कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
विदूषकोऽपि सानन्दमभिनन्दितविक्रमः। राजपुत्र्या तया सत्र हृष्टस्तामनयन्निशाम् ॥३४३॥ प्रातश्च ज्ञातवृत्तान्तस्तुष्टस्तस्मै ददौ नृपः। विभवैः सह शौर्यैकपताकामिव तां सुताम् ॥३४४॥ स तया सह तत्रासीद्रात्रीः काश्चिद् विदूषकः। पवात्पदमिवोच्छन्त्या लक्ष्म्येव गुणवत्तया ॥३४५॥ एकदा च निशि स्वरं ततः प्रायात्प्रियोत्सुकः। लब्धदिव्यरसास्वादः को हि रज्येदसान्तरे ॥३४६॥ नगराच्च विनिर्गत्य स च सस्मार राक्षसम्। स्मृतमात्रमागतं तं च जगाद रचितानतिम् ॥३४७॥ सिद्धक्षेत्रे प्रयातव्यमुदयाद्रौ मया सखे। मद्राविद्याधरीहेतोस्तत्त्वं सत्र मां नय ॥३४८॥ तथेत्युक्तवतस्तस्य स्कन्धमारुह्य रक्षसः। ययौ च स तया गत्या दुर्गां षष्टियोजनीम् ॥३४९॥ प्रातश्च तीर्त्वा शीतोदामलङ्घ्यां मानुषैर्नदीम्। उदयाद्रेश्र्च प्रापसन्निकर्षमयत्नतः ॥३५०॥ अय स पर्वत श्रीमानुदयाख्यः पुरस्तव। अत्रोपरि च नास्त्येव सिद्धिधाम्नि गतिर्मम ॥३५१॥ इत्युक्त्वा राक्षसे तस्मिन्प्राप्तानुज्ञे तिरोहिते। दीर्घिकां स ददर्शैकां रम्यां सत्र विदूषकः ॥३५२॥ वदन्त्या स्वागतमिव भ्रमद्भ्रमरगुञ्जितैः। तस्यास्तीरे न्यषीदच्च फुल्लपद्माननश्रियः ॥३५३॥ स्त्रीणामिवात्र चापल्पत्त्वचपंक्तिः सुविस्तरात्। अद्य प्रियागमे मार्गस्त्वेतेसि ब्रुवतीमिव ॥३५४॥ अरूढव्योऽय गिरिमैरयस्तद्विह्व वर क्षणम्। स्थितो भवामि पश्यामि कस्यय पदपद्धतिः ॥३५५॥ इति चिन्तयतस्तस्य तत्र तोयार्थमाययुः। गृहीतकाञ्चनघटा भव्या सुयहवः स्त्रियः ॥३५६॥ वारिपूरितकुम्भाश्च ताः स पप्रच्छ योषितः। कस्येदं नीयते तोयमिति प्रणयपेशलम् ॥३५७॥
तृतीय लम्बक ३४९
तृतीय लम्बक ३४९ राजकुमारी से साहस और वीरता के लिए प्रशंसित प्रछन्नचित्त विदूषक ने वहीं रात बिताई ॥५४३॥ प्रातःकाल राजा ने सब वृत्तान्त जानकर विदूषक के शौर्य की अद्वितीय पताका के समान उस राजपुत्री को पर्याप्त दहेज (धन) के साथ उसके लिए दे दिया ॥५४४॥ विदूषक ने उसके गुणों से बँधी हुई अतएव उसका साथ न छोड़ती हुई लक्ष्मी के समान उन कुछ रात्रियों को राजकुमारी के साथ व्यतीत किया ॥५४५॥ एक दिन भद्रा के प्रति उत्सुक विदूषक रात में चुपचाप चल दिया। सच है, दिव्य रस का आस्वाद प्राप्त कर लेने पर कौन दूसरे रसों की चाह करता है? ॥५४६॥ नगर से बाहर निकलकर विदूषक ने राक्षस का स्मरण किया। स्मरण करते ही उपस्थित और नमस्कार करते हुए राक्षस को विदूषक ने कहा ॥५४७॥ 'मित्र ! मुझे उदय पर्वत पर सिद्धक्षेत्र में भद्रा नाम की विद्याधरी के लिए जाना है, इस लिए तुम मुझे वहाँ ले चलो' ॥५४८॥ 'ठीक है, चलो ऐसा कहते हुए राक्षस के कन्धे पर चढ़कर वह विदूषक रातो-रात दुर्गम और साठ योजन लम्बी शीतोदा नदी के किनारे पहुँचा। प्रातःकाल मनुष्यों के लिए अगम्य शीतोदा नामक नदी को पार करके, बिना परिश्रम ही उदयाचल के समीप जा पहुँचा ॥५४९-५०॥ उदय पर्वत के समीप पहुँच कर राक्षस ने कहा— श्रीमान् ! यह तुम्हारे सामने उदय पर्वत है। सिद्धों के निवास-स्थान इस पर्वत पर मेरी गति नहीं है ॥५५१॥ ऐसा कहकर और विदूषक की आज्ञा पाकर राक्षस के अन्तर्धान होने पर विदूषक ने वहाँ एक सुन्दर बावली देखी ॥५५२॥ खिले हुए कमलों से मुख-शोभा को धारण करती हुई वह बावली गुँजारते हुए भौरों के शब्दों से मानो उसका स्वागत कर रही थी ॥५५३॥ उस बावली के तट पर उसने स्त्रियों के पैरों की पंक्तियाँ देखीं जो मानों उसे यह कह रही थीं कि तुम्हारी प्रियतमा के मिलने का मार्ग यही है ॥५५४॥ विदूषक ने सोचा कि यह पर्वत मनुष्यों के लिए अलङ्घनीय है। अतः यहीं बैठकर देखता हूँ कि यह पैरों की पंक्तियाँ किस की हैं? ॥५५५॥ वह ऐसा सोच ही रहा था कि बहुत-सी सुन्दरियाँ सोने के घड़े लिये हुए जल भरने के लिए बावली पर आई ॥५५६॥ पानी से घड़े भर लेने के अनन्तर विदूषक ने उन सुन्दरियों से स्नेह-गरम शब्दों में पूछा कि यह जल किसके लिए ले जा रही हो ॥५५७॥
३५ कथासरित्सागर
३५ कथासरित्सागर आस्ते विद्याधरी भद्रा भद्रानामात्र पर्वते। इदं स्नानोदकं तस्या इति ताश्च तमब्रुवन् ॥३५८॥ चित्रं धातेव धीराणामारब्धोद्दामकर्मणाम्। परितुष्यन् सामग्रीं घटयत्युपयोगिनीम् ॥३५९॥ यथैका साहसं स्त्री तासां मध्यादुवाच तम्। महाभाग ! मम स्कन्धे कुम्भ उत्क्षिप्यतामिति ॥३६०॥ तथेति च घटे तस्याः स्कन्धोत्क्षिप्ते स बुद्धिमान्। निदधे भद्रया पूर्वं दत्तं रत्नाङ्गुलीयकम् ॥३६१॥ उपाविशच्च तत्रैव स पुनर्वीथिकातले। ताश्च तज्जसमादाय ययुर्भद्रागृहं स्त्रियः ॥३६२॥ यत्र ताभिश्च भद्रायास्तावत्स्नानाम्बु दीयते। तावत्तस्यास्तदुत्सङ्गे निपपाताङ्गुलीयकम् ॥३६३॥ तद्दृष्ट्वा प्रत्यभिज्ञाय भद्रा पप्रच्छ ताः सखीः। दृष्टः किं कोऽपि युष्माभिरिहापूर्वो पुमानिति ॥