महाभारत (खंड १) - आदि व सभा पर्व
Mahabharata (Vol 1) - Adi and Sabha Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
ग्रन्थ महत्त्व, गौरव अथवा गम्भीरतामें वेदोंसे भी अधिक सिद्ध हुआ है ।। २६९—२७३ ।।
महत्त्वाद् भारवत्त्वाच्च महाभारतमुच्यते ।
निरुक्तमस्य यो वेद सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। २७४ ।।
अतएव महत्ता, भार अथवा गम्भीरताकी विशेषतासे ही इसको महाभारत कहते हैं। जो इस ग्रन्थके निर्वचनको जान लेता है, वह सब पापोंसे छूट जाता है ।। २७४ ।।
तपो न कल्कोऽध्ययनं न कल्कः
स्वाभाविको वेदविधिर्न कल्कः ।
प्रसह्य वित्ताहरणं न कल्क-
स्तान्येव भावोपहतानि कल्कः ।। २७५ ।।
तपस्या निर्मल है, शास्त्रोंका अध्ययन भी निर्मल है, वर्णाश्रमके अनुसार स्वाभाविक वेदोक्त विधि भी निर्मल है और कष्टपूर्वक उपार्जन किया हुआ धन भी निर्मल है, किंतु वे ही सब विपरीत भावसे किये जानेपर पापमय हैं अर्थात् दूसरेके अनिष्टके लिये किया हुआ तप, शास्त्राध्ययन और वेदोक्त स्वाभाविक कर्म तथा क्लेशपूर्वक उपार्जित धन भी पापयुक्त हो जाता है। (तात्पर्य यह कि इस ग्रन्थरत्नमें भावशुद्धिपर विशेष जोर दिया गया है; इसलिये महाभारत-ग्रन्थका अध्ययन करते समय भी भाव शुद्ध रखना चाहिये) ।। २७५ ।।
इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अनुक्रमणिकापर्वणि प्रथमोऽध्यायः ।। १ ।।
इस प्रकार श्रीमद्महाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अनुक्रमणिकापर्वमें पहला अध्याय पूरा हुआ ।। १ ।।
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ श्लोक मिलाकर कुल २८२ श्लोक हैं]
।। अनुक्रमणिकापर्व सम्पूर्ण ।।
१. जय शब्दका अर्थ महाभारत नामक इतिहास ही है। आगे चलकर कहा है—‘जयो नामेतिहासोऽयम्’ इत्यादि। अथवा अठारहों पुराण, वाल्मीकिरामायण आदि सभी आर्ष-ग्रन्थोंकी संज्ञा ‘जय’ है।
३. मंगलाचरणका श्लोक देखनेपर ऐसा जान पड़ता है कि यहाँ नारायण शब्दका अर्थ है भगवान् श्रीकृष्ण और नरोत्तम नरका अर्थ है नररत्न अर्जुन। महाभारतमें प्रायः सर्वत्र इन्हीं दोनोंका नर-नारायणके अवतारके रूपमें उल्लेख हुआ है। इससे मंगलाचरणमें ग्रन्थके इन दोनों प्रधान पात्र तथा भगवान्के मूर्ति-युगलको प्रणाम करना मंगलाचरणको नमस्कारात्मक होनेके साथ ही वस्तुनिर्देशात्मक भी बना देता है। इसलिये अनुवादमें श्रीकृष्ण और अर्जुनका ही उल्लेख किया गया है।
३. नैमिषारण्य नामकी व्याख्या वाराहपुराणमें इस प्रकार मिलती है— एवं कृत्वा ततो देवो मुनिं गौरमुखं तदा। उवाच निमिषेणेदं निहतं दानवं बलम् ।। अरण्येऽस्मिंस्ततस्त्वेतन्नैमिषारण्यसंज्ञितम् । ऐसा करके भगवान्ने उस समय गौरमुख मुनिसे कहा—'मैंने निमिषमात्रमें इस अरण्य (वन)-के भीतर इस दानव-सेनाका संहार किया है; अतः यह वन नैमिषारण्यके नामसे प्रसिद्ध होगा।'
४. जो विद्वान् ब्राह्मण अकेला ही दस सहस्र जिज्ञासु व्यक्तियोंका अन्न-दानादिके द्वारा भरण-पोषण करता है, उसे कुलपति कहते हैं।
५. जो कार्य अनेक व्यक्तियोंके सहयोगसे किया गया हो और जिसमें बहुतोंको ज्ञान, सदाचार आदिकी शिक्षा तथा अन्न-वस्त्रादि वस्तुएँ दी जाती हों, जो बहुतोंके लिये तृप्तिकारक एवं उपयोगी हो, उसे 'सत्र' कहते हैं।
३. 'तत् सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत्' (तैत्तिरीय उपनिषद्)। ब्रह्मने अण्ड एवं पिण्डकी रचना करके मानो स्वयं ही उसमें प्रवेश किया है।
३. ऋषयः सप्त पूर्वे ये मनवश्च चतुर्दश । एते प्रजानां पतय एभिः कल्पः समाप्यते ।। (नीलकण्ठीमें ब्रह्माण्डपुराणका वचन)
* यह और इसके बादका श्लोक महाभारतके तात्पर्यके सूचक हैं। दुर्योधन क्रोध है। यहाँ क्रोध शब्दसे द्वेष-असूया आदि दुर्गुण भी समझ लेने चाहिये। कर्ण, शकुनि, दुःशासन आदि उससे एकताको प्राप्त हैं, उसीके स्वरूप हैं। इन सबका मूल है राजा धृतराष्ट्र। यह अज्ञानी अपने मनको वशमें करनेमें असमर्थ है। इसीने पुत्रोंकी आसक्तिसे अंधे होकर दुर्योधनको अवसर दिया, जिससे उसकी जड़ मजबूत हो गयी। यदि यह दुर्योधनको वशमें कर लेता अथवा बचपनमें ही विदुर आदिकी बात मानकर इसका त्याग कर देता तो विष-दान, लाक्षागृहदाह, द्रौपदी-केशाकर्षण आदि दुष्कर्मोंका अवसर ही नहीं आता और कुलक्षय न होता। इस प्रसंगसे यह भाव सूचित किया गया है कि यह जो मन्यु (दुर्योधन)-रूप वृक्ष है, इसका दृढ़ अज्ञान ही मूल है, क्रोध-लोभादि स्कन्ध हैं, हिंसा-चोरी आदि शाखाएँ हैं और बन्धन-नरकादि इसके फल-पुष्प हैं। पुरुषार्थकामी पुरुषको मूलाज्ञानका उच्छेद करके पहले ही इस (क्रोधरूप) वृक्षको नष्ट कर देना चाहिये।
* युधिष्ठिर धर्म हैं। इसका अभिप्राय यह है कि वे शम, दम, सत्य, अहिंसा आदि रूप धर्मकी मूर्ति हैं। अर्जुन-भीम आदिको धर्मकी शाखा बतलानेका अभिप्राय यह है कि वे सब युधिष्ठिरके ही स्वरूप हैं, उनसे अभिन्न हैं। शुद्धसत्त्वमय ज्ञानविग्रह श्रीकृष्णरूप परमात्मा ही उसके मूल हैं। उनके दृढ़ ज्ञानसे ही धर्मकी नींव मजबूत होती है। श्रुति भगवतीने कहा है कि 'हे गार्गी! इस अविनाशी परमात्माको जाने बिना इस लोकमें जो हजारों वर्षपर्यन्त यज्ञ करता है, दान देता है, तपस्या करता है, उन सबका फल नाशवान् ही होता है।' ज्ञानका मूल है ब्रह्म अर्थात् वेद। वेदसे ही परमधर्म योग और अपरधर्म यज्ञ-यागादिका ज्ञान होता है। यह निश्चित सिद्धान्त है कि धर्मका मूल केवल शब्दप्रमाण ही है। वेदके भी मूल ब्राह्मण हैं; क्योंकि वे ही वेद-सम्प्रदायके प्रवर्तक हैं। इस प्रकार उपदेशकके रूपमें ब्राह्मण, प्रमाणके रूपमें वेद और अनुग्राहकके रूपमें परमात्मा धर्मका मूल है। इससे यह बात सिद्ध हुई है कि वेद और ब्राह्मणका भक्त अधिकारी पुरुष भगवदाराधनके बलसे योगादिरूप धर्ममय वृक्षका सम्पादन करे। उस वृक्षके अहिंसा-सत्य आदि तने हैं। धारण-ध्यान आदि शाखाएँ हैं और तत्त्व-साक्षात्कार ही उसका फल है। इस धर्ममय वृक्षके समाश्रयसे ही पुरुषार्थकी सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं।
