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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

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प्राचीन भारत की एकराजत्व शासन-प्रणाली को दृष्टि में रखकर स्वभावतः होना तो यह चाहिये था कि सर्वसत्तामान शासक ( राजा ) ही सम्पूर्ण राज-सत्ता का एकाधिकारी व्यक्ति होता, किन्तु अर्थशास्त्र तथा न्यायशास्त्र विषयक ग्रन्थों में जो नीति-नियम निर्धारित हैं उनको देखकर ही यह बात स्पष्ट हो जाती है कि हिन्दू राजा की स्थिति एक वेतनभोगी सेवक से बढ़कर कुछ न थी। राजा और राजपरिवार का वेतन ( वृत्ति ) निर्धारित था, जो कि देश की आय तथा देश की स्थिति पर निर्भर था। राजमाता, पटरानी, दूसरी रानियां, राजकुमार और दूसरे राजपरिवार के व्यक्तियों के लिये वेतन नियत था ( अर्थशास्त्र, पृ० ४२०-४२२ )। राजा को यद्यपि स्वामी कहा जाता था, किन्तु उसके अधिकार की सीमाएँ अपराधियों के दमन तक ही सीमित थीं। सार्वजनिक बहुमत से वह बँधा रहता था। वह पौरजानपद की राष्ट्र-संघटन की शक्ति के अधीन था। इस दृष्टि से उसकी स्थिति राष्ट्र के एक सेवक या भृत्य से बढ़कर नहीं थी। उसका कोई स्वतन्त्र व्यक्तित्व और उसकी कोई व्यक्तिगत रुचि-अरुचि नहीं हुआ करती थी। हिन्दू राजा की यह दास या भृत्य जैसी स्थिति ही वस्तुतः नैतिक दृष्टि से उसे स्वामित्व के उच्चासन पर अडिग बनाये रखी रही। राज्यरूपी वृक्ष का मूल बताते हुए शुक्रनीतिसार ( ५।१२ ) में उसकी स्थिति को बड़े अच्छे ढंग से दर्शाया गया है। कहा गया है कि “राजा, राज्यरूपी वृक्ष का मूल है, मन्त्रि-परिषद् उसका धड़ या स्कंध हैं, सेनापति उसकी शाखाएँ हैं, सैनिक उसके पल्लव है, प्रजा उसके पुष्प हैं, देश की सम्पन्नता उसके फल हैं और समस्त देश उसका बीज है।”

इसलिये यदि राजा न हो तो प्रजा और राष्ट्र की क्या स्थिति हो सकती है, यह स्पष्ट हो जाता है।

हिन्दू राजनीति की दृष्टि से राज्य एक ऐसी पुनीत थाती है जो राजा को इसलिये सौंपी जाती है कि वह प्रजा की सुख-समृद्धि और कल्याण-कामना के लिए सतत यत्नशील बना रहे। प्रत्येक राज्याभिषेक के समय अभिषिक्त राजा को यह कह कर इस पुनीत थाती को सौंपा जाता था कि “यह राष्ट्र तुम्हें सौंपा जाता है। तुम इसके संचालक, नियामक और उत्तरदायित्व के दृढ़ वाहन-कर्ता हो। यह राज्य तुम्हें कृषि के कल्याण, सम्पन्नता, प्रजा के पोषण के लिए दिया जाता है ( शुक्लयजुर्वेद ९।२२ )।

इसलिये राजा के लिये पहिली प्रतिज्ञा राष्ट्रहित और प्रजा की हित-कामना की हुआ करती थी। हिन्दुओं की एकराजता का यह महान आदर्श, जिसका

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एकमात्र उद्देश्य प्रजा की भलाई या, संसार की तत्कालीन राजनीति के इतिहास में अपना अनन्य स्थान रखता है। वस्तुतः वह एक नागरिक राज्य था, जिसके प्रांतीय शासक या मांडलिक सदा ही नागरिक हुआ करते थे। इस एकराज शासन की अनेक प्रणालियाँ प्रलचित थीं जैसे राज्य, महाराज्य, आधिपत्य और सार्वभौम । सार्वभौम शासन-प्रणाली का विकास आगे चलकर चक्रवर्ती शासन-प्रणाली के रूप में प्रकट हुआ। कौटिल्य ने इसके संबंध में कहा है कि 'सारी भूमि या भारत; देश है। उसमें हिमालय से लेकर समुद्र तक सीधे उत्तर-दक्षिण एक हजार योजन में चक्रवती क्षेत्र है' ( अर्थशास्त्र, पृ० ५९० )। ये शासन प्रणालियाँ भी आगे-आगे बदलती रहीं, किन्तु उन सभी में प्रजा-कल्याण की भावना सदा ही बनी रही।

शासन-व्यवस्था

वैदिक साहित्य में हमें दो प्रकार की राजतंत्रात्मक शासन पद्धतियों के दर्शन होते हैं : नियंत्रित और अनियंत्रित । इन पद्धतियों के स्वामी ( राजा ) का यह दावा रहा है कि उसकी उत्पत्ति दैवी है, जो या तो बिना किसी प्रकार के विरोध के देश पर अधिकार कर लेता था अथवा विरोध को दबाकर बलात् सारे शासन को स्वायत्त कर लेता था। नियंत्रण की दशा में तो वह जनता की रजामंदी से ही जनता पर अधिकार करता था और दूसरी अनियंत्रित दशा में अपने बल द्वारा उस पर काबू करता था। ये दोनों प्रकार की पद्धतियाँ वंशगत थीं। अनियंत्रित राज्य बलपूर्वक भी प्राप्त किया जा सकता है ऐसा विधान हमें अथर्ववेद ( ४।२२ ) में भी देखने को मिलता है। साथ ही वैदिक ग्रन्थों में हमें यह भी देखने को मिलता है कि नियंत्रित राज्यतंत्र में राजा या तो चुना जाता है या स्वीकार किया जाता था। ( देखिए : ऋग्वेद १।२४।८; १०।१७५।१; अथर्ववेद ३।४।२ )।

तत्कालीन गण आधुनिक प्रजातंत्र के स्वरूप थे। उन गणों ( सभा या समूह ) का अध्यक्ष जनता द्वारा निर्वाचित होता था। इस प्रकार के प्राचीन गणों में शाक्य, मल्ल, विज्जी, लिच्छवी, मालव, क्षुद्रक, समवस्ताई, पहला, योधेय, कुनिन्द, शिवि, अर्जुनायन आदि प्रमुख हैं। इन सभी गणों का मुखिया ( राजा ) वंशगत होता था और उनके सार्वजनिक कार्यों का संचालन निर्वाचित सभासदों की एक कमेटी द्वारा संपन्न होता था। इनकी शासनपद्धति राजतंत्रात्मक थी; किन्तु उनकी संघ-व्यवस्था प्रजातंत्रात्मक थी। गौतमबुद्ध के समय तक अस्तित्व में आये गणों का उल्लेख रायस डेविड्स की बुद्धिस्ट इंडिया में किया गया है, जिनके नाम हैं : कपिलवस्तु के शाक्य, सुमसुकमार की

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पहाड़ियों के भाग, अलकप्पा के बुली, केशपट्ट के कलामा, रामगांव के कालया कुशीनगर के मल्ल, पावा के मल्ल, पिप्पलिवन के मौर्य, विमिथा के विदेह और वैशाली के लिच्छवी या विज्जी। इन प्रजातन्त्रात्मक गणराज्यों का संचालन प्रौढ़ों की एक राजसभा, एक सार्वजनिक सभा ( संघ ) और ग्रामीणों की पंचायत द्वारा हुआ करता था। सारे शासन का आधार ग्राम्यसंगठन था। ग्राम का मुखिया ( ग्रामीण ) ही कर के भुगतान तथा ग्राम सम्बन्धी दूसरे शासन-प्रबंधों के लिए उत्तरदायी समझा जाता था। एक प्रबंधक के नियंत्रण में पाँच से दस गाँव तक होते थे। इसे गोप ( जिला ) कहा गया है। इसी प्रकार के चार ग्राम-समूहों ( गोपों ) का समूह-पति होता था, जिसके शासक को स्थानिक और उसके ऊपर का शासक नागरिक नाम से कहा जाता था। नागरिक अर्थात् राजधानी का प्रमुख। इन सबके ऊपर देख-रेख के लिए जिस अधिकारी की नियुक्ति की जाती थी उसको समाहर्ता कहा जाता था। ( अर्थ-शास्त्र, पृ० ९९-१०२ ) ।

