कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
| प्रकरण ११७ | पार्ष्णिग्राहचिन्ता |
|---|---|
| अध्याय १३ |
(१) संहत्यारिविजिगीष्वोरमित्रयोः पराभियोगिनोः पार्ष्णिं गृह्णतोर्यः शक्तिसम्पन्नस्य पार्ष्णिं गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते। शक्तिसम्पन्नो ह्यमित्रमुच्छिद्य पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात्, न हीनशक्तिरलब्धलाभ इति।
(२) शक्तिसाम्ये यो विपुलारम्भस्य पार्ष्णिं गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते। विपुलारम्भो ह्यमित्रमुच्छिद्य पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात्, नाल्पारम्भः सक्तचक्र इति।
(३) आरम्भसाम्ये यः सर्वसन्दोहेन प्रयातस्य पार्ष्णिं गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते। शून्यमूलो ह्यस्य सुकरो भवति, नैकदेशबलप्रयातः कृतपार्ष्णिप्रतिविधान इति।
पार्ष्णिग्राह-चिन्ता
(१) विजिगीषु और शत्रु जब पृष्ठवर्ती (पार्ष्णि) होकर किसी राजा पर चढ़ाई करें तो उनमें से वही विशेष लाभ प्राप्त करता है, जो कि दूसरे के साथ युद्ध में फँसे हुए अपने शत्रुभूत दो राजाओं में से अधिक शक्तिशाली राजा की पार्ष्णि को ग्रहण करता है क्योंकि शक्तिशाली राजा अपने शत्रु का उच्छेद कर बाद में अपने पार्ष्णिग्राह का भी उच्छेद कर देता है। हीनशक्ति शत्रुराजा तो अपने शत्रु का उच्छेद करने पर भी वैसे ही निर्बल बना रहता है, उसकी ओर से आक्रमण की कोई आशंका नहीं हो सकती है। इसलिए उसका पार्ष्णिग्राह बनने में कोई लाभ नहीं है।
(२) यदि दोनों युद्ध-निरत शत्रु समानशक्ति हों तो उसी का पार्ष्णिग्राह बनना लाभप्रद है, जो कि सभी साधनों से सम्पन्न हो। क्योंकि सर्वसाधन-सम्पन्न शत्रु राजा अपने शत्रु का उच्छेद कर सकता है। जो कि साधनहीन और अपनी बिखरी सेना को बटोरने में ही लगा हो, ऐसा शत्रु न तो अपने शत्रु को जीत ही सकता है और न ही वह विजिगीषु के लिए भय का कारण है। इसलिए ऐसे शत्रु का पार्ष्णिग्राह बनने में कोई लाभ नहीं है।
(३) यदि दोनों ही सर्वसाधनसम्पन्न हों तो ऐसे राजा का पार्ष्णिग्राह बनने में विशेष लाभ है, जो अपने संपूर्ण सैन्य को लेकर युद्ध के लिये कूच कर गया हो। क्योंकि जिसका मुख्य भाग (राज्य या राजधानी) असुरक्षित हो उस पर शीघ्र ही विजय प्राप्त की जा सकती है। किन्तु जिसने अपनी पार्ष्णि की रक्षा के लिए प्रबन्ध
प्र० ११७ : अ० १३ ] पार्ष्णिग्राह-चिन्ता ५१७
(१) बलोपादानसाम्ये यश्चलामित्रं प्रयातस्य पाष्णिं गृह्णाति, सोऽति-संधत्ते। चलामित्रं प्रयातो हि सुखेनवाप्तसिद्धिः पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात्, न स्थितामित्रं प्रयात:। असौ हि दुर्गप्रतिहतः। पार्ष्णिग्राहे च प्रतिनिवृत्त-स्थितेनामित्रेणावगृह्यते। (२) तेन पूर्वे व्याख्याताः। (३) शत्रुसाम्ये यो धार्मिकामियोगिनः पाष्णिं गृह्णाति सोऽतिसन्धत्ते। धार्मिकामियोगी हि स्वेषां च द्वेष्यो भवति। अधार्मिकामियोगी सम्प्रियः। (४) तेन मूलहरतादात्विककदर्य्याभियोगिनां पार्ष्णिग्रहणं व्याख्यातम्। (५) मित्राभियोगिनोः पार्ष्णिग्रहणे त एव हेतवः। (६) मित्रममित्रं चाभियुञ्जानयोर्यो मित्राभियोगिनः पाष्णिं गृह्णाति,
कर थोड़ी सेना को साथ ले युद्ध के लिए प्रस्थान किया हो उसको जीतना सरल नहीं है। वह अपने पार्ष्णिग्राह का अच्छी तरह प्रतीकार कर सकता है।
( १ ) वरावर सेनाओं को साथ ले जाने वाले राजाओं में से उसी का पार्ष्णिग्राह बनना ठीक है, जिसने अपने दुर्गरहित शत्रु पर आक्रमण किया हो। क्योंकि सहज ही में अपने दुर्गरहित शत्रु को वश में करके बाद में वह अपने पार्ष्णिग्राह का भी उच्छेदन कर सकता है। परन्तु दुर्गसम्पन्न राजा के साथ युद्ध में लगे शत्रु पर चढ़ाई करने में कोई लाभ नहीं है, प्रत्युत हानि की संभावना अधिक है। क्योंकि युद्ध से खिसिया कर जब वह वापिस लौटता है तो पार्ष्णिग्राह के साथ ही युद्ध में जुट जाता है, जिससे पार्ष्णिग्राह की हानि ही होती है, लाभ नहीं।
( २ ) इसी प्रकार हीनशक्ति पार्ष्णिग्राही, अल्पारंभ पार्ष्णिग्राही और कुछ सेना ले जाने वाले पार्ष्णिग्राही राजाओं के संवन्ध में भी समझ लेना चाहिए।
( ३ ) सर्वथा समानशक्ति शत्रुओं में उसी का पार्ष्णिग्राह बनने में विशेष लाभ है, जिसने अपने किसी धर्मात्मा शत्रु पर आक्रमण किया हो। क्योंकि ऐसा करने पर अपने और पराये सभी उससे द्वेष करने लगते हैं, और ऐसी स्थिति में पार्ष्णिग्राह सरलता से ही उसको अपने वश में कर सकता है। परन्तु अधर्मी शत्रु पर आक्रमण करने वाला राजा सभी का प्रिय हो जाता है और वह निश्चित ही अपने शत्रु को जीत लेता है इसलिए ऐसे राजा का पार्ष्णिग्राह बनने में कोई लाभ नहीं है।
( ४ ) इसी प्रकार मूलहर, तादात्विक और कदर्य राजाओं पर आक्रमण करने वाले पार्ष्णिग्राह के लाभालाभ के संबन्ध में भी समझना चाहिए—मूलहर और तादात्विक में से मूलहर पर और तादात्विक तथा कदर्य में से कदर्य पर आक्रमण करने में विशेष लाभ है।
( ५ ) मित्रराजाओं का पार्ष्णिग्रहण बनने के भी वे ही नियम समझने चाहिए, जो कि अतिसंधि में निर्देश किये गये हैं।
( ६ ) मित्र और शत्रु पर आक्रमण करने वाले राजाओं में से, जो मित्र पर
५१७ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
सोऽतिसन्धत्ते । मित्राभियोगी हि सुखेनावाप्तसिद्धिः पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात् । सुकरो हि मित्रेण सन्धिर्नाममित्रेणेति ।
(१) मित्रममित्रं चोद्धरतोर्योऽमित्रोद्धारिणः पार्ष्णिं गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते । वृद्धमित्रो ह्यमित्रोद्धारी पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात्, नेतरः स्वपक्षोपघाती ।
(२) तयोरलब्धलाभापगमने यस्यामित्रो महतो लाभाद्वियुक्तः क्षयव्ययाधिको वा, स पार्ष्णिग्राहोऽतिसन्धत्ते । लब्धलाभापगमने यस्यामित्रो लाभेन शक्त्या हीनः, स पार्ष्णिग्राहोऽतिसन्धत्ते । यस्य वा यातव्यः शत्रोर्विग्रहापकारसमर्थः स्यात् ।