* शास्त्रोक्त आचारका परित्याग न करना, सदाचारी सत्पुरुषोंका संग करना और सदाचारमें दृढ़तासे स्थित रहना—इसको 'शौच' कहते हैं। अपनी इच्छाके अनुकूल और प्रतिकूल पदार्थोंकी प्राप्ति होनेपर चित्तमें विकार न होना ही 'धृति' है। सबसे बढ़कर सामर्थ्यका होना ही 'विक्रम' है। सद्वृत्तकी अनुवृत्ति ही 'शुश्रूषा' है। (सदाचारपरायण गुरुजनोंका अनुसरण गुरुशुश्रूषा है।) किसीके द्वारा अपराध बन जानेपर भी उसके प्रति अपने चित्तमें क्रोध आदि विकारोंका न होना ही 'क्षमाशीलता' है। जितेन्द्रियता अथवा अनुद्धत रहना ही 'विनय' है। बलवान् शत्रुको भी पराजित कर देनेका अध्यवसाय 'शौर्य' है। इनके संग्राहक श्लोक इस प्रकार हैं—
आचारापरिहारश्च संसर्गश्चाप्यनिन्दितैः । आचारे च व्यवस्थानं शौचमित्यभिधीयते ।।
इष्टानिष्टार्थसम्पत्तौ चित्तस्याविकृतिर्धृतिः । सर्वातिशयसामर्थ्यं विक्रमं परिचक्षते ।।
वृत्तानुवृत्तिः शुश्रूषा क्षान्तिरागस्यविक्रिया । जितेन्द्रियत्वं विनयोऽथवानुद्धतशीलता ।।
शौर्यमध्यवसायः स्याद् बलिनोऽपि पराभवे ।।
* आचार्य, ब्रह्मा, ऋत्विक्, सदस्य, यजमान, यजमानपत्नी, धन-सम्पत्ति, श्रद्धा-उत्साह, विधि-विधानका सम्यक् पालन एवं सद्बुद्धि आदि यज्ञकी उत्तम गुणसामग्रीके अन्तर्गत हैं।
(पर्वसंग्रहपर्व)
(पर्वसंग्रहपर्व)
द्वितीयोऽध्यायः
समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन, अक्षौहिणी सेनाका प्रमाण, महाभारतमें वर्णित पर्वों और उनके संक्षिप्त विषयोंका संग्रह तथा महाभारतके श्रवण एवं पठनका फल
ऋषय ऊचुः
समन्तपञ्चकमिति यदुक्तं सूतनन्दन । एतत् सर्वं यथातत्त्वं श्रोतुमिच्छामहे वयम् ॥ १ ॥ **ऋषि बोले—**सूतनन्दन! आपने अपने प्रवचनके प्रारम्भमें जो समन्तपंचक (कुरुक्षेत्र)-की चर्चा की थी, अब हम उस देश (तथा वहाँ हुए युद्ध)-के सम्बन्धमें पूर्णरूपसे सब कुछ यथावत् सुनना चाहते हैं ॥ १ ॥
सौतिरुवाच
शृणुध्वं मम भो विप्रा ब्रुवतश्च कथाः शुभाः । समन्तपञ्चकाख्यं च श्रोतुमर्हथ सत्तमाः ॥ २ ॥ **उग्रश्रवाजीने कहा—**साधुशिरोमणि विप्रगण! अब मैं कल्याणदायिनी शुभ कथाएँ कह रहा हूँ; उसे आपलोग सावधान चित्तसे सुनिये और इसी प्रसंगमें समन्तपंचकक्षेत्रका वर्णन भी सुन लीजिये ॥ २ ॥ त्रेताद्वापरयोः सन्धौ रामः शस्त्रभृतां वरः । असकृत् पार्थिवं क्षत्रं जघानामर्षचोदितः ॥ ३ ॥ त्रेता और द्वापरकी सन्धिके समय शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ परशुरामजीने क्षत्रियोंके प्रति क्रोधसे प्रेरित होकर अनेकों बार क्षत्रिय राजाओंका संहार किया ॥ ३ ॥ स सर्वं क्षत्रमुत्साद्य स्ववीर्येणानलद्युतिः । समन्तपञ्चके पञ्च चकार रौधिरान् हृदान् ॥ ४ ॥ अग्निके समान तेजस्वी परशुरामजीने अपने पराक्रमसे सम्पूर्ण क्षत्रियवंशका संहार करके समन्तपंचकक्षेत्रमें रक्तके पाँच सरोवर बना दिये ॥ ४ ॥ स तेषु रुधिराम्भःसु हृदेषु क्रोधमूर्च्छितः । पितॄन् संतर्पयामास रुधिरेणेति नः श्रुतम् ॥ ५ ॥
क्रोधसे आविष्ट होकर परशुरामजीने उन रक्तरूप जलसे भरे हुए सरोवरोंमें रक्ताञ्जलिके द्वारा अपने पितरोंका तर्पण किया, यह बात हमने सुनी है ॥ ५ ॥
अथर्चीकादयोऽभ्येत्य पितरो राममब्रुवन् ।
राम राम महाभाग प्रीताः स्म तव भार्गव ॥ ६ ॥
अनया पितृभक्त्या च विक्रमेण तव प्रभो ।
वरं वृणीष्व भद्रं ते यमिच्छसि महाद्युते ॥ ७ ॥
तदनन्तर, ऋचीक आदि पितृगण परशुरामजीके पास आकर बोले—'महाभाग राम! सामर्थ्यशाली भृगुवंशभूषण परशुराम!! तुम्हारी इस पितृभक्ति और पराक्रमसे हम बहुत ही प्रसन्न हैं। महाप्रतापी परशुराम! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हें जिस वरकी इच्छा हो हमसे माँग लो' ॥ ६-७ ॥
राम उवाच
यदि मे पितरः प्रीता यद्यनुग्राह्यता मयि ।
यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं मया ॥ ८ ॥
अतश्च पापान्मुच्येऽहमेष मे प्रार्थितो वरः ।
ह्रदाश्च तीर्थभूता मे भवेयुर्भुवि विश्रुताः ॥ ९ ॥
**परशुरामजीने कहा—**यदि आप सब हमारे पितर मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे अपने अनुग्रहका पात्र समझते हैं तो मैंने जो क्रोधवश क्षत्रियवंशका विध्वंस किया है, इस कुकर्मके पापसे मैं मुक्त हो जाऊँ और ये मेरे बनाये हुए सरोवर पृथ्वीमें प्रसिद्ध तीर्थ हो जायें। यही वर मैं आपलोगोंसे चाहता हूँ ॥ ८-९ ॥
एवं भविष्यतीत्येवं पितरस्तमथाब्रुवन् ।
तं क्षमस्वेति निषिषिधुस्ततः स विरराम ह ॥ १० ॥
तदनन्तर 'ऐसा ही होगा' यह कहकर पितरोंने वरदान दिया। साथ ही 'अब बचे-खुचे क्षत्रियवंशको क्षमा कर दो'—ऐसा कहकर उन्हें क्षत्रियोंके संहारसे भी रोक दिया। इसके पश्चात् परशुरामजी शान्त हो गये ॥ १० ॥
