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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
प्रकरण ११३-११४<br>अध्याय ८## यातव्यवृत्तिः, अनुग्राह्यमित्रविशेषाश्च

(१) यातव्योऽभियास्यमानः सन्धिकारणमादातुकामो विहस्तुकामो वा सामवायिकानामन्यतमं लाभद्वैगुण्येन पणेत। प्रपणिता क्षयव्ययप्रवास-प्रत्यवायपरोपकारशरीराबाधांश्चास्य वर्णयेत्। प्रतिपन्नमर्थेन योजयेत्। वैरं वा परैर्ग्राहयित्वा विसंवादयेत्।

(२) दुरारब्धकर्माणं भूयः क्षयव्ययाभ्यां योक्तुकामः स्वारब्धायां वा यात्रायां सिद्धिं विघातयितुकामो मूले यात्रायां वा प्रतिहर्तुकामो यातव्य-संहितः पुनर्याचितुकामः प्रत्युत्पन्नार्थकृच्छ्रस्तस्मिन्नविश्वस्तो वा तदात्वे लाभमल्पमिच्छेदायत्यां प्रभूतम्।

(३) मित्रोपकारममित्रोपघातमर्थानुबन्धमवेक्षमाणः पूर्वोपकारकं कारयितुकामो भूयस्तदात्वे महान्तं लाभमुत्सृज्यायत्यामल्पमिच्छेत्।


यातव्य सम्बन्धी व्यवहार और अनुग्रह करने वाले मित्रों के प्रति कर्त्तव्य

( १ ) यातव्य विजिगीषु को चाहिए कि आक्रमण करने से पहिले ही वह, सन्धि के कारणों को मानने वाले या उसकी अपेक्षा न रखने वाले सहायक ( सामवायिक ) के रूप में किसी एक सामंत के साथ, पूर्व निश्चित लाभ से, दुगुना लाभ देकर सन्धि कर ले । तदनन्तर उस साथी सामन्त के समक्ष वह : सेनाक्षय, धनव्यय, दूर प्रवास, मार्ग के विघ्न, शत्रुपक्ष में घुसकर उसका उपकार करना और शरीर पीड़ा आदि दोषों या बाधाओं को खोलकर रख दें । यदि वह इन सब बाधाओं को झेलना स्वीकार कर ले तो उसे प्रतिज्ञात धन दे दे । इसके विपरीत यदि वह सन्धि के कारणों को स्वीकार न करे तो दूसरे सामन्त से उसका विरोध करा कर, उससे अपनी सन्धि तोड़ दे ।

( २ ) अनुचित देश-काल में युद्ध-यात्रा का आरम्भ कर सामन्त को क्षय-व्यय-ग्रस्त करने की इच्छा रखने वाला या उचित देश-काल में युद्ध यात्रा करके अवश्य-म्भावी सिद्धि का विधान करने की इच्छा वाला या यात्रा करने पर दुर्ग आदि के ऊपर आक्रमण करने की इच्छा वाला; या यातव्य से पहिले थोड़ा ही लेकर सन्धि करके फिर अधिक माँग की इच्छा रखने वाला या आकस्मिक अर्थ-कष्ट से ग्रसित या यातव्य में अविश्वास करने वाला; उस समय थोड़ा ही लाभ लेकर सन्धि कर ले और फिर भविष्य में अधिक धन लेने की इच्छा करे ।

( ३ ) यदि उसे यह सम्भावना हो कि आगे चलकर मित्र से उसको लाभ होगा;

४९० | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ सातवां अधिकरण

(१) दूष्यामित्राभ्यां मूलहरेण वा ज्यायसा विगृहीतं त्रातुकामस्तथा-विधमुपकारं कारयितुकामः सम्बन्धापेक्षी वा तदात्वे च आयत्यां लाभं न प्रतिगृह्णीयात् । (२) कृतसन्धिरतिक्रमितुकामः परस्य प्रकृतिकर्शनं मित्रामित्रसन्धि-विश्लेषणं वा कर्तुकामः पराभियोगाच्छङ्कमानो लाभमप्राप्तमधिकं याचेत । तमितरस्तदात्वे च आयत्यां च क्रममवेक्षेत । तेन पूर्वे व्याख्याताः । (३) अरिविजिगीष्वोस्तु स्वं स्वं मित्रमनुगृह्णतोः शक्यकल्यभव्या-रम्भिस्थिरकर्मानुरक्तप्रकृतिभ्यो विशेषः । शक्यारम्भी विषह्यं कर्मारभेत् । कल्यारम्भी निर्दोषम् । भव्यारम्भी कल्याणोदयम् । स्थिरकर्मा नासमाप्य कर्मोपरमते । अनुरक्तप्रकृतिः सुसहायत्वादल्पेनाप्यनुग्रहेण कार्यं साधयति । त एते कृतार्थाः सुखेन प्रभूतं चोपकुर्वन्ति । अतः प्रतिलोमेनानुग्राह्याः ।

शत्रुओं को वह हानि कर पायेगा; पुराने सहायक पुनः सहायता करेंगे; ऐसी स्थिति में उस समय अधिक लाभ को छोड़ कर भविष्य में भी वह थोड़े ही लाभ की कामना करे ।

( १ ) यदि वह चाहता हो कि दूष्य, शत्रु एवं अधिकशक्ति सामन्त से उसके साथी सामन्त की रक्षा हो जाय अथवा अपने प्रति भी इसी प्रकार के उपकारों को चाहे; और यह चाहे कि यातव्य के साथ उसका सम्बन्ध जुड़ जाय, तो उस समय और भविष्य में भी अपने साथी से कुछ भी लाभ न ले ।

( २ ) यदि वह पहिले की गई सन्धि को तोड़ना चाहे या शत्रुप्रकृति को नष्ट करना चाहे या मित्र तथा शत्रु की सन्धि को तोड़ना चाहे या उसे शत्रु के आक्रमण की आशंका हो या अप्राप्त पूर्व निश्चित लाभ से अधिक लाभांश की माँग करे, ऐसी दशा में दूसरे सामन्त को चाहिए, जिससे लाभ की माँग की गई है, कि वह इस प्रकार की माँग के सम्बन्ध में उस समय और भविष्य में होने वाले लाभ तथा हानि का भलीभाँति विचार करे । इसी प्रकार पूर्वोक्त तीन पक्षों में भी हानि-लाभ का विचार समझना चाहिए ।

( ३ ) अपने-अपने मित्रों पर बड़ा अनुग्रह रखने वाले शत्रु और विजिगीषु, दोनों को चाहिए कि वे १. शक्यारम्भी २. कल्याणारम्भी ३. भव्यारम्भी ४. स्थिर-कर्मा और ५. अनुरक्त प्रकृति, इन पाँच प्रकार के मित्रों पर विशेष अनुग्रह रखें । अपनी शक्ति के अनुसार कर सकने योग्य कार्य को ही आरम्भ करने वाला शक्या-रम्भी कहलाता है । दोष रहित कार्य को आरम्भ करने वाला कल्याणारम्भी कहलाता है । भविष्य में कल्याणप्रद फल को देने वाले को जो आरम्भ करे उसे भव्यारम्भी कहते हैं । आरम्भ किये हुए कार्य को जो समाप्त किये बिना न छोड़े उसे स्थिरकर्मा कहते हैं । अच्छे सहायक मिल जाने के कारण थोड़ी-सी सेना आदि से कार्य को पूरा कर देने वाला अनुरक्तप्रकृति कहलाता है । यदि इन पाँच प्रकार

प्र० ११३-११४ : अ० ८ ] [ यातव्य-अनुग्राह्य सम्बन्धी व्यवहार ४९१

(१) तयोरेकपुरुषानुग्रहे यो मित्रं मित्रतरं वानुगृह्णाति सोऽतिसन्धत्ते । मित्रादात्मवृद्धिं हि प्राप्नोति । क्षयव्ययप्रवासपरोपकारान् इतरः । कृतार्थश्च शत्रुर्वैगुण्यमेति ।

