माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( २७० ) माधवनिदान ।
( २७० ) माधवनिदान । वातविस्फोटकके लक्षण । शिरोरुक्छूलभूयिष्ठं ज्वरतृट्पर्वभेदनम् । सुकृष्णवर्णता चेति वातविस्फोटलक्षणम् ॥ ४ ॥ मस्तकमें पीडा, शूल, देहमें पीडा, ज्वर, प्यास, संधियोंमें पीडा, फोडोंका वर्ण काला होय, ये वातविस्फोटकके लक्षण हैं ॥ पित्तविस्फोटकके लक्षण । ज्वरदाहरुजास्रावपाकतृष्णाभिरन्वितम् । पीतलोहितवर्णं च पित्तविस्फोटलक्षणम् ॥ ५ ॥ ज्वर, दाह, पीडा, स्राव, फोडोंका पकना, प्यास, देह पीला हो अथवा लाल होय ये पित्तविस्फोटकके लक्षण हैं ॥ कफविस्फोटकके लक्षण । छर्द्यरोचकजाड्यानि कंडूकाठिन्यपांडुताः । अवेदनश्चिरात्पाकी स विस्फोटः कफात्मकः ॥ ६ ॥ वमन, अरुचि, जडता तथा फोडा खुजलीयुक्त हो, कठिन, पीले और उनमें पीडा होय नहीं और वे बहुत कालमें पकें, यह विस्फोट कफका जानना ॥ कफपित्तात्मकविस्फोटकके लक्षण । कण्डूर्दाहो ज्वरश्छर्दिरेतैस्तु कफपैत्तिकः । खुजली, दाह, ज्वर और वमन इन लक्षणोंसे कफपित्तजन्य विस्फोट जानना ॥ वातपित्तात्मकके लक्षण । वातपित्तकृतो यस्तु कुरुते तीव्रवेदनाम् ॥ ७ ॥ वातपित्तके विस्फोटकमें तीव्र पीडा होती है ॥ कफवातात्मकके लक्षण । कण्डूस्तैमित्यगुरुभिर्जानीयात्कफवातिकम् । खुजली, गीलापना, भारीपना इन लक्षणोंसे कफवातका विस्फोट जानना ॥ सन्निपातविस्फोटकके लक्षण । मध्ये निम्नोन्नतोऽन्ते च कठिनोऽल्पप्रपाकवान् ॥ ८ ॥ दाहरागतृषामोहेच्छर्दिमूर्च्छारुजो ज्वरः । प्रलापो वमथुस्तंद्रा सोऽसाध्यश्च त्रिदोषजः ॥ ९ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । (२७१) जो फोडा बीचमें नीचे होय और ओरपासके ऊंचा होय, कठिन कुछ पका होय है तथा जिसके योगसे दाह, अंगमें लाली, प्यास, मोह, वमन, मूर्च्छा, पीडा, ज्वर, प्रलाप, कम्प, तन्द्रा ये लक्षण होते हैं वह सन्निपातका विस्फोटक असाध्य है ॥ रक्तजविस्फोटकके लक्षण । रक्ता रक्तसमुत्थाना गुञ्जाफलनिभास्तथा । वेदितव्यास्तु रक्तेन पैत्तिकेन च हेतुना ॥ न ते सिद्धिं समायांति सिद्धैर्योगशतैरपि ॥ १० ॥ रुधिरसे प्रगट भया विस्फोटक तांबेके रंगका, गुंजा (चिरमिटी) के समान लाल, वह रुधिरके दुष्ट होनेसे अथवा पित्तके दुष्ट होनेसे होय है, इसमें सैकडों अनुभव- कारी औषधके करनेसे साध्य नहीं होय है ॥ साध्यासाध्यविचार । एकदोषोत्थितः साध्यः कृच्छ्रसाध्यो द्विदोषजः । सर्वरूपान्वितो घोरस्त्वसाध्यो भूर्युपद्रवः ॥ ११ ॥ एक दोषसे प्रगट भया जो विस्फोटक वह साध्य है, द्विदोषका कष्टसाध्य है और सर्वलक्षणयुक्त होय सो भयंकर तथा जिसमें उपद्रव बहुत होयँ वह विस्फोटक असाध्य है ॥ विस्फोटकके उपद्रव । हिक्का श्वासोऽरुचिस्तृष्णा अङ्गसादो हृदि व्यथा । विसर्पज्वरहृल्लासा विस्फोतानामुपद्रवाः ॥ १२ ॥ हिचकी, श्वास, अरुचि, प्यास, अंगग्लानि, हृदयमें पीडा, विसर्परोग, ज्वर,वमन ये विस्फोटकके उपद्रव जानने ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां विस्फोटकनिदानं समाप्तम् ॥ अथ मसूरिकानिदानम् । कारण और सम्प्राप्ति । कट्वम्ललवणक्षारविरुद्धायशनाशनैः । दुष्टनिष्पावशाकाद्यैः प्रदुष्टपवनोदकैः ॥ १ ॥ क्रूरग्रहेक्षणाद्वापि देहे दोषाः समुद्धताः ।
( २७२ ) माधवनिदान ।
( २७२ ) माधवनिदान । जनयंति शरीरेऽस्मिन्दुष्टरक्तेन संगताः ॥ मसूराकृतिसंस्थानाः पिडिकाः स्युर्मसूरिकाः ॥ २ ॥ कडुआ, खट्टा, नोनका, खारी, विरुद्ध भोजन, अध्यशन ( भोजनके ऊपर भोजन ), दुष्ट अन्न, निष्पाव ( शिंबीबीज उडद् मूँग ) आदि, शाक, विषैले फूल आदिसे मिला पवन तथा जल, शनैश्चरादि खोटे ग्रहोंका देखना इन सब कारणों करके शरी- रमें वातादिदोष कुपित होकर दुष्ट रुधिरमें मिलकर मसूरके समान देहमें अनेक मरोरी उत्पन्न करें, उनको मसूरिका ( माता ) कहते हैं । “ दुष्टरक्तेन संगताः ” इस पद धरनेसे रुधिरका कटु अम्लादि हेतु करके विशेष कोप दिखाया इसीसे ग्रन्थोन्तरोंमें लिखा भी है ॥ मसूरिकाके पूर्वरूप । तासां पूर्वं ज्वरः कण्डूर्गात्रभङ्गोऽरुचिर्भ्रमः । त्वचि शोफः सवैवर्ण्यं नेत्ररागस्तथैव च ॥ ३ ॥ तिस माता शीतलाके पूर्व ज्वर होय, खुजली चले, देहमें फूटनी होय, अन्नमें अरुचि, भ्रम होय, अंगके ऊपरकी त्वचा में सूजन होय तथा वर्ण पलटजाय, नेत्र लाल होयँ ये शीतलाके पूर्वरूप होते हैं ॥ वातकी मसूरिकाके लक्षण । स्फोटाः कृष्णारुणा रूक्षास्तीव्रवेदनाऽन्विताः । कठिनाश्चिरपाकाश्च भवन्त्यनिलसम्भवाः ॥ ४ ॥ सन्ध्यस्थिपर्वणां भेदः कासः कम्पोऽरतिः कुमः । शोषस्ताल्वोष्ठजिह्वानां तृष्णा चारुचिसंयुता ॥ ५ ॥ वातमसूरिकाके फोडे काले, लाल और रूक्ष होते हैं, उनमें तीव्र पीडा होय' कठिन होय, शीघ्र पके नहीं, इसके योगसे सन्धि हाड और पर्वोंमें फोडनेकीसी पीडा, खांसी, कम्प, चित्त स्थिर न हो, बिना परिश्रमके श्रम होय, तालुआ, होठ और जीभ ये सूखने लगें, प्यास, अरुचि ये लक्षण होते हैं ॥ पित्तकी मसूरिकाके लक्षण । रक्ताः पीताः सिताः स्फोटाः सदाहास्तीव्रवेदनाः । भवन्त्यचिरपाकाश्च पित्तकोपसमुद्भवाः ॥ ६ ॥ १ पित्तं शोणितसंसृष्टं यदा दूषयति त्वचम् । तदा करोति पिडिकाः सर्वगात्रेषु देहिनाम् ॥ मसूरमुद्गमाषाणां तुल्याः कालोपमा इति । मसूरिकास्तु ता ज्ञेयाः पित्तरक्ताधिका बुधैः ॥ इति ।
