भारतकोश
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माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)

Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation

माधवकर द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished404 पृष्ठ

भाषाटीकासमेत । ( १३३ ) होय उसको उसी पदार्थकी बलि देनेसे उस ग्रहकी शांति होती है, ऐसे ही सर्वत्र जानना । यह डल्लनका मत है । और वह मनुष्य पितरोंकी भक्ति करे । ये लक्षण पितृग्रहपीडित मनुष्यके हैं ॥ सर्पग्रहयुक्तके लक्षण । यस्त्वूर्व्यां प्रसरति सर्पवत्कदाचित्सृक्किण्यौ विलिहति जिह्वया तथैव। क्रोद्धालुर्मधुगुडदुग्धपायसेप्सुर्विज्ञेयो भवति भुजङ्ग- मेशजुष्टः ॥ २३ ॥ जो सर्पके समान पृथ्वीमें लोटा करे अर्थात् छातीके बल चले तथा सर्पके समान अपने ओष्ठप्रान्त (होठों) को चाटा करे, सदा क्रोधी रहे, शहद, गुड, दूध और खीरकी इच्छा करे वह सर्पग्रहग्रस्त जानना ॥ राक्षसग्रहपीडितके लक्षण । मांसासृग्विविधसुराविकारलिप्सुर्निर्लज्जो भृशमतिनिष्ठुरोऽति शूरः। क्रोद्धालुर्विपुलबलो निशाविहारी शौचद्विड् भवति च राक्षसैर्गृहीतः ॥ २४ ॥ जो मनुष्य मांस, रुधिर, नाना प्रकारके मद्य पीनेकी इच्छा करे और निर्लज्ज, अत्यन्त निष्ठुर, अत्यन्त शूर, क्रोधी, बडा बली, रात्रिमें डोलनेवाला, अपवित्र ऐसा होय वह राक्षसकरके ग्रस्त जानना॥ पिशाचजुष्टके लक्षण । उद्धस्तः कृशपरुषश्चिरप्रलापी दुर्गन्धो भृशमशुचिस्तथाऽतिलोलः । बह्वाशी विजनवनान्तरोपसेवी व्याचेष्टन्भ्रमति रुदन्पिशाचजुष्टः २५ जो अपने हाथ ऊपरको करे, “उद्वस्त्र” ऐसा भी पाठ है, उस जगह उद्वस्त्र नाम नंगा हो जाय, तेजरहित, बहुत देरपर्यत बकनेवाला, जिसके देहमें दुर्गन्ध आवे, अपवित्र तथा अतिचञ्चल कहिये सब अन्नपानमें इच्छा करनेवाला खानेको मिले तो बहुत भोजन करे, एकान्त वनांतरोंमें रहनेवाला, विरुद्ध चेष्टा करनेवाला, रुदन कर्त्ता, डोलनेवाला ऐसा मनुष्य पिशाचग्रस्त जानना ॥ प्रसंगवशसे ब्रह्मराक्षस और भूतोन्मादके लक्षण ग्रन्थान्तरोंसे लिखते हैं— देवविप्रगुरुद्वेषी वेदवेदाङ्गविच्छुचिः । आशुपीड़ाकरोऽहिंस्रो ब्रह्मराक्षससेवितः ॥ २६ ॥

( १३४ ) माधवनिदान ।

( १३४ ) माधवनिदान ।

देव, ब्राह्मण, गुरुसे द्वेषकर्त्ता, वेद और वेदके अंग ( शिक्षा, कल्प, व्याकरण आदि ) को पढा भया, पवित्र रहनेवाला, शीघ्र पीडाका कर्त्ता, हिंसा करे नहीं ये लक्षण ब्रह्मराक्षसजुष्ट मनुष्यके हैं ॥ भूतोन्मादके लक्षण । महापराक्रमो यश्च दिव्यं ज्ञानं च भाषते । उन्मादकालानैश्चित्यो भूतोन्मादी स उच्यते ॥ २७ ॥ महापराक्रमी और जो श्रेष्ठज्ञानको कहे और जो उन्मादकालका निश्चय न होय उसको भूतोन्मादी कहते हैं ॥ अब कहते हैं कि, देवादिकग्रह इस मनुष्यको तीन कार्यके वास्ते ग्रहण करते हैं, हिंसा अर्थात् मारनेके निमित्त और पूजाके निमित्त तथा विहारके निमित्त । इनमें हिंसाके निमित्त ग्रस्त मनुष्य साध्य (अच्छा) नहीं होय उसके लक्षण आगे कहते हैं॥ स्थूलाक्षो द्रुतमटनः सफेनलेही निद्रालुः पतति च कम्पते च यो हि । यश्चाद्रिद्विरदनगादिविच्युतः स्यात्सोऽसाध्यो भवति तथा त्रयोदशेऽब्दे ॥ २८ ॥ नेत्र भयानक होजायँ, शीघ्र चले, मुखमें जो झाग है उसको चाटनेवाला और जिसको निद्रा बहुत आवे तथा गिरपडे, काँपे और जो पर्वत, हाथी ( अथवा ) नग नाम वृक्ष, आदिशब्दसे भीत मन्दिर आदि जानने, इनसे गिरकर ग्रहग्रस्त होय वह असाध्य है । तैसेही तेरहवें वर्षमें सर्व देवादि उन्मादी असाध्य जानने । विदेहने विशेष लक्षण कहे हैं सो ग्रन्थान्तरोंसे जानलेवे ॥ देवादिकोंका आवेशसमय । देवग्रहाः पौर्णमास्यामसुराः सन्ध्ययोरपि । गन्धर्वाः प्रायशोऽष्टम्यां यक्षाश्च प्रतिपद्यथ ॥ २९ ॥ पितृग्रहास्तथा दर्श पञ्चम्यामपि चोरगाः । रक्षांसि रात्रौ पैशाचाश्चतुर्दश्यां विशन्ति हि ॥ ३० ॥ देवग्रह पूर्णमासीको प्रवेश करते हैं, असुरग्रह सायंकालमें, अपिशब्दसे पूर्णमा- सीको भी प्रवेश करते हैं, गन्धर्वग्रह बहुधा अष्टमीको, प्रायःशब्दसे सन्ध्याको भी गन्धर्व ग्रह प्रवेश करते हैं, यक्षग्रह पडवाको, पितृग्रह अमावश्याको, सर्पग्रह पंचमीको, अपिशब्दसे अमावास्याको भी प्रवेश करते हैं, राक्षस रात्रिमें और पिशाच चतु-