शासन-व्यवस्था के प्रसंग में कौटिल्य ने नगर की व्यवस्थापिका सभा ( नगर पालिका ) का बहुत ही विस्तार से वर्णन किया है। उसके छह विभाग बताये गये हैं। प्रत्येक विभाग का संचालन पाँच सदस्यों के हाथ में हुआ करता था। एक विभाग का कार्य कारीगरों ( कलाकारों ) की निगरानी करना था; दूसरे विभाग के हाथ में विदेशियों की देखरेख तथा उनके आवास आदि की व्यवस्था थी; तीसरा विभाग जनगणना, स्वास्थ्य तथा आय-व्यय से संबंधित था; चौथा विभाग मुद्रा तथा विनिमय, तौल, चुंगी, पासपोर्ट आदि का कार्य करता था; पाँचवां विभाग निर्मित वस्तुओं की निगरानी के लिये नियुक्त था; और छठा विभाग केवल कर-वसूली का था।

विभागीय अध्यक्ष : धर्म और शासन के क्षेत्र के कार्य करने वाले जिन प्रमुख विभागीय अध्यक्षों का कौटिल्य ने (अर्थशास्त्र, पृ० ३३) उल्लेख किया है, उनकी सूची डा० जायसवाल ने ( हिन्दू राज्यतंत्र, भाग २; पृ० २६१-२६२ ) इस प्रकार दी है :

१. मंत्री
२. पुरोहित
३. सेनापति—सेना-विभाग का मंत्री
४. युवराज
५. दौवारिक—राजप्रासाद का प्रधान अधिकारी
६. अंतर्वंशिक—राजवंश के गृहकार्यों का प्रधान अधिकारी

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७. प्रशास्तृ या प्रशास्ता—कारागारों का प्रधान अधिकारी ८. समाहर्ता—माल-विभाग का मंत्री ९. सन्निधाता—राजकोष का मंत्री १०. प्रदेष्टा—राजाज्ञाओं का प्रचार करने वाला ११. नायक—सैनिकों का प्रधान अधिकारी १२. पौर—राजधानी का प्रधान शासक १३. व्यावहारिक—न्यायकर्ता, न्यायाधीश १४. कार्मांतिक—खानों और कारखानों आदि का प्रधान अधिकारी १५. सभ्य—मंत्रि-परिषद् का अध्यक्ष १६. दण्डपाल—सेना के निर्वाह का कार्य करने वाला प्रमुख अधिकारी १७. अंतपाल या राष्ट्रांतपाल—सीमाप्रांतों का प्रधान अधिकारी १८. दुर्गपाल—शत्रुओं से देश की रक्षा करने वाला अधिकारी

उक्त अठारह प्रकार के राज्याधिकारियों को कौटिल्य ने तीन भागों में विभक्त किया और उसी क्रम से उनका वेतन निर्धारित किया है । पहिली श्रेणी में मंत्री, पुरोहित, सेनापति और युवराज; दूसरी श्रेणी में दौवारिक, अंतर्वंशिक, प्रशास्तृ, समाहर्ता, सन्निधाता; और तीसरी श्रेणी में प्रदेष्टा, नायक, पौर, व्यावहारिक, कार्मांतिक, सभ्य, दण्डपाल, दुर्गपाल तथा अंतपाल को रखा गया है । इन तीनों श्रेणियों के अधिकारियों का वेतन प्रतिवर्ष क्रमशः ४८००० पण ( रौप्य ), २४००० पण, और १२००० पण निर्धारित किया है ( अर्थशास्त्र, पृ० ४२०-४२२ ) ।

राजदूत

राजनीति के क्षेत्र में राजदूत का आज जो महत्त्वपूर्ण स्थान माना जाता है, प्राचीन भारत में भी उसको ऐसा ही गौरव प्राप्त था । रामायण, महाभारत धर्मशास्त्र और कौटिल्य द्वारा उद्धृत पुरातन अर्थशास्त्रकारों की दृष्टि में राजदूत का एक जैसा प्रतिष्ठित स्थान माना गया है । कुछ आचार्यों ने तो आज की भाँति, राजदूत को, मंत्रि-परिषद् का एक सदस्य स्वीकार किया है । कौटिल्य ने राजदूत को राजा का मुख माना है । ( अर्थशास्त्र, पृ० ५० ) राजा का मुख उसको इसलिये कहा गया है कि अपने राष्ट्र में राजा जैसी व्यवस्था और जैसे नीति-नियम निर्धारित करता है, परराष्ट्र में राजा का वही कार्य राजदूत करता है । परराष्ट्र संबंधी कार्यों में वह राजा का प्रतिनिधि माना जाता है ।

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मनुस्मृति ( ७।६३-६४ ) में राजदूतों की योग्यता के संबंध में कहा गया है कि वह बहुश्रुत आकार तथा चेष्टाओं के विकार से हृदयस्थ भावों को पकड़ने वाला, स्मृतिमान, दर्शनीय, दक्ष, सत्कुलीन, राजभक्त, देश-काल का ज्ञाता, पवित्र आचरण करने वाला, वाग्मी और समस्त शास्त्रों का ज्ञाता होना चाहिए। महाभारत ( शांति० ८५।२८ ) में भी दूत के यही विशेषण गिनाये गये हैं।

राजदूतों को किस ढंग से प्रस्थान करना चाहिये और उनके आचार-व्यवहार के क्या तरीके होने चाहिए, इस संबंध में कौटिल्य ने बड़ी बारीकी से विचार किया है। इस संबंध में उसका कहना है कि प्राणबाधा उपस्थित हो जाने पर भी राजदूत को चाहिये कि वह अपने राजा के संदेश को अविकल रूप में दूसरे राजा के सामने पेश करे। ( अर्थशास्त्र, पृ० ५० )

राजदूत पर जहाँ एक साथ इतनी जिम्मेदारियाँ और प्राणभय तक की भारी विपत्तियाँ निर्भर हैं, वहाँ उसकी सुरक्षा तथा उसके महत्त्वपूर्ण कार्यों को दृष्टि में रखकर उसको कुछ विशेषाधिकार भी दिये गये हैं। सबसे पहिला विशेषाधिकार उसको आत्मरक्षा का दिया गया है। सभी धर्म-शास्त्रकारों और राजनीति के आचार्यों ने एकमत होकर इस बात व्यवस्था दी है कि राजदूत अवध्य है। कौटिल्य ने तो यहाँ तक कहा है कि राजदूत भले ही चांडाल हो, वह अवध्य है, क्योंकि दूत का धर्म अपने मालिक का संदेश पहुँचाना भर है ( अर्थशास्त्र, पृ० ५० )। रामायण में भी कहा गया है कि दूत चाहे साधु हो या असाधु; वह तो दूसरे का भेजा हुआ एवं दूसरे की बात को कहने वाला होता है। इसलिए दूत का वध सर्वथा निषिद्ध है ( रामायण सुन्द० सर्ग ५२ श्लो० १३ )। महाभारत ( शांति० अध्या० ८५, श्लो० २७ ) में तो कहा गया है कि क्षात्रधर्मरत जो राजा सत्यवादी दूत का वध करता है उसके पितर भ्रूण-हत्या के भागी होते हैं।

राजदूत के संबंध में ऐसे नीति-नियम निर्धारित थे, जिनको प्राचीन काल में भी अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति प्राप्त थी। कदाचित् कोई दूत ऐसा महान अपराध कर भी बैठता था, जो वैधानिक दृष्टि से क्षम्य नहीं होता था, तब भी उसको सजा दी जाती थी, प्राणदण्ड नहीं, जैसे कि रावण के अनुरोध पर धर्मवेत्ता विभीषण ने हनूमान के लिए दण्ड निर्धारित किया था।

कौटिल्य ने दूतों की तीन श्रेणियाँ बतायीं हैं : १ निसृष्टार्थ, २ परिमितार्थ और ३ शासनहर ( अर्थशास्त्र, पृ० ४९ )। पहिली श्रेणी के दूतों का प्रमुख कार्य अपने राजा का संदेश ले जाना और अपने राजा के लिये संदेश