(३) पार्ष्णिग्राहयोरपि यः शक्यारम्भबलोपादानाधिकः स्थितशत्रुः पाश्र्वस्थायी वा सोऽतिसन्धत्ते । पार्श्वस्थायी हि यातव्याभिसारो मूलबाधकश्च भवति । मूलाबाधक एव पश्चात्स्थायी ।
आक्रमण करने वाले राजा का पार्ष्णिग्राह बनता है वही विशेष लाभ में रहता है । क्योंकि मित्र पर आक्रमण करने वाला राजा सहज ही में सिद्धि प्राप्त कर लेता है और बलवान् होकर वह पार्ष्णिग्राह का भी उच्छेद कर सकता है। इसके विपरीत, क्योंकि मित्र के साथ संधि हो जाना सुकर होता है, शत्रु के साथ कठिनता से ही संधि हो सकती है। अतः शत्रु पर आक्रमण करने वाला राजा न तो सिद्धिलाभ कर सकता है और न तो पार्ष्णिग्राह की कुछ हानि कर सकता है ।
( १ ) मित्र और शत्रु का उन्मूलन ( उद्धार ) करने वाले राजाओं में से जो शत्रु का उद्धार करने वाले राजा का पार्ष्णिग्राह बनता है वही विशेष लाभ में रहता है । क्योंकि शत्रु का उद्धार करने वाला राजा स्वपक्ष और मित्रपक्ष से संपन्न होकर पार्ष्णिग्राह का भी उच्छेद कर सकता है । परन्तु दूसरा, जो मित्र का ही उन्मूलन करना चाहता है, अपने ही पक्ष का घातक होने के कारण, कभी भी पार्ष्णिग्राह का उच्छेद नहीं कर सकता है ।
( २ ) मित्र और शत्रु का उन्मूलन करने वाले राजाओं के कोई विशेष लाभ प्राप्त किये वगैर ही लौट आने पर, उनमें से ऐसे शत्रु पर आक्रमण करने में लाभ है, जिसने कुछ भी लाभ प्राप्त नहीं किया और जिसका अधिक क्षयव्यय हुआ हो । क्योंकि वह शत्रु को क्षीण कर पार्ष्णिग्राह को भी हानि पहुँचा सकता है । किन्तु विशेष लाभ प्राप्त करके लौट आने पर जिसका शत्रु लाभ तथा शक्ति से हीन हो, ऐसे आक्रमणकारी राजा का पार्ष्णिग्राह बनने में लाभ रहता है । क्योंकि लाभ और शक्ति से संपन्न शत्रु को वश में न कर सकने के कारण वह पार्ष्णिग्राह का कुछ नहीं बिगाड़ पाता है । अथवा जो यातव्य और विजिगीषु के साथ युद्ध करके अपकार करने में असमर्थ हो उसकी पार्ष्णि को दबाने वाला राजा भी विशेष लाभ में रहता है ।
( ३ ) दो समान गुण वाले पार्ष्णिग्राह राजाओं में वही पार्ष्णिग्राह विशेष लाभ
प्र० ११७ : अ० १३ ] पार्ष्णिग्राह-चिन्ता ५१९
(१) पार्ष्णिग्राहास्त्रयो ज्ञेयाः शत्रोश्चेष्टानिरोधकाः । सामन्ताः पृष्ठतोवर्गः प्रतिवेशौ च पार्श्वयोः ॥
(२) अरेर्नेतृश्च मध्यस्थो दुर्बलोऽन्तर्धिरुच्यते । प्रतिघाते बलवतो दुर्गाटव्यपसारवान् ॥
(३) मध्यमं त्वरिविजिगीष्वोर्लिप्समानयोर्मध्यमस्य पार्ष्णि गृह्णतो लब्धलाभापगमने यो मध्यमं मित्राद्वियोजयति, अमित्रं च मित्रमाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । सन्धेयश्च शत्रुरुपकुर्वाणो, न मित्रं मित्रभावादुत्क्रान्तम् ।
(४) तेनोदासीनलिप्सा व्याख्याता ।
(५) 'पार्ष्णिग्रहणाभियानयोस्तु मन्त्रयुद्धादभ्युच्चयः । व्यायामयुद्धे हि क्षयव्ययाभ्यामुभयोरवृद्धिः । जित्वापि हि क्षीणदण्डकोशः पराजितो भवति' इत्याचार्याः ।
में रहता है, जिसके पास कार्यसिद्धि के लिए दूसरे की अपेक्षा अधिक सेना हो और जो दुर्ग आदि से संपन्न हो, अथवा जो यातव्य का पड़ोसी हो । क्योंकि निकटवर्ती को यदि विशेष लाभ होता है तो वह यातव्य के साथ मिलकर विजिगीषु के मूलस्थान को भी बाधा पहुँचा सकता है । परन्तु दूर रहनेवाले से बाधा की आशंका नहीं रहती है ।
( १ ) शत्रु के कार्य व्यापार को रोकने वाले पार्ष्णिग्राह तीन प्रकार के होते हैं : १. आक्रमण करने वाले राजा के समीपवर्ती २. पीछे रहने वाले और ३. इधर-उधर के, पार्श्ववर्ती ।
( २ ) आक्रमणकारी विजिगीषु और उसके शत्रु के बीच का दुर्बल राजा अन्तर्धि कहलाता है । केवल बलवान् का मुकाबला होने पर वह दुर्ग तथा घने जंगल ( अटवी ) में छिप जाता है । इसीलिए उसका ऐसा अन्वर्थ नाम पड़ा ।
( ३ ) मध्यम राजा को वश में करने की इच्छा रखने वाले शत्रु और विजिगीषु, दोनों में वही विशेष लाभ में रहता है, जो उसका पार्ष्णिग्राह बनता है, और वहाँ से कुछ लाभ प्राप्त कर मध्यम राजा को अपने मित्र से अलग कर देता है तथा जो स्वयं अपने शत्रु तक को अपना मित्र बना लेता है । उपकार करने वाले शत्रु के साथ भी संधि कर लेनी चाहिए और मित्रभाव से शून्य अपकार करने वाले मित्र को भी छोड़ देना चाहिए ।
( ४ ) इसी प्रकार उदासीन राजा को वश में कर लेना चाहिए ।
( ५ ) पार्ष्णिग्राह और आक्रमणकारी, इन दोनों राजाओं में वही अधिक उन्नत हो सकता है, जो मन्त्रयुद्ध से शत्रु का नाश करता है । साधारणतया युद्ध दो प्रकार होता है १. व्यायाम युद्ध और २. मंत्रयुद्ध । युद्धभूमि में उतर कर शस्त्रास्त्र आदि के उपायों द्वारा शत्रु को विच्छिन्न कर देना व्यायामयुद्ध कहलाता है, और बिना युद्ध-भूमि में गये ही सभी तीक्ष्ण आदि गुप्तचरों द्वारा शत्रु का नाश कराना मंत्रयुद्ध
५२० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
५२० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) नेति कौटिल्यः । सुमहतापि क्षयव्ययेन शत्रुविनाशोऽभ्युपगन्तव्यः । (२) तुल्ये क्षयव्यये यः पुरस्ताद् दूष्यबलं घातयित्वा निश्शल्यः पश्चा-दूष्यबलो युद्ध्येत, सोऽतिसन्धत्ते । (३) द्वयोरपि पुरस्ताद्दूष्यबलघातिनोर्यो बहुलतरं शक्तिमत्तरमत्यन्त-दूष्यं च घातयेत्, सोऽतिसन्धत्ते । (४) तेनामित्राटवीबलघातो व्याख्यातः । (५) पाष्णिग्राहोऽभियोक्ता वा यातव्यो वा यदा भवेत् । विजिगीषुस्तदा तत्र नैत्रेमेतत्समाचरेत् ॥ (६) पाष्णिग्राहो भवेन्नेता शत्रोर्मित्राभियोगिनः । विग्राह्य पूर्वमाक्रन्दं पाष्णिग्राहाभिसारिणा ॥ (७) आक्रन्देनाभियुञ्जानः पाष्णिग्राहं निवारयेत् । तथाक्रन्दाभिसारेण पाष्णिग्राहाभिसारिणम् ॥
कहलाता है । इन दोनों में मन्त्रयुद्ध ही उन्नति का कारण है, क्योंकि व्यायाम युद्ध में क्षय-व्यय होता है । तथैव युद्ध में जीत जाने पर भी सेना और कोष के क्षीण हो जाने के कारण वह राजा प्रायः पराजित-सा ही हो जाता है । यह प्राचीन आचार्यों की राय है ।
( १ ) इसके विपरीत कौटिल्य का कहना है कि चाहे कितना ही क्षय-व्यय क्यों न हो, हर हालत में शत्रु का नाश करना ही उद्देश्य होना चाहिए ।
( २ ) मनुष्य तथा धन की बराबर हानि होने पर जो राजा पहिले अपने दूष्य-बल को समाप्त कर फिर निष्कंटक हो अपनी नियमित सेना को साथ लेकर युद्ध करता है वही विशेष लाभ में रहता है ।
