कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
चतुर्थ लम्बक ४४५
चतुर्थ लम्बक ४४५ मैं भवानीभक्त शबरराज हूँ। गजमुक्ता लेने के हेतु इस जंगल में आया हूँ तुम्हें देखकर मुझे अपना एक जीवनाधार आत्मीय मित्र स्मरण आ गया जो एक बड़े व्यापारी और धनी का पुत्र है उसका नाम वसुदत्त है ॥८८-८९॥ हे सुवदि! वह रूप और यौवन में तुम्हारे ही समान सुन्दर है। आँखों के लिए मानों अमृत का झरना है ऐसा पुरुष इस विश्व में दूसरा नहीं है॥९०॥ इस संसार में वह लड़की धन्य होगी जिसका वह पाणिग्रहण करेगा। वह मित्रता दया दान और धैर्य का समुद्र है॥९१॥ यदि तुम्हारी ऐसी सुन्दर आकृति उसे न मिली तो कामदेव का धनुष-बाण धारण करना ही व्यर्थ हो जायगा। इसका मुझे दुःख है॥९२॥ इस प्रकार कामदेव के मोहन-मन्त्रों के समान भीलराज के वचनों से वह कुमारी तुरन्त अन्यमनस्क हो उठी॥९३॥ साथ ही कामदेव से प्रेरित हो उस भील से बोली कि 'तुम्हारा वह मित्र कहाँ है उसे लाकर दिखाओ ॥९४॥ यह सुनकर और अच्छा लाता हूँ—कहकर वह भील अपने को सफल समझता हुआ प्रसन्नता से चला ॥९५॥ तदनन्तर अपने घर जाकर मोती कस्तूरी आदि के सैकड़ों बोझे लदवाकर वह वसुदत्त के घर पहुँचा ॥९६॥ वहाँ सभी लोगों द्वारा स्वागत किये गये भीलराज ने कई लाख मुद्राओं के मूल्य के उस उपहार को वसुदत्त के पिता को भेंट किया ॥९७॥ हँसी-खुशी में दिन व्यतीत होने पर रात्रि में एकान्त के समय भीलराज ने मेरे पास आकर कन्या को देखने का समस्त वृत्तान्त प्रारम्भ से सुनाया और कहा कि 'चलो वहीं चलें'—ऐसा कहकर रात्रि में ही मुझे साथ लेकर भीलराज चल पड़ा॥ ९८ ॥ प्रातःकाल ही भीलराज के साथ मुझे कहीं चला गया जानकर मेरे पिता ने भीलराज में विश्वस्त होकर धैर्यपूर्वक दिन व्यतीत किये ॥९९॥ शीघ्र चलनेवाले उस भीलराज ने मार्ग में मेरी सहायता करते हुए मुझे हिमाचल पर पहुँचा दिया॥१००॥ मैं और वह दोनों सायंकाल उस तालाब पर पहुँचे और स्नान करके स्वादिष्टफल खाकर उस रात वहीं सो गये। वह सुन्दर स्थान खिले हुए विविध पुष्पों से सुगन्धित भ्रमरियों के संगीत से आकर्षक और रात्रि में जलनेवाली औषधियों से आलोकित था॥१०१-१०२॥
रतेस्तद्वासवेश्मेव विधात्र्यै गिरिकाननम् । आवयोरभवल्लक्ष्म पिवतोस्तत्सरोजलम् ॥१४॥ ततोऽन्येषु प्रतिपदं तत्तत्पुरुकलिकामृता । प्रत्युद्गतेव मनसा मम तन्मार्गभाविना ॥१५॥ चक्षुषा दक्षिणेनापि सूचितागमनामूना । दिवुक्षयेव स्फुरता सा कन्यात्रागताभवत् ॥१०६॥ सटारुत्सिंहपृष्ठस्था सुभ्रूदृष्टा मया च सा । शरव्यम्भोघरोत्सङ्गसङ्गिनीवन्द्यवी कला ॥१०७॥ विलसद्विस्मयौत्सुक्यसाध्वसं पश्यतश्च ताम् । ममावर्तत तत्काल न जाने हृदय कथम् ॥१०८॥ अथावतीर्य सिंहात्सा पुष्पाण्युच्चित्य कन्यका । स्नात्वा सरसि तत्तीरगत हरमपूजयत् ॥१०९॥ पूजावसाने चोपैत्य स सखा शबरो मम । प्रणम्यात्मानमावेद्य तामबोचत् कृतादराम् ॥११०॥ आनीतः स मया देवी सुहृद्योग्यो वरस्तव । मन्यस यदि तत्तुभ्य दर्शयाम्यधुनैव तम् ॥१११॥ तच्छ्रुत्वा दर्शयेत्युक्ते तया स शबरस्ततः । आगत्य निकटं नीत्वा मां तस्याः समदर्शयत् ॥११२॥ सापि मां तिर्यगालोक्य चक्षुषा प्रणयलुठता । मदनावेशसन्नगा शबरेश तमभ्यधात् ॥११३॥ सखा ते मानुषो नाय कामः कोऽप्ययमागतः । मद्गच्छनाय देवोऽस्य मर्त्यस्याप्याकृति कृतः ॥११४॥ तदाकर्ण्योक्तवानस्मि तां प्रत्याययितुं स्वयम् । सत्यं सुवरि ! मर्त्योऽहं किं व्याजनाजने जने ॥११५॥ अह हि सार्थवाहस्य वल्मीकासिनः सुतः । महाधनाभिधानस्य महेश्वरवराजितः ॥११६॥ तपस्यन्स हि पुत्रार्थमुद्दिश्य शशिशेखरम् । समादिष्टस्ततस्तेन स्वप्ने देवेन तुष्यता ॥११७॥ उत्तिष्ठोत्तस्यते कोऽपि महात्मा तनयस्तव । रहस्यं परमं यत्तत्सम्प्रवक्ष्याम विस्तरम् ॥११८॥
चतुर्थ लम्बक ४४५
[Header] चतुर्थ लम्बक ४४५
