महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
२१४-
चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
अर्जुनका पूर्वदिशाके तीर्थोंमें भ्रमण करते हुए मणिपुरमें जाकर चित्रांगदाका पाणिग्रहण करके उसके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न करना
वैशम्पायन उवाच
कथयित्वा च तत् सर्वं ब्राह्मणेभ्यः स भारत ।
प्रययौ हिमवत्पार्श्वं ततो वज्रधरात्मजः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! रातकी वह सारी घटना ब्राह्मणोंसे कहकर इन्द्रपुत्र अर्जुन हिमालयके पास चले गये ॥ १ ॥
अगस्त्यवटमासाद्य वसिष्ठस्य च पर्वतम् ।
भृगुतुङ्गे च कौन्तेयः कृतवाञ्छौचमात्मनः ॥ २ ॥
अगस्त्यवट, वसिष्ठपर्वत तथा भृगुतुंगपर जाकर उन्होंने शौच-स्नान आदि किये ॥ २ ॥
प्रददौ गोसहस्राणि सुबहूनि च भारत ।
निवेशांश्च द्विजातिभ्यः सोऽददत् कुरुसत्तमः ॥ ३ ॥
भारत! कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने उन तीर्थोंमें ब्राह्मणोंको कई हजार गौएँ दान कीं और द्विजातियोंके रहनेके लिये घर एवं आश्रम बनवा दिये ॥ ३ ॥
हिरण्यविन्दोस्तीर्थे च स्नात्वा पुरुषसत्तमः ।
दृष्टवान् पाण्डवश्रेष्ठः पुण्यान्यायतनानि च ॥ ४ ॥
हिरण्यबिंदुतीर्थमें स्नान करके पाण्डवश्रेष्ठ पुरुषोत्तम अर्जुनने अनेक पवित्र स्थानोंका दर्शन किया ॥ ४ ॥
अवतीर्य नरश्रेष्ठो ब्राह्मणैः सह भारत ।
प्राचीं दिशमभिप्रेप्सुर्जगाम भरतर्षभः ॥ ५ ॥
जनमेजय! तत्पश्चात् हिमालयसे नीचे उतरकर भरत-कुलभूषण नरश्रेष्ठ अर्जुन पूर्व दिशाकी ओर चल दिये ॥ ५ ॥
आनुपूर्व्येण तीर्थानि दृष्टवान् कुरुसत्तमः ।
नदीं चोत्पलिनीं रम्यामरण्यं नैमिषं प्रति ॥ ६ ॥
नन्दामपरनन्दां च कौशिकीं च यशस्विनीम् ।
महानदीं गयां चैव गङ्गामपि च भारत ॥ ७ ॥
भारत! फिर उस यात्रामें कुरुश्रेष्ठ धनंजयने क्रमशः अनेक तीर्थोंका तथा नैमिषारण्यतीर्थमें बहनेवाली रमणीय उत्पलिनी नदी, नन्दा, अपरनन्दा, यशस्विनी कौशिकी
(कोसी), महानदी, गयातीर्थ और गंगाजीका भी दर्शन किया ॥ ६-७ ॥
एवं तीर्थानि सर्वाणि पश्यमानस्तथाऽऽश्रमान् ।
आत्मनः पावनं कुर्वन् ब्राह्मणेभ्यो ददौ च गाः ॥ ८ ॥
इस प्रकार उन्होंने सब तीर्थों और आश्रमोंको देखते हुए स्नान आदिसे अपनेको पवित्र करके ब्राह्मणोंके लिये बहुत-सी गौएँ दान कीं ॥ ८ ॥
अङ्गवङ्गकलिङ्गेषु यानि तीर्थानि कानिचित् ।
जगाम तानि सर्वाणि पुण्यान्यायतनानि च ॥ ९ ॥
तदनन्तर अंग, वंग और कलिंग देशोंमें जो कोई भी पवित्र तीर्थ और मन्दिर थे, उन सबमें वे गये ॥ ९ ॥
दृष्ट्वा च विधिवत् तानि धनं चापि ददौ ततः ।
कलिङ्गराष्ट्रद्वारेषु ब्राह्मणाः पाण्डवानुगाः ।
अभ्यनुज्ञाय कौन्तेयमुपावर्तन्त भारत ॥ १० ॥
और उन तीर्थोंका दर्शन करके उन्होंने विधिपूर्वक वहाँ धन-दान किया। कलिंग राष्ट्रके द्वारपर पहुँचकर अर्जुनके साथ चलनेवाले ब्राह्मण उनकी अनुमति लेकर वहाँसे लौट गये ॥ १० ॥
स तु तैरभ्यनुज्ञातः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
सहायैरल्पकैः शूरः प्रययौ यत्र सागरः ॥ ११ ॥
परंतु कुन्तीपुत्र शूरवीर धनंजय उन ब्राह्मणोंकी आज्ञा ले थोड़े-से सहायकोंके साथ उस स्थानकी ओर गये, जहाँ समुद्र लहराता था ॥ ११ ॥
स कलिङ्गानतिक्रम्य देशानायतनानि च ।
हर्म्याणि रमणीयानि प्रेक्षमाणो ययौ प्रभुः ॥ १२ ॥
कलिंग देशको लाँघकर शक्तिशाली अर्जुन अनेक देशों, मन्दिरों तथा रमणीय अट्टालिकाओंका दर्शन करते हुए आगे बढ़े ॥ १२ ॥
महेन्द्रपर्वतं दृष्ट्वा तापसैरुपशोभितम् ।
समुद्रतीरेण शनैर्मणिपूरं जगाम ह ॥ १३ ॥
इस प्रकार वे तपस्वी मुनियोंसे सुशोभित महेन्द्र पर्वतका दर्शन कर समुद्रके किनारे-किनारे यात्रा करते हुए धीरे-धीरे मणिपूर पहुँच गये ॥ १३ ॥
तत्र सर्वाणि तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च ।
अभिगम्य महाबाहुरभ्यगच्छन्महीपतिम् ॥ १४ ॥
वहाँके सम्पूर्ण तीर्थों और पवित्र मन्दिरोंमें जानेके बाद महाबाहु अर्जुन मणिपूरनरेशके पास गये ॥ १४ ॥
मणिपूरेश्वरं राजन् धर्मज्ञं चित्रवाहनम् ।
तस्य चित्राङ्गदा नाम दुहिता चारुदर्शना ॥ १५ ॥
राजन्! मणिपूरके स्वामी धर्मज्ञ चित्रवाहन थे। उनके चित्रांगदा नामवाली एक परम सुन्दरी कन्या थी ॥ १५ ॥