३६४॥ दृष्ट एको ऽस्माभिर्मानुषो वापिकातटे। तेनोत्क्षिप्तो घटश्चायमिति प्रत्यब्रुवंश्च ताः ॥३६५॥ ततो भद्रा अब्रवीच्छीघ्रं प्रक्लृप्तस्नानमण्डनम्। इहानयत गत्वा तं स हि मर्त्यः समागतः ॥३६६॥ इत्युक्ते भद्रया गत्वा यथावस्तु निवेद्य च। स्नातश्च सद्यस्त्याभिस्तत्रानिन्ये विदूषकः ॥३६७॥ प्रातश्च स ददर्शात्र भद्रां मार्गोन्मुखीं चिरात्। निजसत्त्वतरोः साक्षात् पक्वामिव फलश्रियम् ॥३६८॥ सापि दृष्ट्वा तमुत्थाय हर्षबाष्पाम्बुसीकरैः। दत्तार्घेव बबन्धास्य कण्ठे भुजलतास्रजम् ॥३६९॥ परस्परालिङ्गितयोस्तयोः स्वेदच्छलादिव। अतिपीडनतः स्नेहः सस्यन्दे चिरसम्भृतः ॥३७०॥ अथोपविष्टयोरन्योन्यमक्ष्णोस्तृप्तौ विलोकने। उभौ शतगुणीभूतामिवोत्कण्ठामुदूहतुः ॥३७१॥ आगतोऽसि कथं भूमिमिमामिति च भद्रया। परिपृष्टः स तत्कालमुवाचेदं विदूषकः ॥३७२॥
तृतीय लम्बक ३५१
तृतीय लम्बक ३५१ उन सुन्दरियों ने कहा—भद्र ! इस पर्वत पर भद्रा नाम की विद्याधरी निवास करती है। यह उसके स्नान का जल है॥३५८॥ यह सत्य है कि साहसिक कार्यों को प्रारम्भ करनेवाले वीरों के लिए विधाता स्वयं ही उपयोगी सामग्री घटित कर देता है॥३५९॥ इतने में ही उन सुन्दरियों में से एक बोली—हे महापुरुष ! घड़े को मेरे कन्धे पर रख दो॥३६०॥ तब बुद्धिमान् विदूषक ने घड़े को उसके कन्धे पर रखते हुए, भद्रा की दी हुई रत्नों की अंगूठी को उस (घड़े) में धीरे से रख दिया॥३६१॥ और उसी बावली के किनारे फिर बैठ गया। वे स्त्रियाँ पानी लेकर भद्रा के घर चली गई। वहाँ जब वे भद्रा को पानी देकर स्नान कराने लगीं तब वह अंगूठी (भद्रा) उसकी गोद में गिर पड़ी॥३६२-३६३॥ उसे देखकर भद्रा ने सहेलियों से पूछा कि क्या तुम लोगों ने किसी नये मनुष्य को देखा है॥३६४॥ उन्होंने कहा—हाँ हम लोगों ने नदी के किनारे एक जवान मनुष्य को देखा है उसने ही यह घड़ा भी उठवा दिया था॥३६५॥ तब भद्रा बोली—तुम लोग उसे स्नान और वेश-भूषा आदि से सज्जित करके शीघ्र ही मेरे पास ले आओ वह मेरा पति आया है॥३६६॥ भद्रा के इस प्रकार कहने पर और सब कुछ विदूषक से निवेदन करके उसकी सहेलियाँ स्नान किये विदूषक को भद्रा के पास ले आईं॥३६७॥ विदूषक ने उत्सुकता के साथ राह देखती हुई भद्रा को अपने साहस-रूपी वृक्ष के पके हुए फल के समान देखा॥३६८॥ भद्रा भी उसे देखकर हर्ष के आँसुओं से मानों अर्घ्य देती हुई उसके गले में लिपट गई और उसे अपनी भुज-लता रूपी पाश से बाँध लिया ॥३६९ ३७ ० ॥ तदनन्तर बैठे हुए दोनों परस्पर देखते हुए अघाते नहीं थे। मानों सैकड़ोंगुनी बढ़ी हुई सात्कंठा (चाह) उनमें भरी थी॥३७१॥ 'इस स्थान पर कैसे आये ? भद्रा के इस प्रकार पूछने पर विदूषक उसी समय बोला—॥३७२॥
१५२ कथासरित्सागर
१५२ कथासरित्सागर समालम्ब्य भवरत्नहमारुह्य प्रागसदायान् । सुबहुनागतोऽस्मीह किमन्यद् वच्मि सुन्दरि ! ॥३७३॥ सञ्छ्रुत्वा तस्य दृष्ट्वा तामनपेक्षितजीविताम्। प्रीतिं काष्ठागतस्नेहा सा भद्रा समभाषत ॥३७४॥ आर्यपुत्र न मे कार्य सखीभिन च सिद्धिभिः। त्वं मे प्राणा गुणक्रीता दासी चाहं तव प्रभो ! ॥३७५॥ विदूषकस्ततोऽवादीत्तार्हगच्छ मया सह। मुक्त्वा दिव्यमिमं भोगं वस्तुमुज्जयिनीं प्रिये॥३७६॥ तथेति प्रतिपन्ने सा भद्रा सपदि तद्गृहम्। तरङ्गुल्पपरिभ्रष्टा विद्याश्च तृणवज्जहौ ॥३७७॥ ततस्तया समं सद्यं स विशद्याम तां निशाम्। क्लप्तोपचारस्तत्सख्या योगेश्वर्या विदूषक ॥३७८॥ प्रातश्च भद्रया साकमवतीर्योदयाद्रितः। सस्मार यमदंष्ट्रं तं राक्षसं स पुन कृती ॥३७९॥ स्मृतमात्रागतस्योक्त्वा गन्तव्याध्वक्रमं निजम्। सस्याऽऽरोह स स्कन्धे भद्रामारोप्य तां पुरः॥३८०॥ सापि सेहे तवत्युग्रराक्षसांसाधिरोहणम्। अनुराग-परायत्ता कुर्वते किं न योषितः ॥३८१॥ रक्षोऽधिरूढश्च तत स प्रतस्थे प्रियासखः। विदूषकः पुनः प्राप तच्च कार्कोटक पुरम् ॥३८२॥ रक्षोदर्शनसंत्रास तत्र व्यालोकितो जनः। दृष्ट्वायमर्त्तनृपतिं स्वां भार्यां मार्गति स्म च ॥३८३॥ दत्तां तेम गृहीत्वा च तत्सुतां तां भुजङ्गिताम्। तश्व राक्षसास्कन्धः स प्रतस्थे पुरातनः ॥३८४॥ गत्वाम्बुधेस्तटे प्राप पापं तं वणिजं च सः। यनास्य वारिधौ पूर्वं छिन्नाः क्षिप्तस्य रज्जवः ॥३८५॥ जहार तस्य च सुतां वणिजः स धनेः सह। प्रागम्बुधौ प्रवहणप्रमोचनपणार्जिताम् ॥३८६॥ धनापहारमेवास्य वधं मेने च पाप्मनः। कवर्त्तणां पुरे प्राप्ता प्रायण प्रार्थसञ्चयाः ॥३८७॥
तृतीय लम्बक १५३
