भारतकोश
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महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व

Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,256 पृष्ठ

मेरुके चारों ओर मण्डलाकार इलावृतवर्ष बसा हुआ है। मेरुके दक्षिण पार्श्वमें जम्बू नामका एक वृक्ष है, जो सदा फल और फूलोंसे भरा रहता है। सिद्ध और चारण उस वृक्षका सेवन करते हैं।

आस्वर्गमुच्छ्रिता राजन् तस्य शाखा वनस्पतेः ।
यस्य नाम्ना त्विदं द्वीपं जम्बूद्वीपमिति श्रुतम् ॥

राजन्! उक्त जम्बूवृक्षकी शाखा ऊँचाईमें स्वर्ग-लोकतक फैली हुई है। उसीके नामपर इस द्वीपको जम्बूद्वीप कहते हैं।

तां च जम्बू ददर्शार्थ सव्यसाची परंतपः ।
तौ दृष्ट्वाप्रतिमौ लोके जम्बू मेरुं च संस्थितौ ॥
प्रीतिमानभवद् राजन् सर्वतः स विलोकयन् ।
तत्र लेभे ततो जिष्णुः सिद्धैर्दिव्यैश्च चारणैः ॥
रत्नानि बहुसाहस्रं वस्त्राण्याभरणानि च ।
अन्यानि च महार्हाणि तत्र लब्ध्वार्जुनस्तदा ॥
आमन्त्रयित्वा तान् सर्वान् यज्ञमुद्दिश्य वै गुरोः ।
अथादाय बहून् रत्नान् गमनायोपचक्रमे ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले सव्यसाची अर्जुनने उस जम्बूवृक्षको देखा। जम्बू और मेरुगिरि दोनों ही इस जगत्में अनुपम हैं। उन्हें देखकर अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई। राजन्! वहाँ सब ओर दृष्टिपात करते हुए अर्जुनने सिद्धों और दिव्य चारणोंसे कई सहस्र रत्न, वस्त्र, आभूषण तथा अन्य बहुत-सी बहुमूल्य वस्तुएँ प्राप्त कीं। तदनन्तर उन सबसे विदा ले बड़े भाईके यज्ञके उद्देश्यसे बहुत-से रत्नोंका संग्रह करके वे वहाँसे जानेको उद्यत हुए।

मेरुं प्रदक्षिणं कृत्वा पर्वतप्रवरं प्रभुः ।
ययौ जम्बूनदीतीरे नदीं श्रेष्ठां विलोकयन् ॥
स तां मनोरमां दिव्यां जम्बूस्वादुरसावहाम् ।

पर्वतश्रेष्ठ मेरुको अपने दाहिने करके अर्जुन जम्बूनदीके तटपर गये। वे उस श्रेष्ठ सरिताकी शोभा देखना चाहते थे। वह मनोरम दिव्य नदी जलके रूपमें जम्बूवृक्षके फलोंका स्वादिष्ट रस बहाती थी ।।

हैमपक्षिगणैर्जुष्टां सौवर्णजलजाकुलाम् ॥
हैमपङ्कां हैमजलां शुभां सौवर्णवालुकाम् ।

सुनहरे पंखोंवाले पक्षी उसका सेवन करते थे। वह नदी सुवर्णमय कमलोंसे भरी हुई थी। उसकी कीचड़ भी स्वर्णमय थी। उसके जलसे भी सुवर्णमयी आभा छिटक रही थी। उस मंगलमयी नदीकी बालुका भी सुवर्णके चूर्ण-सी शोभा पाती थी।

क्वचित् सौवर्णपद्मैश्च संकुलां हेमपुष्पकैः ॥
क्वचित् सुपुष्पितैः कीर्णां सुवर्णकुमुदोत्पलैः ।

क्वचित् तीररुहैः कीर्णां हेमवृक्षैः सुपुष्पितैः ।।
कहीं-कहीं सुवर्णमय कमलों तथा स्वर्णमय पुष्पोंसे वह व्याप्त थी। कहीं सुन्दर खिले हुए सुवर्णमय कुमुद और उत्पल छाये हुए थे। कहीं उस नदीके तटपर सुन्दर फूलोंसे भरे हुए स्वर्णमय वृक्ष सब ओर फैले हुए थे।

तीर्थैश्च रुक्मसोपानैः सर्वतः संकुलां शुभाम् ।
विमलैर्मणिजालैश्च नृत्यगीतरवैर्युताम् ।।
उस सुन्दर सरिताके घाटोंपर सब ओर सोनेकी सीढ़ियाँ बनी हुई थीं। निर्मल मणियोंके समूह उसकी शोभा बढ़ाते थे। नृत्य और गीतके मधुर शब्द उस प्रदेशको मुखरित कर रहे थे।

दीप्तैर्हेमवितानैश्च समन्ताच्छोभितां शुभाम् ।
तथाविधां नदीं दृष्ट्वा पार्थस्तां प्रशशंस ह ।।
अदृष्टपूर्वां राजेन्द्र दृष्ट्वा हर्षमवाप च ।
उसके दोनों तटोंपर सुनहरे और चमकीले चँदोवे तने थे, जिनके कारण जम्बूनदीकी बड़ी शोभा हो रही थी। राजेन्द्र! ऐसी अदृष्टपूर्व नदीका दर्शन करके अर्जुनने उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और वे मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए।

दर्शनीयान् नदीतीरे पुरुषान् सुमनोहरान् ।।
तान् नदीसलिलाहारान् सदारानमरोपमान् ।
नित्यं सुखमुदा युक्तान् सर्वालंकारशोभितान् ।।
उस नदीके तटपर बहुत-से देवोपम पुरुष अपनी स्त्रियोंके साथ विचर रहे थे। उनका सौन्दर्य देखने ही योग्य था। वे सबके मनको मोह लेते थे। जम्बूनदीका जल ही उनका आहार था। वे सदा सुख और आनन्दमें निमग्न रहनेवाले तथा सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित थे।

तेभ्यो बहूनि रत्नानि तदा लेभे धनंजयः ।
दिव्यजाम्बूनदं हेमभूषणानि च पेशलम् ।।
लब्ध्वा तान् दुर्लभान् पार्थः प्रतीचीं प्रययौ दिशम् ।
उस समय अर्जुनने उनसे भी नाना प्रकारके रत्न प्राप्त किये। दिव्य जाम्बूनद नामक सुवर्ण और भाँति-भाँतिके आभूषण आदि दुर्लभ वस्तुएँ पाकर अर्जुन वहाँसे पश्चिम दिशाकी ओर चल दिये।

नागानां रक्षितं देशमजयच्चार्जुनस्ततः ।।
ततो गत्वा महाराज वारुणीं पाकशासनः ।
गन्धमादनमासाद्य तत्रस्थानजयत् प्रभुः ।।
तं गन्धमादनं राजन्नतिक्रम्य ततोऽर्जुनः ।
केतुमालं विवेशाथ वर्षं रत्नसमन्वितम् ।

