माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
( ३४ ) माधवनिदान ।
( ३४ ) माधवनिदान । विषमज्वरकी सम्प्राप्ति । दोषोऽल्पोऽहितसंभूतो ज्वरोत्सृष्टस्य वा पुनः । धातुमन्यतमं प्राप्य करोति विषमज्वरम् ॥ २७ ॥ जिस मनुष्यके ज्वर औषधादिक सेवन करनेसे शांत होनेके पश्चात् अपथ्य करनेसे वात पित्तादि दोष पुनः थोडे प्रकुपित हों रक्तरसादि धातुओंमेंसे किसी धातुमें प्राप्त हो और उनको दूषित कर विषमज्वर कहिये तृतीयक चतुर्थकादिक ज्वर उत्पन्न करे । वाशब्द करके प्रथमसे ही विषमज्वर होय है यह सूचना करी । यथा-“ आरम्भाद्विषमो यस्तु ” इति । अल्पशब्दसे यह दिखाया कि, यह दोष बलहीन होनेसे कालान्तरमें बलवान् होकर ज्वर करे और जो दोष बलवान् है वह नित्यज्वर करे है । विषमज्वरके लक्षण भालुकिने कहे हैं सो ऐसे कि, अनियत कालमें शीत उष्णकरके विषमवेग ज्वर होय उस ज्वरको विषमज्वर ऐसे कहते हैं । दूसरे लक्षण ऐसे कि, “ मुक्तानुबन्धित्वं विषमत्वम् ” अर्थात् जो ज्वर छोड़ दे और फिर आजावे उसको विषमज्वर ऐसे कहते हैं ॥ धातुगतज्वरके नाम । सततः संततोऽन्येद्युस्तृतीयकचतुर्थकौ । संततं रसरक्तस्थः सोऽन्येद्युः पिशिताश्रितः ॥ २८ ॥ मेदोगतस्तृतीयेऽह्नि ह्यस्थिमज्जगतः पुनः । कुर्याच्चातुर्थिकं घोरमन्तकं रोगसंकरम् ॥ २९ ॥ सन्तत सतत अन्येद्यु ( द्वयाहिक ) तृतीयक ( त्र्याहिक ) जिसको तिजारी कहते हैं और चातुर्थिक जिसको चौथिया कहते हैं ऐसे पांच प्रकारके विषमज्वर हैं ॥ सततशब्दकरके सतत और सन्तत ये दोनों जानने अर्थात् रसस्थ दोष सन्तत ज्वर करे हैं और रक्तस्थ दोष सतत ज्वर करे हैं इससे सन्तत और सतत ये दोनों शब्द केवल संज्ञावाचक हैं सातत्यवाचक नहीं हैं ऐसे जानने । मांसगत अन्येद्युष्क अर्थात् द्वयाहिक ( एकतरा ) को करे हैं और मेदगतदोष तृतीयक ( तिजारी ) ज्वर करे हैं और वेही दोष अस्थिमज्जामें प्राप्त हुए दुःसह मृत्युका कारक अनेक रोगोंसे व्याप्त ऐसा चातुर्थिक ज्वर प्रगट करे हैं ॥ संततज्वरके लक्षण । सप्ताहं वा दशाहं वा द्वादशाहमथापि वा । संतत्या योऽविसर्गी स्यात्संततः स निगद्यते ॥ ३० ॥ १ “ यः स्यादनियतकालाच्छीतोष्णाभ्यां तथैव च । वेगतश्चापि विषमो ज्वरः स विषमो मतः ” ॥
भाषाटीकासमेत । ( ३५ ) सात दिनपर्यंत किंवा दश दिनपर्यंत किंवा बारह दिनपर्यन्त एकसा जो ज्वर निरन्तर रहे और उतरे नहीं तिसको सन्ततज्वर कहते हैं । सात दश बारह ये जो कहे सो अनुक्रम करके वात पित्त कफ इनके उल्बणसे कहे हैं, यह संततज्वर त्रिदो- षज है कारण इसका बारह पदार्थोंका साथ होता है । ऐसे वातादिदोष धातुके प्रमाण मूत्र और मल इनको एक ही समय ग्रसकर सन्ततज्वर उत्पन्न करते हैं । बारह पदार्थ ये हैं-वातादिदोष ३ सप्त धातु ७ मूत्र १ और मल १ मिलकर बारह हुए ॥ सततकादिकोंके लक्षण । अहोरात्रे सततको द्वौ कालाव्नुवर्त्तते । अन्येद्युष्कस्त्वहोरात्र- मेककालं प्रवर्त्तते ॥ ३१ ॥ तृतीयकस्तृतीयेऽह्नि चतुर्थेऽह्नि चतुर्थकः । केचिद्भूताभिपंगोत्थं वदंति विषमज्वरम् ॥ ३२ ॥ काल छः हैं-१ पूर्वाह्न, २ मध्याह्न, ३ अपराह्न, ४ प्रदोष, ५ अर्द्धरात्रि, ६ प्रत्यूष. पूर्वाह्न प्रदोष ये कफके काल हैं, मध्याह्न और अर्धरात्रि ये पित्तके काल हैं, अपराह्न और प्रत्यूष ये वातके काल हैं । सन्ततज्वर दिनरातमें दो समय आता है, ईशानदेव कहते हैं कि, दिनके दो वेला अर्थात् दो वार, रात्रिके दो वेला अथवा दिनके एक वेला और रात्रिके एक वेला, एकके दो वेला अमुक वेलामें आवेगा जैसे ज्वरके आनेका समय नहीं कहा है । अन्येद्युष्कज्वर अहोरात्रिमें एक वेलामें आता है, तृतीयकज्वर जिस दिन आता है उसके तीसरे दिन फिर आता है और चातुर्थिक चौथे दिन आता है और कोई आचार्य इस विषम ज्वरको भूताभिषं- गोत्थ कहते हैं, यह मत सुश्रुताचार्यकोही मान्य है अर्थात् उसने विषमज्वरपर बलि होमादि भूतोचित और कषायपानादिक दोषोचित ऐसी चिकित्सा कही है और विषमज्वर ये प्रायशः आगंतुकका सम्बन्धी है यह चरकने कहा है ॥ उत्कृष्टदोषभेदकरके तृतीयक चतुर्थकोंके दूसरे लक्षण । कफपित्तात्त्रिकग्राही पृष्ठाद्वातकफात्मकः । वातपित्ताच्छिरोग्राही त्रिविधः स्यात्तृतीयकः ॥ ३३ ॥ चातुर्थिको दर्शयति प्रभावं द्विविधं ज्वरः । जङ्घाभ्यां श्लैष्मिकः पूर्वं शिरसोऽनिलसंभवः ॥ ३४ ॥ तृतीयक ज्वर कफ पित्तके जोरसे त्रिकस्थान ( तीन हड्डी ) में पीडा करे है वात कफके जोरसे पीठमें पीडा करे है, वात पित्तके जोरसे मस्तकमें पीडा करे है, ऐसे तृतीयकज्वर तीन प्रकारका है । त्रिकंग्राही जो इसका तात्पर्य यह है कि, त्रिक १ त्रिक कहिये कमर और जंघाके मध्यकी तीन हड्डी ।
( ३६ ) माधवनिदान ।
