कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
प्रकरण ७१ | विक्रीतक्रीतानुशयः अध्याय १५
(१) विक्रीय पण्यमप्रयच्छतो द्वादशपणो दण्डः, अन्यत्र दोषोपनिपाताविषह्येभ्यः। (२) पण्यदोषो दोषः। राजचोराग्न्युदकबाध उपनिपातः। बहुगुणहीनमार्तकृतं वाऽविषह्यम्। (३) वैदेहकानामेकरात्रमनुशयः। कर्षकाणां त्रिरात्रम्। गोरक्षकाणां पञ्चरात्रम्। व्यामिश्राणामुत्तमानां च वर्णानां वृत्तिविक्रये सप्तरात्रम्। (४) आतिपातिकानां पण्यानामन्यत्राविक्रेयमित्यविरोधेनानुशयो देयः। तस्यातिक्रमे चतुर्विंशतिपणो दण्डः, पण्यदशभागो वा। (५) क्रीत्वा पण्यमप्रतिगृह्णतो द्वादशपणो दण्डः, अन्यत्र दोषोपनिपाताविषह्येभ्यः। समानश्चानुशयो विक्रेतुरनुशयेन।
क्रय विक्रय का बयाना
( १ ) सौदा बेचने के बाद जो सौदागर देने से मुकर जाय उस पर बारह पण दण्ड किया जाय; सौदागर यदि किसी दोष, उपनिपात अथवा अविषह्य के कारण बेची हुई वस्तु को नहीं देता तो वह निर्दोष है।
( २ ) बेची हुई वस्तु में किसी प्रकार की खराबी आ जाना दोष कहलाता है। बेची हुई वस्तु में राजा, चोर, अग्नि तथा जल आदि के द्वारा हुई बाधा उपनिपात है। बेची हुई वस्तु का अत्यधिक गुणहीन या दुःखदाई होना अविषह्य कहलाता है।
( ३ ) क्रय-विक्रय करने वाले व्यापारियों द्वारा खरीदे गये माल का बयाना एक दिन तक लौटाया जा सकता है। इसी प्रकार किसानों का विक्रय तीन दिन तक; ग्वालों का विक्रय पाँच दिन तक और सङ्कर जाति तथा उत्तम वर्णों के जीवन-निर्वाह के आधारभूत भूमि आदि का विक्रय सात दिन तक वापिस किया जा सकता है।
( ४ ) अल्पायु ( आतिपातिक ) वस्तुओं का बयाना ( अनुशय ) इस शर्त पर दिया जाय कि वह उसको किसी दूसरे के हाथ न बेचेगा। इस नियम का उल्लङ्घन करने वाले को चौबीस पण या बिकी हुई वस्तु का दसवाँ हिस्सा दण्ड किया जाय।
( ५ ) किसी वस्तु को खरीद कर उसको लेने से यदि खरीददार मुकर जाय तो
प्र० ७१ : अ० १५ ] क्रय विक्रय का बयाना ३२१
(१) विवाहानां तु त्रयाणां पूर्वेषां वर्णानां पाणिग्रहणासिद्धमुपावर्तनम् । शूद्राणां च प्रकर्मणः । वृत्तपाणिग्रहणयोरपि दोषमौपशायिकं दृष्ट्वा सिद्धमुपावर्तनम् । न त्वेवाभिप्रजातयोः ।
(२) कन्यादोषमौपशायिकमनाख्याय प्रयच्छतः षण्णवतिर्दण्डः । शुल्कस्त्रीधनप्रतिदानं च ।
(३) वरयितुर्वा वरदोषमनाख्याय विन्दतो द्विगुणः । शुल्कस्त्रीधननाशश्च ।
(४) द्विपदचतुष्पदानां तु कुष्ठव्याधिताशुचीनामुत्साहस्वास्थ्यशुचीनामाख्याने द्वादशपणो दण्डः ।
(५) आ त्रिपक्षादिति चतुष्पदानामुपावर्तनम् । आ संवत्सरादिति मनुष्याणाम् । तावता हि कालेन शक्यं शौचाशौचे ज्ञातुमिति ।
उस पर बारह पण दण्ड किया जाय । यदि दोष, उपनिपात और अविषह्य आदि कारणों से ऐसा किया गया हो तो खरीदार निर्दोष है । खरीदने वाले के लिए भी बयाना देने का वही नियम है, जो बेचने वाले के लिए बताया गया है ।
( १ ) विवाह सम्बन्धी शर्तें : ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य, इन तीनों जातियों में विवाह के बाद स्त्री पुरुष के किसी प्रकार का उलट-फेर नहीं हो सकता है । शूद्रों में प्रथम संयोग हो जाने पर स्त्री-पुरुष एक-दूसरे को छोड़ सकते हैं । ब्राह्मण आदि तीन वर्णों में विवाह के बाद सुहागरात के समय यदि पति-पत्नि को एक-दूसरे में कोई योनिलिङ्ग दोष जान पड़े तो सम्बन्ध-विच्छेद हो सकता है । सन्तान हो जाने पर किसी भी तरह सम्बन्ध-विच्छेद सम्भव नहीं है ।
( २ ) कन्या के किसी गुप्त दोष को छिपाकर उसका विवाह करने वाले व्यक्ति पर छियानबे पण दण्ड किया जाय और उसे जो शुल्क तथा स्त्री धन दिया है वह वापिस लिया जाय ।
( ३ ) इसी प्रकार जो वर के दोषों को छिपा कर विवाह करता है, उस पर दुगुना अर्थात् १९२ पण दण्ड किया जाय और उसको दिया हुआ शुल्क तथा स्त्री धन भी जब्त कर लिया जाय ।
( ४ ) पशुओं की विक्री : कोढी, बीमार तथा व्यधिग्रस्त मनुष्यों और पशुओं को स्वस्थ-सुंदर बताने वाले व्यक्ति पर बारह पण जुर्माना किया जाय ।
( ५ ) चौपाये पशु डेढ मास तक और मनुष्य साल भर तक लौटाये जा सकते हैं क्योंकि इस अवधि में इनकी अच्छाई-बुराई का भली भांति अन्दाजा लगाया जा सकता है ।
२१ कौ०
३२२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) दाता प्रतिग्रहीता च स्यातां नोपहतौ यथा। दाने क्रये वानुशयं तथा कुर्युः सभासदः॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे विक्रीतक्रीतानुशयो नाम पंचदशोऽध्यायः; आदित एकसप्ततितमः।
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( १ ) धर्मस्थ ( सभासद ) लोगों को चाहिए कि वे लेन-देन और क्रय विक्रय के अनुशय में ऐसी व्यवस्था करें कि किसी को कोई नुकसान न उठाना पड़े ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में क्रीतविक्रीतानुशय नामक पन्द्रहवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ७२-७३ | दत्तस्यानपाकर्म, अस्वामिविक्रयः, |