१ सन्ध्या त्रिनाडीप्रमिताऽर्कबिम्बादद्धॉदितास्तादध ऊर्ध्वमत्र । इति ॥

र्दशीको मनुष्यदेहमें प्रवेश करते हैं। तिथि कहनेका यह प्रयोजन है कि, जिस जिस तिथिको जो ग्रह मनुष्यको ग्रस्त करे उसको उसी तिथिमें शांतिके निमित्त बलिदाना- दिक कराने चाहिये । शंका-क्योंजी ! जब ग्रहग्रस्त मनुष्योंको उन्माद होता है तो वह ग्रह मनुष्य देहमें प्रवेश करते क्यों नहीं दीखते हैं ? इसवास्ते उत्तर कहते हैं- दर्पणादीन् यथा छाया शीतोष्णं प्राणिनो यथा । स्वमणिं भास्करांशुश्च यथा देहं च देहधृक् । विशन्ति न च दृश्यन्ते ग्रहास्तद्वच्छरीरिणाम् ॥ ३१ ॥ जैसे दर्पणमें मनुष्यका प्रतिबिम्ब पडे है, आदिशब्द इस जगह प्रकारवाची है अर्थात् जल, तैल आदिमें जैसे छाया पडती है और सरदी, गरमी जैसे मनुष्योंको लगती है अथवा जैसे सूर्यकिरण सूर्यकान्तमणि ( आतसीकाच ) में प्रवेश करे है अथवा जैसे जीव देहमें प्रवेश करे है, इसी प्रकार सब ग्रह मनुष्यके शरीरमें प्रवेश करते हैं परन्तु दीखते नहीं हैं। इस श्लोकके पोषक दृष्टान्त जैज्जट आचार्यने बहुत दिये हैं परन्तु ग्रन्थ बढनेके भयसे नहीं लिखे ॥ इस उन्मादरोगमें सर्वत्र देवशब्दकरके देवताओंकेसे आचरणवाले देवताओंके अनुचर ( दास ) जानने चाहिये, क्योंकि देवताओंको मनुष्यके अपवित्र देहमें प्रवेश होना असम्भव है। सो सुश्रुतमें लिखा है-- न ते मनुष्यैः सह संविशन्ति न वा मनुष्यान् कचिदाविशन्ति । ये त्वाविशन्तीति वदन्ति मोहात्ते भूतविद्याविषयादपोह्याः ॥ ३२ ॥ तेषां ग्रहाणां परिचारका ये कोटीसहस्रायुतपद्मसंख्याः । असृग्वसामांसभुजः सुभीमा निशाविहाराश्च तथा विशंति ॥ ३३ ॥ जो देवादिक मनुष्यके साथ मिलते नहीं हैं न वे मनुष्योंकी देहमें प्रवेश करते हैं और जो वैद्य ' प्रवेश करते हैं ' ऐसे कहते हैं, वे अज्ञानसे कहते हैं, ऐसा वैद्य ' भूतविद्यावाला जानकर त्याज्य है । तौ कौन प्रवेश करते हैं ? इस वास्ते कहते हैं ' तेषाम् ' अर्थात् उन देवताओंके परिचारक ( नौकर ) जो करोडों हजारों पद्म- संख्यक रुधिर, वसा, मांसके भोजन करनेवाले भयंकर, रात्रिमें विचरनेवाले हैं वें प्रवेश करते हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थदीपिकामाथुरीभाषा- टीकायामुन्मादरोगनिदानं समाप्तम् ॥ १ ग्रहा गृह्णन्ति ये येषु तेषां तेषु विशेषतः । दिनेषु बलिहोमादीन्प्रयुंजीत चिकित्सकः ॥

( १३६ ) माधवनिदान ।

( १३६ ) माधवनिदान । अथापस्मारनिदानम् । प्रथम सुश्रुतोक्त इस रोगकी निरुक्ति लिखते हैं- स्मृतिर्भूतार्थविज्ञानमपस्तत्परिवर्जने । अपस्मार इति प्रोक्तस्ततोऽयं व्याधिरन्तकृत् ॥ १ ॥ स्मृतिशब्द प्राणियोंके अर्थज्ञानको कहता है और अपशब्द उसका नाशक है इसीसे स्मृति और अप इन दोनों शब्दोंसे अपस्मार यह शब्द सिद्ध हुआ । इसी पूर्वोक्त हेतुके नाशसे यह रोग जलादिकके विषे प्रवेश होनेसे प्राणान्तकारक है ॥ अपस्मारकी निदानपूर्वक सम्प्राप्ति । चिन्ताशोकादिभिर्दोषाः क्रुद्धा हृत्स्रोतसि स्थिताः । कृत्वा स्मृतेरपध्वंसमपस्मारं प्रकुर्वते ॥ २ ॥ चिन्ता, शोक, आदिशब्दसे क्रोध, लोभ, मोहादिसे कुपित भये जो दोष ( वात, पित्त, कफ ) सो हृदयमें स्थित जो मनके बहनेवाली नाडी उनमें प्राप्त हो स्मरण ( ज्ञान ) का नाश कर अपस्माररोगको प्रगट करे ॥ वाग्भटके मतसे निदान । मिथ्यायोगेन्द्रियार्थानां कर्मणामतिसेवनात् । निरुद्धमलिनां कर्मविहारकुपितैर्मलैः ॥ ३ ॥ वेगनिग्रहशीलानामहताशुचि- भोजिनाम् । रजस्तमोभिभूतानां गच्छतां वा रजस्वलाम् । तथा कामभयोद्वेगक्रोधशोकादिभिर्भृशम् । चेतसोऽभिभवैः पुंसामपस्मारोऽभिजायते ॥ ४ ॥ इन्द्रियोंके अर्थ कहिये विषय और कर्म, उनका मिथ्यायोग, अतियोग और अयोगके सेवन करनेसे तथा निरुद्धमल भोजन और विहारसे कुपित भये जो दोष उनसे तथा मूत्रमलादि वेगोंके धारण करनेवालोंके अहित और अपवित्र भोजन करनेसे रजोगुणी मनुष्योंके, रजस्वला स्त्रीगमन करनेसे तथा काम, भय, उद्वेग, क्रोध, शोक इन कारणोंसे, चित्त ( मन ) के बिगडनेसे मनुष्योंके अपस्माररोग प्रगट होता है । तहां श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, रसन, घ्राण ये इंद्रियोंके अर्थ हैं । शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये इन्द्रियोंके विषय हैं । इनके अतिसेवनसे CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १३७ ) उदाहरण दिखाते हैं, जैसे-पुरुषका इष्टनाशादि सुनना मिथ्यायोग है, पटहादि बाजोंका सुनना अतियोग है, कुछ न सुनना अयोग है । ऐसेही अपवित्र आदिको छूना मिथ्यायोग है, अतिशीतल अतिगरम छूना, स्नान उबटना आदिका सेवन अतियोग है, किसीको न छूना अयोग है । छोटी वस्तुका देखना मिथ्यायोग है, बड़ी वस्तुका देखना अतियोग और किसीको न देखना अयोग है । रसोंका अतिसेवन अतियोग है, थोडा सेवन मिथ्यायोग है, असेवन अयोग है । दुर्गन्धका सूँघना मिथ्यायोग है, अतितीक्ष्ण गन्धका सूँघना अतियोग है, किसीको न सूँघना अयोग है । तहां कायिक, वाचिक, मानसिक तीन प्रकारका कर्म कहा है । तहां कायिक कर्म जैसे कुसमयमें दंडकसरतका करना मिथ्यायोग, बहुत करना अतियोग, कुछ न करना अयोग है । खोटा और झूठा बोलना वाणीका मिथ्यायोग है, बहुत बोलना अतियोग है, चुप होजाना अयोग है । मानसकर्म जैसे शोकादि चिंतवन मानसिक मिथ्यायोग है, अत्यन्त चिंता करना अतियोग है और किसीकी चिंता न करना अयोग है इति ॥ आगे श्लोक माधवके हैं ॥ अपस्मारके सामान्य लक्षण । तमःप्रवेशः संरम्भो दोषोद्रेकहतस्मृतिः । अपस्मार इति ज्ञेयो गदो घोरश्चतुर्विधः ॥ १ ॥ अन्धकारमें प्रवेश करनेके समान ज्ञानका नाश होना, नेत्र टेढे बांके फिर दोषोंके बढनेसे ज्ञानका नष्ट होना ये लक्षण जिस रोगमें होयं ऐसा भयंकर अपस्मार रोग चार प्रकारका है, इसको लोग संसारमें मिरगी ऐसे कहते हैं ॥ पूर्वरूप । हृत्कम्पः शून्यता स्वेदो ध्यानं मूर्च्छा प्रमूढता । निद्रानाशश्च तस्मिंस्तु भविष्यति भवन्त्यथ ॥ २ ॥ जब अपस्मार होनेवाला होय है तब ये लक्षण होते हैं, हृदय कांपे और शून्य पड जाय-कुछ सूझे नहीं, चिन्ता, मूर्च्छा, पसीने आवे, ध्यान लगजाय, मूर्च्छा कहिये मनका मोह और प्रमूढता कहिये इन्द्रियोंका मोह होय, निद्रा जाती रहे ॥ वातज अपस्मारके लक्षण । कम्पते प्रदशेदन्तान्फेनोद्वामी श्वसित्यपि । परुषारुणकृष्णानि पश्येदूपाणि चानिलात् ॥ ३ ॥

