लीलावती (भास्कराचार्य द्वितीय - प्राचीन भारतीय गणित सटीक)
Lilavati of Bhaskaracharya with Hindi Commentary
भास्कराचार्य द्वितीय (११५० ई.) / पं. रामस्वरूप शर्मा द्वारा
सप्तराशिकप्रकारः । ( ७७ ) अर्थः-हे वैश्यवर्य्य ! जो तुम व्यापार करना जानते हो तो यदि तीन ३ हाथ चौंडी और ८ आठ हाथ लम्बी और विचित्ररूपकी सुंदर रेशमकी ८ आठ दुपटी सौ १०० निष्ककी मिलती हैं तो साढे तीन ३ १/२ हाथ लम्बी और आधा १/२ हाथ चौंडी वैसी ही सुंदर रेशमकी दुपटी दूसरी कितनेकी आवेगी सो शीघ्र कहो ॥१३॥ न्यासः- | १/२ लब्धो निष्कः ० द्रम्माः १४ ३ ८ | ७/२ पणाः ९ काकिणी १ ८ १०० | १ वराटकाः ६ २/३ फैलाव-यहां प्रश्न करनेवालेके कहनेके अनुसार न्यास- ३/८/८/१०० | १/२/३ १/२/१ यह हुआ ३/८/८/१०० | १/२/७/२/१ यह न्यास हुआ. फिर यहां भागानुबन्ध किया तब फल और हरोंका पलट किया तब ३/८/८ | १/२/१००/१ ऐसा रूप हुआ. यहां बहुत राशिका घात ७०० सातसौमें थोडी राशिके घात ७६८ सातसौ अडसठ भाग दिया सो भाज्यके अल्प होनेसे लग नहीं सकता, इस कारण भाज्य ७०० निष्कके “द्रम्मैस्तथा षोडशभिश्च निष्कः” १६ सोलहसे गुणा करके द्रम्म बनाये तो ११२०० ग्यारहसहस्र दोसौ हुए, इसमें अल्पराशि घातका भाग किया तब १४ चौदह द्रम्म लब्धि हुए. और ४४८ चारसौ अडतालीस शेष बचे इनके “ते षोडश द्रम्म इहावगम्यः” १६ सोलहसे गुणा करके पण बनाये तो ७१६८ सात हजार एकसौ अडसठ हुए. इसमें अल्पराशिघात ७६८ का भाग दिया तब ९ नौ पण लब्धि हुए और २५६ दोसौ छप्पन बचे. इनकी “ताश्च पणश्चतस्रः” चार ४ से गुणा करके काकिणी बनाई तो १०२४ एक हजार चौबीस हुई, इनमें अल्पराशि घातका भाग दिया तब १ एक काकिणी लब्धि हुई और २५६ दोसौ छप्पन बचीं. इनके "वराटकानां दशकद्वयं यत्सा काकिणी ” बीस २० से गुणा करके वराटक बनाये तो ५१२० पांच हजार एकसौ बीस हुए, इनमें अल्पराशिघातका भाग दिया तब ६ छ वराटक लब्धि हुए और ५१२/७६८ यह भिन्नाङ्क बचा, इसमें २५६ दोसौ छप्पन का परिवर्तन दिया तब २/३ यह भिन्नांक बचा रहा. इस प्रकार उस एक दुपटीका मोल द्रम्म १४ पण ९ काकिणी १ वराटक ६ २/३ हुए. CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
( ७८ ) लीलावती । अथ नवराशिकोदाहरणम्- अब नवराशिका उदाहरण लिखते हैं- पिंडे येऽर्कमितांगुलाः किल चतुर्वर्गांगुला विस्तृतौ पट्टा दीर्घतया चतुर्दशकरास्त्रिंशल्लभन्ते शतम् ॥ एता विस्तृतिपिण्डदैर्घ्यमितयो येषां चतुर्वर्जिताः पट्टास्ते वद मे चतुर्दश सखे मूल्यं लभन्ते कियत् ॥ ४ ॥ अन्वयः-हे सखे ! ये पिण्डे अर्कमितांगुलाः विस्तृतौ चतुर्वर्गांगुलाः दीर्घतया चतुर्दशकराः त्रिंशत् पट्टाः किल शतं लभन्ते तर्हि येषां चतुर्वर्जिताः विस्तृतिपिण्ड- दैर्घ्यमितयः एताः ते पट्टाः चतुर्दश कियत् मूल्यं लभन्ते इति मे वद ॥ ४ ॥ अर्थः-हे मित्र ! जो मोटेपनेमें १२ बारह अंगुल है और विस्तारमें १६ सोलह अंगुल हैं और लंबाईमें १४ चौदह अंगुल है. ऐसे ३० तीस पटेले सौ १०० निष्कके मिलते हैं, तो जिन पटेलोंका चौडापन, मोटापन, लम्बापन चार चार घटाकर पहले ही पटेलोंकी बराबर है. अर्थात् ८ आठ अंगुल मोटे १२ बारह अंगुल चौंडे १० दश अंगुल लम्बे १४ चौदह पटेले कितने मूल्यमें आवेंगे सो कहो ? ॥४॥ १२ | ८ १६ | १२ न्यासः- १४ | १० लब्धं मूल्यं निष्काः १६ २/३ ३० | १४ १०० | ० फैलाव-यहां प्रश्न करनेवालेके कहनेके अनुसार न्यास यह है.ऊपर कहे हुए नियमानुसार यहां हर नहीं है तब भी फलको ही पलट दिया तब न्यास एसा हुआ. बहुत राशियोंका घात किया अर्थात् ८ आठको बारह १२ स गुणा किया तब ९६ छियानवे हुए, इसको १० दशसे गुणा किया तब ९६० नौसौ साठ हुए इसको १४ चौदहसे गुणा किया तब १३३४० तेरह सहस्र तीनसौ चालीस हुआ. इसको सौ १०० से गुणा किया तब १३४४००० तेरह लक्ष चौवालीस हजार बहुत राशिका घात हुआ इसमें थोडी राशिके घात ८०६४० अस्सी हजार छ सौ चालीसका भाग दिया तब १६ सोलह लब्धि हुआ और २/३ यह भिन्नाङ्क रहा. इस प्रकार १६ २/३ निष्कमें आवेंगे. CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
एकादशराशिकप्रकारः । (७९) अथैकादशराशिकोदाहरणम्- अब एकादश राशिके उदाहरण लिखते हैं- पट्टा ये प्रथमोदितप्रमितयो गव्यूतिमात्रे स्थिता- स्तेषामानयनाय चेच्छकटिनां द्रम्माष्टकं भाटकम् ॥ अन्ये ये तदनन्तरं निगदिता माने चतुर्वर्जिता- स्तेषां का भवतीति भाटकमितिर्गव्यूतिषट्के वद ॥ ५ ॥ अन्वयः- हे सखे ! प्रथमोदितप्रमितयः पट्टाः गव्यूतिमात्रे स्थिताः तेषां आन- यनाय चेत् शकटिनां भाटकं द्रम्माष्टकं भवति तर्हि ये अन्ये माने चतुर्वर्जिताः तदनन्तरं निगदिताः तेषां गव्यूतिषट्के का भाटकमितिः भवति इति वद ? ॥५॥ अर्थः- हे मित्र ! जो पहले उदाहरणमें पट्टे कहे हैं. मोटे १२ अंगुल, चौडे १६ अंगुल, लम्बे १४ अंगुल ऐसे तीस पटेले दो कोशपर रक्खे हैं उनके लानेमें यदि गाडियोंका भाडा आठ ८ द्रम्म होता है, तौ जो उनके बाद चार ४ अंगुल कमके पट्टे कहे हैं. अर्थात् ८ आठ अंगुल मोटे १२ बारह अंगुल चौडे १० दश अंगुल लम्बे १४ चौदह पट्टोंके बारह १२ कोश लानेमें क्या भाडा होगा? सो कहो ॥ ५ ॥ न्यासः-- १२ | ८ १६ | १२ १४ | १० लब्धा भाटके द्रम्माः ८ ३० | १४ \t\t\t १२ | ८ १ | ६ \t\t\t १६ | १२ ८ | ० \t\t\t १४ | १० \t\t\t\t ३० | १४ फैलाव-इस उदाहरणमें प्रश्न करनेवालेके कहनेके अनुसार \t २ | १२ न्यास हुआ. उपरोक्त रीतिके अनुसार हर नहीं है केवल फल \t ८ | ० १२ ८ पलटा करनेसे न्यास १६ १२ हुआ. १४ १० ३० १४ २ ३० १२ ( बहुत राशियोंका घात ) ८ ( थोडी राशियोंका घात. )