भाषाटीकासमेत। (२७३) विड्भेदश्चांगमर्दश्च दाहस्तृष्णाऽरुचिस्तथा । मुखपाकोऽक्षिपाकश्च ज्वरस्तीक्ष्णः सुदारुणः ॥ ७ ॥ पित्तकी मसूरिकाका मुख पीला, सफेद होय है, उसमें दाह तथा पीडा बहुत होय और यह शीतला शीघ्र पके, इसके योगसे मल पतला होय, अंग टूटे, दाह, प्यास, अरुचि, मुखपाक और नेत्रपाक होय, ज्वर तीव्र हो ये लक्षण होयँ हैं ॥ रक्तजमसूरिकाके लक्षण । रक्तजायां भवन्त्येते विकाराः पित्तलक्षणाः ॥ ८ ॥ रक्तज मसूरिकामें पित्तज मसूरिकाके लक्षण होते हैं ॥ कफजमसूरिकाके लक्षण । कफप्रसेकः स्तैमित्यं शिरोरुग्गात्रगौरवम् । हृल्लासः सारुचिर्निद्रा तन्द्रालस्यसमन्विता ॥ ९ ॥ श्वेताः स्निग्धा भृशं स्थूलाः कण्डूरा मंदवेदनाः । मसूरिकाः कफोत्थाश्च चिरपाकाः प्रकीर्तिताः ॥ १० ॥ कफकी मसूरिकामें मुखके द्वारा कफका स्राव होय, अंगमें आर्द्रता तथा भारी पना, मस्तकमें शूल, वमनआनेकीसी इच्छा होय, अरुचि, निद्रा, तन्द्रा, आलस्य ये होयँ और फोडे सफेद चिकने अत्यन्त मोटे होयँ, इनमें खुजली बहुत चले, पीडा मन्द होय और वे बहुत दिनमें पकें ॥ त्रिदोषजमसूरिकाके लक्षण । नीलाश्चिपिटविस्तीर्णा मध्ये निम्ना महारुजः । चिरपाकाः पूतिस्रावाः प्रभूताः सर्वदोषजाः ॥ ११ ॥ त्रिदोषज मसूरिकाके फोडे नीले, चिपटे, लंबे, बीचमें नीचे ऐसे होयँ, उसमें पीडा अत्यन्त होय तथा वे बहुत दिनमें पकें और उनमेंसे दुर्गन्धयुक्त स्राव होय, फोडे सर्व दोषके बहुत होय हैं ॥ चर्मपिडिकाके लक्षण । कण्ठरोधोऽरुचिस्तन्द्राप्रलापारतिसंयुताः । दुश्चिकित्स्याः समुद्दिष्टाः पिडिकाश्चर्मसंज्ञिताः ॥ १२ ॥ जिस फोडेके होनेसे कण्ठ रुक जाय, अरुचि, तन्द्रा, प्रलाप, चैन न पडना यें लक्षण होते हैं, जिनकी औषधि नहीं हो सके ऐसी चर्मसंज्ञक पिडिका जाननी ॥
( २७४ ) माधवनिदान ।
( २७४ ) माधवनिदान । रोमांतिकाके लक्षण । रोमकूपोन्नतिसमा रागिण्यः कफपित्तजाः । कासारोचकसंयुक्ता रोमांत्यो ज्वरपूर्विकाः ॥ १३ ॥ कफपित्तसे केशों ( बालों ) के छिद्रके समान बारीक और लाल ऐसी मसूरिका होयँ, इनके होनेसे खांसी, अरुचि होय तथा इनके होनेसे पहिले ज्वर होय, इनको रोमांतिका ( कसूमीमाता ) ऐसे कहते हैं ॥ रसादि सप्त धातु । रसगतमसूरिकाओंके लक्षण । तोयबुद्बुदसंकाशास्त्वग्गताश्च मसूरिकाः । स्वल्पदोषाः प्रजायंते भिन्नास्तोयं स्रवंति च ॥ १४ ॥ रसगत मसूरिका पानीके बबूलेके सदृश हों, इनके फूटनेसे पानी बहे, वह त्वग्गत मसूरिका है, कारण इसका यह है कि दोष स्वल्प हैं ॥ रक्तगतमसूरिकाके लक्षण । रक्तस्था लोहिताकाराः शीघ्रपाकास्तनुत्वचः । साध्या नात्यर्थदुष्टास्तु भिन्ना रक्तं स्रवंति च ॥ १५ ॥ रुधिरगत मसूरिका तांबेके रंगकी, जल्दी पकनेवाली होती हैं, उनके ऊपरकी त्वचा पतली होय है, यह अत्यन्त दुष्ट नहीं होनेसे साध्य होय और इनके फूटनेसे इनमेंसे रुधिर निकले ॥ मांसगतके लक्षण । मांसस्थाः कठिनाः स्निग्धाश्चिरपाकास्तनुत्वचः । गात्रशूलोऽरतिः कंपमूर्च्छादाहतृषान्विताः ॥ १६ ॥ मांसस्थ मसूरिका कठिन चिकनी होय हैं, ये बहुत दिनमें पकें तथा इनकी त्वचा पतली होय, अंगोंमें शूल होय, चैन पडे नहीं, खुजली चले, मूर्च्छा, दाह और प्यास ये लक्षण होते हैं ॥ मेदोगतके लक्षण । मेदो जा मंडलाकारा मृदवः किंचिदुन्नताः । घोरज्वरपरीताश्च स्थूलाः कृष्णाः सवेदनाः ॥ संमोहारतिसंतापाः कश्चिदाभ्यो विनिस्तरेत् ॥ १७ ॥
