कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा
प्र० ११६ : अ० १०] सन्धि विचार (२) ५०३
लाभः श्रेयान् । स्थलीयं हि सुरोधावमर्दावस्कन्दमनिःस्राविशत्रु च । नदी- दुर्गं तु द्विगुणक्लेशकरमुदकं च पातव्यं वृत्तिकरं चामित्रस्य । (१) नदीपर्वतदुर्गीयाभ्यां नदीदुर्गीयाद् भूमिलाभः श्रेयान् । नदीदुर्गं हि हस्तिस्तम्भसङ्क्रमसेतुबन्धनौभिः साध्यमनित्यगाम्भीर्यमवस्त्राव्युदकं च, पार्वतं तु स्वारक्षं दुरपरोधि कृच्छ्रारोहणं भग्ने चैकस्मिन् न सर्ववधः, शिलावृक्षप्रमोक्षश्च महापकारिणाम् । (२) निम्नस्थलयोधिभ्यो निम्नयोधिभ्यो भूलाभः श्रेयान् । निम्नयो- धिनो ह्यपरुद्धदेशकालाः, स्थलयोधिनस्तु सर्वदेशकालयोधिनः । (३) खनकाकाशयोधिभ्यः खनकेभ्यो भूमिलाभः श्रेयान् । खनका हि खातेन शस्त्रेण चोभयथा युध्यन्ते, शस्त्रेणैवाकाशयोधिनः ।
भूमि लेना ही ठीक है; क्योंकि स्थल-दुर्ग को सरलता से घेरा जा सकता है, उच्छिन्न किया जा सकता है और शत्रु को भी उससे भाग निकलने का सुयोग नहीं मिल पाता है । इसलिए शीघ्र ही वह आक्रमणकारी की आधीनता स्वीकार कर लेता है । परन्तु नदी-दुर्ग को इससे दुगुना कष्ट उठा कर भी काबू में नहीं किया जा सकता है । वहाँ पर जल और जलाधीन अन्न, फल आदि के होने से शत्रु के निर्वाह में कोई बाधा नहीं पड़ती । इसलिए उसका उच्छेद करना कठिन होता है ।
(१) नदी दुर्ग और पर्वत दुर्ग दोनों में से नदी दुर्ग में रहने वाले राजा से ही भूमि लाभ होना श्रेष्ठ है; क्योंकि हाथी, लकड़ी, पुल, बाँध और नौकाओं द्वारा पार करके उसको हस्तगत किया जा सकता है । किनारों को तोड़ कर उसके जल को भी निकाला जा सकता है । परन्तु पर्वतीय दुर्ग पत्थर आदि से सुदृढ़ बना होने के कारण न तो उसको सरलता से घेरा जा सकता है और न ही उस पर चढ़ा जा सकता है । अस्त्रों में से एक को ही नष्ट किया जा सकता है बाकी सुरक्षित बने रहते हैं । बड़े शक्तिशाली आक्रमणकारी का भी, ऊपर से पत्थर, पेड़ आदि गिरा कर प्रतीकार किया जा सकता है ।
(२) निम्नयोधी (नौका में बैठ कर युद्ध करने वाले) और स्थलयोधी शत्रुओं में निम्नयोधी शत्रु से ही भूमि लाभ श्रेष्ठ है; क्योंकि उसके युद्ध का निश्चित समय एवं निश्चित स्थान होता है । इसलिए उस पर विजय प्राप्त करना कठिन नहीं है । परन्तु स्थलयोधी सभी परिस्थितियों में युद्ध करता है । इसलिए उसको शीघ्र ही नहीं जीता जा सकता है ।
(३) खनकयोधी (खाई युद्ध करने वाले) और आकाशयोधी शत्रुओं में खनक योधी शत्रु से ही भूमि लाभ श्रेष्ठ है; क्योंकि उनके लिए खाई तथा अस्त्र दोनों की आवश्यकता होती है । कभी-कभी खाई के लिए उचित स्थान न मिलने के कारण वे
५०४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) एवंविधेभ्यः पृथिवीं लभमानोऽर्थशास्त्रवित् । संहितेभ्यः परेभ्यश्च विशेषमधिगच्छति ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे भूमिसन्धिर्नाम दशमोऽध्यायः, आदितः सप्तशततमः ।
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युद्ध नहीं करने पाते हैं । इसलिए उनको सरलता से वश में किया जा सकता है । परन्तु आकाशयोधी शत्रु केवल शस्त्र द्वारा ही युद्ध करता है । इसलिए उसको जीतना कठिन है ।
( १ ) इस प्रकार अर्थशास्त्रज्ञ विजिगीषु राजा, ऊपर बताये गए संहित एवं दूसरे राजाओं से, पृथ्वी को प्राप्त करता हुआ अपनी उन्नति करता जाय ।
इति षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में भूमिसन्धि नामक दसवां अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ११६ |
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| अध्याय ११ |
अनवसितसन्धि
(१) 'त्वं चाहं च शून्यं निवेशयावह' इत्यनवसितसन्धिः । (२) तयोर्यः प्रत्युपस्थितार्थो यथोक्तगुणां भूमिं निवेशयति सोऽतिसन्धत्ते । (३) तत्रापि स्थलमौदकं वेति । महतः स्थलादलपमौदकं श्रेयः, सातत्यादवस्थितत्वाच्च फलानाम् । (४) स्थलयोरपि प्रभूतपूर्वापरसस्यमल्पवर्षपाकमसक्तारम्भं श्रेयः । (५) औदकयोरपि धान्यवापमधान्यवापाच्छ्रेयः । तयोरल्पबहुत्वे धान्यकान्तादलपान्महद्धान्यकान्तं श्रेयः । महत्यवकाशे हि स्थाल्याश्चानूप्याश्चौषधयो भवन्ति । दुर्गादीनि च कर्माणि प्राभूत्येन क्रियन्ते । कृत्रिमा हि भूमिगुणाः ।
अनवसित संधि
( संधि-विचार ३ )
( १ ) 'आओ, तुम और हम मिलकर शून्य भूमि में उपनिवेश बसायें !' इस प्रकार से जो सन्धि की जाय उसको अनवसित ( अनिश्चित ) सन्धि कहते हैं ।
( २ ) उन दोनों में से जो, पूर्ण साधनों को साथ लेकर पूर्वोक्त गुणसंपन्न भूमि में उपनिवेश बसाता है वही विशेष लाभ में रहता है ।
( ३ ) सर्वगुणसंपन्न स्थलभूमि और जलभूमि, दोनों में जलभूमि को बसाना ही श्रेष्ठ है । अधिक स्थलभूमि की अपेक्षा थोड़ी ही जलभूमि अच्छी है; क्योंकि सदा ही वह फल-फूल आदि से गुलजार बनी रहती है ।
( ४ ) दो स्थल भूमियों में भी वही स्थलभूमि अच्छी होती है, जहाँ वसंत और शरद की फसलें एक समान अच्छी होती हैं तथा जहाँ थोड़ी ही वृष्टि से फसलें पक कर तैयार हो जाती हैं और जिनको सरलता से जोता-बोया जा सकता है ।
( ५ ) दो जलमय भूमियों में वही भूमि उत्तम है, जहाँ सभी धान्य बोये जा सकें और जहाँ धान्य न हों वह भूमि अच्छी नहीं है । उनमें भी कम-ज्यादा को दृष्टि में रखकर उपजाऊ अधिक भूमि ही श्रेष्ठ है; क्योंकि अधिक विस्तार होने से उसके जल स्थल युक्त विभिन्न क्षेत्रों में अनेक प्रकार के अन्न उपजाये जा सकते हैं । क्योंकि
५०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
५०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) खनिधान्यभोगयोः खनिभोगः कोशकरः, धान्यभोगः कोशकोष्ठा-गारकरः धान्यमूला हि दुर्गादीनां कर्मणामारम्भाः । महाविषयविक्रयो वा खनिभोगः श्रेयान् ।
(२) 'द्रव्यहस्तिवनभोगयोर्द्रव्यवनभोगः सर्वकर्मणां योनिः प्रभूतनिधान-क्षमश्च । विपरीतो हस्तिवनभोगः' इत्याचार्याः ।
(३) नेति कौटिल्यः । शक्यं द्रव्यवनमनेकमनेकस्यां भूमौ वापयितुं न हस्तिवनं, हस्तिप्रधानो हि परानीकवध इति ।
(४) वारिस्थलपथभोगयोरनित्यो वारिपथभोगः, नित्यः स्थलपथभोग इति ।
(५) भिन्नमनुष्या श्रेणीमनुष्या वा भूमिरिति । भिन्नमनुष्या श्रेयसी ।
