव या साहसमशङ्किता। सा परस्त्रीकृता कुस्त्री रूपाजीव न हन्ति कम् ॥८६॥ इत्युक्त्वा विष्णुदत्तादीन्स वांस्ते मुमुचुस्ततः। विष्णुदत्तं च सप्तान्ये सहायास्तेऽथ तुष्टुवुः ॥८७॥ रक्षारत्नप्रदीपस्त्वं जातो नः स्वपतां निधिः। त्वत्प्रसादेन तीर्णा स्मो मृत्युमद्यानिमिषजम् ॥८८॥ स्तुत्वैवं विष्णुदत्तं तं सम्पूज्य च दुर्वचः। प्रगतास्ते ययुः प्रातः स्वकार्यायेव सत्वराः ॥८९॥

षष्ठ लम्बक ७२९

षष्ठ लम्बक ७२९ बाहर निकलकर राख के ढेर में उसके सिर और शरीर को फेंककर चुपचाप वह लौट आई ॥७५॥ विष्णुदत्त भी सबसे पीछे निकलकर और दूर से यह सब देखकर, अपने सोये हुए मित्रों के साथ सो गया ॥७६॥ उधर उस दुष्टा स्त्री ने घर में आकर उसी तलवार से सोये हुए पति का सिर काट डाला और बाहर निकलकर सेवकों को सुनाकर चिल्लाने लगी— हाय ! मैं मारी गई, इन पथिकों ने मेरे पति को मार डाला' ॥७७-७८॥ यह सुनकर उसके सेवक दौड़कर आये और अपने सरदार को कटा हुआ देखकर, तलवारें खींचकर विष्णुदत्त आदि पथिकों पर टूट पड़े ॥७९॥ 'ठहरो, तुमलोग ब्रह्महत्या न करो। यह सब काण्ड जार से फँसी हुई इसी दुष्टा स्त्री ने किया है ॥८ ॥ 'मैंने प्रारम्भ से अबतक द्वार के खुली हुई दरारों से सब अपनी आँखों से देखा है और बाहर निकलकर भी सब स्वयं देखा है। आप लोग क्षमा करें' तो मैं सब कुछ कहता हूँ ॥८१-८२॥ ऐसा कहते हुए विष्णुदत्त ने सारी बात बताकर कूड़े और राख के ढेर में पड़े हुए उस यार के मृत शरीर और सिर को दिखाया ॥८३-८४॥ तब उतरे हुए मुँह से उस स्त्री के यह सब स्वीकार कर लेने पर वे सब उस दुराचारिणी को डाँटते-फटकारते चले गये ॥८५॥ काम के वशीभूत होकर जो स्त्री निर्मम होकर साहस कर बैठती है वह दूसरो से स्नेहवत् होकर तलवार के समान किसका विनाश नहीं कर डालती ॥८६॥ ऐसा कहते हुए उन भीलों ने विष्णुदत्त आदि सातों ब्राह्मणों को छोड़ दिया और वे सातों साथी विष्णुदत्त की प्रशंसा करने लगे ॥८७॥ उन्होंने कहा— सोये हुए हम लोगों की रक्षा के लिए तुम रत्नदीप के समान सिद्ध हुए। आज अपशकुन से होनेवाली मृत्यु को तुम्हारी कृपा से हमलोग पार कर सके' ॥८८॥ इस प्रकार विष्णुदत्त की प्रशंसा करके और अपने कहे हुए दुर्वचनों के लिए क्षमा-प्रार्थना- पूर्वक उसे प्रणाम करके वे प्रातःकाल अपने काम में लग गये ॥८९॥ ९२

इत्थं कलिङ्गसेनायाः शमयित्वा व्यथां मिथः। सोमप्रभा सा कौशाम्ब्यां सखी पुनरुवाच ताम् ॥९०॥ एवं कार्यप्रवृत्तानामनिमित्तमुपस्थितम्। विलम्बाद्यप्रतिहतं सस्यनिष्टं प्रयच्छति ॥९१॥ यतश्चात्रानुतिष्ठन्ते प्राप्तवाच्यावमानिनः। प्रवर्त्तमाना रभसात्पर्यन्ते मन्दबुद्धयः ॥९२॥ अतोऽशुभे निमित्ते ऽद्य वत्सेशं प्रति यत्त्वया। आत्मप्रहाय प्रहितो दूतो युक्तं न तत्कृतम् ॥९३॥ तदविघ्नं विवाहं च विदधातु विधिस्तव। कुरुम्भेनागता गेहाद् विवाहस्तेन दूरतः ॥९४॥ देवा अपि च रुन्धन्ति त्वयि रत्नमिव ततः। चिन्त्यश्च नीतिनिपुणो मन्त्री यौगन्धरायणः ॥९५॥ राजव्यसनशङ्की सन्सतोऽत्र विघ्नं समाचरेत्। विहितेऽपि विवाहे वा दोषमुत्पादयेत्स वः ॥९६॥ धार्मिकः सङ्गं कुर्याद्वा दोषं तन्पि ते सखि। सपत्नी सर्वथा चिन्त्या कथां वक्ष्यत्र ते शृणु ॥९७॥

ऋषिकन्यायाः कदलीगर्भायाः कथा

अस्तीहैक्षुमती नाम पुरी तस्याश्च पार्श्वतः। नदी तदभिधानेव विश्वामित्रकृते ऽमे ॥९८॥ तत्समीपे महच्चास्ति वनं तत्र कृताश्रमः। ऊर्ध्वपावस्तपश्चक्रे मुनिर्मङ्कणकाभिधः ॥९९॥ तपस्यता च तेनात्र गगनेनागताऽप्सराः। अदर्शि मेनका नाम वातेन चलिताम्बरा ॥१००॥ ततो लब्धावकाशेन कामेन द्रागभिसारितः। नूतने कदलीगर्भे वीर्यं तस्यापतन्मुनेः ॥१०१॥ जज्ञे ततश्च कन्या सा सद्यः सर्व्वाङ्गसुन्दरी। अमोघं हि महर्षीणां वीर्यं पचति तत्क्षणम् ॥१०२॥

