भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ
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प्रकरण १४७## स्कन्धावारनिवेशः
अध्याय १

(१) वास्तुकप्रशस्ते वास्तुनि नायकवर्धकिमौहूर्तिकाः स्कन्धावारं वृत्तं दीर्घं चतुरस्रं वा, भूमिवशेन वा, चतुर्द्वारं षट्पथं नवसंस्थानमापयेयुः । खातवप्रसालद्वारारट्टलकसम्पन्नं भये स्थाने च ।

(२) मध्यमस्योत्तरे नवभागे राजवास्तुकं धनुःशतायाममर्धविस्तारं पश्चिमार्धे तस्यान्तःपुरम् । अन्तर्वैशिकसैन्यं चान्ते निविशेत । पुरस्तादुपस्थानं, दक्षिणतः कोशशासनकार्यकरणानि, वामतो राजौपवाह्यानां हस्त्यश्वरथानां स्थानम् । अतो धनुःशतान्तराश्चत्वारः शकटमेथीप्रततिस्तम्भ-


छावनी का निर्माण

(१) भवन-निर्माण-कला के विशेषज्ञों द्वारा प्रशंसित क्षेत्र में सेनापति (नायक), कारीगर (वर्धकि) और ज्योतिषी (मौहूर्तिक) ये तीनों पारस्परिक परामर्श से गोलाकार, लंबा, चौकोर या जैसी भूमि हो उसी के अनुसार चारों दिशाओं में चार दरवाजों, छह मार्गों और नौ संस्थानों (डिविजन्स = वर्गों) से युक्त सैनिक छावनी (स्कंधावार) का निर्माण करायें। खाई, सफील, परकोटा, एक प्रधान द्वार और अट्टालिकाओं से युक्त स्कंधावार उसी अवस्था में बनवाया जाय, जबकि आक्रमण का भय तथा अधिक समय तक वहाँ टिके रहने की संभावना हो।

(२) स्कंधावार के बीच में उत्तर की ओर नौवें हिस्से में सौ धनुष लंबा तथा पचास धनुष चौड़ा और राजा का निवास-स्थान बनवाया जाय। उसके आधे हिस्से में पश्चिम की ओर अंतःपुर का निर्माण कराया जाय और अन्तःपुर के समीप ही अन्तःपुररक्षकों के लिए भी स्थान बनवाये जाँय। राजगृह के सामने राजा का विश्रामस्थान (उपस्थान) होना चाहिए। राजगृह की दाहिनी ओर खजाना, सेक्रेट्रिएट (शासनकरण) और कार्य-निरीक्षकों (कार्यकरण) के स्थान बनवाये जाँय। राजगृह के बाँई ओर हाथी, घोड़ा, रथ आदि वाहनों के लिए स्थान होना चाहिए। राजगृह के कुछ दूर चारों ओर रक्षार्थ चार बाड़ बनवाये जायें, जिनमें पहली बाड़ गाड़ियों की, दूसरी बाड़ कांटेदार लताओं की, तीसरी बाड़ मजबूत

६३८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवाँ अधिकरण

सालपरिक्षेपाः प्रथमे पुरस्तान्मन्त्रिपुरोहितौ, दक्षिणतः कोष्ठागारं महानसं च, वामतः कुप्यायुधागारम्, द्वितीये मौलभृतानां स्थानम्, अश्वरथानां, सेनापतेश्च। तृतीये हस्तिनः श्रेण्यः प्रशास्ता च। चतुर्थे विष्टिनायको मित्रामित्राटवीबलं स्वपुरुषाधिष्ठितम्। वणिजो रूपाजीवाश्चानुमहापथम्। बाह्यतो लुब्धकश्वगणिनः सत्यग्नयो गूढाश्चारक्षाः। (१) शत्रूणामापाते कूपकूटावपातकण्टकिनीश्च स्थापयेत्। अष्टादशवर्गाणारक्षविपर्यासं कारयेत्। दिवायामं च कारयेदपसर्पज्ञानार्थम्। (२) विवादसौरिकसमाजद्यूतवारणं च कारयेत्। मुद्रारक्षणं च। सेनानिवृत्तमायुधीयमशासनं शून्यपालोऽनुबध्नीयात्।

लकड़ी के खंभों की और चौड़ी बाड़ मजबूत चहार-दीवारी के ढंग की होनी चाहिए। प्रत्येक बाड़ का फासला सौ-सौ धनुष का होना चाहिए। पहली बाड़ के बीच में सामने की ओर मंत्रियों और पुरोहितों के स्थान बनवाने चाहिए। दाहिनी ओर भोजन-भंडार और रसोईघर होने चाहिए। बाँई ओर लोहा, ताँबा, लकड़ी आदि रखने की जगह और आयुधागार होने चाहिए। दूसरी बाड़ के बीच में मौलभृत आदि सेनाओं के स्थान और घोड़ों तथा सेनापति के स्थान होने चाहिए। इसी प्रकार बाड़ के तीसरे-घेरे में हाथियों, श्रेणीबल तथा प्रशास्ता (कंटकशोधन का अध्यक्ष) के स्थान होने चाहिए। बाड़ के चौथे घेरे में कर्मचारीवर्ग (विष्ट), नायक (दस सेनापतियों का प्रधान) और अपने विश्वस्त अधिकारी से संरक्षित मित्रसेना शत्रुसेना तथा आटविकसेना के स्थान बनवाये जाँय। व्यापारी और वेश्याओं के स्थान, बड़े बाजार (महापथ) में बनवाये जाँय। बहेलिये, शिकारी, बाजे तथा अग्नि आदि के इशारे से शत्रु के आगमन की सूचना देने वाले और ग्वाले आदि के वेष में रहने वाले रक्षकों को सबसे बाहर की ओर बसाया जाय।

(१) जिस मार्ग के शत्रु के आने की संभावना हो वहाँ कुएँ, गढे आदि खोदकर और लोहे की कीलों या काँटों से युक्त तख्तों को बिछाकर शत्रु को रोकने का प्रबन्ध किया जाय। हर समय पहरे के लिए अठारह वर्गों को बारी-बारी से नियुक्त किया जाय। शत्रु के गुप्तचरों का पता लगाने के लिए दिन-रात अपने आदमियों को घूमने के लिए नियुक्त करना चाहिए।

(२) आपसी झगड़ों, मदिरापान और जुआ आदि खेलने से सैनिकों को सर्वथा रोक लिया जाय। छावनी के भीतर-बाहर जाने-आने के लिए राजकीय मुहर का पास बनाया जाय। राजा की लिखित आज्ञापत्र के बिना युद्धभूमि से लौटने वाले सैनिकों को, शून्यपाल (राजधानी का रक्षण-अधिकारी) गिरफ्तार कर ले।

प्र० १४७ : अ० १ ] छावनी का निर्माण ६३९

(१) पुरस्तादध्वनः सम्यक्प्रशास्ता रक्षणानि च । यायाद्वर्द्धकिविष्टिभ्यामुदकानि च कारयेत् ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे स्कन्धावारनिवेशो नाम प्रथमोऽध्यायः;
आदितोऽष्टाविंशदुत्तरशततमः ।

—: ० :—


( १ ) प्रशास्ता ( कंटकशोधन-अधिकारी ) को चाहिए कि वह सेना और राजा के प्रस्थान करने से पहिले कारीगरों, मजदूरों तथा अध्यक्षों को साथ लेकर चला जाय और मार्गरक्षा का तथा आवश्यकतानुसार जल आदि का अच्छी तरह प्रबंध करे ।

इति सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में स्कन्धावारनिवेश नामक
पहला अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १४८-१४९स्कन्धावारप्रयाणां बलव्यसनाव-
अध्याय २स्कन्दकालरक्षणं च