|---|---|
| अध्याय १६ | स्वस्वामिसम्बन्धश्च |
(१) दत्तस्याप्रदानमृणादानेन व्याख्यातम् । (२) दत्तमव्यवहार्यमेकत्रानुशये वर्तेत । सर्वस्वं पुत्रदारमात्मानं प्रदा- यानुशयिनः प्रयच्छेत् । धर्मदानमसाधुषु, कर्मसु चौपघातिकेषु वा । अर्थ- दानमनुपकारिषु अपकारिषु वा । कामदानमनर्हेषु च । यथा च दाता प्रतिग्रहीता च नोपहतौ स्यातां तथानुशयं कुशलाः कल्पयेयुः । (३) दण्डभयादाक्रोशभयादनर्थभयाद्वा भयदानं प्रतिगृह्णतः स्तेयदण्डः । प्रयच्छतश्च । रोषदानं परहिंसायाम् । राज्ञामुपरि दर्पदानं च । तत्रोत्तमो दण्डः ।
दान किये हुए धन को न देना, अस्वामि-विक्रय, स्व-स्वामि संबंध
(१) दान किये हुए धन को न देना, कर्जा न देने के समान ही समझना चाहिए ।
(२) दान किया हुआ धन यदि उपयोग में लाने के योग्य न हो तो उसे अमा- नत (अनुशय) के तौर पर सुरक्षित रखा जाय । दाता को चाहिए कि वह अपनी सारी संपत्ति, स्त्री, पुत्र, कलत्र आदि, यहाँ तक कि अपने आप को भी गिरवी रख- कर दान पाने वाले (अनुशयी) का धन चुकता करे । धर्मबुद्धि से अनजाने में असा- धुओं को दान में दिया हुआ धन; या सद्बुद्धि से अच्छे कार्य के लिए बुरे व्यक्तियों को दान में दिया हुआ धन; अनुपकारी तथा अपकारी को दान में दिया हुआ धन; और काम-तृप्ति के लिए वेश्या आदि को दिया हुआ धन अमानत (अनुशय) के तौर पर सुरक्षित रखा जाय । कुशल धर्मस्थ व्यक्तियों को चाहिए कि वे अनुशय का इस प्रकार निर्णय करें, जिससे दाता और प्रतिगृहीता, दोनों को किसी प्रकार की हानि न हो ।
(३) जो भी व्यक्ति दण्ड, निंदा और रोग आदि के भय से दान दें तथा दान लें, उन सब को चोरी का दण्ड दिया जाय । दूसरे को मारने की नीयत से दान देने और दान लेने वाले व्यक्तियों को भी यही दण्ड दिया जाय । यदि कोई व्यक्ति किसी कार्य में अभिमानवश राजा से अधिक दान दे तो उसे उत्तम साहस दण्ड दिया जाय ।
३२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) प्रातिभाव्यं दण्डशुल्कशेषमाक्षिकं सौरिकं कामदानं च नाकामः पुत्रो दायादो वा रिक्थहरो दद्यात् । इति दत्तस्यानपाकर्म । (२) अस्वामिविक्रयस्तु । नष्टापहृतमासाद्य स्वामी धर्मस्थेन ग्राहयेत्, देशकालातिपत्तौ वा स्वयं गृहीत्वोपहरेत् । धर्मस्थश्च स्वामिनमनुयुञ्जीत– कुतस्ते लब्धमिति । स चेदाचारक्रमं दर्शयेत, न विक्रेतारं, तस्य द्रव्यस्यातिसर्गेण मुच्येत । विक्रेता चेद्दृश्येत, मूल्यं स्तेयदण्डं च । स चेदपसारमधिगच्छेदपसरेदापसारक्षयादिति । क्षये मूल्यं स्तेयदण्डं च दद्यात् । (३) नाष्टिकं च स्वकरणं कृत्वा नष्टप्रत्याहृतं लभेत । स्वकरणाभावे पञ्चबन्धो दण्डः । तच्च द्रव्यं राजधर्म्यं स्यात् । (४) नष्टापहृतमनिवेद्योत्कर्षतः स्वामिनः पूर्वः साहसदण्डः ।
(१) व्यर्थ का ऋण, दण्डशेष (जुरमाना), शुल्कशेष (दहेज का धन), जुए में हारा धन, शराबखोरी में लिया हुआ ऋण और वेश्या को दिया जाने वाला धन आदि को; मृत पुरुष का कोई भी वारिस यदि न देना चाहे तो कानूनन उसको बाध्य नहीं किया जा सकता है। यहाँ तक प्रतिज्ञात वस्तु को न दिए जाने के संबंध में कहा गया।
(२) अस्वामि-विक्रय : किसी वस्तु का स्वामी न होते हुए भी जो व्यक्ति उस वस्तु को बेच दे उसका दण्ड-विधान इस प्रकार है : अपनी खोई हुई या चोरी गई वस्तु को उसका मालिक जिस व्यक्ति के पास देखे उसको धर्मस्थ के द्वारा गिरफ्तार करा दे। यदि देश या काल उसमें बाधक हो तो स्वयं ही पकड़ कर उस व्यक्ति को धर्मस्थ के हवाले कर दे। धर्मस्थ उससे पूछे कि 'तुम्हें यह कहाँ मिली?' यदि वह प्राप्त वस्तु के संबन्ध में पूरा विवरण बताकर कहे कि उसको वह वस्तु कहीं पड़ी हुई मिली है और उस वस्तु को उसके असली मालिक को लौटा दे, तो उसे बरी कर दिया जाय। यदि वह उस वस्तु के बेचने वाले व्यक्ति का नाम बताये, तो उस विक्रेता से उस वस्तु का मूल्य खरीदने वाले को दिलाया जाय और वह वस्तु उसके असली मालिक को सौंप दी जाय और बेचने वाले को चोरी का दण्ड दिया जाय। यदि वह भी किसी दूसरे विक्रेता का नाम ले; वह भी किसी दूसरे को बताये, इस प्रकार जो भी उसका पहला विक्रेता सिद्ध हो वही उस वस्तु का मूल्य और चोरी का जुरमाना अदा करे।
(३) खोई हुई वस्तु को उसका मालिक प्रमाणरूप में लेख तथा साक्षी दिखा-कर ही प्राप्त कर सकता है। यदि वह पुरुष उस वस्तु को अपनी सिद्ध न कर सके तो उसके मूल्य का पाँचवाँ हिस्सा जुरमाना भरे और वह वस्तु धर्मानुसार राजा के अधिकार में दे दी जाय।
(४) अपनी खोई हुई वस्तु को किसी के पास देखकर बिना धर्मस्थ को सूचित
प्र० ७२-७३ : अ० १६ ] दान और विक्रय सम्बन्धी नियम ३२५