वह पर्वतीय प्रदेश उस सरोवर के निर्मल जल को पीते हुए सोयों के विश्राम के लिए रति के निवास-स्थान के समान सुखद हुआ॥१४॥ दूसरे दिन प्रातःकाल विविध प्रकार की उत्कंठाओं के कारण उछलते हुए और उस कन्या के मार्ग पर दौड़ते हुए मन से तथा उसे देखने की इच्छा से फड़कते हुए दाहिने नेत्र से उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे कि इतने में वह वहाँ आ गई। लहराते अयालवाले सिंह की पीठ पर बैठी उस शुभ्रू को मैंने देखा जो शरद् के मेघ की गोद में चमकती चञ्चलका की तरह लग रही थी। विस्मय उत्सुकता और भय से उसे देखते हुए मेरा हृदय जाने क्यों धड़कने लगा ॥१५-१८॥ वह कन्या वहाँ आकर, तालाब में स्नान कर पुष्प चयन करने लगी। और, तत्पश्चात् वह उस तालाब के तीर पर स्थित शिवजी के मन्दिर में जाकर उनका पूजन करने लगी॥१९॥ पूजा समाप्त होने पर वह मेरा मित्र भील उसके समीप जाकर प्रणामपूर्वक अपना परिचय देने के पश्चात् स्वागत करती हुई उस कन्या से बोला- ॥११॥ 'हे देवि मैं तुम्हारे अनुरूप वर उस मित्र को लाया हूँ। यदि तुम चाहो तो उसे अभी तुम्हें दिखा दूँ' ॥१११॥ यह सुनकर 'दिखाओ' - उसके ऐसा कहने पर वह भील मेरे पास आया और उसने मुझे ले जाकर उसे दिखाया ॥११२॥ परिणामस्वरूप वह भी मुझे प्रेम बरसाती हुई तिरछी आँखों से देखकर काम के वशीभूत होकर भीलराज से बोली - ॥११३॥ यह तुम्हारा मित्र मनुष्य नहीं कोई देवता है, जो मुझे ठगने के लिए आया है; क्योंकि मनुष्य की ऐसी आकृति नहीं हो सकती है ॥११४॥ यह सुनकर उसे विश्वास दिलाने के लिए मैंने स्वयं ही कहा- 'हे सुन्दरि ! मैं सचमुच मनुष्य हूँ। तुम्हारे समान सरल मनुष्य से ठगी करने से क्या लाभ है। मैं वलभी के रहनेवाले महाधन नामक व्यापारी का पुत्र हूँ जो शिवजी की आराधना से उत्पन्न हुआ हूँ ॥११५-११६॥ मेरे पिता ने पुत्र प्राप्ति के लिए शिवजी की तपस्या की थी और स्वप्न में शिवजी ने प्रसन्न होकर आदेश दिया था कि 'तुम वलभी में उठो, तुम्हें एक महात्मा पुत्र उत्पन्न होगा यही मेरी उत्पत्ति का रहस्य है और अधिक कहना व्यर्थ है ॥११७-११८४॥
एतच्छ्रुत्वा प्रबुद्धस्य तस्य कालेन चात्मजः। अहमेव समुत्पन्नो वसुदत्त इति श्रुतः ॥११९॥ अयं च प्लवगाधीशः स्वयंवरसुहृन्मया। देशान्तरगतैन प्राप्तप्राप्तः कृच्छ्रैकबान्धवः ॥१२०॥ एष मे तत्त्वसंक्षेप इत्युक्त्वा विरते मयि। अभाषताथ कन्या सा लज्जयावनतानना ॥१२१॥ अस्येतेमां च जानेऽद्य स्वप्नेऽर्जितवती हरः। प्रातः प्राप्स्यसि भर्तारमिति तुष्टः किलादिशत् ॥१२२॥ तस्मात्त्वमद्य मे भर्त्ता भ्रातायं च गवत्सखः। इति वाक्सुधया सा मामानन्द्य विरताभवत् ॥१२३॥ सम्मन्त्र्याथ तया साकं विवाहाय यथाविधि। अकार्यं निश्चय गन्तु समिन्धोऽहं निज गृहम् ॥१२४॥ [L13: तत सा सिंहमाहूय वाहनं तं स्वसज्ञया। अत्रारोहायंपुत्रेति मामभाषत सुन्दरी ॥१२५॥ अथाहुं तेन सुहृदानुयात शबरण तम्। सिंहमारुह्य दयितामुत्सङ्गे स्वां गृहीतवान् ॥१२६॥ तत प्रस्थितवानस्मि कृतकृत्यो निजं गृहम्। कान्त्या सह सिंहस्थो मित्रे तस्मिन्पुरःसरे ॥१२७॥ तपीयस्तरनिमिशहरिणानिवृत्तय । क्रमेण ते वयं सर्वे सम्प्राप्ता वरुणी पुरीम् ॥१२८॥ तत्र मामागतं दृष्ट्वा सिंहारूढं सवल्लभम्। साश्चर्यस्तद्द्रुतं गत्वा मम पित्रेऽब्रवीज्जनः ॥१२९॥ सोऽपि प्रत्युद्गतो हर्षादवतीर्णं मृगेन्द्रतः। पादानतं दृष्ट्वा मामभ्यनन्दत् सविस्मयः ॥१३०॥ अनन्यसदृशीं तां च कृतपादामिवन्दनाम्। पश्यन्ममोचितां भार्या न माति स्म मुदा क्वचित् ॥१३१॥ प्रवेश्य मन्दिर चास्मान् वृत्तान्त परिपृच्छ्य च। प्रशंस शबराधीशसौहार्दं सोत्सव व्यधात् ॥१३२॥ ततो मौहूर्तिकापद्यावन्त्येधुर्वंरकन्यका। सा मया परिणीताऽभून्मिस्तारिम्बन्युना ॥१३३॥
चतुर्थ लम्बक. ४४७
चतुर्थ लम्बक. ४४७ यह आदेश सुनकर उत्पन्न हुए अपने पिता के यहाँ मैं पुत्र-रूप में उत्पन्न हुआ। मेरा नाम समुद्रदत्त है और यह मित्रराज मेरा स्वयं वरण किया हुआ कठिन समय का मित्र है॥१२१-१२२॥ संक्षेप में यह मेरा जन्म है। ऐसा कहकर मेरे चुप हो जाने पर लज्जा से नीचे की ओर मुँह करके वह कन्या कहने लगी—'यह ठीक है। आज मैंने स्वप्न में शिवजी की पूजा की तो उन्होंने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि तुम प्रातःकाल ही अपने वर (पति) को प्राप्त करोगी॥१२१ १२२॥ इसलिए तुम्हीं मेरे पति और तुम्हारा यह मित्र मेरा भाई है। इस प्रकार वाणी-रूपी अमृत से वह कन्या मेरा अभिनन्दन करके चुप हो गई॥१२३॥ तदनन्तर विधिवत् विवाह के लिए उससे परामर्श करके मैंने मित्र के साथ अपने घर चलने का निश्चय किया॥१२४॥ तब उस कन्या ने संकेत मात्र से अपने वाहन सिंह को पास बुलाया और समुद्रदत्त से कहा कि वायुपुत्र! आप सिंह पर सवार हों॥१२५॥ मैं भी अपने मित्र भीम के साथ उस सिंह पर बैठा और गोद में अपनी प्रियतमा को बैठा लिया॥१२६॥ वहाँ से गरुड़मन्त्राख्य हारण में अपनी पत्नी और मित्र के साथ सिंह पर बैठा हुआ घर की ओर चला और शबर लोग उसे मार्ग बताते हुए चले॥१२७॥ ग्रीष्म के बाधा से मारे गये पथिक के समान जीवन रक्षा करते हुए हमलोग समय से उसी नगरी में पहुँचे॥