भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
१०४कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) ततः सर्वाधिकरणानां करणीयं सिद्धं शेषमायव्ययौ नीवीं उपस्थानं प्रचारचरित्रसंस्थानं च निबन्धेन प्रयच्छेत् । उत्तममध्यमावरेषु च कर्मसु तज्जातिकमध्यक्षं कुर्यात् । सामुदायिकेष्ववक्लृप्तिकं यमुपहृत्य न राजानुत्तप्येत ।

(२) सहग्राहिणः प्रतिभुवः कर्मोपजीविनः पुत्रा भ्रातरो भार्या दुहितरो भृत्याश्चास्य कर्मच्छेदं वहेयुः ।

(३) त्रिंशतं चतुःपञ्चाशच्चाहोरात्राणां कर्मसंवत्सरः । तमाषाढीपर्यवसानमूनं पूर्णं वा दद्यात् । करणाधिष्ठितमधिमासकं कुर्यात् । अपसर्पाधिष्ठितं च प्रचारम् । प्रचारचरित्रसंस्थानान्यनुपलभमानो हि प्रकृतः समुदयमज्ञानेन परिहापयति । उत्थानक्लेशासहत्वादालस्येन, शब्दादिष्वि-


स्वास्थ्य सम्बन्धी सुधारों से प्राप्त धन का उल्लेख और मित्र राजाओं तथा शत्रु राजाओं के साथ संधि-विग्रह आदि के निमित्त प्राप्त हुआ अथवा खर्च हुए धन का विवरण आदि सभी ऐसे विषय हैं जिनका उल्लेख निबन्धपुस्तक ( एकाउण्ट बुक्स ) में किया जाना चाहिये ।

( १ ) इसके बाद सभी उत्पत्ति-केन्द्रों एवं विभागों के लिए किए जानेवाले, किए गए तथा बचे हुए आय, व्यय, नीवी, कार्यकर्ताओं की उपस्थिति, प्रचार, चरित्र और संस्थान आदि सब बातों को रजिस्टर में दर्ज करके राजा को दे देना चाहिए । उत्तम, मध्यम और निकृष्ट जैसे भी कार्य हों उनके अनुसार ही उनके अध्यक्ष नियुक्त किये जाने चाहिए । एक ही कार्य को करनेवाले अनेक व्यक्तियों में उसी व्यक्ति को अध्यक्ष नियुक्त किया जाना चाहिए जो निपुण, गुणी, यशस्वी हो और जिसे दण्ड देने के पश्चात् राजा को पश्चात्ताप न करना पड़े ।

( २ ) यदि कोई अध्यक्ष राजकीय धन का गबन करके उसको अदा करने में असमर्थ हो तो वह धन क्रमशः उसके हिस्सेदार, उसके जामिन, उसके अधीनस्थ कर्मचारी, उसके पुत्र एवं भाई, उसकी स्त्री एवं लड़की अथवा उसके नौकर अदा करें ।

( ३ ) तीन-सौ-चौवन दिन-रात का एक कर्मसंवत्सर होता है । उसकी समाप्ति आषाढ़ी पूर्णिमा को समझनी चाहिए । इसी वर्ष-गणना के हिसाब से प्रत्येक अध्यक्ष का वेतन दिया जाना चाहिए । यदि अध्यक्ष की नियुक्ति वर्ष के मध्य में हुई है तो उसको कम वेतन और यदि उसने पूरे वर्ष कार्य किया है तो उसे पूरा वेतन दिया जाना चाहिए । प्रत्येक कर्मचारी के कार्य का ब्यौरा उपस्थिति रजिस्टर से देखना चाहिए । अध्यक्ष को चाहिए कि वह जनपद के समस्त कार्यालयों की कार्य-व्यवस्था का ज्ञान गुप्तचरों से प्राप्त करे । यदि वह ऐसा नहीं करता तो अपनी अज्ञानता के

प्र० २३ : अ० ७ ] गाणनिक के कार्य्य १०५

न्द्रियार्थेषु प्रमादेन, संक्रोशाधर्मानर्थभीरुर्भयेन, कार्य्यार्थिष्वनुग्रहबुद्धिः कामेन हिंसाबुद्धिः कोपेन, विद्याद्रव्यवल्लभापाश्रयाद् दर्पेण, तुलामानतर्कगणिकान्तरोपधानात् लोभेन ।

(१) तेषामानुपूर्व्या यावानर्थोपघातः तावानेकोत्तरो दण्ड इति मानवाः । सर्वत्राष्टगुण इति पाराशराः । दशगुण इति बार्हस्पत्याः । विंशतिगुण इत्यौशनसाः । यथापराधमिति कौटिल्यः ।

(२) गाणनिक्यान्याषाढीमागच्छेयुः । आगतानां समुद्रपुस्तभाण्डनीवीकानामेकत्रासम्भाषावरोधं कारयेत् । आयव्ययनीवीनामग्राणि श्रुत्वा


कारण वह धनोत्पादन में हानिकर सिद्ध होता है । १. अज्ञान २. आलस्य ३. प्रमाद ४. काम ५. क्रोध ६. दर्प ७. लोभ, ये धनोत्पादन में विघ्न डालने वाले दोष हैं । अधिक परिश्रम से कतराने के कारण आलस्य के द्वारा, गाना-बजाना तथा स्त्रियों में आसक्त रहने के कारण प्रमाद के द्वारा, निन्दा, अधर्म तथा अनर्थ के कारण भय द्वारा, किसी कार्यार्थी पर अनुग्रह करने के कारण काम द्वारा, किसी क्रूरता के कारण क्रोध द्वारा, विद्या, धन एवं राजप्रिय होने के कारण दर्प द्वारा, और नाप-तौल तर्कना तथा हिसाब में गड़बड़ कर देने के कारण लोभ के द्वारा, कर्मचारी लोग आमदनी में बाधा डाल देते हैं ।

( १ ) आचार्य मनु के अनुयायी विद्वानों का कहना है कि 'जो कर्मचारी ऊपर निर्दिष्ट दोषों के वशीभूत होकर जितना अपराध करे उसको उसी क्रम से दण्ड दिया जाना चाहिये' अर्थात् यदि वह अज्ञान के कारण अपराध करता है तो उसे उतना ही दण्ड दिया जाना चाहिए जितने का कि उसने नुकसान किया है, यदि वह आलस्य के कारण नुकसान करता है तो दुगुना, प्रमाद के कारण नुकसान करता है तो तिगुना दण्ड दिया जाना चाहिए । आचार्य पराशर के मतानुयायियों का कहना है कि 'अपराध करनेवाले प्रत्येक व्यक्ति को अठगुना दण्ड देना चाहिये, क्योंकि सभी अपराध एक समान हैं ।' आचार्य वृहस्पति के अनुयायी विद्वानों का मत है कि 'सभी अपराधियों को दसगुना दण्ड दिया जाना चाहिए ।' शुक्राचार्य के अनुयायी कहते हैं कि 'सबको बीसगुना दण्ड मिलना चाहिए ।' किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि जो जितना अपराध करे तदनुसार ही उसे दण्ड दिया जाना चाहिए ।'

( २ ) सभी कार्यालयों के अध्यक्ष ( विभिन्न जिलों के एकाउण्टेण्टस ) आषाढ़ के महीने में वर्ष की समाप्ति पर प्रधान कार्यालय में आकर हिसाब का मिलान करें । उन आये हुए लोगों को तब तक एक-दूसरे से बातचीत न करने दी जाय तथा मिलने न दिया जाय, जब तक कि उनके पास राजकीय मोहर लगे रजिस्टर तथा व्यय से बचा हुआ धन मौजूद हैं । सर्व प्रथम आय-व्यय को सुनकर उसके पास जो बचत

१०६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

नीमीमवहारयेत् । यच्चाग्रादायस्यान्तरवर्णे नीव्या वर्धेत, व्ययस्य वा यत् परिहापयेत्, तदष्टगुणमध्यक्षं दापयेत् । विपर्यये तमेव प्रति स्यात् ।

(१) यथाकालमनागतानामपुस्तनीवीकानां वा देयदशबन्धो दण्डः । कार्मिके चोपस्थिते कारणिकस्याप्रतिबध्नतः पूर्वः साहसदण्डः । विपर्यये कार्मिकस्य द्विगुणः ।

