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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

'श्रीकृष्ण! चार कारणोंसे आपको सदा मेरी रक्षा करनी चाहिये। एक तो आप मेरे सम्बन्धी हैं, दूसरे अग्निकुण्डमें उत्पन्न होनेके कारण मैं गौरवशालिनी हूँ, तीसरे आपकी सच्ची सखी हूँ और चौथे आप मेरी रक्षा करनेमें समर्थ हैं' ॥ १२७ ॥

वैशम्पायन उवाच

अथ तामब्रवीत् कृष्णस्तस्मिन् वीरसमागमे ।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने वीरोंके उस समुदायमें द्रौपदीसे इस प्रकार कहा ॥ १२७ १/२ ॥

वासुदेव उवाच

रोदिष्यन्ति स्त्रियो ह्येवं येषां क्रुद्धासि भाविनि ।
बीभत्सुशरसंछन्नाञ्छोणितौघपरिप्लुतान् ॥ १२८ ॥
निहतान् वल्लभान् वीक्ष्य शयानान् वसुधातले ।
यत् समर्थं पाण्डवानां तत् करिष्यामि मा शुचः ॥ १२९ ॥
**श्रीकृष्ण बोले—**भाविनि! तुम जिनपर क्रुद्ध हुई हो, उनकी स्त्रियाँ भी अपने प्राणप्यारे पतियोंको अर्जुनके बाणोंसे छिन्न-भिन्न और खूनसे लथपथ हो मरकर धरतीपर पड़ा देख इसी प्रकार रोयेंगी। पाण्डवोंके हितके लिये जो कुछ भी सम्भव है, वह सब करूँगा, शोक न करो ॥ १२८-१२९ ॥

सत्यं ते प्रतिजानामि राज्ञां राज्ञी भविष्यसि ।
पतेद् द्यौर्हिमवाञ्छीर्येत् पृथिवी शकलीभवेत् ॥ १३० ॥
शुष्येत् तोयनिधिः कृष्णे न मे मोघं वचो भवेत् ।
तच्छ्रुत्वा द्रौपदी वाक्यं प्रतिवाक्यमथाच्युतात् ॥ १३१ ॥
साचीकृतमवेक्षत् सा पाञ्चाली मध्यमं पतिम् ।
आबभाषे महाराज द्रौपदीमर्जुनस्तदा ॥ १३२ ॥
मैं सत्य प्रतिज्ञापूर्वक कह रहा हूँ कि तुम राजरानी बनोगी। कृष्णे! आसमान फट पड़े, हिमालय पर्वत विदीर्ण हो जाय, पृथ्‍वीके टुकड़े-टुकड़े हो जायँ और समुद्र सूख जाय, किंतु मेरी यह बात झूठी नहीं हो सकती। द्रौपदीने अपनी बातोंके उत्तरमें भगवान् श्रीकृष्णके मुखसे ऐसी बातें सुनकर तिरछी चितवनसे अपने मझले पति अर्जुनकी ओर देखा। महाराज! तब अर्जुनने द्रौपदीसे कहा— ॥ १३०—१३२ ॥

मा रोदीः शुभताम्राक्षि यदाह मधुसूदनः ।
तथा तद् भविता देवि नान्यथा वरवर्णिनि ॥ १३३ ॥
‘लालिमायुक्त सुन्दर नेत्रोंवाली देवि! वरवर्णिनि! रोओ मत। भगवान् मधुसूदन जो कुछ कह रहे हैं, वह अवश्य होकर रहेगा; टल नहीं सकता’ ॥ १३३ ॥

धृष्टद्युम्न उवाच

अहं द्रोणं हनिष्यामि शिखण्डी तु पितामहम् ।
दुर्योधनं भीमसेनः कर्णं हन्ता धनंजयः ॥ १३४ ॥
रामकृष्णौ व्यपाश्रित्य अजेयाः स्म रणे स्वसः ।
अपि वृत्रहणा युद्धे किं पुनर्धृतराष्ट्रजे ॥ १३५ ॥
धृष्टद्युम्नने कहा—बहिन! मैं द्रोणको मार डालूँगा, शिखण्डी भीष्मका वध करेंगे, भीमसेन दुर्योधनको मार गिरायेंगे और अर्जुन कर्णको यमलोक भेज देंगे। भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामका आश्रय पाकर हमलोग युद्धमें शत्रुओंके लिये अजेय हैं। इन्द्र भी हमें रणमें परास्त नहीं कर सकते। फिर धृतराष्ट्रके पुत्रोंकी तो बात ही क्या है? ॥ १३४-१३५ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्तेऽभिमुखा वीरा वासुदेवमुपास्थिताः ।
तेषां मध्ये महाबाहुः केशवो वाक्यमब्रवीत् ॥ १३६ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! धृष्टद्युम्नके ऐसा कहनेपर वहाँ बैठे हुए वीर भगवान् श्रीकृष्णकी ओर देखने लगे। उनके बीचमें बैठे हुए महाबाहु केशवने उनसे ऐसा कहा ॥ १३६ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि द्रौपद्याश्वासने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें द्रौपदी-आश्वासनविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १२ ।।


* यत्रसायंगृह मुनि वे होते हैं, जो जहाँ सायंकाल हो जाता है वहीं घरकी तरह रातभर निवास करते हैं।
* आदिपर्वके १४७वें अध्यायके लाक्षागृहदाहप्रसंगमें बतलाया है कि ‘भीमसेनने माताको तो कंधेपर चढ़ा लिया और नकुल-सहदेवको गोदमें उठा लिया तथा शेष दोनों भाइयोंको दोनों हाथोंसे पकड़कर उन्हें सहारा देते हुए चलने लगे।’ इस कथनसे द्रौपदीके वचन भिन्न हैं; क्योंकि द्रौपदीका उस समय विवाह नहीं हुआ था, अतः द्रौपदी इस बातको ठीक-ठीक नहीं जानती थी, इसीसे वह लोगोंके मुखसे सुनी-सुनायी बात अनुमानसे कह रही है; अतः लाक्षागृहदाहके प्रसंगकी बात ही ठीक है।

अध्याय (पृष्ठ 138)

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त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीकृष्णका जूएके दोष बताते हुए पाण्डवोंपर आयी हुई विपत्तिमें अपनी अनुपस्थितिको कारण मानना