( ३६ ) माधवनिदान । वातका स्थान है उसके स्थानमें कफ पित्त दूसरेके स्थानमें पहुँचनेसे निर्बल हो जाते हैं इससे तीसरे दिन ज्वर करते हैं । यदि कफ पित्त स्वस्थानपर स्थित होय तो सन्ततज्वरको करते हैं यह जैज्जटका मत है। ऐसेही मस्तक कफका स्थान है और पीठ पित्तका स्थान है इनमें दूसरे दोषोंके पहुँचनेसे दुर्बल होकर तृतीयक ज्वर करते हैं। शंका-यदि त्रिक वातका स्थान है तो फिर आप पित्त कफका उस स्थानमें गमन कैसे कहते हो ? उत्तर-यह स्थानका नियम प्रकृतिस्थित दोषोंका कहा है कुपित दोषोंका नहीं कहा है क्योंकि कुपित दोषोंका सर्वत्र गमन होता है यह सुश्रु- तका मत है। ऐसेही दोषोंका अन्यस्थानगतत्व होनेसे तथा दोषोंका निर्बलत्व होनेसे चातुर्थिक ज्वरमें भी जानना । चातुर्थिक ज्वर दो प्रकारकी शक्ति दिखाता है सो ऐसे-कफ अधिक जिसमें होवे वह प्रथम जंघाओंमें व्याप्त होकर पश्चात् सर्व देहमें व्याप्त होता है और वात अधिक जिसमें होवे वह पहले मस्तकमें व्याप्त होकर पीछे सर्व देहमें व्याप्त होता है । पांच प्रकारके विषमज्वर प्रायशः सन्निपातसे प्रगट होते हैं यह चरकका मत है । हारीत ऋषि कहते हैं कि चातुर्थिकज्वरमें पित्त प्रधान है। इन विषम ज्वरोंका उत्पत्तिक्रम वृद्धसुश्रुतमें इस प्रकारका लिखा है कि, कफके पांच स्थान हैं। उनमें जिस जिस स्थानमें दोष प्राप्त होते हैं वहां उसी २ विषमज्वरकों प्रगट करते हैं । उन पांच स्थानोंके नाम-आमाशय १, हृदय २, कण्ठ ३, शिर ४ और सन्धि ५ । तहां आमाशयमें दोष पहुँचनेसे सन्ततकज्वर दो समय आता है, हृदय स्थित दोष आमाशयमें आनेसे एकान्तरा एक समय आता है, कण्ठमें स्थित दोष एक दिनमें हृदयमें आता है, दूसरे दिन आमाशयमें प्राप्त हो ज्वर करे उसै तृतीयक (तिजारी) कहते हैं, शिरमें स्थित जो दोष सो क्रमसे कण्ठ हृदय और आमाशयमें तीन दिनमें प्राप्त हो चतुर्थ दिवस चातुर्थिक ज्वर प्रगट करते हैं और उन दोषोंको उलटकर पुनः स्वस्थानमें पहुँचना उसी दिन होता है क्योंकि, दोष वेगवान् होते हैं और दोष सन्धिस्थित होते हैं तब प्रलेपक ज्वर प्रगट करते हैं,' ये विषमज्वरके समान ज्वर हैं. कारण इसका यह है कि, सन्धि आमाशयमें स्थित है और सुश्रुतने कहा है कि प्रलेपक यह विषम ज्वर है धातुशोष रोगियोंकों क्लेशका देनेवाला है ॥ विषमज्वरके भेद । विषमज्वर एवान्यश्चातुर्थिकविपर्ययः । स मध्येऽह्नि ज्वरयति ह्याद्यन्ते विमुञ्चति ॥ ३५ ॥ १ कुपितानां हि दोषाणां शरीरं परिधावताम् । यत्र संगः खवैगुण्याद्व्याधिस्तत्रोपजायते ॥ २ प्रायशः सन्निपातेन दृष्टः पञ्चविधो ज्वरः । सन्निपाते तु यो भूयात् स दोषः परिकीर्तितः॥
भाषाटीकासमेत । ( ३७ ) चातुर्थिक ज्वरका उलटा यह दूसरा विषमज्वर है, यह प्रथम और अंतका दिन छोड़कर बीचके दो दिन आता है जैसे यह चातुर्थिकका विपर्यय है तैसे ही तृती- यक आदिका भी विपर्यय होता है, उनको कहते हैं-जैसे बीचके एक दिन ज्वर आवे और आदि अन्तके दिन नहीं आवे यह तृतीयकका विपरीत और जो एक काल छोड़कर सब दिन रात्रि ज्वर रहे वह अन्येद्युष्क इकन्तरेका विपरीत जानना । इनके विषयमें ग्रन्थकारोंके भिन्न भिन्न मत हैं, विस्तारके भयसे इस जगह नहीं लिखे हैं ॥ वातबलासकज्वर । नित्यं मन्दज्वरो रूक्षः शूनकस्तेन सीदति । स्तब्धाङ्गः श्लेष्मभूयिष्ठो नरो वातबलासकी ॥ ३६ ॥ वातबलासक नामक ज्वर जिस मनुष्यके हो वह उस ज्वरकरके शोथयुक्त अर्थात् सूजन हो और मन्दज्वर सदैव बना रहे, देह रूखी हो, अंग जकड जावे, कफ विशेष होय यह ज्वर वात और कफसे होता है इसको वातबलासकज्वर कहते हैं ॥ प्रलेपकज्वर । प्रलिम्पन्निव गात्राणि घर्मेण गौरवेण च । मन्दज्वरविलेपी च स शीतः स्यात्प्रलेपकः ॥ ३७ ॥ जिस ज्वरमें पसीनासे तथा सूर्यके घामसे अथवा देहके गौरवसे मानो देहको लिप्त करदियासा मालूम हो इसी हेतुसे मन्दज्वर हो, शीत लगे, यह ज्वर कफपित्तसे प्रगट होता है और राजयक्ष्मारोगमें यह होता है, कोई इसको त्रिदोषजनित कहते हैं, इसको प्रलेपकज्वर कहते हैं ॥ विषमज्वरविशेषभेद । विदग्धेऽन्नरसे देहे श्लेष्मपित्ते व्यवस्थिते । तेनार्धं शीतलं देहमर्धमुष्णं प्रजायते ॥ ३८ ॥ अन्नका रस दुष्ट होनेसे और देहमें कफ पित्त दुष्ट होकर स्थित होनेसे ( अर्ध- नारीश्वररूप अथवा नरसिंहरूप ) अर्धांगज्वर प्रगट करे हैं अर्थात् अर्धदेह कफसे शीतल और अर्धदेह पित्तसे गरम होता है ॥ १ वातबलासल्लक्षणं ग्रन्थान्तरे-"बलासो वायुना युक्तः शीतादि षडहो ज्वरम् । जनये- न्नयनस्रावं हृत्पीडां मधुरास्यताम् ॥" २ प्रलेपकस्त्वत्रविषमः प्रायः क्लेशाय शोषिणाम् । अन्ये रात्रिञ्चरादयोऽपि विषमज्वरा बोद्धव्याः, यथोक्तम्-समौ वातकफौ यस्य क्षीणपित्तस्य देहिनः । रात्रौ प्रायो ज्वरस्तस्य दिवा हीनकफस्य तु ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३८ ) माधवनिदान ।
( ३८ ) माधवनिदान । काये दुष्टं यदा पित्तं श्लेष्मा चान्ते व्यवस्थितः । तेनोष्णत्वं शरीरस्य शीतत्वं हस्तपादयोः ॥ ३९ ॥ जिस मनुष्यके कोठेमें पित्त दुष्ट हो और कफ हाथ पैरोंमें दुष्ट होकर स्थित होवे तिस करके सब देह उष्ण रहे और हाथ पग शीतल रहें ॥ इन्होंका विपरीत द्वितीय ज्वर । काये श्लेष्मा यदा दुष्टः पित्तं चान्ते व्यवस्थितम् । शीतत्वं तेन गात्राणामुष्णत्वं हस्तपादयोः ॥ ४० ॥ जिस समय कोठेमें कफ दुष्ट हो और पित्त हाथ पैरोंमें दुष्ट होकर रहे तब शरीर शीतल हो और हाथ पैर उष्ण होंयँ ॥ शीतपूर्वकज्वरके लक्षण । त्वक्स्थौ श्लेष्मानिलौ शीतमादौ जनयतो ज्वरम् । तयोः प्रशान्तयोः पित्तमन्ते दाहं करोति च ॥ ४१ ॥ कफ और वात ये दुष्ट होकर त्वचा में प्राप्त हों अर्थात् रसधातुका आश्रय कर प्रथम शीतज्वर उत्पन्न करते हैं और जब इनका वेग शांत होता है तब पिछाडी पित्त दाह करे है ॥ दाहपूर्वकज्वरके लक्षण । करोत्यादौ तथा पित्तं त्वक्स्थं दाहमतीव च । तस्मिन्प्रशान्ते त्वितरौ कुरुतः शीतमन्ततः ॥ ४२ ॥ द्वावेतौ दाहशीतादिज्वरौ संसर्गजौ स्मृतौ । दाहपूर्वस्तयोः कष्टः सुखसाध्यतमोऽपरः ॥ ४३ ॥ उसी प्रकार पहिले पित्त रसगत होकर अत्यन्त दाह करे है, पीछे उसका वेग शांतहुएपर वात कफ ये शीत करते हैं । दाहपूर्वक और शीतपूर्वक ये दोनों ज्वर संसर्ग अर्थात् त्रिदोषोंके सम्बन्धसे होते हैं, ऐसे ऋषियोंने कहा है उनमें दाहपूर्वक ज्वर दुःखप्रद और कृच्छ्रसाध्य है और शीतपूर्वक ज्वर सुखसाध्य है ॥ सप्तधातुगत ज्वर । रसगतज्वरके लक्षण । गुरुता हृदयोत्क्लेशः सदनं छर्द्यरोचकौ । रसस्थे तु ज्वरे लिङ्गं दैन्यं चास्योपजायते ॥ ४४ ॥ रसधातुमें स्थित ज्वर होय तो देह भारी, दोषोंको हृदयमें स्थित होनेसे उपस्थित वमनसी मालूम हो, ग्लानि,ओकारी,अरुचि और दैन्य कहिये मनमें खेद ये चिह्न होते हैं॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( ३९ ) रक्तगत ज्वरके लक्षण । रक्तनिष्ठीवनं दाहो मोहश्छर्दनविभ्रमौ । प्रलापः पिटिका तृष्णा रक्तप्राप्ते ज्वरे नृणाम् ॥ ४५ ॥ रुधिरका गिरना, दाह, मोह, वमन, भ्रम, अनर्थ बोलना, देहमें फुन्सी, प्यास ये लक्षण रक्तगत ज्वरके होनेसे होते हैं ॥ मांसगत ज्वरके लक्षण । पिण्डिकोद्वेष्टनं तृष्णा सृष्टमूत्रपुरीषता । ऊष्मान्तर्दाहविक्षेपौ ग्लानिः स्यान्मांसगे ज्वरे ॥ ४६ ॥ जानुके नीचे पिंडलियोंमें दण्ड आदिके लगनेकीसी पीडा, प्यास, मल मूत्रका निकलना, गरमी, अन्तर्दाह, हाथ पैरोंका इधर उधर पटकना और ग्लानि ये लक्षण जब मांसमें ज्वर पहुँच जाय है तब होते हैं ॥ मेदोगत ज्वरके लक्षण । भृशं स्वेदस्तृषा मूर्च्छा प्रलापश्छर्दिरेव च । दौर्गन्ध्यारोचकौ ग्लानिर्मेदस्थे चासहिष्णुता ॥ ४७ ॥ अत्यन्त पसीनेका आना, प्यास, मूर्च्छा, प्रलाप, वमन, देहमें दुर्गन्ध, अन्नमें अरुचि, ग्लानि और वेदना न सही जाय ये लक्षण मेदोगतज्वरमें होते हैं ॥ अस्थिगत ज्वरके लक्षण । भेदोऽस्थां कूजनं श्वासो विरेकश्छर्दिरेव च । विक्षेपणं च गात्राणामेतदस्थिगते ज्वरे ॥ ४८ ॥ हाड फूटना तथा हाडोंका गूंजना, श्वास, दस्तका होना, वमन, हाथ पैरका चलना ये अस्थिगत ज्वरके लक्षण हैं ॥ मज्जागत ज्वरके लक्षण । तमःप्रवेशनं हिक्का कासः शैत्यं वमिस्तथा । अन्तर्दाहो महाश्वासो मर्मच्छेदश्च मज्जगे ॥ ४९ ॥ अन्धेरा आना, हिचकी, खांसी, शीत लगे, वमन, अन्तर्दाह, महाश्वास अर्थात् जो श्वासके निदानमें कहेंगे और मर्ममें पीडा यह मर्म शब्द इस जगह हृदयवाचक है अर्थात् हृदयमें पीडा हो ये मज्जागत ज्वरके लक्षण हैं ॥ शुक्रगत ज्वरके लक्षण । मरणं प्राप्नुयात्तत्र शुक्रस्थानगते ज्वरे । शेफसः स्तब्धता मोक्षः शुक्रस्य च विशेषतः ॥ ५० ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ४० ) माधवनिदान ।
( ४० ) माधवनिदान । रसादि धातुगत ज्वर शुक्रस्थानमें पहुंचनेसे रोगीका मरण होता है, इस ज्वरमें लिंगका जकडजाना और शुक्रका विशेष छूटना और सुश्रुतादिक आचार्य कहते हैं कि रक्तादि पदार्थोंका थोडा २ स्राव होता है ॥ प्राकृत और वैकृत ज्वरका लक्षण । वर्षाशरद्वसन्तेषु वाताद्यैः प्राकृतः क्रमात् । वैकृतोऽन्यः सुदुःसाध्यः प्राकृतश्चानिलोद्भवः ॥ ५१ ॥ वर्षाऋतु शरदृतु और वसंतऋतु इसके मध्यमें वातादिकके क्रमसे जो ज्वर होय वह प्राकृत कहाता है जैसे वर्षाकालमें वातज्वर, शरत्कालमें पित्तज्वर और वसन्त कालमें कफज्वर, इससे विपरीत जो ज्वर हो उसको वैकृतज्वर कहते हैं जैसे-वर्षा- कालमें पैत्तिक, शरदऋतुमें श्लैष्मिक और वसन्तऋतुमें वातिक, यह वैकृतज्वर दुःसाध्य है अर्थात् प्राकृत ज्वर सुखसाध्य है और वातजन्य प्राकृत ज्वर यह भी दुःसाध्य है और रोगोंमें प्राकृतत्व दुःसाध्य है परन्तु ज्वरमें व्याधिस्वभाव करके सुखसाध्यत्व कहा है ॥ प्राकृतज्वरोंकी चिकित्साके निमित्त उत्पत्तिक्रम कहते हैं- वर्षासु मारुतो दुष्टः पित्तश्लेष्मान्वितो ज्वरम् । कुर्याच्च पित्तं शरदि तस्य चानुबलः कफः ॥ ५२ ॥ तत्प्रकृत्या विसर्गाच्च तत्र नानशनाद्भयम् । कफो वसन्ते तमपि वातपित्तं भवेदनु ॥ ५३ ॥ ग्रीष्मऋतुसे संचित हुआ वायु वर्षाकालमें कुपित हो पित्त कफयुक्त हो ज्वरको प्रगट करे है उसी प्रकार वर्षाकालमें संचित हुआ पित्त शरदृतुमें दुष्ट होकर ज्वरको उत्पन्न करे है उसको कफका अनुबन्ध होता है । उस ज्वरमें कफ पित्तके स्वभाव करके और विसर्ग काल करके लंघन करनेसे भय नहीं होय । तैसे ही १ यदुक्तम्-प्राकृतः सुखसाध्यस्तु वसंतशरदुद्भवः॥२ ज्वरे तुल्यर्तुदोषत्वं प्रमेहे तुल्यदूष्यता । रक्तगुल्मे पुरातनत्वं सुखसाध्यस्य लक्षणम् ॥ ३ अनुबलं यथा-स्वतंत्रस्य कस्यचिद्राज्ञो गजरथ- तुरगपुरुषादिबलवतो वैरिभिः सह युध्यमानस्य पश्चादन्यबलं तच्छक्तेरनुबलोपबृंहणार्थमागच्छति एवं स्वतन्त्रस्य पित्तस्य ज्वरं कुर्वतो बलोपबृंहणं शरदि कफः करोति, तयोः पित्तश्लेष्मणोः प्रकृत्या स्वभावेन तत्कृतयोर्ज्वरयोरनशनाल्लंघननाद्भयं न भवतीति ॥ वर्षा शरद और हेमंत ये विसर्गकाल हैं इनमें चन्द्रमाका बल रहे है इनमें प्राणोंका बल बढे है। और शिशिर वसन्त ग्रीष्म ये आदानकाल हैं इनमें सूर्य्यका बल अधिक होता है इसीसे प्राणोंका बलक्षीण होता है ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
निदानोक्तानुपशयो विपरीतोपशायिता ॥ ५४ ॥