तृतीय लम्बक १५३ 'तुम्हारे प्रेम के सहारे अनेक प्रकार के प्राण-संशयों को प्राप्त करते हुए आया हूँ और क्या कहूँ ?' यह सुनकर और प्राणों की परवा न करनेवाले उसके प्रेम को देखकर अत्यन्त स्नेह- पूर्ण भद्रा उससे बोली—॥१७३। १७४॥ 'आर्यपुत्र ! मुझे अपनी सखियों या सिद्धियों से कुछ भी प्रयोजन नहीं। हे स्वामी ! मैं तो तुम्हारे गुणों से खरीदी हुई दासी हूँ' ॥१७५॥ तब विदूषक बोला—'यदि ऐसा है तो मेरे साथ आओ। इस दिव्य भोग को छोड़कर उज्जयिनी रहने के लिए चलो' ॥१७६॥ भद्रा ने तुरन्त उसकी बात स्वीकार कर ली और इस प्रकार का विचार करने से नष्ट हुई विद्या को तृण के समान छोड़ दिया ॥१७७॥ भद्रा की सभी योगेश्वरों के समस्त प्रबन्ध करने पर विदूषक ने उस रात को वहीं विश्राम किया ॥१७८॥ और प्रातःकाल ही भद्रा के साथ उदयाचल से नीचे उतर कर यमदंष्ट्र नामक राक्षस को विदूषक ने फिर याद किया ॥१७९॥ स्मरण करते ही उपस्थित राक्षस को मार्ग के कायक्रम बताकर और भद्रा को उसके कन्धे पर चढ़ाकर विदूषक स्वयं भी उस पर सवार हो गया ॥१८०॥ उस अति कोमल भद्रा ने भी राक्षस के कठोर कन्धे पर चढ़ने का कष्ट सहन किया। प्रेम-परार्धीन रमणियां क्या नहीं करतीं ? ॥१८१॥ प्रेयसी के साथ राक्षस पर सवार विदूषक फिर उसी कर्कोटक नगर में पहुँचा ॥१८२॥ राक्षस को देखने के कारण व्याकुल जनता न देखा जाता हुआ विदूषक जरा आर्यवर्मा के समीप गया और अपनी पत्नी को सौंपा ॥१८३॥ कान-फूसूफ़ से ज्ञात की हुई आर्यवर्मा की लड़की को साथ लेकर उसी प्रकार राक्षस पर सवार होकर वह वर्द्धमान नगर में चला ॥१८४॥ समुद्र के तट पर पहुँच कर उसने उस पूर्व बनिये को पकड़ा, जिसके छोटे जहाज को छुड़ाकर लाने से उसकी कन्या को जीत लिया था और जिसने पहले रानी बनकर उस नगर में रहने के लिए छोड़ दिया था ॥१८५॥ विदूषक ने उसको सब बात बतलाकर विदा किया। सजनता को ही उसने बीज के रूप में उगा हुआ, क्योंकि यश ही मनुष्य का दूसरा जन्म होता है ॥१८६॥ इस प्रकार बनिये की बेटी को लेकर उसी राक्षस-रूपी रथ पर बैठा हुआ विदूषक उठा और राजकुमारी के रम्य आवास के तट गया ॥१८७॥ ४५
१५४ कथासरित्सागर
१५४ कथासरित्सागर ततो रक्षोरथात्स्वस्तामानीय वणिक्सुताम्। स मद्राजपुत्रीभ्यां सहवोदपतन्नभः ॥३८८॥ दर्शयन्निजकान्तानां द्युमार्गेण ततार च। विलसत्सत्त्वसंरम्भं स्वपौरुषमिवाम्बुधिम् ॥३८९॥ प्राप तच्च स भूयोऽपि नगरं पौण्ड्रवर्धनम्। दृष्टः सविस्मयं सर्वैर्वाहनीकृतराक्षसः ॥३९०॥ तत्र तां देवसेनस्य सुतां राज्ञश्चिरोत्सुकाम्। भार्यां सम्भावयामास राक्षसावजयार्जिताम् ॥३९१॥ रुध्यमानोऽपि तत्पित्रा स स्वदेशसमुत्सुकः। गृहीत्वा तामपि ततः प्रायादुज्जयिनीं प्रति ॥३९२॥ अचिरेण च तां प्राप पुरीं राक्षसयोगतः। बहिर्गतामिवारामीयवेशदर्शननिर्वृतिम् ॥३९३॥ अधोपरिस्थितस्तस्य महाकायस्य रक्षसः। अस्पृष्टद्भूध्रकान्तिप्रकटितारमनः ॥३९४॥ स जनैर्ददृशे तत्र शिखरे ज्वसितोषधौ। द्यक्षाङ्क इव पूर्वाद्रिसवयस्यो विदूषकः ॥३९५॥ ततो विस्मितविभ्रस्ते जने श्रुत्वेत्थाम् भूपतिः। आदित्यसेनो निरगात्स्वश्वशुरोऽस्य तदा पुरः ॥३९६॥ विदूषकस्तु दृष्ट्वा तमवतीर्णाशु राक्षसात्। प्रणम्य नृपमभ्यागाद्भूयोऽप्यभिननन्द तम् ॥३९७॥ अवतार्यैव तत्स्कन्धात् स्वभार्यास्ततोऽग्रिणः। मुमोच शापपाराय राक्षसः स विदूषकः ॥३९८॥ गते च राक्षसे तस्मिन्स तन सह भूभुजा। श्वशुरेण सभार्यः सन् प्राविशद्राजमन्दिरम् ॥३९९॥ तत्र तां प्रथमां भार्यां तनयां तस्य भूपतेः। आनन्दयदुपागत्य चिरोत्कण्ठावशीकृताम् ॥४००॥ कयमेतास्त्वया भार्याः प्राप्ताः कद्नप राक्षसाः। इति पृष्टः स राज्ञाथ सवमस्मै शशंस तत् ॥४०१॥ ततः प्रभावतुष्टेन तेन तस्य महीभृता। जामातुर्निजराज्याय प्रदत्त कायवंदिना ॥४०२॥
तृतीय लम्बक १५५
[Page Header] तृतीय लम्बक १५५
आकाश-मार्ग से समुद्र में किये गये अपने पौरुष का वर्णन करता हुआ विदूषक क्रमशः समुद्र पार कर गया ॥३८८॥ इस प्रकार, वह क्रमशः पौण्ड्र-वर्धन नगर में पहुँचा। राक्षस को वाहन बनाये हुए उस विदूषक को सभी पुरवासी आश्चर्य से देख रहे थे ॥३८९-३९०॥ पौण्ड्रवर्धन नगर में विदूषक ने राक्षस को पराजित की हुई चिरकाल से उत्सुक देवसेन राजा की कन्या का स्वाभत किया ॥३९१॥ राजा देवसेन द्वारा रोका जाता हुआ भी विदूषक उज्जैन जाने के लिए उत्सुक हो रहा था अतः वहाँ रुका नही और उसे भी साथ लेकर उज्जैन पहुँचा ॥३९२-३९३॥ विशाल शरीरवाले राक्षस के ऊपर बैठे हुए और कन्धे पर बैठी हुई अपनी वधू की शोभा से शोभित होते हुए विदूषक को उज्जयनी की जनता ने जलती हुई ओषधियोंवाले पूर्वाचल के शिखर पर चमकते हुए चन्द्रमा के समान देखा ॥३९४-३९५॥ नागरिकों के आश्चर्यचकित और व्याकुल होने पर समस्त वृन्तान्त जानकर विदूषक का श्वसुर राजा आदित्यसेन उसके सम्मुख आया ॥३९६॥ तब विदूषक ने राक्षस के कन्धे से शीघ्र ही उतरकर राजा को प्रणाम किया। राजा ने भी उसका अभिनन्दन किया ॥३९७॥ तदनन्तर विदूषक ने राक्षस के कन्धे पर बैठी हुई सभी पत्नियों को उतारकर उसे स्वतन्त्रता-पूर्वक विचरण करने के लिए छोड़ दिया ॥३९८॥ राक्षस के चले जाने पर विदूषक अपनी पत्नियों को लिये हुए राजा के साथ राजभवन में गया। राजभवन में जाकर राजा की कन्या और अपनी प्रथम पत्नी से मिला जो चिरकालीन विरह के कारण अत्यन्त उत्कण्ठित हो रही थी ॥३९९-४००॥ उज्जयिनी-नरेश आदित्यसेन ने विदूषक के प्रभाव को देखकर उसे अपने जामाता का आधा राज्य प्रदान कर दिया ॥४०१॥ राजा ने विदूषक से पूछा कि ये इतनी पत्नियां कैसे प्राप्त कीं और यह राक्षस कौन है? विदूषक ने क्रमशः सारा वृत्तान्त सुना दिया ॥४०२॥