तां ददर्श पुरे तस्मिन् विचरन्तीं यदृच्छया ।
दृष्ट्वा च तां वरारोहां चकमे चैत्रवाहनीम् ॥ १६ ॥
उस नगरमें विचरण करती हुई उस सुन्दर अंगोंवाली चित्रवाहनकुमारीको अकस्मात् देखकर अर्जुनके मनमें उसे प्राप्त करनेकी अभिलाषा हुई ॥ १६ ॥
अभिगम्य च राजानमवदत् स्वं प्रयोजनम् ।
देहि मे खल्विमां राजन् क्षत्रियाय महात्मने ॥ १७ ॥
अतः राजासे मिलकर उन्होंने अपना अभिप्राय इस प्रकार बताया—‘महाराज! मुझ महामनस्वी क्षत्रियको आप अपनी यह पुत्री प्रदान कर दीजिये’ ॥ १७ ॥
तच्छ्रुत्वा त्वब्रवीद् राजा कस्य पुत्रोऽसि नाम किम् ।
उवाच तं पाण्डवोऽहं कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ १८ ॥
यह सुनकर राजाने पूछा—‘आप किनके पुत्र हैं और आपका क्या नाम है?’ अर्जुनने उत्तर दिया, ‘मैं महाराज पाण्डु तथा कुन्तीदेवीका पुत्र हूँ। मुझे लोग धनंजय कहते हैं’ ॥ १८ ॥
तमुवाचाथ राजा स सान्त्वपूर्वमिदं वचः ।
राजा प्रभञ्जनो नाम कुलेऽस्मिन् सम्बभूव ह ॥ १९ ॥
तब राजाने उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा—'इस कुलमें पहले प्रभंजन नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं ॥ १९ ॥
अपुत्रः प्रसवेनार्थी तपस्तेपे स उत्तमम् । उग्रेण तपसा तेन देवदेवः पिनाकधृक् ॥ २० ॥ ईश्वरस्तोषितः पार्थ देवदेव उमापतिः । स तस्मै भगवान् प्रादादेकैकं प्रसवं कुले ॥ २१ ॥ 'उनके कोई पुत्र नहीं था, अतः उन्होंने पुत्रकी इच्छासे उत्तम तपस्या प्रारम्भ की। पार्थ! उन्होंने उस उग्र तपस्यासे पिनाकधारी देवाधिदेव महेश्वरको संतुष्ट कर लिया। तब देवदेवेश्वर भगवान् उमापति उन्हें वरदान देते हुए बोले—'तुम्हारे कुलमें एक-एक संतान होती जायगी' ॥ २०-२१ ॥
एकैकः प्रसवस्तस्माद् भवत्यस्मिन् कुले सदा । तेषां कुमाराः सर्वेषां पूर्वेषां मम जज्ञिरे ॥ २२ ॥ एका च मम कन्येयं कुलस्योत्पादिनी भृशम् । पुत्रो ममायमिति मे भावना पुरुषर्षभ ॥ २३ ॥ 'इस कारण हमारे इस कुलमें सदासे एक-एक संतान ही होती चली आ रही है। मेरे अन्य सभी पूर्वजोंके तो पुत्र होते आये हैं, परंतु मेरे यह एक कन्या ही हुई है। यही इस कुलकी परम्पराको चलानेवाली है। अतः भरतश्रेष्ठ! इसके प्रति मेरी यही भावना रहती है कि 'यह मेरा पुत्र है' ॥ २२-२३ ॥
पुत्रिका हेतुविधिना संज्ञिता भरतर्षभ । तस्मादेकः सुतो योऽस्यां जायते भारत त्वया ॥ २४ ॥ एतच्छुल्कं भवत्वस्याः कुलकृज्जायतामिह । एतेन समयेनेमां प्रतिगृह्णीष्व पाण्डव ॥ २५ ॥ 'यद्यपि यह पुत्री है, तो भी हेतुविधिसे (अर्थात् इससे जो प्रथम पुत्र होगा, वह मेरा ही पुत्र माना जायगा, इस हेतुसे) मैंने इसे पुत्रकी संज्ञा दे रखी है। भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे द्वारा इसके गर्भसे जो एक पुत्र उत्पन्न हो, वह यहीं रहकर इस कुलपरम्पराका प्रवर्तक हो; इस कन्याके विवाहका यही शुल्क आपको देना होगा। पाण्डुनन्दन! इसी शर्तके अनुसार आप इसे ग्रहण करें' ॥ २४-२५ ॥
स तथेति प्रतिज्ञाय तां कन्यां प्रतिगृह्य च । उवास नगरे तस्मिंस्तिस्रः कुन्तीसुतः समाः ॥ २६ ॥ 'तथास्तु' कहकर अर्जुनने वैसा ही करनेकी प्रतिज्ञा की और उस कन्याका पाणिग्रहण करके उन्होंने तीन वर्षोंतक उसके साथ उस नगरमें निवास किया ॥ २६ ॥
तस्यां सुते समुत्पन्ने परिष्वज्य वराङ्गनाम् । आमन्त्र्य नृपतिं तं तु जगाम परिवर्तितुम् ॥ २७ ॥
उसके गर्भसे पुत्र उत्पन्न हो जानेपर उस सुन्दरीको हृदयसे लगाकर अर्जुनने विदा ली तथा राजा चित्रवाहनसे पूछकर वे पुनः तीर्थोंमें भ्रमण करनेके लिये चल दिये ॥ २७ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि चित्राङ्गदासङ्गमे चतुर्दशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें चित्रांगदासमागमविषयक दो सौ चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१४ ॥
अर्जुनके द्वारा वर्गा अप्सराका ग्राहयोनिसे उद्धार तथा वर्गाकी आत्मकथाका आरम्भ
पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा वर्गा अप्सराका ग्राहयोनिसे उद्धार तथा वर्गाकी आत्मकथाका आरम्भ
वैशम्पायन उवाच
ततः समुद्रे तीर्थानि दक्षिणे भरतर्षभ ।