भूमि को अधिक उपजाऊ बनाना अपने हाथ में निर्भर है; इसलिए अधिक भूमि को लेना ही श्रेष्ठ है ।
( १ ) खानयुक्त तथा धान्ययुक्त भूमियों में खानयुक्त भूमि केवल कोष की वृद्धि करती है; किन्तु धान्ययुक्त भूमि कोष और कोष्ठागार दोनों को संपन्न करती है । क्योंकि दुर्ग आदि कर्मों की उन्नति भी धान्यमूलक ही है; अतः धान्ययुक्त भूमि ही श्रेयस्कर होती है । अथवा खानयुक्त भूमि भी उत्तम है, क्योंकि वहाँ से उत्पन्न वस्तुओं का बड़ा भारी व्यापार किया जा सकता है ।
( २ ) 'लकड़ी के जंगल और हाथी के जंगल, दोनों में से कौन श्रेष्ठ है ?' इस संबंध में पूर्वाचार्यों का कहना है कि लकड़ियों का जंगल ही श्रेष्ठ है; क्योंकि एक तो दुर्ग आदि कर्मों में लकड़ी की बड़ी आवश्यकता होती है और दूसरे उसका अधिक-से अधिक संचय सरलता से किया जा सकता है । किन्तु हाथी के जंगलों में यह उपयो-गिता नहीं होती है ।
( ३ ) आचार्य कौटिल्य इस बात को नहीं मानता है । उसका कथन है कि 'लकड़ी के जंगल अपनी इच्छानुसार बनाये जा सकते हैं; हाथियों के जंगल स्वयं नहीं बनाये जा सकते हैं । शत्रु की सेना को नाश करने वाले साधनों में हाथी प्रमुख साधन है । इसलिए हाथियों के जंगल ही श्रेष्ठ हैं ।'
( ४ ) जलमार्ग और स्थलमार्ग में दोनों ही अनित्य ( अस्थायी ) हों तो उनमें जलमार्ग ही उत्तम है । यदि दोनों ही नित्य ( स्थायी ) हों तो स्थलमार्ग ही उत्तम समझना चाहिए ।
( ५ ) 'भिन्न प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि अच्छी है या समान प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि श्रेष्ठ है ?' इन दोनों में भिन्न प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि ही श्रेष्ठ समझनी
प्र० ११६ : अ० ११ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५०७
भिन्नमनुष्याभोग्या भवत्यनुपजाप्या चान्येषाम् । अनापत्सहा तु । विपरीता श्रेणीमनुष्या कोपे महादोषा । (१) तस्यां चातुर्वर्ण्याभिनिवेशे सर्वभोगसहत्वादवरवर्णप्राया श्रेयसी । बाहुल्याद्ध्रुवत्वाच्च कृष्याः कर्षणवती । कृष्याश्चान्येषां चारम्भाणां प्रयोजकत्वाद् गोरक्षकवती । पण्यनिचयार्णनुग्रहादाढ्यवणिक्वती । (२) भूमिगुणानामपाश्रयः श्रेयान् । (३) दुर्गापाश्रया पुरुषापाश्रया वा भूमिरिति । पुरुषापाश्रया श्रेयसी । पुरुषवद्धि राज्यम् । अपुरुषा गौर्वन्ध्येव किं दुहीत । (४) महाक्षयव्ययनिवेशां तु भूमिमवाप्तुकामः पूर्वमेव क्रेतारं पणेत । दुर्बलमराजबीजिनं निरुत्साहमपक्षमन्यायवर्त्तिं व्यसनिनं दैवप्रमाणं यत्किञ्चनकारिणं वा ।
चाहिए; क्योंकि ऐसी भूमि को विजिगीषु शीघ्र ही अपने कब्जे में कर लेता है, और क्योंकि भिन्न प्रकृति के कारण दूसरे शत्रु भी उन्हें बहका नहीं सकते हैं । ऐसे लोग आपत्तिसह भी नहीं होते हैं । किन्तु समान प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि को शत्रु बहका सकते हैं । एकता के कारण वहाँ की प्रजा हर तरह की आपत्तियों को सहन करने के लिए तैयार रहती हैं और कुपित होने पर राजा का भी उच्छेद कर देती है ।
( १ ) उस भूमि में चारों वर्णों के लोगों की स्थिति के संबंध में यह विचार कर लेना चाहिए कि सब तरह के दुःख-सुख सहन करने वाले शूद्र, ग्वाले आदि नीची जाति के मनुष्यों वाली भूमि ही श्रेष्ठ होती है । क्योंकि खेती की अधिकता और निश्चित फलवती होने के कारण ऐसी भूमि श्रेयस्कर होती है । कृषि संबंधी व्यापार तथा अन्य अनेक कार्य गाय एवं गोपालकों पर ही निर्भर हैं । इसलिए गाय और ग्वालों से युक्त भूमि ही श्रेष्ठ है । व्यापार के लिए धान्य आदि का संचय तथा ब्याज पर ऋण आदि देकर उपकार करने के कारण व्यापारी और धनवान् व्यक्तियों से युक्त भूमि भी श्रेष्ठ होती है ।
( २ ) भूमि के उक्त सभी गुणों में से आश्रय या रक्षा, उसके सर्वोच्च गुण हैं ।
( ३ ) 'दुर्गों का आश्रय देने वाली भूमि अच्छी होती है या मनुष्यों का ?' इन दोनों में मनुष्यों का सहारा देने वाली भूमि श्रेष्ठ है, क्योंकि राज्य कहते ही उसको है, जहाँ बहुत से पुरुष निवास करते हों; 'पुरुषवद्धि राज्यम्' । पुरुषहीन भूमि तो वन्ध्या गो के समान है ।
( ४ ) जन-धन का अत्यधिक व्यय करके बसाई जाने वाली भूमि को यदि विजिगीषु प्राप्त करना चाहे तो पहिले वह उस भूमि का ऐसा खरीदार राजा तैयार कर ले, जो दुर्बल, अराजजीवी ( जो किसी राजवंश का न हो ), उत्साहहीन, अपक्ष
५०८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) महाक्षयव्ययनिवेशायां हि भूमौ दुर्बलो राजबीजी निविष्टः सगन्धाभिः प्रकृतिभिः सह क्षयव्ययेनावसीदति । (२) बलवानराजबीजी क्षयव्ययभयादसगन्धाभिः प्रकृतिभिस्त्यज्यते । (३) निरुत्साहस्तु दण्डवानपि दण्डस्याप्रणेता सदण्डः क्षयव्ययेनावभज्यते । (४) कोशवानप्यपक्षः क्षयव्ययानुग्रहहीनत्वान्न कुतश्चित्प्राप्नोति । (५) अन्यायवृत्तिर्निविष्टमप्युत्थापयेत्, स कथमिनिविष्टं निवेशयेत् । (६) तेन व्यसनी व्याख्यातः । (७) दैवप्रमाणो मानुषहीनो निरारम्भो विपन्नकर्मारम्भो वावसीदति । (८) यत्किञ्चनकारी न किंचिदासादयति । स चैषां पापिष्ठतमो भवति ।
( बेसहारा ), अन्यायवृत्ति, व्यसनी, भाग्यवादी और यत्किंचनकारी ( जो मन में आया, कर दिया ) हो ।
( १ ) जन-धन आदि का अत्यधिक व्यय करके बसाई जाने योग्य भूमि में जब शक्तिहीन राजवंश में पैदा हुआ राजा उपनिवेश बसाता है तो अत्यधिक पुरुषों का 'क्षय और धन का व्यय होने के कारण अपने सहायकों, सजातियों और अमात्य आदि प्रकृतियों के साथ वह क्षीण हो जाता है ।
( २ ) राजवंश में पैदा न हुए बलवान् राजा को क्षय-व्यय के भय से उसके विजातीय अमात्य आदि सहायक उसको छोड़ देते हैं ।
( ३ ) सेना के होते हुए भी उत्साहहीन राजा उसका यथोचित उपयोग नहीं कर पाता है । इसलिए धन-जन का व्यय-क्षय हो जाने के कारण सेना के सहित ही वह नष्ट हो जाता है ।
( ४ ) कोषसंपन्न मित्रहीन राजा क्षय-व्यय में उचित सहायता न मिलने के कारण नष्ट हो जाता है ।
( ५ ) प्रजा पर अन्याय करने वाले स्थायी रूप से बसे हुए राजा को जब प्रजा उखाड़ फेंकती है तब नये उपनिवेशों को बसाना उसके लिए कैसे संभव हो सकता है ?
