महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
श्रीरामचन्द्रजीके मनमें यह संदेह हुआ कि सम्भव है, सीता पर पुरुषके स्पर्शसे अपवित्र हो गयी हों; अतः उन्होंने विदेहनन्दिनी सीतासे स्पष्ट वचनोंद्वारा कहा—‘विदेहकुमारी! मैंने तुम्हें रावणकी कैदसे छुड़ा दिया। अब तुम जाओ। मेरा जो कर्तव्य था, उसे मैंने पूरा कर दिया ।। १० ।।
मामासाद्य पतिं भद्रे न त्वं राक्षसवेश्मनि ।
जरां व्रजेथा इति मे निहतोऽसौ निशाचरः ।। ११ ।।
‘भद्रे! मुझ-जैसे पतिको पाकर तुम्हें वृद्धावस्थातक किसी राक्षसके घरमें न रहना पड़े, यही सोचकर मैंने उस निशाचरका वध किया है ।। ११ ।।
कथं ह्यस्मद्विधो जातु जानन् धर्मविनिश्चयम् ।
परहस्तगतां नारीं मुहूर्तमपि धारयेत् ।। १२ ।।
‘धर्मके सिद्धान्तको जाननेवाला मेरे-जैसा कोई भी पुरुष दूसरेके हाथमें पड़ी हुई नारीको मुहूर्तभरके लिये भी कैसे ग्रहण कर सकता है? ।। १२ ।।
सुवृत्तामसुवृत्तां वाप्यहं त्वामद्य मैथिलि ।
नोत्सहे परिभोगाय श्वावलीढं हविर्यथा ।। १३ ।।
‘मिथिलेशनन्दिनी! तुम्हारा आचार-विचार शुद्ध रह गया हो अथवा अशुद्ध, अब मैं तुम्हें अपने उपयोगमें नहीं ला सकता—ठीक उसी तरह, जैसे कुत्तेके चाटे हुए हविष्यको कोई भी ग्रहण नहीं करता’ ।। १३ ।।
ततः सा सहसा बाला तच्छ्रुत्वा दारुणं वचः ।
पपात देवी व्यथिता निकृत्ता कदली यथा ।। १४ ।।
सहसा यह कठोर वचन सुनकर देवी सीता व्यथित हो कटे हुए केलेके वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ीं ।। १४ ।।
योऽप्यस्या हर्षसम्भूतौ मुखरागस्तदाभवत् ।
क्षणेन स पुनर्नष्टो निःश्वास इव दर्पणे ।। १५ ।।
जैसे श्वास लेनेसे दर्पणमें पड़ा हुआ मुखका प्रतिबिम्ब मलिन हो जाता है, उसी प्रकार सीताके मुखपर उस समय जो हर्षजनित कान्ति छा रही थी, वह एक ही क्षणमें फिर विलीन हो गयी ।। १५ ।।
ततस्ते हरयः सर्वे नच्छ्रुत्वा रामभाषितम् ।
गतासुकल्पा निश्चेष्टा बभूवुः सहलक्ष्मणाः ।। १६ ।।
श्रीरामचन्द्रजीका यह कथन सुनकर समस्त वानर तथा लक्ष्मण सबके सब मरे हुएके समान निश्चेष्ट हो गये ।। १६ ।।
ततो देवो विशुद्धात्मा विमानेन चतुर्मुखः ।
पद्मयोनिर्जगत्स्रष्टा दर्शयामास राघवम् ।। १७ ।।
इसी समय विशुद्ध अन्तःकरणवाले कमलयोनि जगत्स्रष्टा चतुर्मुख ब्रह्माजीने विमानद्वारा वहाँ आकर श्रीरामचन्द्रजीको दर्शन दिया ॥ १७ ॥ शक्रश्चाग्निश्च वायुश्च यमो वरुण एव च । यक्षाधिपश्च भगवांस्तथा सप्तर्षयोऽमलाः ॥ १८ ॥ साथ ही इन्द्र, अग्नि, वायु, यम, वरुण, यक्षराज भगवान् कुबेर तथा निर्मल चित्तवाले सप्तर्षिगण भी वहाँ आ गये ॥ १८ ॥ राजा दशरथश्चैव दिव्यभास्वरमूर्तिमान् । विमानेन महार्हेण हंसयुक्तेन भास्वता ॥ १९ ॥ इनके सिवा हंसोंसे युत एक बहुमूल्य तेजस्वी विमानद्वारा दिव्य प्रकाशमय स्वरूप धारण किये स्वयं राजा दशरथ भी वहाँ पधारे ॥ १९ ॥ ततोऽन्तरिक्षं तत् सर्वं देवगन्धर्वसंकुलम् । शुशुभे तारकाचित्रं शरदीव नभस्तलम् ॥ २० ॥ उस समय देवताओं और गन्धर्वोंसे भरा हुआ वह सम्पूर्ण अन्तरिक्ष इस प्रकार शोभा पाने लगा, मानो असंख्य तारागणोंसे चित्रित शरद्ऋतुका आकाश हो ॥ २० ॥ तत उत्थाय वैदेही तेषां मध्ये यशस्विनी । उवाच वाक्यं कल्याणी रामं पृथुलवक्षसम् ॥ २१ ॥ तब उन सबके बीचमें खड़ी होकर कल्याणमयी यशस्विनी सीताने चौड़ी छातीवाले भगवान् श्रीरामसे इस प्रकार कहा— ॥ २१ ॥ राजपुत्र न ते दोषं करोमि विदिता हि ते । गतिः स्त्रीणां नराणां च शृणु चेदं वचो मम ॥ २२ ॥ 'राजपुत्र! मैं आपको दोष नहीं देती, क्योंकि आप स्त्रियों और पुरुषोंकी कैसी गति है, यह अच्छी तरह जानते हैं। केवल मेरी यह बात सुन लीजिये ॥ २२ ॥ अन्तश्चरति भूतानां मातरिश्वा सदागतिः । स मे विमुञ्चतु प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥ २३ ॥ 'निरन्तर संचरण करनेवाले वायुदेव समस्त प्राणियोंके भीतर विचरते हैं। यदि मैंने कोई पापाचार किया हो तो वे वायुदेवता मेरे प्राणोंका परित्याग कर दें ॥ २३ ॥ अग्निरापस्तथाऽऽकाशं पृथिवी वायुरेव च । विमुञ्चन्तु मम प्राणान् यदि पापं चराम्यहम् ॥ २४ ॥ 'यदि मैं पापका आचरण करती होऊँ तो अग्नि, जल, आकाश, पृथ्वी और वायु—ये सब मिलकर मुझसे मेरे प्राणोंका वियोग करा दें ॥ २४ ॥ यथाहं त्वदृते वीर नान्यं स्वप्नेऽप्यचिन्तयम् । तथा मे देवनिर्दिष्टस्त्वमेव हि पतिर्भव ॥ २५ ॥