(१) ग्रामारण्यानामध्वनि निवेशान् यवसेन्धनोदकवशेन परिसंख्याय स्थानासनगमनकालं च यात्रां यायात् । तत्प्रतीकारद्विगुणं भक्तोपकरणं वाहयेत् । अशक्तो वा सैन्येष्ववायोजयेत् । अन्तरेषु वा निचिनुयात् । (२) पुरस्तान्नायकः । मध्ये कलत्रं स्वामी च । पार्श्वयोरश्वा बाहूत्सारः । चक्रान्तेषु हस्तिनः । प्रसारवृद्धिर्वा सर्वतः । वनाजीवः प्रसारः । स्वदेशादन्वायतिर्वीवधः । मित्रबलमासारः । कलत्रस्थानमपसारः । पश्चात्सेनापतिः पर्यायान्निविशेत ।


छावनी का प्रमाण और आपत्ति एवं आक्रमण के समय सेना की रक्षा

( १ ) गावों, जंगलों तथा मार्गों में ठहरने योग्य स्थानों का घास, लकड़ी तथा जल आदि के अनुसार निर्णय कर और वहाँ पर पहुँचने, ठहरने, वहाँ से जाने आदि का पहिले ही से समय का निश्चय करके फिर विजिगीषु को यात्रा के लिए घर से निकलना चाहिए । उस यात्रा में खाने-पीने और पहनने ओढ़ने के लिए जितने समान की आवश्यकता हो, उससे दुगुना सामान साथ रखना चाहिए । यदि इतना सब सामान सवारियों पर ही न जा सके तो उसमें से थोड़ा-थोड़ा सैनिकों को दिया जाय । अथवा पड़ाव के लिए नियुक्त स्थानों से आवश्यक सामान को संग्रह करके साथ ले जाना चाहिए ।

( २ ) सेना के सबसे आगे दस सेनापतियों के प्रमुख नायक को चलना चाहिए, बीच में अन्तःपुर तथा राजा चले, अगल-बगल में भुजाओं से ही शत्रु के आघात को रोकने वाली घुड़सवारसेना चले, पिछले भाग में हाथी चलें, और अन्न, घास, भूसा आदि सब सामान चारों ओर से ले जाया जाय । जंगल में पैदा होने वाले अन्न, घास आदि आजीविका-योग्य वस्तुओं को प्रसार कहते हैं । अपने ही देश से अनाज आदि द्रव्यों के आयात को वीवध कहते हैं । मित्र की सेना को आसार कहा जाता है । रानियों के ठहरने के स्थान को अपसार कहते हैं । यात्राकाल में अपनी-अपनी सेना के सबसे पीछे सेनापति रहे ।

प्र० १४८-१४९ : अ० २ ] छावनी-सम्बन्धी विचार ६४१

(१) पुरस्तादभ्याघाते मकरेण यायात्, पश्चाच्छकटेन, पार्श्वयोर्वज्रेण, समन्ततः सर्वतोभद्रेण, एकायने सूच्या । (२) पथि द्वैधीभावे स्वभूमितो यायात् । अभूमिष्ठानां हि स्वभूमिष्ठा युद्धे प्रतिलोमा भवन्ति । योजनमधमा, अध्यर्धं मध्यमा, द्वियोजनमुत्तमा, संभाव्या वा गतिः । (३) आश्रयकारी, सम्पन्नघाती, पार्ष्णिरासारो मध्यम उदासीनो वा प्रतिकर्त्तव्यः, संकटो मार्गः शोधयितव्यः, कोशो दण्डो मित्रामित्राटवीबलं विष्टिरृतुश्च प्रतीक्ष्याः कृतदुर्गकर्मनिचयरक्षाक्षयः क्रीतबलनिर्वेदो मित्रबलनिर्वेदश्चागमिष्यति, उपजपिलारो वा नातित्वरयन्ति, शत्रुरभिप्रायं वा पूरयिष्यति इति शनैर्यायात् । विपर्यये शीघ्रम् ।


( १ ) यदि सामने की ओर से शत्रु के आक्रमण की आशंका हो तो 'मकराकार व्यूह' की रचना करके शत्रु की ओर बढ़ना चाहिए, यदि आक्रमण की पीछे से संभावना हो तो 'शकटव्यूह' बनाकर आगे बढ़ना चाहिए, यदि अगल-बगल से आक्रमण की संभावना हो तो 'चक्रव्यूह' बनाकर आगे बढ़ना चाहिए, और यदि चारों ओर से आक्रमण की संभावना हो तो 'सर्वतोभद्रव्यूह' बनाकर, यदि मार्ग इतना तंग हो कि उससे एक साथ न जाया जाय तो 'सूचीव्यूह' बनाकर आगे बढ़ना चाहिए ।

( २ ) यदि मार्ग में किसी प्रकार की द्विविधा हो तो उसी मार्ग से प्रस्थान करना चाहिए जिससे चतुरंगिनी सेना आसानी से जा सके, क्योंकि अनुकूल मार्ग से चलने वाले राजा पर प्रतिकूल मार्ग से चलने वाला राजा आक्रमण नहीं कर सकता है । प्रतिदिन एक योजन ( चार कोस ) चलना अधम गति है, डेढ़ योजन चलना मध्यम गति और दो योजन चलना उत्तम गति कहलाती है । अथवा सुविधानुसार प्रतिदिन जितना चला जा सके, उतना चलना चाहिए ।

( ३ ) विजिगीषु जब यह सोचे कि 'अपनी उन्नति के लिए मुझे किसी राजा को अपना आश्रय बनाना चाहिए, अथवा धनधान्य-सम्पन्न किसी शत्रुदल को नष्ट करना है, या पार्ष्णिग्राह, आसार, मध्यम और उदासीन राजा का प्रतीकार करना है, तो धीरे से यात्रा करे । ऊबड़-खावड़ मार्ग को साफ करने के लिए भी धीरे से ही यात्रा करे । अथवा जब कोष, अपनी सेना, मित्रसेना, शत्रुसेना, आटविक सेना, कारीगर और अपनी सेना के अनुकूल ऋतु की प्रतीक्षा करनी हो तो तब भी धीरे-धीरे यात्रा करे । अथवा जब यह संभावना हो कि शत्रु का दुर्ग बेमरम्मत है, उसका संगृहीत धान्य भी समाप्त प्राय है, उसके रक्षा-साधन भी विनष्ट हैं, धन देकर अपने वश में की हुई सेना भी उससे खिन्न है और मित्रसेना भी उससे विरक्त है, तो भी धीरे-धीरे यात्रा करे । अथवा जब समझे कि शत्रुद्रोही लोग अभी जल्दी में नहीं हैं,

४१ कौ०

६४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवाँ अधिकरण

६४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवाँ अधिकरण

(१) हस्तिस्तम्भसंक्रमसेतुबन्धनौकाष्ठवेणुसंघातैः अलाबुचर्मकरण्ड-दृतिप्लवगण्डिकावेणिकाभिश्चोदकानि तारयेत् । (२) तीर्थाभिग्रहे हस्त्यश्वैरन्यतो रात्रावुत्तार्य सत्रं गृह्णीयात् । (३) अनुदके चक्रिचतुष्पदं चाध्वप्रमाणेने शक्त्योदकं वाहयेत् । (४) दीर्घकान्तारमनुदकं यवसेन्धनोदकहीनं वा कृच्छाध्वानमभियोग-प्रस्कन्नं क्षुत्पिपासाध्वक्लान्तं पङ्कतोयगभीराणां वा नदीदरीशैलानामुच्चा-नापयाने व्यासक्तम् । एकायनमार्गं शैलविषमे सङ्कटे वा बहुलीभूतं निवेशे प्रस्थिते विसन्नाहं भोजनव्यासक्तम् । आयतगतपरिश्रान्तमवसुप्तं व्याधि-मरकदुर्भिक्षपीडितं व्याधितपत्त्यश्वद्विपमभूमिष्ठं वा बलव्यसनेषु वा स्वसैन्यं रक्षेत् । परसैन्यं चाभिहन्यात् ।