१५६ कथासरित्सागर
१५६ कथासरित्सागर सत्यशौच स राजाभूद् विप्रो मूर्खा विद्रूपकः। समुच्छ्रितसितच्छत्रो विधूतोभयचामरः॥४०३॥ सदा च मङ्गलाऽतोद्य-वाद्यनिर्ह्रादनिर्भरम्। प्रहर्षमुक्तनादेव रराजोज्जयिनी पुरी॥४०४॥ इत्याप्तराज्यविभवः क्रमशः स कृत्स्नां जित्वा महीमखिलराजकपूजिताङ्घ्रिः। तामि समं विगतमत्सरमिव ताभि र्भ्रातृंस्तदधिरभरस्त निजप्रयामि॥४०५॥ इत्यनुकूले दैवे भजति निजं सत्वमेव धीराणाम्। लक्ष्मीरासाकर्षणसिद्धमहामोदमन्त्रत्वम्॥४०६॥ इत्थं श्रुत्वा वत्सराजस्य वक्त्राच्चित्रामेतामद्भुतार्थां कथां ते। पार्श्वसीना मन्त्रिमुख्यास्त्य सर्वे देव्यौ चापि प्रीतिमग्र्यामवापुः॥४ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे लावानककलम्बके चतुर्थस्तरङ्गः।
पञ्चमस्तरङ्गः वत्सराजकृतं विद्याराधनम् ततो वत्सेश्वरं प्राह तत्र यौगन्धरायणः। राजन्! दैवानुकूल्यं च विद्यते पौरुषं च ते॥१॥ नीतिमार्गे च वयमप्यत्र किञ्चित् कृतश्रमाः। तद्यथा चिन्तितं शीघ्रं कुरुष्व विजयं दिशाम्॥२॥ इत्युक्ते मन्त्रिमुख्येन राजा वत्सेश्वरोऽब्रवीत्। अस्त्वेतद् बहुविघ्नास्तु सदा कल्याणसिद्धयः॥३॥ अतस्तदर्थं तपसा शम्भुमाराधयाम्यहम्। विना हि तत्प्रसादेन कुतो वाञ्छितसिद्धयः॥४॥ तच्छ्रुत्वा च तपस्तस्य मन्त्रिणोऽप्यनुमेनिरे। सेतुबन्धोद्यतस्याब्धौ रामस्येव कपीश्वराः॥५॥
१ चतुर्विध वाद्यानां संमिश्रितः शब्दः 'आतोद्य' इत्युच्यते।
तृतीय लम्बक ३५७
तृतीय लम्बक ३५७ आधा राज्य प्राप्त करके वह विदूषक उसी क्षण राजा बन गया। उसके मस्तक पर ऊँचा छत्र रच गया और चारों ओर चँवर डुलने लगे॥४३॥ मांगलिक बाजों के शब्द से भरी हुई नगरी ऐसी मालूम हो रही थी मानो हर्ष के कारण प्रसन्नता प्रकट कर रही हो॥४४॥ इस प्रकार राज्य-वैभव प्राप्त करके विदूषक धीरे-धीरे सारी पृथ्वी को विजय करके स्नेह से एक साथ रहती हुई भद्रा आदि पत्नियों के साथ चिरकाल तक आनन्द का अनुभव करता रहा॥४५॥ इस प्रकार, दैव के अनुकूल होने पर मनुष्य का अपना ही बल और साहस लक्ष्मी को हठ पूर्वक आकृष्ट करने का महामन्त्र हो जाता है॥४६॥ आश्चर्यमयी इस कथा को वत्सराज के मुंह से सुनकर वे सभी यौगन्धरायण आदि मन्त्री तथा दोनों महाराणियां (वासवदत्ता पद्मावती) अत्यन्त प्रसन्न हुईं ॥४७॥ चतुर्थ तरङ्ग समाप्त पंचम तरंग वत्सराज के द्वारा शिव की आराधना तब यौगन्धरायण ने वत्सराज से कहा—'महाराज ! इस समय आपका दैव (भाग्य) अनुकूल है और पुरुषार्थ (बल) तुममें है ही। इधर हमलोग (मन्त्रिगण) भी राजनीतिक दाँव- पेंचों के जानकार हैं इसलिए जैसा सोचा गया है तदनुसार पृथ्वी का विजय करो'॥१ २॥ यह सुनकर वत्सराज ने कहा—'यह ठीक है, किन्तु कल्याण-साधना में विघ्न बहुत होते हैं ॥३॥ इसलिए मैं इस विजय की सिद्धि के लिए मैं तप द्वारा शिव जी की आराधना करता हूँ क्योंकि उनकी कृपा के बिना इष्ट सिद्धि कैसे हो सकती है' ॥४॥ राजा की इस इच्छा का सभी मन्त्रियों ने इस प्रकार अनुमोदन किया जिस प्रकार सेतु बाँधने के लिए उद्यत रामजी के दिशागमन के लिए सभी वानरों ने अनुमोदन किया था॥५॥
१५८ कथासरित्सागर
१५८ कथासरित्सागर ततस्तं सह देवीभ्यां सचिवैश्च तपःस्थितम्। त्रिरात्रोपोषितं भूपं शिवः स्वप्ने समादिशत् ॥६॥ तुष्टोऽस्मि ते समुत्तिष्ठ निर्विघ्नं जयमाप्स्यसि। सर्वविद्याधराधीशं पुत्रं धवाचिरादिति ॥७॥ ततः स बुबुधे राजा तत्प्रसादाद्धतक्लमः। अर्कांशुश्वसिताप्यायि प्रतिपच्चन्द्रमा इव ॥८॥ आनन्दयच्च सचिवानां प्रातः स्वप्नेन तेन सः। व्रतोपवासक्लान्ते च देव्यौ द्वे पुष्पकोमले ॥९॥ तत्स्वप्नश्रवणेनैव श्रोत्रपेयेन तृप्तयोः। तयोश्च विमलावाव जात: स्वास्थ्योपचक्रमः ॥१०॥ लेभे स राजा तपसा प्रभावं पूर्वजैः समम्। पुण्यां पतिव्रतानां च तत्पत्न्योः कीर्तिमापतुः ॥११॥ उत्सवव्यग्रपौरैश्च विहितव्रतपारणः। यौगन्धरायणोऽन्यद्युरिति राजानमब्रवीत् ॥१२॥ धन्यस्त्वं यस्य चैवेत्थं प्रसन्नो भगवान् हरः। तदिदानीं रिपून् जित्वा भज लक्ष्मीं भुजार्जिताम् ॥१३॥ सा हि स्वकर्मसम्भूता भूभृतामन्वये स्थिरा। निजधर्माजितानां हि विनाशो नास्ति सम्पदां ॥१४॥ तथा च चिरभूमिष्ठो निधिः पूर्वजसम्भृतः। प्रनष्टो भवता प्राप्तः किं चात्रेतां कथां शृणु ॥१५॥ देवदासवैश्यस्य कथा बभूव देवदासाख्यः पुरे पाटलिपुत्रके। [L24: पुरा कोऽपि वणिक्पुत्रो महाधनकुलोद्गतः ॥१६॥ अभवत्तस्य भार्या च नगरात् पौण्ड्रवर्धनात्। परिणीता समृद्धस्य कस्यापि वणिजः सुता ॥१७॥ गते पितरि पञ्चत्वं क्रमेण व्यसनान्वितः। स देवदासो द्यूतेन सर्वं धनमहारयत् ॥१८॥ ततश्च तस्य सा भार्या दुःसवाद्दारिद्र्यदुःखिता। एरयं नीता निजं गृहं स्वपित्रा पौण्ड्रवर्धनम् ॥१९॥