(२) मध्यमं त्वनुगृह्णतोर्यो मध्यमं मित्रं मित्रतरं वानुगृह्णाति सोऽतिसन्धत्ते । मित्रादात्मवृद्धिं हि प्राप्नोति । क्षयव्ययप्रवासपरोपकारानितरः । मध्यमश्चेदनुगृहीतो विगुणः स्यादमित्रोऽतिसन्धत्ते । कृतप्रयासं हि मध्यमामित्रमपसृतमेकार्थोपगतं प्राप्नोति ।

(३) तेनोदासीनानुग्रहो व्याख्यातः ।

(४) मध्यमोदासीनयोर्बलांशदाने यः शूरं कृतास्त्रं दुःखसहमनुरक्तं वा दण्डं ददाति, सोऽतिसन्धीयते । विपरीतोऽतिसन्धत्ते ।

(५) यत्र तु दण्डः प्रतिहतस्तं वा चार्थमन्यांश्च साधयति, तत्र मौलभृतश्रेणीमित्राटवीबलानामन्यतममुपलब्धदेशकालं दण्डं दद्यात् । अमित्राटवीबलं वा व्यवहितदेशकालम् ।


के मित्रों को सहायता देकर कृतार्थ किया जाय तो उनसे विजिगीषु को बहुत सहायता मिलती है । इनसे विपरीत अशक्यारम्भी आदि पर कदापि भी अनुग्रह न किया जाय ।

( १ ) यदि शत्रु और विजिगीषु दोनों एक ही व्यक्ति पर अनुग्रह करना चाहते हों, तो जो मित्र या अतिमित्र हो उस पर ही अनुग्रह किया जाय, क्योंकि वह अत्यन्त लाभ पहुँचाता है । मित्र से तो सर्वदा ही आत्मवृद्धि होती है, यदि उस पर अनुग्रह भी किया जाय तब तो कहना ही क्या है । जो भी मित्र की जगह शत्रु पर अनुग्रह करता है उसके पुरुष एवं धन का नाश होता है तथा दूर-दूर जाकर उसको शत्रु का उपकार करना पड़ता है, और कार्य सध जाने के बाद फिर शत्रु उससे बिगाड़ कर लेता है ।

( २ ) यदि शत्रु और विजिगीषु मध्यम राजा पर अनुग्रह करना चाहें तब भी मित्र अथवा अतिमित्र पर ही अनुग्रह करना ठीक होता है, क्योंकि मित्र से सदा ही अपनी संवृद्धि होती है और शत्रु पर अनुग्रह करने वाले को सदा ही क्षय, व्यय, प्रवास सहना पड़ता है तथा शत्रु का उपकार करना पड़ता है अनुगृहीत मध्यम राजा के बिगड़ जाने पर अपने शत्रु को ही विशेष लाभ होता है, क्योंकि मित्र बनकर बिगड़ जाने के बाद शत्रु बना मध्यम समान कार्य करने वाले विजिगीषु के शत्रु को अपना मित्र बना लेता है ।

( ३ ) इसी प्रकार उदासीन राजा पर अनुग्रह करने का सुफल कुफल समझ लेना चाहिए ।

( ४ ) मध्यम और उदासीन राजाओं को सेना की सहायता में जो अपने शस्त्र-सञ्चालन में कुशल, दुःखसहिष्णु एवं अनुरक्त सैनिक को दे डालते हैं वे धोखा खाते हैं, और जो ऐसा नहीं करता वह लाभ में रहता है ।

( ५ ) जिस कार्य को सम्पन्न करने के लिए एक बार भेजी हुई सेना नष्ट हो

४९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

४९२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) यं तु मन्येत—'कृतार्थो मे दण्डं गृह्णीयादमित्राटव्यभूम्यनृतुषु वा वासयेदफलं वा कुर्यादि'ति दण्डव्यासङ्गापदेशेन नैनमनुगृह्णीयात् । एवमवश्यं त्वनुग्रहीतव्ये तत्कालसहमस्मै दण्डं दद्यात् । आ समाप्तैश्चैनं वासयेद्योधयेच्च, बलव्यसनेभ्यश्च रक्षेत् । कृतार्थच्च सापदेशमवस्त्रावयेत् । दूष्यामित्राटवीदण्डं वास्मै दद्यात् । यातव्येन वा सन्धायैनमतिसन्दध्यात् ।

(२) समे हि लाभे सन्धिः स्याद्विषमे विक्रमो मतः ।
समहीनविशिष्टानामित्युक्ताः सन्धिविक्रमाः ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे यातव्यवृत्तिरग्राह्यमित्रविशेषो नाम अष्टमोऽध्याय; आदितः पञ्चशततमः ।

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गई हो उसकी पूर्ति के लिए तथा दूसरे कार्यों की सफलता के लिए ऐसे अवसर पर मौलबल, भृतबल, श्रेणीबल, मित्रबल और आटवीबल, इन पाँचों में से किसी एक सेना को उचित देश-काल के अनुसार भेज देना चाहिए । अथवा दूर देश और अधिक समय के लिए अमित्रबल या आटवीबल को ही भेजना चाहिए ।

( १ ) जिस उदासीन या मध्यम को यह समझा जाय कि : वह अपना कार्य निकाल लेने के बाद मेरी सेना को अपने वश में कर लेगा, या उसको शत्रु के पास, आटविक के पास, अयुक्त स्थानों तथा ऋतुओं में रखेगा, अथवा मेरी सेना को जीत का कोई हिस्सा न देगा' उसको कुछ बहाना बना कर सेना न दी जाय । यदि इस प्रकार के राजा की सहायता करनी परमावश्यक हो तो उतने समय तक के लिए उसको समर्थ सैनिक दिये जायें, जब तक कार्य समाप्त न हो और सुविधाजनक भूमि में सेना रहे तथा अवसर आने पर ही वह युद्ध करे, साथ ही सैनिक आपत्तियों या निरस्त्र हो जाने की स्थिति से उन्हें सुरक्षित रखे । कार्य हो जाने के बाद कुछ बहाना बनाकर सेना वापिस बुला ली जाय । फिर जरूरत पड़ने पर अपनो दूष्यसेना, शत्रु सेना या आटविक सेना को ही देना चाहिए, अथवा यातव्य के साथ मिलकर मध्यम या उदासीन राजा से खूब धन वसूल करे ।

( २ ) बराबर लाभ देने पर सन्धि और लाभांश में ज्यादा-कमी करने पर विग्रह कर देना चाहिए । इस अध्याय में सम, हीन और विशिष्ट राजाओं की सन्धि तथा विक्रम का निरूपण किया गया ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में यातव्यवृत्ति-अनुग्राह्यमित्रविशेष नामक आठवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ११५मित्रहिरण्यभूमिकर्मसन्धयः
अध्याय ९

(१) संहितप्रयाणे मित्रहिरण्यभूमिलाभानामुत्तरोत्तरो लाभः श्रेयान् । मित्रहिरण्ये हि भूमिलाभाद्भवतः, मित्रं हिरण्यलाभात् । यो वा लाभः सिद्धः शेषयोरन्यतरं साधयति । (२) 'त्वं चाहं च मित्रं लभावहे' इत्येवमादिः समसन्धिः । 'त्वं मित्रम्' इत्येवमादिर्विषमसन्धिः । तयोर्विशेषलाभादतिसन्धिः । (३) समसन्धौ तु यः सम्पन्नं मित्रं मित्रकृच्छ्रे वा मित्रमवाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । आपद्धि सौहृदस्थैर्यमुत्पादयति । (४) मित्रकृच्छ्रेऽपि नित्यमवश्यमनित्यं वश्यं वेति । 'नित्यमवश्यं श्रेयः, तद्ध्यनुपकुर्वदपि नापकरोति' इत्याचार्याः ।