(२) प्रचारसमं महामात्राः समग्राः श्रावयेयुरविषममात्राः । पृथग्भूतो मिथ्यावादी चैषामुत्तमदण्डं दद्यात् ।

(३) अकृताहोरूपहरं मासमाकाङ्क्षेत । मासादूर्ध्वं मासद्विशतोत्तरं दण्डं दद्यात् । अल्पशेषनीविकं पञ्चरात्रमाकाङ्क्षेत ततः परम् ।


शेष हो उसे ले लिया जाय । अध्यक्ष की बताई हुई आय-राशि से यदि रजिस्टर का हिसाब अधिक निकले और उसी प्रकार बताए हुए व्यय की अपेक्षा रजिस्टर में उससे कम निकले तो अध्यक्ष पर, उसके द्वारा बताई गई कम-अधिक रकम का आठगुना जुर्माना किया जाय । यदि आमदनी से अधिक अथवा व्यय से कम रकम रजिस्टर में चढ़ी हो तो ऐसी दशा में अध्यक्ष को दण्ड न दिया जाय, वरन् आय-व्यय की जो कमी-बेसी हुई है वह उसी को दे दी जाय ।

( १ ) जो अध्यक्ष निश्चित समय में अपने रजिस्टर तथा शेष धन आदि को लेकर प्रधान कार्यालय में उपस्थित नहीं होता उसके हिसाब में जितना बाकी निकले उसका दसगुना जुर्माना उस पर किया जाना चाहिए । यदि प्रधान अध्यक्ष ( एका-उण्ट्स सुपरिन्टेन्डेंट ) निर्धारित समय पर क्षेत्रीय कार्यालयों में पहुँच जाय और वहाँ के विभागीय अध्यक्ष कार्यालय का हिसाब-किताब दिखाने में असमर्थ हों तो उन्हें प्रथम साहस-दण्ड दिया जाना चाहिये । इसके विपरीत यदि प्रधान अध्यक्ष निर्धारित समय पर न पहुँच पावे तो उसे दुगुना प्रथम साहस-दण्ड देना चाहिये ।

( २ ) राजा के महामात्र आदि प्रधान कर्मचारी आय-व्यय तथा नीवीसम्बन्धी सारी राजकीय व्यवस्थाएँ प्रजाजनों को समझायें-बुझायें । यदि उनमें से कोई झूठा प्रचार करे तो उसे उत्तम साहस-दण्ड दिया जाना चाहिये ।

( ३ ) द्रव्य की वसूली करनेवाला राजकर्मचारी यदि निर्धारित समय पर द्रव्य-वसूली न कर सके तो उसे एक मास का और समय दिया जाय । यदि फिर भी वह द्रव्य संग्रह करके राजकोष में न पहुँचा सके तो उस पर प्रति मास के हिसाब से दो-सौ रुपया जुर्माना कर देना चाहिये । जिस अध्यक्ष के पास थोड़ा राजदेय धन बाकी हो, निर्धारित समय से केवल पाँच दिन तक उसकी प्रतीक्षा की जाय । तदनन्तर उसे भी दंडनीय समझा जाय ।

प्र० २३ : अ० ७ ] गाणनिक के कार्य १०७

(१) कोशपूर्वमहोरूपहरं धर्मव्यवहारचरित्रसंस्थानसङ्कलननिर्वर्तना-नुमानचारप्रयोगैरवेक्षेत । (२) दिवसपञ्चरात्रपक्षमासचातुर्मास्यसंवत्सरैश्च प्रतिसमानयेत् । व्युष्टदेशकालमुखोत्पत्त्यनुवृत्तिप्रमाणदायकदापकनिबन्धकप्रतिग्राहकैश्चायं समानयेत् । व्युष्टदेशकालमुखलाभकारणदेययोगपरिमाणाज्ञापकोद्धारक-निधातृकप्रतिग्राहकैश्च व्ययं समानयेत् । व्युष्टदेशकालमुखानुवर्तनरूप-लक्षणपरिमाणनिक्षेपभाजनगोपायकैश्च नीवीं समानयेत् । (३) राजार्थे कारणिकस्याप्रतिबध्नतः प्रतिषेधयतो वाऽज्ञां निबन्धा-दायव्ययमन्यथा वापि कल्पयतः पूर्वः साहसदण्डः ।


( १ ) कोषधन और कोषरजिस्टर लानेवाले अध्यक्ष की परीक्षा पहिले धर्म के द्वारा ली जाय, अर्थात् उसे देखा जाय कि वह धर्मात्मा है या दम्भी, फिर उसके व्यवहार को देखा जाय, तदनन्तर उसके आचार-विचार, उसकी पूर्वस्थिति, उसके कार्य एवं हिसाब-किताब, और अन्त में उसके कार्यों का पारस्परिक मिलान करके उसकी परीक्षा ली जाय, गुप्तचरों द्वारा भी उसके भेद जाने जाँय ।

( २ ) अध्यक्ष को चाहिये कि वह प्रतिदिन, प्रति पाँच दिन, प्रतिपक्ष, प्रतिमास, प्रति चार मास और प्रतिवर्ष के क्रम से राजकीय आय-व्यय एवं नीवी का लेखा-जोखा साफ-सुथरे ढंग में रखे । अर्थात् वर्षारंभ से, पहिले एक दिन का हिसाब, फिर एक साथ पाँच दिन का हिसाब, फिर एक साथ पन्द्रह दिन का हिसाब, फिर एक साथ एक मास का हिसाब, और अन्त में एक साथ पूरे एक वर्ष का हिसाब करके रखे । आय का लेखा निर्दोष और साफ रहे, एदतर्थ रजिस्टर में राजवर्ष ( मास, पक्ष, दिन ), देश, काल, मुख ( आयमुख, आयशरीर ), उत्पत्ति ( आयवृद्धि ), अनुवृत्ति ( स्थानान्तर ) प्रमाण, कर देनेवाले का नाम, दिलानेवाले अधिकारी का नाम, लेखक का नाम और लेनेवाले का नाम, इस प्रकार के स्तंभ ( खाने ) बने होने चाहिए । व्यय का लेखा तैयार करने के लिए रजिस्टर में इस प्रकार के खाने होने चाहिए : व्युष्ट, देश, काल, मुख, लाभ ( पक्ष, मास, वर्ष के क्रम से ) व्यय का कारण, देय वस्तु का नाम, मिलावटी द्रव्य में अच्छाई-बुराई का उल्लेख, तौल, किसकी आज्ञा से व्यय किया गया, किसको दिया गया, भाण्डागारिक और लेनेवाले का पूरा विवरण । इसी प्रकार नीवी ( शेष धन ) का लेखा ; व्युष्ट, देश, काल, मुख, द्रव्य का स्वरूप, द्रव्य की विशेषता, तौल, जिस पात्र में द्रव्य रखा जाय और द्रव्य का संरक्षक, आदि विवरणों के आधार पर तैयार करना चाहिए ।

( ३ ) यदि कारणिक ( क्लर्क ) अर्थलाभ को रजिस्टर में दर्ज नहीं करता है, राजकीय आज्ञा का उल्लंघन करता है, अथवा आय-व्यय के संबंध में विपरीत कल्प-नाऐं भी करता है तो उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाना चाहिए ।

१०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) क्रमावहीनमुत्क्रममविज्ञातं पुनरुक्तं वा वस्तुक्रमवलिखतो द्वादशपणो दण्डः ।

(२) नीवीमवलिखतो द्विगुणः, भक्षयतोऽष्टगुणः, नाशयतः पञ्चबन्धः प्रतिदानं च । मिथ्यावादे स्तेयदण्डः । पश्चात् प्रतिज्ञाते द्विगुणः प्रस्मृतोत्पन्ने च ।

(३) अपराधं सहेताल्पं तुष्येदल्पेऽपि चोदये । महोपकारं चाध्यक्षं प्रग्रहेणाभिपूजयेत् ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे अक्षपटले गाणनिक्याधिकारः सप्तमोऽध्यायः, आदितः सप्तविंशः ॥