'वीर! यदि मैंने आपके सिवा दूसरे किसी पुरुषका स्वप्नमें भी चिन्तन न किया हो तो देवताओंके दिये हुए एकमात्र आप ही मेरे पति हों' ॥ २५ ॥ ततोऽन्तरिक्षे वागासीत् सुभगा लोकसाक्षिणी । पुण्या संहर्षणी तेषां वानराणां महात्मनाम् ॥ २६ ॥ तदनन्तर आकाशमें सब लोगोंको साक्षी देती हुई एक सुन्दर वाणी उच्चरित हुई, जो परम पवित्र होनेके साथ ही उन महामना वानरोंको भी हर्ष प्रदान करनेवाली थी ॥ २६ ॥
वायुरुवाच
भो भो राघव सत्यं वै वायुरस्मि सदागतिः । अपापा मैथिली राजन् संगच्छ सह भार्यया ॥ २७ ॥ (उस आकाशवाणीके रूपमें) **वायुदेवता बोले—**रघुनन्दन! मैं सदा विचरण करनेवाला वायुदेवता हूँ। सीताने जो कुछ कहा है, वह सत्य है। राजन्! मिथिलेशकुमारी सर्वथा पापशून्य हैं। आप अपनी इस पत्नीसे निःसंकोच होकर मिलिये ॥ २७ ॥
अग्निरुवाच
अहमन्तःशरीरस्थो भूतानां रघुनन्दन । सुसूक्ष्ममपि काकुत्स्थ मैथिली नापराध्यति ॥ २८ ॥ **अग्निदेवने कहा—**रघुनन्दन! मैं समस्त प्राणियोंके शरीरमें रहनेवाला अग्नि हूँ। मुझे मालूम है कि मिथिलेशकुमारीके द्वारा कभी सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म अपराध नहीं हुआ है ॥ २८ ॥
वरुण उवाच
रसा वै मत्प्रसूता हि भूतदेहेषु राघव । अहं वै त्वां प्रब्रवीमि मैथिली प्रतिगृह्यताम् ॥ २९ ॥ **वरुणदेवने कहा—**श्रीराम! समस्त प्राणियोंके शरीरमें जो जलतत्त्व है, वह मुझसे ही उत्पन्न हुआ है। अतः मैं तुमसे कहता हूँ, मिथिलेशकुमारी निष्पाप है, इसे ग्रहण करो ॥ २९ ॥
ब्रह्मोवाच
पुत्र नैतदिहाश्चर्यं त्वयि राजर्षिधर्मणि । साधो सद्वृत्त काकुत्स्थ शृणु चेदं वचो मम ॥ ३० ॥ **तत्पश्चात् ब्रह्माजी बोले—**वत्स! तुम राजर्षियोंके धर्मपर चलनेवाले हो; अतः तुममें ऐसा सद्विचार होना आश्चर्यकी बात नहीं है। साधु सदाचारी श्रीराम! तुम मेरी यह बात सुनो ॥ ३० ॥ शत्रुरेष त्वया वीर देवगन्धर्वभोगिनाम् ।
यक्षाणां दानवानां च महर्षीणां च पातितः ॥ ३१ ॥
वीरवर! यह रावण देवता, गन्धर्व, नाग, यक्ष, दानव तथा महर्षियोंका भी शत्रु था। इसे तुमने मार गिराया है ॥ ३१ ॥
अवध्यः सर्वभूतानां मत्प्रसादात् पुराभवत् ।
कस्माच्चित् कारणात् पापः कञ्चित् कालमुपेक्षितः ॥ ३२ ॥
पूर्वकालमें मेरे ही प्रसादसे यह समस्त प्राणियोंके लिये अवध्य हो गया था। किसी कारणवश ही कुछ कालतक इस पापीकी उपेक्षा की गयी थी ॥ ३२ ॥
वधार्थमात्मनस्तेन हृता सीता दुरात्मना ।
नलकूबरशापेन रक्षा चास्याः कृता मया ॥ ३३ ॥
दुरात्मा रावणने अपने वधके लिये ही सीताका अपहरण किया था। नलकूबरके शापद्वारा मैंने सीताकी रक्षाका प्रबन्ध कर दिया था ॥ ३३ ॥
यदि ह्यकामां सेवेत स्त्रियमन्यामपि ध्रुवम् ।
शतधास्य फलेन्मूर्धा इत्युक्तः सोऽभवत् पुरा ॥ ३४ ॥
पूर्वकालमें रावणको यह शाप दिया गया था कि यदि यह उसे न चाहनेवाली किसी परायी स्त्रीका बलपूर्वक सेवन करेगा तो इसके मस्तकके सैकड़ों टुकड़े हो जायँगे ॥ ३४ ॥
नात्र शङ्का त्वया कार्या प्रतीच्छेमां महाद्युते ।
कृतं त्वया महत् कार्यं देवानाममरप्रभ ॥ ३५ ॥
अतः महातेजस्वी श्रीराम! तुम्हें सीताके विषयमें कोई शंका नहीं करनी चाहिये। इसे ग्रहण करो। देवताओंके समान तेजस्वी वीर! तुमने रावणको मारकर देवताओंका महान् कार्य सिद्ध किया है ॥ ३५ ॥
दशरथ उवाच
प्रीतोऽस्मि वत्स भद्रं ते पिता दशरथोऽस्मि ते ।
अनुजानामि राज्यं च प्रशाधि पुरुषोत्तम ॥ ३६ ॥
**दशरथजी बोले—**वत्स! मैं तुम्हारा पिता दशरथ हूँ, तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो। पुरुषोत्तम! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि अब तुम अयोध्याका राज्य करो ॥ ३६ ॥
राम उवाच
अभिवादये त्वां राजेन्द्र यदि त्वं जनको मम ।
गमिष्यामि पुरीं रम्यामयोध्यां शासनात् तव ॥ ३७ ॥
**श्रीरामचन्द्रजीने कहा—**राजेन्द्र! यदि आप मेरे पिता हैं तो मैं आपको प्रणाम करता हूँ। आपकी आज्ञासे अब मैं रमणीय अयोध्यापुरीको लौट जाऊँगा ॥ ३७ ॥
मार्कण्डेय उवाच
तमुवाच पिता भूयः प्रहृष्टो भरतर्षभ ।
गच्छायोध्यां प्रशाधीति रामं रक्तान्तलोचनम् ॥ ३८ ॥
सम्पूर्णानीह वर्षाणि चतुर्दश महाद्युते ।
मार्कण्डेयजी कहते हैं— भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! तदनन्तर पिता दशरथने अत्यन्त प्रसन्न होकर कुछ-कुछ लाल नेत्रोंवाले श्रीरामचन्द्रजीसे पुनः कहा—'महाद्युते! तुम्हारे वनवासके चौदह वर्ष पूरे हो गये हैं। अब तुम अयोध्या जाओ और वहाँका शासन अपने हाथमें लो' ॥ ३८ १/२ ॥
ततो देवान् नमस्कृत्य सुहृद्भिरभिनन्दितः ॥ ३९ ॥
महेन्द्र इव पौलोम्या भार्यया स समेयिवान् ।
तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने देवताओंको नमस्कार किया और सुहृदोंसे अभिनन्दित हो अपनी पत्नी सीतासे मिले, मानो इन्द्रका शचीसे मिलन हुआ हो ॥ ३९ १/२ ॥
ततो वरं ददौ तस्मै ह्यविन्ध्याय परंतपः ॥ ४० ॥
त्रिजटां चार्थमानाभ्यां योजयामास राक्षसीम् ।
इसके बाद परंतप श्रीरामने अविन्ध्यको अभीष्ट वरदान दिया तथा त्रिजटा राक्षसीको धन और सम्मानसे संतुष्ट किया ॥ ४० १/२ ॥
तमुवाच ततो ब्रह्मा देवैः शक्रपुरोगमैः ॥ ४१ ॥
कौसल्यामातरिष्टांस्ते वरानद्य ददानि कान् ।
यह सब हो जानेपर इन्द्र आदि देवताओंसहित ब्रह्माने भगवान् रामसे कहा—'कौसल्यानन्दन! कहो, आज मैं तुम्हें कौन-कौनसे अभीष्ट वर प्रदान करूँ'? ॥
वव्रे रामः स्थितिं धर्मे शत्रुभिश्चापराजयम् ॥ ४२ ॥
राक्षसैर्निहतानां च वानराणां समुद्भवम् ।
तब श्रीरामचन्द्रजीने उनसे ये वर माँगे—'मेरी धर्ममें सदा स्थिति रहे, शत्रुओंसे कभी पराजय न हो तथा राक्षसोंके द्वारा मारे गये वानर पुनः जीवित हो जायँ' ॥ ४२ १/२ ॥
ततस्ते ब्रह्मणा प्रोक्ते तथेति वचने तदा ॥ ४३ ॥
समुत्तस्थुर्महाराज वानरा लब्धचेतसः ।
यह सुनकर ब्रह्माजीने कहा—'ऐसा ही हो।' महाराज! उनके इतना कहते ही सभी वानर चेतना प्राप्त करके जी उठे ॥ ४३ १/२ ॥
सीता चापि महाभागा वरं हनुमते ददौ ॥ ४४ ॥
रामकीर्त्या समं पुत्र जीवितं ते भविष्यति ।
महासौभाग्यवती सीताने भी हनुमान्जीको यह वर दिया—'पुत्र! जबतक इस धरातलपर भगवान् श्रीरामकी कीर्ति बनी रहेगी, तबतक तुम्हारा जीवन स्थिर रहेगा ॥ ४४ १/२ ॥
दिव्यास्त्वामुपभोगाश्च मत्प्रसादकृताः सदा ॥ ४५ ॥ उपस्थास्यन्ति हनुमन्निति स्म हरिलोचन । 'पिंगलनयन हनुमान्! मेरी कृपासे तुम्हें सदा ही दिव्य भोग प्राप्त होते रहेंगे' ॥ ४५ १/२ ॥
ततस्ते प्रेक्षमाणानां तेषामक्लिष्टकर्मणाम् ॥ ४६ ॥ अन्तर्धानं ययुर्देवाः सर्वे शक्रपुरोगमाः । तदनन्तर अनायास ही महान् पराक्रम करनेवाले वानरोंके देखते-देखते वहाँ इन्द्र आदि सब देवता अन्तर्धान हो गये ॥ ४६ १/२ ॥
दृष्ट्वा रामं तु जानक्या संगतं शक्रसारथिः ॥ ४७ ॥ उवाच परमप्रीतः सुहृन्मध्य इदं वचः । देवगन्धर्वयक्षाणां मानुषासुरभोगिनाम् ॥ ४८ ॥ अपनीतं त्वया दुःखमिदं सत्यपराक्रम । श्रीरामचन्द्रजीको जनकनन्दिनी सीताके साथ विराजमान देख इन्द्रसारथि मातलिको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने सब सुहृदोंके बीचमें इस प्रकार कहा—'सत्यपराक्रमी श्रीराम! आपने देवता, गन्धर्व, यक्ष, मनुष्य, असुर और नाग—इन सबका दुःख दूर कर दिया है ॥ ४७-४८ १/२ ॥
सदेवासुरगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ ४९ ॥ कथयिष्यन्ति लोकास्त्वां यावद् भूमिर्धरिष्यति । 'जबतक यह पृथ्वी रहेगी, तबतक देवता, असुर, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस तथा नागोंसहित सम्पूर्ण जगत्के लोग आपकी कीर्तिकथाका गान करेंगे' ॥ ४९ १/२ ॥
इत्येवमुक्त्वाऽनुज्ञाप्य रामं शस्त्रभृतां वरम् ॥ ५० ॥ सम्पूज्यापाक्रमत् तेन रथेनादित्यवर्चसा । ऐसा कहकर शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञा ले उनकी पूजा करके सूर्यके समान तेजस्वी उसी रथके द्वारा मातलि स्वर्गलोकको चला गया ॥ ५० १/२ ॥
ततः सीतां पुरस्कृत्य रामः सौमित्रिणा सह ॥ ५१ ॥ सुग्रीवप्रमुखैश्चैव सहितः सर्ववानरैः । विधाय रक्षां लङ्कायां विभीषणपुरस्कृतः ॥ ५२ ॥ संततार पुनस्तेन सेतुना मकरालयम् । पुष्पकेण विमानेन खेचरेण विराजता ॥ ५३ ॥ कामगेन यथामुख्यैरमात्यैः संवृतो वशी ।
तदनन्तर जितेन्द्रिय भगवान् श्रीरामने लंकापुरीकी सुरक्षाका प्रबन्ध करके लक्ष्मण, सुग्रीव आदि सभी श्रेष्ठ वानरों, विभीषण तथा प्रधान-प्रधान सचिवोंके साथ सीताको आगे करके इच्छानुसार चलनेवाले, आकाशचारी, शोभाशाली पुष्पकविमानपर आरूढ़ हो उसीके द्वारा पूर्वोक्त सेतुमार्गसे ऊपर-ही-ऊपर पुनः मकरालय समुद्रको पार किया ।। ५१—५३ १/२ ।।
ततस्तीरे समुद्रस्य यत्र शिष्ये स पार्थिवः ।। ५४ ।।
तत्रैवोवास धर्मात्मा सहितः सर्ववानरैः ।
समुद्रके इस पार आकर धर्मात्मा श्रीरामने पहले जहाँ शयन किया था, उसी स्थानपर सम्पूर्ण वानरोंके साथ विश्राम किया ।। ५४ १/२ ।।
अथैनान् राघवः काले समानीयाभिपूज्य च ।। ५५ ।।
विसर्जयामास तदा रत्नैः संतोष्य सर्वशः ।
फिर श्रीरघुनाथजीने यथासमय सबको अपने पास बुलाकर सबका यथायोग्य आदर-सत्कार किया तथा रत्नोंकी भेंटसे संतुष्ट करके सभी वानरों और रीछोंको बिदा किया ।। ५५ १/२ ।।