मित्रसंधि और हिरण्यसंधि

( संधि-विचार १ )

(१) संयुक्त युद्ध-यात्रा में मित्र, हिरण्य और भूमि, इन लाभों में उत्तरोत्तर लाभ श्रेष्ठ है । क्योंकि भूमिलाभ से शेष दोनों लाभ प्राप्त हो सकते हैं और हिरण्य लाभ से मित्रलाभ सुलभ किया जा सकता है । अथवा जिस प्राप्त हुए लाभ से शेष दोनों या उनमें से कोई एक लाभ सिद्ध हो सके, वही श्रेष्ठ समझना चाहिए ।

(२) 'तुम और हम, दोनों मिलकर मित्र को लाभ पहुँचायें' इस प्रकार की गई संधि को समसंधि कहते हैं । 'तुम मित्र-लाभ प्राप्त करो और मैं हिरण्य का अथवा तुम हिरण्य का लाभ प्राप्त करो और मैं भूमि का' इस प्रकार की गई संधि को विषमसंधि कहते हैं । इन दोनों संधियों में पूर्व लिखित लाभ से अधिक लाभ प्राप्त हो तो वह अतिसंधि कहलाती है ।

(३) समसंधि में जो संपन्न मित्र को या विपत्तिग्रस्त मित्र को प्राप्त करता है, वह अतिसंधि के विशेष लाभ को प्राप्त करता है । क्योंकि आपत्ति में मित्रता और भी दृढ़ हो जाती है ।

(४) मित्र के विपत्तिकाल में, अपने वश में न रहने वाले नित्य मित्र का मिलना उत्तम है या अपने वश में रहने वाले अनित्य मित्र का मिलना अच्छा है ? इस संबंध में पुरातन आचार्यों का कहना है कि नित्य मित्र का प्राप्त करना ही श्रेष्ठ है, क्योंकि वह उपकार न करे किन्तु अपकार कभी भी नहीं करता है ।

४९४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) नेति कौटिल्यः-वश्यमनित्यं श्रेयः, यावदुपकरोति तावन्मित्रं भवति । उपकारलक्षणं मित्रमिति ।

(२) वश्ययोरपि महाभोगमनित्यमल्पभोगं वा नित्यमिति । 'महाभोग-मनित्यं श्रेयः, महाभोगमनित्यमल्पकालेन महदुपकुर्वन्महान्ति व्ययस्थानानि प्रतिकरोति' इत्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः । नित्यमल्पभोगं श्रेयः, महाभोगमनित्यमुपकार-भयादपक्रामति, उपकृत्य वा प्रत्यादातुमीहते । नित्यमल्पभोगं सातत्यादल्प-मुपकुर्वन्महता कालेन महदुपकरोति ।

(४) गुरुसमुत्थं महान्मित्रं लघुसमुत्थमल्पं वेति । 'गुरुसमुत्थं महान्मित्रं प्रतापकरं भवति, यदा चोत्तिष्ठते, तदा कार्यं साधयति' इत्याचार्याः ।

(५) नेति कौटिल्यः-लघुसमुत्थमल्पं श्रेयः, लघुसमुत्थमल्पं मित्रं कार्यकालं नातिपातयति दौर्बल्याच्च यथेष्टभोग्यं भवति, नेतरत् प्रकृष्ट-भौमम् ।


(१) परन्तु कौटिल्य का कहना है कि अपने वश में रहने वाला अनित्य मित्र का प्राप्त होना ही श्रेष्ठ है, क्योंकि जब तक वह उपकार करता रहता है तभी तक मित्र बना रहता है, मित्र का लक्षण ही अपने साथी की भलाई करना है ।

(२) 'अपने वश में रहने वाले दो मित्रों में से थोड़े समय के लिए अधिक कर देने वाला मित्र अच्छा है या हमेशा थोड़ा-थोड़ा कर देने वाला मित्र अच्छा है ?' पूर्वाचार्यों का कहना है कि थोड़े दिन तक अधिक कर देने वाला मित्र श्रेष्ठ है, क्योंकि वह थोड़े ही समय में बहुत ज्यादा धनादि देकर विजिगीषु का महान् उपकार कर देता है, तथा अपनी सहायता से राजकीय व्ययछिद्रों का भी प्रतीकार कर देता है ।

(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य का अभिमत है कि सदा के लिए थोड़ा-थोड़ा देने वाला मित्र श्रेष्ठ है, क्योंकि एक साथ अधिक देने के भय से मित्रता भी टूट जाती है और फिर वह अपने दिये गये धन को वापिस करने के लिए यत्न करता है । इसके विपरीत थोड़ा-थोड़ा धन देने वाला मित्र विजिगीषु का बड़ा उपकार करता है ।

(४) बड़ी कठिनाई और बड़े यत्न करने पर शत्रु से युद्ध करने के लिए तैयार होने वाला प्रबल मित्र अच्छा है या सरलता से शीघ्र ही तैयार हो जाने वाला निर्बल मित्र श्रेष्ठ है ?' इस पर पूर्वाचार्यों का कहना है कि कठिनता से तैयार होने वाला प्रबल मित्र ही अच्छा है, क्योंकि एक तो वह शत्रुओं का दमन कर सकेगा और दूसरे में कार्य को भी पूरा कर देगा ।

(५) किन्तु कौटिल्य इस तर्क से सहमत नहीं है । उसका कहना है कि सरलता

प्र० ११५ : अ० ९ ] सन्धि-विचार ( १) ४९५

(१) विक्षिप्तसैन्यमवश्यसैन्यं वेति ? 'विक्षिप्तं सैन्यं शक्यं प्रतिसंहर्तुं वश्यत्वात्' इत्याचार्याः। (२) नेति कौटिल्यः। अवश्यसैन्यं श्रेयः। अवश्यं हि शक्यं सामादिभिर्वश्यं कर्तुं, नेतरत्कार्यव्यासक्तं प्रतिसंहर्तुम्। (३) पुरुषभोगं हिरण्यभोगं वा मित्रमिति। 'पुरुषभोगं मित्रं श्रेयः, पुरुषभोगं मित्रं प्रतापकरं भवति। यदा चोत्तिष्ठते तदा कार्यं साधयति' इत्याचार्याः। (४) नेति कौटिल्यः। हिरण्यभोगं मित्रं श्रेयः, नित्यो हिरण्येन योगः कदाचित् दण्डेन दण्डश्च हिरण्येनान्ये च कामाः प्राप्यन्त इति।


से शीघ्र तैयार हो जाने वाला निर्बल मित्र ही उत्तम है, क्योंकि ऐसा मित्र हरेक आवश्यकता पर काम आता है और इच्छानुसार उसको किसी भी कार्य में लगाया जा सकता है। इसके विपरीत ये सभी बातें दूसरे मित्र में नहीं होतीं, विशेषतया जब कि वह दूर देश में रहता है।

( १ ) 'कार्य सिद्धि के लिए अनेक स्थानों में विघटित राजा की वश्य सेना अच्छी है या जिसकी सेना तो अपने वश में न हो लेकिन सब अपने पास हो, ऐसा मित्र अच्छा है ?' पूर्वाचार्यों का इस संबंध में यह सुझाव है कि विघटित सेना शीघ्र ही एकत्र की जा सकती है।

( २ ) किन्तु आचार्य कौटिल्य का मत है कि अपने पास ही एकत्र अवश्य सेना वाला राजा ही मित्र के लायक है; क्योंकि साम, दाम आदि उपायों से उस सेना को अपने वश में किया जा सकता है और शीघ्र ही इच्छित कार्यों में उसको लगाया जा सकता है। इसके विपरीत दूसरे कार्यों में व्यस्त बिखरी हुई सेना को तत्काल एकत्र कर अपने कार्यों में नहीं लगाया जा सकता है।