तेषां समीपे यो देशो ह्रदानां रुधिराम्भसाम् ।
समन्तपञ्चकमिति पुण्यं तत् परिकीर्तितम् ॥ ११ ॥
उन रक्तसे भरे सरोवरोंके पास जो प्रदेश है उसे ही समन्तपंचक कहते हैं। यह क्षेत्र बहुत ही पुण्यप्रद है ॥ ११ ॥
येन लिङ्गेन यो देशो युक्तः समुपलक्ष्यते ।
तेनैव नाम्ना तं देशं वाच्यमाहुर्मनीषिणः ॥ १२ ॥
जिस चिह्नसे जो देश युक्त होता है और जिससे जिसकी पहचान होती है, विद्वानोंका कहना है कि उस देशका वही नाम रखना चाहिये ॥ १२ ॥
अन्तरे चैव सम्प्राप्ते कलिद्वापरयोरभूत् ।
समन्तपञ्चके युद्धं कुरुपाण्डवसेनयोः ॥ १३ ॥
जब कलियुग और द्वापरकी सन्धिका समय आया, तब उसी समन्तपंचकक्षेत्रमें कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंका परस्पर भीषण युद्ध हुआ ॥ १३ ॥
तस्मिन् परमधर्मिष्ठे देशे भूदोषवर्जिते ।
अष्टादश समाजग्मुरक्षौहिण्यो युयुत्सया ॥ १४ ॥
भूमिसम्बन्धी दोषोंसे³ रहित उस परम धार्मिक प्रदेशमें युद्ध करनेकी इच्छासे अठारह अक्षौहिणी सेनाएँ इकट्ठी हुई थीं ॥ १४ ॥
समेत्य तं द्विजास्ताश्च तत्रैव निधनं गताः ।
एतन्नामाभिनिर्वृत्तं तस्य देशस्य वै द्विजाः ॥ १५ ॥
ब्राह्मणो! वे सब सेनाएँ वहाँ इकट्ठी हुईं और वहीं नष्ट हो गयीं। द्विजवरो! इसीसे उस देशका नाम समन्तपंचक³ पड़ गया ॥ १५ ॥
पुण्यश्च रमणीयश्च स देशो वः प्रकीर्तितः ।
तदेतत् कथितं सर्वं मया ब्राह्मणसत्तमाः ।
यथा देशः स विख्यातस्त्रिषु लोकेषु सुव्रताः ॥ १६ ॥
वह देश अत्यन्त पुण्यमय एवं रमणीय कहा गया है। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मणो! तीनों लोकोंमें जिस प्रकार उस देशकी प्रसिद्धि हुई थी, वह सब मैंने आपलोगोंसे कह दिया ॥ १६ ॥
ऋषय ऊचुः
अक्षौहिण्य इति प्रोक्तं यत्त्वया सूतनन्दन ।
एतदिच्छामहे श्रोतुं सर्वमेव यथातथम् ॥ १७ ॥
ऋषियोंने पूछा—सूतनन्दन! अभी-अभी आपने जो अक्षौहिणी शब्दका उच्चारण किया है, इसके सम्बन्धमें हमलोग सारी बातें यथार्थरूपसे सुनना चाहते हैं ॥ १७ ॥
अक्षौहिण्याः परीमाणं नराश्वरथदन्तिनाम् ।
यथावच्चैव नो ब्रूहि सर्वं हि विदितं तव ॥ १८ ॥
अक्षौहिणी सेनामें कितने पैदल, घोड़े, रथ और हाथी होते हैं? इसका हमें यथार्थ वर्णन सुनाइये; क्योंकि आपको सब कुछ ज्ञात है ॥ १८ ॥
सौतिरुवाच
एको रथो गजश्चैको नराः पञ्च पदातयः ।
त्रयश्च तुरगास्तज्ज्ञैः पत्तिरित्त्यभिधीयते ॥ १९ ॥
उग्रश्रवाजीने कहा—एक रथ, एक हाथी, पाँच पैदल सैनिक और तीन घोड़े—बस, इन्हीँको सेनाके मर्मज्ञ विद्वानोंने 'पत्ति' कहा है ॥ १९ ॥ पत्तिं तु त्रिगुणामेतामाहुः सेनामुखं बुधाः । त्रीणि सेनामुखान्येको गुल्म इत्यभिधीयते ॥ २० ॥ इसी पत्तिकी तिगुनी संख्याको विद्वान् पुरुष 'सेनामुख' कहते हैं। तीन 'सेनामुखों' को एक 'गुल्म' कहा जाता है ॥ २० ॥ त्रयो गुल्मा गणो नाम वाहिनी तु गणास्त्रयः । स्मृतास्तिस्रस्तु वाहिन्यः पृतनेति विचक्षणैः ॥ २१ ॥ तीन गुल्मका एक 'गण' होता है, तीन गणकी एक 'वाहिनी' होती है और तीन वाहिनियोंको सेनाका रहस्य जाननेवाले विद्वानोंने 'पृतना' कहा है ॥ २१ ॥ चमूस्तु पृतनास्तिस्रस्तिस्रश्चम्बस्त्वनीकिनी । अनीकिनीं दशगुणां प्राहुरक्षौहिणीं बुधाः ॥ २२ ॥ तीन पृतनाकी एक 'चमू', तीन चमूकी एक 'अनीकिनी' और दस अनीकिनीकी एक 'अक्षौहिणी' होती है। यह विद्वानोंका कथन है ॥ २२ ॥ अक्षौहिण्याः प्रसंख्याता रथानां द्विजसत्तमाः । संख्या गणिततत्त्वज्ञैः सहस्राण्येकविंशतिः ॥ २३ ॥ शतान्युपरि चैवाष्टौ तथा भूयश्च सप्ततिः । गजानां च परीमाणमेतदेव विनिर्दिशेत् ॥ २४ ॥ श्रेष्ठ ब्राह्मणो! गणितके तत्त्वज्ञ विद्वानोंने एक अक्षौहिणी सेनामें रथोंकी संख्या इक्कीस हजार आठ सौ सत्तर (२१,८७०) बतलायी है। हाथियोंकी संख्या भी इतनी ही कहनी चाहिये ॥ २३-२४ ॥ ज्ञेयं शतसहस्रं तु सहस्राणि नवैव तु । नराणामपि पञ्चाशच्छतानि त्रीणि चानघाः ॥ २५ ॥ निष्पाप ब्राह्मणो! एक अक्षौहिणीमें पैदल मनुष्योंकी संख्या एक लाख नौ हजार तीन सौ पचास (१,०९,३५०) जाननी चाहिये ॥ २५ ॥ पञ्चषष्टिसहस्राणि तथाश्वानां शतानि च । दशोत्तराणि षट् प्राहुर्यथावदिह संख्यया ॥ २६ ॥ एक अक्षौहिणी सेनामें, घोड़ोंकी ठीक-ठीक संख्या पैंसठ हजार छः सौ दस (६५,६१०) कही गयी है ॥ २६ ॥ एतामक्षौहिणीं प्राहुः संख्यातत्त्वविदो जनाः । यां वः कथितवानस्मि विस्तरेण तपोधनाः ॥ २७ ॥ तपोधनो! संख्याका तत्त्व जाननेवाले विद्वानोंने इसीको अक्षौहिणी कहा है, जिसे मैंने आपलोगोंको विस्तारपूर्वक बताया है ॥ २७ ॥
एतया संख्यया ह्यासन् कुरुपाण्डवसेनयोः ।
अक्षौहिण्यो द्विजश्रेष्ठाः पिण्डिताष्टादशैव तु ॥ २८ ॥
श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इसी गणनाके अनुसार कौरव-पाण्डव दोनों सेनाओंकी संख्या अठारह अक्षौहिणी थी ॥ २८ ॥
समेतास्तत्र वै देशे तत्रैव निधनं गताः ।
कौरवान् कारणं कृत्वा कालेनाद्भुतकर्मणा ॥ २९ ॥
अद्भुत कर्म करनेवाले कालकी प्रेरणासे समन्तपञ्चकक्षेत्रमें कौरवोंको निमित्त बनाकर इतनी सेनाएँ इकट्ठी हुईं और वहीं नाशको प्राप्त हो गयीं ॥ २९ ॥
अहानि युयुधे भीष्मो दशैव परमास्त्रवित् ।
अहानि पञ्च द्रोणस्तु ररक्ष कुरुवाहिनीम् ॥ ३० ॥
अस्त्र-शस्त्रोंके सर्वोपरि मर्मज्ञ भीष्मपितामहने दस दिनोंतक युद्ध किया, आचार्य द्रोणने पाँच दिनोंतक कौरव-सेनाकी रक्षा की ॥ ३० ॥
अहनी युयुधे द्वे तु कर्णः परबलार्दनः ।