( ६ ) यही हाल व्यसनी राजा का भी होता है ।
( ७ ) भाग्य पर भरोसा करने वाला पौरुषहीन राजा किसी नये कार्य को आरंभ नहीं करता है; यदि आरंभ करता भी है तो विघ्न के भय से उसे अधूरा ही छोड़ देता है; और इस प्रकार जन-धन की व्यर्थ हानि करने के बाद वह स्वयं भी नष्ट हो जाता है ।
( ८ ) बिना विचारे कार्य करने वाला राजा कभी फूलता-फलता नहीं है; किन्तु
प्र० ११६ : अ० ११ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५०९
(१) 'यत्किंचिदारभमाणो हि विजिगीषोः कदाचिच्छिद्रमासादयेत्' इत्याचार्याः। (२) 'यथा छिद्रं तथा विनाशमप्यासादयेत्' इति कौटिल्यः । (३) तेषामलाभे यथा पाष्णिग्राहोपग्रहे वक्ष्यामस्तथा भूमिमवस्थाप- येत् । इत्यभिहितसन्धिः । (४) गुणवतीमादेयां वा भूमिं बलवता क्रयेण याचितः सन्धिमवस्थाप्य दद्यात् । इत्यनिभृतसन्धिः । (५) समेन वा याचितः कारणमवेक्ष्य दद्यात् । 'प्रत्यादेया मे भूमि- र्वश्या वा, अनया प्रतिबद्धः परो मे वश्यो भविष्यति, भूमिविक्रयाद्वा मित्र- हिरण्यलाभः कार्यसामर्थ्यकरो मे भविष्यति' इति ।
ऊपर कहे गए सभी राजाओं की अपेक्षा विजिगीषु के लिए वह बहुत खतरनाक सिद्ध होता है ।
( १ ) पूर्वाचार्यों का कहना है कि किसी कार्य को प्रारंभ करता हुआ शत्रु यदि विजिगीषु के किसी दोष का पता लगा ले तो वह यत्किंचनकारी राजा के द्वारा विजिगीषु को हानि पहुँचा सकता है; क्योंकि विजिगीषु उसे मूर्ख समझ कर उससे पीठ फेरे रहता है ।
( २ ) परन्तु आचार्य कौटिल्य का मत है कि वह यत्किंचनकारी विजिगीषु के दोषों को जानने की तरह स्वयं को भी नष्ट कर सकता है; क्योंकि विजिगीषु तो उसके अनेक दोषों से परिचित रहता है ।
( ३ ) यदि इन उपर्युक्त राजाओं में से कोई उस व्यय-क्षयी भूमि को खरीदने के लिए तैयार न हो तो जो तरीका आगे पाष्णिग्राह के साथ सन्धि के लिए बताया जायेगा उसी के अनुसार उस भूमि को बसाने की व्यवस्था करे । इसीका नाम अभिहितसंधि है । अभिहितसन्धि, अर्थात् लेन-देन से विचलित न होकर बराबर बनी रहना ।
( ४ ) गुणवती और अदेय भूमि को यदि बलवान् सामंत खरीदना चाहे तो उससे 'अवसर आने पर आप मेरी सहायता करेंगे' ऐसी सामान्य संधि करके वह भूमि उसके हाथ बेच देनी चाहिए, क्योंकि प्रबल सामंत दुर्बल से अविश्वास करके अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ भी सकता है । इसको अनिभृतसन्धि कहते हैं ।
( ५ ) यदि समानशक्ति राजा उस भूमि को खरीदना चाहे तो नीचे लिखे कारणों पर अच्छी तरह विचार करके वह भूमि उसके हाथ बेच देनी चाहिए । वे कारण हैं : बेच देने पर यह भूमि कालान्तर में मेरे पास आ सकेगी, अथवा बेच देने पर भी मैं इससे लाभ उठाता रहूँगा, अथवा इस भूमि के साथ संबंध बना रहने के कारण दूसरा
५१० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण
(१) तेन हीनः क्रेता व्याख्यातः । (२) एवं मित्रं हिरण्यं च सजनामजनां च गाम् । लभमानोऽतिसन्धत्ते शास्त्रवित्सामवायिकान् ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणेऽनवसितसन्धिनार्म एकादशोऽध्यायः, आदितोऽष्टशततमः ।
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शत्रु मेरे वश में हो जायेगा, अथवा इसको बेच देने पर मैं मित्र तथा धन-संपति से संपन्न हो जाऊँगा ।'
( १ ) इसी प्रकार हीनशक्ति खरीददार के संबंध में भी समझना चाहिए ।
( २ ) अर्थशास्त्रज्ञ राजा इस प्रकार मित्र, धन, संपत्ति, आवाद और वंजर भूमि को प्राप्त करता हुआ दूसरे राजाओं की अपेक्षा सदा ही विशेष लाभ प्राप्त करता है ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में अनवसितसन्धि नामक ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ११६ | |
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| अध्याय १२ | # कर्मसन्धि |
(१) ‘त्वं चाहं च दुर्गं कारयावहे’ इति कर्मसन्धिः । (२) तयोर्यो दैवकृतमविषह्यमल्पव्ययारम्भं दुर्गं कारयति, सोऽतिसन्धत्ते । (३) तत्रापि स्थलनदीपर्वतदुर्गाणामुत्तरोत्तरं श्रेयः । (४) सेतुबन्धयोरप्याहार्योदकात्सहोदकः श्रेयान् । सहोदकयोरपि प्रभूतवापस्थानः श्रेयान् । (५) द्रव्यवनयोरपि यो महत् सारवद्द्रव्याटवीकं विषयान्ते नदीमातृकं द्रव्यवनं छेदयति, सोऽतिसन्धत्ते । नदीमातृकं हि स्वाजीवमपाश्रयश्चापदि भवति । (६) हस्तिवनयोरपि यो बहुशूरमृगं दुर्बलप्रतिवेशमन्तावक्लेशं विषयान्ते हस्तिवनं बध्नाति, सोऽतिसन्धत्ते ।
कर्मसन्धि
( सन्धि-विचार ४ )
( १ ) ‘आप और मैं मिलकर दुर्ग बनवायें’ इस प्रकार किसी कार्य सम्बन्धी वस्तु का नाम लेकर जो सन्धि की जाती है उसको कर्मसन्धि कहते हैं।
( २ ) इस प्रकार की सन्धि करने वाले विजिगीषु और उसका साथी राजा, दोनों में से वही विशेष लाभ में रहता है जो शत्रुओं से दुर्भेद्य दुर्गम स्थान में अल्प व्यय करके दुर्ग बनवाता है।
( ३ ) ऐसे दुर्गों में भी स्थल में बने दुर्ग की अपेक्षा जल में बना दुर्ग श्रेष्ठ है और उससे भी पर्वतीय प्रदेश में बना हुआ दुर्ग श्रेष्ठ होता है।
( ४ ) सेतुबंधों में वर्षा जल से भरने वाले की अपेक्षा स्वाभाविक अर्थात् नहर आदि के जल से भरने वाला सेतुबंध उत्तम है। उनमें भी वह सेतुबन्ध श्रेष्ठ है जो खेती योग्य पर्याप्त भूमि के निकट हो।