( ३ ) 'आदमियों की सहायता देने वाला मित्र अच्छा है ? या हिरण्य की सहायता देने वाला मित्र अच्छा है ? इन दोनों में आदमियों की सहायता देने मित्र ही अच्छा है, क्योंकि वह स्वयं ही शत्रुओं पर आक्रमण कर उन्हें दबा सकता है, और जब कभी भी कार्य करने के लिए तैयार हो जाता है तो उस कार्य को पूरा भी कर डालता है ऐसा पूर्वाचार्यों का मत है।

( ४ ) किन्तु कौटिल्य इस बात को नहीं मानता है। उसके मत से हिरण्य आदि की सहायता देने वाला मित्र ही श्रेष्ठ है, क्योंकि धन की आवश्यकता सदा ही बनी रहती है, जब कि सेना की आवश्यकता कभी-कभी ही होती है। और फिर धन के के द्वारा सेना-संग्रह भी किया जा सकता है तथा दूसरे अभीष्ट कार्यों को भी पूरा किया जा सकता है।

४९६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ सातवाँ अधिकरण

(१) हिरण्यभोगं भूमिभोगं वा मित्रमिति । 'हिरण्यभोगं गतिमत्त्वात्सर्वव्ययप्रतीकारकरम्' इत्याचार्याः ।

(२) नेति कौटिल्यः—'मित्रहिरण्ये हि भूमिलाभाद्भवतः' इत्युक्तं पुरस्तात् । तस्माद्भूमिभोगं मित्रं श्रेय इति ।

(३) तुल्ये पुरुषभोगे विक्रमः क्लेशसहत्वमनुरागः सर्वबललाभी वा मित्रकुलाद्विशेषः ।

(४) तुल्ये हिरण्यभोगे प्रार्थितार्थता प्राभूत्यमल्पप्रयासता सातत्यं च विशेषः ।

(५) तत्रैतद्भवति—

नित्यं वश्यं लघूत्थानं पितृपैतामहं महत् ।
अद्वैध्यं चेति सम्पन्नं मित्रं षड्गुणमुच्यते ॥

(६)

ऋते यदर्थं प्रणयाद्रक्ष्यते यच्च रक्षति ।
पूर्वोपचितसम्बन्धं तन्मित्रं नित्यमुच्यते ॥

(७)

सर्वचित्रमहाभोगं त्रिविधं वश्यमुच्यते ।


(१) 'हिरण्य देने वाला मित्र श्रेष्ठ है या भूमि देने वाला मित्र श्रेष्ठ है ?' इस पर पूर्वाचार्यों का कहना है कि हिरण्य देने वाला मित्र ही श्रेष्ठ है; क्योंकि धन को जहाँ चाहो, इच्छानुसार लगाया जा सकता है और हर तरह का व्यय उससे पूरा किया जा सकता है ।

(२) किन्तु कौटिल्य का कहना है कि 'मित्र और हिरण्य दोनों ही भूमि से प्राप्त किए जा सकते हैं' इस बात को पहिले ही बताया जा चुका है । इसलिए भूमि की सहायता देने वाला मित्र ही श्रेष्ठ है ।

(३) यदि दो मित्र समान रूप से पुरुषों की सहायता पहुँचाने वाले हों तो उनमें जो पराक्रमी, क्लेशसह; अनुरागी और मौलभृत आदि सभी प्रकार की सेनाएँ देने वाला हो वही श्रेष्ठ है ।

(४) इसी प्रकार समानरूप से हिरण्य आदि की सहायता पहुँचाने वाले दो मित्रों में वही मित्र श्रेष्ठ है; जो थोड़ा ही कहने पर बहुत धन दे और निरंतर ही ऐसा देता रहे ।

(५) मित्र और उनके गुण : गुण भेद से मित्र छह प्रकार के होते हैं; नित्य, वश्य, लघूत्थान, पितृ-पैतामह, महत् और अद्वैध्य ।

(६) निस्वार्थ भाव से पुराने संबंधों के कारण स्नेहवश विजिगीषु जिसकी रक्षा करता है और जो विजिगीषु की रक्षा करता है उसको नित्यमित्र कहते हैं ।

(७) वश्यमित्र तीन प्रकार का होता है : सर्वभोग, चित्रभोग और महाभोग ।

प्र० ११५ : अ० ९ ] सन्धि विचार ( १ ) ४९७

एकतोभोग्युभयतः सर्वतोभोगि चापरम् ॥
(१) आदातृ वा दात्रपि वा जीवत्यरिषु हिंसया ।
मित्रं नित्यमवश्यं तद् दुर्गाटव्यपसारि च ॥
(२) अन्यतो विगृहीतं यल्लघुव्यसनमेव वा ।
सन्धत्ते चोपकाराय तन्मित्रं वश्यमध्रुवम् ॥
(३) एकार्थानर्थसम्बन्धमुपकार्यविकारि च ।
मित्रभावि भवत्येतन्मित्रमद्वैध्यमापदि ॥
(४) मित्रभावाद्ध्रुवं मित्रं शत्रुसाधारणाच्चलम् ।
न कस्यचिदुदासीनं द्वयोरुभयभावि तत् ॥


जो सेना, धन, भूमि आदि सभी तरह से विजिगीषु की सहायता करता है वह सर्वभोग वश्यमित्र, जो केवल सेना एवं धन से विजिगीषु का महान् उपकार करे वह महाभोग वश्यमित्र; और जो रत्न, ताँबा, लोहा, लकड़ी के जंगल आदि से विजिगीषु की सहायता करता है वह चित्रभोग वश्यमित्र कहलाता है । अनर्थ-निवारण की दृष्टि से वश्यमित्र के तीन भेद और हैं; एकतोभोगी, उभयतोभोगी और सर्वतोभोगी । जो केवल शत्रु का प्रतीकार करे वह एकतोभोगी, जो शत्रु तथा शत्रुमित्र दोनों का प्रतीकार करे वह उभयतोभोगी; और जो शत्रु, शत्रुमित्र तथा आटविक आदि सब का प्रतीकार करे वह सर्वतोभोगी वश्यमित्र कहलाता है ।

( १ ) जो विजिगीषु का उपकार न करने पर भी शत्रुओं की लूट-मार करके अपना निर्वाह करता हो और जो दुर्ग एवं अटवी में सुरक्षित हो वह वश्यमित्रता हीन नित्यमित्र कहलाता है ।

( २ ) किन्तु जिस-जिस पर शत्रु ने आक्रमण कर दिया हो, जिस पर थोड़ी विपत्ति आ पड़ी हो, इसलिए जो सहायतार्थ विजिगीषु से सन्धि करना चाहता है वह नित्यमित्रताहीन वश्यमित्र कहलाता है । उपकारक होने से वश्य और अपनी उन्नति-काल तक ही मित्रता रखने के कारण वह अनित्य है ।

( ३ ) जो दुःख-सुख को समान रूप से अनुभव करे, सदा उपकार करने वाला हो, कभी भी विमुख न हो और जो आपत्तिकाल में साथ न छोड़े वह अद्वैध्य मित्र है । उसके साथ मित्रता का नित्य संबंध होने के कारण उसको मित्रभावि भी कहते हैं ।

( ४ ) जो शत्रु और विजिगीषु, दोनों का उपकार न करे, जो दोनों का समान उपकार करे, जो दुर्बलतावश दोनों का सेवक बना रहे, वह उभयभावि मित्र कहलाता है ।

