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कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : द्वितीय खण्ड (लम्बक ६ से १८) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1961 (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,079 पृष्ठ

सप्तम लम्बक १७९

सप्तम लम्बक १७९ तब उसपर छोटे भाई अनिच्छासेन को बिठाकर उसने अपना समाचार माता-पिता को कहने के लिए पिता घर के भेज दिया ॥१४६॥ वह अनिच्छासेन उस विमान के द्वारा आकाश मार्ग से इरावती नगरी में पिता के समीप जा पहुँचा ॥१४७॥ वहाँ जाकर उसने अत्यन्त उस कष्ट से व्याकुल माता-पिता को अपने दर्शन से ऐसा प्रसन्न किया जैसे चन्द्रमा चकवा-चकई को प्रसन्न करता है ॥१४८॥ आते ही माता और पिता को प्रणाम करके उनके द्वारा गले लगाये गये अनिच्छासेन ने अपने बड़े भाई की कुशल-वार्ता सुनाकर उनकी शंका दूर कर दी ॥१४९॥ और, अपना तथा बड़े भाई का प्रारम्भ के कष्ट से लेकर अन्त में गुण की प्राप्ति तक का सारा समाचार सुना दिया ॥१५०॥ और, यहाँ पर दुष्ट विमाता के द्वारा किये गये सारे पापकर्म की सारी कथा भी उसने सुनी जो विमाता ने उनके नाश के लिए की थी ॥१५१॥ तदनन्तर, अत्यन्त प्रसन्नता और उत्सव मानते हुए माता-पिता और अमला से प्रशंसित अनिच्छासेन वहीं रहने लगा ॥१५२॥ कुछ दिनों के बीतने पर बुरे सपने के कारण भाई के अनिष्ट की आशंका से दुःखित अनिच्छासेन ने भाई से मिलने की उत्कण्ठा अपने पिता से प्रकट की ॥१५३॥ और, कहा—'आपके मिलने की उत्कण्ठा बताकर मैं आर्य इन्दीवरसेन को यहाँ लाता हूँ। अतः पिताजी आप मुझे उसके पास जाने की आज्ञा दें ॥१५४॥ यह सुनकर बड़े पुत्र को देखने के लिए उत्सुक पिता और माता से आज्ञा प्राप्त कर अनिच्छासेन उसी विमानपर चढ़कर शीघ्र ही मीनपुर नगर जा राजा की आज्ञा पाकर ही अपने भाई के घर प्रविष्ट हुआ ॥१५५-१५६॥ उसने भीतर जाते ही बेहोश और भूमि पर गिरे हुए अपने बड़े भाई को देखा और उसके समीप ही यमदंष्ट्रा और मदनदंष्ट्रा—दोनों ही रो रही थीं ॥१५७॥ उसके पूछने पर कि यह क्या हुआ? नीचे मुँह किये हुई और लज्जाभिनय सी करती हुई यमदंष्ट्रा बोली—॥१५८॥ 'तुम्हारी अनुपस्थिति में एक बार मेरे स्नान के लिए चले जाने पर तुम्हारा भाई इस मदनदंष्ट्रा के साथ एकान्त में रमण कर रहा था। मैंने तुरन्त स्नान करके आने पर उसे इसके साथ देखा और वचनों से फटकारा ॥१५९-१६०॥

१७८ कथासरित्सागर

१७८ कथासरित्सागर विमाने वीरमारोप्य सोऽनिच्छासेनमग्रभाक्। प्रहिणोदन्तिकं पित्रोः स्वोदन्तावेदनाय तम् ॥१४६॥ सोऽपि गत्वा विमानेन तन क्षिप्राद्विहायसा। पुरीमनिच्छासेनस्तां पितुः प्रापदैरावतीम् ॥१४७॥ तत्र तौ नन्दयामास पितरौ दर्शनेन स। तीव्रोत्तातपक्लान्तौ चकोराविव चन्द्रमाः ॥१४८॥ उपेत्य चाङ्घ्रिपतितः पर्यायालिङ्गितस्तयोः। निरास पृच्छतोः शङ्कां भ्रातृकल्याणवार्तया ॥१४९॥ शशंस स च वृत्तान्तमेतयोः पुरतोऽखिलम्। आपातदुस्तं सोऽप्यन्तं मातुरानन एव च ॥१५०॥ शुश्राव चात्र विहितं तादृशं पापया तया। द्वेषेणापरमात्रा सदारमनाशाय कैतवम् ॥१५१॥ ततः पित्रोत्सववता युक्तो मात्रा च निर्वृतः। तस्थावनिच्छासेनोऽत्र पूज्यमानो जनेन सः ॥१५२॥ याते कतिपयाहे च दृष्ट दुःस्वप्नशङ्कितः। भ्रातरं प्रति सोत्कण्ठः पितरं स व्यजिज्ञपत् ॥१५३॥ गच्छामि युष्मदुत्कण्ठामभिधायानयाम्यहम्। आर्यन्वीरसेनं तमनुजानीहि तात माम् ॥१५४॥ तच्छ्रुत्वानुमतस्तेन पित्रा पुत्रोत्सुकेन सः। जनन्या च विमानं स्वं तदेवारुह्य सत्वरः ॥१५५॥ प्रायादनिच्छासेनस्तद्व्योम्ना शैलपुरं पुरम्। प्राप्यश्च तत्र प्राविक्षत्स्वभ्रातुस्तस्य मन्दिरम् ॥१५६॥ ददर्श तत्र निस्संज्ञं पतितस्थितमग्रजम्। रुदत्योरन्तिके खड्गदंष्ट्रामदनदंष्ट्रयोः ॥१५७॥ किमेतदिति सम्भ्रान्तं पृच्छन्तं तमधोमुखी। जगाद खड्गदंष्ट्रा सा निन्दितापरया तया ॥१५८॥ स्वय्यस्थिरे मयि स्नातुं गतायामेकदाऽनया। त्वद्भात्राय महारस्तं रहो मदनदंष्ट्रया ॥१५९॥ क्षणात्स्नात्वागता चाहं साक्षादेनं तथा स्थितम्। एतया मुक्तमद्राक्षं वाचा च निरभर्त्सयम् ॥१६०॥

सप्तम लम्बक १७९

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति देवनागरी लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