( ५ ) जो राजा अनेक पदार्थों को पैदा करने वाले जंगलों में नदियों से सींचे जाने योग्य फल-फूलों को पैदा करने वाले अपने सीमाप्रान्त के जंगलों को ठीक करता है। वही विशेष लाभ में रहता है। क्योंकि नदियों से सींचे जाने वाले स्थान आजीविका के साधन होने के साथ-साथ विपत्ति काल में आश्रय देने वाले भी होते हैं।
( ६ ) हाथी और मृग के जंगलों में भी जो राजा शक्तिशाली जंगली जानवरों
५१२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) तत्रापि 'बहुकुण्ठालपशूरयोरल्पशूरं श्रेयः। शूरेषु हि युद्धम्। अल्पाः शूरा बहूनशूरान् भञ्जन्ति, ते भग्नाः स्वसैन्यावघातिनो भवन्ति' इत्याचार्याः।
(२) नेति कौटिल्यः। कुण्ठा बहवः श्रेयांसः, स्कन्धविनियोगादनेकं कर्म कुर्वाणाः स्वेषामपाश्रया युद्धे, परेषां दुर्धर्षा विभीषणाश्च।
(३) बहुषु हि कुण्ठेषु विनयकर्मणा शक्यं शौर्यमाधातुं, न त्वेवाल्पेषु शूरेषु बहुत्वमिति।
(४) खन्योरपि यः प्रभूतसारामदुर्गमार्गामल्पव्ययारम्भां खनिं खानयति, सोऽतिसन्धत्ते।
(५) तत्रापि 'महासारमल्पसारं वा प्रभूतमिति। महासारमल्पं श्रेयः। वज्रमणिमुक्ताप्रवालहेमरूप्यधातुर्हि प्रभूतमल्पसारमत्यर्थेण ग्रसते' इत्याचार्याः।
से युक्त, दुर्बलों के लिए भी सुखकर और अनेक जाने-आने के मार्गों से युक्त हस्तिवनों को अपने प्रदेश में स्थापित करता है वह विशेष लाभ में रहता है।
(१) उन हाथी के जंगलों में भी अशक्त अधिक संख्यावाले हस्तिवन की अपेक्षा शक्तिशाली थोड़े हाथियों वाले जंगल ही श्रेष्ठ हैं; क्योंकि बलवान् हाथियों के भरोसे ही युद्ध होता है। इसके विपरीत पुरातन आचार्यों का कहना है कि अल्पसंख्यक शूर हाथी बहुसंख्यक कायर हाथियों को भगा देते हैं और वे तितर-वितर हो कर अपनी ही सेना को कुचल डालते हैं।
(२) किन्तु कौटिल्य इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कथन है कि शक्तिहीन बहुत हाथियों का होना ही श्रेयस्कर है; क्योंकि सेना के अनेक विभागों में उनसे अनेक कार्य लिए जा सकते हैं। इसलिए युद्ध में वे अच्छे सहायक, शत्रुओं को घबड़ा देने वाले (अधिक होने के कारण) और शत्रु के वश में न आने वाले होते हैं।
(३) संख्या में अधिक हाथी यदि सामर्थ्यहीन भी हों तो कोई हानि नहीं है; क्योंकि युद्ध सम्बन्धी शिक्षाओं के द्वारा उन्हें समर्थ बनाया जा सकता है; किन्तु शक्तिशाली थोड़े हाथियों की संख्या सहसा बढ़ाई नहीं जा सकती है।
(४) खानों में भी, जो राजा उत्तम वस्तुएँ देने वाली, दुर्गम मार्गों से युक्त और अल्प व्ययकर खानों को खुदवाता है वह विशेष लाभ प्राप्त करता है।
(५) उन खानों में भी मणि-माणिक्य आदि बहुमूल्य वस्तुओं को थोड़े परिमाण में उत्पन्न करने वाली खान श्रेष्ठ है? अथवा अधिक परिमाण वाली अल्पमूल्य की वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली खान श्रेष्ठ है? इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों का कथन है कि 'बहुमूल्य थोड़ी वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली खान अच्छी है; क्योंकि हीरा,
प्र० ११६ : अ० १२ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५१३
(१) नेति कौटिल्यः। चिरादल्पो महासारस्य क्रेता विद्यते। प्रभूतः सातत्यादल्पसारस्य। (२) एतेन वणिकपथो व्याख्यातः। (३) तत्रापि 'वारिस्थलपथयोर्वारिपथः श्रेयान्, अल्पव्ययव्यायामः प्रभूतपण्योदयश्च' इत्याचार्याः। (४) नेति कौटिल्यः। संरुद्धगतिरसार्वकालिकः प्रकृष्टभययोनिर्निष्प्रतिकारश्च वारिपथः। विपरीत: स्थलपथः। (५) वारिपथे तु कूलसंयानपथयोः कूलपथः पण्यपट्टणबाहुल्याच्छ्रेयान्। नदीपथो वा सातत्याद्विषह्याबाधत्वाच्च। (६) स्थलपथेऽपि। 'हैमवतो दक्षिणापथाच्छ्रेयान् हस्त्यश्वगन्धदन्ताजिनरूप्यसुवर्णपण्याः सारवत्तराः' इत्याचार्याः।
मणि, मोती, मूंगा, सोना, चाँदी आदि बहुमूल्य थोड़ी वस्तुएँ, अल्प मूल्य की अधिक वस्तुओं को भी दबा लेती हैं।'
( १ ) किन्तु कौटिल्य इस मन्तव्य से सहमत नहीं है। वह कहता है कि 'मूल्यवान् वस्तु का खरीददार बहुत समय बाद कोई विरला ही मिलता है; किन्तु अल्पमूल्य वस्तुओं के खरीदारों की कमी नहीं रहती है।'
( २ ) इसी प्रकार व्यापारिक मार्गों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए।
( ३ ) स्थलमार्ग और जलमार्ग में से जलमार्ग द्वारा व्यापार करना श्रेयस्कर है; क्योंकि उसमें श्रम तथा व्यय अधिक नहीं करना पड़ता और उसके द्वारा माल आसानी से लाया-ले-जाया जा सकता है—ऐसा प्राचीन आचार्यों का मत है।
( ४ ) इसके विपरीत आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'विपत्तिकाल में जलमार्ग सब ओर से रोका जा सकता है। सभी ऋतुओं में उससे जाना-आना भी नहीं हो सकता है। स्थल मार्ग की अपेक्षा वह भयजनक और अप्रतीकारक भी है। किन्तु स्थल मार्ग में ये सभी दिक्कतें नहीं होती हैं। इसलिए स्थलमार्ग ही श्रेष्ठ है।'
( ५ ) जलमार्ग दो प्रकार का होता है : एक तो किनारे-किनारे का मार्ग ( कूलपथ ) और दूसरा जल के बीच का मार्ग ( संयानपथ )। इन दोनों में कूलपथ ही श्रेष्ठ होता है, क्योंकि उस पर अनेक व्यापारिक नगर बसे होते हैं, जिससे बड़ा लाभ उठाया जा सकता है। अथवा संयानपथ भी उत्तम समझना चाहिए; क्योंकि नदी में निरन्तर पानी भरा रहता है, जिससे मार्ग में कोई उत्कट बाधा उपस्थित नहीं हो पाती है।