३२ कौ०

४९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

४९८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) विजिगीषोरमित्रं यन्मित्रमन्तर्धितां गतम् ।
उपकारे निविष्टं वाशक्तं वानुपकारि तत् ॥
(२) प्रियं परस्य वा रक्ष्यं पूज्यसम्बन्धमेव वा ।
अनुगृह्णाति यन्मित्रं शत्रुसाधारणं हि तत् ॥
(३) प्रकृष्टभौमं सन्तुष्टं बलवच्चालसं च यत् ।
उदासीनं भवत्येतद्व्यसनादवमानितम् ॥
(४) अरेर्नेतुश्च यद्वृद्धि दौर्बल्यादनुवर्तते ।
उभयस्याप्यविद्विष्टं विद्यादुभयभावि तत् ।
(५) कारणाकरणध्वस्तं कारणाकरणागतम् ।
यो मित्रं समपेक्षेत स मृत्युमुपगूहति ॥

(६) क्षिप्रमल्पो लाभश्चिरान्महानिति वा । 'क्षिप्रमल्पो लाभः कार्य-देशकालसंवादकः श्रेयान्' इत्याचार्याः ।

(७) नेति कौटिल्यः । चिरादविनिपाती बीजसधर्मा महान् लाभः श्रेयान्, विपर्यये पूर्वः ।


( १ ) जो विजिगीषु राजा अमित्र तथा शत्रु-विजिगीषु के बीच होने के कारण मित्र हो तथा इच्छा होने पर भी जो दोनों का उपकार न कर सके वह भी उभय-भावि मित्र है।

( २ ) जो विजिगीषु का मित्र हो तथा शत्रु का भी प्रिय एवं रक्ष्य ( रक्षा किए जाने योग्य ) हो और शत्रु के साथ जिसका कोई पूज्य सम्बन्ध हो, वह भी उभय-भावि मित्र कहलाता है ।

( ३ ) दूसरे देश में रहने वाला, सन्तोषी, बलवान् और आलस्य एवं व्यसनों के कारण तिरस्कृत मित्र उपकार करने के समय उदासीन हो जाया करता है ।

( ४ ) जो मित्र दुर्बल होने के कारण शत्रु और विजिगीषु दोनों का अनुगामी होता है । किसी से भी द्वेष न करके दोनों की आज्ञा को मानता है वह भी उभय-भावि मित्र कहलाता है ।

( ५ ) अकारण गत और अकारण आगत मित्र को जो आश्रय देता है । वह निश्चय ही अपनी मौत को स्वयं बुलाता है ।

( ६ ) 'शीघ्र होने वाला थोड़ा लाभ अच्छा है या देर में होने वाला बड़ा लाभ अच्छा है?' इस पर पूर्वाचार्यों का कथन है कि शीघ्र हो जाने वाला थोड़ा लाभ श्रेयस्कर है, क्योंकि उससे देश, काल और कार्य के लाभ को जाना जा सकता है ।

( ७ ) किन्तु कौटिल्य इससे सहमत नहीं है । उसका कहना है कि देर में होने

प्र० ११५ : अ० ९ ] सन्धि विचार ( १ ) ४९९

(१) एवं दृष्ट्वा ध्रुवे लाभे लाभांशे च गुणोदयम् । स्वार्थसिद्धिपरो यायात् संहितः सामवायिकैः ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे मित्रहिरण्यभूमिकर्मसन्धिनम नवमोऽध्याय, आदितः षट्छत्ततमः ।

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वाला विघ्नरहित बीज आदि का महान लाभ ही उत्तम है । यदि महान लाभ में निधन होने की सम्भावना हो तो शीघ्र मिलनेवाला थोड़ा ही लाभ श्रेष्ठ है ।

( १ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपने निश्चित लाभ या लाभांश के परिणाम को ठीक तरह से जानकर दूसरे राजाओं के साथ सन्धि करके अपनी कार्य सिद्धि के लिए तत्पर रहे ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में मित्रहिरण्यभूमिकर्मसन्धि नामक नौवाँ अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ११६# भूमिसन्धि
अध्याय १०

(१) 'त्वं चाहं च भूमिं लभावहे' इति भूमिसन्धिः । (२) तयोर्यः प्रत्युपस्थितार्थः सम्पन्नां भूमिमवाप्नोति सोऽतिसन्धत्ते । (३) तुल्ये सम्पन्नालाभे यो बलवन्तमाक्रम्य भूमिमवाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । भूमिलाभं शत्रुकर्शनं प्रतापं च हि प्राप्नोति । दुर्बलाद् भूमिलाभे सत्यं सौकर्यं भवति । दुर्बल एव च भूमिलाभः, तत्सामन्तश्च मित्रममित्रभावं गच्छति । (४) तुल्ये बलीयस्त्वे यः स्थिरं शत्रुमुत्पाट्य भूमिमवाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । दुर्गावाप्तिर्हि स्वभूमिरक्षणममित्राटवीप्रतिषेधं च करोति ।


भूमिसन्धि

( सन्धि-विचार-२ )

( १ ) 'तुम और हम मिलकर भूमि को प्राप्त करें' इस प्रकार की गई भूमि-विषयक सन्धि को भूमिसन्धि कहते हैं ।

( २ ) शत्रु और विजिगीषु, दोनों में जो भी धन और गुणी भृत्यों को शीघ्र उपस्थित कर सम्पन्न भूमि को प्राप्त करता है, वह विशेष लाभ में रहता है ।

( ३ ) दोनों को समान रूप से सम्पन्न भूमि के प्राप्त हो जाने पर भी जो बलवान् शत्रु पर आक्रमण करके भूमि को प्राप्त करता है वही विशेष लाभ में रहता है; क्योंकि एक तो उसे भूमि का लाभ होता है और दूसरे अपने बलवान् शत्रु का नाश कर वह अपने प्रताप का भी विस्तार करता है । यद्यपि दुर्बल से भूमि प्राप्त करना निःसन्देह सुगम है, तथापि इस प्रकार का भूमि लाभ निकृष्ट कोटि का होता है: क्योंकि यह लाभ दुर्बल की हिंसा करके प्राप्त होता है और दूसरे में दुर्बल के पड़ोसी सामंत तथा विजिगीषु के मित्र भी उसके आचरण से क्षुब्ध होकर उसके शत्रु बन जाते हैं । इसलिए दुर्बल से भूमि लेना श्रेयस्कर नहीं है ।

( ४ ) दो समान बलशाली शत्रुओं के होने पर, जो विजिगीषु स्थायी शत्रु का नाश कर भूमि प्राप्त करता है, वही विशेष लाभ में है; क्योंकि शत्रु के दुर्ग आदि अपने हाथों में आ जाने पर विजिगीषु की भूमि की रक्षा हो जाती है और आटविकों का प्रतीकार करना भी उसके लिए सरल हो जाता है ।

प्र० ११६ : अ० १० ] सन्धि विचार ( २ ) ५०१

(१) चलामित्राद्भूमिलाभे शक्यसामन्ततो विशेषः । दुर्बलसामन्ता हि क्षिप्राप्यायनयोगक्षेमा भवति । विपरीता बलवत्सामन्ता कोशदण्डावच्छेदनी च भूमिर्भवति ।

(२) सम्पन्ना नित्याममित्रा मन्दगुणा वा भूमिरनित्याममित्रेति । 'सम्पन्ना नित्याममित्रा श्रेयसी भूमिः । सम्पन्ना हि कोशदण्डौ सम्पादयति । तौ चामित्रप्रतिघातकौ' इत्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः—नित्याममित्रालाभे भूयाञ्छत्रुलाभो भवति । नित्यश्च शत्रुरुपकृते चापकृते च शत्रुरेव भवति । अनित्यस्तु शत्रुरुपकारादनपकाराद्वा शाम्यति ।

(४) यस्या हि भूमेर्बहुदुर्गाश्चोरगणैर्म्लेंच्छाटवीभिर्वा नित्याविरहताः प्रत्यन्ताः, सा नित्याममित्रा । विपर्यये त्वनित्याममित्रेति ।

(५) अल्पा प्रत्यासन्ना महती व्यवहिता वा भूमिरिति । अल्पा प्रत्यासन्ना श्रेयसी । सुखा हि प्राप्तुं पालयितुमभिसारयितुं च भवति । विपरीता व्यवहिता ।


