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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

यथा हि लक्ष्यं निहतं धनुश्च सज्यं कृतं तेन तथा प्रसह्य । यथा हि भाषन्ति परस्परं ते छन्ना ध्रुवं ते प्रचरन्ति पार्थाः ॥ १३ ॥ जिस प्रकार उन्होंने धनुषपर बलपूर्वक प्रत्यंचा चढ़ायी, जिस तरह दुर्भेद्य लक्ष्यको बेध गिराया और जिस प्रकार वे सभी भाई आपसमें बातें करते हैं, उससे यह निश्चय हो जाता है कि कुन्तीके पुत्र ही ब्राह्मणवेषमें छिपे हुए विचर रहे हैं ॥ १३ ॥

ततः स राजा द्रुपदः प्रहृष्टः पुरोहितं प्रेषयामास तेषाम् । विद्याम युष्मानिति भाषमाणो महात्मानः पाण्डुसुतास्तु कच्चित् ॥ १४ ॥ जनमेजय! इस समाचारसे राजा द्रुपदको बड़ी प्रसन्नता हुई, उन्होंने उसी समय उनके पास अपने पुरोहितको भेजते हुए कहा—'आप उन लोगोंसे कहियेगा कि मैं आपलोगोंका परिचय जानना चाहता हूँ। क्या आपलोग महात्मा पाण्डुके पुत्र हैं?' ॥ १४ ॥

गृहीतवाक्यो नृपतेः पुरोधा गत्वा प्रशंसामभिधाय तेषाम् । वाक्यं समग्रं नृपतेर्यथाव- दुवाच चानुक्रमविक्रमेण ॥ १५ ॥ राजाका अनुरोध मानकर पुरोहितजी गये और उन सबकी प्रशंसा करके राजा द्रुपदके वचनोंको ठीक-ठीक एकके बाद एक करके क्रमशः कहने लगे— ॥ १५ ॥

विज्ञातुमिच्छत्यवनीश्वरो वः पाञ्चालराजो वरदो वरार्हाः । लक्ष्यस्य वेद्धारमिमं हि दृष्ट्वा हर्षस्य नान्तं प्रतिपद्यते सः ॥ १६ ॥ 'वरदानके योग्य वीर पुरुषो! वर देनेमें समर्थ पांचालदेशके राजा द्रुपद आपलोगोंका परिचय जानना चाहते हैं। इन वीर पुरुषको लक्ष्यवेध करते देखकर उन्हें हर्षकी सीमा नहीं रह गयी है ॥ १६ ॥

आख्यात च ज्ञातिकुलानुपूर्वीं पदं शिरस्सु द्विषतां कुरुध्वम् । प्रह्लादयध्वं हृदयं ममेदं पाञ्चालराजस्य च सानुगस्य ॥ १७ ॥ 'आपलोग अपनी जाति और कुल आदिका यथावत् वर्णन करें, शत्रुओंके माथेपर पैर रखें और मेरे तथा अनुचरोंसहित पांचालराजके हृदयको आनन्द प्रदान करें ॥ १७ ॥

पाण्डुर्हि राजा द्रुपदस्य राज्ञः प्रियः सखा चात्मसमो बभूव । तस्यैष कामो दुहिता ममेयं स्नुषां प्रदास्यामि हि कौरवाय ॥ १८ ॥ ‘महाराज पाण्डु राजा द्रुपदके आत्माके समान प्रिय मित्र थे। इसलिये उनकी यह अभिलाषा थी कि मैं अपनी इस पुत्रीका विवाह पाण्डुकुमारसे करूँ। इसे राजा पाण्डुको पुत्रवधूके रूपमें समर्पित करूँ’ ॥ १८ ॥ अयं हि कामो द्रुपदस्य राज्ञो हृदि स्थितो नित्यमनिन्दिताङ्गाः । यदर्जुनो वै पृथुदीर्घबाहु- र्धर्मेण विन्देत सुतां ममैताम् ॥ १९ ॥ सर्वांगसुन्दर शूरवीरो! राजा द्रुपदके हृदयमें नित्य निरन्तर यह कामना रही है कि मोटी एवं विशाल भुजाओंवाले अर्जुन मेरी इस पुत्रीका धर्मपूर्वक पाणि-ग्रहण करें ॥ १९ ॥ कृतं हि तत् स्यात् सुकृतं ममेदं यशश्च पुण्यं च हितं तदेतत् । ‘उनका यह कहना है कि यदि मेरा यह मनोरथ पूर्ण हो जाय, तो मैं समझूँगा कि यह मेरे शुभ कर्मोंका फल प्राप्त हुआ है। यही मेरे लिये यश, पुण्य और हितकी बात होगी’ ॥ १९ १/२ ॥ अथोक्तवाक्यं हि पुरोहितं स्थितं ततो विनीतं समुदीक्ष्य राजा ॥ २० ॥ समीपतो भीममिदं शशास प्रदीयतां पाद्यमर्घ्यं तथास्मै । मान्यः पुरोधा द्रुपदस्य राज्ञ- स्तस्मै प्रयोज्याभ्यधिका हि पूजा ॥ २१ ॥ जब विनयशील पुरोहितजी यह बात कह चुके, तब राजा युधिष्ठिरने उनकी ओर देखकर पास बैठे हुए भीमसेनको यह आज्ञा दी कि ‘इन्हें पाद्य और अर्घ्य समर्पित करो। ये महाराज द्रुपदके माननीय पुरोहित हैं। अतः इनका हमें विशेष आदर-सत्कार करना चाहिये’ ॥ २०-२१ ॥ भीमस्ततस्तत् कृतवान् नरेन्द्र तां चैव पूजां प्रतिगृह्य हर्षात् । सुखोपविष्टं तु पुरोहितं तदा युधिष्ठिरो ब्राह्मणमित्युवाच ॥ २२ ॥