सेवितं देवकल्पैश्च नारीभिः प्रियदर्शनैः ॥ उधर जाकर अर्जुनने नागोंद्वारा सुरक्षित प्रदेशपर विजय पायी। महाराज! वहाँसे और पश्चिम जाकर शक्तिशाली अर्जुन गन्धमादन पर्वतपर पहुँच गये और वहाँके रहनेवालोंको जीतकर अपने अधीन बना लिया। राजन्! इस प्रकार गन्धमादन पर्वतको लाँघकर अर्जुन रत्नोंसे सम्पन्न केतुमालवर्षमें गये, जो देवोपम पुरुषों और सुन्दरी स्त्रियोंकी निवासभूमि है। तं जित्वा चार्जुनो राजन् करे च विनिवेश्य च । आहृत्य तत्र रत्नानि दुर्लभानि तथार्जुनः ॥ पुनश्च परिवृत्याथ मध्यं देशमिलावृतम् । राजन्! उस वर्षको जीतकर अर्जुनने उसे कर देनेवाला बना दिया और वहाँसे दुर्लभ रत्न लेकर वे पुनः मध्यवर्ती इलावृतवर्षमें लौट आये। गत्वा प्राचीं दिशं राजन् सव्यसाची परंतपः ॥ मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् । ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते ॥ खशाञ्झषांश्च नद्योतान् प्रघसान् दीर्घवेणिकान् । पशूपांश्च कुलिन्दांश्च तङ्गणान् परतङ्गणान् ॥ रत्नान्यादाय सर्वेभ्यो माल्यवन्तं ततो ययौ । तं माल्यवन्तं शैलेन्द्रं समतिक्रम्य पाण्डवः ॥ भद्राश्वं प्रविवेशाथ वर्षं स्वर्गोपमं शुभम् । तदनन्तर शत्रुदमन सव्यसाची अर्जुनने पूर्व दिशामें प्रस्थान किया। मेरु और मन्दराचलके बीच शैलोदा नदीके दोनों तटोंपर जो लोग कीचक और वेणु नामक बाँसोंकी रमणीय छायाका आश्रय लेकर रहते हैं, उन खश, झष, नद्योत, प्रघस, दीर्घवेणिक, पशुप, कुलिन्द, तंगण तथा परतंगण आदि जातियोंको हराकर उन सबसे रत्नोंकी भेंट ले अर्जुन माल्यवान् पर्वतपर गये। तत्पश्चात् गिरिराज माल्यवान्को भी लाँघकर उन पाण्डुकुमारने भद्राश्ववर्षमें प्रवेश किया, जो स्वर्गके समान सुन्दर है। तत्रामरोपमान् रम्यान् पुरुषान् सुखसंयुतान् ॥ जित्वा तान् स्ववशे कृत्वा करे च विनिवेश्य च । आहृत्य सर्वरत्नानि असंख्यानि ततस्ततः ॥ नीलं नाम गिरिं गत्वा तत्रस्थानजयत् प्रभुः । उस देशमें देवताओंके समान सुन्दर और सुखी पुरुष निवास करते थे। अर्जुनने उन सबको जीतकर अपने अधीन कर लिया और उनपर कर लगा दिया। इस प्रकार इधर-उधरसे असंख्य रत्नोंका संग्रह करके शक्तिशाली अर्जुनने नीलगिरिकी यात्रा की और वहाँके निवासियोंको पराजित किया। ततो जिष्णुरतिक्रम्य पर्वतं नीलमायतम् ॥

विवेश रम्यकं वर्षं संकीर्णं मिथुनैः शुभैः । तं देशमथ जित्वा च करे च विनिवेश्य च ॥ अजयच्चापि बीभत्सुर्देशं गुह्यकरक्षितम् । तत्र लेभे च राजेन्द्र सौवर्णान् मृगपक्षिणः ॥ अगृह्णाद् यज्ञभूत्यर्थं रमणीयान् मनोरमान् । तदनन्तर विशाल नीलगिरिको भी लाँघकर सुन्दर नर-नारियोंसे भरे हुए रम्यकवर्षमें उन्होंने प्रवेश किया। उस देशको भी जीतकर अर्जुनने वहाँके निवासियोंपर कर लगा दिया। तत्पश्चात् गुह्यकोंद्वारा सुरक्षित प्रदेशको जीतकर अपने अधिकारमें कर लिया। राजेन्द्र! वहाँ उन्हें सोनेके मृग और पक्षी उपलब्ध हुए, जो देखनेमें बड़े ही रमणीय और मनोरम थे। उन्होंने यज्ञ-वैभवकी समृद्धिके लिये उन मृगों और पक्षियोंको ग्रहण कर लिया।

अन्यानि लब्ध्वा रत्नानि पाण्डवोऽथ महाबलः ॥ गन्धर्वरक्षितं देशमजयत् सगणं तदा । तत्र रत्नानि दिव्यानि लब्ध्वा राजन्नथार्जुनः ॥ श्वेतपर्वतमासाद्य जित्वा पर्वतवासिनः । स श्वेतं पर्वतं राजन् समतिक्रम्य पाण्डवः ॥ वर्षं हिरण्यकं नाम विवेशाथ महीपते । तदनन्तर महाबली पाण्डुनन्दन अन्य बहुत-से रत्न लेकर गन्धर्वोंद्वारा सुरक्षित प्रदेशमें गये और गन्धर्वगणोंसहित उस देशपर अधिकार जमा लिया। राजन्! वहाँ भी अर्जुनको बहुत-से दिव्य रत्न प्राप्त हुए। तदनन्तर उन्होंने श्वेत पर्वतपर जाकर वहाँके निवासियोंको जीता। फिर उस पर्वतको लाँघकर पाण्डुकुमार अर्जुनने हिरण्यकवर्षमें प्रवेश किया।

स तु देशेषु रम्येषु गन्तुं तत्रोपचक्रमे ॥ मध्ये प्रासादवृन्देषु नक्षत्राणां शशी यथा । महाराज! वहाँ पहुँचकर वे उस देशके रमणीय प्रदेशोंमें विचरने लगे। बड़े-बड़े महलोंकी पंक्तियोंमें भ्रमण करते हुए श्वेताश्व अर्जुन नक्षत्रोंके बीच चन्द्रमाके समान सुशोभित होते थे।

महापथेषु राजेन्द्र सर्वतो यान्तमर्जुनम् ॥ प्रासादवरशृङ्गस्थाः परया वीर्यशोभया । ददृशुस्ताः स्त्रियः सर्वाः पार्थमात्मयशस्करम् ॥ तं कलापधरं शूरं सरथं सानुगं प्रभुम् । सवर्मसुकिरीटं वै संनद्धं सपरिच्छदम् ॥ सुकुमारं महासत्त्वं तेजोराशिमनुत्तमम् । शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम् ॥ पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र शक्तिपाणिं स्म मेनिरे ।