शल्योऽर्धदिवसं चैव गदायुद्धमतः परम् ॥ ३१ ॥
शत्रुसेनाको पीड़ित करनेवाले वीरवर कर्णने दो दिन युद्ध किया और शल्यने आधे दिनतक। इसके पश्चात् (दुर्योधन और भीमसेनका परस्पर) गदायुद्ध आधे दिनतक होता रहा ॥ ३१ ॥
तस्यैव दिवसस्यान्ते द्रौणिहार्दिक्यगौतमाः ।
प्रसुप्तं निशि विश्वस्तं जघ्नुर्यौधिष्ठिरं बलम् ॥ ३२ ॥
अठारहवाँ दिन बीत जानेपर रात्रिके समय अश्वत्थामा, कृतवर्मा और कृपाचार्यने निःशंक सोते हुए युधिष्ठिरके सैनिकोंको मार डाला ॥ ३२ ॥
यत्तु शौनक सत्रे ते भारताख्यानमुत्तमम् ।
जनमेजयस्य तत् सत्रे व्यासशिष्येण धीमता ॥ ३३ ॥
कथितं विस्तरार्थं च यशो वीर्यं महीक्षिताम् ।
पौष्यं तत्र च पौलोममास्तीकं चादितः स्मृतम् ॥ ३४ ॥
शौनकजी! आपके इस सत्संग-सत्रमें मैं यह जो उत्तम इतिहास महाभारत सुना रहा हूँ, यही जनमेजयके सर्पयज्ञमें व्यासजीके बुद्धिमान् शिष्य वैशम्पायनजीके द्वारा भी वर्णन किया गया था। उन्होंने बड़े-बड़े नरपतियोंके यश और पराक्रमका विस्तारपूर्वक वर्णन करनेके लिये प्रारम्भमें पौष्य, पौलोम और आस्तीक—इन तीन पर्वोंका स्मरण किया है ॥ ३३-३४ ॥
विचित्रार्थपदाख्यानमनेकसमयान्वितम् ।
प्रतिपन्नं नरैः प्राज्ञैर्वैराग्यमिव मोक्षिभिः ॥ ३५ ॥
जैसे मोक्ष चाहनेवाले पुरुष पर-वैराग्यकी शरण ग्रहण करते हैं, वैसे ही प्रज्ञावान् मनुष्य अलौकिक अर्थ, विचित्र पद, अद्भुत आख्यान और भाँति-भाँतिकी परस्पर विलक्षण मर्यादाओंसे युक्त इस महाभारतका आश्रय ग्रहण करते हैं ॥ ३५ ॥
आत्मैव वेदितव्येषु प्रियेष्ठिव हि जीवितम् ।
इतिहासः प्रधानार्थः श्रेष्ठः सर्वागमेष्वयम् ॥ ३६ ॥
जैसे जाननेयोग्य पदार्थोंमें आत्मा, प्रिय पदार्थोंमें अपना जीवन सर्वश्रेष्ठ है, वैसे ही सम्पूर्ण शास्त्रोंमें परब्रह्म परमात्माकी प्राप्तिरूप प्रयोजनको पूर्ण करनेवाला यह इतिहास श्रेष्ठ है ॥ ३६ ॥
अनाश्रित्येदमाख्यानं कथा भुवि न विद्यते ।
आहारमनपाश्रित्य शरीरस्येव धारणम् ॥ ३७ ॥
जैसे भोजन किये बिना शरीर-निर्वाह सम्भव नहीं है, वैसे ही इस इतिहासका आश्रय लिये बिना पृथ्वीपर कोई कथा नहीं है ॥ ३७ ॥
तदेतद् भारतं नाम कविभिस्तूपजीव्यते ।
उदयप्रेप्सुभिर्भृत्यैरभिजात इवेश्वरः ॥ ३८ ॥
जैसे अपनी उन्नति चाहनेवाले महत्त्वाकांक्षी सेवक अपने कुलीन और सद्भावसम्पन्न स्वामीकी सेवा करते हैं, इसी प्रकार संसारके श्रेष्ठ कवि इस महाभारतकी सेवा करके ही अपने काव्यकी रचना करते हैं ॥ ३८ ॥
इतिहासोत्तमे यस्मिन्नर्पिता बुद्धिरुत्तमा ।
स्वरव्यञ्जनयोः कृत्स्ना लोकवेदाश्रयेव वाक् ॥ ३९ ॥
जैसे लौकिक और वैदिक सब प्रकारके ज्ञानको प्रकाशित करनेवाली सम्पूर्ण वाणी स्वरों एवं व्यंजनोंमें समायी रहती है, वैसे ही (लोक, परलोक एवं परमार्थसम्बन्धी) सम्पूर्ण उत्तम विद्या-बुद्धि इस श्रेष्ठ इतिहासमें भरी हुई है ॥ ३९ ॥
तस्य प्रज्ञाभिपन्नस्य विचित्रपदपर्वणः ।
सूक्ष्मार्थन्याययुक्तस्य वेदार्थैर्भूषितस्य च ॥ ४० ॥
भारतस्येतिहासस्य श्रूयतां पर्वसंग्रहः ।
पर्वानुक्रमणी पूर्वं द्वितीयः पर्वसंग्रहः ॥ ४१ ॥
यह महाभारत इतिहास ज्ञानका भण्डार है। इसमें सूक्ष्म-से-सूक्ष्म पदार्थ और उनका अनुभव करानेवाली युक्तियाँ भरी हुई हैं। इसका एक-एक पद और पर्व आश्चर्यजनक है तथा यह वेदोंके धर्ममय अर्थसे अलंकृत है। अब इसके पर्वोंकी संग्रह-सूची सुनिये। पहले अध्यायमें पर्वानुक्रमणी है और दूसरेमें पर्वसंग्रह ॥ ४०-४१ ॥
पौष्यं पौलोममास्तीकमादिरंशावतारणम् ।
ततः सम्भवपर्वोक्तमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ४२ ॥
इसके पश्चात् पौष्य, पौलोम, आस्तीक और आदिअंशावतरण पर्व हैं। तदनन्तर सम्भवपर्वका वर्णन है, जो अत्यन्त अद्भुत और रोमांचकारी है ॥ ४२ ॥ दाहो जतुगृहस्यात्र हैडिम्बं पर्व चोच्यते । ततो बकवधः पर्व पर्व चैत्ररथं ततः ॥ ४३ ॥ इसके पश्चात् जतुगृह (लाक्षाभवन) दाहपर्व है। तदनन्तर हिडिम्बवधपर्व है, फिर बकवध और उसके बाद चैत्ररथपर्व है ॥ ४३ ॥ ततः स्वयंवरो देव्याः पाञ्चाल्याः पर्व चोच्यते । क्षात्रधर्मेण निर्जित्य ततो वैवाहिकं स्मृतम् ॥ ४४ ॥ उसके बाद पांचालराजकुमारी देवी द्रौपदीके स्वयंवरपर्वका तथा क्षत्रियधर्मसे सब राजाओंपर विजय-प्राप्तिपूर्वक वैवाहिकपर्वका वर्णन है ॥ ४४ ॥ विदुरागमनं पर्व राज्यलम्भस्तथैव च । अर्जुनस्य वने वासः सुभद्राहरणं ततः ॥ ४५ ॥ विदुरागमन, राज्यलम्भपर्व, तत्पश्चात् अर्जुन-वनवासपर्व और फिर सुभद्राहरणपर्व है ॥ ४५ ॥ सुभद्राहरणादूर्ध्व ज्ञेया हरणहारिका । ततः खाण्डवदाहाख्यं तत्रैव मयदर्शनम् ॥ ४६ ॥ सुभद्राहरणके बाद हरणाहरणपर्व है, पुनः खाण्डवदाह-पर्व है, उसीमें मयदानवके दर्शनकी कथा है ॥ ४६ ॥ सभापर्व ततः प्रोक्तं मन्त्रपर्व ततः परम् । जरासन्धवधः पर्व पर्व दिग्विजयं तथा ॥ ४७ ॥ इसके बाद क्रमशः सभापर्व, मन्त्रपर्व, जरासन्ध-वधपर्व और दिग्विजयपर्वका प्रवचन है ॥ ४७ ॥ पर्व दिग्विजयादूर्ध्वं राजसूयिकमुच्यते । ततश्चार्घाभिहरणं शिशुपालवधस्ततः ॥ ४८ ॥ तदनन्तर राजसूय, अर्घाभिहरण और शिशुपाल-वधपर्व कहे गये हैं ॥ ४८ ॥ द्यूतपर्व ततः प्रोक्तमनुद्यूतमतः परम् । तत आरण्यकं पर्व किर्मीरवध एव च ॥ ४९ ॥ इसके बाद क्रमशः द्यूत एवं अनुद्यूतपर्व हैं। तत्पश्चात् वनयात्रापर्व तथा किर्मीरवधपर्व है ॥ ४९ ॥ अर्जुनास्याभिगमनं पर्व ज्ञेयमतः परम् । ईश्वरार्जुनयोर्युद्धं पर्व कैरातसंज्ञितम् ॥ ५० ॥ इसके बाद अर्जुनाभिगमनपर्व जानना चाहिये और फिर कैरातपर्व आता है, जिसमें सर्वेश्वर भगवान् शिव तथा अर्जुनके युद्धका वर्णन है ॥ ५० ॥