सप्तम लम्बक १७९ तब उसपर छोटे भाई अनिच्छसेन को बिठाकर उसने अपना समाचार माता-पिता को कहने के लिए बिना श्रम के भेज दिया ॥१४६॥ वह अनिच्छासेन उस विमान के द्वारा आकाश मार्ग से इरावती नगरी में पिता के समीप जा पहुँचा ॥१४७॥ वहाँ आकर उसने अत्यन्त उग्र कष्ट से व्याकुल माता-पिता को अपने दर्शन से ऐसा प्रसन्न किया जैसे चन्द्रमा चक्रवा-चकई को प्रसन्न करता है ॥१४८॥ जाते ही माता और पिता को प्रणाम करके उनके द्वारा गले लगाये गये अनिच्छासेन ने अपने बड़े भाई की कुशल-वार्ता सुनाकर उनकी शंका दूर कर दी ॥१४९॥ और, अपना तथा बड़े भाई का प्रारम्भ के कष्ट से लेकर अन्त में सुख की प्राप्ति तक का सारा समाचार सुना दिया ॥१५०॥ और, यहाँ पर दुष्ट विमाता के द्वारा किये गये सारे पापकर्म की सारी कथा भी उसने सुनी जो विमाता ने उनके नाश के लिए की थी ॥१५१॥ तदनन्तर, अत्यन्त प्रसन्नता और उत्सव मानते हुए माता-पिता और जनता से प्रशंसित अनिच्छासेन वहीं रहने लगा ॥१५२॥ कुछ दिनों के बीतने पर बुरे सपने के कारण भाई के अनिष्ट की आशंका से दुःखित अनिच्छासेन ने भाई से मिलने की उत्कण्ठा अपने पिता से प्रकट की ॥१५३॥ और, कहा—आपके मिलने की उत्कण्ठा बताकर मैं आर्य इन्दीवरसेन को यहाँ लाता हूँ। अतः पिताजी आप मुझे उसके पास जाने की आज्ञा दें ॥१५४॥ यह सुनकर बड़े पुत्र को देखने के लिए उत्सुक पिता और माता से आज्ञा प्राप्त कर अनिच्छासेन उसी विमानपर चढ़कर शीघ्र ही धीरपुर नगर को आया और प्रातःकाल ही अपने भाई के घर प्रविष्ट हुआ ॥१५५-१५६॥ उसने भीतर जाते ही बेहोश और भूमि पर गिरे हुए अपने बड़े भाई को देखा और उसके समीप ही मलयदंष्ट्रा और मदनमंजूषा—दोनों ही रो रही थीं ॥१५७॥ उनसे पूछने पर कि यह क्या हुआ? नीचे मुंह किये हुई और मदनमंजूषा से निन्दा की जाती हुई मलयदंष्ट्रा बोली—॥१५८॥ 'तुम्हारी अनुपस्थिति में एक बार मेरे स्नान के लिए चले जाने पर तुम्हारा भाई इस मदनमंजूषा के साथ एकान्त में रमण कर रहा था। मैंने तुरन्त स्नान करके आने पर उसे इसके साथ देखा और वचनों से फटकारा ॥१५९-१६०॥

१८० कथासरित्सागर

१८० कथासरित्सागर ततोज्नुनीताप्येतेन नित्यमेवाबिसङ्ख्यया । ईर्ष्यया मोहितात्यर्थमहमेवमचिन्तयम् ॥१६१॥ अहो अगणयित्वैव मामयं भजतेऽपराम् । आमेज्स्य खड्गमाहात्म्यकृतो दर्पोऽयमीदृशः ॥१६२॥ तदस्य गोपयाम्येनमिति सञ्चिन्त्य मूढया। एतत्खङ्गो निधिः क्षिप्तः सुप्तेऽस्मिन्दहने मया ॥१६३॥ कलङ्कितश्च खड्गोऽसो गतश्चैव दशामिमाम् । अनुतप्तास्मि आक्रुष्टा ततो मदनदंष्ट्रया ॥१६४॥ अथैतस्यां च मयि च द्वयोः शोकाग्ध्यचेतसोः । मरणाध्यवसायिन्योरागतस्त्वमिहाधुना ॥१६५॥ तद्गृहाण त्वमेवैतत्खड्गं निस्त्रिंशकर्मिकाम् । अव्यक्तजातिभ्रंशां मामेतेनैव निपातय ॥१६६॥ इत्युक्तः स तयानिच्छासेनोऽथ भ्रातृजायया । सापापवध्यां मत्वा तां छेत्तुमैच्छन्निजं शिरः ॥१६७॥ मैवं कार्षीन्मृतो नायं राजपुत्र तवाग्रजः । खड्गप्रमादकोपेन देव्या स्वेयं विमोहितः ॥१६८॥ अस्या च खड्गदंष्ट्रायां मन्तव्या नापराधिता । यतः शापावतीर्णानामेतद्वस्तद्विजृम्भितम् ॥१६९॥ एते चास्य तव भ्रातुः पूर्वभार्ये उभे अपि । तत्प्रसाद्य तामेव देवीमभिमतप्तये ॥१७०॥ इति तत्कालमुद्भूतामन्तरिक्षात्सरस्वतीम् । श्रुत्वा निवृत्तेऽनिच्छासेनः स मरणोद्यमात् ॥१७१॥ आरुह्यैव विमानं तद्गृहीत्वाग्निकसङ्गितम् । सङ्गं तं विन्ध्यवासिन्याः पादमूलं जगाम सः ॥१७२॥ तत्र मूर्धोपहारेण तोषयिष्यन्नुपोषितः । दवीं तामुद्धतामेठां गगनादशृणोद् गिरम् ॥१७३॥ मा पुत्र साहसं कार्षीर्गच्छ जीवतु तेऽग्रजः । जायतां निर्मलः खड्गो भक्त्या तुष्टा ह्यहं तव ॥१७४॥ एतद्दिव्यं वचः श्रुत्वा तत्क्षणं निजभक्तृताम् । प्राप्तं दृष्ट्वा करे खड्गं कृत्वा तस्याः प्रदक्षिणम् ॥१७५॥

सप्तम लम्बक १८१

सप्तम लम्बक १८१ उसके बहुत मनाने पर भी अलंघनीय दैव-गति के कारण ईर्ष्या से मोहित होकर मैंने सोचा कि आश्चर्य है कि यह मुझे कुछ न समझकर दूसरी स्त्री का सेवन करता है— यह सारा घमण्ड इसे इस खड्ग के कारण है, इसलिए इस खड्ग को ही छिपा देती हूँ ऐसा सोचकर मूर्खता के कारण मैंने रात में उसके सो जाने पर तलवार को आग में फेंक दिया ॥१६१-१६३॥ इस कारण यह खड्ग भी कलंकित (काला) हो गया और यह इस दशा (बेहोशी) को प्राप्त हो गया ॥१६४॥ तदनन्तर प्रेम से बंधी यह और मैं—दोनों मरने का प्रयत्न कर रही थीं कि तुम आ गये ॥१६५॥ सो अब तुम ऐसे नृशंस-कर्म करनेवाली और अपनी जाति के धर्म को न छोड़नेवाली मुझे इसी तलवार से काट दो। इस प्रकार, भौजाई के कहने पर अनिच्छासेन ने सोचा कि यह तो शोक और सन्ताप के कारण ऐसा कह रही है इसे न मारना चाहिए। मैं ही भाई के शोक में आत्महत्या क्यों न कर लूं ? ऐसा सोचकर उसने अपना गला काटना चाहा ॥१६६ १६७॥ हे राजकुमार ! ऐसा न करो यह तुम्हारा भाई मरा नहीं है। देवी के खड्ग का अपमान होने के कारण उसी के कोप से यह बेहोश हो गया है ॥१६८॥ इस विषय में यमदंष्ट्रा को भी अपराधिनी न समझो। क्योंकि यह सब शाप के कारण लोगों का हस्तकौशल है। ये दोनों ही तुम्हारे भाई की पहले जन्म की पत्नियां हैं। इसलिए अपनी इच्छा-सिद्धि के लिए उसी भगवती विन्ध्यवासिनी की आराधना करो ॥१६९ १७० ॥ इस प्रकार, आकाशवाणी सुनकर अनिच्छासेन ने मरने का प्रयत्न रोक लिया। विमान पर चढ़कर और उस काले खड्ग को लेकर वह विन्ध्यवासिनी के चरणों की शरण में गया ॥१७१ १७२॥ यहाँ जाकर देवी को अपने शिर का बलिदान देने के लिए उद्यत हुए उसने आकाशवाणी सुनी कि 'बेटा ! साहस न करो। जाओ। तुम्हारा भाई जीवित हो जाये और खड्ग भी निर्मल हो जाये। मैं तुझ पर प्रसन्न हूँ।' ॥१७३ १७४ ॥ ऐसी दिव्य वाणी सुनकर हाथ में लिये खड्ग को निष्कलंक (चमचमाता) देखकर देवी को प्रणाम किया तथा उसकी प्रदक्षिणा की ॥१७५॥

