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काव्यादर्श (महाकवि दण्डी - प्रसादिनी सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Kavyadarsha of Mahakavi Dandin with Prasadini Commentary

महाकवि दण्डी द्वारा

DevanagariHindipublished270 पृष्ठ

३।८६] ३. वर्ण-नियम चित्र बन्ध : (१.३) द्विस्वरनियमवान् १०६ (१.३) श्री-दीप्ती, ह्री-कीर्ती, धी-नीती, गीः-प्रीती । एधेते द्वे द्वे ते, ये नेशे देवेशे ॥ ८६ ॥ (१.३ क) लक्ष्मी और तेज, (ख) लज्जा और यश, (ग) प्रज्ञा और नीति, (घ) वाणी और प्रीति ये दो-दो तुम्हारे ही वृद्धिको प्राप्त हो रही हैं, जो कि देवराज (इन्द्र) में (या हे राजन्, शिवमें) नहीं हैं ॥ ८६ ॥ गति' छन्दमें की है। यह अन्यत्र 'अमृतगतिका', 'अमृततिलका', 'त्वरितगति' नामोंसे भी अभिहित है। अन्यत्र इसे 'कुलटा' नाम भी दिया है। इसमें न, ज, न, ये तीन गण तथा अन्तमें एक गुरु होता है और प्रत्येक पाँचवें अक्षरपर यति होती है। पाँचवाँ अक्षर ही गुरु भी होता है१ ॥ ८५ ॥ (१.३) दो स्वरोंके नियम वाला चित्र बन्ध—षडक्षर गायत्री जातिके 'शेषा', 'शेषराज' अपरनामक 'विद्युल्लेखा' छन्दमें२ निबद्ध प्रकृत छियासीवें श्लोकमें कविने अपने वर्ण्य राजाको श्री आदि आठ गुणोंके चार युग्मोंमें देवराज या शिवसे भी बढ़कर बताया है। ये दो-दो गुणोंके चारों युग्म न इन्द्रमें हैं न शिव में; परन्तु वर्ण्य राजा में ये वर्धमान अवस्थामें (एधेते) हैं; कहाँ जाकर रुकेंगे, कोई नहीं कह सकता । (१) इन्द्रमें श्री तो है, पर दीप्ति (तेज) विलासिता के कारण नहीं है। जब भी शत्रुओंका आक्रमण होता है, दौड़े जाते हैं ब्रह्मा, विष्णु, महेशके या और तो और किसी पार्थिव प्राणीके ही पास सहायता लेनेको । (२) देवराज हैं, पर उनमें न लज्जा है, न यश । कामुकके रूपमें निर्लज्जकी प्रसिद्धि अलबत्ता अवश्य है। यह उनकी सहस्राक्षता से ही व्यक्त होता है । (३) कामुकमें बुद्धि होती भी है, तो वह नीतिका अनुसरण नहीं करती । (४) ऐसे स्वार्थप्रेरित पुरुषमें मधुर वाणी और उससे सम्पाद्य प्रीति भी दुर्लभ ही होती है ।३ श्मशानवास, दिगम्बरता, १. दिअवर हार पअलिआ पुण वि तह डिअ करिआ । वसु-लहु वे गुरु सहिआ अमिअगइ, धअ कहिआ ॥ प्राकृतपैङ्गल २।६६ कुलटा स्यान्नजनगा, पञ्चभिः पञ्चभिर्यतिः । २. वाराहा मत्ता जं कण्णा तीआ होतं । हारा छक्का बन्धो सेसा राजा छन्दो ॥ प्राकृतपैङ्गल २।४२ वृत्तरत्नाकर ३।६ : विद्युल्लेखा मो मः । नारायण भट्ट : गायत्री तककी जातिके छन्दोंमे पादान्तयति होती है, यह छान्दस उपदेशपरम्परा है । ३. कविका प्रेरणास्रोत श्रीमद्भागवत (८।८।२०) प्रतीत होता है : कश्चिन्महांस्तस्य न कामनिर्जयः, स ईश्वरः किं ? परतो व्यपाश्रयः ॥

११० काव्यादर्श [३।८७-८८ (१.४) सामायामा मायामासा मारानाया यानारामा । यानावारा रावानाया मायारामा मारायामा ॥ ८७ ॥ (२.१) नयनानन्द-जनने, नक्षत्र-गण-शालिनि । अघने गगने दृष्टिरङ्गने, दीयतां सकृत् ॥ ८८ ॥ (२.१) हे प्रशस्त अङ्गों वाली, नयनोंको आनन्द उत्पन्न करने वाले नक्षत्र- समूहसे सुशोभित, मेघरहित गगनपर एकबार तनिक नज़र तो डालो ।।८८।।

अशुचिता, विरक्ततासे शिवमें भी श्री, ह्री, नीति और प्रीतिका अभाव स्वतः
व्यक्त है।
यहाँ श्लोकके पूर्वार्धमें सब १२ अक्षर दीर्घ इकार हैं और उत्तरार्धमें सभी
१२ अक्षर एकार हैं । यह बन्ध 'ई', 'ए' के व्यस्त प्रयोगसे भी बन सकता
है । उसका सौन्दर्य व्यवस्थाके तारतम्यपर निर्भर करता है। इस प्रकार
दो स्वरोंसे ही निबद्ध होनेसे यह श्लोक विचित्र शोभासे सम्पन्न हो गया है ।
यह शोभा शब्दों (वर्णविन्यास) से प्राप्य होनेके कारण यह वर्णविन्यास
शब्दालङ्कार है । दो स्वरोंमें सीमित होनेसे दुष्कर भी है ।। ८६ ।।
(१.४) एकस्वर नियमवान् दुष्कर चित्रबन्ध—यह श्लोक पीछे 'सर्वतो-
भद्र चित्रबन्ध' के उदाहरणके रूपमें (३।८२, पृष्ठ १०१ पर) आ चुका है।
अर्थ तथा अन्य वक्तव्य वहाँ कहा जा चुका है । यहाँ यह आचार्यने एक
'आ' स्वरके ही बत्तीस बार प्रयोगके कारण एक स्वरनियम चित्रबन्धके
उदाहरणके रूपमें दिया है । इसीसे इस अलङ्कारका भी उदाहरण प्रस्तुत
हो जानेके कारण अलग उदाहरण देना आवश्यक नहीं समझा है । १ दोनों
शब्दालङ्कार तुल्यबल हैं। अतः इनकी संसृष्टि है ।। ८७ ।।
(२.१) चार स्थानोंसे उच्चरित वर्णोंके ही प्रयोग वाला चित्र बन्ध—
वर्णनियमवान् चित्रबन्धके द्वितीय भेद स्थाननियमके इस प्रथम उदाहरणमें
कविने नकारावृत्तिसे सम्पन्न अनुप्रास वाले प्रथम पादमें न-विपुला तथा शेष
पादोंमें श्लोकके प्रयोगसे नायकने रजनीमें झिलमिलाते तारों वाले शरद् ऋतु
के स्वच्छ गगनकी शोभापर एक नज़र डालनेकी प्रार्थना सजनीसे की है ।
१. रत्नश्री : सर्वतोभद्रं पूर्वोक्तमेकस्वरोदाहरणमपि कल्पत इति पुनरुदा-
हृतम् । एकस्वरोदाहरणमात्रमिह विवक्षितम् । तच्च पूर्वसिद्धमेव
सम्भवतीति किमपूर्वेणेदृशेनाहोपुरुषिकामात्रेणेति भावः ।

३।८६] ३. वर्णनियम : चित्र बन्ध (२.२) त्रिस्थानवर्णनियमवान् १११ (२.२) अलि-नीलालक-लतं कं न हन्ति घन-स्तनि ? आननं नलिन-च्छाय-नयनं शशि-कान्ति ते ॥ ८६ ॥ (२.२) हे मघन स्तनों वाली, भ्रमरसमान काली घुंघराली अलकावली वाला, कमलसमान शोभासे युक्त नज़रों वाला, चन्द्रके समान कान्ति वाला तुम्हारा मुख किसे कष्ट नहीं पहुँचाता है ? ॥ ८६ ॥ प्रथम पाद तृतीयपादोक्त 'गगने' का सप्तम्यन्त विशेषण भी हो सकता है, तो 'अङ्गने' का सम्बुद्धिविभक्त्यन्त विशेषण भी हो सकता है । 'अघने' से शरद् ऋतुके कारण 'निरभ्रे' अर्थ अभिप्रेत है । नक्षत्रोंसे शोभित निरभ्र गगनमें एक ही कमी रह गई है चन्द्रकी । वह यहाँ तुम मेरे पास हो ! अतः 'हे नयनोंको आनन्दित करने वाली' कहना अधिक उपयुक्त है । 'आनन्दजनने' से √ह्लाद्, √चन्द् धातुओंका अर्थ कविने जानबूझकर कहा हैं। नयनोंकी कमलसे प्रसिद्ध समानताको दृष्टिमें रखते हुए 'चन्द्र' या 'चन्द्रिका' का तथा नयनोंका प्रयोग नहीं किया है, क्योंकि कमल और चन्द्रमा में विरोध जो है। 'दृष्टि'से कमलकी प्रतीति नहीं होती । यहाँ कविने समूचे श्लोकमें कण्ठ्य अकार ह्रस्व, गुरु और दीर्घ तीनों प्रकारका, (ii) तालव्य इकार (ह्रस्व और दीर्घ), (iii) कण्ठतालव्य ए तथा (iv) मूर्धन्य ऋ (ह्रस्व और गुरु), इन चार स्थानोंसे उच्चार्य स्वरोंका प्रयोग किया है । (i) कण्ठ्य क, ख, १ ग, घ, ङ का, (ii) तालव्य ज, य, श का, (iii) मूर्धन्य ट, ण, र, और षका तथा (iv) दन्त्य त, द, न, और स का इस प्रकार इन चार ही स्थानोंसे उच्चार्य व्यञ्जनोंका प्रयोग कविने किया है । कविने इन स्थानों से उच्चार्य वर्णोंके चयनमें एक और बात ध्यानमें रखी है : (१) स्वरोंमें मात्रिक अवान्तर भेद भी दिये हैं । (२) व्यञ्जनोंमें (i) स्पर्श, (ii) अन्तस्थ और (iii) ऊष्म प्रत्येक वर्गका चयन किया है । इस प्रकार यहाँ शब्दचयनकी दुष्करता स्पष्ट है ॥ ८८ ॥ (२.२) तीन स्थानोंमें उच्चरित वर्णोंके नियम वाला चित्र बन्ध- प्रस्तुत ८६ वाँ श्लोक स्थाननियमवाले चित्रबन्धके द्वितीय त्रिस्थान वर्णनियम चित्रबन्धको प्रदर्शित करनेको दिया है। इसमें कविने वक्ताकी रतिके आलम्बन १. 'नक्षत्र' के 'क्ष' का पूर्वाङ्ग 'क्' 'ष्' के योगमें 'ख्' के रूपमें भी उच्चरित होता है : चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् (सिद्धान्तकौमुदी, हल्सन्धि); शुक्लयजुःप्रातिशाख्य ४।१२० : असस्थाने मुदि द्वितीयं शानकस्य ।