वासुदेव उवाच

नैतत् कृच्छ्रमनुप्राप्तो भवान् स्याद् वसुधाधिप ।
यद्यहं द्वारकायां स्यां राजन् संनिहितः पुरा ॥ १ ॥
**भगवान् श्रीकृष्ण बोले—**राजन्! यदि मैं पहले द्वारकामें या उसके निकट होता तो आप इस भारी संकटमें नहीं पड़ते ॥ १ ॥

आगच्छेयमहं द्यूतमनाहूतोऽपि कौरवैः ।
आम्बिकेयेन दुर्धर्ष राज्ञा दुर्योधनेन च ।
वारयेयमहं द्यूतं बहून् दोषान् प्रदर्शयन् ॥ २ ॥
दुर्जय वीर! अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र, राजा दुर्योधन तथा अन्य कौरवोंके बिना बुलाये भी मैं उस द्यूतसभामें आता और जूएके अनेक दोष दिखाकर उसे रोकनेकी चेष्टा करता ॥ २ ॥

भीष्मद्रोणौ समानाय्य कृपं बाह्लीकमेव च ।
वैचित्रवीर्यं राजानमलं द्यूतेन कौरव ॥ ३ ॥
पुत्राणां तव राजेन्द्र त्वन्निमित्तमिति प्रभो ।
तत्राचक्षमहं दोषान् यैर्भवान् व्यतिरोपितः ॥ ४ ॥
प्रभो! मैं आपके लिये भीष्म, द्रोण, कृप, बाह्लीक तथा राजा धृतराष्ट्रको बुलाकर कहता—'कुरुवंशके महाराज! आपके पुत्रोंको जूआ नहीं खेलना चाहिये।' राजन्! मैं द्यूतसभामें जूएके उन दोषोंको स्पष्टरूपसे बताता, जिनके कारण आपको अपने राज्यसे वंचित होना पड़ा है ॥ ३-४ ॥

वीरसेनसुतो यैस्तु राज्यात् प्रभ्रंशितः पुरा ।
अतर्कितविनाशश्च देवनेन विशाम्पते ॥ ५ ॥
तथा जिन दोषोंने पूर्वकालमें वीरसेनपुत्र महाराज नलको राजसिंहासनसे च्युत किया। नरेश्वर! जूआ खेलनेसे सहसा ऐसा सर्वनाश उपस्थित हो जाता है, जो कल्पनामें भी नहीं आ सकता ॥ ५ ॥

सातत्यं च प्रसङ्गस्य वर्णयेयं यथातथम् ॥ ६ ॥
इसके सिवा उससे सदा जूआ खेलनेकी आदत बन जाती है। यह सब बातें मैं ठीक-ठीक बता रहा हूँ ॥ ६ ॥

स्त्रियोऽक्षा मृगया पानमेतत् कामसमुत्थितम् । दुःखं चतुष्टयं प्रोक्तं यैर्नरो भ्रश्यते श्रियः ॥ ७ ॥ तत्र सर्वत्र वक्तव्यं मन्यन्ते शास्त्रकोविदाः । विशेषतश्च वक्तव्यं द्यूते पश्यन्ति तद्विदः ॥ ८ ॥ स्त्रियोंके प्रति आसक्ति, जूआ खेलना, शिकार खेलनेका शौक और मद्यपान—ये चार प्रकारके भोग कामनाजनित दुःख बताये गये हैं, जिनके कारण मनुष्य अपने धन-ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाता है। शास्त्रोंके निपुण विद्वान् सभी परिस्थितियोंमें इन चारोंको निन्दनीय मानते हैं; परंतु द्यूतक्रीड़ाको तो जूएके दोष जाननेवाले लोग विशेषरूपसे निन्दनीय समझते हैं॥ ७-८ ॥ एकाहाद् द्रव्यनाशोऽत्र ध्रुवं व्यसनमेव च । अभुक्तनाशश्चार्थानां वाक्पारुष्यं च केवलम् ॥ ९ ॥ एतच्चान्यच्च कौरव्य प्रसङ्गिकटुकोदयम् । द्यूते ब्रूयां महाबाहो समासाद्याम्बिकासुतम् ॥ १० ॥ जूएसे एक ही दिनमें सारे धनका नाश हो जाता है। साथ ही जूआ खेलनेसे उसके प्रति आसक्ति होनी निश्चित है। समस्त भोग-पदार्थोंका बिना भोगे ही नाश हो जाता है और बदलेमें केवल कटुवचन सुननेको मिलते हैं। कुरुनन्दन! ये तथा और भी बहुत-से दोष हैं, जो जूएके प्रसंगसे कटु परिणाम उत्पन्न करनेवाले हैं। महाबाहो! मैं धृतराष्ट्रसे मिलकर जूएके ये सभी दोष बतलाता ॥ ९-१० ॥ एवमुक्तो यदि मया गृह्णीयाद् वचनं मम । अनामयं स्याद् धर्मश्च कुरूणां कुरुवर्धन ॥ ११ ॥ कुरुवर्धन! मेरे इस प्रकार समझाने-बुझानेपर यदि वे मेरी बात मान लेते तो कौरवोंमें शान्ति बनी रहती और धर्मका भी पालन होता ॥ ११ ॥ न चेत् स मम राजेन्द्र गृह्णीयान्मधुरं वचः । पथ्यं च भरतश्रेष्ठ निगृह्णीयां बलेन तम् ॥ १२ ॥ राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! यदि वे मेरे मधुर एवं हितकर वचनको सुनकर उसे न मानते तो मैं उन्हें बलपूर्वक रोक देता ॥ १२ ॥ अथैनमपनीतेन सुहृदो नाम दुर्हृदः । सभासदोऽनुवर्तेरंस्तांश्च हन्यां दुरोदरान् ॥ १३ ॥ यदि वहाँ सुहृदनामधारी शत्रु अन्यायका आश्रय ले इस धृतराष्ट्रका साथ देते तो मैं उन सभासद जुआरियोंको मार डालता ॥ १३ ॥ असांनिध्यं तु कौरव्य ममानर्तेष्वभूत् तदा । येनेदं व्यसनं प्राप्ता भवन्तो द्यूतकारितम् ॥ १४ ॥