१२८॥ उस नगरी में सिंह पर चढ़े और पत्नी के साथ मुझे आते हुए देखकर आश्चर्यचकित वर्णिकपुत्र नागरिक ने मेरे पिता से कहा॥१२९॥ वे सब प्रसन्न होकर बाहर आये। हमलोगों को आते और सिंह से उतरकर उनके चरणों में प्रणाम करते हुए देखकर उन्होंने अत्यधिक प्रसन्नता दिखाई॥१३०॥ अनुक्रम से उन्होंने मेरा उस पत्नी का भी कन्या का प्रणाम करते हुए देखकर और उस देश को न जाने वन्दनमाला के (दिखायी) दिये जैसे ... न मानते॥१३१॥ वे प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। वहीं रहकर सब आभरण भूषण उतार उद्यान में नगर की प्रशंसा करने पर ... बना दिया॥१३२॥ मदन से दुःखे देखकर उस कन्या ने अपने पिता को यह बात कहलवाकर भेज दी कि उस वीर का कन्या के साथ विधिवत् विवाह किया जाय॥१३३॥
तदालोक्य च सोऽकस्माद् मवूवधूबाहनस्तदा। सिंह सर्वेषु पश्यत्सु सम्पन्नः पुरुषाकृतिः ॥१३४॥ किमेतदिति विभ्रान्ते जने तत्र स्थितेऽखिले। स दिव्यवस्त्राभरणो नमन्नामबमब्रवीत् ॥१३५॥ अह चित्राङ्गदो नाम विद्याधर इय च मे। सुता मनोवती नाम कन्या प्राणाधिकप्रिया ॥१३६॥ एतामङ्क सदा कृत्वा विपिनेन भ्रमन्नहम्। प्राप्तवानेकदा गङ्गां भूरितीरतपोवनाम् ॥१३७॥ तपस्विमज्जनत्रासात्तस्या मध्येन गच्छतः। अपतत् मम वक्षात्त पुष्पमाला तदम्भसि ॥१३८॥ ततोऽकस्मात्समुत्थाय नारवोऽन्तर्जलस्थितः। पृष्ठे यया पतितया क्रुद्धो मामशपन्मुनिः ॥१३९॥ औद्धत्येनामुना पाप गच्छ सिंहो भविष्यसि। हिमाचल गतश्चैतां सुतां पृष्ठेन वक्ष्यसि ॥१४०॥ यदा च मानुषेणेषा सुता ते परिणेष्यते। तदा तद्दर्शनादेव शापादस्माद् विमोक्ष्यसे ॥१४१॥ इत्थमह मुनिना शप्तः सिहीभूय हिमाधरु। अतिष्ठ तनयामेतां हरपूजापरां वहन् ॥१४२॥ अनन्तर यथा चरनाच्छबराधिपतिरिखम्। सम्प्राप्त सर्वकल्याण तथा प्रविदितम्ब ते ॥१४३॥ तस्माद्यामि भद्र वस्तीर्णः शापो मयैष सः। इत्युक्त्वा सोऽभ्युदपतत्सद्यो विद्याधरो नमः ॥१४४॥ ततस्तद्विस्मयाक्रान्तो मन्दरस्वजनान्भवः। श्लाघ्यसम्बन्धहृष्टो मे पिताकार्षीन्महोत्सवम् ॥१४५॥ को हि निर्व्याजमित्राणां चरित चिन्तयिष्यसि। मुहृत्सु मव तृप्यन्ति प्राजैरप्युपकृतय ये ॥१४६॥ इति चात्र न को माम सकमत्वाग्मभ्यधात्। ध्याय ध्यायमुदार तच्छबराधिपचेष्टितम् ॥१४७॥ राजापि तत्परा मुदृष्या नयस्तस्य सम्मतः। भतुष्यदस्मरत्नहेम शबराधिपत परम् ॥१४८॥ शुद्धश्च तस्मै मल्पित्रा द्राणित महस्रैव च। मतपमन्वीराउय रननोपायनतायिना ॥१४९॥
चतुर्थ लम्बक ४४९
चतुर्थ लम्बक ४४९ विवाह हो जाने पर सब लोगों के देखते-ही-देखते मेरी पत्नी का वाहन सिंह पुरुष बन गया॥१३४॥ उसका यह परिवर्तित रूप देखकर वहाँ बैठे हुए सभी लोगों के विस्मित हो जाने पर, दिव्य वस्त्र और आभूषण पहने हुए वह मुझे प्रणाम करता हुआ इस प्रकार कहने लगा—॥१३५॥ मैं चित्रांगद नामक विद्याधर हूँ और यह प्राणों से भी अधिक प्यारी मेरी कन्या है॥१३६॥ मैं इसे गोद में लेकर सदा जंगलों में घूमता रहता था। एक बार अनेक तपोवनों से अलंकृत तटोंवाली गंगा के समीप पहुँचा॥१३७॥ तपस्वियों का लंघन न हो इस भय से मैं तट से न जाकर उसके मध्य से जा रहा था। मेरे जाते हुए दैवयोग से मेरी पुष्पमाला गंगा में गिर पड़ी। वह पुष्पमाला जल के अन्दर गोता लगाते हुए नारदजी की पीठ पर गिरी। फलतः इससे क्रुद्ध होकर नारदमुनि ने उस समय मुझे शाप दिया कि 'हे पापी! तूने मेरे साथ उद्दण्डता की है। इसलिए जा तू सिंह बनेगा और हिमाचल में जाकर इस कन्या को पीठ पर वहन करता रहेगा॥१३८-१४०॥ जब यह कन्या मनुष्य से अपना विवाह कर लेगी तब यह देखकर ही तू शाप से मुक्त हो जायगा॥१४१॥ इस प्रकार नारदमुनि से शापित होकर मैं हिमाचल में सिंह बनकर शिव-पूजन में रत इस कन्या को वहन करता रहता था॥१४२॥ इसके पश्चात् भीमराज के प्रयत्न से यह सब जो कुछ मङ्गलमय घटना हुई, वह सब आपको विदित ही है॥१४३॥ अतः अब मैं स्वर्ग-लोक को जाता हूँ। तुम लोगों का कल्याण हो। मैं शाप से मुक्त हो गया हूँ। ऐसा कहकर वह विद्याधर तुरन्त आकाश में उड़ गया॥१४४॥ उस सिंह द्वारा आश्चर्यमन्वित और प्रसन्न बन्धुजनोंवाले एवं उच्चकोटि के विद्याधर के साथ हुए सम्बन्ध से उत्साहित और प्रसन्न मेरे पिता ने मेरे विवाह का महान् उत्सव मनाया॥१४५॥ अपने प्राणों से उपकार करने पर भी जो उपकारी मित्र सन्तुष्ट नहीं होते ऐसे मित्रों के चरित्र को कौन शोध या समझ सकता है। इस प्रकार भीमराज के उदारतामय चरित्र की चारों ओर चर्चा चलती रही॥१४६-१४७॥ वरुथी के राजा भी उसकी अतिशय उदारता की कथा सुनकर सन्तुष्ट हुए और मेरे पिता ने बहुमूल्य रत्नों का उपहार देकर और प्रत्युपकार के रूप में उसे वरुथी के राजा की ओर से जंगल का राज्य दिला दिया॥१४८-१४९॥ ५७