( ६ ) 'स्थलमार्ग में भी दक्षिणापथ की अपेक्षा उत्तरापथ श्रेष्ठ है, क्योंकि उस
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५१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
५१४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) नेति कौटिल्यः । कम्बलाजिनाश्वपण्यवर्ज्याः शंखवज्रमणिमुक्ता-सुवर्णपण्याश्च प्रभूततरा दक्षिणापथे ।
(२) दक्षिणापथेऽपि बहुखनिः सारपण्यः प्रसिद्धगतिरल्पव्यायामो वा वणिक्पथः श्रेयान् । प्रभूतविषयो वा फल्गुपण्यः ।
(३) तेन पूर्वः पश्चिमश्च वणिक्पथो व्याख्यातः ।
(४) तत्रापि चक्रपादपथयोश्चक्रपथो विपुलारम्भत्वाच्छ्रेयान् । देशकालसम्भावनो वा खरोष्ट्रपथः ।
(५) आभ्यामंसपथो व्याख्यातः ।
(६) परकर्मोदयो नेतुः क्षयो वृद्धिविपर्यये । तुल्ये कर्मपथे स्थानं ज्ञेयं स्वं विजिगीषुणा ॥
ओर हाथी, घोड़े, कस्तूरी, दांत, चाप, चांदी और सुवर्ण आदि बहुमूल्य विक्रेय वस्तुयें अधिकता से मिल जाती हैं।' यह प्राचीन आचार्यों का मत है ।
( १ ) परन्तु कौटिल्य का कहना है कि 'कंबल, चमड़ा और घोड़े इन वस्तुओं को छोड़ कर हाथी आदि तथा शंख, हीरा, मणि, मोती, सुवर्ण आदि अन्य अनेक विक्रेय वस्तुएँ उत्तर की अपेक्षा दक्षिण की ओर अधिक होती हैं । इसलिए दक्षिणापथ ही श्रेष्ठ है ।'
( २ ) दक्षिणापथ में भी वह मार्ग उत्तम समझना चाहिए, जो खान तथा विक्रेय वस्तुओं से युक्त, आने-जाने में सुगम और थोड़े से परिश्रम से सिद्ध होने वाला हो । अथवा वह मार्ग श्रेष्ठ समझना चाहिए जहाँ थोड़े कीमत की वस्तुयें बहुतायत से मिल सकें या जहाँ बहुमूल्य वस्तुओं से अधिक खरीदार हों ।
( ३ ) इसी प्रकार पूरब और पश्चिम के व्यापारिक मार्गों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।
( ४ ) इन व्यापारिक मार्गों में भी पैदल मार्ग की अपेक्षा सवारी योग्य मार्ग को उत्तम समझना चाहिए । क्योंकि ऐसे मार्गों से बहुत व्यापार किया जा सकता है । विक्रेय वस्तुएँ अधिक तादाद में लायी-ले जायी जा सकती हैं। देश-काल के अनुसार गधों और ऊँटों का मार्ग भी श्रेष्ठ समझना चाहिए, क्योंकि उनसे भी अधिक व्यापार किया जा सकता है ।
( ५ ) इसी प्रकार कन्धों के द्वारा भार ढोने वाले बैल आदि के व्यापारिक मार्गों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए ।
( ६ ) शत्रु का अपने कार्यों से लाभ होना ही विजिगीषु का क्षय समझना चाहिए और अपने कार्यों की सिद्धि में ही सफलता समझनी चाहिए । यदि कार्यफल दोनों को बराबर मिले तो विजीगीषु को पूर्ववत् एक जैसा समझना चाहिए । उसने न तो उन्नति की न तो अवनति ।
प्र० ११६ : अ० १२ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५१५
(१) अल्पागमातिव्ययता क्षयो वृद्धिविपर्यये ।
समायव्ययता स्थानं कर्मसु ज्ञेयमात्मनः ॥
(२) तस्मादल्पव्ययारम्भं दुर्गादिषु महोदयम् ।
कर्म लब्ध्वा विशिष्टाः स्यादित्युक्ताः कर्मसन्धयः ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे कर्मसन्धिर्नाम द्वादशोऽध्यायः आदितो नवोत्तरशततमः ।
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( १ ) थोड़ी आय तथा अधिक खर्च हो तो क्षय, इसके विपरीत वृद्धि समझनी चाहिए । इसी प्रकार बराबर आय व्यय में समान अवस्था समझनी चाहिए ।
( २ ) इसलिये विजिगीषु को चाहिए कि वह दुर्ग आदि के कार्यों में थोड़ा खर्च करके ही महान् फल प्राप्त करने की चेष्टा करे । महान् फल देने वाले कार्य को प्राप्त करके ही विजिगीषु अपने शत्रु से बढ़ सकता है । यही कर्मसन्धि है ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिककरण में कर्मसन्धि नामक बारहवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ११७ | पार्ष्णिग्राहचिन्ता |
|---|---|
| अध्याय १३ |
(१) संहत्यारिविजिगीष्वोरमित्रयोः पराभियोगिनोः पार्ष्णिं गृह्णतोर्यः शक्तिसम्पन्नस्य पार्ष्णिं गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते। शक्तिसम्पन्नो ह्यमित्रमुच्छिद्य पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात्, न हीनशक्तिरलब्धलाभ इति।
(२) शक्तिसाम्ये यो विपुलारम्भस्य पार्ष्णिं गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते। विपुलारम्भो ह्यमित्रमुच्छिद्य पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात्, नाल्पारम्भः सक्तचक्र इति।
(३) आरम्भसाम्ये यः सर्वसन्दोहेन प्रयातस्य पार्ष्णिं गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते। शून्यमूलो ह्यस्य सुकरो भवति, नैकदेशबलप्रयातः कृतपार्ष्णिप्रतिविधान इति।
पार्ष्णिग्राह-चिन्ता
(१) विजिगीषु और शत्रु जब पृष्ठवर्ती (पार्ष्णि) होकर किसी राजा पर चढ़ाई करें तो उनमें से वही विशेष लाभ प्राप्त करता है, जो कि दूसरे के साथ युद्ध में फँसे हुए अपने शत्रुभूत दो राजाओं में से अधिक शक्तिशाली राजा की पार्ष्णि को ग्रहण करता है क्योंकि शक्तिशाली राजा अपने शत्रु का उच्छेद कर बाद में अपने पार्ष्णिग्राह का भी उच्छेद कर देता है। हीनशक्ति शत्रुराजा तो अपने शत्रु का उच्छेद करने पर भी वैसे ही निर्बल बना रहता है, उसकी ओर से आक्रमण की कोई आशंका नहीं हो सकती है। इसलिए उसका पार्ष्णिग्राह बनने में कोई लाभ नहीं है।
