भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

प्र० ४४ : अ० २८ ] नौकाध्यक्ष २१३

(१) यथानिर्दिष्टाश्चैताः पण्यपत्तनयात्राकालेषु प्रेषयेत् । संयान्तीर्नावः क्षेत्रानुगताः शुल्कं याचेत । हिंस्रिका निर्घातयेद्, अमित्रविषयातिगाः पण्य-पत्तनचारित्रोपघातिकाश्च । (२) शासकनियामकदात्ररश्मिग्राहकोत्सेचकाधिष्ठिताश्च महानावो हैमन्तग्रीष्मतार्यासु महानदीषु प्रयोजयेत् । क्षुद्रिकाः क्षुद्रिकासु वर्षा-स्त्राविणीषु । (३) बद्धतीर्थाश्चैताः कार्याः राजद्विष्टकारिणां तरणभयात् । अकाले-ऽतीर्थे च तरतः पूर्वः साहसदण्डः । (४) अकालेऽतीर्थे चानिसृष्टतारिणः पादोनसप्तविंशतिपणस्तरात्ययः । (५) कैवर्तकाष्ठतृणभारपुष्पफलवाटषण्डगोपालकानामनत्ययः सम्भा-व्यदूतानुपातिनां च सेनाभाण्डप्रचारप्रयोगाणां च । स्वतरणैस्तरताम् । बीजभक्तद्रव्योपस्करांश्चानूपग्रामाणां तारयताम् ।


लग जाने के कारण नुकसान हुए माल का टैक्स माफ कर देना चाहिए या नुकसान को देखते हुए आधा ही टैक्स लेना चाहिए ।

( १ ) निःशुल्क या आधे शुल्क वाली नौकाओं को बन्दरगाहों की ओर यात्रा करने के समय में भेज दिया जाय या छोड़ दिया जाय । चलती हुई नौकाएँ जब चुंगी पर पहुँच जायँ तब उनकी चुंगी वसूल की जाय । चोर-डाकुओं की नौकाओं को नष्ट कर दिया जाय । जो नौकाएं शत्रुदेश की ओर जाती हों या जो व्यापार-नियमों का उल्लंघन करती हों, उन्हें भी तहस-नहस कर दिया जाय ।

( २ ) नाव का कप्तान ( शासक ), नावचालक ( नियामक ), लंगड़ डालने वाला ( दात्रग्राहक ), रस्सी या पतवार पकड़ने वाला ( रश्मिग्राहक ), और नौका में भरे हुए पानी को उलीचने वाला ( उत्सेचक ), इन पाँच कर्मचारियों के रहने पर ही बड़ी-बड़ी नौकाओं को गर्मी तथा सर्दी में समान रूप से बहने वाली बड़ी-बड़ी नदियों में चलाने की आज्ञा देनी चाहिए । बरसाती नदियों में चलाने के लिये अलग नौकाएँ होनी चाहिए ।

( ३ ) इन बड़ी नौकाओं को ठहरने के लिये नियत बन्दरगाह होने चाहिए और उन पर पूरी निगरानी रखी जानी चाहिए, जिससे किसी शत्रु राजा के गुप्तचर उनमें प्रवेश न कर सकें ।

( ४ ) कोई भी नाव वाला यदि अनिश्चित समय में ही अनियमित मार्ग से घाट के आर-पार जाये तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए । इसके अतिरिक्त ठीक समय पर और नियत घाट से बिना आज्ञा नाव पार करने वाले व्यक्ति पर पौने सत्ताईस पण दण्ड निर्धारित किया जाय ।

( ५ ) धीवर, लकड़हारे, घसियारे, माली, कुंजड़े, खेतों के रखवाले, चोर की डर से पीछे जाने वाले, राजदूत के पीछे शेष कार्य को पूरा करने के लिए जाने वाली

२१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) ब्राह्मणप्रव्रजितबालवृद्धव्याधितशासनहरगर्भिण्यो नावध्यक्षमुद्राभिस्तरेयुः । (२) कृतप्रवेशाः पारविषयिकाः सार्थप्रमाणाः विशेयुः । (३) परस्य भार्या कन्यां वित्तं वापहरन्तं शङ्कितमाविग्नमुद्भाण्डीकृतं महाभाण्डेन मूर्ध्नि भारेणावच्छादयन्तं सद्योगृहीतलिङ्गिनमलिङ्गिनं वा प्रव्रजितमलक्ष्यव्याधितं भयविकारिणं गूढसारभाण्डशासनशस्त्राग्नियोगं विषहस्तं दीर्घपथिकममुद्रं चोपग्राहयेत् । (४) क्षुद्रपशुर्मनुष्यश्च सभारो माषकं दद्यात् । शिरोभारः कायभारो गवाश्वं च द्वौ । उष्ट्रमहिषं चतुरः । पञ्च लघूयानम् । षड् गोलिङ्गम् । सप्त शकटम् । पण्यभारः पादम् ।

सेना, सैनिक सामग्री और गुप्तपुरुषों को बिना समय एवं बिना आज्ञा ही नदी पार करने पर कोई दण्ड न दिया जाना चाहिए । अपनी नाव से नदी पार करने वाले व्यक्तियों पर भी कोई प्रतिबन्ध नहीं होना चाहिए । बीज, कर्मचारियों की भोजन-सामग्री, फल, फूल, शाक और मसाला ( उपस्कर ) आदि सामान को पार ले जाने वाले व्यक्ति भी दण्ड से मुक्त समझे जाँय ।

( १ ) ब्राह्मण, संन्यासी, बालक, बीमार, राजदूत या हलकारा और गर्भवती स्त्री को नौकाध्यक्ष की मुहर देखकर ही, बिना भाड़ा के पार कर देना चाहिए ।

( २ ) जिन परदेशियों को पासपोर्ट मिल गया हो अथवा पासपोर्ट प्राप्त व्यापारियों के साथ जिन-जिन व्यक्तियों को आने की अनुमति मिल गई हो, वे ही देश में प्रवेश कर सकते हैं ।

( ३ ) किसी की स्त्री, कन्या या किसी का धन चुरा कर भागने वाले व्यक्ति को आगे बताये हुए लक्षणों से पहिचान कर फौरन गिरफ्तार करवा देना चाहिए । वे लक्षण इस प्रकार हैं : यदि वह चौकन्ना-सा नजर आये, ताकत से अधिक बोझा उठाये हो, सिर पर इस प्रकार घास-फूस फैलाये हो कि शक्ल न दिखाई दे, नकली संन्यासी का वेष बनाये हो, संन्यासी वेश बदल कर सादा वेष धारण कर ले, बीमारी का कोई चिह्न न होने पर भी अपने को बीमार जैसा लगाये, डर से मुख की रौनक उतरी हुई हो, बहुमूल्य वस्तुओं को छिपाये हो, गुप्त कागजातों को रखे हो, हथियार छिपाकर रखे हो, जहर आदि को रखे हो, अग्नियोग को छिपाये हो, दूर का सफर करता हो और पासपोर्ट प्राप्त किए बिना ही यात्रा करता हो ।

( ४ ) भेड़, बकरी आदि छोटे जानवरों का और जिस मनुष्य के पास हाथ में उठाने भर का बोझा हो, एक माषक भाड़ा दे । जिस पुरुष के पास सिर अथवा पीठ से उठाने योग्य बोझा हो और गाय, घोड़ा आदि पशुओं का, दो माषक भाड़ा दिया जाय । ऊँट और भैंस का चार माषक भाड़ा दिया जाना चाहिए । इसी प्रकार

प्र० ४४ : अ० २८ ] नौकाध्यक्ष २१५

(१) तेन भाण्डभारो व्याख्यातः । द्विगुणो महानदीषु तरः । (२) कॢप्तमानूपग्रामा भक्तवेतनं दद्युः । (३) प्रत्यन्तेषु तराः शुल्कमातिवाहिकं वर्तनीं च गृह्णीयुः । निर्गच्छतश्चासमुद्रस्य भाण्डं हरेयुः । अतिभारेणावेलायामतीर्थे तरतश्च । (४) पुरुषोपकरणहीनायामसंस्कृतायां वा नावि विपन्नायां नावध्यक्षो नष्टं विनष्टं वाभ्यावहेत् । (५) सप्ताहवृत्तामाषाढीं कार्त्तिकीं चान्तरा तरः । कार्मिकप्रत्ययं दद्यान्नित्यं चाह्निकमावहेत् ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे नावध्यक्षो नाम अष्टाविंशोऽध्यायः, आदितोऽष्टपञ्चाशः । — : ० : —