११२ काव्यादर्श [३।६० (२.३) अनङ्ग-लङ्घनालग्न-नानाऽऽतङ्का सदङ्गना । सदानघ, सदानन्द, नताङ्गासङ्ग सङ्गत ॥ ६० ॥ (२.३) हे सदा अनघ (पापरहित), सदानन्द (श्रेष्ठोंको आनन्दित करने वाले), नत (विनत) अङ्गों वालीको प्रेम करने वाले मित्र, वह श्रेष्ठ सुन्दरी अनङ्गका लङ्घन (कामदेवकी मर्यादाका अतिक्रमण) करनेके कारण तरह- तरहके आतङ्कोंमें आ घिरी है। (उसे तुम कामदेवके कोपसे बचाओ) ॥६०॥ विभाव सुन्दरीके उद्दीपन विभाव मुखकी अद्भुत आकर्षकताका वर्णन पिछले पद्यके समान प्रथम पादमें नविपुलासे युक्त श्लोक छन्दमें किया है। कोमल तथा आनन्ददायी नील कुञ्चितकेशोंसे तथा कमलसदृश नयनोंसे युक्त ज्योत्स्नामय, देखते ही भली भाँति प्राण युक्त कर देने वाले (आनन) मुख पदार्थ द्वारा भी हनन किए जानेसे अधिक विषम क्या होगा ? दण्डीके यहाँ यह विरोध है । ग३३४ देखें । यहाँ (१) स्वरोंमें कण्ठ्य (i) अ, आ, (ii) तालव्य इ, ई, (iii) कण्ठ-तालव्य ए स्वरोंका ही प्रयोग किया गया है। (२) व्यञ्जनोंमें (i) कण्ठ्य क, घ, ह, (ii) तालव्य च, छ, य, श, (iii) दन्त्य त, न, ल, स का, (३) तथा स्वरव्यञ्जनोभयात्मक अनुस्वारका¹ प्रयोग किया गया है। यहाँ भी अवान्तर सभी भेदोंका प्रयोग किया हुआ है। अर्थावबोधकी दृष्टिसे यद्यपि यह पद्य प्रसादगुणयुक्त (झटिति अर्थसमर्पक) होनेसे सुगम है, पर रचनाविधानमें वर्णचयनमें स्थानविशेषसे तथा उसमें भी अवान्तर भेदोंको स्थान देनेके लिये विशेष प्रयत्न अपेक्षित होनेसे यह आधुनिक मन्त्रिमण्डलके गठनके प्रयासोंके समान दुष्कर है, यह स्पष्ट है ॥ ८६ ॥ (२.३) द्विस्थान वर्णनियम चित्र बन्ध—नवतितम श्लोकमें कविने वर्ण- स्थाननियम चित्रबन्ध वाले पद्यमें सुन्दरीकी विप्रलम्भ रतिका वर्णन किया है। उत्तरार्धके सभी पद सम्बोधन हैं। कोई पुरुष अपने मित्रको मित्रके प्रेममें बिरहिन नायिकाकी स्थितिका वर्णन कर रहा है। अर्थकी दृष्टिसे यह सुगम १. शौनकके अनुसार अनुस्वारमें स्वर और व्यञ्जन दोनोंके धर्म हैं। अतः यह स्वर भी माना जा सकता है और व्यञ्जन भी : अनुस्वारो व्यञ्जनं वा, स्वरो वा (ऋक्प्रातिशाख्य १।५) । उवटने इसकी व्याख्या इसे स्वरव्यञ्जनोभयात्मा वर्णान्तरके रूपमें बताकर की है : ‘अं’ इत्यनुस्वारो वर्णसमाम्नाये पठ्यते । स कांश्चित् स्वरधर्मान् गृह्णाति, कांश्चिद् व्यञ्जन-धर्मान् ।...तत्रोभय-धर्म-योगादुभय-स्वभावं स्वर-व्यञ्जनयोरन्यद् वर्णान्तरं प्रकाशयति—‘अनुस्वारो व्यञ्जनं वा, स्वरो वा ।’ इति ।

३।६० ] ३. वर्ण-नियम चित्र बन्ध : (२.३) द्वि-स्थान वर्ण-नियम ११३ है । पर रचनाकी दृष्टिसे दो ही स्थानोंके व्यञ्जनोंके चयनके कारण कठिन है । इसमें (i) कण्ठ्य व्यञ्जनों क, ग, घ, ङ, का तथा (ii) दन्त्य त, द, न और स का प्रयोग हुआ है । पिछले दो उदाहरणोंमें स्वर और व्यञ्जन दोनों, सदृशसङ्ख्यक स्थाननियमसे प्रयुक्त थे ।१ यहाँ स्वरस्थाननियम है, किन्तु वह व्यञ्जनस्थाननियमसे भिन्न है : केवल कण्ठ्य 'अ' का ही ह्रस्व और दीर्घ रूपोंमें प्रयोग हुआ है । इससे यह सूचित होता है कि आचार्यके मनमें (i) केवल व्यञ्जन या (ii) केवल स्वरका स्थाननियम भी शोभाकारकके रूपमें स्थित है । इस दृष्टिसे यह श्लोक द्विस्थानव्यञ्जननियम और एकस्थान- स्वरनियमका उदाहरण है । मिश्र पद्धतिको आदर देने वाले आचार्यके लिये यह दिग्निर्देश उचित ही है । यहाँ भी कविने स्पर्श, अन्तस्थ और ऊष्म तीनों प्रकारके व्यञ्जनोंका प्रयोग किया है । नताङ्गासङ्ग—नतान्यङ्गानि यस्याः, सा नताङ्गी, नताङ्गा२ (बहुव्रीहि) । नताङ्गायामासङ्ग आसक्तिः प्रेमा यस्य, तथाविध (बहु०) । रत्नश्रीज्ञान आदिने 'नताङ्गासङ्गेन सङ्गत' विग्रह मानकर 'सङ्गत' को समासका उत्तर पद माना है : हे अन्यस्त्रीसम्भोगप्रसङ्ग । पर यह पिछले दो विशेषणोंके विपरीत होनेसे उचित नहीं है : अन्यस्त्रीसम्भोगप्रसङ्ग (परस्त्रीके सम्भोगमें लीन) पुरुष 'सदा अनघ' (निष्पाप) तथा 'सदानन्द' (सत्‌को, या सदा, आनन्दित करने वाला) कैसे होगा ? सङ्गत—सम् + √गम् + क्त । 'क्त' जब भावमें होता है, तब 'सख्य' अर्थ होता है और जब कर्ता अर्थमें, तब रूढिमे 'सखा' अथवा यौगिक 'संयुक्त' अर्थ होता है३ ।। ६० ।। १. पीछे स्वरों और व्यञ्जनोंके स्थानोंमें भेद व्यञ्जनोंका कण्ठ-तालव्य भेद सम्भव न होनेसे हुआ है । समानाक्षर (simple vowels) उसी स्थान वाले प्रयुक्त हैं, जिस स्थानके व्यञ्जन हैं । सन्ध्यक्षर (diphthongs) भिन्न हैं । २. सिद्धान्तकौमुदी, स्त्रीप्रत्यय : नासिकोदरौष्ठजङ्घादन्तकर्णशृङ्गाच्च (अष्टा० ४।१।५५) । अत्र वृत्तिः—अङ्ग गात्र-कण्ठेभ्यो वक्तव्यम् । स्वङ्गी, स्वङ्गेत्यादि । कवियोंमें ङीषन्त अधिक प्रचलित है : अद्य प्रभृत्यवनताङ्गि, तवास्मि दासः (कुमारसम्भव ५।८६) । दण्डीने अकारबहुल पद्यमें भिन्नस्थानोच्चार्य एक ईकारान्तका प्रयोग वैरस्य- कारक समझकर नहीं किया है । ३. अष्टाध्यायी ३।१।१०४ : अजर्यं सङ्गतम् । भट्टिकाव्य ६।५३ : तेन सङ्गतमार्येण रामाजर्यं कुरु द्रुतम् । ५५ : आदृत्यस्तेन वृत्त्येन स्तुत्यो जुष्येण सङ्गतः ।

