किरातार्जुनीयम् (घण्टापथ व सुधा टीका सहित)
Kiratarjuniyam of Bharavi Hindi
महाकवि भारवि द्वारा
स्रोत: Kiratarjuniyam with Ghantapath & Sudha Hindi Commentary by Sheshraj Sharma (उद्गम)
[ १० ]
दशम सर्ग--नृत्य, गीत और वाद्य आदि प्रयोगोंसे अविचलित अर्जुनकी तपस्याको भङ्ग करनेके प्रयासके असफल होनेसे वे अप्सराएँ और गन्धर्व इन्द्रके पास लौट गये।
एकादश सर्ग--यह सब वृत्तान्त सुनकर इन्द्र वृद्ध ब्राह्मणका रूप लेकर यात्रासे परिश्रान्त-से होकर अर्जुनके पास पहुँचते हैं और बाण आदि धारण कर तपस्या करनेका कारण पूछते हैं। तब अर्जुनके अपने उद्देश्यको सूचित करनेपर इन्द्र अहिंसा और शान्तिके महत्त्वका प्रतिपादन करते हैं। तब अर्जुन अपने वर्ण और आश्रमके अनुसार अपने कर्त्तव्यका समर्थन करते हैं। अनन्तर प्रसन्न होकर इन्द्र अपने रूपमें प्रकट होकर अर्जुनको आलिङ्गन कर उन्हें शिवजीकी उपासना करनेका उपदेश देकर अन्तर्हित हो जाते हैं।
द्वादश सर्ग--तब अर्जुन शिवजीकी आराधना करनेके लिए कठोर तपस्या करने लगे। तपस्या करते हुए तेजस्वी अर्जुनको दर्शक लोग शिवजी, इन्द्र और अग्निके समान देखने लगे तथा उनके तपःप्रभावके सहन करनेमें असमर्थ होकर शिवजीकी स्तुति करने लगे। तब शिवजीने प्रत्यक्ष होकर उनको 'ये बदरिका-श्रमवासी नारायण हैं'—ऐसा कहकर अर्जुनका परिचय दिया और फिर कहा कि 'अर्जुनकी तपस्याको देवकार्य समझकर मूक नामका दानव शूकरका रूप लेकर उन्हें मारनेके लिए आयेगा। मैं भी किरातका वेष धारण कर उसे शरप्रहारसे मार डालूँगा। उसी समय अर्जुन भी उसपर शरप्रहार करेंगे। अनन्तर दोनोंके बाणोंसे गिरे हुए उसके शरीरसे बाण लेनेके विषयमें मेरे भृत्यसे अर्जुनका कलह होगा।' ऐसा कहकर उन्हें सान्त्वना देकर शिवजी किरातपतिका वेष लेकर और उनके प्रमथसैन्यगण भी किरातका वेष लेकर अर्जुनसे युद्ध करनेके लिए सन्नद्ध हो गये।
त्रयोदश सर्ग--तब अर्जुन विशाल शरीरवाले शूकरको अपनी ओर आते हुए देखकर अनेक तर्कणा करने लगे और उसपर गाण्डीव धनुपर शर लेकर प्रहार करनेके लिए तत्पर हुए। यह देखकर शिवजीने भी उसपर शरप्रहार किया। एक साथ दोनोंके बाणप्रहारसे वह शूकर निष्प्राण होकर भूतलपर गिर पड़ा। तब प्रचुर बाणोंसे रहते हुए भी अर्जुन उसके शरीरसे बाण लेनेके लिए तत्पर हुए। उसी समय उन्होंने किरातपति शिवजीके भृत्य एक किरातको आते देखा।
[ ११ ]
अर्जुनको प्रणाम कर प्रशंसापूर्वक कहा कि 'आपको हमारे स्वामी के बाणको इसतरह लेना उचित नहीं। आप उनसे माँगकर ले लें। निकट ही हैं, उनके साथ मैत्री कर लें। आपको सब कुछ अभीष्ट प्राप्त होगा।'
चतुर्दश सर्ग--अर्जुनने वनेचरका उपदेश सुनकर उसके भाषणकी प्रशंसा कर कहा कि 'तुम्हारे स्वामीका बाण कहीं गुम हो गया होगा, उसे ढूंढो। उसके लिए तुम्हे मुझे उलाहना देना उचित नहीं। खाण्डववनके दाहके समय अग्निदेवने मुझे असंख्य बाण दिये हैं। उसके लिए पर्वतीय किरातके बाणमें मेरी आस्था नहीं है। वर्णाश्रमधर्मके रक्षक मेरी आखेट क्रीडा करनेवाले तुम्हारे स्वामी पर्वतीय किरातके साथ मैत्रीका कुछ भी औचित्य नहीं है।' ऐसा कहनेवाले अर्जुन से यह वनेचर तर्जनकर सेनाके पास स्थित प्रसन्नस्वरूप शिवजीके पास गया। तब विशाल किरातसेनाके साथ जिसके अधिपति कार्त्तिकेय थे, राजकुमार अर्जुनका भीषण युद्ध होता है।
पञ्चदश सर्ग--कोपाक्रान्त अर्जुनके बाणप्रहारसे सारी किरातसेना भया-विष्ट होकर भागने लगी। तब अर्जुन उनके सेनापति कार्त्तिकेयसे युद्ध करने लगे। कार्त्तिकेय अपनी सेनाको साहस और धैर्य देनेके लिए समझाने लगे। तब शिवजी और अर्जुनका तुमुल संग्राम होने लगा। शिवजीके प्रचण्ड बाणोंसे विद्ध होकर भी अर्जुनने अपना धैर्य नहीं छोड़ा। इसे देख सब चकित हुए।
षोडश सर्ग - अर्जुन किरातपतिको असामान्य रणकौशल और अपनी शक्तिहीनता देखकर अनेक तर्क-वितर्क करने लगे। तब उन्होंने शिवसेना-पर प्रस्वापनास्त्रका प्रयोग किया। फलस्वरूप शिवसेना मूर्च्छित हो गई। तब शिवजीके ललाट (लिलार) से पीला तेज उत्पन्न हुआ, जिससे किरातसेना पूर्ववत् युद्धके लिए सन्नद्ध हुई। अनन्तर अर्जुनने नागपाशोंका प्रयोग किया। उनके प्रभावसे आकाशचारी पक्षी इधर-उधर भागने लगे। तब शिवजीने नागपाशोंको हटानेके लिए गरुडास्त्रका प्रक्षेप किया, जिससे नागपाश निरस्त हो गये। तब अर्जुनने आग्नेयास्त्रका प्रहार किया जिससे ज्वालामाली अग्निदेवके प्रकट होनेसे सर्वत्र उष्णताका प्रादुर्भाव हुआ। शिवजीने उसे हटानेके लिए वरुणास्त्रका प्रक्षेप किया जिससे मेघमण्डलसे करासम्पातमय वृष्टिसे अग्निका प्रचण्ड तेज दूर हो गया। अर्जुनसे किये गये समस्त दिव्यास्त्रोंका प्रयोग