(१) क्रम के विरुद्ध, उलट-पलट कर विपरीत लिख देना, किसी वस्तु को बिना समझे-बूझे ही लिख देना और एक वस्तु को दुबारा चढ़ा देना, ऐसी गड़बड़ी करनेवाले कर्मचारी को बारह पण का दण्ड दिया जाय ।

(२) यदि नीवी (बचत धन) के सम्बन्ध में लेखक की ऐसी गड़बड़ी पायी जाय तो चौबीस पण दण्ड, उसका गबन करे तो छियानवे पण दण्ड और उसका अपव्यय करे तो साठ पड़ दण्ड दिया जाना चाहिए । झूठ बोलनेवाले को चोर जितना दण्ड देना चाहिये । हिसाब-किताब के सम्बन्ध में पीछे से किसी बात को स्वीकार करने पर चोरी से दुगुना दण्ड और पूछे जाने पर किसी बात का उत्तर न देकर बाद में उसका उसका उत्तर देने पर भी यही दंड देना चाहिए ।

(३) राजा को चाहिए कि वह अपने अध्यक्ष के थोड़े अपराध को क्षमा कर दे और यदि वह पूर्वापेक्षया आमदनी में थोड़ी भी वृद्धि कर लेता है तो उसके प्रति प्रसन्नता एवं सन्तोष प्रकट करे । महान् उपकार करनेवाले अध्यक्ष का कृतज्ञ होकर राजा को सदैव उसका सम्मान करना चाहिए ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में अक्षपटल में गाणनिक्याधिकार नामक सातवाँ अध्याय समाप्त ।


प्रकरण २४## समुदयस्य युक्तापहृतस्य प्रत्यानयनम्
अध्याय ८

(१) कोषपूर्वाः सर्वारम्भाः । तस्मात् पूर्वं कोषमवेक्षेत । (२) प्रचारसमृद्धिश्चरित्रानुग्रहश्चोरग्रहो युक्तप्रतिषेधः सस्यसम्पत् पण्यबाहुल्यमुपसर्गप्रमोक्षः परिहारक्षयो हिरण्योपायनमिति कोषवृद्धिः । (३) प्रतिबन्धः प्रयोगो व्यवहारोऽवस्तारः परिहापणमुपभोगः परिवर्तनमपहारश्चेति कोषक्षयः । (४) सिद्धीनामसाधनमनवतारणमप्रवेशनं वा प्रतिबन्धः । तत्र दशबन्धो दण्डः । (५) कोषद्रव्याणां वृद्धिप्रयोगः प्रयोगः ।


अध्यक्षों द्वारा गबन किये गये धन की पुनः प्राप्ति

(१) सारे कार्य कोष पर निर्भर हैं । इसलिए राजा को चाहिए कि सबसे पहिले कोष पर ध्यान दे ।

(२) राष्ट्र की सम्पत्ति को बढ़ाना, राष्ट्र के चरित्र पर ध्यान रखना, चोरों पर निगरानी रखना, राजकीय अधिकारियों को रिश्वत लेने से रोकना, सभी प्रकार के अन्नोत्पादन को प्रोत्साहित करना, जल-स्थल में उत्पन्न होनेवाली प्रत्येक व्यापार-योग्य वस्तुओं को बढ़ाना, अग्नि आदि के भय से राज्य की रक्षा करना, ठीक समय पर यथोचित कर वसूल करना और हिरण्य आदि की भेंट लेना, ये सब कोषवृद्धि के उपाय हैं ।

(३) कोषक्षय के आठ कारण हैं : १. प्रतिबन्ध, २. प्रयोग, ३. व्यवहार, ४. अवस्तार, ५. परिहायण, ६. उपभोग, ७. परिवर्तन और ८. अपहार ।

(४) राजकर को वसूल करना, वसूल करके उसे अपने अधिकार में न रखना, और अधिकार में करके भी उसे खजाने में जमा न करना, यह तीन प्रकार का प्रतिबन्ध है । जो अध्यक्ष इन माध्यमों से कोष का क्षय करे, उस पर क्षत राशि से दशगुना जुर्माना करना चाहिए ।

(५) कोषधन का स्वयं ही लेन-देन करके वृद्धि का यत्न करना प्रयोग कहलाता है । ऐसे अधिकारी पर दुगुना जुर्माना करना चाहिए ।

११० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) पण्यव्यवहारो व्यवहारः । तत्र फलद्विगुणो दण्डः । (२) सिद्धं कालमप्राप्तं करोत्यप्राप्तं प्राप्तं वेत्यवस्तारः । तत्र पञ्चबन्धो दण्डः । (३) क्लृप्तमायं परिहापयति व्ययं वा विवर्धयतीति परिहापणम् । तत्र हीनचतुर्गुणो दण्डः । (४) स्वयमन्यैर्वा राजद्रव्याणामुपभोजनमुपभोगः । तत्र रत्नोपभोगे घातः, सारोपभोगे मध्यमः साहसदण्डः, फल्गुकुप्योपभोगे तच्च तावच्च दण्डः । (५) राजद्रव्याणामन्यद्रव्येणादानं परिवर्तनं, तद् उपभोगेन व्याख्यातम् । (६) सिद्धमायं न प्रवेशयति निबद्धं व्ययं न प्रयच्छति, प्राप्तां नीवीं विप्रतिजानीत इत्यपहारः । तत्र द्वादशगुणो दण्डः ।


( १ ) कोष के द्रव्य से स्वयं ही व्यापार करना व्यवहार कहलाता है । ऐसा करने पर भी दुगुना दण्ड देना चाहिए ।

( २ ) राजकर वसूल करनेवाला अधिकारी, नियत समय से कर-वसूली न करके रिश्वत लेने की इच्छा से, मियाद बीत जाने का भय देकर प्रजा को तंग करके जो धन एकत्र करता है उसे अवस्तार कहते हैं । ऐसा करने पर उसे नुकसान की राशि से पाँचगुना दण्ड देना चाहिए ।

( ३ ) जो अध्यक्ष अपने कुप्रबंध के कारण कर की आय को कम कर देता और व्यय की राशि को बढ़ा देता है, उस क्षय को परिहापण कहते हैं । ऐसा करने पर अध्यक्ष को क्षय से चौगुना दण्ड दिया जाय ।

( ४ ) राजकोष के द्रव्य को स्वयं भोग करना तथा दूसरों को भोग कराना 'उपभोग' क्षय है । इसके अपराध में अध्यक्ष को, यदि वह रत्नों का उपभोग करता है तो प्राणदण्ड, सारद्रव्यों का उपभोग करता है तो मध्यम साहस दण्ड, और फल्गु एवं कुप्य आदि पदार्थों का उपभोग करता है तो, उससे द्रव्य वापिस लेकर उसकी लागत का दण्ड दिया जाना चाहिए ।

( ५ ) राजकोष के द्रव्यों को दूसरे द्रव्यों से बदल लेना परिवर्तन कहलाता है । इस कार्य को करने वाले अध्यक्ष के लिए भी उपभोग-क्षय के समान ही दण्ड दिया जाय ।

( ६ ) प्राप्त आय को रजिस्टर में न चढ़ाना, नियमित व्यय को रजिस्टर में चढ़ाकर भी खर्च न करना और प्राप्त नीवी के सम्बन्ध में मुकर जाना, यह तीन

प्र० २४ : अ० ८ ] गबन हुए धन की प्राप्ति १११

(१) तेषां हरणोपायाश्चत्वारिंशत्—पूर्वं सिद्धं पश्चादवतारितम्, पश्चात् सिद्धं पूर्वमवतारितम्, साध्यं न सिद्धम्, असाध्यं सिद्धम्, सिद्धमसिद्धं कृतम्, असिद्धं सिद्धं कृतम्, अल्पसिद्धं बहुकृतम्, बहुसिद्धमल्पं कृतम्, अन्यत् सिद्धमन्यत् कृतम्, अन्यतः सिद्धमन्यतः कृतम्, देयं न दत्तम्, अदेयं दत्तम्, काले न दत्तम्, अकाले दत्तम्, अल्पं दत्तं बहु कृतम्, बहु दत्तमल्पं कृतम्, अन्यद् दत्तमन्यत् कृतम्, अन्यतो दत्तमन्यतः कृतम्, प्रविष्टमप्रविष्टं कृतम्, अप्रविष्टं प्रविष्टं कृतम्, कुप्यमदत्तमूल्यं प्रविष्टम्, दत्तमूल्यं न प्रविष्टम्, संक्षेपो विक्षेपः कृतः, विक्षेपः संक्षेपो वा, महार्घमल्पार्घेण परिवर्तितम्, अल्पार्घं महार्घेण वा, समारोपितोऽर्घः, प्रत्यवरोपितो वा,