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लाना था। उन्हें समयानुसार यह भी अधिकार प्राप्त था कि अपने राजा की कार्यसिद्धि के लिये वे स्वयं भी अपनी ओर से बात-चीत कर सकते हैं । इस श्रेणी के दूतों में अमात्य की सारी योग्यतायें बतायी गयी हैं। दूसरी श्रेणी के परिमितार्थ दूतों के लिये अमात्य की तीन-चौथाई योग्यताएँ निर्धारित की गयी हैं। परिमितार्थ दूत की पहुँच कुछ निर्धारित सीमाओं तक ही रखी गई हैं, जिससे कि उसका ऐसा नामकरण हुआ। तीसरे शासनहर दूतों का एकमात्र कार्य संदेशों का आदान-प्रदान करना था।

गुप्तचर

कौटिल्य की अर्थनीति में गुप्तचरों का स्थान बहुत ऊँचा है। गुप्तचर ( खुफिया विभाग ) का जैसा एकमात्र उद्देश्य आज अपराधों का पता लगाना मात्र माना जाता है, पुराने भारत में इस उद्देश्य को नितांत ही गौण समझा जाता रहा है। वस्तुतः गुप्तचरों की आवश्यकता राजनीति के क्षेत्र में इसलिए आवश्यक प्रतीत हुई जिससे शासक को प्रजा के कष्टों, क्लेशों और पीड़ाओं का पता लग सके । प्रजा की सुख-शांति में बाधा उत्पन्न करने वालों और राजकीय नियमों के पालन करने-कराने में रोक लगाने वालों का दमन कैसे हो, इसकी सूचना राजा तक पहुँचाना, गुप्तचरों का प्रमुख कार्य था।

क्योंकि समाज में अनेक वर्ग और उन वर्गों में भी अनेक उपवर्ग होते हैं। इसलिए, समाज के ओर-छोर तक के छिद्रों का पता लगाने वाले गुप्तचरों के तौर-तरीकों में भी विविधता का होना स्वाभाविक-सा है। इस दृष्टि से कौटिल्य ने कार्य भेद से गुप्तचरों के नौ विभाग किये हैं, जिनके नाम हैं : ( १ ) कापटिक, ( २ ) उदास्थित, ( ३ ) गृहपतिक, ( ४ ) वैदेहक, ( ५ ) तापस, ( ६ ) सत्री, ( ७ ) तीक्ष्ण, ( ८ ) रसद और ( ६ ) भिक्षुकी।

राज्य की सुव्यवस्था, शासन का पूर्णतया पालन और प्रजा की सुख-शांति का बहुत-कुछ दायित्व गुप्तचरों पर निर्भर है। ऊपर जिन नौ प्रकार के गुप्तचरों का निर्देश किया गया है, उनकी कार्य-विधि और उनके पारस्परिक सहयोग का ढंग कैसा होना चाहिए, इसका विस्तार से विवेचन एक पूरे प्रकरण में किया गया है।

इन गुप्तचरों के कार्यों का अध्ययन करने के बाद हमें पता लगता है कि प्राचीन भारत की शासन-व्यवस्था का यह गुप्तचर-विभाग कितना उपयोगी और ठोस था। उनका संगठन, उनके गुप्त रहस्य और उनकी संकेत-प्रणाली इतनी जटिल, किन्तु इतनी व्यवस्थित थी कि उस समय की अन्तरराष्ट्रीय

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राजनीति के किस हिस्से में क्या हो रहा है, इसका ज्ञान राजा की गुप्तचरों के द्वारा ही प्राप्त होता था ।

पुर और जनपद की स्थापना

शासन-व्यवस्था और सुख-सुविधा की दृष्टि से कौटिल्य ने समग्र राष्ट्र को दो भागों में विभक्त किया है : पुर और जनपद । पुर से उनका अभिप्राय नगर, दुर्ग या राजधानी से और जनपद से शेष सारे राष्ट्र से है । राज्य की सात प्रकृतियों में जनपद और दुर्ग ( पुर ) को इसीलिए अलग-अलग माना गया है ।

पुर ( राजधानी ) के प्रमुख अधिकारी को नागरिक कहा गया है और उसी प्रकार जनपद की शासन-व्यवस्था का दायित्व समाहर्ता पर निर्भर किया है ( अर्थशास्त्र, पृ० ९९ ) । राजधानी में शांति-सुरक्षा बनी रहे, इसके लिए कौटिल्य ने नगर में प्रवेश करने वाले नवागंतुक व्यक्तियों की देख-रेख, नगर-रक्षकों की व्यवस्था, संदिग्ध व्यक्तियों पर निगरानी, अग्निभय की रक्षा का प्रबन्ध, और नगरवासियों के स्वास्थ्य-लाभ के लिए यथोचित व्यवस्था आदि जितनी भी आवश्यक बातें हैं सबको ध्यान में रखा है ।

जनपद की स्थापना किस प्रकार की जानी चाहिए, इस संबन्ध में कौटिल्य ने विस्तार से प्रकाश डाला है । जनपद की सबसे छोटी बस्ती को ग्राम और दस ग्रामों के संघटन से संग्रहण नामक राजकीय कार्यालय की स्थापना का निर्देश किया है ( अर्थशास्त्र, पृ० ७७ ) । दस-दस ग्रामों के उक्त क्रम से दो सौ ग्रामों का संघटन करके एक क्षेत्र का निर्माण और उसमें खार्वटक नाम की बस्ती ( शासन स्थान ) बसाये जाने की व्यवस्था दी गई है ( अर्थशास्त्र, ७७ ) । फिर चार-सौ गाँवों का संघटन कर उनके शासन के लिए द्रोणमुख की स्थापना होनी चाहिए ( अर्थशास्त्र, ७७ ) । फिर आठ-सौ गांवों के बीच पूर्वोक्त विधि से स्थानीय नामक राजकीय कार्यालय को स्थापित करना चाहिए ( अर्थशास्त्र, ७७ ) । इसी प्रकार जनपद के सीमान्त पर अंतपालों की संरक्षता में दुर्गों का निर्माण करना चाहिए, जिनसे कि जनपद में शत्रुओं को न आने दिया जाय ( अर्थशास्त्र, पृ० ८५ ) । जनपद की कुछ अंतपाल रहित सीमाओं पर व्याध, शबर, पुलिंद, चाण्डाल और अन्य वनचर जातियों को बसा कर वहाँ की सुरक्षा का भार उन्हीं को सौंप देना चाहिए (अर्थशास्त्र, पृ० ७७) ।

जनपद को ऐसी भूमि में बसाया जाना चाहिए जहां नदियां, पर्वत, वन

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हों; जहाँ अल्पश्रम से ही अधिक उपज की प्राप्ति हो; जहाँ अच्छी-अच्छी खानें, हाथियों के जंगल हों; जहाँ की जलवायु नागरिकों के स्वास्थ्यलाभ के लिए उपयोगी सिद्ध हो; जहाँ तरह-तरह के पशु हों; जहाँ परिश्रमी किसान हों; जहाँ की प्रजा दण्ड तथा कर को सहन करने की क्षमता रखती हो । कौटिल्य ने इसको उत्तम जनपद कहा है ( अर्थशास्त्र, पृ० ७७–८१ ) ।

दण्ड : समाज के सभी वर्ग, अथ च, समस्त प्रजा अपने-अपने धर्मपालन में एकनिष्ठ रहे, इसकी देख-रेख का सारा दायित्व राजा पर निर्भर है । अपने-अपने धर्मों का सम्यक् पालन प्रजाजन तभी कर सकते हैं जब उन्हें अपने अधिकारों को भोगने और अपने कर्तव्यों को निबाहने के लिए पूरी सुविधायें प्राप्त हों । समाज निर्बाधित रूप में अपने-अपने धर्मों ( कर्तव्यों ) के प्रति निष्ठावान् बना रहे, उसको उसके अधिकारों की पूरी सुविधायें सुलभ होती रहें, इसी हेतु न्याय की आवश्यकता हुई ।