तदनन्तर राजा रानियां और मन्त्रियों के साथ तीन रात तक उपवास करते हुए राजा को शिवजी ने स्वप्न में आदेश दिया ॥६॥ 'मैं तुमसे प्रसन्न हूँ लगे तुम बिना किसी विघ्न-बाधा के विजय प्राप्त करोगे' ॥७॥ शिवजी के प्रसाद से कष्ट रहित राजा इस प्रकार उद्यत हुआ जिस प्रकार सूर्य की किरणों से वृद्धि प्राप्त करके प्रतिपदा का चन्द्रमा शोभित होता है ॥८॥ प्रभातकाल में उठकर राजा ने मन्त्रियो तथा व्रत-उपवास से क्लान्त फूल के समान कोमल दोनों पत्नियों को स्वप्न का वर्णन करके हर्षित कर दिया ॥९॥ कानों द्वारा पीने (सुनने) के योग्य उस स्वप्न के कथन से दोनों महारानियों को मानों मीठी औषधि का उपचार हुआ ॥१०॥ राजा वत्सराज ने तपस्या के प्रभाव से अपने पूर्वजा के समान प्रभाव प्राप्त किया। और, उसकी दोनों पत्नियों ने पतिव्रताता की पवित्र कीर्ति प्राप्त की ॥११॥ व्रत की समाप्ति के उत्सव पर समस्त नगरवासी उत्सव में व्यग्र रहे। उसके दूसरे दिन यौगन्धरायण ने राजा को कहा ॥१२॥ स्वामी ! तुम धन्य हो जिस पर शिवजी इस प्रकार प्रसन्न हैं। इसलिए तुम अब शत्रुओ को जीतकर अपनी भुजा से अर्जित लक्ष्मी प्राप्त करो ॥१३॥ अपन धर्म से प्राप्त सम्पत्ति का विनाश नहीं होता ॥१४॥ इसीलिए तुमने अपने पूर्वजों की चिरकाल से भूमि में गड़ी हुई नष्ट लक्ष्मी को प्राप्त किया है। इस पर एक कथा सुनो ॥१५॥ देवदास वैश्य की कथा पाटलिपुत्र नगर में बड़े धनी कुल में उत्पन्न देवदास नामका वैश्य-पुत्र था ॥१६॥ उसकी पत्नी पौण्ड्रवर्धन नगर के किसी धनी वैश्य की कन्या थी ॥१७॥ पिता के मर जाने पर व्यसनी देवदास ने जुए में सारा धन गँवा दिया ॥१८॥ उसके दरिद्र हो जाने पर उसकी पत्नी दुःख से कष्ट में रहती थी। इसलिए उसका धनी पिता आकर उसे अपने घर (पौण्ड्रवर्धन) ले गया ॥१९॥
६६ कथासरित्सागर
६६ कथासरित्सागर शनै सोऽपि विपत्सिन्धौ स्थातुमिच्छन् स्वकर्मणि। मत्स्यार्थी देवदासस्तं श्वशुरं याचितुं ययौ ॥२०॥ प्राप्तश्च सन्ध्यासमयं सत्पुरं पौण्ड्रवर्धनम्। रजोरूक्ष विवस्त्र च वीक्ष्यात्मानमचिन्तयत् ॥२१॥ ईदृशः प्रविशामीह कथं श्वशुरवेश्मनि। वरं हि मानिनो मृत्युर्न दैन्यं स्वजनाग्रतः ॥२२॥ इत्यालोक्यापणे गत्वा स क्वापि विपणेर्बहिः। नक्तं सङ्कुचितस्तस्थौ तत्काल कमलोपमः ॥२३॥ क्षणाच्च तस्यां विपणौ प्रविशन्तं व्यलोकयत्। युवानं वणिजं कञ्चिदुद्घाटितकवाटकम् ॥२४॥ क्षपान्तरे स तत्रैव निश्शब्दपदमागताम्। द्रुतमन्तःप्रविष्टां च स्त्रियमेकां ददर्श सः ॥२५॥ ज्वलत्प्रदीपे यावच्च ददौ दृष्टिं तदन्तरे। प्रत्यभिज्ञातवांस्तावत्तां निजानेव गेहिनीम् ॥२६॥ ततः सोऽङ्कितद्वारो भार्यां तामन्यगामिनीम्। दृष्ट्वा दुःखाग्निदग्धो देवदासो व्यचिन्तयत् ॥२७॥ धनहीनेन देहोऽपि ह्रीयते स्त्रीषु का कथा। निसर्गेनियतं वासां विद्युतामिव चापलम् ॥२८॥ सैवेयं सा विपत्सूता व्यसनार्णवपातिनाम्। गतिः सद्यः स्वतन्त्रायाः स्त्रियाः पितृगृहे स्थितेः ॥२९॥ इति सञ्चिन्तयंस्तस्या भार्याया स बहिः स्थितः। रतान्तविस्रम्भजुषं कथालापमिवाशृणोत् ॥३०॥ उपेत्य च ददौ द्वारि स कर्णं सापि तत्क्षणम्। इत्यब्रवीदुपपतिं पापा सा वणिजं रहः ॥३१॥ शृण्विदं कथयाम्यद्य रहस्यं तेऽनुरागिणी। मद्दर्त्तुर्वीरवर्मस्य पुराऽभूत्प्रपितामहः ॥३२॥ स्वगृहस्याङ्गणं तेन चत्वारः स्वर्णपूरिताः। कुम्भाश्चतुर्षु कोणेषु निगूढा स्थापिता भुवि ॥३३॥ तवेकस्याः स्वभार्यायाः स चक्रे विदितं तदा। तद्भार्या चान्तकाले सा स्नुषायै तदबोधयत् ॥३४॥ सापि स्नुषायै मञ्छ्वश्र्वै मञ्छ्वशूरोब्रवीच्च मे। इत्ययं मत्पतिगृहस्यैष बभूवक्रममुपागतम् ॥३५॥
तृतीय लम्बर १६१ कुछ दिनों तक स्वयं कष्ट पाता हुआ और कुछ व्यापार के लिए श्वशुर से धन पाने की इच्छा से देवदास उनके पास गया॥१२॥ और मैला-कुचैला धूल से भरा हुआ वह सायंकाल पौण्ड्रवर्धन नगर में पहुँचा। अपनी ऐसी स्थिति देखकर सोचने लगा कि इस हालत में ससुराल कैसे जाऊँ। दरिद्र व्यक्ति के लिए मर जाना अच्छा है, किन्तु अपने सम्बन्धियों के आगे दीनता प्रदर्शन उचित नहीं ॥२१-२२॥ ऐसा सोचकर वह बाजार में आकर किसी दूकान के बाहर चौंतरे पर रात में कमल के समान सिमटकर पड़ा रहा॥२३॥ कुछ ही देर बाद उसने दूकान का दरवाजा खोलकर उसमें घुसते हुए किसी युवक वैश्य को देखा। कुछ ही समय के बाद एक पांथा आई हुई और जल्दी से दूकान में घुसी किसी स्त्री को देखा ॥