भाषाटीकासमेत । (४१) हेमन्तकालमें सञ्चित भया कफ वसन्तकालमें ज्वर उत्पन्न करे है तिसके पिछाडी वात पित्त सहायक होते हैं ॥ काले यथास्वं सर्वेषां प्रवृत्तिर्वृद्धिरेव वा । निदानोक्तानुपशयो विपरीतोपशायिता ॥ ५४ ॥ वातादिकोंकी यथायोग्य अपने कालमें उत्पत्ति और वृद्धि होवै है अथवा उत्पत्ति नित्य ज्वरकी और वृद्धि विषमज्वरकी होती है जैसे-कालमें ये दोष विशेष जान- नेके लक्षण हैं उसी प्रकार उपशय और अनुपशय भी रोग जाननेके कारण हैं । सो इस प्रकार जानना-निदानत्व करके जो आहार विहार कहे हैं उनसे सेवन करनेको अनुपशय कहिये दुःखकी उत्पत्ति होती है और दोषोंके विपरीत जो आहार विहार उन्होंसे उपशायिता कहिये सुखकी उत्पत्ति होय है ॥ अन्तर्दाहोऽधिका तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः । सन्ध्यस्थिशूल- मस्वेदो दोषवचोर्विनिग्रहः ॥ ५५ ॥ अन्तर्वेगस्य लिङ्गानि ज्वरस्यैतानि लक्षये । सन्तापोऽभ्यधिको बाह्यस्तृष्णादीनां च मार्दवम् ॥ बहिर्वेगस्य लिङ्गानि सुखसाध्यत्वमुच्यते ॥ ५६ ॥ पिछाडी जो ज्वर कहे हैं उन्होंमें सम्प्राप्तिके भेदसे कोई एक ज्वर अंतर्वेग होता है और कोई ज्वर बहिर्वेग होता है तिन दोनोंके लक्षण कहते हैं-अंतर्दाह, अतितृषा, बड़बडाना, श्वास, भ्रम, संधि और हाड इनमें पीडा, पसीना न आवे, वायु और मलका बाहर न निकलना ये अंतर्वेगज्वरके लक्षण जानने । शरीरके बाहर संताप अधिक होवे, तृष्णादिक लक्षण थोडे होवें, ये बहिर्वेगज्वरके लक्षण हैं यह ज्वर सुखसाध्य है इस ज्वरके सुखसाध्य कहनेसे अंतर्वेगज्वर कृच्छ्रसाध्य और असाध्य हैं; यह सूचना करी ॥ चिकित्सा करनेके निमित्त आम पच्यमान और निराम ज्वरके लक्षण कहते हैं- लालाप्रसेकहृल्लासहृदयाशुद्ध्यरोचकाः। तन्द्रालस्याविपाकास्य- वैरस्यं गुरुगात्रता ॥ ५७ ॥ क्षुन्नाशो बहुमूत्रत्वं स्तब्धता बलवाञ्ज्वरः । आमज्वरस्य लिङ्गानि न दद्यात्तत्र भेषजम्॥५८॥ भेषजं ह्यामदोषस्य भूयो जनयति ज्वरम् । शोधनं शमनीयं च करोति विषमज्वरम् ॥ ५९ ॥ लारका गिरना, खाली ओकारीका आना, हृदयमें जडत्व, अरुचि, तंद्रा, आलस्य, अन्नका परिपाक न होना, मुखका स्वाद जाता रहे, देह भारी, भूखका नाश, वारं- बार मूतना, देहका जकडना, देहमें बलवान् ज्वर हो ये अपक्व ज्वरके लक्षण जानने,
( ४२ ) माधवनिदान ।
( ४२ ) माधवनिदान । इस ज्वरमें वैद्य औषधी न दे, अपक्व ज्वरमें औषधि देनेसे ज्वरकी वृद्धि होती है और शोधन तथा शमन औषध देनेसे विषमज्वरको करे हैं ॥ ज्वरके दश उपद्रव । श्वासो मूर्च्छाऽरुचिस्तृष्णा छर्द्यतीसारविङ्ग्रहः । हिक्का श्वासोऽङ्गदाहश्च ज्वरस्योपद्रवा दश ॥ ६० ॥ भावप्रकाशके मतसे दश उपद्रवोंको कहते हैं-श्वास, मूर्च्छा, अरुचि, प्यास, वमन, अतीसार, मलका रुकना, हिचकी, खांसी, देहमें दाह ये ज्वरके दश उपद्रव हैं ॥ पच्यमान ज्वरके लक्षण । ज्वरवेगोऽधिका तृष्णा प्रलापः श्वसनं भ्रमः । मलप्रवृत्तिरुत्क्लेशः पच्यमानस्य लक्षणम् ॥ ६१ ॥ ज्वरका वेग, अधिक प्यास, प्रलाप, भ्रम, मलकी प्रवृत्ति, उपस्थित वमनसी मालूम होय ये पच्यमान ज्वरके लक्षण हैं ॥ पक्वज्वर किंवा निरामज्वरके लक्षण । क्षुत्क्षामता लघुत्वं च गात्राणां ज्वरमार्दवम् । दोषप्रवृत्तिरुत्साहो निरामज्वरलक्षणम् ॥ ६२ ॥ भूखका लगना, देहका कृश होना, अंगोंका हलकापना, मन्द ज्वरका आना, अधोवायुकी प्रवृत्ति होना, मनमें उत्साहका होना ये निरामज्वरके लक्षण जानने ॥ ग्रन्थांतरसे जीर्णज्वरके लक्षण । त्रिःसप्ताहे व्यतीते तु ज्वरो यस्तनुतां गतः । प्लीहाग्निसार्द कुरुते स जीर्णज्वर उच्यते ॥ ६३ ॥ २१ दिवस व्यतीत होनेपर जो ज्वर बारीक हो देहमें रहे जिससे प्लीहा अर्थात् तापातिल्ली रोग और मन्दाग्नि होवे उसको जीर्णज्वर कहते हैं ॥ साध्यज्वरके लक्षण । बलवत्स्वल्पदोषेषु ज्वरः साध्योऽनुपद्रवः । बलवान् पुरुषके थोडे दोषयुक्त और श्वास आदि उपद्रव करके रहित जो ज्वर हो वह साध्य जानना । असाध्यज्वरके लक्षण । हेतुभिर्बहुभिर्जातो बलिभिर्बहुलक्षणः । ज्वरः प्राणान्तकृद्यश्च शीघ्रमिन्द्रियनाशनः ॥ ६४ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu..Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( ४३ ) जो ज्वर बहुत प्रबल कारणोंसे उत्पन्न भया हो और जिसमें सम्पूर्ण लक्षण मिलते हों वह ज्वर प्राणोंका हरण करनेवाला जानना और जो ज्वर प्रगट होते ही चिकित्सा करते २ इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट कर दे अर्थात् अन्धा बहिरा इत्यादि वह भी ज्वर असाध्य जानना ॥ ज्वरः क्षीणस्य शूनस्य गम्भीरो दैर्घ्यरात्रिकः । असाध्यो बलवान् यश्च केशसीमन्तकृज्ज्वरः ॥ ६५ ॥ जो पुरुष ज्वरसे क्षीण पडगया हो अथवा सूजन जिसके देहमें आगई हो वह असाध्य है और जिसके ज्वर धातुके भीतर हो अथवा अन्तर्वेगज्वर अथवा जिसमें वातादि दोषोंका निश्चय न होसके और बहुत दिनतक रहनेवाला ज्वर असाध्य होता है और ज्वर बलवान् हो तथा जिसमें रोगी अपने हाथसे केशों ( बालों ) की सीमन्त आदि रचना करे वह ज्वर असाध्य है ॥ गम्भीरज्वरके लक्षण । गम्भीरस्तु ज्वरो ज्ञेयो ह्यन्तर्दाहेन तृष्णया । आनद्धत्वेन चात्यर्थं श्वासकासोद्गमेन च ॥ ६६ ॥ अन्तर्दाह, प्यास, दोष अर्थात् विरुद्ध दोषके बढनेसे मलके रुकनेसे तथा श्वास खांसीके उत्पन्न होनेसे गम्भीर ज्वर जानना ॥ दूसरे असाध्यज्वरके लक्षण । आरम्भाद्विषमो यस्य यस्य वा दैर्घ्यरात्रिकः । क्षीणस्य चातिरूह्क्षस्य गम्भीरो हन्ति मानवम् ॥ ६७ ॥ विसंज्ञस्ताम्यते यस्तु शेते निपतितोऽपि वा । शीतार्दितोऽन्तरुष्णश्च ज्वरेण म्रियते नरः ॥ ६८ ॥ जो ज्वर प्रगट होते ही विषम पड जांय और जो ज्वर बहुत दिनसे आया करे और क्षीण तथा अतिरूक्ष देहवाले पुरुषके जो गम्भीर ज्वर हो वह मृत्युकारक होता है और जो बेहोश होकर मोहको प्राप्त हो तथा गिरकर जिससे उठा न जाय पडाही रहे अथवा बाहरी शीत लगे और देहके भीतर दाह हो ऐसे ज्वरवाला पुरुष मरजावे ॥ और असाध्य लक्षण । यो हृष्टरोमा रक्ताक्षो हृदि संघातशूलवान् । वक्त्रेण चैवो- च्छ्वसिति तं ज्वरो हन्ति मानवम् ॥ ६९ ॥ हिक्काश्वासतृषा- CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ४४ ) माधवनिदान ।