षष्ठ लम्बक ७३१

षष्ठ लम्बक ७३१ सोमप्रभा ने कौशाम्बी में इस प्रकार कथा सुनाकर कलिंगसेना से पुनः कहा— ईर्ष्यालु इस प्रकार काम में लगे हुए लोगों को आनेवाले अपशकुन कार्यों में व्यवधान उत्पन्न कर देते हैं। इस कारण बुद्धिमानों की बातों को न माननेवाले मन्दबुद्धिवाले व्यक्ति आवेश में आकर कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं और पीछे पश्चात्ताप करते हैं। इसलिए उस अपशकुन में वत्सराज के प्रति तुमने अपने ग्रहण करने के लिए, जो दूत भेजा वह अच्छा नहीं किया। तू घर से कुलग्न में आई है इसलिए तेरा विवाह टल गया है। अब दैव ही उसे निर्विघ्न पूर्ण करे ॥९०-९४॥ गुण पर देवता भी रीझते हैं। इसलिए तुम्हें उसकी रक्षा करनी चाहिए और मन्त्री यौगन्धरायण की भी चिन्ता करनी चाहिए। राज्य पर विपत्ति की आशंका से वह विवाह में विघ्न उपस्थित करेगा। विवाह हो जाने पर भी वह तुममें दोष उत्पन्न करेगा। धार्मिक होने पर यह संभव है कि वह तुम्हें लांछित न करे, तो भी तुम्हारी सौतें चिन्तनीय हैं। मैं इस प्रसंग में तुम्हें कथा सुनाती हूँ सुनो ॥९५ ९७॥ ऋषिकन्या कदलीगर्भा की कथा छेदी देश में इषुमती नाम की नगरी है। उसके पास ही इषुमती नाम की नदी है। ये दोनों नगरी और नदी—मुनि विश्वामित्र-निर्मित हैं॥९८॥ उसके तट पर एक महान् वन है जिसमें मंकणक नाम का ऋषि ऊपर पैर करके तपस्या करता था॥९९॥ तपस्या करते हुए उसने एक बार आकाश-मार्ग से जाती हुई मेनका नाम की अप्सरा को देखा। आकाश-मार्ग से जाती हुई उस मेनका की साड़ी वायु से उड़ रही थी। अतः, उसे नग्न देखने के कारण काम-वासना से ऋषि का मन क्षुब्ध हो उठा। फलतः उस ऋषि का वीर्य एक नवीन कदली-वृक्ष के मध्य जा गिरा। और उस कदली-गर्भ से सर्वाङ्गसुन्दरी एक कन्या उत्पन्न हुई क्योंकि ऋषियों का अमोघ (सफल) वीर्य शीघ्र ही फलीभूत होता है॥१००-१ २॥

७३२ कथासरित्सागर

७३२ कथासरित्सागर सम्भूता कदलीगर्भे यस्मात्तस्माच्चकार ताम्। नाम्ना स कदलीगर्भा पिता मङ्कणको मुनिः ॥१०३॥ तस्याश्रमे सा ववृधे गौतमस्य कृपी यथा। द्रोणभार्या पुरा रम्भादर्शनच्युतवीर्यजा ॥१०४॥ एकदा च विषेधीतमाश्रमं मृगया रसात्। दृढवर्मा धृतोऽश्वेन मध्यदेशभवो नृपः ॥१०५॥ स तां ददर्श कदलीगर्भां प्रावृतवल्कलाम्। मुनिकन्योचितेनात्र वेषेणात्यन्तशोभिताम् ॥१०६॥ सा च दृष्ट्वास्य नृपते स्वीचक्रे हृदयं तथा। यथावकाशोऽपि हतस्तत्रान्तःपुरयोषिताम् ॥१०७॥ अपीमां प्राप्नुयां भार्या कस्यापीह सुतामृषेः। दुष्यन्त इव कण्वस्य मुनेः कन्यां शकुन्तलाम् ॥१०८॥ इति सञ्चिन्तयन्नेव संगृहीतसमिच्छुभम्। सोऽप्रापश्यत्समायान्तं मुनिं मङ्कणकं नृपः ॥१०९॥ ववन्दे चैनमभ्येत्य पादयोर्मुक्तवाहनः। पृष्टश्चात्मानमेतस्मै मुनये स न्यवेदयत् ॥११०॥ छत्रं स कदलीगर्भां मुनिराविशति स्म ताम्। वत्से राज्ञोऽतिथिपरस्य स्वयार्घ्यं फलप्स्यतामिति ॥१११॥ तथेति कल्पितातिथ्यस्तया राजा स सम्भ्रया। संवृक्कुतस्ते कन्येयमिति पप्रच्छ तं मुनिम् ॥११२॥ मुनिश्च स ततस्तस्यास्तामुत्पत्तिं च नाम च। अन्वर्थं कदलीगर्भेत्यस्मै राज्ञे न्यवेदयत् ॥११३॥ ततस्तां स मुनेः कन्यां मेनकामावनोद्भवम्। प्रत्यप्सरसमप्युक्तो राजा तस्मादयाचत ॥११४॥ सोऽप्येतां कदलीगर्भां ददौ तस्मै सुतामृषिः। स्थित्यानुभावं पूर्वोक्तामविधाय हि धष्टितम् ॥११५॥ तच्च दृष्ट्वा प्रभावेण सम्भाव्यय सुरङ्गना। संमदाप्रीतिरुत्सस्याप्यवदद्व्याहृष्णन्नम् ॥११६॥ दत्त्वा च मर्षपाङ्गन्मे जगदुस्तां तदैव ताः। यान्तीं मार्गे वपस्यैतांस्त्वममभिज्ञानदिछये ॥११७॥