जनमेजय! तब भीमसेनने पाद्य, अर्घ्य निवेदन करके उनका विधिवत् पूजन किया। उनकी दी हुई पूजाको प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करके पुरोहितजी जब बड़े सुखसे आसनपर बैठ गये, तब राजा युधिष्ठिरने उन ब्राह्मणदेवतासे इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥

पाञ्चालराजेन सुता निसृष्टा स्वधर्मदृष्टेन यथा न कामात् । प्रदिष्टशुल्का द्रुपदेन राज्ञा सा तेन वीरेण तथानुवृत्ता ॥ २३ ॥ ‘ब्रह्मन्! पाञ्चालराज द्रुपदने यह कन्या अपनी इच्छासे नहीं दी है, उन्होंने अपने धर्मके अनुसार लक्ष्यवेधकी शर्त करके अपनी कन्या देनेका निश्चय किया था। उस वीर पुरुषने उसी शर्तको पूर्ण करके यह कन्या प्राप्त की है ॥ २३ ॥ न तत्र वर्णेषु कृता विवक्षा न चापि शीले न कुले न गोत्रे ॥ कृतेन सज्येन हि कार्मुकेण विद्धेन लक्ष्येण हि सा विसृष्टा ॥ २४ ॥ सेयं तथानेन महात्मनेह कृष्णा जिता पार्थिवसङ्घमध्ये ।

नैवंगते सौमकिरद्य राजा संतापमर्हत्यसुखाय कर्तुम् ॥ २५ ॥ ‘राजाने वहाँ वर्ण, शील, कुल और गोत्रके विषयमें कोई अभिप्राय नहीं व्यक्त किया था। धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर लक्ष्यवेध कर देनेपर ही कन्यादानकी घोषणा की थी। इस महात्मा वीरने उसी घोषणाके अनुसार राजाओंकी मण्डलीमें राजकुमारी कृष्णापर विजय पायी है। ऐसी दशामें सोमकवंशी राजा द्रुपदको अब सुखका अभाव करनेवाला संताप नहीं करना चाहिये ॥ २४-२५ ॥

कामश्च योऽसौ द्रुपदस्य राज्ञः स चापि सम्पत्स्यति पार्थिवस्य । सम्प्राप्यरूप्रां हि नरेन्द्रकन्या- मिमामहं ब्राह्मण साधु मन्ये ॥ २६ ॥ ‘ब्राह्मण! राजा द्रुपदकी जो पहलेकी अभिलाषा है, वह भी पूरी होगी। इस राजकन्याको हम सर्वथा ग्रहण करनेयोग्य एवं उत्तम मानते हैं ॥ २६ ॥

न तद् धनुर्मन्दबलेन शक्यं मौर्व्या समायोजयितुं तथा हि । न चाकृतास्त्रेण न हीनजेन लक्ष्यं तथा पातयितुं हि शक्यम् ॥ २७ ॥ ‘कोई बलहीन पुरुष उस विशाल धनुषपर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सकता था। जिसने अस्त्रविद्याकी पूर्ण शिक्षा न पायी हो, ऐसे पुरुषके अथवा किसी नीच कुलके मनुष्यके लिये भी उस लक्ष्यको गिराना असम्भव था ॥ २७ ॥

तस्मान्न तापं दुहितुर्निमित्तं पाञ्चालराजोऽर्हति कर्तुमद्य । न चापि तत्पातनमन्यथेह कर्तुं हि शक्यं भुवि मानवेन ॥ २८ ॥ ‘अतः पांचालराजको अब अपनी पुत्रीके लिये पश्चात्ताप करना उचित नहीं है। इस पृथ्वीपर उस वीरके सिवा ऐसा कोई मनुष्य नहीं है, जो उस लक्ष्यको वेध सके’ ॥ २८ ॥

एवं ब्रुवत्येव युधिष्ठिरे तु पाञ्चालराजस्य समीपतोऽन्यः । तत्राजगामाशु नरो द्वितीयो निवेदयिष्यन्निह सिद्धमन्नम् ॥ २९ ॥ राजा युधिष्ठिर यों कह ही रहे थे कि पांचालराज द्रुपदके पाससे एक दूसरा मनुष्य यह समाचार देनेके लिये शीघ्रतापूर्वक आया कि ‘राजभवनमें आपलोगोंके लिये भोजन तैयार है’ ॥ २९ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि पुरोहितयुधिष्ठिरसंवादे द्विनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें पुरोहितयुधिष्ठिरविषयक एक सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९२ ॥

१९३-

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त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

पाण्डवों और कुन्तीका द्रुपदके घरमें जाकर सम्मानित होना और राजा द्रुपदद्वारा पाण्डवोंके शील-स्वभावकी परीक्षा

दूत उवाच

जन्यार्थमन्नं द्रुपदेन राज्ञा
विवाहहेतोरुपसंस्कृतं च ।
तदाप्नुवध्वं कृतसर्वकार्याः
कृष्णां च तत्रैव चिरं न कार्यम् ॥ १ ॥
दूत बोला— महाराज द्रुपदने विवाहके निमित्त बरातियोंको जिमानेके लिये उत्तम भोजनसामग्री तैयार करायी है। अतः आपलोग सम्पूर्ण दैनिक कार्योंसे निवृत्त हो उसे पायें। राजकुमारी कृष्णाको भी विवाहविधिसे वहीं प्राप्त करें। इसमें विलम्ब नहीं करना चाहिये ॥ १ ॥