२४-२५॥ दूकान के अन्दर जलते हुए दीप के प्रकाश से दरवाजे की दरार से जब उसने अन्दर झाँका तब अपनी पत्नी को देखा और पहचान लिया॥२६॥ अन्दर से द्वार बन्द करके अन्य पुरुष के संसर्ग में अपनी पत्नी को देखकर उस पर मानों वज्रपात-सा हुआ और वह सोचने लगा॥२७॥ बुरे व्यसनों के समूह में पड़े हुए पुरुष के लिए ऐसी विपत्तियाँ सुलभ हैं। धनहीन व्यक्ति शरीर को भी बेच देता है, स्त्रिया की तो बात ही क्या जिसका जीवन स्वभावतः विद्युत् के समान चंचल होता है? ॥२८॥ पिता के घर में रहनेवाली स्वतन्त्र स्त्री की यही गति होती है॥२९॥ ऐसा सोचता वह बाहर बैठा हुआ अपनी स्त्री तथा उसके उपपति का गुप्त वार्तालाप सुनने लगा॥३०॥ उसने दूकान के द्वार पर जाकर कान लगाया तो वह पापिन स्त्री एकान्त में उस अपने उपपति वैश्य से कह रही थी कि तेरे प्रति मेरा प्रेम है, इसलिए कहती हूँ सुनो॥३१॥ मेरे पति का परदादा वीरवर्मा था उसने अपने घर के आँगन के चारों कोनों में सोने की अशर्फियों से भरे चार घड़े छिपाकर गाड़े हैं। यह बात उसने अपनी एक स्त्री से कही थी उस स्त्री ने मरने के समय उसकी बहू (पतोहू) से बता दी। उसने अपनी बहू (मेरी सास) को यह बतलाया और मेरी सास ने मुझसे कहा। इस प्रकार मेरे पति के कुल में सासों के द्वारा इस धन की जानकारी के लिए परम्परा चल रही है॥३२-३५॥ ४१
स्वभर्तुस्तच्च न मया दरिद्रस्यापि वर्णितम् । स हि द्यूतरतो द्वेष्यस्त्वं तु मे परमः प्रियः ॥३६॥ तत्तत्र गत्वा मद्भर्तुः सकाशात्तद्गृहं धनैः । क्रीत्वा तत्प्राप्य च स्वर्णमिहैत्य भज मां सुखम् ॥३७॥ एवमुक्तः कुटिलया स तयोपपतिर्वणिक् । सुतोष तस्य मन्वानो निधिं लब्ध्यमयत्नतः ॥३८॥ देवदासोऽपि कुभ्रूवाक्शल्यैस्तैर्हृदिहतः । कीलितामिव तत्काल धनाशां हृदये दधौ ॥३९॥ जगाम च ततः सद्यः पुरं पाटलिपुत्रकम् । प्राप्य च स्वगृहं लब्ध्वा निधानं स्वीचकार तत् ॥४०॥ अथाजगाम स वणिक्त्तद्भार्याच्छन्नकामुकः । तमत्र ददृशे वाणिज्यव्याजान्न निधिलोलुपः ॥४१॥ देवदाससकाशाच्च क्रीणाति स्म स तद्गृहम् । देवदासोऽपि मूल्येन भूयसा तस्य तद्ददौ ॥४२॥ ततो गृहस्थितिं कृत्वा युक्त्या श्वशुरवेश्मनः । स देवदासः शीघ्रं तामानाय स्वगेहिनीम् ॥४३॥ एवं कृते च तद्भार्याकामुकः स वणिक्शठः । असम्पन्निधिरभ्येत्य देवदासमुवाच तम् ॥४४॥ एतद्भवद्गृहं जीर्णं मह्यं न खलु रोचते । तद्देहि मे निजं मूल्यं स्वगृहं स्वीकुरुष्व च ॥४५॥ इति जल्पंश्च स वणिग् देवदासश्च विब्रुवन् । उभौ विवादमत्तौ तौ राजाग्रेमुपजग्मतुः ॥४६॥ तत्र स्वभार्यावृत्तान्तं यदास्यविषदुःसहम् । देवदासो नरेन्द्राय कृत्स्नमद्गिरति स्म तम् ॥४७॥ तत्तदाभाष्य तद्भार्यां तत्त्वं चान्विच्य भूपतिः । अदण्डयत् सर्वस्वं वणिजं परदारिकम् ॥४८॥ देवदासोऽपि तुष्टभूः त्यक्त्वा तां क्षिप्रमागिराम् । अन्यां च परिणीयाथ तस्थौ लब्धनिधिः सुखम् ॥४९॥
१ वरदारामङ्गदनमन्वन्थि खण्डम् ।
तृतीय लम्बक १६१
तृतीय लम्बक १६१ मेरा पति यद्यपि दरिद्र है फिर भी मैंने उससे नहीं कहा। वह जुआरी है इसलिए मेरा शत्रु है और तुम मेरे परम प्रिय हो। इसलिए तुमसे कह रही हूँ॥३६॥ अतः तुम जाकर और धन देकर मेरे पति से उसका मकान खरीद लो और उस धन को निकालकर यहाँ आकर मेरे साथ सुख से रहो॥३७॥ उस कुटिला स्त्री से इस प्रकार कहा गया उसका जार (यार) बिना परिश्रम धन-प्राप्ति की आशा से प्रसन्न हो गया॥३८॥ देवदास ने भी उस दुष्टा स्त्री के वाक्य-जाल में बद्ध होकर धन के भाग को हड़प में गाड़ दिया॥३९॥ इस प्रकार उस बनिये की पत्नी का गुप्त पति वह बनिया गङ्गा के माध्यम से व्यापार के बहाने पाटलिपुत्र को चला॥४०॥ उसने पटना जाकर देवदास से उस घर को खरीद लिया। देवदास ने भी जान-बूझकर अधिक मूल्य में मकान उसे दे दिया। देवदास भी पाटलिपुत्र में आकर अपने विश्राम के लिए नये घर का प्रबन्ध करके श्वशुर-गृह से शीघ्र ही अपनी स्त्री को लिवा लाया॥४१-४२॥ ऐसा होने पर उसकी पत्नी का गुप्त कामी वह धूर्त बनिया उस मकान में खजाना न पाकर देवदास से आकर बोला॥४३॥ 'यह तुम्हारा पुराना मकान मुझे अच्छा नहीं लगा इसलिए मेरा दाम लौटा दो और अपना घर ले लो'॥४४॥ वह बनिया इस प्रकार कह रहा था और देवदास इन्कार कर रहा था। इस प्रकार लड़ते-झगड़ते वे दोनों फैसला कराने के लिए राजा के सम्मुख जा पहुँचे॥४५-४६॥ राजा के पास जाकर हार्दिक दुःख से सन्तप्त देवदास ने अपनी दुष्ट पत्नी का समस्त वृत्तान्त राजा से कहा॥४७॥ तब राजा ने पुरोहित आदि का सत्कारकर अपनी पत्नी के जन्म की खोज की और दुरात्मा भवन के राज्य में उस श्रेष्ठ (कण्ठकी) का भी सर्वस्व हरण कर दण्ड दिया॥४८॥ दृष्टान्त उद्धृत कर स्त्री की दुष्टता सिद्ध करने भी पद्मावती भ्रष्टाह से वह ...