राजेन्द्र! जब अर्जुन उत्तम बल और शोभासे सम्पन्न हो हिरण्यकवर्षकी विशाल सड़कोंपर चलते थे, उस समय प्रासादशिखरोंपर खड़ी हुई वहाँकी सुन्दरी स्त्रियाँ उनका दर्शन करती थीं। कुन्तीनन्दन अर्जुन अपने यशको बढ़ानेवाले थे। उन्होंने आभूषण धारण कर रखा था। वे शूरवीर, रथयुक्त, सेवकोंसे सम्पन्न और शक्तिशाली थे। उनके अंगोंमें कवच और मस्तकपर सुन्दर किरीट शोभा दे रहा था। वे कमर कसकर युद्धके लिये तैयार थे और सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री उनके साथ थी। वे सुकुमार, अत्यन्त धैर्यवान्, तेजके पुंज, परम उत्तम, इन्द्र-तुल्य पराक्रमी, शत्रुहन्ता तथा शत्रुओंके गजराजोंकी गतिको रोक देनेवाले थे। उन्हें देखकर वहाँकी स्त्रियोंने यही अनुमान लगाया कि इस वीर पुरुषके रूपमें साक्षात् शक्तिधारी कार्तिकेय पधारे हैं।

अयं स पुरुषव्याघ्रो रणेऽद्भुतपराक्रमः ।।
अस्य बाहुबलं प्राप्य न भवन्त्यसुहृद्गणाः ।
वे आपसमें इस प्रकार बातें करने लगीं—'सखियो! ये जो पुरुषसिंह दिखायी दे रहे हैं, संग्राममें इनका पराक्रम अद्भुत है। इनके बाहुबलका आक्रमण होनेपर शत्रुओंके समुदाय अपना अस्तित्व खो बैठते हैं।'

इति वाचो ब्रुवन्त्यस्ताः स्त्रियः प्रेम्णा धनंजयम् ।।
तुष्टुवुः पुष्पवृष्टिं च ससृजुस्तस्य मूर्धनि ।
इस प्रकारकी बातें करती हुई स्त्रियाँ बड़े प्रेमसे अर्जुनकी ओर देखकर उनके गुण गातीं और उनके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा करती थीं।

दृष्ट्वा ते तु मुदा युक्ताः कौतूहलसमन्विताः ।।
रत्नैर्विभूषणैश्चैव अभ्यवर्षन्त पाण्डवम् ।
वहाँके सभी निवासी बड़ी प्रसन्नताके साथ कौतूहलवश उन्हें देखते और उनके निकट रत्नों तथा आभूषणोंकी वर्षा करते थे।

अथ जित्वा समस्तांस्तान् करे च विनिवेश्य च ।।
मणिहेमप्रवालानि रत्नान्याभरणानि च ।
एतानि लब्ध्वा पार्थोऽपि शृङ्गवन्तं गिरिं ययौ ।।
शृङ्गवन्तं च कौन्तेयः समतिक्रम्य फाल्गुनः ।।)
उत्तरं कुरुवर्षं तु स समासाद्य पाण्डवः ।
इयेष जेतुं तं देशं पाकशासननन्दनः ।। ७ ।।
उन सबको जीतकर तथा उनके ऊपर कर लगाकर वहाँसे मणि, सुवर्ण, मूँगे, रत्न तथा आभूषण ले अर्जुन शृंगवान् पर्वतपर चले गये। वहाँसे आगे बढ़कर पाकशासनपुत्र पाण्डव अर्जुनने उत्तर कुरुवर्षमें पहुँचकर उस देशको जीतनेका विचार किया ।। ७ ।।

तत एनं महावीर्यं महाकाया महाबलाः ।
द्वारपालाः समासाद्य हृष्टा वचनमब्रुवन् ।। ८ ।।

इतनेहीमें महापराक्रमी अर्जुनके पास बहुत-से विशालकाय महाबली द्वारपाल आ पहुँचे और प्रसन्नतापूर्वक बोले— ।। ८ ।।

पार्थ नेदं त्वया शक्यं पुरं जेतुं कथंचन । उपावर्तस्व कल्याण पर्याप्तमिदमच्युत ।। ९ ।। इदं पुरं यः प्रविशेद् ध्रुवं न स भवेन्नरः । प्रीयामहे त्वया वीर पर्याप्तो विजयस्तव ।। १० ।। ‘पार्थ! इस नगरको तुम किसी तरह जीत नहीं सकते। कल्याणस्वरूप अर्जुन! यहाँसे लौट जाओ। अच्युत! तुम यहाँतक आ गये, यही बहुत हुआ। जो मनुष्य इस नगरमें प्रवेश करता है, निश्चय ही उसकी मृत्यु हो जाती है। वीर! हम तुमसे बहुत प्रसन्न हैं। यहाँतक आ पहुँचना ही तुम्हारी बहुत बड़ी विजय है ।। ९-१० ।।

न चात्र किंचिज्जेतव्यमर्जुनात्र प्रदृश्यते । उत्तराः कुरवो ह्येते नात्र युद्धं प्रवर्तते ।। ११ ।। प्रविष्टोऽपि हि कौन्तेय नेह द्रक्ष्यसि किंचन । न हि मानुषदेहेन शक्यमत्राभिवीक्षितुम् ।। १२ ।। ‘अर्जुन! यहाँ कोई जीतनेयोग्य वस्तु नहीं दिखायी देती। यह उत्तर कुरुदेश है। यहाँ युद्ध नहीं होता है। कुन्तीकुमार! इसके भीतर प्रवेश करके भी तुम यहाँ कुछ देख नहीं सकोगे, क्योंकि मानव-शरीरसे यहाँकी कोई वस्तु देखी नहीं जा सकती ।। ११-१२ ।।

अथेह पुरुषव्याघ्र किंचिदन्यच्चिकीर्षसि । तत् प्रब्रूहि करिष्यामो वचनात् तव भारत ।। १३ ।। ‘भरतकुलभूषण पुरुषसिंह! यदि यहाँ तुम युद्धके सिवा और कोई काम करना चाहते हो तो बताओ, तुम्हारे कहनेसे हम स्वयं ही उस कार्यको पूर्ण कर देंगे’ ।। १३ ।।

ततस्तानब्रवीद् राजन्नर्जुनः प्रहसन्निव । पार्थिवत्वं चिकीर्षामि धर्मराजस्य धीमतः ।। १४ ।। राजन्! तब अर्जुनने उनसे हँसते हुए कहा—‘मैं अपने भाई बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरको समस्त भूमण्डलका एकमात्र चक्रवर्ती सम्राट् बनाना चाहता हूँ ।। १४ ।।

न प्रवेक्ष्यामि वो देशं विरुद्धं यदि मानुषैः । युधिष्ठिराय यत् किंचित् करपण्यं प्रदीयताम् ।। १५ ।। ‘आपलोगोंका देश यदि मनुष्योंके विपरीत पड़ता है तो मैं इसमें प्रवेश नहीं करूँगा। महाराज युधिष्ठिरके लिये करके रूपमें कुछ धन दीजिये’ ।। १५ ।।