अथवा युद्ध के बिना ही शत्रु मेरे अभिप्राय को पूरा कर देगा, तब धीरे-धीरे यात्रा करे । इसके विपरीत अवस्थाओं में शीघ्रता से ही यात्रा करनी चाहिए ।

(१) यात्राकाल में हाथियों, लकड़ी के खंभों; झूलों, पुलों, नौकाओं, लकड़ी तथा बाँस के बेड़ों, तूंबियों, चर्मकाण्डों, चमड़े की तूंबियों, मोमजामा के तकियों, काग की लकड़ी के वेड़ों और मजबूत रस्सियों से सेनाओं को नदी पार उतारा जाय ।

(२) नदी के घाट यदि शत्रु के कब्जे में हों तो हाथी और घोड़ों के द्वारा रात में दूसरी ओर से बिना घाट के ही अपनी सेनाओं को पार उतार कर शत्रु के स्थानों पर कब्जा कर लेना चाहिए ।

(३) जिस प्रदेश से जल न हो वहाँ गाड़ी, बैल आदि चौपायों द्वारा पास में पर्याप्त जल रखकर मार्ग तय किया जाय ।

(४) विजिगीषु को चाहिए कि वह लम्बा रास्ता तय करने वाली तथा जंगलों से होकर सफर करने वाली अपनी सेना की भरसक रक्षा करे । मार्ग में जल न पाने वाली, धान, भूसा, ईंधन, लकड़ी आदि से हीन, कठिन मार्ग में चलनेवाली, लम्बे समय युद्ध में रहने के कारण खिन्न, भूख, प्यास तथा सफर के कारण बेचैन, भारी दलदल, गहरे पानी, नदी, गुफा तथा पर्वत आदि के पार करने एवं चढ़ने-उतरने में संलग्न, तंग रास्ते में, विषम स्थान में या पहाड़ी किलों में एकत्र, लम्बा सफर करने से थकी, नींद लेती हुई, ज्वर, महामारी तथा दुर्भिक्ष से पीडित, बीमार, पैदल-हाथी घोड़ों से युक्त, प्रतिकूल भूमि में ठहरी, सैनिक आपत्तियों से पस्त, आदि जितनी भी कठिनाइयाँ हैं उनमें विजिगीषु को अपनी सेना की रक्षा करनी चाहिए । साथ ही विजिगीषु को चाहिए कि उक्त अवस्थाओं को प्राप्त हुई शत्रु की सेना को नष्ट-भ्रष्ट कर डाले ।

प्र० १४८-१४९ : अ० २ ] छावनी-सम्बन्धी विचार ६४३

(१) एकायनमार्गप्रयातस्य सेनानिश्चारग्रासाहारशय्याप्रस्ताराग्नि-निधानध्वजायुधसंख्यानेन परबलज्ञानम् । तदात्मनो गूहयेत् । (२) पार्वतं वनदुर्गं वा सापसारप्रतिग्रहम् । स्वभूमौ पृष्ठतः कृत्वा युध्येत निविशेत च ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे स्कन्धावारप्रयाणं बलव्यसनावस्कन्दकालरक्षणं चेति द्वितीयोऽध्यायः; आदित एकोनत्रिंशदुत्तरशततमः ।

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(१) जब शत्रु एक ही जाने योग्य तंग रास्ते से जा रहा हो उस समय एक-एक करके जाते हुए सैनिकों की, उनकी सवारियों की, भोजन आदि सामग्री की, सोने के स्थान की, भोजन पकाने के चूल्हों की और अस्त्र-शस्त्रों की गिनती कर शत्रु-सेना की इयत्ता का पता लगा लेना चाहिए । अपनी सेना की इयत्ता का पता देने वाले साधनों को छिपा देना चाहिए या नष्ट कर देना चाहिए ।

(२) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपसार ( भागे हुए या पराजित के छिपने की जगह ) और प्रतिग्रह ( आक्रमण करती हुई शत्रुसेना को गिरफ्तार करने की जगह ) के युक्त पहाड़ी तथा जंगली दुर्ग अच्छी तरह तैयार करके और सर्वथा अनुकूल भूमि में ठहर कर युद्ध करे अथवा निश्चिन्त होकर निवास करे ।

साङ्ग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में दूसरा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १५०-१५२कूटयुद्धविकल्पाः, स्वसैन्योत्साहनं, स्वबलान्यबलव्यायोगश्च
अध्याय ३

(१) बलविशिष्टः कृतोपजापः प्रतिविहितर्तुः स्वभूम्यां प्रकाशयुद्धमुपेयात् विपर्यये कूटयुद्धम् । (२) बलव्यसनावस्कन्दकालेषु परमभिहन्यात् । अभूमिष्ठं वा स्वभूमिष्ठः । प्रकृतिप्रग्रहो वा स्वभूमिष्ठं दूष्यामित्र्राटवीबलैर्वा भङ्गं दत्त्वा विभूमिप्राप्तं हन्यात् । संहतानीकं हस्तिभिर्भेदयेत् । (३) पूर्वं भङ्गप्रदानेनानुप्रलीनं भिन्नमभिन्नं प्रतिनिवृत्य हन्यात् । पुरस्तादभिहत्य प्रचलं विमुखं वा पृष्ठतो हस्त्यश्वेनाभिहन्यात् । पृष्ठतोऽभिहत्य प्रचलं विमुखं वा पुरस्तात्सारबलेनाभिहन्यात् ।


कूटयुद्ध के भेद, अपनी सेना का प्रोत्साहन और अपनी तथा पराई सेना का प्रयोग

( १ ) बलवान् एवं बृहद् सेना से युक्त, शत्रुपक्ष को फोड़ने में समर्थ और युद्ध योग्य समय को अपने अनुकूल बनाने वाले विजिगीषु को चाहिए कि वह अपनी अनुकूल भूमि में ही प्रकाश-युद्ध करना स्वीकार करे । यदि इसके विपरीत व्यवस्था हो तो कूटयुद्ध ही करना चाहिए ।

( २ ) व्यसनापन्न सेना पर या लम्बे सफर, जंगल के सफर अथवा जलाभाव की अवस्था में शत्रु के ऊपर आक्रमण किया जाय । अथवा शत्रु की विरुद्ध स्थिति और अपनी अनुकूल स्थिति होने पर आक्रमण करे । अथवा शत्रु की अमात्य आदि प्रकृतियों को वश में करके तब आक्रमण किया जाय अथवा राजद्रोहियों, शत्रुओं और जांगलिकों को अपनी पराजय का विश्वास दिलाकर जब वे अपना स्थान छोड़ दें तब उन पर आक्रमण किया जाय । अनुकूल भूमि में एक स्थान पर ठहरी हुई शत्रु-सेना को हाथियों द्वारा छिन्न-भिन्न किया जाय ।