कुरुश्रेष्ठ! मैं उन दिनों आनर्तदेशमें ही नहीं था, इसीलिये आपलोगोंपर यह द्यूतजनित संकट आ गया ।। १४ ।।
सोऽहमेत्य कुरुश्रेष्ठ द्वारकां पाण्डुनन्दन ।
अश्रौषं त्वां व्यसनिनं युयुधानाद् यथातथम् ।। १५ ।।
कुरुप्रवर पाण्डुनन्दन! जब मैं द्वारकामें आया, तब सात्यकिसे आपके संकटमें पड़नेका यथावत् समाचार सुना ।। १५ ।।
श्रुत्वैव चाहं राजेन्द्र परमोद्विग्नमानसः ।
तूर्णमभ्यागतोऽस्मि त्वां द्रष्टुकामो विशाम्पते ।। १६ ।।
राजेन्द्र! वह सुनते ही मेरा मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठा और प्रजेश्वर! मैं तुरंत ही आपसे मिलनेके लिये चला आया ।। १६ ।।
अहो कृच्छ्रमनुप्राप्ताः सर्वे स्म भरतर्षभ ।
सोऽहं त्वां व्यसने मग्नं पश्यामि सह सोदरैः ।। १७ ।।
भरतकुलभूषण! अहो! आप सब लोग बड़ी कठिनाईमें पड़ गये हैं। मैं तो आपको सब भाइयोंसहित विपत्तिके समुद्रमें डूबा हुआ देख रहा हूँ ।। १७ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि वासुदेववाक्ये त्रयोदशोऽध्यायः ।। १३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें वासुदेववाक्यविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १३ ।।

द्यूतके समय न पहुँचनेमें श्रीकृष्णके द्वारा शाल्वके साथ युद्ध करने और सौभविमानसहित उसे नष्ट करनेका संक्षिप्त वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुर्दशोऽध्यायः

द्यूतके समय न पहुँचनेमें श्रीकृष्णके द्वारा शाल्वके साथ युद्ध करने और सौभविमानसहित उसे नष्ट करनेका संक्षिप्त वर्णन

युधिष्ठिर उवाच
असांनिध्यं कथं कृष्ण तवासीद् वृष्णिनन्दन ।
क्व चासीद् विप्रवासस्ते किं चाकार्षीः प्रवासतः ॥ १ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**वृष्णिकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीकृष्ण! जब यहाँ द्यूतक्रीडाका आयोजन हो रहा था, उस समय तुम द्वारकामें क्यों अनुपस्थित रहे? उन दिनों तुम्हारा निवास कहाँ था और उस प्रवासके द्वारा तुमने कौन-सा कार्य सिद्ध किया? ॥ १ ॥

श्रीकृष्ण उवाच
शाल्वस्य नगरं सौभं गतोऽहं भरतर्षभ ।
निहन्तुं कौरवश्रेष्ठ तत्र मे शृणु कारणम् ॥ २ ॥
महातेजा महाबाहुर्यः स राजा महायशाः ।
दमघोषात्मजो वीरः शिशुपालो मया हतः ॥ ३ ॥
यज्ञे ते भरतश्रेष्ठ राजसूयेऽर्हणां प्रति ।
स रोषवशमापन्नो नामृष्यत दुरात्मवान् ॥ ४ ॥
श्रुत्वा तं निहतं शाल्वस्तीव्ररोषसमन्वितः ।
उपायाद् द्वारकां शून्यामिहस्थे मयि भारत ॥ ५ ॥
**श्रीकृष्णने कहा—**भरतवंशशिरोमणे! कुरुकुलभूषण! मैं उन दिनों शाल्वके सौभ नामक नगराकार विमानको नष्ट करनेके लिये गया हुआ था। इसका क्या कारण था, वह बतलाता हूँ, सुनिये। भरतश्रेष्ठ! आपके राजसूययज्ञमें अग्रपूजाके प्रश्नको लेकर जो क्रोधके वशीभूत हो इस कार्यको नहीं सह सका था और इसीलिये जिस दुरात्मा, महातेजस्वी, महाबाहु एवं महायशस्वी दमघोषनन्दन वीर राजा शिशुपालको मैंने मार डाला था; उसकी मृत्युका समाचार सुनकर शाल्व प्रचण्ड रोषसे भर गया। भारत! मैं तो यहाँ हस्तिनापुरमें था और वह हमलोगोंसे सूनी द्वारकापुरीमें जा पहुँचा ॥ २—५ ॥

स तत्र योधितो राजन् कुमारैर्वृष्णिपुङ्गवैः ।
आगतः कामगं सौभमारुह्यैव नृशंसवत् ॥ ६ ॥
राजन्! वहाँ वृष्णिवंशके श्रेष्ठ कुमारोंने उसके साथ युद्ध किया। वह इच्छानुसार चलनेवाले सौभ नामक विमानपर बैठकर आया और क्रूर मनुष्यकी भाँति यादवोंकी हत्या

करने लगा ।। ६ ।।
ततो वृष्णिप्रवीरांस्तान् बालान् हत्वा बहूंस्तदा ।
पुरोद्यानानि सर्वाणि भेदयामास दुर्मतिः ।। ७ ।।
उस खोटी बुद्धिवाले शाल्वने वृष्णिवंशके बहुतेरे बालकोंका वध करके नगरके सब बगीचोंको उजाड़ डाला ।। ७ ।।
उक्तवांश्च महाबाहो क्वासौ वृष्णिकुलाधमः ।
वासुदेवः स मन्दात्मा वसुदेवसुतो गतः ।। ८ ।।
महाबाहो! उसने यादवोंसे पूछा—‘वह वृष्णिकुलका कलंक मन्दात्मा वसुदेवपुत्र वासुदेव कहाँ है? ।। ८ ।।
तस्य युद्धार्थिनो दर्पं युद्धे नाशयितास्म्यहम् ।
आनर्ताः सत्यमाख्यात तत्र गन्तास्मि यत्र सः ।। ९ ।।
तं हत्वा विनिवर्तिष्ये कंसकेशिनिषूदनम् ।
अहत्वा न निवर्तिष्ये सत्येनायुधमालभे ।। १० ।।
‘उसे युद्धकी बड़ी इच्छा रहती है, आज उसके घमंडको मैं चूर कर दूँगा। आनर्तनिवासियो! सच-सच बतला दो। वह कहाँ है? जहाँ होगा, वहीं जाऊँगा और कंस तथा केशीका संहार करनेवाले उस कृष्णको मारकर ही लौटूँगा। मैं अपने अस्त्र-शस्त्रोंको छूकर सत्यकी सौगन्ध खाता हूँ कि अब कृष्णको मारे बिना नहीं लौटूँगा’ ।। ९-१० ।।
क्वासौ क्वास़ाविति पुनस्तत्र तत्र प्रधावति ।
मया किल रणे योद्धुं काङ्क्षमाणः स सौभराट् ।। ११ ।।
सौभविमानका स्वामी शाल्व संग्रामभूमिमें मेरे साथ युद्धकी इच्छा रखकर चारों ओर दौड़ता और सबसे यही पूछता था कि ‘वह कहाँ है, कहाँ है?’ ।। ११ ।।
अद्य तं पापकर्मार्णं क्षुद्रं विश्वासघातिनम् ।
शिशुपालवधामर्षाद् गमयिष्ये यमक्षयम् ।। १२ ।।
मम पापस्वभावेन भ्राता येन निपातितः ।
शिशुपालो महीपालस्तं वधिष्ये महीपते ।। १३ ।।
राजन्! साथ ही वह यह भी कहता था कि ‘आज उस नीच पापाचारी और विश्वासघाती कृष्णको शिशुपालवधके अमर्षके कारण मैं यमलोक भेज दूँगा। उस पापीने मेरे भाई राजा शिशुपालको मार गिराया है, अतः मैं भी उसका वध करूँगा ।। १२-१३ ।।
भ्राता बालश्च राजा च न च संग्राममूर्धनि ।
प्रमत्तश्च हतो वीरस्तं हनिष्ये जनार्दनम् ।। १४ ।।
‘मेरा भाई शिशुपाल अभी छोटी अवस्थाका था, दूसरे वह राजा था, तीसरे युद्धके मुहानेपर खड़ा नहीं था, चौथे असावधान था, ऐसी दशामें उस वीरकी जिसने हत्या की है, उस जनार्दनको मैं अवश्य मारूँगा’ ।। १४ ।।