( १३८ ) माधवनिदान ।

( १३८ ) माधवनिदान । वातके अपस्मारमें रोगी कांपे, दांतोंको चबावे, मुखसे झाग गेरे और श्वास भरे तथा कर्कश अरुणवर्ण और काला वर्ण मनुष्योंको दीखे अर्थात् कोई नील वर्णका मनुष्य मेरे पास दौडा आता है । इसी प्रकार पित्तसे पीले वर्णका पुरुष दौडा आता है और कफमें सफेद रंगका पुरुष सामने दौडा आता है ऐसे जानना ॥ पित्तकी मृगीके लक्षण । पीतफेनाङ्गवक्त्राक्षः पीतासृग्रूपदर्शनः । सतृष्णोष्णानलव्याप्तलोकदर्शी च पैत्तिकः ॥ ४ ॥ पित्तकी मिरगीवालोंके झाग, देह, मुख और नेत्र ये पीले होते हैं और वह पीले रुधिरके रंगकीसी सब वस्तु देखे, प्यासयुक्त और गरमीकी साथ अग्निसे व्याप्त भया ऐसा सब जगत्को देखे ॥ कफकी मृगीके लक्षण । शुक्लफेनाङ्गवक्त्राक्षः शीतहृष्टाङ्गजो गुरुः । पश्यञ्छुक्लानि रूपाणि मुच्यते श्लैष्मिकश्चिरात् ॥ ५ ॥ कफकी मिरगीवालेके झाग, अंग, मुख और नेत्र सफेद होयं, देह शीतल होय तथा देंहके रोमांच खडे रहे, भारी होय और सब पदार्थ सफेद दीखे यह अप- स्मार ( मिरगी ) रोग देरमें छोडे । इससे यह सूचना करी कि, वातपित्तकी मृगी जलदी रोगीको छोड देती है ॥ सन्निपातकी मृगीके लक्षण । सर्वैरेतैः समस्तैश्च लिंगैर्ज्ञेयस्त्रिदोषजः । अपस्मारः स चासाध्यो यः क्षीणस्यानवश्च यः ॥ ६ ॥ जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलते हों वह त्रिदोषज अपस्मार जानना । यह असाध्य है । और जो क्षीण पुरुषके होय वह भी असाध्य है । तथा पुराना पड गया होय वह भी अपस्मार ( मिरगी ) रोग असाध्य है ॥ मृगीके असाध्य लक्षण । प्रतिस्फुरन्तं बहुशः क्षीणं प्रचलितभ्रुवम् । नेत्राभ्यां च विकुर्वाणमपस्मारो विनाशयेत् ॥ ७ ॥ बारंबार कंपयुक्त होय, क्षीण हो गया हो भृकुटी ( भौंह ) का चलानेवाला और नेत्र बांके करमेवाला ऐसा अपस्मारी रोगी जीवे नहीं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । (१३९) मृगीरोगकी पाली । पक्षाद्वा द्वादशाहाद्वा मासाद्वा कुपिता मलाः । अपस्माराय कुर्वन्ति वेगं किंचिदथोत्तरम् ॥ ८ ॥ कोपको प्राप्त भये जो दोष सो पंद्रहवें दिन अथवा बारहवें दिन अथवा महीने भरमें मिरगीरोग प्रकट करें । तिनमें पैत्तिक १५ दिन, वातिक १२ दिन और श्लैष्मिक ३० दिनमें आती है । इस जगह बारहवें दिनके पिछाडी पक्ष कहना ठीक था फिर पहिले पक्ष धरनेका यह प्रयोजन है कि, अधिक कालकरके ही दोष वेग करते हैं यह कहा । “किंचिदथोत्तरम्” इस पदसे यह सूचना करी है कि, जिस जिस दोषका जो जो काल कहा है उससे पहिले भी दोषोंके तारतम्यसे मिरगीरोग होय है ऐसे जानना । शंका-वेग उत्पन्न करके अपस्मारके प्रगट कर्त्ता दोष देहमें सदा रहते हैं, फिर वे सर्वकालमें वेग क्यों नहीं करते, द्वादशादि दिनमें क्यों करते हैं ? इन विषयमें दृष्टांतरूप समाधान कहते हैं- देवे वर्षत्यपि यथा भूमौ बीजानि कानिचित् । शरदि प्रतिरोहन्ति तथा व्याधिसमुच्छ्रयः ॥ ९ ॥ जैसे चातुर्मासमें इन्द्र वर्षे भी है परन्तु कोई जव, गेहूँ, चना आदि बीज शरद् ऋतुमें ही ऊगते हैं तैसेही सर्वरोगके बीजरूप वातादिक दोष कदाचित् किसी अप- स्मारादिक व्याधिविशेष निदानादिकका संगम होनेसे उस रोगको प्रगट करे हैं । अथवा इसका मुख्य प्रयोजन यह है कि, बीजके अंकुर फूटनेमें तेज, वायु, पृथ्वी, जल ये सहायक भी हैं, परन्तु वे सब कालविशेषकी प्रतीक्षा ( इच्छा ) करते हैं । अंकुर आनेको काल ही सहाय चाहिये अर्थात् जिस कालमें जिस बीजको अंकुर आता है वह उसी कालमें आवेगा बीचमें कभी नहीं आनेवाला, यही न्याय चातु- र्थिक ज्वरादिकोंमें भी जानना ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरप्रणीतमाधवार्थदीपिकायां माधुरीभाषाटीकाया- मपस्मारनिदानं समाप्तम् ॥

अथ वातव्याधिनिदानम् ।

वातव्याधिकी सम्प्राप्ति । रूक्षशीताल्पलघ्वन्नव्यवायातिप्रजागरैः । विषमादुपचाराच्च दोषास्रक्स्रावणादपि ॥ १ ॥ लङ्घनप्लवनात्यध्वव्यायामाति-