छोटी गाड़ी का पाँच माषक, मझौली गाड़ी छह माषक, और बड़ी बैलगाड़ी का सात माषक भाड़ा देना चाहिए । बीस तुला बोझ का ३/४ पण भाड़ा निर्धारित है ।

( १ ) इसी हिसाब से भैंस या ऊँट आदि पर ढोये जाने वाले बोझा का भाड़ा समझ लेना चाहिए । बड़ी-बड़ी नदियों की उतराई इससे दुगुनी होनी चाहिए ।

( २ ) नदियों के किनारे बसे हुए लोग सरकारी टैक्स के अतिरिक्त कुछ निर्धारित भत्ता या वेतन भी मल्लाहों को दें ।

( ३ ) पार उतारने वाले राजकीय मल्लाह सीमाप्रदेशों में व्यापारियों से मार्ग का टैक्स और अन्तपाल को दिया जाने वाला शुल्क भी अदा करें । जो व्यापारी बिना मुहर के माल को निकालते पकड़ा जाय उसका सारा माल जब्त कर लिया जाय । जो व्यक्ति, अनिमियत बोझा असमय और बिना घाट के ही पार उतारने की कोशिश करे उसका भी सारा माल जब्त कर लिया जाय ।

( ४ ) मल्लाहों की असावधानी, अन्य आवश्यक साधनों से हीन और बिना मरम्मत की सरकारी नौका यदि डूब जाय तो यात्रियों का सारा हर्जाना नौकाध्यक्ष पूरा करे ।

( ५ ) आषाढ़ी पूर्णिमा से लेकर कार्त्तिकी पूर्णिमा के एक सप्ताह बाद तक की अवधि के बीच बरसाती नदियों में नौका-कर लिया जाना चाहिए ( किन्तु सदा बहने वाली नदियों में तो हमेशा ही टैक्स लेना चाहिए ) । प्रत्येक मल्लाह को चाहिए कि वह प्रतिदिन के कार्य का विवरण और दैनिक भाग नौकाध्यक्ष के सुपुर्द कर दे ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में नौकाध्यक्ष नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ४५
अध्याय २९

गोऽध्यक्षः


(१) गोऽध्यक्षो वेतनोपग्राहिकं करप्रतिकरं भग्नॊत्सृष्टकं भागानुप्रविष्टकं व्रजपर्यग्रं नष्टं विनष्टं क्षीरघृतसञ्जातं चोपलभेत । (२) गोपालकपिण्डारकदोमन्थकलुब्धकाः शतं शतं धेनूनां हिरण्यभृताः पालयेयुः । क्षीरघृतभृता हि वत्सानुपहन्युरिति वेतनोपग्राहिकम् । (३) जरद्गुधेनुगर्भिणीपष्ठौहीवत्सतरीणां समविभागं रूपशतमेकः पालयेत् । घृतस्याष्टौ वारकान् पणिकं पुच्छं अङ्कचर्म च वार्षिकं दद्यादिति करप्रतिकरः । (४) व्याधितान्त्यङ्गान्यन्यदोहीदुर्दोहापुत्रघ्नीनां च समविभागं रूपशतं पालयन्तस्तज्जातिकं भागं दद्युरिति भग्नॊत्सृष्टकम् ।


पशुविभाग का अध्यक्ष

( १ ) गो, भैंस आदि पालतू पशुओं की देख-रेख में नियुक्त अधिकारी (गोऽध्यक्ष) को चाहिए कि वह १. वेतनीपग्राहिक, २. करप्रतिकर, ३. भग्नॊत्सृष्टक ४. भागानुप्रविष्टक ५. व्रजपर्यग्र, ६. नष्ट, ७. विनष्ट और ८. क्षीरघृतसञ्जात, इन आठों के सम्बन्ध में पूरी जानकारी प्राप्त करे ।

( २ ) गायों को पालने वाले ( गोपालक ), भैंसों को पालने वाले (पिण्डारक), गाय, भैंस को दुहने वाले ( दोहक ), दही को मथने वाले ( मंथक ) और हिंसक पशुओं से गाय, भैंस की रक्षा करने वाले ( लुब्धक ), ये पाँच-पाँच व्यक्ति मिलकर सौ-सौ गाय, भैंसों का पालन करें । वेतन के रूप में इनको या तो नकद रुपया दिया जाय अथवा अन्न-वस्त्र दिये जाँय; दूध, दही आदि में इनका कोई हिस्सा नहीं होना चाहिए, क्योंकि दूध, दही में इनका हिस्सा होने के कारण ये लोग बछड़ों को मार देते हैं । गाय, भैंस आदि की रक्षा के इस उपाय का नाम वेतनोपग्राहिक है ।

( ३ ) बूढी, दूध देने वाली, गाभिन, पठोरी और बछिया, इन पाँच प्रकार की गायों को बीस-बीस के क्रम से सौ बनाकर उन्हें किसी चरवाहे को ठेके पर दिया जाय । इसके बदले में चरवाहा गौओं के मालिक को आठ वारक घी, एक-एक पशु के पीछे एक-एक पण, और सरकारी मुहर से युक्त मरे हुए पशु का एक अदद चमड़ा प्रतिवर्ष दिया करे; रक्षा के इस उपाय को करप्रतिकर कहते हैं ।

( ४ ) बीमार, कानी, लंगड़ी, एकहथी ( अनन्यदोही ), मुश्किल से दुही जाने

प्र० ४५ : अ० २६ ] पशुविभाग का अध्यक्ष २१७

(१) परचक्राटवीभयादनुप्रविष्टानां पशूनां पालनधर्मेण दशभागं दद्युरिति भागानुप्रविष्टकम् । (२) वत्सा वत्सतरा दम्या वहिनो वृषा उक्षाणश्च पुंगवा । (३) युगवाहनशकटवहा वृषभाः सूनामहिषाः पृष्ठस्कन्धवाहिनश्च महिषाः । (४) वत्सिका वत्सतरी प्रष्ठौही गर्भिणी धेनुश्चाप्रजाता बन्ध्याश्च गावो महिष्यश्च । मासद्विमासजातास्तासामुपजा वत्सा वत्सिकाश्च । मास-द्विमासजातानङ्कयेत् । मासद्विमासपर्युषितमङ्कयेत् । अङ्कं चिह्नं वर्णं शृङ्गान्तरं च लक्षणम्, एवमुपजा निबन्धयेदिति व्रजपर्यग्रम् । (५) चोरहृतमन्ययूथप्रविष्टमवलीनं वा नष्टम् ।


योग्य और बच्चों को खाने वाली ( पुत्रघ्नी ), इन पाँच प्रकार की गायों को भी पूर्ववत्, सौ बनाकर, किसी व्यक्ति को ठेके पर पालने के लिए दिया जाय । गोपालक को चाहिए कि वह स्थिति के अनुसार घी आदि का आधा या तिहाई हिस्सा मालिक को दे दिया करे; इस उपाय का नाम भग्नोट्सृष्टक है ।

( १ ) शत्रुओं अथवा चोरों के डर से जो गोपालक अपनी गायों को सरकारी चरागाह में ही बन्द करके रखे, उसको चाहिए कि वह, गायों की आमदनी का दसवाँ भाग राजा को अदा करे; गाय आदि की रक्षा के इस तौर-तरीके को भागानुप्रविष्टक कहते हैं ।

( २ ) दूध पीने वाला बछड़ा, बड़ा बछड़ा, कृषियोग्य बछड़ा ( दम्य ), बोझा ढोने योग्य साँड़ ( बहिनो ), बिना बधिया किया हुआ साँड़ और हल जोतने योग्य बैल, ये छह प्रकार के बैल होते हैं ।

( ३ ) जुवा, हल, गाड़ी आदि में जोते जाने योग्य भैंसा, साँड़ ( वृषभा ), मांस के उपयोग में आने वाले ( सूनामहिषा ) और बोझा ढोने योग्य, ये चार प्रकार के भैंसे होते हैं ।