एवमादि महाराज विलप्य दिवमास्थितः । कामगेन स सौभेन क्षिप्त्वा मां कुरुनन्दन ।। १५ ।। कुरुनन्दन! महाराज! इस प्रकार शिशुपालके लिये विलाप करके मुझपर आक्षेप करता हुआ वह इच्छानुसार चलनेवाले सौभ विमानद्वारा आकाशमें ठहरा हुआ था ।। १५ ।।

तमश्रौषमहं गत्वा यथावृत्तः स दुर्मतिः । मयि कौरव्य दुष्टात्मा मार्त्तिकावतको नृपः ।। १६ ।। कुरुश्रेष्ठ! यहाँसे द्वारका जानेपर मैंने, मार्त्तिकावतक देशके निवासी दुष्टात्मा एवं दुर्बुद्धि राजा शाल्वने मेरे प्रति जो दुष्टतापूर्ण बर्ताव किया था (आक्षेपपूर्ण बातें कही थीं), वह सब कुछ सुना ।। १६ ।।

ततोऽहमपि कौरव्य रोषव्याकुलमानसः । निश्चित्य मनसा राजन् वधायास्य मनो दधे ।। १७ ।। कुरुनन्दन! तब मेरा मन भी रोषसे व्याकुल हो उठा। राजन्! फिर मन-ही-मन कुछ निश्चय करके मैंने शाल्वके वधका विचार किया ।। १७ ।।

आनर्तेषु विमर्दं च क्षेपं चात्मनि कौरव । प्रवृद्धमवलेपं च तस्य दुष्कृतकर्मणः ।। १८ ।। ततः सौभवधायाहं प्रतस्थे पृथिवीपते । स मया सागरावर्ते दृष्ट आसीत् परीप्सता ।। १९ ।। कुरुप्रवर! पृथिवीपते! उसने आनर्त देशमें जो महान् संहार मचा रखा था, वह मुझपर जो आक्षेप करता था तथा उस पापाचारीका घमंड जो बहुत बढ़ गया था, वह सब सोचकर मैं सौभनगरका नाश करनेके लिये प्रस्थित हुआ। मैंने सब ओर उसकी खोज की तो वह मुझे समुद्रके एक द्वीपमें दिखायी दिया ।। १८-१९ ।।

ततः प्रध्माप्य जलजं पाञ्चजन्यमहं नृप । आहूय शाल्वं समरे युद्धाय समवस्थितः ।। २० ।। नरेश्वर! तदनन्तर मैंने पाञ्चजन्य शंख बजाकर शाल्वको समरभूमिमें बुलाया और स्वयं भी युद्धके लिये उपस्थित हुआ ।। २० ।।

तन्मुहूर्तमभूद् युद्धं तत्र मे दानवैः सह । वशीभूताश्च मे सर्वे भूतले च निपातिताः ।। २१ ।। वहाँ सौभनिवासी दानवोंके साथ दो घड़ीतक मेरा युद्ध हुआ और मैंने सबको वशमें करके पृथ्वीपर मार गिराया ।। २१ ।।

एतत् कार्यं महाबाहो येनाहं नागमं तदा । श्रुत्वैव हास्तिनपुरं द्यूतं चाविनयोत्थितम् । द्रुतमागतवान् युष्मान् द्रष्टुकामः सुदुःखितान् ।। २२ ।।

महाबाहो! यही कार्य उपस्थित हो गया था, जिससे मैं उस समय न आ सका। लौटनेपर ज्यों ही सुना कि हस्तिनापुरमें दुर्योधनकी उद्दण्डताके कारण जूआ खेला गया (और पाण्डव उसमें सब कुछ हारकर वनको चले गये); तब अत्यन्त दुःखमें पड़े हुए आपलोगोंको देखनेके लिये मैं तुरंत यहाँ चला आया ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने चतुर्दशोऽध्यायः ॥ १४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधोपाख्यानविषयक चौदहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४ ॥

सौभनाशकी विस्तृत कथाके प्रसंगमें द्वारकामें युद्धसम्बन्धी रक्षात्मक तैयारियोंका वर्णन

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पञ्चदशोऽध्यायः

सौभनाशकी विस्तृत कथाके प्रसंगमें द्वारकामें युद्धसम्बन्धी रक्षात्मक तैयारियोंका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

वासुदेव महाबाहो विस्तरेण महामते ।
सौभस्य वधमाचक्ष्व न हि तृप्यामि कथ्यतः ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने कहा—महाबाहो! वसुदेवनन्दन! महामते! तुम सौभ-विमानके नष्ट होनेका समाचार विस्तारपूर्वक कहो। मैं तुम्हारे मुखसे इस प्रसंगको सुनते-सुनते तृप्त नहीं हो रहा हूँ॥ १ ॥