(२) यदि दोनों युद्ध-निरत शत्रु समानशक्ति हों तो उसी का पार्ष्णिग्राह बनना लाभप्रद है, जो कि सभी साधनों से सम्पन्न हो। क्योंकि सर्वसाधन-सम्पन्न शत्रु राजा अपने शत्रु का उच्छेद कर सकता है। जो कि साधनहीन और अपनी बिखरी सेना को बटोरने में ही लगा हो, ऐसा शत्रु न तो अपने शत्रु को जीत ही सकता है और न ही वह विजिगीषु के लिए भय का कारण है। इसलिए ऐसे शत्रु का पार्ष्णिग्राह बनने में कोई लाभ नहीं है।
(३) यदि दोनों ही सर्वसाधनसम्पन्न हों तो ऐसे राजा का पार्ष्णिग्राह बनने में विशेष लाभ है, जो अपने संपूर्ण सैन्य को लेकर युद्ध के लिये कूच कर गया हो। क्योंकि जिसका मुख्य भाग (राज्य या राजधानी) असुरक्षित हो उस पर शीघ्र ही विजय प्राप्त की जा सकती है। किन्तु जिसने अपनी पार्ष्णि की रक्षा के लिए प्रबन्ध
प्र० ११७ : अ० १३ ] पार्ष्णिग्राह-चिन्ता ५१७
(१) बलोपादानसाम्ये यश्चलामित्रं प्रयातस्य पाष्णिं गृह्णाति, सोऽति-संधत्ते। चलामित्रं प्रयातो हि सुखेनवाप्तसिद्धिः पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात्, न स्थितामित्रं प्रयात:। असौ हि दुर्गप्रतिहतः। पार्ष्णिग्राहे च प्रतिनिवृत्त-स्थितेनामित्रेणावगृह्यते। (२) तेन पूर्वे व्याख्याताः। (३) शत्रुसाम्ये यो धार्मिकामियोगिनः पाष्णिं गृह्णाति सोऽतिसन्धत्ते। धार्मिकामियोगी हि स्वेषां च द्वेष्यो भवति। अधार्मिकामियोगी सम्प्रियः। (४) तेन मूलहरतादात्विककदर्य्याभियोगिनां पार्ष्णिग्रहणं व्याख्यातम्। (५) मित्राभियोगिनोः पार्ष्णिग्रहणे त एव हेतवः। (६) मित्रममित्रं चाभियुञ्जानयोर्यो मित्राभियोगिनः पाष्णिं गृह्णाति,
कर थोड़ी सेना को साथ ले युद्ध के लिए प्रस्थान किया हो उसको जीतना सरल नहीं है। वह अपने पार्ष्णिग्राह का अच्छी तरह प्रतीकार कर सकता है।
( १ ) वरावर सेनाओं को साथ ले जाने वाले राजाओं में से उसी का पार्ष्णिग्राह बनना ठीक है, जिसने अपने दुर्गरहित शत्रु पर आक्रमण किया हो। क्योंकि सहज ही में अपने दुर्गरहित शत्रु को वश में करके बाद में वह अपने पार्ष्णिग्राह का भी उच्छेदन कर सकता है। परन्तु दुर्गसम्पन्न राजा के साथ युद्ध में लगे शत्रु पर चढ़ाई करने में कोई लाभ नहीं है, प्रत्युत हानि की संभावना अधिक है। क्योंकि युद्ध से खिसिया कर जब वह वापिस लौटता है तो पार्ष्णिग्राह के साथ ही युद्ध में जुट जाता है, जिससे पार्ष्णिग्राह की हानि ही होती है, लाभ नहीं।
( २ ) इसी प्रकार हीनशक्ति पार्ष्णिग्राही, अल्पारंभ पार्ष्णिग्राही और कुछ सेना ले जाने वाले पार्ष्णिग्राही राजाओं के संवन्ध में भी समझ लेना चाहिए।
( ३ ) सर्वथा समानशक्ति शत्रुओं में उसी का पार्ष्णिग्राह बनने में विशेष लाभ है, जिसने अपने किसी धर्मात्मा शत्रु पर आक्रमण किया हो। क्योंकि ऐसा करने पर अपने और पराये सभी उससे द्वेष करने लगते हैं, और ऐसी स्थिति में पार्ष्णिग्राह सरलता से ही उसको अपने वश में कर सकता है। परन्तु अधर्मी शत्रु पर आक्रमण करने वाला राजा सभी का प्रिय हो जाता है और वह निश्चित ही अपने शत्रु को जीत लेता है इसलिए ऐसे राजा का पार्ष्णिग्राह बनने में कोई लाभ नहीं है।
( ४ ) इसी प्रकार मूलहर, तादात्विक और कदर्य राजाओं पर आक्रमण करने वाले पार्ष्णिग्राह के लाभालाभ के संबन्ध में भी समझना चाहिए—मूलहर और तादात्विक में से मूलहर पर और तादात्विक तथा कदर्य में से कदर्य पर आक्रमण करने में विशेष लाभ है।
( ५ ) मित्रराजाओं का पार्ष्णिग्रहण बनने के भी वे ही नियम समझने चाहिए, जो कि अतिसंधि में निर्देश किये गये हैं।
( ६ ) मित्र और शत्रु पर आक्रमण करने वाले राजाओं में से, जो मित्र पर
५१७ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
सोऽतिसन्धत्ते । मित्राभियोगी हि सुखेनावाप्तसिद्धिः पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात् । सुकरो हि मित्रेण सन्धिर्नाममित्रेणेति ।
(१) मित्रममित्रं चोद्धरतोर्योऽमित्रोद्धारिणः पार्ष्णिं गृह्णाति, सोऽतिसन्धत्ते । वृद्धमित्रो ह्यमित्रोद्धारी पार्ष्णिग्राहमुच्छिन्द्यात्, नेतरः स्वपक्षोपघाती ।
(२) तयोरलब्धलाभापगमने यस्यामित्रो महतो लाभाद्वियुक्तः क्षयव्ययाधिको वा, स पार्ष्णिग्राहोऽतिसन्धत्ते । लब्धलाभापगमने यस्यामित्रो लाभेन शक्त्या हीनः, स पार्ष्णिग्राहोऽतिसन्धत्ते । यस्य वा यातव्यः शत्रोर्विग्रहापकारसमर्थः स्यात् ।
(३) पार्ष्णिग्राहयोरपि यः शक्यारम्भबलोपादानाधिकः स्थितशत्रुः पाश्र्वस्थायी वा सोऽतिसन्धत्ते । पार्श्वस्थायी हि यातव्याभिसारो मूलबाधकश्च भवति । मूलाबाधक एव पश्चात्स्थायी ।
आक्रमण करने वाले राजा का पार्ष्णिग्राह बनता है वही विशेष लाभ में रहता है । क्योंकि मित्र पर आक्रमण करने वाला राजा सहज ही में सिद्धि प्राप्त कर लेता है और बलवान् होकर वह पार्ष्णिग्राह का भी उच्छेद कर सकता है। इसके विपरीत, क्योंकि मित्र के साथ संधि हो जाना सुकर होता है, शत्रु के साथ कठिनता से ही संधि हो सकती है। अतः शत्रु पर आक्रमण करने वाला राजा न तो सिद्धिलाभ कर सकता है और न तो पार्ष्णिग्राह की कुछ हानि कर सकता है ।