४५० कथासरित्सागर
४५० कथासरित्सागर सवस्तया मनोरथ्या पत्न्या मित्रेण तेन च। कृतार्थः शबरन्द्रेण सत्रातिष्ठमहं सुखी ॥१५०॥ स च इत्ययीकृतारमीयदशवासरसंस्तवः। भूयस्तास्मद्गृहेष्वेव न्यवसच्छबराधिपः ॥१५१॥ परस्परोपकार्येषु सर्वकालमतृप्तयोः। स द्वयोरगमत्कालो मम तस्य च मित्रयोः ॥१५२॥ अविराच्च मनोरथ्यां तस्यामजनि मे सुतः। बहिष्कृतः कुरुत्येव कुरुतस्त्यः हृदयासवः ॥१५३॥ हिरण्यदत्तनामा च स धनर्वृद्धिमाययौ। कृतविद्यो यथाबन्ध परिणीतोऽभवत्ततः ॥१५४॥ सद्दृष्ट्वा जीवितफल पूर्ण मत्वा च मत्पिता। वृद्धो भागीरथीं प्राप्तास्तवारो देहमुज्झितुम् ॥१५५॥ ततोऽहं पितृशोकार्तः कथञ्चिद्वान्धवैर्धृतिम्। ग्राहितो गृहभारं स्वमुद्वोढं प्रतिपन्नवान् ॥१५६॥ तदा मनोरथीमुग्धमुखदर्शनमेकतः। अन्यत शबरन्द्रेण सङ्गतो मां व्यनोदयत् ॥१५७॥ ततः सत्पुत्रसानन्दा मुक्ताग्रमत्तोरमाः। सुहृत्समागमसुखा गतान्त निश्रा मम ॥१५८॥ कालेनार्थ प्रवृद्ध मामप्रह्वीश्चिबुकं जरा। किं गृह्यथापि पुत्रेति प्रीत्येव स्पृशतो हितम् ॥१५९॥ तनाहं महसोत्पन्नवैराग्यस्तेनय निजम्। कुटुम्बभारोद्वहनं वनं वाञ्छन्नयोजयम् ॥१६०॥ सदारश्च गतोऽभूव गिरि कासञ्जरं ततः। मत्स्नेहव्यक्तराज्येन मम शबरभूपुना ॥१६१॥ तत्र प्राप्तेन चारमीया जातिर्विद्याधरी मया। शापदश्च प्राप्तपर्यन्तः स शापः गहसा स्मृतः ॥१६२॥ शश्च पत्न्यै मनोरथ्यै तदवास्यातवाहनम्। अन्यं च शबरन्द्राय मुमुक्षुर्मानुषा तनुम् ॥१६३॥ भार्यामित्र इम एव भूयास्तां म्मरतो मम। अन्यजन्मस्वप्यायुक्त्वा हृदि कृत्वा च शङ्करम् ॥१६४॥ मया गिरिजगात्समाधिश्रित्य प्रपम ततः। ताभ्यां स्वपत्नीमित्राभ्यां सह मुक्तं शरीरकम् ॥१६५॥
चतुर्थ लम्बक ४५१
चतुर्थ लम्बक ४५१ तदनन्तर मैं उस मनोवती पत्नी और अभिन्न हृदय मित्र भीकराज के साथ सुखपूर्वक बसभी में रहने लगा ॥१५१ ॥ वह भीकराज अपने देश का प्रेम छोड़कर अधिकतर हमारे घर में ही रहने लगा ॥१५१॥ परस्पर उपकार के कार्यों में सर्वदा व्यपृत रहनेवाले हम दोनों मित्रों का समय व्यतीत हुआ ॥१५२॥ कुछ ही दिनों में मनोवती द्वारा मेरा पुत्र उत्पन्न हुआ मानों सारे कुटुम्ब के हार्दिक उत्सव का मूर्तरूप वह प्रकट हुआ हो ॥१५३॥ हिरण्यदत्त नामक वह कुमार, धीरे-धीरे बड़ा हुआ और पढ़ने-लिखने के पश्चात् मैंने उसका विवाह कर दिया ॥१५४॥ मेरे पिता यह देखकर और अपने जीवन का अन्तिम फल समझकर वृद्धावस्था में शरीर त्याग करने के लिए गंगातट पर चले गये ॥१५५॥ पिता के चले जाने पर शोक से अत्यन्त दुःखी होकर मैंने अपने बन्धु-बान्धवों के धैर्य देने और समझाने-बुझाने पर घर-गृहस्थी का भार उठाना स्वीकार किया ॥१५६॥ उस समय एक ओर तो मनोवती के भोले-भाले मुंह को देखता और दूसरी ओर मित्र पद्मराज की मित्रता —ये दो मेरे मनोविनोद के साधन थे ॥१५७॥ सुपुत्र के कारण असीम आनन्ददायक सपती के कारण मनोरम एवं सच्चे मित्र के समागम से सुखद से मेरे दिन व्यतीत हुए ॥१५८॥ कुछ समय के पश्चात् मुझ वयस्क को 'बेटा अबतक घर में क्या कर रहे हो' मानों इस प्रकार प्रेमपूर्वक हित वचन कहती हुई वृद्धावस्था ने मेरी ठोड़ी या दाढ़ी पकड़ ली ॥१५९॥ इस कारण अकस्मात् वैराग्य उत्पन्न होने पर वन में जाने की इच्छा से मैंने कुटुम्ब का भार अपने पुत्र को दे दिया ॥१६०॥ तदनन्तर मैं अपनी पत्नी के साथ कालंजर नामक पर्वत पर चला गया और भीकराज मेरे प्रेम से राज्य को छोड़कर मेरे साथ हो लिया ॥१६१॥ वहाँ जाकर मैंने अपनी पूर्वजन्म की विद्याधर जाति का स्मरण किया और वन्द्य होनेवाले पित्र जी के शाप का भी समूचा स्मरण किया ॥१६२॥ उस शाप को मैंने अपनी पत्नी मनोवती तथा मित्र भीकराज को भी बता दिया ॥१६३॥ तदनन्तर मानव-शरीर को छोड़ने की इच्छा से मैंने अन्तिम समय यही कामना की है कि अगले जन्म में भी ये ही दोनों मेरी पत्नी और मित्र बनें। इस प्रकार मनमें शंकर का ध्यान कर पर्वत (हिमालय) की चोटी¹ से गिरकर उक्त पत्नी और मित्र के साथ शरीर का त्याग कर दिया ॥१६४-१६५॥ १ इसको भृगुपात—भृगुप्रपात कहते हैं इस पर चढ़कर प्राण-त्याग करने से अगले जन्म में मनोवाञ्छित सिद्धि होती है।—अनु.