गतेषु वानरेन्द्रेषु गोपुच्छर्क्षेषु तेषु च ।। ५६ ।।
सुग्रीवसहितो रामः किष्किन्धां पुनरागमत् ।
जब वे रीछ, श्रेष्ठ वानर और लंगूर चले गये, तब सुग्रीवसहित श्रीरामने पुनः किष्किन्धापुरीको प्रस्थान किया ।। ५६ १/२ ।।
विभीषणेनानुगतः सुग्रीवसहितस्तदा ।। ५७ ।।
पुष्पकेण विमानेन वैदेह्या दर्शयन् वनम् ।
किष्किन्धां तु समासाद्य रामः प्रहरतां वरः ।। ५८ ।।
अङ्गदं कृतकर्माणं यौवराज्येऽभ्यषेचयत् ।
विभीषण और सुग्रीवके साथ पुष्पक-विमानद्वारा विदेहकुमारी सीताको वनकी शोभा दिखाते हुए योद्धाओंमें श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने किष्किन्धामें पहुँचकर अंगदको, जिन्होंने लंकाके युद्धमें महान् पराक्रम दिखाया था, युवराजके पदपर अभिषिक्त किया ।। ५७-५८ १/२ ।।
ततस्तैरेव सहितो रामः सौमित्रिणा सह ।। ५९ ।।
यथागतेन मार्गेण प्रययौ स्वपुरं प्रति ।
इसके बाद लक्ष्मण तथा सुग्रीव आदिके साथ श्रीरामचन्द्रजी जिस मार्गसे आये थे, उसीके द्वारा अपनी राजधानी अयोध्याकी ओर प्रस्थित हुए ।। ५९ १/२ ।।
अयोध्यां स समासाद्य पुरीं राष्ट्रपतिस्ततः ।। ६० ।।
भरताय हनूमन्तं दूतं प्रास्थापयत् तदा ।
तत्पश्चात् अयोध्यापुरीके निकट पहुँचकर राष्ट्रपति श्रीरामने हनुमानजीको दूत बनाकर भरतके पास भेजा ।।
लक्षयित्वेङ्गितं सर्वं प्रियं तस्मै निवेद्य वै ।। ६१ ।।
वायुपुत्रे पुनः प्राप्ते नन्दिग्राममुपागमत् ।
जब वायुपुत्र हनुमान्जी भरतजीकी सारी चेष्टाओंको लक्ष्य करके उन्हें श्रीरामचन्द्रजीके पुनरागमनका प्रिय समाचार सुनाकर लौट आये, तब श्रीरामचन्द्रजी नन्दिग्राममें आये ।। ६१ १/२ ।।
स तत्र मलदिग्धाङ्गं भरतं चीरवाससम् ।। ६२ ।।
अग्रतः पादुके कृत्वा ददर्शासीनमासने ।
वहाँ आकर श्रीरामने देखा, भरत चीरवस्त्र पहने हुए हैं, उनका शरीर मैलसे भरा हुआ है और वे मेरी चरणपादुकाएँ आगे रखकर कुशासनपर बैठे हैं ।। ६२ १/२ ।।
संगतो भरतेनाथ शत्रुघ्नेन च वीर्यवान् ।। ६३ ।।
राघवः सहसौमित्रिर्मुमुदे भरतर्षभ ।
युधिष्ठिर! लक्ष्मणसहित पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी भरत और शत्रुघ्नसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए ।। ६३ १/२ ।।
ततो भरतशत्रुघ्नौ समेतौ गुरुणा तदा ।। ६४ ।।
वैदेह्या दर्शनेनोभौ प्रहर्षं समवापतुः ।
भरत और शत्रुघ्नको भी उस समय बड़े भाईसे मिलकर तथा विदेहकुमारी सीताका दर्शन करके महान् हर्ष प्राप्त हुआ ॥ ६४ १/२ ॥
तस्मै तद् भरतो राज्यमागतायातिसत्कृतम् ।
न्यासं निर्यातयामास युक्तः परमया मुदा ॥ ६५ ॥
फिर भरतजीने बड़ी प्रसन्नताके साथ अयोध्या पधारे हुए भगवान् श्रीरामको अपने पास धरोहरके रूपमें रखा हुआ (अयोध्याका) राज्य अत्यन्त सत्कारपूर्वक लौटा दिया ॥ ६५ ॥
ततस्तं वैष्णवे शूरं नक्षत्रेऽभिमतेऽहनि ।
वसिष्ठो वामदेवश्च सहितावभ्यषिञ्चताम् ॥ ६६ ॥
तत्पश्चात् विष्णुदेवतासम्बन्धी श्रवण नक्षत्रका पुण्य दिवस आनेपर वसिष्ठ और वामदेव दोनों ऋषियोंने मिलकर शूरशिरोमणि भगवान् रामका राज्याभिषेक किया ॥ ६६ ॥
सोऽभिषिक्तः कपिश्रेष्ठं सुग्रीवं ससुहृज्जनम् ।
विभीषणं च पौलस्त्यमन्वजानाद् गृहान् प्रति ॥ ६७ ॥
राज्याभिषेकका कार्य सम्पन्न हो जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने सुहृदोंसहित सुग्रीवको तथा पुलस्त्यकुलनन्दन विभीषणको अपने-अपने घर लौटनेकी आज्ञा दी ॥ ६७ ॥
अभ्यर्च्य विविधैर्भोगैः प्रीतियुक्तौ मुदा युतौ ।
समाधायेतिकर्तव्यं दुःखेन विससर्ज ह ॥ ६८ ॥
श्रीरामने भाँति-भाँतिके भोग अर्पित करके उन दोनोंका सत्कार किया। इससे वे बड़े प्रसन्न और आनन्दमग्न हो गये। तदनन्तर उन दोनोंको कर्तव्यकी शिक्षा देकर रघुनाथजीने उन्हें बड़े दुःखसे विदा किया ॥ ६८ ॥
पुष्पकं च विमानं तत् पूजयित्वा स राघवः ।
प्रादाद् वैश्रवणायैव प्रीत्या स रघुनन्दनः ॥ ६९ ॥
इसके बाद उस पुष्पकविमानकी पूजा करके रघुनन्दन श्रीरामने उसे कुबेरको ही प्रेमपूर्वक लौटा दिया ॥ ६९ ॥
ततो देवर्षिसहितः सरितं गोमतीमनु ।
दशाश्वमेधानाजह्रे जारूथ्यान् स निरर्गलान् ॥ ७० ॥
तदनन्तर देवर्षियोंसहित गोमती नदीके तटपर जाकर श्रीरघुनाथजीने दस अश्वमेध यज्ञ किये, जो स्तुतिके योग्य थे और जिनमें अन्न आदिकी इच्छासे आनेवाले याचकोंके लिये कभी द्वार बंद नहीं होता था ॥ ७० ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि श्रीरामाभिषेके
एकनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें श्रीरामाभिषेकविषयक दो सौ इक्यान्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९१ ॥
२९२-
द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
मार्कण्डेयजीके द्वारा राजा युधिष्ठिरको आश्वासन
मार्कण्डेय उवाच
एवमेतन्महाबाहो रामेणामिततेजसा ।
प्राप्तं व्यसनमत्युग्रं वनवासकृतं पुरा ॥ १ ॥
मार्कण्डेयजी कहते हैं— महाबाहु युधिष्ठिर! इस प्रकार प्राचीन कालमें अमिततेजस्वी श्रीरामने वनवासजनित अत्यन्त भयंकर कष्ट भोगा था ॥ १ ॥
मा शुचः पुरुषव्याघ्र क्षत्रियोऽसि परंतप ।
बाहुवीर्याश्रिते मार्गे वर्तसे दीप्तनिर्णये ॥ २ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले पुरुषसिंह! तुम क्षत्रिय हो, शोक न करो। तुम तो उस मार्गपर चल रहे हो, जहाँ केवल अपने बाहुबलका भरोसा किया जाता है तथा जहाँ अभीष्ट फलकी प्राप्ति प्रत्यक्ष एवं असंदिग्ध है ॥ २ ॥
न हि ते वृजिनं किंचिद् वर्तते परमाण्वपि ।
अस्मिन् मार्गे निषीदेयुः सेन्द्रा अपि सुरसुराः ॥ ३ ॥
श्रीरामके कष्टके सामने तुम्हारा कष्ट अणुमात्र भी नहीं है। इन्द्रसहित देवता तथा असुर भी इस क्षत्रियधर्मके मार्गपर चले हैं ॥ ३ ॥
संहत्य निहतो वृत्रो मरुद्भिर्वज्रपाणिना ।
नमुचिश्चैव दुर्धर्षो दीर्घजिह्वा च राक्षसी ॥ ४ ॥
वज्रपाणि इन्द्रने मरुद्गणोंके साथ मिलकर वृत्रासुर, दुर्धर्ष वीर नमुचि तथा दीर्घजिह्वा राक्षसीका वध किया था ॥ ४ ॥
सहायवति सर्वार्थाः संतिष्ठन्तीह सर्वशः ।
किं नु तस्याजितं संख्ये यस्य भ्राता धनंजयः ॥ ५ ॥
जो सहायकोंसे सम्पन्न है, उसके सभी मनोरथ इस जगत्में सब प्रकारसे सिद्ध होते हैं। फिर जिसे धनंजय-जैसा भाई मिला हो, वह युद्धमें किसे परास्त नहीं कर सकता ॥ ५ ॥
अयं च बलिनां श्रेष्ठो भीमो भीमपराक्रमः ।
युवानौ च महेष्वासौ वीरौ माद्रवतीसुतौ ॥ ६ ॥
ये भयंकर पराक्रमी भीमसेन बलवानोंमें श्रेष्ठ हैं। माद्रीनन्दन वीर नकुल-सहदेव भी महान् धनुर्धर तथा नवयुवक हैं ॥ ६ ॥
एभिः सहायैः कस्मात् त्वं विषीदसि परंतप ।
य इमे वज्रिणः सेनां जयेयुः समरुद्गणाम् ॥ ७ ॥
परंतप! इन सब सहायकोंके होते हुए तुम विषाद क्यों करते हो? तुम्हारे ये भाई तो मरुद्गणोंसहित वज्रधारी इन्द्रकी सेनाको भी परास्त कर सकते हैं ॥ ७ ॥
त्वमप्येभिर्महेष्वासैः सहायैर्देवरूपिभिः ।
विजेष्यसे रणे सर्वानमित्रान् भरतर्षभ ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! तुम भी इन देवस्वरूप महाधनुर्धर भाइयोंकी सहायतासे अपने समस्त शत्रुओंको युद्धमें जीत लोगे ॥ ८ ॥
इतश्च त्वमिमां पश्य सैन्धवेन दुरात्मना ।
बलिना वीर्यमत्तेन हृतामेभिर्महात्मभिः ॥ ९ ॥
आनीतां द्रौपदीं कृष्णां कृत्वा कर्म सुदुष्करम् ।
जयद्रथं च राजानं विजितं वशमागतम् ॥ १० ॥
इधर इस द्रौपदीकी ओर देखो। अपने पराक्रमके मदसे उन्मत्त महाबली दुरात्मा सिन्धुराजने इसे हर लिया था; परंतु तुम्हारे इन महात्मा बन्धुओंने अत्यन्त दुष्कर कर्म करके द्रुपदकुमारी कृष्णाको पुनः लौटा लिया तथा राजा जयद्रथको भी परास्त करके अपने अधीन कर लिया था ॥ ९-१० ॥
असहायेन रामेण वैदेही पुनराहृता ।
हत्वा संख्ये दशग्रीवं राक्षसं भीमविक्रमम् ॥ ११ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके तो कोई स्वजातीय सहायक भी नहीं थे, तो भी उन्होंने युद्धमें भयंकर पराक्रमी राक्षस दशाननका वध करके विदेहनन्दिनी सीताको पुनः लौटा लिया ॥ ११ ॥
यस्य शाखामृगा मित्राण्यूक्षाः कालमुखास्तथा ।
जात्यन्तरगता राजन्नेतद् बुद्ध्यानुचिन्तय ॥ १२ ॥
राजन्! दूसरी योनिके प्राणी वानर, लंगूर तथा रीछ ही उनके मित्र अथवा सहायक थे (किंतु तुम्हारे तो चार शूरवीर भाई सहायक हैं)। इस बातपर बुद्धिद्वारा विचार करो ॥ १२ ॥
तस्मात् स त्वं कुरुश्रेष्ठ मा शुचो भरतर्षभ ।
त्वद्विधा हि महात्मानो न शोचन्ति परंतप ॥ १३ ॥
अतः कुरुश्रेष्ठ! भरतभूषण! तुम शोक न करो। क्योंकि परंतप! तुम्हारे-जैसे महात्मा पुरुष कभी शोक नहीं करते ॥ १३ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमाश्वासितो राजा मार्कण्डेयेन धीमता ।
त्यक्त्वा दुःखमदीनात्मा पुनरेप्येनमब्रवीत् ॥ १४ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! परम बुद्धिमान् मार्कण्डेय मुनिके इस प्रकार आश्वासन देनेपर उदार हृदयवाले राजा युधिष्ठिर दुःख-शोक छोड़कर पुनः उनसे इस प्रकार