( १४० ) माधवनिदान ।

( १४० ) माधवनिदान । विचेष्टनैः । धातूनां संक्षयाच्चिन्ताशोकरोगातिकर्षणात् ॥२॥ वेगसंधारणादामादभिघातादभोजनात् । मर्मबाधाद्गजोष्ट्राश्व- शीघ्रयानादिसेवनात् ॥ ३ ॥ देहे स्रोतांसि रिक्तानि पूरयित्वा- ऽनिलो बली । करोति विविधान्व्याधीन्सर्वाङ्गैकाङ्गसंश्रयान् ॥४॥ रूखा, शीतल, थोडा और हलका ऐसे अन्न खानेसे, अति मैथुनके करनेसे बहुत जागनेसे, विषम उपचार करनेसे दोष ( कफ पित्त मल मूत्र इत्यादिक ) और रुधिर इनके निकलनेसे अर्थात् वमन विरेचनसे, लंघन अर्थात् अखाडे आदिमें कला खेलनेसे, नदी आदिमें तैरनेसे, बहुत चलनेसे, अतिदण्डकसरत आदि श्रमके करनेसे, अत्यन्त विरुद्धचेष्टा करनेसे, रस रुधिर आदि धातुओंके क्षय होनेसे, चिन्ता शोक और रोगद्वारा कृश होनेसे, मल मूत्रादिकोंके वेग रोकनेसे, आमसे, लकडी आदिकी चोट लगनेसे उपवास ( व्रत ) के करनेसे आदि ले सब मर्मस्थानोंमें लगनेसे, हाथी ऊंट घोडा इत्यादि जल्दी चलनेवाली सवारीपर बैठनेसे, कोपको प्राप्त भई जो बलवान् वायु सो देहमें खाली जो नस उनमें प्राप्त हो सर्वाङ्ग अथवा एक अङ्गमें व्याप्त होनेवाली ऐसी अनेक प्रकारकी वातव्याधि उत्पन्न करे है॥ वातव्याधिके पूर्वरूप व लक्षण । अव्यक्तं लक्षणं तेषां पूर्वरूपमिति स्मृतम् । आत्मरूपं तु तद्व्यक्तमपायो लघुता पुनः ॥ ५ ॥ उस वक्ष्यमाण वातव्याधिके जो अप्रगट लक्षण उसको पूर्वरूप ऐसे कहते हैं ज्वरादिकोंके सदृश विशिष्ट नहीं हैं। और जो रूप प्रगट होय अर्थात् दोषादि भेद करके यथार्थ दीखे उसको उस व्याधिका लक्षण जानना । अपानवायुके चञ्चल होनेसे, स्तम्भ संकोच कम्पादिका कदाचित् अभाव होय है। और शरीरकी लघुता ( वायुकरके धातुशोषण होनेसे) अथवा 'अपायोऽलघुता' कहिये सब वातविकारोंको अपाय कहिये अभाव होय और वातविकारोंका अलघुता कहिये अल्पत्व करके जो स्थिति है सो निःशेष ( बिलकुल ) निवृत्ति नहीं होय किन्तु कुछ न कुछ अंश रहा आवे जैसे बहिरायाम निवृत्ति होनेपर भी रूक्षादिकोंकी निवृत्ति नहीं होती हैं ॥ अब नाना प्रकारकी व्याधि करै है यह जो कह आये हैं उसको कहते हैं— संकोचः पर्वणां स्तम्भो भङ्गोऽस्थां पर्वणामपि । लोमहर्षः प्रलापश्च पाणिपृष्ठशिरोग्रहः ॥ ६ ॥ खांज्यपांगुल्यकुब्जत्वं शोथोऽङ्गानामनिद्रता । गर्भशुक्ररजोजनाशः स्पंदनं गात्रसु- प्तता ॥ ७ ॥ शिरोनासाक्षिजन्रूणां ग्रीवायाश्चपि हुण्डनम् ।

रूपाणि करोति कुपितोऽनिलः । हेतुस्थानविशेषाच्च भवे-

भाषाटीकासमेत । ( १४१ ) भेदस्तोदोऽर्त्तिराक्षेपो मोहश्चायास एव च ॥ ८ ॥ एवंविधानि रूपाणि करोति कुपितोऽनिलः । हेतुस्थानविशेषाच्च भवे- द्रोगविशेषकृत् ॥ ९ ॥ संधियोंका संकोच और स्तंभ, हड्डियों और सन्धियोंमें फूटनेकीसी पीडा, रोमांच, बाहियात बकना, हाथ पैर और मुख इनका जकडजाना, खंजत्व, पांगुला होना, कुबडापना, अङ्गोंका सूखना, निद्राका नाश, गर्भका न रहना, शुक्र और रज (स्त्रीका आर्त्तव) इनका नाश, कंप, अङ्गोंमें शून्यता, मस्तक, नाक, मुख, जत्रु और नाड इनका भीतर जाना, अथवा टेढे होजाय, भेदसदृश पीडा, नोचनेकीसी पीडा, शूल, आक्षेपरोग जा आगे कहेंगे, मोह, श्रम, कुपित भई जो वायु इस प्रकार लक्षण करे है, वह वायु हेतु और स्थान इन भेदसे विशिष्ट रोग उत्पन्न करनेवाली होती है । जैसे कफावृत होनेसे मन्यास्तम्भ रोग करे । यदि पक्वाशयमें वात स्थित होय तो आंतोंका गूंजना इत्यादि रोग करै है ॥ कोष्ठाश्रितवायुके कार्य । तत्र कोष्ठाश्रिते दुष्टे निग्रहो मूत्रवर्चसोः । ब्रध्नहृद्रोगगुल्मार्शः पार्श्वशूलं च मारुते ॥ १० ॥ कोठेमें स्थित वायु दुष्ट होनेसे मलमूत्रका अवरोध होय, बदरोग, हृद्रोग, गोला बवासीर और पसवाडोंमें पीडा इतने रोग उत्पन्न करे ॥ सर्वांगकुपित वायुके कार्य सर्वाङ्गकुपिते वाते गात्रस्फुरणजृम्भणम् । वेदनाभिः परीतस्य स्फुटन्तीवास्य सन्धयः ॥ ११ ॥ सब अंगकी वायु कुपित होनेसे अंगोंका फरकना, जम्भाई और सन्धि वेदना- युक्त हो फूटनेकीसी पीडा होय ॥ गुदामें स्थित वायुके कार्य । ग्रहो विण्मूत्रवातानां शूलाध्मानाश्मशर्कराः । जंघोरुत्रिकपत्पृष्ठरोगशोफौ गुदस्थिते ॥ १२ ॥ वायु गुदामें स्थित होनेसे मल मूत्र और वायुका रुकना, शूल, अफरा, पथरी शर्करा, जंघा, ऊरु, त्रिकस्थान, पैर, पीठ इनमें पीडा और सूजन ये रोग होते हैं ॥ १ इस जगह गुदाशब्दकरके उत्तरगुदा अर्थात् पक्वाशय जानना, गुदा नहीं जानना क्योंकि, गुदामें कहे तो उसको अश्मरी ( पथरी ) कर्तृत्व नहीं हो सके ।