११४ काव्यदर्श [३।६१ (२.४) अगा गाङ्गाङ्ककाकाक-गाहकाघक-काक-हा । अ-हाहाऽङ्ग, ख-गाङ्गाग-कङ्काग-खगकाककः१ ॥ ६१ ॥ (२.४) गङ्गाके जलमें (जलविहारमें अपेक्षित राजस) चञ्चलतासे रहित होकर, अर्थात् सात्त्विक पुण्यबुद्धिसे, अवगाहन (स्नान) करने वाले, हा-हाकार (शोक, धिक्कारके शब्दों) को (गङ्गास्नानसे पवित्र होनेके कारण) नहीं प्राप्त करने वाले आकाशमें गतिशील सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि ज्योतियोंको अङ्कमें धारण करने वाले (सुमेरु) पर्वतको अर्थात्, वहाँ स्थित सभी २१ स्वर्गों२ को प्राप्त करने वाले (हे सत्पुरुष), महा-पातक आदि निन्दित पापों रूपी कौवोंको (स्नानके पुण्यसे) नष्ट करने वाले तथा स्थावर जङ्गम दोनों रूपोंमें स्थित ब्रह्मकी प्राप्तिके सुख वाले होकर आदित्यमण्डलकी प्राप्ति रूपी वैराज पदको प्राप्त (ही) हो गए हो, अर्थात् इस पदको अवश्य प्राप्त करोगे ॥६१॥ (२.४) एकस्थान वर्णनियम चित्रबन्ध—इक्यानवेंवे श्लोकमें कविने गङ्गा- स्नानके पुण्यका महत्त्व गङ्गास्नान करने वाले किसी पुरुषके लिए उत्तम वैराजपदकी प्राप्तिकी आशंकासे व्यक्त किया है। इसमें कविने कण्ठ्य (१) स्वर अ, आ का, (२ i) स्पर्श व्यञ्जनों क, ख, ग, घ, ङ, (ii) ऊष्म ह और (iii) विसर्ग३ इन एक ही स्थान कण्ठसे उच्चार्य वर्णोंका मिलाजुला (लयात्मक) प्रयोग किया है। रचनाकी दुष्करता स्पष्ट है। गाङ्ग-काकाक-गाहक — गङ्गाया इदं गाङ्गम्, तस्येदम् (अष्टा० ४।३।१२०) अण्, गाङ्गं च तत् कम् उदकम् गाङ्ग कम् गङ्गाजलम्, ककनं लौल्यं चाञ्चल्यम्, कक लौल्ये (भ्वादि) न काकः अकाकः, अचञ्चलता, अकाकेन गाहते प्रविशति १. अन्वयः—(हे) गाङ्ग-काकाक-गाहक, अ-हाहाऽङ्ग, ख-गाङ्गाग-कङ्क, अघक-काक-हा अग-खग-काककः (त्वम्) गाम् अगाः । रत्नश्रीज्ञानने पद्यके अन्तिम शब्दको भी सम्बोधन ही माना है। इस पाठमें कण्ठ्य वर्णों में विसर्ग रह जाता है। अतः पूर्वार्धके अन्तमें प्रथमान्तके समान उत्तरार्ध के अन्तमें भी प्रथमान्त पाठ विसर्गका भी समावेश हो जानेसे उचित है । २. एक-विंशत्यमी स्वर्गा निविष्टा मेरु-मूर्धनि ।। नृसिंहपुराण ३०।२४ सरित्स्नायी・・・निर्मलं स्वर्गमाप्नोति・・・॥ ३७ ३. 'अः, ‿ क, ‿ प, अं' (ऋक्प्रातिशाख्य, विष्णुमित्रकृत वर्गद्वयवृत्तियुत, पृष्ठ १६) तक प्रोक्त वर्णराशिमें स्वर और अनुस्वारसे इतर वर्णोंको शौनक‌ने 'व्यञ्जन' कहा है : सर्वः शेषो व्यञ्जनान्येव (ऋ प्रा १।६) । विसर्गकी गणना व्यंजनोंमें भी ऊष्म वर्णोंमें की है : प्रथमपञ्चमौ च द्वा ऊष्मणाम् । केचिदेता उरस्यौ (ऋ प्रा १।३८-३६) ।

३।६२] ३ (३.१) त्रि-विध पञ्चस्थानवर्ण-नियम चित्र बन्ध ११५ ३.१ रे रे रोरू-रुरूरो-रुगागो-गोऽगाङ्ग-गोऽग-गुः । (३.१.) अरे अरे (अति नीच) निर्मम, अचञ्चल (मौन) वाणी वाला अर्थात् चुपचाप होकर पर्वतके अङ्गों (कन्दरा, खोह, शिलाकी ओट) में (अथवा वृक्षोंके अङ्गों तने, डालियों, पत्तों, झुरमुटोंकी ओटमें) स्थित, मेरे इति अकाक-गाहकः, गाङ्ग-कस्य अकाक-गाहकः, तस्य सम्बोधनम् अ-हा-हाऽङ्ग हा-हा-शब्दं शोक-धिक्कार-व्यञ्जकम् अङ्गति गच्छति, अगि... गत्यर्थाः (भ्वादि) इति हा-हाऽङ्गः, न हा-हा-ऽङ्गः इति अ-हा-हाऽङ्गः, तस्य सम्बोधनम् । ख-गाङ्गाकङ्क — खेन गच्छन्तीति ख-गानि नक्षत्रादीनि ज्योतींषि, तानि अङ्के यस्य स खगाङ्कः, स चासावगः पर्वत: सुमेरुः,१ तं कङ्कति इति ख-गाङ्क-कङ्कः, ककि... गत्यर्थाः (भ्वादि), तस्य सम्बुद्धौ अघक-काक-हा — कुत्सितानि निरति- शय-तमोमय-निरय-गतिफलत्वान्निन्दितानि अघानि पापानि अघ कानि, तान्येव काका इव कुत्सितत्वात्, इति अघक-काकाः, रूपक समासः, तान् हन्ति नाशयति इति । अग-खग-काककः— न गच्छतीत्यगं स्थावरम् । खेन आकाशेन गच्छ- तीति खगम् जङ्गमम्, अगं च खगं चेत्यग-खगं स्थावर-जङ्गमं, तथाविधं च कम् सुखस्वरूपमानन्दमयं ब्रह्म अग-खग-कम्, तस्य अकनम् आकः गमनं प्राप्तिरिति यावत्, तस्य कं सुखमस्त्यस्य, मत्वर्थीयोऽच्, सः । १ गाम् आदित्यं, तदुपलक्षितं स्वर्गम् । अगाः—गतवानसि, इणो गा लुङि (अष्टा० २।४।४५)—यहाँ 'ऐसे पुरुषका स्वर्गगमन अवश्य होता है,' इस धारणासे भविष्यकालमें ही भूतकाल का प्रयोग उपचारसे किया गया है (—रत्नश्री) ।। ६१ ।। (३.१) त्रिविध पञ्चस्वर-स्थान-वर्णनियमवान् चित्रबन्ध—६२वें श्लोक में कविने आश्रमके पालतू मृगको मारने वाले किसी शिकारीको अपने पास आनेसे मना करते किसी तपस्वीका वर्णन किया है । १. महाभारत, वनपर्व १६३।१५, २७, २८ आदि देखें । २. रत्नश्रीज्ञानकी यह व्याख्या भी सुन्दर है : एवं कल्याणायतत्वाद् दुर्जन- संसर्गोऽपि तव नास्तीति कथयति—अगन्ति कुटिलं गच्छन्ति अदान्तत्वाद् इत्यगानि । कर्तयंच् । अगानि च तानि खानीन्द्रियाणि चेत्यग-खानि । तानि गच्छन्तीत्यग-ख-गाः अदान्तेन्द्रियाः, खला इति यावत् । त एव कुत्सितत्वादगखगकाः । तेष्वककोऽलोलोऽलुब्धो निरपेक्षस्तत्संसर्ग-द्वेषात् । अर्थात् विषयोंके प्रति कुटिलतासे (मनुष्यको हानिकारक रूपसे) गमन करने वाली ज्ञानकर्मेन्द्रियोंके प्रति गमन करने वाले असंयमी लोगोंमें संसर्ग नहीं रखने वाला प्रकृत पुरुष । रत्नश्रीज्ञानने इस विशेषणको सम्बोधन माना है ।