इमे रथाः काञ्चनपद्मचित्राः
सदश्वयुक्ता वसुधाधिपार्हाः ।
एतान् समारुह्य समेत सर्वे
पाञ्चालराजस्य निवेशनं तत् ॥ २ ॥
ये सुवर्णमय कमलोंसे सुशोभित तथा राजाओंकी सवारीके योग्य विचित्र रथ खड़े हैं, इनमें उत्तम घोड़े जुते हुए हैं; इनपर सवार हो आप सब लोग महाराज द्रुपदके महलमें पधारें ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः प्रयाताः कुरुपुङ्गवास्ते
पुरोहितं तं परियाप्य सर्वे ।
आस्थाय यानानि महान्ति तानि
कुन्ती च कृष्णा च सहैकयाने ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वहाँ वे सभी कुरुश्रेष्ठ पाण्डव पुरोहितजीको विदा करके उन विशाल रथोंपर आरूढ़ हो (राजभवनकी ओर) चले। उस समय कुन्ती और कृष्णा एक साथ एक ही सवारीपर बैठी हुई थीं ॥ ३ ॥

श्रुत्वा तु वाक्यानि पुरोहितस्य
यान्युक्तवान् भारत धर्मराजः ।

जिज्ञासयैवाथ कुरूत्तमानां द्रव्याण्यनेकान्युपसंजहार ॥ ४ ॥ भारत! उस समय धर्मराज युधिष्ठिरने जो बातें कही थीं, उन्हें पुरोहितके मुखसे सुनकर उन कुरुश्रेष्ठ वीरोंके शीलस्वभावकी परीक्षाके लिये राजा द्रुपदने अनेक प्रकारकी वस्तुओंका संग्रह किया ॥ ४ ॥

फलानि माल्यानि च संस्कृतानि वर्माणि चर्माणि तथाऽऽसनानि । गाश्चैव राजन्नथ चैव रज्जू- र्बीजानि चान्यानि कृषिनिमित्तम् ॥ ५ ॥ अन्येषु शिल्पेषु च यान्यपि स्युः सर्वाणि कृत्यान्यखिलेन तत्र । क्रीडानिमित्तान्यपि यानि तत्र सर्वाणि तत्रोपजहार राजा ॥ ६ ॥ राजन्! (सब प्रकारके) फल, सुन्दर ढंगसे बनायी हुई मालाएँ, कवच, ढाल, आसन, गौएँ रस्सियाँ, बीज एवं खेतीके अन्य सामान तथा अन्य कारीगरियोंके सब सामान पूर्णरूपसे वहाँ संगृहीत किये गये थे। इसके सिवा, खेलके लिये जो आवश्यक वस्तुएँ होती हैं, उन सबको राजा द्रुपदने वहाँ जुटाकर रखा था ॥ ५-६ ॥

वर्माणि चर्माणि च भानुमन्ती खड्गा महान्तोऽश्वरथाश्च चित्राः । धनूंषि चाग्र्याणि शराश्च चित्राः शक्त्यृष्टयः काञ्चनभूषणाश्च ॥ ७ ॥ प्रासा भुशुण्ड्यश्च परश्वधाश्च सांग्रामिकं चैव तथैव सर्वम् । शय्यासनान्युत्तमवस्तुवन्ति तथैव वासो विविधं च तत्र ॥ ८ ॥ दूसरी ओर कवच, चमकती हुई ढालें, तलवारें, बड़े-बड़े विचित्र घोड़े तथा रथ, श्रेष्ठ धनुष, विचित्र बाण, सुवर्ण-भूषित शक्तियाँ एवं ऋष्टियाँ, प्रास, भुशुण्डियाँ, फरसे तथा सब प्रकारकी युद्धसामग्री, उत्तम वस्तुओंसे युक्त शय्या-आसन और नाना प्रकारके वस्त्र भी वहाँ संग्रह करके रखे गये थे ॥ ७-८ ॥

कुन्ती तु कृष्णां परिगृह्य साध्वी- मन्तःपुरं द्रुपदस्याविवेश । स्त्रियश्च तां कौरवराजपत्नीं प्रत्यर्चयामासुरदीनसत्त्वाः ॥ ९ ॥

कुन्तीदेवी सती-साध्वी कृष्णाको साथ ले द्रुपदके रनिवासमें गयीं। वहाँकी उदारहृदया स्त्रियोंने कौरवराज पाण्डुकी धर्मपत्नीका (बड़ा) आदर-सत्कार किया ॥ ९ ॥

तान् सिंहविक्रान्तगतीन् निरीक्ष्य महर्षभाक्षानजिनोत्तरीयान् । गूढोत्तरांसान् भुजगेन्द्रभोग- प्रलम्बबाहून् पुरुषप्रवीरान् ॥ १० ॥ राजा च राज्ञः सचिवाश्च सर्वे पुत्राश्च राज्ञः सुहृदस्तथैव । प्रेष्याश्च सर्वे निखिलेन राजन् हर्षं समापेतुरतीव तत्र ॥ ११ ॥

राजन्! पाण्डवोंकी चाल-ढाल सिंहके समान पराक्रमसूचक थी, उनकी आँखें साँड़के समान बड़ी-बड़ी थीं, उन्होंने काले मृगचर्मके ही दुपट्टे ओढ़ रखे थे, उनकी हँसलीकी हड्डियाँ मांससे छिपी हुई थीं और भुजाएँ नागराजके शरीरके समान मोटी एवं विशाल थीं। उन पुरुषसिंह पाण्डवोंको देखकर राजा द्रुपद, उनके सभी पुत्र, मन्त्री, इष्ट-मित्र और समस्त नौकर-चाकर ये सब-के-सब वहाँ बड़े ही प्रसन्न हुए ॥ १०-११ ॥

ते तत्र वीराः परमासनेषु सपादपीठेष्वविशङ्कमानाः । यथानुपूर्वं विविशुर्नराग्र्या- स्तथा महार्हेषु न विस्मयन्तः ॥ १२ ॥