१८९ कथासरित्सागर

१८९ कथासरित्सागर मनोरथमिवारुह्य विमानं सिद्धमाशुमत् । आजगामोत्सुकोऽनिच्छासेनेन शैलपुरं स तत् ॥१७६॥ तत्र दृष्ट्वोत्थितं सद्यो लब्धसंज्ञं समभ्रजम्। जग्राह पादयोः साधु कण्ठे सोऽप्येनमग्रहीत् ॥१७७॥ त्वया नौ रक्षितो मर्त्येयमे ते पादयोस्ततः। निपत्य भ्रातृजाये तमनिच्छासेनमूचतुः ॥१७८॥ भयेन्दीवरसेनाय पृच्छते सोऽब्रवीत् सत्। ॥१७९॥ । नाक्रुप्यत्सङ्गवष्ट्राये भ्रातर्येस्मिंस्तुताव च ॥१८० ॥ क्षुभाव चेतस्य मुक्तात्पितरौ दर्शनोत्सुकौ। मायामपरमात्रा च कृतां तौ तद्वियोगदाम् ॥१८१॥ ततो मात्रापितं खड्गं गृहीत्वा तत्प्रभावतः । ध्यातोपनतमारुह्य विमानं शुमहच्च सः ॥१८२॥ सहेममन्दिरो भार्याद्वयेन सह सानुजः । तामिन्दीवरसेनः स्वां पुरीमागादिरावतीम् ॥१८३॥ तत्रावतीर्य नभसो विस्मयालोकितो जनैः । राजवेश्म पितुः पार्श्वं विवेश सपरिच्छदः ॥१८४॥ तथाभूतञ्च पितरं तं दृष्ट्वा मातरं च सः। पपात पादयोर्बाष्पधाराधौतमुखस्तयोः ॥१८५॥ तौ च तं सहसा दृष्ट्वा पुत्रमाश्लिष्य सानुजम्। अमृतेनेव सिक्ताङ्गौ तापनिर्वाणमीयतुः ॥१८६॥ दिव्यरूपे च तद्भार्ये कृतपादाभिवन्दने। स्नुषे उभे ते पश्यन्तौ हृष्टावभिननन्दतुः ॥१८७॥ कथाप्रसङ्गाद् बुद्ध्वा च तस्य ते पूर्वनिर्मिते । दिव्यशास्त्रमिते भार्ये मयतुस्तौ परां मुदम् ॥१८८॥ विमानगतिशीर्णेर्णमन्दिरानयनादिना । प्रभावेण सुतस्यास्य विस्मयं नन्रदतुः ॥१८९॥ ततस्ताभ्यां स सहितः पितृभ्यां सपरिग्रहः । आस्तेन्दीवरसेनोऽत्र प्रदत्तप्रमदोत्सवः ॥१९०॥

इसके बाद अपने सफल मनोरथ के समान उस विमान पर चढ़कर उत्सुकता के साथ दैत्यपुर को आया ॥१७६॥ वहाँ पर होश में आये हुए बड़े भाई को देखकर उसके चरणों पर गिर पड़ा। उसने भी उसे उठाकर गले लगा लिया ॥१७७॥ 'तुमने हम दोनों के पति की और हमारी रक्षा की'—ऐसा कहकर दोनों भौजाइयाँ उसके चरणों पर गिर पड़ीं ॥१७८॥ तदनन्तर, सब समाचार पूछते हुए बड़े भाई इन्दीवरसेन से अनिच्छासेन ने सारा वृत्तान्त सुना दिया ॥१७९॥ सब समाचार सुनकर इन्दीवरसेन ने यमदंष्ट्रा पर क्रोध नहीं किया और भाई के कार्यों पर सन्तोष प्रकट किया ॥१८०॥ और, उसके मुँह से सुना कि उसके माता-पिता उसे देखने के लिए अत्यन्त उत्सुक हो रहे हैं। दूसरी विमाता के किये हुए छल-कपट को भी उसने सुना ॥१८१॥ तब छोटे भाई अनिच्छासेन से दिये गये खड्ग को लेकर उसके प्रभाव से ध्यान करते ही उपस्थित महान् विमान पर चढ़कर सोने के महलों तथा दोनों पत्नियों और छोटे भाई के साथ इन्दीवरसेन अपनी इरावती नगरी को आ गया ॥१८२-१८३॥ वहाँ पर जनता से आश्चर्य के साथ देखा गया इन्दीवरसेन अपने साथियों के साथ पिता के घर में गया ॥१८४॥ वियोग से दुर्बल और दुःखी पिता और माता को देखकर आँसुओं से मुँह को धोता हुआ वह उनके चरणों पर गिर पड़ा ॥१८५॥ वे दाता (राजा-रानी) छोटे भाई के साथ ज्येष्ठ पुत्र को देखकर उसका आलिंगन करते हुए अत्यन्त सन्ताप को भूलकर शान्ति और सुख में मग्न हो गये ॥१८६॥ शिष्ट रूपवाली पाद-वन्दन करती हुई उन दोनों बहुओं को देखकर उन लोगों ने प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया ॥१८७॥ इस प्रकार माता-पिता को प्रसन्न करता हुआ और जनता को उत्साह देता हुआ इन्दीवरसेन पिता के समीप ही रहने लगा ॥१८८॥ आकाश-यान सोने का महल आदि पाने के कारण और उनके प्रभाव से इन्दीवरसेन के माता-पिता आश्चर्य में प्रसन्न होते थे। इन्दीवरसेन भी दोनों पत्नियों के साथ तथा अन्य दुर्लभ ऐश्वर्य जनता की आँखों को तृप्त करता हुआ वहाँ रहने लगा ॥१८९-१९०॥