षष्ठ स्तम्भक ७११ उस कन्या के पिता ऋषि ने उसका नाम 'कदलीगर्भा' रख दिया। वह कन्या कदली गर्भा अपने पिता मंचणक ऋषि के आश्रम में उसी प्रकार पलने और बढ़ने लगी जैसे रम्भा के दर्शन से विष्णुपद स्थान पर गौतम ऋषि की कन्या और द्रोणाचार्य की पत्नी कृपी पल रही थी ॥१-३ । ४॥ एक बार मध्यदेश का राजा दृढवर्मा शिकार के प्रसंग में घोड़े द्वारा उसी आश्रम में ले जाया गया ॥१-५॥ उस राजा ने वहाँ अकस्मात् आए हुए उस कदलीगर्भा को देखा। वह कन्या मुनिकन्या के आभूषणहीन वेष में अत्यन्त सुन्दरी लग रही थी ॥१-६॥ उसके देखते ही राजा दृढवर्मा का हृदय उसी प्रकार आकृष्ट हो गया जिस प्रकार कण्व के आश्रम में शकुन्तला को देखकर राजा दुष्यन्त का हृदय आकृष्ट हो गया था। राजा सोचने लगा कि क्या मैं दुष्यन्त की शकुन्तला के समान इस कन्या को प्राप्त कर सकूँगा ? ॥१-७-८॥ इस प्रकार सोचते हुए राजा ने नित्यकर्म के लिए समिधा और कुशा लेकर आते हुए मंचणक ऋषि को देखा ॥१- ९ । १०॥ उस समय घोड़े से उतरते हुए राजा ने ऋषि के समीप आकर उनके चरणों में प्रणाम किया और प्रश्न करने पर उसे अपना परिचय दिया ॥११॥ तब ऋषि ने कन्या कदलीगर्भा को आज्ञा दी कि बेटी इस अतिथि राजा के लिए तुम अर्घ्य ला ॥१२-१३॥ इस प्रकार उस विनम्र कन्या से सन्तुष्ट राजा ने उस मुनि से पूछा कि यह स्त्री कन्या तुम्हें कहाँ से और कैसे प्राप्त हुई ? ॥१४-१५॥ तब मुनि ने उसकी उत्पत्ति और उसके नाम का अनुकूल अर्थ 'कदलीगर्भा' बताया ॥१६-१७॥ तब राजा ने उस कन्या को मेनका अप्सरा की सन्तान समझकर अत्यन्त उत्कण्ठा के साथ ऋषि से उस कन्या को माँगा ॥१८-१९॥ राजा के माँगने पर उस ऋषि ने भी उस कन्या दे दी क्योंकि प्राचीन व्यक्तियों को दिव्य और प्रभावशाली व्यक्तियों पर विचार न करना चाहिए ॥१२-२०॥ अपने दिव्य प्रभाव से स्वर्ग की अप्सराओं ने यह जानकर और मेनका के प्रेम से यहाँ आकर उस कन्या को विवाह के वेष में अलंकृत किया। और उसके हाथ में सरसों देते हुए कहा- तू पतिके घर जाती हुई मार्ग में इसे डालती हुई जाना जिससे लौटते समय के लिए मार्ग का परिचय बना रहे ॥१२८-१३०॥ १ उत्तर में हिमालय दक्षिण में विन्ध्याचल पूर्व में प्रयाग और पश्चिम में मारवाड़ के मध्य में आया हुआ देश, मध्यदेश कहा जाता है। २ दिव्य अतिथि के स्वागत के लिए उसे अक्षत दूब और फल डालकर जल देना अर्घ्य है जो सम्मान का चिह्न है। ३ अर्थात् केले के वृक्ष के मध्य से उत्पन्न।

७२६ कथासरित्सागर

७२६ कथासरित्सागर यन्मया सहसा देव्याः प्रतिज्ञा पुरतः कृता । विज्ञानं नात्र सादृक्ष्मे सम्यककिञ्चिच्च विद्यते ॥१३३॥ अन्यत्रेव च न व्याजः कृतः राजगृहे क्षमम् । ज्ञात्वा जातु हि कुर्वीरन्निग्रहं प्रभविष्णवः ॥१३४॥ एकस्तत्राभ्युपायः स्याद्यत्सुहृन्मेऽस्ति नापितः । ईदृग्विज्ञानकुशलः स जतुर्यादिहोद्यमम् ॥१३५॥ इत्यालोच्यैव सा तस्य नापितस्यान्तिकं ययौ । तस्मै मनीषितं सर्वं तच्छशंसांर्थसिद्धिदम् ॥१३६॥ तत स नापितो वृद्धो धूर्तश्चैवमचिन्तयत् । उपस्थितमिदं विष्ट्या लाभस्थानं ममाधुना ॥१३७॥ सन्न वाच्या नवा राजवधू रक्ष्या तु सा यतः । दिव्यदृष्टिः पिता तस्य सर्वं प्रख्यापयेदिदम् ॥१३८॥ विदितेऽप्येतौ तु नृपतेर्देवी सम्प्रति मुञ्चतु । क्रूरहस्य-सहाये हि भृते मरयामते प्रभुः ॥१३९॥ संश्लेष्य काले राजे च वाच्यमेतत्तथा मया । यथा स्यादुपजीव्यो मे राजा सा वणिककन्यका ॥१४०॥ एवं च नातिपापं स्याद् भवेद्दीर्घा च जीविका । इत्यालोच्य स तां प्राह नापितः कूटतापसीम् ॥१४१॥ अम्ब ! सर्वं करोम्येतत्किं तु योगबलेन चेत् । एषा राज्ञो नवा भार्या हन्यते तन्न युज्यते ॥१४२॥ यद्वा कदाचिद्राजा हि सर्वानस्मान् विनाशयेत् । स्त्रीहत्या पातकं च स्यात्पिता च मुनिः शपेत् ॥१४३॥ तस्माद् बुद्धिवलेनैषा राज्ञो विश्लेष्यते परम् । येन देवी सुखं तिष्ठेदर्थप्राप्तिर्भवेच्च नः ॥१४४॥ एतच्च न कियत्क्षिप्रं हि न बुद्ध्या साधयाम्यहम् । प्रज्ञानं मायरूपं च श्रूयतां वक्ष्यामि ते ॥१४५॥ अभूदस्य पिता राज्ञो दुःशीलो दुष्टवल्लभः । अह च दासस्तस्याहं गतः स्वाक्षिप्तकर्मकृत् ॥१४६॥ स कदाचिदिह भ्रान्त्या भार्यामन्तः मामकीम् । तस्यां तस्य सुरूपायां तरुण्या च मनो ययौ ॥१४७॥

षष्ठ लम्बक ७१७

षष्ठ लम्बक ७१७ मैंने महारानी के आगे एकाएक लम्बी चौड़ी डींग तो हाँक दी किन्तु ऐसा विज्ञान तो मैं जानती नहीं ॥१३५३॥ अन्य साधारण स्थानों के समान राजा के घर में ऐसा छल-कपट करना उचित नहीं क्योंकि रहस्य खुलने पर शक्तिशाली राजा प्राणदंड दे सकते हैं ॥१३५४॥ हाँ एक उपाय सूझ रहा है। मेरा मित्र एक नापित (नाई) है वह ऐसे कामों में चतुर है। वह कुछ उपाय कर सकता है ॥१३५५॥ ऐसा सोचकर वह भिक्षुणी नापित के पास गई और उसे अपना अर्थलाभ करानेवाली सारी योजनाएँ बताई ॥१३५६॥ तब वह वृद्ध और धूर्त नापित सोचने लगा—'मेरे भाग्य से ही लाभ का यह अवसर मिला है॥१३५७॥ इसलिए नई राजवधू को मारना न चाहिए प्रत्युत उसकी रक्षा करनी चाहिए क्योंकि उस रानी का पिता दिव्य दृष्टिवाला है। वह योगबल से सब जानकर प्रकट कर देगा ॥१३५८॥ इस समय तो उसे राजा से पृथक् करके महारानी का धन खाते हैं क्योंकि रहस्य में सहायता करनेवाले सेवक के सामने स्वामी स्वयं सेवक बन जाता है ॥१३५९॥ राजा और नई रानी दोनों को अलग-अलग कराकर यथासमय राजा को ऐसा समझा दूँगा कि जिससे राजा और ऋषिकन्या दोनों ही सदा के लिए मेरी जीविका के स्रोत बन जायेंगे। इस प्रकार, भारी पाप भी न होगा और मेरे लिए स्थायी जीविका भी बन जायगी' ऐसा सोचकर वह धूर्त नापित उस कपटी तपस्विनी से कहने लगा - 'माता मैं यह सब तो कर दूँगा किन्तु किसी उपाय से यदि राजा की नई रानी को मार दिया जाय तो यह उचित न होगा ॥१४ १४२॥ रहस्य फूट पड़ने पर, राजा हमलोगों को फाँसी दे सकता है। स्त्री-हत्या करना पाप भी होगा और रानी का पिता मुनि भी हमें शाप देगा ॥१४४३॥ इसलिए केवल बुद्धि के बल से ही उसे राजा से पृथक कर दिया जाय तो महारानी भी सुख से रहेगी और हमें भी धन मिलेगा ॥१४४४॥ यह बात तो क्या है? बुद्धि से मैं क्या नहीं कर सकता। मेरी बुद्धि का वैभव सुनो मैं कहता हूँ ॥१४४५॥ नाई और राजा की कथा इस राजा दृढवर्मा का पिता बहुत ही दुश्चरित्र था। मैं उसका दास था और उसका क्षौर कर्म किया करता था ॥१४४६॥ किसी समय इस ओर घूमते हुए उसने मेरी स्त्री को देख लिया। उस सुन्दरी युवती की ओर उसका मन खिंच गया ॥१४४७॥ ९१