( १४२ ) माधवनिदान ।

( १४२ ) माधवनिदान । आमाशयस्थित वायुके कार्य । रुक्पार्श्वोदरहृन्नाभेस्तृष्णोद्गारविषूचिकाः । कासः कण्ठास्यशोषश्च श्वासश्चामाशये स्थिते ॥ १३ ॥ वायु आमाशयमें स्थित होनेसे पसवाडा, उदर, हृदय और नाभि इनमें पीडा होय, प्यास, डकार और हैजा ( मुख और गुदाके द्वारा अन्नकी प्रवृत्ति ) खांसी, कण्ठ, मुखका सूखना, श्वास ये लक्षण होते हैं ॥ पक्वाशयस्थ वायुके कार्य । पक्वाशयस्थोऽन्त्रकूजं शूलाटोपौ करोति च । कृच्छ्रमूत्रपुरीषत्वमानाहं त्रिकवेदनाम् ॥ १४ ॥ वायु पक्वाशयमें होय तो आंतोंका गूझना, शूल, आटोप, गुडगुडाशब्द, मल मूत्र कष्टसे निकले, अफरा, त्रिकस्थानमें पीडा इन लक्षणोंको करे ॥ इन्द्रियोंमें स्थित वायुके कार्य । श्रोत्रादिष्विन्द्रियवधं कुर्यात्क्रुद्धः समीरणः । कानसे आदि जो और इंद्रियें हैं उनमें कुपित वायु यदि स्थित होय तो इंद्रि- योंका नाश करै ॥ रसधातुगत वायुके लक्षण । त्वग्रूक्षा स्फुटिता सुप्ता कृशा कृष्णा च तुद्यते । आतन्द्यते सरागा च मर्मरुक्त्वग्गतेऽनिले ॥ १५ ॥ वायु त्वग्गत अर्थात् धातुरूप त्वचामें प्राप्त होनेसे त्वचा रूखी और फटी शून्य कर्कश और काली हो जाय और उसमें चमका चले तथा तन जाय, कुछ तांबेके समान लाल होजाय और हृदयादि मर्मोंमें पीडा होय ॥ रक्तगत वायुके लक्षण । रुजस्तीव्राः ससन्तापा वैवर्ण्यं कृशताऽरुचिः । गात्रे चारूंषि भुक्तस्य स्तंभश्चासृग्गतेऽनिले ॥ १६ ॥ वायु रुधिरमिश्रित होनेसे सन्तापयुक्त तीव्रवेदना होय, देहकी विवर्णता होय, कृशता, अरुचि और देहमें फोडा तथा भोजन करनेके उपरान्त देहका जकड जाना ये लक्षण होते हैं ॥ मांसमेदोगत वायुके लक्षण । गुर्वङ्गं तुद्यते स्तब्धं दण्डमुष्टिहतं यथा । सरुक् श्रमितमत्यर्थं मांसमे दोगतेऽनिले ॥ १७ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १४३ ) मांस और मेदमें वायुके पहुँचनेसे अंग भारी हो जाय, चोटनेकेसे पीडा होय अथवा निश्चल होजाय अथवा मुक्का मारनेकीसी तथा लकडी मारनेकीसी पीडा होय और थकापन होय ॥ मज्जास्थिगत वायुके लक्षण । मेदोऽस्थिपर्वणां सन्धिशूलं मांसबलक्षयः । अस्वप्नः सतता रुक् च मज्जास्थिकुपितेऽनिले ॥ १८ ॥ मज्जा और हड्डी इन ठिकानेपर वायुका कोप होनेसे हडफूटनी हो, संधिसन्धिमें पीडा हो, मांस बल ये क्षीण हो जायँ, निद्रा आवे नहीं और निरन्तर पीडा हो ॥ शुक्रगत वायुके लक्षण । क्षिप्रं मुञ्चति बध्नाति शुक्रं गर्भमथापि वा । विकृतिं जनयेच्चापि शुक्रस्थः कुपितोऽनिलः ॥ १९ ॥ शुक्रस्थानकी वायुका कोप होनेसे वह वायु शुक्रको जल्दी पतन करे और बंधन करे, अथवा गर्भको जल्दी छोडे और बंधन करे और गर्भका अथवा शुक्रका विकार प्रगट करे ॥ शिरागत वायुके लक्षण । कुर्याच्छिरागतः शूलं शिराकुञ्चनपूरणम् । स बाह्याभ्यन्तरायामं खल्लीं कुब्जत्वमेव च ॥ २० ॥ वायु शिरा (नाडी) गत होनेसे शूल, नाडीका संकोच और स्थूलत्व करे और बाह्यायाम, आभ्यन्तरायाम, खल्ली और कुबडापना इन रोगोंको उत्पन्न करे ॥ स्नायुगत और संधिगत वायुके लक्षण । सर्वाङ्गैकाङ्गरोगांश्च कुर्यात्स्नायुगतोऽनिलः । हन्ति संधिगतः सन्धीञ्छूलशोथौ करोति च ॥ २१ ॥ वायु स्नायुगत होनेसे सर्वांग और एकांग रोगको करे, संधिगत होनेसे सन्धिका विश्लेष (जुदा जुदा होना) और सन्धिका जकड जाना तथा शूल और सूजन इन रोगोंको प्रगट करे ॥ पित्त और कफ इनस आवृत्त हुई प्राणादिक वायुके आधे आधे श्लोकोंमें लक्षण कहते हैं- प्राणे पित्तावृते छर्दिर्दाहश्चैवोपजायते । दौर्बल्यं सदनं तन्द्रा वैरस्यं च कफावृते ॥ २२ ॥ उदाने पित्तयुक्ते तु दाहो मूर्च्छा भ्रमः क्लमः । अस्वेदहर्षौ मन्दाग्निः शीतता च कफा- CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( १४४ ) माधवनिदान ।

( १४४ ) माधवनिदान । वृते ॥ २३ ॥ स्वेददाहौष्ण्यमूर्च्छाः स्युः समाने पित्तसंयुत । कफेन संगे विण्मूत्रे गात्रहर्षश्च जायते ॥ २४ ॥ अपाने पित्त- युक्ते तु दाहौष्ण्यं रक्तमूत्रता । अधःकाये गुरुत्वं च शीतता च कफावृते ॥ २५ ॥ व्याने पित्तावृते दाहो गात्रविक्षेपणं क्लमः । स्तंभनो दंडकश्चापि शोथशूलौ कफावृते ॥ २६ ॥ प्राणवायु पित्तसंयुक्त होनेसे वमन और दाह उत्पन्न होय और कफसंयुक्त होनेसे दुर्बलपना, ग्लानि, तन्द्रा और मुखमें विरसता ये होयँ । उदानवायु पित्त- युक्त होनेसे दाह, मूर्च्छा, भ्रम, अनायास श्रम ये होयँ और कफयुक्त होय तौ पसीना नहीं आवे, रोमाञ्च, अग्नि मन्द होय और शीत लगे । समानवायु पित्तयुक्त होनेसे पसीना, दाह, गरमी और मूर्च्छा ये होते हैं और कफयुक्त होनेसे मलमूत्रका रुकना और रोमाञ्च होय । अपानवायु पित्तयुक्त होनेसे दाह, गरमी, लाल मूत्र होता है और अपानवायु कफयुक्त हो तो कमरके नीचेके भागमें भारीपना और सरदीका लगना होय । व्यानवायु पित्तयुक्त होनेसे दाह गात्रोंका विक्षेप अर्थात् इधर उधरका फेरना और श्रम होय और कफयुक्त होनेसे शरीर लकडीके समान स्तंभ होय, सूजन और शूल होय । इस जगह प्राणादि पंच वायुओंके परस्पर मिलनेसे बीस प्रकारके आवरण चरकोक्त जान लेने और वाग्भटके मतसे आवरण बाईस प्रकारके हैं, हमने ग्रन्थके विस्तारभयसे छोड दिये हैं ॥ आक्षेपकके सामान्य लक्षण । यदा तु धमनीः सर्वाः कुपितोऽभ्येति मारुतः । तदा क्षिपत्याशु मुहुर्मुहुर्देहं मुहुश्चरः । मुहुर्मुहुस्तदाक्षेपादाक्षेपक इति स्मृतः ॥२७॥ जिस कालमें वायु कुपित होकर सब धमनी नाडियोंमें जाकर प्राप्त होय तब उस जगह वह बारम्बार संहार करके देहको बारंबार आक्षिप्त करती है अर्थात् हाथीपर बैठनेवाले पुरुषके समान सब देहको चलायमान करे उस देहको बारम्बार चलानेको आक्षेपक रोग कहते हैं ॥ आक्षेपकके अपतन्त्र और अपतानक ऐसे दो अवस्था- विशेषको कहते हैं-- क्रुद्धः स्वैः कोपनैर्वायुः स्थानादूर्ध्वं प्रवर्त्तते । पीडयन् हृदयं गत्वा शिरःशंखौ च पीडयेत् ॥ २८ ॥ धनुर्वन्नामयेद्गात्रा- १-ऊर्ध्वाधस्तिर्यग्गा धमनीः ।