( ८० ) लीलावती। ८ १२ १२ १६ ――― ――― ९६ १९२ १० १४ ――― ――― ९६० २६८८ १४ ३० ――― ――― १३४४० ८०६४० १२ २ ――― ――― १६१२८० १६१२८० ८ १२९०२४० बहुत राशियोंके घातमें १२९०२४० थोडी राशियोंके घात १६१२८० का भाग दिया तब ८ आठ द्रम्म लब्धि हुए, यही भाडा होगा. अथ भाण्डप्रतिभाण्डे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्-- अब भाण्डप्रतिभाण्ड (एक वस्तु देकर उतने ही मूल्यकी दूसरी वस्तु पलटना) की रीति आधे श्लोकमें कहते हैं- तथैव भाण्डप्रतिभाण्डके विधिर्विपर्य्ययस्तत्र सदा हि मूल्ये ॥ अन्वयः-भाण्डप्रतिभाण्डके तथा एव विधिः कार्य्यः । तत्र हि मूल्ये सदा विपर्य्ययो भवति ॥ अर्थः-भाण्डप्रतिभाण्डमें वैसा ही (पञ्चराशिककी तरह ) विधि करना तहां ही मूल सदा पलट कर रखना. उदाहरणम्-- द्रम्मेण लभ्यत इहाम्रशतत्रयञ्चेत्रिंशत्पणेन विपणौ वरदा- डिमानि ॥ आम्रैर्वदाशु दशभिः कति दाडिमानि लभ्यानि तद्विनिमयेन भवन्ति मित्र ॥ १ ॥ अन्वयः-हे मित्र ! चेत् इह विपणौ द्रम्मेण आम्रशतत्रयं लभ्यते। तथा पणेन त्रिंशत् दाडिमानि लभ्यन्ते तर्हि दशभिः आम्रैः तद्विनिमयेन कति दाडिमानि लभ्यानि भवन्ति इति आशु वद ? ॥१॥ हे मित्र ! यदि इस दुकानपर एक द्रम्मके ३०० तीनसौ आम मिलते हैं और एक पणमें ३० तीस दाडिमी मिलती हैं, तो दश १० आमोंसे बदला करनेसे कितनी दाडिमी मिलेंगी ? यह शीघ्र कहो ॥ १॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
मिश्रव्यवहारः । (८१) १६ १ न्यासः--३०० ३० लब्धानि दाडिमानि १६ १० ० फैलाव-प्रश्नकर्ताके कहनेके अनुसार न्यास \begin{matrix} १६ ३०० १० \end{matrix} \begin{matrix} १ ३० ० \end{matrix} ऐसा हुआ, यहां ऊपर कही हुई रीति के अनुसार फल और मूल्यको पलटा तब \begin{matrix} १ ३० १० \end{matrix} \begin{matrix} १६ ३०० ० \end{matrix} ऐसा हुआ. यहां बहुत राशियोंके घात ४८०० में थोडी राशियोंके घात ३०० का भाग दिया तब १६ सोलह लब्धि हुए, यही १६ दाडिमी दश आमके पलटेमें मिलेंगी. इति लीलावत्यां प्रकीर्णकानि। अथ मिश्रकव्यवहारे करणसूत्रं सार्द्धवृत्तम्- अब मिश्रगणित ( मिश्र उसको कहते हैं जिस गणितमें मिली हुई राशि हों की रीति डेढ़ श्लोकमें लिखते हैं- प्रमाणकालेन हतं प्रमाणं विमिश्रकालेन हतम्फलञ्च ॥ २० ॥ स्वयोगभक्ते च पृथक् स्थिते ते मिश्राहते मूलकलान्तरे स्तः ॥ यद्वेष्टकर्म्माख्यविधेस्तु मूलं मिश्राच्च्युतं तच्च कलान्तरं स्यात्२१ अन्वयः-प्रमाणं प्रमाणकालेन हतम् फलं च विमिश्रकालेन हतं कुर्यात् । ते पृथक् स्थिते मिश्राहते स्वयोगभक्ते च मूलकलान्तरे स्तः । यद्वा इष्टकर्म्माख्यविधेः मूलं मिश्रात् च्युतं तत् कलान्तरं च स्यात् ॥ २० ॥ २१ ॥ अर्थः-प्रमाणको प्रमाण कालसे गुणा करे, फलको मिश्र कालसे गुणा करे और दोनों गुणनफलोंको अलग २ दो स्थानोंमें लिखे. एक स्थानमें दोनोंको मिश्रसे गुणा करे. दूसरे स्थानके गुणन फलोंको जोड कर मिश्रधनसे गुणा किये हुए, दोनोंमें भाग ले तब मूलधन और व्याज निकलता है ॥ २० ॥ अथवा इष्टकर्म्मकी रीति के अनुसार मूल निकाले और उसको मिश्रधनमें घटा दे, तब व्याज निकल आवेगा ॥ २१ ॥ उद्देशकः- उदाहरण- पञ्चकेन शतेनाब्दे मूलं स्वं सकलान्तरम् ॥ सहस्रञ्चेत्पृथक्तत्र वद मूलकलान्तरे ॥ १ ॥ ६ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
( ८२ ) लीलावती। अन्वयः-पञ्चकेन शतेन अब्दे चेत् सकलांतरं मूलं स्वं सहस्रं भवति तत्र मूलक- लान्तरे पृथक् वद ॥ १ ॥ अर्थः-सौ १०० पर यदि एक महीनेमें ५ पांच ब्याज मिलता है और एक वर्षमें ब्याज सहित मूलधन एक सहस्र १००० होता है तो उस सहस्रमें मूलधन कितना है और ब्याज कितना है यह अलग अलग कहो ॥१॥ न्यासः- १/१००/५ | १२/१००० लब्धे क्रमेण मूलकलान्तरे ६२५। ३७५ अथवेष्टकर्म्मणा कल्पितमिष्टं रूपम् १ उद्देश- कालापवद्दिष्टराशिरित्यादिकरणेन रूपस्य वर्षे कला- न्तरम् ३/५ एतद्युतेन रूपेण ८/५ १००० रूपगुणे भक्ते लब्धम् ६२५ मूलधनम् ॥ एतन्मिश्रात् १००० च्युतं कलान्तरम् ३७५ फैलाव-यहां ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार प्रमाण १०० सौ को प्रमाण काल १ एकसे गुणा किया तब १०० सौ ही हुए और मिश्रकाल १२ बारहसे फल ५ पांचको गुणा किया तब ६० साठ हुए. इन दोनों राशियोंको एक जगह लिखा १०० । ६० और इन दोनोंके जोड १६० को दूसरी जगह लिखा फिर अलग २ लिखी हुई जो दोनों १०० । ६० राशि हैं उनको अलग २ मिश्रधन १००० से गुणा किया तब १००००० । ६०००० ऐसा रूप हुआ, इन दोनोंमें पहले दोनों राशियोंके जोडका भाग दिया तब एक जगह पहली राशिमें लब्धि हुआ ६२५ छहसौ पचीस यह तो मूलधन हुआ और दूसरी राशिमें भाग दिया तब लब्धि हुआ ३७५ तीनसौ पिछहत्तर. यह ब्याज हुआ ॥ अथवा इष्ट कर्मको रीतिके अनुसार १ एकको इष्ट माना फिर पञ्चराशिकके रीतिसे इष्ट अङ्क एक १ का ब्याज लिया जैसे १/१००/५ | १२/१/३ यहां इष्ट एकका ब्याज मिला ३/५ तीन ३ के नीचे पांच हर प्रश्नमें मूल और ब्याज मिला हुआ है, इस कारण इष्ट १ एकको भी ब्याज ३/५ में जोड दिया तो ८/५ ऐसा रूप हुआ. इसका इष्ट १ से गुणे हुए दृश्य १००० में भाग लिया तो लब्धि मिला मूलधन ६२५ छ सौ पचीस इसको मिश्रधनमें घटाया तब लब्धि हुआ व्याज ३७५ तीनसौ पिछहत्तर ॥ मिश्रान्तरे करणसूत्रम्- और मिश्रगणित करनेकी रीति लिखते हैं- अथ प्रमाणैर्गुणिताः स्वकाला व्यतीतकालघ्नफलोद्धृतास्ते ॥ स्वयोगभक्ताश्च विमिश्रनिघ्नाः प्रयुक्तखण्डानि पृथग्भवन्ति ॥२२॥