(१) शुल्कस्थाने नष्टापहृतोत्पन्नं तिष्ठेत् । त्रिपक्षादूर्ध्वमनभिसारं राजा हरेत्, स्वामी वा स्वकरणेन । (२) पञ्चपणिकं द्विपदरूपस्य निष्क्रयं दद्यात्; चतुष्पणिकमेकखुरस्य; द्विपणिकं गोमहिषस्य; पादिकं क्षुद्रपशूनाम् । रत्नसारफलगुकुप्यानां पञ्चकं शतं दद्यात् । (३) परचक्राटवीहृतं तु प्रत्यानीय राजा यथास्वं प्रयच्छेत् । चोरहृतमविद्यमानं स्वद्रव्येभ्यः प्रयच्छेत्, प्रत्यानेतुमशक्तो वा । स्वयंग्राहेणाहृतं प्रत्यानीय तन्निष्क्रयं वा प्रयच्छेत् । (४) परविषयाद्वा विक्रमेणानीतं यथाप्रविष्टं राज्ञा भुञ्जीतान्यत्रार्य-प्राणद्रव्येभ्यो देवब्राह्मणतपस्विद्रव्येभ्यश्च । इत्यस्वामिविक्रयः ।
किये ही, यदि उसका मालिक स्वयं ही छीनने लगे तो उसको प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
( १ ) किसी का खोया हुआ या चोरी गया माल मिल जाय तो वह चुंगीघर में जमा कर दिया जाय । डेढ महीने तक यदि उसका मालिक उसको न ले तो उसको सरकारी माल में जमाकर दिया जाय; अथवा साक्षी आदि के द्वारा मालिक अपना स्वत्व सिद्ध करके उस माल को ले ले ।
( २ ) नष्ट या अपहृत दास-दासी को छुड़ाने के लिए प्रति व्यक्ति के हिसाब से पांच पण, छुड़ाने वाला, जमा करे । इसी प्रकार घोड़े, गधे आदि को छुड़ाने के लिए चार पण; गाय, भैंस आदि को छुड़ाने के लिए दो पण, छोटे-छोटे पशुओं को छुड़ाने के लिए ¼ पण; रत्न आदि बहुमूल्य, टिकाऊ वस्तुओं, रसहीन ( फल्गु ) वस्तुओं और तांबा आदि धातुओं को छुड़ाने के लिए पांच पण सरकारी टैक्स ( निष्क्रय ) छुड़ाने वाला जमा करे ।
( ३ ) दूसरे राजा के द्वारा या जंगलियों द्वारा अपहरण किये हुए दास, दासी या चौपाया आदि को राजा स्वयं लाकर उनके स्वामियों को दे । चोरों द्वारा चुराई गई वस्तु यदि नष्ट हो जाय या राजा भी उसको लौटा कर न ला सके तो, राजा को चाहिए कि अपने द्रव्यों में से उस वस्तु को उसके स्वामी की दे । चोरों को पकड़ने के लिए नियुक्त हुए राजपुरुषों द्वारा लायी गयी वस्तु उसके मालिक को दे दी जाय; यदि ऐसा संभव न हो तो उस खोई हुई वस्तु का मूल्य उसके स्वामी को दे दिया जाय ।
( ४ ) दूसरे देश से जीत कर लाए हुए धन का उपभोग, राजा की आज्ञा प्राप्त कर किया जाय; किन्तु वह धन यदि आर्यों, देवताओं, ब्राह्मणों और तपस्वियों का हो तो उसका उपभोग न कर, प्रत्युत उसको लौटा दिया जाय । यहाँ तक अस्वामि-विक्रय के संबन्ध में कहा गया ।
३२६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) स्वस्वामिसम्बन्धस्तु भोगानुवृत्तिरुच्छिन्नदेशानां यथास्वं द्रव्याणाम् । (२) यत्स्वं द्रव्यमन्यैर्भुज्यमानं दशवर्षाण्युपेक्षेत, हीयेतास्य । अन्यत्र बालवृद्धव्याधितव्यसनिप्रोषितदेशत्यागराज्यविभ्रमेभ्यः । (३) विंशतिवर्षोपेक्षितमनुवसितं वास्तु नानुयुञ्जीत । (४) ज्ञातयः श्रोत्रियाः पाषण्डा वा राज्ञामसन्निधौ परवास्तुषु विवसन्तो न भोगेन हरेयुः; उपनिधिमाधिं निधिं निक्षेपं स्त्रियं सीमां राजश्रोत्रियद्रव्याणि च । (५) आश्रमिणः पाषण्डा वा महत्यवकाशे परस्परमबाधमाना वसेयुः । अल्पां बाधां सहेरन् । पूर्वागतो वा वासपर्यायं दद्यात् । अप्रदाता निरस्येत । (६) वानप्रस्थयतिब्रह्मचारिणामाचार्यशिष्यधर्मभ्रातृसमानतीर्थ्यारिक्थभाजः क्रमेण ।
(१) स्वस्वामि-सम्बन्ध : जिस संपत्ति को कोई व्यक्ति लगातार भोगता आ रहा हो । उसके संबंध में कोई साक्षी न मिलने पर भी, उस संपत्ति पर भोग करने वाले का ही अधिकार माना जाय ।
(२) जो व्यक्ति, दस वर्ष तक दूसरों के उपभोग में लायी गयी, अपनी संपत्ति की खोज खबर नहीं करता, उस संपत्ति पर उस व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं रह जाता है। किन्तु वह संपत्ति यदि ऐसे व्यक्तियों की हो, जो बाल, बूढे, बीमार, आपद्ग्रस्त, परदेश गये, देश त्यागी और राजकीय कार्य के लिए बाहर गये हों, तो दस वर्ष बाद भी अपनी संपत्ति पर उनका अधिकार बना रहता है ।
(३) यदि कोई किरायादार मालिक मकान की रजामंदी से बीस वर्ष तक उसके मकान पर रहे तो उस मकान पर किरायेदार का अधिकार हो जाता है ।
(४) बंधु-बांधव, श्रोत्रिय और पाखण्डी आदि व्यक्ति राजा से दूर दूसरों के मकानों में रहते हुए भी उनके मालिक नहीं सकते हैं । इसी प्रकार उपनिधि, आधि, निधि, निक्षेप, स्त्री, सीमा, राजा और श्रोत्रिय की वस्तुओं पर कोई भी व्यक्ति अधिकार नहीं कर सकता है ।
(५) आश्रमवासी और पाखंड (अवैदिक एवं व्रत-उपवास करने वाले) एक-दूसरे को किसी प्रकार की हानि न पहुँचाते हुए निवास करें । यदि एक-दूसरे को वे थोड़ी सी हानि पहुँचायें तो सहन कर लें । पहिले से रहने वाला व्यक्ति, बाद में आये व्यक्ति को स्थान दे दे; यदि स्थान न दे उसे बाहर कर दिया जाय ।
(६) वानप्रस्थी, संन्यासी और ब्रह्मचारियों की संपत्ति के उत्तराधिकारी क्रमशः उनके आचार्य, शिष्य और धर्म भाई या सहपाठी होते हैं ।