[ १२ ]
भाग्यहीन पुरुषके कर्मके समान शिवजीने अपने अस्त्रोंसे विफल कर डाला। इस प्रकार अस्त्रप्रयोगोंमें निष्फल होकर भी अर्जुन युद्ध करनेसे विरत नहीं हुए।
सप्तदश सर्ग--'ऐसा युद्ध कभी नहीं हुआ था' ऐसा सोचकर अर्जुन क्रुद्ध होकर, जैसे सर्प विषवमन करता है, उसी तरह आँखोंसे आंसू गिराने लगे, तथाऽपि बाणवृष्टिसे किरातसेनाको पीड़ित करने लगे। किरातपति शिवजीने उनके समस्त बाणोंको नष्ट कर दिया और उनके मर्मस्थलोंको बाणप्रहारसे अत्यन्त पीड़ित कर दिया। उन्होंने अर्जुनके समस्त शरोंको समाप्त कर कवचका भी अपहरण कर डाला। कवच और बाणोंसे रहित होकर भी अर्जुन धैर्यपूर्वक किरातपतिके ऊपर शिलावृष्टि करने लगे। शिवजीके द्वारा उसका निवारण करनेपर अर्जुन मल्लयुद्ध करनेके लिए सन्नद्ध हुए।
अष्टादश सर्ग--तब किरातपति और अर्जुनका भीषण बाहुयुद्ध होने लगा। परस्परके आघातसे दोनों रक्ताक्त हो गये। 'किरातपति कौन है और अर्जुन कौन है' यह पहचानना भी कठिन हुआ। उस समय अन्तरिक्षमें उछले हुए शिवजीके चरणोंको अर्जुनने पकड़ लिया। तब भगवान् शिवजीने विस्मित होकर अर्जुनका हृदयसे आलिङ्गन किया और उन्हें अपने स्वरूपका दर्शन दिया। अर्जुनने अष्टमूर्ति शिवजीकी स्तुति की। शिवजीने उनको पाशुपतास्त्र देकर धनुर्वेद पढ़ाया। इन्द्र आदि देवताओंने भी अपने अस्त्रोंको प्रदान कर अर्जुनको प्रोत्साहित किया। अनन्तर शिवजीकी आज्ञासे सफलमनोरथ अर्जुन द्वैतवनमें अपने भाइयोंके पास पहुँच गये।
महाकवि भारविके विषयमें किंवदन्तियाँ
महाकवि भारविके विषयमें दो किंवदन्तियाँ प्रचलित हैं। उनका ऐतिहासिक महत्व न होने पर भी "न ह्यमूला जनश्रुतिः" इस उक्ति के अनुसार मनोरञ्जनके लिए भी यहाँ दी जाती हैं।
एक किंवदन्ती इस प्रकारकी है—
भारतवर्षकी उत्तरदिशामें अवस्थित हिमालय पर्वत और उसका एक विशेष इन्द्रकील शैलका किरातार्जुनीयमें विशद वर्णन देखनेसे महाकवि भारवि हिमालय-के किसी प्रदेशके निवासी थे कुछ विद्वान् ऐसा अनुमान करते हैं।
अध्ययनके लिए गुरुकुलमें निवास करते हुए भारविको हिमालय पर्वत और इन्द्रकील शैलकी अधित्यका और उपत्यकामें गायोंको चरानेके अवसरपर वहाँके निवासी वनेचरोंको देखनेका अवसर मिला। अनन्तर अर्जुनके इन्द्रकील पर्वतमें तपश्चरण और किरातपतिका रूप लिये हुए शिवजीसे और किरातोंसे युद्धका वर्णन समाविष्ट कर उन्होंने मनोरम दृश्योंके वर्णनसे परिपूर्ण किरातार्जुनीय महा-काव्यकी रचना की।
दूसरी किंवदन्ती पूर्वोक्त किंवदन्तीसे अधिक प्रसिद्ध और प्रचलित है, वह यों दी जाती है। भारवि स्वल्प अठ्ठारह वर्षकी उम्रमें ही व्याकरण, काव्य और कोष आदिका अध्ययन कर कुछ पद्योंकी भी रचना कर सामाजिक बन्धुवर्गका मनोरञ्जन करने लग गये थे।
एकबार भारविके पिताके बन्धुगण उनके पास आकर "आप भाग्यवान् हैं जो कि अल्पवयमें ही आपका पुत्र भारवि प्रतिभाशाली होकर काव्यरचना करने लगा है" ऐसा कहने लगे। तब भारविके पिताने कहा कि 'आप लोगोंको उसकी इस तरह प्रशंसा करना उचित नहीं है। वह क्या जानता है? अभी वह पढ़ रहा है।' इतना ही नहीं, भारविके पिता उसका तिरोभाव भी करते थे। तब भारवि अपने पिताको अपनी यशःप्राप्तिमें बाधक समझकर उनपर प्रस्तर-प्रहार करनेके लिए तत्पर हुए। एक बार रातको जब भारविके पिता केवल भारविकी ही प्रशंसा
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भारविको माता उनको भोजन परोस रही थी उस समय उन दोनोंकी बातचीत भारवि सुनने लगे।
भारविकी माता अपने पतिको कहने लगी—
'प्राणनाथ ! आप अपने होनहार पुत्रको क्यों बार-बार पराभूत कर रहे हैं ? जबकि सब लोग उसके प्रशंसक हैं।'
तब भारविके पिताने कहा—'प्रिये ! ज्यादा संमान होनेसे उसकी उन्नतिका मार्ग अभिमानके कारण अवरुद्ध होगा। कालान्तरमें भारवि रविके समान हमारे कुलको प्रकाशपूर्ण कर देगा'।
माता और पिताका ऐसा संवाद सुनकर भारविको पश्चात्ताप हुआ और पिताजीके चरणोंपर गिरकर उन्होंने अपने दुर्भावका प्रायश्चित पूछा। तब उनके दयालु पिताने कहा कि "वत्स ! छः माह तक श्वशुरके गृहमें निवास करना ही तुम्हारे पापका पर्याप्त प्रायश्चित होगा"।