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भाषाटीकासमेत । ( २७५ ) मेदोगत मसूरिका मण्डलके आकार अर्थात् गोल, नरम, कुछ ऊंची, मोटी तथा काली होती हैं, इनके होनेसे भयंकर ज्वर, पीडा, इंद्रिय मनको मोह, चित्तका अस्थिर होना, सन्ताप ये लक्षण होते हैं। इन मसूरिकासे कोई मनुष्य बचता होगा इससे यह दिखाया कि, ये अत्यन्त कृच्छ्रसाध्य हैं ॥ अस्थिमज्जागतके लक्षण । क्षुद्रा गात्रसमारूढाश्चिपिटाः किंचिदुन्नताः । मज्जोत्था भृशसम्मोहवेदनारतिसंयुताः ॥ १८ ॥ छिन्दंति मर्मधामानि प्राणानाशु हरंति ताः । भ्रमरेणेव विद्धानि भवन्त्यस्थीनि सर्वतः ॥ १९ ॥ अस्थि मज्जागत मसूरिका बहुत छोटी, देहके समान, रूक्ष, चिपटी, कुछ ऊँची होय हैं, अत्यन्त चित्तविभ्रम, पीडा, अस्वस्थता ये होते हैं, वह मर्मस्थानोंके भेद करके शीघ्र प्राणहरण करें इसके होनेसे हड्डियोंमें भौंरेके काटनेके समान पीडा होय है ॥ शुक्रगतके लक्षण । पक्वाभाः पिडिकाः स्निग्धाः श्लक्ष्णाश्चात्यर्थवेदनाः । स्तैमित्यारतिसंमोहदाहोन्मादसमन्विताः ॥ २० ॥ शुक्रजायां मसूर्या तु लक्षणानि भवन्ति च । निर्दिष्टं केवलं चिह्नं दृश्यते न तु जीवितम् ॥ २१ ॥ शुक्रधातुगत मसूरिका पकेके समान चिकनी अलग अलग होय हैं, इनमें अत्यन्त पीडा होय, इनके होनेसे गीलापना, अस्वस्थता, पीडा, मोह, दाह, उन्माद ये लक्षण होते हैं, रोगी बचे ऐसे इसमें कोई लक्षण नहीं दीखे इसीसे इसको असाध्य जानना ॥ सप्तधातुगतमसूरिकाके दोषके सम्बन्धसे लक्षण कहते हैं- दोषमिश्रास्तु सप्तैता द्रष्टव्या दोषलक्षणैः । ये सप्तधातुगत मसूरिका वातादिकोंके लक्षणों करके तीन दोषोंकरके मिश्रित, प्रगट भई जाननी ॥ धातुगत और दोषज मसूरिकामें कौन साध्य हैं ? सो कहते हैं- त्वग्गता रक्तजाश्चैव पित्तजाः श्लेष्मजास्तथा ॥ २२ ॥ पित्तश्लेष्मकृताश्चैव सुखसाध्या मसूरिकाः । एता विनापि क्रियया प्रशाम्यंति शरीरिणाम् ॥ २३ ॥
( २७६ ) माधवनिदान ।
( २७६ ) माधवनिदान । रसगत, रक्तगत, पित्तज, कफज, पित्तकफज ये मसूरिका सुखसाध्य हैं । ये औषधके बिना भी शांत होती हैं ॥ कष्टसाध्य । वातजा वातपित्तोत्था वातश्लेष्मकृताश्च याः । कृच्छ्रसाध्या मतास्तास्तु यत्नादेता उपाचरेत् ॥ २४ ॥ वातज, वातपित्तज, वातकफज मसूरिका कष्टसाध्य हैं इनकी यत्नपूर्वक चिकित्सा करे ॥ असाध्यमसूरिकाके लक्षण । असाध्याः सन्निपातोत्थास्तासां वक्ष्यामि लक्षणम् । प्रवालसदृशाः काश्चित्काश्चिज्जम्बूफलोपमाः ॥ २५ ॥ लोहजालसमाः काश्चिदतसीफलसन्निभाः । आसां बहुविधा वर्णा जायन्ते दोषभेदतः ॥ २६ ॥ सन्निपातज मसूरिका असाध्य हैं उनके लक्षण कहता हूं. कोई मूंगाके समान लाल होंय, कोई जामुनके समान और कोई लोहजालके समान तथा अलसीके बीजके समान होती हैं । दोषोंके भेद करके इनके अनेक प्रकारके रंग होते हैं ॥ सर्वमसूरिकाके अवस्थाविशेषकरके लक्षण । कासो हिक्काथ मोहश्च ज्वरस्तीव्रः सुदारुणः । प्रलापारतिमूर्च्छाश्च तृष्णा दाहोऽतिघूर्णता ॥ २७ ॥ मुखेन प्रस्रवेद्रक्तं तथा घ्राणेन चक्षुषा । कण्ठे घुर्घुरकं कृत्वा श्वसित्यत्यर्थदारुणम् ॥ २८ ॥ मसूरिकाभिभूतो यो भृशं घ्राणेन निश्श्वसेत् । स भृशं त्यजति प्राणांस्तृष्णार्तो वायुदूषितः ॥ २९ ॥ खांसी, हिचकी, मोह, तीव्रज्वर, प्रलाप, असन्तोष, मूर्च्छा, प्यास, दाह, नेत्र टेढे तिरछे बांके फटेसे ये लक्षण होते हैं, मुख, नाक और नेत्र इनके मार्ग होकर रुधिर गिरे, कण्ठमें घुरघुर शब्द होय और भयंकर श्वास ले, जो मसूरिकापीडित रोगी केवल नाकके द्वारा श्वास लेय, वह पुरुष वायु और तृषा इनसे पीडित होकर तत्काल प्राणत्याग करे ॥
भाषाटीकासमेत । (२७७) मसूरिकाके उपद्रव । मसूरिकान्ते शोथः स्यात्कूर्परे मणिबन्धके । तथांसफलके वापि दुश्चिकित्स्यः सुदारुणः ॥ ३० ॥ मसूरिका (शीतला) के अन्तमें कूर्पर (कोहनी), पहुंचा तथा कन्धा इनमें सूजन होय, (इसको व्यवहारमें गुरु ऐसे कहते हैं) यह चिकित्सा करनेमें कठिन है॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां मसूरिकानिदानं समाप्तम् ॥ अथ क्षुद्ररोगनिदानम् । अजगल्लिकाके लक्षण । स्निग्धा सवर्णा ग्रथिता नीरुजा मुद्गसन्निभा । कफवातोत्थिता ज्ञेया बालानामजगल्लिका ॥ १ ॥ बालकको कफवातसे चिकनी, त्वचाके वर्णके समान वर्ण होय, गांठसी बन्धी रुजा (पीडा) रहित तथा मूंगके सदृश जो पिडिका होय उसको अजगल्लिका कहते हैं ॥ यवप्रख्याके लक्षण । यवाकारा सुकठिना ग्रथिता मांससंश्रिता । पिडिका श्लेष्मवाताभ्यां यवप्रख्येति चोच्यते ॥ २ ॥ कफवातसे प्रगट, जौके समान कठिन, गांठके सदृश मांसमिश्रित जो पीडिका होय उसको यवप्रख्या कहते हैं भोजके मतसे इसीको अन्त्रालजी कहते हैं ॥ अन्त्रालजीके लक्षण । घनामवक्त्रां पिडिकामुन्नतां परिमंडलाम् । अन्त्रालजीमल्पपूयां तां विद्यात्कफवातजाम् ॥ ३ ॥ कफवातसे प्रगट, कठिन, जिसमें मुख न हो, तथा ऊंची ऐसी पिडिका होय तथा जिसके चारोंओर मण्डलाकार हो और जिसमें राध थोडी होय, उसको अन्त्रालजी कहते हैं ॥ १ अन्त्रालजी स्नायुगता भोजादवगन्तव्या । यदुक्तम्- "श्लेष्मानिलौ श्रितौ स्नायुं पिडिकां पित्तमण्डलाम् । दुष्टौ जनयतोऽवक्त्रामल्पपूयामकण्डुराम् ॥ आमोदुम्बरसंकाशां विद्यादन्त्रा- लर्जीं तु ताम् ॥" CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( २७८ ) . माधवनिदान ।