प्रकार का अपहार है । अपहार के द्वारा कोषक्षय करनेवाले अध्यक्ष को हानि से बारहगुना दण्डित करना चाहिये ।

( १ ) अध्यक्ष, चालीस प्रकार के उपायों से राजद्रव्य का अपहरण कर सकते हैं । पहिली फसल में प्राप्त हुए द्रव्य को दूसरी फसल आने पर रजिस्टर में चढ़ाना, दूसरी सफल की आमदनी का कुछ हिस्सा पहिली फसल के रजिस्टर में चढ़ा देना, राजकर को रिश्वत लेकर छोड़ देना, राजकर से मुक्त देवालय, ब्राह्मण आदि से कर वसूल करना, कर देने पर भी उसको रजिस्टर में न चढ़ाना, कर न देने पर भी उसको रजिस्टर में भर देना, कम प्राप्त हुए धन को रिश्वत लेकर पूरा दर्ज कर देना पूरे प्राप्त हुए धन को अधूरा कह कर लिख देना, जो द्रव्य प्राप्त हुआ है, उसकी जगह दूसरा ही द्रव्य भर देना, एक पुरुष से प्राप्त हुए धन को रिश्वत लेकर, दूसरे के नाम दर्ज कर देना, देने योग्य वस्तु को न देना, जो वस्तु देने योग्य नहीं है, उसको दे देना, समय पर किसी वस्तु को न देना, रिश्वत लेकर असमय में ही उस वस्तु को दे देना, थोड़ा देकर भी बहुत लिख देना, बहुत देकर भी थोड़ा लिख देना, अभीष्ट वस्तु की जगह दूसरी ही वस्तु दे देना, जिस व्यक्ति को देने के लिए कहा गया है, उसके बदले में किसी दूसरे को ही दे देना, राजधन को वसूल करके उसे खजाने में जमा न करना, राजकर को वसूल न करके, रिश्वत लेकर, उसे जमा-रजिस्टर में चढ़ा देना, राजाज्ञा से वस्त्रादि क्रय करके तत्काल ही उनका मूल्य चुकता न करके एकांत में कुछ कम रकम देना, अधिक मूल्य में क्रीत वस्तुओं की रकम कम करके रजिस्टर में लिखना, सामूहिक करवसूली को अलग-अलग व्यक्ति से लेना, अलग-अलग व्यक्ति से लिये जानेवाले कर को सामूहिक रूप में वसूल करना, बहुमूल्य वस्तु को अल्पमूल्य की वस्तु से बदल देना, अल्पमूल्य की वस्तु को बहुमूल्य वस्तु से बदलना, रिश्वत लेकर बाजार में वस्तुओं की कीमत बढ़ा देना, वस्तुओं का भाव घटा देना, दो दिन का वेतन दिया हो तो चार दिन बढ़ाकर लिख देना, चार दिन का

११२कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

रात्रयः समारोपिताः, प्रत्यवरोपिता वा, संवत्सरो मासविषमः कृतः, मासो दिवसविषमो वा, समागमविषमः, मुखविषमः, धार्मिकविषमः, निर्वर्तनविषमः, पिण्डविषमः, वर्णविषमः, अर्घविषमः, मानविषमः, मापनविषमः, भाजनविषम इति हरणोपायाः ।

(१) तत्रोपयुक्तनिधायकनिबन्धकप्रतिग्राहकदायकदापकमन्त्रिवैयावृत्यकरानेकैकशोऽनुयुञ्जीत । मिथ्यावादे चैषां युक्तसमो दण्डः ।

(२) प्रचारे चावघोषयेत्—अमुना प्रकृतेनोपहताः प्रज्ञापयन्त्विति । प्रज्ञापयतो यथोपघातं दापयेत् । अनेकेषु चाभियोगेष्वपव्ययमानः सकृदेव परोक्तः सर्वं भजेत । वैषम्ये सर्वत्रानुयोगं दद्यात् । महत्यर्थापहारे चाल्पेनापि सिद्धः सर्वं भजेत ।


वेतन दिया हो तो दो दिन घटाकर लिख देना, मलमासरहित संवत्सर को मलिमास युक्त बता देना, महीने के दिन घटा-बढ़ाकर लिख देना, नौकरों की संख्या बढ़ाकर लिख देना, एक जरिये से हुई आमदनी को दूसरे जरिये से दर्ज कर देना, ब्राह्मणादि को स्वीकृत धन में से कुछ स्वयं ले लेना, कुटिल उपाय से अतिरिक्त धन वसूल करना, सामूहिक वसूली में से न्यूनाधिक्य रूप में धन लेना, वर्णविषमता दिखाकर धन का अपहरण कर लेना, जहाँ मूल्य निर्धारित न हों, वहीं दाम बढ़ाकर लाभ उठाना, तोल में कमी-बेशी करके उपार्जन करना, नाप में विषमता पैदा करके धन कमाना, और घृत से भरे हुए सौ बड़े घड़ों की जगह सौ छोटे घड़े दे देना, राजकीय धन को अपहरण करने के ये चालीस तरीके हैं ।

( १ ) यदि किसी अध्यक्ष के सम्बन्ध में राजा को यह सन्देह हो जाय कि उसने अनुचित उपायों से राजकीय धन का अपहरण किया है तो राजा को चाहिये कि उस विभाग के प्रधान निरीक्षक, कोषाध्यक्ष, लेखक (क्लर्क), कर लेनेवाले और कर दिलानेवाले सलाहकारों को अलग-अलग बुलाकर यह पूछे कि उनके अध्यक्ष ने गबन किया है या नहीं । यदि उनमें से कोई झूठ बोले तो उसे गबन करनेवाले अपराधी के समान ही दण्ड दिया जाय ।

( २ ) अपने सारे राज्य में राजा यह घोषणा करा दे कि अपराधी अध्यक्ष ने जिस जिसका गबन किया है, उसकी सूचना राजदरबार को भेज दी जाय । इस प्रकार सूचना मिलने पर राजा, प्रजा की उस हानि को पूरा करे । यदि अध्यक्ष के विरुद्ध एक साथ ही अनेक शिकायतें हों और उनमें से वह किसी को भी स्वीकार न करे तो उसका एक भी अपराध साबित हो जाने पर, सभी शिकायतों का अभियोग उस पर लगाया जाय । यदि अभियुक्त कुछ अपराधों को स्वीकार करता है और कुछ से मुकर जाता है, तो उससे पूरे सबूत माँगे जाँय । गबन किये गये बहुत से धन के

प्र० २४ : अ० ८ ] गबन हुए धन की प्राप्ति ११३

(१) कृतप्रतिघातावस्थः सूचको निष्पन्नार्थः षष्ठमंशं लभेत, द्वादशमंशं भृतकः । प्रभूताभियोगादल्पनिष्पत्तौ निष्पन्नस्यांशं लभेत । अनिष्पन्ने शारीरं हैरण्यं वा दण्डं लभेत, न चानुग्राह्यः । (२) निष्पत्तौ निक्षिपेद्वादमात्मानं वापवाहयेत् । अभियुक्तोपजापात्तु सूचको वधमाप्नुयात् ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे समुदायस्य युक्तापहृतस्य प्रत्यानयनमष्टमोऽध्यायः, आदितः अष्टाविंशः ॥


सम्बन्ध में पूरे सबूत नहीं मिलते, कुछ ही धन के सम्बन्ध में सबूत मिल पाते हों, तो उस पर पूरे गबन का अभियोग लगाना चाहिए ।