मिश्रव्यवहारः । ( ८३ ) अन्वयः-अथ स्वकालाः प्रमाणैः गुणिताः व्यततिकालाव्रफलोद्धृताः स्वयोगभक्ताश्च ते विमिश्रनिघ्नाः पृथक् प्रयुक्तखण्डानि भवन्ति ॥ २२ ॥ अर्थः-अपने २ प्रमाण धनसे अपने २ प्रमाण कालको गुणाकर उन्होंमें गये हुए अपने अपने कालसे गुणितफलका भाग देकर अलग स्थानमें लिखे और उनके योग को अलग लिखे, फिर बिना योग किये हुए अङ्कोंको मिश्रधनसे अलग २ गुणा करे और पहले जो योग किया है उसका भाग दे जो लब्धि हो वह मिश्र धनके खण्ड हैं जिनका योग सब मिश्रधन है ॥ २२ ॥ उद्देशकः-- उदाहरण- यत्पञ्चकत्रिकचतुष्कशतेन दत्तं खण्डैस्त्रिभिर्गणक निष्क- शतं षडूनम् ॥ मासेषु सप्तदशपंचसु तुल्यमाप्तं खण्डत्र- येऽपि हि फलं वद खण्डसंख्याम् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे गणक ! यत् षडूनं निष्कशंतं त्रिभिः खण्डैः पञ्चकत्रिकचतु ष्कशतेन दत्तम् हि सप्तदशपंचसु मासेषु खण्डत्रयेऽपि फलं तुल्यम् आप्तम् तदा खण्डसंख्यां वद ॥ १ ॥ अर्थः-हे गणितप्रवीण ! यदि एक आदमीके पास ९४ चौरानवे निष्क हैं उसने उसके तीन खण्ड करके ब्याज दिये, उसमें एक खंड पाँच निष्क सैकडे पर दिया वह ७ सात महीने रहा और दूसरा खण्ड ३ तीन निष्क सैकडेपर दिया वह दश १० महीने रहा और तीसरा खण्ड ४ चार निष्क सैंकडेके हिसाबसे दिया वह पांच ५ महीने रहा और तीनों खण्डों का ब्याज बराबर ही मिला तो कहो उन तीनों खण्डोंकी क्या संख्या है ? ॥ १ ॥ न्यासः-- १ ७ | १ १० | १ ५ १०० | १०० | १०० ५ | ३ | ४ मिश्रधनम् ९४ लब्धानि यथाक्रमेण खण्डानि २४ । २८ । ४२ । पञ्चराशिककरणेन समकलान्तरम् ८ फैलाव-इस उदाहरणमें ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार प्रमाणधन १०० । १०० । १०० अपने प्रमाण कालसे १ गुणा किया तो १०० । १०० । १०० हुआ इनमें बीते हुए काल ७ । १० । ५ से अपने २ फल ५ । ३ । ४ (ब्याज) को गुणा किया तब
( ८४ ) लीलावती । हुआ ३५ । ३० । २० इनका भाग दिया तब १००/३५ १००/३० १००/२० ऐसा हुआ. यहां क्रमसे ५ । १० । २० का अपवर्तन दिया तब २०/७ १०/३ ५/१ ऐसा रूप हुआ, इनका समच्छेद करके योग किया तब २३५/२१ ऐसा हुआ, इसको अलग लिखा और जिनका योग किया है उन अङ्कों २०/७ १०/३ ५/१ को अलग २ मिश्र धन ९४ से गुणा किया तब १८८०/७ ९४०/३ ४७०/१ ऐसा रूप हुआ. इनमें योग २३५/२१ का अलग २ भाग लिया तब २४ । २८ । ४२ चौबीस, अट्ठाइस, ब्यालीस तीन खण्ड हुए. अब पंचराशिककी रीतिसे सब राशियोंका ब्याज निकाला अर्थात् १०० सौ निष्कका १ एक महीनेमें ५ पाँच निष्क तो २४ चौबीस निष्कका ७ सात महीनेमें क्या १ १०० २४/५ ७ फल को पलटा तब १ १०० २४/५ ७ ऐसा न्यास होने पर बहुत राशिके घात ८४० आठसौ चालीसमें थोड़ी राशिके घात १०० का भाग दिया तब लब्धि ब्याज ८ २/५ यह हुआ. इसी प्रकार यदि १०० सौका एक महीनेमें ३ निष्क मिलता है तो २८ अट्ठाईसका १० दश महीनेमें क्या १ १०० २८/३ १० फलको पलटा तब १ १०० २८/३ १० ऐसा न्यास होनेपर बहुत राशिक घात ८४० में थोडी राशिके घातका भाग दिया तब लब्धि हुआ ब्याज ८ २/५ वही इसी प्रकार यदि १०० सौका एक महीनेमें ४ चार निष्क तो ४२ बयालीस का ५ पांच महीनेमें क्या १ १०० ४२/४ ५ फलको पलटा तब १ १०० ४२/४ ५ ऐसा न्यास होने पर बहुत राशिके घात ८४० में थोडी राशिके घात १०० का भाग लिया लब्धि वही ८ २/५ हुआ. अथ मिश्रान्तरे करणसूत्रम्- अब और मिश्रगणितकी रीति लिखते हैं, आधे श्लोकमें- प्रक्षेपका मिश्रहता विभक्ताः प्रक्षेपयोगेन पृथक्फलानि ॥ अन्वयः-प्रक्षेपकाः मिश्रहताः प्रक्षेपयोगेन विभक्ताः पृथक् फलानि भवन्ति ॥ अर्थः-अनेक मनुष्य इकट्ठे होकर अपने २ हिस्सेसे व्यवहारमें जो धन लगाते हैं उसको प्रक्षेप कहते हैं और व्यवहार करनेके अनन्तर घटाया, नफा होकर जो इकट्ठा धन होता है उसको मिश्रधन कहते हैं. प्रक्षेपधनोंको अलग २ मिश्रधनसे गुणा करके सब जगे प्रक्षेप धनके जोडका भाग दे तब अलग २ फल मालूम हो जाता है ॥ अत्रोद्देशकः-इस विषयमें उदाहरण- पञ्चाशदेकसहिता गणकाष्टषष्टिः पञ्चोनिता नवतिगदिध- नानि येषाम् ॥ प्राप्ता विमिश्रितधनैस्त्रिशती त्रिभिस्तैर्वा- णिज्यतो वद विभज्य धनानि तेषाम् ॥ १ ॥
