महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व
Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अम्बा और परशुरामजीका संवाद, अकृतव्रणकी सलाह, परशुराम और भीष्मकी रोषपूर्ण बातचीत तथा उन दोनोंका युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें उतरना
अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
अम्बा और परशुरामजीका संवाद, अकृतव्रणकी सलाह, परशुराम और भीष्मकी रोषपूर्ण बातचीत तथा उन दोनोंका युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें उतरना
भीष्म उवाच
एवमुक्तस्तदा रामो जहि भीष्ममिति प्रभो ।
उवाच रुदतीं कन्यां चोदयन्तीं पुनः पुनः ॥ १ ॥
काश्ये न कामं गृह्णामि शस्त्रं वै वरवर्णिनि ।
ऋते ब्रह्मविदां हेतोः किमन्यत् करवाणि ते ॥ २ ॥
भीष्मजी कहते हैं—राजन्! अम्बाके ऐसा कहनेपर कि प्रभो! भीष्मको मार डालिये। परशुरामजीने रो-रोकर बार-बार प्रेरणा देनेवाली उस कन्यासे इस प्रकार कहा—'सुन्दरी! काशिराजकुमारी! मैं अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार किसी वेदवेत्ता ब्राह्मणको आवश्यकता हो तो उसीके लिये शस्त्र उठाता हूँ। वैसा कारण हुए बिना इच्छानुसार हथियार नहीं उठाता। अतः इस प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए मैं तेरा दूसरा कौन-सा कार्य करूँ ॥ १-२ ॥
वाचा भीष्मश्च शाल्वश्च मम राज्ञि वशानुगौ ।
भविष्यतोऽनवद्याङ्गि तत् करिष्यामि मा शुचः ॥ ३ ॥
'राजकन्ये! भीष्म और शाल्व दोनों मेरी आज्ञाके अधीन होंगे। अतः निर्दोष अंगोंवाली सुन्दरी! मैं तेरा कार्य करूँगा। तू शोक न कर ॥ ३ ॥
न तु शस्त्रं ग्रहीष्यामि कथंचिदपि भाविनि ।
ऋते नियोगाद् विप्राणामेष मे समयः कृतः ॥ ४ ॥
'भाविनि! मैं किसी तरह ब्राह्मणोंकी आज्ञाके बिना हथियार नहीं उठाऊँगा, ऐसी मैंने प्रतिज्ञा कर रखी है' ॥
अम्बोवाच
मम दुःखं भगवता व्यपनेयं यतस्ततः ।
तच्च भीष्मप्रसूतं मे तं जहीश्वर मा चिरम् ॥ ५ ॥
अम्बा बोली—भगवन्! आप जैसे हो सके वैसे ही मेरा दुःख दूर करें। वह दुःख भीष्मने पैदा किया है; अतः प्रभो! उसीका शीघ्र वध कीजिये ॥ ५ ॥
राम उवाच
काशिकन्ये पुनर्ब्रूहि भीष्मस्ते चरणावुभौ ।
शिरसा वन्दनार्होऽपि ग्रहीष्यति गिरा मम ॥ ६ ॥
परशुरामजी बोले— काशिराजकी पुत्री! तू पुनः सोचकर बता। यद्यपि भीष्म तेरे लिये वन्दनीय है, तथापि मेरे कहनेसे वह तेरे चरणोंको अपने सिरपर उठा लेगा ॥
अम्बोवाच
जहि भीष्मं रणे राम गर्जन्तमसुरं यथा ।
समाहूतो रणे राम मम चेदिच्छसि प्रियम् ।
प्रतिश्रुतं च यदपि तत् सत्यं कर्तुमर्हसि ॥ ७ ॥
अम्बा बोली— राम! यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो युद्धमें आमन्त्रित हो, असुरके समान गर्जना करनेवाले भीष्मको मार डालिये और आपने जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उसे भी सत्य कीजिये ॥ ७ ॥
भीष्म उवाच
तयोः संवदतोरेवं राजन् रामाम्बयोस्तदा ।
ऋषिः परमधर्मात्मा इदं वचनमब्रवीत् ॥ ८ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! परशुराम और अम्बामें जब इस प्रकार बातचीत हो रही थी, उसी समय परम धर्मात्मा ऋषि अकृतव्रणने यह बात कही— ॥ ८ ॥
शरणागतां महाबाहो कन्यां न त्यक्तुमर्हसि ।
यदि भीष्मो रणे राम समाहूतस्त्वया मृधे ॥ ९ ॥
निर्जितोऽस्मीति वा ब्रूयात् कुर्याद् वा वचनं तव ।
कृतमस्या भवेत् कार्यं कन्याया भृगुनन्दन ॥ १० ॥
‘महाबाहो! यह कन्या शरणमें आयी है; अतः आपको इसका त्याग नहीं करना चाहिये। भृगुनन्दन राम! यदि युद्धमें आपके बुलानेपर भीष्म सामने आकर अपनी पराजय स्वीकार करे अथवा आपकी बात ही मान ले तो इस कन्याका कार्य सिद्ध हो जायगा ॥ ९-१० ॥
वाक्यं सत्यं च ते वीर भविष्यति कृतं विभो ।
इयं चापि प्रतिज्ञा ते तदा राम महामुने ॥ ११ ॥
जित्वा वै क्षत्रियान् सर्वान् ब्राह्मणेषु प्रतिश्रुता ।
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रश्चैव रणे यदि ॥ १२ ॥
ब्रह्मद्विड् भविता तं वै हनिष्यामीति भार्गव ।
शरणार्थे प्रपन्नानां भीतानां शरणार्थिनाम् ॥ १३ ॥
न शक्ष्यामि परित्यागं कर्तुं जीवन् कथंचन ।
यश्च कृत्स्नं रणे क्षत्रं विजेष्यति समागतम् ॥ १४ ॥
दीप्तात्मानमहं तं च हनिष्यामीति भार्गव ।
'महामुने राम! प्रभो! ऐसा होनेसे आपकी कही हुई बात सत्य सिद्ध होगी। वीरवर भार्गव! आपने समस्त क्षत्रियोंको जीतकर ब्राह्मणोंके बीचमें यह प्रतिज्ञा की थी कि यदि कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र ब्राह्मणोंसे द्वेष करेगा तो मैं उसे निश्चय ही मार डालूँगा। साथ ही भयभीत होकर शरणमें आये हुए शरणार्थियोंका परित्याग मैं जीते-जी किसी प्रकार नहीं कर सकूँगा और जो युद्धमें एकत्र हुए सम्पूर्ण क्षत्रियोंको जीत लेगा, उस तेजस्वी पुरुषका भी मैं वध कर डालूँगा ।। ११—१४ १/२ ।। स एवं विजयी राम भीष्मः कुरुकुलोद्वहः । तेन युध्यस्व संग्रामे समेत्य भृगुनन्दन ।। १५ ।। 'भृगुनन्दन राम! इस प्रकार कुरुकुलका भार वहन करनेवाला भीष्म समस्त क्षत्रियोंपर विजय पा चुका है; अतः आप संग्राममें उसके सामने जाकर युद्ध कीजिये' ।। १५ ।।
राम उवाच
स्मराम्यहं पूर्वकृतां प्रतिज्ञामृषिसत्तम । तथैव च चरिष्यामि यथा साम्नैव लप्स्यते ।। १६ ।। **परशुरामजी बोले—**मुनिश्रेष्ठ! मुझे अपनी पहलेकी की हुई प्रतिज्ञाका स्मरण है, तथापि मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा कि सामनीतिसे ही काम बन जाय ।। १६ ।। कार्यमेतन्महद् ब्रह्मन् काशिकन्यामनोगतम् । गमिष्यामि स्वयं तत्र कन्यामादाय यत्र सः ।। १७ ।। ब्रह्मन्! काशिराजकी कन्याके मनमें जो यह कार्य है, वह महान् है। मैं उसकी सिद्धिके लिये इस कन्याको साथ लेकर स्वयं ही वहाँ जाऊँगा, जहाँ भीष्म है ।। १७ ।। यदि भीष्मो रणश्लाघी न करिष्यति मे वचः । हनिष्याम्येनमुद्रिक्तमिति मे निश्चिता मतिः ।। १८ ।। यदि युद्धकी स्पृहा रखनेवाला भीष्म मेरी बात नहीं मानेगा तो मैं उस अभिमानीको मार डालूँगा; यह मेरा निश्चित विचार है ।। १८ ।। न हि बाणा मयोत्सृष्टाः सज्जन्तीह शरीरिणाम् । कायेषु विदितं तुभ्यं पुरा क्षत्रियसंगरे ।। १९ ।। मेरे चलाये हुए बाण देहधारियोंके शरीरमें अटकते नहीं हैं। (उन्हें विदीर्ण करके बाहर निकल जाते हैं।) यह बात तुम्हें पूर्वकालमें क्षत्रियोंके साथ होनेवाले युद्धके समय ज्ञात हो चुकी है ।। १९ ।। एवमुक्त्वा ततो रामः सह तैर्ब्रह्मवादिभिः । प्रयाणाय मतिं कृत्वा समुत्तस्थौ महातपाः ।। २० ।। ऐसा कहकर महातपस्वी परशुरामजी उन ब्रह्मवादी महर्षियोंके साथ प्रस्थान करनेका निश्चय करके उसके लिये उद्यत हो गये ।। २० ।।
ततस्ते तामुषित्वा तु रजनीं तत्र तापसाः । हुताग्नयो जप्तजप्याः प्रतस्थुर्मज्जिघांसया ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् रातभर वहीं रहकर प्रातःकाल संध्योपासन, गायत्री-जप और अग्निहोत्र करके वे तपस्वी मुनि मेरा वध करनेकी इच्छासे उस आश्रमसे चले ॥ २१ ॥
अभ्यगच्छत् ततो रामः सह तैर्ब्रह्मवादिभिः । कुरुक्षेत्रं महाराज कन्यया सह भारत ॥ २२ ॥ महाराज भरतनन्दन! फिर उन वेदवादी मुनियोंको साथ ले परशुरामजी राजकन्या अम्बाके साथ कुरुक्षेत्रमें आये ॥ २२ ॥
न्यविशन्त ततः सर्वे परिगृह्य सरस्वतीम् । तापसास्ते महात्मानो भृगुश्रेष्ठपुरस्कृताः ॥ २३ ॥ वहाँ भृगुश्रेष्ठ परशुरामजीको आगे करके उन सभी तपस्वी महात्माओंने सरस्वती नदीके तटका आश्रय ले रात्रिमें निवास किया ॥ २३ ॥
भीष्म उवाच
ततस्तृतीये दिवसे संदेश व्यवस्थितः । कुरु प्रियं स मे राजन् प्राप्तोऽस्मीति महाव्रतः ॥ २४ ॥ भीष्मजी कहते हैं—तदनन्तर तीसरे दिन (हस्तिनापुरके बाहर) एक स्थानपर ठहरकर महान् व्रतधारी परशुरामजीने मुझे संदेश दिया—‘राजन्! मैं यहाँ आया हूँ। तुम मेरा प्रिय कार्य करो’ ॥ २४ ॥
तमागतमहं श्रुत्वा विषयान्तं महाबलम् । अभ्यगच्छं जवेनाशु प्रीत्या तेजोनिधिं प्रभुम् ॥ २५ ॥ तेजके भण्डार और महाबली भगवान् परशुरामको अपने राज्यकी सीमापर आया हुआ सुनकर मैं बड़ी प्रसन्नताके साथ वेगपूर्वक उनके पास गया ॥ २५ ॥
गां पुरस्कृत्य राजेन्द्र ब्राह्मणैः परिवारितः । ऋत्विग्भिर्देवकल्पैश्च तथैव च पुरोहितैः ॥ २६ ॥ राजेन्द्र! उस समय एक गौको आगे करके ब्राह्मणोंसे घिरा हुआ मैं देवताओंके समान तेजस्वी ऋत्विजों तथा पुरोहितोंके साथ उनकी सेवामें उपस्थित हुआ ॥ २६ ॥
स मामभिगतं दृष्ट्वा जामदग्न्यः प्रतापवान् । प्रतिजग्राह तां पूजां वचनं चेदमब्रवीत् ॥ २७ ॥ मुझे अपने समीप आया हुआ देख प्रतापी परशुरामजीने मेरी दी हुई पूजा स्वीकार की और इस प्रकार कहा ॥ २७ ॥
राम उवाच
भीष्म कां बुद्धिमास्थाय काशिराजसुता तदा ।
अकामेन त्वयाऽऽनीता पुनश्चैव विसर्जिता ॥ २८ ॥
परशुरामजी बोले— भीष्म! तुमने किस विचारसे उन दिनों स्वयं पत्नीकी कामनासे रहित होते हुए भी काशिराजकी इस कन्याका अपहरण किया, अपने घर ले आये और पुनः इसे निकाल बाहर किया ॥ २८ ॥
विभ्रंशिता त्वया हीयं धर्मदास्ते यशस्विनी ।
परामृष्टां त्वया हीमां को हि गन्तुमिहार्हति ॥ २९ ॥
तुमने इस यशस्विनी राजकुमारीको धर्मसे भ्रष्ट कर दिया है। तुम्हारे द्वारा इसका स्पर्श कर लिया गया है, ऐसी दशामें इसे दूसरा कौन ग्रहण कर सकता है? ॥ २९ ॥
प्रत्याख्याता हि शाल्वेन त्वयाऽऽनीतेति भारत ।
तस्मादिमां मन्नियोगात् प्रतिगृह्णीष्व भारत ॥ ३० ॥
भारत! तुम इसे हरकर लाये थे। इसी कारणसे शाल्वराजने इसके साथ विवाह करनेसे इन्कार कर दिया है; अतः अब तुम मेरी आज्ञासे इसे ग्रहण कर लो ॥ ३० ॥
स्वधर्मं पुरुषव्याघ्र राजपुत्री लभत्वियम् ।
न युक्तस्त्ववमानोऽयं राज्ञां कर्तुं त्वयानघ ॥ ३१ ॥
पुरुषसिंह! तुम्हें ऐसा करना चाहिये, जिससे इस राजकुमारीको स्वधर्मपालनका अवसर प्राप्त हो। अनघ! तुम्हें राजाओंका इस प्रकार अपमान करना उचित नहीं है ॥ ३१ ॥
ततस्तं वै विमनसमुदीक्ष्याहमथाब्रुवम् ।
नाहमेनां पुनर्दद्यां ब्रह्मन् भ्रात्रे कथंचन ॥ ३२ ॥
तब मैंने परशुरामजीको उदास देखकर इस प्रकार कहा—'ब्रह्मन्! अब मैं इसका विवाह अपने भाईके साथ किसी प्रकार नहीं कर सकता ॥ ३२ ॥
शाल्वस्याहमिति प्राह पुरा मामेव भार्गव ।
मया चैवाभ्यनुज्ञाता गतेयं नगरं प्रति ॥ ३३ ॥
'भृगुनन्दन! इसने पहले मुझसे ही आकर कहा कि मैं शाल्वकी हूँ, तब मैंने इसे जानेकी आज्ञा दे दी और यह शाल्वराजके नगरको चली गयी ॥ ३३ ॥
न भयान्नाप्यनुक्रोशान्नार्थलोभान्न काम्यया ।
क्षात्रं धर्ममहं जह्यामिति मे व्रतमाहितम् ॥ ३४ ॥
'मैं भयसे, दयासे, धनके लोभसे तथा और किसी कामनासे भी क्षत्रियधर्मका त्याग नहीं कर सकता, यह मेरा स्वीकार किया हुआ व्रत है' ॥ ३४ ॥
अथ मामब्रवीद् रामः क्रोधपर्याकुलेक्षणः ।
न करिष्यसि चेदेतद् वाक्यं मे नरपुङ्गव ॥ ३५ ॥
हनिष्यामि सहामात्यं त्वामद्येति पुनः पुनः ।
तब यह सुनकर परशुरामजीके नेत्रोंमें क्रोधका भाव व्याप्त हो गया और वे मुझसे इस प्रकार बोले—‘नरश्रेष्ठ! तुम यदि मेरी यह बात नहीं मानोगे तो आज मैं मन्त्रियोंसहित तुम्हें मार डालूँगा।’ इस बातको उन्होंने बार-बार दुहराया ॥ ३५१/२ ॥ संरम्भादब्रवीद् रामः क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥ ३६ ॥ तमहं गीर्भिरिष्टाभिः पुनः पुनररिंदम । अयाचं भृगुशार्दूलं न चैव प्रशशाम सः ॥ ३७ ॥ शत्रुदमन दुर्योधन! परशुरामजीने क्रोधभरे नेत्रोंसे देखते हुए बड़े रोषावेशमें आकर यह बात कही थी, तथापि मैं प्रिय वचनोंद्वारा उन भृगुश्रेष्ठ महात्मासे बार-बार शान्त रहनेके लिये प्रार्थना करता रहा; पर वे किसी प्रकार शान्त न हो सके ॥ ३६-३७ ॥ प्रणम्य तमहं मूर्ध्ना भूयो ब्राह्मणसत्तमम् । अब्रुवं कारणं किं तद् यत् त्वं युद्धं मयेच्छसि ॥ ३८ ॥ इष्वस्त्रं मम बालस्य भवतैव चतुर्विधम् । उपदिष्टं महाबाहो शिष्योऽस्मि तव भार्गव ॥ ३९ ॥ तब मैंने उन ब्राह्मणशिरोमणिके चरणोंमें मस्तक झुकाकर पुनः प्रणाम किया और इस प्रकार पूछा—‘भगवन्! क्या कारण है कि आप मेरे साथ युद्ध करना चाहते हैं? बाल्यावस्थामें आपने ही मुझे चार प्रकारके धनुर्वेदकी शिक्षा दी है। महाबाहु भार्गव! मैं तो आपका शिष्य हूँ’ ॥ ३८-३९ ॥ ततो मामब्रवीद् रामः क्रोधसंरक्तलोचनः । जानीषे मां गुरुं भीष्म गृह्णासीमां न चैव ह ॥ ४० ॥ सुतां काश्यस्य कौरव्य मत्प्रियार्थं महामते । न हि ते विद्यते शान्तिरन्यथा कुरुनन्दन ॥ ४१ ॥ तब परशुरामजीने क्रोधसे लाल आँखें करके मुझसे कहा—‘महामते भीष्म! तुम मुझे अपना गुरु तो समझते हो; परंतु मेरा प्रिय करनेके लिये काशिराजकी इस कन्याको ग्रहण नहीं करते हो; किंतु कुरुनन्दन! ऐसा किये बिना तुम्हें शान्ति नहीं मिल सकती ॥ ४०-४१ ॥ गृहाणेमां महाबाहो रक्षस्व कुलमात्मनः । त्वया विभ्रंशिता हीयं भर्तारं नाधिगच्छति ॥ ४२ ॥ ‘महाबाहो! इसे ग्रहण कर लो और इस प्रकार अपने कुलकी रक्षा करो। तुम्हारे द्वारा अपनी मर्यादासे गिर जानेके कारण इसे पतिकी प्राप्ति नहीं हो रही है’ ॥ तथा ब्रुवन्तं तमहं रामं परपुरंजयम् । नैतदेवं पुनर्भावि ब्रह्मर्षे किं श्रमेण ते ॥ ४३ ॥ ऐसी बातें करते हुए शत्रुनगरविजयी परशुरामजीसे मैंने स्पष्ट कह दिया—‘ब्रह्मर्षे! अब फिर ऐसी बात नहीं हो सकती। इस विषयमें आपके परिश्रमसे क्या होगा? ॥ ४३ ॥
गुरुत्वं त्वयि सम्प्रेक्ष्य जामदग्न्य पुरातनम् । प्रसादये त्वां भगवंस्त्यक्तैषा तु पुरा मया ॥ ४४ ॥ 'जमदग्निनन्दन! भगवन्! आप मेरे प्राचीन गुरु हैं, यह सोचकर ही मैं आपको प्रसन्न करनेकी चेष्टा कर रहा हूँ। इस अम्बाको तो मैंने पहले ही त्याग दिया था ॥ ४४ ॥ को जातु परभावां हि नारीं व्यालीमिव स्थिताम् । वासयेत गृहे जानन् स्त्रीणां दोषो महात्ययः ॥ ४५ ॥ 'दूसरेके प्रति अनुराग रखनेवाली नारी सर्पिणीके समान भयंकर होती है। कौन ऐसा पुरुष होगा, जो जान-बूझकर उसे कभी भी अपने घरमें स्थान देगा; क्योंकि स्त्रियोंका (परपुरुषमें अनुरागरूप) दोष महान् अनर्थका कारण होता है ॥ ४५ ॥ न भयाद् वासवस्यापि धर्मं जह्यां महाव्रत । प्रसीद मा वा यद् वा ते कार्यं तत् कुरु मा चिरम् ॥ ४६ ॥ 'महान् व्रतधारी राम! मैं इन्द्रके भी भयसे धर्मका त्याग नहीं कर सकता। आप प्रसन्न हों या न हों। आपको जो कुछ करना हो, शीघ्र कर डालिये ॥ ४६ ॥ अयं चापि विशुद्धात्मन् पुराणे श्रूयते विभो । मरुत्तेन महाबुद्धे गीतः श्लोको महात्मना ॥ ४७ ॥ “गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः । उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते” ॥ ४८ ॥ 'विशुद्ध हृदयवाले परम बुद्धिमान् राम! पुराणमें महात्मा मरुत्तके द्वारा कहा हुआ यह श्लोक सुननेमें आता है कि यदि गुरु भी गर्वमें आकर कर्तव्य और अकर्तव्यको न समझते हुए कुपथका आश्रय ले तो उसका परित्याग कर दिया जाता है ॥ ४७-४८ ॥ स त्वं गुरुरिति प्रेम्णा मया सम्मानितो भृशम् । गुरुवृत्तिं न जानीषे तस्माद् योत्स्यामि वै त्वया ॥ ४९ ॥ 'आप मेरे गुरु हैं, यह समझकर मैंने प्रेमपूर्वक आपका अधिक-से-अधिक सम्मान किया है; परंतु आप गुरुका-सा बर्ताव नहीं जानते; अतः मैं आपके साथ युद्ध करूँगा ॥ ४९ ॥ गुरुं न हन्यां समरे ब्राह्मणं च विशेषतः । विशेषतस्तपोवृद्धमेवं क्षान्तं मया तव ॥ ५० ॥ 'एक तो आप गुरु हैं। उसमें भी विशेषतः ब्राह्मण हैं। उसपर भी विशेष बात यह है कि आप तपस्यामें बढ़े-चढ़े हैं। अतः आप-जैसे पुरुषको मैं कैसे मार सकता हूँ? यही सोचकर मैंने अबतक आपके तीक्ष्ण बर्तावको चुपचाप सह लिया ॥ ५० ॥ उद्यतेषुमथो दृष्ट्वा ब्राह्मणं क्षत्रबन्धुवत् । यो हन्यात् समरे क्रुद्धं युध्यन्तमपलायिनम् ॥ ५१ ॥ ब्रह्महत्या न तस्य स्यादिति धर्मेषु निश्चयः ।
क्षत्रियाणां स्थितो धर्मे क्षत्रियोऽस्मि तपोधन ॥ ५२ ॥
'यदि ब्राह्मण भी क्षत्रियकी भाँति धनुष-बाण उठाकर युद्धमें क्रोधपूर्वक सामने आकर युद्ध करने लगे और पीठ दिखाकर भागे नहीं तो उसे इस दशामें देखकर जो योद्धा मार डालता है, उसे ब्रह्महत्याका दोष नहीं लगता, यह धर्मशास्त्रोंका निर्णय है। तपोधन! मैं क्षत्रिय हूँ और क्षत्रियोंके ही धर्ममें स्थित हूँ' ॥ ५१-५२ ॥
यो यथा वर्तते यस्मिंस्तस्मिन्नेव प्रवर्तयन् ।
नाधर्मं समवाप्नोति न चाश्रेयश्च विन्दति ॥ ५३ ॥
'जो जैसा बर्ताव करता है, उसके साथ वैसा ही बर्ताव करनेवाला पुरुष न तो अधर्मको प्राप्त होता है और न अमंगलका ही भागी होता है' ॥ ५३ ॥
अर्थे वा यदि वा धर्मे समर्थो देशकालवित् ।
अर्थसंशयमापन्नः श्रेयान्निःसंशयो नरः ॥ ५४ ॥
'अर्थ (लौकिक कृत्य) और धर्मके विवेचनमें कुशल तथा देश-कालके तत्त्वको जाननेवाला पुरुष यदि अर्थके विषयमें संशय उत्पन्न होनेपर उसे छोड़कर संशयशून्य हृदयसे केवल धर्मका ही अनुष्ठान करे तो वह श्रेष्ठ माना गया है' ॥ ५४ ॥
यस्मात् संशयितेऽप्यर्थेऽयथान्यायं प्रवर्तसे ।
तस्माद् योत्स्यामि सहितस्त्वया राम महाहवे ॥ ५५ ॥
'राम! 'अम्बा ग्रहण करनेयोग्य है या नहीं' यह संशयग्रस्त विषय है तो भी आप इसे ग्रहण करनेके लिये मुझसे न्यायोचित बर्ताव नहीं कर रहे हैं; इसलिये महान् समरांगणमें आपके साथ युद्ध करूँगा' ॥ ५५ ॥
पश्य मे बाहुवीर्यं च विक्रमं चातिमानुषम् ।
एवं गतेऽपि तु मया यच्छक्यं भृगुनन्दन ॥ ५६ ॥
तत् करिष्ये कुरुक्षेत्रे योत्स्ये विप्र त्वया सह ।
द्वन्द्वे राम यथेष्टं मे सज्जीभव महाद्युते ॥ ५७ ॥
'आप उस समय मेरे बाहुबल और अलौकिक पराक्रमको देखियेगा। भृगुनन्दन! ऐसी स्थितिमें भी मैं जो कुछ कर सकता हूँ, उसे अवश्य करूँगा। विप्रवर! मैं कुरुक्षेत्रमें चलकर आपके साथ युद्ध करूँगा। महातेजस्वी राम! आप द्वन्द्वयुद्धके लिये इच्छानुसार तैयारी कर लीजिये' ॥ ५६-५७ ॥
तत्र त्वं निहतो राम मया शरशतार्दितः ।
प्राप्स्यसे निर्जिताँल्लोकान् शस्त्रपूतो महारणे ॥ ५८ ॥
'राम! उस महान् युद्धमें मेरे सैकड़ों बाणोंसे पीड़ित एवं शस्त्रपूत हो मारे जानेपर आप पुण्यकर्मोंद्वारा जीते हुए दिव्य लोकोंको प्राप्त करेंगे' ॥ ५८ ॥
स गच्छ विनिवर्तस्व कुरुक्षेत्रं रणप्रिय ।
तत्रैष्यामि महाबाहो युद्धाय त्वां तपोधन ॥ ५९ ॥
‘युद्धप्रिय महाबाहु तपोधन! अब आप लौटिये और कुरुक्षेत्रमें ही चलिये। मैं युद्धके लिये वहीं आपके पास आऊँगा।। ५९ ।। अपि यत्र त्वया राम कृतं शौचं पुरा पितुः । तत्राहमपि हत्वा त्वां शौचं कर्तास्मि भार्गव ।। ६० ।। ‘भृगुनन्दन परशुराम! जहाँ पूर्वकालमें अपने पिताको अंजलि-दान देकर आपने आत्मशुद्धिका अनुभव किया था, वहीं मैं भी आपको मारकर आत्मशुद्धि करूँगा।। तत्र राम समागच्छ त्वरितं युद्धदुर्मद । व्यपनेष्यामि ते दर्पं पौराणं ब्राह्मणब्रुव ।। ६१ ।। ‘ब्राह्मण कहलानेवाले रणदुर्मद राम! आप तुरंत कुरुक्षेत्रमें पधारिये। मैं वहीं आकर आपके पुरातन दर्पका दलन करूँगा’।। ६१ ।। यच्चापि कत्थसे राम बहुशः परिषत्सु वै । निर्जिताः क्षत्रिया लोके मयैकेनेति तच्छृणु ।। ६२ ।। ‘राम! आप जो बहुत बार भरी सभाओंमें अपनी प्रशंसाके लिये यह कहा करते हैं कि मैंने अकेले ही संसारके समस्त क्षत्रियोंको जीत लिया था तो उसका उत्तर सुन लीजिये।। ६२ ।। न तदा जातवान् भीष्मः क्षत्रियो वापि मद्विधः । पश्चाज्जातानि तेजांसि तृणेषु ज्वलितं त्वया ।। ६३ ।। ‘उन दिनों भीष्म अथवा मेरे-जैसा दूसरा कोई क्षत्रिय नहीं उत्पन्न हुआ था। तेजस्वी क्षत्रिय तो पीछे उत्पन्न हुए हैं। आप तो घास-फूसमें ही प्रज्वलित हुए हैं (तिनकोंके समान दुर्बल क्षत्रियोंपर ही अपना तेज प्रकट किया है)।। ६३ ।। यस्ते युद्धमयं दर्पं कामं च व्यपनाशयेत् । सोऽहं जातो महाबाहो भीष्मः परपुरंजयः । व्यपनेष्यामि ते दर्पं युद्धे राम न संशयः ।। ६४ ।। ‘महाबाहो! जो आपकी युद्धविषयक कामना तथा अभिमानको नष्ट कर सके, वह शत्रुनगरीपर विजय पानेवाला यह भीष्म तो अब उत्पन्न हुआ है। राम! मैं युद्धमें आपका सारा घमंड चूर-चूर कर दूँगा, इसमें संशय नहीं है’।। ६४ ।।
भीष्म उवाच
ततो मामब्रवीद् रामः प्रहसन्निव भारत । दिष्ट्या भीष्म मया सार्धं योद्धुमिच्छसि संगरे ।। ६५ ।। **भीष्मजी कहते हैं—**भरतनन्दन! तब परशुरामजीने मुझसे हँसते हुए-से कहा—‘भीष्म! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम रणक्षेत्रमें मेरे साथ युद्ध करना चाहते हो।। ६५ ।।
अयं गच्छामि कौरव्य कुरुक्षेत्रं त्वया सह । भाषितं ते करिष्यामि तत्रागच्छ परंतप ॥ ६६ ॥ तत्र त्वां निहतं माता मया शरशताचितम् । जाह्नवी पश्यतां भीष्म गृध्रकङ्कबलाशनम् ॥ ६७ ॥ 'कुरुनन्दन! यह देखो, मैं तुम्हारे साथ युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें चलता हूँ। परंतप! वहीं आओ। मैं तुम्हारा कथन पूरा करूँगा। वहाँ तुम्हारी माता गंगा तुम्हें मेरे हाथसे मरकर सैकड़ों बाणोंसे व्याप्त और कौओं, कंकों तथा गीधोंका भोजन बना हुआ देखेगी ॥ ६६-६७ ॥ कृपणं त्वामभिप्रेक्ष्य सिद्धचारणसेविता । मया विनिहतं देवी रोदतामद्य पार्थिव ॥ ६८ ॥ 'राजन्! तुम दीन हो। आज तुम्हें मेरे हाथसे मारा गया देख सिद्ध-चारणसेविता गंगादेवी रुदन करें ॥ ६८ ॥ अतदर्हा महाभागा भगीरथसुतानघा । या त्वामजीजनन्मन्दं युद्धकामुकमातुरम् ॥ ६९ ॥ 'यद्यपि वे महाभागा भगीरथपुत्री पापहीना गंगा यह दुःख देखनेके योग्य नहीं हैं, तथापि जिन्होंने तुम-जैसे युद्धकामी, आतुर एवं मूर्ख पुत्रको जन्म दिया है, उन्हें यह कष्ट भोगना ही पड़ेगा ॥ ६९ ॥ एहि गच्छ मया भीष्म युद्धकामुक दुर्मद । गृहाण सर्वं कौरव्य रथादि भरतर्षभ ॥ ७० ॥ 'युद्धकी इच्छा रखनेवाले मदोन्मत्त भीष्म! आओ, मेरे साथ चलो। भरतश्रेष्ठ कुरुनन्दन! रथ आदि सारी सामग्री साथ ले लो' ॥ ७० ॥ इति ब्रुवाणं तमहं रामं परपुरंजयम् । प्रणम्य शिरसा राममेवमस्त्वित्यथाब्रुवम् ॥ ७१ ॥ शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाले परशुरामजीको इस प्रकार कहते देख मैंने मस्तक झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और 'एवमस्तु' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की ॥ ७१ ॥ एवमुक्त्वा ययौ रामः कुरुक्षेत्रं युयुत्सया । प्रविश्य नगरं चाहं सत्यवत्यै न्यवेदयम् ॥ ७२ ॥ ऐसा कहकर परशुरामजी युद्धकी इच्छासे कुरुक्षेत्रमें गये और मैंने नगरमें प्रवेश करके सत्यवतीसे यह सारा समाचार निवेदन किया ॥ ७२ ॥ ततः कृतस्वस्त्ययनो मात्रा च प्रतिनन्दितः । द्विजातीन् वाच्य पुण्याहं स्वस्ति चैव महाद्युते ॥ ७३ ॥ रथमास्थाय रुचिरं राजतं पाण्डुरैर्हयैः । सूपस्करं स्वधिष्ठानं वैयाघ्रपरिवारणम् ॥ ७४ ॥
उपपन्नं महाशस्त्रैः सर्वोपकरणान्वितम् । तत्कुलीनेन वीरेण हयशास्त्रविदा रणे ॥ ७५ ॥ यन्तृं सूतेन शिष्टेन बहुशो दृष्टकर्मणा । महातेजस्वी नरेश! उस समय स्वस्तिवाचन कराकर माता सत्यवतीने मेरा अभिनन्दन किया और मैं ब्राह्मणोंसे पुण्याहवाचन करा उनसे कल्याणकारी आशीर्वाद ले सुन्दर रजतमय रथपर आरूढ़ हुआ। उस रथमें श्वेत रंगके घोड़े जुते हुए थे। उसमें सब प्रकारकी आवश्यक सामग्री सुन्दर ढंगसे रखी गयी थी। उसकी बैठक बहुत सुन्दर थी। रथके ऊपर व्याघ्रचर्मका आवरण लगाया गया था। वह रथ बड़े-बड़े शस्त्रों तथा समस्त उपकरणोंसे सम्पन्न था। युद्धमें जिसका कार्य अनेक बार देख लिया गया था, ऐसे सुशिक्षित, कुलीन, वीर तथा अश्वशास्त्रके पण्डित सारथिद्वारा उस रथका संचालन और नियन्त्रण होता था ॥ ७३—७५ १/२ ॥
दंशितः पाण्डुरेणाहं कवचेन वपुष्मता ॥ ७६ ॥ पाण्डुरं कार्मुकं गृह्य प्रायां भरतसत्तम । भरतश्रेष्ठ! मैंने अपने शरीरपर श्वेतवर्णका कवच धारण करके श्वेत धनुष हाथमें लेकर यात्रा की ॥
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ॥ ७७ ॥ पाण्डुरैश्चापि व्यजनैर्वीज्यमानो नराधिप । शुक्लवासाः सितोष्णीषः सर्वशुक्लविभूषणः ॥ ७८ ॥ नरेश्वर! उस समय मेरे मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था और मेरे दोनों ओर सफेद रंगके चँवर डुलाये जाते थे। मेरे वस्त्र, मेरी पगड़ी और मेरे समस्त आभूषण श्वेतवर्णके ही थे ॥ ७७-७८ ॥
स्तूयमानो जयाशीर्भिर्निष्क्रम्य गजसाह्वयात् । कुरुक्षेत्रं रणक्षेत्रमुपायां भरतर्षभ ॥ ७९ ॥ विजयसूचक आशीर्वादोंके साथ मेरी स्तुति की जा रही थी। भरतभूषण! उस अवस्थामें मैं हस्तिनापुरसे निकलकर कुरुक्षेत्रके समरांगणमें गया ॥ ७९ ॥
ते हयाश्चोदितास्तेन सूतेन परमाहवे । अवहन् मां भृशं राजन् मनोमारुतरंहसः ॥ ८० ॥ राजन्! मेरे घोड़े मन और वायुके समान वेगशाली थे। सारथिके हाँकनेपर उन्होंने बात-की-बातमें मुझे उस महान् युद्धके स्थानपर पहुँचा दिया ॥ ८० ॥
गत्वाहं तत् कुरुक्षेत्रं स च रामः प्रतापवान् । युद्धाय सहसा राजन् पराक्रान्तौ परस्परम् ॥ ८१ ॥ राजन्! मैं तथा प्रतापी परशुरामजी दोनों कुरुक्षेत्रमें पहुँचकर युद्धके लिये सहसा एक-दूसरेको पराक्रम दिखानेके लिये उद्यत हो गये ॥ ८१ ॥
ततः संदर्शनेऽतिष्ठं रामस्यातितपस्विनः । प्रगृह्य शङ्खप्रवरं ततः प्राधममुत्तमम् ॥ ८२ ॥ तदनन्तर मैं अत्यन्त तपस्वी परशुरामजीकी दृष्टिके सामने खड़ा हुआ और अपने श्रेष्ठ शंखको हाथमें लेकर उसे जोर-जोरसे बजाने लगा ॥ ८२ ॥
ततस्तत्र द्विजा राजंस्तापसाश्च वनौकसः । अपश्यन्त रणं दिव्यं देवाः सेन्द्रगणास्तदा ॥ ८३ ॥ राजन्! उस समय वहाँ बहुत-से ब्राह्मण, वनवासी तपस्वी तथा इन्द्रसहित देवगण उस दिव्य युद्धको देखने लगे ॥ ८३ ॥