( ३ ) पूर्व पराजय के कारण तितर-बितर हुई शत्रु की सेना को विजिगीषु की एकत्र सेना लौट कर फिर मारे । सामने की ओर से आक्रमण करने के कारण तितर-बितर अथवा भागी हुई शत्रु सेना को पीछे की ओर से घुड़सवारों और हाथियों के द्वारा नष्ट करा दिया जाय । पीछे की ओर से आक्रमण करने के कारण छिन्न-भिन्न या उलटी भागी हुई शत्रु सेना को सामने की ओर से बहादुर सैनिकों के द्वारा नष्ट-भ्रष्ट करा दिया जाय ।

प्र० १५०-१५२ : अ० ३ ] कूटयुद्ध और सेना-प्रयोग ६४५

(१) ताभ्यां पार्श्वाभिघातौ व्याख्यातौ । यतो वा दूष्यफल्गुबलं ततोऽभिहन्यात् । (२) पुरस्ताद्विषमायां पृष्ठतोऽभिहन्यात् । पृष्ठतो विषमायां पुरस्तादभिहन्यात् । पार्श्वतो विषमायामितरतोऽभिहन्यात् । (३) दूष्यामित्र्राटवीबलैर्वा पूर्वं योधयित्वा श्रान्तमश्रान्तः परमभिहन्यात् । दूष्यबलेन वा स्वयं भङ्गं दत्त्वा 'जितम्' इति विश्वस्तमविश्वस्तः सत्रापाश्रयोऽभिहन्यात् । सार्थव्रजस्कन्धावारसंवाहविलोप्रमत्तमप्रमत्तोऽभिहन्यात् । फल्गुबलावच्छन्नः सारबलो वा परवीराननुप्रविश्य हन्यात् । गोग्रहणेन श्वापदवधेन वा परवीरानाकृष्य सत्रच्छन्नोऽभिहन्यात् । (४) रात्राववस्कन्देन जागरयित्वाऽनिद्राक्लान्तानवसुप्तान् वा दिवा हन्यात् । सपादचर्मकोशैर्वा हस्तिभिः सौप्तिकं दद्यात् । अहः सन्नाहपरिश्रान्तानपराह्णेऽभिहन्यात् ।


( १ ) आगे-पीछे से किये गये आक्रमणों के अनुसार ही अगल-बगल से किये जाने वाले आक्रमणों के सम्बन्ध में भी जान लेना चाहिए । अथवा जिस ओर शत्रु की राजद्रोही या निर्बल सेना हो उसी ओर से आक्रमण करना चाहिए ।

( २ ) यदि सामने की ओर से आक्रमण करना अपने अनुकूल न हो तो पीछे की ओर से आक्रमण करना चाहिए और पीछे की ओर से असुविधा हो तो आगे की ओर से आक्रमण करना चाहिए । अगल-बगल के आक्रमण में जिस ओर से सुविधा हो उसी ओर से आक्रमण किया जाय ।

( ३ ) अथवा अपनी दूष्यसेना, शत्रुसेना तथा आटविक सेना के साथ शत्रु को लड़ाकर फिर विजिगीषु स्वयं ही उस पर आक्रमण करे । अथवा अपनी दूष्य सेना को लड़ाकर स्वयं को विजिगीषु पराजित करार दे और तब शत्रु का आश्रय लेकर उस पर धावा बोल दे जब शत्रु व्यापारी वर्ग, गायों के समूह तथा छावनियों की रक्षा में और उनको लुटता देख प्रमादी बना हुआ हो, तब उस पर आक्रमण किया जाय । अथवा बाहर की ओर अपनी निर्बल सेना को बांध कर और बीच में बहादुर सैनिकों को रख कर शत्रु की सेना को नष्ट-भ्रष्ट किया जाय । अथवा शत्रु-देश से गाय, आदि का अपहरण करने और व्याघ्र, वराह आदि का शिकार करने के बहाने शत्रु के वीर पुरुषों को प्रलोभन देकर सत्र में छिप कर मार डाला जाय ।

( ४ ) रात में लूट-मार, डाका-चोरी आदि के भय से शत्रु के सैनिकों को जगा-कर और फिर जब वे दिन में सोयें तो उन्हें मार डाला जाय । पैरों पर चमड़े का खोल पहनाये हुए हाथियों द्वारा सोते हुए सैनिकों पर आक्रमण किया जाय । कवायद करने के बाद थके हुए सैनिकों को दोपहर के बाद मरवा दिया जाय ।

६४६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) शुष्कचर्मवृत्तशर्कराकोशकैर्गोमहिषोष्ट्रयूथैर्वा त्रस्नुभिरकृतहस्त्यश्वं भिन्नमभिन्नः प्रतिनिवृत्तं हन्यात् । प्रतिसूर्यवातं वा सर्वमभिहन्यात् । (२) धान्वनवनसङ्कटपङ्कशैलनिम्नविषमनावो गावः शकटव्यूहो नीहारो रात्रिरिति सत्राणि । (३) पूर्वे च प्रहरणकालाः कूटयुद्धहेतवः । (४) संग्रामस्तु निर्दिष्टदेशकालो धर्मिष्ठः । (५) संहत्य दण्डं ब्रूयात्—‘तुल्यवेतनॊऽस्मि, भवद्भिः सह भोग्यमिदं राज्यं, मयाभिहितः परोऽभिहन्तव्यः’ इति । वेदेष्वप्यनुश्रूयते समाप्तदक्षिणानां यज्ञानामवभृथेषु—‘सा ते गतिर्या शूराणाम्’ इति । अपीह श्लोकौ भवतः— (६) यान् यज्ञसंघैस्तपसा च विप्राः स्वर्गैषिणः पात्रचयैश्च यान्ति । क्षणेन तामप्यतियान्ति शूराः प्राणान्सुयुद्धेषु परित्यजन्तः ॥


(१) सूखे चमड़े से बँधे हुए मिट्टी के छोटे-छोटे ढेलों से या घवड़ा जाने वाले गाय, भैंसों और ऊँटों के झुंडों के द्वारा हाथी-घोड़े रहित शत्रु की छिन्न-भिन्न हुई सेना को अपनी एकत्र सेना के द्वारा मरवा दिया जाय । सूर्य और हवा के सामने आयी हुई सभी तरह की सेना को नष्ट कर डालना चाहिए ।

(२) मरुस्थल का दुर्ग (धान्वन), जंगल का दुर्ग, कंटकाकीर्ण झाड़ियों वाले स्थान (संकट), दलदल भूमि, पहाड़ी इलाके, तराई क्षेत्र, ऊबड़-खाबड़ भूमि, नौकाएँ, गायों के झुंड, शकटव्यूह, कुहरा और रात्रि इन सब को सत्र कहा जाता है । इन स्थानों में छिप कर युद्ध करना चाहिए ।

(३) पूर्व प्रहार करने के समय और सत्र स्थान कूट युद्धों के कारण हुआ करते हैं ।

(४) यहाँ तक कूट युद्ध के विभिन्न प्रकारों का निरूपण किया गया ।

(५) विजिगीषु को चाहिए कि वह अपनी संगठित सेना से कहे कि 'मैं भी आपके ही समान वेतनभोगी नौकर हूँ । आप लोगों के साथ ही मैं इस राज्य का उपयोग कर सकता हूँ । इसलिए जिसका मैं शत्रु बताऊँ वह आप लोगों के हाथों अवश्य मारा जाना चाहिए ।' इस प्रकार सेना को उत्साहित करना चाहिए । तदनंतर मन्त्रियों और पुरोहितों द्वारा सेना को यह कह कर उत्साहित कराये कि वेदों में ऐसा लिखा हुआ है कि यज्ञ, अनुष्ठान समाप्त हो जाने के बाद और दक्षिणा दिये जाने के बाद यजमान को जो फल मिलता है । वही फल युद्धक्षेत्र में वीरगति पाये हुए सैनिक को मिलता है । इसी सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों के दो श्लोक हैं कि—