अन्वयः-हे गणक ! येषाम् एकसहिता पञ्चाशत् १ । अष्टषाष्टः २ । पञ्चोनिता नवतिः ३ । आदिधनानि सन्ति । तैः त्रिभिः विमिश्रितधनैः वाणिज्यतः त्रिशती प्राप्ता तर्हि तेषां धनानि विभज्य वद ? ॥ १ ॥ अर्थः-हे गणितचातुरीधुरीण ! जिनके ५१ इक्यावन, ६८ अडसठ, ८५ पिच्यासी यह प्रक्षेपधन हैं, उन तीनोंने इकट्ठा धन करके व्यवहार किया तब सब धन उनको ३०० तीनसौ मिला ता उन तीनोंको क्या २ मिला यह अलग २ करके कहो? ॥ १ ॥ न्यासः-प्रक्षेपकाः ५१ । ६८ । ८५ मिश्रधनम् ३०० जातानि धनानि ७५ । १०० । १२५ एतान्यादिधनैरुनानि लाभाः २४ । ३२ । ४० अथवा-मिश्रधनम् ३०० आदिधनैक्येन २०४ ऊनं सर्वलाभयोगः ९६ अस्मिन्प्रक्षेपगुणिते प्रक्षेपयोग २०४ भक्ते लाभाः २४ । ३२ । ४० । फैलाव-यहां तीन वणिक् हैं उनका अलग २ धन ( प्रक्षेपधन ) ५१ । ६८ । ८५ इकावन, अडसठ, पिच्यासी है और मिश्रधन ३०० तीनसौ है इसी मिश्रधनसे प्रक्षेप- धनोंको अलग २ गुणा किया तब १५३०० । २०४०० । २५५०० ऐसा होनेपर प्रक्षेपधनोंके योग २०४ दोसौ चारसे तीनों जगह भाग दिया तब ७५ । १०० । १२५ पिछहत्तर, सौ, एकसौ पच्चीस यह क्रमसे तीनों जगह गुणनफल हुआ इनमें क्रमसे तीनोंको व्यवहार करके ७५ । १०० । १२५ । मिला. इन तीनों राशियोंमें क्रमसे प्रक्षेप धन ५१ । ६८ । ८५ को घटाया तब क्रमसे २४ । ३२ । ४० लाभ हुआ ॥ अथवा मिश्रधन ३०० में प्रक्षेप (आदि) धनोंके योगको घटाया तब सबको मिलकर ९६ छियानवे लाभ हुआ, इसको प्रक्षेपधनोंसे अलग २ गुणा किया तब क्रमसे ४८९६ । ६५२८ । ८१६० हुआ. यहां तीनों जगह प्रक्षेप योग २०४ का भाग लिया तब तीनोंको क्रमसे २४ । ३२ । ४० लाभ हुआ. इन तीनोंको जोडा तो वही मिलकर तीनों ९६ छियानवे लाभ हुआ. वाप्यादिपूरणे करणसूत्रं वृत्तार्द्धम्- अब फुहारोंके द्वारा हौज, वापी पूरा होनेकी रीति आधे श्लोकमें लिखते हैं- भजेच्छिदोंशै रथ तैर्विमिश्रै रूपं भजेत्स्यात्परिपूतिकालः ॥ २३ ॥
( ८६ ) लीलावती । अन्वयः–छिदः अंशैः विभजेत् । अथ तैः विमिश्रैः रूपं विभजेत् । तदा परिपू- र्तिकालः स्यात् ॥ २३ ॥ अर्थः–हरोंमें अंशोंका भाग दे, फिर हरोंमें भाग देनेसे जो लब्धि हुई है, उनका योग करके उस योगका एक १ में भाग दे तब भर जानेका समय लब्धि होता है ॥ २३ ॥ उदाहरणम्– ये निर्झरा दिनदिनार्द्धतृतीयषष्ठैः संपूरयन्ति हि पृथक्पृ- थगेव मुक्ताः ॥ वापीं यदा युगपदेव सखे विमुक्तास्ते केन वासरलवेन तदा वदाशु ॥ १ ॥ अन्वयः–हे सखे ! ये निर्झराः पृथक्पृथक् एव मुक्ता हि दिनदिनार्द्धतृतीयषष्ठैः वापीं संपूरयन्ति ते युगपत् एव विमुक्ताः तदा केन वासरलवेन वापीं पूरयंति इति आशु वद ? ॥ १ ॥ अर्थः–हे मित्र ! तीन झरने ( फुहारे ) हैं वह अलग २ छोडनेसे वापी ( हौज ) को एक तो एक दिनमें भरता है, दूसरा आधे दिनमें भरता है, तीसरा दिनके तीसरे भागमें, भरता है, चौथा दिनके छठे भागमें भरता है, यदि उनको एक साथ छोड़ दें तो वह चारों फुहारे मिलकर वापीको ( हौजकों ) कितनी देरमें भरेंगे सो जल्दी कहो ? ॥ १ ॥ न्यासः– १/१ १/२ १/३ १/६ लब्धो वापीपरिपूृतिकालो दिनांशाः १/१२ फैलाव–यहां चारों फुहारे दिनके १/१ १/२ १/३ १/६ इन भागोंमें पूरा करते हैं. ऊपर कही हुई रीतियोंके अनुसार अंशोंका हरोंमें भाग दिया तब क्रमसे १/१ २/१ ३/१ ६/१ इनका योग किया तो १२/१ ऐसा रूप हुआ, इसका रूप ( एक १ ) में भाग लिया तब १/१२ एकके नीचे बारह हर लब्धि हुआ, यही उत्तर है. अर्थात् सब फुहारे मिलके एक दिनके बारहवें अंशमें ( एक घंटेमें ) हौजको भर देंगे ॥ अथ क्रयविक्रये करणसूत्रं वृत्तम्– अब वस्तु मोल लेना अथवा बेचना इसकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं– पण्यैः स्वमूल्यानि भजेत्स्वभागैर्हत्वा तदैक्येन भजेच्च तानि ॥ भागांश्च मिश्रेण धनेन हत्वा मौल्यानि पण्यानि यथाक्रमं स्युः ॥ २४ ॥ CC-0. Late Pt. Manmohan Shastri Collection Jammu. Digitized by eGangotri
क्रयावक्रयव्यवहारः। (८७) अन्वयः-स्वमूल्यानि स्वभागैः हत्वा पण्यैः विभजेत् तानि भागान् च मिश्रधनेन हत्वा तदैक्येन विभजेत् तदा यथाक्रमं मौल्यानि पण्यानि च स्युः ॥ २४ ॥ अर्थः-अपने २ मूल्योंको अपने २ भागोंसे गुणा करे और उन गुणा किये हुए अंकोंमें जो वस्तु बेची जाय उसकी तोलका भाग ले, भाग लेनेसे जो राशि आवे उनको दानमें अलग २ लिखे; फिर एक १ जगहका योग करे, दूसरी जगहके अंकोंको विना योग किये लिखा रहने दे.फिर जिनका योग नहीं किया है, उनको अलग २ मिश्रधनसे गुणा करे और जोडे हुए अङ्कोंसे भाग ले तो उन वस्तुओंका अलग २ मूल्य मालूम होगा. फिर भागोंको मिश्रधनसे गुणा करके उसी योगका भाग दे तब अलग २ तोल मालूम होगी ॥ २४ ॥ उद्देशकः- उदाहरणः- सार्द्धं तण्डुलमानकत्रयमहो द्रम्मेण मानाष्टकं मुद्गानाञ्च यदि त्रयोदशमिता एता वणिक्काकिणीः ॥ आदायार्पय तण्डुलां शयुगलं मुद्रैकभागान्वितं क्षिप्रं क्षिप्रभुजो व्रजेमहि यतः सार्थोऽग्रतो यास्यति ॥ १ ॥ अन्वयः-अहो वणिक् ! यदि सार्द्धं तण्डुलमानकत्रयम् मुद्गानां च मानाष्टकं द्रम्मेण लभ्यते तर्हि एताः त्रयोदश मिताः काकिणीः आदाय मुद्रैकभागान्वितं तण्डुलांशयुगलं क्षिप्रम् अर्पय वयं हि क्षिप्रभुजः व्रजेमहि यतः सार्थः अग्रतः यास्यति ॥ १ ॥ अर्थः-हे वैश्यवर्य्य ! साढे तीन ३ १/२ मान चावल और मूंग ८ आठ मान १ द्रम्मकी आती है, तो यह १३ तेरह काकिणी लो और दोनों वस्तु दो, परन्तु मूगका एक भाग हो और चावल दो २ भाग हों. ( जल्दी दो क्योंकि हम जल्दी भोजन बना खाकर चले जायँ नहीं तो संगके आदमी आगे चले जायँगे. ) तो कहो उस वणिकने मूंग कितनी दी और चावल कितने दिये और उनका अलग २ मोल क्या हुआ ? ॥ १ ॥ न्यासः-पण्ये ७/२, ८; मौल्ये १/१, १/१; स्वभागौ २/१, १/१; मिश्र- धनम् १३/६४ अत्र स्वमूल्ये स्वभागगुणिते पण्याभ्यां भक्ते जाते ४/७, १/८ भागौ च २/१, १/१ मिश्रधनेन १३/६४ संगुण्य भक्ते जाते तण्डुलमुद्गमूल्ये १/६, १/१२८ तथा तण्डुलमुद्गमाने भागौ