यदि भर्त्रा कृतावज्ञा कदाचित्त्वमिहैष्यसि । ध्वज्जावैरैभिरायान्ती पन्थानं पुत्र वेत्स्यसि ॥११८॥ इत्युक्ता तामिरारोप्य कृतोद्वाहं स्ववाजिनि । स राजा कदलीगर्भां दृढवर्मा ययौ यतः ॥११९॥ प्राप्तान्वागतसैन्योऽथ वपन्त्या सर्वपान्पथि । वध्वा तया सह प्राप राजधानीं निजां च सः ॥१२०॥ तत्रान्यपत्नीविमुखः कदलीगर्भया तया । समं स सस्पहावस्थातद्वृत्तान्तं स्वमन्त्रिषु ॥१२१॥ ततस्तस्य महादेवी तदीयं मन्त्रिणं रहः । स्मारयित्वोपकारान् स्वान् अगादात्मन्दुःखिता ॥१२२॥ राज्ञा नूतनभार्यैकसक्तेनाद्याहमुज्झिता । तत्त्था कुरु येनैषा सपत्नी मे निवर्त्तते ॥१२३॥ तच्छ्रुत्वा सोऽब्रवीन्मन्त्री देवि कर्तुं युज्यते । मादृशानां प्रभोः पत्न्या विनाघोऽप्य वियोजनम् ॥१२४॥ एष प्रव्राजकस्त्रीणां विषयः कुहकादिषु । प्रयोगेष्वभियुक्तानां सङ्कतानां तथाविधे ॥१२५॥ ता हि कैतवतापास्यः प्रविश्यैवानिवारिताः । गृहेषु मायाकुशलाः कर्म किं किं न कुर्वते ॥१२६॥ इत्युक्ता तेन सा देवी विनतवाह तं हिया । अलं तर्हि ममानेन गर्हितेन सतामिति ॥१२७॥ तद्वधो हृदि कृत्वा तु सं विसृज्य च मन्त्रिणम् । काञ्चित्प्रव्राजिकां चेटीमुखेनानयति स्म सा ॥१२८॥ तस्याः शशंस चामूलात्तत्सर्वं स्वमनीषितम् । अङ्गीचकार सासु च सिद्धे कार्ये धनं महत् ॥१२९॥ साप्यर्थलोभादार्त्ता तामित्युवाच कुतापसी । देवि किं नाम वस्तुतद्वहं ते साधयाम्यदः ॥१३०॥ मानाविधान्हि जानामि प्रयोगान् सुवहूनहम् । एवमाश्वास्य तां देवीं साप प्रव्राजिका ययौ ॥१३१॥ मन्त्रिकां प्राप्य च निजां भीतेवेत्थमचिन्तयत् । अहो अतीव भोगाशा क नाम न विडम्बयेत् ॥१३२॥

षष्ठ लम्बक ७३५

षष्ठ लम्बक ७३५ 'और बेटी कभी पति के अपमान करने पर तू यदि पिता के आश्रम को लौटेगी तो इन्हीं सरसों के वृक्षों से मार्ग का पता लग जायगा' ॥११८॥ उनसे इस प्रकार कही गई कन्या कदलीगर्भा को घोड़े पर बैठाकर राजा दृढ़वर्मा अपने नगर को लौटा ॥११९॥ राजा के पीछे सेना भी आ रही थी। इस प्रकार सरसों बोती हुई उस कन्या को लिये हुए वह राजा अपनी राजधानी में आ गया ॥१२० ॥ वहाँ आकर राजा ने मन्त्रियों से अपना सारा विवाह-वृत्तान्त प्रकट कर दिया और अन्य रानियों से विरक्त होकर वह एकमात्र कदलीगर्भा के ही प्रेम में मग्न हो गया ॥१२१॥ तदनन्तर उसकी महारानी ने राजा के मन्त्री को बुलाकर और अपने किये हुए उपकारों का स्मरण दिलाकर, उससे एकान्त में कहा—'ऐसा उपाय करो कि जिससे मेरी यह सौत चली जाय क्योंकि वह (राजा) एकमात्र उसी में आसक्त है' ॥१२२-१२३॥ यह सुनकर मन्त्री कहने लगा—महारानी स्वामी की पत्नी का इस प्रकार विनाश या वियोग मेरे जैसे व्यक्ति नहीं कर सकते' ॥१२४॥ यह तो साधुनी स्त्रियों या जादू-टोना करनेवाले ऐसे-वैसे व्यक्तियों का काम है ॥१२५॥ ये मायाकुशल नकली साधुनियाँ अपनी अप्रतिहत गति से घरों में घुसकर यह सब मायाजाल रचा करती हैं। वे क्या-क्या नहीं करतीं ? ॥१२६॥ मन्त्री के इस प्रकार कहने पर रानी अत्यन्त लज्जा से विनम्र होकर कहने लगी—'तो इस प्रकार के सज्जनों द्वारा निन्दित कार्य से मुझे क्या प्रयोजन' ॥१२७॥ इस प्रकार मन्त्री को विदा कर और उसकी बात को मानकर रानी ने दासी द्वारा किसी साधुनी को बुलवाया ॥१२८॥ रानी ने उसे अपनी सारी कामना बता दी और कार्य सिद्ध होने पर उसे पर्याप्त धन देने का आश्वासन भी दिया ॥१२९॥ वह दुष्टा परिव्राजिका (साधुनी) भी धन के लोभ से उस व्याकुल रानी से बोली— 'महारानी यह कौन-सी बात है इसे तुरन्त सिद्ध करती हूँ' ॥१३० ॥ मैं विविध प्रकार के प्रयोगों को जानती हूँ। इस प्रकार रानी को धीरज बँधाकर वह परिव्राजिका चली गई और अपनी मटिया में जाकर डरी हुई-सी इस प्रकार सोचने लगी— मुझे भाग्य से ही यह प्राप्ति का अवसर मिला है। लोगों की अत्यन्त लुब्धा विनती दुर्दशा नहीं करती ? आश्चर्य है। ॥१३१-१३२॥