( १ ) मित्र और शत्रु का उन्मूलन ( उद्धार ) करने वाले राजाओं में से जो शत्रु का उद्धार करने वाले राजा का पार्ष्णिग्राह बनता है वही विशेष लाभ में रहता है । क्योंकि शत्रु का उद्धार करने वाला राजा स्वपक्ष और मित्रपक्ष से संपन्न होकर पार्ष्णिग्राह का भी उच्छेद कर सकता है । परन्तु दूसरा, जो मित्र का ही उन्मूलन करना चाहता है, अपने ही पक्ष का घातक होने के कारण, कभी भी पार्ष्णिग्राह का उच्छेद नहीं कर सकता है ।
( २ ) मित्र और शत्रु का उन्मूलन करने वाले राजाओं के कोई विशेष लाभ प्राप्त किये वगैर ही लौट आने पर, उनमें से ऐसे शत्रु पर आक्रमण करने में लाभ है, जिसने कुछ भी लाभ प्राप्त नहीं किया और जिसका अधिक क्षयव्यय हुआ हो । क्योंकि वह शत्रु को क्षीण कर पार्ष्णिग्राह को भी हानि पहुँचा सकता है । किन्तु विशेष लाभ प्राप्त करके लौट आने पर जिसका शत्रु लाभ तथा शक्ति से हीन हो, ऐसे आक्रमणकारी राजा का पार्ष्णिग्राह बनने में लाभ रहता है । क्योंकि लाभ और शक्ति से संपन्न शत्रु को वश में न कर सकने के कारण वह पार्ष्णिग्राह का कुछ नहीं बिगाड़ पाता है । अथवा जो यातव्य और विजिगीषु के साथ युद्ध करके अपकार करने में असमर्थ हो उसकी पार्ष्णि को दबाने वाला राजा भी विशेष लाभ में रहता है ।
( ३ ) दो समान गुण वाले पार्ष्णिग्राह राजाओं में वही पार्ष्णिग्राह विशेष लाभ
प्र० ११७ : अ० १३ ] पार्ष्णिग्राह-चिन्ता ५१९
(१) पार्ष्णिग्राहास्त्रयो ज्ञेयाः शत्रोश्चेष्टानिरोधकाः । सामन्ताः पृष्ठतोवर्गः प्रतिवेशौ च पार्श्वयोः ॥
(२) अरेर्नेतृश्च मध्यस्थो दुर्बलोऽन्तर्धिरुच्यते । प्रतिघाते बलवतो दुर्गाटव्यपसारवान् ॥
(३) मध्यमं त्वरिविजिगीष्वोर्लिप्समानयोर्मध्यमस्य पार्ष्णि गृह्णतो लब्धलाभापगमने यो मध्यमं मित्राद्वियोजयति, अमित्रं च मित्रमाप्नोति, सोऽतिसन्धत्ते । सन्धेयश्च शत्रुरुपकुर्वाणो, न मित्रं मित्रभावादुत्क्रान्तम् ।
(४) तेनोदासीनलिप्सा व्याख्याता ।
(५) 'पार्ष्णिग्रहणाभियानयोस्तु मन्त्रयुद्धादभ्युच्चयः । व्यायामयुद्धे हि क्षयव्ययाभ्यामुभयोरवृद्धिः । जित्वापि हि क्षीणदण्डकोशः पराजितो भवति' इत्याचार्याः ।
में रहता है, जिसके पास कार्यसिद्धि के लिए दूसरे की अपेक्षा अधिक सेना हो और जो दुर्ग आदि से संपन्न हो, अथवा जो यातव्य का पड़ोसी हो । क्योंकि निकटवर्ती को यदि विशेष लाभ होता है तो वह यातव्य के साथ मिलकर विजिगीषु के मूलस्थान को भी बाधा पहुँचा सकता है । परन्तु दूर रहनेवाले से बाधा की आशंका नहीं रहती है ।
( १ ) शत्रु के कार्य व्यापार को रोकने वाले पार्ष्णिग्राह तीन प्रकार के होते हैं : १. आक्रमण करने वाले राजा के समीपवर्ती २. पीछे रहने वाले और ३. इधर-उधर के, पार्श्ववर्ती ।
( २ ) आक्रमणकारी विजिगीषु और उसके शत्रु के बीच का दुर्बल राजा अन्तर्धि कहलाता है । केवल बलवान् का मुकाबला होने पर वह दुर्ग तथा घने जंगल ( अटवी ) में छिप जाता है । इसीलिए उसका ऐसा अन्वर्थ नाम पड़ा ।
( ३ ) मध्यम राजा को वश में करने की इच्छा रखने वाले शत्रु और विजिगीषु, दोनों में वही विशेष लाभ में रहता है, जो उसका पार्ष्णिग्राह बनता है, और वहाँ से कुछ लाभ प्राप्त कर मध्यम राजा को अपने मित्र से अलग कर देता है तथा जो स्वयं अपने शत्रु तक को अपना मित्र बना लेता है । उपकार करने वाले शत्रु के साथ भी संधि कर लेनी चाहिए और मित्रभाव से शून्य अपकार करने वाले मित्र को भी छोड़ देना चाहिए ।
( ४ ) इसी प्रकार उदासीन राजा को वश में कर लेना चाहिए ।
( ५ ) पार्ष्णिग्राह और आक्रमणकारी, इन दोनों राजाओं में वही अधिक उन्नत हो सकता है, जो मन्त्रयुद्ध से शत्रु का नाश करता है । साधारणतया युद्ध दो प्रकार होता है १. व्यायाम युद्ध और २. मंत्रयुद्ध । युद्धभूमि में उतर कर शस्त्रास्त्र आदि के उपायों द्वारा शत्रु को विच्छिन्न कर देना व्यायामयुद्ध कहलाता है, और बिना युद्ध-भूमि में गये ही सभी तीक्ष्ण आदि गुप्तचरों द्वारा शत्रु का नाश कराना मंत्रयुद्ध
५२० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
५२० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण
(१) नेति कौटिल्यः । सुमहतापि क्षयव्ययेन शत्रुविनाशोऽभ्युपगन्तव्यः । (२) तुल्ये क्षयव्यये यः पुरस्ताद् दूष्यबलं घातयित्वा निश्शल्यः पश्चा-दूष्यबलो युद्ध्येत, सोऽतिसन्धत्ते । (३) द्वयोरपि पुरस्ताद्दूष्यबलघातिनोर्यो बहुलतरं शक्तिमत्तरमत्यन्त-दूष्यं च घातयेत्, सोऽतिसन्धत्ते । (४) तेनामित्राटवीबलघातो व्याख्यातः । (५) पाष्णिग्राहोऽभियोक्ता वा यातव्यो वा यदा भवेत् । विजिगीषुस्तदा तत्र नैत्रेमेतत्समाचरेत् ॥ (६) पाष्णिग्राहो भवेन्नेता शत्रोर्मित्राभियोगिनः । विग्राह्य पूर्वमाक्रन्दं पाष्णिग्राहाभिसारिणा ॥ (७) आक्रन्देनाभियुञ्जानः पाष्णिग्राहं निवारयेत् । तथाक्रन्दाभिसारेण पाष्णिग्राहाभिसारिणम् ॥
कहलाता है । इन दोनों में मन्त्रयुद्ध ही उन्नति का कारण है, क्योंकि व्यायाम युद्ध में क्षय-व्यय होता है । तथैव युद्ध में जीत जाने पर भी सेना और कोष के क्षीण हो जाने के कारण वह राजा प्रायः पराजित-सा ही हो जाता है । यह प्राचीन आचार्यों की राय है ।
( १ ) इसके विपरीत कौटिल्य का कहना है कि चाहे कितना ही क्षय-व्यय क्यों न हो, हर हालत में शत्रु का नाश करना ही उद्देश्य होना चाहिए ।