वे नरश्रेष्ठ वीर पाण्डव वहाँ लगे हुए पादपीठसहित बहुमूल्य श्रेष्ठ सिंहासनोंपर बिना किसी हिचक या संकोचके मनमें तनिक भी विस्मय न करते हुए बड़े-छोटेके क्रमसे जा बैठे ॥ १२ ॥

उच्चावचं पार्थिवभोजनीयं पात्रीषु जाम्बूनदराजतीषु । दासाश्च दास्यश्च सुमृष्टवेषाः सम्भोजकाश्चाप्युपजह्रुरन्नम् ॥ १३ ॥

तब स्वच्छ और सुन्दर पोशाक पहने हुए दास-दासी तथा रसोइयोंने सोने-चाँदीके बरतनोंमें राजाओंके भोजन करनेयोग्य अनेक प्रकारकी सामान्य और विशेष भोजन-सामग्री लाकर परोसी ॥ १३ ॥

ते तत्र भुक्त्वा पुरुषप्रवीरा यथाऽऽत्मकामं सुभृशं प्रतीताः । उत्क्रम्य सर्वाणि वसूनि राजन् सांग्रामिकं ते विविशुर्नृवीराः ॥ १४ ॥

मनुष्योंमें श्रेष्ठ पाण्डव वहाँ अपनी रुचिके अनुसार उन सब वस्तुओंको खाकर बहुत अधिक प्रसन्न हुए। राजन्! (तदनन्तर वहाँ संग्रह की हुई अन्य) सब वैभव-भोगकी सामग्रियोंको छोड़कर वे वीर पहले उसी स्थानपर गये, जहाँ युद्धकी सामग्रियाँ रखी गयी थीं ॥ १४ ॥

तल्लक्षयित्वा द्रुपदस्य पुत्रो राजा च सर्वैः सह मन्त्रिमुख्यैः । समर्थयामासुरुपेत्य हृष्टाः कुन्तीसुतान् पार्थिव राजपुत्रान् ॥ १५ ॥

जनमेजय! यह सब देखकर राजा द्रुपद, राजकुमार और सभी प्रधान मन्त्री बड़े प्रसन्न हुए और उनके पास जाकर उन्होंने अपने मनमें यही निश्चय किया कि ये राजकुमार कुन्तीदेवीके ही पुत्र हैं ॥ १५ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि युधिष्ठिरादिपरीक्षणे त्रिनवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें युधिष्ठिर आदिकी परीक्षाविषयक एक सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९३ ॥

१९४-

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः

द्रुपद और युधिष्ठिरकी बातचीत तथा व्यासजीका आगमन

वैशम्पायन उवाच

तत आहूय पाञ्चाल्यो राजपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
परिग्रहेण ब्राह्मेण परिगृह्य महाद्युतिः ॥ १ ॥
पर्यपृच्छददीनात्मा कुन्तीपुत्रं सुवर्चसम् ।
कथं जानीम भवतः क्षत्रियान् ब्राह्मणानुत ॥ २ ॥
वैश्यान् वा गुणसम्पन्नानथवा शूद्रयोनिजान् ।
मायामास्थाय वा विप्रांश्चरतः सर्वतोदिशम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! तदनन्तर महातेजस्वी, उदारचित्त, पांचालराज द्रुपदने अत्यन्त कान्तिमान् कुन्तीपुत्र राजकुमार युधिष्ठिरको (अपने पास) बुलाकर ब्राह्मणोचित आतिथ्य-सत्कारके द्वारा उन्हें अपनाकर पूछा—'हमें कैसे ज्ञात हो कि आपलोग किस वर्णके हैं? हम आपको क्षत्रिय, ब्राह्मण, गुणसम्पन्न वैश्य अथवा शूद्र क्या समझें? अथवा मायाका आश्रय लेकर ब्राह्मणरूपसे सब दिशाओंमें विचरनेवाले आपलोगोंको हम कोई देवता मानें? ॥ १—३ ॥

कृष्णाहेतोरनुप्राप्ता देवाः संदर्शनार्थिनः ।
ब्रवीतु नो भवान् सत्यं संदेहो ह्यत्र नो महान् ॥ ४ ॥
जान पड़ता है, आप कृष्णाको पानेके लिये यहाँ दर्शक बनकर आये हुए देवता ही हैं। आप सच्ची बात हमें बता दें; क्योंकि आपके विषयमें हमको बड़ा संदेह हो रहा है ॥ ४ ॥

अपि नः संशयस्यान्ते मनः संतुष्टिमावहेत् ।
अपि नो भागधेयानि शुभानि स्युः परंतप ॥ ५ ॥
परंतप! आपसे रहस्यकी बात सुनकर क्या हमारे इस संशयका नाश और मनको संतोष होगा और क्या हमारा भाग्य उदय होगा? ॥ ५ ॥

इच्छया ब्रूहि तत् सत्यं सत्यं राजसु शोभते ।
इष्टापूर्तेन च तथा वक्तव्यमनृतं न तु ॥ ६ ॥
आप स्वेच्छासे ही सच्ची बात बतायें, राजाओंमें इष्ट* और पूर्तकी अपेक्षा सत्यकी ही अधिक महिमा है; अतः असत्य नहीं बोलना चाहिये ॥ ६ ॥

श्रुत्वा ह्यमरसंकाश तव वाक्यमरिंदम ।
ध्रुवं विवाहकरणमास्थास्यामि विधानतः ॥ ७ ॥
देवताओंके समान तेजस्वी शत्रुसूदन! मैं आपकी बात सुनकर निश्चय ही विधिपूर्वक विवाहकी तैयारी करूँगा ॥ ७ ॥