७३६ कथासरित्सागर

७३६ कथासरित्सागर यन्मया सहसा देव्याः प्रतिमा पुरतः कृता। विज्ञानं चात्र तादृङ्मे सम्यककिञ्चिन्न विद्यते ॥१३३॥ अन्यत्रैव च न व्याजः कर्तुं राजगृहे क्षमम्। ज्ञात्वा जातु हि कुर्वीरन्निग्रहं प्रभविष्णवः ॥१३४॥ एकस्तत्राभ्युपायः स्याद्यत्सङ्गे मेऽस्ति नापितः। ईदृग्विज्ञानकुशलः स चेत्कुर्यान्महोद्यमम् ॥१३५॥ इत्यालाख्यैव सा तस्य नापितस्यान्तिकं ययौ। तस्मै मनीषितं सर्वं तच्छासादर्शिसिद्धिदम् ॥१३६॥ ततः स नापितो वृद्धो धूर्तदश्चैवमचिन्तयत्। उपस्थितमिदं दिष्ट्या लाभस्थानं ममाधुना ॥१३७॥ तन्न वाच्या नवा राजवधू रक्ष्या तु सा यतः। दिव्यदृष्टिः पिता तस्य सर्वं प्रख्यापयिष्यति ॥१३८॥ विशिष्येतां तु नृपतेर्देवी सम्प्रति मुञ्च्यते। पुरहस्य-सहाये हि भर्ते भृत्यायते प्रभुः ॥१३९॥ सङ्क्षेप्ये काले राज्ञे च वाच्यमेतत्तथा मया। यथा स्यादुपजीव्यो मे राजा सा वणिककन्यका ॥१४०॥ एवं च नातिपापं स्याद् भवेद्दीर्घा च जीविका। इत्यालोच्य स तां प्राह नापितः कूटतापसीम् ॥१४१॥ अम्ब ! सर्वं करोम्येतत्किं तु मोगबलेन चेत्। एषा राज्ञो नवा भार्या हन्यते तन्न युज्यते ॥१४२॥ बद्धवा क्वापिद्विजा हि सर्पानस्मान् विनाशयेत्। स्त्रीहत्या पातकं च स्यात्तत्पिता च मुनिः शपेत् ॥१४३॥ तस्माद् बुद्धिबलेनैषा राज्ञो विश्लेष्यते परम्। येन देवी सुखं तिष्ठेद्वधप्राप्तिर्भवेन्न च ॥१४४॥ एतच्च मे कियत्किं हि न बुद्ध्या साधयाम्यहम्। प्रज्ञानं मामकीनं च शृणुतां वर्णयामि ते ॥१४५॥ अभून्मम पिता राज्ञो दुःशीलो वृद्धशर्मणः। अहं च दामस्तम्येहं राजः स्वापितकर्मकृत् ॥१४६॥ स कदाचिदिहं भ्राम्यन्भार्यामागन् मामकीम्। तस्यां तस्य गुरुपापां तस्यां च मनो ययौ ॥१४७॥

पन्द्रह लम्बक ७३७

पन्द्रह लम्बक ७३७ मैंने महारानी के आगे एकाएक लम्बी-चौड़ी डींग तो हाँक दी किन्तु ऐसा विधान तो मैं जानती नहीं ॥१३३॥ अन्य साधारण स्थानों के समान राजा के घर में ऐसा छल-कपट करना उचित नहीं क्योंकि रहस्य खुलने पर शक्तिशाली राजा प्राणदंड दे सकते हैं ॥१३४॥ हाँ एक उपाय सूझ रहा है। मेरा मित्र एक नापित (नाई) है वह ऐसे कार्यों में चतुर है। वह कुछ उपाय कर सकता है ॥१३५॥ ऐसा सोचकर वह भिक्षुकी नापित के पास गई और उसे अपना सर्वकार्य करानेवाली सारी योजनाएँ बताई ॥१३६॥ तब वह वृद्ध और धूर्त नापित सोचने लगा- 'मेरे भाग्य से ही लाभ का यह अवसर मिला है ॥१३७॥ इसलिए नई राजवधू को मारना न चाहिए प्रत्युत इसकी रक्षा करनी चाहिए क्योंकि इस रानी का पिता दिव्य दृष्टिवाला है। वह योगबल से सब जानकर प्रकट कर देगा ॥१३८॥ इस समय तो उसे राजा से पृथक् करके महारानी का धन पाते हैं, क्योंकि रहस्य में सहायता करनेवाले सेवक के सामने स्वामी स्वयं सेवक बन जाता है ॥१३९॥ राजा और नई रानी दोनों को अलग-अलग कराकर यथासमय राजा को ऐसा समझा दूँगा कि जिससे राजा और महिष्या दोनों ही सदा के लिए मेरी जीविका के स्रोत बन जायेंगे। इस प्रकार, भारी पाप भी न होगा और मेरे लिए स्थायी जीविका भी बन जायगी ऐसा सोचकर वह मूर्ख नापित उस कपटी तपस्विनी से कहने लगा - 'माता मैं यह सब तो कर दूँगा किन्तु किसी उपाय से यदि राजा की नई रानी को मार दिया जाय तो यह उचित न होगा ॥१४०-१४२॥ रहस्य फूट पड़ने पर, राजा हमलोगों को फाँसी दे सकता है। स्त्री-हत्या करना पाप भी होगा और रानी का पिता मुनि भी हमें शाप देगा ॥१४३॥ इसलिए केवल बुद्धि के बल से ही उसे राजा से पृथक कर दिया जाय तो महारानी भी सुख से रहेगी और हमें भी धन मिलेगा ॥१४४॥ यह बात तो क्या है? बुद्धि से मैं क्या नहीं कर सकता। मेरी बुद्धि का वैभव सुनो मैं कहता हूँ ॥१४५॥ नाई और राजा की कथा इस राजा दृढ़वर्मा का पिता बहुत ही दुश्चरित्र था। मैं उसका दास था और उसका क्षौर कर्म किया करता था ॥१४६॥ किसी समय इधर-उधर घूमते हुए उसने मेरी पत्नी को देख लिया। उस सुन्दरी युवती की ओर उसका मन खिंच गया ॥१४७॥ ९३