( १ ) यदि कोई निष्पक्ष, राजहितेच्छु व्यक्ति किसी अध्यक्ष के गबन की सूचना देता है, तो अपराध सिद्ध हो जाने पर, उस अपहृत धन का छठा भाग सूचना देनेवाले को दिया जाना चाहिये । यदि सूचना देनेवाला व्यक्ति राजकर्मचारी हो तो उसे बारहवाँ भाग दिया जाना चाहिये । यदि अभियोग बहुत से धन का सिद्ध हो चुका है, किन्तु मिला कुछ ही धन है तो सूचना देनेवाले व्यक्ति को उस प्राप्त धन में से ही हिस्सा देना चाहिये । यदि अपराध सिद्ध न हो सके तो सूचना देनेवाले व्यक्ति को उचित शारीरिक या आर्थिक दण्ड दिया जाना चाहिये । किसी भी अपराधी को क्षमा न किया जाय ।

( २ ) अभियोग साबित हो जाने पर सूचना देनेवाला व्यक्ति अदालत से अपने को बरी करा सकता है, किन्तु रिश्वत लेकर यदि वह अपराधी के पक्ष में हो जाता है, और सच्चा बयान नहीं देता है तो उसे प्राणदण्ड दिया जाना चाहिये ।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में अपहृतप्रत्यानयन नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ।


८ कौ०

प्रकरण २५# उपयुक्तपरीक्षा
अध्याय ९

(१) अमात्यसम्पदोपेताः सर्वाध्यक्षाः शक्तितः कर्मसु नियोज्याः । कर्मसु चैषां नित्यं परीक्षां कारयेत्, चित्तानित्यत्वान्मनुष्याणाम् । अश्वसधर्माणो हि मनुष्या नियुक्ताः कर्मसु विकुर्वते ।

(२) तस्मात् कर्तारं कारणं देशं कालं कार्यं प्रक्षेपमुदयं चैषु विद्यात् । ते यथासन्देशमसंहता अविगृहीताः कर्माणि कुर्युः । संहता भक्षयेयुः । विगृहीता विनाशयेयुः । न चानिवेद्य भर्तुः किञ्चिदारब्धं कुर्यु रन्यत्रापत्प्रतीकारेभ्यः । प्रमादस्थानेषु चैषामत्ययं स्थापयेद् दिवसवेतनव्ययद्विगुणम् ।


राजकीय उच्चाधिकारियों के चाल-चलन की परीक्षा

(१) राजकीय उच्चपदस्थ कर्मचारियों को अमात्य के गुणों से युक्त होना चाहिए, योग्यता एवं कार्यक्षमता के आधार पर ही उन्हें भिन्न-भिन्न पदों पर नियुक्त किया जाना चाहिए। उपयुक्त पदों पर नियुक्त किए जाने के अनन्तर समय-समय पर राजा उनके चाल-चलन की निगरानी कराता रहे, क्योंकि मनुष्यों की चित्त-वृत्तियां सदा एक जैसी नहीं रहती हैं। देखा यह जाता है कि कभी-कभी मनुष्य भी घोड़ों की आदत जैसा आचरण करने लगते हैं। अर्थात् घोड़ा जैसे अपने स्थान पर बँधा हुआ शान्त दिखाई देता है, किन्तु रथ आदि में जोड़ते ही वह बिगड़ पड़ता है, वैसे ही स्वभाव से शांत दिखाई देने वाला मनुष्य भी कार्य पर नियुक्त हो जाने के बाद उद्दण्ड हो जाता है।

(२) इसलिए राजा को चाहिए कि अध्यक्षों के सम्बन्ध में वह कारण (अधीनस्थ कर्मचारी), देश, काल, कार्य, वेतन और लाभ, इन बातों की जानकारी रखे। उच्चपदस्थ कर्मचारियों को भी चाहिए कि वे राजा के आदेशानुसार एक-दूसरे से द्वेष न करते हुए जुदा-जुदा रह कर ही अपने कार्यों में तत्पर रहें। यदि वे आपस में मिल जायेंगे तो राजधन का अपहरण करेंगे और परस्पर द्वेष करेंगे तो राजकार्यों को नष्ट कर देंगे। कर्मचारियों को चाहिए कि राजा की आज्ञा प्राप्त किए बिना वे किसी भी नये कार्य का आरंभ न करें, किन्तु आपत्तियों का प्रतीकार करने के लिए किये जाने योग्य कार्यों को वे राजा की अनुमति प्राप्त किए बिना भी आरंभ कर

प्र० २५ अ० ९ ] उच्चाधिकारियों की परीक्षा ११५

(१) यश्चैषां यथादिष्टमर्थं सविशेषं वा करोति स स्थानमानौ लभेत । (२) अल्पायतिश्चेन्महाव्ययो भक्षयति । विपर्यये यथायतित्त्वव्ययश्च न भक्षयति इत्याचार्याः अपसर्पेणैवोपलभ्यते इति कौटिल्यः । (३) यः समुदयं परिहापयति स राजार्थं भक्षयति । स चेदज्ञानादिभिः परिहापयति तदेनं यथागुणं दापयेत् । (४) यः समुदयं द्विगुणमुद्भावयति स जनपदं भक्षयति । स चेद् राजार्थमुपनयत्यल्पापराधं वारयितव्यः । महति यथापराधं दण्डयितव्यः । (५) यः समुदयं व्ययमुपनयति स पुरुषकर्माणि भक्षयति । स कर्म-दिवसद्रव्यमूलपुरुषवेतनापहारेषु यथापराधं दण्डयितव्यः ।

सकते हैं । यदि उच्चपदस्थ कर्मचारी अपने कार्यों में प्रमाद करें तो उन पर उनके वेतन का दुगुना दण्ड किया जाय ।

( १ ) जो पदाधिकारी आदिष्ट कार्य को पूरा करके, स्वेच्छया किसी दूसरे हित-कर कार्य को भी करता है, उसे तरक्की और सम्मान दिया जाना चाहिए ।

( २ ) कुछ पुरातन आचार्यों का कहना है कि 'यदि किसी अध्यक्ष की आमदनी थोड़ी और खर्च अधिक दिखाई दे, तो समझ लेना चाहिए कि वह राज्य के धन का अपहरण करता है । यदि जितनी आमदनी है, उतना ही व्यय दिखाई दे तो समझना चाहिए कि वह न तो राजधन का गबन करता है और न रिश्वत लेता है ।' किन्तु आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'धन का अपहरण करनेवाला भी थोड़ा खर्च कर सकता है । अतः गुप्तचरों द्वारा ही इस कार्य का ठीक पता लग सकता है ।'

( ३ ) जो अधिकारी नियमित आय में कमी दिखाता है, वह निश्चय ही राज-धन का अपहरण करता है । यदि उसकी अज्ञानता, प्रमाद एवं आलस्य के कारण हुई है तो उसे अपराध के अनुसार दुगुना, तिगुना दण्ड दिया जाना चाहिये ।

( ४ ) जो अधिकारी नियमित आय से दुगुनी आय दिखाता है, वह निश्चय ही प्रजा को पीड़ित कर इतना धन वसूल करता है । यदि वह उस दुगुनी आमदनी को राजकोष के लिए भेज देता है तो उसे इतना ही दण्ड देना चाहिए, जिससे कि आगे ऐसा अनुचित कार्य न कर सके । यदि वह उस अधिक धन को राजकोष के लिए न भेज कर स्वयं ही खा लेता है तो उसे अपराध के अनुसार कठोर दण्ड दिया जाना चाहिए ।

( ५ ) जो अधिकारी व्ययनिमित्त निर्धारित राशि को खर्च न करके बचा लेता है वह मजदूरों का पेट काटता है । उस अपराधी अधिकारी को, कार्यहानि के मूल्य का तथा मजदूरी के अपहरण का, यथोचित दण्ड दिया जाना चाहिए ।

११६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दूसरा अधिकरण

(१) तस्मादस्य यो यस्मिन्नधिकरणे शासनस्थः स तस्य कर्मणो याथातथ्यमायव्ययौ च व्याससमासाभ्यामाचक्षीत । (२) मूलहरतादात्विककदर्यांश्र्च प्रतिषेधयेत् । यः पितृपैतामहमर्थमन्या-येन भक्षयति स मूलहरः । यो यद्यदुत्पद्यते तत्तद् भक्षयति स तादात्विकः । यो भृत्यात्मपीडाभ्यामुपचिनोत्यर्थं स कदर्यः । सः पक्षवांश्चेदनादेयः । विपर्यये पर्यादातव्यः । (३) यो महत्यर्थसमुदये स्थितः कदर्यः सन्निधत्ते, अवनिधत्ते, अवस्रा-वयति वा—सन्निधत्ते स्ववेश्मनि, अवनिधत्ते पौरजानपदेषु अवस्रावयति परविषये—तस्य सत्री मन्त्रिमित्रभृत्यबन्धुपक्षमार्गतिं गतिं च द्रव्याणा-मुपलभेत । (४) यश्चास्य परविषये सञ्चारं कुर्यात्तमनुप्रविश्य मन्त्रं विद्यात् । सुविदिते शत्रुशासनापदेशेनैनं घातयेत् । (५) तस्मादस्याध्यक्षाः संख्यायकलेखकरूपदर्शकनीवीग्राहकोत्तरा-ध्यक्षसखाः कर्माणि कुर्युः ।