युधिष्ठिर उवाच

मा राजन् विमना भूस्त्वं पाञ्चाल्य प्रीतिरस्तु ते ।
ईप्सितस्ते ध्रुवः कामः संवृत्तोऽयमसंशयम् ॥ ८ ॥
**युधिष्ठिर बोले—**पांचालराज! आप उदास न हों, आपको प्रसन्न होना चाहिये। आपके मनमें जो अभीष्ट कामना थी, वह निश्चय ही आज पूरी हुई है, इसमें संशय नहीं है ॥ ८ ॥

वयं हि क्षत्रिया राजन् पाण्डोः पुत्रा महात्मनः ।
ज्येष्ठ मां विद्धि कौन्तेयं भीमसेनार्जुनाविमौ ॥ ९ ॥
राजन्! हमलोग क्षत्रिय ही हैं, महात्मा पाण्डुके पुत्र हैं। मुझे कुन्तीका ज्येष्ठ पुत्र समझिये, ये दोनों भीमसेन और अर्जुन हैं ॥ ९ ॥

आभ्यां तव सुता राजन् निर्जिता राजसंसदि ।
यमौ च तत्र कुन्ती च यत्र कृष्णा व्यवस्थिता ॥ १० ॥
राजन्! इन्हीं दोनोंने समस्त राजाओंके समूहमें आपकी पुत्रीको जीता है। उधर वे दोनों नकुल और सहदेव हैं। माता कुन्ती वहीं गयी हैं, जहाँ राजकुमारी कृष्णा है ॥ १० ॥

व्येतु ते मानसं दुःखं क्षत्रियाः स्मो नरर्षभ ।
पद्मिनीव सुतेयं ते ह्रदादन्यह्रदं गता ॥ ११ ॥
नरश्रेष्ठ! अब आपकी मानसिक चिन्ता निकल जानी चाहिये। हम सब लोग क्षत्रिय ही हैं। आपकी यह पुत्री कृष्णा कमलिनीकी भाँति एक सरोवरसे दूसरे सरोवरको प्राप्त हुई है ॥ ११ ॥

इति तथ्यं महाराज सर्वमेतद् ब्रवीमि ते ।
भवान् हि गुरुरस्माकं परमं च परायणम् ॥ १२ ॥
महाराज! यह सब मैं आपसे सच्ची बात कह रहा हूँ। आप हमारे बड़े तथा परम आश्रय हैं ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः स द्रुपदो राजा हर्षव्याकुललोचनः ।
प्रतिवक्तुं मुदा युक्तो नाशकत् तं युधिष्ठिरम् ॥ १३ ॥

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! राजा युधिष्ठिरकी ये बातें सुनकर महाराज द्रुपदकी आँखोंमें हर्षके आँसू छलक आये। वे आनन्दमें मग्न हो गये और (गला भर आनेके कारण) उन युधिष्ठिरको तत्काल (कुछ) उत्तर न दे सके ॥ १३ ॥
यत्नेन तु स तं हर्षं संनिगृह्य परंतपः ।
अनुरूपं तदा वाचा प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ॥ १४ ॥
शत्रुसूदन द्रुपदने (बड़े) यत्नसे अपने (हर्षके आवेग)-को रोका और युधिष्ठिरको उनके कथनके अनुरूप ही उत्तर दिया ॥ १४ ॥
पप्रच्छ चैनं धर्मात्मा यथा ते प्रद्रुताः पुरात् ।
स तस्मै सर्वमाचख्यावानुपूर्व्येण पाण्डवः ॥ १५ ॥
फिर उन धर्मात्मा पांचाल-नरेशने यह पूछा कि ‘आपलोग वारणावत नगरसे किस प्रकार भाग निकले?’ पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने वे सारी बातें उन्हें क्रमशः कह सुनायीं ॥ १५ ॥
तच्छ्रुत्वा द्रुपदो राजा कुन्तीपुत्रस्य भाषितम् ।
विगर्हयामास तदा धृतराष्ट्रं नरेश्वरम् ॥ १६ ॥
आश्वासयामास च तं कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
प्रतिजज्ञे च राज्याय द्रुपदो वदतां वरः ॥ १७ ॥
कुन्तीकुमारके मुखसे वह सारा समाचार सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ महाराज द्रुपदने उस समय राजा धृतराष्ट्रकी बड़ी निन्दा की और कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको आश्वासन दिया। साथ ही उन्होंने यह प्रतिज्ञा भी की कि ‘हम तुम्हें तुम्हारा राज्य दिलवाकर रहेंगे’ ॥ १६-१७ ॥
ततः कुन्ती च कृष्णा च भीमसेनार्जुनावपि ।
यमौ च राज्ञा संदिष्टं विविशुर्भवनं महत् ॥ १८ ॥
तत्र ते न्यवसन् राजन् यज्ञसेनेन पूजिताः ।
प्रत्याश्वस्तस्ततो राजा सह पुत्रैरुवाच तम् ॥ १९ ॥
राजन्! तत्पश्चात् कुन्ती, कृष्णा, युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव राजा द्रुपदके द्वारा निर्दिष्ट किये हुए विशाल भवनमें गये और यज्ञसेन (द्रुपद)-से सम्मानित हो वहीं रहने लगे। इस प्रकार विश्वास जम जानेपर महाराज द्रुपदने अपने पुत्रोंके साथ जाकर युधिष्ठिरसे कहा— ॥ १८-१९ ॥
गृह्णातु विधिवत् पाणिमद्यायं कुरुनन्दनः ।
पुण्येऽहनि महाबाहुरर्जुनः कुरुतां क्षणम् ॥ २० ॥
‘ये कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले महाबाहु अर्जुन आजके पुण्यमय दिवसमें मेरी पुत्रीका विधिपूर्वक पाणिग्रहण करें और (अपने कुलोचित)

मंगलाचारका पालन प्रारम्भ कर दें' ।। २० ।।

वैशम्पायन उवाच

तमब्रवीत् ततो राजा धर्मात्मा च युधिष्ठिरः ।
ममापि दारसम्बन्धः कार्यस्तावद् विशाम्पते ।। २१ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**तब धर्मात्मा राजा युधिष्ठिरने उनसे कहा—'राजन्! विवाह तो मेरा भी करना होगा' ।। २१ ।।