बोले ।। १४ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि रामोपाख्यानपर्वणि युधिष्ठिराश्वासने द्विनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ।। २९२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत रामोपाख्यानपर्वमें युधिष्ठिरको आश्वासनविषयक दो सौ बानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २९२ ।।
(पतिव्रतामाहात्म्यपर्व)
(पतिव्रतामाहात्म्यपर्व)
त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः
राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण
युधिष्ठिर उवाच
नात्मानमनुशोचामि नेमान् भ्रातृन् महामुने ।
हरणं चापि राज्यस्य यथेमां द्रुपदात्मजाम् ।। १ ।।
**युधिष्ठिर बोले—**महामुने! इस द्रुपदकुमारीके लिये मुझे जैसा शोक होता है, वैसा न तो अपने लिये, न इन भाइयोंके लिये न राज्य छिन जानेके लिये ही होता है ।। १ ।।
द्यूते दुरात्मभिः क्लिष्टाः कृष्णया तारिता वयम् ।
जयद्रथेन च पुनर्वनाच्चापि हृता बलात् ।। २ ।।
दुरात्मा धृतराष्ट्रपुत्रोंने जूएके समय हमलोगोंको भारी संकटमें डाल दिया था, परंतु इस द्रौपदीने हमें बचा लिया। फिर जयद्रथने इस वनसे इसका बलपूर्वक अपहरण किया ।। २ ।।
अस्ति सीमन्तिनी काचिद् दृष्टपूर्वापि वा श्रुता ।
पतिव्रता महाभागा यथेयं द्रुपदात्मजा ।। ३ ।।
क्या आपने किसी ऐसी परम सौभाग्यवती पतिव्रता नारीको पहले कभी देखा अथवा सुना है, जैसी यह द्रौपदी है? ।। ३ ।।
मार्कण्डेय उवाच
शृणु राजन् कुलस्त्रीणां महाभाग्यं युधिष्ठिर ।
सर्वमेतद् यथा प्राप्तं सावित्र्या राजकन्यया ।। ४ ।।
**मार्कण्डेयजी बोले—**राजा युधिष्ठिर! राजकन्या सावित्रीने कुलकामिनीयोंके लिये परम सौभाग्यरूप यह पातिव्रत्य आदि सब सद्गुणसमूह जिस प्रकार प्राप्त किया था, वह बताता हूँ, सुनो ।। ४ ।।
आसीन्मद्रेषु धर्मात्मा राजा परमधार्मिकः ।
ब्रह्मण्यश्च महात्मा च सत्यसंधो जितेन्द्रियः ।। ५ ।।
प्राचीनकालकी बात है, मद्रदेशमें एक परम धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। वे ब्राह्मण-भक्त, विशालहृदय, सत्य-प्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय थे।। ५।।
यज्वा दानपतिर्दक्षः पौरजानपदप्रियः ।
पार्थिवोऽश्वपतिर्नाम सर्वभूतहिते रतः ॥ ६ ॥
वे यज्ञ करनेवाले, दानाध्यक्ष, कार्यकुशल, नगर और जनपदके लोगोंके परम प्रिय तथा सम्पूर्ण भूतोंके हितमें तत्पर रहनेवाले भूपाल थे। उनका नाम अश्वपति था।। ६।।
क्षमावाननपत्यश्च सत्यवाग् विजितेन्द्रियः ।
अतिक्रान्तेन वयसा संतापमुपजग्मिवान् ॥ ७ ॥
राजा अश्वपति क्षमाशील, सत्यवादी और जितेन्द्रिय होनेपर भी संतानहीन थे। बहुत अधिक अवस्था बीत जानेपर इसके कारण उनके मनमें बड़ा संताप हुआ।। ७।।
अपत्योत्पादनार्थं च तीव्रं नियममास्थितः ।
काले परिमिताहारो ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥ ८ ॥
अतः उन्होंने संतानकी उत्पत्तिके लिये कठोर नियमोंका आश्रय लिया। वे निश्चित समयपर थोड़ा-सा भोजन करते और ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए इन्द्रियोंको संयममें रखते थे।। ८।।
हुत्वा शतसहस्रं स सावित्र्या राजसत्तमः ।
षष्ठे षष्ठे तदा काले बभूव मितभोजनः ॥ ९ ॥
राजाओंमें श्रेष्ठ अश्वपति ब्राह्मणोंके साथ प्रतिदिन गायत्री-मन्त्रसे एक लाख आहुति देकर दिनके छठे भागमें परिमित भोजन करते थे।। ९।।
एतेन नियमेनासीद् वर्षाण्यष्टादशैव तु ।
पूर्णे त्वष्टादशे वर्षे सावित्री तुष्टिमभ्यगात् ॥ १० ॥
उनको इस नियमसे रहते हुए अठारह वर्ष बीत गये। अठारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर सावित्रीदेवी संतुष्ट हुईं।। १०।।
रूपिणी तु तदा राजन् दर्शयामास तं नृपम् ।
अग्निहोत्रात् समुत्थाय हर्षेण महतान्विता ।
उवाच चैनं वरदा वचनं पार्थिवं तदा ॥ ११ ॥
(सा तमश्वपतिं राजन् सावित्री नियमे स्थितम् ॥)
राजन्! तब मूर्तिमती सावित्रीदेवीने अग्निहोत्रकी अग्निसे प्रकट होकर बड़े हर्षके साथ राजाको प्रत्यक्ष दर्शन दिया और वर देनेके लिये उद्यत हो अनुष्ठानके नियमोंमें स्थित उस राजा अश्वपतिसे इस प्रकार कहा।।
सावित्र्युवाच
ब्रह्मचर्येण शुद्धेन दमेन नियमेन च ।
सर्वात्मना च भक्त्या च तुष्टास्मि तव पार्थिव ।। १२ ।।
सावित्री बोली— राजन्! मैं तुम्हारे विशुद्ध ब्रह्मचर्य, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह तथा सम्पूर्ण हृदयसे की हुई भक्तिके द्वारा बहुत संतुष्ट हुई हूँ ।। १२ ।।
वरं वृणीष्वाश्वपते मद्रराज यदीप्सितम् ।
न प्रमादश्च धर्मेषु कर्तव्यस्ते कथञ्चन ।। १३ ।।