( ४ ) दूध पीने वाली बछिया, पठोरी ( प्रष्ठौही ), गाभिन, दूध देने वाली, अधेड़ और बाँझ, ये सात प्रकार की गाय-भैंसें हैं । उनके दो महीने या एक महीने के पैदा हुए बछड़ों को उपजा ( लयेरू ) कहते हैं । उन लयेरू बछड़ों को लोहे के गर्म छल्लों से दाग देना चाहिए । दो मास तक सरकारी चरागाह में रहने वाली गाय-भैंसों को भी दाग देना चाहिए, उनके स्वामियों का पता लगे या न लगे । राजकीय मुहर अथवा छल्ले आदि से अङ्कित गाय-भैंसों तथा लयेरू बछड़ों के रङ्ग, सींग आदि विशेष चिह्नों का उल्लेख रजिस्टर में किया जाय । गायों की रक्षा के इस उपाय को व्रजपर्यग्र कहते हैं ।

( ५ ) नष्ट गोधन तीन प्रकार का होता है : १. चोरों द्वारा अपहृत २. दूसरे गोष्ठों में विलयित और ३. अपने गोष्ठ से भ्रष्ट; इसी अवस्था को नष्ट कहते हैं ।

२१८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) पङ्कूविषमव्याधिजरातोयाहारावसन्नं वृक्षतटकाष्ठशिलाभिहतमी- शानव्यालसर्पग्राहदावाग्निविपन्नं विनष्टम् । प्रमादादभ्यावहेयुः । (२) एवं रूपाग्रं विद्यात् । (३) स्वयं हन्ता घातयिता हर्ता हारयिता च वध्यः । परपशूनां राजा- ङ्केन परिवर्तयिता रूपस्य पूर्वं साहसदण्डं दद्यात् । (४) स्वदेशीयानां चोरहृतं प्रत्यानीय पणिकं रूपं हरेत् । परदेशीयानां मोक्षयितार्धं हरेत् । (५) बालवृद्धव्याधितानां गोपालकाः प्रतिकुर्युः । (६) लुब्धकश्वगणिभिरपास्तस्तेनव्यालपरबाधभयमृतुविभक्तमरण्यं चारयेयुः । (७) सर्पव्यालत्रासनार्थं गोचरानुपातज्ञानार्थं च त्रस्नूनां घण्टातूर्यं च बध्नीयुः ।

(१) दल-दल में फँसी, गढ़े में गिरी, बीमार, बूढ़ी, पानी तथा आहार के अभाव में नष्ट, वृक्ष तले दबी, चट्टान या शिलाओं से जख्मी, बिजली गिर जाने से नष्ट, हिंसक जानवरों से आक्रान्त, साँप, नाक या जंगली आग से नष्ट, गायों को विनष्ट कहते हैं। यदि इस प्रकार गाय आदि का विनाश गायों की असावधानी के कारण होवे तो उस हानि को वे स्वयं पूरा करें।

(२) अध्यक्ष को चाहिए कि वह इन सभी बातों की पूरी जानकारी रखे।

(३) यदि कोई ग्वाला गाय को मारे, या किसी से मरवावे; उसकी चोरी करे, या करवावे; तो उसे प्राणदण्ड दिया जाना चाहिए। जो गाय-भैंस सरकारी नहीं हैं उन पर राजकीय चिह्न कर उनके रूप को बदल देने वाले व्यक्ति को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।

(४) चोरों से चुराये गये अपने देश के पशुओं को जो व्यक्ति उनके वास्तविक स्वामियों को वापिस कर दे, मालिक से वह प्रति पशु के पीछे एक पण वसूल कर ले। चोरों से छुड़ाये गये परदेश के पशुओं का आधा हिस्सा मालिक का और आधा हिस्सा छुड़ाने वाले का होता है।

(५) गोपालकों को चाहिए कि वे, बछड़ों, बीमार और बूढ़े पशुओं की उचित परिचर्या करें।

(६) गोपालकों को चाहिए कि वे शिकारियों, बहेलियों, चोरों, हिंसकों और शत्रु की बाधाओं आदि से सावधान रह कर ऋतु के अनुसार सुरक्षित जंगलों में गायों को चरायें।

(७) सर्प एवं हिंसक पशुओं को डराने के लिए, चरागाह में गाय की पहिचान के लिए और घबड़ाने वाले पशुओं की गर्दन में लोहे की घंटी बाँध देनी चाहिए।

प्र० ४५ : अ० २६ ] पशुविभाग का अध्यक्ष २१९


(१) समव्यूढतीर्थमकदमग्राहमुदकमवतारयेयुः पालयेयुश्च । स्तेनव्यालसर्पग्राहगृहीतं व्याधिजरावासन्नं च आवेदयेयुरन्यथा रूपमूल्यं भजेरन् । (२) कारणमृतस्याङ्कचर्म गोमहिषस्य कर्णलक्षणमजाविकानां पुच्छमङ्कचर्म चाश्वखरोष्ट्राणां बालचर्मबस्तिपित्तस्नायुदन्तखुरशृङ्गास्थीनि चाहरेयुः । (३) मांसमाममार्द्रं शुष्कं वा विक्रीणीयुः । उदश्वित् श्ववराहेभ्यो दद्युः । कूर्चिकां सेनाभक्तार्थमाहरेयुः । किलाटो घाणपिण्याकक्लेदार्थः । (४) पशुविक्रेता पादिकं रूपं दद्यात् । (५) वर्षाशरद्धेमन्तानुभयतः कालं दुह्युः । शिशिरवसन्तग्रीष्मानेककालम् । द्वितीयकाले दोग्धुरङ्गुष्ठच्छेदो दण्डः । (६) दोहनकालमतिक्रामतस्तत्फलहानं दण्डः ।


( १ ) पशुओं को पानी पिलाने एवं नहलाने के लिए ऐसे स्थान में उतारना चाहिए, जहाँ चौरस घाट बने हों और दलदल एवं हिंसक जलचर जन्तु दोनों न हों; गोपालक पूरी सावधानी से उनकी रक्षा करता रहे । गोपालकों का कर्तव्य है कि वे चोर, व्याघ्र, साँप एवं नक्र आदि से आक्रान्त और बीमारी तथा बुढ़ापे से मरे हुए पशुओं की सूचना अध्यक्ष को दें, अन्यथा मृतपशु के नुकसान का दायित्व उन पर समझा जायगा ।

( २ ) यदि भैंस मर गई हो तो उसका दगा हुआ चमड़ा; बकरी तथा भेड़ के चिह्नित कान; और घोड़ा, गधा एवं ऊँट की पूँछ लाकर ग्वाला, अध्यक्ष के सामने पेश करे; साथ ही वह मरे हुए पशु के बाल, चमड़ा, मूत्राशय, पित्ता, आँत, दाँत, खुर, सींग और हड्डी, इन सब चीजों का संग्रह करके रख ले ।

( ३ ) गीले या सूखे मांस को बेच देना चाहिए । मठा को कुत्तों और सूअरों में वितरित कर देना चाहिए । काञ्जी को सैनिकों के लिए देनी चाहिए । फटे हुए दूध को गाय भैंसों की सानी में डाल देना चाहिए ।

( ४ ) पशुओं का व्यापारी प्रत्येक पशु के पीछे, उसकी लागत का चतुर्थांश अध्यक्ष को दे ।

( ५ ) ग्वालों को चाहिए कि वे सावन, भादों, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष और पौष महीनों में गाय-भैसों को दो समय दुहें । माघ, फाल्गुन, चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, और आषाढ़ में केवल सायंकाल ही दुहें ।

( ६ ) इन छह महीनों में गाय-भैसों को दोनों समय दुहने वाले व्यक्ति का अंगूठा काट देना चाहिए । जो ग्वाला ठीक समय पर न दुहे, उसे उस दिन का वेतन न दिया जाय ।

२२० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

२२० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) एतेन नस्यदम्ययुगपिङ्गनवर्तनकाला व्याख्याताः । (२) क्षीरद्रोणे गवां घृतप्रस्थः । पञ्चभागाधिको महिषीणाम् । द्विभागाधिकोऽजावीनाम् । मन्थो वा सर्वेषां प्रमाणं, भूमितृणोदकविशेषाद्धि क्षीरघृतवृद्धिर्भवति । (३) यूथवृषं वृषेणावपातयतः पूर्वः साहसदण्डः, घातयत उत्तमः । (४) वर्णाविरोधेन दशतीरक्षाः । उपनिवेशदिग्विभागो गोप्रचाराद् बलान्वयतो वा गवां रक्षासामर्थ्याच्च । अजावीनां षाण्मासिकोमूर्णां ग्राहयेत् । तेनाश्वखरोष्ट्रवराहव्रजा व्याख्याता । (५) बलीवर्दनां नस्याश्वभद्रगतिवाहिनां यवसस्यार्धभारः, तृणस्य द्विगुणं, तुला घाणपिण्याकस्य, दशाढकं कणकुण्डकस्य, पञ्चपलिकं मुखलवणं, तैलकुडुबो नस्यं, प्रस्थः पानम् । मांसतुला, दध्नश्चाढकं, यवद्रोणं, माषाणां वा पुलाकः । क्षीरद्रोणमर्धाढकं वा सुरायाः, स्नेहप्रस्थः क्षारदशपलं शृङ्गिबेरपलं च प्रतिपानम् ।