द्रुपद उवाच

भवान् वा विधिवत् पाणिं गृह्णातु दुहितुर्मम ।
यस्य वा मन्यसे वीर तस्य कृष्णामुपादिश ।। २२ ।।
**द्रुपद बोले—**वीर! तब आप ही विधिपूर्वक मेरी पुत्रीका पाणिग्रहण करें अथवा आप अपने भाइयोंमेंसे जिसके साथ चाहें, उसीके साथ कृष्णाको विवाहकी आज्ञा दे दें ।। २२ ।।

युधिष्ठिर उवाच

सर्वेषां महिषी राजन् द्रौपदी नो भविष्यति ।
एवं प्रव्याहृतं पूर्वं मम मात्रा विशाम्पते ।। २३ ।।
**युधिष्ठिरने कहा—**राजन्! द्रौपदी तो हम सभी भाइयोंकी पटरानी होगी। मेरी माताने पहले हम सब लोगोंको ऐसी ही आज्ञा दे रखी है ।। २३ ।।

अहं चाप्यनिविष्टो वै भीमसेनश्च पाण्डवः ।
पार्थेन विजिता चैषा रत्नभूता सुता तव ।। २४ ।।
मैं तथा पाण्डव भीमसेन भी अभीतक अविवाहित हैं और आपकी इस रत्नस्वरूपा कन्याको अर्जुनने जीता है ।। २४ ।।

एष नः समयो राजन् रत्नस्य सह भोजनम् ।
न च तं हातुमिच्छामः समयं राजसत्तम ।। २५ ।।
महाराज! हम लोगोंमें यह शर्त हो चुकी है कि रत्नको हम सब लोग बाँटकर एक साथ उपभोग करेंगे। नृपशिरोमणे! हम अपनी उस (पुरानी) शर्तको छोड़ना या तोड़ना नहीं चाहते ।। २५ ।।

सर्वेषां धर्मतः कृष्णा महिषी नो भविष्यति ।
आनुपूर्व्येण सर्वेषां गृह्णातु ज्वलने करान् ।। २६ ।।
अतः कृष्णा धर्मके अनुसार हम सभीकी महारानी होगी। इसलिये वह प्रज्वलित अग्निके सामने क्रमशः हम सबका पाणिग्रहण करे ।। २६ ।।

द्रुपद उवाच

एकस्य बह्व्यो विहिता महिष्यः कुरुनन्दन ।
नैकस्या बहवः पुंसः श्रूयन्ते पतयः क्वचित् ॥ २७ ॥
द्रुपद बोले—‘कुरुनन्दन! एक राजा बहुत-सी रानियाँ (अथवा एक पुरुषकी अनेक स्त्रियाँ) हों, ऐसा विधान तो वेदोंमें देखा गया है; परंतु एक स्त्रीके अनेक पुरुष पति हों, ऐसा कहीं सुननेमें नहीं आया है* ॥ २७ ॥
लोकवेदविरुद्धं त्वं नाधर्मं धर्मविच्छुचिः ।
कर्तुमर्हसि कौन्तेय कस्मात् ते बुद्धिरीदृशी ॥ २८ ॥
‘तुम धर्मके ज्ञाता और पवित्र हो, अतः तुम्हें लोक और वेदके विरुद्ध यह अधर्म नहीं करना चाहिये। तुम कुन्तीके पुत्र हो; तुम्हारी बुद्धि ऐसी क्यों हो रही है? ॥ २८ ॥

युधिष्ठिर उवाच

सूक्ष्मो धर्मो महाराज नास्य विद्मो वयं गतिम् ।
पूर्वेषामानुपूर्व्येण यातं वर्त्मानुयामहे ॥ २९ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**महाराज! धर्मका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, हम उसकी गतिको नहीं जानते। पूर्वकालके प्रचेता आदि जिस मार्गसे गये हैं, उसीका हमलोग क्रमशः अनुसरण करते हैं ॥ २९ ॥
न मे वागनृतं प्राह नाधर्मे धीयते मतिः ।
एवं चैव वदत्यम्बा मम चैतन्मनोगतम् ॥ ३० ॥
मेरी वाणी कभी झूठ नहीं बोलती और मेरी बुद्धि भी कभी अधर्ममें नहीं लगती। हमारी माताने हमें ऐसा ही करनेकी आज्ञा दी है और मेरे मनमें भी यही ठीक जँचा है ॥ ३० ॥
एष धर्मो ध्रुवो राजंश्चरैनमविचारयम् ।
मा च शंका तत्र ते स्यात् कथंचिदपि पार्थिव ॥ ३१ ॥
राजन्! यह अटल धर्म है। आप बिना किसी सोच-विचारके इसका पालन करें। पृथ्वीपते! आपको इस विषयमें किसी प्रकारकी आशंका नहीं होनी चाहिये ॥ ३१ ॥

द्रुपद उवाच

त्वं च कुन्ती च कौन्तेय धृष्टद्युम्नश्च मे सुतः ।
कथयन्त्विति कर्तव्यं श्वः काले करवामहे ॥ ३२ ॥
**द्रुपद बोले—**कुन्तीनन्दन! तुम, कुन्तीदेवी और मेरा पुत्र धृष्टद्युम्न—ये सब लोग मिलकर यह निश्चय करके बतायें कि क्या करना चाहिये? उसे ही कल ठीक समयपर हमलोग करेंगे ॥ ३२ ॥