ततो दिव्यानि वस्त्राणि दिव्यान्‍याभरणानि च । क्षौमाजिनानि दिव्यानि तस्य ते प्रददुः करम् ।। १६ ।। तब उन द्वारपालोंने अर्जुनको करके रूपमें बहुत-से दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण तथा दिव्य रेशमी वस्त्र एवं मृगचर्म दिये ।। १६ ।।

एवं स पुरुषव्याघ्रो विजित्य दिशमुत्तराम् । संग्रामान् सुबहून् कृत्वा क्षत्रियैर्दस्युभिस्तथा ॥ १७ ॥ स विनिर्जित्य राज्ञस्तान् करे च विनिवेश्य तु । धनान्यादाय सर्वेभ्यो रत्नानि विविधानि च ॥ १८ ॥ हयांस्तित्तिरिकल्माषाञ्छुकपत्रनिभानपि । मयूरसदृशानन्यान सर्वाननिलरंहसः ॥ १९ ॥ वृतः सुमहता राजन् बलेन चतुरङ्गिणाः । आजगाम पुनर्वीरः शक्रप्रस्थं पुरोत्तमम् ॥ २० ॥ इस प्रकार पुरुषसिंह अर्जुनने क्षत्रिय राजाओं तथा लुटेरोंके साथ बहुत-सी लड़ाइयाँ लड़ीं और उत्तर दिशापर विजय प्राप्त की। राजाओंको जीतकर उनसे कर लेते और उन्हें फिर अपने राज्यपर ही स्थापित कर देते थे। राजन्! वे वीर अर्जुन सबसे धन और भाँति-भाँतिके रत्न लेकर तथा भेंटमें मिले हुए वायुके समान वेगवाले तित्तिर,* कल्माष, सुग्गापंखी एवं मोर-सदृश सभी घोड़ोंको साथ लिये और विशाल चतुरंगिणी सेनासे घिरे हुए फिर अपने उत्तम नगर इन्द्रप्रस्थमें लौट आये ॥ १७—२० ॥

धर्मराजाय तत् पार्थो धनं सर्वं सवाहनम् । न्यवेदयदनुज्ञातस्तेन राज्ञा गृहान् ययौ ॥ २१ ॥ पार्थने घोड़ोंसहित वह सारा धन धर्मराजको सौंप दिया और उनकी आज्ञा लेकर वे महलमें चले गये ॥ २१ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि अर्जुनोत्तरदिग्विजयो
अष्टाविंशोऽध्यायः ॥ २८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें अर्जुनकी उत्तर दिशापर विजयविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५८ श्लोक मिलाकर कुल ७९ श्लोक हैं)


* तीतरके समान चितकबरे रंगवाले।

अध्याय (पृष्ठ 1802)

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एकोनत्रिंशोऽध्यायः

भीमसेनका पूर्व दिशाको जीतनेके लिये प्रस्थान और विभिन्न देशोंपर विजय पाना

वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु भीमसेनोऽपि वीर्यवान् ।
धर्मराजमनुप्राप्य ययौ प्राचीं दिशं प्रति ॥ १ ॥
महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना ।
हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् ॥ २ ॥
वृतो भरतशार्दूलो द्विषच्छोकविवर्द्धनः ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले ॥ १-२ ½ ॥

स गत्वा नरशार्दूलः पञ्चालानां पुरं महत् ॥ ३ ॥
पञ्चालान् विविधोपायैः सान्त्वयामास पाण्डवः ।
नरश्रेष्ठ भीमसेनने पहले पांचालोंकी महानगरी अहिच्छत्रामें जाकर भाँति-भाँतिके उपायोंसे पांचाल वीरोंको समझा-बुझाकर वशमें किया ॥ ३ ½ ॥

ततः स गण्डकाञ्छूरो विदेहान् भरतर्षभः ॥ ४ ॥
विजित्याल्पेन कालेन दशार्णानजयत् प्रभुः ।
तत्र दाशार्णको राजा सुधर्मा लोमहर्षणम् ।
कृतवान् भीमसेनेन महद् युद्धं निरायुधम् ॥ ५ ॥
वहाँसे आगे जाकर उन भरतवंशशिरोमणि शूर-वीर भीमने गण्डक (गण्डकी नदीके तटवर्ती) और विदेह (मिथिला) देशोंको थोड़े ही समयमें जीतकर दशार्ण देशको भी अपने अधिकारमें कर लिया। वहाँ दशार्णनरेश सुधर्माने भीमसेनके साथ बिना अस्त्र-शस्त्रके ही महान् युद्ध किया। उन दोनोंका वह मल्लयुद्ध रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ॥ ४-५ ॥

भीमसेनस्तु तद् दृष्ट्वा तस्य कर्म महात्मनः ।
अधिसेनापतिं चक्रे सुधर्माणं महाबलम् ॥ ६ ॥
भीमसेनने उस महामना राजाका यह अद्भुत पराक्रम देखकर महाबली सुधर्माको अपना प्रधान सेनापति बना दिया ॥ ६ ॥

ततः प्राचीं दिशं भीमो ययौ भीमपराक्रमः ।

सैन्येन महता राजन् कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ ७ ॥ राजन्! इसके बाद भयानक पराक्रमी भीमसेन पुनः विशाल सेनाके साथ पृथ्वीको कँपाते हुए पूर्व दिशाकी ओर बढ़े ॥ ७ ॥ सोऽश्वमेधेश्वरं राजन् रोचमानं सहानुगम् । जिगाय समरे वीरो बलेन बलिनां वरः ॥ ८ ॥ जनमेजय! बलवानोंमें श्रेष्ठ वीरवर भीमने अश्वमेध-देशके राजा रोचमानको उनके सेवकोंसहित बलपूर्वक जीत लिया ॥ ८ ॥ स तं निर्जित्य कौन्तेयो नातितीव्रेण कर्मणा । पूर्वदेशं महावीर्यो विजिग्ये कुरुनन्दनः ॥ ९ ॥ उन्हें हराकर महापराक्रमी कुरुनन्दन कुन्तीकुमार भीमने कोमल बर्तावके द्वारा ही पूर्वदेशपर विजय प्राप्त कर ली ॥ ९ ॥ ततो दक्षिणमागम्य पुलिन्दनगरं महत् । सुकुमारं वशे चक्रे सुमित्रं च नराधिपम् ॥ १० ॥ तदनन्तर दक्षिण आकर पुलिन्दोंके महान् नगर सुकुमार और वहाँके राजा सुमित्रको अपने अधीन कर लिया ॥ १० ॥ ततस्तु धर्मराजस्य शासनाद् भरतर्षभः । शिशुपालं महावीर्यमभ्यगाज्जनमेजय ॥ ११ ॥ जनमेजय! तत्पश्चात् भरतश्रेष्ठ भीम धर्मराजकी आज्ञासे महापराक्रमी शिशुपालके यहाँ गये ॥ ११ ॥ चेदिराजोऽपि तच्छ्रुत्वा पाण्डवस्य चिकीर्षितम् । उपनिष्क्रम्य नगरात् प्रत्यगृह्णात् परंतप ॥ १२ ॥ परंतप! चेदिराज शिशुपालने भी पाण्डुकुमार भीमका अभिप्राय जानकर नगरसे बाहर आ स्वागत-सत्कारके साथ उन्हें अपनाया ॥ १२ ॥ तौ समेत्य महाराज कुरुचेदिवृषौ तदा । उभयोरात्मकुलयोः कौशल्यं पर्यपृच्छताम् ॥ १३ ॥ महाराज! कुरुकुल और चेदिकुलके वे श्रेष्ठ पुरुष परस्पर मिलकर दोनोंने दोनों कुलोंके कुशल-प्रश्न पूछे ॥ १३ ॥ ततो निवेद्य तद् राष्ट्रं चेदिराजो विशाम्पते । उवाच भीमं प्रहसन् किमिदं कुरुषेऽनघ ॥ १४ ॥ राजन्! तदनन्तर चेदिराजने अपना राष्ट्र भीमसेनको सौंपकर हँसते हुए पूछा—'अनघ! यह क्या करते हो?' ॥ १४ ॥ तस्य भीमस्तदाऽऽचख्यौ धर्मराजचिकीर्षितम् । स च तं प्रतिगृह्यैव तथा चक्रे नराधिपः ॥ १५ ॥