१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर एकदा च परित्यागसेनं तं जनकं नृपम्। विज्ञाप्य सानुजः प्रायात्पुनर्दिग्विजयोय सः ॥१९१॥ खड्गप्रभावाजिरखा च पृथ्वीं शूरस्नो महाभुजः। आययौ हेमहस्त्यश्वरत्नान्याहृत्य भूभुजाम् ॥१९२॥ अवाप नगरीं तां च निजां विजितया भयात्। अमुयात इवादूभूतसन्यधूलिनिभाद् भुवा ॥१९३॥ प्रविश्य राजधानीं च पित्रा प्रत्युद्गताऽथसः । जननीं नन्दयामास सानुजोऽर्धिकसङ्गमाम् ॥१९४॥ सम्मान्य राजलोकं च स्वभार्यास्विजनान्वितः। तत्रेभ्वीबरसेनस्तत्प्रमोदेनामयदहिनम् ॥१९५॥ अन्येद्युस्तत्करद्वारेणार्पयित्वा च मेदिनीम्। पित्रे स राजपुत्रः स्वामकस्माज्जातिमस्मरत् ॥१९६॥ तत सुप्तप्रबुद्धामो जनकं तमुवाच च। मया जातिः स्मृता तात सविद्य शृणु वच्मि सः ॥१९७॥ अस्ति मुक्तापुर माम सानौ हिमवत पुरम्। तत्रास्ति मुवतसेनाख्यो राजा विद्याधरेश्वरः ॥१९८॥ कम्बुवत्यभिधानायां देव्यां तस्य सुतौ क्रमात् ॥ जातौ द्वौ पद्मसेनश्च रूपसेनश्च सद्गुणौ ॥१९९॥ पद्मसेने तयो प्रेम्णा स्वय वृतवती पतिम्। कन्यादित्यप्रभा नाम विद्याधरवरात्मजा ॥२० ०॥ तद्वधूक तयास्यापि माम्ना चन्द्रवती स्वयम्। एष्यावृणीत कामार्ता तं विद्याधरकन्यका ॥२०१॥ द्विभार्यः स तथा पद्मसेनो नित्यमखिद्यत। सपलीसेर्येयादित्यप्रमया भार्यया तया ॥२०२॥ ईर्ष्यान्धिभार्याकलह सोढु शक्नोमि नान्बहम्। तपोबनाय गच्छामि निर्वेदस्यास्य शान्तये ॥२०३॥ ततात दहि मेऽनुज्ञामिति निर्वन्धतो मुहुः। जनक पद्मसेन स्व मुक्तासेने जगाद सः ॥२०४॥ सोऽपि तं तद्ग्रहं दृष्ट्वा समायंमक्षपत्पिता। किं ते तपोवनं गत्वा मत्र्यंलोकमवाप्नुहि ॥२० ५॥

सप्तम लम्बक १८५

सप्तम लम्बक १८५ एक बार पिता परित्यागसेन को निवेदन करके इन्दीवरसेन अपने छोटे भाई के साथ पुनः दिग्विजय के लिए चला ॥१९१॥ उस महाबली इन्दीवरसेन ने देवी के खड्ग के प्रभाव से सारी पृथ्वी का विजय करके और भाई के साथ पुनः राजधानी में आकर अपने पिता और माता अधिकप्रभा को आनन्दित किया ॥१९२-१९३॥ राजधानी में आकर अनुजीवी राजाओं का सम्मान-सत्कार आदि करके अपनी पत्नियों के साथ उसने वह दिन आनन्द से व्यतीत किया ॥१९४॥ एक दिन उस राजपुत्र ने कर के द्वारा सारी पृथ्वी का राज्य पिता को सौंपकर अकस्मात् अपने पूर्व जन्म का स्मरण किया ॥१९५-१९६॥ तब सन्ध्या जाकर उत्त हुआ वह राजकुमार इन्दीवरसेन अपने पिता से बोला— हे पिता ! मैंने अपने पूर्वजन्म का स्मरण कर लिया है। कहता हूँ सुनो—॥१९७॥ हिमालय के शिखर पर मुक्ता पुर नाम का एक नगर है। वहाँ पर मरुद्गत नाम का विद्याधरों का राजा है। कनकवती नाम की उसकी रानी से पद्मसेन और रूपसेन नाम के दो गुणवान् पुत्र हुए। उन दोनों में से पद्मसेन नामक बड़े कुमार को आदित्यप्रभा नाम की विद्याधर-कन्या ने स्वयं वरण कर लिया ॥१९८-२००॥ यह देखकर आदित्यप्रभा की छोटी कनकप्रभा नाम की विद्याधर-कन्या ने भी प्रसन्न होकर रूपसेन को वर लिया ॥२०१॥ इस प्रकार दो पत्नियोंवाला पद्मसेन गौड़ के द्वार कनकवती उस आदित्यप्रभा के साथ रमण करने लगा ॥२०२॥ उस पत्नी के कलह से दुःखी होकर पद्मसेन ने पिता मरुद्गत से आग्रहपूर्वक कहा कि पिताजी ! मैं इस कन्या को पत्नीत्व के लिए स्वीकार ले जाता हूँ। इस बीचका बात का रहस्य नहीं खुला। उस समय विद्याधर कन्या ने ॥२०३-२०४॥ यह सुनकर बड़े भाई पद्मसेन ने पिता से आग्रहपूर्वक पूछा और छोटे भाई के लिए विदा होकर उस कन्या का स्वयं वरण करके भाई को दे दूँगा ॥२०५॥

१८६ कथासरित्सागर

१८६ कथासरित्सागर तत्रैषा कलहासक्ता भार्यादित्यप्रभा तव। राक्षसी योनिमासाद्य त्वद्भार्यैव भविष्यति॥२०६॥ द्वितीया चन्द्रवत्येषा त्वयि रक्तातिवल्लभा। राजस्त्री राक्षसी भूत्वा भूमौ त्वां प्राप्स्यति प्रियम्॥२०७॥ सामिलाषोऽनुसर्तुं त्वां ज्येष्ठ यल्लङ्घितो मया। तन्मेष रूपसेनोऽपि भावी भ्रातैव तत्र ते॥२०८॥ द्विभार्यलंकृतं किञ्चिद्दुःखं तत्राप्यवाप्स्यसि। एवमुक्त्वा विरम्यत्य शापान्तमकरोत्स नः॥२०९॥ राजपुत्रो भुव जित्वा पृथ्वीं पित्रोः प्रदास्यसि। यदा तदा सहामीभिर्जातिं स्मृत्वा विमोक्ष्यसे॥२१०॥ इति पित्रोदितस्तन पद्मसेनो निजेन सः। तत्कालं सह तरन्यै मर्त्यलोकमवातरत्॥२११॥ स पद्मसेनस्तातायमहं जातः सुतस्तव। नाम्नेन्दीवरसेनोऽत्र कर्त्तव्य च कृत मया॥२१२॥ योऽपरो रूपसेनश्च विद्याधरकुमारकः। अनिच्छासेन इत्येष जातः सोऽनुज एव म॥२१३॥ या सादित्यप्रभा भार्या या च चन्द्रावतीति मे। विद्धि ते द्वे इमे खड्गदंष्ट्रामदनदंष्ट्रिके॥२१४॥ इदानीं चायमवधि प्राप्तः शापस्य सोऽप्य नः। तद्व्रजामो वय तात निजं वैद्याधरं पदम्॥२१५॥ इत्युक्त्वा स समं भार्याभ्रातृभिः स्पृष्टमात्रिभिः। त्यक्त्वैव मानुषीं मूर्ति भूत्वा विद्याधराकृतिः॥२१६॥ प्रणम्य पित्रोश्चरणौ कृत्वाङ्के दयिताद्वयम्। सानुजः प्रययौ व्योम्ना निज विद्याधर पुरम्॥२१७॥ तत्राभिनन्दितः पित्रा मुक्तसेनेन सन्मतिः। मातृनेत्रोत्सवो भ्रात्रा रूपसेनेन सङ्गतः॥२१८॥ उवास पद्मसेनोऽसौ भूयो नाविष्कृतेर्ष्यया। आदित्यप्रभया चन्द्रवत्या च सह निभृतः॥२१९॥