इन्द्रलोकाभिगमनं पर्व ज्ञेयमतः परम् । नलोपाख्यानमपि च धार्मिकं करुणोदयम् ॥ ५१ ॥ तत्पश्चात् इन्द्रलोकाभिगमनपर्व है, फिर धार्मिक तथा करुणोत्पादक नलोपाख्यानपर्व है ॥ ५१ ॥ तीर्थयात्रा ततः पर्व कुरुराजस्य धीमतः । जटासुरवधः पर्व यक्षयुद्धमतः परम् ॥ ५२ ॥ तदनन्तर बुद्धिमान् कुरुराजका तीर्थयात्रापर्व, जटासुरवधपर्व और उसके बाद यक्षयुद्धपर्व है ॥ ५२ ॥ निवातकवचैर्युद्धं पर्व चाजगरं ततः । मार्कण्डेयसमस्या च पर्वानन्तरमुच्यते ॥ ५३ ॥ इसके पश्चात् निवातकवचयुद्ध, आजगर और मार्कण्डेयसमस्यापर्व क्रमशः कहे गये हैं ॥ ५३ ॥ संवादश्च ततः पर्व द्रौपदीसत्यभामयोः । घोषयात्रा ततः पर्व मृगस्वप्नोद्भवं ततः ॥ ५४ ॥ व्रीहिद्रौणिकमाख्यानमैन्द्रद्युम्नं तथैव च । द्रौपदीहरणं पर्व जयद्रथविमोक्षणम् ॥ ५५ ॥ इसके बाद आता है द्रौपदी और सत्यभामाके संवादका पर्व, इसके अनन्तर घोषयात्रापर्व है, उसीमें मृगस्वप्नोद्भव और व्रीहिद्रौणिक उपाख्यान है। तदनन्तर इन्द्रद्युम्नका आख्यान और उसके बाद द्रौपदीहरणपर्व है। उसीमें जयद्रथविमोक्षणपर्व है ॥ ५४-५५ ॥ पतिव्रताया माहात्म्यं सावित्र्याश्चैवमद्भुतम् । रामोपाख्यानमत्रैव पर्व ज्ञेयमतः परम् ॥ ५६ ॥ इसके बाद पतिव्रता सावित्रीके पातिव्रत्यका अद्भुत माहात्म्य है। फिर इसी स्थानपर रामोपाख्यानपर्व जानना चाहिये ॥ ५६ ॥ कुण्डलाहरणं पर्व ततः परमिहोच्यते । आरणेयं ततः पर्व वैराटं तदनन्तरम् । पाण्डवानां प्रवेशश्च समयस्य च पालनम् ॥ ५७ ॥ इसके बाद क्रमशः कुण्डलाहरण और आरणेय-पर्व कहे गये हैं। तदनन्तर विराटपर्वका आरम्भ होता है, जिसमें पाण्डवोंके नगरप्रवेश और समयपालन-सम्बन्धीपर्व हैं ॥ ५७ ॥ कीचकानां वधः पर्व पर्व गोग्रहणं ततः । अभिमन्योश्च वैराट्याः पर्व वैवाहिकं स्मृतम् ॥ ५८ ॥ इसके बाद कीचकवधपर्व, गोग्रहण (गोहरण)-पर्व तथा अभिमन्यु और उत्तराके विवाहका पर्व है ॥ ५८ ॥ उद्योगपर्व विज्ञेयमत ऊर्ध्वं महाद्भुतम् ।
ततः संजययानाख्यं पर्व ज्ञेयमतः परम् ।। ५९ ।।
प्रजागरं तथा पर्व धृतराष्ट्रस्य चिन्तया ।
पर्व सानत्सुजातं वै गुह्यमध्यात्मदर्शनम् ।। ६० ।।
इसके पश्चात् परम अद्भुत उद्योगपर्व समझना चाहिये। इसीमें संजययानपर्व कहा गया है। तदनन्तर चिन्ताके कारण धृतराष्ट्रके रातभर जागनेसे सम्बन्ध रखनेवाला प्रजागरपर्व समझना चाहिये। तत्पश्चात् वह प्रसिद्ध सनत्सुजातपर्व है, जिसमें अत्यन्त गोपनीय अध्यात्मदर्शनका समावेश हुआ है ।। ५९-६० ।।
यानसन्धिस्ततः पर्व भगवद्यानमेव च ।
मातलीयमुपाख्यानं चरितं गालवस्य च ।। ६१ ।।
सावित्रं वामदेव्यं च वैन्योपाख्यानमेव च ।
जामदग्न्यमुपाख्यानं पर्व षोडशराजिकम् ।। ६२ ।।
इसके पश्चात् यानसन्धि तथा भगवद्यानपर्व है, इसीमें मातलि का उपाख्यान, गालव-चरित, सावित्र, वामदेव तथा वैन्य-उपाख्यान, जामदग्न्य और षोडशराजिक-उपाख्यान आते हैं ।। ६१-६२ ।।
सभाप्रवेशः कृष्णस्य विदुलापुत्रशासनम् ।
उद्योगः सैन्यनिर्याणं विश्वोपाख्यानमेव च ।। ६३ ।।
फिर श्रीकृष्णका सभाप्रवेश, विदुलाका अपने पुत्रके प्रति उपदेश, युद्धका उद्योग, सैन्यनिर्याण तथा विश्वोपाख्यान—इनका क्रमशः उल्लेख हुआ है ।। ६३ ।।
ज्ञेयं विवादपर्वात्र कर्णस्यापि महात्मनः ।
निर्याणं च ततः पर्व कुरुपाण्डवसेनयोः ।। ६४ ।।
इसी प्रसंगमें महात्मा कर्णका विवादपर्व है। तदनन्तर कौरव एवं पाण्डव-सेनाका निर्याणपर्व है ।। ६४ ।।
रथातिरथसंख्या च पर्वोक्तं तदनन्तरम् ।
उलूकदूतागमनं पर्वामर्षविवर्धनम् ।। ६५ ।।
तत्पश्चात् रथातिरथसंख्यापर्व और उसके बाद क्रोधकी आग प्रज्वलित करनेवाला उलूकदूतागमनपर्व है ।। ६५ ।।
अम्बोपाख्यानमत्रैव पर्व ज्ञेयमतः परम् ।
भीष्माभिषेचनं पर्व ततश्चाद्भुतमुच्यते ।। ६६ ।।
इसके बाद ही अम्बोपाख्यानपर्व है। तत्पश्चात् अद्भुत भीष्माभिषेचनपर्व कहा गया है ।। ६६ ।।
जम्बूखण्डविनिर्माणं पर्वोक्तं तदनन्तरम् ।
भूमिपर्व ततः प्रोक्तं द्वीपविस्तारकीर्तनम् ।। ६७ ।।
इसके आगे जम्बूखण्ड विनिर्माणपर्व है। तदनन्तर भूमिपर्व कहा गया है, जिसमें द्वीपोंके विस्तारका कीर्तन किया गया है ।। ६७ ।। पर्वोक्तं भगवद्गीता पर्व भीष्मवधस्ततः । द्रोणाभिषेचनं पर्व संशप्तकवधस्ततः ।। ६८ ।। इसके बाद क्रमशः भगवद्गीता, भीष्मवध, द्रोणाभिषेक तथा संशप्तकवधपर्व हैं ।। ६८ ।। अभिमन्युवधः पर्व प्रतिज्ञापर्व चोच्यते । जयद्रथवधः पर्व घटोत्कचवधस्ततः ।। ६९ ।। इसके बाद अभिमन्युवधपर्व, प्रतिज्ञापर्व, जयद्रथवधपर्व और घटोत्कचवधपर्व हैं ।। ६९ ।। ततो द्रोणवधः पर्व विज्ञेयं लोमहर्षणम् । मोक्षो नारायणास्त्रस्य पर्वानन्तरमुच्यते ।। ७० ।। फिर रोंगटे खड़े कर देनेवाला द्रोणवधपर्व जानना चाहिये। तदनन्तर नारायणास्त्रमोक्षपर्व कहा गया है ।। ७० ।। कर्णपर्व ततो ज्ञेयं शल्यपर्व ततः परम् । ह्रदप्रवेशनं पर्व गदायुद्धमतः परम् ।। ७१ ।। फिर कर्णपर्व और उसके बाद शल्यपर्व है। इसी पर्वमें ह्रदप्रवेश और गदायुद्धपर्व भी हैं ।। ७१ ।। सारस्वतं ततः पर्व तीर्थवंशानुकीर्तनम् । अत ऊर्ध्वं सुबीभत्सं पर्व सौप्तिकमुच्यते ।। ७२ ।। तदनन्तर सारस्वतपर्व है, जिसमें तीर्थों और वंशोंका वर्णन किया गया है। इसके बाद है अत्यन्त बीभत्स सौप्तिकपर्व ।। ७२ ।। ऐषीकं पर्व चोद्दिष्टमत ऊर्ध्वं सुदारुणम् । जलप्रदानिकं पर्व स्त्रीविलापस्ततः परम् ।। ७३ ।। इसके बाद अत्यन्त दारुण ऐषीकपर्वकी कथा है। फिर जलप्रदानिक और स्त्रीविलापपर्व आते हैं ।। ७३ ।। श्राद्धपर्व ततो ज्ञेयं कुरूणामौर्ध्वदेहिकम् । चार्वाकनिग्रहः पर्व रक्षसो ब्रह्मरूपिणः ।। ७४ ।। तत्पश्चात् श्राद्धपर्व है, जिसमें मृत कौरवोंकी अन्त्येष्टिक्रियाका वर्णन है। उसके बाद ब्राह्मण-वेषधारी राक्षस चार्वाकके निग्रहका पर्व है ।। ७४ ।। आभिषेचनिकं पर्व धर्मराजस्य धीमतः । प्रविभागो गृहाणां च पर्वोक्तं तदनन्तरम् ।। ७५ ।।