( ४४ ) माधवनिदान । युक्तं मूढं विभ्रान्तलोचनम् । संततोच्छ्वासिनं क्षीणं नरं क्षप- यति ज्वरः ॥ ७०॥ हतप्रभेन्द्रियं क्षाममरोचकनिपीडितम् । गम्भीरतीक्ष्णवेगात्तं ज्वरितं परिवर्जयेत् ॥ ७१ ॥ जिसके देहमें रोमांच खडे रहें, लालनेत्र हों, हृदयमें गांठ होनेसे जैसी पीडा हो वैसा हो और संघात इस पदका यह अर्थ करते हैं कि, नाना प्रकारका शूल हो मुखके द्वारा श्वास ले वह ज्वर रोगी मनुष्यको मार डाले । हिचकी श्वास प्यास इन करके व्याप्त हो, मोहयुक्त हो चलायमान नेत्र हों, निरंतर श्वास ले ऐसे लक्षणयुक्त मनुष्यको ज्वर मार डालता है। इन्द्रियोंकी शक्ति नष्ट होनेसे और शरीरकी कांति निस्तेज होनेसे अथवा इन्द्रिय ( नाक कान नेत्र ) ये नष्ट हो जावें, देह कृश हो जावे, अरुचिसे अत्यंत पीडित हो “अरोचकनिपीडितम्” इसका इस जगह जैज्जटने दो पाठ लिखे हैं एक तो— “दुरात्मानमुपद्रुतम्” इसका अर्थ यह है कि, दुष्ट अंतःकरण होवे और उपद्रवयुक्त होवे । दूसरा पाठ यह है कि “दुरात्मभिरुपद्रुतम्” अर्थात् राक्षसादि- करके युक्त हो तथा अतिघोर अन्तर्वेग करके परिपीडित हो ऐसे ज्वरवान् पुरुषको वैद्य छोडदेवे। इसी जगह कई एक टीकाकारोंने जो असाध्यलक्षण लिखे हैं सो आतंक- दर्पण तथा मधुकोश टीकासे लिखे हैं वे सब वाग्भट और हारीतके कालज्ञान देख- नेसे निश्चय हो जायँगे सो लेवे, इस जगह हम ग्रन्थ बढनेके भयसे नहीं लिखते ॥ ज्वरमुक्तिके पूर्वरूप । दाहः स्वेदो भ्रमस्तृष्णा कम्पो विड्भिदसंज्ञिता । कूजनं चातिवैगन्ध्यमाकृतिर्ज्वरमोक्षणे ॥ ७२ ॥ दाह, पसीना, भ्रम, प्यास, कंप, मलका पतला होना, संज्ञाका नाश होना, गूंजे, देहमें अत्यंत दुर्गंध आवे ये लक्षण ज्वर छोडता है तब होते हैं. शंका--क्यों जी ! दोष ( वात पित्त कफ ) नाशके बिना रोगकी निवृत्ति होय नहीं और जब दोष क्षीण होगये तो उस दाहादिलक्षण कैसे करते हैं ? उत्तर--इसका कारण यह है कि, कोई एक वस्तुका ऐसा स्वभाव है कि क्षीण होनेके समयमें अपनी शक्तिको दिखाती है जैसे दीपकमें तेल नहीं रहे और थोडी देर बलकर शांत हो जाता है ऐसेही जब दोष शांत होनेको होते हैं तब अपनी शक्ति दाहादिकोंको दिखाते हैं । अथवा दूसरा उत्तर यह है कि, जैसे बंदर वृक्षकी डालीको हिलायकर दूसरे स्थानपर चलाजाता है परन्तु वह वृक्षकी डाली बहुत देरपर्यंत हिला करती है इसी प्रकार ज्वर गयेपर भी उसके असरसे दाहादिक रहते हैं यह लक्षण दाहसे आदि ले त्रिदोष ज्वरके शांत होनेके समय होते हैं और सब ज्वरोंमें नहीं होते और ज्वरमें केवल पसीने ही आते हैं यह भालुकी आचार्यका मत है ॥
इति ज्वरनिदानम् ॥
भाषाटीकासमेत । ( ४६ ) ज्वरमुक्तिके लक्षण । स्वेदो लघुत्वं शिरसः कण्डूः पाको मुखस्य च । क्षवथुश्चान्नकांक्षा च ज्वरमुक्तस्य लक्षणम् ॥ ७३ ॥ इति ज्वरनिदानम् ॥ पसीने आवें, देह हलका हो, मस्तकमें खुजली चले, मुखका पाक अर्थात् होठोंमें पपडी पडजाय, छींक आवे, भोजन करनेकी इच्छा हो ये लक्षण ज्वरमुक्तके हैं ॥ प्रसंगवशाज्ज्वरमुक्तलक्षणं ग्रन्थान्तरे- देहो लघुर्व्यपगतक्लममोहतापः पाको मुखे करणसौष्ठवमव्यथत्वम् । स्वेदः क्षवः प्रकृतियोगिमनोऽन्नलिप्सा कण्डूश्च मूर्ध्नि विगतज्वरलक्षणानि ॥ १ ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा- टीकायां ज्वरनिदानं समाप्तम् ॥ इंग्रेजी मतानुसार ज्वर निदान । ज्वरको इंग्रेजीमें ( Fever ) फीवर कहते हैं उसकी उत्पत्ति । १--शरदी । शरदी पडनेसे मनुष्यका सब देह रोमांचबद्ध होजाय तब पसीनेका निकलना रुकजाय इस हेतुसे देहका जो अवगुण सो देहके बाहर नहीं निकले इसीसे देह हलका नहीं होय और वही देहका अवगुण ज्वररोगको प्रगट करता है । इस ज्वरको सामान्य ज्वर कहते हैं। अथवा देह अतिगरमीसे पीडित होय उस समय किसी कारणसे शीतल करे तो शरदी होती है अथवा किसी अतिपरिश्रम करनेसे मनुष्यके देहसे पसीने निकलें उस समय हवामें बैठे अथवा हवामें शयन करनेसे शरदी होती है अथवा रातमें मैदानमें सोनेसे अथवा रातमें शीतलपवनके लगनेसे पसीना नहीं निकले इस हेतुसे शरदी होय अथवा गीला कपडा ओढकर बैठनेसे वा सोनेसे शरदी होय है इन कारणोंसे शरदी होय वह शरदी अनेक प्रकारके ज्वरोंकी उत्पत्ति करे है ॥
( ४६ ) माधवनिदान ।