सप्तम लम्बक १८७

सप्तम लम्बक १८७ यहाँ मर्त्यलोक में भी यह कलहकारिणी तुम्हारी भार्या आदित्यप्रभा राक्षस-योनि में उत्पन्न होकर तुम्हारी ही पत्नी होगी। यह दूसरी तुम्हारी प्यारी चन्द्रावती भी राक्षसी और राजा की रानी होकर तुम्हें ही पति के रूप में प्राप्त करेगी ॥२६२-७॥ तुम्हारा साथ देने की इच्छा करनेवाला यह तुम्हारा भाई रूपशग भी मर्त्यलोक में तुम्हारा भाई ही बनेगा ॥२८॥ मर्त्यलोक में भी दो पत्नियों के होने का दुःख कष्ट भी प्राप्त कराग ! ऐसा कहकर और कुछ क्षण रुककर हमारे पिता ने शाप का अन्त इस प्रकार किया—॥२९॥ 'तुम राजपुत्र होकर, पृथ्वी को जीतकर जब पिता को पृथ्वी प्रदान करोगे तब इन सब (पत्नियों और भाई) के साथ पूर्वजन्म का स्मरण करके शाप से छूट जाओगे' ॥२१०॥ अपने पिता से इस प्रकार कहा गया पद्मसेन उन पत्नियो और भाई के साथ उसी समय पृथ्वी पर अवतीर्ण हुआ ॥२११॥ अतः हे पिता ! वह पद्मसेन मैं इन्दीवरसेन नाम से तुम्हारा पुत्र हुआ और जो करना था किया। यह दूसरा विद्याधर-कुमार रूपशेग है जो यह अनिष्ठासेन के नाम से तुम्हारा दूसरा पुत्र हुआ जो मेरा पूर्वजन्म का छोटा भाई ही है। आदित्यप्रभा और चन्द्रावती नामवाली ये दोना मेरी पत्नियां ही यमदंष्ट्रा और मदनदंष्ट्रा हैं। अब हम सब लोगों के शाप की अवधि समाप्त हो गई है। अब हम अपने विद्याधर-नगर को जाते हैं॥२१२-२१५॥ ऐसा कहकर वह इन्दीवरसेन अपने पूर्वजन्म का स्मरण करती हुई पत्नियों और छोटे भाई के साथ मानव-शरीर को छोड़कर और विद्याधर-शरीर धारण कर, माता-पिता के चरणों में प्रणाम करके और दोनों पत्नियों को गोद में उठाकर छोटे भाई के साथ अपने विद्याधर स्थान को चला गया ॥२१६-२१७॥ वहाँ विद्याधर-नगर में पिता मुक्तसेन से अभिनन्दन किया गया माता की आँखों का तारा रूपसेन से युक्त वह पद्मसेन ईर्ष्या रहित आदित्यप्रभा और चन्द्रावती के साथ सुख से रहने लगा ॥२१८-२१९॥

१८४ कथासरित्सागर

१८४ कथासरित्सागर इत्येतां गोमुखो रम्यां कथयित्वा कथां पथि। नरवाहनदत्तं समुवाच सचिवः पुनः ॥२२०॥ इत्थं स्यान्महतामेव महाक्लेशस्तथोदयः। अन्येषां तु कियान्देवे क्लेशो वाप्युदयोऽपि वा ॥२२१॥ त्वं तु रत्नप्रभादेवीविद्याशक्त्यानुपालितः। कर्पूरिकां राजसुतामक्लेशात्तामवाप्स्यसि ॥२२२॥ इति नरवाहनदत्तः श्रुत्वा सुमुखस्य गोमुखस्य मुखात्। प्राप्तश्रमत्पथि सस्मिन्नसावपरिक्षमं स तत्सहितः ॥२२३॥ गच्छंश्च तत्र कलकूजितराजहंसमच्छं सुधासरसशीतलभूरिवारि। चाम्रावलीपनसदाडिमरम्यरोधः सायं सरो विकचवारिजमाससाद ॥२२४॥ तस्मिन्स्नात्वा हिमगिरिसुताकान्तमभ्यर्च्य भक्त्या। कृत्वाहारी सुरभिमधुरास्वादहृद्यैः फलैस्तैः। सख्या सार्धं मृदुकिसलयास्तीर्णशय्याप्रसुप्त- स्त्तत्तीरे तां रजनिमनयत्सोऽत्र वत्सेशसूनुः ॥२२५॥ इति महाकविश्रीसोमदेवभट्टविरचिते कथासरित्सागरे रत्नप्रभालम्बके अष्टमस्तरङ्गः। नवमस्तरङ्गः नरवाहनदत्तस्य स्वप्नदर्शनम् अथ प्रातः सरस्तीरात्तस्मादुत्थाय मन्त्रिणम्। नरवाहनदत्तस्तं गोमुखं प्रस्थितोऽब्रवीत् ॥१॥ वयस्य जाने काप्यद्य रात्र्यन्ते धवलाम्बरा। कुमारी दिव्यरूपी मामेत्य स्वप्नेऽभ्यभाषिदम् ॥२॥ निश्चिन्तो भव वत्स त्वमितः शीघ्रमवाप्स्यसि। अम्भोस्तीरे वनान्तं स्यमाश्चर्यं नगरं महत् ॥३॥ विश्रान्तस्तत्र चाश्वेयात्ताप्य कर्पूरसम्भवम्। पुरं कर्पूरिकां प्राप्स्यस्यथ तां राजकन्यकाम् ॥४॥ इत्युक्त्वा सा तिरोऽभूत्सा प्रबुद्धश्चास्मि तत्क्षणम्। एव तमुक्तवन्तं च प्रीतः प्रोवाच गोमुखः ॥५॥ देवैरनुगृहीतस्त्वं देव किं तेऽस्ति दुष्करम्। तन्निश्चितमाह्लादेन चैव सेत्स्यत्यभीप्सितम् ॥६॥