(१) इसी प्रकार जो व्यक्ति ठीक समय पर बैलों को न नाथे, ठीक समय पर नये बैलों को बाण पर न लगाये, नौसिखिये तथा पूरे बैल को एक साथ जोते, और बैलों को ठीक समय पर न सिखाये, उन्हें भी उस दिन का वेतन नहीं देना चाहिए ।

(२) एक द्रोण गाय के दूध में एक प्रस्थ घी निकलता है । यदि एक द्रोण भैंस का दूध हो तो उसमें पाँच प्रस्थ घी निकलता है । बकरी और भेड़ के एक द्रोण दूध में ३/२ घी निकलता है । किसी भी पशु के दही को मथकर ही उसमें निकलने वाले घी का ठीक परिमाण निर्धारित किया जा सकता है । भूमि, घास, पानी आदि की अधिक सुविधा के ऊपर ही दूध-घी की वृद्धि निर्भर है ।

(३) यदि कोई व्यक्ति गोष्ठ के सांड़ को किसी दूसरे सांड़ से लड़ाये तो उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए, उसको मारे तब भी उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।

(४) एक रंग की दस गाएँ, इस प्रकार की दस वर्णों की सौ गाएँ करके किसी ग्वाले को रक्षा के लिए दे देनी चाहिएँ । गायों के रहने और चरने की नियमित व्यवस्था, उनकी तादात को एवं उनकी सुरक्षा को देखकर ही करनी चाहिए। बकरी और भेड़ की ऊन छह मास बाद उतार लेनी चाहिए । गाय, भैंसों के अनुसार ही घोड़े, गधे, ऊँट और सूअरों की भी यथोचित व्यवस्था की जानी चाहिए ।

(५) नथे हुए बैलों और घोड़ों के रथ पर जुते जाने वाले श्रेष्ठ बैलों को आधा भार (दस तुला) हरी घास, उससे दुगुनी भूसी, दस आढक सानी, पाँच पल नमक, एक कुडव तेल नाक में, एक प्रस्थ तेल पीने के लिये देना चाहिए, इसके अतिरिक्त

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गोऽध्यक्ष नामक

प्र० ४५ : अ० २६ ] पशुविभाग का अध्यक्ष २२१

(१) पादोनमश्वतरगोखराणां, द्विगुणं महिषोष्ट्राणां कर्मकरबलीवर्दा- नाम्। पायनाथं च धेनूनाम्। कर्मकालतः फलतश्च विधानम्। सर्वेषां तृणोदकप्राकाम्यम्। इति गोमण्डलं व्याख्यातम्। (२) पञ्चर्षभं खराश्वानामजावीनां दशर्षभम्। शक्यं गोमहिषोष्ट्राणां यूथं कुर्याच्चतुर्वृषम्॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे गोऽध्यक्षो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः, आदित एकोनपञ्चाशः।

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सौ पल माँस एक आढक दही, एक द्रोण जौ या उड़द, इन सब चीजों का सांदा बनाकर भी दिया चाहिए, एक द्रोण दूध या आधा आढक सुरा, एक प्रस्थ तेल या घी, दस पल गुड़ और एक पल सोठ, इन सबको एकत्र करके बैलों को देना चाहिए।

(१) बैलों की इस खुराक का चतुर्थांश कम खुराक खच्चरों तथा गधों को, बैलों की दुगुनी खुराक भैंसों, ऊँटों एवं खेतों में काम करने वाले बैलों को, दूध देने वाली गायों को, देनी चाहिए। काम करने वाले बैलों और दूध देने वाली गायों की खुराक उनके कार्य एवं दूध के औसत के अनुसार ही दी जानी चाहिए। सभी पशुओं को उनकी इच्छानुसार भरपेट घास-पानी देना चाहिए। यहाँ तक गो आदि पशुओं की आहार-व्यवस्था बताई गई।

(२) एक सौ गदही तथा घोड़ियों के झुण्ड पाँच घोड़े, सौ भेड़-बकरियों में दस बकरे, सौ-सौ गाय, भैंस तथा ऊँटों के झुण्डों में चार-चार सांड, छोड़ने चाहिए।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में गोऽध्यक्ष नामक उन्तीसवाँ अध्याय समाप्त।

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प्रकरण ४६
अध्याय ३०

अश्वाध्यक्षः


(१) अश्वाध्यक्षः पण्यागारिकं क्रयोपगतमाहवलब्धमाजातं साहा-
य्यागतं पणस्थितं यावत्कालिकं वाश्वपर्यग्रं कुलवयोवर्णचिह्नकर्मवर्गा-
गमैर्लेखयेत् ।
(२) अप्रशस्तन्यङ्गव्याधितांश्चावेदयेत् ।
(३) कोशकोष्ठागाराभ्यां च गृहीत्वा मासलाभमश्ववाहश्चिन्तयेत् ।
(४) अश्वविभवेनायतामश्वायामद्विगुणविस्तारां चतुर्द्वारोपावर्तन-
मध्यां सप्रग्रीवां प्रद्वारासनफलकयुक्तां वानरमयूरपृषतनकुलचकोरशुकशा-
रिकाभिराकीर्णां शालां निवेशयेत् ।
(५) अश्वायामचतुरश्रश्लक्ष्णफलकास्तारं सखादनकोष्ठकं समूत्र-
पुरीषोत्सर्गमेकैकशः प्राङ्मुखमुदङ्मुखं वा स्थानं निवेशयेत् । शालावशेन
वा दिग्विभागं कल्पयेत् । वडबावृषकिशोराणाम् एकान्तेषु ।


अश्वविभाग का अध्यक्ष

( १ ) अश्वशाला के अध्यक्ष को चाहिए कि वह, भेंटस्वरूप प्राप्त, खरीदे हुए, युद्ध में मिले हुए, अपने यहाँ पैदा हुए, बदले में प्राप्त, रेहन रखे हुए और कुछ समय के लिए सहायतार्थ प्राप्त, इन सभी प्रकार के घोड़ों को उनकी नस्ल, उम्र, रंग, चिह्न, समूह, कर्म और कहाँ से वे मिले हैं, इन सभी बातों का विवरण अपने रजि-स्टर में दर्ज करे ।

( २ ) बुरी नस्ल वाले, लंगड़े-लूले और बीमार घोड़ों को बदल देना चाहिए या उनका उचित इलाज करना चाहिए ।

( ३ ) कोष और कोष्ठागार से एक महीने का पूरा खर्च लेकर साईस को चाहिए कि वह सावधानीपूर्वक घोड़ों की टहल-सेवा करे ।

( ४ ) घोड़ों को रखने के लिये ऐसी घुड़साल बनवाई जाय, जो घोड़ों की संख्या के अनुसार लम्बी और घोड़ों की लम्बाई से दुगुनी चौड़ी हो, उसमें चार दरवाजे, काफी फैलाव, बड़ा बरामदा, दरवाजों के दोनों ओर चबूतरे हों और जो बन्दर, मोर, नेवला, चकोर, तोता तथा मैना आदि से घिरी हुई हो ।

( ५ ) घोड़े की लम्बाई-चौड़ाई के अनुसार एक समतल चौकोर तख्ता बिछा होना चाहिए । इसके अतिरिक्त घास-भूसा खाने के लिए लकड़ी की नाँद, पेशाब

प्र० ४६ : अ० ३० ] अश्वविभाग का अध्यक्ष २२३

(१) बडबायाः प्रजातायास्त्रिरात्रं घृतप्रस्थपानम् । अत ऊर्ध्वं सक्तु प्रस्थः स्नेहभैषज्यप्रतिपानं दशरात्रं, ततः पुलाको यवसमार्तवश्चाहारः । (२) दशरात्रादूर्ध्वं किशोरस्य घृतचतुर्भागः सक्तुकुडवः क्षीरप्रस्थ- श्चाहार आ षण्मासादिति । ततः परं मासोत्तरमर्धवृद्धैर्यवप्रस्थ आत्रि- वर्षाद्, द्रोण आ चतुर्वर्षादिति । अत ऊर्ध्वं चतुर्वर्षः पंचवर्षो वा कर्मण्यः पूर्णप्रमाणः । (३) द्वात्रिंशदङ्गुलं मुखमुत्तमाश्वस्य, पञ्चमुखान्यायामः, विंशत्य- ङ्गुला जङ्घा, चतुर्जङ्घ उत्सेधः । त्र्यङ्गुलावरं मध्यमावरयोः । शताङ्गुलः परिणाहः । पञ्चभागावरं मध्यमानरयोः । (४) उत्तमाश्वस्य द्विद्रोणं शालिव्रीहियवप्रियङ्गुणामर्धशुष्कमर्धसिद्धं