११६ काव्यादर्श [३।६३ किं केका-काकु-कः काको मा-माऽऽगा मा समामम¹ ॥६२॥ (३.२) देवानान्नन्दनो देवो नोदनो वेदनिन्दिनः । (पालित) किलकारियां भरते हुए मृगकी छातीको आहत करनेके अपराधको प्राप्त (तू) मेरे पास मत आ, मत आ । क्या कौआ (कभी) केका (मयूर- ध्वनि) की स्वरभङ्गियों (आनन्दकारी पञ्चम) को बोलने वाला हो सकता है ? ॥ ६२ ॥ (३.२) देवताओंको प्रसन्न करने वाले, वेदनिन्दक (असुर) वर्गको दुःखी यह उदाहरण चित्रबन्धकी दृष्टिसे बहुत कलापूर्ण है। इसमें तीनों प्रकार के नियम एक साथ अपनाए गये हैं : (१) पञ्च-स्वर-नियम—अ, इ, उ, ए तथा ओ; (२) पञ्च-स्थान-नियम—(क) स्वर : (i) कण्ठ्य अ, आ. (ii) तालव्य इ, (iii) ओष्ठ्य उ, (iv) कण्ठ-तालव्य ए, (v) कण्ठोष्ठ्य ओ; (ख) व्यञ्जनः (i) कण्ठ्य क, ग, विसर्ग, (ii) कण्ठ-नासिक्य (अनुनासिक) ङ, (iii) मूर्धन्य र, (iv) जिह्वामूलीय ≍क तथा (v) ओष्ठ्य म; (३) पञ्च-व्यञ्जन-नियम—क, ग, ङ, म और र। विसर्ग उपध्मानीय एवं जिह्वा- मूलीय घोष हका ही अघोष रूप (allophone) होनेसे² स्वतन्त्र व्यञ्जनके रूपमें अभिप्रेत नहीं हैं । नियमतः स्वरके पश्चात् तदङ्गत्वेन प्रयुक्त होनेके कारण अनुस्वार एवं विसर्ग स्वरधर्म अधिक हैं, स्वतन्त्र वर्ण कम । पर स्थान- नियममें सुस्पष्टतया पृथक्प्रयत्ननिर्वर्त्यताके कारण उनकी पृथग् गणना उचित है । 'चतुःप्रभृति' अल्पत्वका उपलक्षक ही है। इयत्ताका निर्धारक नहीं। सभी टीकाकारोंने इस श्लोकको चतुर्वर्णनियमका उदाहरण माना है। 'ह'के अघोष रूप और उनके रूपभेद जिह्वामूलीयको छोड़नेपर भी दो बार प्रयुक्त नासिक्य स्पर्श 'ङ' की पञ्चम वर्णताका अपलाप कैसे किया जा सकता है ? इसके अतिरिक्त, जब अन्य दो प्रकारके वर्णनियम भी यहाँ व्यवस्थित रूपसे उपस्थित हैं, तो उन्हें शोभाकारक (चित्रबन्धत्वका प्रयोजक) क्यों न माना जाये ? अतः वस्तुतः आचार्यने यहाँ तीनों प्रकारके चित्रबन्धोंकी संसृष्टि (समकक्षतया उपस्थिति) प्रस्तुत की है ॥ ६२ ॥ (३.२) त्रिवर्ण-नियमवान् चित्र-बन्ध—हिरण्यकशिपु द्वारा मुष्टिसे ताडित स्तम्भसे अतिभीषण निनाद करते हुए भगवान् विष्णु प्रकट हुए । इसी १. अन्वयः—रे रे अमम, अगाङ्ग-गः, अगगुः, मम रोरु-रूरुरो-रुगागो-गः (त्वम्) मा मा-मा आ-गाः । किं काकः केका-काकु-कः ? २. ऋक्प्रा०१।१०: उत्तरेऽष्टा ऊष्माणः । ११: अन्त्याः सप्त तेषामघोषाः ।

२।६३] ३. (३.२) त्रि-वर्ण-नियमवान् चित्र बन्ध : ११७ दिवन्दुदाव नादेन दाने दानवनन्दिनः ॥ ९३ ॥ करने वाले देव (नृसिंह रूपधारी विष्णु) ने दानवनन्दन (हिरण्यकशिपु) के खण्डन (दान, विदारण) (प्रयुक्त) गर्जना (नाद) से आकाशको विदीर्ण कर दिया ॥ ६३ ॥ पुराणप्रसिद्ध कथाको आचार्य दण्डीने तिरानवेंवे श्लोकमें बताया है। ब्रह्मासे वर प्राप्त करनेके बाद निश्चिन्त हुए हिरण्यकशिपुने वेदप्रतिपादित मर्यादाओंको तोड़ना शुरू किया। १ हरिभक्त प्रह्लादसे चिढ़कर उसने 'स्तम्भमें स्थित विष्णु तेरी रक्षा करेगा' कहकर उस स्तम्भपर मुष्टिकाका प्रहार किया। ३ उस स्तम्भसे तभी अति भीषण निनद (गर्जना) हुआ, जिससे ब्रह्माण्ड कटाह ही फूटनेको आया और ब्रह्मादि देवोंको भी लगा कि अब उनके लोकका प्रलय होने ही वाला है। ४ श्रीमद्भागवतकी इस कथाको आचार्य दण्डीने सङ्केतात्मक 'वेदनन्दिनः', 'दाने नादेन दिवं दुदाव' से व्यक्त किया है। यहाँ स्वर तो विविध प्रकारके अ, इ, उ, ए तथा ओ आये हैं। किन्तु ये चित्रत्वप्रयोजक नहीं हैं। व्यञ्जन केवल तीन हैं : (i द १३ बार, (ii) न १८ बार, (iii) व छह बार । इन व्यञ्जनोंका प्रयोग पीछेके उदाहरणोंमें पूरे पादमें या श्लोकके काफी बड़े हिस्सेमें लगातार एक ही व्यञ्जनके प्रयोगके रूपमें हुआ है; किन्तु यहाँ यह एक उचित व्यवधानसे हुआ है। इससे यह बन्ध बहुरंगी मनकोंसे व्यवहित ग्रथित मालाके समान सुशोभित हो गया है। इससे आचार्य 'स्थाननियमके निबन्धनका यह भी एक प्रकार है', यह सूचित करना चाहते हैं। ५ इस ग्रथनसे यहाँ अनुप्रासकी भी सुन्दर सृष्टि हो गई है। १. दितेर्द्वाविव दायादौ दैत्य-दानव-वन्दितौ । हिरण्यकशिपुर्नाम, हिरण्याक्षश्च कीर्तितौ ॥ श्रीमद्भागवत ६।१८।११ २. स एव वर्णाश्रमिभिः क्रतुभिर्भूरि-दक्षिणैः । इज्यमानो हविर्भागानग्रहीत् स्वेन तेजसा ॥ श्रीमद्भागवत ७।४।१५ एवमैश्वर्यमत्तस्य दृप्तस्योच्छास्त्रवर्तिनः । कालो महान् व्यतीयाय ब्रह्मशापमुपेयुषः ॥ २० यदा देवेषु, वेदेषु, गोषु, विप्रेषु, साधुषु । धर्मे मयि च विद्वेषः, स वा आशु विनश्यति ॥ २७ ३. खङ्गं प्रगृह्योत्पतितो वरासनात्तस्तम्भं तताडातिबलः स्वमुष्टिना । । ८।१५ ४. तदैव तस्मिन्निनदोऽतिभीषणो बभूव येनाण्डकटाहमस्फुटत् । यं वै स्वधिष्ण्योपगतं त्वजादयः श्रुत्वा स्वधामाप्ययमङ्ग मेनिरे ॥१६ ५. इसकी चर्चा ३।८४, पृष्ठ १०६ में की जा चुकी है।

११८ काव्यादर्श [३।६४-६५ (३.३) सूरिः सुरासुरासारि-सारः, सारसि-सारसाः । ससार सरसीः सीरी स-सूरूः स सुरा-रसी ॥ ६४ ॥ (३.४) नूनन्नुन्नानि नानेन नाननेनाननानि नः । नानेना ननु नानूनेनैनेनानानिनो निनीः १ ॥ ६५ ॥ (३.३) विद्वान् (नीतिज्ञ), सुरों और असुरोंको व्याप्त करने वाले बलसे युक्त, सुन्दर जाँघों वाली रमणियों सहित, सुरामें रस लेने वाले उन हलधर (बलराम) ने कलरव करते सारसों वाली सरसियों (पुष्करिणियों) में अव- गाहन किया ।। ६४ ।। (३.४) इस बलवान् (पुरुष) ने हमारी सेनाओंको निश्चय ही ध्वस्त नहीं कर दिया है, ऐसा नहीं है (अर्थात् ध्वस्त कर ही दिया है) । न्यूनके विपरीत (अर्थात अधिक, बलवत्तर) इस (पूर्वोक्त पुरुष) के साथ बलहीनों (दुर्बलों) को लड़ाने वाला (पुरुष) क्या निरपराध हो, ऐसा नहीं है ? (अर्थात् ऐसा पुरुष अपराधी है ही) ।। ६५ ।। दुदाव—टुदु उपतापे (स्वादि०) कर्तरि लिट्, प्र० ए० व० । द्युलोक (आकाश अमूर्त, निराकार द्रव्य) को उपतप्त करना सम्भव नहीं है । अतः लक्षणया द्युस्थ विभिन्न लोकोंके निवासी अभिप्रेत हैं । श्रीमद्भागवतमें इसी भावको सुन्दर अभिव्यक्ति दी गई है। दण्डीने सङ्क्षेपके कारण सङ्केत ही किया है । दाने— दो अवखण्डने (दिवादि०) से ल्युट्, सप्तमी, ए० व० ॥६३॥ (३.३) द्वि-व्यञ्जन-नियम चित्र बन्ध—चौरानवेंवे श्लोकमें आचार्य दण्डीने बलवत्ता, स्त्रीसङ्ग और सुरापानके लिये प्रसिद्ध हलायुध बलरामके पुष्करिणियोंमें विहारका वर्णन समूचे श्लोकमें 'स' और 'र' दो व्यञ्जनोंका ही प्रयोग करके किया है । स्वर यहाँ यद्यपि अ, इ, उ (सब ह्रस्व और दीर्घ) तीन ही प्रयुक्त हुए हैं, अतः स्वरनियम भी है । तथापि समूचे ध्वनिप्रभावकी दृष्टिसे व्यञ्जननियम चारुतर है । यों इसमें सादा-सा यमक भी है ।। ६४ ।। (३.४) एक-व्यञ्जन-नियमवान् चित्र बन्ध—वर्णनियम बन्ध प्रकरणके अन्तिम श्लोकमें आचार्य दण्डीने बलवान् शत्रुसे भिड़नेके कारण डरे हुए निर्बल लोगों द्वारा अपने स्वामीकी आलोचना कराई है । भारविका उदाहरण अर्थकी दृष्टिसे इससे बेहतर है । किन्तु उसमें चतुर्थपादान्तमें तकारका प्रयोग १. अन्वय : अनेन अननेन नः अननानि नूनं न नुन्नानि, न । अनूनेन एनेन अनानिनः निनीः ना ननु अनेनाः न ?