तब भीमने उससे धर्मराज जो कुछ करना चाहते थे, वह सब कह सुनाया। तदनन्तर राजा शिशुपालने उनकी बात मानकर कर देना स्वीकार कर लिया ॥ १५ ॥
ततो भीमस्तत्र राजन्नुषित्वा त्रिदश क्षपाः ।
सत्कृतः शिशुपालेन ययौ सबलवाहनः ॥ १६ ॥
राजन्! उसके बाद शिशुपालसे सम्मानित हो भीमसेन अपनी सेना और सवारियोंके साथ तेरह दिन वहाँ रह गये। तत्पश्चात् वहाँसे विदा हुए ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि भीमदिग्विजये एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें भीमदिग्विजयविषयक उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1805)

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त्रिंशोऽध्यायः

भीमका पूर्व दिशाके अनेक देशों तथा राजाओंको जीतकर भारी धन-सम्पत्तिके साथ इन्द्रप्रस्थमें लौटना

वैशम्पायन उवाच

ततः कुमारविषये श्रेणिमन्तमथाजयत् ।
कोसलाधिपतिं चैव बृहद्वलमरिंदमः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर शत्रुओंका दमन करनेवाले भीमसेनने कुमारदेशके राजा श्रेणिमान् तथा कोसलराज बृहद्वलको परास्त किया ॥ १ ॥

अयोध्यायां तु धर्मज्ञं दीर्घयज्ञं महाबलम् ।
अजयत् पाण्डवश्रेष्ठो नातितीव्रेण कर्मणा ॥ २ ॥
इसके बाद अयोध्याके धर्मज्ञ नरेश महाबली दीर्घयज्ञको पाण्डवश्रेष्ठ भीमने कोमलतापूर्ण बर्तावसे वशमें कर लिया ॥ २ ॥

ततो गोपालकक्षं च सोत्तरानपि कोसलान् ।
मल्लानामधिपं चैव पार्थिवं चाजयत् प्रभुः ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् शक्तिशाली पाण्डुकुमारने गोपालकक्ष और उत्तर कोसल देशको जीतकर मल्लराष्ट्रके अधिपति पार्थिवको अपने अधीन कर लिया ॥ ३ ॥

ततो हिमवतः पार्श्वं समभ्येत्य जलोद्भवम् ।
सर्वमल्पेन कालेन देशं चक्रे वशं बली ॥ ४ ॥
इसके बाद हिमालयके पास जाकर बलवान् भीमने सारे जलोद्भव देशपर थोड़े ही समयमें अधिकार प्राप्त कर लिया ॥ ४ ॥

एवं बहुविधान् देशान् विजिग्ये भरतर्षभः ।
भल्लाटमभितो जिग्ये शुक्तिमन्तं च पर्वतम् ॥ ५ ॥
इस प्रकार भरतवंशभूषण भीमसेनने अनेक देश जीते और भल्लाटके समीपवर्ती देशों तथा शुक्तिमान् पर्वतपर भी विजय प्राप्त की ॥ ५ ॥

पाण्डवः सुमहावीर्यो बलेन बलिनां वरः ।
स काशिराजं समरे सुबाहुमनिवर्तिनम् ॥ ६ ॥
वशे चक्रे महाबाहुर्भीमो भीमपराक्रमः ।
बलवानोंमें श्रेष्ठ महापराक्रमी तथा भयंकर पुरुषार्थ प्रकट करनेवाले पाण्डुकुमार महाबाहु भीमसेनने समरमें पीठ न दिखानेवाले काशिराज सुबाहुको बलपूर्वक हराया ॥ ६ ॥

३ ॥

ततः सुपार्श्वमभितस्तथा राजपतिं क्रथम् ।। ७ ।। युध्यमानं बलात् संख्ये विजिग्ये पाण्डवर्षभः । इसके बाद पाण्डुपुत्र भीमने सुपार्श्वके निकट राजराजेश्वर क्रथको, जो युद्धमें बलपूर्वक उनका सामना कर रहे थे, हरा दिया ।। ७ १/२ ।।

ततो मत्स्यान् महातेजा मलदांश्च महाबलान् ।। ८ ।। अनघानभयांश्चैव पशुभूमिं च सर्वशः । निवृत्य च महाबाहुर्मदधारं महीधरम् ।। ९ ।। सोमधेयांश्च निर्जित्य प्रयायावुत्तरामुखः । वत्सभूमिं च कौन्तेयो विजिग्ये बलवान् बलात् ।। १० ।। तत्पश्चात् महातेजस्वी कुन्तीकुमारने मत्स्य, महाबली मलद, अनघ और अभय नामक देशोंको जीतकर पशुभूमि (पशुपतिनाथके निकटवर्ती स्थान—नेपाल)-को भी सब ओरसे जीत लिया। वहाँसे लौटकर महाबाहु भीमने मदधार पर्वत और सोमधेयनिवासियों-को परास्त किया। इसके बाद बलवान् भीमने उत्तराभिमुख यात्रा की और वत्सभूमिपर बलपूर्वक अधिकार जमा लिया ।। ८—१० ।।

भर्गाणामधिपं चैव निषादाधिपतिं तथा । विजिग्ये भूमिपालांश्च मणिमत्प्रमुखान् बहून् ।। ११ ।। ततो दक्षिणमल्लांश्च भोगवन्तं च पर्वतम् । तरसैवाजयद् भीमो नातितीव्रेण कर्मणा ।। १२ ।। फिर क्रमशः भर्गोंके स्वामी, निषादोंके अधिपति तथा मणिमान् आदि बहुत-से भूपालोंको अपने अधिकारमें कर लिया। तदनन्तर दक्षिण मल्लदेश तथा भोगवान् पर्वतको भीमसेनने अधिक प्रयास किये बिना ही वेगपूर्वक जीत लिया ।। ११-१२ ।।