सप्तम लम्बक १८१

सप्तम लम्बक १८१ मार्ग में जाते हुए मन्त्री गोमुख ने नरवाहनदत्त से यह कथा सुनाई और कहा--'इस प्रकार महान् व्यक्तियों को महान् कष्ट प्राप्त होते हैं। दूसरे साधारण व्यक्तियों का तो कितने ही बार उत्थान और पतन होते हैं ॥२२०-२२१॥ तुम तो रानी रत्नप्रभा की विद्या-शक्ति से रक्षित हो इसलिए राजकुमारी कर्पूरिका को बिना कष्ट ही प्राप्त करोगे ॥२२२॥ इस प्रकार, नरवाहनदत्त ने सुमुख गोमुख के मुंह से कथा सुनकर रास्ते की थकावट का अनुभव नहीं किया ॥२२३॥ जाते हुए उसने सायंकाल एक सुन्दर सरोवर को देखा जो सुन्दर शब्द करते हुए हंसों के स्वर से मुखरित हो रहा था जिसका जल अमृत के समान मधुर और तृप्तिकारक था और आम अनार एवं कटहल के वृक्षों से उसके किनारे रमणीय हो रहे थे ॥२२४॥ उस सरोवर में स्नान करके भक्ति-भाव से शिव की पूजा करके सुगन्धित मीठे और पुष्टिकारक फलों से आहार करके उस नरवाहनदत्त ने कोमल पत्तों की शय्या पर अपने मित्र के साथ उसके किनारे पर सोकर उस रात को बिताया ॥२२५॥ महाकवि श्रीसोमदेवभट्ट-विरचित कथासरित्सागर के रत्नप्रभालम्बक का अष्टम तरंग समाप्त नवम तरंग नरवाहनदत्त का साहस तब प्रातःकाल उस तालाब के किनारे से उठकर आगे के लिए प्रस्थान करते हुए नरवाहनदत्त ने मन्त्री गोमुख से कहा--॥१॥ "मित्र ! आज रात को स्वप्न में श्वेत वस्त्र धारण किये हुई, कोई दिव्यरूपा एक कुमारी ने मुझसे कहा--॥२॥ 'बेटा ! निश्चिन्त रहो। यहाँ से शीघ्र ही तुम समुद्र-तट के जंगलों में स्थित आश्चर्यमय बड़े नगर को जाओगे ॥३॥ वहाँ विश्राम करके बिना कष्ट के ही कर्पूरसम्भव द्वीप (टापू) में पहुँचोगे और वहाँ कर्पूरिका नाम की राजकुमारी को प्राप्त करोगे' ॥४॥ ऐसा कहकर वह अन्तर्धान हो गई और मैं भी उसी समय जाग उठा" ॥५॥ ऐसा कहते हुए युवराज से प्रसन्न गोमुख ने कहा-'महाराज ! तुम्हारे ऊपर देवताओं की कृपा है। अतः अवश्य ही तुम्हारा मनोरथ शीघ्र सफल होगा' ॥६॥

१९० कथासरित्सागर

१९० कथासरित्सागर एवमुक्तवता तेन गोमुखेन समं पथि। नरवाहनदत्तोऽत्र स प्रायात्सत्वरस्ततः ॥७॥ क्रमात्प्रापच्च जलधेरुपकण्ठगतं स तत्। अद्रिकूटनिभाट्टालप्रतोलीगोपुरान्वितम् ॥८॥ मेर्वाभसर्वसौवर्णराजमन्दिरराजितम् । नगरं विपुलाभोगं भूमण्डलमिवापरम् ॥९॥ प्रविश्य तत्र विपणीमार्गेण स ददर्श च। काष्ठयन्त्रमयं सर्वं चेष्टमानं सजीववत् ॥१०॥ वणिग्विलासिनीपौरजनं जनितविस्मयम्। म्रियामानं निर्जीवं इति वाग्विरहात्परम् ॥११॥ क्रमाच्च गोमुखसखः सोऽन्तिकं राजवेश्मनः। प्राप तादृशमेवात्र हस्त्यश्वादि विलोकयन् ॥१२॥ विवेश चास्य सौवर्णपुरमस्तकक्षोभिनः। अभ्यन्तरं ससचिवः साश्चर्यो राजसद्मनः ॥१३॥ तत्र यन्त्रप्रतीहारवारनारीपरिवृतम्। जडानां स्पन्दने हेतुं तेषां चेतनमेककम् ॥१४॥ इन्द्रियाणामिवात्मानमधिष्ठातृतया स्थितम्। रत्नसिंहासनासीनं भव्यं पुरुषमैक्षत ॥१५॥ सोऽपि तं पुरुषो दृष्ट्वा चोत्तमाकृतिमुत्थितः। विधाय स्वागतं स्वस्मिन्नुपावेशयदासनं ॥१६॥ पप्रच्छ चोपविष्टाय्रे क्क कथं किममानुषाम्। इमामारमनां द्वितीयः सन्निमां प्राप्तो भवानिति ॥१७॥ ततः सोऽपि स्ववृत्तान्तं निवेद्य तमशेषतः। नरवाहनदत्तस्तं प्रह्वं पप्रच्छ पूरुषम् ॥१८॥ कस्त्वं किं चेदमाश्चर्यं पुरं ते भद्र कथ्यताम्। तच्छ्रुत्वा स पुमान्वक्तुं स्वोदन्तमपचक्रमे ॥१९॥ राज्यधरनरवाहनाय कथा अस्ति काञ्चीति नगरी गरीयोगुणगुम्फिता। काञ्चीव वसुधावध्वा गलद्रत्नरुचिस्ततो गता ॥२०॥

सप्तम लम्बक १९१

सप्तम लम्बक १९१ गोमुख से इस प्रकार प्रोत्साहित नरवाहनदत्त गोमुख के साथ जल्दी-जल्दी रास्ता चलने लगा ॥७॥ और, चलते-चलते क्रमश समुद्र तट पर स्थित पर्वताकार अट्टालिकाओं गलियों एवं नगर-द्वारों तथा सुमेरु के समान सात के राजभवनों से युक्त विशाल विस्तारवाले भू-मण्डल के समान नगर में पहुँचा ॥८ ९॥ उस नगर में बाजार के रास्ते से मुड़कर जाते हुए उसने सब कुछ लकड़ी का बना हुआ और सजीव प्राणी के समान चेष्टा करता हुआ देखा ॥१०॥ बनिया वेश्याएँ, नागरिक आदि सभी आश्चर्यकारक थे। वे करते सब कुछ थे किन्तु बोल न सकने के कारण निर्जीव मालूम पड़ते थे ॥११॥ नरवाहनदत्त गोमुख के साथ हाथी घोड़े आदि देखता हुआ क्रमशः उस नगर के राजभवन के समीप जा पहुँचा ॥१२॥ और, उस सुवर्णमय नगर के मस्तक के समान शोभित उस राजभवन में अत्यधिक आश्चर्य के साथ अन्दर गया ॥१३॥ जिसमें यन्त्र के बने हुए पहरेदार, वेश्याएँ आदि यथावश्यक भरे हुए थे और उनके मध्य इन्द्रियों का संचालन करनेवाले आत्मा के समान उन सभी जड़ पदार्थों का संचालन करनेवाले सबके अधिष्ठाता के रूप में रत्न-सिंहासन पर बैठे हुए भव्य पुरुष को देखा ॥१४ १५॥ उस पुरुष ने भी अच्छी आकृति देखकर नरवाहन दत्त उच्चकोटि का पुरुष समझा और स्वागत करके आसन पर बिठाया ॥१६॥ और सामने बैठकर पूछा कि 'तुम कौन हो और एक व्यक्ति के साथ मनुष्यों से अगम्य इस भूमि में कैसे पहुँचे ? ॥१७॥ तब नरवाहनदत्त ने भी अपना सम्पूर्ण वृत्तान्त कहकर उस पुरुष से नम्रतापूर्वक पूछा—॥१८॥ तुम कौन हो ? और यह आश्चर्यमय तुम्हारा नगर कैसा है ? यह सुनकर उस व्यक्ति ने अपना वृत्तान्त कहना प्रारम्भ किया ॥१ ॥ राज्यधर बढ़ई की कथा बड़े अच्छे गुणों से चुनी गई और वसुधा-वधू की काची (करधनी) के समान अलंकार-रूप काची नाम की एक नगरी है ॥२ ॥