३।६६] दुष्कर एवं सुकर मार्गका उपसंहार ११६ इति दुष्करमार्गेऽपि किञ्चिदादर्शितः क्रमः। प्रहेलिकाप्रकाराणां पुनरुद्दिश्यते गतिः ॥ ६६ ॥ इस प्रकार दुष्कर (कठिन, दुर्बोध रचना वाले) मार्गमें भी क्रम (व्यवस्था, स्वरूप) कुछ दिखा दिया है। अब प्रहेलिकाके भेदोंका स्वरूप नामतः बताया जा रहा है ॥ ६६ ॥ एकव्यञ्जन नियमको शिथिल करता है।¹ परवर्ती आचार्यों द्वारा अन्त्य वर्णकी भिन्नताको दोषावह न बताना² कविके सामर्थ्यकी शिथिलताको स्वीकार करना है। दण्डीके प्रकृत उदाहरणमें एक ही व्यञ्जन नकारका प्रयोग किया गया है। विसर्गको उस दृष्टिसे व्यञ्जन नहीं माना जाता (श्लोक ६२, पृष्ठ ११६ देखें) । अतः वह एकव्यञ्जन नियमका भञ्जक नहीं है ॥ ६५ ॥ दुष्कर एवं सुकर मार्गका उपसंहार—आचार्य दण्डीने तृतीय अध्यायमें (क) ३७वें श्लोक तक सुकर बन्ध वाले यमकका निरूपण किया है। (ख) ३८वेंसे ७७वें श्लोक तक ४० श्लोकोंमें दुष्कर बन्ध वाले यमकके विभिन्न भेद और उनके उदाहरण दिये हैं। (ग) ७८वें से ८२वें तक ५ श्लोकोंमें त्रिविध दुष्कर आकारबन्ध प्रदान किये हैं। (घ) ८३वें से ६५ वें तक १३ श्लोकोंमें दुष्कर वर्णनियमके तीन प्रकार उनके चार-चार अवान्तर भेदोंमें प्रतिपादित किये हैं। इस प्रकार (ख—घ) ३८वेंसे ६५वें तक ५८ श्लोकोंमें आचार्य दण्डीने काव्यमें शोभावह दुष्कर निबन्धनके मार्गका सङ्क्षेपमें किन्तु अनुक्त- की उपलक्षकताकी दृष्टिसे समृद्ध वर्णन किया है। 'अपि'से दुष्करसे पूर्व प्रतिपादित (क) सुकर मार्गका समुच्चय आचार्य को इष्ट है। दुष्करके अतिरिक्त सुकर मार्गका भी निरूपण सङ्क्षेपसे (किञ्चिद्) ही किया गया है। सुकरकी सङ्क्षिप्तताका स्पष्ट कथन पीछे ३७वें श्लोकमें किया जा चुका है। दुष्कर मार्ग भी पूरी तरहसे नहीं दिखलाया गया है। कुछ ही दिखलाया गया है। दुष्करके इस 'किञ्चिदादर्शित क्रम' में अभी (ङ) प्रहेलिकाओं (पहेलियों) का निरूपण रहता है। आचार्यने अगले ८० श्लोकोंमें पूर्वाचार्यों द्वारा निर्दिष्ट पन्द्रह शुद्ध और एक संकीर्ण १. न नोननुन्नो, नुन्नोनो, नाना नानाऽऽनना ननु । नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्न नुत् ।। किरातार्जुनीय १५।१५ २. किरातार्जुनीय १५।१४ पर मल्लिनाथ सूरिका घण्टापथ : अयमेकव्य- ञ्जनः । अन्त्यस्तकारस्तु न दोषावहः । 'नान्त्यवर्णस्तु भेदकः' इत्यभ्यनु- ज्ञानात् ।

१२० काव्यादर्श [३।६६ प्रकारकी पहेलियोंके नाम तथा लक्षण दिये हैं। उन्हीं आचार्यों द्वारा प्रोक्त १४ दुष्ट पहेलियाँ न बतानेका प्रयोजन ११वें श्लोकमें बताकर १६ श्लोकोंमें पूर्वोक्त साधु प्रहेलिकाओंके उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। सङ्कीर्ण प्रकार उप- लक्षक है नाना (गौण-मुख्य भावसे तथा समकक्ष रूपसे सम्पन्न) सङ्कर- प्रकारोंका। प्रहेलिका प्रकरणके अन्तिम (१७वें) श्लोकमें सङ्कीर्ण प्रहेलिकाकी सङ्गति बताई है। इस प्रकार ६७से १२४ तकके २७ श्लोकोंकी नक्षत्रमालासे आचार्यने रमणीय प्रहेलियोंकी कण्ठभूषा निर्मित की है। आचार्यने प्रहेलिकाओंके प्रयोजनोंमें (६७वें श्लोकमें) 'परव्यामोहन' भी एक प्रयोजन बताया है। इससे प्रहेलिकाओंकी दुष्करता सूचित होती है। रत्नश्रीज्ञान, वादि जङ्घालदेव तरुण वाचस्पति आदि प्राचीन तथा रङ्गाचार्य रेड्डी आदि अर्वाचीन सभी टीकाकारोंने इसके पूर्वार्ध श्लोकमें दुष्कर मार्गका उपसंहार माना है। यह उचित नहीं है। केवल पूर्वार्धमें दुष्करका उपसंहार माननेसे प्रहेलिकाएँ दुष्करसे बहिर्भूत माननी होंगी। तब वे पर-व्यामोहनमें उपयुक्त कैसे होंगी ? यह प्रयोजन तो इनके दुष्कर, दुर्बोध होनेसे ही सिद्ध हो सकता है, सुकर होनेसे नहीं। अतः इस समूचे श्लोकमें दुष्करका उपसंहार मानना उचित है ॥ त्रयोदश्यां गुरौ प्रातश्चन्द्रे रिरंसि-संयुते । वर्णनियमवांश्चित्रबन्धो व्याख्यायि यत्नतः ॥ १ ॥ हन्तेदमुज्ज्वलं दीप्तं प्रजाहाहाकरं नभः । न स्पृष्टं मेघनाम्नाऽपि; नितान्ताकरुणः प्रभुः ॥ २ ॥ कपूयाचरणे राज्ञि प्रजास्वस्यानुयासु च । कुतो देवस्य दृष्टिः स्यात्कोमला सुखदायिनी ॥ ३ ॥ हरो हरतु सन्तापमूलं दुष्कर्मभावनाम् । भव्यं भवतु लोकस्य; देशे स्याच्छासनं शुभम् ॥ ४ ॥ — ০ — नभःकृष्णे भृगो रात्रौ युगे-युगे प्रहेलिकाः । लोकमानसगाहिन्यो हंस्यो यथा समुज्ज्वलाः ॥ १ ॥ निर्दोषारावसंयुक्ता विद्वद्बालमनोहराः । सम्प्रत्याख्यामि ताः सम्यग् वेदे लोके समादृताः ॥ २ ॥ नैवेष्टा भामहैर्मुग्धैर्युक्त्याऽऽख्यातास्तु दण्डिभिः । इतो यत्नेन मध्येषा प्रीयतां वागधीश्वरी ॥ ३ ॥