तथा लीद रखने का उचित प्रबन्ध होना चाहिए, घुड़सालों के दरवाजे पूरव तथा उत्तर की ओर होने चाहिएँ, घोड़ों को बाँधने के लिए अलग-अलग खूंटे होने चाहिएँ। घुड़साल, या तो राजमहल के उत्तर-पूरव में होनी चाहिए; यदि ऐसा सम्भव न हो तो सुविधानुसार उचित दिशाओं की ओर उनके दरवाजे बना दिए जाँय । प्रसवा घोड़ियों, साँड़, घोडों और छह मास से तीन वर्ष तक के बछेड़ों को बाँधने के लिए अलग-अलग स्थान होने चाहिएँ ।

( १ ) जब घोड़ी व्याये तो उसे तीन दिन तक एक प्रस्थ घी पीने के लिए दिया जाना चाहिए । तदनन्तर दस दिन तक उसे एक प्रस्थ सत्तू और चिकनाई में मिली दवा पीने के लिए दी जानी चाहिए । उसके बाद उसे अधपके जौ का साँदा, घास और ऋतु के अनुसार आहार देना चाहिए ।

( २ ) नये पैदा हुए घोड़ों के बछड़े को दस दिन बाद एक कुडव सत्तू में चौथाई घी मिला कर देना चाहिए । छह महीने तक उसे एक प्रस्थ दूध प्रतिदिन दिया जाना चाहिए । तदनन्तर उसको जौ का एक प्रस्थ और उसमें उत्तरोत्तर प्रतिमास आधा प्रस्थ बढ़ाकर तीन वर्ष तक यही आहार देना चाहिए । उसके बाद पूरे एक वर्ष तक प्रतिदिन उसे एक द्रोण आहार मिलना चाहिए । तब जाकर चार या पाँच वर्ष में वह पूरी तरह काम लेने लायक होता है ।

( ३ ) जिस घोड़े की खाब बत्तीस अंगुल, लम्बाई एक-सौ-साठ अंगुल, जंघा बीस अंगुल और ऊँचाई अस्सी अंगुल हो वह उत्तम होता है । उससे तीन अंगुल कम परिमाण का घोड़ा मध्यम और उससे भी तीन अंगुल कम परिमाण को घोड़ा अधम कोटि का समझना चाहिए । उत्तम घोड़े की मोटाई सौ अंगुल, मध्यम घोड़े की मोटाई अस्सी अंगुल और अधम घोड़े की मोटाई चौंसठ अंगुल होती है ।

( ४ ) उत्तम घोड़ों को साठी, चावल, गेहूँ, जौ, काकुन आदि में से कोई भी दो

२२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र . [ दूसरा अधिकरण

वा मुद्गमाषाणां वा पुलाकः । स्नेहप्रस्थश्च । पञ्चपलं लवणस्य । मांसं पञ्चाशत्पलिकम् । रसस्याढकं द्विगुणं वा दघ्नः पिण्डक्लेदनार्थम् । क्षारपञ्चपलिकः सुरायाः प्रस्थः पयसो वा द्विगुणः प्रतिपानम् । दीर्घपथभारक्लान्तानां च खादनार्थं स्नेहप्रस्थोऽनुवासनम् । कुडुबो नस्यकर्मणः । यवसस्यार्धभारः, तृणस्य द्विगुणः, षडरत्निपरिक्षेपः पुञ्जीलग्रहो वा ।

(१) पादावरमेतन्मध्यमावरयाः । उत्तमसमो रथ्यो वृषश्च मध्यमः । मध्यमसमश्चावरः पादहीनं वडवानां पारशमानां च । अतोऽर्धं किशोराणां च । इति विधायोगः ।

(२) विधापाचकमूत्रग्राहचिकित्सकाः प्रतिस्वादभाजः ।

(३) युद्धव्याधिजराकर्मक्षीणाः पिण्डगोचरिकाः स्युः । असमरप्रयोज्याः पौरजानपदानांर्थेन वृषा बडबास्वायोज्याः ।

द्रोण धान्य अधपका या अधसूखा, ख़ूराक में देना चाहिए; अथवा इतना ही मूंग या उड़द का साँदा बनाकर देना चाहिए । इसके अतिरिक्त एक प्रस्थ घी या तेल; पाँच पल नमक पचास पल मांस एक आढक शोरवा या दो आढक दही में भीगी हुई सानी, पाँच पल गुड़ के साथ एक प्रस्थ शराब अथवा दो प्रस्थ दूध, प्रतिदिन तीसरे पहर पीने के लिये दिया जाना चाहिए । लम्बा सफर और अधिक बोझा उठाने के कारण थके हुये घोड़ों को एक प्रस्थ घी या तेल और साथ ही उतने ही परिमाण की थकावट को दूर करने वाली दवाइयों का मिश्रण ( अनुवासन ) पिलाना चाहिए । एक कुडव घी या तेल उसके नाक में छोड़ना चाहिए, खाने के लिये उसको दस तुला भूसा, बीस तुला हरी घास या जई आदि देना चाहिए ।

( १ ) उत्तम घोड़े की उक्त ख़ूराक का चौथाई हिस्सा कम मध्यम घोड़े की और उसमें से भी चौथाई हिस्सा कम अधम घोड़े की ख़ूराक है । जो मध्यम घोड़ा रथ में जोता जाय तथा जो साँड़ घोड़ी पर छोड़ा गया हो उनको भी उत्तम घोड़े का आहार देना चाहिये । इसी प्रकार जो अधम घोड़े रथ में जोते जाँय या साँड़ छोड़े जाँय उनको मध्यम घोड़े का आहार देना चाहिए । इस आहार से चौथा हिस्सा कम घोड़ी और खच्चरों का आहार है । उसका आधा आहार बछड़ों को देना चाहिए । यही घोड़ों के आहार का विधान है ।

( २ ) घोड़ों की परिचर्या करने वाले साईसों और उनकी चिकित्सा करने वाले वैद्यों को भी घोड़े के आहार में से कुछ हिस्सा दिया जाना चाहिए ।

( ३ ) जो घोड़े युद्ध के कारण, बीमारी, बुढ़ापे और भार ढोने के कारण, अशक्त तथा बेकार हो चुके हैं, उन्हें उतना ही आहार दिया जाय कि वे भूखे न मर सकें । जो घोड़े हृष्ट-पुष्ट होकर भी युद्धोपयोगी न हों, उन्हें नगर तथा जनपद के निवासियों की घोड़ियों में नस्ल पैदा करने के लिए साँड़ बना दिया जाय ।

प्र० ४६ : अ० ३० ] अश्वविभाग का अध्यक्ष २२५

(१) प्रयोग्यानामुत्तमाः काम्बोजकसैन्धवारट्टजवानायुजाः । मध्यमा बाह्लीकपापेयकसौवीरकतैतलाः । शेषाः प्रत्यवराः । (२) तेषां तीक्ष्णभद्रमन्दवशेन सान्नाह्यमौपवाह्यकं वा कर्म प्रयोजयेत् । चतुरस्रं कर्माश्वस्य सान्नाह्यम् । (३) वल्गनो नीचैर्गतो लंघनो धोरणो नारोष्ट्रश्चौपवाह्याः । (४) तत्रौपवेणुको वर्धमानको यमक आलीढप्लुतः ( पृथ ? पूर्व )-गस्त्रिकचाली च वल्गनः । (५) स एव शिरःकर्णविशुद्धो नीचैर्गतः, षोडशमार्गो वा । प्रकीर्णकः प्रकीर्णोत्तरो निषण्णः पार्श्वानुवृत्त ऊर्मिमार्गः शरभक्रीडितः शरभप्लुतः