( १ ) चलायमान शत्रु से भूमि लाभ करने पर उसी दशा में विशेष लाभ होता है जब उस चलायमान शत्रु का पड़ोसी दुर्बल हो; क्योंकि ऐसी भूमि विजिगीषु को शीघ्र ही योग क्षेम की देने वाली होती है। इसके विपरीत जिस विजित भूमि का सामन्त बलवान् हो वह सर्वदा अनिष्टकर होती है; विजिगीषु के कोश और बल को क्षीण करने वाली होती है ।

( २ ) 'विजिगीषु के लिए सम्पन्न एवं नित्य शत्रु की भूमि लेनी श्रेयस्कर है या अत्यल्प सम्पन्न एवं अनित्य शत्रु की भूमि लेनी श्रेयस्कर है ?' इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों का मन्तव्य है कि सम्पन्न एवं नित्य शत्रु की भूमि लेना ही उत्तम है; क्योंकि सम्पन्न भूमि के द्वारा कोश तथा सेना, दोनों को बढ़ाया जा सकता है, जिससे कि शत्रुओं का उच्छेद किया जा सकता है ।

( ३ ) किन्तु कौटिल्य इस मन्तव्य को स्वीकार नहीं करता है । उसका कहना है कि नित्य शत्रु की भूमि लेने से शत्रुता बहुत बढ़ जाती है; क्योंकि जो नित्य शत्रु है उसका उपकार किया जाय या अपकार; वह रहता शत्रु ही है । किन्तु अनित्य शत्रु का उपकार या अपकार करने पर वह शान्त हो जाता है ।

( ४ ) जिस भूमि के सीमा प्रान्तों के बहुत से दुर्ग चोरों, म्लेच्छों तथा आटविकों से सदा घिरे रहते हैं वह भूमि नित्याममित्रा कहलाती है; और इसके विपरीत भूमि अनित्याममित्रा कहलाती है ।

( ५ ) 'प्राप्त होने वाली भूमियों में निकटवर्ती थोड़ी भूमि ठीक है या दूर की

५०२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) व्यवहिताव्यवहितयोरपि दण्डधारणात्मधारणा वा भूमिरिति । आत्मधारणा श्रेयसी । सा हि स्वसमुत्थाभ्यां कोशदण्डाभ्यां धार्यते । विपरीता दण्डधारणा दण्डस्थानमिति । (२) बालिशात् प्राज्ञाद् वा भूमिलाभ इति । बालिशाद् भूमिलाभः श्रेयान् । सुप्राप्यानुपाल्या हि भवत्यप्रत्यादेया च । विपरीता प्राज्ञादनुरक्तेति । (३) पीडनीयोच्छेदनीययोरुच्छेदनीयाद् भूमिलाभः श्रेयान् । उच्छेदननीयो ह्यनपाश्रयो दुर्बलापाश्रयो वाभियुक्तः कोशदण्डावादायापसर्तुकामः प्रकृतिभिस्त्यज्यते । न पीडनीयो दुर्गमित्रप्रतिस्तब्ध इति । (४) दुर्गप्रतिस्तब्धयोरपि स्थलनदीदुर्गीयाभ्यां स्थलदुर्गीयाद् भूमि-


बहुत-सी भूमि' ऐसी स्थिति में समीप की थोड़ी भूमि ही श्रेयस्कर है; क्योंकि सरलता से उसकी प्राप्ति और रक्षा की जा सकती है और विपत्ति काल में उसका आश्रय लिया जा सकता है। परन्तु बहुत दूर की अधिक भूमि इसके सर्वथा विपरीत होती है।

(१) 'दूर और पास की भूमि में पर-रक्षित भूमि लेना ठीक है या स्वयं रक्षित भूमि ?' इन दोनों में स्वयं रक्षित भूमि लेना ही उत्तम है; क्योंकि स्वयं स्थापित कोष और सेना द्वारा उसकी रक्षा की जा सकती है । किन्तु पररक्षित भूमि इसके सर्वथा विपरीत होती है; क्योंकि दूसरे के स्थापित कोष और सेना द्वारा उसकी रक्षा की जाती है।

(२) 'मूर्ख शत्रु और बुद्धिमान् शत्रु दोनों में किससे भूमि प्राप्त करना श्रेयस्कर है ?' मूर्खशत्रु राजा से भूमि लेना श्रेयस्कर है; क्योंकि वह बड़ी सरलता से प्राप्त हो जाती है और एक तो उसकी रक्षा सुगमता से की जा सकती है तथा दूसरे वह लौटानी भी नहीं पड़ती है। परन्तु बुद्धिमान् शत्रु राजा से प्राप्त भूमि इसके सर्वथा विपरीत होती है; उसके प्रकृतिजन तथा प्रजाजन उसमें सदा ही अनुराग रखने वाले होते हैं।

(३) पीडनीय और उच्छेदनीय, इन दोनों शत्रु राजाओं में उच्छेदनीय शत्रु की भूमि लेना श्रेयस्कर है; क्योंकि निराश्रय तथा दुर्बल आश्रय का होने के कारण, जब उस पर चढ़ाई की जाती है तो, वह सेना तथा कोष सहित भाग निकलता है। ऐसी दशा में प्रकृति जन उसकी सहायता नहीं करते । परन्तु पीडनीय शत्रु दुर्ग और मित्रों की सहायता प्राप्त करके अपने ही स्थान पर जमा रहता है। उसके प्रकृति जन भी उससे अनुराग रखते हैं ।

(४) दुर्गों से सुरक्षित शत्रुओं में स्थल दुर्ग में रहने वाले शत्रु की भूमि प्राप्त करना ठीक है या नदी दुर्ग में रहने वाले शत्रु की ?' स्थल दुर्ग में रहने वाले शत्रु की

प्र० ११६ : अ० १०] सन्धि विचार (२) ५०३

लाभः श्रेयान् । स्थलीयं हि सुरोधावमर्दावस्कन्दमनिःस्राविशत्रु च । नदी- दुर्गं तु द्विगुणक्लेशकरमुदकं च पातव्यं वृत्तिकरं चामित्रस्य । (१) नदीपर्वतदुर्गीयाभ्यां नदीदुर्गीयाद् भूमिलाभः श्रेयान् । नदीदुर्गं हि हस्तिस्तम्भसङ्क्रमसेतुबन्धनौभिः साध्यमनित्यगाम्भीर्यमवस्त्राव्युदकं च, पार्वतं तु स्वारक्षं दुरपरोधि कृच्छ्रारोहणं भग्ने चैकस्मिन् न सर्ववधः, शिलावृक्षप्रमोक्षश्च महापकारिणाम् । (२) निम्नस्थलयोधिभ्यो निम्नयोधिभ्यो भूलाभः श्रेयान् । निम्नयो- धिनो ह्यपरुद्धदेशकालाः, स्थलयोधिनस्तु सर्वदेशकालयोधिनः । (३) खनकाकाशयोधिभ्यः खनकेभ्यो भूमिलाभः श्रेयान् । खनका हि खातेन शस्त्रेण चोभयथा युध्यन्ते, शस्त्रेणैवाकाशयोधिनः ।


भूमि लेना ही ठीक है; क्योंकि स्थल-दुर्ग को सरलता से घेरा जा सकता है, उच्छिन्न किया जा सकता है और शत्रु को भी उससे भाग निकलने का सुयोग नहीं मिल पाता है । इसलिए शीघ्र ही वह आक्रमणकारी की आधीनता स्वीकार कर लेता है । परन्तु नदी-दुर्ग को इससे दुगुना कष्ट उठा कर भी काबू में नहीं किया जा सकता है । वहाँ पर जल और जलाधीन अन्न, फल आदि के होने से शत्रु के निर्वाह में कोई बाधा नहीं पड़ती । इसलिए उसका उच्छेद करना कठिन होता है ।