तब भारवि अपनी पत्नीके साथ दूरस्थित श्वशुरके गृहमें पहुँचे। पहले तो उनका खूब सम्मान हुआ, पर बहुत समय तक उनका निवास होनेसे उनका अपमान होने लगा। होते-होते उन्हें मवेशियोंको चराने और उन्हें साना देनेका काम भी सौंपा गया।
भारवि कर्मफलके भोगके लिए दृढसङ्कल्प होकर प्रतिदिन पद्योंकी रचनाकर उन्हें भूर्जपत्रोंमें अङ्कित करने लगे। एक दिन उन्होंने एक पद्यकी रचनाकी जो इस प्रकार है—
"सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम् ।
वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः" ॥ (२-३०) ।
अर्थात् कोई कर्म सहसा (बिना विचारे) नहीं करना चाहिए, क्योंकि अविवेक विपत्तिका मुख्य स्थान है। विचारपूर्वक काम करनेवालेको सम्पत्ति गुणोंसे लुब्ध होकर स्वयम् वरण करती है।
भारवि जब इस पद्यको ताड़पत्रपर लिख रहे थे तब उनकी पत्नी संक्लेशवश कारण कर अपने और अपने पतिकी दुर्दशापर आंसू गिराने लगीं। तब भारविने "अभिमानी जनको छः महीनेतक इस प्रकार श्वसुरालयमें रहना नित्य-मरणके समान है" ऐसा सोचकर अपनी पत्नीसे कहा—
[ १५ ]
‘भद्रे ! तुम इस पद्यको किसी धनी व्यापारीके हाथ बेच डालो और उससे वस्त्र आदि आवश्यक पदार्थ खरीद लो’। ऐसा कहकर उस पद्यको उन्हें दे दिया। उनकी पत्नीने उस पद्यको एक धनी व्यापारीको दिखलाया। उसने उसे पढ़कर प्रसन्न होकर उन्हें सौ अशर्फियां दे दीं, और अपने घरमें चित्ररूपमें सज्जित कर उसे टांग दिया। प्रसङ्गवश वह व्यापारी व्यापारके लिए दूसरे द्वीपमें चला गया था। कई वर्षोंके बाद व्यापारी रातमें जब घर आया और अपनी पत्नीको एक कुमारके साथ सोई हुई देखा तो उसे व्यभिचारिणी समझकर खड्गसे प्रहार करनेके लिए तत्पर हुआ। संयोगवश भारविके उसी पद्य पर जो कि दीवारमें टाँगा गया था, उसकी दृष्टि पड़ी और उसने पत्नी को जगाया। उसने पतिको देखकर प्रसन्न होकर कहा—‘यह तुम्हारा पुत्र है’। तब उस व्यापारीको सन्तोष हुआ।
उधर भारवि छः महीने तक क्लेशपूर्ण प्रायश्चित्त भोगकर सप्तममासके प्रथम दिनमें श्वशुरगृहसे पत्नीके साथ प्रस्थानकर अपने घर आ गये एवम् माता-पिता-की सेवा करते हुए रहने लगे और प्रवासमें आरब्ध किरातार्जुनीयको पूर्ण करके उसके प्रचारसे यश और सम्पत्तिका उपार्जन कर सुखपूर्वक समय व्यतीत करने लगे।
पहलेकी किंवदन्तीकी अपेक्षा इसकी ज्यादा प्रसिद्धि है।
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॥ श्रीः ॥ काशी संस्कृत ग्रन्थमाला ७४
महाकवि-भारविविरचितं
किरातार्जुनीयम्
महोपाध्यायश्रीमल्लिनाथसूरिकृतया 'घण्टापथ'-व्याख्यया
पण्डितश्रीगङ्गाधरशर्मकृतया 'सुधा'-व्याख्यया च
समलङ्कृतम् ।
( सर्ग )
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इस ग्रन्थ का परिष्कृत तथा परिवर्धित मूल-पाठ एवं टीका,
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संस्करण : अष्टम्, वि० सं० २०७५
मूल्य : २५.००
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Edition : Eighth, 2018
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मुद्रक : मित्तल ऑफसेट, जौहरी प्रोसेस, वाराणसी
THE KASHI SANSKRIT SERIES 74 ❦
KIRĀTĀRJUNĪYAM
OF MAHĀKAVI BHĀRAVI
With
Gaṇṭāpatha Sanskrit Commentary of Mallinātha
Sūri and Sudhā Hindi Commentary of
Pt. Gaṅgadhara Śarmā
Cantos
CHAUKHAMBHA PRAKASHAN
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Varanasi-221001
संस्कृत-कथासारः
प्रथमसर्गे
युधिष्ठिरं प्रति वनेचरस्योक्तिः
हे राजन ! चारचक्षुषो राजानो नानुयायिभिर्वञ्चनीयाः, अतो मदुक्तं युक्तमयुक्तं वा त्वया क्षन्तव्यम्, यतो हितकरं प्रियं च वचो दुर्लभम्भवति। अधिपत्याशासकः सुहृद् हितवचनाश्रोताऽधिपश्च निन्द्यौ । यतोऽन्योऽन्यानुरागिष्वेवामात्यनृपेषु सर्वसम्पदस्तित्ष्ठन्ति । रामचरितं स्वभावतो दुर्ज्ञेयं जन्तवश्चाज्ञानिनो भवन्त्युभयोर्महद्वैषम्यम्, अथापि त्वत्प्रभावादेवास्याकमरिगूढनीतिमार्गज्ञानम् ।
वनेचरस्य वक्तव्योक्तिः
सिंहासनस्थोऽपि दुर्योधनो भवतः पराजयभीत्या विमलं यशो विस्तारयति। षड्वर्गविजयी नीत्यनुसरणशीलो दुर्योधनों नक्तन्दिवं विभज्य नीत्या पौरुषं करोति। निरभिमानो दुर्योधनो भृत्येषु मित्रभावं, मित्रेषु बन्धुभावं, बन्धुषु च स्वामिभावं लोकान्दर्शयते । समविभक्तधर्मार्थकामसेवकस्य दुर्योधनस्य ते गुणानुरागात्सख्यं प्राप्तवन्त इव परस्परं न बाधन्ते, अपि तु वर्धन्त एव। वशी दुर्योधनो धनलोभात् क्रोधाद्वा न दण्डधारी, किन्तु 'राज्ञो ममायं धर्मः' इति बुद्ध्या गुरुशिक्षया शत्रौ पुत्रे वा दण्डयिता। कीर्तिमतो दुर्योधनेन सर्वतो रक्षिता मही भूरि वसूत्पादयति। कीर्तिमन्तस्तेजस्विनो मानिनो धनादृता धनुर्भृतो राजानो दुर्योधनस्य प्राणैः प्रियं कर्तुमिच्छन्ति । अशेषितक्रियो दुर्योधनोऽवञ्चकचरद्वाराऽन्यनृपकार्यं वेत्ति । अस्योद्योगस्तु फलैर्ज्ञायते नान्यथा । अक्रुद्धस्यापि दुर्योधनस्यस्यानुशासनं गुणानुरागिणो राजानः शिरसा वहन्ति। यौवराज्ये दुःशासनं नियुज्य दुर्योधनो मखेषु वह्निं प्रीणयति। यथोच्चरितमन्त्रश्रवणादुरगो व्यथते तथा जनोदीरितभवन्नामाकर्णनादयं व्यथते । हे राजन् ! शत्रुप्रतिकारविधाने तत्परो भव, चरोक्तिषु प्रवृत्तिसारैव वेदितव्या।
युधिष्ठिरं प्रति द्रौपद्युक्तिः
हे स्वामिन् ! विज्ञेषु स्त्रीजनोक्तमनुशासनमनादर इव भवति, अथापि दुष्टा मनोव्यथा वक्तुं मां प्रेरयन्ति । हे स्वामिन् ! स्ववंशजे राजभिरुपार्जिता मही मत्तगजेन मालेव त्वया विनाशिता । हे राजन् ! ये मायिषु मायां न कुर्वन्ति ते पराभवं भजन्ते। तीक्ष्णबाणा अनावृतशरीरान् घ्नन्ति । हे राजन् ! कोऽन्यः कुलाभिमानी राजा निजवधूमिव लक्ष्मीं त्वामन्तरेणापहारयति । हे राजन् ! अग्निः शुष्कं शमीवृक्षमिव निन्दितमार्गस्थं त्वा मन्युः कुतो न ज्वलति । सकलमन्योरपद्विनाशकस्य पुंसः सर्वे च प्राणिनो वश्या भवन्ति, स्नेहिनो निष्कोपात्पुंसो न कस्यचिद्भयं भवति। हे
किरातार्जुनीयम्
प्रथम सर्गः
अर्धाङ्गीकृत-दाम्पत्यमपि गाढानुरागि यत् । पितृभ्यां जगतस्तस्मै कस्मैचिन्महसे नमः॥ आलम्बे जगदालम्बं हेरम्बचरणाम्बुजम् । शुष्यन्ति यद्रजास्यस्पर्शात्सद्यः प्रत्यूहवार्धयः तद्दिव्यमव्ययं धाम सारस्वतमुपास्महे । यत्प्रकाशात्प्रलीयन्ते मोहान्धतमसच्छटाः॥
वाणीं काणभुजीमजीगणदवाशासीच्च वैयासकी- मन्तस्तन्त्रमरंस्त पन्नगगवीगुम्फेषु चाजागरीत् । वाचामाकलयद्रहस्यमखिलं यश्चाक्षपादस्फुरां लोकेऽभूददुपज्ञमेव विदुषां सौजन्यजन्यं यशः॥
मल्लिनाथकविः सोऽयं मन्दात्मानुजिघृक्षया । तत्किरातार्जुनीयाख्यं काव्यं व्याख्यातुमिच्छति ॥
नारिकेलफलसम्मितं वचो भारवेः सपदि तद्विभज्यते । स्वादयन्तु रसगर्भनिर्भरं सारमस्य रसिका यथेप्सितम् ॥
नानानिबन्धविषमैकपदैर्नितान्तं साशङ्कचङ्क्रमणखिन्नधियामसङ्घम् । कर्तुं प्रवेशमिह भारविकाव्यबन्धे घण्टापथं कमपि नूतनमातनिष्ये । इहान्वयमुखेनैव सर्वं व्याख्यायते मया । नामूलं लिख्यते किञ्चिन्नानपेक्षितमुच्यते ॥
अथ तत्रभवान् भारविनामा कविः 'काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये । सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे' ।। इत्याद्यालङ्कारिकवचनप्रमाण्यात्काव्यस्यानेकश्रेयःसाधनताम् 'काव्यालापांश्च वर्जयेत्' इति निषेधन्त्वाशास्त्रस्यासत्काव्यविषयतां च पश्यन्किरातार्जुनीयाख्यां महाकाव्यं चिकीर्षुश्चिकीर्षितार्थाविघ्नपरिसमाप्तिसम्प्रदायाविच्छेदलक्षणफलसाधनत्वात् 'आशीर्नमस्क्रिया वस्तु निर्देशो वाऽपि तन्मुखम्' इत्याद्याशीर्वादद्यन्यतमस्तं प्रबन्धमुखलक्षणत्वाच्च वनेचरस्य युधिष्ठिरप्राप्तिरूपं वस्तु निर्दिशन्कथामुपक्षिपति—
( 8 )
सहदेव कठिन भूमि में सोते हैं। इन सबों को इस दशा में देखकर भी आपको दुःख नहीं होता। यह देखकर मुझे अत्यन्त दुःख हो रहा है।
हे महाराज! आप अब शान्ति को छोड़कर शत्रुओं को नष्ट करने के लिए अपना पुराना तेज धारण कीजिए, क्योंकि शान्ति से मुनियों का कार्य होता है न कि राजाओं का। सब प्रकार से समर्थ होते हुए भी शत्रु विजय के लिए आपका समय की प्रतीक्षा करते रहना उचित नहीं है क्योंकि विजय चाहने वाले राजा लोग समय पड़ने पर किसी न किसी व्याज से सन्धि को भी तोड़ देते हैं।
द्वितीय सर्ग
युधिष्ठिर के प्रति भीम की उक्ति
इस प्रकार द्रौपदी की अपने मनोनुकूल बातें सुनकर भीम युधिष्ठिर से बोले हे महाराज ! द्रौपदी ने इस समय जो कहा वह उचित कहा, स्त्री की कही हुई समझ कर आपको इसकी उपेक्षा करना उचित नहीं है। यदि अवधि की प्रतीक्षा करते रहियेगा तो निश्चय समझिये कि दुर्योधन इतने दिन तक राज्यसुख भोगकर आपको अवधि बीतने पर राज्य दे देगा यह असम्भव है। अतः आलस्य छोड़कर पुरुषार्थ कीजिए।
इस भाँति अत्यन्त क्रुद्ध भीमसेन की बातें सुनकर मतवाले हाथी की भाँति उन्हें धीरे-धीरे शान्त करने के लिए महाराज युधिष्ठिर चेष्टा करते हुए बोले—
भीम के प्रति युधिष्ठिर की उक्ति
हे भीम ! तुमने जो कुछ कहा, वह ठीक है, तथापि मेरा मन विचारपूर्वक कार्य करने को कहता है क्योंकि असमय में क्रोध करना अत्यन्त अनुचित है। यदि इस समय नियम तोड़कर चढ़ाई न की जाय तो जितने राजा हैं वे सब अवधि के बाद हमारी सहायता करेंगे। अहङ्कारी मनुष्य की सेवा में जो लोग रहते हैं वे लोग जब समय पड़ता है तब उसे छोड़ देते हैं, क्योंकि उसके दुर्व्यवहार से मन में सभी अप्रसन्न रहते हैं। अतः अब तक अवधि है तब तक शान्ति के साथ समय बिताना उचित है। इस प्रकार से जब युधिष्ठिर भीम को समझा रहे थे, ठीक उसी समय दैवात् व्यास जी पहुँच गये। उन्हें देखते ही सबने उठकर स्वागत किया तथा आदर से लाकर उच्च आसन पर बैठाया। पश्चात् स्वयं भी आज्ञा पाकर हाथ जोड़कर सम्मुख बैठ गये।
किरातार्जुनीयम्
प्रथम सर्गः
अर्धाङ्गीकृत-दाम्पत्यमपि गाढानुरागि यत् । पितृभ्यां जगतस्तस्मै कस्मैचिन्महसे नमः॥ आलम्बे जगदालम्बं हेरम्बचरणाम्बुजम् । शुष्यन्ति यद्रजःस्पर्शात्सद्यः प्रत्यूहवार्धयः तद्दिव्यमव्ययं धाम सारस्वतमुपास्महे । यत्प्रकाशात्प्रलीयन्ते मोहान्धतमसच्छटाः॥
वाणीं काणभुजीमजीगणदवाशासीच्च वैयासकी-
मन्तस्तन्त्रमरंस्त पन्नगगवीगुम्फेषु चाजागरीत् ।
वाचामाकलयद्रहस्यमखिलं यश्चाक्षपादस्फुरां
लोकेऽभूदुपज्ञमेव विदुषां सौजन्यजन्यं यशः॥
मल्लिनाथकविः सोऽयं मन्दात्मानुजिघृक्षया ।
तत्किरातार्जुनीयाख्यं काव्यं व्याख्यातुमिच्छति ॥
नारिकेलफलसम्मितं वचो भारवेः सपदि तद्विभज्यते ।
स्वादयन्तु रसगर्भनिर्भरं सारमस्य रसिका यथेप्सितम् ॥
नानानिबन्धविषमैकपर्दैर्नितान्तं साशङ्कचङ्क्रमणखिन्नधियामशङ्कम् । कर्तुं प्रवेशमिह भारविकाव्यबन्धे घण्टापथं कमपि नूतनमातनिष्ये । इहान्वयमुखेनैव सर्वं व्याख्यास्यते मया । नामूलं लिख्यते किञ्चिन्नानपेक्षितमुच्यते ॥
अथ तत्रभवान् भारविनामा कविः 'काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवेतरक्षतये । सद्यः परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे'।। इत्याद्यालङ्कारिकवचनप्रमाण्यात्काव्यस्यानेकश्रेयःसाधनताम् 'काव्यालापांश्च वर्जयेत्' इति निषेधनाज्ञाशास्त्रस्यासत्काव्यविषयतां च पश्यन्किरातार्जुनीयाख्यां महाकाव्यं चिकीर्षुश्चिकीर्षितार्थविघ्नपरिसमाप्तिसाम्प्रदायाविच्छेदलक्षणफलसाधनत्वात् 'आशीर्नमस्क्रिया वस्तु निर्देशो वापि तन्मुखम्' इत्याद्याशीर्वादाद्यन्यतमस्त प्रबन्धमुखलक्षणत्वाच्च वनेचरस्य युधिष्ठिरप्राप्तिरूपं वस्तु निर्दिशन्कथामुपक्षिपति—
२ किरातार्जुनीयम् [प्रथमः
श्रियः कुरुणामधिपस्य पालनीं प्रजासु वृत्तिं यमयुङ्क्त वेदितुम्।
स वर्णिलिङ्गी विदितः समाययौ युधिष्ठिरं द्वैतवने वनेचरः॥ १॥
श्रिय इति। आदितः श्रीशब्दप्रयोगाद्गर्णार्णाद्गणगणादिशुद्धिर्नात्रातीवोपयुज्यते। तदुक्तम्-‘देवतावाचकाः शब्दा ये च भद्रादिवाचकाः। ते सर्वे नैव निन्द्याः स्युर्लिपितो गणतोऽपि वा’ इति। कुरूणां निवासाः कुरवो जनपदाः। ‘तस्य निवासः’ इत्यणप्रत्ययः। जनपदे लुप्। तेषामधिपस्य सम्बन्धिनीम्। शेषे षष्ठी। श्रियो राजलक्ष्म्याः ‘कर्तृकर्मणोः कृति’ इति कर्मणि षष्ठी। पाल्यतेऽनयेति पालनी ताम्। प्रतिष्ठापिकामित्यर्थः। प्रजारागमूलत्वात्सम्पद इति भावः। ‘करणाधिकरणयोश्च’ इति करणे ल्युट्। ‘टिड्ढाणञ्—’ इत्यादिना ङीप्। प्रजासु जनेषु विषये। ‘प्रजा स्यात्सन्ततौ जने’ इत्यमरः। वृत्तिं व्यवहारं ज्ञातुं यं वनेचरमयुङ्क्त नियुक्तवान्। वर्णः प्रशस्तिरस्यास्तीति वर्णी ब्रह्मचारी। यदुक्तम्— ‘स्मरणं कीर्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणम् । सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिर्वृतिरेव च ॥ एतन्मैथुनमष्टाङ्गं प्रवदन्ति मनिषिणः। विपरीतं ब्रह्मचर्यमेतदेवाष्टलक्षणम्। एतदष्टविधमैथुनाभावः प्रशस्तिः। ‘वर्णाद् ब्रह्मचारिणि’ इतीनिप्रत्ययः। तस्य लिङ्गं चिह्नमस्यास्तीति वर्णिलिङ्गी। ब्रह्मचारिवेषवानित्यर्थः। स नियुक्तः वने चरतीति वनेचर किरातः। ‘भेदाकिरातशबरपुलिन्दा म्लेच्छजातयाः’ इत्यमरः। ‘चरेष्ट’ इति टप्रत्ययः। ‘तत्पुरुषे कृति बहुलम्’ इत्युलुक्। विदितं वदनमस्यास्तीति विदितः। ‘परवृत्तान्तज्ञानवानित्यर्थः। ‘अर्शआदिभ्योऽच्’ इत्यच्प्रत्ययः। उभयत्रापि ‘पीता गावः’ ‘भुक्ता ब्राह्मणाः’ विभक्ता भ्रातरः’ इत्यादिवत्साधुत्वम्। न तु कर्तरि क्तः। सकर्मकेभ्यस्तस्य विधानाभावात्। अत एव भाष्यकारः— अकारो मत्वर्थीयः विभक्तमेषामस्तीति ‘विभक्ताः’ पीतमेषामस्तीति पीताः’ इति सर्वत्र। अथवात्तरपदलोपोऽत्र द्रष्टव्यः। विभक्तधना विभक्ताः, पीतोदकाः पीता इति। अत्र लोपशब्दार्थमाह कैयटः- ‘गम्यार्थस्याप्रयोग एव लोपोऽभिमतः। ‘विभक्ता भ्रातरः’ इत्यत्र च धनस्य यद्विभक्तत्वं तद्भ्रातृषूपचरितम्। ‘पीतोदका गावः’ इत्यत्राप्युदकस्य पीतत्वं गोष्वारोप्यते इति। तद्वदत्रापि वृत्तिगतं विदित्वं वेदित्त्वं वेदितरि वनेचर उपचर्यते। एतेन ‘वनाय पीतप्रतिबद्धवत्साम्’, पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्मास्वपीतेषु या ‘एवमादयो व्याख्याताः अथवा विदितवान्। अकर्मकादप्यविविक्षिते कर्मणि कर्तरि क्तः। यथा ‘आसितः कर्त्ता’ इत्यादौ। यथाहूः— ‘धातोरर्थान्तरे
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् । ३
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् । ३
वृत्तेर्धात्वर्थेनोपसंग्रहात् । प्रसिद्धेरविवक्षातः कर्मणोऽकर्मिका क्रिया' ।। इति द्वैतवने द्वैताख्ये तपोवने । यद्वा द्वे इते गते यस्मात्तद् द्वीतम् । तच्च तद्वनञ्च तस्मिन् । शोकमोहादिवर्जित इत्यर्थः। युधि रणे स्थिरं युधिष्ठिरं धर्मराजम् 'हलदन्तात्सप्तम्याः संज्ञायाम् इत्यलुक् । 'गवियुधिभ्यां स्थिरः' इति षत्वम् । समाययौ सम्प्राप्तवान् । अत्र 'वने वनेचरः इति द्वयोः स्वरव्यञ्जनसमुदाययोरेकदैवावृत्त्यनुप्रासो नामालङ्कारः। अस्मिन्सर्गे वंशस्थवृत्तम् तल्लक्षणम्- 'जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ' इति ॥१॥
या नीलाम्बुदसन्निभा भगवती संसारतापान्वितान्
सद्यश्चञ्चलदृष्टिकोणकिरणैरालोक्य गर्जद्गिरा ।
कारुण्यामृतधारया विदधती मोहान्वितान् प्राणिनो
भक्तत्राणपरायणा विजयते जाग्रत्प्रभावा शिवा ।।
अन्वयः- कुरूणाम्, अधिपस्य, श्रियः, पालनीं प्रजासु, वृत्तिम्, वेदितुम्, यम्, अयुङ्क, सः, वर्णिलिङ्गी, विदितः, वनेचर, द्वैतवने, युधिष्ठिरं, समाययौ ॥१॥
**सुधा-**कुरूणाम्=कुरुसंज्ञकभूनिवासप्रसिद्धदेशानाम् (यथोक्तं शब्दकल्पद्रुमे 'कुरुः धार्तराष्ट्रपाण्डवानां पूर्वपुरुषः' यथा- 'योजमीढसुतस्त्वन्य ऋक्षः संवरणस्ततः। तपस्यां सूर्यकन्यायां कुरुक्षेत्रपतिः कुरुः। परीक्षित् सधनुर्जह्नुर्निषधाद्यः कुरोः सुताः॥' अत्रसंज्ञकदेशानामिति न युक्तम्, यतः कुरुवर्षन्तु, सिद्धपुरसमीपेर्वर्त्तते, तंतु भारतवर्षान्तर्गतं न, प्रत्युत भारतदेशादुत्तरस्यां किन्नरहरिवर्षरम्यक हिरण्मयवर्षेऽप्यऽनन्तरं कुरुवर्षमस्तीति सिद्धान्तशिरोमणेर्गोलाध्याये भुवनकोशे भास्कराचार्यैरन्यैश्च भूगोलवर्णनशीलैरवर्णि)। अधिपस्य = स्वामिनः, दुर्योधनस्येति शेषः। श्रियः = राजसम्पदः, सम्बन्धिनीं, पालनीं=सकलनियमसेवनीं, प्रजासु = जनेषु तदङ्गान्तर्गतिष्विति शेषः। वृत्तिम् = व्यवहारम्, वा वार्त्ताम्, वेदितुम् = विज्ञातुम्, यम् = अज्ञातनामानम् वनेचरमिति शेषः। अयुङ्क्त = नियुक्तवान्, सः = मान्यः, वर्णिलिङ्गी = ब्रह्मचारित्वरूपधारी, 'नान्यो मां लोकप्रकृतिपरीक्षकं जानातु, अपि तु, साधुरूपमवलोक्य मत्तः किमप्यनाशङ्क्य स्वयथार्थं स्वभावं प्रकाशयतु, इतिधिया कपटब्रह्मचारिवेषधर इत्यर्थः। विदितः = ज्ञाताखिलज्ञातव्य वनेचरः = आरण्यकः, द्वैतवने = एतन्नाम्ना विदिते विपिने, युधिष्ठिरम् = ज्येष्ठपाण्डवमेतन्नामानम् प्रति समाययौ = समागतः।
| ४ | किरातार्जुनीयम् | [प्रथमः |
|---|
अस्मिन् सर्गे वंशस्थसंज्ञं वृत्तम् । तल्लक्षणञ्च 'जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ ।'
यथा—
| ज | त | ज | र |
|---|---|---|---|
| । ऽ । | ऽ ऽ । | । ऽ । | ऽ । ऽ |
| 'श्रियः कु— | रूणाम्— | धिपस्य— | पालनीम् । |
समवृत्तत्वाच्चतुर्ष्वपि पादेषु समानमेव लक्षणं ज्ञेयमिति ॥१॥
समासो व्युत्पत्तिश्च— अधिपातीति अधिपः तस्याधिपस्य । पाल्यतेऽनयेति पालनी ता पालनीम् । वर्णः पशस्तिरस्यास्तीति वर्णी तस्य वर्णिलिङ्गम् तदस्यास्तीति वर्णिलिङ्गी । वने चरतीति वनेचरः युधि स्थिरो युधिष्ठिरः। द्वे इते गते यस्मात्तद् द्वीतं द्वीतमेव द्वैतं तच्च वने द्वैतवनम् तस्मिन् द्वैतवने ॥२॥
व्याकरणम्— वेदितुम् = विद् + तुमुन् । अयुङ्क्त = युज् + लङ् । समाययौ = सम् + आङ् + या + लिट् ॥२॥
वाच्यान्तरम्— दुर्योधनस्य प्रजापालनपद्धतिमवगन्तुं युधिष्ठिरेण योऽयुज्यत, तेन वर्णिलिंगिना वनेचरेण द्वैतवने युधिष्ठिर समायते ॥१॥