$\frac{७}{९}$ $\frac{७}{१८}$ अत्र तण्डुलमूल्ये पणौ २ काकिण्यौ २ वराटकाः १३ $\frac{१}{३}$ मुद्गमूल्ये काकिण्यौ २ वराटकाः ३ $\frac{२}{३}$ ॥ फैलाव-अपने २ मूल्यों $\frac{१}{१}$ $\frac{१}{१}$ को अपने २ भागों $\frac{२}{१}$ $\frac{१}{१}$ से गुणा किया अर्थात् चावलोंके मूल्य $\frac{१}{१}$ को चावलोंके भाग $\frac{२}{१}$ से गुणा किया तब $\frac{२}{१}$ ऐसा रूप हुआ और मूंगके मूल्य $\frac{१}{१}$ को मूंगके भागसे $\frac{१}{१}$ गुणा किया तब $\frac{१}{१}$ ऐसा रूप हुआ. इस प्रकार अपने २ मूल्यको अपने २ भागोंसे गुणा करनेपर $\frac{२}{१}$ $\frac{१}{१}$ ऐसा रूप हुआ. अब इनमें अपनी २ तोलका भाग दिया अर्थात् $\frac{२}{१}$ में चाव- लोंकी तोल $\frac{३}{१}$ का भाग दिया तब $\frac{२}{३}$ ऐसा रूप हुआ और $\frac{१}{१}$ में मूंगकी तोल $\frac{२}{१}$ का भाग दिया तब $\frac{१}{२}$ ऐसा रूप हुआ, इस प्रकार दोनों स्थानोंमें भाग देनेसे $\frac{२}{३}$ $\frac{१}{२}$ ऐसा रूप हुआ. इनको दो जगह लिखा फिर एक जगह लिखा फिर एक जगह दोनों $\frac{२}{३}$ $\frac{१}{२}$ राशियोंका योग कर लिया और एक जगह वैसा ही रहने दिया. जहां योग किया वहां $\frac{७}{६}$ ऐसा रूप हुआ, बिना योग किये हुए दोनों राशियों $\frac{२}{३}$ $\frac{१}{२}$ को मिश्रधन $\frac{१३}{८}$ से गुणा किया तब $\frac{५२}{२४८}$ $\frac{१६}{१२१}$ ऐसा रूप हुआ. इन दोनों राशियोंमें पहले जो योग $\frac{७}{६}$ कर आये हैं, उसका भाग लिया तो क्रमसे लब्धि हुआ $\frac{७}{९}$ $\frac{७}{१८}$ यह क्रमसे चावल और मूंगका द्रम्मरूप मोल हुआ, अर्थात् २ दो भाग चावलका मोल दो २ पण २ काकिणी १३ तेरह वराटक और वराटकका तृतीयांश $\frac{१}{३}$ हुआ और एक भाग मूंगका मूल्य २ दो काकिणी ६ छ वराटक और दो वराटकका तीसरा भाग $\frac{२}{३}$ हुआ, फिर उपरोक्त रीति के अनुसार चावल और मूंगके भागों $\frac{२}{१}$ $\frac{१}{१}$ को मिश्र धन $\frac{१३}{६४}$ से गुणा किया तो हुए $\frac{२६}{६४}$ $\frac{१३}{६४}$ इनमें ऊपर जो योग $\frac{७}{६}$ किया था उसका भाग लिया तब क्रमसे चावल और मूंग तोलमें $\frac{७}{१२}$ $\frac{७}{२४}$ मान मिलेगा ॥
उदाहरणम्- दूसरा उदाहरण- कर्पूरस्य वरस्य निष्कयुगलेनै कं पलं प्राप्यते वैश्यानन्दन चन्दनस्य च पलं द्रम्माष्टभागेन चेत् ॥ अष्टांशेन तथाऽगुरोः पलदलं निष्केण मे देहि तान् भागैरेककषोडशाष्टकमितैर्धूपं चिकीर्षाम्यहम् ॥ २ ॥ अन्वयः- हे वैश्यानन्दन ! चेत् वरस्य कर्पूरस्य एकं पलं निष्कयुगलेन प्राप्यते । चन्दनस्य च पलं द्रम्माष्टभागेन प्राप्यते । तथा अष्टांशेन अगुरोः पलदलं प्राप्यते
क्रयविक्रयव्यवहारः । (८९) तर्हि तान् एककषोडशाष्टकमितैः भागैः मे निष्केण देहि । यतः अहं धूप चिकीर्षामि ॥ २ ॥ अर्थः-हे अपनी माताको आनन्द देनेवाले वैश्यकुमार ! यदि सुन्दर कर्पूर एक पल २ दो निष्कका मिलता है और चन्दन एक पल द्रम्मके आठवें भाग १/८ का मिलता है और अगर १/२ आधा पल द्रम्मके आठवें भागमें मिलता है तो इन सब वस्तुओंको अर्थात् कपूर १ एक भाग चन्दनके १६ सोलह भाग अगरके ८ आठ भाग एक निष्कसे मुझको दो क्योंकि मुझको धूप करनेकी इच्छा है ॥ २ ॥ (यहां बताओ कि, तीनों चीजें तोलमें कितनी २ मिलेंगी और उनका अलग २ क्या मोल होगा ? ) न्यासः-पण्यानि १/१ १/१ १/२ मूल्यानि ३२/१ १/८ १/८ भागाः १/१ १६/१ ८/१ मिश्रधनम् द्रम्माः १६ लब्धानि कर्पूरादीनां मूल्यानि १४ २/६ ६/६ ६/६ तथैव तेषां पण्यानि ७/१६ ७/१६ ३/२ ॥ फैलाव- कर्पूर. चन्दन. अगर. मिश्रधन मोल ३२/१ भाग १/१ मोल १/८ भाग १६/१ मोल १/८ भाग ८/१ १६ पल १/१ पल १/१ पल १/२ यहाँ अपने २ मूल्यको अपने २ भागोंसे उपरोक्त रीति के अनुसार गुणा किया अर्थात् कर्पूरके मूल्य ३२/१ का अपने भाग १/१ स गुणा किया तब ३२/१ ऐसा रूप हुआ. फिर चन्दनके मूल्य १/८ को अपने भाग १६/१ स गुणा किया तब २/१ ऐसा रूप हुआ और अगरके मूल्य १/८ का अपने भाग ८/१ से गुणा किया तब ८/६४ ऐसा रूप हुआ. इस प्रकार तीनोंके मूल्योंको अपने २ भागोंसे गुणा करनेसे ऐसा ३२/१ २/१ १/१ रूप हुआ. इनमें अपनी २ तोलका भाग लिया अर्थात् ३२/१ में अपनी तोल १/१ का भाग लिया तब ३२/१ ऐसा रूप हुआ. २/१ में अपनी तोल १/१ का भाग लिया तब २/१ ऐसा स्वरूप हुआ. १/१ में अपनी तोल १/२ का भाग देनेसे २/१ ऐसा रूप हुआ. इस प्रकार तीनों राशिमें अपनी २ तोलका भाग देनेसे ३२/१ २/१ २/१ ऐसा स्वरूप हुआ, इनको दो जगह अलग २ लिखा, एक जगह तीनों राशिका योग कर लिया और एक जगह वैसा ही रहने दिया. जहाँ योग किया वहा ३६/१ ऐसा रूप हुआ, फिर बिना योग करी हुई जो राशि १ ३२/१ २/१ २/१ ह उनको मिश्रधन १६/१ द्रम्मसे अलग २ गुणा किया, तब ५१२/१ ३२/१ ३२/१ ऐसा रूप हुआ, इनमें ऊपर जो योग ३६/१ कर आये हैं उसका अलग २ भाग लिया.