वैशम्पायन उवाच

ते समेत्य ततः सर्वे कथयन्ति स्म भारत ।
अथ द्वैपायनो राजन्नभ्यागच्छद् यदृच्छया ॥ ३३ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**भारत! तदनन्तर वे सब लोग मिलकर इस विषयमें सलाह करने लगे। राजन्! इसी समय भगवान् वेदव्यास वहाँ अकस्मात् आ पहुँचे ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि वैवाहिकपर्वणि द्वैपायनागमने
चतुर्नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १९४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत वैवाहिकपर्वमें वेदव्यासके आगमनसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १९४ ॥


* स्मृतियोंमें इष्ट और पूर्तका परिचय इस प्रकार दिया गया है—
अग्निहोत्रं तपः सत्यं वेदानां चानुपालनम् । आतिथ्यं वैश्वदेवं च इष्टमित्यभिधीयते ।।
वापीकूपतडागादि देवतायतनानि च । अन्नप्रदानमारामाः पूर्तमित्यभिधीयते ।।
‘अग्निहोत्र, तप, सत्यभाषण, वेदोंकी आज्ञाका निरन्तर पालन, अतिथियोंका सत्कार तथा बलिवैश्वदेव कर्म—ये ‘इष्ट’ कहलाते हैं। बावली, कुआँ, पोखरे आदि बनवाना, देवमन्दिर निर्माण कराना, अन्नदान देना और बगीचे लगाना—इनका नाम पूर्त है।’
* इस विषयमें यह श्रुतिका वचन प्रसिद्ध है—‘एकस्य बह्वयो जाया भवन्ति, नैकस्यै बहवः सहपतयः’ अर्थात् एक पुरुषकी बहुत-सी स्त्रियाँ होती हैं, किंतु एक स्त्रीके लिये बहुत-से पति नहीं होते।

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पञ्चनवत्यधिकशततमोऽध्यायः

व्यासजीके सामने द्रौपदीका पाँच पुरुषोंसे विवाह होनेके विषयमें द्रुपद, धृष्टद्युम्न और युधिष्ठिरका अपने-अपने विचार व्यक्त करना

वैशम्पायन उवाच

ततस्ते पाण्डवाः सर्वे पाञ्चाल्यश्च महायशाः ।
प्रत्युत्थाय महात्मानं कृष्णं सर्वेऽभ्यवादयन् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर वे पाण्डव तथा महायशस्वी पांचालराज द्रुपद—सबने खड़े होकर महात्मा श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीको प्रणाम किया ॥ १ ॥
प्रतिनन्द्य स तां पूजां पृष्ट्वा कुशलमन्ततः ।
आसने काञ्चने शुद्धे निषसाद महामनाः ॥ २ ॥
उनके द्वारा की हुई पूजाको प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार करके अन्तमें सबसे कुशल-मंगल पूछकर महामना व्यासजी शुद्ध सुवर्णमय आसनपर विराजमान हुए ॥ २ ॥
अनुज्ञातास्तु ते सर्वे कृष्णेनामिततेजसा ।
आसनेषु महार्हेषु निषेदुर्दृिपदां वराः ॥ ३ ॥
फिर अमित-तेजस्वी व्यासजीकी आज्ञा पाकर वे सभी नरश्रेष्ठ बहुमूल्य आसनोंपर बैठे ॥ ३ ॥

ततो मुहूर्तान्मधुरां वाणीमुच्चार्य पार्षतः । पप्रच्छ तं महात्मानं द्रौपद्यार्थं विशाम्पते ॥ ४ ॥ कथमेका बहूनां स्याद् धर्मपत्नी न संकरः । एतन्मे भगवान् सर्वं प्रब्रवीतु यथातथम् ॥ ५ ॥ राजन्! तदनन्तर दो घड़ीके बाद राजा द्रुपदने मीठी वाणी बोलकर महात्मा व्यासजीसे द्रौपदीके विषयमें पूछा—'भगवन्! एक ही स्त्री बहुत-से पुरुषोंकी धर्मपत्नी कैसे हो सकती है? जिससे संकरताका दोष न लगे, यह सब आप ठीक-ठीक बतावें' ॥ ४-५ ॥

व्यास उवाच

अस्मिन् धर्मे विप्रलब्धे लोकवेदविरोधके । यस्य यस्य मतं यद् यच्छ्रोतुमिच्छामि तस्य तत् ॥ ६ ॥ व्यासजीने कहा—अत्यन्त गहन होनेके कारण शास्त्रीय आवरणके द्वारा ढके हुए अतएव इस लोक-वेद-विरुद्ध धर्मके सम्बन्धमें तुममेंसे जिसका-जिसका जो-जो मत हो, उसे मैं सुनना चाहता हूँ ॥ ६ ॥

द्रुपद उवाच

अधर्मोऽयं मम मतो विरुद्धो लोकवेदयोः । न ह्येका विद्यते पत्नी बहूनां द्विजसत्तम ॥ ७ ॥ द्रुपद बोले—द्विजश्रेष्ठ! मेरी रायमें तो यह अधर्म ही है; क्योंकि यह लोक और वेद दोनोंके विरुद्ध है। बहुत-से पुरुषोंकी एक ही पत्नी हो, ऐसा व्यवहार कहीं भी नहीं

है ।। ७ ।। न चाप्याचरितः पूर्वैरयं धर्मो महात्मभिः । न चाप्यधर्मो विद्वद्भिश्चरितव्यः कथंचन ।। ८ ।। पूर्ववर्ती महात्मा पुरुषोंने भी ऐसे धर्मका आचरण नहीं किया है और विद्वान् पुरुषोंको किसी प्रकार भी अधर्मका आचरण नहीं करना चाहिये ।। ८ ।। ततोऽहं न करोम्येनं व्यवसायं क्रियां प्रति । धर्मः सदैव संदिग्धः प्रतिभाति हि मे त्वयम् ।। ९ ।। इसलिये मैं इस धर्मविरोधी आचारको काममें नहीं लाना चाहता। मुझे तो इस कार्यके धर्मसंगत होनेमें सदा ही संदेह जान पड़ता है ।। ९ ।।