४५२ कथासरित्सागर
४५२ कथासरित्सागर सोऽहं स त समुत्पन्नो नाम्ना जीमूतवाहनः । विद्याधरकुलेऽमुष्मिंश्चेष जातिस्मरोऽधुना ॥१६६॥ स चापि शबरेन्द्रस्त्वं जातो मित्रावसुः पुनः । त्र्यक्षप्रसादात्सिद्धानां राज्ञो विश्वावसो सुतः ॥१६७॥ सापि विद्याधरी मित्र मम भार्या मनोवती । तव स्वसा समुत्पन्ना नाम्ना मलयवत्यसौ ॥१६८॥ एव मे पूर्वपत्न्येषा भगिनी ते भवानपि । पूर्वमित्रमतो युक्ता परिणेतुमसो मम ॥१६९॥ किं तु पूर्वमितो गत्वा मम पित्रोर्निवेदय । तयो प्रमाणीकृतयो सिद्ध्येदेतत्तदीप्सितम् ॥१७०॥ जीमूतवाहनमलयवतीविवाहः इत्य निशम्य जीमूतवाहनात् प्रीतमानसः । गत्वा मित्रावसुः सर्वं तत्पितृभ्यां शशंस तत् ॥१७१॥ अभिनन्दितवाक्यश्च ताभ्यां दृष्टस्तथैव सः । उपगम्य तयैवाथ स्वपितृभ्यां न्यवेदयत् ॥१७२॥ तयोरीप्सितसम्पत्तिस्तुष्टयोः सत्वरं च सः । युवराजो विवाहाय सम्भारमकरोत् स्वसुः ॥१७३॥ ततो जग्राह विधिवत्तस्या जीमूतवाहनः । पाणिं मलयवत्याः स सिद्धराजपुरस्कृतः ॥१७४॥ बभूव चोत्सवस्तत्र चण्डद्युतिचरेश्वरः । सम्मिश्रितोदकश्चातो वत्सादिविद्याधरोत्करैः ॥१७५॥ कृतोद्वाहस्ततस्तस्थौ तस्मिञ्जीमूतवाहनः । मलयाद्रौ महार्हेण विभवेन वधूसखः ॥१७६॥ एकदा च स्वशूर्येण स मित्रावसुना सह । वनावनानि जलधेरवलोकयितुं ययौ ॥१७७॥ तत्रापश्यच्च पुरुषं युवानं खिन्नमागतम् । निवारयन्तं जननीं हा पुत्रे ति विरविणीम् ॥१७८॥ भटेश्च परिव्यस्तं भटनेवानुयायिना । पृष्ठतः पृच्छत प्राप्त्यक शिलाखण्डम् ॥१७९॥
चतुर्थ लम्बक ४५३
चतुर्थ लम्बक ४५३ वह जातिस्मर मैं अब समुत्पन्न जीमूतवाहन नाम से विद्याधर-कुल में उत्पन्न हुआ वही शंखेन्द्र तुम मित्रावसु हो जो शिवजी की कृपा से सिद्धों के राजा विश्वावसु के पुत्र हो।।१६६ १६७।। हे मित्र वह मेरी विद्याधरी पत्नी मनोवती मलयवती नाम से तुम्हारी बहिन है। वह तुम्हारी बहिन मेरे पूर्वजन्म की पत्नी है और तुम भी मेरे उसी जन्म में मित्र हो। अतः मैं इससे विवाह करना उचित समझता हूँ ।।१६८ १६९।। किन्तु इसके पूर्व तुम मेरे पिता से निवेदन करो। उनके स्वीकार करने पर ही तुम्हारा यह अभीष्ट सिद्ध होगा ॥१७०॥ जीमूतवाहन और मलयवती का विवाह जीमूतवाहन से ऐसा सुनकर प्रसन्नचित्त मित्रावसु ने मेरे पिता के समीप जाकर यह प्रस्ताव उपस्थित किया। उनके द्वारा समर्थन प्राप्त कर लेने पर सन्तुष्ट मित्रावसु ने यही प्रस्ताव अपनी माता और पिता से किया ॥१७१॥ वे यह सुनकर अभिलषित सम्पत्ति मिल जाने के समान प्रसन्न हुए और उन्होंने प्रसन्नता- पूर्वक इस सम्बन्ध को स्वीकार किया ॥१७२॥ तदनन्तर युवराज मित्रावसु ने अपने विवाह की तैयारी की और जीमूतवाहन ने भी विधिपूर्वक मलयवती का पाणिग्रहण किया ॥१७३॥ आकाशचारी चारणों के गीतों से मनोहर उनका विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ। इस विवाह में सिद्धों और विद्याधरों के झुंड भी सम्मिलित हुए थे ।।१७४ १७५।। विवाह के उपरान्त जीमूतवाहन अपनी पत्नी के साथ अपने राजसी ठाटबाट से वहाँ रहने लगा ॥१७६॥ एकबार वे अपने साले मित्रावसु के साथ समुद्र-तट के जंगलों की सैर करता हुआ टहल रहा था कि इतने में उसने एक व्याकुल युवा पुरुष को अपनी ओर आते हुए देखा और उसके पीछे एक वृद्धा स्त्री 'हाय बेटा हाय बेटा' कहकर रोती-बिलखती आ रही थी ॥१७७-१७८॥ पीछे आते हुए सैनिक के समान किसी पुरुष ने एक ऊँची चट्टान के समीप लाकर उसे छोड़ दिया था॥१७९॥
४५४ कथासरित्सागर
४५४ कथासरित्सागर कस्त्वं किमीहसे किं च माता त्वां क्षोभतीति तम्। स पप्रच्छ ततः सोऽपि तस्मै वृत्तान्तमब्रवीत् ॥१८०॥ कद्रूविनतयो कथा पुरा कश्यपभार्ये द्वे कद्रूश्च विनता तथा। मिथः कथाप्रसङ्गेन विवादं किल चक्रतुः ॥१८१॥ आद्या श्यामान् हरेरश्वानवादीदपरा सितान्। अन्योन्यदासभावं च पणमत्र बबन्धतुः ॥१८२॥ ततो जयैषिणी कद्रूः स्वैरं मार्गैर्निजात्मजैः। विषफूत्कारमलिनैरस्याश्वानकारयत् ॥१८३॥ तादृशांश्चोपदर्श्यैतान्विनतां छद्मना जिताम्। दासीञ्चकार कष्टा हि स्त्रीणामन्यामहिष्णुता ॥१८४॥ तद्बुद्ध्वागत्य विनतातनयो गरुडस्तदा। सान्त्वेन मातुर्निर्यत्यैमुक्तिं कद्रूमयाचत ॥१८५॥ एतं कद्रुसुता नागा विचिन्त्यैवं तमब्रुवन्। भो वैनतेय क्षीराब्धेः प्राग्दधो मथितुं सुरैः ॥१८६॥ ततः सुधां समाहृत्य प्रतिवस्तु प्रयच्छ नः। मातरं स्वीकुरुष्वाथ मत्वान्दिं यन्निषां घटः॥१८७॥ एतन्नागवचः श्रुत्वा गत्वा च क्षीरवारिधिम्। सुधार्थं वधयामास गरुडो गुह्यकौरवम् ॥१८८॥ ततः पराक्रमप्रीतो वेधस्तत्र स्वयं हरिः। तुष्टोऽस्मि त वरं कञ्चिद् वृणीष्वेत्याविशेश तम् ॥१८९॥ नागा भवन्तु मे भक्ष्या इति सोऽपि हरेस्ततः। वैनतेयो वरं वव्रे मातुर्दास्येन कोपितः ॥१९०॥ तथेति हरिणादिष्टो निजवीर्याज्जितामृतः। स ववमथ दातुं गर्वितो ज्ञातवस्तुना ॥१९१॥ तथा पक्षीन्द्र ! कार्यं ते यथा मूढं मुच्यते। नागैः सथा यथा चैनां तेभ्यः प्रत्याहराम्यहम् ॥१९२॥ एतच्छ्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स बष्णनवरोऽसुरः। सुधाकलशमादाय तार्क्ष्यो नागानुपाययौ ॥१९३॥