( ९० ) लीलावती । तब लब्धिका १२८/१ ६/१ ६/१ ऐसा रूप हुआ. इस प्रकार कर्पूर चन्दन, अगर इनका क्रमसे १४ ३/१ ६/१ ६/१ इतना द्रम्म मूल्य हुआ, फिर कर्पूर चन्दन, अगर इन तीनोंके भागों १/१ १६/१ ५/१ को मिश्रधन १६/१ से गुणा किया तब १६/१ २५६/१ १२८/१ ऐसा रूप हुआ. इनमें ऊपर जो योग किया था ३६/१ उसका भाग दिया तब लब्धिका ५/१ ६४/१ ९ ऐसा रूप हुआ इस प्रकार कर्पूर चन्दन अगर इनकी क्रमसे ५/१ ७ ३/१ ३ ५/१ इतना पल तोल हुआ यही मिलेगा. रत्नमिश्रीकरणसूत्रं वृत्तम्- रत्नोंके विषयकी मिश्र गणित करनेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- नरघ्नदानोनितरत्नशेषैरिष्टे हते स्युः खलु मूल्यसंख्याः ॥ शेषैर्हते शेषवधे पृथकस्थैरभिन्नमूल्यान्यथवा भवन्ति॥ २५॥ अन्वयः-खलु नरघ्नदानोनितरत्नशेषैः इष्टे हते मूल्यसंख्या स्युः । अथवा शेषवधे पृथक्स्थैः शेषैः हते अभिन्नमूल्यानि भवन्ति ॥ २५ ॥ अर्थः- (जहां मनुष्योंका अपने पदार्थोंके परस्पर अलटे पलटे समान धन कहा हो) तहां मनुष्योंकी संख्यासे गुणी हुई दानकी संख्याके घटानेसे जितने २ रत्न शेष रहें उनका अलग २ इष्ट अङ्कमें भाग ले तब जो जो लब्धि होगी वही निश्चय करके प्रति २ रत्नका मोल होगा. अथवा-सब जो शेष रहें उन सबको परस्पर गुणा करके जो राशि हो उसमें शेष अङ्कोंका अलग २ भाग दे तब प्रति २ रत्न का मोल लब्धि मिलेगा ॥ २५ ॥ अत्रोद्देशकः-इस विषयका उदाहरण- माणिक्याष्टकमिन्द्रनीलदशकं मुक्ताफलानां शतं सद्रत्नानि च पञ्च रत्नवणिजां येषां चतुर्णां धनम् ॥ संगस्नेहवशेन ते निजधनाद्दत्त्वैकमेकं मिथो जातास्तुल्यधनाः पृथग्वद सखे तद्रत्नमूल्यानि मे ॥१॥ अन्वयः- हे सखे ! येषां रत्नवणिजां माणिक्याष्टकम् इन्द्रनीलदशकम् मुक्ताफलानां शत सद्रत्नाणि च पञ्च चतुर्णां धनम् आसीत् ते सङ्गस्नेहवशेन निजधनात् एकम् एकम् मिथः दत्त्वा तुल्यधनाः जाताः तर्हि रत्नमूल्यानि मे पृथक् वद ॥ १ ॥
रत्नमिश्रकव्यवहारः । (९१) अर्थः-हे मित्र ! जिन रत्नोंके व्यापार करनेवाले चार पुरुषोंका क्रमसे ८ आठ माणिक १० दश इन्द्रनीलमणि १०० सौ मोती ५ पांच सुन्दर हीरे यह धन था. उन्होंने मार्गमें स्नेह होनेसे अपने २ धनमेंसे आपसमें एक २ रत्न दिया तब उन सबके पास तुल्य मूल्यका धन हो गया तौ कहो माणिक आदि प्रति रत्नका क्या मोल होगा ? ॥ १ ॥ न्यासः--मा० ८ नी० १० मु० १०० व० ५ । दानम् १ नराः ४ । नरगुणितदानेन ४रत्नसंख्यासूनितासु शेषाणि मा० ४। नी० ६। मु० ९६ । व० १ एतैरिष्टराशौ भक्ते रत्नमूल्यानि स्यु रिति । तानि च यथाकथंचिदिष्टे कल्पिते भिन्नानि ॥ अत्रेष्टं स्वधिया कल्प्यते तथाऽत्रापीष्टं कल्पितम् ९६ ॥ अतो जातानि मूल्यानि २४ । १६ । १ । ९६ समधनम् २३३ । अथवा शेषाणां घाते २३०४ पृथक् शेषैर्भक्ते जातान्यभिन्नानि ५७६। ३८४ । २४ । २३०४ । जनानां चतुर्णां तुल्यधनम् ५५९२ तेषामैते द्रम्माः सम्भाव्यन्ते ॥ फैलाव-यहाँ व्यापारियोंने एक १ रत्न देकर पलटा किया वही एक रत्नदान है और मनुष्य चार ४ हैं, इस कारण मनुष्योंकी संख्या ४ से दानकी संख्या १ को गुणा किया तब ४ चार हुए. इनको सबके रत्नोंमेंसे घटाया तो बचे मा० नी० मु० $ \hspace{19em}४\hspace{1.5em}६\hspace{1.5em}९६$ हीरा इनका अलग २ इष्ट ९६ छियानवे मानकर उसमें भाग दिया तब क्रमसे एक $ \hspace{0.5em}१$ २ माणिक आदिका मोल हुआ. मा० नी० मु० ही० इस प्रकार आपसमें एक २ $ \hspace{11em}२४\hspace{1.5em}१६\hspace{1.5em}१\hspace{1.5em}९६$ रत्न पलट लेनेसे सबका धन बराबर हो जाता है, क्योंकि माणिकवालेके पास पाँच ५ माणिक एक १ नीलमणि, १ एक मुक्ता १ एक हीरा है. ऊपर १ माणिकआदि सबका मोल बता आये हैं, उसी हिसाबसे जोडा. अर्थात् ५ पाँच माणिकका मोल १२० एकसौ बीस द्रम्म हुए और एक नीलमणिका मोल १६ सोलह द्रम्म हुआ और एक १ मुक्ताका १ एक द्रम्म हुआ. १ एक हीरेके ९६ छियानवे द्रम्म हुए, सबको जोडा तब २३३ दोसौ तैंतीस द्रम्म हुये. इसी प्रकार दूसरेके पास एक १ माणिक सात ७ नीलमणि एक १ मुक्ता एक १ हीरा है, तीसरेके पास एक १
( ९२ ) लीलावती । माणिक एक १ नीलमणि सतानवे ९७ मुक्ता एक १ हीरा है. चौथेके पास एक १ माणिक एक १ नीलमणि एक १ मोती दो २ हीरा है सबका उपरोक्त मूल्यके अनु- सार जोडनेसे समधन २३३ दोसौ तैंतीस होता है जैसा कि आगे यंत्रमें लिखा है
व्यौपारी. | पहला | दूसरा | तीसरा | चौथा माणिक. | ५ | १ | १ | १ नीलमणि. | १ | ७ | १ | १ मुक्ताफल. | १ | १ | ९७ | १ हीरा. | १ | १ | १ | २