(६) अनेक यज्ञों को करके, कठिन तप करके और अनेक सुपात्रों को दान

प्र० १५०-१५२ : अ० ३ ] कूटयुद्ध और सेना-प्रयोग ६४७

(१) नवं शरावं सलिलस्य पूर्णं सुसंस्कृतं दर्भकृतोत्तरीयम् ।
तत्तस्य माभून्नरकं च गच्छेद्यो भर्तृपिण्डस्य कृते न युध्येत् ॥

(२) इति मन्त्रिपुरोहिताभ्यामुत्साहयेद्योधान् ।

(३) व्यूहसम्पदा कार्तान्तिकादिश्चास्य वर्गः सर्वज्ञदैवसंयोगख्यापनाभ्यां स्वपक्षमुद्धर्षयेत् । परपक्षं चोद्वेजयेत् । ‘श्वो युद्धम्’ इति कृतोपवासः शस्त्रवाहनं चानुशयीत । अथर्वभिश्च जुहुयात् । विजययुक्ताः स्वर्गीयाश्चाशिषो वाचयेत् । ब्राह्मणेभ्यश्चात्मानमतिसृजेत् ।

(४) शौर्यशिल्पाभिजानानुरागयुक्तमर्थमानाभ्यामविसंवादितमनीकगर्भं कुर्वीत । पितृपुत्रभ्रातृकाणामायुधीयानामध्वजं मुण्डानीकं राजस्थानम् । हस्ती रथो वा राजवाहनमश्वानुबन्धे । यत्प्रायः सैन्यो, यत्र वा विनीतः स्यात्, तदधिरोहयेत् । राजव्यञ्जनो व्यूहाधिष्ठानमायोज्यः ।


देकर ब्राह्मण लोग जिस उच्च गति को प्राप्त करते हैं, शूरवीर क्षत्रिय धर्मयुद्ध में प्राणोत्सर्ग करके उससे भी उच्च-गति को प्राप्त करते हैं ।

( १ ) ‘मन्त्रों से संस्कृत, जल से भरा हुआ और दर्भ से आच्छादित नई शराव का छलछलाता शकोरा उस व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता और वह नरक में जाता है, जो अपने स्वामी के लिए प्राणों की बाजी नहीं लगाता ।’

( २ ) इस प्रकार मंत्री और पुरोहितों के द्वारा सैनिकों को प्रोत्साहित किया जाय ।

( ३ ) विजिगीषु राजा के ज्योतिर्विद् एवं शकुनशास्त्री व्यक्तियों को चाहिए कि वे अलग-अलग व्यूहों की विशेष रचना द्वारा अपनी सर्वज्ञता को और दैव-साक्षात्कार होने की प्रसिद्धि को फैलाकर अपने पक्ष के सैनिकों को उत्साहित करते रहें तथा शत्रु के सैनिकों को बेचैन बनाये रखें । ‘कल युद्ध है’ ऐसा निश्चय हो जाने पर विजिगीषु को चाहिए कि उस दिन उपवास करता हुआ वह अपने रथ, हाथी, घोड़े आदि सवारियों के पास ही शयन करे, और अथर्ववेद में बताये गये शत्रु-ध्वंसक मंत्रों का जप तथा अनुष्ठान करता रहे । शत्रु के हार जाने पर अपनी विजय के अनुकूल और अपने ही सैनिकों की वीरगति प्राप्त होने पर ब्राह्मणों से स्वर्गीय आशीर्वादों का वाचन कराये । अपनी रक्षा के लिए स्वयं को वह ब्राह्मणों को अर्पण कर दे ।

( ४ ) बहादुर, कारीगर, खानदानी तथा अनुरक्त और धन, मान आदि से सदा अनुकूल बनाई गई सेना को अपनी बड़ी सेना में रक्षा के निमित्त नियुक्त किया जाना चाहिए । राजा के पिता, पुत्र, भाई आदि अन्तरंग संबंधियों के निवास स्थान को और राजा के अङ्गरक्षक तथा प्रच्छन्न वेष धारण किये प्रधान सेना के निवास-स्थान को राजा के निवास स्थान के समीप ही टिकाया जाय । राजा हाथी या रथ

६४८कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ दसवां अधिकरण

(१) सूतमागधाः शूराणां स्वर्गमस्वर्गं भीरूणां जातिसङ्घकुलकर्मवृत्तस्तवं च योधानां वर्णयेयुः । पुरोहितपुरुषाः कृत्याभिचारं ब्रूयुः । सत्रिकवर्धकिमौहूर्तिकाः स्वकर्मसिद्धिमसिद्धिं परेषाम् ।

(२) सेनापतिरर्थमानाभ्यामभिसंस्कृतमनीकमाभाषेत—'शतसाहस्रो राजवधः । पञ्चाशतसाहस्रः सेनापतिकुमारवधः । दशसाहस्रः प्रवीरमुख्यवधः । पञ्चसाहस्रो हस्तिरथवधः । साहस्रोऽश्ववधः । शत्यः पत्तिमुख्यवधः । शिरो विंशतिकम् । भोगद्वैगुण्यं स्वयंग्राहश्चेति । तदेषां दशवर्गाधिपतयो विद्युः ।


पर सवार होकर चले और उसकी रक्षा के लिए साथ में अश्वारोही सैनिक हों । अथवा जिन सवारियों पर प्रायः सेना चल रही हो उसी प्रकार की सवारी में या जिस सवारी में चढ़ने का राजा का अच्छा अभ्यास हो, उसमें चढ़कर चले । व्यूहरचना का अधिष्ठाता किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त किया जाय, जो राजा से अविकल रूप में मिलता-जुलता हो ।

(१) सूतों ( ऐतिहासिक गाथाओं के गायकों ) और मागधों ( स्तुतिवाचकों ) को चाहिए कि वे—शूर-वीर सैनिकों को स्वर्ग, कायरों को नरक और अन्य जाति संघी ( बटालियनों ) को उनके कुल, कर्म, शील, स्वभाव तथा व्यवहार के अनुसार ओजोमयी उत्साहवर्धक वाणी सुनाकर स्तुतिगान करें । पुरोहितों को चाहिए कि वे अथर्ववेद में निर्दिष्ट शत्रुनाशक कृत्याभिचार का अनुष्ठान करें । सत्री, बढ़ई और ज्योतिषियों को चाहिए कि वे सदा ही अपने कार्यों की सिद्धि और शत्रुकार्यों की असफलता के सम्बन्ध में प्रचार करते रहें ।

(२) युद्ध के लिए तैयार, धन-सत्कार से संवर्द्धित सेना को ललकार कर सेनापति यों कहे, 'आप लोगों में से जो भी सैनिक शत्रुराजा को मार डालेगा उसे एक लाख स्वर्णमुद्राएँ पुरस्कार में दी जायेंगी । जो सैनिक शत्रु के सेनापति या राजकुमार को मार डालेगा, उसे पचास हजार स्वर्णमुद्रायें इनाम में दी जायेंगी । इस प्रकार शत्रु के वीर सैनिकों में से मुख्य सैनिकों को मारने वाले को दस हजार, हाथी तथा रथों को नष्ट करने वाले को पाँच हजार, घुड़सवारों को नष्ट करने वाले को एक हजार, पैदल सेना के मुख्य सैनिकों को नष्ट करने वाले को एक सौ और साधारण सिपाही का शिर काट कर लाने वाले को बीस स्वर्ण मुद्राएँ इनाम में दी जायेंगी । इसके अतिरिक्त युद्ध में भाग लेने वाले प्रत्येक सैनिक का वेतन, भत्ता दुगुना कर दिया जायेगा और शत्रु के यहाँ से लूट-पाट में मिला हुआ सारा माल भी उन्हें ही दिया जायेगा ।' इस प्रकार बताये गये राजवध का समाचार केवल पदिक सेनापति और नायक ही जान पायें ।

प्र० १५०-१५२ : अ० ३ ] कूटयुद्ध और सेना-प्रयोग [ ६४९

(१) चिकित्सकाः शस्त्रयन्त्रागदस्नेहवस्त्रहस्ताः, स्त्रियश्चान्नपानरक्षिण्यः पुरुषाणामुद्धर्षणीयाः पृष्ठतस्तिष्ठेयुः । (२) अदक्षिणामुखं पृष्ठतः सूर्यमनुलोमवातमनीकं स्वभूमौ व्यूहेत । परभूमिव्यूहे चाश्वांश्चारयेयुः । (३) यत्र स्थानं प्रजवश्चाभूमि व्यूहस्य, तत्र स्थितः प्रजवितश्चोभयथा जीयेत । विपर्यये जयति । उभयथा स्थाने प्रजवे च । (४) समा विषमा व्यामिश्रा वा भूमिरिति । पुरस्तात्पार्श्वाभ्यां पश्चाच्च ज्ञेया । समायां दण्डमण्डलव्यूहाः, विषमायां भोगसंहतव्यूहाः । व्यामिश्रायां विषमव्यूहाः । (५) विशिष्टबलं भङ्क्त्वा सन्धि याचेत । समबलेन याचितः सन्दधीत । हीनमनुहन्यात् । न त्वेव स्वभूमिप्राप्तं त्यक्तात्मानं वा ।


( १ ) सैनिकों के स्वास्थ्य-संरक्षण और मनोविनोद के लिए चिकित्सक, काटने के औजार, चिमटी, दवाई, घी, तेल, मरहम-पट्टी, सहचिकित्सक, खाने-पीने की सामग्री और सैनिकों को प्रसन्न करने वाली स्त्रियाँ, इन सबको युद्धभूमि के लिये प्रस्थान करते समय सेना के पिछले हिस्से में रखा जाय ।

( २ ) विजिगीषु को चाहिए कि युद्धकाल में अमंगल-सूचक दक्षिण दिशा की ओर सैनिकों का मुँह करके खड़ा न करे । इस बात पर पूरा ध्यान दिया जाय कि सूर्य की किरणें सेना के पीठ पीछे और वायु का रुख अनुकूल हो, इस प्रकार व्यूह-रचना करके सैनिकों को खड़ा किया जाय । यदि युद्ध भूमि शत्रु के अनुकूल हो और वहीं पर विजिगीषु को भी व्यूह-रचना करनी पड़े, तो विजिगीषु को चाहिए कि वह घोड़े दौड़ा कर शत्रु के मोर्चे को विघटित कर दे ।

( ३ ) जिस स्थान पर ठहर कर विजिगीषु बहुत दिनों तक कार्य करता ही रह जाय या समयाभाव में जल्दी ही कार्य को करता हुआ, दोनों ही परिस्थितियों में, वहाँ पर अवश्य ही वह शत्रु द्वारा मारा जाता है ।

( ४ ) व्यूहभूमि तीन प्रकार की होती है, १. सम २. विषम और ३. व्यामिश्र । व्यूह-रचना के आगे, पीछे या बगल में, कहीं भी सम भूमि का होना आवश्यक है । इसी प्रकार विषम भूमि के संबंध में भी समझना चाहिए । तीनों प्रकार की उक्त समभूमि में दण्डाकार सेना की स्थापना ( दण्ड व्यूह ) और गोलाकार सेना की स्थापना ( मंडल व्यूह ) की जाय । इसी प्रकार तीनों तरह की विषम भूमि में भोग-व्यूह और संहत व्यूह की रचना की जाय । तीनों प्रकार की व्यामिश्र भूमि में विषमव्यूहों की रचना की जाय ।

( ५ ) विजिगीषु को चाहिए कि पहले वह अधिक शक्तिशाली शत्रु की सेना को

६५० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) पुनरावर्तमानस्य निराशस्य च जीविते । अधार्यो जायते वेगस्तस्माद्भग्नं न पीडयेत् ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे कूटयुद्धविकल्पाः स्वसैन्योत्साहनं स्वबलान्य-बलव्यायोगश्चेति तृतीयोऽध्यायः; आदितस्त्रिंशदुत्तरशततमः ।

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नष्ट-भ्रष्ट कर फिर स्वयं ही उससे संधि के लिए प्रार्थना करे । यदि शत्रु समान शक्ति का हो तो उसकी प्रार्थना करने पर ही विजिगीषु संधि के लिए तैयार हो । अपने से हीन शक्ति राजा को तो ऐसा तहस-नहस कर देना चाहिए कि फिर कभी भी वह उठ न सके । किन्तु यदि हीनशक्ति राजा-अनुकूल स्थान पर हो या जीवन से निराश हो चुका हो तो उसको न मारा जाय ।

( १ ) जीवन से निराश हुआ शत्रु यदि युद्धक्षेत्र से बचकर वापिस आता है तो उसका युद्धावेश ठंडा पड़ जाता है । इसलिए पहिले ही से निराश एवं कमजोर शत्रु को पीड़ा पहुँचा कर कुपित नहीं करना चाहिए ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में कूटयुद्ध-सैन्यव्यायोग नामक तीसरा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १५३-१५४युद्धभूमयः, पत्त्यश्वरथहस्तिकर्माणि च
अध्याय ४

(१) स्वभूमिः पत्त्यश्वरथद्विपानामिष्टा युद्धे निवेशे च । (२) धान्वनवननिम्नस्थलयोधिनां खनकाकाशदिवारात्रियोधिनां च पुरुषाणां नादेयपार्वतानूपसारसानां च हस्तिनामश्वानां च यथास्वमिष्टा युद्धभूमयः कालश्च । (३) समा स्थिराभिकाशा निरुत्खातिन्यचक्रखुरोऽनक्षग्राहिणी अवृक्षगुल्मप्रततिस्तम्भकेदारश्वभ्रवल्मीकसिकतापङ्कभङ्गुरा दरणहीना च रथभूमिः । (४) हस्त्यश्वयोर्मनुष्याणां च समे विषमे हिता युद्धे निवेशे च । (५) अण्वश्मवृक्षा ह्रस्वलङ्घनीयश्वभ्रा मन्ददरणदोषाचाश्वभूमिः । स्थूलस्थाण्वश्मवृक्षप्रततिवल्मीकगुल्मा पदातिभूमिः । गम्यशैलनिम्नविषमा मर्दनीयवृक्षा छेदनीयप्रततिः पङ्कभङ्गुरदरणहीना च हस्तिभूमिः ।


युद्धयोग्य भूमि और पदाति, अश्व, रथ तथा हाथी आदि सेनाओं के कार्य

(१) पैदल, घुड़सवार, रथारोही तथा हस्त्यारोही सैनिकों को युद्ध के लिए और ठहरने के लिए उपयुक्त भूमि का होना अत्यंत आवश्यक है ।

(२) धान्वनदुर्ग, वनदुर्ग, जल, स्थल, खाई, आकाश, दिन-रात, नदी, पहाड़, जलमय प्रदेश तथा तालाब आदि में युद्ध करने वाले हस्त्यारोही और अश्वारोही सैनिकों के लिए अनुकूल युद्धयोग्य भूमि तथा उपयुक्त ऋतु आदि का होना अत्यन्त आवश्यक है ।

(३) समतल, दलदल रहित एकदम ठोस, साफ-सुथरी, चिकनी, घनी बेलों से अच्छादित, खाई-खंधक से रहित, झुरमुट, ठूंठ, क्यारियाँ, बाँबी, गढ़े, रेत, कीचड़ और टेढ़ेपन आदि से रहित जमीन एवं दर्रों से रहित ( दरणहीना ) भूमि रथसेना के युद्धार्थ उपयुक्त समझनी चाहिए ।

(४) उपर्युक्त रथयोग्य भूमि ही अश्वारोही, हस्त्यारोही और पदाति सेनाओं के लिए भी सम, विषम देश में युद्ध के लिए उपयुक्त समझनी चाहिए ।

(५) छोटे-छोटे कंकड़ तथा वृक्षों से युक्त, छोटे-छोटे लांघने योग्य गढों से युक्त और इधर-उधर छोटे-छोटे दर्रों से युक्त भूमि अश्वारोही सेना के ठहरने—युद्ध के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है । मोटे-मोटे पेड़ों के ठूंठ, मोटे-मोटे पत्थर वा कंकड़,

६५२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) अकण्टकिन्यबहुविषमा प्रत्यासारवतीति पदातीनामतिशयः । (२) द्विगुणप्रत्यासारा कर्दमौदकखञ्जनहीना निःशर्करेति वाजिनामतिशयः । (३) पांसुकर्दमौदकनलशराधानवती श्वदंष्ट्राहीना महावृक्षशाखाघातवियुक्तेति हस्तिनामतिशयः । (४) तोयाशयाश्रयवती निरुत्खातिनी केदारहीना व्यावर्तनसमर्थेति रथानामतिशयः । उक्ता सर्वेषां भूमिः । (५) एतया सर्वबलनिवेशा युद्धानि च व्याख्यातानि भवन्ति । (६) भूमिवासनवनिचयो विषमतोयतीर्थवातरश्मिग्रहणं वीवधासारयोर्घातो रक्षा वा, विशुद्धिः स्थापना च बलस्य, प्रसारवृद्धिर्बाहूत्सारः,

वृक्ष, लता, बांबी तथा झुरमुट आदि से युक्त भूमि पैदल सैनिकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है । हाथियों के चढ़ सकने योग्य पहाड़, ऊँची-नीची जमीन, हाथियों के खुजलाने योग्य वृक्षों से युक्त, काटने योग्य लताओं से पूर्ण और गढों एवं दरारों से रहित भूमि हाथियों के लिए अधिक उपयुक्त है ।

( १ ) कंटकरहित, न अधिक ऊँची न अधिक नीची और अवसर आने पर लौट आने की सुविधा वाली भूमि पैदल सेना के पड़ाव-युद्ध के लिए अत्यन्त उत्तम है ।

( २ ) जिस भूमि में आगे बढ़ने की अपेक्षा पीछे लौटने में अधिक सुविधा रहती है और जिसमें कीचड़, जल, दलदल तथा कंकरीली मिट्टी का सर्वथा अभाव हो वह भूमि अश्वारोही सेना के लिए अतीव उत्तम है ।

( ३ ) धूल, कीचड़, जल, नरसल, मूंज और नरसल-मूंज की जड़ से युक्त तथा गोखुरुओं से रहित एवं बड़े-बड़े घने वृक्षों से रहित भूमि हस्त्यारोही सेना के लिए अति उत्तम है ।

( ४ ) स्नान योग्य जलाशयों, विश्राम करने योग्य स्थानों से युक्त, ऊबड़-खाबड़ रहित, क्यारियों से रहित, अवसर के समय में लौटने की सुविधाओं वाली भूमि रथ-सेना के लिए अधिक उपयोगी है । यहाँ तक उपयुक्त युद्धभूमि के सम्बन्ध में निरूपण किया गया ।

( ५ ) इसी प्रकार सेनाओं के ठहरने और युद्धादि कार्यों के सम्बन्ध में भी विचार कर लेना चाहिए ।

( ६ ) भूमि, निवास तथा वन की सफाई घोड़ों के द्वारा की जानी चाहिए । ( छिपे हुए शत्रु को हटाना भूमिनिश्चय; सेना के पड़ाव में उपद्रव को दूर करना वासनिश्चय; और जंगली मार्गों में चोरों को साफ करना वननिश्चय कहलाता है ) । विषम ( जहाँ पर शत्रु आक्रमण न कर सके ), तोय ( जहाँ पर जल से भरे तालाब हों ), तीर्थ ( नदी के घाट ), वात ( जहाँ पर शुद्ध वायु आ-जा सके ) और रश्मि

प्र० १५३-१५४ : अ० ४ ] युद्धभूमि और सैन्यकर्म ६५३

पूर्वप्रहारो व्यावेशनं, व्यावेधनमाश्वासो, ग्रहणं, मोक्षणं, मार्गानुसारविनिमयः, कोशकुमाराभिहरणं, जघनकोटचभिघातो, हीनानुसारणमनुयानं, समाजकर्मेत्यश्वकर्माणि ।

(१) पुरोयानमकृतमार्गवासतीर्थकर्म बाहूत्सारस्तोयतरणावतरणे स्थानगमनावतरणं विषम सम्बाधप्रवेशोऽग्निदानशमनमेकाङ्गविजयः, भिन्नसन्धानमभिन्नभेदनं व्यसने त्राणमभिघातो विभीषिका त्रासनमौदार्यं ग्रहणं मोक्षणं सालद्वाराट्टालकभञ्जनं कोशवाहनापवाहनमिति हस्तिकर्माणि ।


( जहाँ सूर्य का पूर्ण प्रकाश हो ), आदि सुविधाजनक स्थानों को पहिले ही से अपने कब्जे में कर लेना चाहिए, शत्रुदेश से आने वाले जीविकोपार्जन योग्य पदार्थों तथा शत्रु के मित्र की सेना का नाश और अपने पदार्थों एवं सेना की रक्षा, छिपकर प्रविष्ट हुई शत्रुसेना की सफाई और अपनी सेना की दृढ़ स्थिति, धान्य तथा घास आदि का संग्रह, शत्रु सेना को तितर-वितर करना, भुजाओं के समान शत्रुसेना को हटाना, शत्रुसेना पर पहिले चढ़ाई करना, शत्रुसेना में घुसकर उसको चौंका देना, शत्रुसेना को तरह-तरह की तकलीफ देना, अपनी सेना को धैर्य देना, शत्रुसेना को घेरना, शत्रुद्वारा गिरफ्तार अपने सैनिकों को छुड़ाना. अपनी सेना के मार्ग पर शत्रुओं के अधिकार करने पर शत्रुसेना के मार्ग को अपने अधीन कर लेना, शत्रु के कोष तथा राजकुमार का अपहरण करना, पीछे तथा सामने की ओर आक्रमण करना, जिनके घोड़े मर गये हों, ऐसे सैनिकों का पीछा करना, भागी हुई शत्रुसेना का पीछा करना और बिखरी हुई अपनी सेना को संगठित करना—ये सभी कार्य घोड़ों के द्वारा आसानी से कराये जा सकते हैं, इसीलिए इन्हें अश्वकर्म कहते हैं ।

( १ ) अपनी सेना के आगे-आगे चलना, पहिले से तैयार न हुए मार्ग, निवास घाट आदि का बनाना, भुजाओं के समान शत्रुसेना को तितर-वितर करना, नदी की गहराई बताने के लिए उसके भीतर प्रवेश करना, पंक्ति में खड़ा होकर शत्रु के आक्रमण को रोकना, इसी प्रकार मार्ग में चलना; इसी प्रकार नीचे उतरना, घने जंगलों तथा शत्रु की सेना में घुसना, शत्रु के पड़ाव में आग लगाना और अपने पड़ाव में लगी हुई आग को बुझाना, अकेले ही शत्रु पर विजय प्राप्त करना, अपनी बिखरी हुई सेना को संगठित करना, शत्रु की संगठित सेना को तितर-वितर करना, आपत्ति के समय अपनी सेना की रक्षा करना और शत्रु की सेना को कुचलना, अपने को दिखाने मात्र से ही शत्रु को घबड़ा देना, मदविह्वल होकर शत्रु को विचलित कर देना, अपने अस्तित्व से अपनी सेना के महत्त्व को प्रकट करना, शत्रु के योद्धाओं को पकड़ना, अपने योद्धाओं को छुड़ाना, शत्रु के परकोटे, प्रधान द्वार तथा अटारी आदि को ध्वस्त करना, शत्रु के कोष तथा सवारी आदि को भगा ले जाना, ये सभी कार्य हाथियों के द्वारा संपादित होने के कारण हस्तिकर्म के नाम से कहे जाते हैं ।

६५४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दसवां अधिकरण

(१) स्वबलरक्षा चतुरङ्गबलप्रतिषेधः संग्रामे ग्रहणं मोक्षणं भिन्नसन्धानमभिन्नभेदनं त्रासनमौदार्यं भीमघोषश्चेति रथकर्माणि ।
(२) सर्वदेशकालशस्त्रवहनं व्यायामश्चेति पदातिकर्माणि ।
(३) शिबिरमार्गसेतुकूपतीर्थशोधनकर्म यन्त्रायुधावरणोपकरणग्रासवहनमायोधनाच्च प्रहरणावरणाप्रतिविद्धापनयनमिति विष्टिकर्माणि ।

(४) कुर्याद्गवाश्वव्यायोगं रथेष्वल्पहयो नृपः ।
खरोष्ट्रशकटानां वा गर्भमल्पगजस्तथा ॥

इति सांग्रामिके दशमेऽधिकरणे युद्धभूमयः पत्त्यश्वरथहस्तिकर्माणि नाम चतुर्थोऽध्यायः; आदित एकत्रिंशदुत्तरशततमः ।

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(१) अपनी सेना की रक्षा करना, आक्रमण के समय शत्रु सेना को रोकना, शत्रु के बलवान् सैनिकों को पकड़ना, अपने गिरफ्तार सैनिकों को छुड़ाना, अपनी सेना को संगठित करना तथा शत्रु सेना को तितर-बितर करना, भयभीत करके शत्रु की सेना को घबड़ाना, अपनी सेना का महत्त्व प्रकट करना और भयंकर आवाज करना; ये सभी कार्य रथकर्म अर्थात् रथसेना के द्वारा संपादित होते हैं ।

(२) सम-विषम आदि सभी स्थानों और वर्षा-शरद् आदि सभी ऋतुओं में युद्ध के लिए तैयार हो जाना, नियम पूर्वक कवायद करना और अवसर आने पर युद्ध करना; ये सब कार्य पदाति सेना के हैं ।

(३) अस्त्र-शस्त्र न रखकर फौज में कार्य करने वाले कर्मचारियों को विष्टि कहा जाता है । सैनिक शिविर बनाना, सैनिक मार्ग, नदी के पुल, बाँध, कुएँ, घाट आदि तैयार करना, घास आदि उखाड़ कर मैदान साफ करना, युद्ध की मशीनें, अस्त्र-शस्त्र, कवच आदि युद्धोपयोगी सामान तथा हाथी, घोड़ों के लिए घास ढोना, उनकी रक्षा का प्रबन्ध करना, युद्धभूमि में कवच, हथियार तथा घायल आदि सैनिकों को दूसरी जगह ले जाना, ये सभी कार्य विष्टि नामक कर्मचारियों के हैं ।

(४) जिस राजा के पास घोड़ों की तादाद कम हो उसको चाहिए कि वह घोड़ों के साथ रथों में बैलों को भी जोड़ कर काम ले । इसी प्रकार जिस राजा के पास हाथियों का अभाव हो वह अपनी सेना को गधों या ऊँटों द्वारा चलाई जाने वाली गाड़ियों के बीच में सुरक्षित रखे ।

सांग्रामिक नामक दसवें अधिकरण में युद्धभूमि-पत्त्यश्वरथहस्तिकर्म नामक चौथा अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १५५-१५७## पक्षकक्षोरस्यानां बलाग्रतो व्यूहविभागः सारफल्गुबलविभागः,
अध्याय ५## पत्त्यश्वरथहस्तियुद्धानि च

(१) पञ्चधनुःशतावकृष्टदुर्गमवस्थाप्य युद्धमुपेयाद्, भूमिवशेन वा। विभक्तमुख्यामचक्षुर्विषये मोक्षयित्वा सेनां सेनापतिनायकौ व्यूहेयाताम्।

(२) शमान्तरं पत्तिं स्थापयेत्। त्रिशमान्तरमश्वम्। पञ्चशमान्तरं रथं, हस्तिनं वा। द्विगुणान्तरं त्रिगुणान्तरं वा व्यूहेत। एवं यथासुखम-सम्बाधं युध्येत।

(३) पञ्चारत्नि धनुः, तस्मिन् धन्विनं स्थापयेत्। त्रिधनुष्यश्वम्। पञ्चधनुषि रथं हस्तिनं वा। पञ्चधनुर्नीकसन्धिः पक्षकक्षोरस्यानाम्।


पक्ष, कक्ष तथा उरस्य आदि विशेष व्यूहों का सेना के परिणाम के अनुसार व्यूहविभाग; सार तथा फल्गु-बलों का विभाग; और चतुरंग सेना का युद्ध

( १ ) युद्ध-भूमि से पाँच-सौ धनुष के फासले पर छावनी डालनी चाहिए, अथवा भूमि के अनुसार भी छावनी की दूरी इससे ज्यादा या कम की जा सकती है। मुख्य सैनिकों को अलग-अलग करके उन्हें इस प्रकार छिपाया जाय, जिससे शत्रुओं को कुछ भी पता न लगने पावे। उसके बाद सेनापति और नायक, दोनों उस सेना की व्यूह-रचना को यथोचित ढंग से सम्पन्न करें।

( २ ) पैदल ( पत्ति ) सेना के प्रत्येक सिपाही को एक-एक शम (चौदह अंगुल) के फासले पर खड़ा किया जाय। इसी प्रकार घुड़सवार सिपाहियों को तीन-तीन शम के फासले पर, और रथारोहियों तथा हस्त्यारोहियों को पाँच-पाँच शम के अन्तर पर खड़ा किया जाय अथवा भूमि की सुविधानुसार ही उनका फासला कम या ज्यादा किया जाय। ऐसी व्यूह-रचना करके निर्भीक होकर सुखपूर्वक युद्ध किया जाय।

( ३ ) पाँच अरत्नि ( हाथ ) का एक धनुष होता है। धनुर्धारी योद्धाओं को पाँच हाथ के फासले पर खड़ा किया जाय। तीन धनुष ( पन्द्रह हाथ ) के फासले पर अश्वारोहियों को और पाँच धनुष ( पच्चीस हाथ ) के फासले पर रथारोहियों को तथा हस्त्यारोहियों को खड़ा किया जाय। पक्ष ( आगे बगल में खड़े होकर लड़ने वाली ), कक्ष ( आगे अवान्तर भाग में खड़े होकर लड़ने वाली ) और उरस्य ( बीच में खड़े होकर लड़ने वाली ) पाँचों सेनाओं को पाँच-पाँच धनुष के फासले पर खड़ा किया जाय।