भाषाटीकासमेत । ( १४५ ) प्याक्षिपेन्मोहयेत्तथा । स कृच्छ्रादुच्छ्वसेच्चापि स्तब्धाक्षोऽथ निमीलकः ॥ २९ ॥ कपोत इव कूजेच्च निस्संज्ञः सोऽप- तन्त्रकः । दृष्टिं संस्तभ्य संज्ञां च हत्वा कण्ठेन कूजति ॥ ३० ॥ हृदि मुक्ते नरः स्वास्थ्यं याति मोहं वृते पुनः । वायुना दारुणं प्राहुरेके तदपतानकम् ॥ ३१ ॥ रूक्षादि स्वकारणोंसे कोपको प्राप्त भई जो वायु सो अपने स्थानको छोड ऊपर जाकर प्राप्त हो और हृदयमें जाकर पीडा करे, मस्तक और कनपटी इनमें पीडा करे और देहको धनुषके समान नवाय देवे और चले तो मूर्च्छित कर दे, वह रोगी बडे कष्टसे श्वास ले, नेत्र जकड जावें अथवा मिच जावें, कबूतरके समान गूंजे तथा बेहोश हो इस रोगको अपतंत्रक कहते हैं । दृष्टिका स्तंभन हो जाय, संज्ञा जाती रहे, गलेमें घुरघुर शब्द होय, वायु जब हृदयको छोडे तब रोगीको होश होय और वायु हृदयको व्याप्त करे तब फेर मोह हो जाय । इस भयंकर रोगको कोई अपतानक ऐसे कहते हैं ॥ अब कहते हैं कि, दण्डापतानक, अन्तरायाम, बहिरायाम और अभिघात इन भेदोंसे आक्षेपकयोग चार प्रकारका है, उनके लक्षण लिखते हैं- दंडापतानकके लक्षण । कफान्वितो भृशं वायुस्तास्वेव यदि तिष्ठति । दण्डवत्स्तंभयेद्देहं स तु दण्डापतानकः ॥ ३२ ॥ वायु अत्यन्त कफयुक्त होकर सब धमनी नाडियोंमें प्राप्त हो और सब देहको दण्ड (लकडी) के समान स्तब्ध जकड दे वह दंडापतानक होता है ॥ अब अन्तरायाम और बहिरायाम इनके साधारण रूपको कहते हैं- धनुस्तुल्यं नमेद्यस्तु स धनुःस्तम्भसंज्ञितः । जो वायु धनुषके समान शरीरको बांका कर दे उसको धनुःस्तंभसंज्ञक कहते हैं ॥ अन्तरायामके लक्षण । अङ्गुलीगुल्फजठरहृद्वक्षोगलसंश्रितः। स्नायुप्रतानमनिलो यदा क्षिपति वेगवान् ॥ ३३ ॥ विष्टब्धाक्षः स्तब्धहनुर्भग्नपार्श्वः कफं वमन् । अभ्यन्तरं धनुरिव यदा नमति मानवः ॥ ३४ ॥ तदा सोऽभ्यन्तरायामं कुरुते मारुतो बली ॥ ३५ ॥

( १४६ ) माधवनिदान ।

( १४६ ) माधवनिदान । पैरकी उंगली, घोंटू, हृदय, पेट, उरःस्थल और गला इन ठिकानोंमें रहा जो वायु वह वेगवान् होकर जो वहां नसोंका जाल उसको सुखाय बाहर निकाल दे उस मनुष्यके नेत्र स्थिर होजायँ, मोडा रहिजाय, पसवाडोंमें पीडा होय, मुखसे कफ गिरे और जिससमय मनुष्य धनुषके सदृश नीचेको नवजाय तब वह बली वायु अन्तरायाम रोगको करे ॥ बाह्यायामके लक्षण । बाह्यः स्नायुप्रतानस्थो बाह्यायामं करोति च । तमसाध्यं बुधाः प्राहुर्वक्षःकट्यूरुभञ्जनम् ॥ ३६ ॥ बाहरकी नसोंमें रहती जो वात सो बाह्यायाम अर्थात् पीठको बांकी कर दे उरस्थल कमर और जांघोंको मोड दे, ऐसे इस रोगको पंडित असाध्य कहते हैं ॥ अब पूर्वोक्त आक्षेपकको पित्तकफका अनुबन्ध होता है, उसको कहते हैं- कफपित्तान्वितो वायुर्वायुरेव च केवलः । कुर्यादाक्षेपकं त्वन्यं चतुर्थमभिघातजम् ॥ ३७ ॥ कफपित्तयुक्त वायु अथवा केवल वायु आक्षेपकरोगको करे और दूसरा कहिये दण्डापतानकादि तीनोंकी अपेक्षा चतुर्थ अभिघातज आक्षेपक रोगको करे । इसके लक्षण-“ यदा तु धमनीः सर्वाः ” इत्यादि पूर्वोक्त सामान्यलक्षणोंसे जानने । इस श्लोकका गदाधरने ऐसा अर्थ करा है कि, 'कफपित्तान्वितः' इत्यादि निमित्तभेद करके चार प्रकारका आक्षेपकरोग प्रगट हो, सो ऐसे एक कफान्वित वायुसे, दूसरा पित्तान्वित वायुसे, तीसरा केवल वायुसे और चौथा दंडादिके चोट लगनेसे कुपित वायुसे । इस पक्षमें गर्भपात और रुधिरका अतिस्राव जो होता है सो केवल वातजन्य जानना और उस ठिकाने बारंबार आक्षेपक होता है । इसका कारण यह है कि, ये सब आक्षेपकके भेद हैं ॥ असाध्यत्वको कहते हैं- गर्भपातनिमित्तश्च शोणितातिस्रवाच्च यः । अभिघातनिमित्तश्च न सिद्ध्यत्यपतानकः ॥ ३८ ॥ गर्भपातके होनेसे अथवा अति रक्तस्त्रावके होनेसे अथवा अभिघात कहिये दण्डादिकोंकी चोट लगनेसे जो प्रगट अपतानकरोग सो असाध्य है ॥ पक्षाघातके लक्षण । गृहीत्वाऽर्धं तनोर्वायुः शिरास्नायू विशोष्य च । पक्षमन्यतरं हन्ति सन्धिबन्धान्विमोक्षयन् ॥ ३९ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

भाषाटीकासमेत । ( १४७ ) कृत्स्नोऽर्द्धकायस्तस्य स्यादकर्मण्यो विचेतनः । एकाङ्गरोगं तं केचिदन्ये पक्षवधं विदुः ॥ ४० ॥ वायु आधे शरीरको पकड सब शरीरकी नसोंको सुखायकर दहने या बांये अंगके बाहु कक्षा पार्श्वादिकोंमेंसे किसी एकको नाश करदे और सन्धिके बंधनोंको शिथिल करदे, पीछे उस रोगीके सब वा आधे अंग हलें चलें नहीं और उसको थोडा भी देखनेका स्पर्श आदिका ज्ञान नहीं रहे इसको एकांगरोग कहते हैं, दूसरे पक्षवध कहते हैं । इसीको पक्षाघात कहते हैं । लोकमें लकवा कहते हैं ॥ सर्वाङ्गरोगके लक्षण । सर्वाङ्गरोगस्तद्वत्स्यात्सर्वकायाश्रितेऽनिले । तद्वत् कहिये “ शिरास्नायु ” इत्यादि सम्प्राप्ति लक्षण इससे जानने । सर्व शिराओं ( नाडियों ) में वायु प्राप्त होनेसे उसको सर्वांगरोग कोई कहते हैं ॥ अब साध्यासाध्यके ज्ञानार्थ और दोषोंका सम्बन्ध कहते हैं- दाहसंतापमूर्च्छाः स्युर्वायौ पित्तसमन्विते । शैत्यशोथगुरु- त्वानि तस्मिन्नेव कफान्विते ॥ ४१ ॥ शुद्धवातहतं पक्षं कृच्छ्रसाध्यतमं विदुः । साध्यमन्येन संसृष्टमसाध्यं क्षयहेतु- कम् ॥ ४२ ॥ गर्भिणीसूतिकाबालवृद्धक्षीणेष्वासृक्स्रुतौ । पक्षाघातं परिहरेद्वेदनारहितो यदि ॥ ४३ ॥ पक्षबंधकी वायु कफपित्तयुक्त होवे तो दाह, सन्ताप और मूर्च्छा होय और वही वायु कफयुक्त होय तो शीत सूजन भारीपन ये लक्षण होयें और केवल वायुसे प्रगट पक्षाघात अत्यन्त कष्टसाध्य होता है और दोषोंसे ( पित्तसे या कफसे ) संसृष्ट होनेसे साध्य होता है। क्षयसे प्रगट भया पक्षाघात असाध्य होता है। गर्भिणी, प्रसूति, बालक, वृद्ध और क्षीण इनके भया तथा रुधिरके स्रावसे प्रगट भया पक्षाघात पीडा- रहित हो तो उसको वैद्य त्यागदे अर्थात् असाध्य जान चिकित्सा न करे ॥ अर्दितरोगके लक्षण । उच्चैर्व्याहरतोऽत्यर्थं खादतः कठिनानि च । हसतो जृम्भतो वापि भाराद्विषमशायिनः ॥ ४४ ॥ शिरोनासाौष्ठचिबुक- ललाटेक्षणसन्धिगः । अर्दयत्यनिलो वक्त्रमर्द्दितं जनयत्यतः ॥ ४५ ॥ वक्रीभवति वक्त्रार्धं ग्रीवा चाप्यपवर्तते । शिर- श्चलति वाक्स्तंभो नेत्रादीनां च वैकृतम् ॥ ४६ ॥ ग्रीवा-