( २७८ ) . माधवनिदान । विवृतापिडिकाके लक्षण । विवृतास्यां महादाहां पक्वोदुम्बरसन्निभाम् । परिमंडलां पित्तकृतां विवृतां नाम तां विदुः ॥ ४ ॥ पित्तके योगसे फटे मुखकी, अत्यन्त दाहयुक्त, पके गूलरके समान, चारों ओर वल पडी हुई जो पिडिका होय उसको विवृता कहते हैं ॥ कच्छपिकाके लक्षण । ग्रथिता पञ्च वा षड् वा दारुणाः कच्छपोन्नताः । कफानिलाभ्यां पिडिका ज्ञेया कच्छपिका बुधैः ॥ ५ ॥ कफ वायुसे प्रगट गांठ बन्धी, पांच अथवा छः, कठिन कछुओके पीठके समान ऊंची जो पिडिका होयँ उनको कच्छपिका कहते हैं ॥ वल्मीकपिडिकाके लक्षण । ग्रीवांसकक्षकरपाददेशे संधौ गले वा त्रिभिरेव दोषैः । ग्रन्थिः सवल्मीकवदक्रियाणां जातः क्रमेणैव गतः प्रवृद्धिम् ॥ ६ ॥ मुखैरनेकैः स्रुतितोदवद्भिर्विसर्पवत्स्र्पति चोन्नताग्रैः । वल्मीकमाहुर्भिषजो विकारं निष्प्रत्यनीकं चिरजं विशेषात् ॥७॥ नाड, कन्धा, कूंख, हाथ, पैर, सन्धि, गला इन ठिकाने तीनों दोषोंसे सर्पकी बांबीके समान गांठ होय, उसका उपाय न करे तब वह धीरे धीरे बढे, उसमें अनेक मुख हो जायँ, उसमेंसे स्राव होय, नोचनेकीसी पीडा होय तथा वह मुखक ऊपर कुछ ऊंची होकर विसर्पके समान फैल जाय, इस रोगको वैद्य वल्मीक कहते हैं । इसके ऊपर औषध उपचार नहीं चले और पुराने होनेसे विशेष असाध्य जाननी ॥ इन्द्रवृद्धाके लक्षण । पद्मकर्णिकवन्मध्ये पिडिकाभिः समाचिताम् । इन्द्रवृद्धां तु तां विद्याद्वातपित्तोत्थितां भिषक् ॥ ८ ॥ कमलकार्णिकाके समान बीचमें एक पिडिका होय, उसके चारोंओर छोटी छोटी फुन्सी होयँ, उसको इन्द्रवृद्धा कहते हैं, यह वात पित्तसे उत्पन्न होय है ॥ गर्दभिकाके लक्षण । मंडलं वृत्तमुत्सन्नं सरक्तं पिडिकाचितम् । रुजाकरीं गर्दभिकां तां विद्याद्वातपित्तजाम् ॥ ९ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( २७९ ) वातपित्तसे प्रगट एक गोल ऊंचा तथा लाल और फोडोंसे व्याप्त ऐसा मंडल होय वह बहुत दूखे उसको गर्दभिका कहते हैं ॥ पाषाणगर्दभके लक्षण । वातश्लेष्मसमुद्भूतः श्वयथुर्हनुसंधिजः । स्थिरो मन्दरुजः स्निग्धो ज्ञेयः पाषाणगर्दभः ॥ १० ॥ वातकफसे ठोडीकी सन्धिमें कठिन, मन्द पीडा करनेवाली चिकनी ऐसा सूजन होथ उसको पाषाणगर्दभ कहते हैं ॥ पनसिके लक्षण । कर्णस्याभ्यन्तरे जातां पिडिकामग्रवेदनाम् । स्थिरां पनसिकां तां तु विद्याद्वातकफोत्थिताम् ॥ ११ ॥ कानके भीतर वात पित्त कफसे जो फुन्सी उग्रवेदना सहित प्रगट होय और वह स्थिर होय, उसको पैनसिका कहते हैं ॥ जालगर्दभके लक्षण । विसर्पवत्सर्पति यः शोथस्तनुरपाकवान् । दाहज्वरकरः पित्तोत्स ज्ञेयो जालगर्दभः ॥ १२ ॥ पित्तसे विसर्पके समान इधर उधरको फैलनेवाली पतली तथा कुछ पकनेवाली ऐसी सूजन होय, उसमें दाह होय और ज्वर होय, इसको जालगर्दभ कहते हैं, कोई आचार्य कहते हैं कि, इसमें पकना नहीं होय ॥ इरिबेल्लिकाके लक्षण । पिडिकामुत्तमांगस्थां वृत्तामुग्ररुजाज्वराम् । सर्वात्मिकां सर्वलिंगां जानीयादिरिवेल्लिकां ॥ १३ ॥ त्रिदोषसे प्रगट मस्तकमें गोल अत्यन्त पीडा और ज्वर करनेवाली त्रिदोषके लक्षण संयुक्त ऐसी पिडिका होय उसको इरिबेल्लिका कहते हैं ॥ कक्षा (कखलाई) के लक्षण । बाहुकक्षांसपार्श्वे तु कृष्णस्फोटां सवेदनाम् । पित्तकोपसमुद्भूतां कक्षामित्यभिनिर्दिशेत् ॥ १४ ॥ १ कफवातौ प्रकुपितौ मांसमाश्रित्य कर्णयोः । समन्ततः परिस्तब्धां कुरुतः पिडिकां स्थिराम् ॥ विषमां दाहसंयुक्तां विद्यात्पनसिकां तु ताम् ॥ २ पित्तोत्कटास्त्रयो दोषा जन- यंति त्वगाश्रिताः । श्यावं रक्तं तनुं शोथमपाकं बहुवेदनम् ॥ विसर्पिणं सदाहं च तृष्णाज्वर- समन्वितम् । विसर्पमाहुस्तं व्याधिमपरे जालगर्दभम् ॥
( २८० ) माधवनिदान ।
( २८० ) माधवनिदान । बाहु ( भुजा ) की जड़, कंधा और पसवाडे इन ठिकाने पित्त कुपित होकर काले फोडोंसे व्याप्त तथा वेदनायुक्त जो पिडिका होय उसको कक्षा वा कखलाई कहते हैं॥ गन्धमालाके लक्षण । एकामेतादृशीं दृष्ट्वा पिडिकां स्फोटसन्निभाम् । त्वग्गतां पित्तकोपेन गन्धमालां प्रचक्षते ॥ १५ ॥ पित्तके कोपसे जो कक्षामें कही हुई काले फोडेके समान एक पिडिका त्वचाके भीतर होय उसको गन्धमाला कहते हैं ॥ अग्निरोहिणी ( काली फुन्सी ) । कक्षाभागेषु ये स्फोटा जायन्ते मांसदारुणाः । अन्तर्दाहज्वरकरा दीप्तपावकसन्निभाः ॥ १६ ॥ सप्ताहाद् द्वादशाहाद्वा पक्षाद्वा हंति मानवम् । तामग्निरोहिणीं विद्यादसाध्यां सान्निपातिकीम् ॥ १७ ॥ कांखके आसपास मांसके विदारण करनेवाले जो फोडे होते हैं तिसकरके अन्त- र्दाह होय तथा ज्वर होय वे फोडे प्रदीप्त अग्निके समान लाल होयँ, इन फोडोंमें वायु अधिक होनेसे सात दिन, पित्ताधिक्यसे बारह दिन और कफाधिक्यसे १५ दिनमें रोगी मरे, यह अग्निरोहिणी नामक त्रिदोषजा पिडिका असाध्य है ॥ चिप्पके लक्षण । नखमांसमधिष्ठाय वातः पित्तं च देहिनाम् । कुर्वाते दाहपाकौ च तं व्याधिं चिप्पमादिशेत् ॥ १८ ॥ वायु और पित्त नखोंके मांसमें स्थित होकर दाह और पाकको करे, इस रोगको चिप्प ऐसे कहते हैं, यह अल्प दोषोंसे होय तो इसको कुनख कहते हैं ॥ अनुशयीके लक्षण । गभीरामल्पसंरम्भां सवर्णामुपरि स्थिताम् । पादस्यानुशयीं तां तु विद्यादन्तः प्रपाकिनीम् ॥ १९ ॥ पैरोंमें त्वचाके समान वर्ण यत्किंचित् सूजनयुक्त भीतरसे पकी जो पिडिका होय उसको अनुशयी कहते हैं ॥ विदारिकाके लक्षण । विदारिकन्दवद् वृत्ता कक्षावंक्षणसन्धिषु । विदारिका भवेद्रक्ता सर्वजा सर्वलक्षणा ॥ २० ॥
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भाषाटीकासमेत । ( २८१ ) विदारीकंदके समान गोल, कांखमें अथवा वंक्षणस्थानमें जो गांठ तांबेके रंगकीसी होय उसको विदारिका कहते हैं, यह सन्निपातसे होय है, इसमें तीनों दोषोंके लक्षण होते हैं ॥ शर्करा । प्राप्य मांसशिरास्नायु श्लेष्मा मेदस्तथाऽनिलः । ग्रंथिं करोत्यसौ भिन्नो मधुसर्पिर्वसानिभम् ॥ २१ ॥ स्रवत्यास्रावमनिलस्तत्र वृद्धिं गतः पुनः । मांसं विशोष्य ग्रथितां शर्करां जनयेत्ततः ॥ २२ ॥ कफ मेद वायु ये मांस शिरा और स्नायु इनमें प्राप्त हों गांठ बांधते हैं, जब वह फूटे तब उसमेंसे शहद, घृत, चर्बी इनके समान स्राव हो तिसकरके वायु पुनः बढ़- कर मांसको सुखाय उसकी बारीक खिंचीसी गांठ करे, उसको शर्करा कहते हैं ॥ शर्करार्वुदके लक्षण । दुर्गन्धि क्लिन्नमत्यर्थं नानावर्णं ततः शिराः । सृजंति रक्तं सहसा तद्विद्याच्छर्करार्वुदम् ॥ २३ ॥ शर्करा होनेके अनन्तर नाडियोंसे दुर्गन्ध क्लेदयुक्त अनेक प्रकारके घृत, मेद और वसा इनके वर्णका रुधिर स्रवै, उसको शर्करार्वुद कहते हैं परन्तु भोजने शर्करार्वुदको शर्करा रोगके अंतर्गत कहा है ॥ पाददारीके लक्षण । परिक्रमणशीलस्य वायुरत्यर्थरूक्षयोः । पादयोः कुरुते दारीं पाददारीं तमादिशेत् ॥ २४ ॥ जिस पुरुषको बहुत चलना पडे है उसके पैर वायुके योगसे अत्यन्त रूक्ष होकर विदीर्ण हों ( फाटें ) उसको पाददारी कहते हैं अर्थात् विवाई कहते हैं । विपादिका कुष्ठ फटे नहीं है, यह फूट निकले है, यह इनमें भेद जानना ॥ कदर ( ठेक ) के लक्षण । शर्करोन्मथिते पादे क्षते वा कंटकादिभिः । ग्रंथिः कोलवदुत्सन्नो जायते कदरं तु तत् ॥ २५ ॥ १ तमेव भिन्नदुर्गन्धं घृतमेदोगिभं शिराः । स्रवंति स्रावमनिशं तदा स्याच्छर्करार्वुदम् ॥१॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( २८१ ) माधवनिदान ।
( २८१ ) माधवनिदान । पैरोंमें कंकर छिदनेसे अथवा कांटे लगनेसे बेरके समान ऊंची गांठ प्रगट होय उसको कदर अर्थात् ठेक कहते हैं अथवा ' ग्रंथिः कोलवदुत्सन्नो' इस जगह ' ग्रंथिः कीलवदुत्सन्नो ' ऐसा भी पाठ है अर्थात् कीलके समान जो गांठ होय, उसको कदर कहते हैं । यह कदररोग हाथोंमें भी होय है सो भोजने लिखा भी है ॥ अलस ( खारुआ ) के लक्षण । क्लिन्नांगुल्यंतरौ पादौ कण्डूदाहरुजान्वितौ । दुष्टकर्दमसंस्पर्शादलसं तं विभावयेत् ॥ २६ ॥ दुष्ट कीचमें डोलनेसे ( वर्षा आदिका पानी और सडी कीचमें डोलनेसे ) पैरोंकी उंगली गीली रहनेसे उंगलियोंके बीचमें सफेद चकत्ते हो जायँ, उनमें खुजली, दाह और गीलापन होय, तथा पीडा होय उसको अलस अर्थात् खारुआ कहते हैं, यह कफरक्तके दोषसे होता है ॥ इन्द्रलुप्त ( चाईं ) के लक्षण । रोमकूपानुगं पित्तं वातेन सह मूच्छितम् । प्रच्यावयति रोमाणि ततः श्लेष्मा सशोणितः ॥ २७ ॥ रुणद्धि रोमकूपांस्तु ततोऽन्येषामसंभवः । तदिंद्रलुप्ते खालित्यं रुह्येति च विभावयेत् ॥ २८ ॥ पित्त वादीके साथ कुपित होकर रोमकूपोंमें अर्थात् बालोंके छिद्रोंमें प्राप्त हो तब मस्तक अथवा अन्य स्थानके बाल झडने लगें, पीछे कफ और रुधिर रोमकूप कहिये बालोंके प्रगट होनेके स्थानको रोकदे उससे फिर बाल नहीं ऊगें, इस रोगको इन्द्रलुप्त खालित्य चाचा ( चाईं ) कहते हैं, यह रोग स्त्रियोंके नहीं होय, कारण इसका यह है कि उनका रुधिर महीनेके महीने शुद्ध होता रहे है और निकलता रहे है इससे वह रोमकूपोंको नहीं रोके है, सो विदेहाचार्यने भी लिखा है और इसी रोगको खालित्य और रुह्या कहते हैं सो भोजने लिखा है परन्तु कार्तिकाचार्य कहते हैं कि इन्द्रलुप्तं रोग कुछ दाढीमें होय है और खालित्यरोग शिरमें होय है और रुह्या- रोग पीडासहित होय है ॥ १ ' हस्तयोः पादयोश्चापि गम्भीरानुमतं स्थिरम् । मांसकीलं जनयतः कुपितौ कफ मारुतौ । सशल्यमिव तं देशं मन्यते तेन पीडितम् । शर्कराकदरं केचिन्मन्यन्ते वातकंटकम् ॥ २ अत्यन्तसुकुमाराङ्ग्यो रजो दुष्टं स्रवंति च । अव्यायामरता यस्मात्तस्मान्न स्खलतिः- स्त्रियाः ॥ इति । ३ “ इन्द्रलुप्तं श्मश्रुणि भवति खालित्यं शिरस्येव रुह्या सर्वदेहे ।”