( १ ) चाल एवं कवायद में प्रवीण युद्धयोग्य घोड़ों में काबुल, सिंध, आरट्ट और अरब देशों के घोड़े उत्तम श्रेणी के हैं। व्यास, सतलज के मध्यवर्ती प्रदेश (बाह्लीक), पश्चिमोत्तर सीमा प्रान्त ( पापेयक ), राजस्थान और तितल देशों में उत्पन्न घोड़े मध्यम कोटि के होते हैं। इनके अतिरिक्त सभी घोड़े अधम कोटि में आते हैं ।

( २ ) तेज, मध्यम और मन्द गति के अनुसार ही घोड़ों को युद्धकार्यों और साधारण सवारी आदि कार्यों में प्रयुक्त करना चाहिये । विशेषज्ञों द्वारा युद्ध-सम्बन्धी हर प्रकार की चालों की शिक्षा दिलाना ही घोड़े का सन्नाह्य कर्म कहलाता है ।

( ३ ) सवारी या खेलों में प्रयुक्त किए जाने वाले घोड़ों की चाल के पांच भेद हैं : १. वल्गन, २. नीचैर्गत, ३. लंघन, ४. धोरण और ५. नारोष्ट्र ।

( ४ ) मण्डलाकार चक्कर लगाने को बल्गन कहते हैं । वह छह प्रकार का होता है : १. औपवेणुक ( एक हाथ के गोल घेरे में घूमना ), २. वर्धमानक ( उतने ही घेरे में कई बार घूमना ), ३. यमक ( बराबर के दो घेरों में एक साथ घूमना ), ४. आलीढप्लुत ( एक पैर को समेट कर और दूसरे पैर को फैलाकर छलांग मारना और तत्काल ही घूम जाना ) ५. पूर्वंग ( शरीर के अगले हिस्से के सहारे घूमना ) और ( ६ ) त्रिकचाली ( पुट्ठी और पिछली दो टांगों के सहारे घूमना ) ।

( ५ ) शिर और कान में किसी प्रकार की कंपन पैदा किए बिना ही गोल घेरे में चक्कर लगाना ही नीचैर्गत कहलाता है; उसके सोलह प्रकार हैं : १. प्रकीर्णक ( सभी चालें एक साथ मिली हुई होना ), २. प्रकीर्णोत्तर ( सभी चालें एक साथ मिली हुई होने पर भी एक चाल का मुख्य होना ), ३. निषण्ण ( पीठ पर कंपन किये बिना ही किसी विशेष चाल को निकालना ), ४. पार्श्वानुवृत्त ( एक ही ओर तिरछी चाल चलना ) ५. ऊर्मिमार्ग ( लहरों जैसी ऊँची-नीची चाल चलना ), ६. शरभक्रीडित ( तरुण हाथी की तरह क्रीडा करते हुए चलना), ७. शरभप्लुत ( तरुण हाथी की तरह कूद कर चलना ), ८, त्रिताल ( तीन पैरों से चलना ), ६. वाह्यानु-

१५ कौ०

२२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

त्रितालो बाह्यानुवृत्तः पञ्चपाणिः सिंहायतः स्वाधूतः क्लिष्टः श्लिङ्गितो बृंहितः पुष्पाभिकीर्णश्चेति नीचैर्गतमार्गाः । (१) कपिप्लुतो भेकप्लुत एणप्लुत एकपादप्लुततः कोकिलसञ्चार्युरस्यो बकचारी च लङ्घनः । (२) काङ्को वारिकाङ्क्षो मायूरोऽर्धमायूरो नाकुलोऽधनाकुलो वाराहोऽर्धवाराहश्चेति धोरणः । (३) संज्ञाप्रतिकारो नारोष्ट्र इति । (४) षण्णव द्वादशेति योजनान्यध्वा रथ्यानाम् । पञ्च योजनान्यर्धाष्टमानि दशेति पृष्ठवाह्यानामश्वानामध्वा ।


वृत्त ( दायें-बायें घेरा बनाकर चलना ), १०. पंचपाणि ( पहिले तीन पैरों को एक साथ रखकर फिर एक पैर को दो बार रख कर चलना ), ११. सिंहायत ( शेर के समान लम्बी चाल भरना ), १२. स्वाधूत ( लम्बी कूद भरना ), १३. क्लिष्ट ( बिना सवार के ही चलना ), १४. श्लिंगित ( शरीर के अगले हिस्से को झुका कर चलना ), १५. बृंहित ( शरीर के अगले हिस्से को ऊँचा करके चलना ) और १६. पुष्पाभिकीर्ण ( टेढ़ी-मेढ़ी चाल चलना ) ।

( १ ) कूद कर चलने वाली चाल का नाम लंघन है; उसके सात प्रकार हैं : १. कपिप्लुत ( बन्दर की तरह कूद कर चलना ), २. भेकप्लुत ( मेढक की तरह उछल कर चलना ), ३. एणप्लुत ( हरिण की तरह छलांग मारकर चलना ), ४. एकपादप्लुत ( तीन पैरों को समेट कर एक पैर से ही छलांग मार कर चलना ), ५. कोकिलसंचारी ( कोयल की तरह फुदक कर चलना ), ६. उरस्य ( पैरों को समेट कर छाती के बल कूदकर चलना ) और ७. बकचारी ( बगुले की तरह बीच में धीरे-धीरे चलकर सहसा एक साथ कूदकर चलना ) ।

( २ ) धीरे-धीरे चलकर सहसा सरपट चाल से चलना धोरण गति कहलाती है; उसके आठ प्रकार हैं : १. कांक ( बगुले की चाल चलना ), २. वारिकांक्ष ( बत्तख की चाल चलना ), ३. मायूर ( मोर की चाल चलना ), ४. अर्धमायूर ( आधी चाल मोर की चलना ), ५. नाकुल (नेवले की चाल चलना), ६. अर्धनाकुल ( आधी चाल नेवले की चलना ), ७. वराह ( सुअर की चाल चलना ) और ८. अर्धवराह ( आधी चाल सुअर की चलना ) ।

( ३ ) सिखाये हुये इशारों पर चलना नारोष्ट्र चाल कहलाती है ।

( ४ ) रथ में जोते जाने योग्य अधम घोड़ों को छह योजन, मध्यम घोड़ों को नौ योजन और उत्तम घोड़ों को बारह योजन चलाये जाने के बाद विश्राम देना चाहिये; अधम, मध्यम और उत्तम किस्म के भार ढोने वाले घोड़ों को इसी क्रम से पाँच, साढे सात और दस योजन चलाने के बाद विश्राम देना चाहिए ।

प्र० ४६ : अ० ३० ] अश्वविभाग का अध्यक्ष २२७

(१) विक्रमो भद्राश्वासो भारवाह्य इति मार्गाः । (२) विक्रमो वल्गितमुपकण्ठमुपजवो जवश्च धाराः । (३) तेषां बन्धनोपकरणं योग्याचार्याः प्रतिदिशेयुः । साङ्ग्रामिकं रथाश्वालङ्कारं च सूताः । अश्वानां चिकित्सकाः शरीरह्लासवृद्धिप्रतीकारमृतुविभक्तं चाहारम् । (४) सूत्रग्राहकाश्वबन्धकयावसिकविधापाचकस्थानपालकेशकारजाङ्गलीविदश्च स्वकर्मभिरश्वानाराधयेयुः । (५) कर्मातिक्रमे चैषां दिवसवेतनच्छेदनं कुर्यात् । नीराजनोपरुद्धं वाहयतश्चिकित्सकोपरुद्धं वा द्वादशपणो दण्डः । (६) क्रियाभैषज्यसङ्गेन व्याधिवृद्धौ प्रतीकारद्विगुणो दण्डः । तदपराधेन वैलोम्ये पत्रमूल्यं दण्डः ।


( १ ) उक्त तीनों कोटि के घोड़ों की गति तीन प्रकार की होती है, यथा; १. मन्दगति, २. मध्यगति और ३. तीव्रगति ।

( २ ) मन्दगति से चलना, मध्यम गति से चलना, तीव्र गति से चलना, चौकन्ना होकर चलना, कूद-फाँदकर चलना, दायें-बायें होकर चलना, तेज-तेज चलना, इन सब तरह की चालों का नाम धारा है; धारा अर्थात् ढंग या क्रम ।

( ३ ) घोड़ों के विभिन्न अवयवों को किस प्रकार के आभूषणों से सजाना चाहिए, इसकी विधि, योग्य आचार्य बतलायें । युद्धोपयोगी घोड़ों और रथों को सजाने की सारी क्रिया का निर्देश सारथी करे । ऋतु के अनुसार घोड़ों का क्या-क्या आहार होना चाहिये एवं उनके मोटा होने या तंग होने का तरीका क्या है, इसका निर्देश अश्व-चिकित्सक करें ।