अभ्यगच्छत् सुपुण्यानि शोभितानि तपस्विभिः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर अर्जुन दक्षिण समुद्रके तटपर तपस्वीजनोंसे सुशोभित परम पुण्यमय तीर्थोंमें गये ॥ १ ॥
वर्जयन्ति स्म तीर्थानि तत्र पञ्च स्म तापसाः ।
अवकीर्णानि यान्यासन् पुरस्तात् तु तपस्विभिः ॥ २ ॥
वहाँ उन दिनों तपस्वीलोग पाँच तीर्थोंको छोड़ देते थे। ये वे ही तीर्थ थे, जहाँ पूर्वकालमें बहुतेरे तपस्वी महात्मा भरे रहते थे ॥ २ ॥
अगस्त्यतीर्थं सौभद्रं पौलोमं च सुपावनम् ।
कारन्धमं प्रसन्नं च हयमेधफलं च तत् ॥ ३ ॥
भारद्वाजस्य तीर्थं तु पापप्रशमनं महत् ।
एतानि पञ्च तीर्थानि ददर्श कुरुसत्तमः ॥ ४ ॥
उनके नाम इस प्रकार हैं—अगस्त्यतीर्थ, सौभद्र-तीर्थ, परम पावन पौलोमतीर्थ, अश्वमेध यज्ञका फल देनेवाला स्वच्छ कारन्धमतीर्थ तथा पापनाशक महान् भारद्वाजतीर्थ। कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने इन पाँचों तीर्थोंका दर्शन किया ॥ ३-४ ॥
विविक्तान्युपलक्ष्याथ तानि तीर्थानि पाण्डवः ।
दृष्ट्वा च वर्ज्यमानानि मुनिभिर्धर्मबुद्धिभिः ॥ ५ ॥
पाण्डुपुत्र अर्जुनने देखा, ये सभी तीर्थ बड़े एकान्तमें हैं, तो भी एकमात्र धर्ममें बुद्धिको लगाये रखनेवाले मुनि भी उन तीर्थोंको दूरसे ही छोड़ दे रहे हैं ॥ ५ ॥
तपस्विनस्ततोऽपृच्छत् प्राञ्जलिः कुरुनन्दनः ।
तीर्थानीमानि वर्ज्यन्ते किमर्थं ब्रह्मवादिभिः ॥ ६ ॥
तब कुरुनन्दन धनंजयने दोनों हाथ जोड़कर तपस्वी मुनियोंसे पूछा—‘वेदवक्ता ऋषिगण इन तीर्थोंका परित्याग किसलिये कर रहे हैं?’ ॥ ६ ॥
तापसा ऊचुः
ग्राहाः पञ्च वसन्त्येषु हरन्ति च तपोधनान् ।
तत एतानि वर्ज्यन्ते तीर्थानि कुरुनन्दन ॥ ७ ॥
**तपस्वी बोले—**कुरुनन्दन! उन तीर्थोंमें पाँच ग्राह रहते हैं, जो नहानेवाले तपोधन ऋषियोंको जलके भीतर खींच ले जाते हैं; इसीलिये ये तीर्थ मुनियोंद्वारा त्याग दिये गये हैं॥ ७॥
वैशम्पायन उवाच
तेषां श्रुत्वा महाबाहुर्वार्यमाणस्तपोधनैः।
जगाम तानि तीर्थानि द्रष्टुं पुरुषसत्तमः॥ ८॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**उनकी बातें सुनकर कुरुश्रेष्ठ महाबाहु अर्जुन उन तपोधनोंके मना करनेपर भी उन तीर्थोंका दर्शन करनेके लिये गये॥ ८॥
ततः सौभद्रमासाद्य महर्षेस्तीर्थमुत्तमम्।
विगाह्य सहसा शूरः स्नानं चक्रे परंतपः॥ ९॥
तदनन्तर परंतप शूरवीर अर्जुन महर्षि सुभद्रके उत्तम सौभद्रतीर्थमें सहसा उतरकर स्नान करने लगे॥ ९॥
अथ तं पुरुषव्याघ्रमन्तर्जलचरो महान्।
जग्राह चरणे ग्राहः कुन्तीपुत्रं धनंजयम्॥ १०॥
इतनेमें ही जलके भीतर विचरनेवाले एक महान् ग्राहने नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार धनंजयका एक पैर पकड़ लिया॥ १०॥
स तमादाय कौन्तेयो विस्फुरन्तं जलेचरम्।
उदतिष्ठन्महाबाहुर्बलेन बलिनां वरः॥ ११॥
परंतु बलवानोंमें श्रेष्ठ महाबाहु कुन्तीकुमार बहुत उछल-कूद मचाते हुए उस जलचर जीवको लिये-दिये पानीसे बाहर निकल आये॥ ११॥
उत्कृष्ट एव ग्राहस्तु सोऽर्जुनेन यशस्विना।
बभूव नारी कल्याणी सर्वाभरणभूषिता॥ १२॥
यशस्वी अर्जुनद्वारा पानीके ऊपर खिंच आनेपर वह ग्राह समस्त आभूषणोंसे विभूषित एक परम सुन्दरी नारीके रूपमें परिणत हो गया॥ १२॥
दीप्यमाना श्रिया राजन् दिव्यरूपा मनोरमा।
तदद्भुतं महत् दृष्ट्वा कुन्तीपुत्रो धनंजयः॥ १३॥
तां स्त्रियं परमप्रीत इदं वचनमब्रवीत्।
का वै त्वमसि कल्याणि कुतो वासि जलेचरी॥ १४॥
किमर्थं च महत् पापमिदं कृतवती पुरा।
राजन्! वह दिव्यरूपिणी मनोरमा रमणी अपनी अद्भुत कान्तिसे प्रकाशित हो रही थी। यह महान् आश्चर्यकी बात देखकर कुन्तीनन्दन धनंजय बड़े प्रसन्न हुए और उस स्त्रीसे इस प्रकार बोले—‘कल्याणी! तुम कौन हो और कैसे जलचरयोनिको प्राप्त हुई थी? तुमने पूर्वकालमें ऐसा महान् पाप किसलिये किया जिससे तुम्हारी यह दुर्गति हुई?’ ॥ १३-१४½ ॥
वर्गोवाच
अप्सरास्मि महाबाहो देवारण्यविहारिणी ॥ १५ ॥
**वर्गा बोली—**महाबाहो! मैं नन्दनवनमें विहार करनेवाली एक अप्सरा हूँ ॥ १५ ॥
इष्टा धनपतेर्नित्यं वर्गा नाम महाबल ।
मम सख्यश्चतस्रोऽन्याः सर्वाः कामगमाः शुभाः ॥ १६ ॥