तदनन्तर धर्मबुद्धिसम्पन्न धर्मराज युधिष्ठिरके अभिषेकका पर्व है तथा इसके पश्चात् गृहप्रविभागपर्व है ॥ ७५ ॥
शान्तिपर्व ततो यत्र राजधर्मानुशासनम् ।
आपद्धर्मश्च पूर्वोक्तं मोक्षधर्मस्ततः परम् ॥ ७६ ॥
इसके बाद शान्तिपर्व प्रारम्भ होता है; जिसमें राजधर्मानुशासन, आपद्धर्म और मोक्षधर्मपर्व हैं ॥ ७६ ॥
शुकप्रश्नाभिगमनं ब्रह्मप्रश्नानुशासनम् ।
प्रादुर्भावश्च दुर्वासः संवादश्चैव मायया ॥ ७७ ॥
फिर शुकप्रश्नाभिगमन, ब्रह्मप्रश्नानुशासन, दुर्वासाका प्रादुर्भाव और मायासंवादपर्व हैं ॥ ७७ ॥
ततः पर्व परिज्ञेयमानुशासनिकं परम् ।
स्वर्गारोहणिकं चैव ततो भीष्मस्य धीमतः ॥ ७८ ॥
इसके बाद धर्माधर्मका अनुशासन करनेवाला आनुशासनिकपर्व है, तदनन्तर बुद्धिमान् भीष्मजीका स्वर्गारोहणपर्व है ॥ ७८ ॥
ततोऽश्वमेधिकं पर्व सर्वपापप्रणाशनम् ।
अनुगीता ततः पर्व ज्ञेयमध्यात्मवाचकम् ॥ ७९ ॥
अब आता है आश्वमेधिकपर्व, जो सम्पूर्ण पापोंका नाशक है। उसीमें अनुगीतापर्व है, जिसमें अध्यात्मज्ञानका सुन्दर निरूपण हुआ है ॥ ७९ ॥
पर्व चाश्रमवासाख्यं पुत्रदर्शनमेव च ।
नारदागमनं पर्व ततः परमिहोच्यते ॥ ८० ॥
इसके बाद आश्रमवासिक, पुत्रदर्शन और तदनन्तर नारदागमनपर्व कहे गये हैं ॥ ८० ॥
मौसलं पर्व चोद्दिष्टं ततो घोरं सुदारुणम् ।
महाप्रस्थानिकं पर्व स्वर्गारोहणिकं ततः ॥ ८१ ॥
इसके बाद है अत्यन्त भयानक एवं दारुण मौसलपर्व। तत्पश्चात् महाप्रस्थानपर्व और स्वर्गारोहण-पर्व आते हैं ॥ ८१ ॥
हरिवंशस्ततः पर्व पुराणं खिलसंज्ञितम् ।
विष्णुपर्व शिशोश्चर्या विष्णोः कंसवधस्तथा ॥ ८२ ॥
इसके बाद हरिवंशपर्व है, जिसे खिल (परिशिष्ट) पुराण भी कहते हैं, इसमें विष्णुपर्व, श्रीकृष्णकी बाललीला एवं कंसवधका वर्णन है ॥ ८२ ॥
भविष्यपर्व चाप्युक्तं खिलेष्वेवाद्भुतं महत् ।
एतत् पर्वशतं पूर्णं व्यासेनोक्तं महात्मना ॥ ८३ ॥
इस खिलपर्वमें भविष्यपर्व भी कहा गया है, जो महान् अद्भुत है। महात्मा श्रीव्यासजीने इस प्रकार पूरे सौ पर्वोंकी रचना की है ॥ ८३ ॥
यथावत् सूरपुत्रेण लौमहर्षणिना ततः। उक्तानि नैमिषारण्ये पर्वाण्यष्टादशैव तु ॥ ८४ ॥
सूतवंशशिरोमणि लोमहर्षणके पुत्र उग्रश्रवाजीने व्यासजीकी रचना पूर्ण हो जानेपर नैमिषारण्यक्षेत्रमें इन्हीं सौ पर्वोंको अठारह पर्वोंके रूपमें सुव्यवस्थित करके ऋषियोंके सामने कहा ॥ ८४ ॥
समासो भारतस्यायमत्रोक्तः पर्वसंग्रहः । पौष्यं पौलोममास्तीकमादिरंशावतारणम् ॥ ८५ ॥ सम्भवो जतुवेश्माख्यं हिडिम्बबकयोर्वधः। तथा चैत्ररथं देव्याः पाञ्चाल्याश्च स्वयंवरः ॥ ८६ ॥ क्षात्रधर्मेण निर्जित्य ततो वैवाहिकं स्मृतम् । विदुरागमनं चैव राज्यलम्भस्तथैव च ॥ ८७ ॥ वनवासोऽर्जुनस्यापि सुभद्राहरणं ततः । हरणाहरणं चैव दहनं खाण्डवस्य च ॥ ८८ ॥ मयस्य दर्शनं चैव आदिपर्वणि कथ्यते ।
इस प्रकार यहाँ संक्षेपसे महाभारतके पर्वोंका संग्रह बताया गया है। पौष्य, पौलोम, आस्तीक, आदिअंशावतरण, सम्भव, लाक्षागृह, हिडिम्बवध, बकवध, चैत्ररथ, देवी द्रौपदीका स्वयंवर, क्षत्रियधर्मसे राजाओंपर विजयप्राप्तिपूर्वक वैवाहिक विधि, विदुरागमन, राज्यलम्भ, अर्जुनका वनवास, सुभद्राका हरण, हरणाहरण, खाण्डवदाह तथा मयदानवसे मिलनेका प्रसंग—यहाँतककी कथा आदिपर्वमें कही गयी है ॥ ८५-८८ १/२ ॥
पौष्ये पर्वणि माहात्म्यमुत्तङ्कस्योपवर्णितम् ॥ ८९ ॥ पौलोमे भृगुवंशस्य विस्तारः परिकीर्तितः। आस्तीके सर्वनागानां गरुडस्य च सम्भवः ॥ ९० ॥
पौष्यपर्वमें उत्तंकके माहात्म्यका वर्णन है। पौलोमपर्वमें भृगुवंशके विस्तारका वर्णन है। आस्तीकपर्वमें सब नागों तथा गरुड़की उत्पत्तिकी कथा है ॥ ८९-९० ॥
क्षीरोदमथनं चैव जन्मोच्चैःश्रवसस्तथा । यजतः सर्पसत्रेण राज्ञः पारीक्षितस्य च ॥ ९१ ॥ कथेयमभिनिर्वृत्ता भरतानां महात्मनाम् । विविधाः सम्भवा राज्ञामुक्ताः सम्भवपर्वणि ॥ ९२ ॥ अन्येषां चैव शूराणामृषेर्द्वैपायनस्य च । अंशावतरणं चात्र देवानां परिकीर्तितम् ॥ ९३ ॥
इसी पर्वमें क्षीरसागरके मन्थन और उच्चैःश्रवा घोड़ेके जन्मकी भी कथा है। परीक्षित्नन्दन राजा जनमेजयके सर्पयज्ञमें इन भरतवंशी महात्मा राजाओंकी कथा कही गयी है। सम्भवपर्वमें राजाओंके भिन्न-भिन्न प्रकारके जन्मसम्बन्धी वृत्तान्तोंका वर्णन है। इसीमें दूसरे शूरवीरों तथा महर्षि द्वैपायनके जन्मकी कथा भी है। यहीं देवताओंके अंशावतरणकी कथा कही गयी है ।। ९१—९३ ।।
दैत्यानां दानवानां च यक्षाणां च महौजसाम् ।
नागानामथ सर्पाणां गन्धर्वाणां पतत्त्रिणाम् ।। ९४ ।।
अन्येषां चैव भूतानां विविधानां समुद्भवः ।
महर्षेराश्रमपदे कण्वस्य च तपस्विनः ।। ९५ ।।
शकुन्तलायां दुष्यन्ताद् भरतश्चापि जज्ञिवान् ।
यस्य लोकेषु नाम्नेदं प्रथितं भारतं कुलम् ।। ९६ ।।