मद्रराज अश्वपते! तुम्हें जो अभीष्ट हो, वह वर माँगो। धर्मोंके पालनमें तुम्हें कभी किसी तरह भी प्रमाद नहीं करना चाहिये ।। १३ ।।
अश्वपतिरुवाच
अपत्यार्थः समारम्भः कृतो धर्मेप्सया मया ।
पुत्रा मे बहवो देवि भवेयुः कुलभावनाः ।। १४ ।।
अश्वपतिने कहा— देवि! मैंने धर्मप्राप्तिकी इच्छासे संतानके लिये यह अनुष्ठान आरम्भ किया था। आपकी कृपासे मुझे बहुत-से वंशप्रवर्तक पुत्र प्राप्त हों ।। १४ ।।
तुष्टासि यदि मे देवि वरमेतं वृणोम्यहम् ।
संतानं परमो धर्म इत्याहुर्मां द्विजातयः ।। १५ ।।
देवि! यदि आप प्रसन्न हैं तो मैं आपसे यह संतानसम्बन्धी वर ही माँगता हूँ; क्योंकि द्विजातिगण मुझसे बराबर यही कहते हैं कि ‘न्याययुक्त संतानोत्पादन (भी) परम धर्म है’ ।। १५ ।।
सावित्र्युवाच
पूर्वमेव मया राजन्नभिप्रायमिमं तव ।
ज्ञात्वा पुत्रार्थमुक्तो वै भगवांस्ते पितामहः ।। १६ ।।
सावित्री बोली— राजन्! मैंने पहले ही तुम्हारे इस अभिप्रायको जानकर पुत्रके लिये भगवान् ब्रह्माजीसे निवेदन किया था ।। १६ ।।
प्रसादाच्चैव तस्मात् ते स्वयम्भुविहिताद् भुवि ।
कन्या तेजस्विनी सौम्य क्षिप्रमेव भविष्यति ।। १७ ।।
अतः सौम्य! भगवान् ब्रह्माजीके कृपाप्रसादसे तुम्हें शीघ्र ही इस पृथ्वीपर एक तेजस्विनी कन्या प्राप्त होगी ।। १७ ।।
उत्तरं च न ते किंचिद् व्याहर्तव्यं कथञ्चन ।
पितामहविसर्गेण तुष्टा ह्येतद् ब्रवीमि ते ।। १८ ।।
इस विषयमें तुम्हें किसी तरह भी कोई प्रतिवाद या उत्तर नहीं देना चाहिये। मैं ब्रह्माजीकी आज्ञासे संतुष्ट होकर तुमसे यह बात कहती हूँ ।। १८ ।।
मार्कण्डेय उवाच
स तथेति प्रतिज्ञाय सावित्र्या वचनं नृपः । प्रसादयामास पुनः क्षिप्रमेतद् भविष्यति ॥ १९ ॥ **मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! सावित्रीदेवीकी बात सुनकर राजाने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञाका पालन करनेकी प्रतिज्ञा की और पुनः सावित्रीदेवीको इस उद्देश्यसे प्रसन्न किया कि यह भविष्यवाणी शीघ्र सफल हो ॥ १९ ॥
अन्तर्हितायां सावित्र्यां जगाम स्वपुरं नृपः । स्वराज्ये चावसद् वीरः प्रजा धर्मेण पालयन् ॥ २० ॥ जब सावित्रदेवी अन्तर्धान हो गयीं, तब वीर राजा अश्वपति भी अपने नगरको चले गये और प्रजाका धर्मपूर्वक पालन करते हुए अपने राज्यमें ही रहने लगे ॥
कस्मिंश्चित् तु गते काले स राजा नियतव्रतः । ज्येष्ठायां धर्मचारिण्यां महिष्यां गर्भमादधे ॥ २१ ॥ नियमपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजा अश्वपतिने किसी समय अपनी धर्मपरायणा बड़ी रानीमें गर्भ स्थापित किया ॥ २१ ॥
राजपुत्र्यास्तु गर्भः स मालव्या भरतर्षभ । व्यवर्धत तदा शुक्ले तारापतिरिवाम्बरे ॥ २२ ॥ भरतश्रेष्ठ! अश्वपतिकी पत्नी मालवदेशकी राजकुमारी थीं। उनका वह गर्भ आकाशमें शुक्लपक्षीय चन्द्रमाकी भाँति दिनोदिन बढ़ने लगा ॥ २२ ॥
प्राप्ते काले तु सुषुवे कन्यां राजीवलोचनाम् । क्रियाश्च तस्या मुदितश्चक्रे च नृपसत्तमः ॥ २३ ॥ समय प्राप्त होनेपर महारानीने एक कमलनयनी कन्याको जन्म दिया तथा नृपश्रेष्ठ अश्वपतिने अत्यन्त प्रसन्न होकर उसके जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न करवाये ॥ २३ ॥
सावित्र्या प्रीतया दत्ता सावित्र्या हुतया ह्यपि । सावित्रीत्येव नामास्याश्चक्रुर्विप्रास्तथा पिता ॥ २४ ॥ सावित्रीने प्रसन्न होकर उस कन्याको दिया था तथा गायत्री-मन्त्रद्वारा आहुति देनेसे ही सावित्रीदेवी प्रसन्न हुई थीं, अतः ब्राह्मणों तथा पिताने उस कन्याका नाम 'सावित्री' ही रखा ॥ २४ ॥
सा विग्रहवतीव श्रीर्व्यवर्धत नृपात्मजा । कालेन चापि सा कन्या यौवनस्था बभूव ह ॥ २५ ॥ वह राजकन्या मूर्तिमती लक्ष्मीके समान बढ़ने लगी और यथासमय उसने युवावस्थामें प्रवेश किया ॥ २५ ॥
तां सुमध्यां पृथुश्रोणीं प्रतिमां काञ्चनीमिव । प्राप्तेयं देवकन्येति दृष्ट्वा सम्मेनिरे जनाः ॥ २६ ॥
उसके शरीरका कटिभाग परम सुन्दर तथा नितम्बदेश पृथुल था। वह सुवर्णकी बनी हुई प्रतिमा-सी जान पड़ती थी। उसे देखकर सब लोग यही मानते थे कि यह कोई देवकन्या आ गयी है ।। २६ ।।
तां तु पद्मपलाशाक्षीं ज्वलन्तीमिव तेजसा । न कश्चिद् वरयामास तेजसा प्रतिवारितः ॥ २७ ॥ उसके नेत्रयुगल विकसित नील कमलदलके समान मनोहर थे। वह अपने तेजसे प्रज्वलित-सी जान पड़ती थी। उसके तेजसे प्रतिहत हो जानेके कारण कोई भी राजा या राजकुमार उसका वरण नहीं कर सका ।। २७ ।।