( ४६ ) माधवनिदान । २--मन्दवायु । जिस समय पृथ्वीमें वर्षाका अथवा और प्रकार जल सूखे उसमें घास पत्ता सड़- जावें तब इनसे मन्द वायु अथवा बाष्प उत्पन्न होय तिसके द्वारा अनेक प्रकारके ज्वर प्रगट होवें, विशेषकरके आमज्वरकी अधिक उत्पत्ति होय इसीसे जलाशयस्थान तालाब आदि और झील खाल इन स्थानोंमें मन्दवायु अधिक होता है इससे नाना प्रकारके ज्वर प्रगट होयँ, यह हवा सोताके जलसे उत्पन्न नहीं होय है किन्तु जिस जगह थोडा जल होय जैसे तलैया आदि उसमें घाम लगनेसे जल पक्व होकर गन्ध वायुको अधिक उत्पन्न करे है यह वायु दिनमें सूर्य्यकी किरणसे बहुत हल्की होकर ऊपरको उठे इसीसे यह बड़ा नुकसान करनेवाली होती है और सन्ध्या तथा रात्रिमें यह वायु शीतल होनेसे नीचे उतर सर्व साधारण मनुष्योंको नुकसान करनेवाली होती है और हवाओंसे यह हवा अधिक भारी होती है, घरके किंवाड लगानेसे यह हवा घरके भीतर कम जाती है इसीसे घरके किंवाड देकर मसेरी जिसको पूर्वके लोग बहुधा रखते हैं यह कपडेकी बनी हुई होती है इसमें सोना चाहिये ॥ ३--गरिष्ठ भोजन । जो मनुष्य भारी द्रव्य भोजन करे तब उसके वह पचै नहीं और पेटमें पीडा करे उस पीडाके होनेसे ज्वर उत्पन्न होय, विशेषकरके यह ज्वर बालकोंके होता है ॥ अनेकप्रकारके ज्वरोंके लक्षण । नाडी और श्वास जल्दी चले, मस्तकमें पीडा होय, त्वचा शुष्क और गरम होय प्रलाप होय अथवा न होय पेशाब लाल उतरे, जीभ मलीन होय, शरीरमें सदा ज्वर रहाकरे कभी कम होजाय कभी जियादह हो जाय ॥ कुंकुमज्वरके लक्षण । श्वास लेते समय मन्द मन्द पीडा होय, खांसी हो, कफ कुछ नीले रंगका गिरे, ज्वर अल्प होय, वक्षस्थलमें पीडा होय, खांखते समय श्वास जल्दी चले, नाडी कुछ कुछ थोडी और शीघ्र चले, त्वचा सदैव थोडी गरम रहे; जिस समय रोगकी वृद्धि होय, स्वासके चलनेसे पीडा होय और अधिक पीडा होय उस रोगके आरम्भमें कफ नहीं निकले किन्तु दो तीन दिनके बाद कफसमेत निकल पडे उस रोगीका हल्दीके समान पीला वर्ण होय, कभी कभी जलके सदृश वर्ण होय इस रोगकी विशेषता होनेसे कफ पतला होजाय, यह रोग अत्यन्त बढकर पचनेको होय तब कफका शाकके समान रंग हो अथवा काले रंगका और दुर्गन्धयुक्त होय बहुत शरदी पडनेसे इसकी उत्पत्ति होती है ॥ यकृत वा कलेजाइज्वरके लक्षण । दहने पाँसूमैं पीडा होय, शरीरमें थोडा ज्वर होय तथा आहारमें अरुचि होय जीभ मलिन, नेत्र पीले होयँ, मल मिट्टीके रंगका अथवा सफेद तथा काला होय और कठिन, पेशाब लाल होय ॥
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अथातिसारनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । ( ४७ ) अथातिसारनिदानम् । पित्तज्वरमें अतिसार होता है तथा ज्वरको और अतिसारको अन्योन्य उपद्रव होनेसे ज्वरके अनन्तर अतिसार रोगको कहते हैं- गुर्वतिस्निग्धतीक्ष्णोष्णद्रवस्थूलातिशीतलैः । विरुद्धाध्यशना- जीर्णेर्विषमैश्चातिभोजनैः ॥ १ ॥ स्नेहाद्यैरतियुक्तैश्च मिथ्यायुक्तै- र्विषैर्भयैः । शोकदुष्टाम्बुमद्यातिपानैः सात्म्यर्तुपर्ययैः ॥ २ ॥ जलाभिरमणैर्वेगविघातैः कृमिदोषतः । नृणां भवत्यतीसारो लक्षणं तस्य वक्ष्यते ॥ ३ ॥ प्रमाणसे अधिक भोजन करनेसे अथवा स्वभावसे भारी पदार्थ जैसे उड़द आदिक खानेसे और अतिचिकनी अतितीखी अतिगरम अत्यन्त पतली स्थूल अर्थात् जिसके अवयव कठिन हों जैसे लड्डू, घेवर, गूंझा इत्यादि और अत्यन्त शीतल स्पर्शसे तथा वीर्यसे विरुद्ध जैसे क्षीर मत्स्य इत्यादिक, अध्यशन कहिये पूर्व दिनका भोजन परिपाक नहीं होय और उसपर भोजन करना, अन्नके बिना पके, नित्य भोजनके समयको त्यागकर और समय थोडा वा बहुत ऐसे भोजनोंके करनेसे स्नेह स्वेद आदि पंचकर्मसे, अत्यन्त योगके करनेसे वा थोडे योग करनेसे स्थावरादिक दूषीविषके खानेसे, भयसे, सोच करनेसे, अतिदुष्ट जलके पीनेसे तथा अतिमद्यके पीनेसे सात्म्य और ऋतुके पलटनेसे, जलमें अतिक्रीडा करनेसे, मल मूत्र आदि वेगोंको रोकनेसे, कृमिरोगके उपद्रवसे अथवा कृमिजनित वातादिकके कोपसे मनुष्योंको अतिसार रोग होता है, इन लक्षणोंसे यह निदान यथासम्भव वातादि- दोषोंका जानना । आगे अतिसारके लक्षण कहते हैं ॥ अतिसाररोगकी संप्राप्ति । संशम्यापां धातुरग्निं प्रवृद्धो वर्चोमिश्रो वायुनाऽधः प्रणुन्नः । सार्यैतातीवातिसारं तमाहुर्व्याधिं घोरं षड्विधं तं वदन्ति । एकैकशः सर्वशश्चापि दोषैः शोकेनान्यः षष्ठ आमेन चोक्तः ॥ ४॥ पूर्वोक्त कुपथ्यसे अत्यन्त दुष्ट हुए शरीरमें रस, जल, मूत्र, स्वेद, मेद, कफ, पित्त, रुधिर इत्यादि जलरूप धातु अग्निको मन्द कर और वही जल मलमिश्रित १ तदुक्तं चरके-“ भुक्तं पूर्वाह्णशेषे तु पुनरध्यशनं मतम् । “ २ बहुतोकमकाले च तज्ज्ञेयं विषमाशनम् ॥”
( ४८ ) माधवनिदान ।
( ४८ ) माधवनिदान ।
हो पवनका प्रेरित गुदाके मार्गसे बारंबार नीचेको बहुत उतरे तिसको अतिसार कहते हैं । यह भयंकर अतिसार रोग ६ प्रकारका है-वातका १, पित्तका २, कफका ३, ४ सन्निपातका, ५ शोकका और ६ आमातिसार ऐसे छःप्रकारका अतिसार है । द्वंद्वज अतिसार व्याधिस्वभावकरके नहीं होते, चरकमें आमातिसार नहीं कहा । भय और शोकसे दो कहकर संख्या पूरी करी है। और आमातिसारको सन्निपाताति- सारके अन्तर्गत कहा है ॥ यहां माधवाचार्यने भयातिसारकी वातज अतिसारमें गणना करी है ॥ अतिसारके पूर्वरूप । हृन्नाभिपा यूदरकुक्षितोदगात्रावसादानिलसन्निरोधाः । विट्सङ्ग आध्मानमथाविपाको भविष्यतस्तस्य पुरःसराणि॥५॥ हृदय, नाभि, गुदा, पेट, कूख इनमें पीडा हो, शरीरमें फूटनी हो, गुदाका पवन रुकजाय, मलका अवरोध हो अफरा हो और अन्न पचे नहीं ये लक्षण- अतिसाररोग के पूर्वरूपके होते हैं ॥ वातातिसारके लक्षण । अरुणं फेनिलं रूक्षमल्पमल्पं मुहुर्मुहुः । शकृदामं सरुक्शब्दं मारुतेनातिसार्यते ॥ ६ ॥ कुछ ललाईको लिये, झाग मिला तथा रूखा, थोडा थोडा बारम्बार आम मिला हुआ दस्त उतरे और शूल चले तथा मल उतरते समय शब्द होवे तो वाता- तिसार जानना ॥ पित्तातिसारके लक्षण । पित्तात्पीतं नीलमालोहितं वा तृष्णामूर्च्छादाहपाकोपपन्नम् । पित्तसे पीला काला और धूसरे रंगका मल उतरता है तथा तृष्णा मूर्च्छा और सम्पूर्ण शरीर तथा गुदामें दाह होती है, गुदा प चजाती है ये लक्षण पित्तातिसारके हैं ॥ कफातिसारके लक्षण । शुक्लं सांद्रं सकफं श्लेष्मयुक्तं विस्रं शीतं हृष्टरोमा मनुष्यः ॥ ७ ॥ कफातिसारवाले पुरुषका मल सफेद, गाढा, चिकना, कफमिश्रित, दुर्गंधयुक्त और शीतल उतरता है तथा रोम खडे होजाते हैं ये लक्षण कफातिसारके जानने ॥ सन्निपातातिसारके लक्षण । वराहस्नेहमांसाम्बुसदृशं सर्वरूपिणम् । कृच्छ्रसाध्यमतीसारं विद्याद्दोषत्रयोद्भवम् ॥ ८ ॥