इसी पर्वमें अत्यन्त प्रभावशाली दैत्य, दानव, यक्ष, नाग, सर्प, गन्धर्व और पक्षियों तथा अन्य विविध प्रकारके प्राणियोंकी उत्पत्तिका वर्णन है। परम तपस्वी महर्षि कण्वके आश्रममें दुष्यन्तके द्वारा शकुन्तलाके गर्भसे भरतके जन्मकी कथा भी इसीमें है। उन्हीं महात्मा भरतके नामसे यह भरतवंश संसारमें प्रसिद्ध हुआ है ।। ९४—९६ ।।
वसूनां पुनरुत्पत्तिर्भागीरथ्यां महात्मनाम् ।
शान्तनोर्वेश्मनि पुनस्तेषां चारोहणं दिवि ।। ९७ ।।
इसके बाद महाराज शान्तनुके गृहमें भागीरथी गंगाके गर्भसे महात्मा वसुओंकी उत्पत्ति एवं फिरसे उनके स्वर्गमें जानेका वर्णन किया गया है ।। ९७ ।।
तेजोंऽशानां च सम्पातो भीष्मस्याप्यत्र सम्भवः ।
राज्यान्निवर्तनं तस्य ब्रह्मचर्यव्रते स्थितिः ।। ९८ ।।
प्रतिज्ञापालनं चैव रक्षा चित्राङ्गदस्य च ।
हते चित्राङ्गदे चैव रक्षा भ्रातुर्यवीयसः ।। ९९ ।।
विचित्रवीर्यस्य तथा राज्ये सम्प्रतिपादनम् ।
धर्मस्य नृषु सम्भूतिरणीमाण्डव्यशापजा ।। १०० ।।
कृष्णद्वैपायनाच्चैव प्रसूतिर्वरदानजा ।
धृतराष्ट्रस्य पाण्डोश्च पाण्डवानां च सम्भवः ।। १०१ ।।
इसी पर्वमें वसुओंके तेजके अंशभूत भीष्मके जन्मकी कथा भी है। उनकी राज्यभोगसे निवृत्ति, आजीवन ब्रह्मचर्यव्रतमें स्थित रहनेकी प्रतिज्ञा, प्रतिज्ञापालन, चित्रांगदकी रक्षा और चित्रांगदकी मृत्यु हो जानेपर छोटे भाई विचित्रवीर्यकी रक्षा, उन्हें राज्य-समर्पण, अणीमाण्डव्यके शापसे भगवान् धर्मकी विदुरके रूपमें मनुष्योंमें उत्पत्ति, श्रीकृष्णद्वैपायनके वरदानके कारण धृतराष्ट्र एवं पाण्डुका जन्म और इसी प्रसंगमें पाण्डवोंकी उत्पत्ति-कथा भी है ।। ९८—१०१ ।।
वारणावतयात्रायां मन्त्रो दुर्योधनस्य च । कूटस्य धार्तराष्ट्रेण प्रेषणं पाण्डवान् प्रति ॥ १०२ ॥ हितोपदेशश्च पथि धर्मराजस्य धीमतः । विदुरेण कृतो यत्र हितार्थं म्लेच्छभाषया ॥ १०३ ॥ लाक्षागृहदाहपर्वमें पाण्डवोंकी वारणावत-यात्राके प्रसंगमें दुर्योधनके गुप्त षड्यन्त्रका वर्णन है। उसका पाण्डवोंके पास कूटनीतिज्ञ पुरोचनको भेजनेका भी प्रसंग है। मार्गमें विदुरजीने बुद्धिमान् युधिष्ठिरके हितके लिये म्लेच्छभाषामें जो हितोपदेश किया, उसका भी वर्णन है ॥ १०२-१०३ ॥
विदुरस्य च वाक्येन सुरङ्गोपक्रमक्रिया । निषाद्याः पञ्चपुत्रायाः सुप्ताया जतुवेश्मनि ॥ १०४ ॥ पुरोचनस्य चात्रैव दहनं सम्प्रकीर्तितम् । पाण्डवानां वने घोरे हिडिम्बायाश्च दर्शनम् ॥ १०५ ॥ तत्रैव च हिडिम्बस्य वधो भीमन्महाबलात् । घटोत्कचस्य चोत्पत्तिरत्रैव परिकीर्तिता ॥ १०६ ॥ फिर विदुरकी बात मानकर सुरंग खुदवानेका कार्य आरम्भ किया गया। उसी लाक्षागृहमें अपने पाँच पुत्रोंके साथ सोती हुई एक भीलनी और पुरोचन भी जल मरे—यह सब कथा कही गयी है। हिडिम्बवधपर्वमें घोर वनके मार्गसे यात्रा करते समय पाण्डवोंको हिडिम्बाके दर्शन, महाबली भीमसेनके द्वारा हिडिम्बासुरके वध तथा घटोत्कचके जन्मकी कथा कही गयी है ॥ १०४—१०६ ॥
महर्षेर्दर्शनं चैव व्यासस्यामिततेजसः । तदाज्ञयैकचक्रायां ब्राह्मणस्य निवेशने ॥ १०७ ॥ अज्ञातचर्यया वासो यत्र तेषां प्रकीर्तितः । बकस्य निधनं चैव नागराणां च विस्मयः ॥ १०८ ॥ अमिततेजस्वी महर्षि व्यासका पाण्डवोंसे मिलना और उनकी आज्ञासे एकचक्रा नगरीमें ब्राह्मणके घर पाण्डवोंके गुप्त निवासका वर्णन है। वहीं रहते समय उन्होंने बकासुरका वध किया, जिससे नागरिकोंको बड़ा भारी आश्चर्य हुआ ॥ १०७-१०८ ॥
सम्भवश्चैव कृष्णाया धृष्टद्युम्नस्य चैव ह । ब्राह्मणात् समुपश्रुत्य व्यासवाक्यप्रचोदिताः ॥ १०९ ॥ द्रौपदीं प्रार्थयन्तस्ते स्वयंवरदिदृक्षया । पञ्चालानभितो जग्मुर्यत्र कौतूहलान्विताः ॥ ११० ॥ इसके अनन्तर कृष्णा (द्रौपदी) और उसके भाई धृष्टद्युम्नकी उत्पत्तिका वर्णन है। जब पाण्डवोंको ब्राह्मणके मुखसे यह संवाद मिला, तब वे महर्षि व्यासकी आज्ञासे द्रौपदीकी
प्राप्तिके लिये कौतूहलपूर्ण चित्तसे स्वयंवर देखने पांचालदेशकी ओर चल पड़े॥ १०९-११०॥
अङ्गारपर्णं निर्जित्य गङ्गाकूलेऽर्जुनस्तदा । सख्यं कृत्वा ततस्तेन तस्मादेव च शुश्रुवे ॥ १११ ॥ तापत्यमथ वासिष्ठमौर्वं चाख्यानमुत्तमम् । भ्रातृभिः सहितः सर्वैः पञ्चालानभितो ययौ ॥ ११२ ॥ पाञ्चालनगरे चापि लक्ष्यं भित्त्वा धनंजयः । द्रौपदीं लब्धवानत्र मध्ये सर्वमहीक्षिताम् ॥ ११३ ॥ भीमसेनार्जुनौ यत्र संरब्धान् पृथिवीपतीन् । शल्यकर्णौ च तरसा जितवन्तौ महामृधे ॥ ११४ ॥ चैत्ररथपर्वमें गंगाके तटपर अर्जुनने अंगारपर्ण गन्धर्वको जीतकर उससे मित्रता कर ली और उसीके मुखसे तपती, वसिष्ठ और और्वके उत्तम आख्यान सुने। फिर अर्जुनने वहाँसे अपने सभी भाइयोंके साथ पांचालकी ओर यात्रा की। तदनन्तर अर्जुनने पांचालनगरके बड़े-बड़े राजाओंसे भरी सभामें लक्ष्यवेध करके द्रौपदीको प्राप्त किया—यह कथा भी इसी पर्वमें है। वहीं भीमसेन और अर्जुनने रणांगणमें युद्धके लिये संनद्ध क्रोधान्ध राजाओंको तथा शल्य और कर्णको भी अपने पराक्रमसे पराजित कर दिया॥ १११—११४॥
दृष्ट्वा तयोश्च तद्वीर्यमप्रमेयममानुषम् । शङ्कमानौ पाण्डवांस्तान् रामकृष्णौ महामती ॥ ११५ ॥ जग्मतुस्तैः समागन्तुं शालां भार्गववेश्मनि । पञ्चानामेकपत्नीत्वे विमर्शो द्रुपदस्य च ॥ ११६ ॥ महामति बलराम एवं भगवान् श्रीकृष्णने जब भीमसेन एवं अर्जुनके अपरिमित और अतिमानुष बल-वीर्यको देखा, तब उन्हें यह शंका हुई कि कहीं ये पाण्डव तो नहीं हैं। फिर वे दोनों उनसे मिलनेके लिये कुम्हारके घर आये। इसके पश्चात् द्रुपदने ‘पाँचों पाण्डवोंकी एक ही पत्नी कैसे हो सकती है’—इस सम्बन्धमें विचार-विमर्श किया॥ ११५-११६॥