प्र० ७२-७३ : अ० १६ ] दान और विक्रय सम्बन्धी नियम ३२७
(१) विवादपदेषु चैषां यावन्तः पणा दण्डाः तावती रात्रीः क्षपणा-भिषेकाग्निकार्यमहाकृच्छ्रवर्धनानि राज्ञश्चरेयुः । अहिरण्यसुवर्णाः पाषण्डाः साधवः । ते यथास्वमुपवासव्रतै राराधयेयुः । अन्यत्र पारुष्यस्तेयसाहससंग्रहणेभ्यः । तेषु यथोक्ता दण्डाः कार्याः ।
(२) प्रव्रज्यासु वृथाचारान् राजा दण्डेन वारयेत् । धर्मो ह्यधर्मोपहतः शास्तारं हन्त्युपेक्षितः ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे दत्तस्यानपाकर्म-अस्वामिविक्रय-स्वस्वामिसम्बन्धो नाम षोडशोऽध्यायः; आदितो द्विसप्ततितमः ।
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(१) इन लोगों में परस्पर झगड़ा हो जाने के कारण अपराधी को जितना पण दण्ड किया जाय, उतनी ही रात्रि वह राजा के कल्याण के लिए उपवास, स्नान, अग्निहोत्र और कठिन चांद्रायण व्रतों का अनुष्ठान करे । हिरण्य-सुवर्ण आदि रखने वाले धर्मशील पाखंडी भी दण्डित होने पर राजा की कल्याण-कामना के लिए यथोचित व्रत-आदि करें । यदि वे मार-पीट, चोरी, डाका और व्यभिचार करें तो उन्हें सहज ही में न छोड़ा जाय बल्कि अपराध के अनुसार उनको पूर्वोक्त सभी प्रकार के दण्ड दिये जायें ।
(२) संन्यासियों के बीच होने वाले मिथ्या आचार-विचारों को राजा दण्ड के द्वारा ही दूर करे क्योंकि अधर्म से दबाया और उपेक्षा किया हुआ धर्म शासन करने वाले राजा को नष्ट कर देता है ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दानविक्रय सम्बन्ध नामक सोलहवां अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ७४ | ## साहसम् |
|---|---|
| अध्याय १७ |
(१) साहसमन्वयवत्प्रसभकर्म । निरन्वये स्तेयमपव्ययने च । (२) रत्नसारफल्गुकुप्यानां साहसे मूल्यसमो दण्डः, इति मानवाः । मूल्यद्विगुण इत्यौशनसाः । यथापराध इति कौटिल्यः । (३) पुष्पफलशाकमूलकन्दपक्वान्नचर्मवेणुमृद्भाण्डादीनां क्षुद्रकद्रव्याणां द्वादशपणावरश्चतुर्विंशतिपणपरो दण्डः । (४) कालायसकाष्ठरज्जुद्रव्यक्षुद्रपशुपटादीनां स्थूलकद्रव्याणां चतुर्विंशतिपणावरोऽष्टचत्वारिंशत्पणपरो दण्डः । ताम्रवृत्तकंसकाचदन्तभाण्डादीनां स्थूलकद्रव्याणामष्टचत्वारिंशत्पणावरः षण्णवतिपरः पूर्वः साहसदण्डः । महापशुमनुष्यक्षेत्रगृहहिरण्यसुवर्णसूक्ष्मवस्त्रादीनां स्थूलकद्रव्याणां द्विशतावरः पञ्चशतपरः मध्यमः साहसदण्डः ।
साहस
( १ ) खुले आम बलात्कार करना, डाके डालना तथा मारधाड़ करना साहस कहलाता है । छिपकर किसी वस्तु का अपहरण करना या किसी वस्तु को लेकर देने से मुकर जाना चोरी कहलाता है ।
( २ ) मनु के मतानुयायी विद्वानों का कथन है कि 'रत्न, बहुमूल्य टिकाऊ वस्तुओं, रसहीन वस्तुओं तथा ताँबा आदि धातुओं पर डाका डालने वाले व्यक्ति को, उनकी कीमत के बराबर दण्ड दिया जाय' । औशनस संप्रदाय के विद्वानों की राय है कि मूल्य के बराबर नहीं 'मूल्य से दुगुना दण्ड दिया जाय ।' किन्तु आचार्य कौटिल्य का अभिमत है कि उन्हें 'अपराध के अनुसार ही दंड दिया जाय ।'
( ३ ) फूल, फल, शाक, मूल, कंद, पका अन्न, चमड़ा, बाँस और मिट्टी के बर्तन आदि छोटी-छोटी वस्तुओं का अपहरण करने वाले पर बारह पण से लेकर चौबीस पण तक का दंड किया जाय ।
( ४ ) इसी प्रकार लोहा, लकड़ी, रस्सी, छोटे पशु और वस्त्र आदि वस्तुओं के अपहरण में चौबीस से अड़तालीस पण तक का दण्ड किया जाय । तांबा, पीतल, कांसा, कांच और हाथीदांत आदि की बनी हुई वस्तुओं पर डाका डालने वाले पर
प्र० ७४ : अ० १७ ] साहस ३२९
(१) स्त्रियं पुरुषं वाभिषह्य बध्नतो बन्धयतो बन्धं वा मोक्षयतः पंच- शतावरः सहस्रपर उत्तमः साहसदण्ड इत्याचार्याः।
(२) यः साहसं प्रतिपत्तेति कारयति स द्विगुणं दद्यात् । यावद्धिरण्य- मुपयोक्ष्यते तावद्दास्यामीति स चतुर्गुणं दण्डं दद्यात् । य एतावद्धिरण्यं दास्यामीति प्रमाणमुद्दिश्य कारयति स यथोक्तं हिरण्यं दण्डं च दद्याद् इति बार्हस्पत्याः ।
(३) स चेत्कोपं मदं मोहं वापदिशेद्यत्, यथोक्तवद्दण्डमेनं कुर्यात्, इति कौटिल्यः ।
(४) दण्डकर्मसु सर्वेषु रूपमष्टपणं शतम् । शतावरेषु व्याजीं च विद्यात्पञ्चपणं शतम् ॥
अड़तालीस से छियानवे पण तक का जुर्माना किया जाय; इसी को प्रथम साहस दण्ड कहते हैं। बड़े पशु, मनुष्य, खेत, मकान, हिरण्य, सोना और बड़ी कीमत के वस्त्र आदि द्रव्यों पर डाका डालने वाले को दो-सौ पण से पाँच सौ पण तक का दंड दिया जाय; इसी का नाम मध्यम साहस दण्ड है।
(१) स्त्री-पुरुष को जबर्दस्ती बाँधने, बँधवाने वाले और राजाज्ञा से बँधे हुए स्त्री-पुरुष को अनधिकार जबर्दस्ती छोड़ने या छुड़वाने वाले व्यक्ति को पाँच-सौ पण लेकर हजार पण तक का दंड दिया जाय; प्राचीन आचार्यों के मतानुसार यही उत्तम साहस दण्ड कहलाता है।