१६४ कथासरित्सागर
१६४ कथासरित्सागर वत्सराजस्य दिग्विजयप्रस्थानम् इत्थं धर्मार्जिता लक्ष्मीरा सन्तत्यनपायिनी। इतरा तु जरापाततुषारकणनश्वरी ॥५०॥ अतो यतेत धर्मेण धनमर्जयितुं पुमान्। राजा तु सुतरां येन मूलं राज्यतरोर्धनम् ॥५१॥ तस्माद्यथावत्सम्मान्य सिद्धये मन्त्रिमण्डलम्। कुरु दिग्विजयं देव लब्धुं धर्मोत्तरां श्रियम् ॥५२॥ श्वशुरद्वयबन्धूनां प्रसक्तानुप्रसक्तितः। विकुर्वत न बहवो राजानस्ते मिलन्ति च ॥५३॥ यस्त्वेव ब्रह्मदत्ताख्यो वाराणस्यां महीपतिः। नित्यं वैरी स ते तस्माद् विजयस्व तमग्रतः ॥५४॥ तस्मिञ्जिते जय प्राचीप्रक्रमणाखिला दिशः। उन्ने कुरुष्व वै पाण्डोर्यशश्च कुमुदोज्ज्वलम् ॥५५॥ इत्युक्तो मन्त्रिमुख्येण तथेति विजयोद्यतः। वत्सराजः प्रकृतिषु प्रयाणारम्भमादिशत् ॥५६॥ ददौ च चेदिदेशं च राज्यं गोपालकाय सः। सत्कारहृष्टोऽनुपतिः स्वश्वशुर्यमानुगच्छते ॥५७॥ त्रिं च पद्मावतीभ्रात्रे प्रायच्छत्सिंहवर्मणे। सम्मान्य चविविद्यय सर्वै सममुपेयुषे ॥५८॥ आनाययच्च स विभुर्भिल्लराजं पुलिन्दकम्। मित्रं बलैर्व्याप्तदिशं प्रावृट्कालमिवाम्बुदः ॥५९॥ अभूच्च यात्रारम्भो राष्ट्रे तस्य महाप्रभोः। आकुलस्य तु शत्रूणां हृदि चित्रमजायत ॥६०॥ योगन्धरायणश्चाथ वारान्ताराणसीं प्रति। प्राहिणोद् ब्रह्मदत्तस्य राज्ञो ज्ञातुं विचेष्टितम् ॥६१॥ ततः शुभेऽहनि प्रीतो निमित्तजयशंसिभिः। ब्रह्मदत्तं प्रति प्राच्यां पूर्वं वत्सेश्वरो ययौ ॥६२॥ आरुढः प्रांशुतुङ्गाग्रं प्रोत्तुङ्गजगदुद्धरम्। गिरि प्रफुल्लवेत्रस्तर मृगेन्द्र इव दुर्मदः ॥६३॥
तृतीय लम्बक ३६५
तृतीय लम्बक ३६५ वत्सराज का दिग्विजय के लिए प्रयाण इस प्रकार, धर्म से कमाई हुई लक्ष्मी सन्तान-परम्परा तक नष्ट नहीं होती और पाप की कमाई पत्ते पर पड़ी ओस की बूँद के समान विनाशशील होती है ॥५०॥ इसलिए पुरुष को चाहिए कि धर्म से धन कमावे। राजा के राज्य-रूपी वृक्ष का तो धर्म से अर्जित धन ही मूल है। अतः महाराज ! मन्त्रिमण्डल का विधिवत् सम्मान कर धर्म से धन प्राप्त करने के लिए दिग्विजय करो ॥५१-५२॥ तुम्हारे दो श्वसुरों के सम्बन्ध (मित्रता) के कारण बहुत-से राजा विरोध नहीं करेंगे बल्कि मित्रता रखेंगे ॥५३॥ यह जो वाराणसी (काशी) में ब्रह्मदत्त नाम का राजा है वह तुम्हारे वंश का वैरी है पहले उसी की विजय करो ॥५४॥ उसके जीत लेने पर क्रमशः समूची पूर्व दिशा की विजय करो और शरद् के कुमुद के समान शुद्ध यश को ऊँचा करो—विस्तृत करो ॥५५॥ मुख्यमन्त्री से इस प्रकार कहे गये वत्सराज उदयन ने विजय के लिए तैयार होकर सारे नगर की प्रजा से विजय यात्रा की घोषणा करा दी ॥५६॥ राजा उदयन ने अपने साले और अपने सहायक मारुकंप का उसका सम्मान करने के लिए विदेह (मिथिला) का राज्य दे दिया ॥५७॥ अपनी सेनाओं के साथ सहायता के लिए आये हुए पद्मावती के भाई सिंहवर्मा को सम्मानित करके चेदि-देश का राज्य दे दिया ॥५८॥ तदनन्तर राजा ने सेना से वर्षाकाल के समान अपनी सेनाओं के साथ आए घिरे हुए भिल्लों के राजा पुलिन्दक को बुलवाया ॥५९॥ इस प्रकार राजा के राष्ट्र में विजय-यात्रा की तैयारी हुई और शत्रुओं के हृदय में उत्सुकता उत्पन्न हो गई यह आश्चर्य की बात है ॥६०॥ प्रधानमन्त्री यौगन्धरायण ने राजा ब्रह्मदत्त की कार्यवाही जानने के लिए अपने गुप्तचरों को वाराणसी भेजा ॥६१॥ इस प्रकार सभी तैयारी हो जाने पर विजयोद्यत शकुनों से प्रसन्न राजा उदयन ने शुभ दिन के सवेरे पूर्व दिशा में ब्रह्मदत्त पर चढ़ाई की ॥६२॥ उस समय उदयन की सेना से उड़ती धूल तथा उत्सव से हाथियों के मदजल से भूमि पर कीचड़ का कीचड़ हो जाने पर विचित्र दृश्य दिखलाई देता था ॥६३॥
३३३ कथासरित्सागर