चतुर्थ लम्बक ४५५
चतुर्थ लम्बक ४५५ 'तू कौन है तथा क्या चाहता है ? माता तेरे सम्बन्ध में शोक क्यो कर रही है?' इत्यादि। जीमूतवाहन ने उस युवक से यह सब वृत्तान्त पूछा। उत्तर में उसने जीमूतवाहन का सारा वृत्तान्त इस प्रकार कहा—॥१८८॥ कद्रू और विनता की कथा प्राचीन समय में कश्यप की दो पत्नियां विनता और कद्रू किसी कथा के प्रसंग में परस्पर विवाद कर बैठीं ॥१८९॥ कद्रू ने कहा कि सूर्य के घोड़े काले हैं और विनता ने कहा श्वेत। बस इसी बात पर उन्होंने आपस में शर्त लगा ली कि जिसकी बात झूठी होगी वह सच्ची बातवाली की दासता करेगी ॥१९०॥ जीतने की इच्छा रखनेवाली कद्रू ने अपने पुत्र सर्पों के द्वारा विषैली फुत्कार से सूर्य के घोड़ों का रंग काला करवा दिया और छल से जीती हुई कद्रू ने विनता को दासी बना लिया। सच है कि स्त्रियों की पारस्परिक ईर्ष्या भी दुर्लङ्घ्य होती है ॥१९१-१९४॥ यह जानकर विनता के पुत्र गरुड़ ने दास्यि के साथ अपनी माता की दासता की मुक्ति के लिए कद्रू से प्रार्थना की ॥१९५॥ तब कद्रू के पुत्र नागगण आपस में विचार करके बोले कि 'हे गरुड़ ! देवताओ ने अभी क्षीरसागर का मथना प्रारम्भ किया है। वहाँ से इसके बदले में अमृत लाकर हमें दो तब अपनी माता को स्वीकार करो क्योंकि तुम अत्यन्त बलवान् हो ॥१९६-१९७॥ नागों के यह वचन सुनकर और अमृत के लिए क्षीर समुद्र पर जाकर गरुड़ ने अत्यन्त पौरुष प्रकट किया ॥१९८॥ गरुड़ के पराक्रम से प्रसन्न होकर भगवान् विष्णु ने स्वयं गरुड़ से कहा कि मैं तुमपर प्रसन्न हूँ अतः कुछ वर मांगो ॥१९९॥ माता के दास्य के अपमान से क्रुद्ध गरुड़ ने भगवान् से वर मांगा कि नाग मेरे भक्ष्य हों ॥२००॥ भगवान् ने 'ऐसा ही हो'—कहकर उसे वही वरदान दिया। तदनन्तर गरुड़ अपने पराक्रम से अमृत को प्राप्त कर जब चलने लगा तब देवराज इन्द्र ने उससे कहा—॥२०१॥ 'हे पक्षिराज तुम्हें ऐसा करना चाहिए कि जिससे ये धूर्त सर्प अमृत को न खा सकें। अतः मैं इसे सर्पों से हरण कर लूँगा ॥२०२॥ ऐसा सुनकर विष्णु के वर से प्रसन्न गरुड़ ने इन्द्र के इस प्रस्ताव को स्वीकार किया और अमृत-कलश लेकर सर्पों के समीप गया ॥२०३॥
४५६ कथासरित्सागर
४५६ कथासरित्सागर वरप्रभावभीतांश्च मुग्धानाश्वास्यगाद तान् । इदमानीतममृतं मुक्त्वाम्बां मम गृह्यताम् ॥१९४॥ अय निक्षिपाम्येतदहं वो धर्मसंस्तरे । तन्मोच्याम्बा च गच्छामि स्वीकुरुध्वमिदं सुधाम् ॥१९५॥ तथेत्युक्ते च तैर्नागैः स पवित्रं कुशास्तरे । सुधाकलशमाधत्त ते प्रास्य जननीं जहुः ॥१९६॥ दास्यमुक्तां च कृत्वैवं मातरं गरुडे गते । यावद्धावन्ते नागा मिथुश्चास्तत्स्थिलामृतम् ॥१९७॥ तावन्निपत्य सहसा तान् विमोह्य स्वशक्तितः । स सुधाकलशं शक्रो जहार कुशसंस्तरात् ॥१९८॥ विपन्नास्तेऽथ नागास्तं लिलिहुर्धर्मसंस्तरम् । कदाचिदमृतस्योतलेपोऽप्यस्मिन् भवेदिति ॥१९९॥ तेन पाटितजिह्वास्ते वृथा प्रापुर्द्विजिह्वताम् । हास्यादृते किमन्यत्स्यादतिलौल्यवतः फलम् ॥२००॥ अथालब्धामृतरसान्नागान्वैरी हरेर्वरात् । तार्क्ष्यः प्रबभूवे भोक्तुं तान्निपत्य पुनः पुनः ॥२०१॥ तदापाते च पातालं त्रासनिर्जिताखिलम् । प्रभ्रष्टगर्भिणीगर्भमभूत्कंपितपन्नगम् ॥२०२॥ नागानां ह्रासो जीमूतवाहनस्यात्मनोत्सव तं दृष्ट्वा बान्धवहं तत्र वासुकिर्भुजगेश्वरः । कृत्स्नमेवपदं नष्टं नागलोकममन्यत ॥२०३॥ ततो दुर्वारवीर्यस्य सपत्नस्तस्य विचिन्त्य सः । समयं प्रार्थनापूर्वं चकारैवं गरुत्मतः ॥२०४॥ एकैकं प्रतिदिनं नागं ते प्रेषयाम्यहम् । आहारहेतोः पक्षीन्द्र ! पयोधिपुलिनाञ्चले ॥२०५॥ पातालन्तु प्रवेष्टव्यं न त्वया सर्ववारिणा । मामलोभदायात्साभ्यस्सर्वैव हि विनश्यति ॥२०६॥ इति वासुकिना प्रोक्तस्तथेति गरुडोऽन्वहम् । तत्प्रहितमिहैकेकं नागं भोक्तुं प्रचक्रमे ॥२०७॥
चतुर्थ लम्बक ४५७
चतुर्थ लम्बक ४५७ और वर के प्रभाव से डरे हुए नागों से बोला कि 'मैंने अमृत ला दिया है। मेरी माता को दासता से मुक्त करके इसे लो' ॥१९४॥ यदि तुम्हें मुझसे भय है तो मैं इसे कुशा के आसन पर रख देता हूँ और अपनी माता को छुड़ा ले जाता हूँ। तुम लोग इसे स्वीकार करो' ॥१९५॥ 'ऐसा ही करो' नागों के इस प्रकार कहने पर पवित्र कुशासन पर अमृत-कलश को रखवा- कर नागों ने गरुड़ की माता विनता को छोड़ दिया ॥१९६॥ माता को दासता से मुक्त कराकर गरुड़ के चले जाने पर नाग निर्भयतापूर्वक जब अमृतपान करने के लिए एकत्र हुए, तब इन्द्र ने अपनी शक्ति से कुशासन पर रखे हुए सुधा-कलश का अपहरण कर लिया ॥१९७-१९८॥ हताश नागों ने 'कहीं अमृत गिरकर कुशा में न लगा हो'—ऐसा मानकर कुशाग्रों को चाटना प्रारम्भ किया ॥१९९॥ कुशाग्रों को चाटने से उनकी जीभों के दो टुकड़े हो गये । सच है, अत्यन्त लोभियों को हँसी के सिवा और क्या फल मिलता है ॥२००॥ अमृत के स्वाद से वञ्चित नागों का शत्रु गरुड़ विष्णु के वरदान के कारण बार-बार नागों पर टूटकर उन्हें खाने लगा ॥२०१॥ फलतः गरुड़ के आक्रमण से सारा पाताल व्याकुल हो गया। भय के कारण सर्प निर्जीव से हो गये। गर्भिणी नागपत्नियों के गर्भपात होने लगे और इसी भय मात्र से अनेक नाग प्राणों से भी हाथ धो बैठे ॥२०२॥ नागों के लिए जीमूतवाहन का आत्मसमर्पण प्रतिदिन इस प्रकार का आतङ्क देखकर नागराज वासुकि ने सोचा कि इस प्रकार तो सारा नागलोक सहसा नष्ट हो जायगा और गरुड़ भी अजेय है। ऐसा सोचकर उसने गरुड़ के साथ मिलकर एक नियम बना लिया कि प्रतिदिन एक नाग समुद्र-तट के पर्वत पर गरुड़ के भोजन के लिए भेज दिया जायगा। तब नागराज ने गरुड़ से कहा कि 'तुम पाताल में उपद्रव करने का आतङ्क फैलाने न आया करो। अन्यथा इस प्रकार एक साथ ही समस्त नागों के नाश हो जाने पर तुम्हारा स्वार्थ नष्ट ही जायगा' ॥२०३-२०५॥ गरुड़ ने भी इस व्यवस्था को मान लिया और वासुकि द्वारा भेजे हुए एक-एक नाग को वह प्रतिदिन खाने लगा ॥२०६॥ १ सर्प इसीलिए 'द्विजिव्ह' या दो जिह्वा वाले कहे जाते हैं। ५८
४५८ कथासरित्सागर
४५८ कथासरित्सागर तेन क्रमेण वासस्या फणिनोऽत्र क्षयं गताः। अहं च शङ्खचूडाख्यो नागो वारे ममाद्य च ॥२०८॥ अतोऽहं गरुडाहारकृतोबध्यशिलामिमाम्। मातुश्च शोच्यतां प्राप्तो नागराजनिवेशतः ॥२ ०९॥ इति तस्य वचः श्रुत्वा शङ्खचूडस्य दुःखितः। सान्त्वयंस्तं स जीमूतवाहनस्तमभाषत ॥२१०॥ अहो किमपि निःसत्त्वं राजत्वं बत वासुकेः। यत्स्वहस्तेन नीयन्ते रिपोरामिषतां प्रजाः ॥२११॥ किं न प्रथममात्मैव तेन दत्तो गरुत्मते। क्लीबेनाभ्यर्थिता केयं स्वकुलक्षयसाक्षिता ॥२१२॥ उत्पद्य कश्यपात्पापं तार्क्ष्योऽपि कुरुते कियत्। देहमात्रकृते मोहः कीदृशो महतामपि ॥२१३॥ तदहं तावदद्यैकं रक्षामि त्वां गरुत्मतः। स्वशरीरप्रदानेन मा विषादं वृथा सखे' ॥२१४॥ तच्छ्रुत्वा शङ्खचूड़ोऽपि धैर्यवित्पुवाच तम्। शान्तमेतन्महासत्त्व ! मा स्मैवं भाषथाः पुनः ॥२१५॥ न काचस्य कृते जातु युक्ता मुक्तामणेः क्षतिः। न चाप्यहं गमिष्यामि कथां कुलकलङ्किताम् ॥२१६॥ इत्युक्त्वा तं निषिध्यैव मातुर्जीमूतवाहनम्। भत्त्वा गरुडवेलां च स क्षणास्तरगामिनीम् ॥२१७॥ शङ्खचूड़ो ययौ तत्र वारिधेस्तीरवर्तिनम्। अन्तकाले नमस्कर्तुं गोकर्णाख्यमुमापतिम् ॥२१८॥ गते तस्मिंश्च कारुण्यनिधिर्जीमूतवाहनः। तत्त्राणायात्मदानेन बुबुधे लब्धमन्तरम् ॥२१९॥ ततस्तद्विस्मृतमिव क्षिप्रं कृत्वा स्वमुक्तिदं। कार्यापवेगादभ्यमुञ्चन्न मित्रवसुं गृहम् ॥२२०॥ तत्क्षणं च समासन्नताक्ष्र्यपक्षानिलाहता। तत्सत्त्वदर्शनाश्चर्यादिव सा मूर्ध्न्यूधयत् ॥२२१॥ तत्राहीर्रिपुमायान्तं मत्वा जीमूतवाहनः। परानुकम्पी तां बध्यशिलामभ्यारुरोह सः ॥२२२॥
चतुर्थ लम्बक ४५९
चतुर्थ लम्बक ४५९ अतः नागवध के उसी क्रम में आज मेरी बारी है। मेरा नाम शंखचूड़ है। मैं भी नागराज की आज्ञा से आज गरुड़ के आहार के लिए इस वध्यशिला पर लाया गया हूँ। अतः मैं माता के लिए शोचनीय हो रहा हूँ। इस प्रकार शंखचूड़ के वचन सुनकर और उसके मुख से दुःखी जीमूतवाहन धैर्यपूर्वक उससे बोला—॥२८-२१॥ अहो ! वासुकि का नागराज होना कितना सारहीन है, जो स्वयं अपने हाथों से अपनी प्रजा को शत्रु का आमिष (भोजन) बना रहा है॥२११॥ क्यों नहीं उसने सबसे पहले अपने को ही गरुड़ के लिए प्रदान किया। प्रत्युत इसके विपरीत ही नपुंसक के समान उसने अपने कुल का ही नाश स्वीकार किया॥२१२॥ उधर, गरुड़ भी कश्यप ऋषि की सन्तान होकर कितना पाप कर रहा है। महान् पुरुषों को भी इस देह के लिए कितना मोह है॥२१३॥ इसलिए आज मैं तुम एक नाग की अपना शरीर-दान करके रक्षा करता हूँ। तुम व्यर्थ शोक न करो॥२१४॥ यह सुनकर शंखचूड़ भी धैर्य के साथ बोला—हे महात्मन् ! ऐसा फिर न कहना॥२१५॥ काँच के लिए मोती की हानि करना उचित नहीं है। मैं भी कुल-कलंक बनना नहीं चाहता'॥२१६॥ ऐसा कहकर और जीमूतवाहन को रोककर वह सज्जन नाग शंखचूड़ तुरन्त आनेवाले गरुड़ के समय को जानकर समुद्रतीरवासी गोकर्ण नामक शिव को अन्तिम समय का प्रणाम करने के लिए गया। उसके जाने पर दयानिधि जीमूतवाहन को उसकी रक्षा के लिए अपना प्राणदान करने का अवसर मिल गया॥२१७-२१९॥ तब उसने पुलिन में माँ त्रिशिखी की बात का स्मरण करके किसी काम के बहाने से अपने साथी मित्रावसु को वहाँ से भेज दिया॥२२०॥ उसी समय समीप आये गरुड़ के पंखों की वायु से काँपती हुई भूमि मानो उस महापुरुष के दर्शन से आश्चर्यचकित हो घूमने लगी॥२२१॥ इस लक्षण से परोपकारी जीमूतवाहन गरुड़ का आया हुआ जानकर उस वध्यशिला पर चढ़ गया॥२२२॥
४६ कथासरित्सागर
४६ कथासरित्सागर