(२) जो व्यक्ति जान-बूझ कर या सूचना देकर डाका (साहस) डालता है, उसे दुगुना दंड दिया जाय । जो व्यक्ति किसी को डाका डालने के लिए यह कह कर प्रेरित करे कि 'तुम्हारे छुड़ाने पर जितना खर्च होगा, उतना मैं लाऊँगा' उसे चौगुना दंड दिया जाय । जो व्यक्ति 'तुम्हें इतना सुवर्ण दूंगा' इस प्रकार धन की तादाद का प्रलोभन देकर डाका डलवाये, उससे उतना ही सुवर्ण वसूल किया जाय और इसके अतिरिक्त उसे यथोचित दंड दिया जाय; आचार्य बृहस्पति के अनुयायी विद्वानों का ऐसा निर्देश है ।
(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कहना है कि 'इस प्रकार साहस कार्य कराने वाले व्यक्ति को यदि वह इसका कारण क्रोध, उन्माद या अज्ञानता बताये तो वही दंड दिया जाय, जो साहस आदि कर्म करने वालों के लिए बताया गया है।'
(४) सब दंडों में प्रति सैकड़ा आठ पणरूप (सरकारी टैक्स) और दंड की रकम सौ से कम होने पर प्रति सैकड़ा पाँच पण व्याजी (सरकारी टैक्स) समझना चाहिए ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में साहस नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ।
३३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) प्रजानां दोषबाहुल्याद्राज्ञां वा भावदोषतः ।
रूपव्याजावधर्मिष्ठे धर्म्या तु प्रकृतिः स्मृता ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे साहसं नाम सप्तदशोऽध्यायः;
आदितस्त्रिसप्ततितमः ।
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( १ ) प्रजा के दोषों अपराधों की अधिकता होने पर या राजा के मन में बेईमानी की नियत आ जाने से रूप तथा व्याजी नामक सरकारी टैक्स धर्मानुकूल नहीं माने जाते हैं । इसलिए शास्त्रों में विधान किये गए दंड ही धर्मानुकूल माने गये हैं ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में साहस नामक सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ७५ |
|---|
| अध्याय १८ |
वाक्पारुष्यम्
(१) वाक्पारुष्यमुपवादः कुत्सनमभिभर्त्सनमिति । (२) शरीरप्रकृतिश्रुतवृत्तिजनपदानां शरीरोपवादेन काणखञ्जादिभिः सत्ये त्रिपणो दण्डः । मिथ्योपवादे षट्पणो दण्डः । (३) शोभनाक्षिदन्त इति काणखंजादीनां स्तुतिनिन्दायां द्वादशपणो दण्डः । (४) कुष्ठोन्मादक्लैब्यादिभिः कुत्सायां च सत्यमिथ्यास्तुतिनिन्दासु द्वादशपणोत्तरा दण्डास्तुल्येषु । विशिष्टेषु द्विगुणः । हीनेष्वर्धदण्डः । परस्त्रीषु द्विगुणः । प्रमादमदमोहादिभिरर्धदण्डाः ।
वाक्पारुष्य
(१) गाली-गलौज, निन्दा और धमकाना आदि वाक्पारुष्य नामक अपराध के अन्तर्गत हैं। वाक्पारुष्य के पाँच भेद हैं : १. शरीर, २. प्रकृति, ३. श्रुत, ४. वृत्ति और ५. देश ।
(२) शरीर : इनमें शरीर को लक्ष्य करके यदि कोई व्यक्ति काणे, गंजे, लंगड़े, लूले को काणा, गंजा, लंगड़ा, लूला कहकर पुकारे तो उस पर तीन पण दंड किया जाय । यदि झूठी निन्दा करे तो छह पण दंड किया जाय ।
(३) यदि कोई व्यक्ति किसी काणे, लंगड़े आदि की व्याजस्तुति के भाव से यह कहे कि 'वाह तुम्हारी आँखें आदि कितनी सुन्दर हैं' तो उस पर बारह पण दंड किया जाय ।
(४) किसी व्यक्ति की कोढ़ी, पागल या नपुंसक आदि कहकर निन्दा करने वाले पर भी बारह पण दंड किया जाय । यदि कोई व्यक्ति अपने बराबर वालों की सच्ची, झूठी तथा व्याजस्तुति से निन्दा करे तो उस पर क्रमशः बारह, चौबीस और छत्तीस पण दंड किया जाय । यदि अपने से बड़ों के साथ कोई ऐसा व्यवहार करे तो उस पर दुगुना दंड किया जाय । अपने से छोटों के साथ ऐसा करने पर आधा दंड किया जाय । दूसरों की स्त्रियों के साथ ऐसा करने वाले पर भी दुगुना दंड किया जाय । यदि ऐसी निन्दा पागलपन, मद या किसी मोह के कारण की गई हो तो उस पर भी आधा दंड किया जाय ।
३३२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) कुष्ठोन्मादयोश्चिकित्सकाः। संनिकृष्टाः पुमांसश्च प्रमाणम्। क्लीबभावे स्त्रियः मूत्रफेनः अप्सु विष्ठानिमज्जनं च। (२) प्रकृत्युपवादे ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यशूद्रान्तावसायिनामपरेण पूर्वस्य त्रिपणोत्तरा दण्डाः। पूर्वेणापरस्य द्विपणाधराः। कुब्राह्मणादिभिश्च कुत्सायाम्। (३) तेन श्रुतोपवादो वाग्जीवनानां, कारुकुशीलवानां वृत्त्युपवादः, प्राग्घूणकगान्धारादीनां च जनपदोपवादा व्याख्याताः। (४) यः परम् ‘एवं त्वां करिष्यामि’ इति करणेनाभिभत्सर्येदकरणे, यस्तस्य करणे दण्डस्ततोऽर्धदण्डं दद्यात्। (५) अशक्तः कोपं मदं मोहं वाऽपदिशेत् द्वादशपणं दद्यात्। (६) जातवैराशयः शक्तश्चापकर्तुं यावज्जीविकावस्थं दद्यात्।
(१) किसी को कोढ़ी पागल सिद्ध करने के लिए उनके चिकित्सक या साथ रहने वाले ही प्रमाण माने जाँय। पेशाब में झाग न उठना और पानी में विष्ठा का डूब जाना नपुंसक स्त्री का प्रमाण समझना चाहिए।