अथोपोष्य शिरःस्नाता देवतामभिगम्य सा । हुत्वाग्निं विधिवद् विप्रान् वाचयामास पर्वणि ॥ २८ ॥ एक दिन किसी पर्वके अवसरपर उपवासपूर्वक शिरसे स्नान करके सावित्री देवताके दर्शनके लिये गयी और विधिपूर्वक अग्निमें आहुति दे उसने ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया ।। २८ ।।
ततः सुमनसः शेषाः प्रतिगृह्य महात्मनः । पितुः समीपमगमद् देवी श्रीरिव रूपिणी ॥ २९ ॥ तदनन्तर इष्टदेवताका प्रसाद लेकर मूर्तिमती लक्ष्मीदेवीके समान सुशोभित होती हुई वह अपने महात्मा पिताके समीप गयी ।। २९ ।।
साभिवाद्य पितुः पादौ शेषाः पूर्वं निवेद्य च । कृताञ्जलिर्वरारोहा नृपतेः पार्श्वमास्थिता ॥ ३० ॥ पहले प्रसाद आदि निवेदन करके उसने पिताके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर वह सुन्दरी कन्या हाथ जोड़कर पिताके पार्श्वभागमें खड़ी हो गयी ।। ३० ।।
यौवनस्थां तु तां दृष्ट्वा स्वां सुतां देवरूपिणीम् । अयाच्यमानां स वरैर्नृपतिर्दुःखितोऽभवत् ॥ ३१ ॥ अपनी देवस्वरूपिणी पुत्रीको युवावस्थामें प्रविष्ट हुई देख और अभीतक इसके लिये किसी वरने याचना नहीं की, यह सोचकर मद्रनरेशको बड़ा दुःख हुआ ।। ३१ ।।
राजोवाच
पुत्रि प्रदानकालस्ते न च कश्चिद् वृणोति माम् । स्वयमन्विच्छ भर्तारं गुणैः सदृशमात्मनः ॥ ३२ ॥ राजा बोले—बेटी! अब किसी वरके साथ तेरा ब्याह कर देनेका समय आ गया है, परंतु (तेरे तेजसे प्रतिहत हो जानेके कारण) कोई भी मुझसे तुझे माँग नहीं रहा है। इसलिये तू स्वयं ही ऐसे वरकी खोज कर ले जो गुणोंमें तेरे समान हो ।। ३२ ।।
प्रार्थितः पुरुषो यश्च स निवेद्यस्त्वया मम ।
विमृश्याहं प्रदास्यामि वरय त्वं यथेप्सितम् ॥ ३३ ॥
जिस पुरुषको तू पतिरूपमें प्राप्त करना चाहे, उसका मुझे परिचय दे देना; फिर मैं सोच-विचारकर उसके साथ तेरा ब्याह कर दूँगा। तू मनोवांछित वरका वरण कर ले ॥ ३३ ॥
श्रुतं हि धर्मशास्त्रेषु पठ्यमानं द्विजातिभिः ।
तथा त्वमपि कल्याणि गदतो मे वचः शृणु ॥ ३४ ॥
कल्याणि! मैंने ब्राह्मणोंके मुखसे धर्मशास्त्रोंकी जो बात सुनी है, उसे बता रहा हूँ, तू भी सुन ले— ॥ ३४ ॥
अप्रदाता पिता वाच्यो वाच्यश्चानुपयन् पतिः ।
मृते भर्तरि पुत्रश्च वाच्यो मातुररक्षिता ॥ ३५ ॥
‘विवाहके योग्य हो जानेपर कन्याका दान न करनेवाला पिता निन्दनीय है। ऋतुकालमें पत्नीके साथ समागम न करनेवाला पति निन्दाका पात्र है तथा पतिके मर जानेपर विधवा माताकी रक्षा न करनेवाला पुत्र धिक्कारके योग्य है’ ॥ ३५ ॥
इदं मे वचनं श्रुत्वा भर्तुरन्वेषणे त्वर ।
देवतानां यथा वाच्यो न भवेयं तथा कुरु ॥ ३६ ॥
मेरी यह बात सुनकर तू पतिकी खोज करनेमें शीघ्रता कर। ऐसी चेष्टा कर, जिससे मैं देवताओंकी दृष्टिमें अपराधी न बनूँ ॥ ३६ ॥
मार्कण्डेय उवाच
एवमुक्त्वा दुहितरं तथा वृद्धांश्च मन्त्रिणः ।
व्यादिदेशानुयात्रं च गम्यतां चेत्यचोदयत् ॥ ३७ ॥
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! पुत्रीसे ऐसा कहकर राजाने बूढ़े मन्त्रियोंको आज्ञा दी—‘आपलोग यात्राके लिये आवश्यक सामग्री (वाहन आदि) लेकर सावित्रीके साथ जायँ’ ॥ ३७ ॥
साभिवाद्य पितुः पादौ व्रीडितेव मनस्विनी ।
पितुर्वचनमाज्ञाय निर्जगामाविचारितम् ॥ ३८ ॥
मनस्विनी सावित्रीने कुछ लज्जित-सी होकर पिताके चरणोंमें प्रणाम किया और उनकी आज्ञा शिरोधार्य करके बिना कुछ सोच-विचार किये उसने प्रस्थान कर दिया ॥ ३८ ॥
सा हैमं रथमास्थाय स्थविरैः सचिवैर्वृता ।
तपोवनानि रम्याणि राजर्षीणां जगाम ह ॥ ३९ ॥
सुवर्णमय रथपर सवार हो बूढ़े मन्त्रियोंसे घिरी हुई वह राजकन्या राजर्षियोंके सुरम्य तपोवनोंमें गयी ॥ ३९ ॥
मान्यानां तत्र वृद्धानां कृत्वा पादाभिवादनम् ।
वनानि क्रमशस्तात सर्वाण्येवाभ्यगच्छत ॥ ४० ॥
तात! वहाँ माननीय वृद्धजनोंकी चरणवन्दना करके उसने क्रमशः सभी वनोंमें भ्रमण किया ॥ ४० ॥
एवं तीर्थेषु सर्वेषु धनोत्सर्गं नृपात्मजा ।
कुर्वती द्विजमुख्यानां तं तं देशं जगाम ह ॥ ४१ ॥
इस प्रकार राजकुमारी सावित्री सभी तीर्थोंमें जाकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धनदान करती हुई विभिन्न देशोंमें घूमती फिरी ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि पतिव्रतामाहात्म्यपर्वणि सावित्र्युपाख्याने
त्रिनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत पतिव्रतामाहात्म्यपर्वमें सावित्री-
उपाख्यानविषयक दो सौ तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ३/३ श्लोक मिलाकर कुल ४१ ३/३ श्लोक हैं)