( २ ) मनुष्य तथा धन की बराबर हानि होने पर जो राजा पहिले अपने दूष्य-बल को समाप्त कर फिर निष्कंटक हो अपनी नियमित सेना को साथ लेकर युद्ध करता है वही विशेष लाभ में रहता है ।
( ३ ) यदि दोनों राजा पहिले अपने दूष्यबल को ही समाप्त कर डालते हैं तो उनमें से वही अधिक लाभ में रहता है, जो पहिले बहुसंख्यक शक्तिशाली दूष्यबल को समाप्त करवा डालता है ।
( ४ ) दूष्यबल की ही भाँति शत्रुबल और अटवीबल के संबंध में भी समझ लेना चाहिए ।
( ५ ) विजिगीषु जब पाष्णिग्राह, अभियोक्ता अथवा यातव्य हो, उस समय उसे नीचे बताये तरीकों से नेतृत्व करना चाहिए ।
( ६ ) विजिगीषु को यही उचित है कि वह अपने मित्र पर आक्रमण करने वाले शत्रु के पृष्ठवर्ती मित्र ( आक्रंद ) को पहिले अपने मित्र की सेना के साथ भिड़ाकर फिर स्वयं उसकी पाष्णि को ग्रहण करे ।
( ७ ) यदि विजिगीषु स्वयं ही आक्रमणकारी हो तो वह अपने पाष्णिग्राह को अपने मित्र राजा द्वारा वारित करे और पाष्णिग्राह की सेना का मुकाबला अपने मित्र की सेना के द्वारा करे ।
प्र० ११७ : अ० १३ ] पार्ष्णिग्राह-चिन्ता ५२१
(१) अरिमित्रेण मित्रं च पुरस्तादवघट्टयेत् ।
मित्रमित्रमरेश्चापि मित्रमित्रेण वारयेत् ॥
(२) मित्रेण ग्राहयेत्पार्ष्णिमभियुक्तोऽभियोगिनः ।
मित्रमित्रेण चाक्रन्दं पार्ष्णिग्राहात्निवारयेत् ॥
(३) एवं मण्डलमात्मार्थं विजिगीषुर्निवेशयेत् ।
पृष्ठतश्च पुरस्ताच्च मित्रप्रकृतिसम्पदा ॥
(४) कृत्स्ने च मण्डले नित्यं दूतान् गूढांश्च वासयेत् ।
मित्रभूतः सपत्नानां हत्वा हत्वा च संवृतः ॥
(५) असंवृतस्य कार्याणि प्राप्तान्यपि विशेषतः ।
निस्संशयं विपद्यन्ते भिन्नप्लव इवोदधौ ॥
इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणे पार्ष्णिग्राहचिन्ता नाम त्रयोदशोऽध्यायः आदितो दशोत्तरशततमः ।
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( १ ) इस प्रकार अपने पीछे का प्रबन्ध कर सामने से कोई शत्रु मुकाबले में आये तो उससे अपने मित्र को भिड़ा दे । मदद के लिए यदि शत्रु के मित्र का मित्र आवे तो उसका मुकाबला अपने मित्र के मित्र से करे ।
( २ ) यदि विजिगीषु के ऊपर ही चढ़ाई की गई हो तो अपने मित्र को अपने उस आक्रमणकारी का पार्ष्णिग्राह बना दे । यदि आक्रमणकारी का कोई मित्र उस पार्ष्णिग्राह का मुकाबला करने के लिए आवे तो उस अपने मित्र पार्ष्णिग्राह के मित्र द्वारा उसका निवारण करे ।
( ३ ) इस प्रकार विजिगीषु, मित्ररूप प्रकृति की पूर्वोक्त गुणसमृद्धि से युक्त राज-मण्डल को अपनी सहायता के लिए आगे और पीछे ठीक तरह से स्थापित करे ।
( ४ ) अपनी सहायता के लिए स्थापित किये हुए उस संपूर्ण राजमण्डल में गुप्तचरों और दूतों का सदा उत्तम प्रबंध रखे और शत्रुओं के साथ ऊपर से मित्रता के भाव रखकर एक-एक करके उन्हें मार दे तथा ऊपर से उदासीन एवं निष्पक्ष बना रहे ।
( ५ ) जो राजा अपने गुप्त विचारों या गुप्त मन्त्रणाओं को छिपा कर नहीं रख सकता है वह उच्चतावस्था में पहुँचकर भी नीचे गिर जाता है । समुद्र में नाव के फट जाने से जो दशा सवार की होती है, ठीक वही दशा मन्त्र के फूट जाने पर राजा की होती है ।
षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में पार्ष्णिग्राहचिन्ता नामक तेरहवाँ अध्याय समाप्त ।
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| प्रकरण ११८ | # हीनशक्तिपूरणम् |
|---|---|
| अध्याय १४ |
(१) सामवायिकैरेवमभियुक्तो विजिगीषुर्यस्तेषां प्रधानस्तं ब्रूयात्— ‘त्वया मे सन्धिः, इदं हिरण्यमहं च मित्रम्, द्विगुणा ते वृद्धिः, नार्हस्यात्म-क्षयेण मित्रमुखानमित्रान् वर्धयितुम्, एते हि वृद्धास्त्वामेव परिभविष्यन्ति’।
(२) भेदं वा ब्रूयात्—‘अनपकारो यथाऽहमेतैः सम्भूयाभियुक्तः तथा त्वामप्येते संहितबलाः स्वस्था व्यसने वाऽभियोक्ष्यन्ते । बलं हि चित्तं विकरोति, तदेषां विघातय’ इति ।
(३) भिन्नेषु प्रधानमुपगृह्य हीनेषु विक्रमयेत् । हीनाननुग्राह्य वा प्रधाने । यथा वा श्रेयोऽभिमन्येत, तथा । वैरं वा परैर्ग्राहयित्वा विसं-वादयेत् ।
दुर्बल विजिगीषु के लिए शक्ति-संचय के साधन
( १ ) यदि अनेक राजा मिलकर विजिगीषु पर एक साथ आक्रमण करें तो विजिगीषु उन राजाओं के मुखिया से इस प्रकार कहे : 'मैं आपसे संधि करना चाहता हूँ; यह रहा हिरण्य । अब से मैं आपका मित्र हूँ । आपका भी दुगुना लाभ हो गया है । इसलिए अपने जन-धन का नुकसान कर इन ऊपरी मित्रों को बढ़ावा देना अब आपको उपयुक्त नहीं है । बाद में ये आप पर ही टूट पड़ेंगे । इसलिए आपको इनका साथ नहीं देना चाहिए ।'
( २ ) यदि ऐसा संभव न हो तो उनकी आपस में फूट करा दे । फूट डालने के लिए वह कहे कि 'जैसे मुझ निरपराध पर इन सबने आक्रमण किया है, वैसे स्वयं उन्नत होने पर या आपके विपत्तिकाल ये आप पर भी अवश्य आक्रमण करेंगे क्योंकि एकत्र बल अवश्य ही चित्त को विकृत कर देता है । इसलिए आपके लिए उचित यही है कि अभी से आप इनके संगठित बल को छिन्न-भिन्न कर दें ।'
( ३ ) इस प्रकार जब उनमें फूट हो जाय तब उनमें किसी प्रधान को अग्रसर करके हीनबल वाले शत्रु पर आक्रमण कर दे । अथवा हीनबल वाले राजाओं को अपनी ओर मिलाकर सामवायिकों के प्रधान पर ही चढ़ाई कर दे । अथवा जिस तरह अपना काम बन सके, वैसा करे । अथवा उनमें से प्रत्येक के हृदय में परस्पर घृणाभाव पैदा कर उन्हें विघटित कर दे ।