वासुदेव उवाच

हतं श्रुत्वा महाबाहो मया श्रौतश्रवं नृप ।
उपायाद् भरतश्रेष्ठ शाल्वो द्वारवतीं पुरीम् ॥ २ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाबाहो! नरेश्वर! भरतश्रेष्ठ! श्रुतश्रवा* के पुत्र शिशुपालके मारे जानेका समाचार सुनकर शाल्वने द्वारकापुरीपर चढ़ाई की ॥ २ ॥

अरुन्धतां सुदुष्टात्मा सर्वतः पाण्डुनन्दन ।
शाल्वो वैहायसं चापि तत् पुरं व्यूह्य विष्ठितः ॥ ३ ॥
पाण्डुनन्दन! उस दुष्टात्मा शाल्वने सेनाद्वारा द्वारकापुरीको सब ओरसे घेर लिया था। वह स्वयं आकाशचारी विमान सौभपर व्यूहरचनापूर्वक विराजमान हो रहा था ॥ ३ ॥

तत्रस्थोऽथ महीपालो योधयामास तां पुरीम् ।
अभिसारेण सर्वेण तत्र युद्धमवर्तत ॥ ४ ॥
उसीपर रहकर राजा शाल्व द्वारकापुरीके लोगोंसे युद्ध करता था। वहाँ भारी युद्ध छिड़ा हुआ था और उसमें सभी दिशाओंसे अस्त्र-शस्त्रोंके प्रहार हो रहे थे ॥ ४ ॥

पुरी समन्ताद् विहिता सपताका सतोरणा ।
सचक्रा सहुडा चैव सयन्त्रखनका तथा ॥ ५ ॥
द्वारकापुरीमें सब ओर पताकाएँ फहरा रही थीं। ऊँचे-ऊँचे गोपुर वहाँ चारों दिशाओंमें सुशोभित थे। जगह-जगह सैनिकोंके समुदाय युद्धके लिये प्रस्तुत थे। सैनिकोंके आत्मरक्षापूर्वक युद्धकी सुविधाके लिये स्थान-स्थानपर बुर्ज बने हुए थे। युद्धोपयोगी यन्त्र वहाँ बैठाये गये थे; तथा सुरंगद्वारा नये-नये मार्ग निकालनेके काममें भी बहुत-से लोग जुटे हुए थे ॥ ५ ॥

सोपशल्यप्रतोलीका साट्टाट्टालकगोपुरा ।

सचक्रग्रहणी चैव सोल्कालातावपोथिका ॥ ६ ॥

सड़कोंपर लोहेके विषाक्त काँटे अदृश्यरूपसे बिछाये गये थे। अट्टालिकाओं और गोपुरोंमें पर्याप्त अन्नका संग्रह किया गया था। शत्रुपक्षके प्रहारोंको रोकनेके लिये जगह-जगह मोर्चेबन्दी की गयी थी। शत्रुओंके चलाये हुए जलते गोले और अलात (प्रज्वलित लौहमय अस्त्र)-को भी विफल करके नीचे गिरा देनेवाली शक्तियाँ सुसज्जित थीं ॥ ६ ॥

सोष्ट्रिका भरतश्रेष्ठ सभेरीपणवानका । सतोमराङ्कुशा राजन् सशतघ्नीकलाङ्गला ॥ ७ ॥ सभुशुण्ड्यश्मगुडका सायुधा सपरश्वधा । लोहचर्मवती चापि साग्निः सगुडशृङ्गिका ॥ ८ ॥

अस्त्रोंसे भरे हुए मिट्टी और चमड़ेके असंख्य पात्र रखे गये थे। भरतश्रेष्ठ! ढोल, नगारे और मृदंग आदि जुझारू बाजे भी बज रहे थे। राजन्! तोमर, अंकुश, शतघ्नी, लांगल, भुशुण्डी, पत्थरके गोले, अन्यान्य अस्त्र-शस्त्र, फरसे, बहुत-सी सुदृढ़ ढालें और गोला-बारूदसे भरी हुई तोपें यथास्थान तैयार रखी गयी थीं ॥ ७-८ ॥

शास्त्रदृष्टेन विधिना सुयुक्ता भरतर्षभ । रथैरनेकैर्विविधैर्गदसाम्बोद्धवादिभिः ॥ ९ ॥ पुरुषैः कुरुशार्दूल समर्थैः प्रतिवारणे ।

अतिख्यातकुलैर्वीरैर्दृष्टवीर्यैश्च संयुगे ।। १० ।। मध्यमेन च गुल्मेन रक्षिभिः सा सुरक्षिता । उत्क्षिप्तगुल्मैश्च तथा हयैश्च सपताकिभिः ।। ११ ।। आघोषितं च नगरे न पातव्या सुरेति वै । प्रमादं परिरक्षद्भिरुग्रसेनोद्धवादिभिः ।। १२ ।। भरतकुलभूषण! शास्त्रोक्त विधिसे द्वारकापुरीको रक्षाके सभी उत्तम उपायोंसे सम्पन्न किया गया था। कुरुश्रेष्ठ! शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ गद, साम्ब और उद्धव आदि अनेक वीर पुरुष नाना प्रकारके बहुसंख्यक रथोंद्वारा पुरीकी रक्षामें दत्तचित थे। जो अत्यन्त विख्यात कुलोंमें उत्पन्न थे तथा युद्धके अवसरोंपर जिनके बल-वीर्यका परिचय मिल चुका था, ऐसे वीर रक्षक मध्यम गुल्म (नगरके मध्यवर्ती दुर्ग)-में स्थित हो पुरीकी पूर्णतः रक्षा कर रहे थे। सबको प्रमादसे बचानेवाले उग्रसेन और उद्धव आदिने शत्रुओंके गुल्मोंको नष्ट करनेकी शक्ति रखनेवाले घुड़सवारोंके हाथमें झंडे देकर समूचे नगरमें यह घोषणा करा दी थी कि किसीको भी मद्यपान नहीं करना चाहिये ।। ९—१२ ।।

प्रमत्तेष्वभिघातं हि कुर्याच्छाल्वो नराधिपः । इति कृत्वाप्रमत्तास्ते सर्वे वृष्ण्यन्धकाः स्थिताः ।। १३ ।। क्योंकि मदिरासे उन्मत्त हुए लोगोंपर राजा शाल्व घातक प्रहार कर सकता है। यह सोचकर वृष्णि और अन्धकवंशके सभी योद्धा पूरी सावधानीके साथ युद्धमें डटे हुए थे ।। १३ ।।