३।६६] ४. प्रहेलिका १२१ पाटलोष्ठदलच्छन्नदशनस्मितपुष्पिणी । नखनिर्भातवीणाऽऽह्यतारस्वरनिनादिनी । ४ । ४. प्रहेलिका—यह शब्द प्र + √ हिल् (भावकरण, तु०) + इन् + कन् (अनुकम्पा में) + टाप् से निष्पन्न है ।१ इससे प्रकट होने वाला भाव ‘व्या- मोहन’ (उलझनमें, चक्करमें डालना) है, यह इस शब्दके प्राचीन पर्याय ‘प्रवल्हिका’ की ऐतरेय और गोपथ ब्राह्मणोंमें उपलब्ध व्याख्या तथा उसके अथर्ववेदीय उदाहरणोंसे२ स्पष्ट है । भावप्रकाशनकी यह पद्धति निबन्धनके काव्यात्मक स्वरूपके कारण प्रकृष्ट है तथा गोष्ठियोंमें लोकप्रिय होनेसे अनुकम्पाका विषय है । इस प्रकार चित्र अलङ्कारकी इस विधिका अर्थ ‘व्यामोहनकारी उक्तिका प्रकृष्ट (काव्यात्मक) लोकप्रिय प्रकार’ है । भामहके कथनसे विदित होता है कि ‘प्रहेलिका’ का दुष्कर अलङ्कारोंके मध्य निरूपण आचार्य रामशर्माने ‘अच्युतोत्तर’ नामक ग्रन्थमें किया था । भामहने इसका लक्षण नहीं दिया है । इसके द्विविध चरित्रके निर्देशसे इसके स्वरूपपर कुछ प्रकाश डाला है : प्रहेलिका (१) नाना धातुओं तथा अर्थोंसे गम्भीर (गूढ) होती है, तथा (२) नामसे यमक कहाती है ।३ कदाचिद् भामह १. अमरकोष १।६।२ : प्रवल्हिका प्रहेलिका । रामाश्रमी : प्रहेलयति = अभिप्रायं सूचयति । ‘हिल भावकरणे’ (तुदादि, प० सेट्) । उणादिसूत्र ४।११८ : सर्वधातुभ्य इन् । अष्टा० ५।३।७६ : अनुकम्पायाम् । यह शब्द कन् प्रत्ययके विना भी मिलता है : प्रहेलिः । हिन्दी ‘पहेली’ इसीसे विकसित है । २. ऐ० ब्रा० ३०।७ (६।३३) : प्रवल्हिकाः* शंसति । प्रवल्हिकाभिर्वै देवा असुरान् प्रवर्ल्ह्याथैनानत्यायन् । तथैवैतद् यजमानाः प्रवल्हिकाभिरेवाऽप्रियं भ्रातृव्यं प्रवर्ल्ह्याथैनमति यन्ति । सायणभाष्य : ‘विततौ किरणौ द्वौ’ (अथर्ववेद २०।१३३) इत्याद्याः षडनुष्टुभः प्रवल्हिकाऽऽख्याः । बृहद्देवता १।५७ : वितताऽऽदिः प्रवल्हिका । गोपथ ब्रा०, उत्तर भाग, ६।१३ : अथ प्रवल्हिकाः पूर्वं शस्त्वा ‘विततौ किरणौ द्वौ’ (अथर्व० २०।१३३) इति... । प्रवल्हिकाभिर्हं वै देवा असुराणां रसामप्रववृहुः । तद् यथाऽऽभिर् ह वै देवा असुराणां रसां प्रववृहुः । तस्मात् प्रवल्हिकाः । तत् प्रवल्हिकानां प्रवल्हिकात्वम् । वर्तनीपर विचारार्थ निरुक्तके पाँच अध्याय, पृष्ठ ५६६ देखें । ३. नाना-धात्वर्थ-गम्भीरा, यमक-व्यपदेशिनी । ‘प्रहेलिका’ सा ह्युदिता रामशर्माच्युतोत्तरे ॥ काव्यालङ्कार २।१६

१२२ काव्यादर्श [३।६७ क्रीडा-गोष्ठी-विनोदेषु तज्ज्ञैराकीर्ण-मन्त्रणे । पर-व्यामोहने चापि सोपयोगाः प्रहेलिकाः ॥ ६७ ॥ (१) खेलों, गोष्ठियों, मनोरञ्जनके अवसरोंपर, (२) भीड़में बातचीत करनेमें और (३) दूसरोंको विशेष रूपसे भुलावा देने (चकराने) में प्रहेलि- काएँ उनके जानकारोंके द्वारा उपयोगी (लाभकारी) होती हैं ॥ ६७ ॥ ऐसे यमकको नाममात्रका यमक कहते हैं, जिसमें नाना धातु अथवा अर्थ गूढ़ रहते हैं । पर अर्थोंकी गूढ़ताके कारण वे इसे ‘प्रहेलिका’ मानते हैं, यमक नहीं । भामहके इस कथनसे प्रहेलिकामें (१) धातु तथा (२) अर्थकी गूढ़ता लक्षण सिद्ध होती है । ‘धातु’ उपलक्षक है नाम उपसर्ग आदि प्रकारके शब्दों का । इस प्रकार प्रहेलिकाके (१) शब्दगूढ़ और (२) अर्थगूढ भेद भामहको अभिप्रेत प्रतीत होते हैं । पर भामहका प्रहेलिकाको ‘यमक’ कहना कुछ जँचता नहीं है : यमकमें तो तुल्यश्रुति वर्णोंकी आवृत्ति मुख्य स्वरूपलक्षण धर्म है; प्रहेलिकाके स्थलमें वह अनुप्रास, उपमा आदिके समान आनुषङ्गिक तो हो सकती है, पर स्वरूपगत कैसे हो सकती है ? दण्डीने (श्लोक १०६ में) सोलह प्रकारकी पहेलियाँ पूर्वाचार्यों द्वारा निर्दिष्ट बताई हैं । रत्नश्रीज्ञानने पूर्वाचार्योंकी व्याख्या ‘रामशर्मादिभिः’ की है । कह नहीं सकते कि उन्होंने यह नामोल्लेख सुनी-सुनाई बातके आधारपर किया है, या रामशर्माके ग्रन्थको देखकर किया है । पर दण्डीने (श्लोक १०६ में) पूर्वाचार्योंको अभिमत १६ साधु और १४ दुष्ट प्रहेलिकाओंकी बात ठोस आधारपर (उनके ग्रन्थ देखकर) ही की लगती है । दण्डी द्वारा प्रस्तुत पूर्वा- चार्यसम्मत ये सोलह प्रहेलिकायें यमकके संस्पर्शसे रहित हैं । इससे अनुमान किया जा सकता है कि पूर्वाचार्यों रामशर्मा आदिकी प्रहेलिकाओंमें भी यमक तत्त्व आवश्यक नहीं रहा होगा, अन्यथा दण्डीके लक्षणोदाहरणोंमें यमक- संस्पर्श पूर्वपक्षके रूपमें ही सही, अवश्य, मिलता ॥ ६६ ॥ प्रहेलिकाओंकी उपयोगिता - दण्डीने प्रहेलिकाका सामान्य लक्षण न देकर भेदोंके लक्षणमें उसे स्पष्ट किया है । षोडशभेद निरूपणसे पूर्व आचार्यने एक (६७) श्लोकमें पहेलियोंका प्रयोजन बताया है । वात्स्यायनके अनुसार नाग- रककी दिनचर्यामें अपराह्नका समय गोष्ठी-विहारके लिये नियत था । इसके अतिरिक्त किसी निमित्तसे, पर्वोंपर, या पक्ष अथवा मासमें किसी एक घोषित दिन समान विद्या, बुद्धि, शील, आर्थिक स्थिति और वयस् वाले लोगोंका

जमावड़ा वेश्याभवनमें, सभामें या नागरकोंमेंसे ही किसी एकके घरपर होता था । इनका उद्देश्य नागरकोंके काव्यव्यासङ्गसे अथवा अन्य गीत, वाद्य आदि के प्रदर्शनसे बुद्धिविकास था । इनमें गम्भीर चर्चाओंकी तो कम गुंजाइश थी, हाँ हल्की फुल्की काव्यचर्चा, अथवा कलाविषयक समस्याओंपर विचार आदि हुआ करता था ।१ इस तरहके अवसरोंके लिये प्रहेलिका, प्रतिमाला (अन्त्या- क्षरी), समस्यापूर्ति, कलायें विशेष उपयोगी होती थीं ।२ गोष्ठियोंके अन्तमें श्रेष्ठ प्रहेलिका आदिको सम्मान व्यक्त करके प्रोत्साहित किया जाता था ।३ इन सब प्रकारके अवसरोंपर आयोजित गोष्ठियोंको आचार्यने 'क्रीडा- गोष्ठी-विनोदेषु' कहा है । स्पष्ट है कि इन गोष्ठियोंमें गम्भीर प्रबन्धकाव्योंका प्रणयन या उन पर विचार नहीं होता होगा । अतः प्रहेलिकाओंका (१) प्रथम उपयोग इन गोष्ठियोंमें इन्हें सुनाना, वाहवाही लूटना तथा अपने ईर्ष्यालुओंको हत-प्रभ करना और अपना तथा दूसरोंका विनोद (मनोरञ्जन) करते हुए कालक्षेप करना था । यही आज भी है । (२) जनसङ्कुल स्थानों में भी पहेलियाँ बुझाकर अपने मन्तव्यका सम्प्रेषण करके आमन्त्रण (बात- १. कामसूत्र १।४।२२ : गृहीत-प्रसाधनस्यापराह्णे गोष्ठीविहाराः । जयमङ्गला : 'गोष्ठीविहारा' = 'गोष्ठ्यां क्रीडा' इति । २६ : घटानि- बन्धनं, गोष्ठीसमवायः, समापानकम्, उद्यानगमनं, समस्याः, क्रीडाश्च प्रवर्त्तयेत् । २७ : पक्षस्य मासस्य वा प्रज्ञातेऽहनि... ३४ : वेश्याभवने, सभायामन्यतमस्योदवसिते वा समान-विद्या-बुद्धि-शील-वित्त-वयसां सह वेश्याभिरनुरूपैरालापैरासनबन्धो गोष्ठी । ३५ : तत्र चैषां काव्य- समस्या कलासमस्या च । जयमङ्गला : सम्भूय दर्शनं निरूपणं तत्समस्या, 'चर्चा' इत्यर्थः । २. कामसूत्र १।३।१६ तथा इसपर जयमङ्गला : '(२८) प्रहेलिका' इति— क्रीडार्था, वाक्यार्था च । '(२६) प्रतिमाला' इति—यस्या अन्त्याक्षरिकेति प्रतीतिः । सा क्रीडाऽर्था वादार्था च । यथोक्तम्— 'प्रतिश्लोकं क्रमाद्यत्र सन्धायाक्षरमन्तिमम् । पठेतां श्लोकमन्योन्यं प्रतिमालेति सोच्यते ।।' इति । ....'(३३) काव्यसमस्यापूरणम्' इति—'...' काव्यस्य श्लोकस्य समस्या पाद इत्यर्थः, तस्याः पूरणं क्रीडाऽर्थं वादार्थं च । ३. कामसूत्र १।४।३६ : तस्यामुज्ज्वला लोककान्ताः पूज्याः प्रीतिसमाना- श्चाहारिताः :