( ३ ) यदि दोनों राजा पहिले अपने दूष्यबल को ही समाप्त कर डालते हैं तो उनमें से वही अधिक लाभ में रहता है, जो पहिले बहुसंख्यक शक्तिशाली दूष्यबल को समाप्त करवा डालता है ।
( ४ ) दूष्यबल की ही भाँति शत्रुबल और अटवीबल के संबंध में भी समझ लेना चाहिए ।
( ५ ) विजिगीषु जब पाष्णिग्राह, अभियोक्ता अथवा यातव्य हो, उस समय उसे नीचे बताये तरीकों से नेतृत्व करना चाहिए ।
( ६ ) विजिगीषु को यही उचित है कि वह अपने मित्र पर आक्रमण करने वाले शत्रु के पृष्ठवर्ती मित्र ( आक्रंद ) को पहिले अपने मित्र की सेना के साथ भिड़ाकर फिर स्वयं उसकी पाष्णि को ग्रहण करे ।
( ७ ) यदि विजिगीषु स्वयं ही आक्रमणकारी हो तो वह अपने पाष्णिग्राह को अपने मित्र राजा द्वारा वारित करे और पाष्णिग्राह की सेना का मुकाबला अपने मित्र की सेना के द्वारा करे ।
प्र० ११७ : अ० १३ ] पार्ष्णिग्राह-चिन्ता ५२१
(१) अरिमित्रेण मित्रं च पुरस्तादवघट्टयेत् ।
मित्रमित्रमरेश्चापि मित्रमित्रेण वारयेत् ॥
(२) मित्रेण ग्राहयेत्पार्ष्णिमभियुक्तोऽभियोगिनः ।
मित्रमित्रेण चाक्रन्दं पार्ष्णिग्राहात्निवारयेत् ॥
(३) एवं मण्डलमात्मार्थं विजिगीषुर्निवेशयेत् ।
पृष्ठतश्च पुरस्ताच्च मित्रप्रकृतिसम्पदा ॥
(४) कृत्स्ने च मण्डले नित्यं दूतान् गूढांश्च वासयेत् ।
मित्रभूतः सपत्नानां हत्वा हत्वा च संवृतः ॥
(५) असंवृतस्य कार्याणि प्राप्तान्यपि विशेषतः ।
निस्संशयं विपद्यन्ते भिन्नप्लव इवोदधौ ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे पार्ष्णिग्राहचिन्ता नाम त्रयोदशोऽध्यायः आदितो दशोत्तरशततमः ।
—: ० :—
( १ ) इस प्रकार अपने पीछे का प्रबन्ध कर सामने से कोई शत्रु मुकाबले में आये तो उससे अपने मित्र को भिड़ा दे । मदद के लिए यदि शत्रु के मित्र का मित्र आवे तो उसका मुकाबला अपने मित्र के मित्र से करे ।
( २ ) यदि विजिगीषु के ऊपर ही चढ़ाई की गई हो तो अपने मित्र को अपने उस आक्रमणकारी का पार्ष्णिग्राह बना दे । यदि आक्रमणकारी का कोई मित्र उस पार्ष्णिग्राह का मुकाबला करने के लिए आवे तो उस अपने मित्र पार्ष्णिग्राह के मित्र द्वारा उसका निवारण करे ।
( ३ ) इस प्रकार विजिगीषु, मित्ररूप प्रकृति की पूर्वोक्त गुणसमृद्धि से युक्त राज-मण्डल को अपनी सहायता के लिए आगे और पीछे ठीक तरह से स्थापित करे ।
( ४ ) अपनी सहायता के लिए स्थापित किये हुए उस संपूर्ण राजमण्डल में गुप्तचरों और दूतों का सदा उत्तम प्रबंध रखे और शत्रुओं के साथ ऊपर से मित्रता के भाव रखकर एक-एक करके उन्हें मार दे तथा ऊपर से उदासीन एवं निष्पक्ष बना रहे ।
( ५ ) जो राजा अपने गुप्त विचारों या गुप्त मन्त्रणाओं को छिपा कर नहीं रख सकता है वह उच्चतावस्था में पहुँचकर भी नीचे गिर जाता है । समुद्र में नाव के फट जाने से जो दशा सवार की होती है, ठीक वही दशा मन्त्र के फूट जाने पर राजा की होती है ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में पार्ष्णिग्राहचिन्ता नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ११८ | # हीनशक्तिपूरणम् |
|---|---|
| अध्याय १४ |
(१) सामवायिकैरेवमभियुक्तो विजिगीषुर्यस्तेषां प्रधानस्तं ब्रूयात्— ‘त्वया मे सन्धिः, इदं हिरण्यमहं च मित्रम्, द्विगुणा ते वृद्धिः, नार्हस्यात्म-क्षयेण मित्रमुखानमित्रान् वर्धयितुम्, एते हि वृद्धास्त्वामेव परिभविष्यन्ति’।
(२) भेदं वा ब्रूयात्—‘अनपकारो यथाऽहमेतैः सम्भूयाभियुक्तः तथा त्वामप्येते संहितबलाः स्वस्था व्यसने वाऽभियोक्ष्यन्ते । बलं हि चित्तं विकरोति, तदेषां विघातय’ इति ।
(३) भिन्नेषु प्रधानमुपगृह्य हीनेषु विक्रमयेत् । हीनाननुग्राह्य वा प्रधाने । यथा वा श्रेयोऽभिमन्येत, तथा । वैरं वा परैर्ग्राहयित्वा विसं-वादयेत् ।
दुर्बल विजिगीषु के लिए शक्ति-संचय के साधन
( १ ) यदि अनेक राजा मिलकर विजिगीषु पर एक साथ आक्रमण करें तो विजिगीषु उन राजाओं के मुखिया से इस प्रकार कहे : 'मैं आपसे संधि करना चाहता हूँ; यह रहा हिरण्य । अब से मैं आपका मित्र हूँ । आपका भी दुगुना लाभ हो गया है । इसलिए अपने जन-धन का नुकसान कर इन ऊपरी मित्रों को बढ़ावा देना अब आपको उपयुक्त नहीं है । बाद में ये आप पर ही टूट पड़ेंगे । इसलिए आपको इनका साथ नहीं देना चाहिए ।'
( २ ) यदि ऐसा संभव न हो तो उनकी आपस में फूट करा दे । फूट डालने के लिए वह कहे कि 'जैसे मुझ निरपराध पर इन सबने आक्रमण किया है, वैसे स्वयं उन्नत होने पर या आपके विपत्तिकाल ये आप पर भी अवश्य आक्रमण करेंगे क्योंकि एकत्र बल अवश्य ही चित्त को विकृत कर देता है । इसलिए आपके लिए उचित यही है कि अभी से आप इनके संगठित बल को छिन्न-भिन्न कर दें ।'
( ३ ) इस प्रकार जब उनमें फूट हो जाय तब उनमें किसी प्रधान को अग्रसर करके हीनबल वाले शत्रु पर आक्रमण कर दे । अथवा हीनबल वाले राजाओं को अपनी ओर मिलाकर सामवायिकों के प्रधान पर ही चढ़ाई कर दे । अथवा जिस तरह अपना काम बन सके, वैसा करे । अथवा उनमें से प्रत्येक के हृदय में परस्पर घृणाभाव पैदा कर उन्हें विघटित कर दे ।
प्र० ११८ : अ० १४ ] शक्ति-संचय के साधन ५२३
(१) फलभूयस्त्वेन वा प्रधानमुपजाप्य सन्धि कारयेत् । अथोभयवेतनाः फलभूयस्त्वं दर्शयन्तः सामवायिकान् 'अतिसंहिताः स्थ' इत्युद्दूषयेयुः । दुष्टेषु सन्धि दूषयेत् । अथोभयवेतना भूयो भेदमेषां कुर्युः—'एवं तद्यदस्माभिर्दर्शितम्' इति । भिन्नेष्वन्यतमोपग्रहेण वा चेष्टेत । (२) प्रधानाभावे सामवायिकानामुत्साहयितारं स्थिरकर्माणमनुरक्तप्रकृतिं लोभाद्भयाद्वा सङ्घातमुपगतं विजिगीषोर्भीतं राज्यप्रतिसम्बन्धं मित्रं चलामित्रं वा पूर्वानुत्तराभावे साधयेत् । (३) उत्साहयितारमात्मनिसर्गेण, स्थिरकर्माणं सान्त्वप्रणिपातेन, अनुरक्तप्रकृतिं कन्यादानयापनाभ्यां, लुब्धमंशद्वैगुण्येन, भीतमेभ्यः कोशदण्डानुग्रहेण, स्वतो भीतं विश्वासयेत्प्रतिभूप्रदानेन, राज्यप्रतिसम्बन्धमेकी-