(२) प्रकृति : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्त्यज जातियों (प्रकृतियों) में यदि पूर्व-पूर्व वे एक दूसरे की निन्दा करें तो अन्त्यज को तीन पण, छह पण, नौ पण और बारह पण दंड दिया जाय। इसी प्रकार ब्राह्मण निन्दा करे तो दो पण, चार पण, छह पण और आठ पण उसको दंड दिया जाय। इसी प्रकार कुब्राह्मण, महाब्राह्मण आदि निन्दित वाक्य कहने वाले को भी यही दंड दिया जाय।
(३) श्रुति : पढ़ाई, विद्वत्ता, योग्यता आदि विषयों को लेकर वाग्जीवी, व्यक्ति यदि एक दूसरे की निन्दा करें तो उन्हें भी यही दंड दिया जाय।
वृत्ति : शिल्पी, कुशीलव (नट, नर्तक, गायक) आदि यदि एक दूसरे की आजीविका की निन्दा करें तो उन्हें भी यही दंड दिया जाय।
देश : भिन्न-भिन्न देशों के रहने वाले यदि एक दूसरे के देश की निन्दा करें तो उन्हें भी उक्त दंड दिया जाय।
(४) यदि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को यह कहकर कि 'मैं तुम्हें पीटूंगा या तुम्हारे साथ ऐसा कार्य करूँगा' धमकाये, पर मारे-पीटे नहीं तो उसे पूर्वोक्त दंड से आधा दंड दिया जाय; किन्तु जो धमकाने के साथ-साथ मारे-पीटे भी उसको आगे 'दंडपारुष्य' प्रकरण में निर्दिष्ट नियमों के अनुसार दंड दिया जाय।
(५) यदि कोई निर्बल व्यक्ति, किसी को डराये-धमकाये, क्रोध, उन्माद या पागलपन प्रकट करे तो उसपर बाहर पण दंड किया जाय।
(६) यदि यह बात साबित हो जाय कि किसी ने शत्रुतावश किसी दूसरे
प्र० ७५ : अ० १८ ] वाक्पारुष्य ३३३
(१) स्वदेशग्रामयोः पूर्वं मध्यमं जातिसंघयोः ।
आक्रोशाद्देवचैत्यानामुत्तमं दण्डमर्हति ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे वाक्पारुष्यं नाम अष्टादशोऽध्यायः,
आदितश्चतुस्सप्ततितमः ।
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व्यक्ति के हाथ-पैर तोड़ने की धमकी दी है और वह ऐसा करने में समर्थ भी है, तो उसे उसकी आमदनी तथा हैसियत के अनुसार यथोचित दंड दिया जाय ।
(१) यदि कोई व्यक्ति अपने देश या गाँव की निन्दा करे तो उसे प्रथम साहस दंड, अपनी जाति तथा समाज की निन्दा करे तो उसे मध्यम साहस दंड और देवालयों की निन्दा करे तो उसे उत्तम साहस दंड दिया जाय ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में वाक्पारुष्य नामक अठारहवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ७६ |
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| अध्याय १९ |
दण्डपारुष्यम्
(१) दण्डपारुष्यं स्पर्शनमवगूर्णं प्रहतमिति । (२) नाभेरधःकायं हस्तपङ्कभस्मपांसुभिरिति स्पृशतस्त्रिपणो दण्डः । (३) तैरेवामेध्यैः पादष्ठीविकाभ्यां च षट्पणः । छर्दिमूत्रपुरीषादिभिर्द्वादशपणः नाभेरुपरि द्विगुणाः । शिरसि चतुर्गुणाः समेष्व । (४) विशिष्टेषु द्विगुणाः । हीनेषु अर्धदण्डाः । परस्त्रीषु द्विगुणाः । प्रमादमदमोहादिभिरर्धदण्डाः । (५) पाद्वस्त्रहस्तकेशावलम्बनेषु षट्पणोत्तरा दण्डाः । (६) पीडनावेष्टनाञ्जनप्रकर्षणाध्यासनेषु पूर्वः साहसद्ण्डः । पातयित्वाऽपक्रमतोऽर्धदण्डः ।
दण्डपारुष्य
( १ ) किसी को छूना, पीटना या हाथ उठाना और चोट पहुँचाना दंडपारुष्य है ।
( २ ) नाभि से नीचे के हिस्से पर हाथ, कीचड़, राख और धूल डालने वाले व्यक्ति को तीन पण दंड दिया जाय ।
( ३ ) यदि किसी को अपवित्र हाथ से छू दिया जाय, पैर से छू दिया जाय तो उस पर छह पण का दंड करना चाहिए । यही हरकतें यदि नाभि के ऊपर के हिस्से से की जांय तो उसे दुगुना दंड दिया जाय । यदि शिर पर की जांय तो चौगुना दंड दिया जाय ।
( ४ ) यदि अपने से श्रेष्ठ व्यक्तियों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाय तो उसे दुगुना दंड दिया जाय । अपने से छोटों के साथ यदि ऐसा व्यवहार किया जाय तो आधा दंड दिया जाय । दूसरों की स्त्रियों के साथ ऐसी हरकतें करने पर भी दुगुना दंड दिया जाय । यदि कोई व्यक्ति प्रमाद, उन्माद या अज्ञानतावश ऐसा करें तो उसे आधा दंड दिया जाय ।
( ५ ) पैर, वस्त्र, हाथ और बालों को पकड़ने वाले व्यक्ति पर क्रमशः छह, बारह, अठारह और चौबीस पण दंड दिया जाय ।
( ६ ) किसी को पकड़ने पर, बाँधने पर, कालिख पोतने पर, घसीटने पर और नीचे पटक उसके ऊपर चढ़ बैठने पर प्रथम साहस दंड दिया जाय । किसी को जमीन पर पटक कर भाग जाने वाले को प्रथम साहस का आधा दंड दिया जाय ।
प्र० ७६ : अ० १६ ] दण्डपारुष्य ३३५