१९२ कथासरित्सागर

१९२ कथासरित्सागर तस्यां बाहुबलाख्योऽस्ति काञ्च्यां ख्यातो महीपतिः। कोपे यद्वा कृता येन खलापि श्रीर्भुजार्जिता ॥२१॥ तस्य राष्ट्रे नृपस्यावां तक्षाणौ भ्रातरावुभौ। मयप्रणीतदार्व्वादिमायायन्त्रविचक्षणौ ॥२२॥ ज्येष्ठ प्राणधरो नाम वेश्याव्यसनविप्लवः। अह कनिष्ठस्तद्भक्तो नाम्ना राज्यधरः प्रभो ॥२३॥ तत भुक्त्वा धन पित्र्य मद्वभर्त्रा म्व च किञ्चन। गुप्त मदर्पितमपि स्नेहाद्रक्षापितं मया ॥२४॥ ततोऽपि सोऽतिव्यसनो वेश्यार्थर्धिजिहीर्षया। रज्जुयन्त्रवहं दारुमय हंसयुग व्यधात् ॥२५॥ सपक्षयुगल रज्जुघट्टनप्रेरित निशि। राज्ञो बाहुबलस्यात्र कोशाद्यन्त्रप्रयोगतः ॥२६॥ गवाक्षेण प्रविश्यान्तश्छत्त्वा पटलक स्थितम्। आदायाभरण तस्य मद्भ्रातुर्गृहमागमत् ॥२७॥ तच्च विक्रीर्य सोऽभुङ्क्त मज्ज्येष्ठः सह वेश्यया। तथैवाहर्निश कोषममुष्णात् स च भूपतेः ॥२८॥ वार्यमाणोऽपि च मया नाकार्याद्व्यरमत्ततः। को हि मार्गममार्ग वा व्यसनान्धो निरीक्षते ॥२९॥ तथा च मुष्यमानेऽपि रात्रिष्वञ्चितार्गले। निर्मूषके राजगञ्जे दिनानि कतिचित् भयात् ॥३०॥ बिभिन्वन् प्रत्यह तूष्णीं परितप्तोऽधिकाधिकम्। तद्भाण्डागारिको गत्वा स्फुट राजे न्यवेदयत् ॥३१॥ राजापि च तदाग्यांश्च रक्षकान् जाग्रतो निशि। कोषान्त स्थापयामास तत्र तत्त्वमवेक्षितुम् ॥३२॥ ते निशीथे प्रविष्टौ तौ गवाक्षेणात्र रक्षकाः। मद्भ्रातृयन्त्रहंसौ द्वावपश्यन् रज्जुघट्टितौ ॥३३॥ यन्त्रयुक्तिपरिभ्रान्तौ चञ्चूपात्तविभूषणौ। छिन्नरज्जू जगृहुश्च राज्ञे दर्शयितु प्रगे ॥३४॥ तत्काल च स मद्भ्राता ज्येष्ठोऽब्रवीत् ससम्भ्रम । भ्रातर्गृहीतौ हंसौ द्वौ मदीयो गञ्जरक्षिभिः ॥३५॥

सप्तम लम्बक १९३

सप्तम लम्बक १९३ उस काँची में बाहुबल नाम का प्रसिद्ध राजा है, जिसने अपनी भुजाओं के बल से उपार्जित चंचला लक्ष्मी को भी अपने कोष (खजाने) में बाँध रखा है ॥२१॥ उस राजा के राज्य में मयदानव से आविष्कृत यंत्रों के निर्माण में कुशल हम दो बढ़ई भाई रहते थे ॥२२॥ प्राणधर नाम का बड़ा भाई वेश्या-व्यसन में प्रसिद्ध था। उसका भक्त छोटा भाई मैं राज्यधर नाम से प्रसिद्ध हूँ ॥२३॥ मेरे बड़े भाई ने अपनी कमाई के तथा पिता के धन को खा डाला और कुछ मेरे द्वारा स्नेह से दिये गये धन को भी उड़ा दिया ॥२४॥ तो भी अत्यन्त व्यसनी उसने वेश्या के लिए धन हरण करने के लिए रस्सी से बँधे हुए काठ के हंसों की जोड़ी बनाई ॥२५॥ वे हंस रस्सी के हिलाने से रात को राजा के खजाने में रोशनदान से अन्दर घुसकर अपनी चोंच में पेटियों में रखे हुए आभूषणों को यन्त्र के द्वारा अपने मालिक (मेरे भाई) के पास ले आते थे ॥२६-२७॥ मेरा बड़ा भाई उन आभूषणों को बेचकर उस धन को वेश्या के साथ भोगता था ॥२८॥ मेरे बहुत मना करने पर भी वह इस अनुचित कार्य से रुका नहीं। व्यसनों में अन्धा कौन भले या बुरे मार्ग को देखता है ॥२९॥ इस प्रकार रात में दृढ़ता से बन्द किये गये और चूहा से रहित उस गोदाम में चोरी होने के कारण कुछ दिनों के अनन्तर भाण्डार का अधिकारी भय से सर्वदा इस चोरी का पता लगाने की चिन्ता में अत्यन्त सन्तप्त और दुःखी हो गया और उसने राजा के समीप जाकर स्पष्ट रूप से निवेदन कर दिया ॥३०-३१॥ राजा ने भाण्डारी तथा अन्यान्य सिपाहियों को रात में चोरी का पता लगाने के लिए नियुक्त कर दिया। उन रखवालों ने रात को यन्त्र से बने हुए और रस्सी से बँधे हंसों को रोशनदान से घुसते हुए और माल उठाते हुए देख लिया और उन्हें पकड़ लिया। रस्सारूप यंत्र की युक्ति से घूमनेवाला काठों से गढ़ा हंसद्वय हुए और टूटी हुई रस्सी वाले उन हंसों को प्रातः काल राजा को दिखाने के लिए पकड़ रखा ॥३२-३४॥ उसी समय मेरे भाई ने घबड़ाये हुए आकर मुझसे कहा कि गोदाम के रखवालों ने मेरे हंसों को पकड़ लिया है ॥३५॥ २५