( १ ) अथवा बहुत-सा धन देकर उस मुखिया को फोड़ ले और खुद जाकर दूसरे राजाओं से चुपचाप सन्धि कर ले । उसके बाद विजिगीषु के उभय वेतन भोगी गुप्तचर उन संगठित राजाओं से, मुखिया को मिली भारी रकम की बात सुनाते हुए उनसे 'तुम सबको उसने ठग लिया है' ऐसा कह कर भड़काये । जब संगठित राजा मुखिया के विरुद्ध हो जाँय तो मुखिया के साथ की गई संधि को तोड़ दे । उसके बाद उभयवेतनभोगी गुप्तचर कहे 'देखो, मैंने पहिले ही कहा था कि मुखिया राजा ने भारी रकम मारी है । तभी तो गड़बड़ हो जाने के कारण इसने विजिगीषु के साथ संधि को तोड़ दिया है । हम इस बात को पहले ही कह चुके थे ।' जब वे आपस में फूट जाँय तो दोनों पक्षों में से किसी एक का सहारा लेकर पक्ष के साथ लड़ाई आरंभ कर दे ।
( २ ) यदि उन संगठित राजाओं से कोई प्रधान न हो तो उनको उत्साहित करने वाला, स्थिरकर्मा, अनुरक्तप्रकृति, लोभ या भय से संधि में शामिल न होने वाला, विजिगीषु से भयभीत, अपने राज्य से संबन्धित, अपना ही मित्र और चल शत्रु हो तो इन्हें ही वश में करना चाहिए । इनमें अगले-अगले राजा को वश में करने का यत्न करे ।
( ३ ) उत्साही राजा से विजिगीषु यों कहे 'मैं अपनी सारी प्रकृति और पुत्रादिसहित आपके अधीन हूँ । अपनी इच्छानुसार जिस कार्य पर चाहें मुझे लगा सकते हैं; किन्तु मेरा उच्छेद न कीजिए ।' इस प्रकार आत्मसमर्पण करके उसको वश में करे । स्थिरकर्मा को 'आपने मुझे जीत लिया है' कह कर वश में करे । अनुरक्तप्रकृति राजा को अपनी कन्या देकर वश में करे । लोभी राजा को दुगुना हिस्सा देकर; अपने आप से डरे हुए राजा को विश्वास दिला कर वश में करे । इसी प्रकार अपने राज्य से संबंध रखने वाले राजा को—मैं और आप एक ही हैं । मेरी पराजय में आपकी
५२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
भावोपगमनेन, मित्रमुभयतः प्रियहिताभ्यामुपकारत्यागेन वा, चलामित्रमवधूतमनपकारोपकाराभ्याम् ।
(१) यो वा यथायोगं भजेत, तं तथा साधयेत् । सामदानभेददण्डैर्वा यथापत्सु व्याख्यास्यामः ।
(२) व्यसनोपघातत्वरितो वा कोशदण्डाभ्यां देशे काले कार्ये वावधृतं सन्धिमुपेयात् । कृतसन्धिर्हीनमात्मानं प्रतिकुर्वीत ।
(३) पक्षे हीनो बन्धुमित्रपक्षं कुर्वीत, दुर्गमविषह्यं वा । दुर्गमित्रप्रतिस्तब्धो हि स्वेषां परेषां च पूज्यो भवति ।
(४) मन्त्रशक्तिहीनः प्राज्ञपुरुषोपचयं विद्यावृद्धसंयोगं वा कुर्वीत । तथाहि सद्यः श्रेयः प्राप्नोति ।
(५) प्रभावहीनः प्रकृतियोगक्षेमसिद्धौ यतेत । जनपदः सर्वकर्मणां योनिः, ततः प्रभावः ।
भी पराजय है । दूसरों के साथ मिल कर मुझ पर आक्रमण करना आपको शोभा नहीं देता है ।' ऐसी आत्मीयता का भाव जताकर अपने वश में करे । मित्र राजा को प्रिय और हितकर वचनों से तथा उससे लिया गया कर उसे वापिस दे, इस प्रकार अपने वश में करे । अस्थिर शत्रु राजा को, उसका उपकार करने तथा अपकार न करने की प्रतिज्ञा से, वश में करे ।
( १ ) अथवा इन संगठित राजाओं में जो जिस तरीके से वश में किया जा सके उसके साथ वैसा ही व्यवहार करे; अथवा साम, दाम आदि उपायों से उनको वश में करे; जैसा कि आपत्प्रकरण में आगे बताया जायेगा ।
( २ ) अथवा विजिगीषु राजा आसन्न विपत्ति को शीघ्र ही दूर करने की इच्छा रखकर संगठित राजाओं से, सेना और कोष के द्वारा सहायता देने की शर्त पर, संधि कर ले और अपनी कमजोरियों को दूर करने का यत्न करे ।
( ३ ) मित्र-रहित विजिगीषु को चाहिए कि वह अधिकाधिक राजाओं को अपना मित्र बनाये । या अभेद्य दुर्गों को बनवाये, क्योंकि मित्रसंपन्न और दुर्गसंपन्न विजिगीषु के विरोध में कोई खड़ा नहीं हो सकता है ।
( ४ ) बुद्धिवल ( मंत्रशक्ति ) से हीन राजा को चाहिए कि वह बुद्धिमान् पुरुषों का संग्रह कर विद्यावृद्ध एवं अनुभवी व्यक्तियों की संगति करे । ऐसा करने से राजा शीघ्र ही अपना कल्याण करता है ।
( ५ ) प्रभुशक्ति ( प्रभाव ) से हीन राजा को चाहिए कि वह अपनी अमात्य प्रकृति तथा प्रयोजनों के योग-क्षेम के लिए महान् यत्न करे । क्योंकि जनपद ही सभी
प्र० ११८ : अ० १४ ] शक्ति-संचय के साधन ५२५
(१) तस्य स्थानमात्मनश्च आपदि दुर्गम् । (२) सेतुबन्धः सस्यानां योनिः । नित्यानुषक्तो हि वर्षगुणलाभः सेतुवापेषु । (३) वणिक्पथः परातिसन्धानस्य योनिः, वणिक्पथेन हि दण्डगूढपुरुषातिनयनं शस्त्रावरणयानवाहनक्रयश्च क्रियते । प्रवेशो निर्नयनं च । (४) खनिः संग्रामोपकरणानां योनिः । (५) द्रव्यवनं दुर्गकर्मणां, यानरथयोश्च । (६) हस्तिवनं हस्तिनाम् । (७) गजाश्वखरोष्ट्राणां च व्रजः । (८) तेषामलाभे बन्धुमित्रकुलेभ्यः समार्जनम् । (९) उत्साहहीनः श्रेणीप्रवीरपुरुषाणां चोरगणाटविकम्लेच्छजातीनां परापकारिणां गूढपुरुषाणां यथालाभमुपचयं कुर्वीत ।
कार्यों की सिद्धि का मूल है। उसी से कोष तथा सेना का संग्रह और दुर्गों का निर्माण किया जाता है। तभी प्रभावशाली बना जा सकता है।
( १ ) उस प्रभाव का मूल दुर्ग ही है और उसी दुर्ग से विपत्तिकाल में अपनी भी रक्षा होती है।
( २ ) अन्न आदि की उत्पत्ति के प्रमुख कारण बांध हैं। क्योंकि जो अन्न हमें केवल वृष्टि के द्वारा ही प्राप्त हो सकते हैं, बांधों एक जलाशयों के द्वारा उन अन्नों को को हम सदा ही प्राप्त कर सकते हैं।
( ३ ) व्यापारिक मार्ग शत्रुओं को धोखा देने के प्रधान कारण हैं, क्योंकि इन्हीं मार्गों द्वारा शत्रुदेश में सेना, तीक्ष्ण, रसद आदि पुरुषों को तथा अस्त्र, शस्त्र को भेजा जा सकता है और घोड़े आदि के क्रय-विक्रय का कार्य शत्रु देश में किया जा सकता है। इन्हीं मार्गों के द्वारा दूसरे देशों के साथ वस्तु-विनिमय और यातायात होता है।
( ४ ) युद्ध के सभी उपकरणों का मूल स्थान खान है।
( ५ ) दुर्गों और राजप्रासादों के मूल कारण लकड़ियों के जंगल हैं। इसी प्रकार रथ तथा अन्य सवारियों के कारण भी जंगल ही है।
( ६ ) हाथियों की उत्पत्ति के मूल कारण हस्तिवन हैं।
( ७ ) हाथी, घोड़े, गधे और ऊँट आदि पशुओं की उत्पत्ति का कारण व्रज ( गोष्ठ ) है।
( ८ ) यदि उपर्युक्त साधन अपने राज्य में उपलब्ध या उत्पन्न न हों तो उन्हें अपने मित्रों तथा बंधुओं के कुलों से प्राप्त करना चाहिए।
( ९ ) उत्साहहीन राजा को चाहिए कि वह श्रेणीपुरुषों, शूरवीरों, शत्रुओं का
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में हीनशक्तिपूरण नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त ।