आनर्तांश्च तथा सर्वे नटा नर्तकगायनाः । बहिर्निर्वासिताः क्षिप्रं रक्षद्भिर्वित्तसंचयम् ।। १४ ।। धनसंग्रहकी रक्षा करनेवाले यादवोंने आनर्तदेशीय नटों, नर्तकों तथा गायकोंको शीघ्र ही नगरसे बाहर कर दिया था ।। १४ ।।

संक्रमा भेदिताः सर्वे नावश्च प्रतिषेधिताः । परिखाश्चापि कौरव्य कालैः सुनिचिताः कृताः ।। १५ ।। कुरुनन्दन! द्वारकापुरीमें आनेके लिये जो पुल मार्गमें पड़ते थे वे सब तोड़ दिये गये। नौकाएँ रोक दी गयी थीं और खाइयोंमें काँटे बिछा दिये गये थे ।। १५ ।।

उदपानाः कुरुश्रेष्ठ तथैवाप्यम्बरीषकाः । समन्तात् क्रोशमात्रं च कारिता विषमा च भूः ।। १६ ।। कुरुश्रेष्ठ! द्वारकापुरीके चारों ओर एक कोसतकके चारों ओरके कुएँ इस प्रकार जलशून्य कर दिये गये थे मानो भाड़ हों और उतनी दूरकी भूमि भी लौहकण्टक आदिसे व्याप्त कर दी गयी थी ।। १६ ।।

प्रकृत्या विषमं दुर्गं प्रकृत्या च सुरक्षितम् । प्रकृत्या चायुधोपेतं विशेषेण तदानघ ।। १७ ।।

निष्पाप नरेश! द्वारका एक तो स्वभावसे ही दुर्गम्य, सुरक्षित और अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न है, तथापि उस समय इसकी विशेष व्यवस्था कर दी गयी थी ।। १७ ।।
सुरक्षितं सुगुप्तं च सर्वायुधसमन्वितम् ।
तत् पुरं भरतश्रेष्ठ यथेन्द्रभवनं तथा ।। १८ ।।
भरतश्रेष्ठ! द्वारकानगर इन्द्रभवनकी भाँति ही सुरक्षित, सुगुप्त और सम्पूर्ण आयुधोंसे भरा-पूरा है ।। १८ ।।
न चामुद्रोऽभिनिर्याति न चामुद्रः प्रवेक्ष्यते ।
वृष्ण्यन्धकपुरे राजंस्तदा सौभसमागमे ।। १९ ।।
राजन्! सौभनिवासियोंके साथ युद्ध होते समय वृष्णि और अन्धकवंशी वीरोंके उस नगरमें कोई भी राजमुद्रा (पास)-के बिना न तो बाहर निकल सकता था और न बाहरसे नगरके भीतर ही आ सकता था ।। १९ ।।
अनुरथ्यासु सर्वासु चत्वरेषु च कौरव ।
बलं बभूव राजेन्द्र प्रभूतगजवाजिमत् ।। २० ।।
कुरुनन्दन राजेन्द्र! वहाँ प्रत्येक सड़क और चौराहेपर बहुत-से हाथीसवार और घुड़सवारोंसे युक्त विशाल सेना उपस्थित रहती थी ।। २० ।।
दत्तवेतनभक्तं च दत्तायुधपरिच्छदम् ।
कृतोपधानं च तदा बलमासीन्महाभुज ।। २१ ।।
महाबाहो! उस समय सेनाके प्रत्येक सैनिकको पूरा-पूरा वेतन और भत्ता चुका दिया गया था। सबको नये-नये हथियार और पोशाकें दी गयी थीं और उन्हें विशेष पुरस्कार आदि देकर उनका प्रेम और विश्वास प्राप्त कर लिया गया था ।। २१ ।।
न कुप्यवेतनी कश्चिन्न चातिक्रान्तवेतनी ।
नानुग्रहभृतः कश्चिन्न चादृष्टपराक्रमः ।। २२ ।।
कोई भी सैनिक ऐसा नहीं था जिसे सोने-चाँदीके सिवा ताँबा आदि वेतनके रूपमें दिया जाता हो अथवा जिसे समयपर वेतन न प्राप्त हुआ हो। किसी भी सैनिकको दयावश सेनामें भर्ती नहीं किया गया था तथा कोई भी ऐसा न था जिसका पराक्रम बहुत दिनोंसे देखा न गया हो ।। २२ ।।
एवं सुविहिता राजन् द्वारका भूरिदक्षिणा ।
आहुकेन सुगुप्ता च राज्ञा राजीवलोचन ।। २३ ।।
कमलनयन राजन्! जिसमें बहुत-से दक्ष मनुष्य निवास करते थे उस द्वारकानगरीकी रक्षाके लिये इस प्रकारकी व्यवस्था की गयी थी। वह राजा उग्रसेनके द्वारा भलीभाँति सुरक्षित थी ।। २३ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि अर्जुनाभिगमनपर्वणि सौभवधोपाख्याने
पञ्चदशोऽध्यायः ॥ १५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत अर्जुनाभिगमनपर्वमें सौभवधविषयक पंद्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५ ॥


* श्रुतश्रवा शिशुपालकी माताका नाम है। यह वसुदेवजीकी बहिन थी।

अध्याय (पृष्ठ 150)

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षोडशोऽध्यायः

शाल्वकी विशाल सेनाके आक्रमणका यादवसेनाद्वारा प्रतिरोध, साम्बद्वारा क्षेमवृद्धिकी पराजय, वेगवान्‌का वध तथा चारुदेष्णद्वारा विविन्ध्य दैत्यका वध एवं प्रद्युम्नद्वारा सेनाको आश्वासन

वासुदेव उवाच

तां तूपयातो राजेन्द्र शाल्वः सौभपतिस्तदा ।
प्रभूतनरनागेन बलेनोपविवेश ह ॥ १ ॥
**भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—**राजेन्द्र! सौभ विमानका स्वामी राजा शाल्व अपनी बहुत बड़ी सेनाके साथ, जिसमें हाथीसवारों तथा पैदलोंकी संख्या अधिक थी, द्वारकापुरीपर चढ़ आया और उसके निकट आकर ठहरा ॥ १ ॥

समे निविष्टा सा सेना प्रभूतसलिलाशये ।
चतुरङ्गबलोपेता शाल्वराजाभिपालिता ॥ २ ॥
जहाँ अधिक जलसे भरा हुआ जलाशय था, वहीं समतल भूमिमें उसकी सेनाने पड़ाव डाला। उसमें हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल चारों प्रकारके सैनिक थे। स्वयं राजा शाल्व उसका संरक्षक था ॥ २ ॥