१९४ कथासरित्सागर

१९४ कथासरित्सागर रज्जुर्हि शिथिलीभूता यन्त्रे स्रस्ता च कीलिका। तस्मादितोपसर्तव्यमधुनैवावयोर्द्वयोः ॥३६॥ चौराविति निगृह्णीयात् प्रातर्बुद्ध्वा नृपो हि नौ। आवामत्र हि विख्यातौ मायायन्त्रविदावुभौ ॥३७॥ मातयन्त्रविमानं च तन्ममास्तीह मञ्जु यत्। योजनाष्टशतीं याति सकृत् प्रहतकीलिकम् ॥३८॥ तेन दूरं व्रजावोऽद्य विदेशमपि सुखदम्। पापे कर्मण्यवज्ञातं हितवाक्ये कुतः सुखम् ॥३९॥ यन्मया न कृतं वाक्यं तव दुष्कृतबुद्धिना। तस्यैष पाकः प्रसृतो योऽद्य खमप्यपापिनि ॥४०॥ एवमुक्त्वा समारोहद्विमानं व्योमगामि तत्। स मे प्राणधरो भ्राता तदैव सकुटुम्बकः ॥४१॥ अहमुक्तोऽपि तेनात्र नारोहं यन्निर्वृतेः। ततस्तेन समुत्पत्य स प्रायात् क्वापि दूरतः ॥४२॥ गते प्राणधरे तस्मिन्नहमन्वेषनामनि। प्रभाते माऽवि सम्भाव्य राजतो भयमेककः ॥४३॥ आरुह्य स्वकृतेऽन्यस्मिन् धाव्यन्त्रविमानके। द्रुतं ततो गतोऽभूवं योजनानां शतद्वयम् ॥४४॥ प्रेरितेन पुनस्तेन विमानेन खगामिना। ततोऽपि योजनशतद्वयमप्यदगामहम् ॥४५॥ ततः समुद्रेनैकट्याच्छास्त्रत्यक्तविमानकः। पद्भ्यां व्रजन्निह प्राप्तः शून्यं पुरमिदं क्रमात् ॥४६॥ कौतुकाच्च प्रविष्टोऽहं वैभवं राजमन्दिरम्। वस्त्रामरणशय्यादिराजोपकरणान्वितम् ॥४७॥ सायं सोद्यानवाप्याम्भः स्नातो भुक्त्वा फलान्यहम्। राजशय्यागतो रात्रावेकाकी समचिन्तयम् ॥४८॥ निर्जनं किं करोमीह तत् प्रातर्यत्र कुत्रचित्। व्रजामीतो गतं न हि भयं बाहुबलान्नृपात् ॥४९॥ इति सञ्चिन्त्य संसुप्तं नितान्तं दिव्यमप्यधृत्। पुरुषो बर्हिणारूढः स्वप्ने मामवमभ्यधात् ॥५०॥

सप्तम लम्बक १९५

सप्तम लम्बक १९५ क्योंकि रस्सी ढीली हो गई है और यन्त्र की कील भी खिसक गई इसलिए अब हम दोनों को अभी ही यहाँ से हट जाना चाहिए ॥३६॥ क्योंकि प्रातःकाल राजा हम दोनों को चोर समझकर मरवा डालेगा इसलिए कि हम दोनों ही यहाँ ऐसे कूटयन्त्रों को बनानेवाले और जाननेवाले प्रसिद्ध कारीगर हैं॥३७॥ मेरे पास जो मायामय यन्त्रवाला विमान (आकाश-यान) है, वह एक बार चाभी देने से बत्तीस कोस तक जाता है॥३८॥ उसके द्वारा हम लोग सुखदायी विदेश में भी जा सकते हैं। बुरे काम में हितैषी के हित वाक्य न मानने से सुख कहाँ मिल सकता है? उस मेरा हित चाहनेवाले तुम्हारे बहुत मना करने पर भी पापबुद्धि मैंने तुम्हारी बात नहीं मानी उसी पाप का यह फल निष्पाप तुम्हें भी भोगना पड़ा ॥३९-४०॥ ऐसा कहकर मेरा बड़ा भाई प्राणधर अपने कुटुम्ब के साथ दूर जानेवाले विमान पर चढ़ गया ॥४१॥ उसके कहने पर भी बहुत लोगों से भरे हुए उस विमान पर मैं नहीं बैठा। इस आशंका से कि वह विमान आकाश में उड़कर कहीं दूर न चला जाय ॥४२॥ यथार्थ नामवाले उस प्राणधर के चले जाने पर एकाकी मैं भी प्रातःकाल ही में अपने बनाये हुए वायुयन्त्रवाले विमान से शीघ्र ही आठ सौ कोस दूर राजा से भय भागा ॥४३-४४॥ उस आकाश-यान में पुनः पानी भरकर मैं और भी दो कोस दूर चला आया ॥४५॥ तब समुद्र की समीपता की शंका से विमान को छोड़कर पैरों से चलता-चलता इस सूने नगर में आ गया ॥४६॥ देखते-देखते मैं बहुमूल्य आभूषण शय्या आदि साज-सामान से भरे हुए उस राजमन्दिर में आया। नागरत्न नाम की ओषधीय लगाकर और पहरे को लांघकर राजा के पलंग पर सोता हुआ अकेला मैं सोचने लगा—॥४७-४८॥ कि मैं इस निर्जन नगर में क्या करूँगा। प्रातःकाल उठकर कहीं इधर उधर देखूँगा। अब राजा के बाहुबल से तो मुझे भय नहीं रहा ॥४९॥ ऐसा सोचकर काटे हुए भुजाये प्रातःकाल के समय खाट पर चढ़े हुए किसी पुरुष से इस प्रकार कहा—॥५०॥

१९६ कथासरित्सागर

१९६ कथासरित्सागर

इहैव भद्र वस्तव्यं गन्तव्यं नान्यतस्त्वया। आहारकाले चारुह्य स्थातव्यं मध्यमे पुरे ॥५१॥ इत्युक्त्वान्तर्हिते तस्मिन् प्रबुद्धोऽहमचिन्तयम्। दुष्पारनिर्मितमिदं दिव्यस्थानं सुनिश्चितम् ॥५२॥ कृतश्च तेन मे स्वप्ने पुष्पपुण्यैरनुग्रहः। उत्थितोऽस्मीह नूनं हि क्षेमोऽस्ति वसतोऽद्य मे ॥५३॥ इति बद्धासनमुत्थाय कृत्याह्निकमहं स्थितः। आरुह्य यावदाहारकालेऽस्मिन् मध्यमे पुरे ॥५४॥ तावद्धिरण्मयेष्वग्रेपात्रेषूपनतेषु मे। अपतत् स्वादुघृतक्षीरसालिमक्तादिभोजनम् ॥५५॥ चिन्तितं चिन्तितं चान्यन्मम भोज्यमुपागमत्। तद्भुक्त्वा चाहमभवं देवात्तीवेह निर्वृतः ॥५६॥ ततो गृहीतैव मया स्थितिरस्मिन् पुरे प्रभो। चिन्तितोपनमद्राज्यभोगेन प्रतिवासरम् ॥५७॥ भार्या परिच्छदो वा मे चिन्तितस्तु न तिष्ठति। तेन यन्त्रमयोऽत्राप्यं जनः सर्वः कृतो मया ॥५८॥ इतीहागत्य तत्रापि दैवैकाकी करोम्यहम्। राज्ञो लीलामितुः राज्यधरो नाम विधेर्वशात् ॥५९॥ तद्बन्निमितेऽमुष्मिन् भवन्तोऽद्य पुरे दिनम्। विधाम्यन्तु यथाशक्ति परिचर्यापरे मयि ॥६०॥ इत्युक्त्या तत्पुरोद्यानं तेन राज्यधरेण सः। [L22: नरवाहनदत्तोऽत्र नीयते स्म स गोमुखः ॥६१॥ तत्र वापीजलस्नातो वारिजार्चितधूर्जटिः। तां मध्यमपुराहारभूमिं च प्रापितोऽभवत् ॥६२॥ बुभुजे तत्र चाहारान् ध्यातोपस्थापिताञ्छुभान्। तेन राज्यधरेणाप्रस्थितेन स समन्वितः ॥६३॥ ततः केनाप्यदृष्टेन प्रमृष्टाहारभूमिकः। अनु ताम्बूलभोगं स तस्थौ पीठासनः सुखम् ॥६४॥ अथ चिन्तामणिप्रख्यपुरमाहात्म्यविस्मितः। भुक्ते राज्यधरे नक्तं स भेजे शयनोत्तमम् ॥६५॥