५२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) परमित्रः प्रतीकारमाबलीयसं वा परेषु प्रयुञ्जीत । (२) एवं पक्षेण मन्त्रेण द्रव्येण च बलेन च। संपन्नः प्रतिनिर्गच्छेत् परावग्रहमात्मनः ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे हीनशक्तिपूरणं नाम चतुर्दशोऽध्यायः,
आदित एकादशोत्तरशततमः ।
—: ० :—
अपकार करने वाले, चोरों आटविकों म्लेच्छों और गुप्तचरों का अपने लाभ के लिए संग्रह करे ।
(१) शत्रुओं का बनावटी मित्र बनकर उनका प्रतीकार करता रहे, अथवा पीछे बताये गये आबलीयस अधिकरण के उपायों द्वारा शत्रुओं का प्रतीकार करता रहे ।
(२) इस प्रकार बंधु, मित्र, विद्यावृद्ध पुरुषों की संगति से तथा दुर्ग, सेतुबंध से उत्पन्न द्रव्य द्वारा और श्रेणी आदि बल से अपनी शक्ति को पूर्ण करता हुआ विजिगीषु सदैव अपने शत्रु का प्रतीकार करता रहे ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में हीनशक्तिपूरण नामक चौदहवाँ अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण ११९-१२० | बलवता विगृह्योपरोधहेतवः |
|---|---|
| अध्याय १५ | दण्डोपनतवृत्तं च |
(१) दुर्बलो राजा बलवताऽभियुक्तस्तद्विशिष्टबलमाश्रयेत, यमितरो मन्त्रशक्त्या नातिसन्दध्यात् । (२) तुल्यबलमन्त्रशक्तीनामायत्तसम्पदो वृद्धसंयोगाद्वा विशेषः । (३) विशिष्टबलाभावे समबलैस्तुल्यबलसङ्घैर्वा बलवतः सम्भूय तिष्ठेत्, यावन्न मन्त्रप्रभावशक्तिभ्यामतिसन्दध्यात् । (४) तुल्यमन्त्रप्रभावशक्तीनां विपुलारम्भतो विशेषः । (५) समबलाभावे हीनबलैः शुचिभिरुत्साहिभिः प्रत्यनीकभूतैर्बलवतः सम्भूय तिष्ठेत्, यावन्न मन्त्रप्रभावोत्साहशक्तिभिरतिसन्दध्यात् । तुल्यो-
बलवान् शत्रु और विजित शत्रु के साथ व्यवहार
( १ ) यदि कोई बलवान् राजा किसी दुर्बल राजा पर आक्रमण करे तो उस दुर्बल राजा को चाहिए कि वह अपने आक्रमणकारी राजा से भी बलवान् किसी ऐसे राजा का आश्रय प्राप्त करे, जिसको कि वह आक्रमणकारी राजा भी मंत्रशक्ति आदि से फोड़ न सके ।
( २ ) यदि अनेक समान सैन्यशक्ति और मंत्रशक्ति के राजा हों तो उनमें उसी का आश्रय प्राप्त किया जाय, जिसका प्रकृतिमण्डल बुद्धिमान् हो । यदि इस तरह के भी बहुत-से राजा हों तो उनमें भी उसी का आश्रय लेना चाहिए, जो अत्यन्त अनुभवी विद्वानों से युक्त हो ।
( ३ ) यदि आक्रमणकारी की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली राजा आश्रय के लिये न मिले तो विजिगीषु को चाहिए कि वह समान शक्ति वाले या समान सैन्य बल वाले अनेक राजाओं के साथ मिलकर अपने शक्तिशाली आक्रमणकारी का तब तक मुकाबला करता रहे, जब तक कि वह शत्रु उन सब मिले हुए राजाओं को मंत्रशक्ति तथा प्रभावशक्ति के द्वारा अलग-अलग न कर दे ।
( ४ ) यदि आश्रय लेने योग्य इस प्रकार के अनेक राजा हों तो उनमें से विपुलारंभ राजा का ही आश्रय प्राप्त किया जाय ।
( ५ ) यदि समशक्ति राजा भी आश्रय के लिए न मिले तो आक्रमणकारी के प्रबल विरोधी उत्साही, पवित्रहृदय, बलवान् और बहुत से हीनशक्ति राजाओं के साथ मिलकर तब तक अपने शत्रु का मुकाबला करता रहे, जब तक कि अपनी सहायता करने वाले इन राजाओं में मंत्रशक्ति तथा प्रभावशक्ति से भेद डालकर वह
५२८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण ]
त्साहशक्तीनां स्वयुद्धभूमिलाभाद्विशेषः । तुल्यभूमीनां स्वयुद्धकाललाभाद्वि-
शेषः । तुल्यदेशकालानां युग्मशस्त्रावरणतो विशेषः ।
(१) सहायाभावे दुर्गमाश्रयेत, यत्रामित्रः प्रभूतसैन्योऽपि भक्तयवसेन्ध-
नोदकोपरोधं न कुर्यात्, स्वयं च क्षयव्ययाभ्यां युज्येत ।
(२) तुल्यदुर्गाणां निचयापसारतो विशेषः । निचयापसारसम्पन्नं हि
मनुष्यदुर्गमिच्छेदिति कौटिल्यः ।
(३) तदेभिः कारणैराश्रयेत—
(४) 'पाष्णिग्राहामासारं मध्यममुदासीनं वा प्रतिपादयिष्यामि ।
सामन्ताटविकतत्कुलीनावरुद्धानामन्यतमेनास्य राज्यं हारयिष्यामि घात-
यिष्यामि वा । कृत्यपक्षोपग्रहेण वास्य दुर्गे राष्ट्रे स्कन्धावारे वा कोपं
समुत्थापयिष्यामि । शस्त्राग्निरसप्रणिधानैरौपनिषदिकैर्वा यथेष्टमासन्नं
(शत्रु) अपने से अलग न कर ले । यदि इस प्रकार के भी बहुत से राजा आश्रय के लिए मिलें तो उनमें से वही श्रेष्ठ है जिसके पास युद्ध के योग्य अपनी भूमि हो । यदि इस प्रकार युद्धयोग्य भूमि भी अनेक राजाओं के पास मिले तो उनमें उसी का आश्रय लेना चाहिए, जिससे अपने अनुकूल, युद्ध के योग्य समय भी मिल सके । यदि देश और काल भी अनेक के पास हों तो उनमें से उसी का आश्रय लेना चाहिए, जिसके पास विपुल युद्ध-सामग्री हो ।
(१) यदि सहायता करने वाला कोई भी राजा आश्रय के लिए न मिले तो ऐसे दुर्ग का सहारा लेना चाहिए जहाँ पर अधिक सैन्यसंपन्न शत्रु भी अपने तथा अपने पशुओं के भोजन योग्य अपेक्षित पदार्थों और इंधन, जल आदि के लिए किसी प्रकार की रुकावट न करे । उल्टे शत्रु ही का क्षय व्यय होता रहे ।
(२) यदि इस प्रकार के अनेक दुर्ग आश्रय के योग्य मिलें तो उनमें से वही दुर्ग श्रेष्ठ है, जहाँ तेल, नमक आदि नित्य वस्तुओं का अच्छा संचय हो और अवसर आने पर जहाँ से निकल जाने की भी आशा हो । क्योंकि आचार्य कौटिल्य का भी यही कहना है कि 'ऐसे ही दुर्ग का आश्रय लिया जाय, जिसमें तेल, नमक आदि नित्य सामग्री हो और जिससे भाग निकलने की संभावना हो ।'
(३) नीचे गिनाये कारणों में यदि कोई भी कारण उपस्थित हो तो दुर्ग का आश्रय लेना चाहिए । कारण इस प्रकार हैं :
(४) १. यदि विजिगीषु यह समझे कि मैं पाष्णिग्राह, मित्रबल, मध्यम अथवा उदासीन राजा को अपने शत्रु के मुकाबले में युद्ध करने के लिए खड़ा कर सकूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । २. अथवा यदि समझे कि सामन्त, आटविक या आक्रमणकारी के विरोधी उसी के किसी वंशज द्वारा उसका राज्य हरण करा लूँगा या उसको मरवा डालूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ३. अथवा यदि समझे कि आक्रमणकारी के कर्मचारियों को वश में करके उसके दुर्ग, राष्ट्र तथा उसकी छावनी में विप्लव करा
प्र० ११९-१२० : अ० १५ ] शत्रु के साथ व्यवहार ५२९