( ४ ) लगाम पहिना कर घोड़ों को टहलाने वाला नौकर, लगाम तथा जीन आदि चढ़ाने वाला कर्मचारी, घास खिलाने वाला नौकर, उनके लिये उड़द भूषा एवं चावल पकाने वाला रसोइया, घुड़साल की सफाई करने वाला व्यक्ति, घोड़ों के बाल तथा खुरें ठीक करने वाला नौकर और अश्वचिकित्सक; ये सभी नौकर-चाकर अपने-अपने कार्यों को नियत समय पर पूरा करते हुए घोड़ों की यथोचित परिचर्या करें ।

( ५ ) इनमें से जो भी कर्मचारी अपने कार्य को उचित रीति से न करे उसका उस दिन का वेतन काट लेना चाहिए । कुशल-क्षेम एवं बल-वृद्धि के लिए और चिकित्सा के लिए रोके गये घोड़ों को काम पर लगाने वाले व्यक्ति से बारह पण दण्डरूप में वसूल किए जाँय ।

( ६ ) घोड़ों की यथासमय चिकित्सा न करने के कारण यदि उनकी बीमारी बढ़ जाय तो इलाज में जितना व्यय हो, उसका दुगुना दण्ड अश्वशाला के अध्यक्ष

२२८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण

२२८ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण

(१) तेन गोमण्डलं खरोष्ट्रमहिषमजाविकं च व्याख्यातम् । (२) द्विरह्नः स्नानमश्वानां गन्धमाल्यं च दापयेत् । कृष्णसन्धिषु भूतेज्याः शुक्लेषु स्वस्तिवाचनम् ॥ (३) नीराजनामाश्वयुजे कारयेन्नवमेऽहनि । यात्रादाववसाने वा व्याधौ वा शान्तिके रतः ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणेऽश्वाध्यक्षो नाम त्रिंशोऽध्यायः, आदितः पञ्चाशः।

—: ० :—


पर करना चाहिए। यदि चिकित्सा और दवाई के दोष के कारण घोड़ा मर जाय तो जितनी कीमत का घोड़ा हो उतना दण्ड अश्वशाला के अध्यक्ष पर किया जाय ।

( १ ) घोड़ों की परिचर्या और चिकित्सा के लिए ऊपर जो नियम बताये गये हैं, गाय, बैल, गधा, ऊँट, भैंस और भेड़-बकरियों को परिचर्या चिकित्सा के सम्बन्ध में भी वही नियम समझने चाहिए; इनके सम्बन्ध में भी वही दण्ड-व्यवस्था है ।

( २ ) शरद और ग्रीष्म, दोनों ऋतुओं में घोड़ों को दो-दो बार नहलाना चाहिये । गन्ध और मालाएँ उन्हें प्रतिदिन दी जानी चाहिए । अमावस्था को घोड़ों के निमित्त भूतों को बलि देनी चाहिए । और पूर्णमासी को उनके कुशल-क्षेम के लिये स्वस्तिवाचन पढ़ा जाना चाहिए ।

( ३ ) आश्विन मास की नवमी को घोड़ों के स्वस्थ-नीरोग रहने के लिये नीराजना संस्कार करना चाहिए । यात्रा के आगे और यात्रा की समाप्ति पर और घोड़ों में कोई संक्रामक रोग फैलने पर भी नीराजना संस्कार करना चाहिए ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में अश्वाध्यक्ष नामक तीसवाँ अध्याय समाप्त ।

—; ० :—

प्रकरण ४७# हस्त्यध्यक्षः
अध्याय ३१

(१) हस्त्यध्यक्षो हस्तिवनरक्षां दम्यकर्मक्षान्तानां हस्तिहस्तिनीकलभानां शालास्थानशय्याकर्मविधायवसप्रमाणं कर्मस्वायोगं बन्धनोपकरणं साङ्ग्रामिकमलङ्कारं चिकित्सकानीकस्थोपस्थायुकवर्गं चानुतिष्ठेत् । (२) हस्त्यायामद्विगुणोत्सेधविष्कम्भायामां हस्तिनीस्थानाधिकां सप्रग्रीवां कुमारीसङ्ग्रहां प्राङ्मुखीमुदङ्मुखीं वा शालां निवेशयेत् । (३) हस्त्यायामचतुरश्रश्लक्ष्णालानस्तम्भफलकान्तरकं मूत्रपुरीषोत्सर्गस्थानं निवेशयेत् । स्थानसमशय्यामर्धापाश्रयां दुर्गे सान्नाह्योपवाह्यानां बहिर्दम्यव्यालानाम् ।


गजशाला का अध्यक्ष

(१) गजशाला के अध्यक्ष को चाहिए कि वह हाथियों के जंगल की रक्षा करे; सिखाये जाने योग्य हाथी-हथिनी और उनके बच्चों के लिए वह गजशाला, बाँधने, उठने-बैठने के यथोचित स्थान बनवाये; वही युद्ध-सम्बन्धी कार्य, पका हुआ भोजन और हरी घास-भूसा आदि के तौल का निर्णय करे; हाथियों को हर तरह की चाल चलना सिखाये; हाथियों के अम्बारी, अंकुश आदि साजों और युद्धसम्बन्धी आभूषणों का प्रबन्ध करे; हाथियों के चिकित्सक और उनकी सेवा-टहल करने वाले कर्मचारियों पर भी अध्यक्ष नजर रखे ।

(२) हाथी के लिए उसकी लम्बाई से दुगुनी ऊँची, दुगुनी चौड़ी और दुगुनी लम्बी गजशाला बनवानी चाहिए, हथिनी के रहने की गजशाला उससे छह हाथ अधिक लम्बी होनी चाहिए, गजशाला के आगे बरामदा, उसमें बाँधने के लिये तराजू के आकार के खूंटे (कुमारी) और उसके दरवाजे पूर्व या उत्तर की ओर होने चाहिए ।

(३) हाथी की लम्बाई जितना, चौकोर, चिकना एक खूंटा वहाँ गाड़ा जाय, खूंटा एक तख्ते के बीच में लगाकर गाड़ा जाय, जिससे ऊपर की जमीन ढकी रहे और खूंटे को उखाड़ा न जा सके; पाखाना और पेशाब के लिए पीछे की ओर ढलवां स्थान बनवाना चाहिए । हाथी के सोने-बैठने के लिए एक चबूतरा-सा बनवाया जाय, जिसकी ऊँचाई साढ़े चार हाथ होनी चाहिए । युद्ध तथा सवारी के उपयोगी हाथियों की शय्या किले के भीतर ही बनवाई जाय, जो हाथी अभी सिखवा या बनैले हों उन्हें किले के बाहर ही रखना चाहिए ।

२३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) प्रथमसप्तमावष्टमभागावह्नः स्नानकालौ, तदनन्तरं विधायाः । पूर्वाह्ने व्यायामकालः, पश्चादह्नः प्रतिपानकालः । रात्रिभागौ द्वौ स्वप्नकालौ, त्रिभागः संवेशनोत्थानिकः । (२) ग्रीष्मे ग्रहणकालः । विंशतिवर्षो ग्राह्यः । (३) विक्को मूढो मत्कुणो व्याधितो गर्भिणी धेनुका हस्तिनी चाग्राह्याः । (४) सप्तारत्निरुत्सेधो नवायामो दशपरिणाहः । प्रमाणतश्चत्वारिंशद्वर्षो भवत्युत्तमः । त्रिंशद्वर्षो मध्यमः । पञ्चविंशतिवर्षोऽवरः । (५) तयोः पादावरो विधाविधिः । (६) अरत्नौ तण्डुलद्रोणः । अर्धाढकं तैलस्य । सर्पिषस्त्रयः प्रस्थाः । दशपलं लवणस्य । मांसं पञ्चाशतपलिकम् । रसस्याढकं द्विगुणं वा दध्नः पिण्डक्लेदनार्थम् । क्षारं दशपलिकम् । मद्यस्य आढकं द्विगुणं वा पयसः प्रतिपानम् गात्रावसेकस्तैलप्रस्थः शिरसोऽष्टभागः प्रादीपकश्च । यवस्य द्वौ भारौ सपादौ शष्पस्य शुष्कस्यार्धतृतीयो भारः । कडङ्गारस्यानियमः ।