धृष्टद्युम्न उवाच

यवीयसः कथं भार्यां ज्येष्ठो भ्राता द्विजर्षभ । ब्रह्मन् सम्भविर्तेत सवृत्तः संस्तपोधन ।। १० ।। धृष्टद्युम्न बोले—द्विजश्रेष्ठ! आप ब्राह्मण हैं, तपोधन हैं; आप ही बताइये, बड़ा भाई सदाचारी होते हुए भी अपने छोटे भाईकी स्त्रीके साथ समागम कैसे कर सकता है? ।। १० ।। न तु धर्मस्य सूक्ष्मत्वाद् गतिं विद्म कथंचन । अधर्मो धर्म इति वा व्यवसायो न शक्यते ।। ११ ।। कर्तुमस्मद्विधैर्ब्रह्मंस्ततोऽयं न व्यवस्यते । पञ्चानां महिषी कृष्णा भवत्विति कथंचन ।। १२ ।। धर्मका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण हम उसकी गतिको सर्वथा नहीं जानते; अतः यह कार्य अधर्म है या धर्म, इसका निश्चय करना हम-जैसे लोगोंके लिये असम्भव है। ब्रह्मन्! इसीलिये हम किसी तरह भी ऐसी सम्मति नहीं दे सकते कि राजकुमारी कृष्णा पाँच पुरुषोंकी धर्मपत्नी हो ।। ११-१२ ।।

युधिष्ठिर उवाच

न मे वागनृतं प्राह नाधर्मे धीयते मतिः । वर्तते हि मनो मेऽत्र नैषोऽधर्मः कथंचन ।। १३ ।। श्रूयते हि पुराणेऽपि जटिला नाम गौतमी । ऋषीनध्यासितवती सप्त धर्मभृतां वरा ।। १४ ।। युधिष्ठिरने कहा—मेरी वाणी कभी झूठ नहीं बोलती और मेरी बुद्धि भी कभी अधर्ममें नहीं लगती; परंतु इस विवाहमें मेरे मनकी प्रवृत्ति हो रही है, इसलिये यह किसी प्रकार भी अधर्म नहीं है। पुराणोंमें भी सुना जाता है कि धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ जटिला नामवाली गौतम गोत्रकी कन्याने सात ऋषियोंके साथ विवाह किया था ।। १३-१४ ।।

तथैव मुनिजा वार्क्षी तपोभिर्भावितात्मनः । संगताभूद् दश भ्रातृनेकनाम्नः प्रचेतसः ॥ १५ ॥ इसी प्रकार कण्डु मुनिकी पुत्री वार्क्षीने तपस्यासे पवित्र अन्तःकरणवाले दस प्रचेताओेंके साथ, जिनका एक ही नाम था और जो आपसमें भाई-भाई थे, विवाहसम्बन्ध स्थापित किया था ॥ १५ ॥ गुरोर्हि वचनं प्राहुर्धर्म्यं धर्मज्ञसत्तम । गुरूणां चैव सर्वेषां माता परमको गुरुः ॥ १६ ॥ धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ व्यासजी! गुरुजनोंकी आज्ञाको धर्मसंगत बताया गया है और समस्त गुरुओंमें माता परम गुरु मानी गयी है ॥ १६ ॥ सा चाप्युक्तवती वाचं भैक्षवद् भुज्यतामिति । तस्मादेतदहं मन्ये परं धर्मं द्विजोत्तम ॥ १७ ॥ हमारी माताने भी यही बात कही है कि तुम सब लोग भिक्षाकी भाँति इसका उपभोग करो; अतः द्विजश्रेष्ठ! हम पाँचों भाइयोंके साथ होनेवाले इस विवाहसम्बन्धको परम धर्म मानते हैं ॥ १७ ॥

<center>कुन्त्युवाच</center>

एवमेतद् यथा प्राह धर्मचारी युधिष्ठिरः । अनृतान्मे भयं तीव्रं मुच्येऽहमनृतात् कथम् ॥ १८ ॥ **कुन्तीने कहा—**धर्मका आचरण करनेवाले युधिष्ठिरने जैसा कहा है, वह ठीक है। (अवश्य मैंने द्रौपदीके साथ पाँचों भाइयोंके विवाहसम्बन्धकी आज्ञा दे दी है।) मुझे झूठसे बहुत भय लगता है; बताइये, मैं झूठके पापसे कैसे बच सकूँगी? ॥ १८ ॥

<center>व्यास उवाच</center>

अनृतान्मोक्ष्यसे भद्रे धर्मश्चैष सनातनः । न तु वक्ष्यामि सर्वेषां पाञ्चाल शृणु मे स्वयम् ॥ १९ ॥ **व्यासजी बोले—**भद्रे! तुम झूठसे बच जाओगी। (पाण्डवोंके लिये) यह सनातन धर्म है। (कुन्तीसे यों कहकर वे द्रुपदसे बोले) पांचालराज! (इस विवाहमें एक रहस्य है, जिसे) मैं सबके सामने नहीं कहूँगा। तुम स्वयं एकान्तमें चलकर मुझसे सुन लो ॥ १९ ॥ यथायं विहितो धर्मो यतश्चायं सनातनः । यथा च प्राह कौन्तेयस्तथा धर्मो न संशयः ॥ २० ॥ जिस प्रकार और जिस कारणसे यह सनातन धर्मके अनुकूल कहा गया है और कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने जिस प्रकार इसकी धर्मानुकूलताका प्रतिपादन किया है, उसपर विचार करनेसे निस्संदेह यही सिद्ध होता है कि यह विवाह धर्मसम्मत है ॥ २० ॥

<center>वैशम्पायन उवाच</center>