कौटिल्य जैसे प्रकाण्ड राजनीतिज्ञ ने, जिसके जीवन का अधिकांश भाग राजनीति के क्षेत्र में क्रियात्मक रूप से बीता, न्याय की दिशा में बहुत ही बारीकी से विचार किया है । न्याय-व्यवस्था को उसने दो भागों में बाँटा है : ( १ ) व्यवहार और ( २ ) कण्टकशोधन ।

नागरिकों के पारस्परिक कलहों के मूल कारणों का पता लगाकर उनकी विवेचना करना और तब निरपेक्ष होकर दोषी को दण्ड तथा निर्दोषी को मुक्ति देना, कौटिल्य की न्याय-स्थापना का यह पहिला व्यवहार पक्ष है । न्याय-व्यवस्था के दूसरे पक्ष का संबंध राज-कर्मचारियों से है; किन्तु उसके अन्तर्गत पूंजीपति और दुर्जन लोगों का भी समावेश किया गया है । अर्थात् राजकर्मचारियों, व्यवसायियों और दुर्जनों से प्रजा की किस प्रकार रक्षा की जाय, इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कण्टकशोधन नामक न्याय के दूसरे पक्ष की स्थापना की गयी है ।

न्याय-व्यवस्था के लिए कौटिल्य ने जिस व्यवहार शब्द का प्रयोग किया है वह बहुत ही उपयुक्त बैठता है । आचार्य कात्यायन ने व्यवहार शब्द की निष्पत्ति करते हुए लिखा है वि=नानार्थ; अव=संदेह; और हार=हरण । इस नानार्थ संदेह के हरण याने दूर करने के उपायों का दिग्दर्शन ही व्यवहार के अंतर्गत किया है । कौटिल्य के अर्थशास्त्र ( पृ० २५५–२६० ) में अपने प्रकार के व्यवहार-मार्गों पर बड़ी सूक्ष्मता से विचार किया गया है ।

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कण्टकशोधन के लिए कौटिल्य ने जो व्यवस्था दी है उससे ऐसा अवगत होता है कि समाज में छोटे-से-छोटे छिद्रों और नितांत परोक्ष रूप में घटित होने वाले शोषणों का उसने बड़ी बारीकी से अध्ययन किया था। इन कण्टकों की तीन प्रमुख श्रेणियाँ बतायी गयी हैं। पहिली श्रेणी में तो कर्मकार ( व्यवसायी ), जैसे धोबी, जुलाहे, सुनार, वैद्य, दूसरी श्रेणी में प्रजा को पीड़ित करने वाले दुष्ट जन और तीसरी श्रेणी में राजकर्मचारियों की लूट-खसोट, गबन तथा कूटकर्म आदि के लिए व्यवस्था दी गयी है।

न्याय की अवस्थिति दण्ड पर निर्भर है। इस हेतु वृहद् धर्मस्थ अधिकरण में कौटिल्य ने दण्ड-व्यवस्था पर विस्तार से प्रकाश डाला है। कौटिल्य की दण्ड-व्यवस्था को पढ़ कर उसकी तत्त्वग्राही बुद्धि का परिचय तो मिलता है, किन्तु इस उद्देश्य के प्रतिपादन में उसने इतना अधिक समय लगा दिया कि उसके द्वारा कल्पित उस निष्कण्टक साम्राज्य की सत्यता पर पाठक को संदेह होने लगता है और दण्ड-ही-दण्ड की एकांत व्यवस्था से वह भयभीत भी हो उठता है।

कौटिल्य की दण्ड-व्यवस्था के प्रमुख तीन अंग हैं : अर्थदण्ड, शरीरदण्ड और कारागारदण्ड। इनमें भी विकल्प दिये गये हैं। दण्ड का पहिला सिद्धांत अपराध पर आधारित है। जैसा अपराध वैसा दण्ड। फिर अपराधी के सामर्थ्य के अनुसार, अपराधी के ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि वर्ण के अनुसार, अपराधी की विशेष परिस्थिति के अनुसार, अनेक ढंगों पर दण्ड को निर्धारित किया गया है।

अपराधियों के सुधार और बंदीगृहों की सुव्यवस्था पर भी कौटिल्य ने विचार किया है। बंदी बनाये गये स्त्री-पुरुषों के लिए ऐसे अनेक कार्य सुझाये गये हैं, जिनको सीख लेने के बाद कारामुक्त होने पर वे लाभदायी सिद्ध हो सकें, और अपराध की जो सबसे बड़ी समस्या रोजी-रोटी की रही है, उसकी पूर्ति हो सके।

कौटिल्य का विचार है कि प्रत्येक मनुष्य अरिषड्वर्ग से पराभूत है, इसलिए उसका सर्वदा निर्लिप्त, निर्दोष बना रहना संभव नहीं है। काम, क्रोध, लोभ, मान, मद और हर्ष ये छहों शत्रु न जाने कब मनुष्य को उद्वेलित करके उसको अधर्म तथा दुराचरण की ओर ले जाते हैं। यदि ऐसी स्थिति आ गयी तो निश्चय ही समाज में मत्स्यन्याय फैल जायेगा, अर्थात् बलवान् निर्बल को निगल जायेगा। ( अर्थशास्त्र, पृ० १६ )

इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर दण्ड की व्यवस्था की गयी है।

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प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने धर्म ( कर्तव्य ) का पालन करे और सदाचार में प्रवृत्त रहे, कौटिल्य की व्यवस्था का यह प्रमुख उद्देश्य है, किन्तु धर्म और सदाचार की अवरोधक प्रवृत्तियों का दमन कैसे संभव हो, इसके लिए दण्ड की व्यवस्था की गयी। कौटिल्य की यह दण्ड-व्यवस्था बहुत ही वैज्ञानिक है। जिस रूप में कि मनुष्य का धर्म बना रहे और समाज में लोक कल्याण के आदर्श प्रतिष्ठित रहें, वैसे विधान से दण्ड की व्यवस्था की गयी है। इस संबंध में कौटिल्य का अभिमत है कि अपराधियों के लिए ऐसा दण्ड निर्धारित होना चाहिए जो कि उद्वेगकर न हो, मृत्युदण्ड से प्रजा दण्ड देने वाले का ही तिरस्कार करने लगती है, उचित दण्ड ही कल्याणकर होता है, भली-भाँति विचार करके निर्धारित किया गया दण्ड प्रजा को धर्म, अर्थ और काम में लगाये रखता है, ईर्ष्या, द्वेष और अज्ञान के द्वारा अविचारित दण्ड जीवनमुक्त वानप्रस्थों और परिव्राजकों तक को कुपित कर देता है, फिर भला गृहस्थ लोगों के संबंध में तो उसकी कल्पना करना भी भयावह है। ( अर्थशास्त्र, पृ० १३ )

कौटिल्य के मतानुसार दण्ड का बहुत बड़ा स्थान है, क्योंकि आन्वीक्षकी, त्रयी, वार्ता और दण्ड, इन चारों विद्याओं में दण्डनीति ही एक ऐसी बलवती विद्या है, जिसके द्वारा शेष तीनों विद्याओं का सुविधापूर्वक संचालन किया जा सकता है। ( अर्थशास्त्र, १२ ) वस्तुतः कौटिल्य की दण्ड-व्यवस्था की योजना का संपूर्ण आधार लोककल्याण और लोकरक्षा के निमित्त जान पड़ता है।

वर्णाश्रम व्यवस्था

प्राचीन ग्रंथों का अनुशीलन करने पर हमें तत्कालीन जन-समुदाय तीन प्रमुख वर्गों में विभक्त हुआ मिलता है : क्षत्र ( योद्धा ), ब्रह्मन् ( पुरोहित ) और विश ( श्रमिक )। क्षत्र लोग समाज के नेता, शासक, राजा एवं सरदार रहे, ब्रह्मन् अपनी बौद्धिक शक्ति के कारण राजा के सचिव, न्यायाधीश तथा धार्मिक नेता या अनुशासक के पदों पर अधिष्ठित थे, और विश वर्ग के लोग कृषक, व्यापारी के रूप में व्यापार, वाणिज्य एवं उद्योग-धंधों के द्वारा संपत्ति का उपार्जन करते रहे। जन-समूह का यह त्रिविध वर्ग-भेद जब तक श्रम-विभाजन की दृष्टि से अपने कर्तव्यों में ईमानदार बना रहा तब तक तो उसने अच्छी उन्नति की, किन्तु जब वह अधिकार-लिप्सु तथा शोषक बन कर शेष समाज की उपेक्षा करने लगा तो स्वभावतः उसके पतन की भूमिका तैयार होने लगी थी। उनकी इन पतनोन्मुख स्थितियों एवं प्रवृत्तियों पर प्रकाश