वर्जयित्वा श्मशानानि देवताऽऽयतनानि च ।
वल्मीकांश्चैत्यवृक्षांश्च तन्निविष्टमभूद् बलम् ॥ ३ ॥
श्मशानभूमि, देवमन्दिर, बाँबी और चैत्यवृक्षको छोड़कर सभी स्थानोंमें उसकी सेना फैलकर ठहरी हुई थी ॥ ३ ॥

अनीकानां विभागेन पन्थानः संवृताऽभवन् ।
प्रवणाय च नैवासञ्छाल्वस्य शिबिरे नृप ॥ ४ ॥
सेनाओंके विभागपूर्वक पड़ाव डालनेसे सारे रास्ते घिर गये थे। राजन्! शाल्वके शिविरमें प्रवेश करनेका कोई मार्ग नहीं रह गया था ॥ ४ ॥

सर्वायुधसमोपेतं सर्वशस्त्रविशारदम् ।
रथनागाश्वकलिलं पदातिध्वजसंकुलम् ॥ ५ ॥
तुष्टपुष्टबलोपेतं वीरलक्षणलक्षितम् ।
विचित्रध्वजसन्नाहं विचित्ररथकार्मुकम् ॥ ६ ॥
संनिवेश्य च कौरव्य द्वारकायां नरर्षभ ।
अभिसारयामास तदा वेगेन पतगेन्द्रवत् ॥ ७ ॥

नरश्रेष्ठ! राजा शाल्वकी वह सेना सब प्रकारके आयुधोंसे सम्पन्न, सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके संचालनमें निपुण, रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी हुई तथा पैदल सिपाहियों और ध्वजा-पताकाओंसे व्याप्त थी। उसका प्रत्येक सैनिक हृष्ट-पुष्ट एवं बलवान् था। सबमें वीरोचित लक्षण दिखायी देते थे। उस सेनाके सिपाही विचित्र ध्वजा तथा कवच धारण करते थे। उनके रथ और धनुष भी विचित्र थे। कुरुनन्दन! द्वारकाके समीप उस सेनाको ठहराकर राजा शाल्वने उसे वेगपूर्वक द्वारकाकी ओर बढ़ाया; मानो पक्षिराज गरुड़ अपने लक्ष्यकी ओर उड़े जा रहे हों ।। ५-७ ।।

तदापतन्तं संदृश्य बलं शाल्वपतेस्तदा । निर्याय योधयामासुः कुमारा वृष्णिनन्दनाः ॥ ८ ॥ शाल्वराजकी उस सेनाको आती देख उस समय वृष्णिकुलको आनन्दित करनेवाले कुमार नगरसे बाहर निकलकर युद्ध करने लगे ।। ८ ।।

असहन्तोऽभियानं तच्छाल्वराजस्य कौरव । चारुदेष्णश्च साम्बश्च प्रद्युम्नश्च महारथः ॥ ९ ॥ ते रथैर्दशिताः सर्वे विचित्राभरणध्वजाः । संसक्ताः शाल्वराजस्य बहुभिर्योधपुङ्गवैः ॥ १० ॥ कुरुनन्दन! शाल्वराजके उस आक्रमणको वे सहन न कर सके। चारुदेष्ण, साम्ब और महारथी प्रद्युम्न—ये सब कवच, विचित्र आभूषण तथा ध्वजा धारण करके रथोंपर बैठकर शाल्वराजके अनेक श्रेष्ठ योद्धाओंके साथ भिड़ गये ।। ९-१० ।।

गृहीत्वा कार्मुकं साम्बः शाल्वस्य सचिवं रणे । योधयामास संहृष्टः क्षेमवृद्धिं चमूपतिम् ॥ ११ ॥ हर्षमें भरे हुए साम्बने धनुष धारण करके शाल्वके मन्त्री तथा सेनापति क्षेमवृद्धिके साथ युद्ध किया ।। ११ ।।

तस्य बाणमयं वर्षं जाम्बवत्याः सुतो महत् । मुमोच भरतश्रेष्ठ यथा वर्षं सहस्रदृक् ॥ १२ ॥ तद् बाणवर्षं तुमुलं विषेहे स चमूपतिः । क्षेमवृद्धिर्महाराज हिमवानिव निश्चलः ॥ १३ ॥ भरतश्रेष्ठ! जाम्बवतीकुमारने उसके ऊपर भारी बाणवर्षा की, मानो इन्द्र जलकी वर्षा कर रहे हों। महाराज! सेनापति क्षेमवृद्धिने साम्बकी उस भयंकर बाणवर्षाको हिमालयकी भाँति अविचल रहकर सहन किया ।। १२-१३ ।।

ततः साम्बाय राजेन्द्र क्षेमवृद्धिपि स्वयम् । मुमोच मायाविहितं शरजालं महत्तरम् ॥ १४ ॥ राजेन्द्र! तदनन्तर क्षेमवृद्धिने स्वयं भी साम्बके ऊपर मायानिर्मित बाणोंकी भारी वर्षा प्रारम्भ की ॥ १४ ॥ ततो मायामयं जालं माययैव विदीर्य सः । साम्बः शरसहस्रेण रथमस्याभ्यवर्षत ॥ १५ ॥ साम्बने उस मायामय बाणजालको मायासे ही छिन्न-भिन्न करके क्षेमवृद्धिके रथपर सहस्रों बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ १५ ॥ ततः स विद्धः साम्बेन क्षेमवृद्धिश्शमूपतिः । अपायाज्जवनैरश्वैः साम्बबाणप्रपीडितः ॥ १६ ॥ साम्बने सेनापति क्षेमवृद्धिको अपने बाणोंसे घायल कर दिया। वह साम्बकी बाणवर्षासे पीड़ित हो शीघ्रगामी अश्वोंकी सहायतासे (लड़ाईका मैदान छोड़कर) भाग गया ॥ १६ ॥ तस्मिन् विप्रद्रुते क्रूरे शाल्वस्याथ चमूपतौ ।

वेगवान् नाम दैतेयः सुतं मेऽभ्यद्रवद् बली ॥ १७ ॥ शाल्वके क्रूर सेनापति क्षेमवृद्धिके भाग जाने-पर वेगवान् नामक बलवान् दैत्यने मेरे पुत्रपर आक्रमण किया ॥ १७ ॥