हनिष्यामि । स्वयमधिष्ठितेन वा योगप्रणिधानेन क्षयव्ययमेनमुपनेष्यामि । क्षयव्ययप्रवासोपतप्ते वास्य मित्रवर्गे सैन्ये वा क्रमेणोपजापं प्राप्स्यामि । वीवधासारप्रसारवधेन वास्य स्कन्धावारावग्रहं करिष्यामि । दण्डोपनयेन वास्य रन्ध्रमुत्थाप्य सर्वसन्दोहेन प्रहरिष्यामि । प्रतिहतोत्साहेन वा यथेष्टं सन्धिमवाप्स्यामि । मयि प्रतिबन्धस्य वा सर्वतः कोपाः समुत्थास्यन्ति । निरासारं वास्य मूलं मित्राटवीदण्डैरुद्घाटयिष्यामि । महतो वा देशस्य योगक्षेममिहस्थः पालयिष्यामि । स्वविक्षिप्तं मित्रविक्षिप्तं वा मे सैन्यमिहस्थस्यैकस्थमविषह्यं भविष्यति । निम्नखातरात्रियुद्धविशारदं वा मे सैन्यं पथ्याबाधमुक्तमासन्ने कर्मणि करिष्यति । विरुद्धदेशकालमिहागतो वा स्वय-
दूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ४. अथवा यदि समझे कि हथियार, अग्नि, विष आदि का प्रयोग करने वाले गुप्तचरों द्वारा या औपनिषदिक प्रकरण में निर्दिष्ट प्रयोगों द्वारा पास आये आक्रमणकारी को मरवा डालूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ५. अथवा यदि समझे कि स्वयं अधिष्ठित या योगप्रणिधान द्वारा शत्रु का अच्छी तरह क्षय-व्यय कर सकूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ६. अथवा यदि समझे कि क्षय-व्यय और प्रवास से संतप्त शत्रु के मित्रवर्ग तथा सेना में धीरे-धीरे भेद डाल दूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ७. अथवा यदि समझे कि शत्रु देश से आने वाले खाद्यपदार्थ, मित्रबल तथा घास, भूसा और ईंधन आदि को बीच में ही नष्ट करके शत्रु की छावनी को पीड़ित कर सकूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ८. अथवा यदि समझे कि अपनी कुछ सेना को शत्रु की छावनी में छिपे तौर से ले जाकर उसकी निर्बलताओं का पता लगाऊँगा और तब पूरे सैन्यबल के साथ उस पर हमला बोल दूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ६. अथवा यदि समझे कि किसी तरह शत्रु के उत्साह को दबा करके उसके साथ संधि कर लूंगा, या मुझ पर आक्रमण करने वाले शत्रु पर सारा राज-मंडल कुपित हो उठेगा तो दुर्ग का आश्रय ले । १०. अथवा यदि समझे कि मित्र द्वारा प्राप्त उसकी सैनिक सहायता को रोक कर उसकी राजधानी को अपने मित्रबल और आटविकों द्वारा रौंदा दूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । ११. अथवा यह समझे कि यहीं रहकर मैं अपने महान् देश का योग-क्षेम करता रहूँगा तो दुर्ग का आश्रय ले । १२. अथवा यदि समझे कि यहीं पर रह कर मेरे अथवा मित्र के कार्य से अन्यत्र भेजी हुई सेना यहाँ आकर मेरे साथ मिली रहेगी और शत्रु के वश में न हो सकेगी तो दुर्ग का आश्रय ले । १३. अथवा यदि समझे कि जमीन के नीचे खाई खोदकर और रात में युद्ध करने में चतुर मेरी सेना रास्ते की थकावट को दूर करके अवसर आने पर अच्छी तरह कार्य कर सकेगी तो दुर्ग का आश्रय ले । १४. अथवा यदि समझे कि प्रतिकूल देश-काल में आये हुए आक्रमणकारी को अपने आप क्षय-व्यय भुगतना पड़ेगा तो दुर्ग का आश्रय ले । १५. अथवा यदि समझे कि इस देश पर अति क्षय-व्यय सहन करने वाला राजा ही चढ़ाई कर पायेगा, क्योंकि यहाँ दुर्ग, जंगल और बहि-
३४ कौ०
५३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
मेव क्षयव्ययाभ्यां न भविष्यति । महाक्षयव्ययाभिगम्योऽयं देशो दुर्गाटव्य-पसारबाहुल्यात्, परेषां व्याधिप्रायः, सैन्यव्यायामानामलब्धभौमश्च, तमापद्गतः प्रवेक्ष्यति । प्रविष्टो वा न निर्गमिष्यति' इति ।
(१) कारणाभावे बलसमुच्छ्रये वा परस्य दुर्गमुन्मुच्यापगच्छेत् । अग्निपतङ्गवदमित्रे वा प्रविशेत् । अन्यतरसिद्धिर्हि त्यक्तात्मनो भवतीत्याचार्याः।
(२) नेति कौटिल्यः । सन्धेयतामात्मनः परस्य चोपलभ्य सन्दधीत । विपर्यये विक्रमेण सिद्धिमपसारं वा लिप्सित ।
(३) सन्धेयस्य वा दूतं प्रेषयेत् । तेन वा प्रेषितमर्थमानाभ्यां सत्कृत्य ब्रूयात्—इदं राज्ञः पण्यागारम्, इदं देवीकुमाराणां देवीकुमारवचनाद्, इदं राज्यमहं च त्वदर्पणः इति ।
(४) लब्धसंश्रयः समयाचारिकवद्भर्तरि वर्तेत । दुर्गादीनि च कर्माण्यावाहविवाहपुत्राभिषेकाश्वपण्यहस्तिग्रहणसत्रयात्राविहारगमनानि चानुज्ञातः कुर्वीत । स्वभूम्यवस्थितप्रकृतिसन्धिमुपघातमपसृतेषु वा सर्वमनुज्ञातः
र्गमी मार्गों की अधिकता है तो दुर्ग का आश्रय ले । १६. और यदि समझे कि विदेश से आने वाले लोगों के लिये यह स्थान कष्टकर है । सेनाओं की कवायद के लिए भी यहाँ उचित भूमि नहीं है । इसलिये प्रत्येक आक्रमणकारी यहाँ आपद्ग्रस्त होगा । यदि किसी तरह वह यहाँ आ भी गया तो फिर उसका बाहर सकुशल निकलना कठिन है तो अवश्य ही दुर्ग का आश्रय ले ।
( १ ) यदि उक्त परिस्थितियाँ न हों और शत्रु की सेना बहुत बलवान् एवं बहुसंख्यक हो तो पूर्वाचार्यों का कहना है कि या तो दुर्ग छोड़ कर चले जाना चाहिए अथवा अग्नि में पतंगे के समान शत्रु-सैन्य पर पिल पड़ना चाहिए । क्योंकि आत्म-मोह छोड़ कर इस प्रकार लड़ाई में कूद पड़ने पर कभी-कभी जीत भी हो जाती है ।
( २ ) इसके विपरीत कौटिल्य का कहना है कि पहिले तो शत्रु की और अपनी योग्यता को देखकर संधि कर लेनी चाहिए । यदि संधि होनी किसी तरह भी संभव न हो तो पराक्रम के द्वारा ही सिद्धिलाभ करना चाहिए । अथवा यदि समझे कि संधि होनी सर्वथा ही असंभव है तो स्थान को ही छोड़ दे ।
( ३ ) अथवा उक्त स्थिति में किसी धर्मविजेता शक्तिशाली राजा के पास अपना दूत भेजे । अथवा उसके भेजे हुए दूत को धन-मान से संतुष्ट कर उससे कहे, यह मेरी मूल्यवान् भेंट विजेता के लिए और यह महारानी तथा राजकुमारों की भेंट विजेता की महारानी एवं राजकुमारों के लिए लेते जायें । उनको मेरा यह संदेश भी पहुँचा दीजिए कि मेरे तथा इस राज्य के मालिक भी वे ही हैं ।
( ४ ) इस युक्ति से यदि विजेता का आश्रय मिल जाय तो समय को देखते हुए उसके साथ विजिगीषु सेवक की तरह व्यवहार करे और दुर्ग आदि कार्यों के निर्माण, विवाह, पुत्र का राज्याभिषेक, घोड़े खरीदने, हाथियों को पकड़ने, यज्ञ करने, तीर्थाटन
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ।