शर्मकान् वर्मकांश्चैव व्यजयत् सान्त्वपूर्वकम् । वैदेहकं च राजानं जनकं जगतीपतिम् ।। १३ ।। विजिग्ये पुरुषव्याघ्रो नातितीव्रेण कर्मणा । शकांश्च बर्बरांश्चैव अजयच्छद्मपूर्वकम् ।। १४ ।। शर्मक और वर्मकोंको उन्होंने समझा-बुझाकर ही जीत लिया। विदेह देशके राजा जनकको भी पुरुषसिंह भीमने अधिक उग्र प्रयास किये बिना ही परास्त किया। फिर शकों और बर्बरोंपर छलसे विजय प्राप्त कर ली ।। १३-१४ ।।

वैदेहस्थस्तु कौन्तेय इन्द्रपर्वतमन्तिकात् । किरातानामधिपतीनजयत् सप्त पाण्डवः ।। १५ ।। ततः सुह्यान् प्रसुह्यांश्च सपक्षानतिवीर्यवान् । विजित्य युधि कौन्तेयो मागधानभ्यधाद् बली ।। १६ ।।

विदेह देशमें ही ठहरकर कुन्तीकुमार भीमने इन्द्रपर्वतके निकटवर्ती सात किरातराजोंको जीत लिया। इसके बाद सुह्म और प्रसुह्म देशके राजाओंको, जिनके पक्षमें बहुत लोग थे, अत्यन्त पराक्रमी और बलवान् कुन्तीकुमार भीम युद्धमें परास्त करके मगधदेशको चल दिये ।। १५-१६ ।।

दण्डं च दण्डधारं च विजित्य पृथिवीपतीन् ।
तैरेव सहितैः सर्वैर्गिरिव्रजमुपाद्रवत् ।। १७ ।।
मार्गमें दण्ड-दण्डधार तथा अन्य राजाओंको जीतकर उन सबके साथ वे गिरिव्रज नगरमें आये ।। १७ ।।

जारासंधिं सान्त्वयित्वा करे च विनिवेश्य ह ।
तैरेव सहितैः सर्वैः कर्णमभ्यद्रवद् बली ।। १८ ।।
स कम्पयन्निव महीं बलेन चतुरङ्गिणा ।
युयुधे पाण्डवश्रेष्ठः कर्णेनामित्रघातिना ।। १९ ।।
स कर्णं युधि निर्जित्य वशे कृत्वा च भारत ।
ततो विजिग्ये बलवान् राज्ञः पर्वतवासिनः ।। २० ।।
अथ मोदागिरौ चैव राजानं बलवत्तरम् ।
पाण्डवो बाहुवीर्येण निजघान महामृधे ।। २१ ।।
वहाँ जरासंधकुमार सहदेवको सान्त्वना देकर उसे कर देनेकी शर्तपर उसी राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया और उन सबके साथ बलवान् भीमने कर्णपर चढ़ाई की। पाण्डवश्रेष्ठ भीमने पृथ्वीको कम्पित-सी करते हुए चतुरंगिणी सेना साथ ले शत्रुघाती कर्णके साथ युद्ध छेड़ दिया। भारत! उस युद्धमें कर्णको परास्त करके अपने वशमें कर लेनेके पश्चात् बलवान् भीमने पर्वतीय राजाओंपर विजय प्राप्त की। तदनन्तर पाण्डुनन्दन भीमसेनने मोदागिरिके अत्यन्त बलिष्ठ राजाको अपनी भुजाओंके बलसे महासमरमें मार गिराया ।। १८—२१ ।।

ततः पुण्ड्राधिपं वीरं वासुदेवं महाबलम् ।
कौशिकीकच्छनिलयं राजानं च महौजसम् ।। २२ ।।
उभौ बलभृतौ वीरावुभौ तीव्रपराक्रमौ ।
निर्जित्याजौ महाराज वङ्गराजमुपाद्रवत् ।। २३ ।।
महाराज! तत्पश्चात् भीमसेन पुण्ड्रकदेशके अधिपति महाबली वीर राजा वासुदेवके साथ, जो कोसी नदीके कछारमें रहनेवाले तथा महान् तेजस्वी थे, जा भिड़े। वे दोनों ही बलवान् एवं दुःसह पराक्रमवाले वीर थे। भीमने विपक्षी वासुदेव (पौण्ड्रक)-को युद्धमें हराकर वंगदेशके राजापर आक्रमण किया ।। २२-२३ ।।

समुद्रसेनं निर्जित्य चन्द्रसेनं च पार्थिवम् ।
ताम्रलिप्तं च राजानं कर्वटाधिपतिं तथा ।। २४ ।।
सुह्मानामधिपं चैव ये च सागरवासिनः ।

सर्वान् म्लेच्छगणांश्चैव विजिग्ये भरतर्षभः ॥ २५ ॥
तदनन्तर भरतश्रेष्ठ भीमसेनने समुद्रसेन, भूपाल चन्द्रसेन, राजा ताम्रलिप्त, कर्वटाधिपति तथा सुह्मनरेशको जीतकर समुद्रके तटपर निवास करनेवाले समस्त म्लेच्छोंको भी अपने अधीन कर लिया ॥ २४-२५ ॥
एवं बहुविधान् देशान् विजित्य पवनात्मजः ।
वसु तेभ्य उपादाय लौहित्यमगमद् बली ॥ २६ ॥
इस प्रकार पवनपुत्र बलवान् भीमने बहुत-से देशोंपर अधिकार प्राप्त करके उन सबसे धन लेकर लौहित्य देशकी यात्रा की ॥ २६ ॥
स सर्वान् म्लेच्छनृपतीन् सागरानूपवासिनः ।
करमाहारयामास रत्नानि विविधानि च ॥ २७ ॥
वहाँ उन्होंने समुद्रके टापुओंमें रहनेवाले बहुत-से म्लेच्छ राजाओंको जीतकर उनसे करके रूपमें भाँति-भाँतिके रत्न वसूल किये ॥ २७ ॥
चन्दनागुरुवस्त्राणि मणिमौक्तिककम्बलम् ।
काञ्चनं रजतं चैव विद्रुमं च महाधनम् ॥ २८ ॥
ते कोटिशतसंख्येन कौन्तेयं महता तदा ।
अभ्यवर्षन् महात्मानं धनवर्षेण पाण्डवम् ॥ २९ ॥
इतना ही नहीं, उन राजाओंने भीमसेनको चन्दन, अगुरु, वस्त्र, मणि, मोती, कम्बल, सोना, चाँदी और बहुमूल्य मूँगे भेंट किये। कुन्ती और पाण्डुके पुत्र महात्मा भीमसेनके पास उन्होंने करोड़की संख्यामें धन-रत्नोंकी वर्षा की (करके रूपमें धन-रत्न प्रदान किये) ॥ २८-२९ ॥