३३३ कथासरित्सागर प्राप्तया सिद्धिरूत्येव शरदा दत्तसंभवः । दर्शयन्त्यातिसुगमं मार्गं स्वल्पाम्बुनिम्नगम् ॥६४॥ पूरयन्बहुनादाभिर्वाहिनीभिर्भुवस्तलम् । कुर्वन्नकाण्ड निर्बन्ध-वर्षा-समय-सम्भ्रमम् ॥६५॥ तदा स सैन्य-निर्घोष प्रतिशब्दकुलीकृताः । परस्परमिवान्वस्युस्तदागमभय दिशः ॥६६॥ ववृधुश्च हेमसन्नाहसम्भूतार्कप्रभा हयाः । तस्य नीराजनप्रीतपावकानुगता इव ॥६७॥ विरेजुर्वारणाश्चास्य सितध्वजचामराः । विगलद्गण्डसिन्दूरशोणदानजला पथि ॥६८॥ शरत्पाण्डुपयोवाहाः सधातुरसनिर्झराः । यात्रामुप्रेषिता भीतेरारभञ्जा इव भूधरैः ॥६९॥ नैवैष राजा सहते परेषां प्रसृतं महः । इतीव तच्छमूरणूरुकंतेजस्तिरोदधे ॥७०॥ पद्मातपत्रं च द्वे देव्यौ मार्गे समभिजग्मतुः । नृपं नयगुणाकृष्टे इव कीर्तिजयश्रियौ ॥७१॥ नमन्ताप पलायध्वमित्यूचु विन्ध्यपामिव । पवनाक्षिप्तविक्षिप्तैस्तस्य सन्नाहजांशुकेः ॥७२॥ एवं ययौ स दिग्भागान् पश्यन् फुल्लसिताम्बुजान् । महीमर्यमयोद्भ्रान्तक्षपोत्क्षिप्तफणानिव ॥७३॥ अत्रान्तरे च ते चारा धृतकापालिकव्रताः । योगन्धरायणादिष्टाः प्रापुर्वाराणसीं पुरीम् ॥७४॥ तेषां च कुहकाभिज्ञो ज्ञानित्वमुपदर्शयन् । सिद्ध्यि गुप्तोऽभवद्गोपास्तच्छिष्यतां ययुः ॥७५॥ आचार्योऽयं त्रिकालज्ञ इति व्याजह्रुश्च तम् । शिष्यास्ते स्थापयामासुर्भिक्षाक्षममितस्ततः ॥७६॥ यदुवाचाग्निदाहादि स ज्ञानी भावि पृच्छताम् । तच्छिष्यास्तत्तथा गुप्तं चक्रुस्तेन स पप्रथे ॥७७॥ रञ्जितं शुभ्रविद्यया च समग्रं नृपलक्षणम् । स्वीचक्रे स ह्यमप्येकं राजपुत्रमुपागतम् ॥७८॥
तृतीय लम्बक ११७
तृतीय लम्बक ११७ सफलता की दूती के समान आई हुई कशाओं और नदियों को सुखाकर१ मार्गों को सुखद और सुगम बनाती हुई शरद् ऋतु ने राजा को उत्साह प्रदान किया ॥६४॥ विविध प्रकार के शब्द करती हुई सेनाओं से भूतल को भरता हुआ और अकाल में ही वर्षा-काल का भ्रम करता हुआ वह राजा विजय के लिए अग्रसर हुआ ॥६५॥ उसकी सेना के महान् कलकल शब्द की प्रतिध्वनियों से मानों दिशाएँ परस्पर उसके आगमन की सूचनाएँ देने लगी ॥६६॥ सोने के साजों से सजे हुए, अतएव सूर्य की किरणों से चमकते हुए उसकी सेना के घोड़े ऐसे मालूम होते थे मानों नीराजन-विधि से प्रसन्न अग्नि का अनुगमन कर रहे हैं ॥६७॥ दोनों कानों के समीप झूलते हुए सफेद चामरों से शोभित और मस्तक पर लगे हुए सिन्दूर के कारण लाल मद-जल बहाते हुए उसके हाथी मार्ग में चलते हुए ऐसे भले मालूम होते थे मानों राजा के भय से डरे हुए पर्वतों ने शरत्कालीन श्वेत मेघ-खण्डों से मण्डित एवं धातु-रसों के झरने बहाते हुए अपने पुत्र सेना की सहायता के लिए भेजे हों ॥६८ ६९॥ यह राजा अपने सामने फैलते हुए दूसरे के तेज को सहन नहीं कर सकता। इसीलिए मानों सेना से उड़ी हुई धूल ने सूर्य के तेज को ढाँप दिया ॥७० ॥ राजा के पीछे-पीछे उसकी दोनों महारानियाँ इस प्रकार चल रही थीं मानों राजा की नीति और गुणों से आकृष्ट होकर कीर्ति और विजय-लक्ष्मी चल रही हों ॥७१॥ वायु से इधर-उधर उड़ाये जाते हुए सेना की ध्वजाओं के हत्थे मानों शत्रुओं को चेतावनी दे रहे थे कि या तो नम्र होकर अधीनता करो या भाग जाओ ॥७२॥ वह राजा खिले हुए श्वेत-कमलों से शोभित जल-स्थल के भू-भागों को शेषनाग के उठे हुए फनों के समान देखता हुआ जा रहा था ॥७३॥ इसी बीच यौगन्धरायण से प्रेषित गुप्तचर, कापालिक का वेश बनाकर, वाराणसी नगरी में पहुँचे ॥७४॥ उनमें एक मूढ़ भविष्य का हाल जाननेवाला क्षगी (ज्योतिषी) बन गया और दूसरे सब उसके शिष्य बन गये ॥७५॥ वे उसके शिष्य नगर में इधर-उधर घूमते हुए अपने गुरु के सम्बन्ध में यह प्रचार करते थे कि यह हमारा आचार्य निष्काङ्क्ष और केवल भिक्षा लेकर ही रहता है ॥७६॥ वह ज्ञानी गुरु पूछनेवालों को जो भविष्य में होनेवाली अग्निदाह आदि की बातें बताता था उसके शिष्य उन बातों को गुप्त रूप से स्वयं प्रचारित करके उसका यश बढ़ाते थे। इस प्रकार वह मिथ्या सिद्ध काशी नगरी में प्रसिद्ध सिद्ध बन गया। इस प्रकार उस सिद्ध ने एक छोटे-से चमत्कार से राजा के अत्यन्त प्यारे एक राजपुत्र को अपना उपासक बना लिया ॥७७-७८॥ १ देखिए रघु सर्ग ४ श्लो २४- सरितः कुर्वती गाधाः पथश्चाश्यान कर्दमान्। यात्रायै चोदयामास तं शक्तेः प्रथमं शरत्॥