(१) शूद्रो येनाङ्गेन ब्राह्मणमभिहन्यात् तदस्य छेदयेत् । अवगूर्णे निष्क्रयः स्पर्शेऽर्धदण्डः । तेन चण्डालाशुचयो व्याख्याताः । (२) हस्तेनावगूर्णे त्रिपणावरो द्वादशपणपरो दण्डः । पादेन द्विगुणः । दुःखोत्पादनेन द्रव्येण पूर्वः साहसदण्डः । प्राणाबाधिकेन मध्यमः । (३) काष्ठलोष्टपाषाणलोहदण्डरज्जुद्रव्याणामन्यतमेन दुःखमशोणित-मुत्पादयतश्चतुर्विंशतिपणो दण्डः । शोणितोत्पादने द्विगुणः । अन्यत्र दुष्ट-शोणितात् । (४) मृतकल्पमशोणितं घ्नतो हस्तपादपारश्विकं वा कुर्वतः पूर्वः साहसदण्डः । पाणिपाददन्तभङ्गे कर्णनासाच्छेदने व्रणविदारणे च अन्यत्र दुष्टव्रणेभ्यः । (५) सक्थिग्रीवाभञ्जने नेत्रभेदने वा वाक्यचेष्टाभोजनोपरोधेषु च मध्यमः साहसदण्डः । समुत्थानव्ययश्च । विपत्तौ कण्टकशोधनाय नीयेत ।
( १ ) शूद्र जिस अंग से ब्राह्मण पर प्रहार करे उसका वह अंग काट देना चाहिए। शूद्र यदि ब्राह्मण का हाथ या पैर झटक दे तो उस पर यथोचित दंड किया जाय और केवल छू दे तो उक्त दंड का आधा दंड किया जाय । इसी प्रकार चाण्डाल आदि नीच जातियों के सम्बन्ध में दंड-व्यवस्था समझनी चाहिए ।
( २ ) हाथ से ढकेलने या झटकने पर तीन पण से बारह पण तक का दंड होना चाहिए। पैर से प्रहार करने पर दुगुना दंड दिया जाय । कांटा, सूई आलपीन आदि चुभा देने पर प्रथम साहस दंड और प्राणघातक वस्तु द्वारा चोट पहुँचाने पर मध्यम साहस दंड दिया जाय ।
( ३ ) लकड़ी, ढेला, पत्थर, लोहे की छड़ तथा रस्सी आदि किसी एक वस्तु से मारने पर यदि खून न निकले तो चौबीस पण और खून निकले तो अठतालीस पण दंड दिया जाय । यदि वह खून कोढ, फोड़ा, फुंसी आदि के कारण निकला हो तो दुगुना दंड न दिया जाय ।
( ४ ) यदि बिना खून निकाले ही मारते-मारते किसी को अधमरा कर दिया जाय या उसके हाथ-पैरों के जोड़ तोड़ दिये जाँय तो मारने वाले को प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । हाथ, पैर तथा दाँत तोड़ देने पर कान तथा नाक काट देने पर और घावों को फाड़ देने पर भी प्रथम साहस दण्ड दिया जाय । किन्तु वे घाव यदि फोड़े, फुंसी आदि के कारण न हुए हों, उसी दशा में प्रथम साहस दण्ड दिया जाय ।
( ५ ) गोड़ या गर्दन तोड़ने पर आँख फोड़ने पर, जीभ, हाथ, पैर और मुँह आदि को काट देने पर मध्यम साहस दण्ड दिया जाय और अपराधी को चाहिए कि तब तक वह उस अपंग व्यक्ति की दवा-दारु, खाने-पीने तथा आवश्यक व्यय का
३३६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) महाजनस्यैकं घ्नतः प्रत्येकं द्विगुणो दण्डः । (२) पर्युषितः कलहोऽनुप्रवेशो वा नाभियोज्य इत्याचार्याः । नास्त्यपकारिणो मोक्ष इति कौटल्यः । (३) कलहे पूर्वगतो जयति, अक्षममाणो हि प्रधावति । इत्याचार्याः । (४) नेति कौटल्यः । पूर्वं पश्चाद्वागतस्य साक्षिणः प्रमाणम् । असाक्षिके घातः कलहोपलिङ्गनं वा । (५) घाताभियोगमप्रतिब्रुवतः तदहरेव पश्चात्कारः । (६) कलहे द्रव्यमपहरतो दशपणो दण्डः । (७) क्षुद्रकद्रव्यहिंसायां तच्च तावच्च दण्डः ।
इन्तजाम करे जब तक वह पूर्ण स्वस्थ न हो जाय । यदि अपराधी को इस प्रकार का दंड देने में देश-काल बाधक सिद्ध हो तो उसे कंटक शोधन अधिकरण में बताये गए नियमों के अनुसार दंड दिया जाय ।
(१) यदि बहुत-से आदमी मिलकर एक आदमी को मारें तो उनमें से प्रत्येक आदमी को उससे दुगुना दंड दिया जाय, जितना दंड एक आदमी द्वारा मारने पर दिया जाता है ।
(२) पुरातन आचार्यों का कहना है कि 'बहुत पुराने झगड़ों तथा चोरियों पर मुकदमा दायर न किया जाय ।' किन्तु आचार्य कौटिल्य का मत है कि 'अपकारी व्यक्ति को कभी भी न छोड़ा जाय ।'
(३) पुरातन आचार्यों का अभिमत है कि 'फौजदारी के मामले में जो व्यक्ति पहिले अदालत में दरखास्त दे, उसी की जीत समझी जाय क्योंकि दूसरे से सताये जाने के कारण, दुःख को बरदास्त न करके ही वह पहिले अदालत की शरण में आता है ।'
(४) किन्तु आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'यह उचित नहीं है; अदालत में कोई आगे आये या पीछे, साक्षियों के कथनानुसार ही मुकदमे का फैसला दिया जाय । यह साक्षी न हों तो चोट आदि से और चोट भी यदि भीतरी हो तो अन्य लक्षणों से झगड़े की असलियत जानकर फैसला करना चाहिये ।'
(५) फौजदारी के मामलों में यदि प्रतिवादी उसी दिन जवाब न दे तो उसकी हार समझी जाय ।
(६) दो आदमियों को झगड़े में फँसा हुआ जानकर उनकी वस्तुओं को यदि कोई तीसरा ही व्यक्ति उड़ाकर ले जाय तो उसे दस पण दंड दिया जाय ।
(७) यदि झगड़े में कोई किसी की छोटी-छोटी वस्तुओं को नष्ट कर दे तो वह उसका मूल्य मालिक को दे और उतना ही दंड राजकोष में जमा करे ।
प्र० ७३ : अ० १९ ] दण्डपारुष्य ३३७
(१) स्थूलकद्रव्यहिंसायां तच्च द्विगुणश्च दण्डः । (२) वस्त्राभरणहिरण्यसुवर्णभाण्डहिंसायां तच्च पूर्वश्च साहसदण्डः । (३) परकुड्यमभिघातेन क्षोभयतस्त्रिपणो दण्डः । छेदनभेदने षट्-पणः । पातनभञ्जने द्वादशपणः प्रतीकारश्च । (४) दुःखोत्पादनं द्रव्यमन्यवेश्मनि प्रक्षिपतो द्वादशपणो दण्डः । प्राणाबाधिकं पूर्वः साहसदण्डः । (५) क्षुद्रपशूनां काष्ठादिभिर्दुःखोत्पादने पणो द्विपणो वा दण्डः । शोणितोत्पादने द्विगुणः । (६) महापशूनामेतेष्वेव स्थानेषु द्विगुणो दण्डः, समुत्थानव्ययश्च । (७) पुरोपवनवनस्पतीनां पुष्पफलच्छायावतां प्ररोहच्छेदने षट्पणः । क्षुद्रशाखाच्छेदने द्वादशपणः । पीनशाखाच्छेदने चतुर्विंशतिपणः । स्कन्धवधे पूर्वः साहसदण्डः । समुच्छित्तौ मध्यमः । (८) पुष्पफलच्छायावद्गुल्मलतास्वर्धदण्डः । पुण्यस्थानतपोवनश्मशानद्रुमेषु च ।