| | पहला | दूसरा | तीसरा | चौथा | माणिक. एकका मू० २४ | संख्या. मूल्य. ५ १२० | संख्या. मूल्य. १ २४ | संख्या. मूल्य. १ २४ | संख्या. मूल्य. १ २४ | नीलमणि. एकका मू० १६ | सं० मू० १ १६ | सं० मू० ७ ११२ | सं० मू० १ १६ | सं० मू० १ १६ | मुक्ताफल. एकका मू० १ | सं० मू० १ १ | सं० मू० १ १ | सं० मू० ९७ ९७ | सं० मू० १ १ | हीरा. एकका मू० ९६ | सं० मू० ९६ | सं० मू० १ ९६ | सं० मू० १ ९६ | सं० मू० २ १९२ | सबका जोड. | २३३ | २३३ | २३३ | २३३ |
इस उदाहरणमें इष्ट कल्पना करना अपनी बुद्धिके अनुसार लिखा है. उसकी रीति यह है कि, रत्नोंमें मनुष्य संख्यासे गुणा करी हुई दोकी संख्या घटाकर जो रत्न शेष रहें उनमेंसे पहली दो राशियोंमें किसी अंकका परिवर्तन लगे तो दे ले. परिवर्तन देनेसे जो अंक आवे उनको परस्पर घात कर ले. घात करनेसे जो अंक आवें उनको जिस अंकका परिवर्तन दिया हो उससे गुणा करे. फिर जो अंक हो उसका एक राशि शोषित रत्नोंमेंकी दोनोंको किसी अंकका परिवर्तन लग सके तो दे, परिवर्तन देनेसे जो अंक आवे उनका परस्पर घात करे और जिस अंकका परिवर्तन दिया हो, उससे गुणा करे, इसी प्रकार जितनी राशि हों, सबसे इसी
रीतिसे क्रिया करे. यदि किसीका परिवर्तन न लग सकता हो तो दोनों राशियोंका ही परस्पर घात कर ले और उसीको एक राशि मान ले जैसा कि इसी उदा- हरणोंमें मनुष्योंकी संख्या ४ से गुणित रत्नोंकी संख्या ४ को रत्नोंमें घटानेसे ४, ६, १, ९६ यह राशियें होती हैं. यहां पहली दो २ राशियें ४, ६ में दो २ का परि- वर्तन दिया तब २, ३ ऐसा स्वरूप हुआ. इन दोनों अंकोंका परस्पर घात किया तब ६ छ हुआ, इसको परिवर्तन अंक २ दोसे गुणा किया तब १२ बारह हुए. अब १२ को एक राशि माना और एकराशि शेषत रत्नोंमें १ क ली, तब १२, १ एक ऐसा स्वरूप हुआ. यहां किसीका परिवर्तन नहीं लग सकता. इस कारण दोनों राशियोंके घात १२ को ही एक राशि माना और एक शेषत रत्नोंमेंकी ९६ ली. तब १२, ९६ ऐसा स्वरूप हुआ. यहां १२ बारहका परिवर्तन दिया तब १, ८ ऐसा स्वरूप हुआ. यहां दोनों राशियोंका घात ८ आठ हुआ, इसको परिवर्तक अङ्क १२ से गुणा किया तब ९६ छियानवे हुआ. अब वोही शेषत राशि नहीं रही इस कारण यही ९६ इष्ट है इसी पर उपरोक्त क्रिया करनेसे उत्तर मिलेगा ॥ अथवा-शेष अङ्कों ४ । ६ । १ । ९६ का घात करके उसको इष्ट माना २३०४ इसमें अलग २ शेषोंका भाग लिया तब भी प्रतिरत्नका मूल्य मिला. ५७६ । ३८४। २४ । २३०४ । इस रीतिसे सबका समान धन अलग २ पाँच हजार पांचसौ बानवे ५५९२ होता है ॥ अथ सुवर्णगणिते करणसूत्रं वृत्तम्- अब सुवर्णके विषयमें मिश्रगणित करनेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं. सुवर्णवर्णाहतियोगराशौ स्वर्णैक्यभक्ते कनकैक्यवर्णः ॥ वर्णो भवेच्छोधितहेमभक्ते वर्णोद्धृते शोधितहेमसंख्या ॥ २६ ॥ अन्वयः-सुवर्णवर्णाहतियोगराशौ स्वर्णैक्यभक्ते कनकैक्यवर्णः स्यात्। शोधितहेमभक्ते वर्णः स्यात् । वर्णोद्धृते शोधितहेमसंख्या भवेत् ॥ २६ ॥ अर्थः-सुवर्णकी तोलको अपने २ वर्ण ( प्रमाण जितनेका हो उस धनसे ) गुणा करे. फिर गुणा करनेसे जो गुणनफल हो उनको जोड ले उसमें सब सुवर्णोंकी तोलके योगका भाग दे तब जो लब्धि हो, वह सब मिले हुए सुवर्णका एक भाव होता है और यदि उसी वर्ण और तोलके घातयोगमें शोधे हुए सुवर्णका भाग दे तब पहले वर्णकी संख्या मालूम होती है और यदि वर्णका भाग ले तब शोधे हुए (जिसको शोधा है उसकी ) सुवर्णकी तोल मालूम होती है ॥
(९४) लीलावती। उदाहरणानि- विश्वार्कुरुद्रदशवर्णसुवर्णमाषा दिग्वेदलोचनयुगप्रमिताः क्रमेण ॥ आवर्णितेषु वद तेषु सुवर्णवर्णं तूर्णं सुवर्णगणि- तज्ञ वणिग्भवेत्कः ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सुवर्णगणितज्ञ ! वणिक् ! विश्वार्कुरुद्रदशवर्णसुवर्णमाषाः क्रमेण दिग्वेदलोचनयुगप्रमिताः संति तेषु आवर्तितेषु सुवर्णवर्णं तूर्णं वदकः भवेत् ? ॥१॥ अर्थः-हे सुवर्णके गणितमें प्रवीण वैश्य ! १३ तेरह १२ बारह ११ ग्यारह दश १० के वर्ण ( भाव ) के सुवर्णके क्रमसे १० दश ४ चार दो २ चार ४ मासे हैं अर्थात् तेरहके भावका सुवर्ण दश १० मासे हैं, बारह १२ के भावका चार ४ मासे हैं ग्यारह ११ के भावका २ दो मासे हैं दश १० के भावका चार ४ मासे हैं इन सब सुवर्णोंको मिलाकर गला लिया तब क्या भावका होगा ? यह शीघ्र कहो ॥ १ ॥ ते शोधने यदि च विंशतिरुक्तमाषाः स्युः षोडशाशु वद वर्ण- मितिस्तदा का॥ चेच्छोधितं भवति षोडशवर्णहेम ते विंशतिः कति भवन्ति तदा तु माषाः ॥२ ॥ अन्वयः-ते विंशतिः उक्तमाषाः शोधने यदि षोडश स्युः तदा का वर्णमितिः स्यात् इति आशु वद । चेत् ते विंशतिः शोधितं षोडशवर्णहेम भवति तदा कति माषाः भवन्ति ? ॥ २ ॥ अर्थः-वही पहले कहे हुए बीस २० मासे यदि शोधनेसे सोलह १६ मासे रह गया तो सुवर्ण किस वर्ण ( भाव ) का होगा ? यह शीघ्र कहो और यदि वही बीस २० मासे सुवर्ण गलानेसे सोलह १६ के भावका हो जाय तो कितने मांसे रहेगा ? ॥ २ ॥ न्यासः-- १३/१० १२/४ ११/२ १०/४ जाता आवर्तिते सुवर्णवर्णमितिः १२ ॥ एत एव यदि शोधिताः सन्तः षोडश माषाः भवन्ति तदा वर्णः १५ । यदि तदेव शोधितं षोडशवर्णं स्वर्णं भवति तदा पञ्चदश १५ माषा भवन्ति ॥