ततो दिव्यानि माल्यानि प्रादुरासंस्ततस्ततः । वादित्राणि च दिव्यानि मेघवृन्दानि चैव ह ॥ ८४ ॥ तदनन्तर वहाँ इधर-उधरसे दिव्य मालाएँ प्रकट होने लगीं और दिव्य वाद्य बज उठे। साथ ही सब ओर मेघोंकी घटाएँ छा गयीं ॥ ८४ ॥
ततस्ते तापसाः सर्वे भार्गवस्यानुयायिनः । प्रेक्षकाः समपद्यन्त परिवार्य रणाजिरम् ॥ ८५ ॥ तदनन्तर परशुरामजीके साथ आये हुए वे सब तपस्वी उस संग्रामभूमिको सब ओरसे घेरकर दर्शक बन गये ॥ ८५ ॥
ततो मामब्रवीद् देवी सर्वभूतहितैषिणी । माता स्वरूपिणी राजन् किमिदं ते चिकीर्षितम् ॥ ८६ ॥ राजन्! उस समय समस्त प्राणियोंका हित चाहनेवाली मेरी माता गंगादेवी स्वरूपतः प्रकट होकर बोलीं—'बेटा! यह तू क्या करना चाहता है? ॥ ८६ ॥
गत्वाहं जामदग्न्यं तु प्रयाचिष्ये कुरुद्वह । भीष्मेण सह मा योत्सीः शिष्येणेति पुनः पुनः ॥ ८७ ॥ 'कुरुश्रेष्ठ! मैं स्वयं जाकर जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे बारंबार याचना करूँगी कि आप अपने शिष्य भीष्मके साथ युद्ध न कीजिये ॥ ८७ ॥
मा मैवं पुत्र निर्बन्धं कुरु विप्रेण पार्थिव । जामदग्न्येन समरे योद्धुमित्येव भर्त्सयत् ॥ ८८ ॥ 'बेटा! तू ऐसा आग्रह न कर। राजन्! विप्रवर जमदग्निनन्दन परशुरामके साथ समरभूमिमें युद्ध करनेका हठ अच्छा नहीं है।' ऐसा कहकर वे डाँट बताने लगीं ॥
किन्नु वै क्षत्रियहणो हरतुल्यपराक्रमः । विदितः पुत्र रामस्ते यतस्तं योद्धुमिच्छसि ॥ ८९ ॥ अन्तमें वे फिर बोलीं—'बेटा! क्षत्रियहन्ता परशुराम महादेवजीके समान पराक्रमी हैं। क्या तू उन्हें नहीं जानता, जो उनके साथ युद्ध करना चाहता है?' ॥ ८९ ॥
ततोऽहमब्रुवं देवीमभिवाद्य कृताञ्जलिः ।
सर्वं तद् भरतश्रेष्ठ यथावृत्तं स्वयंवरे ॥ ९० ॥ तब मैंने हाथ जोड़कर गंगादेवीको प्रणाम किया और स्वयंवरमें जैसी घटना घटित हुई थी, वह सब वृत्तान्त उनसे आद्योपान्त कह सुनाया ॥ ९० ॥
यथा च रामो राजेन्द्र मया पूर्वं प्रचोदितः । काशिराजसुतायाश्च यथा कर्म पुरातनम् ॥ ९१ ॥ राजेन्द्र! मैंने परशुरामजीसे पहले जो-जो बातें कही थीं तथा काशिराजकी कन्याकी जो पुरानी करतूतें थीं, उन सबको बता दिया ॥ ९१ ॥
ततः सा राममभ्येत्य जननी मे महानदी । मदर्थं तमृषिं वीक्ष्य क्षमयामास भार्गवम् ॥ ९२ ॥ तत्पश्चात् मेरी जन्मदायिनी माता गंगाने भृगुनन्दन परशुरामजीके पास जाकर मेरे लिये उनसे क्षमा माँगी ॥
भीष्मेण सह मा योत्सीः शिष्येणेति वचोऽब्रवीत् । स च तामाह याचन्तीं भीष्ममेव निवर्तय । न च मे कुरुते काममित्यहं तमुपागमम् ॥ ९३ ॥ साथ ही यह भी कहा कि भीष्म आपका शिष्य है; अतः उसके साथ आप युद्ध न कीजिये। तब याचना करनेवाली मेरी मातासे परशुरामजीने कहा—'तुम पहले भीष्मको ही युद्धसे निवृत्त करो। वह मेरे इच्छानुसार कार्य नहीं कर रहा है; इसीलिये मैंने उसपर चढ़ाई की है' ॥ ९३ ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो गङ्गा सुतस्नेहाद् भीष्मं पुनरुपागमत् । न चास्याश्चाकरोद् वाक्यं क्रोधपर्याकुलेक्षणः ॥ ९४ ॥ वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तब गंगादेवी पुत्रस्नेहवश पुनः भीष्मके पास आयीं। उस समय भीष्मके नेत्रोंमें क्रोध व्याप्त हो रहा था; अतः उन्होंने भी माताका कहना नहीं माना ॥ ९४ ॥
अथादृश्यत धर्मात्मा भृगुश्रेष्ठो महातपाः । आह्वयामास च तदा युद्धाय द्विजसत्तमः ॥ ९५ ॥ इतनेमें ही भृगुकुलतिलक ब्राह्मणशिरोमणि महातपस्वी धर्मात्मा परशुरामजी दिखायी दिये। उन्होंने सामने आकर युद्धके लिये भीष्मको ललकारा ॥ ९५ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि परशुरामभीष्मयोः कुरुक्षेत्रावतरणे अष्टसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७८ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम और भीष्मका कुरुक्षेत्रमें युद्धके लिये अवतरणविषयक एक सौ अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७८ ॥
१७९-
एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः
संकल्पनिर्मित रथपर आरूढ़ परशुरामजीके साथ भीष्मका युद्ध प्रारम्भ करना
भीष्म उवाच
तमहं स्मयन्निव रणे प्रत्यभाषं व्यवस्थितम् ।