इन्द्रप्रस्थमुपागम्य भीमो भीमपराक्रमः । निवेदयामास तदा धर्मराजाय तद् धनम् ॥ ३० ॥

तदनन्तर भयानक पराक्रमी भीमने इन्द्रप्रस्थमें आकर वह सारा धन धर्मराजको सौंप दिया ।। ३० ।।

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि भीमप्राचीदिग्विजये त्रिंशोऽध्यायः ।। ३० ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत दिग्विजयपर्वमें भीमके द्वारा पूर्व दिशाकी विजयसे सम्बन्ध रखनेवाला तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३० ।।

अध्याय (पृष्ठ 1810)

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एकत्रिंशोऽध्यायः

सहदेवके द्वारा दक्षिण दिशाकी विजय

वैशम्पायन उवाच

तथैव सहदेवोऽपि धर्मराजेन पूजितः ।
महत्या सेनया राजन् प्रययौ दक्षिणां दिशम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! सहदेव भी धर्मराज युधिष्ठिरसे सम्मानित हो दक्षिण दिशापर विजय पानेके लिये विशाल सेनाके साथ प्रस्थित हुए ॥ १ ॥

स शूरसेनान् कात्स्न्र्येन पूर्वमेवाजयत् प्रभुः ।
मत्स्यराजं च कौरव्यो वशे चक्रे बलाद् बली ॥ २ ॥
शक्तिशाली सहदेवने सबसे पहले समस्त शूरसेननिवासियोंको पूर्णरूपसे जीत लिया; फिर मत्स्यराज विराटको अपने अधीन बनाया ॥ २ ॥

अधिराजाधिपं चैव दन्तवक्रं महाबलम् ।
जिगाय करदं चैव कृत्वा राज्ये न्यवेशयत् ॥ ३ ॥
राजाओंके अधिपति महाबली दन्तवक्रको भी परास्त किया और उसे कर देनेवाला बनाकर फिर उसी राज्यपर प्रतिष्ठित कर दिया ॥ ३ ॥

सुकुमारं वशे चक्रे सुमित्रं च नराधिपम् ।
तथैवापरमत्स्यांश्च व्यजयत् स पटच्चरान् ॥ ४ ॥
निषादभूमिं गोशृङ्गं पर्वतप्रवरं तथा ।
तरसैवाजयद् धीमान् श्रेणिमन्तं च पार्थिवम् ॥ ५ ॥
इसके बाद राजा सुकुमार तथा सुमित्रको वशमें किया। इसी प्रकार अपर मत्स्यों और लुटेरोंपर भी विजय प्राप्त की। तदनन्तर निषाददेश तथा पर्वतप्रवर गोशृंगको जीतकर बुद्धिमान् सहदेवने राजा श्रेणिमान्‌को वेगपूर्वक परास्त किया ॥ ४-५ ॥

नरराष्ट्रं च निर्जित्य कुन्तिभोजमुपाद्रवत् ।
प्रीतिपूर्वं च तस्यासौ प्रतिजग्राह शासनम् ॥ ६ ॥
फिर नरराष्ट्रको जीतकर राजा कुन्तिभोजपर धावा किया। परंतु कुन्तिभोजने प्रसन्नताके साथ ही उसका शासन स्वीकार कर लिया ॥ ६ ॥

ततश्चर्मणवतीकूले जम्भकस्यात्मजं नृपम् ।
ददर्श वासुदेवेन शेषितं पूर्ववैरिणा ॥ ७ ॥
इसके बाद चर्मण्वतीके तटपर सहदेवने जम्भकके पुत्रको देखा, जिसे पूर्ववैरी वासुदेवने जीवित छोड़ दिया था ॥ ७ ॥

चक्रे तेन स संग्रामं सहदेवेन भारत ।

स तमाजौ विनिर्जित्य दक्षिणाभिमुखो ययौ ॥ ८ ॥ भारत! उस जम्भकपुत्रने सहदेवके साथ घोर संग्राम किया; परंतु सहदेव उसे युद्धमें जीतकर दक्षिण दिशाकी ओर बढ़ गये ॥ ८ ॥
सेकानपरसेकांश्च व्यजयत् सुमहाबलः ।
करं तेभ्य उपादाय रत्नानि विविधानि च ॥ ९ ॥
ततस्तेनैव सहितो नर्मदामभितो ययौ ।
वहाँ महाबली माद्रीकुमारने सेक और अपरसेक देशोंपर विजय पायी और उन सबसे नाना प्रकारके रत्न भेंटमें लिये। तत्पश्चात् सेकाधिपतिको साथ ले उन्होंने नर्मदाकी ओर प्रस्थान किया ॥ ९ १/२ ॥
विन्दानुविन्दावावन्त्यौ सैन्येन महताऽऽवृतौ ।
जिगाय समरे वीरावाश्विनेयः प्रतापवान् ॥ १० ॥
अश्विनीकुमारोंके पुत्र प्रतापी सहदेवने वहाँ युद्धमें विशाल सेनासे घिरे हुए अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्दको परास्त किया ॥ १० ॥
ततो रत्नान्युपादाय पुरं भोजकटं ययौ ।
तत्र युद्धमभूद् राजन् दिवसद्वयमच्युत ॥ ११ ॥
वहाँसे रत्नोंकी भेंट लेकर वे भोजकट नगरमें गये। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले राजन्! वहाँ दो दिनोंतक युद्ध होता रहा ॥ ११ ॥
स विजित्य दुराधर्षं भीष्मकं माद्रिनन्दनः ।
कोसलाधिपतिं चैव तथा वेणातटाधिपम् ॥ १२ ॥
कान्तारकांश्च समरे तथा प्राक्कोसलान् नृपान् ।
नाटकेयांश्च समरे तथा हेरम्बकान् युधि ॥ १३ ॥
माद्रीनन्दनने उस संग्राममें दुर्धर्ष वीर भीष्मकको परास्त करके कोसलाधिपति, वेणानदीके तटवर्ती प्रदेशोंके स्वामी, कान्तारक तथा पूर्वकोसलके राजाओंको भी समरमें पराजित किया। तत्पश्चात् नाटकेयों और हेरम्बकोंको भी युद्धमें हराया ॥ १२-१३ ॥
मारुधं च विनिर्जित्य रम्यग्राममथो बलात् ।
नाचीनानर्बुकांश्चैव राज्ञश्चैव महाबलः ॥ १४ ॥
तांस्तानाटविकान् सर्वानजयत् पाण्डुनन्दनः ।
वाताधिपं च नृपतिं वशे चक्रे महाबलः ॥ १५ ॥
महाबली पाण्डुनन्दन सहदेवने मारुध तथा रम्यग्रामको बलपूर्वक परास्त करके नाचीन, अर्बुक तथा समस्त वनेचर राजाओंको जीत लिया। तदनन्तर महाबली माद्रीकुमारने राजा वाताधिपको वशमें किया ॥ १४-१५ ॥
पुलिन्दांश्च रणे जित्वा ययौ दक्षिणतः पुरः ।
युयुधे पाण्ड्यराजेन दिवसं नकुलानुजः ॥ १६ ॥