पञ्चेन्द्राणामुपाख्यानमत्रैवाद्भुतमुच्यते । द्रौपद्या देवविहितो विवाहश्चाप्यमानुषः ॥ ११७ ॥ इसी वैवाहिकपर्वमें पाँच इन्द्रोंका अद्भुत उपाख्यान और द्रौपदीके देवविहित तथा मनुष्य-परम्पराके विपरीत विवाहका वर्णन हुआ है॥ ११७॥
क्षत्तुश्च धृतराष्ट्रेण प्रेषणं पाण्डवान् प्रति । विदुरस्य च सम्प्राप्तिर्दर्शनं केशवस्य च ॥ ११८ ॥ इसके बाद धृतराष्ट्रने पाण्डवोंके पास विदुरजीको भेजा है, विदुरजी पाण्डवोंसे मिले हैं तथा उन्हें श्रीकृष्णका दर्शन हुआ है॥ ११८॥
खाण्डवप्रस्थवासश्च तथा राज्यार्धसर्जनम् ।
नारदस्याज्ञया चैव द्रौपद्याः समयक्रिया ॥ ११९ ॥ इसके पश्चात् धृतराष्ट्रका पाण्डवोंको आधा राज्य देना, इन्द्रप्रस्थमें पाण्डवोंका निवास करना एवं नारदजीकी आज्ञासे द्रौपदीके पास आने-जानेके सम्बन्धमें समय-निर्धारण आदि विषयोंका वर्णन है ॥ ११९ ॥
सुन्दोपसुन्दयोस्तद्वदाख्यानं परिकीर्तितम् । अनन्तरं च द्रौपद्या सहासीनं युधिष्ठिरम् ॥ १२० ॥ अनुप्रविश्य विप्रार्थे फाल्गुनो गृह्य चायुधम् । मोक्षयित्वा गृहं गत्वा विप्रार्थं कृतनिश्चयः ॥ १२१ ॥ समयं पालयन् वीरो वनं यत्र जगाम ह । पार्थस्य वनवासे च उलूप्या पथि संगमः ॥ १२२ ॥ इसी प्रसंगमें सुन्द और उपसुन्दके उपाख्यानका भी वर्णन है। तदनन्तर एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर द्रौपदीके साथ बैठे हुए थे। अर्जुनने ब्राह्मणके लिये नियम तोड़कर वहाँ प्रवेश किया और अपने आयुध लेकर ब्राह्मणकी वस्तु उसे प्राप्त करा दी और दृढ़ निश्चय करके वीरताके साथ मर्यादापालनके लिये वनमें चले गये। इसी प्रसंगमें यह कथा भी कही गयी है कि वनवासके अवसरपर मार्गमें ही अर्जुन और उलूपीका मेल-मिलाप हो गया ॥ १२०-१२२ ॥
पुण्यतीर्थानुसंयानं बभ्रुवाहनजन्म च । तत्रैव मोक्षयामास पञ्च सोऽप्सरसः शुभाः ॥ १२३ ॥ शापाद् ग्राहत्वमापन्ना ब्राह्मणस्य तपस्विनः । प्रभासतीर्थे पार्थेन कृष्णस्य च समागमः ॥ १२४ ॥ इसके बाद अर्जुनने पवित्र तीर्थोंकी यात्रा की है। इसी समय चित्रांगदाके गर्भसे बभ्रुवाहनका जन्म हुआ है और इसी यात्रामें उन्होंने पाँच शुभ अप्सराओंको मुक्तिदान किया, जो एक तपस्वी ब्राह्मणके शापसे ग्राह हो गयी थीं। फिर प्रभासतीर्थमें श्रीकृष्ण और अर्जुनके मिलनका वर्णन है ॥ १२३-१२४ ॥
द्वारकायां सुभद्रा च कामयानेन कामिनी । वासुदेवस्यानुमते प्राप्ता चैव किरीटिना ॥ १२५ ॥ तत्पश्चात् यह बताया गया है कि द्वारकामें सुभद्रा और अर्जुन परस्पर एक-दूसरेपर आसक्त हो गये, उसके बाद श्रीकृष्णकी अनुमतिसे अर्जुनने सुभद्राको हर लिया ॥ १२५ ॥
गृहीत्वा हरणं प्राप्ते कृष्णे देवकिनन्दने । अभिमन्योः सुभद्रायां जन्म चोत्तमतेजसः ॥ १२६ ॥ तदनन्तर देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके दहेज लेकर पाण्डवोंके पास पहुँचनेकी और सुभद्राके गर्भसे परम तेजस्वी वीर बालक अभिमन्युके जन्मकी कथा है ॥ १२६ ॥
द्रौपद्यास्तनयानां च सम्भवोऽनुप्रकीर्तितः ।
विहारार्थं च गतयोः कृष्णयोर्यमुनामनु ॥ १२७ ॥ सम्प्राप्तिश्चक्रधनुषोः खाण्डवस्य च दाहनम् । मयस्य मोक्षो ज्वलनाद् भुजङ्गस्य च मोक्षणम् ॥ १२८ ॥ इसके पश्चात् द्रौपदीके पुत्रोंकी उत्पत्तिकी कथा है। तदनन्तर जब श्रीकृष्ण और अर्जुन यमुनाजीके तटपर विहार करनेके लिये गये हुए थे, तब उन्हें जिस प्रकार चक्र और धनुषकी प्राप्ति हुई, उसका वर्णन है। साथ ही खाण्डववनके दाह, मयदानवके छुटकारे और अग्निकाण्डसे सर्पके सर्वथा बच जानेका वर्णन हुआ है ॥ १२७-१२८ ॥
महर्षेर्मन्दपालस्य शार्ङ्ग्या तनयसम्भवः । इत्येतदादिपर्वोक्तं प्रथमं बहुविस्तरम् ॥ १२९ ॥ इसके बाद महर्षि मन्दपालका शार्ङ्गी पक्षीके गर्भसे पुत्र उत्पन्न करनेकी कथा है। इस प्रकार इस अत्यन्त विस्तृत आदिपर्वका सबसे प्रथम निरूपण हुआ है ॥ १२९ ॥
अध्यायानां शते द्वे तु संख्याते परर्षिणा । सप्तविंशतिरध्याया व्यासेनोत्तमतेजसा ॥ १३० ॥ परमर्षि एवं परम तेजस्वी महर्षि व्यासने इस पर्वमें दो सौ सत्ताईस (२२७) अध्यायोंकी रचना की है ॥ १३० ॥
अष्टौ श्लोकसहस्राणि अष्टौ श्लोकशतानि च । श्लोकाश्च चतुराशीतिर्मुनिनोक्ता महात्मना ॥ १३१ ॥ महात्मा व्यास मुनिने इन दो सौ सत्ताईस (२२७) अध्यायोंमें आठ हजार आठ सौ चौरासी (८,८८४) श्लोक कहे हैं ॥ १३१ ॥
द्वितीयं तु सभापर्व बहुवृत्तान्तमुच्यते । सभाक्रिया पाण्डवानां किङ्कराणां च दर्शनम् ॥ १३२ ॥ लोकपालसभाख्यानं नारदाद् देवदर्शिनः । राजसूयस्य चारम्भो जरासन्धवधस्तथा ॥ १३३ ॥ गिरिव्रजे निरुद्धानां राज्ञां कृष्णेन मोक्षणम् । तथा दिग्विजयोऽत्रैव पाण्डवानां प्रकीर्तितः ॥ १३४ ॥ दूसरा सभापर्व है। इसमें बहुत-से वृत्तान्तोंका वर्णन है। पाण्डवोंका सभानिर्माण, किंकर नामक राक्षसोंका दीखना, देवर्षि नारदद्वारा लोकपालोंकी सभाका वर्णन, राजसूययज्ञका आरम्भ एवं जरासन्धवध, गिरिव्रजमें बंदी राजाओंका श्रीकृष्णके द्वारा छुड़ाया जाना और पाण्डवोंकी दिग्विजयका भी इसी सभापर्वमें वर्णन किया गया है ॥ १३२—१३४ ॥
राज्ञामागमनं चैव सार्हणानां महाक्रतौ । राजसूयेऽर्घसंवादे शिशुपालवधस्तथा ॥ १३५ ॥