(१) नदी दुर्ग और पर्वत दुर्ग दोनों में से नदी दुर्ग में रहने वाले राजा से ही भूमि लाभ होना श्रेष्ठ है; क्योंकि हाथी, लकड़ी, पुल, बाँध और नौकाओं द्वारा पार करके उसको हस्तगत किया जा सकता है । किनारों को तोड़ कर उसके जल को भी निकाला जा सकता है । परन्तु पर्वतीय दुर्ग पत्थर आदि से सुदृढ़ बना होने के कारण न तो उसको सरलता से घेरा जा सकता है और न ही उस पर चढ़ा जा सकता है । अस्त्रों में से एक को ही नष्ट किया जा सकता है बाकी सुरक्षित बने रहते हैं । बड़े शक्तिशाली आक्रमणकारी का भी, ऊपर से पत्थर, पेड़ आदि गिरा कर प्रतीकार किया जा सकता है ।

(२) निम्नयोधी (नौका में बैठ कर युद्ध करने वाले) और स्थलयोधी शत्रुओं में निम्नयोधी शत्रु से ही भूमि लाभ श्रेष्ठ है; क्योंकि उसके युद्ध का निश्चित समय एवं निश्चित स्थान होता है । इसलिए उस पर विजय प्राप्त करना कठिन नहीं है । परन्तु स्थलयोधी सभी परिस्थितियों में युद्ध करता है । इसलिए उसको शीघ्र ही नहीं जीता जा सकता है ।

(३) खनकयोधी (खाई युद्ध करने वाले) और आकाशयोधी शत्रुओं में खनक योधी शत्रु से ही भूमि लाभ श्रेष्ठ है; क्योंकि उनके लिए खाई तथा अस्त्र दोनों की आवश्यकता होती है । कभी-कभी खाई के लिए उचित स्थान न मिलने के कारण वे

५०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) एवंविधेभ्यः पृथिवीं लभमानोऽर्थशास्त्रवित् । संहितेभ्यः परेभ्यश्च विशेषमधिगच्छति ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे भूमिसन्धिर्नाम दशमोऽध्यायः, आदितः सप्तशततमः ।

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युद्ध नहीं करने पाते हैं । इसलिए उनको सरलता से वश में किया जा सकता है । परन्तु आकाशयोधी शत्रु केवल शस्त्र द्वारा ही युद्ध करता है । इसलिए उसको जीतना कठिन है ।

( १ ) इस प्रकार अर्थशास्त्रज्ञ विजिगीषु राजा, ऊपर बताये गए संहित एवं दूसरे राजाओं से, पृथ्वी को प्राप्त करता हुआ अपनी उन्नति करता जाय ।

इति षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में भूमिसन्धि नामक दसवां अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण ११६
अध्याय ११

अनवसितसन्धि


(१) 'त्वं चाहं च शून्यं निवेशयावह' इत्यनवसितसन्धिः । (२) तयोर्यः प्रत्युपस्थितार्थो यथोक्तगुणां भूमिं निवेशयति सोऽतिसन्धत्ते । (३) तत्रापि स्थलमौदकं वेति । महतः स्थलादलपमौदकं श्रेयः, सातत्यादवस्थितत्वाच्च फलानाम् । (४) स्थलयोरपि प्रभूतपूर्वापरसस्यमल्पवर्षपाकमसक्तारम्भं श्रेयः । (५) औदकयोरपि धान्यवापमधान्यवापाच्छ्रेयः । तयोरल्पबहुत्वे धान्यकान्तादलपान्महद्धान्यकान्तं श्रेयः । महत्यवकाशे हि स्थाल्याश्चानूप्याश्चौषधयो भवन्ति । दुर्गादीनि च कर्माणि प्राभूत्येन क्रियन्ते । कृत्रिमा हि भूमिगुणाः ।


अनवसित संधि

( संधि-विचार ३ )

( १ ) 'आओ, तुम और हम मिलकर शून्य भूमि में उपनिवेश बसायें !' इस प्रकार से जो सन्धि की जाय उसको अनवसित ( अनिश्चित ) सन्धि कहते हैं ।

( २ ) उन दोनों में से जो, पूर्ण साधनों को साथ लेकर पूर्वोक्त गुणसंपन्न भूमि में उपनिवेश बसाता है वही विशेष लाभ में रहता है ।

( ३ ) सर्वगुणसंपन्न स्थलभूमि और जलभूमि, दोनों में जलभूमि को बसाना ही श्रेष्ठ है । अधिक स्थलभूमि की अपेक्षा थोड़ी ही जलभूमि अच्छी है; क्योंकि सदा ही वह फल-फूल आदि से गुलजार बनी रहती है ।

( ४ ) दो स्थल भूमियों में भी वही स्थलभूमि अच्छी होती है, जहाँ वसंत और शरद की फसलें एक समान अच्छी होती हैं तथा जहाँ थोड़ी ही वृष्टि से फसलें पक कर तैयार हो जाती हैं और जिनको सरलता से जोता-बोया जा सकता है ।

( ५ ) दो जलमय भूमियों में वही भूमि उत्तम है, जहाँ सभी धान्य बोये जा सकें और जहाँ धान्य न हों वह भूमि अच्छी नहीं है । उनमें भी कम-ज्यादा को दृष्टि में रखकर उपजाऊ अधिक भूमि ही श्रेष्ठ है; क्योंकि अधिक विस्तार होने से उसके जल स्थल युक्त विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार के अन्न उपजाये जा सकते हैं । क्योंकि

५०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

५०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) खनिधान्यभोगयोः खनिभोगः कोशकरः, धान्यभोगः कोशकोष्ठा-गारकरः धान्यमूला हि दुर्गादीनां कर्मणामारम्भाः । महाविषयविक्रयो वा खनिभोगः श्रेयान् ।

(२) 'द्रव्यहस्तिवनभोगयोर्द्रव्यवनभोगः सर्वकर्मणां योनिः प्रभूतनिधान-क्षमश्च । विपरीतो हस्तिवनभोगः' इत्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः । शक्यं द्रव्यवनमनेकमनेकस्यां भूमौ वापयितुं न हस्तिवनं, हस्तिप्रधानो हि परानीकवध इति ।

(४) वारिस्थलपथभोगयोरनित्यो वारिपथभोगः, नित्यः स्थलपथभोग इति ।

(५) भिन्नमनुष्या श्रेणीमनुष्या वा भूमिरिति । भिन्नमनुष्या श्रेयसी ।


भूमि को अधिक उपजाऊ बनाना अपने हाथ में निर्भर है; इसलिए अधिक भूमि को लेना ही श्रेष्ठ है ।

( १ ) खानयुक्त तथा धान्ययुक्त भूमियों में खानयुक्त भूमि केवल कोष की वृद्धि करती है; किन्तु धान्ययुक्त भूमि कोष और कोष्ठागार दोनों को संपन्न करती है । क्योंकि दुर्ग आदि कर्मों की उन्नति भी धान्यमूलक ही है; अतः धान्ययुक्त भूमि ही श्रेयस्कर होती है । अथवा खानयुक्त भूमि भी उत्तम है, क्योंकि वहाँ से उत्पन्न वस्तुओं का बड़ा भारी व्यापार किया जा सकता है ।

( २ ) 'लकड़ी के जंगल और हाथी के जंगल, दोनों में से कौन श्रेष्ठ है ?' इस संबंध में पूर्वाचार्यों का कहना है कि लकड़ियों का जंगल ही श्रेष्ठ है; क्योंकि एक तो दुर्ग आदि कर्मों में लकड़ी की बड़ी आवश्यकता होती है और दूसरे उसका अधिक-से अधिक संचय सरलता से किया जा सकता है । किन्तु हाथी के जंगलों में यह उपयो-गिता नहीं होती है ।