महाबल! मेरा नाम वर्गा है। मैं कुबेरकी नित्यप्रेयसी रही हूँ। मेरी चार दूसरी सखियाँ भी हैं। वे सब इच्छानुसार गमन करनेवाली और सुन्दरी हैं ॥ १६ ॥
ताभिः सार्धं प्रयातास्मि लोकपालनिवेशनम् ।
ततः पश्यामहे सर्वा ब्राह्मणं संशितव्रतम् ॥ १७ ॥
उन सबके साथ एक दिन मैं लोकपाल कुबेरके घरपर जा रही थी। मार्गमें हम सबने उत्तम व्रतका पालन करनेवाले एक ब्राह्मणको देखा ॥ १७ ॥
रूपवन्तमधीयानमेकमेकान्तचारिणम् ।
तस्यैव तपसा राजंस्तद् वनं तेजसाऽऽवृतम् ॥ १८ ॥
वे बड़े रूपवान् थे और अकेले एकान्तमें रहकर वेदोंका स्वाध्याय करते थे। राजन्! उन्हींकी तपस्यासे वह सारा वनप्रान्त तेजोमय हो रहा था ॥ १८ ॥
आदित्य इव तं देशं कृत्स्नं सर्वं व्यकाशयत् ।
तस्य दृष्ट्वा तपस्तादृग् रूपं चाद्भुतमुत्तमम् ॥ १९ ॥
अवतीर्णाः स्म तं देशं तपोविघ्नचिकीर्षया ।
वे सूर्यकी भाँति उस सम्पूर्ण प्रदेशको प्रकाशित कर रहे थे। उनकी वैसी तपस्या और वह अद्भुत एवं उत्तम रूप देखकर हम सभी अप्सराएँ उनके तपमें विघ्न डालनेकी इच्छासे उस स्थानमें उतर पड़ीं ॥ १९½ ॥
अहं च सौरभेयी च समीची बुद्बुदा लता ॥ २० ॥
यौगपद्येन तं विप्रमभ्यगच्छाम भारत ।
गायन्त्योऽथ हसन्त्यश्च लोभयित्वा च तं द्विजम् ॥ २१ ॥
भारत! मैं, सौरभेयी, समीची, बुद्बुदा और लता—पाँचों एक ही साथ उन ब्राह्मणके समीप गयीं और उन्हें लुभाती हुई हँसने तथा गाने लगीं ॥ २०-२१ ॥
स च नास्मासु कृतवान् मनो वीर कथंचन ।
नाकम्पत महातेजाः स्थितस्तपसि निर्मले ॥ २२ ॥
परंतु वीरवर! उन्होंने किसी प्रकार भी अपने मनको हमारी ओर नहीं खिंचने दिया। वे महातेजस्वी ब्राह्मण निर्मल तपस्यामें संलग्न थे। वे उससे तनिक भी विचलित नहीं हुए ॥ २२ ॥
सोऽशपत् कुपितोऽस्मासु ब्राह्मणः क्षत्रियर्षभ ।
ग्राहभूता जले यूयं चरिष्यथ शतं समाः ॥ २३ ॥
क्षत्रियशिरोमणे! हमारी उद्दण्डतासे कुपित होकर उन ब्राह्मणने हमें शाप दे दिया—‘तुमलोग सौ वर्षोंतक जलमें ग्राह बनकर रहोगी’ ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वण्यर्जुनवनवासपर्वणि तीर्थग्राहविमोचने
पञ्चदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें तीर्थग्राहविमोचनविषयक दो सौ पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१५ ॥
२१६-
षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
वर्गाकी प्रार्थनासे अर्जुनका शेष चारों अप्सराओंको भी शापमुक्त करके मणिपुर जाना और चित्रांगदासे मिलकर गोकर्णतीर्थको प्रस्थान करना
वर्गोवाच
ततो वयं प्रव्यथिताः सर्वा भारतसत्तम ।
अयाम शरणं विप्रं तं तपोधनमच्युतम् ॥ १ ॥
वर्गा बोली— भरतवंशके महापुरुष! उन ब्राह्मणका शाप सुनकर हमें बड़ा दुःख हुआ। तब हम सब-की-सब अपने धर्मसे च्युत न होनेवाले उन तपस्वी विप्रकी शरणमें गयीं ॥ १ ॥
रूपेण वयसा चैव कन्दर्पेण च दर्पिताः ।
अयुक्तं कृतवत्यः स्म क्षन्तुमर्हसि नो द्विज ॥ २ ॥
(और इस प्रकार बोलीं—) 'ब्रह्मन्! हम रूप, यौवन और कामसे उन्मत्त हो गयी थीं। इसीलिये यह अनुचित कार्य कर बैठीं। आप कृपापूर्वक हमारा अपराध क्षमा करें ॥ २ ॥
एष एव वधोऽस्माकं सुपर्याप्तस्तपोधन ।
यद् वयं संशितात्मानं प्रलोब्धुं त्वामिहागताः ॥ ३ ॥
'तपोधन! हमारा तो पूर्णरूपसे यही मरण हो गया कि हम आप-जैसे शुद्धात्मा मुनिको लुभानेके लिये यहाँ आयीं ॥ ३ ॥
अवध्यास्तु स्त्रियः सृष्टा मन्यन्ते धर्मचारिणः ।
तस्माद् धर्मेण वर्ध त्वं नास्मान् हिंसितुमर्हसि ॥ ४ ॥
'धर्मात्मा पुरुष ऐसा मानते हैं कि स्त्रियाँ अवध्य बनायी गयी हैं। अतः आप अपने धर्माचरणद्वारा निरन्तर उन्नति कीजिये। आपको हम अबलाओंकी हत्या नहीं करनी चाहिये ॥ ४ ॥
सर्वभूतेषु धर्मज्ञ मैत्रो ब्राह्मण उच्यते ।
सत्यो भवतु कल्याण एष वादो मनीषिणाम् ॥ ५ ॥
'धर्मज्ञ! ब्राह्मण समस्त प्राणियोंपर मैत्रीभाव रखनेवाला कहा जाता है। भद्र पुरुष! मनीषी पुरुषोंका यह कथन सत्य होना चाहिये ॥ ५ ॥
शरणं च प्रपन्नानां शिष्टाः कुर्वन्ति पालनाम् ।
शरणं त्वां प्रपन्नाः स्मस्तस्मात् त्वं क्षन्तुमर्हसि ॥ ६ ॥
'श्रेष्ठ महात्मा शरणागतोंकी रक्षा करते हैं। हम भी आपकी शरणमें आयी हैं; अतः आप हमारे अपराध क्षमा करें' ॥ ६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स धर्मात्मा ब्राह्मणः शुभकर्मकृत् ।