७३८ कथासरित्सागर

७३८ कथासरित्सागर नापितस्त्रीति सावोधि पृष्ट्वा परिजनं स ताम्। किं नापितः करोतीति प्रविश्यैव स मे गृहम्॥१४८॥ उपभुज्यैव तां स्वेच्छं मद्भार्यां क्ष्नुपो ययौ। अहं च तदहर्देवाद् गृहादासं बहिः क्वचित्॥१४९॥ अन्येद्युश्च प्रविष्टेन दृष्टा सान्यादृशी मया। पृष्टा भार्या यथावृत्तं साभिमानेव मेऽभ्यधात्॥१५०॥ तत्क्रमेणैव तां भार्यामशक्तस्य निषेधने। नित्यमेवोपभुञ्जानः स ममोत्सम्प्रवाक्षुपः॥१५१॥ कुतो गम्यमगम्यं वा कुशीलोन्मादिनः प्रभोः। वातोद्धतस्य दावान्नेः किं तृणं किं च काननम्॥१५२॥ ततो यावद्गतिर्मेऽस्ति न काचिन्निवारणे। तावत्स्वल्पाशनक्षामो मान्द्यव्याजमशिश्रियम्॥१५३॥ तावद्युश्च गतोऽभूवं राजस्तस्याहमन्तिकम्। स्वव्यापारोपसेवार्थं निश्वसन् क्षुधपाम्बरः॥१५४॥ तत्र मन्दमिवालोक्य साभिप्रायं स मां नृपः। पप्रच्छ रे किमीदृक्त्वं सञ्जातं कथ्यतामिति॥१५५॥ निर्बन्धपृष्टस्तं चाहं विजने याचिताभयः। प्रत्यवोचं नृपं देव भार्यास्ति मम डाकिनी॥१५६॥ सा च सुप्तस्य मेऽन्त्राणि गुदेनाकृष्य पूषति। तथैव चान्तः क्षिपति तेनाहं क्षामतां गतः॥१५७॥ पोषणाय च मे नित्यं बृंहणं भोजनं कुरु। इत्युक्तः स मया राजा जाताशङ्को व्यचिन्तयत्॥१५८॥ किं सत्यं डाकिनी सा स्यात्तेनाहं किं हृतस्तया। किञ्चिवाहारपुष्टस्य चूषेवन्त्रं ममापि सा॥१५९॥ तदद्य तामहं भुक्त्वा जिज्ञासिष्ये स्वयं निशि। इति सञ्चिन्त्य राजा मे सोऽन्नाहारमवापयत्॥१६०॥ ततो गत्वा गृहं तस्या भार्यायाः सन्निधावहम्। वधूष्यमुच्चैं पृष्टश्च तया तामेवमब्रवम्॥१६१॥ प्रिये न वाच्यं कस्यापि त्वया गुह्यं ब्रवीमि ते। अस्य राज्ञो गुदे जाता दन्ता व्याधिसक्ष्मिमा॥१६२॥

षष्ठ लम्बक ७३९

षष्ठ लम्बक ७३९ उसने अपने सेवकों से यह जान लिया कि यह नापित की स्त्री है, 'नापित मेरा क्या करेगा'—यह जानकर वह मेरे घर में घुस आया और स्वतन्त्रतापूर्वक मेरी स्त्री को भ्रष्ट करके वह दुष्ट राजा चला गया। मैं दैवयोग से उस दिन घर से कहीं बाहर गया हुआ था ॥१४८-१४९॥ दूसरे दिन घर आते ही मैंने उसे (अपनी स्त्री को) दूसरी स्थिति में देखा और पूछने पर उसने अभिमान से सारा वृत्तान्त कह दिया ॥१५०॥ तब से मुझे रोकने में असमर्थ जानकर मेरी परवाह न कर, वह राजा नित्य ही मेरी स्त्री का उपभोग करता रहा ॥१५१॥ दुश्चरित्राता के कारण पापक स्वामी (राजा) के लिए गम्य और अगम्य क्या है ? वाय से फैलाई गई आग के लिए तिनका और जंगल समान है ॥१५२॥ जब मैंने देखा कि राजा को रोकने के लिए मेरी कोई गति नहीं है तब स्वल्पाहार सं पूर्वक होकर मैंने माँदगी (रोग) का बहाना किया ॥१५३॥ इस प्रकार दुबला-पतला रोपी का-सा मुँह किये मैं दुख भरी लम्बी साँस लेता हुआ क्षौर कर्म की सेवा के लिए राजा के पास गया ॥१५४॥ मुझे इस प्रकार माँदा (रोगी) देखकर राजा ने अभिप्राय से पूछा— क्यों रे ! बता तू इतना दुर्बल क्यों हो गया है ? ॥१५५॥ उसके बार-बार आग्रहपूर्वक पूछने पर मैंने अभय-याचना करके उससे एकान्त में कहा—'महाराज क्या कहूँ मेरी स्त्री डाकिनी है। वह सोये हुए में मेरी आँतों का मलद्वार से बाहर खींचकर चूस लेती है और फिर उसी प्रकार रख देती है। इसी कारण मैं दुर्बल हो गया हूँ ॥१५६-१५७॥ शरीर को पुष्ट रखने के लिए मेरे पास पौष्टिक भोजन कहाँ से आवे ? मेरे ऐसा कहने पर राजा सोचने लगा—'क्या वह सचमुच डाकिनी है ? तभी उसने मुझे आकृष्ट कर रखा है। तो अब उपाय से आज रात को उसका पता लगाऊँगा। क्या आहार से परिपुष्ट मेरी आँतों को भी वह चूसेगी ? तब मैं राजा के द्वारा आहार प्राप्त कर अपने घर आकर आँसू बहाने लगा और अपनी स्त्री द्वारा कारण पूछे जाने पर मैंने कहा—'प्यारी किसी से कहना मत। सुनो, तुम्हें बताता हूँ। उस राजा के मलद्वार में वज्र के समान दाँत निकल आये हैं ॥१५८-१६२॥