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डालने से पूर्व यहां भारत की कुछ प्राचीन आदिम मूल जातियों का उल्लेख करना आवश्यक समझा जा रहा है ।

ऋग्वेद ( ५।७८।१२९।३, ६।४६।७ ) में जिन पांच भूमियों (पंच-क्षिति) का उल्लेख किया गया है, वे पांच भूमियां वस्तुतः उन पांच नदियों के आस-पास की भूमियां थीं, जिनके कारण पंचनद का नाम इतिहास में देखने को मिलता है । इन पांच भूमियों में बसने वाले एक ही स्तर के लोग धीरे-धीरे पांच विभिन्न जातियों में ( पंचजन, ऋक् ६।११।४, ६।५१।११, ७।३२।३२, ९।६५।३२ ) में बंट गयीं, जिनकी आजीविका खेती थी और इसीलिये जिन्हें पांच कृषि-जीवियों ( पंच कृषिवी : ऋक्० २।२।१०, ४।३८।१०।२ ) के नाम से स्मरण किया गया । ये पांच जातियां आरंभ में बड़ी उद्योगी थीं और नदियों के उर्वर तटों पर कृषि एवं चरागाह के द्वारा जीविकोपार्जन किया करती थीं, इन्हीं के द्वारा हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक की व्यापक सभ्यता का निर्माण हुआ ( मैक्समूलर : इंडिया : ह्वाट कैन इट टीच अस, पृ० ९५-९६-१८९९ ) । पांच आर्य परिवारों के परिचायक पुरुष, तुर्वस्, वेदस्, अनुस् और द्रुह्यस्, इन्हीं पांच जातियों के प्रतीक थे ।

ये पांच जातियां अपने व्यावसायिक विभेदों के कारण पांच वर्णों में विभक्त हो गये थे, जिनके नाम थे : भंन्त्री, योद्धा, व्यापारी, दास और काले चमड़े वाले । लम्बी अवधि तक इन जातियों के बीच अंतर्जातीय विवाह और सहभोज की स्थिति बनी रही । किन्तु काले चमड़े वाले आर्यों ने जब यहां के मूल निवासी दस्युओं ( दासों ) के साथ सेवक भावना का आचरण करना आरंभ किया और वंश, जन्म, जाति आदि की प्रमुखता स्वीकार की जाने लगी तो सहभोज तथा अंतर्जातीय विवाहों की परंपरा तो जाती ही रही, वरन् उनके बीच गहरी खाई भी पड़ने लग गयी थी ।

ऐसा प्रतीत होता है कि जातियों के जन्मना निर्णय करने का सिद्धांत पुराणकाल तक स्वीकृत नहीं हुआ था ( विष्णुपुराण, खंड ३ अध्याय ८ ) । जातक कथाओं ( उद्दालक ४।२९३, चाण्डाल ४।३८८, सतक्लम्म २।८२, चित्तसंभूत ४।३९० ) तथा अन्य बौद्ध ग्रंथों ( जे० आर० ए० एस० पृ० ३४६, १८६४ ) से यह बात स्पष्ट होती है कि जातियों की उच्चता तथा निम्नता का निर्णय बौद्धिक क्षमता के आधार पर था । उदाहरण के लिये विश्वामित्र ने क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर भी अपने उन्नत कर्मों और ऊंची प्रतिभा के कारण ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया था । लेकिन चारों वर्णों की भिन्नता का

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सिद्धांत बहुत पहिले ही से चला आ रहा था ( आर० सी० मजूमदार : कार-पोरेट लाइफ इन ऐंशिअंट इण्डिया, पृ० ३६४ ) ।

अपनी चतुराई और बुद्धि के प्रभाव से ब्राह्मणों ने धार्मिक तथा सामा-जिक क्षेत्र में श्रेष्ठता प्राप्त कर ली थी । यद्यपि वे शासक नहीं रहे, फिर भी पुरोहितों, सचिवों, न्यायाधीशों के सारे शासन-संचालन संबंधी अधिकार उन्हें प्राप्त थे और उन्होंने ही चारों वर्गों के लिए एवं आश्रम संबंधी व्यवस्था के लिए नियम भी बनाये ।

श्रम के इस वंशगत विभाजन के कारण समाज में अनेक जातियां पनपने लगीं थीं। भारत की पुरातन समाज-व्यवस्था में हमें देखने को मिलता है कि राजनीतिक दृष्टि से भले ही उसने अनेक पराजयों को देखा था, किन्तु घोर आपत्ति और कठिन संकट में भी एकता की भावना को उसने खोया नहीं। अनेक श्रेणियों, वर्गों, वर्णों, जातियों, भाषाओं और धर्मों के बावजूद भी भारतीय जनता की नैतिक तथा बौद्धिक शक्ति कभी भी क्षीण नहीं हुई।

कौटिल्य ने वर्णाश्रम की व्यवस्था से मर्यादित समाज को सुखकर और मुक्तिदायी बताया है। यह मर्यादित वर्णाश्रम-व्यवस्था अपने-अपने धर्म के पालन में बतायी गयी है (अर्थशास्त्र, पृ० १३) ।

वर्णाश्रम की व्यवस्था का महत्त्व हिन्दू समाज में लगभग अनादि है। प्राचीन भारत में व्यष्टि और समष्टि के क्रिया-क्षेत्रों को एक दूसरे से भिन्न माना गया है; किन्तु उनकी पूर्णता पारस्परिक समन्वय में ही बतायी गयी है। कुछ व्यक्तिगत नियम ऐसे हैं, जिनका पालन करके या जिनको जीवन में उतार कर व्यक्ति अपना उत्थान कर स्वयं को इस योग्य बना पाता है कि वह दूसरे का या सारे मानव समाज का उत्थान कर सके। व्यक्ति और समष्टि के उत्थान हेतु प्राचीन भारत में जो नियम-निर्देश निर्धारित किये गये थे, उन्हीं को वर्णा-श्रम नाम दिया गया।

वर्ण-व्यवस्था का उद्देश्य व्यक्ति को सामूहिक हित-चिंतना की ओर ले जाता है, जब कि आश्रम-व्यवस्था उसको व्यक्तिगत उन्नयन की ओर आकर्षित करती है, जिससे कि तप तथा त्याग के द्वारा वह अपने कलुषों एवं असन्तोषों को भस्म कर स्वयं को इस योग्य बना पाता है कि समाज के अभ्युदय में वह उपयोगी सिद्ध हो सके।

वर्णाश्रम-व्यवस्था की इसी मर्यादा को कौटिल्य ने अपनाया है और उसी के कल्याणमय स्वरूप को उन्होंने यों रखा है।

४ कौ० भू०

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गृहस्थ-जीवन के दायित्व से निवृत्ति प्राप्त करने के संबंध में हमारे पूर्वाचार्यों ने विशेष नियम निर्धारित किये हैं। सामान्यतया गृहस्थ जीवन के कर्तव्यों से ५० वर्ष की आयु के बाद छुटकारा पाया जा सकता है; किन्तु उससे पूर्व कुछ अनिवार्य शर्तों को पूरा करना आवश्यक बताया गया है। मनु (६।१) ने कहा है कि 'द्विज को चाहिए कि दृढ़ प्रतिज्ञ होकर इन्द्रियों को वश में करके वह वन में निवास करे।' साथ ही उसने अवकाश ग्रहण करने के संबंध में कहा है (६।२) कि 'जब शरीर की त्वचा में सिकुड़न पड़ जाय और वाल फूलने लगें, तब उस व्यक्ति को गृहस्थ से अवकाश ले लेना चाहिए।' (अर्थशास्त्र, पृ० ८०) ने कहा है कि 'जो व्यक्ति मैथुन-भोग्य-अवस्था को पार कर जाता है, वह अपनी संपत्ति का सम्यक् वितरण करके साधु हो सकता है।'