अभिपन्नस्तु राजेन्द्र साम्बो वृष्णिकुलोद्वहः । वेगं वेगवतो राजंस्तस्थौ वीरो विधारयन् ॥ १८ ॥ राजेन्द्र! वृष्णिवंशका भार वहन करनेवाला वीर साम्ब वेगवान्‌के वेगको सहन करते हुए धैर्यपूर्वक उसका सामना करने लगा ॥ १८ ॥

स वेगवति कौन्तेय साम्बो वेगवतीं गदाम् । चिक्षेप तरसा वीरो व्याविद्ध्य सत्यविक्रमः ॥ १९ ॥ कुन्तीनन्दन! सत्यपराक्रमी वीर साम्बने अपनी वेगशालिनी गदाको बड़े वेगसे घुमाकर वेगवान् दैत्यके सिरपर दे मारा ॥ १९ ॥

तया त्वभिहतो राजन् वेगवान् न्यपतद् भुवि । वातरुग्ण इव क्षुण्णो जीर्णमूलो वनस्पतिः ॥ २० ॥ राजन्! उस गदासे आहत होकर वेगवान् इस प्रकार पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो जीर्ण हुई जड़वाला पुराना वृक्ष हवाके वेगसे टूटकर धराशायी हो गया हो ॥ २० ॥

तस्मिन् विनिहते वीरे गदानुन्ने महासुरे । प्रविश्य महतीं सेनां योधयामास मे सुतः ॥ २१ ॥ गदासे घायल हुए उस वीर महादैत्यके मारे जानेपर मेरा पुत्र साम्ब शाल्वकी विशाल सेनामें घुसकर युद्ध करने लगा ॥ २१ ॥

चारुदेष्णेन संसक्तो विविन्ध्यो नाम दानवः । महारथः समाज्ञातो महाराज महाधनुः ॥ २२ ॥ महाराज! चारुदेष्णके साथ महारथी एवं महान् धनुर्धर विविन्ध्य नामक दानव शाल्वकी आज्ञासे युद्ध कर रहा था ॥ २२ ॥

ततः सुतुमुलं युद्धं चारुदेष्णविविन्ध्ययोः । वृत्रवासवयो राजन् यथा पूर्वं तथाभवत् ॥ २३ ॥ राजन्! तदनन्तर चारुदेष्ण और विविन्ध्यमें वैसा ही भयंकर युद्ध होने लगा, जैसा पहले इन्द्र और वृत्रासुरमें हुआ था ॥ २३ ॥

अन्योन्यस्याभिसंक्रुद्धावन्योन्यं जघ्नतुः शरैः । विनदन्तौ महारावान् सिंहाविव महाबलौ ॥ २४ ॥ वे दोनों एक-दूसरेपर कुपित हो बाणोंसे परस्पर आघात कर रहे थे और महाबली सिंहोंकी भाँति जोर-जोरसे गर्जना करते थे ॥ २४ ॥

रौक्मिणेयस्ततो बाणमग्न्यर्कपमवर्चसम् । अभिमन्त्र्य महास्त्रेण संदधे शत्रुनाशनम् ॥ २५ ॥

तदनन्तर रुक्मिणीनन्दन चारुदेष्णने अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी शत्रुनाशक बाणको महान् (दिव्य) अस्त्रसे अभिमन्त्रित करके अपने धनुषपर संधान किया ।। २५ ।। स विविन्ध्याय सक्रोधः समाहूय महारथः । चिक्षेप मे सुतो राजन् स गतासुरथापतत् ।। २६ ।। राजन्! तत्पश्चात् मेरे उस महारथी पुत्रने क्रोधमें भरकर विविन्ध्यपर वह बाण चलाया। उसके लगते ही विविन्ध्य प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा ।। २६ ।। विविन्ध्यं निहतं दृष्ट्वा तां च विक्षोभितां चमूम् । कामगेन स सौभेन शाल्वः पुनरुपागमत् ।। २७ ।। विविन्ध्यको मारा गया और सेनाको तहस-नहस हुई देख शाल्व इच्छानुसार चलनेवाले सौभ विमानद्वारा फिर वहाँ आया ।। २७ ।। ततो व्याकुलितं सर्वं द्वारकावासि तद् बलम् । दृष्ट्वा शाल्वं महाबाहो सौभस्थं नृपते तदा ।। २८ ।। महाबाहु नरेश्वर! उस समय सौभ विमानपर बैठे हुए शाल्वको देखकर द्वारकाकी सारी सेना भयसे व्याकुल हो उठी ।। २८ ।। ततो निर्याय कौरव्य अवस्थाप्य च तद् बलम् । आनर्तानां महाराज प्रद्युम्नो वाक्यमब्रवीत् ।। २९ ।। महाराज कुरुनन्दन! तब प्रद्युम्नने निकलकर आनर्तवासियोंकी उस सेनाको धीरज बँधाया और इस प्रकार कहा— ।। २९ ।। सर्वे भवन्तस्तिष्ठन्तु सर्वे पश्यन्तु मां युधि । निवारयन्तं संग्रामे बलात् सौभं सराजकम् ।। ३० ।। ‘यादवो! आप सब लोग (चुपचाप) खड़े रहें और मेरे पराक्रमको देखें; मैं किस प्रकार युद्धमें राजा शाल्वके सहित सौभ विमानकी गतिको रोक देता हूँ ।। ३० ।। अहं सौभपतेः सेनामायसैर्भुजगैरिव । धनुर्भुजविनिर्मुक्तैर्नाशयाम्यद्य यादवाः ।। ३१ ।। ‘यदुवंशियो! मैं अपने धनुर्दण्डसे छूटे हुए लोहेके सर्पतुल्य बाणोंद्वारा सौभपति शाल्वकी सेनाको अभी नष्ट किये देता हूँ’ ।। ३१ ।। आश्वसध्वं न भीः कार्या सौभराडद्य नश्यति । मयाभिपन्नो दुष्टात्मा ससौभो विनशिष्यति ।। ३२ ।। ‘आप धैर्य धारण करें, भयभीत न हों, सौभराज अभी नष्ट हो रहा है। दुष्टात्मा शाल्व मेरा सामना होते ही सौभ विमानसहित नष्ट हो जायगा’ ।। ३२ ।। एवं ब्रुवति संहृष्टे प्रद्युम्ने पाण्डुनन्दन । विष्ठितं तद् बलं वीर युयुधे च यथासुखम् ।। ३३ ।।