क्षणाच्चात्र निपत्यैव महासत्त्वं जहार तम्। आहृत्य चञ्च्वा गरुडः स्वच्छायाच्छादिताम्बरः ॥२२३॥ परिस्रवदसृग्धारे च्युतोत्खातशिखामणिम्। नीत्वा भक्षयितुं चन्मारेम शिखरे गिरेः॥२२४॥ तस्याङ्गे पुष्पवृष्टिश्च निपपात नभस्तलात्। तद्दर्शनाच्च किं स्वेदिविति तार्क्ष्यो विसिस्मये ॥२२५॥ तावत्स शङ्खचूड़ोऽत्र गत्वा गोकर्णमागतः। ददर्श रुधिरासारसिक्तं वध्यशिलातलम् ॥२२६॥ हा धिङ्मदर्थं तेनात्मा दत्तो नूनं महात्मना। तत्कुत्र नीतस्तार्क्ष्येण क्षणस्मिन् स भविष्यति ॥२२७॥ अन्विष्यामि द्रुतं तावत्कचिन्तमवाप्नुयाम्। इति साश्रुः स तद्रक्तधारामनुसरन्ययौ ॥२२८॥ अत्रान्तरे च दृष्टं तं दृष्ट्वा जीमूतवाहनम्। गरुडो भक्षणं मुक्त्वा सविस्मयमचिन्तयत् ॥२२९॥ कश्चित्किमप्य एवाय भक्ष्यमाणोऽपि यो मया। विपद्यते न तु परं धीरः प्रत्युत हृष्यति ॥२३०॥ इत्यन्तर्विमृशन्तं च तार्क्ष्यं तादुग्विभोऽपि सः। निजगाद निजाभीष्टसिद्धये जीमूतवाहनः ॥२३१॥ पक्षिराज ! ममास्त्येव शरीरे मांसशोणितम्। तदकस्मात्कृतोऽपि त्वं निवृत्तोऽसि भक्षणात् ॥२३२॥ तच्छ्रुत्वाश्चर्यवशगस्तं स पप्रच्छ पक्षिराट्। नागः साभो न तावत्त्वं ब्रूहि तत्को भवानिति ॥२३३॥ नाग एवास्मि भुङ्क्ष्व स्वं यथारब्धं समापय। आरब्धा ह्यसमाप्तैव किं धीरस्याद्यते क्रिया ॥२३४॥ इति यावच्च जीमूतबाहुं प्रतिवक्ति तम्। तावत्स शङ्खचूड़ोऽत्र प्राप्तो दूरादभाषत ॥२३५॥ मा मा गरुत्मन्नेष नागो नागोऽह्याह्र तव। तदेनं मुञ्च कोऽयं ते जातोऽश्राण्ट बत भ्रमः ॥२३६॥ तच्छ्रुत्वातोय विम्रान्तो बभूव स गरुडेश्वरः। वाञ्छितासिद्धिगेन च भेजे जीमूतवाहनः ॥२३७॥
चतुर्थ लम्बक ४३१
चतुर्थ लम्बक ४३१ अपने विशालपंखों की छाया से आकाश को छाये हुए गरुड़ ने चोंच मारकर उस महाप्राणी जीमूतवाहन को उठा लिया॥२२३॥ बहती हुई रक्तधारावाले और उखड़कर गिरी हुई सिर की मणिवाले जीमूतवाहन को पहाड़ की चोटी पर ले जाकर उसका भक्षण करने लगा॥२२४॥ इसी समय आकाश से पुष्पवृष्टि हुई। गरुड़ भी यह क्या है ऐसा सोचकर आश्चर्य चकित हो गया॥२२५॥ इतने में ही वह शंखचूड़ भी गोकर्णेश्वर शिव को प्रणाम करके आ गया और उसने वध्यशिला को रक्त से सचंप पाया॥२२६॥ और सोचने लगा कि धिक्कार है मुझे। उस महात्मा ने निश्चय ही मेरे लिए जीवन-दान दिया है। गरुड़ इस समय उसे कहाँ ले गया होगा॥२२७॥ मैं उसे शीघ्र खोजता हूँ। सम्भव है, मैं उसे प्राप्त कर लूँ। ऐसा सोचकर वह सज्जन रक्त की धारा के पीछे-पीछे चला॥२२८॥ उधर, जीमूतवाहन को प्रसन्न देखकर गरुड़ ने उसका भोजन करना छोड़ दिया और आश्चर्यान्वित हो उसे देखने लगा॥२२९॥ 'यह नाग नहीं कोई दूसरा ही जीव है, जो मेरे खाये जाने पर भी मरता नहीं प्रत्युत इसके विपरीत प्रसन्न हो रहा है' ॥२३०॥ इस प्रकार मन में सोचते हुए गरुड़ को अपनी दृष्टिसिद्धि के लिए जीमूतवाहन बोला—॥२३१॥ 'हे पक्षिराज ! अब भी मेरे शरीर में मांस और रक्त है। फिर भी तुम बिना तृप्त हुए ही खाने से सहसा क्यों रुक गये हो ? ॥२३२॥ यह सुनकर आश्चर्यचकित गरुड़ ने पूछा—हे सज्जन तुम नाग नहीं बताओ कौन हो ? ॥२३३॥ 'मैं नाग ही हूँ तुम खाओ। जो प्रारम्भ किया है, उसे समाप्त करो। महान् व्यक्ति किसी कार्य को जिसको आरम्भ किया हो समाप्त किये बिना नहीं छोड़ते'॥२३४॥ जीमूतवाहन जबतक ऐसा कह ही रहा था तबतक शंखचूड़ दूर से चिल्लाकर बोला—॥२३५॥ 'हे गरुड़ ! इसे मत खाओ मत खाओ। यह नाग नहीं है, तुम्हारा भक्ष्य नाग मैं हूँ। तुम्हें यह सहसा भ्रम कैसे हो गया। इसे छोड़ दो'॥२३६॥ यह सुनकर पक्षिराज गरुड़ अत्यन्त व्याकुल हो गया और जीमूतवाहन को अपनी अभीष्ट सिद्धि न होने का खेद हुआ॥२३७॥
४६२ कथासरित्सागर
४६२ कथासरित्सागर ततोऽप्योव्यसमालाप्रचन्दद्विद्याधराधिपम् बुद्धवा तं भक्षितं मोहाद् गरुत्मानभ्यतप्यत ॥२३८॥ अहो बत मूढस्य पापमापतितं मम । किं वा सुलभपापा हि भवन्त्युन्मार्गवृत्तयः ॥२३९॥ श्लाघ्यस्त्वय महात्मैष परार्थप्राणदायिना । ममेति मोहकृद्वक्ष येन विश्वमधः कृतम् ॥२४०॥ इति तं चिन्तयन्तं च गरुडं पापशुद्धये । वह्निं विविक्षुं जीमूतवाहनोऽथ जगाद स ॥२४१॥ पक्षिन्द्र किं विषण्णोऽसि सत्यं पापाद् बिभेषि चेत् । सन्दिदानीं न भूयस्ते भक्ष्याहीमे भुजङ्गमाः ॥२४२॥ कार्यश्चानुशयस्तेषु पूर्वभक्तेषु भोगिषु । एषोऽत्र हि प्रतीकारो वृथान्यच्चिन्तितं तव ॥२४३॥ इत्युक्तस्तेन स प्रीतस्ताख्यो भूतानुकम्पिना । तथेति प्रतिपेदे तद्वाक्यं तस्य गुरोरिव ॥२४४॥ ययौ चामृतमानेतुं नाकाञ्जीवयितुं जवात् । क्षताङ्गं तत्र तं चाप्यानस्थिशेषानहीनपि ॥२४५॥ ततश्च साक्षादागत्य देव्या सिक्तोऽमृतेन स । जीमूतवाहनो गौर्या तद्भार्याभक्तितुष्टया ॥२४६॥ तेनाधिकतरोद्भूतकान्तिर्ग्व्यङ्गानि जज्ञिरे । तस्य सानन्दगीर्वाणदुन्दुभिध्वनिभि सह ॥२४७॥ स्वस्थोत्थितं ततस्तस्मिन्नानीय गरुडोऽपि तत् । कृत्स्ने बेलातटेऽप्यथ ववर्षामृतमम्बरात् ॥२४८॥ तेन सर्वे समुत्तस्थुर्जीवन्तस्तत्र पन्नगाः । बभौ तच्च तदा भूरिभुजङ्गकुलसङ्कुलम् ॥२४९॥ बेलावनं विनिर्मुक्तबैनतेयभय तत । पातालमिव जीमूतवाहनालोकनागतम् ॥२५० ॥ ततोऽक्षयेण देहेन यशसा च विराजितम् । बुद्ध्वाभ्यनन्दत् बन्धुजनो जीमूतवाहनम् ॥२५१॥ ननन्द तस्य भार्या च सन्नातिः पितरौ तथा । को न प्रहृष्येद् दृष्टेन सुसत्त्वपरिघातिना ॥२५२॥