प्रसादं कृतवान् वीर रविसोमसमप्रभः ॥ ७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—वीरवर! उनके ऐसा कहनेपर सूर्य और चन्द्रमाके समान तेजस्वी तथा शुभ कर्म करनेवाले उन धर्मात्मा ब्राह्मणने उन सबपर कृपा की ॥ ७ ॥
ब्राह्मण उवाच
शतं शतसहस्रं तु सर्वमक्षय्यवाचकम् ।
परिमाणं शतं त्वेतन्नेदमक्षय्यवाचकम् ॥ ८ ॥
ब्राह्मण बोले—'शत' और 'शतसहस्र' शब्द—ये सभी अनन्त संख्याके वाचक हैं, परंतु यहाँ जो मैंने 'शतं समाः' (तुमलोगोंको सौ वर्षोंतक ग्राह होनेके लिये) कहा है, उसमें शत शब्द सौ वर्षके परिमाणका ही वाचक है। अनन्तकालका वाचक नहीं है ॥ ८ ॥
यदा च वो ग्राहभूता गृह्णन्तीः पुरुषाञ्जले ।
उत्कर्षति जलात् तस्मात् स्थलं पुरुषसत्तमः ॥ ९ ॥
तदा यूयं पुनः सर्वाः स्वं रूपं प्रतिपत्स्यथ ।
अनृतं नोक्तपूर्वं मे हसतापि कदाचन ॥ १० ॥
जब जलमें ग्राह बनकर लोगोंको पकड़नेवाली तुम सब अप्सराओंको कोई श्रेष्ठ पुरुष जलसे बाहर स्थलपर खींच लायेगा, उस समय तुम सब लोग फिर अपना दिव्य रूप प्राप्त कर लोगी। मैंने पहले कभी हँसीमें भी झूठ नहीं कहा है ॥ ९-१० ॥
तानि सर्वाणि तीर्थानि ततः प्रभृति चैव ह ।
नारीतीर्थानि नाम्नेह ख्यातिं यास्यन्ति सर्वशः ।
पुण्यानि च भविष्यन्ति पावनानि मनीषिणाम् ॥ ११ ॥
तुमलोगोंका उद्धार हो जानेके बाद वे सभी तीर्थ इस जगत्में नारीतीर्थके नामसे विख्यात होंगे और मनीषी पुरुषोंको भी पवित्र करनेवाले पुण्यतीर्थ बन जायँगे ॥ ११ ॥
वर्गोवाच
ततोऽभिवाद्य तं विप्रं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।
अचिन्तयामोऽपसृत्य तस्माद् देशात् सुदुःखिताः ॥ १२ ॥
क्व नु नाम वयं सर्वाः कालेनाल्पेन तं नरम् ।
समागच्छेम यो नस्तद् रूपमापादयेत् पुनः ॥ १३ ॥
**वर्गा कहती है—**भारत! तदनन्तर उन ब्राह्मणको प्रणाम और उनकी प्रदक्षिणा करके अत्यन्त दुःखी हो हम सब उस स्थानसे अन्यत्र चली आयीं और इस चिन्तामें पड़ गयीं कि कहाँ जाकर हम सब लोग रहें, जिससे थोड़े ही समयमें हमें वह मनुष्य मिल जाय, जो हमें पुनः हमारे पूर्व स्वरूपकी प्राप्ति करायेगा ।। १२-१३ ।। ता वयं चिन्तयित्वैव मुहूर्तादिव भारत । दृष्टवत्यो महाभागं देवर्षिमुत नारदम् ।। १४ ।। भरतश्रेष्ठ! हमलोग दो घड़ीसे इस प्रकार सोच-विचार कर ही रही थीं कि हमको महाभाग देवर्षि नारदजीका दर्शन प्राप्त हुआ ।। १४ ।। सम्प्रहृष्टाः स्म तं दृष्ट्वा देवर्षिममितद्युतिम् । अभिवाद्य च तं पार्थ स्थिताः स्म व्रीडिताननाः ।। १५ ।। कुन्तीनन्दन! उन अमिततेजस्वी देवर्षिको देखकर हमें बड़ा हर्ष हुआ और उन्हें प्रणाम करके हम लज्जावश सिर झुकाकर वहाँ खड़ी हो गयीं ।। १५ ।। स नोऽपृच्छद् दुःखमूलमुक्तवत्यो वयं च तम् । श्रुत्वा तत्र यथावृत्तमिदं वचनमब्रवीत् ।। १६ ।। फिर उन्होंने हमारे दुःखका कारण पूछा और हमने उनसे सब कुछ बता दिया। सारा हाल सुनकर वे इस प्रकार बोले— ।। १६ ।। दक्षिणे सागरानूपे पञ्च तीर्थानि सन्ति वै । पुण्यानि रमणीयानि तानि गच्छत मा चिरम् ।। १७ ।। ‘दक्षिण समुद्रके तटके समीप पाँच तीर्थ हैं, जो परम पुण्यजनक तथा अत्यन्त रमणीय हैं। तुम सब उन्हींमें चली जाओ, देर न करो ।। १७ ।। तत्राशु पुरुषव्याघ्रः पाण्डवेयो धनंजयः । मोक्षयिष्यति शुद्धात्मा दुःखादस्मान्न संशयः ।। १८ ।। तस्य सर्वा वयं वीर श्रुत्वा वाक्यमिहागताः । तदिदं सत्यमेवाद्य मोक्षिताहं त्वयानघ ।। १९ ।। ‘वहाँ पुरुषोंमें श्रेष्ठ शुद्धात्मा पाण्डुकुमार धनंजय शीघ्र ही पहुँचकर तुम्हें इस दुःखसे छुड़ायेंगे, इसमें संशय नहीं है।' वीर अर्जुन! नारदजीका यह वचन सुनकर हम सब सखियाँ यहीं चली आयीं। अनघ! आज सचमुच ही आपने मुझे उस शापसे मुक्त कर दिया ।। १८-१९ ।। एतास्तु मम ताः सख्यश्चतस्रोऽन्या जले श्रिताः । कुरु कर्म शुभं वीर एताः सर्वा विमोक्षय ।। २० ।। ये मेरी चार सखियाँ और हैं, जो अभी जलमें ही पड़ी हैं। वीरवर! आप यह पुण्य कर्म कीजिये; इन सबको शापसे छुड़ा दीजिये ।। २० ।।
वैशम्पायन उवाच
ततस्ताः पाण्डवश्रेष्ठः सर्वा एव विशाम्पते । तस्माच्छापाददीनात्मा मोक्षयामास वीर्यवान् ॥ २१ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब उदारहृदय पराक्रमी पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुनने उन सभी अप्सराओंको उस शापसे मुक्त कर दिया ॥ २१ ॥
उत्थाय च जलात् तस्मात् प्रतिलभ्य वपुः स्वकम् । तास्तदाप्सरसो राजन्नदृश्यन्त यथा पुरा ॥ २२ ॥ राजन्! उस जलसे ऊपर निकलकर फिर अपना पूर्वस्वरूप प्राप्त कर लेनेपर वे अप्सराएँ उस समय पहलेकी भाँति दिखायी देने लगीं ॥ २२ ॥
तीर्थानि शोधयित्वा तु तथानुज्ञाय ताः प्रभुः । चित्राङ्गदां पुनर्द्रष्टुं मणिपूरं पुनर्ययौ ॥ २३ ॥ इस प्रकार उन तीर्थोंका शोधन करके उन अप्सराओंको जानेकी आज्ञा दे शक्तिशाली अर्जुन चित्रांगदासे मिलनेके लिये पुनः मणिपुर गये ॥ २३ ॥
तस्यामजनयत् पुत्रं राजानं बभ्रुवाहनम् । तं दृष्ट्वा पाण्डवो राजंश्चित्रवाहनमब्रवीत् ॥ २४ ॥ वहाँ उन्होंने चित्रांगदाके गर्भसे जो पुत्र उत्पन्न किया था, उसका नाम बभ्रुवाहन रखा गया था। राजन्! अपने उस पुत्रको देखकर पाण्डुपुत्र अर्जुनने राजा चित्रवाहनसे कहा— ॥ २४ ॥
चित्राङ्गदायाः शुल्कं त्वं गृहाण बभ्रुवाहनम् । अनेन च भविष्यामि ऋणान्मुक्तो नराधिप ॥ २५ ॥ ‘महाराज! इस बभ्रुवाहनको आप चित्रांगदाके शुल्करूपमें ग्रहण कीजिये, इससे मैं आपके ऋणसे मुक्त हो जाऊँगा' ॥ २५ ॥
चित्राङ्गदां पुनर्वाक्यमब्रवीत् पाण्डुनन्दनः । इह वै भव भद्रं ते वर्धैथा बभ्रुवाहनम् ॥ २६ ॥ तत्पश्चात् पाण्डुकुमारने पुनः चित्रांगदासे कहा—'प्रिये! तुम्हारा कल्याण हो। तुम यहीं रहो और बभ्रुवाहनका पालन-पोषण करो ॥ २६ ॥
इन्द्रप्रस्थनिवासं मे त्वं तत्रागत्य रंस्यसि । कुन्तीं युधिष्ठिरं भीमं भ्रातरौ मे कनीयसौ ॥ २७ ॥ आगत्य तत्र पश्येथा अन्यानपि च बान्धवान् । बान्धवैः सहिताः सर्वैर्नन्दसे त्वमनिन्दिते ॥ २८ ॥ ‘फिर यथासमय हमारे निवासस्थान इन्द्रप्रस्थमें आकर तुम बड़े सुखसे रहोगी। वहाँ आनेपर माता कुन्ती, युधिष्ठिर, भीमसेन, मेरे छोटे भाई नकुल-सहदेव तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंको देखनेका तुम्हें अवसर मिलेगा। अनिन्दिते! इन्द्रप्रस्थमें मेरे समस्त बन्धु-बान्धवोंसे मिलकर तुम बहुत प्रसन्न होओगी ॥ २७-२८ ॥
धर्मे स्थितः सत्यधृतिः कौन्तेयोऽथ युधिष्ठिरः । जित्वा तु पृथिवीं सर्वां राजसूयं करिष्यति ॥ २९ ॥ ‘सदा धर्मपर स्थित रहनेवाले सत्यवादी कुन्तीनन्दन महाराज युधिष्ठिर सारी पृथिवीको जीतकर राजसूययज्ञ करेंगे ॥ २९ ॥
तत्रागच्छन्ति राजानः पृथिव्यां नृपसंज्ञिताः । बहूनि रत्नान्यादाय आगमिष्यति ते पिता ॥ ३० ॥ ‘उस समय वहाँ भूमण्डलके नरेशनामधारी सभी राजा आयेंगे। तुम्हारे पिता भी बहुत-से रत्नोंकी भेंट लेकर उस समय उपस्थित होंगे ॥ ३० ॥
एकसार्थं प्रयातासि चित्रवाहनसेवया । द्रक्ष्यामि राजसूये त्वां पुत्रं पालय मा शुचः ॥ ३१ ॥ ‘चित्रवाहनकी सेवाके निमित्त उन्हींके साथ राजसूययज्ञमें तुम भी चली आना। मैं वहीं तुमसे मिलूँगा। इस समय पुत्रका पालन करो और शोक छोड़ दो ॥ ३१ ॥
बभ्रुवाहननाम्ना तु मम प्राणो महीचरः । तस्माद् भरस्व पुत्रं वै पुरुषं वंशवर्धनम् ॥ ३२ ॥ ‘बभ्रुवाहनके नामसे मेरा प्राण ही इस भूतलपर विद्यमान है, अतः तुम इस पुत्रका भरण-पोषण करो। यह इस वंशको बढ़ानेवाला पुरुषरत्न है ॥ ३२ ॥
चित्रवाहनदायादं धर्मात् पौरवनन्दनम् । पाण्डवानां प्रियं पुत्रं तस्मात् पालय सर्वदा ॥ ३३ ॥ ‘यह धर्मतः चित्रवाहनका पुत्र है; किंतु शरीरसे पूरुवंशको आनन्दित करनेवाला है। अतः पाण्डवोंके इस प्रिय पुत्रका तुम सदा पालन करो ॥ ३३ ॥
विप्रयोगेन संतापं मा कृथास्त्वमनिन्दिते । चित्राङ्गदामेवमुक्त्वा गोकर्णमभितोऽगमत् ॥ ३४ ॥ ‘सती-साध्वी प्रिये! मेरे वियोगसे तुम संतप्त न होना।’ चित्रांगदासे ऐसा कहकर अर्जुन गोकर्णतीर्थकी ओर चल दिये ॥ ३४ ॥
आद्यं पशुपतेः स्थानं दर्शनादेव मुक्तिदम् । यत्र पापोऽपि मनुजः प्राप्नोत्यभयदं पदम् ॥ ३५ ॥ वह भगवान् शंकरका आदिस्थान है और दर्शनमात्रसे मोक्ष देनेवाला है। पापी मनुष्य भी वहाँ जाकर निर्भय पद प्राप्त कर लेता है ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वण्यर्जुनवनवासपर्वण्यर्जुनतीर्थयात्रायां षोडशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें अर्जुनकी तीर्थयात्रासे सम्बन्ध रखनेवाला दो सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१६ ॥
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अर्जुनका प्रभासतीर्थमें श्रीकृष्णसे मिलना और उन्हींके साथ उनका रैवतक पर्वत एवं द्वारकापुरीमें आना
सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
अर्जुनका प्रभासतीर्थमें श्रीकृष्णसे मिलना और उन्हींके साथ उनका रैवतक पर्वत एवं द्वारकापुरीमें आना
वैशम्पायन उवाच
सोऽपरान्तेषु तीर्थानि पुण्यान्यायतनानि च।
सर्वाण्येवानुपूर्व्येण जगामामितविक्रमः॥ १॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर अमित-पराक्रमी अर्जुन क्रमशः अपरान्त (पश्चिम समुद्रतटवर्ती)-देशके समस्त पुण्य तीर्थों और मन्दिरोंमें गये॥ १॥
समुद्रे पश्चिमे यानि तीर्थान्यायतननि च।
तानि सर्वाणि गत्वा स प्रभासमुपजग्मिवान्॥ २॥
पश्चिम समुद्रके तटपर जितने तीर्थ और देवालय थे, उन सबकी यात्रा करके वे प्रभासक्षेत्रमें जा पहुँचे॥ २॥
प्रभासदेशं सम्प्राप्तं बीभत्सुमपराजितम्।
सुपुण्यं रमणीयं च शुश्राव मधुसूदनः॥ ३॥
ततोऽभ्यगच्छत् कौन्तेयं सखायं तत्र माधवः।
ददृशाते तदान्योन्यं प्रभासे कृष्णपाण्डवौ॥ ४॥
भगवान् श्रीकृष्णने गुप्तचरोंद्वारा यह सुना कि किसीसे भी परास्त न होनेवाले अर्जुन परम पवित्र एवं रमणीय प्रभासक्षेत्रमें आ गये हैं, तब वे अपने सखा कुन्तीनन्दनसे मिलनेके लिये वहाँ गये। उस समय प्रभासमें श्रीकृष्ण और अर्जुनने एक-दूसरेको देखा॥ ३-४॥
तावन्योन्यं समाश्लिष्य पृष्ट्वा च कुशलं वने।
आस्तां प्रियसखायौ तौ नरनारायणावृषी॥ ५॥
दोनों ही दोनोंको हृदयसे लगाकर कुशल-प्रश्न पूछनेके पश्चात् वे परस्पर प्रिय मित्र साक्षात् नर-नारायण ऋषि वनमें एक स्थानपर बैठ गये॥ ५॥
ततोऽर्जुनं वासुदेवस्तां चर्यां पर्यपृच्छत । किमर्थं पाण्डवैतानि तीर्थान्यनुचरस्युत ।। ६ ।। तब भगवान् वासुदेवने अर्जुनसे उनकी जीवनचर्याके सम्बन्धमें पूछा—‘पाण्डव! तुम किसलिये तीर्थोंमें विचर रहे हो?’ ।। ६ ।।
ततोऽर्जुनो यथावृत्तं सर्वमाख्यातवांस्तदा । श्रुत्वोवाच च वार्ष्णेय एवमेतदिति प्रभुः ।। ७ ।। यह सुनकर अर्जुनने उन्हें सारा वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों सुना दिया। सब कुछ सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण बोले—‘यह बात ऐसी ही है’ ।। ७ ।।
तौ विहृत्य यथाकामं प्रभासे कृष्णपाण्डवौ । महीधरं रैवतकं वासायैवाभिजग्मतुः ।। ८ ।। तदनन्तर श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों प्रभासक्षेत्रमें इच्छानुसार घूम-फिरकर रैवतक पर्वतपर चले गये। उन्हें रातको वहीं ठहरना था ।। ८ ।।
पूर्वमेव तु कृष्णस्य वचनात् तं महीधरम् । पुरुषा मण्डयाञ्चक्रुरुपजह्रुश्च भोजनम् ।। ९ ।। भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे उनके सेवकोंने पहलेसे ही आकर उस पर्वतको सजा रखा था और वहाँ भोजन भी तैयार करके रख लिया था ।। ९ ।।
प्रतिगृह्यार्जुनः सर्वमुपभुज्य च पाण्डवः ।
सहैव वासुदेवेन दृष्टवान् नटनर्तकान् ॥ १० ॥ अभ्यनुज्ञाय तान् सर्वानर्चयित्वा च पाण्डवः । सत्कृतं शयनं दिव्यमभ्यगच्छन्महामतिः ॥ ११ ॥ पाण्डुकुमार अर्जुनने भगवान् वासुदेवके साथ प्रस्तुत किये हुए सम्पूर्ण भोज्य पदार्थोंको यथारुचि खाकर नटों और नर्तकोंके नृत्य देखे। तत्पश्चात् उन सबको उपहार आदिसे सम्मानित करके जानेकी आज्ञा दे महाबुद्धिमान् पाण्डुकुमार अर्जुन सत्कारपूर्वक बिछी हुई दिव्य शय्यापर सोनेके लिये गये ॥ १०-११ ॥
ततस्तत्र महाबाहुः शयानः शयने शुभे । तीर्थानां पल्वलानां च पर्वतानां च दर्शनम् । आपगानां वनानां च कथयामास सात्वते ॥ १२ ॥ वहाँ सुन्दर शय्यापर सोये हुए महाबाहु धनंजयने भगवान् श्रीकृष्णसे अनेक तीर्थों, कुण्डों, पर्वतों, नदियों तथा वनोंके दर्शनसम्बन्धी अनुभवकी विचित्र बातें कहीं ॥ १२ ॥
एवं स कथयन्नेव निद्रया जनमेजय । कौन्तेयोऽपि हृतस्तस्मिन् शयने स्वर्गसंनिभे ॥ १३ ॥ जनमेजय! इस प्रकार बात करते-करते अर्जुन उस स्वर्गसदृश सुखदायिनी शय्यापर सो गये ॥ १३ ॥
मधुरेणैव गीतेन वीणाशब्देन चैव ह । प्रबोध्यमानो बुबुधे स्तुतिभिर्मङ्गलैस्तथा ॥ १४ ॥ तदनन्तर प्रातःकाल मधुर गीत, वीणाकी मीठी ध्वनि, स्तुति और मंगलपाठके शब्दोंद्वारा जगाये जानेपर उनकी नींद खुली ॥ १४ ॥
स कृत्वावश्यककार्याणि वार्ष्णेयेनाभिनन्दितः । रथेन काञ्चनाङ्गेन द्वारकामभिजग्मिवान् ॥ १५ ॥ तत्पश्चात् आवश्यक कार्य करके श्रीकृष्णके द्वारा अभिनन्दित हो उनके साथ सुवर्णमय रथपर बैठकर वे द्वारकापुरीको गये ॥ १५ ॥
अलंकृता द्वारका तु बभूव जनमेजय । कुन्तीपुत्रस्य पूजार्थमपि निष्कुटकेष्वपि ॥ १६ ॥ जनमेजय! उस समय कुन्तीकुमारके स्वागतके लिये समूची द्वारकापुरी सजायी गयी थी तथा वहाँके घरोंके बगीचेतक सजाये गये थे ॥ १६ ॥
दिदृक्षन्तश्च कौन्तेयं द्वारकावासिनो जनाः । नरेन्द्रमार्गमाजग्मुस्तूर्णं शतसहस्रशः ॥ १७ ॥ कुन्तीनन्दन अर्जुनको देखनेके लिये द्वारका-वासी मनुष्य लाखोंकी संख्यामें मुख्य सड़कपर चले आये थे ॥ १७ ॥
अवलोकेषु नारीणां सहस्राणि शतानि च ।
भोजवृष्ण्यन्धकानां च समवायो महानभूत् ॥ १८ ॥
जहाँसे अर्जुनका दर्शन हो सके, ऐसे स्थानोंपर सैकड़ों-हजारों स्त्रियाँ आँख लगाये खड़ी थीं तथा भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके पुरुषोंकी बहुत बड़ी भीड़ एकत्र हो गयी थी ॥ १८ ॥
स तथा सत्कृतः सर्वैर्भोजवृष्ण्यन्धकात्मजैः ।
अभिवाद्याभिवाद्यांश्च सर्वैश्च प्रतिनन्दितः ॥ १९ ॥
भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके सब लोगोंद्वारा इस प्रकार आदर-सत्कार पाकर अर्जुनने वन्दनीय पुरुषोंको प्रणाम किया और उन सबने उनका स्वागत किया ॥ १९ ॥
कुमारैः सर्वशो वीरः सत्कारेणाभिचोदितः ।
समानवयसः सर्वानाश्लिष्य स पुनः पुनः ॥ २० ॥
यदुकुलके समस्त कुमारोंने भी वीरवर अर्जुनका बड़ा सत्कार किया। अर्जुन अपने समान अवस्थावाले सब लोगोंसे उन्हें बारंबार हृदयसे लगाकर मिले ॥ २० ॥
कृष्णस्य भवने रम्ये रत्नभोज्यसमावृते ।
उवास सह कृष्णेन बहुलास्तत्र शर्वरीः ॥ २१ ॥
इसके बाद नाना प्रकारके रत्न तथा भाँति-भाँतिके भोज्यपदार्थोंसे भरपूर श्रीकृष्णके रमणीय भवनमें उन्होंने श्रीकृष्णके साथ ही अनेक रात्रियोंतक निवास किया ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि अर्जुनद्वारकागमने
सप्तदशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें अर्जुनका द्वारकागमनविषयक दो सौ सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २१७ ॥
(सुभद्राहरणपर्व)
(सुभद्राहरणपर्व)
अष्टादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः
रैवतक पर्वतके उत्सवमें अर्जुनका सुभद्रापर आसक्त होना और श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिरकी अनुमतिसे उसे हर ले जानेका निश्चय करना
वैशम्पायन उवाच
ततः कतिपयाहस्य तस्मिन् रैवतके गिरौ ।
वृष्ण्यन्धकानांमभवदुत्सवो नृपसत्तम ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर कुछ दिन बीतनेके बाद रैवतक पर्वतपर वृष्णि और अन्धकवंशके लोगोंका एक बड़ा भारी उत्सव हुआ ॥ १ ॥
तत्र दानं ददुर्वीरा ब्राह्मणेभ्यः सहस्रशः ।
भोजवृष्ण्यन्धकाश्चैव महे तस्य गिरेस्तदा ॥ २ ॥
पर्वतपर होनेवाले उस उत्सवमें भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके वीरोंने सहस्रों ब्राह्मणोंको दान दिया ॥ २ ॥
प्रासादै रत्नचित्रैश्च गिरेस्तस्य समन्ततः ।
स देशः शोभितो राजन् कल्पवृक्षैश्च सर्वशः ॥ ३ ॥
राजन्! उस पर्वतके चारों ओर रत्नजटित विचित्र राजभवन और कल्पवृक्ष थे, जिनसे उस स्थानकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ३ ॥
वादित्राणि च तत्रान्ये वादकाः समवादयन् ।
ननृतुर्नर्तकाश्चैव जगुर्गेयानि गायनाः ॥ ४ ॥
वहाँ बाजे बजानेमें कुशल मनुष्य अनेक प्रकारके बाजे बजाते, नाचनेवाले नाचते और गायकगण गीत गाते थे ॥ ४ ॥
अलंकृताः कुमाराश्च वृष्णीनां सुमहौजसाम् ।
यानैर्हाटकचित्रैश्च चञ्चूर्यन्ते स्म सर्वशः ॥ ५ ॥
महान् तेजस्वी वृष्णिवंशियोंके बालक वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो सुवर्णचित्रित सवारियोंपर बैठकर देदीप्यमान होते हुए चारों ओर घूम रहे थे ॥ ५ ॥
पौराश्च पादचारेण यानैरुच्चावचैस्तथा ।