( १४८ ) माधवनिदान ।

( १४८ ) माधवनिदान । चिबुकदन्तानां तस्मिन् पार्श्वे च वेदना । तमर्दितमिति प्राहुर्व्याधि व्याधिविशारदाः ॥ ४७ ॥ ऊंचे स्वरसे वेदादिकका पाठ करनेसे अथवा कठिन पदार्थ सुपारी आदिके खानेसे, बहुत हँसनेसे, बहुत जंभाईके लेनेसे, बोझा ढोनेसे, ऊंचे नीचे स्थानमें सोनेसे कोपको प्राप्त भई वायु मस्तक, नाक, होठ, ठोडी, ललाट और नेत्र इनकी संधियोंमें प्राप्त हो मुखमें पीडा करे, अर्दित रोग उत्पन्न हुए उस पुरुषका मुख आधा टेढा होजाय, ग्रीवा ( नाड ) टेढी होजाय, मस्तक हिला करे, अच्छी तरह बोला जाय नहीं, नेत्र, भ्रुकुटी, गाल इनकी विकृति कहिये पीडा, फरकना, टेढा होना इत्यादि होयँ और जिस तरफ अर्दित रोग होय उस तरफ नाड, ठोडी और दांत इनमें पीडा होय । व्याधि जाननेमें जो कुशल वैद्य हैं वे इस व्याधिको अर्दित- रोग ऐसे कहते हैं। शंका-क्योंजी ! अर्दित रोगमें और पक्षाघातमें क्या भेद है ? उत्तर-वेग होनेसे अर्दितरोगमें कभी १ पीडा होती है और पक्षाघातमें सदा पीडा होती है। अर्दितरोग चार प्रकारका है ॥ अर्दितरोगके असाध्य लक्षण । क्षीणस्याऽनिमिषाक्षस्य प्रसक्ताव्यक्तभाषिणः । न सिध्यत्यर्दितं गाढं त्रिवर्षं वेपनस्य च ॥ ४८ ॥ क्षीण पुरुषके, पलक नहीं लगे ऐसे पुरुषके अत्यन्त शुद्ध बोले नहीं ऐसे पुरुषके, अर्दित रोगको प्रगट भये तीन वर्ष व्यतीत होगये हों अथवा त्रिवर्ष कहिये मुख, नाक और नेत्र इन तीनोंका स्राव होय ऐसा और कम्पयुक्त पुरुषको अर्दितरोग साध्य नहीं होय ॥ अब आक्षेपकसे लेकर अर्दितपर्यन्त रोगोंका वेग कहते हैं- गते वेगे भवेत्स्वास्थ्यं सर्वेष्वाक्षेपकादिषु । आक्षेपकादि सब वातरोगोंमें वेग शांत होनेसे स्वास्थ्य कहिये पीडा कम होय जैसे मस्तकके ऊपरका भार ( बोझा ) उतारनेसे सुखकी प्राप्ति होती है ॥ हनुग्रहके लक्षण । जिह्वानिर्लेखनाच्छुष्कभक्षणादभिघाततः । कुपितो हनुमूलस्थः स्रंसयित्वाऽनिलो हनुम् ॥ ४९ ॥ १ अथवा यथोक्त सब लक्षणयुक्त अर्दितरोग है उससे विपरीत अर्धांगवातके लक्षण जानने। परन्तु सुश्रुतमें मुखमात्रमें ही अर्दितरोग लिखा है। अर्धशरीरको अर्धांगवात करके लब्ध होनेसे नहीं लिखा, सोई माधवने पाठ लिखा है ।

भाषाटीकासमेत । ( १४९ ) करोति विवृतास्यत्वमथवा संवृतास्यताम् । हनुग्रहः स तेन स्यात्कृच्छ्राच्चर्वणभाषणम् ॥ ५० ॥ जिह्वाके अतिघर्षण करनेसे, चना आदि सूखी वस्तुके खानेसे अथवा किसी प्रकार चोटके लगनेसे हनुमूल ( कपोल ) के अर्थात् डाढकी जड़में रहनेवाली जो वायु सो कुपित होकर हनुमूलको नीचे कर मुखको खुला ही रखदे अथवा मुखको बन्द करदे, उसको हनुग्रहरोग कहते हैं । तब उस मनुष्यका खाना बोलना कठिनतासे होय ॥ मन्यास्तम्भके लक्षण । दिवास्वप्नासमस्थानविकृतोर्ध्वनिरीक्षणैः । मन्यास्तम्भं प्रकुरुते स एव श्लेष्मणा युतः ॥ ५१ ॥ दिनमें सोनेसे, नीचे ऊंचे स्थानमें सोनेसे, ऊंचेको विकृतिपूर्वक देखनेसे इन कारणोंसे कोपको प्राप्त भई जो वात सो कफयुक्त होकर मन्या ( नाड़ी ) स्तंभन करे, इस रोगको मन्यास्तंभरोग कहते हैं ॥ जिह्वास्तम्भके लक्षण । वाग्वाहिनीशिरासंस्थो जिह्वां स्तम्भयतेऽनिलः । जिह्वास्तम्भः स तेनान्नपानवाक्येष्वनीशता ॥ ५२ ॥ वायु वाणीके बहनेवाली नाडियोंमें प्राप्त हो जिह्वाका स्तंभन करदे, उसको जिह्वा स्तंभ कहते हैं। यह अन्नपानकी तथा बोलनेकी सामर्थ्यका नाश करती है ॥ शिराग्रहके लक्षण । रक्तमाश्रित्य पवनः कुर्यान्मूर्धधराः शिराः । रूक्षाः सवेदनाः कृष्णाः सोऽसाध्यः स्याच्छिराग्रहः ॥ ५३ ॥ वायु रुधिरका आश्रयकर मस्तकके धारण करनेवाली नाडीको रूखी पीडायुक्त और काली करदे, यह शिराग्रहरोग असाध्य है ॥ गृध्रसीके लक्षण । स्फिक्पूर्वा कटिपृष्ठोरुजानुजङ्घापदं क्रमात् । गृध्रसी स्तंभरुक्तोदैर्गृह्णाति स्पन्दते मुहुः ॥ ५४ ॥ वाताद्वातकफात्तन्द्रागौरवारोचकान्विता ॥ ५५ ॥ १ मन्या-गलेकी नाड़ीको कहते हैं। २ 'शिरोग्रहः' ऐसा भी पाठ है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