( ३ ) आचार्य कौटिल्य इस बात को नहीं मानता है । उसका कथन है कि 'लकड़ी के जंगल अपनी इच्छानुसार बनाये जा सकते हैं; हाथियों के जंगल स्वयं नहीं बनाये जा सकते हैं । शत्रु की सेना को नाश करने वाले साधनों में हाथी प्रमुख साधन है । इसलिए हाथियों के जंगल ही श्रेष्ठ हैं ।'

( ४ ) जलमार्ग और स्थलमार्ग में दोनों ही अनित्य ( अस्थायी ) हों तो उनमें जलमार्ग ही उत्तम है । यदि दोनों ही नित्य ( स्थायी ) हों तो स्थलमार्ग ही उत्तम समझना चाहिए ।

( ५ ) 'भिन्न प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि अच्छी है या समान प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि श्रेष्ठ है ?' इन दोनों में भिन्न प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि ही श्रेष्ठ समझनी

प्र० ११६ : अ० ११ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५०७

भिन्नमनुष्याभोग्या भवत्यनुपजाप्या चान्येषाम् । अनापत्सहा तु । विपरीता श्रेणीमनुष्या कोपे महादोषा । (१) तस्यां चातुर्वर्ण्याभिनिवेशे सर्वभोगसहत्वादवरवर्णप्राया श्रेयसी । बाहुल्याद्ध्रुवत्वाच्च कृष्याः कर्षणवती । कृष्याश्चान्येषां चारम्भाणां प्रयोजकत्वाद् गोरक्षकवती । पण्यनिचयार्णनुग्रहादाढ्यवणिक्वती । (२) भूमिगुणानामपाश्रयः श्रेयान् । (३) दुर्गापाश्रया पुरुषापाश्रया वा भूमिरिति । पुरुषापाश्रया श्रेयसी । पुरुषवद्धि राज्यम् । अपुरुषा गौर्वन्ध्येव किं दुहीत । (४) महाक्षयव्ययनिवेशां तु भूमिमवाप्तुकामः पूर्वमेव क्रेतारं पणेत । दुर्बलमराजबीजिनं निरुत्साहमपक्षमन्‍यायवर्त्तिं व्यसनिनं दैवप्रमाणं यत्किञ्चनकारिणं वा ।


चाहिए; क्योंकि ऐसी भूमि को विजिगीषु शीघ्र ही अपने कब्जे में कर लेता है, और क्योंकि भिन्न प्रकृति के कारण दूसरे शत्रु भी उन्हें बहका नहीं सकते हैं । ऐसे लोग आपत्तिसह भी नहीं होते हैं । किन्तु समान प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि को शत्रु बहका सकते हैं । एकता के कारण वहाँ की प्रजा हर तरह की आपत्तियों को सहन करने के लिए तैयार रहती हैं और कुपित होने पर राजा का भी उच्छेद कर देती है ।

( १ ) उस भूमि में चारों वर्णों के लोगों की स्थिति के संबंध में यह विचार कर लेना चाहिए कि सब तरह के दुःख-सुख सहन करने वाले शूद्र, ग्वाले आदि नीची जाति के मनुष्यों वाली भूमि ही श्रेष्ठ होती है । क्योंकि खेती की अधिकता और निश्चित फलवती होने के कारण ऐसी भूमि श्रेयस्कर होती है । कृषि संबंधी व्यापार तथा अन्य अनेक कार्य गाय एवं गोपालकों पर ही निर्भर हैं । इसलिए गाय और ग्वालों से युक्त भूमि ही श्रेष्ठ है । व्यापार के लिए धान्य आदि का संचय तथा ब्याज पर ऋण आदि देकर उपकार करने के कारण व्यापारी और धनवान् व्यक्तियों से युक्त भूमि भी श्रेष्ठ होती है ।

( २ ) भूमि के उक्त सभी गुणों में से आश्रय या रक्षा, उसके सर्वोच्च गुण हैं ।

( ३ ) 'दुर्गों का आश्रय देने वाली भूमि अच्छी होती है या मनुष्यों का ?' इन दोनों में मनुष्यों का सहारा देने वाली भूमि श्रेष्ठ है, क्योंकि राज्य कहते ही उसको है, जहाँ बहुत से पुरुष निवास करते हों; 'पुरुषवद्धि राज्यम्' । पुरुषहीन भूमि तो वन्ध्या गो के समान है ।

( ४ ) जन-धन का अत्यधिक व्यय करके बसाई जाने वाली भूमि को यदि विजिगीषु प्राप्त करना चाहे तो पहिले वह उस भूमि का ऐसा खरीदार राजा तैयार कर ले, जो दुर्बल, अराजजीवी ( जो किसी राजवंश का न हो ), उत्साहहीन, अपक्ष

५०८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) महाक्षयव्ययनिवेशायां हि भूमौ दुर्बलो राजबीजी निविष्टः सगन्धाभिः प्रकृतिभिः सह क्षयव्ययेनावसीदति । (२) बलवानराजबीजी क्षयव्ययभयादसगन्धाभिः प्रकृतिभिस्त्यज्यते । (३) निरुत्साहस्तु दण्डवानपि दण्डस्याप्रणेता सदण्डः क्षयव्ययेनावभज्यते । (४) कोशवानप्यपक्षः क्षयव्ययानुग्रहहीनत्वान्न कुतश्चित्प्राप्नोति । (५) अन्यायवृत्तिर्निविष्टमप्युत्थापयेत्, स कथमिनिविष्टं निवेशयेत् । (६) तेन व्यसनी व्याख्यातः । (७) दैवप्रमाणो मानुषहीनो निरारम्भो विपन्नकर्मारम्भो वावसीदति । (८) यत्किञ्चनकारी न किंचिदासादयति । स चैषां पापिष्ठतमो भवति ।

( बेसहारा ), अन्यायवृत्ति, व्यसनी, भाग्यवादी और यत्किंचनकारी ( जो मन में आया, कर दिया ) हो ।

( १ ) जन-धन आदि का अत्यधिक व्यय करके बसाई जाने योग्य भूमि में जब शक्तिहीन राजवंश में पैदा हुआ राजा उपनिवेश बसाता है तो अत्यधिक पुरुषों का 'क्षय और धन का व्यय होने के कारण अपने सहायकों, सजातियों और अमात्य आदि प्रकृतियों के साथ वह क्षीण हो जाता है ।

( २ ) राजवंश में पैदा न हुए बलवान् राजा को क्षय-व्यय के भय से उसके विजातीय अमात्य आदि सहायक उसको छोड़ देते हैं ।

( ३ ) सेना के होते हुए भी उत्साहहीन राजा उसका यथोचित उपयोग नहीं कर पाता है । इसलिए धन-जन का व्यय-क्षय हो जाने के कारण सेना के सहित ही वह नष्ट हो जाता है ।

( ४ ) कोषसंपन्न मित्रहीन राजा क्षय-व्यय में उचित सहायता न मिलने के कारण नष्ट हो जाता है ।

( ५ ) प्रजा पर अन्याय करने वाले स्थायी रूप से बसे हुए राजा को जब प्रजा उखाड़ फेंकती है तब नये उपनिवेशों को बसाना उसके लिए कैसे संभव हो सकता है ?

( ६ ) यही हाल व्यसनी राजा का भी होता है ।

( ७ ) भाग्य पर भरोसा करने वाला पौरुषहीन राजा किसी नये कार्य को आरंभ नहीं करता है; यदि आरंभ करता भी है तो विघ्न के भय से उसे अधूरा ही छोड़ देता है; और इस प्रकार जन-धन की व्यर्थ हानि करने के बाद वह स्वयं भी नष्ट हो जाता है ।

( ८ ) बिना विचारे कार्य करने वाला राजा कभी फूलता-फलता नहीं है; किन्तु