प्र० ११९-१२० : अ० १५ ] शत्रु के साथ व्यवहार ५३१
कुर्वीत । दुष्टपौरजानपदो वा न्यायवृत्तिरन्यां भूमिं याचेत । दूष्यवदुपांशुदण्डेन वा प्रतिकुर्वीत । उचितां वा मित्राद् भूमिं दीयमानां न प्रतिगृह्लीयात् । मन्त्रिपुरोहितसेनापतियुवराजानामन्यतममदृश्यमाने भर्तरि पश्येत् ।
(१) यथाशक्ति चोपकुर्यात् । दैवतस्वस्तिवाचनेषु तत्परा आशिषो वाचयेत् । सर्वत्रात्मनिसर्गं गुणं ब्रूयात् ।
(२) संयुक्तबलवत्सेवी विरुद्धः शङ्कितादिभिः ।
वर्तेत दण्डोपनतो भर्त्र्यैवमवस्थितः ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे बलवता विगृह्योपरोधहेतवः दण्डोपनतवृत्तं नाम पञ्चदशोऽध्यायः, आदितो द्वादशोत्तरशततमः ।
— : ० : —
करने और मनोविनोद के लिए बाहर जाने-आने आदि सब कार्यों को वह विजेता की अनुमति से करे । अपने राज्य के प्रकृतिमण्डल के साथ संधि आदि या उपघात अथवा दूसरे राज्य में भाग जाने वाले के लिए किसी भी प्रकार की दण्ड व्यवस्था, विजेता राजा की अनुमति से ही करे । यदि ऐसा राजा अन्यायी हो जाय या पौर जनपद उससे विरुद्ध हो जाय तो ऐसी स्थिति में वह अपनी पैतृक भूमि को छोड़कर अपने निवास के लिए दूसरी भूमि की याचना करे; अथवा दूष्य द्वारा उपांशुदण्ड से उसका प्रतीकार किया जाय । यदि विजेता राजा अपने किसी पराजित मित्र राजा की भूमि छीन कर उसको दे तो उसे वह स्वीकार न करे । विजयी राजा की सेवा करते हुए पराजित राजा को चाहिए कि वह अपने मंत्री, पुरोहित, सेनापति और युवराज आदि किसी को भी सेवक की अवस्था में न दिखे; अर्थात् उसके सेवक जब उसे देखें तो अपने स्वामी के ही रूप में देखें; किसी के सेवक के रूप में नहीं ।
(१) पराजित राजा को चाहिए कि समय-समय पर वह अपने मालिक को उपहार देता रहे । देवाराधन और मांगलिक कृत्यों के अवसर पर अपने मालिक के लिए दुआयें माँगे । सबके सामने स्वयं को स्वामी का समर्पण बताये तथा उसके गुणों का कीर्तन करे ।
(२) इस प्रकार अपने विजेता राजा की सेवा करते हुए विजित राजा को चाहिए कि वह उसके शक्तिशाली अमात्य आदि के साथ सदा अनुकूल बर्ताव करे और जो विजेता के विरोधी हों या जिन पर उसका शक हो, उनके सदा वह विरुद्ध रहे ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ।
— : ० : —
| प्रकरण १२१ |
|---|
| अध्याय १६ |
दण्डोपनायिवृत्तम्
(१) अनुज्ञातस्तद्धिरण्योद्वेगकरं बलवान् विजिगीषमाणो, यतः स्वभूमिः स्वर्तुवृत्तिश्च स्वसैन्यानामदुर्गापसारः शत्रुरपार्ष्णिर्नासारश्च, ततो यायात् । विपर्यये कृतप्रतीकारो यायात् । (२) सामदानाभ्यां दुर्बलानुपनमयेद्, भेददण्डाभ्यां बलवतः । (३) नियोगविकल्पसमुच्चयैश्चोपायानामनन्तरैकान्तराः प्रकृतीः साधयेत् । (४) ग्रामारण्योपजीविब्रजवणिक्पथानुपालनमुज्झितापसृतापकारिणां चार्पणमिति सान्त्वमाचरेत् । भूमिद्रव्यकन्यादानमभयस्य चेति दानमाचरेत् ।
अधीनस्थ राजाओं के प्रति विजेता विजिगीषु का व्यवहार
(१) यदि पराजित राजा द्वारा प्रतिज्ञात हिरण्यसंधि का उल्लंघन विजेता राजा को उद्विग्न करे तो बलवान् विजिगीषु को चाहिए कि वह शत्रु के उस प्रदेश पर चढ़ाई कर दे, जहाँ के रास्ते उसके अपने अधिकार में हों; अपनी सेना के लिए अनुकूल समय एवं उसके खाने-पीने की पूरी सुविधा हो, जहाँ न तो शत्रु के दुर्ग हों तथा निकल भागने के लिए भी मार्ग न हो, जहाँ पर शत्रु राजा विजिगीषु से पाष्णिग्राह को न भिड़ा दे, और जहाँ उसके मित्रबल का अभाव हो । यदि ऐसी कोई भी सुविधा न हो तो इन सबका प्रतीकार करके ही वह आक्रमण करे ।
(२) दुर्बल राजाओं को शांति या धन देकर अपने वश में करना चाहिए और और बलवान् राजा को भेद तथा दण्ड के द्वारा ।
(३) नियोग, विकल्प और समुच्चय आदि उपायों से शत्रु-प्रकृति और मित्र-प्रकृति को वश में करना चाहिए ।
(४) गाँव या जंगल में रहने वाली गाय, भैंसों की एवं जल, स्थल के व्यापारी मार्गों की रक्षा करना, दूसरे राजा के भय से या स्वयं अपकार करके भागे हुए दूष्य, अमात्य आदि प्रकृतियों को खोज-खोज कर के देना, आदि उपकार कार्यों से शत्रु राजा के साथ सामरूप उपाय का प्रयोग करना चाहिए। इसी प्रकार भूमिदान, द्रव्यदान, कन्यादान, अभयदान आदि उपकारों से दुर्बल राजा के साथ दानरूप उपाय का प्रयोग करना चाहिए।
प्र० १२१ : अ० १६ ] अधीनस्थ राजाओं से व्यवहार ५३३
(१) सामन्ताटविकतत्कुलीनावरुद्धानामन्यतमोपग्रहेण कोशदण्डभूमि- दाययाचनमिति भेदमाचरेत् । प्रकाशकूटतूष्णींयुद्धदुर्गलम्भोपायैरमित्रप्रग्र- हणमिति दण्डमाचरेत् ।
(२) एवमुत्साहवतो दण्डोपकारिणः स्थापयेत्, स्वप्रभाववतः कोशोप- कारिणः, प्रज्ञावतो भूम्युपकारिणः ।
(३) तेषां पण्यपत्तनग्रामखनिसञ्जातेन रत्नसारफल्गुकुप्येन द्रव्य- हस्तिवनव्रजसमुत्थेन यानवाहनेन वा यद्वहुश उपकरोति तच्चित्रभोगं, यद्दण्डेन कोशेन वा महदुपकरोति तन्महाभोगं, यद्दण्डकोशभूमीरुपकरोति तत्सर्वभोगम् ।
( १ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह सामन्त, आटविक, शत्रु राजा का सम्बन्धी, नजरबन्द शत्रु राजा का पुत्र आदि, इनमें से किसी एक को अपने वश में करके उसके द्वारा कोष, सेना, भूमि और दायभाग की याचना करवा कर बलवान् राजा एवं उसके सामन्त आदि के बीच भेद डाल देना चाहिए अर्थात् इन योजनाओं द्वारा भेदरूप उपाय का प्रयोग करना चाहिए । इसी प्रकार प्रकाशयुद्ध ( देश-काल की सूचना देकर किया जाने वाला युद्ध ), कूटयुद्ध ( देश-काल की सूचना दिये बिना या गलत सूचना देकर किया जाने वाला युद्ध ) और तूष्णीयुद्ध ( छिपे तौर पर गूढपुरुषों द्वारा शत्रु को मरवा देना ), इन तीन प्रकार के युद्धों द्वारा, तथा दुर्गलम्भोपाय प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों द्वारा शत्रु को वश में करना चाहिए—यही दण्डरूप उपाय के प्रयोग का तरीका है ।
( २ ) इस प्रकार के उपायों द्वारा अपने अधीन हुए उत्साही एवं सेना का उपकार करने वाले राजाओं को सैनिक कार्यों पर नियुक्त किया जाय । इसी प्रकार कोषसंपन्न व्यक्तियों को कोष संबंधी कार्यों पर और सुयोग्य मन्त्रशक्ति सम्पन्न व्यक्तियों को भूमि सम्बन्धी कार्यों पर नियुक्त किया जाय, जो कि उनकी यथोचित व्यवस्था कर सकें ।