( १५० ) माधवनिदान ।

( १५० ) माधवनिदान । प्रथम स्फिक् कहिये कमरके नीचेका भाग जिसको कूला कहते हैं उसको स्तंभित कर दे, पीछे क्रमसे कमर, पीठ, ऊरु, जानु, जंघा और पग इनको स्तम्भित करदे अर्थात् ये रहिजाय, वेदना और तोद कहिये चोटनेकीसी पीडा होय और बारम्बार कम्प होय, यह गृध्रसीरोग बादीसे होता है और वात कफसे होय तो इसमें तन्द्रा, भारीपना और अरुचि ये विशेष होयँ । इस प्रकार गृध्रसीरोग दो प्रकारका है ॥ विश्वाचीके लक्षण । तलं प्रत्यङ्गुलीनां याः कण्डरा बाहुपृष्ठतः । बाह्वोः कर्मक्षयकरी विश्वाची चेति सोच्यते ॥ ५६ ॥ बाहुके पिछाडीसे लेकर हाथके ऊपरले भागपर्यंत प्रत्येक उंगलीके नीचे मोटी नसें उनको दुष्ट कर हाथसे लेना देना पसारना मुट्टी मारनी इत्यादिक कार्योंका नाश- कर्ता जो रोग होय उसको विश्वाचीरोग कहते हैं ॥ क्रोष्टुशीर्षके लक्षण । वातशोणितजः शोथो जानुमध्ये महारुजः । ज्ञेयः क्रोष्टुकशीर्षस्तु स्थूलः क्रोष्टुकशीर्षवत् ॥ ५७ ॥ वातरक्तसे दोनों जानुओं (घोण्टुओं) की संधिमें अत्यन्त पीडाकारक सूजन हों और वे स्यार (गीदड) के मस्तकसमान मोटे हों उसको क्रोष्टुशीर्ष कहते हैं ॥ खंज और पांगुलेके लक्षण । वायुः कट्याश्रितः सक्थ्नः कण्डरामाक्षिपेद्यदा । खञ्जस्तदा भवेज्जन्तुः पङ्गुः सक्थ्नोर्द्वयोर्वधात् ॥ ५८ ॥ कमरमें रहा जो वात सो जंघाकी नसोंको ग्रहण कर एक पगको स्तंभित कर दे उसको खोडा कहते हैं और दोनों जंघाओंकी नसोंको पकड दोनों स्तम्भित कर दे उसको पांगुला कहते हैं ॥ कलायखंजके लक्षण । प्रकामं वेपते यस्तु खञ्जन्निव च गच्छति । कलायखञ्जं तं विद्यान्मुक्तसन्धिप्रबन्धनम् ॥ ५९ ॥ जो पुरुष चलते समय थरथर कांपे और खंज अर्थात् एक पैरसे हीन मालूम होय, इस रोगमें संधिंके बंधन शिथिल होते हैं, इस रोगको कलायखंज कहते हैं ॥ वातकंटकके लक्षण । रुक्पादे विषमे न्यस्ते श्रमाद्वा जायते यदा । वातेन गुल्फमाश्रित्य तमाहुर्वातकंटकम् ॥ ६० ॥

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भाषाटीकासमेत । ( १५१ ) ऊंची नीची जगहमें पैर पडनेसे अथवा श्रमके होनेसे कुपित वायु टकनोंमें प्राप्त होकर पीडा करे तो इस रोगको वातकण्टक कहते हैं ॥ पादहर्षके लक्षण । पादयोः कुरुते हर्षं पित्तासृक्सहितोऽनिलः । विशेषतश्च क्रमतः पादहर्षं तमादिशेत् ॥ ६१ ॥ जिसके पैर हर्षयुक्त झनझनाहट पीडायुक्त होंय और अत्यन्त सोय जावें उसको पादहर्ष रोग कहते हैं । यह कफवातके कोपसे होय है ॥ अंसशोष अपबाहुकके लक्षण । अंसदेशे स्थितो वायुः शोषयेदंसबन्धनम् । शिराश्चाकुंच्य तत्रस्थो जनयेदपबाहुकम् ॥ ६२ ॥ कन्धेम रहा जो वायु सो कुपित होकर उसके बन्धनको सुखाय दे तब अंस- शोष रोग प्रगट होय और कन्धेमें रहा जो वायु सो नसोंको संकोच करके अप- बाहुक रोग प्रगट करे ॥ मूकादिक तीन रोगोंके लक्षण । आवृत्य वायुः सकफो धमनीः शब्दवाहिनीः । नरानकरोत्यक्रियकान्मूकमिन्मिनगद्गदान् ॥ ६३ ॥ कफयुक्त वायु शब्दके बहनेवाली नाडियोंमें प्राप्त होकर मनुष्योंकी वचन- क्रियारहित मूक, मिन्मिन और गद्गद ऐसा करदे । मूक कहिये जिससे बोला न जाय, मिन्मिन कहिये गिनगिनायकर नाकसे बोले और गद्गद बोलते समय बीचमें पद और व्यञ्जनोंको न बोले और मन्द बोले इन रोगोंके कारण सदृश होकर रोगोंके भिन्न भिन्न प्रकार होते हैं । वे दोषोंके उत्कर्ष करके अथवा प्रारब्धवशसे होते हैं ऐसा जानना ॥ तूनीरोगके लक्षण । अधो या वेदना याति वर्च्चोमूत्राशयोत्थिता । भिन्दन्तीव गुदोपस्थं सा तूनी नाम नामतः॥ ६४ ॥ पक्वाशय और मूत्राशयसे उठी जो पीडा सो नीचे जाकर प्राप्त हो और गुदा तथा उपस्थ कहिये स्त्रीपुरुषोंके गुह्यस्थान इनमें भेद करे अर्थात् पीडा करे उसको तूनीरोग कहते हैं ॥ १ अद्य इति गुदोपस्थम् ।

( १५२ ) माधवनिदान ।

( १५२ ) माधवनिदान । प्रतूनीके लक्षण । गुदोपस्थोत्थिता चैव प्रतिलोमं प्रधावति । वेगैः पक्वाशयं याति प्रतूनी चेह सोच्यते ॥ ६५ ॥ गुदा और उपस्थ इनसे उठी जो पीडा उलटी ऊपर जायकर प्राप्त हो और जोरसें पक्वाशयमें प्राप्त हो और तूनीके समान पीडा करे उसको प्रतूनी कहते हैं ॥ आध्मानरोगके लक्षण । साटोपमत्युग्ररुजमाध्मानमुदरं भृशम् । आध्मानमिति जानीयाद्घोरं वातनिरोधजम् ॥ ६६ ॥ गुडगुडशब्दयुक्त अत्यन्त पीडायुक्त ऐसा उदर (पक्वाशय) अत्यन्त फूले अर्थात् बादीसे भरकर चामकी थैलीके समान होजाय इस भयंकर रोगको आध्मानरोग कहते हैं, यह वातके रुकनेसे होता है ॥ प्रत्याध्मानके लक्षण । विमुक्तपार्श्वहृदयं तदेवामाशयोत्थितम् । प्रत्याध्मानं विजानीयात्कफव्याकुलितानिलम् ॥ ६७ ॥ और वही आध्मानरोग आमाशयमें उत्पन्न होय तो उसको प्रत्याध्मान कहते हैं इसमें पसवाडे और हृदयमें पीडा नहीं होय और वायु कफकरके व्याकुल हो ॥ वाताष्ठीलाके लक्षण । नाभेरधस्तात्सञ्जातः सञ्चारी यदि वाऽचलः । अष्ठीलावद् घनो ग्रन्थिरूर्ध्वमायत उन्नततः ॥ वाताष्ठीलां विजानीयाद्बहिर्मार्गावरोधिनीम् ॥ ६८ ॥ नाभीके नीचे उत्पन्न भई और इधर उधर फिरे अथवा अचल अष्ठीला (गोल- पाषाण) के समान कठिन ऊपरका भाग कुछ लम्बा होय और आडी कुछ ऊंची होय और बहिर्मार्ग कहिये अधोवायु, मल, मूत्र इनका अवरोध कहिये (रुकना) हो ऐसे गांठको वाताष्ठीला कहते हैं ॥ १ "श्रमातुरण पानीयं पीत्वा वेगविधारणम् । धावतो वा पिबेत्तोयं भुञ्जतो वा विदाहि च ॥ तथा पयोऽम्बुपानाद्वा दुर्जरा पललेन वा । साऽष्ठीला नाम विख्याता गुर्वी कुक्षिश्रितापि वा" इति आत्रेयः।