७४ कथासरित्सागर

७४ कथासरित्सागर तच्च भग्नोग्ऽद्य जातोऽपि क्षुरो मे कर्म कुर्वतः । एवं धात्र ममेदानीं क्षुरस्त्रुट्यत्पदे पदे ॥१६३॥ तच्च नवमानेष्य कुतो निरुपमहं क्षुरम्। अतो रोदिमि नष्टा हि जीविकेयं गृहे मम ॥१६४॥ इत्युक्ता सा मया भार्या मतिमाधादुपाय्यतः । रात्री राज्ञोऽस्य सुप्तस्य गुददन्तावभूतेक्षण ॥१६५॥ आ ससारादङ्गुष्ट सदस्य म स्वयोषि सा। विस्रब्धा अपि दृश्यन्ते विटचर्ममया स्त्रियः ॥१६६॥ अथैत्य तां निशि स्वैरं मद्भार्यामुपभुज्य सः। राजा शय्यादावलीकं सुप्तस्वामावृवन् स्मरन् ॥१६७॥ मद्भार्याप्यथ तं सुप्तं मत्वा तस्य शनैः शनैः । हस्तं प्रसारयामास गुदे दन्तोपलब्धये ॥१६८॥ गुदप्राप्ते च तत्पाणावुत्थाय सहसैव सः। डाकिनी डाकिनीत्युक्त्वा त्रस्तो राजा ततो ययौ ॥१६९॥ ततः प्रभृति सा तेन भीत्या त्यक्ता नृपेण मे। भार्या गृहीतसन्तोषा मदेकायतनं गता ॥१७०॥ एवं पूर्वं नृपाद् बुद्ध्या गृहिणी मोचिता मया। इति सां तापसीमुक्त्वा नापितः सोऽब्रवीत्पुनः ॥१७१॥ तदेतत्क्रमया कार्यमार्ये युष्माकमीप्सितम् । यया च क्रियते मातस्तन्दिं वच्मि ते शृणु ॥१७२॥ कोऽप्यन्तःपुरवृद्धोऽत्र स्वीकार्यो योऽब्रवीत्समुम् । [L23: जाया ते कदलीगर्भा डाकिनीति नृपं रहः ॥१७३॥ आरब्धवाया नाङ्गस्याः कश्चित्परिजनः स्वकः । सर्वं परो मेवसहो होतात्कुर्वीत किं न यत् ॥१७४॥ ततोऽस्मिन्त्रात्रि साधङ्के शवगान्निधि यत्नतः । हस्तपादादि कदलीगर्भाभामिनि निधीयते ॥१७५॥ तत्प्रभाते विनाक्यैव राजा सत्यमवेत्य तत् । शुद्धोक्तं कदलीगर्भा भीतस्तां त्यक्ष्यति स्वयम् ॥१७६॥ एवं सपत्नीविरहाद्देवी सुखमवाप्नुयात् । रक्षां च सा बहु मन्येत त्वाम् कपिश्चद् भवेच्च न ॥१७७॥

षष्ठ लम्बक ७४१

षष्ठ लम्बक ७४१ इस कारण क्षौरकर्म करते समय सुवृत्त और अच्छे लोहे का बना हुआ मेरा उस्तरा भी उन दाँतों से टकराकर टूट गया ॥१६३॥ इस प्रकार यदि मेरा उस्तरा पग-पग पर टूटता रहेगा तो मैं प्रतिदिन नया उस्तरा कहाँ से लाऊँगा ? इसलिए अब राजा के घर से मेरी जीविका नष्ट हो गई—यही कारण मेरे रोने का है ॥१६४॥ मेरे इस प्रकार कहने पर मेरी पत्नी ने रात को सोये हुए राजा के मुखद्वार में उगे हुए दाँतों के आश्चर्य को देखने का विचार किया ॥१६५॥ किन्तु संसार के प्रारम्भ से ही निश्चित इस असत्य को मेरी पत्नी ने नहीं समझा। मूर्खों की बातों से चतुर स्त्रियाँ भी ठगी जाती हैं ॥१६६॥ तदनन्तर राजा रात को आकर और मेरी पत्नी का निश्शंक उपभोग करके मेरी डाइन वाली बात का स्मरण करता हुआ झूठे ही सो गया ॥१६७॥ तदनन्तर मेरी पत्नी ने उसे सोया हुआ जानकर, दाँतों को देखने के लिए धीरे-धीरे उसके मुखद्वार की ओर हाथ बढ़ाया ॥१६८॥ उसका हाथ मुखद्वार पर पहुँचते ही सोने का बहाना करनेवाला राजा एकाएक उठकर डाइन ! डाइन ! चिल्लाता हुआ भागा ॥१६९॥ तब से राजा ने डर से मेरी स्त्री को त्याग दिया और मेरी स्त्री एकमात्र मेरे अधीन होकर सुखपूर्वक रहने लगी ॥१७०॥ इस प्रकार, पहले मैंने अपनी बुद्धि के बल पर अपनी स्त्री को राजा से छुड़ाया था। उस कपट-तपस्विनी से ऐसा कहकर वह नापित फिर बोला —'इसलिए हे आर्य, यह तुम्हारा कार्य बुद्धि से किये जाने योग्य है। इसे जिस प्रकार करना है, वह भी सुनो' ॥१७१-१७२॥ रनिवास के किसी वृद्ध नौकर को ठीक करना चाहिए जो राजा से एकान्त में यह कहे कि तेरी यह पत्नी कदलीगर्भा डाइन है ॥१७३॥ यह जंगली स्त्री है, इसका अपना सगा-सम्बन्धी कोई नहीं है। इसी प्रकार अन्यान्य नौकर सेवक आदि भी धन आदि के लोभ से फोड़े जा सकते हैं। कौन ऐसा काम है जो प्रलोभन में फँसकर न किया जा सके ? ॥१७४॥ तदनन्तर जब राजा के मन में शंका उत्पन्न हो जाय तो रात के समय किसी शव के कटे हाथ-पैर आदि कदलीगर्भा के शयनागार में रखवा दिये जायें, प्रातःकाल यह सब देखकर राजा भय से स्वयं उसे छोड़ देगा ॥१७५-१७६॥ इस प्रकार सौत के न रहने से महारानी सुखी हो जायगी। मुझे बहुत मानने लगेगी और हमें भी धन मिलेगा ॥१७७॥