( ३ ) अधीनस्थ मित्र राजाओं में से जो राजा बाजारों, नगरों, गांवों, खदानों से उत्पादित रत्न एवं चंदन आदि पदार्थ, शंख आदि फल्गु पदार्थ तथा वस्त्र आदि द्रव्यों को देकर, अथवा लकड़ियों-हाथियों के जंगल, गाय, रथ; हाथी आदि को देकर विजिगीषु राजा का अत्यन्त उपकार करता है वह मित्र, चित्रभोग कहा जाता है । जो मित्र राजा सेना और कोष के द्वारा विजिगीषु का महान् उपकार करता है वह महाभोग कहलाता है । जो मित्र राजा सेना, कोष और भूमि आदि के द्वारा विजि-गीषु का सर्वांगीण उपकार करता है उसको सर्वभोग कहते हैं ।
| ५३४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ सातवां अधिकरण |
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(१) यदमित्रमेकतः प्रतिकरोति तदेकतोभोगि। यदमित्रमासारं चापकरोति तदुभयतोभोगि। यदमित्रासारप्रतिवेशाटविकान् सर्वतः प्रतिकरोति तत्सर्वतोभोगि। (२) पाष्णिग्राहश्चाटविकः शत्रुमुख्यः शत्रुर्वाद भूमिदानसाध्यः कश्चिदासाद्येत, निर्गुणया भूम्यैनमुपग्राहयेत्, अप्रतिसम्बद्धया दुर्गस्थम्, निरुपजीव्ययाटविकम्, प्रत्यादेयया तत्कुलीनम्, शत्रोरुपच्छिन्नया शत्रोरुपरुद्धम्, नित्यामित्रया श्रेणीबलम्, बलवत्सामन्तया संहतबलम्, उभाभ्यां युद्धे प्रतिलोमम्, अलब्धव्यायामयतोत्साहिनम्, शून्ययारिपक्षीयम्, कर्काशितयापवाहितम्, महाक्षयव्ययनिवेशया गतप्रत्यागतम्, अनुपाश्रयया प्रत्यपसृतम्, परेणानधिवास्यया स्वयमेव भर्तारमुपग्राहयेत्।
( १ ) अनर्थ का निवारण करके उपकार करने वाले मित्र-राजाओं में से जो राजा एक ही शत्रु का प्रतीकार करके विजिगीषु का उपकार करता है वह एकतोभोगी, जो मित्रराजा शत्रु और शत्रुमित्र ( आसार ), इन दोनों का प्रतीकार करके विजिगीषु का उपकार करता है वह उभयतोभोगी, और जो मित्रराजा शत्रु, शत्रु-मित्र, पड़ोसी शत्रुराजा ( प्रतिवेशी ) तथा आटविक आदि सबका प्रतीकार करके विजिगीषु का उपकार करता है वह सर्वतोभोगी कहा जाता है।
( २ ) यदि पाष्णिग्राह, आटविक, शत्रु की अमात्य प्रकृति अथवा स्वयं शत्रु राजा ही भूमि देने पर अधीनता स्वीकार कर ले तो गुणरहित ( ऊसर ) भूमि देकर ही उसे अपने अधीन किया जाय। यदि पाष्णिग्राह आदि दुर्ग में रहते हों तो उन्हें ऐसी भूमि दी जाय, जिसका दुर्ग से कोई संबंध न हो। आटविक को ऐसी भूमि दी जाय, जिसमें कृषि आदि न हो सके। शत्रुकुल के व्यक्तियों को ऐसी भूमि दी जाय, जिसका किसी समय अपहरण किया जा सके। नजरबंद शत्रु के पुत्र आदि को ऐसी भूमि दी जाय, जिसको शत्रु से छीना गया हो। श्रेणीबल ( नेतारहित सेना ) को ऐसी भूमि दी जाय, जिसमें नित्य ही उपद्रव होते हों। संहतबल ( नेतासहित सेना ) को ऐसी भूमि दी जाय, जिसका सामन्त अत्यधिक बलवान् हो। कूट युद्ध करने वाले शत्रु को ऐसी भूमि दी जाय, जहाँ सदा ही उपद्रव होते हैं, तथा जिसका सामन्त भी अधिक बलवान् हो। उत्साही शत्रु को ऐसी भूमि दी जाय, जिसमें सेना की कवायद के लिए स्थान न हो। शत्रुपक्ष के किसी भी व्यक्ति को ऐसी भूमि दी जाय, जो कि किसी काम की न ( शून्य ) हो। सन्धि करके फिर तोड़ देने वाले राजा को ऐसी भूमि दी जाय, जिसमें सदैव शत्रु सेना एवं आटविक के उपद्रव होते हों। एक बार शत्रु से मिलकर जो फिर अपने से मिलना चाहे उसको ऐसी भूमि दी जाय, जिसको बसने योग्य बनाने के लिए अत्यधिक पुरुषों का क्षय एवं धन का व्यय करना पड़े।
प्र० १२१ : अ० १६ ] अधीनस्थ राजाओं से व्यवहार ५३५
(१) तेषां महोपकारं निर्विकारं चानुवर्तेत् । प्रतिलोममुपांशुना साधयेत् । उपकारिणमुपकारशक्त्या तोषयेत् । प्रयासतश्चार्थमानौ कुर्यात् । व्यसनेषु चानुग्रहम् । स्वयमागतानां यथेष्टदर्शनं प्रतिविधानं च कुर्यात् । परिभवोपघातकुत्सातिवादांश्चैषु न प्रयुञ्जीत । दत्त्वा चाभयं पितेवानुगृह्णीयात् । यश्चास्यापकुर्यात्तद्दोषमभिविख्याप्य प्रकाशमेनं घातयेत् । परोद्वेगकारणाद्वा दाण्डकर्मिकवच्चेष्टेत । न च हतस्य भूमिद्रव्यपुत्रदारानभिमन्येत । कुल्यानप्यस्य स्वेषु पात्रेषु स्थापयेत् । कर्मणि मृतस्य पुत्रं राज्ये स्थापयेत् ।
शत्रु के डर से अपने देश में शरण पाये पुरुष को ऐसी भूमि देकर वश में करना चाहिए, जो कि दुर्ग आदि से रहित हो । और जिस भूमि में उसके असली मालिक की सेवा में कोई नहीं टिक सकता उस भूमि को उसके असली मालिक को लौटाकर उसे वश में किया जाय ।
(१) अपने अधीनस्थ राजाओं में से जो राजा विजेता का महान् उपकार करता हो तथा उसकी ओर से अपने मन में कोई कलुष न रखता हो, उसके साथ ऐसा व्यवहार रखा जाय जिससे उसको किसी भी प्रकार की हानि न पहुँचे । किन्तु जो विरुद्ध आचरण करे उसे उपांशुदंड से सीधा किया जाय, क्योंकि प्रकट दण्ड से अन्य वशीभूत राजाओं में उद्वेग फैलने की सम्भावना रहती है । अपना उपकार करने वाले प्रत्येक राजा को सदैव सन्तुष्ट रखा जाय और श्रम-सहयोग के अनुसार उसको यथोचित धन-सत्कार दिया जाय । उसके ऊपर किसी प्रकार की विपत्ति आ पड़े तो सान्त्वना, सहानुभूति से सदैव उस पर अनुग्रह रखा जाय । यदि ऐसे शुभचिन्तक राजा बिना बुलाये ही अपने राज्य में आ जाँय तो उनके साथ अच्छी तरह प्रेमपूर्वक मिला जाय । किन्तु उनकी ओर से किसी भी प्रकार की बुराई की आशंका हो तो उनसे अपनी रक्षा करने के लिए हर समय सतर्क रहा जाय । इस प्रकार के अधीनस्थ राजाओं के सम्बन्ध में तिरस्कार, कटुवाक्य, निन्दा या अति स्तुति आदि का प्रयोग कभी न किया जाय । अभयदान देकर उन पर पिता के समान अनुग्रह करता जाय । किन्तु उनमें जो भी विजेता का अपकार करे, उसके उस अपराध को सर्वत्र प्रचारित कराके प्रकट रूप में उसका वध करवा दिया जाय । यदि इस बात का भय हो कि प्रकट-दण्ड देने से दूसरे अधीनस्थ राजा भड़क उठेंगे तो दाण्डकर्मिक प्रकरण में निर्दिष्ट उपायों से उसका प्रतीकार किया जाय । अर्थात् उसको उपांशुदंड दिया जाय । किन्तु इस प्रकार से दण्डित राजा की भूमि, द्रव्य, पुत्र, स्त्री आदि का अपहरण न किया जाय । बल्कि उन सबको तथा उनके दूसरे सम्बन्धियों को भी यथोचित नौकरियों पर नियुक्त किया जाय । यदि किसी राजा को वश में करते समय युद्ध में उसकी मृत्यु हो जाय तो उसके पुत्र को राजा बनाया जाय ।