फिर पुलिन्दोंको संग्राममें हराकर नकुलके छोटे भाई सहदेव दक्षिण दिशामें और आगे बढ़ गये। तत्पश्चात् उन्होंने पाण्ड्य-नरेशके साथ एक दिन युद्ध किया ॥ १६ ॥ तं जित्वा स महाबाहुः प्रययौ दक्षिणापथम् । गुहामासादयामास किष्किन्धां लोकविश्रुताम् ॥ १७ ॥ उन्हें जीतकर महाबाहु सहदेव दक्षिणापथकी ओर गये और लोकविख्यात किष्किन्धा नामक गुफामें जा पहुँचे ॥ १७ ॥ तत्र वानरराजाभ्यां मैन्देन द्विविदेन च । युयुधे दिवसान् सप्त न च तौ विकृतिं गतौ ॥ १८ ॥ वहाँ वानरराज मैन्द और द्विविदके साथ उन्होंने सात दिनोंतक युद्ध किया; किंतु उन दोनोंका कुछ बिगाड़ न हो सका ॥ १८ ॥ ततस्तुष्टौ महात्मानौ सहदेवाय वानरौ । ऊचतुश्चैव संहृष्टौ प्रीतिपूर्वमिदं वचः ॥ १९ ॥ तब वे दोनों महात्मा वानर अत्यन्त प्रसन्न हो सहदेवसे प्रेमपूर्वक बोले— ॥ १९ ॥ गच्छ पाण्डवशार्दूल रत्नान्यादाय सर्वशः । अविघ्नमस्तु कार्याय धर्मराजाय धीमते ॥ २० ॥ ‘पाण्डवप्रवर! तुम सब प्रकारके रत्नोंकी भेंट लेकर जाओ। परम बुद्धिमान् धर्मराजके कार्यमें कोई विघ्न नहीं पड़ना चाहिये' ॥ २० ॥ ततो रत्नान्युपादाय पुरीं माहिष्मतीं ययौ । तत्र नीलेन राज्ञा स चक्रे युद्धं नरर्षभः ॥ २१ ॥ तदनन्तर वे नरश्रेष्ठ वहाँसे रत्नोंकी भेंट लेकर माहिष्मतीपुरीको गये और वहाँ राजा नीलके* साथ घोर युद्ध किया ॥ २१ ॥ पाण्डवः परवीरघ्नः सहदेवः प्रतापवान् । ततोऽस्य सुमहद् युद्धमासीद् भीरुभयंकरम् ॥ २२ ॥ सैन्यक्षयकरं चैव प्राणानां संशयावहम् । चक्रे तस्य हि साहाय्यं भगवान् हव्यवाहनः ॥ २३ ॥ शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले पाण्डुपुत्र सहदेव बड़े प्रतापी थे। उनसे राजा नीलका जो महान् युद्ध हुआ, वह कायरोंको भयभीत करनेवाला, सेनाओंका विनाशक और प्राणोंको संशयमें डालनेवाला था। भगवान् अग्निदेव राजा नीलकी सहायता कर रहे थे ॥ २२-२३ ॥ ततो रथा हया नागाः पुरुषाः कवचानि च । प्रदीप्तानि व्यदृश्यन्त सहदेवबले तदा ॥ २४ ॥ उस समय सहदेवकी सेनामें रथ, घोड़े, हाथी, मनुष्य और कवच सभी आगसे जलते दिखायी देने लगे ॥ २४ ॥ ततः सुसम्भ्रान्तमना बभूव कुरुनन्दनः ।

नोत्तरं प्रतिवक्तुं च शक्तोऽभूज्जनमेजय ।। २५ ।।
जनमेजय! इससे कुरुनन्दन सहदेवके मनमें बड़ी घबराहट हुई। वे इसका प्रतीकार करनेमें असमर्थ हो गये ।। २५ ।।

जनमेजय उवाच

किमर्थं भगवान् वह्निः प्रत्यमित्रोऽभवद् युधि ।
सहदेवस्य यज्ञार्थं घटमानस्य वै द्विज ।। २६ ।।
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! सहदेव तो यज्ञके लिये ही चेष्टा कर रहे थे, फिर भगवान् अग्निदेव उस युद्धमें उनके विरोधी कैसे हो गये? ।। २६ ।।

वैशम्पायन उवाच

तत्र माहिष्मतीवासी भगवान् हव्यवाहनः ।
श्रूयते हि गृहीतो वै पुरस्तात् पारदारिकः ।। २७ ।।
वैशम्पायनजीने कहा—जनमेजय! सुननेमें आया है कि माहिष्मती नगरीमें निवास करनेवाले भगवान् अग्निदेव किसी समय उस नील राजाकी कन्या सुदर्शनाके प्रति आसक्त हो गये ।। २७ ।।

नीलस्य राज्ञो दुहिता बभूवातीवशोभना ।
साग्निहोत्रमुपातिष्ठद् बोधनाय पितुः सदा ।। २८ ।।
राजा नीलके एक कन्या थी, जो अनुपम सुन्दरी थी। वह सदा अपने पिताके अग्निहोत्रगृहमें अग्निको प्रज्वलित करनेके लिये उपस्थित हुआ करती थी ।। २८ ।।

व्यजनैर्धूयमानोऽपि तावत् प्रज्वलते न सः ।
यावच्चारुपुटौष्ठेन वायुना न विधूयते ।। २९ ।।
पंखेसे हवा करनेपर भी अग्निदेव तबतक प्रज्वलित नहीं होते थे, जबतक कि वह सुन्दरी अपने मनोहर ओष्ठसम्पुटसे फूँक मारकर हवा न देती थी ।। २९ ।।

ततः स भगवानग्निश्चकमे तां सुदर्शनाम् ।
नीलस्य राज्ञः सर्वेषामुपनीतश्च सोऽभवत् ।। ३० ।।
तत्पश्चात् भगवान् अग्नि उस सुदर्शना नामकी राजकन्याको चाहने लगे। इस बातको राजा नील और सभी नागरिक जान गये ।। ३० ।।

ततो ब्राह्मणरूपेण रममाणो यदृच्छया ।
चकमे तां वरारोहां कन्यामुत्पललोचनाम् ।
तं तु राजा यथाशास्त्रमशासद् धार्मिकस्तदा ।। ३१ ।।
तदनन्तर एक दिन ब्राह्मणका रूप धारण करके इच्छानुसार घूमते हुए अग्निदेव उस सर्वाङ्गसुन्दरी कमल-नयनी कन्याके पास आये और उसके प्रति कामभाव प्रकट करने लगे। धर्मात्मा राजा नीलने शास्त्रके अनुसार उस ब्राह्मणपर शासन किया ।। ३१ ।।