कोषः 'लक्ष्मीः पद्मालया पद्मा कमला श्रीर्हरिप्रिया' इत्यमरः। 'कुरुवर्षकुरुश्चन्द्रवंशीयोऽपि नृपः कुरुः'। 'अधिभूर्नायको नेता प्रभुः परिवृढोऽधिपः' इत्यमरः। 'प्रजास्यात्सन्ततौ जने' इत्यमर। 'वृत्ति प्रवृत्तराख्याता वृत्तिर्वचनमुच्यते' 'वृत्तिर्वार्ता वृत्तमपि'। 'वनेचरो वनप्रिय इति स्मृतः'।॥१॥
सारार्थः— यदा कौरवेश्वरेण दुर्योधनेन द्यूतक्रीडया सब्याजं पराजितो युधिष्ठिरो राज्यप्रभृति सर्वस्वं हारयित्वा भीतादिभिरनुजैर्द्रौपद्या स्त्रिया चानुगतो द्वादशः वर्षात्मके वनवासे वसन्नास्ते, तदानीं तस्य मनसीत्थं विचार उत्पन्नः। स दुर्जनों दुर्योधनः कथमिव राज्यं करोति नयेनानयेन वेति ज्ञातव्यमित्यतस्तत्रत्यमेकं गूढचरोचिताचाचतुरं वनेचरं दुर्योधनस्य राज्यशासनपद्धतिज्ञानाय प्रेषितवान् । स च ब्रह्मचारिवेषं सर्वविश्वासयोग्यं धृत्वाऽर्थात् अयमस्मद्गोष्यविषयज्ञानाशया कोऽपि युधिष्ठिरस्य गूढचर' इति यथा कौरवाणां मनसि शंका न भवेत्तथा विधाय तत्र गत्वा सर्वमुदन्तमशेषेणावगम्य युधिष्ठिराय तदादेशकारी निवेदनार्थ द्वैतवने समागतः॥३॥
भाषाऽर्थः— जब महाराज युधिष्ठिर अपने चचेरे भाई दुर्योधन के कपट भरे जुआ के खेल से हारकर सपरिवार द्वैतवन में रहकर बारह वर्ष का वनवास व्यतीत
सर्गः १] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् । ५
सर्गः १] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् । ५
कर रहे थे, उस समय अपने विरोधी दुर्योधन के 'शील' और 'कैसे प्रजाओं को पालता है' यह समझने के लिए जिस ब्रह्मचारी के वेषवाले वनेचर को भेजा था, वह वहाँ जाकर, पूरा हाल समझकर जहाँ कि द्वैतवन में युधिष्ठिर थे, वहाँ आ पहुँचा ॥१॥
सम्प्रति तात्कालोचितत्वमादेशयंस्तस्य तद्गुणसम्पन्नत्वमादर्शयन्नाह— कृतप्रणामस्य महीं महीभुजे जितां सपत्नेन निवेदयिष्यतः। न विव्यथे तस्य मनो न हि प्रियं प्रवक्तुमिच्छन्ति मृषा हितैषिणः॥२॥
कृतप्रणामस्येति। कृतप्रणामस्य तात्कालोचितत्वात्कृतनमस्कारस्य, सपत्नेन रिपुणा दुर्योधनेन 'रिपौ वैरिरिसपत्नारिद्विष्टद्द्वेषणदुर्हृदः' इत्यमरः। जितां स्वायत्तीकृतां महीं महीभुजे युधिष्ठिराय क्रियाग्रहणात्सम्प्रदानत्वम्। निवेदयिष्यतो ज्ञापयिष्यत 'लृटः सद्वा' इति शतृप्रत्ययः। तस्य वनेचरस्य मनो न विव्यथे। कथमयीदृगप्रियं राज्ञे विज्ञापयामीति मनसि न चचालेत्यर्थः। 'व्यथ भयचलनयोः' इति धातोर्लिट् । उक्तमर्थमर्थान्तरन्यासेन समर्थयते— न हीति । हि यस्मात् । हितमिच्छन्तीति हितैषिणः स्वामिहितार्थिनः पुरुषा मृषा मिथ्याभूतं प्रियं प्रवक्तुं नेच्छन्ति अन्यथा कार्यविघातकतया, स्वामिद्रोहिणः स्युरिति भावः। 'अमौढ्यममान्द्यममृषाभाषित्वामभ्यूहकत्वं चेति चारगुणाः' इति नीतिवाक्यामृते ॥२॥
अन्वयः—कृतप्रणामस्य, सपत्नेन जितां, महीं महीभुज, निवेदयिष्यतः, तस्य मनः, न, विव्यथे । हि, हितैषिण मृषा, प्रियं प्रवक्तुं न, इच्छन्ति ॥२॥
सुधा— कृतप्रणामस्य = विहितनमस्कारस्य, कृताभिवादनस्येत्यर्थः। सपत्नेन= शत्रुना, दुर्योधनेनेत्यर्थः। जितां = ब्याजद्यूतेनात्मसात्कृताम्, महीं = पृथ्वीम्, महीभुजे = भूपतये, युधिष्ठिरायेत्यर्थः। निवेदयिष्यतः = निवेदयितुं विज्ञापयितु मिच्छतः भवतो हस्तान्निजहस्ते राज्यं कृत्वा एवमेव स राज्यं प्रशास्तीति कथयिष्यत इत्यर्थः। तस्य = पूर्वप्रेषितस्य वनेचरस्य, मनः= मानसम्, हृदयमित्यर्थः। न विव्यथे = न व्यथितम्, अहो कथमेवं शत्रुप्रशंसां प्रभवे निवेदयामीत्येवं मनागपि मनो न विचलितं, न वा भयान्यितं जातम्। हि=यतः, यस्मात्कारणात्, हितैषिणः= प्रभुकल्याणेच्छवः, भृत्याः आज्ञाप्या इति यावत् । मृषा = मिथ्यात्मकम्, कपोलकल्पितमिति भावः। प्रियं = श्रवणसुखदं वचनम्, प्रवक्तुम् = निवेदयितुम्,
६ किरातार्जुननीयम् [प्रथमः
न = न भ्रमादपि, इच्छन्ति = अभिलषन्ति, स्वप्नेऽपीति शेषः। मिथ्या तु मिथ्यैव, सत्यं सत्यमेव, तेन मिथ्याप्रियवचननिवेदनेन, यथार्थविषयस्थितिमज्ञात्वा नरपतिः प्रमत्तो भवन् राज्यात्पतति, ताकालिकमप्रियमपि वचनं निशम्य, तत्प्रतीकारतत्परो राजा न जात्वरिवशङ्कतो भवति, अतो गूढचरस्यायं मुख्यो धर्मोऽस्ति, यत्स्वमिनेऽसत्यं प्रियं न निवेदनीयमिति भावः। अत एवोक्तं 'सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयात्' इति । अनेन यथार्थो भृत्यसमुदाचारो वर्णितः। एवम् ‘अमौढ्यममान्द्यममृषाभाषितवमभ्यूहकत्वञ्चेति चारगुणाः' इति नीतिवाक्यामृते कथितम् ॥२॥