( १ ) इसलिए प्रत्येक राजकीय अधिकारी का कर्तव्य है कि अपने कार्य की यथार्थता और तत्सम्बन्धी आय-व्यय का विवरण वह संक्षेप में तथा विस्तार से राजा के संमुख प्रस्तुत करे ।

( २ ) उसका यह भी कर्तव्य है कि वह मूलहर, तादात्विक तथा कदर्य पुरुषों पर भी अंकुश रखे । अपनी वंशानुगत संपत्ति का उपभोग जो अन्याय से करता है वह मूलहर है । जो पुरुष जितना उत्पन्न करता है उतना ही व्यय भी कर लेता है, वह तादात्विक कहलाता है । जो अपने को और अपने नौकरों को कष्ट देकर धनो-पार्जन करता है । वह कदर्य कहा जाता है । यदि निषेध करने पर भी ये मूलहर आदि अपने कार्यों को न छोड़ें तो ( यदि उनके बंधुबांधव न हों ) उनकी संपत्ति को जब्त कर लिया जाय और बंधु-बांधव हों तो उन्हें पदच्युत कर दिया जाय ।

( ३ ) जो कदर्य ( कंजूस ) पदाधिकारी गहरी आमदनी करता है, धन को भूमि में गाड़ता है, उसको किसी के पास छिपाकर रखता है, शत्रुदेश में भेजकर किसी के पास जमा करता है, उस अधिकारी के परामर्शदाता, मित्र, नौकर, बंधु-बांधव और आय-व्यय आदि का पता गुप्तचर प्राप्त करें ।

( ४ ) गुप्तचर को चाहिए कि वह कदर्य अधिकारी के धन की शत्रुदेश में ले जानेवाले पुरुष से मिलकर अथवा उसका सेवक बनकर, उसके रहस्य का पता लगावे । गुप्तचर द्वारा राजा को जब इस भेद की सही जानकारी प्राप्त हो जाये तो वह शत्रु के आदेश का बहाना बनाकर उस कदर्य अधिकारी को मरवा डाले ।

( ५ ) इसलिए प्रत्येक विभाग के सभी अध्यक्षों को चाहिये कि वे संख्यानक

प्र० २५ : अ० ६ ] उच्चाधिकारियों की परीक्षा ११७

(१) उत्तराध्यक्षा हस्त्यश्वरथारोहाः । तेषामन्तेवासिनः शिल्पशौच-युक्ताः सङ्ख्यायकादीनामपसर्पाः । (२) बहुमुख्यमनित्यं चाधिकरणं स्थापयेत् । (३) यथा ह्यनास्वादयितुं न शक्यं जिह्वातलस्थं मधु वा विषं वा । अर्थस्तथा ह्यर्थचरेण राज्ञः स्वल्पोऽप्यनास्वादयितुं न शक्यः ॥ (४) मत्स्या यथान्तःसलिले चरन्तो ज्ञातुं न शक्याः सलिलं पिबन्तः । युक्तास्तथा कार्यविधौ नियुक्ता ज्ञातुं न शक्या धनमाददानाः ॥ (५) अपि शक्या गतिर्ज्ञातुं पततां खे पतत्त्रिणाम् । न तु प्रच्छन्नभावानां युक्तानां चरतां गतिः ॥ (६) आस्रावयेच्चोपचितान् विपर्यस्येच्च कर्मसु । यथा न भक्षयन्त्यर्थं भक्षितं निर्वमन्ति वा ॥

( गणक ), लेखक ( क्लर्क ), रूपदर्शक ( मुद्राओं तथा मणि-मुक्ताओं का पारखी ), नीवीग्राहक ( बचत रकम को सँभालनेवाला ) और उत्तराध्यक्ष (प्रधान अधिकारी), इन सबके सहयोग से ही कार्य करें ।

( १ ) उत्तराध्यक्ष ( प्रधान अधिकारी ) उनको नियुक्त किया जाय, जो हाथी, घोड़े और रथों की सवारी में निपुण हों । उनके अधीनस्थ ऐसे आज्ञाकारी, कुशल, पवित्र एवं सदाचरणशील कार्यकर्ता हों, जो संख्यानक आदि राजकीय कर्मचारियों की प्रवृत्तियों का पता लगाने में गुप्तचरों का कार्य करें ।

( २ ) प्रत्येक विभाग में अनेक उच्च पदाधिकारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए, किन्तु उन्हें एक ही विभाग में रहने दिया जाय ।

( ३ ) जैसे जीभ में रखे हुए मधु अथवा विष का स्वाद लिए बिना नहीं रहा जा सकता, उसी प्रकार अर्थाधिकार कार्यों पर नियुक्त पुरुष, अर्थ का थोड़ा भी स्वाद न लें, यह असंभव है ।

( ४ ) जिस प्रकार पानी में रहनेवाली मछलियाँ पानी पीती नहीं दिखाई देती हैं, उसी प्रकार अर्थकार्यों पर नियुक्त कर्मचारी भी धन का अपहरण करते हुए नहीं जाने जा सकते हैं ।

( ५ ) आकाश में उड़नेवाले पक्षियों की गति-विधि का पता लगाया जा सकता है, किन्तु धन का अपहरण करनेवाले कर्मचारियों की गति-विधि से पार पाना कठिन है ।

( ६ ) राजा, जब ऐसे अध्यक्षों का पता लगा ले, तो वह उन धनसंपन्न अधिकारियों की सारी संपत्ति को छीन ले और उन्हें उनके उच्चपदों से गिराकर निम्न

११८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) न भक्षयन्ति ये त्वर्थान् न्यायतो वर्धयन्ति च । नित्याधिकाराः कार्यास्ते राज्ञः प्रियहिते रताः ॥

इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे उपयुक्तपरीक्षा नवमोऽध्यायः,
आदितः एकोनत्रिंशः ॥

—: ० :—


पदों पर नियुक्त कर दे, जिससे भविष्य में गबन न कर सकें एवं अपने गबन को स्वयं ही उगल दें।

( १ ) जो अध्यक्ष राज्यधन का अपहरण नहीं करते, वरन्, न्यायपरायण होकर राजा की समृद्धि में यत्नशील रहते हैं और प्रिय समझकर राजा का हित करते रहते हैं, ऐसे सच्चरित्र अध्यक्षों को सदा सम्मानपूर्वक उच्चपद पर बनाये रखना चाहिए।

अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में उपयुक्तपरीक्षा नामक नौवां अध्याय समाप्त।

—: ० :—

प्रकरण २६# शासनाधिकारः
अध्याय १०

(१) शासने शासनमित्याचक्षते । शासनप्रधाना हि राजानः, तन्मूलत्वात् । सन्धिविग्रहयोः ।

(२) तस्मादमात्यसम्पदोपेतः सर्वसमयविदाशुग्रन्थश्चार्वक्षरो लेखवाचनसमर्थो लेखकः स्यात् । सोऽव्यग्रमना राज्ञः सन्देशं श्रुत्वा निश्चितार्थं लेखं विदध्याद्, देशैश्वर्यवंशनामधेयोपचारमीश्वरस्य, देशनामधेयोपचारमनीश्वरस्य ।

(३) जातिं कुलं स्थानवयःश्रुतानि कर्माद्धिशीलान्यथ देशकालौ ।
यौनानुबन्धं च समीक्ष्य कार्ये लेखं विदध्यात् पुरुषानुरूपम् ॥

(४) अर्थक्रमः, सम्बन्धः, परिपूर्णता, माधुर्यमौदार्यं, स्पष्टत्वम्, इति लेखसम्पत् ।