भाषाटीकासमेत। (४९) सूकरकी चरबीसदृश अथवा मांसके धोये हुए पानीके सदृश और वातादि त्रिदोषोंके जो लक्षण कहे हैं उन लक्षणसंयुक्त हो ऐसा यह त्रिदोषजनित अतिसार कष्टसाध्य जानना ॥ शोकातिसारके लक्षण । तैस्तैर्भावैः शोचतोऽल्पाशनस्य बाष्पोष्मा वै वह्निमाविश्य जन्तोः । कोष्ठं गत्वा क्षोभयेत्तस्य रक्तं तच्चाधस्तात्काकणन्तीप्रकाशम् ॥ निर्गच्छेद्वै विडूविमिश्रं ह्यविड़वा निर्गन्धं वा गन्धवद्वातिसारः ॥ ९॥ जिस पुरुषके पुत्र, मित्र, स्त्री, धन इनका नाश होजावे वह उसी उसी वस्तुका शोच करे इसीसे क्षुधा मन्द होनेसे धातुक्षय होय, ऐसे प्राणीके बाष्प (नेत्र नासा गले आदिसे जो शोकद्वारा जल गिरे सो) और ऊष्मा कहिये शोकजन्य देह- तेज ये दोनों बाष्पोष्मा कोठेमें प्राप्त हो अग्निको मन्द कर रुधिरको कुपित करे तब यह रुधिर चिरमिटीके रंगसदृश हुआ गुदाके मार्ग होकर मलयुक्त अथवा मलरहित निकले तथा गन्धयुक्त अथवा गन्धरहित दस्त उतरे उसको शोकातिसार कहते हैं, इसी प्रकार भयातिसार भी जान लेना ॥ शोकातिसारके कृच्छ्रसाध्यत्व लक्षण । शोकोत्पन्नो दुश्चिकित्स्योऽतिमात्रं रोगो वैद्यैः कष्ट एष प्रदिष्टः॥१०॥ शोकसे उत्पन्न हुआ जो अतिसार वह चिकित्सा करनेमें बहुत कठिन है कारण कि, शोक शांत हुए बिना केवल औषधोंसे शांति नहीं होती इससे वैद्योंने यह कष्ट- साध्य कहा है ॥ आमातिसारके लक्षण । अन्नाजीर्णात्प्रद्रुताः क्षोभयन्तः कोष्ठं दोषा धातुसङ्घान्मलांश्च । नानावर्णं नैकशः सारयन्ति शूलोपेतं षष्ठमेनं वदन्ति ॥ ११ ॥ अन्नके न पचनेसे दोष (वात पित्त कफ) अपने मार्गको छोडकर कोठेमें प्राप्त हो कोठेको दूषित कर रक्तादि धातु और पुरीषादि मलको बारबार गुदाके मार्गसे बाहर निकाले और इसका रंग अनेक प्रकारका हो तथा शूलयुक्त दस्त उतरे इसको छठा आमातिसार वैद्य कहते हैं। शंका-प्रथम कहि आये हैं कि, अति- सार रोग छः प्रकारका होता है, पुनः- "षष्ठमेनं वदन्ति" यह पद क्यों धरा ? उत्तर- यह पद नियमके अर्थ माधवाचार्यने सुश्रुतके मतसे संग्रह किया है। हमारे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ५० ) माधवनिदान ।
( ५० ) माधवनिदान । मतमें छठा अतिसार आमज है जो भयसे उत्पन्न हुआ और आचार्य मानते हैं वह, हम नहीं मानते अतएव ‘ षष्ठमेनं ’ पुनः कहा है क्योंकि भयादि अतिसारोंका वात पित्त कफ अतिसारोंके अन्तर्गतत्व है ॥ आमके लक्षण । संसृष्टमेभिर्दोषैस्तु न्यस्तमप्स्ववसीदति । पुरीषं भृशदुर्गन्धि पिच्छिलं चामसंज्ञितम् ॥ १२ ॥ पूर्व कहे वातादि अतिसारोंके मिलेहुए लक्षणसंयुक्त जो मल वह जलमें गेर- नेसे डूब जाता है, क्योंकि आम वातजमें भारी है और उसमें बहुत दुर्गंध आती है तथा अत्यन्त गाढा होता है उसकी आमसंज्ञा है ॥ पक्व लक्षण । एतान्येव तु लिङ्गानि विपरीतानि यस्य वै । लाघवं च विशेषेण तस्य पक्वं विनिर्दिशेत् ॥ १३ ॥ और ऊपरके श्लोकसे विपरीत लक्षण होवे अर्थात् शरीर हलका हो तथा मल जलमें डूबे नहीं और दुर्गंधरहित हो, बबूलरहित हो उस रोगीका मल पक्व हुआ जाने ॥ असाध्य लक्षण । पक्वं जाम्बवसङ्काशं यकृत्पिण्डनिभं तनु । घृततैलवसामज्जावेस- वारपयोदधि ॥ १४ ॥ मांसधावनतोयाभं कृष्णं नीलारुण- प्रभम् । मेचकं कर्बुरं स्निग्धं चन्द्रकोपगतं घनम् ॥ १५॥ कुणपं मातुलुङ्गाभं दुर्गन्धं कुथितं बहु । तृष्णादाहारुचिश्वासहिक्कापा- र्श्वास्थिशूलिनम् ॥ १६॥ संमूर्च्छारतिसंमोहयुक्तं पक्ववलीगुदम् । प्रलापयुक्तं च भिषग् वर्जयेदातिसारिणम् ॥ १७ ॥ पके जामुनके रंगसदृश काला और चिकना तथा काला और लोहित रंग पतला घृत तेल चरबी मज्जा वेशंवार दूध दही और मांसके धोनेसे जैसा जल निकले है ऐसा रंग हो, काजलके रंगसमान अथवा नीलमिश्रित अरुण रंग अर्थात् पपैथा पक्षीके पंखके रंगसमान अथवा खंजन पक्षीके वर्णसदृश तथा अनेक रंगका चिकना मोरकी चंद्रिकाके सदृश रंग, दृढ, मुरदाकीसी दुर्गंध युक्त, मस्तककी मज्जाके समान १ बेशवार नाम—मांसमेंसे हड्डी निकाल और कूटकर दही दूध काली मिरच डालकर जो पदार्थ बनाते हैं तत्सदृश रंग हो ।
भाषाटीकासमेत । ( ५१ ) गन्धयुक्त बुरी दुर्गन्धके समान, प्यास, दाह, अरुचि, श्वास, हिचकी, पसवाडोंके हाडोंमें पीडा, मनको मोह और इंद्रियोंको मोह, अरति ये लक्षण होयँ तथा गुदाके आंटोंका पकना अनर्थ भाषण करे ऐसे अतिसारी रोगीको वैद्य छोडदे ॥ दूसरे असाध्य लक्षण । असंवृतगुदं क्षीणं दुराध्मानमुपद्रुतम् । गुदे पक्के गतोष्माणमतिसारिणमुत्सृजेत् ॥ १८ ॥ जिसकी गुदाका दस्तके पिछाडी संकोच न होवे, क्षीण पुरुष, अत्यन्त अफरा- युक्त अथवा “ दुरात्मानं ” ऐसा भी पाठान्तर है अर्थात् जिसकी इंद्रिय वश न होवे तथा अतिसारके शोथादिक उपद्रव करके युक्त और गुदाके स्थानमें पाककर्त्ता पकानेवाला पित्त विद्यमान होते हुए जिसकी देहमें गरमीसी नहीं दीखे अर्थात् देह शीतल हो अथवा जिसकी अग्नि नष्ट होजावे ऐसे अतिसारी रोगीको वैद्य त्याग देवे॥ अतिसारके उपद्रव । शोथं शूलं ज्वरं तृष्णां श्वासकासमरोचकम् । छर्दिं मूर्च्छां च हिक्कां च दृष्ट्वाऽतीसारिणं त्यजेत् ॥ १९ ॥ सूजन, शूल, ज्वर, तृषा, श्वास, खांसी, अरुचि, वमन, मूर्च्छा, हिचकी ऐसे लक्षण जिस रोगीमें होयँ उसको वैद्य छोड दे ॥ असाध्य लक्षण । श्वासशूलपिपासार्त्तं क्षीणं ज्वरनिपीडितम् । विशेषेण नरं वृद्धमतिसारो विनाशयेत् ॥ २० ॥ श्वास, शूल, प्यास इनसे पीडित, क्षीण, ज्वरसे पीडित और वृद्ध मनुष्यके ये लक्षण होयँ तो यह अतिसाररोग मनुष्यको विनाश करे ॥ रक्तातिसारके लक्षण । पित्तकृन्ति यदात्यर्थं द्रव्याण्यश्नाति पैत्तिके । तदोपजायतेऽभीक्ष्णं रक्तातीसार उल्बणः ॥ २१ ॥ पित्तातिसारवाला पुरुष अथवा पित्तातिसार होनेवाला पुरुष जब पित्त करने- वाली वस्तु अधिक और निरन्तर भोजन करे तब भयंकर रक्तातिसार प्रगट होता है । इसके लाल काले पीले आदि रंग वातादि दोषोंके दूषित होनेसे होते हैं, ये भी पित्तातिसारके भेद हैं ॥
( ५२ ) माधवनिदान ।
( ५२ ) माधवनिदान । प्रवाहिकाकी सम्प्राप्ति । वायुः प्रवृद्धो निचितं बलासं नुदत्यधस्तादहिताशनस्य । प्रवाहतोऽल्पं बहुशो मलाक्तं प्रवाहिकां तां प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ॥२२॥ अपथ्य सेवन करनेवाले पुरुषके कुपित हुई जो वात सो संचित हुए कफकों मलसंयुक्त करके बारम्बार गुदाके मार्गसे बाहर निकाले और मरोडाके साथ पीडा हो, थोडा मल कई दफा निकले इसको प्रवाहिका कहते हैं। प्रवाहिका और अति- सार इन दोनोंका एक साधर्म्य है इसीसे अतिसार रोगमें प्रवाहिका कही है। परन्तु अतिसारमें अनेक प्रकारके द्रव धातु निकलते हैं और प्रवाहिकामें केवल कफ निक- लता है. इतना भेद है। इसमें “निचितं बलासम्” यह जो पद कहा अर्थात् कफसे मिलकर सो यह केवल कफका तो उपलक्षण है अर्थात् कफके कहनेसे पित्त और रुधिर भी जानना। भोजने इस रोगका नाम विवसी कहा है, पराशरऋषिने इसको अन्तरग्रन्थी कहा है,हारीत ऋषिने निश्वारक कहा है,कोई आचार्य निर्वाहिका कहते हैं॥ प्रवाहिकाके वातादि भेदकरके लक्षण । प्रवाहिका वातकृता सशूला पित्तात्सदाहा सकफा कफाच्च । सशोणिता शोणितसम्भवा च ताः स्नेहरूक्षप्रभवा मतास्तु। तासामतीसारवदादिशेच्च लिङ्गं क्रमं चामविपक्वतां च॥२३॥ वातकी प्रवाहिकामें शूल होता है, पित्तकी दाहयुक्त, कफकी कफयुक्त और रक्तसे रक्तयुक्त होती है। यह चिकने और रूखे पदार्थ भोजन करनेसे होती है अर्थात् चिकने पदार्थसे कफकी, रूखे पदार्थसे वातकी, तु-शब्द करके तीक्ष्ण और खट्टेपदार्थसे क्रमसे पित्तकी और रुधिरकी होती है ऐसे जानना। इस प्रवाहिकाके लक्षणक्रम आम और पक्वावस्था यह अतिसार निदानके सदृश जानना ॥ अतिसार चला गया होय उसके लक्षण । यस्योच्चारं विना मूत्रं सम्यग्वायुश्च गच्छति । दीप्ताग्नेर्लघुकोष्ठस्य स्थितस्तस्योदरामयः ॥ २४ ॥ जिस मनुष्यको मूत्र करते समय दस्त न होय और अपानवायु जिसकी शुद्ध निकले और अग्नि देदीप्यमान होवे, कोठा हलका होवे उस मनुष्यका अतिसार गया जानिये ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषाटीकाया- मतिसाररोगः समाप्तः ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ ग्रहणीनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । (५३) अथ ग्रहणीनिदानम् । ग्रहणीकी सम्प्राप्ति । अतिसारे निवृत्तेऽपि मन्दाग्नेरहिताशिनः । भूयः संदूषितो वह्निर्ग्रहणीमभिदूषयेत् ॥ १ ॥ पहले मनुष्यके अतिसाररोग होकर जाता रहा होय फिर उस मनुष्यके कुपथ्य करनेसे मन्द हुई जो अग्नि पुरुषके उदरमें रहनेवाली जो पित्तधरानामक छठी कला जिसको ग्रहणी कहते हैं उसको बिगाड, अपिशब्द करके अतिसार न भया होय तो भी अपने कारण करके पूर्वोक्त ग्रहणीको बिगाडकर ग्रहणीरोगको प्रगट करे यह सूचना करी। कोई आचार्य ऐसे कहते हैं कि, अतिसार न गया होय, बीचमें ही ग्रहणीरोग होता है। "मन्दाग्नि" इस पद करकेयह सूचना करी कि, जिस पुरुषकी अग्नि तीक्ष्ण है वह कुपथ्य भी करे तथापि कुछ अवगुण नहीं होय, अन्नको ग्रहण करे है इसीसे इसको ग्रहणी कहे हैं, इसीसे ग्रहणी बिगडनेसे अन्नका परिपाक अच्छे प्रकार नहीं होय अर्थात् बारम्बार आम मिश्रित मल गुदाके मार्गसे गिरता है ॥ ग्रहणीरोगकी सम्प्राप्तिपूर्वक सामान्य लक्षण । एकैकशः सर्वशश्च दोषैरत्यर्थमूर्च्छितैः । सा दुष्टा बहुशो भुक्तमाममेव विमुञ्चति ॥ २ ॥ पक्वं वा सरुजं पूति मुहुर्बद्धं मुहुर्द्रवम् । ग्रहणीरोगमाहुस्तमायुर्वेदविदो जनाः ॥ ३ ॥ अत्यन्त कुपित हुए पृथक् १ दोष ( वात, पित्त, कफ ) और सर्व दोष मिलकर ग्रहणीको दुष्ट करें सो ग्रहणी दुष्ट होकर भोजन किये हुए पदार्थको कच्चा अथवा पक्का गुदाके मार्ग होकर निकाले और पीडा होय तथा उस मलमें दुर्गंध आवे, वादीसें पतला मल और पित्तसे गाढा दस्त बारम्बार होवे और कभी कफसे पानी सरीखा अधोवायुयुक्त निकले इसको आयुर्वेदके जाननेवाले वैद्य ग्रहणीरोग कहते हैं ॥ ग्रहणीके पूर्वरूप । पूर्वरूपं तु तस्येदं तृष्णाऽलस्यं बलक्षयः । विदाहोऽन्नस्य पाकश्च चिरात्कायस्य गौरवम् ॥ ४ ॥ प्यास, आलसक, बलनाश, अन्नका दाह ( पाकके समय अग्निसि जले ) और अन्नका पाक देरमें होय, देह भारी होय, यह ग्रहणीरोगका पूर्वरूप है ॥ १ यथाह चरके-" अग्न्यधिष्ठानमन्त्रस्य ग्रहणाद्ग्रहणी मता । नाभेरुपरि सा ह्यग्निबले- नस्तम्भबृंहिता । अपक्वं धारयत्यन्नं पक्वं सृजति चाप्यधः ॥"