१२४ काव्यादर्श [३।६७ बीत) कर ली जाती है । (३) लोगोंको गूढ शब्द अथवा गूढार्थके प्रयोगसे चक्करमें डालना भी पहेलीका प्रयोजन है । इन तीनों प्रयोजनोंमें अन्तिम प्रयोजन ही पहेलियोंका मुख्य प्रयोजन है । वैदिक साहित्यमें गूढार्थक बहुतसे मन्त्र उपलब्ध हैं, जिनकी गूढार्थताका प्रयो- जन श्रोताओंको चक्करमें डालना है । प्रसिद्ध अस्यवामीय (ऋ० १।१६४) सूक्तके १-४, ७, ११-२०, २२, ३२, ४१, ४८ मन्त्र ठेठ पहेलियाँ ही हैं, जिन्हें समझ न पानेपर श्रोताको ऋषिसे पूछना पड़ा होगा : महाराज, अब इनका अर्थ समझाइये । अथर्ववेदका तो एक पूरा सूक्त (२०।१३३) ही 'पहेलियोंका सूक्त' कहा जाता है ।१ ऐतरेय महीदासने इन्हें 'प्रवह्निका' कहा है : असुरों को पहेलियोंमें उलझनमें डालकर देव लोग उनसे आगे बढ़ गये । यजमान भी पहेलियोंसे अपने शत्रुको उलझाकर उनसे आगे बढ़ जाते हैं ।२ आचार्य रुद्रटने इन तीनों प्रयोजनोंमें दण्डीकी 'क्रीडा' को ही उपयुक्त माना है ।३ उनकी दृष्टि कदाचिद् यह है कि पहेलियोंसे परव्यामोहन क्रीडा (मनोविनोद) का ही साधन है, साध्य नहीं । परव्यामोहन साध्य होनेपर शत्रुता पनपती है, जो काव्यका प्रयोजन नहीं हो सकती । पर भोजने (सरस्वती० २।१३४में) दण्डीकी दृष्टिका ही अनुकरण किया है । स्पष्ट ही ये सब बातें महाकाव्यमें यत्र-तत्र-सर्वत्र आने वाली स्थितियाँ नहीं हैं । अतः महाकाव्यमें तो इनका प्रयोग सीमित ही होगा । हाँ, मुक्तक आदि छोटे बन्ध इनका स्वतन्त्र क्षेत्र हैं । पर उनमें भी अवसर और प्रयोजन सीमित ही हैं । यही कारण है कि अच्छे कवि तथा काव्यशास्त्री पहेलियोंको अधिक प्रोत्साहन नहीं देते । किन्तु भामहका यह कहना भी उचित नहीं है कि गूढशब्दार्थ होनेके कारण व्याख्यागम्य होनेसे प्रहेलिकायें हेय हैं ।४ सहृदयोंके १. बृहद्देवता १।५७ : वितताऽऽदिः* प्रवह्निका । अथर्व २०।१३३ । २. प्रवह्निकाः शंसति । प्रवह्निकाभिर्वै देवा असुरान्* प्रवल्ह्याथैनान- त्यायन् । तथैवैतद् यजमानाः प्रवह्निकाभिरेवाप्रियं भ्रातृव्यं प्रवल्ह्याथैन- मति यन्ति । सायण : 'विततौ किरणौ द्वौ' (अथर्व० २०।१३३) इत्याद्या षडनुष्टभः प्रवह्निकाऽऽख्याः । *इन शब्दोंकी वर्तनीके लिये देखें निरुक्त के पाँच अध्याय, ७।११, पृष्ठ ५६६ । ३. मात्रा-बिन्दु-च्युतके, प्रहेलिका, कारक-क्रिया-गूढे । प्रश्नोत्तरादि चान्यत् क्रीडामात्रोपयोगमिदम् ।। काव्याल० ५।२४ ४. काव्यान्यपि यदीमानि व्याख्यागम्यानि शास्त्रवत् । उत्सवः सुधियामेव, हन्त दुर्मेधसो हताः ।। काव्याल० २।२०

३। - ८] ४. प्रहेलिकाओंके लक्षण १२५ (१) आहुः समागतां नाम गूढार्थां पद-सन्धिना । (२) वञ्चिताऽन्यत्र रूढेन यत्र शब्देन वञ्चना ॥ ६८ ॥ (१) पदों (सुबन्त-तिङन्तरूप शब्दों) की सन्धिसे जिस उक्तिका अर्थ छुप जाता है, उसे समागता कहते हैं । (२) अन्य अर्थमें प्रसिद्ध शब्दका प्रयोग करके जहाँ छला जाता है, वह वञ्चिता (कहलाती) है ॥ ६८ ॥

छोटे-मोटे जमावड़ोंमें इस तरहके हल्के-फुल्के काव्य लोकहृदयग्राही होते हैं । यह अनुभवसिद्ध है, किसी आचार्यवचनकी अपेक्षा नहीं करता ॥ ६७ ॥ आचार्य दण्डीने प्रहेलिकाओंका निरूपण तीन क्रमोंमें किया है : (१) ६८- १०४।। तकके श्लोकोंमें पन्द्रह शुद्ध प्रहेलिकाओंके लक्षण बतानेके बाद इनके सङ्करसे निष्पन्न सङ्कीर्ण प्रहेलिका प्रकारको बताया है; (२) पूर्वाचार्यसम्मत दोषयुक्त चौदह प्रहेलिकाओंका अभिधान न करनेका हेतु १०६-१०७ में बताया है; (३) फिर १०८-१२२ तक पन्द्रह शुद्ध प्रहेलिकाओंके पन्द्रह उदा- हरण देकर १२३ में उदाहृत संकीर्ण प्रहेलिकामें सङ्कीर्ण पहेलियाँ बताकर इस उदाहरणको अन्य भेदोंके साङ्कर्यका उपलक्षक बताया है । सभी प्रहेलिकाओंमें सामान्य तत्त्व परव्यामोहन है । व्यामोहन कहीं शब्दका स्वरूप समझ न आनेसे आता है, तो कहीं अर्थकी दुरूहताके कारण आता है । शब्द और अर्थ को दुरूह बनानेके प्रकारोंमें भेद होनेसे ये प्रहेलिकायें एक-दूसरेसे भिन्न हैं । इन सोलह भेदोंके अतिरिक्त पूर्वाचार्य चौदह दोषयुक्त प्रहेलिकायें भी मानते थे, यह दण्डीने बताया है । (१) समागता—यह पहेली विशुद्ध रूपसे शब्दगूढा है । दो पदोंमें स्वर- सन्धि या व्यञ्जनसन्धिसे जब भिन्न प्रकारका शब्द निष्पन्न हो जाता है, तब पदके स्वरूपके विषयमें श्रोताकी बुद्धि भ्रान्त हो जाती है । उस उक्तिका वास्तविक अर्थ छुप जाता है । इस प्रकारकी यह प्रहेलिका पदोंके समागम (सन्धान) के कारण निष्पन्न होनेसे 'समागता' कहलाती है । इसका उदाहरण आचार्यने १०८वें श्लोकमें दिया है । (२) वञ्चिता—विवक्षितसे भिन्न अर्थमें प्रसिद्ध शब्दका प्रयोग करके उससे जहाँ विवक्षितार्थका गोपन किया जाये, वह प्रहेलिका 'वञ्चिता' होती है । इस प्रकार अन्यार्थक शब्दके प्रयोगसे श्रोताकी सही अर्थका बोध नहीं होता, वह भ्रान्त हो जाता है । इस प्रकार वञ्चन (छलने) के कारण यह पहेली 'वञ्चिता' है । 'वञ्चिता' पद 'वञ्चितं = वञ्चनमस्त्यस्यां' व्युत्पत्तिसे

१२६ काव्यादर्श [३।६६-१०० (३) व्युत्क्रान्ताऽतिव्यवहित-प्रयोगान्मोहकारिणी । (४) सा स्यात् प्रमुषिता, यस्यां दुर्बोधार्था पदावली ॥ ६६ ॥ (५) समानरूपा गौणार्थारोपितैर्ग्रथिता पदैः । (३) पादोंके अधिक व्यवधानसे प्रयोगके कारण (अर्थके बारेमें) भ्रान्ति करने वाली व्युत्क्रान्ता (होती है) । (४) वह प्रमुषिता होती है, जिसमें पदसमूह कठिनाईसे समझमें आने वाले अर्थसे युक्त होता है ॥ ६६ ॥ (५) गौण (लाक्षणिक) अर्थोंमें आरोपित पदोंसे विरचित (प्रहेलिका) समान-रूपा होती है । ‘प्रहेलिका’ का विशेषण है । यहाँ वञ्चन (प्रतारण) शब्दके द्वारा नहीं, अपितु अन्य अर्थमें रूढ शब्दके माध्यमसे गूढ हुए अर्थके द्वारा होता है । अर्थ के द्वारा अर्थके विषयमें भ्रान्ति करनेसे यह अर्थगूढा है । उदाहरणार्थ १०६ वाँ श्लोक देखें ॥ ६८ ॥ (३) व्युत्क्रान्ता—पदोंके अत्यन्त व्यवहित प्रयोग (विन्यास) से अन्वय में कठिनाई आ जाती है, जिससे श्रोताको अर्थके विषयमें व्यामोह हो जाता है । व्युत्क्रमणसे विन्यास शब्दका धर्म है, जिससे प्रभावित होता है पदोंका परस्पर सम्बन्ध (अन्वय) । सम्बन्ध अर्थगत होता है । अतः यह प्रहेलिका भी अर्थगूढा ही है । पदोंके सम्बन्धके निश्चित न होनेसे या तो (i) अर्थका निश्चय ही नहीं होगा, या (ii) विपरीत अर्थका अवबोध भी हो सकता है । इस प्रहेलिकामें व्यामोहका आदि कारण पदोंका व्युत्क्रम (व्यवहित प्रयोग) है । अतः इसे ‘व्युत्क्रान्ता’ कहा गया है । यहाँ ‘क्त’ प्रत्यय कर्त्रर्थमें है । इसका उदाहरण ११०वें श्लोकमें है । (४) प्रमुषिता—जिस प्रहेलिकामें शब्दावलीका अर्थ स्वरूपतः ही दुर्बोध हो, तो वह अर्थका अपहरण (प्रमोषण) हो जानेसे ‘प्रमुषिता’ कहलाती है । यह भी अर्थगूढा है । उदाहरण १११वें श्लोकमें है ॥ ६६ ॥ (५) समानरूपा—प्रहेलिकाके ग्रथनमें प्रयुक्त पद अपने प्रसिद्ध मुख्यार्थके वाचक न होकर उनके वाच्य पदार्थके गुणोंसे साम्यके कारण उन गुणोंसे युक्त किसी अन्य पदार्थको लक्षित करते हों, तब समान पदार्थके आरोपके कारण यह प्रहेलिका ‘समान-रूपा’ कहलाती है । यह आरोप प्रायः समासोक्तिकी सृष्टि करता है । यह प्रहेलिका भी अर्थगूढा है । शब्दोंसे किसी वस्तुका वर्णन प्राप्त होते हुए भी अन्य सदृश पदार्थकी विवक्षा साधारण जनके लिये दुर्बोध होती है, अतः यह दुष्कर चित्र शब्दालङ्कार है । उदाहरण ११२वें श्लोकमें है ।

३।१००-१०२] ४. प्रहेलिकाके भेद १२७ (६) परुषा लक्षणास्तित्व-मात्र-व्युत्पादित-श्रुतिः ॥१००॥ (७) सङ्ख्याता नाम सङ्ख्यानं यत्र व्यामोहकारणम् । (८) अन्यथा भासते यत्र वाक्यार्थः, सा प्रकल्पिता ॥ १०१ ॥ (६) सा नामान्तरिता यस्या नाम्नि नानाऽर्थकल्पना । (६) पदोंके निरूपक शास्त्र (व्याकरण) के सद्भाव मात्रसे व्युत्पन्न किये गये पदों वाली परुषा होती है ॥ १०० ॥ (७) जिसमें गिनती उलझाने वाली होती है, वह सङ्ख्याता है । (८) जहाँ वाक्यका अर्थ (इष्टसे) भिन्न प्रकारसे प्रतीत होता है, वह प्रकल्पिता है ॥ १०१ ॥ (६) वह (पहेली) नामान्तरिता (दूसरे नामपदसे युक्त) होती है, जिसके नाम (सञ्ज्ञापद) में विभिन्न (अनेक) अर्थोंकी कल्पना होती है । (६) परुषा जिस प्रहेलिकामें ऐसे शब्दोंका प्रयोग किया जाता है, जिनका लोकमें प्रयोग नहीं होता । शब्दोंके व्युत्पादक शास्त्र व्याकरणके सूत्रोंमें उनकी व्युत्पत्ति अवश्य प्रतिपादित होती है । व्यवहार और काव्यके क्षेत्रसे बाहरके शास्त्राभ्याससे ही ज्ञेय ऐसे शब्द कोमलमति लोगोंको चावलमें कंकड़की तरह कठोर लगते हैं । अतः इस प्रकारके प्रयोग जब विनोदार्थ किये जायें, तो वे कोमलमति नागरिकोंको खूब व्यामूढ करते हैं । प्रहेलिकाका उप- योग ही परव्यामोहनार्थ है । इस लिये ऐसे प्रयोग प्रहेलिकामें शोभाकारक होते हैं । काव्यके सामान्य प्रकारमें भले ये प्रयोग दोष माने जाते हैं । यह अर्थगूढताका ही एक प्रकार है । उदाहरण ११३वें श्लोकमें देखें ॥ १०० ॥ (७) सङ्ख्याता—जिस उक्तिमें गिनती उलझानेवाली होती है, उसे ‘सङ्ख्याता’ प्रहेलिका कहा जाता है । ‘सङ्ख्या’ अर्थ है । अतः यह पहेली भी अर्थगूढा है । इसका उदाहरण ११४वें श्लोकमें है । (८) प्रकल्पिता—जिस उक्तिमें वाक्यार्थ विवक्षितसे अन्य रूपमें भासित होता है, वह वास्तविक नहीं होता । जानबूझकर अर्थान्तरका आभास करानेके कारण उस उक्तिको ‘प्रकल्पिता’ प्रहेलिका कहा जाता है । यह भी अर्थगूढा है । इसका उदाहरण ११५वें श्लोकमें है ॥ १०१ ॥ (६) नामान्तरिता—जिस उक्तिमें प्रयुक्त नाम (सञ्ज्ञा) पदोंमें अनेक अर्थोंकी कल्पनाकी जाती है, उसे ‘नामान्तरिता’ प्रहेलिका कहा जाता है ।

१२८ काव्यादर्श [३।१०२ (१०) निभृता निभृतान्यार्था तुल्य-धर्म-स्पृशा गिरा ॥ १०२ ॥ (१०) समान धर्मों (अथवा तुल्य धर्म वाले अर्थों) को स्पर्श करने वाली वाणी (शब्दों) से अन्य अर्थको छुपाने वाली पहेली निभृता होती है ॥१०२॥ (८) 'प्रकल्पिता' में अर्थान्तरकल्पना श्रोताको हो जाती है, वह कविको विवक्षित नहीं होती । अर्थात् कवि उन अनेक अर्थोंका वर्णन पहेलीमें नहीं करता, वह तो श्रोताको आभासित होती है; जब कि 'नामान्तरिता' में नाना अर्थ कविको विवक्षित होते हैं । प्रेमचन्द्र शर्मानि यहाँ 'नाम' से 'वस्तु' (अर्थ) ली है, केवल उसकी बोधक सञ्ज्ञा नहीं । इससे वर्णित पदार्थमें नाना (भिन्न) अर्थकी कल्पनासे भी 'नामान्तरिता' निष्पन्न हो जाती है ।¹ यह प्रहेलिका भी अर्थगूढा है । ११६वाँ श्लोक इसका उदाहरण है । (१०) निभृता—विवक्षित और अविवक्षित पदार्थोंके समान धर्मोंको छूने वाली पदावलीके प्रयोगसे अन्य अर्थको छुपाकर प्रस्तुत करने वाली उक्ति छुपानेके कारण 'निभृता' प्रहेलिका कहलाती है । आचार्य रत्नश्रीज्ञानने 'तुल्य-धर्म-स्पृशा गिरा' की दो व्याख्याएँ की हैं: (१) विवक्षित और अवि- वक्षित दोनोंमें वर्तमान होनेके कारण तुल्य=समान अर्थरूपी धर्मको, उसे निमित्त बनाकर प्रवृत्तिके कारण छूने वाले, (२) विवक्षित अर्थके समान धर्म १. रङ्गाचार्यरेड्डी, प्रभा : अत्राहू: प्रेमचन्द्रशर्माण:—लक्षणे 'नाम'-पदं च 'वस्तु'-परं, न तु 'सञ्ज्ञा' मात्रपरं बोध्यम् । तेन 'तरुण्याऽऽलिङ्गितः कण्ठे नितम्बस्थलमाश्रितः । गुरूणां सन्निधानेऽपि कः कूजति मुहुर्मुहुः ? ॥' अत्र 'सजल-कलश'-रूप-वस्तुनि वक्तव्ये प्रथमं नानाऽर्थकल्पनान् नामान्तरिता । एवं 'य एवादौ स एवान्ते मध्ये भवति मध्यमः । अस्यार्थं यो न जानाति, तन्मुखे तं ददाम्यहम् ॥' इत्यादावपि अत्र 'यवसः' प्रतिपाद्य इति । इस उदाहरणमें 'यः', में सर्वनामरूप नानार्थकी कल्पना होती है । उसके बाद नाम शब्दमें उसके घटक वर्णोंके आदि, अन्त और मध्य स्थानोंकी विचित्रतासे व्यामोह उत्पन्न किया गया है । अतः सङ्ख्याताके समान प्रहेलिकाका स्थान- कथनवैचित्र्यमूलक नूतन प्रकार है ।