संन्यास या वानप्रस्थ-जीवन ग्रहण करने से पूर्व एक बात यह भी कही गई है कि जब तक कोई व्यक्ति अपने पुत्र के पुत्र को नहीं देख लेता, वह अवकाश ग्रहण करने का अधिकारी नहीं है। इसका आशय यह है कि अवकाश ग्रहण करने से पूर्व प्रत्येक व्यक्ति को अपने पुत्र को इस योग्य बना देना चाहिए कि वह परिवार और समाज की भलाई के लिए गृहस्थ के कर्त्तव्यों का भार वहन के सर्वथा योग्य हो सके। कौटिल्य ने इस शर्त का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों को अपराधी घोषित किया है और कहा है 'यदि कोई व्यक्ति अपनी पत्नी और अपने पुत्रों के भरण-पोषण का प्रबंध किये बिना तपस्वी का जीवन ग्रहण कर लेता है तो वह दण्ड का भागी है।'

समाज और परिवार की उन्नति को दृष्टि में रखकर अपने कर्तव्यों का पूरी तरह निर्वाह करता हुआ प्रत्येक व्यक्ति वानप्रस्थ और उसके बाद पवित्र संन्यास-जीवन धारण कर सकता है। हिन्दुओं की धर्म-व्यवस्था में वैयक्तिक आत्मोन्नति की कामना करने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह आवश्यक बताया गया है कि पहिले वह नैतिक, पारिवारिक और सामाजिक जीवन की मंजिलों को क्रमशः पार कर उसके बाद वानप्रस्थ या संन्यास का ऊँचा जीवन बिता सकता है।

समाज की अभ्युन्नति और जीवन में सदाचार एवं नैतिकता बनाये रखने के लिए हिन्दुओं की धर्म-व्यवस्था में आदि से ही विवाह को एक श्रेष्ठ आदर्श के रूप में ग्रहण किया गया है। हिन्दुओं के धर्मग्रन्थों में विवाह के लिए भिन्न गोत्र की व्यवस्था पर बड़ा जोर दिया गया है, जिसके फलस्वरूप पति और

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पत्नी के विभिन्न रक्तों ( गोत्रों ) का संमिश्रण होकर अच्छी संतति को पैदा किया जा सके। इस व्यवस्था ने समाज में विभिन्न परिवारों को संघटित करने में बड़ी सहायता की। विवाह के लिए सम-स्वभाव के दम्पती को ही आवश्यक बताया गया है। सम-स्वभाव अर्थात् ऐसे परिवार जो व्यवसाय, आर्थिकस्तर, धर्म और विचारों में एकता रखते हों। एकता की इसी भावना ने पहिले तो विच्छिन्न व्यक्ति-समूहों को कुछ विशिष्ट जातियों में एकत्र किया और बाद में भी उन्हीं संघटित जातियों के द्वारा वृहद् राष्ट्र की नींव पड़ी।

न्याय और व्यवस्था

प्राचीन भारत की राज्य-व्यवस्था में धर्म का सर्वोच्च स्थान रहा है। समाज के सभी वर्ग और सारी कार्य-प्रणाली के मूल में धर्म के नीति-निर्देश समन्वित थे। समाज का सबसे बड़ा व्यवस्थापक राजा भी धर्म के बन्धन से इस प्रकार बंधा था कि इस दिशा में कोई संस्कार-संशोधन करने का उसे कोई अधिकार ही नहीं था। धर्मसूत्रों और मनुस्मृति आदि ग्रन्थों में राजा को धर्म का ही एक अंग माना गया है। हिन्दू राज्य-व्यवस्था में जिस युग में राजा को सभी अधिकार प्राप्त थे तब भी राजा से धर्म को उच्च स्थान प्राप्त था। मनुस्मृति में तो राजा को अर्थदण्ड देने तक की बात कही गई है ( ८।३३६ )। अर्थशास्त्र में तो राजा को इतनी छूट दी गई है कि वह कानून बना सकता है; किन्तु धर्मशास्त्र में वह बात भी नहीं है। अर्थशास्त्र (अर्थशास्त्र, पृ० २५९) में साथ ही यह भी कहा गया है कि राजा ऐसा कानून नहीं बना सकता है जो धर्म के विरुद्ध हो और जिससे राजा को मनमाना अधिकार प्राप्त हो सके।

प्राचीन भारत में, जब कि हिन्दू-शासन-प्रणाली सर्वथा एक राजत्व पर आधारित थी, न्याय-विभाग, शासन-विभाग से अलग रखा जाता था। उस समय राजनीति के प्रकाण्ड विद्वान् तथा श्रेष्ठ नैतिक आचरण वाले पुरोहित, राजनीतिज्ञ और ब्राह्मण लोग मंत्री नियुक्त किये जाते थे और वही न्यायाधीश भी हुआ करते थे। धर्म-संबंधी सारी शासन-व्यवस्था पुरोहितों के हाथ में थी। उस पुरोहित न्यायाधीश पर राजा का कोई अंकुश नहीं होता था।

इस प्रकार की कानूनी अदालत का नाम सभा था, जिसमें न्यायाधीशों की सहायता के लिए समाज के लोगों की एक स्वतन्त्र संस्था भी हुआ करती थी। मनु के मतानुसार तीन पंच, न्यायाधीशों की सहायता के लिए हुआ करते थे (मनुस्मृति ८।१०) और जो कानून पारित किया जाता था, उसका ठीक

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तरह से अर्थ बताने के लिए एक विद्वान् ब्राह्मण हुआ करता था ( ७।२० )। किन्तु कौटिल्य ने लिखा है कि न्याय-व्यवस्था का सारा भार राज्य के अर्थ-शास्त्रविद् तीन सदस्यों और तीन अमात्यों के ऊपर निर्भर होना चाहिए।

मुकदमों की निष्पक्ष जांच हो और न्याय की दिशा में किसी प्रकार का दोष न आने पावे, इसका निरीक्षण करने के लिए वृद्धों की व्यवस्था थी। ये वृद्ध आजकल के ज्यूरियों जैसे थे। इस प्रकार के लगभग ७, ५ या ३ ज्यूरी होते थे (शुक्रनीतिसार ४।५।३६-३७)। राजा अपनी परिषद् के साथ मुकदमा सुनता था, जिसमें प्रधान न्यायाधीश भी हुआ करते थे। किसी भी मामले की अपील करने के लिए उच्च न्यायालय होता था (नारद, प्रस्ता० १।७; वृहस्पति १।२९; याज्ञवल्क्य २।३०)। जिन मुकदमों को राजा सुनता था, उनका फैसला वह अपनी परिषद् तथा जजों के परामर्श से करता था। सभी न्यायों का निर्णय राजा के नाम से होता था।

उच्च न्यायालय के सर्वप्रधान न्यायाधीश को प्राड्विवाक कहा जाता था। वही न्याय-विभाग का मंत्री भी हुआ करता था। धर्मशास्त्र विभाग का अलग मंत्री था, जिसको पंडित ( धर्माधिकारी ) कहा जाता था। दोनों के कार्य अलग-अलग थे। न्याय की दिशा में प्राड्विवाक का कार्य ज्यूरी का बहुमत जानकर धर्म या कानून के अनुसार यह बतलाना होता था कि अभियुक्त वास्तव में दोषी है कि नहीं, और तब उसके बाद राजा को परामर्श देना था। 'पंडित' या धर्माधिकारी का यह कार्य होता था कि लोक में जन-जन धर्मों का व्यवहार किया जा रहा है, वे धर्मशास्त्रसंमत हैं या नहीं और तब राजा से वह ऐसे कानून बनवाने की सिफारिश करता था जो लोक को हितकारी सिद्ध हों।

इस प्रकार न्याय और व्यवस्था की दृष्टि से राजा सर्वदा ही प्राड्विवाक और धर्माधिकारी के अधीन हुआ करता था। समाज में जहाँ भी जिस दिशा में ऐसी आशंका होती कि धर्म और न्याय के द्वारा निर्दिष्ट नियमों का पालन नहीं हो रहा है, वहाँ के लिये वह प्रजा को इस बात के लिए सावधान करता था कि वह प्राड्विवाक तथा धर्माधिकारी की आज्ञाओं पर चले।