( १ ) एक दिन के, बराबर आठ भागों में पहिला तथा सातवाँ भाग हाथी के स्नान करने के लिये होना चाहिए। स्नान के बाद ( अर्थात् दूसरे और आठवें भाग में ) उन्हें पका खाना खिलाना चाहिए, दोपहर से पहिले उन्हें कवायद सिखानी चाहिए, दोपहर के बाद पीने के लिये देना चाहिए । रात के बराबर तीन भागों में से दो भाग सोने के लिए और एक भाग उठने-बैठने के लिए होना चाहिए ।

( २ ) गर्मी के मौसम में ही हाथियों को पकड़ना चाहिए । बीस वर्ष या उससे अधिक आयु का हाथी पकड़ने योग्य है ।

( ३ ) दूध पीने वाला हाथी ( विक्क ), हथिनी के समान दातों वाला ( मूढ ), जिसके दाँत न निकले हों ( मत्कुण ) बीमार हाथी और गर्भिणी तथा दूध चुराने वाली हथनी को न पकड़ना चाहिये ।

( ४ ) सात हाथ ऊँचा, नौ हाथ लम्बा और दस हाथ मोटा, चालीस वर्ष उम्र वाला हाथी सर्वोत्तम समझा जाता है । तीस वर्ष का मध्यम; और पच्चीस वर्ष का अधम माना गया है ।

( ५ ) उत्तम हाथी को जितना आहार दिया जाय उससे चौथाई हिस्सा कम मध्यम को और उससे भी चौथाई हिस्सा कम अधम को दिया जाना चाहिए ।

( ६ ) सात हाथ ऊँचे उत्तम हाथी को एक द्रोण चावल, आधा आढक तेल, तीन प्रस्थ घी, दस पल नमक, पचास पल मांस, एक आढक शोरवा या दो आढक दही में सना हुआ दाना दस पल गुड़, दोपहर के बाद पीने के लिए एक आढक शराब या उससे दुगुना दूध, शरीर के मलने के लिए एक प्रस्थ तेल, शिर में लगाने के लिए आधा कुडब तेल, इतना ही तेल रात को लगाने के लिए, चालीस तुला तृण, पचास

प्र० ४७ : अ० ३१ ] गजशाला का अध्यक्ष २३१

(१) सप्ता‍रत्निना तुल्यभोजनोऽष्टारत्निरत्यरालः ।
(२) यथाहस्तमवशेषः षडरत्निः पञ्चारत्निश्च ।
(३) क्षीरयावसिको विक्कः क्रीडार्थं ग्राह्यः ।
(४) सञ्जातलोहिता प्रतिच्छन्ना संलिप्तपक्षा समकक्ष्या व्यतिकीर्णमांसा समतलपतला जातद्रोणिकेति शोभाः ।
(५) शोभावशेन व्यायामं भद्रं मन्दं च कारयेत् ।
मृगसङ्कीर्णलिङ्गं च कर्मस्वृतुवशेन वा ॥
इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे हस्त्यध्यक्षो नामैकत्रिंशोऽध्यायः,
आदित एकपञ्चाशः ।

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तुला हरी घास, साठ तुला रूखी घास और भूसा तथा पत्तियाँ जितना खा सके, खिलाना चाहिए ।

( १ ) आठ हाथ ऊँचे अत्यराल नामक हाथी को सात हाथ ऊँचे उत्तम हाथी के ही बराबर खाना दिया जाय ।

( २ ) छह हाथ ऊँचे हाथी मध्यम कोटि के हैं; उनका आहार उत्तम हाथी के आहार से चौथाई हिस्सा कम होना चाहिए; इसी प्रकार पाँच हाथ ऊँचे अधम श्रेणी के हाथियों के आहार मध्यम हाथियों के आहार से चौथाई हिस्सा कम होना चाहिए ।

( ३ ) दूध पीने वाले बच्चों को केवल क्रीडाकौतुक के लिए पकड़ा जाय और दूध, हरी घास या जई आदि के छोटे-छोटे ग्रास देकर उनका पालन-पोषण किया जाय ।

( ४ ) अवस्थानुसार हाथियों की सात प्रकार की शोभा मानी गई है; १. जब हाथियों के शरीर में केवल हड्डी, चमड़ा ही रह जाय; फिर धीरे-धीरे खूब संचरने लगे, इस शोभा को संजातलोहिता कहते हैं; २. जब मांस बढ़ने लगे, उस अवस्था की शोभा को प्रतिच्छन्ना कहते हैं; ३. जब दोनों ओर मांस भरने लगे, उस अवस्था को संलिप्तपक्षा कहते हैं; ४. जब सारे अवयवों में मांस भरने लगे, उस समय की शोभा को समकक्ष्या कहते हैं; ५. जब शरीर पर कहीं ऊँचा कहीं नीचा मांस दिखाई दे, उस शोभा को व्यतिकीर्णमांसा कहते हैं; ६. जब रीढ़ की हड्डी के बराबर मांस चढ़ जाय, उस अवस्था की शोभा को समतलपतला कहते हैं; और ७. जब मांस रीढ़ की हड्डी से ऊपर चढ़ जाय, उस शोभा का नाम जातिद्रोणिका है ।

( ५ ) इस प्रकार अवस्थाओं को ध्यान में रखकर हाथियों को कवायद सिखायी जाय । जिन हाथियों में उत्तम, मध्यम आदि सांकर्य लक्षण प्रकट हों, उनको युद्ध-सम्बन्धी कार्यों में लगाना चाहिए; अथवा ऋतुओं के अनुसार ही उन्हें युद्ध आदि कार्यों में लगाया जाय ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में एकतीसवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ४८
अध्याय ३२

हस्त्यध्यक्षः हस्तिप्रचारश्च


(१) कर्मस्कन्धाः चत्वारः—दम्यः सान्नाह्य औपवाह्यो व्यालश्च। (२) तत्र दम्यः पञ्चविधः—स्कन्धगतः स्तम्भगतो वारिगतोऽवपातगतो यूथगतश्चेति। तस्योपचारो विक्ककर्म। (३) सान्नाह्यः सप्तक्रियापथः—उपस्थानं संवर्तनं संयानं वधावधो हस्तियुद्धं नागरायणं साङ्ग्रामिकं च। तस्योपविचारः कक्ष्याकर्म ग्रैवेयकर्म यूथकर्म च।


हाथियों की श्रेणियाँ तथा उनके कार्य

( १ ) कार्य-भेद से हाथियों की चार श्रेणियाँ होती हैं : १. दम्य ( शिक्षा देने योग्य ), २. सान्नाह्य ( युद्ध के योग्य ), ३. औपवाह्य ( सवारी के योग्य ) और ४. व्याल ( घातक वृत्तिवाला )।

( २ ) उनमें दम्य हाथी पाँच प्रकार का होता है : १. स्कंधगत ( जो सूंड का सहारा देकर सवार को अपने ऊपर बैठा ले ), २. स्तम्भगत ( जो हाथी खूंटे पर बँधा रह सके ), ३. वारिगत ( हाथियों की फँसाने वाली भूमि पर आ जाने वाला ), ४. अवपातगत ( हाथियों को फँसाने के लिए जंगलों में बनाये गये घास-फूस के गढों में आये हुये ) और ५. यूथगत (जो हथिनियों के साथ विहार करने के व्यसनी हों)। दम्य हाथी की परिचर्या हाथी के बच्चे के समान करनी चाहिए।

( ३ ) सान्नाह्य हाथी कार्य-भेद से सात प्रकार के होते हैं : १. उपस्थान ( आगे-पीछे के अङ्गों को ऊँचा-नीचा, छोटा-बड़ा करने वाला तथा रस्सी, बाँस, ध्वजा आदि को लांघने वाला ), २. संवर्त्तन ( सो जाने, बैठ जाने तथा कूदने-फाँदने वाला ), ३. संयान ( सीधी-बिरछी, गोलाकार चालों को समझने वाला ), ४. वधावध ( सूंड, दांत आदि से प्रहार करने या पकड़ देने वाला ), ५. हस्तियुद्ध ( हर प्रकार के हाथियों से लड़ने वाला ), ६. नगरायण ( नगर आदि को नष्ट करने वाला ) और ७. सांग्रामिक ( खुले आम युद्ध करने वाला )। सान्नाह्य हाथी को ऐसी शिक्षा दी जानी चाहिये कि वह रस्सी बांधने, गले में फन्दा डालने और झुण्ड के अनुकूल कार्य करने में चतुर हो जाय।