( १ ) यदि इसी प्रकार झगड़े में बड़ी-बड़ी वस्तुएँ नष्ट हो जायें तो उनकी कीमत मालिक को और मूल्य का दुगुना दंड सरकार को दिया जाय ।
( २ ) यदि कोई वस्त्रों आभूषणों और हिरण्य तथा सुवर्ण के बने बर्तनों को नष्ट करे तो वह मालिक को उनकी पूरी कीमत चुकाये और सरकार की ओर से उसे प्रथम साहस दंड दिया जाय ।
( ३ ) दूसरे की दीवार को धक्का देकर या चोट मारकर हिलाने वाले व्यक्ति को तीन पण दंड दिया जाय; दीवार को तोड़ने-फोड़ने पर छह पण तथा गिराने पर बारह पण दंड और नुकसान का मुआवजा लिया जाय ।
( ४ ) यदि कोई व्यक्ति किसी के घर में कोई घातक वस्तु फेंके तो उसे बारह पण दंड दिया जाय; यदि प्राण-घातक वस्तु फेंके तो प्रथम साहस दंड दिया जाय ।
( ५ ) छोटे-छोटे जानवरों को लकड़ी, बाँस आदि से मारने पर एक या दो पण दंड दिया जाय । यदि मारने पर जानवर के खून निकल जाय तो दुगुना दंड किया जाय ।
( ६ ) गाय, भैंस आदि बड़े पशुओं की इसी प्रकार की चोट पहुँचाने पर दुगुना दंड किया जाय और अपराधी से दवा-दारू के लिए भी खर्च लिया जाय ।
( ७ ) नगर के बाग-बगीचों में लगे हुए फल-फूल तथा छायादार पेड़ों के पत्ते आदि तोड़ने पर छह पण; छोटी-छोटी शाखाओं की टहनियाँ तोड़ने पर बारह पण; मोटी-मोटी शाखाओं को काटने पर चौबीस पण; तने के ऊपरी स्कंध को काटने पर प्रथम साहस दंड; और पेड़ को जड़ से काटने पर मध्यम साहस दंड दिया जाय ।
( ८ ) फली-फूली छायादार झाड़ियों तथा लताओं को काटने पर ऊपर कहे गए,
२२ कौ०
३३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
३३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ तीसरा अधिकरण
(१) सीमवृक्षेषु चैत्येषु द्रुमेष्वालक्षितेषु च । त एव द्विगुणा दण्डाः कार्या राजवनेषु च ॥
इति धर्मस्थीये तृतीयेऽधिकरणे दण्डपारुष्यं नाम एकोनविंशोऽध्यायः; आदितः पञ्चसप्ततितमः ।
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दंड का आधा दंड दिया जाय । तीर्थस्थानों, तपोवनों और श्मशानों के वृक्षों को काटने वाले पर भी आधा दंड किया जाय ।
( १ ) सीमा के पेड़ों, मन्दिरों के पेड़ों, राजा की ओर से मुहर लगे पेड़ों और सरकारी जंगलों के पेड़ों को काटने पर दुगुना जुर्माना किया जाय ।
धर्मस्थीय नामक तृतीय अधिकरण में दण्डपारुष्य नामक उन्नीसवां अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ७४-७५ | # द्यूतसमाह्वयम्, प्रकीर्णकानि |
|---|---|
| अध्याय २० |
(१) द्यूताध्यक्षो द्यूतमेकमुखं कारयेत्। अन्यत्र दीव्यतो द्वादशपणो दण्डः गूढाजीविज्ञापनाथँम्।
(२) द्यूताभियोगे जेतुः पूर्वः साहसदण्डः। पराजितस्य मध्यमः। बालिशजातीयो ह्येष जेतुकामः पराजयं न क्षमत इत्याचार्याः। नेति कौटल्यः। पराजितश्चेद्द्विगुणदण्डः क्रियेत न कश्चन राजानमभिसरिष्यति। प्रायशो हि कितवाः कूटदेविनः।
(३) तेषामध्यक्षाः शुद्धाः काकणीरक्षांश्च स्थापयेयुः।
(४) काकण्यक्षाणामन्योपधाने द्वादशपणो दण्डः। कूटकर्मणि पूर्वः साहसदण्डः, जितप्रत्यादानम्। उपधौ स्तेयदण्डश्च।
द्यूत समाह्वय और प्रकीर्णक
( १ ) द्यूत समाह्वय : द्यूताध्यक्ष का चाहिए कि वह किसी एक नियत स्थान में जुआ खेलने का प्रबन्ध करे। उस नियत स्थान को छोड़कर दूसरी जगह जुआ खेलने वाले पर बारह पण दण्ड किया जाय; ऐसा इसलिए किया गया है कि जिससे ठगी, धोखेबाज लोगों का पता लग सके।
( २ ) 'जुए के मुकदमों में जीतने वाले को प्रथम साहस दण्ड; और हारने वाले को मध्यम साहस दण्ड दिया जाय; क्योंकि हारने वाला मूर्ख जीतने की इच्छा से जुआ खेलता है और हार जाने पर अपनी हार को सहन न कर जीतने वाले से झगड़ा कर बैठता है।' ऐसा प्राचीन आचार्यों का मत है। परन्तु आचार्य कौटिल्य इस बात को नहीं मानते हैं। उनका कहना है कि 'यदि हारने वाले को जीतने वाले से दुगुना दण्ड दिया जायगा तो फिर कोई भी हारने वाला जुआरी अदालत की शरण में न जा सकेगा; और उसका नतीजा यह होगा कि धूर्त लोग कपट से जुआ खेलते रहेंगे।'
( ३ ) द्यूताध्यक्षों को चाहिए कि वे जुआघर में साफ कौड़ी और पाँसे रखवा दें।
( ४ ) यदि कोई जुआरी उन कौड़ियों और पाँसों को बदले तो उसपर बारह पण दण्ड दिया जाय। यदि कोई छल-कपट से जुआ खेले तो उसे प्रथम साहस दण्ड दिया जाय और उसके जीते हुए धन को छीन लिया जाय तथा रखवाये गए पाँसों में कुछ तब्दीली करके दूसरे को धोखा देने के अभियोग में चोरी का दण्ड दिया जाय।