न्याय-व्यवस्था की शरण में जाने या मुकदमों के लिए मनु ने १८ कारण गिनाये हैं ( मनुस्मृति ८।४-७ ) जिनके नाम हैं : ऋण और धरोहर का भुगतान न करना; बिना स्वामित्व का विक्रय करना; साझीदारों के संबंध में गड़बड़ी हो जाना; दान दी हुई वस्तु को पुनः वापिस लेना; पारिश्रमिक का

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भुगतान न करना; समझौतों को भंग करना; क्रय-विक्रय की व्यवस्था का उल्लंघन करना; स्वामी तथा भृत्य के बीच विवाद पैदा होना; सीमा संबंधी अड़चन का उपस्थित होना; किसी को मारना; किसी का अपमान करना; किसी की चोरी करना; हिसा तथा व्यभिचार करना; वैयक्तिक कर्तव्यों को न निभाना; पैतृक सम्पत्ति के बँटवारे में मतभेद हो जाना; और जुआ तथा पांसा आदि खेलना ।

इस प्रकार के किसी भी विवाद के उपस्थित हो जाने पर कौटिल्य का कहना है कि न्यायाधीश को चाहिये कि वह किसी भी वादी-प्रतिवादी को न धमकाये; या अपमान करे; या न्यायालय से बाहर निकाले । किसी मामले में व्यक्तिगत दबाव नहीं डालना चाहिए । मुकदमे का लेखक वादी-प्रतिवादी के बयानों में न तो अस्पष्ट बयानों को टाले और न ही स्पष्ट कही हुई बातों को अन्यथा या संदिग्ध रूप में लिखे । प्रधान न्यायाधीश का कर्तव्य था कि वह प्रत्येक निर्णीत मुकदमे का पुनर्निरीक्षण करे और उसके सभी पहलुओं को अच्छी तरह से देखे । न्याय की प्रभावशाली व्यवस्था का परिचय हमें कौटिल्य के उस वाक्य से मिलता है, जिसमें लिखा गया है कि "जब राजा किसी निरपराध व्यक्ति को दण्ड देता है तो उस किये गये अर्थदण्ड का तीस गुना द्रव्य राजा को वरुण देवता के निमित्त जल में फेंकना पड़ता है, जो कि बाद में ब्राह्मणों में बाँट दिया जाता है ( अर्थशास्त्र, पृ० ४०२ ) । इससे पता चलता है कि पूरी सावधानी रखने के बावजूद भी न्याय में त्रुटि रह जाने की संभावना थी और राजा तक उस सर्वोच्च न्याय-व्यवस्था से नियमित था । अर्थशास्त्र में उद्धृत अपराधों और अपराधियों की सूची को देखकर पता चलता है कि न्याय की दिशा में कौटिल्य के विचार कितने परिष्कृत और कितने ठोस थे ।

कौटिल्य की कानून-व्यवस्था के अनुसार राज्य के सभी व्यक्ति एकसमान माने गये हैं । यहाँ तक कि जिस ब्राह्मण के प्रति पक्षपात का दोषारोपण किया जाता है, अपराध के आगे वह भी अन्य जातियों के समान दण्डभागी माना गया है । स्वयं राजा के लिये दण्ड-व्यवस्था निर्धारित करके कौटिल्य की न्याय-व्यवस्था में जनतन्त्र की भावना को सर्वोपरि स्वीकार किया गया है । एक सामाजिक व्यक्ति का परिवार के प्रति, माता-पिता, पति-पत्नी, पुत्र, शासक, शासित, नौकर, श्रमिक, व्यापारी, कलाकार, धोबी, ग्वाला और ग्राहक आदि के प्रति क्या कर्तव्य है, इसकी भी व्यापक व्याख्या कौटिल्य ने की है ।

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बलात्कार, व्यभिचार जैसे सामाजिक तथा नैतिक पतन के कार्यों के लिए कौटिल्य ने कठोर दण्ड निर्धारित किये हैं। चरित्र सम्बन्धी ऊँचाई के लिए कौटिल्य की न्याय-व्यवस्था बड़ी ही उपयोगी है।

राज्य की आर्थिक आय के साधन

कौटिल्य की साम्राज्य-व्यवस्था का आर्थिक ढाँचा औद्योगिक आधार-भूमि पर खड़ा है। कौटिल्य की अर्थ-नीति के प्रमुख सिद्धान्त तीन हैं। पहिले सिद्धांत के अन्तर्गत ऐसे उद्योगों ( Industries ) को रखा गया है, जिन पर राज्य का स्वामित्व हो और जो राज्य के द्वारा ही संचालित एवं संघटित हों। इन उद्योगों की पूंजी ( Capital ), श्रम ( Labour ) और प्रबन्ध ( Management ) का दायित्व राज्य पर ही निर्भर रहे। इस प्रकार की औद्योगिक अर्थनीति का परोक्ष उद्देश्य एक सशक्त, आत्म-निर्भर और सर्वसाधनसंपन्न राज्य की प्रतिष्ठा करना था। इस प्रकार के महत्त्वपूर्ण उद्योगों ( Key Industries ) में सोना, चाँदी, शिलाजीत, ताँबा, शीशा, टिन, लोहा, मणि, लवण आदि आकर उद्योगों ( Industry of mines ) का प्रमुख स्थान है।

दूसरे प्रकार के उद्योगों का सम्बन्ध जनता से है। इस श्रेणी के उद्योग राज्य के नागरिकों की निजी सम्पत्ति ( Private Property ) के रूप में माने गये हैं। उनके संघटन, संचालन और पूंजी, श्रम एवं प्रबन्ध का दायित्व भी नागरिकों पर ही निर्भर है। उन पर जनता का ही पूर्ण स्वामित्व है। ऐसे उद्योगों में खेती, सूत, शिल्प, गो-पालन, अश्व-पालन, हस्ति-पालन, सुरा, मांस, वेश्यालय और नट-नर्तक गायक-वादक आदि की गणना की जा सकती है।

कौटिल्य की अर्थनीति का तीसरा सिद्धांत समाज में ऐसी सुव्यवस्था बनाये रखने से संबद्ध है, जिसके अनुसार राज्य के समस्त उत्पादन ( Production ), वितरण ( Distribution ) और उपभोग ( Consumption ) पर शासन-सत्ता का नियन्त्रण बना रहेगा।

उक्त सभी उद्योगों तथा व्यवसायों पर राज्य का स्वामित्व ( State Ownership ) इसलिए माना गया है कि राज्य का अर्थबल सशक्त बना रहे और समाज के सभी वर्ग क्रियाशील बने रहें।

धर्म-दर्शन, काव्य, कला और अर्थ आदि साहित्य के जितने भी अंग हैं, उनमें धर्म-अर्थ-काम एवं मोक्ष, इस वर्गचतुष्टय की उपयोगिता पर अनेक प्रकार से विचार किया गया है। अर्थशास्त्र, क्योंकि ऐहिक जीवन से संबद्ध क्रिया व्यापारों की ही विवेचना प्रस्तुत करता है, अतः उसमें मोक्ष को छोड़कर

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त्रिवर्ग के संबंध में ही प्रकाश डाला गया है। धर्म, अर्थ और काम, इन तीनों का पारस्परिक संबंध बताते हुए कौटिल्य ने यह स्वीकार किया है कि उनमें प्रमुखता अर्थ की है और शेष दोनों धर्म तथा काम, अर्थ पर ही निर्भर हैं। इसी लिए त्रिवर्ग की समुचित उपलब्धि के लिए अर्थ की अनिवार्यता को स्वीकार किया गया है। यही अर्थ जब राज्यकर के रूप में या रक्षा के पुरस्कार हेतु अथवा सेवा के प्रतिदान के निमित्त शासन को प्राप्त होकर एक संरक्षित स्थान पर एकत्र कर रखा जाता है तब उसी को राजकोष के नाम से कहा जाता है।

राष्ट्र की समुन्नति और सुरक्षा के निमित्त जितने भी उपाय तथा साधन बताये गये हैं, उनमें कोष का प्रमुख स्थान है। इसी हेतु कोष-विभाग के कर्मचारियों से लेकर कोष की सुरक्षा, उसकी वृद्धि के उपाय, उसकी आय के साधन और उसके क्षय के कारणों पर कौटिल्य ने बड़ी सूक्ष्मता से विचार किया है।