समासः- कृतः प्रणामो येन सः कृतप्रणामस्तस्य कृतप्रणामस्य । महीं भुनक्तीति महीभुक् तस्मै महीभुजे । हितमिच्छन्तीति हितैषिणः॥२॥
व्याकरणम्- विव्यथे = व्यथ + लिट् । इच्छन्ति = इष् + लट् ॥२॥
वाच्यान्तरम्- वनेचरस्य मनसा न विव्यथे, हितैषिभिर्मृषा प्रियं न प्रवक्तुं मिष्यते ॥२॥
कोषः- 'गोत्रा कुः पृथिवी पृथ्वी क्ष्माऽवनिर्मेदिनी मही' इत्यमरः। 'पार्थिवो भूपतिर्भूपो महीभुक् क्ष्मापतिर्नृपः'। 'रिपौ वैरिसपत्लारिद्विषद्वेषणदुर्हृदः' इत्यमरः। 'चित्तं तु चेतो हृदयं स्वान्तं हृन्मानसं मन' इत्यमरः 'मृषा मिथ्या तु वितथे' इत्यमरः॥२॥
सारार्थः- स च वनेचरो युधिष्ठिरं प्रणम्य यथादृष्टं प्रभुद्रोहिप्रशंसामपरमपि दुर्योधनकृतराज्यशासनविधिं प्रवक्तुमुद्यतः। परन्तु कथमेवं शत्रूत्कर्षं स्वप्रभवे निवेदयामिति मनागपि तस्य मनो न कम्पितम् । यतो हितेच्छोर्भृत्यस्य स्वामिनं प्रति सत्यकथनमेव परो धर्मः। कथमन्धथा भृत्यस्य विश्वासः। तथा शत्रुकृते प्रतीकारः क्रियते स्वामिभिरिति॥२॥
भाषार्थः- किया है प्रणाम जिसने और दुर्योधन से वशीकृत राज्य के बारे में कहने की इच्छा है जिसकी, ऐसे उस वनेचर का चित्त जरा भी विचलित नहीं हुआ । इसलिए कि मालिक के कल्याण चाहने वाले नौकर कभी झूठी मीठी बात मालिक से नहीं कह सकते ॥२॥
तथापि प्रियार्हे राशि कटुनिष्ठुरोक्तिर्न युक्तेत्याशङ्क्य स्वाभ्यनुज्ञया न दुष्यतीत्याशयेनाह—
द्विषां विघाताय विधातुमिच्छतो रहस्यनुज्ञामधिगम्य भूभृतः।
स सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनीं विनिश्चितार्थामिति वाचमाददे ।। ३ ।।
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् । ७
सर्गः ] घण्टापथ-सुधाव्याख्याद्वयोपेतम् । ७
द्विषामिति । रहस्येकान्ते स वनेचरो द्विषां शत्रूणाम् । कर्मणि षष्ठी । विघाताय, विहन्तुमित्यर्थः। 'तुमर्थाच्चभाववचनात्' इति चतुर्थी । 'भाववचनाच्च' इति तुमर्थे घञ्प्रत्ययः। अत्र तादर्थ्यमपि न दोषः तथापि प्रयोगवैचित्र्यविशेषस्या-प्यलङ्कारत्वादेयं व्याचक्षते । विधातुं व्यापारं कर्तुमिच्छतः। समानकर्तृकेषु तुमुन् द्विषो विहन्तुमुद्युञ्जानस्येत्यर्थः। अतः एव भूभृतो युधिष्ठिरस्यानुज्ञामधिगम्य । सुष्ठुभावः सौष्ठवं शब्दसामर्थ्यम् । सुष्ठुशब्दादव्ययादुद्गात्रादित्वादञ्प्रत्ययः। उदारस्य भाव औदार्यमर्थसम्पत्तिः तयोर्द्वन्द्वः सौष्ठवौदार्ये । अत्रौदार्यशब्दस्याजाद्यन्तत्वेऽपि 'लक्षणहेत्वोः क्रियायाः' इत्यत्राल्पस्वरस्यापि हेतुशब्दस्य पूर्वनिपातमकुर्वता सूत्र कृतेव पूर्वनिपातस्यानित्यत्वज्ञापनान्न पूर्वनिपातः। उक्तं च काशिकायाम्— अयमेव लक्षणहे- त्वोरिति निर्देशः। 'पूर्वनिपातव्यभिचारचिह्नम्' इति । ते एव विशेषः तयोर्वा विशेषः तेन शालते इति सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनी ताम् । ताच्छील्येणिनिः। विनिश्चिताथी विशेषतः प्रमाणतो निर्णीतार्थामिति वक्ष्यमाणरूपां वाचमाददे स्वीकृतवान् । उवाचेत्यर्थः॥३॥
अन्वयः--सः द्विषां, विघाताय, विधातुम्, इच्छतः, भूभृतः, रहसि, अनुज्ञाम् अधिगम्य, सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनी, विनिश्चिताथीम् , इति, वाचम्, आददे॥३॥
सुधा-सः = वनेचरः, क्विक्सुरिति शेषः। द्विषाम् = शत्रूणाम्, विघाताय=नाशाय, विधातुम् = विधानं, कर्तुम्, येनोपायेन शत्रुसंहरणम् भवेत्तं प्रकर्तुमित्यर्थः। इच्छतः = अभिलषतः भूभृतः=भूपतेः, युधिष्ठिरस्येति शेषः। रहसि = एकान्ते; निर्जने इति यावत्, अनुज्ञाम् = आज्ञाम्, अधिगम्य = प्राप्य, अर्थात् 'भो वनेचर ! तत्र गत्वा दुर्योधनस्य राजशासनपद्धति सम्यगवगतां ब्रूहि' इत्येवंरूपामाज्ञां शिरसि धृत्वा, सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनीम् = शब्दार्थगुणशोभिताम्, विनिश्चिताथर्थाम् = विशेषरूपेण प्रकटार्थाम्, स्पष्टातमिति यावत्, इति = वक्ष्यमाणरूपाम्, वाचम् = वाणीम्, आददे = स्वीकृतवान्, उवाचेत्यर्थः॥३॥
समासः-भुवं विभर्तीति भूभृतः तस्य भूततः। सुष्ठु भावः सौष्ठवम्, उदारस्य भाव औदार्यम्, सौष्ठवं चौदार्यञ्च सौष्ठवौदार्ये, तयोः सौष्ठवौदार्ययोविशेषः सौष्ठवौदार्यविशेषः, तेन शालते शोभते या सा सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनी, ताम् सौष्ठवौदार्यविशेषशालिनीम् । विशेषेण निश्चितः, निर्णीतोऽर्थो यस्तास्तां विनिश्चितार्थाम् ॥३॥