शासनाधिकार

( १ ) राजा की ओर से पत्र आदि पर लिखित आज्ञा या प्रतिज्ञा का नाम 'शासन' है । राजा लोग शासन ( लिखित बात ) पर ही विश्वास करते हैं, मौखिक बात पर नहीं । संधि, विग्रह आदि षाड्गुण्य संबंधी राजकीय कार्य शासनमूलक ( लिखित ) होने पर ही ठीक समझे जाते हैं ।

( २ ) इसलिए राजकीय शासन को लिखनेवाले लेखक को अमात्य की योग्यताओं वाला, आचार-विचार का ज्ञाता, शीघ्र ही सुंदर वाक्य-योजना में निपुण, सुलेखक और विभिन्न लिपियों को पढ़ने-लिखने वाला होना चाहिए । वह लेखक प्रकृतिस्थ होकर राजा के संदेश को सुने और पूर्वापर प्रसंगों को दृष्टि में रखकर स्पष्ट अभिप्राय प्रकट करनेवाले लेख को लिखे । लेख यदि किसी राजा से संबद्ध हो तो, उसमें देश, ऐश्वर्य, वंश और नाम का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए । यदि उसका संबंध किसी अमात्य से हो तो उसमें केवल उसके देश और नाम का ही उल्लेख किया जाय ।

( ३ ) लेख यदि राजकार्य-संबंधी हो तो उसमें जाति, कुल, स्थान, आयु, योग्यता, कार्य, धन-संपत्ति, सदाचार, देश, काल, वैवाहिक संबंध आदि बातों का भली-भांति विचार करके, प्राप्तकर्ता पुरुषों की श्रेष्ठता, निकृष्टता आदि का भी अवश्य उल्लेख करे ।

( ४ ) उस लेखक में १. अर्थक्रम, २. संबंध, ३. परिपूर्णता, ४. माधुर्य, ५. औदार्य और ६. स्पष्टता आदि छह प्रकार की योग्यताएँ होनी चाहिए ।

१२० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) तत्र यथावदनुपूर्वक्रिया प्रधानस्यार्थस्य पूर्वमभिनिवेश इत्यर्थस्य क्रमः ।
(२) प्रस्तुतस्यार्थस्यानुपरोधादुत्तरस्य विधानमासमाप्तेरिति सम्बन्धः ।
(३) अर्थपदाक्षराणामन्यूनातिरिक्तता हेतूदाहरणदृष्टान्तैरर्थोपवर्णना-श्रान्तपदतेति परिपूर्णता ।
(४) सुखोपनीतचार्वर्थशब्दाभिधानं माधुर्यम् ।
(५) अग्राम्यशब्दाभिधानमौदार्यम् ।
(६) प्रतीतशब्दप्रयोगः स्पष्टत्वमिति ।
(७) अकारादयो वर्णास्त्रिषष्टिः ।
(८) वर्णसङ्घातः पदम् । तच्चतुर्विधं नामाख्यातोपसर्गनिपाताश्चेति । तत्र नाम सत्त्वाभिधायि । अविशिष्टलिङ्गमाख्यातं क्रियावाचि । क्रिया-विशेषकाः प्रादय उपसर्गाः । अव्ययाश्चादयो निपाताः ।
(९) पदसमूहो वाक्यमर्थपरिसमाप्तौ । एकपदावरस्त्रिपदपरः परपदा-र्थानुरोधेन वर्गः कार्यः । लेखपरिसंहरणार्थ इतिशब्दो वाचिकमस्येति च ।


( १ ) प्रधान अर्थ और अप्रधान अर्थ पूर्वापर यथानुक्रम में रखना ही अर्थक्रम कहलाता है ।

( २ ) लेख की समाप्ति पर्यन्त अगला अर्थ, प्रस्तुत अर्थ का बाधक न होनेपर अर्थसम्बन्ध कहलाता है ।

( ३ ) अर्थपद तथा अक्षरों का न्यूनाधिक्य न होना, हेतु उदाहरण तथा दृष्टान्त सहित अर्थ का निरूपण करना और प्रभावहीन शब्दों का प्रयोग न करना परिपूर्णता कहलाता है ।

( ४ ) सरल सुबोध शब्द का प्रयोग करना माधुर्य है ।

( ५ ) शिष्ट शब्दों का प्रयोग करना औदार्य कहलाता है ।

( ६ ) सुप्रसिद्ध शब्दों का प्रयोग करना ही स्पष्टता है ।

( ७ ) अकार आदि त्रेसठ वर्ण होते हैं ।

( ८ ) वर्णों के समूह को पद कहते हैं । पद चार प्रकार का होता है : १. नाम, २. आख्यात, ३. उपसर्ग और ४. निपात । जाति, गुण और द्रव्य को बताने वाला पद नाम कहलाता है । स्त्री-पुरुष आदि विशेष लिङ्गों से रहित क्रियावाचक पद को आख्यात कहते हैं । क्रियाओं के विशेष अर्थों का द्योतन करने वाले उनके आरंभ में लगे हुए प्र, परा, आदि पद उपसर्ग कहलाते हैं । च आदि अव्ययों को निपात कहते हैं ।

( ९ ) सम्पूर्ण अर्थ को कहने वाले पदसमूह का नाम वाक्य है । कम-से-कम एक पद पर और अधिक-से-अधिक तीन पद पर मुख्य पद के अनुसार विराम करना चाहिये । लेख की समाप्ति को बताने के लिए अन्त में इति शब्द लिख देना चाहिये,

प्र० २६ : अ० १० ] शासनाधिकार १२१

(१) निन्दा प्रशंसा पृच्छा च तथाख्यानमथार्थना । प्रत्याख्यानमुपालम्भः प्रतिषेधोऽथ चोदना ॥ सान्त्वमभ्यवपत्तिश्च भर्त्सनानुनयौ तथा । एतेष्वर्थाः प्रवर्तन्ते त्रयोदशसु लेखजाः ॥

(२) तत्राभिजनशरीरकर्मणां दोषवचनं निन्दा। गुणवचनमेतेषामेव प्रशंसा। कथमेतदिति पृच्छा। एवम् इत्याख्यानम्। देहीत्यर्थना। न प्रयच्छामीति प्रत्याख्यानम्। अननुरूपं भवत इत्युपालम्भः। मा कार्षीः इति प्रतिषेधः। इदं क्रियतामिति चोदना। योऽहं स भवान्, मम यद् द्रव्यं तद्भवतः इत्युपग्रहः सान्त्वम्। व्यसनसाहाय्यमभ्यवपत्तिः। सदोषमायति-प्रदर्शनमभिभर्त्सनम्।

(३) अनुनयस्त्रिविधोऽर्थकृतावतिक्रमे पुरुषादिव्यसने चेति।

(४) प्रज्ञापनाज्ञापरिदानलेखास्तथा परीहारनिसृष्टिलेखौ। प्रवृत्तिकश्च प्रतिलेख एव सर्वत्रगश्चेति हि शासनानि ॥


यदि लेख में पूरी बातें न लिखी गई हों तो अन्त में वाचिकमस्य (शेष अंश पत्र-वाहक के मुँह से सुन लीजिए), इस प्रकार लिख देना चाहिए।

(१) निन्दा, प्रशंसा, पृच्छा, आख्यान, अर्थना, प्रत्याख्यान, उपालम्भ, प्रतिषेध, चोदना, सान्त्वना, अभ्यवपत्ति, भर्त्सना और अनुनय इन्हीं तेरह बातों में से ही किसी बात को प्रकट किया जाता है।

(२) किसी के वंश, शरीर और कार्य में दोषारोपण करना निन्दा है। उन्हीं बातों के सम्बन्ध में गुणगान करना प्रशंसा है। 'यह कैसा हुआ?' इस प्रकार पूछना ही पृच्छा है। 'इसको इस प्रकार करना चाहिये' ऐसा कहना आख्यान है। 'दीजिए' इस प्रकार माँगना अर्थना है। 'नहीं देता हूँ' इस प्रकार निषेध करना ही प्रत्याख्यान है। 'यह कार्य आपने अपने अनुरूप नहीं किया' इस प्रकार का वचन उपालम्भ है। 'ऐसा मत करो' यह प्रतिषेध है। 'ऐसा करना चाहिये' इस प्रकार की प्रेरणा चोदना है। 'जो मैं हूँ वही आप हैं, जो मेरा धन है वही आपका भी है' इस प्रकार की तसल्ली देना सान्त्वना है। आपत्ति के समय सहायता करना अभ्युपपत्ति है। दोष देकर धमकी देना भर्त्सना है।