भाषाटीकासमेत । ( २८३ ) दारुणकके लक्षण । दारुणा कण्डुरा रूक्षा केशभूमिः प्रपच्यते । कफमारुतकोपेन विद्याद्दारुणकं तु तम् ॥ २९ ॥ कफवायुके कोपसे केशोंकी जमीन अतिकठिन होकर खुजावे, खरदरी होय तथा बारीक फुन्सी होकर पके उसको दारुणक कहते हैं, कफवातके कोपसे यह रोग होय है. इसका कारण यह है कि बिना पित्तके पाक नहीं होय सो विदेहने कहा भी है ॥ अरूंषिकाके लक्षण । अरूंषि बहुवक्त्राणि बहुक्लेदीनि मूर्धनि । कफासृक्कृमिकोपेन नृणां विद्यादरूंषिकाम् ॥ ३० ॥ रुधिर कफ और कृमि इनके कोपसे माथेमें बहुत फुन्सी हो जायँ, उनमेंसे चोप विशेष निकले और क्लेदयुक्त होयँ इन फुन्सियोंको अथवा व्रणोंको अरूंषिका कहते हैं ॥ पलित ( सफेद बाल ) के लक्षण । क्रोधशोकश्रमकृतः शरीरोष्मा शिरोगतः । पित्तं च केशान्पचति पलितं तेन जायते ॥ ३१ ॥ क्रोध शोक और श्रमके करनेसे उत्पन्न भई जो शरीरमें ऊष्मा ( गरमी ) और पित्त सो मस्तकमें जाकर बालोंको पकाय दे अर्थात् सफेद करदे उस करके यह पलितरोग होय है । पलित रोगपर मधुकोशटीकाकारने तथा भावप्रकाशने शास्त्रार्थ लिखा है ॥ मुखदूषिकाके लक्षण । शाल्मलीकण्टकप्रख्याः कफमारुतकोपजाः । जायन्ते पिडिकायूनां विज्ञेया मुखदूषिकाः ॥ ३२ ॥ कफवायुके कोपसे सेमरके कांटेके समान तरुण ( जवान ) पुरुषके मुखके ऊपर जो फुन्सी होयँ उनको मुखदूषिका अर्थात् मुहासे कहते हैं । इनके होनेसे मुख बुरा हो जाता है ॥ १ यद्वन्न पाटलाभासं सरजस्कं शिरस्त्वचि । परुषं जायते जन्तोस्तस्य रूपं विशेषतः ॥ बोदैः समन्वितं वातात्सकण्डूगौरवं कफात् । सपिपासं सदाहार्तिरोगं पित्तासृजं तथा ॥
( २४४ ) माधवनिदान ।
( २४४ ) माधवनिदान । पद्मिनीकण्टकके लक्षण । कण्टकैराचितं वृत्तं मंडलं पाण्डु कण्डुरम् । पद्मिनीकण्टकप्रख्यैस्तदाख्यं कफवातजम् ॥ ३३ ॥ कमलके कांटेके समान कांटे चारोंओर युक्त हों, गोल, पीले रंगका, खुजली जिसमें चलती होय ऐसा एक मण्डल होय उसको पद्मिनीकण्टक कहते हैं, यह कफवायुसे होय है ॥ जतुमणि ( लहसन ) के लक्षण । सममुत्सन्नमरुजं मण्डलं कफरक्तजम् । सहजं लक्ष्म चैकेषां लक्ष्यो जतुमणिः स्मृतः ॥ ३४ ॥ कफरक्तसे जन्मसे ही चिकना तथा कुछ ऊंचा, जिसमें पीडा होय नहीं ऐसे गोल मण्डलके समान देहमें चिह्न होय उसको लक्ष्म तथा कोई कोई लक्ष्य जतु- मणि कहते हैं । यह स्त्रीपुरुषोंके अंगभेद करके शुभाशुभ फलदायक है, इसको लोकमें ( लहसन ) कहते हैं ॥ माष ( मस्सा ) के लक्षण । अवेदनं स्थिरं चैव यस्मिन् गात्रे प्रदृश्यते । माषवत्कृष्णमुत्सन्नमनिलान्मषकं तु तत् ॥ ३५ ॥ बादीसे शरीरके ऊपर उडदके समान काला, पीडारहित, स्थिर, कठिन, कुछ ऊंची गांठसी प्रगट होय, उसको माष ( मस्सा ) ऐसे कहते हैं । इस श्लोकमें जो चकार है उससे कफमेदसे भी मस्से होते हैं यह दिखाया, सो भोजने कहा भी है ॥ तिलकालक ( तिल ) के लक्षण । कृष्णानि तिलमात्राणि नीरुजानि समानि च । वातपित्तकफोन्सेकात्तान्विद्यात्तिलकालकान् ॥ ३६ ॥ वात पित्त कफके कोपसे काले तिलके समान पीडारहित त्वचासे मिले, ऐसे अंगमें दाग होयँ उनको तिलकालक (तिल) कहते हैं । “ वातपित्तकफोन्सेकात् ” इस पाठमें वात पित्त हेतु करके कफका शोष होय है उसीसे तिल होते हैं परन्तु चरकके मतसे पित्त रुधिरके शोष होनेसे तिल होते हैं । “ यस्य पित्तं प्रकुपितं शोणितं प्राप्य शुष्यति । तिलको विप्लवा व्यंगा नीलिका चास्य जायते ॥ ” इस वचनसे वात भी रुधिरको शोषण करे है । अन्य ग्रन्थमें वात पित्त कफ ये तीनों रुधिरको १ वातोत्तरैस्ते त्वचि यदा दूष्येते कफमेदसी । श्लक्ष्ण मृदु सवर्णं च कुरुते मषकं वदेत् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( २८५ ) शोषण करते हैं। यथा-" मारुतः पित्तमादाय कफरक्तसमाश्रितः । चिनोति तिल- मात्राणि त्वचि ते तिलकालकाः ॥ " न्यच्छके लक्षण । महद्वा यदि वाऽत्यल्पं श्यावं वा यदि वा सितम् । नीरुजं मण्डलं गात्रे न्यच्छमित्यभीधीयते ॥ ३७ ॥ मुखके विना अन्य स्थानमें शरीरके ऊपर बडा अथवा छोटा, काला अथवा सफेद और पीडा रहित दाग होय, उसको न्यच्छ कहते हैं, यह भी व्यंगका भेद है ॥ व्यंग ( झांई ) के लक्षण । क्रोधायासप्रकुपितो वायुः पित्तेन संयुतः। मुखमागत्य सहसा मण्डलं विसृजत्यतः ॥ ३८ ॥ नीरुजं तनुकं श्यावं मुखे व्यङ्गं तमादिशेत् । क्रोध और श्रम इनसे कुपित भया वायु पित्तसंयुक्त होकर मुखमें प्राप्त होकर एक मण्डल उत्पन्न करे, वह दुखे नहीं, पतला तथा श्यामवर्ण होय, उसको व्यंग कहते हैं॥ नीलिकाके लक्षण । कृष्णमेवंगुणं गात्रे मुखे वा नीलिकां विदुः ॥ ३९ ॥ पूर्वोक्त व्यंगके लक्षण सदृश जो काला मण्डल अंगमें होय अथवा मुखर होय उसको नीलिका कहते हैं। भोजने इस जगह नीलिकागात्र ऐसा कहा है अर्थात् सर्व देह नीली होय है ॥ परिवर्त्तिकाके लक्षण । मर्दनात्पीडनाद्वापि तथैवाप्यभिघाततः । मेढ्रचर्म यदा वायुर्भजते सर्वतश्चरन् ॥ ४० ॥ तदा वातोपसृष्टत्वात्तच्चर्म परिवर्त्तते । मणेरधस्तात्कोशस्तु ग्रंथिरूपेण लंबते ॥ ४१ ॥ सवेदनं सदाहं च पाकं च व्रजति क्वचित् । परिवर्त्तिकेति तां विद्यात्सरुजां वातसंभवाम् ॥ सकंडूः कठिना वापि सैव श्लेष्मसमुत्थिता ॥ ४२ ॥ १ मारुतः क्रोधहर्षाभ्यामूर्ध्वगो मुखमाश्रितः । पित्तेन सह संयुक्तः करोति वदनं त्वचि ॥ नीरुजं तनुकं श्यावं व्यंगं तमिति निर्दिशेत् । कृष्णामेव त्वचं गात्रे नीलिकां तां विनिर्दिशेत्॥
( २८६ ) | माधवनिदान ।
( २८६ ) | माधवनिदान । लिंगको मर्दन करनेसे अथवा रगडनेसे, उसी प्रकार लिंगमें किसी प्रकारकी चोट लगनेसे व्यानवायु कुषित होकर उसके चर्ममें प्रवेश कर सर्वत्र विचरे उस समय वातसंस्पर्श हेतु करके लिंगकी चर्म पृथक् होजाय और शिश्नका कोश सूजकर मणिके नीचे गांठके समान होकर लटके, उसमें पीडा होय, दाह होय और कभी कभी वह पकजाय, इस पीडाको परिवर्त्तिका कहते हैं, यह वातसे होय है और जो कफसे होय तौ उसमें खुजली तथा कठिनता होती हैं ॥ अवपाटिकाके लक्षण । अल्पीयःखां यदा हर्षाद्बलाद्गच्छेत्स्त्रियं नरः । हस्ताभिघातादथवा चर्मण्युद्वर्त्तिते बलात् ॥ ४३ ॥ मर्दनात्पीडनाद्वापि शुक्रवेगविघाततः । यस्यावपाट्यते चर्म तां विद्यादवपाटिकाम् ॥ ४४ ॥ जिसकी योनिका छिद्र बारीक होय ऐसी स्त्रीसे बलपूर्वक मैथुन करनेसे अथवा हाथके अभिघात ( चोट ) से बलसे लिंगके चामको उलटनेसे अथवा मीडनेसे अथवा जोरपूर्वक दाबनेसे अथवा शुक्रके वेगको धारण करनेसे उस पुरुषके लिंगकी चाम फट जाय, इस पीडाको अवपाटिका कहते हैं । इस अवपाटिका रोगमें तीनों दोषोंके लक्षण पृथक् २ होते हैं यह मत भोजकाँ है ॥ निरुद्धप्रकाशके लक्षण । वातोपसृष्टे मेढ्रे तु चर्म संश्रयते मणिम् ॥ ४५ ॥ मणिश्चर्मोपनद्धस्तु मूत्रस्रोतो रुणद्धि च । निरुद्धप्रकशे तस्मिन्मंदधारमवेदनम् ॥ ४६ ॥ मूत्रं प्रवर्त्तते जंतोर्मणिर्निव्रियते न च । निरुद्धप्रकाशं विद्यात्सरुजं वातसंभवम् ॥ ४७ ॥ वायुके योगसे लिंग पीडित होनेसे चामडी सूजकर मणिभागमें प्राप्त होय वह मणि चर्मके संकोच होनेसे मूत्रके मार्गको रोके तब मूत्रका रोध होय, तब उस पुरुषका मूत्र ठहर ठहरकर निकले, परन्तु पीडा नहीं होय और मणि बाहर नहीं निकले, इस रोगयुक्त वातजन्य पीडाको निरुद्धप्रकाश कहते हैं, चर्मके संकोच होनेको निरुद्ध कहते हैं, और मूत्रकी धार मन्द निकलनेको प्रकाश कहते हैं। १ मर्दनादभिघाताद्वा कन्यायोनिप्रपीडनात् । लक्ष्यते यदि मेढ्रस्य चर्म दभारिव क्षतम् ॥ अवपातिकेति तां विद्यात्पृथग्दोषैः समन्विताम् । वातात्सा परुषा रूक्षा शूलनिस्तोदकारिणी ॥ पित्तात्सदाहा रक्ताद्वा दाहतृष्णासमन्विता । श्लैष्मिकी कठिना स्निग्धा कण्डूमत्यल्पवेदना ॥
भाषाटीकासमेत । ( २८७ ) ‘ अवेदनम्’ यह जो मूलमें पाठ है इस जगह कोई ‘ सवेदनम्’ ऐसा कहते हैं। भोज- आचार्यका मत भोजसंहितामें लिखा भी है ॥ सन्निरुद्धगुदके लक्षण । वेगसंधारणाद्वायुर्विहतो गुदसंस्थितः । निरुणद्धि महास्रोतः सूक्ष्मद्वारं करोति च ॥ ४८ ॥ मार्गस्य सौक्ष्म्यात्कृच्छ्रेण पुरीषं तस्य गच्छति । सन्निरुद्धगुदं व्याधिमेनं विद्यात्सुदारुणम् ॥ ४९ ॥ मलमूत्रादिकोंके वेग रोकनेसे गुदाश्रित अपानवायु कुपित होकर महास्रोत ( गुदा ) का अवरोध करे और वह द्वारको छोटा करे, पीछे मार्ग छोटा होनेसे उस पुरुषका मल बडे कष्टसे बाहर निकले, इस भयंकर रोगको सन्निरुद्धगुद कहते हैं । इस रोगमें भी निरुद्धप्रकाशके समान चर्मका संकोच होनेसे सन्निरुद्धगुद होय है अर्थात् अपानवायुके रुकनेसे पुरीष ( मल ) का अनिर्गम होय है ॥ अहिपूतनके लक्षण । शकृन्मूत्रसमायुक्तेऽधौतेऽपाने शिशोर्भवेत् । स्विन्ने वा स्नाप्यमाने वा कण्डूरक्तकफोद्भवा ॥ ५० ॥ ततः कण्डूयनात्क्षिप्रं स्फोटाः स्रावश्च जायते । एकीभूतं व्रणैर्घोरं तं विद्यादहिपूतनम् ॥ ५१ ॥ बालकके मलमूत्र करनेके अनन्तर गुदाके न धोनेसे अथवा पसीना आनेसे तथा धोनेके अनन्तर रुधिर कफसे खुजली उत्पन्न होय, तदनन्तर खुजानेसे शीघ्र फोडा उत्पन्न होय और उनसे स्राव होय; पीछे ये सब मिलकर इस भयंकर व्याधिको प्रगट करें । इसे अहिपूतन कहते हैं । यह रोग बहुधा बाल लोम ( छोटे २ रोम ) में होय है । भोज कहता है कि, यह रोग दुष्टस्तन्यपान अर्थात् माताके दुष्ट दूधके पीनेसे बालकके होय हैं ॥ वृषणकच्छूके लक्षण । स्नानोत्सादनहीनस्य मलो वृषणसंस्थितः । यदा प्रक्लिद्यते स्वेदात्कण्डूः सञ्जायते तदा ॥ ५२ ॥ १ मेढ्रान्ते चर्मणि यदा मारुतः कुपितो भशम् । द्वारं निरुणद्धि शनैः प्रकाशं च मुहुर्भवेत् ॥ मूत्रं मूत्रयते कृच्छ्रात्प्रकाशं तु यदा भवत् । वातोपसृष्टमेढ्रं च मणिनं च विदीर्यते । निरुद्धं च प्रकाशं च व्याधिं विद्यात्सुदारुणम् ॥ २-दुष्टस्तन्यस्य पानेन मलस्याच्छादनेन च । कण्डूदाह- रुजावद्भिः पिडितैश्च समाचिता ॥ अहिपूतना सम्भवति यथादोषं च दारुणा ॥ इति ।
( २८८ ) माधवनिदान ।
( २८८ ) माधवनिदान । कण्डूयनात्ततः क्षिप्रं स्फोटाः स्रावश्च जायते । प्राहुर्वृषणकच्छूं तां श्लेष्मरक्तप्रकोपजाम् ॥ ५३ ॥ जो मनुष्य स्नान करते समय लगेहुए मलको नहीं धोवे, उस पुरुषका मल अण्डकोशोंमें सञ्चित होय पीछे वह पसीना आनेसे गीला होय तब अण्डकोशोंमें घोर पीडा होय और खुजानेसे तत्काल फोडा होय, पीछे वह फोडा स्रवकर आप- समें मिलजाते हैं, कफरक्तसे होनेवाली इस व्याधिको वृषणकच्छू कहते हैं ॥ गुदभ्रंशके लक्षण । प्रवाहणातिसाराभ्यां निर्गच्छति गुदं बहिः । रूक्षदुर्बलदेहस्य गुदभ्रंशं तमादिशेत् ॥ ५४ ॥ जिस पुरुषका देह रूक्ष और अशक्त होय, उस पुरुषके प्रवाहण (कुन्थन) तथा अतीसार हेतुकरके गुदा बाहर निकल आवे, अर्थात् कांच बाहर निकल आवे उस रोगको गुदभ्रंश रोग कहते हैं, इस रोगमें धातुक्षय होनेसे वात कुपित होय है ॥ सूकरदंष्ट्रके लक्षण । सदाहो रक्तपर्यन्तस्त्वक्पाकी तीव्रवेदनः । कण्डूमाञ्ज्वरकारी च स स्याच्छूकरदंष्ट्रकः ॥ ५५ ॥ दाहयुक्त चारों ओर लाल होय, जिसकी त्वचा पकनेवाली होय, तीव्र पीडायुक्त, खुजली संयुक्त तथा ज्वर करनेवाली ऐसी सूजन अथवा व्रण होय उसको सूकरदंष्ट्र अर्थात् वराहदाढ कहते हैं ॥ इति श्रीपंडितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां क्षुद्ररोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ मुखरोगनिदानम् । संख्या । दन्तेष्वष्टावोष्ठयोश्च मूलेषु दश पंच च । नव तालुनि जिह्वायां पंच सप्तदशामयाः ॥ कंठे त्रयः सर्वसरा एकषष्टिचतुःपरे ॥ १ ॥ दन्तरोग ८, होठके रोग ८, दन्तमूलके रोग १५, तालूके रोग ९, जिह्वाके ५, कण्ठके रोग १७, और सर्वसर ३ ऐसे सब मिलकर पैंसठ ६५ मुखरोग हैं, “ये श्लोक माधवके नहीं हैं भोजसंहिताके हैं” ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( २८९ ) तिनमें ८ होठके रोगोंकी संप्राप्ति । अनूपपिशितक्षीरदधिमाषादिसेवनात् । मुखमध्ये गदान्कुर्युः क्रुद्धा दोषाः कफोत्तराः ॥ २ ॥ जलसंचारी प्राणियोंके मांस, दूध, दही, उड़द् आदि पदार्थोंके सेवन करनेसे कुपित भये कफादिक दोष मुखमें रोग उत्पन्न करते हैं ॥ वातिक ओष्ठरोगके लक्षण । कर्कशौ परुषौ स्तब्धौ कृष्णौ तीव्ररुजान्वितौ । दाल्येते परिपाट्येते ओष्ठौ मारुतकोपत: ॥ ३ ॥ वादीके कोपसे होठ कर्कश, खरदरे, कठोर और काले होते हैं उनमें तीव्र पीडा होय व दो टुकडोंके समान होजाय तथा होठकी त्वचा किंचित् फटजाय ॥ पैत्तिकके लक्षण । चीयते पिडिकाभिस्तु सरुजाभिः समन्ततः । सदाहपाकपिडिकौ पीतभासौ च पित्ततः ॥ ४ ॥ पित्तसे होठ चारों ओर फुन्सियोंसे व्याप्त हों, उनमें पीडा होय तथा पकजावे और पीलेसे दीखें इसमें जो दाह और पाक कहे हैं सो विशेषताके सूचक हैं ॥ श्लैष्मिकके लक्षण । सवर्णाभिस्तु चीयेते पिडिकाभिरवेदनौ । भवतस्तु कफादोष्ठौ पिच्छिलौ शीतलौ गुरु ॥ ५ ॥ कफसे होठ त्वचाके समान वर्णवाली फुन्सियोंसे व्याप्त हों, कुछ दूखें, तथा मलाईके समान और शीतल तथा भारी हों ॥ सान्निपातिकके लक्षण । सकृत्कृष्णौ सकृत्पीतौ सकृच्छ्वेतौ तथैव च । सन्निपातेन विज्ञेयावनेकापिडिकान्वितौ ॥ ६ ॥ सन्निपातसे होठ कभी काले, कभी पीले, उसी प्रकार कभी सफेद तथा अनेक प्रकारकी फुन्सियोंसे व्याप्त होयें ॥ रक्तजके लक्षण । खर्जूरफलवर्णाभिः पिडिकाभिर्निपीडितौ । रक्तोपसृष्टौ रुधिरं स्रवतः शोणितप्रभौ ॥ ७ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA