महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे इस स्तोत्रसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ॥ २३॥
द्रोण उवाच
इमे मार्जारिकाः शुक्र नित्यमुद्वेजयन्ति नः। एतान् कुरुष्व दग्धांस्त्वं हुताशन सबान्धवान्॥ २४॥
**द्रोणने कहा—**शुक्लस्वरूप अग्ने! ये बिलाव हमें प्रतिदिन उद्विग्न करते रहते हैं। हुताशन! आप इन्हें बन्धु-बान्धवोंसहित भस्म कर डालिये॥ २४॥
वैशम्पायन उवाच
तथा तत् कृतवानग्निरभ्यनुज्ञाय शार्ङ्गकान्। ददाह खाण्डवं दावं समिद्धो जनमेजय॥ २५॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शार्ङ्गकोंकी अनुमतिसे अग्निदेवने वैसा ही किया और प्रज्वलित होकर वे सम्पूर्ण खाण्डववनको जलाने लगे॥ २५॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्याने एकत्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २३१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शार्ङ्गकोपाख्यानविषयक दो सौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३१॥
२३२-
द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
मन्दपालका अपने बाल-बच्चोंसे मिलना
वैशम्पायन उवाच
मन्दपालोऽपि कौरव्य चिन्तयामास पुत्रकान् ।
उक्त्वापि च स तिग्मांशुं नैव शर्म्माधिगच्छति ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! मन्दपाल भी अपने पुत्रोंकी चिन्तामें पड़े थे। यद्यपि वे (उनकी रक्षाके लिये) अग्निदेवसे प्रार्थना कर चुके थे, तो भी उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ॥ १ ॥
स तप्यमानः पुत्रार्थे लपितामिदमब्रवीत् ।
कथं नु शक्ताः शरणे लपिते मम पुत्रकाः ॥ २ ॥
पुत्रोंके लिये संतप्त होते हुए वे लपितासे बोले—'लपिते! मेरे बच्चे अपने घोंसलेमें कैसे बच सकेंगे? ॥ २ ॥
वर्धमाने हुतवहे वाते चाशु प्रवाति ।
असमर्था विमोक्षाय भविष्यन्ति ममात्मजाः ॥ ३ ॥
'जब अग्निका वेग बढ़ेगा और हवा तीव्र गतिसे चलने लगेगी, उस समय मेरे बच्चे अपनेको आगसे बचानेमें असमर्थ हो जायँगे ॥ ३ ॥
कथं त्वशक्ता त्राणाय माता तेषां तपस्विनी ।
भविष्यति हि शोकार्ता पुत्रत्राणमपश्यती ॥ ४ ॥
'उनकी तपस्विनी माता स्वयं असमर्थ है, वह बेचारी उनकी रक्षा कैसे करेगी? अपने बच्चोंके बचनेका कोई उपाय न देखकर वह शोकसे आतुर हो जायगी ॥ ४ ॥
कथमुड्डयनेऽशक्तान् पतने च ममात्मजान् ।
संतप्यमाना बहुधा वाशमाना प्रधावती ॥ ५ ॥
'मेरे बच्चे उड़ने और पंख फड़फड़ानेमें असमर्थ हैं। उन्हें उस दशामें देखकर संतप्त हो बार-बार चीत्कार करती और दौड़ती हुई जरिता किस दशामें होगी? ॥ ५ ॥
जरितारिः कथं पुत्रः सारिसृक्कः कथं च मे ।
स्तम्बमित्रः कथं द्रोणः कथं सा च तपस्विनी ॥ ६ ॥
'मेरा बेटा जरितारि कैसे होगा, सारिसृक्ककी क्या अवस्था होगी, स्तम्बमित्र और द्रोण कैसे होंगे? तथा वह तपस्विनी जरिता किस हालतमें होगी?' ॥ ६ ॥
लालप्यमानं तमृषिं मन्दपालं तथा वने ।
लपिता प्रत्युवाचेदं सासूयमिव भारत ॥ ७ ॥
भारत! मन्दपाल मुनि जब इस प्रकार वनमें (अपनी स्त्री एवं बच्चोंके लिये) विलाप कर रहे थे, उस समय लपिताने ईर्ष्यापूर्वक कहा— ॥ ७ ॥
न ते पुत्रेष्ववेक्षास्ति यानृषीनुक्तवानसि ।
तेजस्विनो वीर्यवन्तो न तेषां ज्वलनाद् भयम् ॥ ८ ॥
‘तुम्हें पुत्रोंको देखनेकी चिन्ता नहीं है। तुमने जिन ऋषियोंके नाम लिये हैं, वे तेजस्वी और शक्तिशाली हैं; उन्हें अग्निसे तनिक भी भय नहीं है ॥ ८ ॥
त्वयाग्नौ ते परीताश्च स्वयं हि मम संनिधौ ।
प्रतिश्रुतं तथा चेति ज्वलनेन महात्मना ॥ ९ ॥
‘मेरे पास ही तुमने अग्निदेवको स्वयं अपने पुत्र सौंपे थे और उन महात्मा अग्निने भी उनकी रक्षाके लिये प्रतिज्ञा की थी ॥ ९ ॥
लोकपालो न तां वाचमुक्त्वा मिथ्या करिष्यति ।
समक्षं बन्धुकृत्ये न तेन ते स्वस्थ मानसम् ॥ १० ॥
‘वे लोकपाल हैं। जब बात दे चुके हैं, तब उसे झूठी नहीं करेंगे। अतः स्वस्थ पुरुष! तुम्हारा मन अपने बच्चोंकी रक्षारूप बन्धुजनोचित कर्तव्यके पालनेके लिये उत्सुक नहीं है ॥ १० ॥
तामेव तु ममामित्रां चिन्तयन् परितप्यसे ।
ध्रुवं मयि न ते स्नेहो यथा तस्यां पुराभवत् ॥ ११ ॥
‘तुम तो मेरी दुश्मन उसी जरिता सौतके लिये चिन्ता करते हुए संतप्त हो रहे हो। पहले जरितामें तुम्हारा जैसा स्नेह था वैसा अवश्य ही मुझपर नहीं है ॥ ११ ॥
न हि पक्षवता न्याय्यं निःस्नेहेन सुहृज्जने ।
पीड्यमान उपद्रष्टुं शक्तेनात्मा कथंचन ॥ १२ ॥
‘जो सहायकोंसे सम्पन्न और शक्तिशाली है’ वह मुझ-जैसे अपने सुहृद् व्यक्तिपर स्नेह नहीं रखे और अपने आत्मीय जनको पीड़ित देखकर उसकी उपेक्षा करे, यह किसी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता ॥ १२ ॥
गच्छ त्वं जरितामेव यदर्थं परितप्यसे ।
चरिष्याम्यहमप्येका यथा कुपुरुषाश्रिता ॥ १३ ॥
‘अतः अब तुम उस जरिताके ही पास जाओ, जिसके लिये तुम इतने संतप्त हो रहे हो। मैं भी दुष्ट पुरुषके आश्रयमें पड़ी हुई स्त्रीकी भाँति अकेली ही विचरूँगी' ॥ १३ ॥
मन्दपाल उवाच
नाहमेवं चरे लोके यथा त्वमभिमन्यसे ।
अपत्यहेतोर्विचरे तच्च कृच्छ्रगतं मम ॥ १४ ॥
**मन्दपालने कहा—**अरी! तू जैसा समझती है, उस भावसे मैं इस संसारमें नहीं विचरता हूँ। मेरा विचरना तो केवल संतानके लिये होता है। मेरी वह संतान ही संकटमें पड़ी हुई है ।। १४ ।।
भूतं हित्वा च भाव्यर्थे योऽवलम्बेत स मन्दधीः ।
अवमन्येत तं लोको यथेच्छसि तथा कुरु ।। १५ ।।
जो पैदा हुए बच्चोंका परित्याग कर भविष्यमें होनेवालोंका भरोसा करता है, वह मूर्ख है; सब लोग उसका अनादर करते हैं; तेरी जैसी इच्छा हो, वैसा कर ।। १५ ।।
एष हि प्रज्वलन्नग्निर्लेलिहानो महीरुहान् ।
आविग्ने हृदि संतापं जनयत्यशिवं मम ।। १६ ।।
यह प्रज्वलित आग सारे वृक्षोंको अपनी लपटोंमें लपेटती हुई मेरे उद्विग्न हृदयमें अमंगलसूचक संताप उत्पन्न कर रही है ।। १६ ।।
वैशम्पायन उवाच
तस्माद् देशादतिक्रान्ते ज्वलने जरिता पुनः ।
जगाम पुत्रकानेव त्वरिता पुत्रगृद्धिनी ।। १७ ।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जब अग्निदेव उस स्थानसे हट गये, तब पुत्रोंकी लालसा रखनेवाली जरिता पुनः शीघ्रतापूर्वक अपने बच्चोंके पास गयी ।। १७ ।।
सा तान् कुशलिनः सर्वान् विमुक्ताञ्जातवेदसः ।
रूरूयमाणान् ददृशे वने पुत्रान् निरामयान् ।। १८ ।।
उसने देखा, सभी बच्चे आगसे बच गये हैं और सकुशल हैं। उन्हें कुछ भी कष्ट नहीं हुआ है और वे वनमें जोर-जोरसे चहक रहे हैं ।। १८ ।।
अश्रूणि मुमुचे तेषां दर्शनात् सा पुनः पुनः ।
एकैकश्येन तान् सर्वान् क्रोशमानानन्वपद्यत ।। १९ ।।
उन्हें बार-बार देखकर वह नेत्रोंसे आँसू बहाने लगी और बारी-बारीसे पुकारकर वह सभी बच्चोंसे मिली ।। १९ ।।
ततोऽभ्यगच्छत् सहसा मन्दपालोऽपि भारत ।
अथ ते सर्व एवैनं नाभ्यनन्दंस्तदा सुताः ।। २० ।।
भारत! इतनेमें ही मन्दपाल मुनि भी सहसा वहाँ आ पहुँचे; किंतु उन बच्चोंमेंसे किसीने भी उस समय उनका अभिनन्दन नहीं किया ।। २० ।।
लालप्यमानमेकैकं जरितां च पुनः पुनः ।
न चैवोचुस्तदा किंचित् तमृषिं साध्वसाधु वा ।। २१ ।।
वे एक-एक बच्चेसे बोलते और जरिताको भी बारबार बुलाते, परंतु वे लोग उन मुनिसे भला या बुरा कुछ भी नहीं बोले ।। २१ ।।
मन्दपाल उवाच
ज्येष्ठः सुतस्ते कतमः कतमस्तस्य चानुजः । मध्यमः कतमश्चैव कनीयान् कतमश्च ते ॥ २२ ॥ **मन्दपालने पूछा—**प्रिये! तुम्हारा ज्येष्ठ पुत्र कौन है, उससे छोटा कौन है, मझला कौन है और सबसे छोटा कौन है? ॥ २२ ॥ एवं ब्रुवन्तं दुःखार्तं किं मां न प्रतिभाषसे । कृतवानपि हि त्यागं नैव शान्तिमितो लभे ॥ २३ ॥ मैं इस प्रकार दुःखसे आतुर होकर तुमसे पूछ रहा हूँ, तुम मुझे उत्तर क्यों नहीं देती? यद्यपि मैंने तुम्हें त्याग दिया था, तो भी यहाँसे जानेपर मुझे शान्ति नहीं मिलती थी ॥ २३ ॥
जरितोवाच
किं नु ज्येष्ठेन ते कार्यं किमनन्तरजेन ते । किं वा मध्यमजातेन किं कनिष्ठेन वा पुनः ॥ २४ ॥ **जरिता बोली—**तुम्हें ज्येष्ठ पुत्रसे क्या काम है, उसके बादवालेसे भी क्या लेना है, मझले अथवा छोटे पुत्रसे भी तुम्हें क्या प्रयोजन है? ॥ २४ ॥ यां त्वं मां सर्वतो हीनामुत्सृज्यासि गतः पुरा । तामेव लपितां गच्छ तरुणीं चारुहासिनीम् ॥ २५ ॥ पहले तुम मुझे सबसे हीन समझकर त्यागकर जिसके पास चले गये थे, उसी मनोहर मुस्कानवाली तरुणी लपिताके पास जाओ ॥ २५ ॥
मन्दपाल उवाच
न स्त्रीणां विद्यते किंचिदमुत्र पुरुषान्तरात् । सापत्नकमृते लोके नान्यदर्थविनाशनम् ॥ २६ ॥ **मन्दपालने कहा—**परलोकमें स्त्रियोंके लिये परपुरुषसे सम्बन्ध और सौतियाडाहको छोड़कर दूसरा कोई दोष उनके परमार्थका नाश करनेवाला नहीं है ॥ २६ ॥ वैराग्निदीपनं चैव भृशमुद्वेगकारि च । सुव्रता चापि कल्याणी सर्वभूतेषु विश्रुता ॥ २७ ॥ अरुन्धती महात्मानं वसिष्ठं पर्यशङ्कत । विशुद्धभावमत्यन्तं सदा प्रियहिते रतम् ॥ २८ ॥ सप्तर्षिमध्यगं धीरमवमेने च तं मुनिम् । अपध्यानेन सा तेन धूमारुणसमप्रभा । लक्ष्यालक्ष्या नाभिरूपा निमित्तमिव पश्यति ॥ २९ ॥
यह सौतियाडाह वैरकी आगको भड़कानेवाला और अत्यन्त उद्वेगमें डालनेवाला है। समस्त प्राणियोंमें विख्यात और उत्तम व्रतका पालन करनेवाली कल्याणमयी अरुन्धतीने उन महात्मा वसिष्ठपर भी शंका की थी, जिनका हृदय अत्यन्त विशुद्ध है, जो सदा उनके प्रिय और हितमें लगे रहते हैं और सप्तर्षिमण्डलके मध्यमें विराजमान होते हैं। ऐसे धैर्यवान् मुनिका भी उन्होंने सौतियाडाहके कारण तिरस्कार किया था। इस अशुभ चिन्तनके कारण उनकी अंगकान्ति धूम और अरुणके समान (मंद) हो गयी। वे कभी लक्ष्य और कभी अलक्ष्य रहकर प्रच्छन्न वेषमें मानो कोई निमित्त देखा करती हैं॥ २७—२९॥
अपत्यहेतोः सम्प्राप्तं तथा त्वमपि मामिह ।
इष्टमेवं गते हि त्वं सा तथैवाद्य वर्तते ॥ ३० ॥
मैं पुत्रोंसे मिलनेके लिये आया हूँ, तो भी तुम मेरा तिरस्कार करती हो और इस प्रकार अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति हो जानेपर जैसे तुम मेरे साथ संदेहयुक्त व्यवहार करती हो, वैसा ही लपिता भी करती है॥ ३०॥
न हि भार्येति विश्वासः कार्यः पुंसा कथंचन ।
न हि कार्यमनुध्याति नारी पुत्रवती सती ॥ ३१ ॥
यह मेरी भार्या है, ऐसा मानकर पुरुषको किसी प्रकार भी स्त्रीपर विश्वास नहीं करना चाहिये; क्योंकि नारी पुत्रवती हो जानेपर पतिसेवा आदि अपने कर्तव्योंपर ध्यान नहीं देती॥ ३१॥
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते सर्व एवैनं पुत्राः सम्यगुपासते ।
स च तानात्मजान् सर्वान्नाश्वासयितुमुद्यतः ॥ ३२ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**तदनन्तर वे सभी पुत्र यथोचितरूपसे अपने पिताके पास आ बैठे और वे मुनि भी उन सब पुत्रोंको आश्वासन देनेके लिये उद्यत हुए॥ ३२॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि शार्ङ्गकोपाख्याने
द्वात्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत मयदर्शनपर्वमें शार्ङ्गकोपाख्यानविषयक दो सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३२॥
२३३-
त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः
इन्द्रदेवका श्रीकृष्ण और अर्जुनको वरदान तथा श्रीकृष्ण, अर्जुन और मयासुरका अग्निसे विदा लेकर एक साथ यमुनातटपर बैठना
मन्दपाल उवाच
युष्माकमपवर्गार्थं विज्ञप्तो ज्वलनो मया ।
अग्निना च तथेत्येवं प्रतिज्ञातं महात्मना ॥ १ ॥
**मन्दपाल बोले—**मैंने अग्निदेवसे यह प्रार्थना की थी कि वे तुमलोगोंको दाहसे मुक्त कर दें। महात्मा अग्निने भी वैसा करनेकी प्रतिज्ञा कर ली थी ॥ १ ॥
अग्नेर्वचनमाज्ञाय मातुर्धर्मज्ञता च वः ।
भवतां च परं वीर्यं पूर्वं नाहमिहागतः ॥ २ ॥
अग्निके दिये हुए वचनको स्मरण करके, तुम्हारी माताकी धर्मज्ञताको जानकर और तुमलोगोंमें भी महान् शक्ति है, इस बातको समझकर ही मैं पहले यहाँ नहीं आया था ॥ २ ॥
न संतापो हि वः कार्यः पुत्रका हृदि मां प्रति ।
ऋषीन् वेद हुताशोऽपि ब्रह्म तद् विदितं च वः ॥ ३ ॥
बच्चो! तुम्हें मेरे प्रति अपने हृदयमें संताप नहीं करना चाहिये। तुमलोग ऋषि हो, यह बात अग्निदेव भी जानते हैं; क्योंकि तुम्हें ब्रह्मतत्त्वका बोध हो चुका है ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमाश्वासितान् पुत्रान् भार्यामादाय स द्विजः ।
मन्दपालस्ततो देशादन्यं देशं जगाम ह ॥ ४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! इस प्रकार आश्वस्त किये हुए अपने पुत्रों और पत्नी जरिताको साथ ले द्विज मन्दपाल उस देशसे दूसरे देशमें चले गये ॥ ४ ॥
भगवानपि तिग्मांशुः समिद्धः खाण्डवं ततः ।
ददाह सह कृष्णाभ्यां जनयञ्जगतो हितम् ॥ ५ ॥
उधर प्रज्वलित हुए प्रचण्ड ज्वालाओंवाले भगवान् हुताशनने भी जगत्का हित करनेके लिये भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनकी सहायतासे खाण्डववनको जला दिया ॥ ५ ॥
वसामेदोवहाः कुल्यास्तत्र पीत्वा च पावकः ।
जगाम परमां तृप्तिं दर्शयामास चार्जुनम् ॥ ६ ॥
वहाँ मज्जा और मेदकी कई नहरें बह चलीं और उन सबको पीकर अग्निदेव पूर्ण तृप्त हो गये। तत्पश्चात् उन्होंने अर्जुनको दर्शन दिया ।। ६ ।। ततोऽन्तरिक्षाद् भगवानवतीर्य पुरंदरः। मरुद्गणैर्वृतः पार्थं केशवं चेदमब्रवीत् ॥ ७ ॥ उसी समय भगवान् इन्द्र मरुद्गणों एवं अन्य देवताओंके साथ आकाशसे उतरे और अर्जुन तथा श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले— ।। ७ ।। कृतं युवाभ्यां कर्मेदममरैरपि दुष्करम्। वरं वृणीतं तुष्टोऽस्मि दुर्लभं पुरुषेष्विह ॥ ८ ॥ ‘आप दोनोंने यह ऐसा कार्य किया है, जो देवताओंके लिये भी दुष्कर है। मैं बहुत प्रसन्न हूँ। इस लोकमें मनुष्योंके लिये जो दुर्लभ हो ऐसा कोई वर आप दोनों माँग लें’ ।। ८ ।। पार्थस्तु वरयामास शक्रादस्त्राणि सर्वशः। प्रदातुं तच्च शक्रस्तु कालं चक्रे महाद्युतिः ॥ ९ ॥ तब अर्जुनने इन्द्रसे सब प्रकारके दिव्यास्त्र माँगे। महातेजस्वी इन्द्रने उन अस्त्रोंको देनेके लिये समय निश्चित कर दिया ।। ९ ।।
यदा प्रसन्नो भगवान् महादेवो भविष्यति। तदा तुभ्यं प्रदास्यामि पाण्डवास्त्राणि सर्वशः ॥ १० ॥
(वे बोले—) ‘पाण्डुनन्दन! जब तुमपर भगवान् महादेव प्रसन्न होंगे, तब मैं तुम्हें सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र प्रदान करूँगा ॥ १० ॥
अहमेव च तं कालं वेत्स्यामि कुरुनन्दन ।
तपसा महता चापि दास्यामि भवतोऽप्यहम् ॥ ११ ॥
आग्नेयानि च सर्वाणि वायव्यानि च सर्वशः ।
मदीयानि च सर्वाणि ग्रहीष्यसि धनंजय ॥ १२ ॥
‘कुरुनन्दन! वह समय कब आनेवाला है, इसे भी मैं जानता हूँ। तुम्हारे महान् तपसे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें सम्पूर्ण आग्नेय तथा सब प्रकारके वायव्य अस्त्र प्रदान करूँगा। धनंजय! उसी समय तुम मेरे सम्पूर्ण अस्त्रोंको ग्रहण करोगे’ ॥ ११-१२ ॥
वासुदेवोऽपि जग्राह प्रीतिं पार्थेन शाश्वतीम् ।
ददौ सुरपतिश्चैव वरं कृष्णाय धीमते ॥ १३ ॥
भगवान् श्रीकृष्णने भी यह वर माँगा कि अर्जुनके साथ मेरा प्रेम निरन्तर बढ़ता रहे। इन्द्रने परम बुद्धिमान् श्रीकृष्णको वह वर दे दिया ॥ १३ ॥
एवं दत्त्वा वर ताभ्यां सह देवैर्मरुत्पतिः ।
हुताशनमनुज्ञाप्य जगाम त्रिदिवं प्रभुः ॥ १४ ॥
इस प्रकार दोनोंको वर देकर अग्निदेवकी आज्ञा ले देवताओंसहित देवराज भगवान् इन्द्र स्वर्गलोकको चले गये ॥ १४ ॥
पावकश्च तदा दावं दग्ध्वा समृगपक्षिणम् ।
अहानि पञ्च चैकं च विरराम सुतर्पितः ॥ १५ ॥
अग्निदेव भी मृगों और पक्षियोंसहित सम्पूर्ण वनको जलाकर पूर्ण तृप्त हो छः दिनोंतक विश्राम करते रहे ॥ १५ ॥
जग्ध्वा मांसानि पीत्वा च मेदांसि रुधिराणि च ।
युक्तः परमया प्रीत्या तावुवाचाच्युतार्जुनौ ॥ १६ ॥
जीव-जन्तुओंके मांस खाकर उनके मेद तथा रक्त पीकर अत्यन्त प्रसन्न हो अग्निने श्रीकृष्ण और अर्जुनसे कहा— ॥ १६ ॥
युवाभ्यां पुरुषाग्र्याभ्यां तर्पितोऽस्मि यथासुखम् ।
अनुजानामि वां वीरौ चरतं यत्र वाञ्छितम् ॥ १७ ॥
‘वीरो! आप दोनों पुरुषरत्नोंने मुझे आनन्दपूर्वक तृप्त कर दिया। अब मैं आपको अनुमति देता हूँ, जहाँ आपकी इच्छा हो, जाइये’ ॥ १७ ॥
एवं तौ समनुज्ञातौ पावकेन महात्मना ।
अर्जुनो वासुदेवश्च दानवश्च मयस्तथा ॥ १८ ॥
परिक्रम्य ततः सर्वे त्रयोऽपि भरतर्षभ ।
रमणीये नदीकूले सहिताः समुपाविशन् ॥ १९ ॥
भरतश्रेष्ठ! महात्मा अग्निदेवके इस प्रकार आज्ञा देनेपर अर्जुन, श्रीकृष्ण तथा मयासुर सबने उनकी परिक्रमा की। फिर तीनों ही यमुनानदीके रमणीय तटपर जाकर एक साथ बैठे ॥ १८-१९ ॥
इति श्रीमहाभारते शतसाहस्र्यां संहितायां वैयासिक्यामादिपर्वणि मयदर्शनपर्वणि वरप्रदाने त्रयस्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारतमें व्यासनिर्र्मित एक लाख श्लोकोंकी संहिताके अंतर्गत आदिपर्वके मयदर्शनपर्वमें इन्द्रवरदानविषयक दो सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २३३ ॥
(आदिपर्व सम्पूर्णम्)
| अनुष्टुप् छन्द | (अन्य बड़े छन्द) | बड़े छन्दोंको ३२ अक्षरोंके अनुष्टुप्के अनुसार गिननेपर | गद्योंको अनुष्टुप् छन्द बनाकर जोड़नेपर | कुल | |
|---|---|---|---|---|---|
| उत्तरभारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | ७८७० ½ | (५११ ½) | ७३६ ½ | २८३ | ८८९० |
| दक्षिणभारतीय पाठसे लिये गये श्लोक— | ७१० ½ | (१८ ½) | २६ | X | ७३६ ½ |
आदिपर्वकी पूर्ण श्लोकसंख्या — ९६२६ ½
सभापर्व
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीमहाभारतम्
सभापर्व
सभाक्रियापर्व
प्रथमोऽध्यायः
भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञाके अनुसार मयासुरद्वारा सभाभवन बनानेकी तैयारी
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण, उनके नित्यसखा-नरस्वरूप नरश्रेष्ठ अर्जुन, (उनकी लीला प्रकट करनेवाली) भगवती सरस्वती और (उन लीलाओंका संकलन करनेवाले) महर्षि वेदव्यासको नमस्कार करके जय (महाभारत)-का पाठ करना चाहिये ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततोऽब्रवीन्मयः पार्थं वासुदेवस्य संनिधौ ।
प्राञ्जलिः श्लक्ष्णया वाचा पूजयित्वा पुनः पुनः ॥ २ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! खाण्डवदाहके अनन्तर मयासुरने भगवान् श्रीकृष्णके पास बैठे हुए अर्जुनकी बारंबार प्रशंसा करके हाथ जोड़कर मधुर वाणीमें उनसे कहा ॥ २ ॥
मय उवाच
अस्मात् कृष्णात् सुसंरब्धात् पावकाच्च दिधक्षतः ।
त्वया त्रातोऽस्मि कौन्तेय ब्रूहि किं करवाणि ते ॥ ३ ॥
**मयासुर बोला—**कुन्तीनन्दन! आपने अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए इन भगवान् श्रीकृष्णसे तथा जला डालनेकी इच्छावाले अग्निदेवसे भी मेरी रक्षा की है। अतः बताइये, मैं (इस उपकारके बदले) आपकी क्या सेवा करूँ? ॥ ३ ॥
अर्जुन उवाच
कृतमेव त्वया सर्वं स्वस्ति गच्छ महासुर ।
प्रीतिमान् भव मे नित्यं प्रीतिमन्तो वयं च ते ॥ ४ ॥
**अर्जुनने कहा—**असुरराज! तुमने इस प्रकार कृतज्ञता प्रकट करके मेरे उपकारका मानो सारा बदला चुका दिया। तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम जाओ। मुझपर प्रेम बनाये रखना। हम भी तुम्हारे प्रति सदा स्नेहका भाव रखेंगे ॥ ४ ॥
मय उवाच
युक्तमेतत् त्वयि विभो यथाऽऽत्थ पुरुषर्षभ ।
प्रीतिपूर्वमहं किंचित् कर्तुमिच्छामि भारत ॥ ५ ॥
मयासुर बोला—प्रभो! पुरुषोत्तम! आपने जो बात कही है, वह आप-जैसे महापुरुषके अनुरूप ही है; परंतु भारत! मैं बड़े प्रेमसे आपके लिये कुछ करना चाहता हूँ ।। ५ ।।
अहं हि विश्वकर्मा वै दानवानां महाकविः ।
सोऽहं वै त्वत्कृते कर्तुं किंचिदिच्छामि पाण्डव ।। ६ ।।
पाण्डुनन्दन! मैं दानवोंका विश्वकर्मा एवं शिल्प-विद्याका महान् पण्डित हूँ। अतः मैं आपके लिये किसी वस्तुका निर्माण करना चाहता हूँ ।। ६ ।।
(दानवानां पुरा पार्थ प्रासादा हि मया कृताः ।
रम्याणि सुखगर्भाणि भोगाढ्यानि सहस्रशः ।।
उद्यानानि च रम्याणि सरांसि विविधानि च ।
विचित्राणि च शस्त्राणि रथाः कामगमास्तथा ।।
नगराणि विशालानि साट्टप्राकारतोरणैः ।
वाहनानि च मुख्यानि विचित्राणि सहस्रशः ।।
बिलानि रमणीयानि सुखयुक्तानि वै भृशम् ।
एतत् कृतं मया सर्वं तस्मादिच्छामि फाल्गुन ।।)
कुन्तीनन्दन! पूर्वकालमें मैंने दानवोंके बहुत-से महल बनाये हैं। इसके सिवा देखनेमें रमणीय, सुख और भोगसाधनोंसे सम्पन्न अनेक प्रकारके रमणीय उद्यानों, भाँति-भाँतिके सरोवरों, विचित्र अस्त्र-शस्त्रों, इच्छानुसार चलनेवाले रथों, अट्टालिकाओं, चहारदीवारियों और बड़े-बड़े फाटकोंसहित विशाल नगरों, हजारों अद्भुत एवं श्रेष्ठ वाहनों तथा बहुत-सी मनोहर एवं अत्यन्त सुखदायक सुरंगोंका मैंने निर्माण किया है। अतः अर्जुन! मैं आपके लिये भी कुछ बनाना चाहता हूँ।
अर्जुन उवाच
प्राणकृच्छ्राद् विमुक्तं त्वमात्मानं मन्यसे मया ।
एवं गते न शक्ष्यामि किंचित् कारयितुं त्वया ।। ७ ।।
अर्जुन बोले—मयासुर! तुम मेरे द्वारा अपनेको प्राणसंकटसे मुक्त हुआ मानते हो और इसीलिये कुछ करना चाहते हो। ऐसी दशामें मैं तुमसे कोई काम नहीं करा सकूँगा ।। ७ ।।
न चापि तव संकल्पं मोघमिच्छामि दानव ।
कृष्णस्य क्रियतां किंचित् तथा प्रतिकृतं मयि ।। ८ ।।
दानव! साथ ही मैं यह भी नहीं चाहता कि तुम्हारा यह संकल्प व्यर्थ हो। इसलिये तुम भगवान् श्रीकृष्णका कोई कार्य कर दो, इससे मेरे प्रति तुम्हारा कर्तव्य पूर्ण हो जायगा ।। ८ ।।
चोदितो वासुदेवस्तु मयेन भरतर्षभ ।
मुहूर्तमिव संदध्यौ किमयं चोद्यतामिति ।। ९ ।।
भरतश्रेष्ठ! तब मयासुरने भगवान् श्रीकृष्णसे काम बतानेका अनुरोध किया। उसके प्रेरणा करनेपर भगवान् श्रीकृष्णने अनुमानतः दो घड़ीतक विचार किया कि 'इसे कौन-सा काम बताया जाय?' ।। ९ ।।
ततो विचिन्त्य मनसा लोकनाथः प्रजापतिः । चोदयामास तं कृष्णः सभा वै क्रियतामिति ।। १० ।। यदि त्वं कर्तुकामोऽसि प्रियं शिल्पवतां वर । धर्मराजस्य दैतेय यादृशीमिह मन्यसे ।। ११ ।।
तदनन्तर मन-ही-मन कुछ सोचकर प्रजापालक लोकनाथ भगवान् श्रीकृष्णने उससे कहा—‘शिल्पियोंमें श्रेष्ठ दैत्यराज मय! यदि तुम मेरा कोई प्रिय कार्य करना चाहते हो तो तुम धर्मराज युधिष्ठिरके लिये जैसा ठीक समझो, वैसा एक सभाभवन बना दो ।। १०-११ ।।
यां कृतां नानुकुर्वन्ति मानवाः प्रेक्ष्य विस्मिताः । मनुष्यलोके सकले तादृशीं कुरु वै सभाम् ।। १२ ।।
‘वह सभाभवन ऐसा बनाओ, जिसके बन जानेपर सम्पूर्ण मनुष्यलोकके मानव देखकर विस्मित हो जायँ एवं कोई उसकी नकल न कर सके ।। १२ ।।
यत्र दिव्यानभिप्रायान् पश्येम हि कृतांस्त्वया । आसुरान् मानुषांश्चैव सभां तां कुरु वै मय ।। १३ ।।
‘मयासुर! तुम ऐसे सभाभवनका निर्माण करो, जिसमें हम तुम्हारे द्वारा अंकित देवता, असुर और मनुष्योंकी शिल्पनिपुणताका दर्शन कर सकें’ ।। १३ ।।
वैशम्पायन उवाच
प्रतिगृह्य तु तद्वाक्यं सम्प्रहृष्टो मयस्तदा । विमानप्रतिमां चक्रे पाण्डवस्य शुभां सभाम् ।। १४ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! भगवान् श्रीकृष्णकी उस आज्ञाको शिरोधार्य करके मयासुर बहुत प्रसन्न हुआ और उसने उस समय पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके लिये विमान-जैसी सुन्दर सभाभवन बनानेका निश्चय किया ।। १४ ।।
ततः कृष्णश्च पार्थश्च धर्मराजे युधिष्ठिरे । सर्वमेतत् समावेद्य दर्शयामासतुर्मयम् ।। १५ ।।
तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुनने धर्मराज युधिष्ठिरको ये सब बातें बताकर मयासुरको उनसे मिलाया ।। १५ ।।
तस्मै युधिष्ठिरः पूजां यथार्हमकरोत् तदा । स तु तां प्रतिजग्राह मयः सत्कृत्य भारत ।। १६ ।।
भारत! राजा युधिष्ठिरने उस समय मयासुरका यथायोग्य सत्कार किया और मयासुरने भी बड़े आदरके साथ उनका वह सत्कार ग्रहण किया ॥ १६ ॥
स पूर्वदेवचरितं तदा तत्र विशाम्पते ।
कथयामास दैतेयः पाण्डुपुत्रेषु भारत ॥ १७ ॥
जनमेजय! दैत्यराज मयने उस समय वहाँ पाण्डवोंको दैत्योंके अद्भुत चरित्र सुनाये ॥ १७ ॥
स कालं कंचिदाश्वस्य विश्वकर्मा विचिन्त्य तु ।
सभां प्रचक्रे कर्तुं पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १८ ॥
कुछ दिनोंतक वहाँ आरामसे रहकर दैत्योंके विश्वकर्मा मयासुरने सोच-विचारकर महात्मा पाण्डवोंके लिये सभाभवन बनानेकी तैयारी की ॥ १८ ॥
अभिप्रायेण पार्थानां कृष्णस्य च महात्मनः ।
पुण्येऽहनि महातेजाः कृतकौतुकमङ्गलः ॥ १९ ॥
तर्पयित्वा द्विजश्रेष्ठान् पायसेन सहस्रशः ।
धनं बहुविधं दत्त्वा तेभ्य एव च वीर्यवान् ॥ २० ॥
सर्वर्तुगुणसम्पन्नां दिव्यरूपां मनोरमाम् ।
दशकिष्कुसहस्रां तां मापयामास सर्वतः ॥ २१ ॥
उसने कुन्तीपुत्रों तथा महात्मा श्रीकृष्णकी रुचिके अनुसार सभाभवन बनानेका निश्चय किया। किसी पवित्र तिथिको (शुभ मुहूर्तमें) मंगलानुष्ठान, स्वस्तिवाचन आदि करके महातेजस्वी और पराक्रमी मयने हजारों श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको खीर खिलाकर तृप्त किया तथा उन्हें अनेक प्रकारका धन दान किया। इसके बाद उसने सभाभवन बनानेके लिये समस्त ऋतुओंके गुणोंसे सम्पन्न दिव्य रूपवाली मनोरम सब ओरसे दस हजार हाथकी (अर्थात् दस हजार हाथ चौड़ी और दस हजार हाथ लम्बी) धरती नपवायी ॥ १९—२१ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभास्थाननिर्णये प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें सभास्थाननिर्णयविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल २५ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 1608)
द्वितीयोऽध्यायः
श्रीकृष्णकी द्वारकायात्रा
वैशम्पायन उवाच
उषित्वा खाण्डवप्रस्थे सुखवासं जनार्दनः ।
पार्थैः प्रीतिसमायुक्तैः पूजनार्होऽभिपूजितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! परम पूजनीय भगवान् श्रीकृष्ण खाण्डवप्रस्थमें सुखपूर्वक रहकर प्रेमी पाण्डवोंके द्वारा नित्य पूजित होते रहे ॥ १ ॥
गमनाय मतिं चक्रे पितुर्दर्शनलालसः ।
धर्मराजमथामन्त्र्य पृथां च पृथुलोचनः ॥ २ ॥
तदनन्तर पिताके दर्शनके लिये उत्सुक होकर विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिर और कुन्तीकी आज्ञा लेकर वहाँसे द्वारका जानेका विचार किया ॥ २ ॥
ववन्दे चरणौ मूर्ध्ना जगद्वन्द्यः पितृष्वसुः ।
स तया मूर्युपाघ्रातः परिष्वक्तश्च केशवः ॥ ३ ॥
जगद्वन्द्य केशवने अपनी बुआ कुन्तीके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और कुन्तीने उनका मस्तक सूँघकर उन्हें हृदयसे लगा लिया ॥ ३ ॥
ददर्शानन्तरं कृष्णो भगिनीं स्वां महायशाः ।
तामुपेत्य हृषीकेशः प्रीत्या बाष्पसमन्वितः ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् महायशस्वी हृषीकेश अपनी बहिन सुभद्रासे मिले। उसके पास जानेपर स्नेहवश उनके नेत्रोंमें आँसू भर आये ॥ ४ ॥
अर्थ्यं तथ्यं हितं वाक्यं लघु युक्तमनुत्तरम् ।
उवाच भगवान् भद्रां सुभद्रां भद्रभाषिणीम् ॥ ५ ॥
भगवान्ने मङ्गलमय वचन बोलनेवाली कल्याणमयी सुभद्रासे बहुत थोड़े, सत्य, प्रयोजनपूर्ण, हितकारी, युक्तियुक्त एवं अकाट्य वचनोंद्वारा अपने जानेकी आवश्यकता बतायी (और उसे ढाढ़स बँधाया) ॥ ५ ॥
तया स्वजनगामीनि श्रावितो वचनानि सः ।
सम्पूजितश्चाप्यसकृच्छिरसा चाभिवादितः ॥ ६ ॥
सुभद्राने बार-बार भाईकी पूजा करके मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और माता-पिता आदि स्वजनोंसे कहनेके लिये संदेश दिये ॥ ६ ॥
तामनुज्ञाय वार्ष्णेयः प्रतिनन्द्य च भामिनीम् ।
ददर्शानन्तरं कृष्णां धौम्यं चापि जनार्दनः ॥ ७ ॥
भामिनी सुभद्राको प्रसन्न करके उससे जानेकी अनुमति लेकर वृष्णिकुलभूषण जनार्दन द्रौपदी तथा धौम्यमुनिसे मिले ।। ७ ।। ववन्दे च यथान्यायं धौम्यं पुरुषसत्तमः । द्रौपदीं सान्त्वयित्वा च आमन्त्र्य च जनार्दनः ॥ ८ ॥ भ्रातृनभ्यगमद् विद्वान् पार्थेन सहितो बली । भ्रातृभिः पञ्चभिः कृष्णो वृतः शक्र इवामरैः ॥ ९ ॥ पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने यथोचित रीतिसे धौम्यजीको प्रणाम किया और द्रौपदीको सान्त्वना दे उसकी अनुमति लेकर वे अर्जुनके साथ अन्य भाइयोंके पास गये। पाँचों भाई पाण्डवोंसे घिरे हुए विद्वान् एवं बलवान् श्रीकृष्ण देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति सुशोभित हुए ॥ ८-९ ॥ यात्राकालस्य योग्यानि कर्माणि गरुडध्वजः । कर्तुकामः शुचिर्भूत्वा स्नातवान् समलंकृतः ॥ १० ॥ तदनन्तर गरुडध्वज श्रीकृष्णने यात्राकालोचित कर्म करनेके लिये पवित्र हो स्नान करके अलंकार धारण किया ॥ १० ॥ अर्चयामास देवांश्च द्विजांश्च यदुपुङ्गवः । माल्यजाप्यनमस्कारैर्गन्धैरुच्चावचैरपि ॥ ११ ॥ फिर उन यदुश्रेष्ठने प्रचुर पुष्प-माला, जप, नमस्कार और चन्दन आदि अनेक प्रकारके सुगन्धित पदार्थोंद्वारा देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजा की ॥ ११ ॥ स कृत्वा सर्वकार्याणि प्रतस्थे तस्थुषां वरः । उपेत्य स यदुश्रेष्ठो बाह्यकक्षाद् विनिर्गतः ॥ १२ ॥ प्रतिष्ठित पुरुषोंमें श्रेष्ठ यदुप्रवर श्रीकृष्ण यात्राकालोचित सब कार्य पूर्ण करके प्रस्थित हुए और भीतरसे चलकर बाहरी ड्योढ़ीको पार करते हुए राजभवनसे बाहर निकले ॥ १२ ॥ स्वस्तिवाच्यार्हतो विप्रान् दधिपात्रफलाक्षतैः । वसु प्रदाय च ततः प्रदक्षिणमथाकरोत् ॥ १३ ॥ उस समय सुयोग्य ब्राह्मणोंने स्वस्तिवाचन किया और भगवान्ने दहीसे भरे पात्र, अक्षत, फल आदिके साथ उन ब्राह्मणोंको धन देकर उन सबकी परिक्रमा की ॥ १३ ॥ काञ्चनं रथमास्थाय तार्क्ष्यकेतनमाशुगम् । गदाचक्रासिशाङ्गैर्द्यायुधैरावृतं शुभम् ॥ १४ ॥ तिथावप्यथ नक्षत्रे मुहूर्ते च गुणान्विते । प्रययौ पुण्डरीकाक्षः शैब्यसुग्रीववाहनः ॥ १५ ॥ इसके बाद गरुडचिह्नित ध्वजासे सुशोभित और गदा, चक्र, खड्ग एवं शार्ङ्गधनुष आदि आयुधोंसे सम्पन्न शैब्य, सुग्रीव आदि घोड़ोंसे युक्त शुभ सुवर्णमय रथपर आरूढ़ हो
कमलनयन श्रीकृष्णने उत्तम तिथि, शुभ नक्षत्र एवं गुणयुक्त मुहूर्तमें यात्रा आरम्भ की॥ १४-१५॥
अन्वारुरोह चाप्येनं प्रेम्णा राजा युधिष्ठिरः।
अपास्य चास्य यन्तारं दारुकं यन्तृसत्तमम्॥ १६॥
उस समय श्रीकृष्णका रथ हाँकनेवाले सारथियोंमें श्रेष्ठ दारुकको हटाकर उसके स्थानमें राजा युधिष्ठिर प्रेमपूर्वक भगवान्के साथ रथपर जा बैठे॥ १६॥
अभीषून् सम्प्रजग्राह स्वयं कुरुपतिस्तदा।
उपारुह्यार्जुनश्चापि चामरव्यजनं सितम्॥ १७॥
रुक्मदण्डं बृहद्बाहुर्विधुधाव प्रदक्षिणम्।
कुरुराज युधिष्ठिरने घोड़ोंकी बागडोर स्वयं अपने हाथमें ले ली। फिर महाबाहु अर्जुन भी रथपर बैठ गये और सुवर्णमय दण्डसे विभूषित श्वेत चँवर और व्यजन लेकर दाहिनी ओरसे उनके ऊपर डुलाने लगे॥ १७ १/२॥
तथैव भीमसेनोऽपि यमाभ्यां सहितो बली॥ १८॥
पृष्ठतोऽनुययौ कृष्णमृत्विक्पौरजनैः सह।
(छत्रं शतशलाकं च दिव्यमाल्योपशोभितम्।
वैडूर्यमणिदण्डं च चामीकरविभूषितम्॥
दधार तरसा भीमश्छत्रं तच्छाङ्गिधन्वने।
उपारुह्य रथं शीघ्रं चामरव्यजने सिते ।।
नकुलः सहदेवश्च धूयमानौ जनार्दनम् ।)
स तथा भ्रातृभिः सर्वैः केशवः परवीरहा ।। १९ ।।
अन्वीयमानः शुशुभे शिष्यैरिव गुरुः प्रियैः ।
इसी प्रकार नकुल-सहदेवसहित बलवान् भीमसेन भी ऋत्विजों और पुरवासियोंके साथ भगवान् श्रीकृष्णके पीछे-पीछे चल रहे थे। उन्होंने वेगपूर्वक आगे बढ़कर शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्णके ऊपर दिव्य मालाओंसे सुशोभित एवं सौ शलाकाओं (तिल्लियों)-से युक्त स्वर्णविभूषित छत्र लगाया। उस छत्रमें वैदूर्य-मणिका डंडा लगा हुआ था। नकुल और सहदेव भी शीघ्रतापूर्वक रथपर आरूढ़ हो श्वेत चँवर और व्यजन डुलाते हुए जनार्दनकी सेवा करने लगे। उस समय अपने समस्त फुफेरे भाइयोंसे संयुक्त शत्रुदमन केशव ऐसी शोभा पाने लगे, मानो अपने प्रिय शिष्योंके साथ गुरु यात्रा कर रहे हों ।। १८-१९½ ।।
पार्थमामन्त्र्य गोविन्दः परिष्वज्य सुपीडितम् ।। २० ।।
युधिष्ठिरं पूजयित्वा भीमसेनं यमौ तथा ।
परिष्वक्तो भृशं तैस्तु यमाभ्यामभिवादितः ।। २१ ।।
श्रीकृष्णके बिछोहसे अर्जुनको बड़ी व्यथा हो रही थी। गोविन्दने उन्हें हृदयसे लगाकर उनसे जानेकी अनुमति ली। फिर उन्होंने युधिष्ठिर और भीमसेनका चरणस्पर्श किया। युधिष्ठिर, भीम और अर्जुनने भगवान्को छातीसे लगा लिया और नकुल-सहदेवने उनके चरणोंमें प्रणाम किया (तब भगवान्ने भी उन दोनोंको छातीसे लगा लिया) ।। २०-२१ ।।
योजनार्धमथो गत्वा कृष्णः परपुरंजयः ।
युधिष्ठिरं समामन्त्र्य निवर्तस्वेति भारत ।। २२ ।।
भारत! शत्रुविजयी श्रीकृष्णने दो कोस दूर चले जानेपर युधिष्ठिरसे जानेकी अनुमति ले यह अनुरोध किया कि ‘अब आप लौट जाइये’ ।। २२ ।।
ततोऽभिवाद्य गोविन्दः पादौ जग्राह धर्मवित् ।
उत्थाप्य धर्मराजस्तु मूर्त्युपाघ्राय केशवम् ।। २३ ।।
पाण्डवो यादवश्रेष्ठं कृष्णं कमलोचनम् ।
गम्यतामित्यनुज्ञाप्य धर्मराजो युधिष्ठिरः ।। २४ ।।
तदनन्तर धर्मज्ञ गोविन्दने प्रणाम करके युधिष्ठिरके पैर पकड़ लिये। फिर पाण्डुकुमार धर्मराज युधिष्ठिरने यादवश्रेष्ठ कमलनयन केशवको दोनों हाथोंसे उठाकर उनका मस्तक सूँघा और ‘जाओ’ कहकर उन्हें जानेकी आज्ञा दी ।। २३-२४ ।।
ततस्तैः संविदं कृत्वा यथावन्मधुसूदनः ।
निवर्त्य च तथा कृच्छ्रात् पाण्डवान् सपदानुगान् ।। २५ ।।
स्वां पुरीं प्रययौ हृष्टो यथा शक्रोऽमरावतीम् ।
लोचनैरनुजग्मुस्ते तमादृष्टिपथात् तदा ॥ २६ ॥ तत्पश्चात् उनके साथ पुनः आनेका निश्चित वादा करके भगवान् मधुसूदनने पैदल आये हुए नागरिकों-सहित पाण्डवोंको बड़ी कठिनाईसे लौटाया और प्रसन्नतापूर्वक अपनी पुरी द्वारकाको गये, मानो इन्द्र अमरावतीको जा रहे हों। जबतक वे दिखायी दिये, तबतक पाण्डव अपने नेत्रोंद्वारा उनका अनुसरण करते रहे ॥ २५-२६ ॥ मनोभिरनुजग्मुस्ते कृष्णं प्रीतिसमन्वयात् । अतृप्तमनसामेव तेषां केशवदर्शने ॥ २७ ॥ क्षिप्रमन्तर्दधे शौरिश्चक्षुषां प्रियदर्शनः । अकामा एव पार्थास्ते गोविन्दगतमानसाः ॥ २८ ॥ अत्यन्त प्रेमके कारण उनका मन श्रीकृष्णके साथ ही चला गया। अभी केशवके दर्शनसे पाण्डवोंका मन तृप्त नहीं हुआ था, तभी नयनाभिराम भगवान् श्रीकृष्ण सहसा अदृश्य हो गये। पाण्डवोंकी श्रीकृष्णदर्शनविषयक कामना अधूरी ही रह गयी। उन सबका मन भगवान् गोविन्दके साथ ही चला गया ॥ २७-२८ ॥ निवृत्योपययुस्तूर्णं स्वं पुरं पुरुषर्षभाः । स्यन्दनेनाथ कृष्णोऽपि त्वरितं द्वारकामगात् ॥ २९ ॥ अब वे पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव मार्गसे लौटकर तुरंत अपने नगरकी ओर चल पड़े। उधर श्रीकृष्ण भी रथके द्वारा शीघ्र ही द्वारका जा पहुँचे ॥ २९ ॥ सात्वतेन च वीरेण पृष्ठतो यायिना तदा । दारुकेण च सूतेन सहितो देवकीसुतः । स गतो द्वारकां विष्णुर्गरुत्मवानिव वेगवान् ॥ ३० ॥ सात्वतवंशी वीर सात्यकि भगवान् श्रीकृष्णके पीछे बैठकर यात्रा कर रहे थे और सारथि दारुक आगे था। उन दोनोंके साथ देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण वेगशाली गरुड़की भाँति द्वारकामें पहुँच गये ॥ ३० ॥
वैशम्पायन उवाच
निवृत्य धर्मराजस्तु सह भ्रातृभिरच्युतः । सुहृत्परिवृतो राजा प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥ ३१ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर भाइयों-सहित मार्गसे लौटकर सुहृदोंके साथ अपने श्रेष्ठ नगरके भीतर प्रविष्ट हुए ॥ ३१ ॥ विसृज्य सुहृदः सर्वान् भ्रातृन् पुत्रांश्च धर्मराट् । मुमोद पुरुषव्याघ्रो द्रौपद्या सहितो नृप ॥ ३२ ॥