४४२ कथासरित्सागर

४४२ कथासरित्सागर इत्युक्त्वा तापसी तेन नापितेन सहेति सा। गत्वा राज्ञो महादेव्यै यथावस्तु न्यवेदयत् ॥१७८॥ देवी च तत्तथा चक्रे सा तद्युक्त्या नृपोऽपि ताम्। प्रत्यक्षं वीक्ष्य कदलीगर्भा तुष्टेति तां जहौ ॥१७९॥ तुष्टया च ततो देव्या तया गुप्तमदायि यत्। प्रव्राजिका तद्बुभुजे सा यथेष्टं सनापिता ॥१८०॥ स्वयसा च कदलीगर्भा सा तेन दृढवर्मणा। राज्ञाभिशापसन्तप्ता निर्ययौ राजमन्दिरात् ॥१८१॥ येनाजगाम तेनैव प्रययौ पितुराश्रमम्। पूर्वोपजातसिद्धार्थसाभिज्ञानेन सा पथा ॥१८२॥ तत्र सामागतां दृष्ट्वा सोऽकस्मात्तत्पिता मुनिः। तस्या दुश्चरिताशङ्की तस्थौ मङ्कणकः क्षणम् ॥१८३॥ प्रणिधानाच्च सं कृत्स्नं तद्वृत्तान्तमवेत्य सः। आश्वास्य च स्वयं स्नेहात्तामादाय ययौ ततः ॥१८४॥ एत्य तस्मै तथाचख्यौ स्वयं प्रह्वय भूपते। देव्या सपत्नीदोषेण कृतं कपटनाटकम् ॥१८५॥ तत्कालं स्वयमभ्येत्य राज्ञे तस्मै स नापितः। यथावृत्तं तथाचष्ट पुनरेवमुवाच च ॥१८६॥ इत्थं विशोध्य कदलीगर्भा राज्ञी मया प्रभो! अभिचारवशाद्युक्त्या देवीं सन्तोष्य रक्षिता ॥१८७॥ तच्छ्रुत्वा निश्चय दृष्ट्वा मुनीन्द्रवचनस्य सः। जग्राह कदलीगर्भा सम्जातप्रत्ययो नृपः ॥१८८॥ अनुगम्य मुनिं तं च संविभेजे स नापितम्। भक्तो ममायमित्यर्थैर्धूर्तेर्भोज्या बतेश्वराः ॥१८९॥ ततस्तया समं तन्वी कदलीगर्भयैव सः। राजा स्वदेवीविमुखो दृढवर्मा सुनिवृतः ॥१९०॥ एवं विधान्विदधते सुबहुन्सपत्न्यो दोषा मुपाप्यनवमाङ्गि कलिङ्गसेने! त्वं कन्यका च चिरभाविविवाहलग्ना वाञ्छन्त्यचिन्त्यगतयश्च सुरा अपि त्वाम् ॥१९१॥

षष्ठ लम्बकः ७४५

[Header] षष्ठ लम्बकः ७४५

उस नाई के इस प्रकार कहने पर वह कपट-तपस्विनी उसकी बात को स्वीकार करके चली गई और महारानी को सब ठीक-ठीक बता दिया ॥१७८॥

महारानी ने भी ऐसा ही किया और परिणाम-स्वरूप राजा ने भी वह सब कुछ आंखों से देखकर कनकवर्मा को डाइन समझकर त्याग दिया ॥१७९॥

इससे प्रसन्न होकर महारानी ने उस दुष्ट भिक्षुणी को जो गुप्त धन दिया उस धन का उपयोग उसने नाई से मिलकर किया ॥१८०॥

वह कनकवर्मा भी राजा के अभिशाप से सन्त्रस्त होकर राजमहल से निकल गई। और जिस मार्ग से आई थी उसी मार्ग से पहले बोई हुई सरसों के क्षुपों की पहचान के सहारे वह अपने पिता के आश्रम में चली गई ॥१८१ १८२॥

ऋषि मंकणक इस प्रकार आई हुई कन्या को देखकर उसकी दुश्चरित्रता पर सन्देह करता हुआ कुछ समय के लिए ध्यानावस्थित हो गया ॥१८३॥

तदनन्तर समाधि में योगबल द्वारा समस्त वृत्तान्त जानकर स्नेहपूर्वक कन्या को स्वयं लेकर आश्रम से राजमहल में आ गया। आकर उसने प्रणाम करते हुए राजा से कहा— 'राजन्, धौत के दोष से यह सारा कपट-नाटक रचा गया है ॥१८४ १८४॥

उसी समय उस नापित ने जो कुछ हुआ था सब स्वयं जाकर राजा को बता दिया। और फिर बोला—'हे स्वामी मैंने इस प्रकार कनकवर्मा को आपसे पृथक् करके उसकी रक्षा की और महारानी को सन्तुष्ट किया' ॥१८६ १८७॥

इस प्रकार, मुनिवर बातों की सत्यता से विश्वस्त राजा ने कनकवर्मा को स्वीकार कर लिया। और ऋषि को कुछ दूर तक पहुँचाकर उन्हें बिदा करने के पश्चात् नापित को 'यह मेरा भक्त है' यह सोचकर उसने (राजा ने) उसे पर्याप्त धन दिया। खेद है कि राजा भी धूर्तों के धोप-भाजन होते हैं ॥१८८ १८९॥

तब से राजा दृढ़वर्मा अपनी महारानी से विमुख हो उस कनकवर्मा के साथ ही निश्चित होकर रहने लगा ॥१९ ॥

हे सुन्दर अंगोंवाली कलिङ्गसेने धौतें इस प्रकार के अनेक उपद्रव और दोष उत्पन्न कर देती हैं। तू बालिका है, तेरे विवाह का समय अभी दूर है और अतुलनीय प्रभाववाले देवता भी तुझे चाहते हैं ॥१९१॥

७४४ कथासरित्सागर

७४४ कथासरित्सागर संरम्भतः साम्प्रतमात्मना त्व मात्मानमेकं जगदेकरत्नम् ! वत्सेश्वरेकार्पितमन्तरङ्गे । वरं त्वदार्यं हि निजं प्रकर्य ॥१९२॥ अहं हि नेष्यामि सखि! त्वदन्तिक स्थिताधुना स्वं पतिमन्दिरे यत् । सखीगृहे संप्र न यान्ति सत्स्त्रियः सुगात्रि भर्त्राद्य निवारितास्मि च ॥१९३॥ न चाप्यगुप्तमिहागमं क्षमो मे त्वदतिस्नेहवशात्स दिव्यदृष्टिः । तद्वैत्ति हि मत्पतिः कथम्चित्तमनुज्ञाप्य किलागताहमद्य ॥१९४॥ इह नास्त्यधुना हि मामकीनं सखि कार्यं तव यामि तद्गृहम् । यदि मामनुमन्यते च भर्त्ता तदिहैष्यामि पुनर्बिलङ्घ्य लज्जाम् ॥१९५॥ इत्थं सबाष्पमभिधाय कलिङ्गसेनां तामश्रुधौतवदनां मनुजेन्द्रपुत्रीम् । आश्वास्य चाङ्गि विगलत्सुरेन्द्रपुत्री सोमप्रभा स्वभवनं नभसा जगाम ॥१९६॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे मदनमञ्चुकालम्बके षष्ठस्तरङ्गः

सप्तमस्तरङ्गः वत्सराजस्य कलिङ्गसेनायाश्च कथा (पूर्वानुवृत्ता) गतां सोमप्रभां यातां स्मरन्ती तां सखीं प्रियाम् । कलिङ्गसेना सन्त्यक्तनिजदेशस्वबान्धवा ॥१॥ सा विलम्बितवत्सेशपाणिग्रहमहोत्सवा । नरेन्द्रकन्या कौशाम्ब्यां मृगीवासीद् वनच्युता ॥२॥ कलिङ्गसेना वीवाहविलम्बनविषण्णधीः । गणकान् प्रति सासूय इव वत्सेश्वरोऽपि च ॥३॥