फैलाव-यहां ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार सुवर्णकी तोलको अपने २ वर्ण (भाव) से गुणा किया तब क्रमसे गुणनफल १३०, ४८, २२, ४० यह हुआ, इनका योग (जोड) किया तब दोसौ चालीस २४० हुआ, इसमें सुवर्णके तोलका योग २० का भाग लिया तब १२ बारह लब्धि हुआ यही सब सुवर्णको गलाकर सबको एक भाव होगा. और जहाँ वही बीस २० मासे सुवर्ण गलानस १६ सोलह मासे रहा. वहाँ ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार उसी सुवर्णके तोल और वर्णके घात योग २४० में शोधनेसे जो सुवर्णके तोल १६ रही है उसका भाग दिया तब १५ लब्धि हुआ यही शुद्ध हुए सुवर्णका भाव होगा ॥ और जहाँ वही बीस २० मासे सुवर्ण गलानेस १६सोलहके भावका हो जाता है वहां ऊपर कही हुई रीतिके अनुसार उसी सुवर्णके तोल और वर्णके घातयोग २४० म शुद्ध करनेपर जो वर्ण (भाव) हुआ. १६ उसका भाग लिया तब १५ पन्द्रह लब्धि हुआ. यही शुद्ध सुवर्णकी तोल रहेगी ॥ अथ वर्णज्ञानाय करणसूत्र वृत्तम्- जिन वर्णोंके मिलानेसे एक वर्ण हुआ है उनमेंसे जिस वर्णको नहीं जानते हैं उसके जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- स्वर्णैक्यनिघ्नाद्युतिजातवर्णात्सुवर्णतद्वर्ण वधैक्यहीनात् ॥ अज्ञातवर्णाभ्रिजसंख्ययाप्तमज्ञातवर्णस्य भवेत्प्रमाणम् ॥२७॥ अन्वयः-द्युतिजातवर्णात् स्वर्णैक्यनिघ्नात् सुवर्णतद्वर्णवधैक्यहीनात् अज्ञातवर्णा- भिजसंख्यया यत् आप्तं तत् अज्ञातवर्णस्य प्रमाणं भवेत् ॥ २७ ॥ अथः-अनेक प्रकारके सुवर्ण मिलानेसे जो वर्ण (भाव) होता है वह युतिजात वर्ण कहा जाता है, उस युतिजात वर्णको सोनेकी तोलके योग (जोड) से गुणा करके उसमें सोनेकी तोल और वर्ग इनके घात योगको घटा दे जो शेष रहे उसमें उस सुवर्णकी तोलका भाग दे जिसका वर्ण नहीं जानते हैं उसका भाग देनेसे जो लब्धि हो वही उसी वर्णकी संख्या है. जिसकी संख्या नहीं जानते हैं ॥ २७ ॥ उदाहरणम्- दशेशवर्णा वसुनेत्रमाषा अज्ञातवर्णस्य षडेतदैक्ये ॥ जातं सखे द्वादशकं सुवर्णमज्ञातवर्णस्य वद प्रमाणम् ॥ १ ॥ अन्वयः-हे सखे ! वसुनेत्रमाषाः दशेशवर्णाः सन्ति । अज्ञातवर्णस्य षट् माषाः सन्ति । एतदैक्ये द्वादशकं सुवर्णं जातम् तर्हि अज्ञातवर्णस्य प्रमाणं वद ? ॥ १ ॥
( ९६ ) लीलावती । अर्थः-हे मित्र ! आठ ८ और दो २ मासे सुवर्ण दश १० और ग्यारह ११ के वर्ण ( भाव ) का है और जिसका भाव नहीं जानते वह सुवर्ण ६ छ मासे है और सबको मिलाकर गलानेसे एक भाव १२ बारह होता है तो जिसका वर्ण ( भाव ) नहीं जानते हैं उसका क्या भाव होगा ? सो कहो ॥ १ ॥ न्यासः- $\begin{matrix} १० & ११ & ० ८ & २ & ६ \end{matrix}$ लब्धमज्ञातवर्णमानम् १५ ॥ फैलाव-यहां युतिजातवर्ण ( सब सुवर्णोंको मिलाकर गलानेसे जो भाव हुआ ) बारह १२ हैं, उसको सुवर्णकी तोलके योग ( जोड ) १६ सोलह १६ से गुणा किया तब १९२ एक सौ बानवे हुए. इसमें १९२ सुवर्णकी तोलको अपने २ वर्णसे गुणा करके ८० । २२ जो योग ( जोड ) १०२ हुआ उसको घटाया तब नव्वे ९० बचे इसमें अज्ञात वर्ण सुवर्णकी तोल ६ का भाग दिया तब १५ पन्द्रह लब्धि हुआ, यही उस सुवर्णका वर्ण ( भाव) है. जिसका वर्ण नहीं जानते थे. क्योंकि पहले कही हुई रीति के अनुसार अब सुवर्णकी तोलोंको अपने २ वर्णसे गुणा किया तब क्रमसे ८०, २२, ९० यह गुणनफल हुए. इनका योग किया तब १९२ एकसौ बानवे हुए, इसमें सुवर्णकी तोल ८, २, ६ के जोड. १६ का भाग देनेसे वही १२ बारह लब्धि युतिजातवर्ण मालूम हो जाता है ॥ सुवर्णज्ञानाय करणसूत्रं वृत्तम्- जिन वर्णोंके मिलानेसे एक वर्ण हुआ है; उनमेंसे जिसकी तोल नहीं जानते हैं उसकी तोल जाननेकी रीति एक श्लोकमें लिखते हैं- स्वर्णैक्यनिघ्नो युतिजातवर्णः स्वर्णघ्नवर्णैक्यवियोजितं च ॥ अहेमवर्णाङ्घ्रिजयोगवर्णविश्लेषभक्तोऽविदिताङ्घ्रिजं स्यात्॥२८॥ अन्वयः-युतिजातवर्णः स्वर्णैक्यनिघ्नः स्वर्णघ्नवर्णैक्यवियोजितं च अहेमवर्णाङ्घ्रि जयोगवर्णविश्लेषभक्तः अविदिताङ्घ्रिजं स्यात् ॥ २८ ॥ अर्थः-युतिजातवर्ण ( सब सुवर्णोंको मिलाकर गलानेसे जो भाव हुआ है ) को सब सुवर्णकी योगसे गुणा करे. फिर जो गुणनफल हो उसमें जिन सुवर्णोंका वर्ण मालूम है उन सुवर्णोंकी तोलको अपने २ भावसे गुणा करके जो योग हो उसको घटा दे जो शेष रहे उसमें जिस सुवर्णका तोल नहीं मालूम है उसका वर्ण और युतिजातवर्ण इनका अन्तर करनेसे जो शेष रहे, उसका भाग देनेसे जो लब्धि हो वही उस तोलकी संख्या है, जिस तोलको नहीं जानते थे ॥ २८ ॥