अर्थ-विभाग के सबसे बड़े अधिकारी को समाहर्त्ता कहा गया है। वह समाज के विभिन्न वर्गों पर, राष्ट्र की विभिन्न वस्तुओं पर, गाँवों, नगरों तथा घरों पर, व्यवसायियों तथा शिल्पियों पर और भूमि पर जो राज्यांश निर्धारित है, उसका संचय करता है तथा उसका पूरा ब्यौरा अपनी निबन्ध-पुस्तक ( Sealed Register ) में अंकित रखता है।

अर्थ-विभाग के अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों में सन्निधाता ( भंडारों का अधिकारी ), स्थानिक ( जनपद के चतुर्थांश का अधिकारी ), गोप ( गाँवों का अधिकारी ), प्रदेष्टा ( स्थानिक तथा गोप का सहायक अधिकारी ) अक्षपटलाध्यक्ष ( अकाउंट जनरल ), कोषाध्यक्ष, अर्थकारणिक ( मुख्य अकाउंटेंट ) कार्मिक ( अर्थकारणिक का अधीनस्थ कर्मचारी ), गाणनिक्य ( जिलों का हिसाब-किताब रखने वाले कर्मचारी ), सांख्यानक ( गणना करने वाले ), लेखक ( क्लर्क ), नीवीग्राहक, गोपालक, अपयुक्त, निधानक, निबंधक, प्रतिग्राहक, दायक और मंत्रिवैयावृत्यक आदि का नाम उल्लेखनीय है।

राजकोष के संचय के साधनों में, जिन्हें कि कौटिल्य ने आयशरीर कहा है, दुर्ग, राष्ट्र, खान, सेतु, वन, व्रज और वणिक्पथ प्रमुख हैं।

राज्य की आर्थिक व्यवस्था पर ही उसकी उन्नति के सभी जरिये निर्भर हैं। इसलिए राजकोष के उक्त आय-स्रोतों के अलावा अर्थदण्ड सम्बन्धी पौतवं कर ( नाप-तौल का कर ), नागरिकों द्वारा प्राप्त राज्यांश, कृषिकर, उपज का

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अंश, बलि कर, धार्मिक कर, वणिक कर और व्यावसायिक वस्तुओं के आयात-निर्यात से जो आमदनी होती थी उसको भी राजकोष में जमा कर दिया जाता था।

राजकर

हिन्दुओं की राज्य-व्यवस्था के इतिहास में राजकर का मौलिक महत्त्व माना गया है। क्योंकि राजकर का सम्बन्ध प्रजा से होता था, इस दृष्टि से राजकर को निर्धारित करने के सारे नीति-नियम यद्यपि धर्म-ग्रन्थों द्वारा निर्धारित किये जाते थे, तथापि उसको लागू करने से पूर्व उस पर समाज की स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य होता था। इस प्रकार धर्मशास्त्र द्वारा निर्धारित और समाज द्वारा स्वीकृत जो राजकर होता था, शासन-व्यवस्था चाहे जैसी भी रहे, किन्तु राजकर के नियमों में किसी भी प्रकार का अवरोध नहीं आने पाता था। यही कारण था कि राजकर के सम्बन्ध में राजा-प्रजा के बीच कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ। कई ग्रन्थों में इस प्रकार के अनेकों उदाहरण मिलते हैं कि राजकर के सम्बन्ध में जो धर्म द्वारा प्रतिपादित नियम थे, उनका अतिक्रमण करने का साहस बड़े-से-बड़े शासक भी नहीं कर सके थे।

अर्थशास्त्र के एक प्रसंग ( अर्थशास्त्र, पृ० ४१४-४१९ ) में कहा गया है कि सेल्युकस के आक्रमण के समय जब प्राप्त राजकर से कार्य न सध पाया था तो चन्द्रगुप्त के महामात्य कौटिल्य ने प्रजा से धन संग्रह करने में अपना सारा बुद्धिबल लगा दिया था। इसके लिए उन्हें बड़े विलक्षण उपायों का आश्रय लेना पड़ा था। अन्त में चन्द्रगुप्त ने अपनी प्रजा से अनुग्रह की भिक्षा मांगते हुए कहा था 'आप लोग मुझ पर अपना प्रेम सूचित करने के लिए धन दें।' उसने इस विपत्ति से रक्षा के लिए देव-मन्दिरों तक से धन वसूल किया था।

राज्य की सारे आय-व्यय पर मन्त्रि-परिषद् का अधिकार होता था। राजा और राजकर के सम्बन्ध में महाभारत ( शांति० ७१।१० ) एक सुन्दर प्रसंग उपस्थित करता है। उसमें लिखा है कि 'षष्ठांश बलिकर ( आयात-निर्यात ), अपराधियों से मिलने वाला जुरमाना और उनके द्वारा अपहृत धन, जो कुछ भी न्यायतः प्राप्त हो, वह सब तुम्हारे वेतन के रूप में होगा; और वही तुम्हारी आय के द्वार या राजकर होगा।' नारदस्मृति ( १८।४८ ) में लिखा हुआ है कि 'राजाओं को पूर्व निश्चित नियमों के अनुसार जो धन प्राप्त हो और भूमि की उपज का जो षष्ठांश प्राप्त हो, वह सब राजकर होगा,

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और प्रजा की रक्षा करने के पुरस्कार स्वरूप वह राजा को मिलेगा।' अपनी रक्षा के फलस्वरूप प्रजा का प्रतिनिधि पुरोहित राज्याभिषेक के समय राजा से यह कहता था कि 'हम तुम्हारे निर्वाह के लिए तुम्हारा उचित अंश (भाग) तुम्हें दिया करेंगे' (शुक्रनीतिसार १।१८८)।

इन सभी उल्लेखों से हमें राजकर की सुव्यवस्था के संबंध में कितनी आस्थापूर्ण विचारधारा का पता लगता है।

राजकर सम्बन्धी नियमों के प्रसंग में दूसरी अनेक बातों के अतिरिक्त महाभारत ( १२।८८।४ ) में एक महत्त्व की बात यह कही गयी है कि 'राज-कर ऐसा होना चाहिए जो प्रजा पर भारस्वरूप सिद्ध न हो; राजा को अपना आचरण उस मधुमक्खी के समान रखना चाहिए जो वृक्षों को बिना कष्ट पहुँचाये उनसे मधु एकत्र करती है।' (अर्थशास्त्र, पृ० ४१९) कुछ निरर्थक वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाते हुए कौटिल्य ने लिखा है कि 'जो वस्तुएँ राष्ट्र के लिए दुःखदायक हों; जो निरर्थक और केवल शोक के लिए हों; उन पर अधिक कर लगा करके उनका आयात कम करना चाहिए (अर्थशास्त्र, पृ० ४१२-४१९)। इनके अतिरिक्त कुछ पदार्थ ऐसे भी थे जिनका निर्यात वर्जित था और देश में जिनका अधिक आयात करने के लिए किसी प्रकार का शुल्क नहीं लिया जाता था; यथा अस्त्र-शस्त्र आदि; धातु; सेना के काम में आने वाले रथ आदि अप्राप्य या दुर्लभ पदार्थ; अनाज और पशु आदि; (अर्थ-शास्त्र वही)। कुछ अवस्थाओं में विशेष कर लगाने का भी नियम था। इस सम्बन्ध में कहा गया है कि जो लोग विदेश से अच्छी सुरायें आदि लाते थे अथवा घर में अरिष्ट आदि बनाते थे उन पर इतना अधिक कर लगाया जाता था जिससे राज्य में बिकने वाली ऐसी चीजों की कम बिक्री का हरजाना निकल आये (अर्थशास्त्र वही)।

आधुनिक समाजवाद

अठारहवीं शताब्दी के जितने भी महान् दार्शनिक हुए उन्होंने भी संसार की सारी वस्तुओं को विवेक की कसौटी पर परखा।

आधुनिक समाजवाद की उत्पत्ति में प्रमुख दो कारण है : एक तो पूंजी-पतियों तथा श्रमिकों का श्रेणी-विरोध और दूसरा उत्पादन में व्याप्त अराज-कता। बुद्धि और तर्क के द्वारा प्रत्येक वस्तु के अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करना ही समाजवादी क्रांति को जन्म देने वाले, महापुरुषों का ध्येय रहा है। समाज और राज्य का जो बासीपन था, परम्परा की जो रूढियां थीं, अंध-