(३) अनुनय तीन प्रकार का होता है : १. अर्थकरणनिमित्तक, २. अतिक्रमणनिमित्तक और ३. पुरुषादिव्यसननिमित्तक। किसी आवश्यक कार्य को करने के लिए अनुनय किया जाना ही अर्थकरणनिमित्तक है, किसी कुपित पुरुष को शान्त करने के लिए अनुनय करना अतिक्रमणनिमित्तक है, और किसी आत्मीय की मृत्यु के कारण आई हुई विपत्ति में अनुनय करना पुरुषाधिव्यसननिमित्तक है। अनुनय कहते हैं अनुग्रह को।

(४) १. प्रज्ञापना, २. आज्ञा, ३. परिदान, ४. परीहार, ५. निसृष्टि ६. प्रवृत्तिक ७. प्रतिलेख और ८. सर्वत्रग, लेख के ये आठ भेद और हैं।

१२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

(१) अनेन विज्ञापितमेवमाह तद्दीयतां चेद्यदि तत्त्वमस्ति ।
राज्ञः समीपे वरकारमाह प्रज्ञापनैषा विविधोपदिष्टा ॥
(२) भर्तुराज्ञा भवेद् यत्र निग्रहानुग्रहौ प्रति ।
विशेषेण तु भृत्येषु तदाज्ञालेखलक्षणम् ॥
(३) यथार्हगुणसंयुक्ता पूजा यत्रोपलक्ष्यते ।
अप्याधौ परिदाने वा भवतस्तावुपग्रहौ ॥
(४) जातेर्विशेषेषु पुरेषु चैव ग्रामेषु देशेषु च तेषु तेषु ।
अनुग्रहो यो नृपतेर्निदेशात्तज्ज्ञः परीहार इति व्यवस्येत् ॥
(५) निसृष्टिस्थापना कार्यकरणे वचने तथा ।
एष वाचिकलेखः स्याद्भवेन्नैसृष्टिकोऽपि वा ॥
(६) विविधां दैवसंयुक्तां तत्त्वजां चैव मानुषीम् ।
द्विविधां तां व्यवस्यन्ति प्रवृत्तिं शासनं प्रति ॥
(७) दृष्ट्वा लेखं यथातत्त्वं ततः प्रत्यनुभाष्य च ।
प्रतिलेखो भवेत् कार्यो यथा राजवचस्तथा ॥


(१) यदि कोई महामात्र राजकीय धन का संग्रह करके अपने पास रख लेता है और गुप्तचर से उसकी सूचना पाकर राजा जब उस महामात्र से राजकीय धन को राजकोष में जमा करने की आज्ञा देता है और जब महामात्र धन देना स्वीकार कर लेता है तब जो लिखा-पढ़ी होती है, उस लेख-पत्र का नाम ही प्रज्ञापना है ।

(२) जिस लेख-पत्र में राजा की ओर से निग्रह या अनुग्रह की आज्ञा हो और विशेषरूप से जो नौकरों के सम्बन्ध में लिखा जाय उसे आज्ञा कहते हैं ।

(३) जिस लेख-पत्र में समुचित गुणों से सत्कार का भाव प्रकट किया जाता है उसे परिदान कहते हैं । यह दो प्रकार से लिखा जाता है । १. जब नौकरों का कोई आत्मीय मर जाता है जिसके कारण वे व्यथित हैं; २. जब राजा उनकी रक्षा के लिए दयाभाव प्रकट करता है ।

(४) विशेष जातियों नगरों, ग्रामों और देशों पर राजा की आज्ञा के अनुसार जो अनुग्रह किया जाता है, विशेषज्ञ लोग उसी को परीहार कहते हैं ।

(५) किसी कार्य के करने तथा कहने में किसी आत्मवचन का प्रमाण देना ही निसृष्टि है, उसके वाचिक और नैसृष्टिक दो भेद होते हैं ।

(६) अनेक प्रकार की दैवी, पारमार्थिक और मानुषी आपत्तियों की सूचना को प्रवृत्तिक कहते हैं । वह शुभ और अशुभ दो प्रकार का होता है ।

(७) दूसरे के भेजे हुए लेख को भली-भांति देखने और पड़ने के अनन्तर, फिर राजा के सामने पढ़कर, राजा की आज्ञा के अनुसार उसका जो उत्तर लिखा जाय उसको प्रतिलेख कहते हैं ।

प्र० २६ : अ० १० ] शासनाधिकार १२३

(१) यथेश्वरांश्चाधिकृतांश्च राजा रक्षोपकारौ पथिकार्थमाह ।
सर्वत्रगो नाम भवेत् स मार्गे देशे च सर्वत्र च वेदितव्यः ॥
(२) उपायाः सामोपप्रदानभेददण्डाः ।
(३) तत्र साम पञ्चविधं—गुणसंकीर्तनं, सम्बन्धापाख्यानं, परस्परो-
पकारसन्दर्शनं, आमायतिप्रदर्शनं, अमात्मोपनिधानमिति ।
(४) तत्राभिजनशरीरकर्मप्रकृतिश्रुतद्रव्यादीनां गुणागुणग्रहणं प्रशंसा
स्तुतिर्गुणसङ्कीर्तनम् ।
(५) ज्ञातियौनमौखस्रौवकुलहृदयमित्रसंकीर्तनं सम्बन्धोपाख्यानम् ।
(६) स्वपक्षपरपक्षयोरन्योन्योपकारसंकीर्तनं परस्परोपकारसन्दर्शनम्।
(७) अस्मिन्नेवं कृत इदमवायोर्भवतीत्याशाजननमायतिप्रदर्शनम् ।
(८) योऽहं स भवान्, यन्मम द्रव्यं तद्भवता स्वकृत्येषु प्रयुज्यताम्
इत्यात्मोपनिधानमिति ।
(९) उपप्रदानमर्थोपकारः ।
(१०) शङ्काजननं निर्भर्त्सनं च भेदः ।


( १ ) जिस लेखपत्र में राजा राहगीरों की रक्षा और उनके उपकार के लिए अपने अधिकारियों को आदेश देता है वह सर्वत्रग है; क्योंकि वह मार्ग में, देश में तथा राष्ट्र में सब जगहों पर लिखा जाता है ।

( २ ) उपाय चार हैं : १. साम, २. दान, ३. दण्ड और ४. भेद ।

( ३ ) उनमें साम पाँच प्रकार का होता है : १. गुणसंकीर्तन, २. सम्बन्धोपाख्यान, ३. परस्परोपकारसंदर्शन, ४. आयतिप्रदर्शन और ५. आत्मोपनिधान ।

( ४ ) वंश, शरीर; कार्य, स्वभाव, विद्वत्ता; हाथी-घोड़े-रथ आदि के गुणों और अवगुणों को जानकर उनकी प्रशंसा करना ही गुणसंकीर्तन कहलाता है ।

( ५ ) समानकुल, विवाह, गुरु-शिष्य, पुरोहित-यजमान, वंशपरंपरागत, हार्दिक और मैत्रीभाव आदि सात प्रकार के सम्बन्धों में से किसी एक का कथन करना सम्बन्धोपाख्यान है ।

( ६ ) परस्पर एक दूसरे द्वारा किये गये उपकार का कथन करना परस्परोपकारसंदर्शन कहलाता है ।

( ७ ) 'इस कार्य के करने में हम दोनों को ऐसा फल प्राप्त होगा, ऐसी आशा करना आयतिप्रदर्शन है ।

( ८ ) 'जो मैं हूँ वही आप हैं तथा मेरा धन ही आपका धन है, उसे आप इच्छानुसार अपने कार्य में लगा सकते हैं।' इस आत्मसमर्पण की भावना को आत्मोपनिधान कहते हैं ।

( ९ ) धन आदि के द्वारा उपकार करना दान या उपप्रदान है ।

( १० ) शत्रु के हृदय में शंका पैदा कर देना भेद है ।