भूमिष्ठं नोत्सहे योद्धुं भवन्तं रथमास्थितः ॥ १ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! तब मैं युद्धके लिये खड़े हुए परशुरामजीसे मुसकराता हुआ-सा बोला—'ब्रह्मन्! मैं रथपर बैठा हूँ और आप भूमिपर खड़े हैं। ऐसी दशामें मैं आपके साथ युद्ध नहीं कर सकता ॥ १ ॥
आरोह स्यन्दनं वीर कवचं च महाभुज ।
बधान समरे राम यदि योद्धुं मयेच्छसि ॥ २ ॥
'महाबाहो! वीरवर राम! यदि आप समरभूमिमें मेरे साथ युद्ध करना चाहते हैं तो रथपर आरूढ़ होइये और कवच भी बाँध लीजिये' ॥ २ ॥
ततो मामब्रवीद् रामः स्मयमानो रणाजिरे ।
रथो मे मेदिनी भीष्म वाहा वेदाः सदश्ववत् ॥ ३ ॥
सूतश्च मातरिश्वा वै कवचं वेदमातरः ।
सुसंवीतो रणे ताभिर्योत्स्येऽहं कुरुनन्दन ॥ ४ ॥
तब परशुरामजी समरांगणमें किंचित् मुसकराते हुए मुझसे बोले—'कुरुनन्दन भीष्म! मेरे लिये तो पृथ्वी ही रथ है, चारों वेद ही उत्तम अश्वोंके समान मेरे वाहन हैं, वायुदेव ही सारथि हैं और वेदमाताएँ (गायत्री, सावित्री और सरस्वती) ही कवच हैं। इन सबसे आवृत एवं सुरक्षित होकर मैं रणक्षेत्रमें युद्ध करूँगा' ॥ ३-४ ॥
एवं ब्रुवाणो गान्धारे रामो मां सत्यविक्रमः ।
शरव्रातेन महता सर्वतः प्रत्यवारयत् ॥ ५ ॥
गान्धारीनन्दन! ऐसा कहते हुए सत्यपराक्रमी परशुरामजीने मुझे सब ओरसे अपने बाणोंके महान् समुदायद्वारा आवृत कर लिया ॥ ५ ॥
ततोऽपश्यं जामदग्न्यं रथमध्ये व्यवस्थितम् ।
सर्वायुधवरे श्रीमत्त्यद्भुतोपमदर्शने ॥ ६ ॥
उस समय मैंने देखा, जमदग्निनन्दन परशुराम सम्पूर्ण श्रेष्ठ आयुधोंसे सुशोभित, तेजस्वी एवं अद्भुत दिखायी देनेवाले रथमें बैठे हैं ॥ ६ ॥
मनसा विहिते पुण्ये विस्तीर्णे नगरोपमे ।
दिव्याश्वयुजि संनद्धे काञ्चनेन विभूषिते ॥ ७ ॥
उसका विस्तार एक नगरके समान था। उस पुण्यरथका निर्माण उन्होंने अपने मानसिक संकल्पसे किया था। उसमें दिव्य अश्व जुते हुए थे। वह स्वर्णभूषित रथ सब प्रकारसे सुसज्जित था ॥ ७ ॥
कवचेन महाबाहो सोमार्ककृतलक्ष्मणा ।
धनुर्धरो बद्धतूणो बद्धगोधाङ्गुलित्रवान् ॥ ८ ॥
महाबाहो! परशुरामजीने एक सुन्दर कवच धारण कर रखा था, जिसमें चन्द्रमा और सूर्यके चिह्न बने हुए थे। उन्होंने हाथमें धनुष लेकर पीठपर तरकस बाँध रखा था और अंगुलियोंकी रक्षाके लिये गोहके चर्मके बने हुए दस्ताने पहन रखे थे ॥ ८ ॥
सारथ्यं कृतवांस्तत्र युयुत्सोरकृतव्रणः ।
सखा वेदविदत्यन्तं दयितो भार्गवस्य ह ॥ ९ ॥
उस समय युद्धके इच्छुक परशुरामजीके प्रिय सखा वेदवेत्ता अकृतव्रणने उनके सारथिका कार्य सम्पन्न किया ॥ ९ ॥
आह्वयानः स मां युद्धे मनो हर्षयतीव मे ।
पुनः पुनरभिक्रोशन्नभियाहीति भार्गवः ॥ १० ॥
भृगुनन्दन राम 'आओ, आओ' कहकर बार-बार मुझे पुकारते और युद्धके लिये मेरा आह्वान करते हुए मेरे मनको हर्ष और उत्साह-सा प्रदान कर रहे थे ॥ १० ॥
तमादित्यमिवोद्यन्तमनाधृष्यं महाबलम् ।
क्षत्रियान्तकरं राममेकमेकः समासदम् ॥ ११ ॥
उदयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी, अजेय, महाबली और क्षत्रियविनाशक परशुराम अकेले ही युद्धके लिये खड़े थे। अतः मैं भी अकेला ही उनका सामना करनेके लिये गया ॥ ११ ॥
ततोऽहं बाणपातेषु त्रिषु वाहान् निगृह्य वै ।
अवतीर्य धनुर्न्यस्य पदातिर्ऋषिसत्तमम् ॥ १२ ॥
अभ्यागच्छं तदा राममर्चिष्यन् द्विजसत्तमम् ।
अभिवाद्य चैनं विधिवदब्रुवं वाक्यमुत्तमम् ॥ १३ ॥
जब वे तीन बार मेरे ऊपर बाणोंका प्रहार कर चुके, तब मैं घोड़ोंको रोककर और धनुष रखकर रथसे उतर गया और उन ब्राह्मणशिरोमणि मुनिप्रवर परशुरामजीका समादर करनेके लिये पैदल ही उनके पास गया। जाकर विधिपूर्वक उन्हें प्रणाम करनेके पश्चात् यह उत्तम वचन बोला— ॥ १२-१३ ॥
योत्स्ये त्वया रणे राम सदृशेनाधिकेन वा ।
गुरुणा धर्मशीलेन जयमाशास्व मे विभो ॥ १४ ॥
'भगवन् परशुराम! आप मेरे समान अथवा मुझसे भी अधिक शक्तिशाली हैं। मेरे धर्मात्मा गुरु हैं। मैं इस रणक्षेत्रमें आपके साथ युद्ध करूँगा; अतः आप मुझे विजयके लिये आशीर्वाद दें' ॥ १४ ॥
राम उवाच
एवमेतत् कुरुश्रेष्ठ कर्तव्यं भूतिमिच्छता ।
धर्मो ह्येष महाबाहो विशिष्टैः सह युध्यताम् ॥ १५ ॥
परशुरामजीने कहा— कुरुश्रेष्ठ! अपनी उन्नतिके चाहनेवाले प्रत्येक योद्धाको ऐसा ही करना चाहिये। महाबाहो! अपनेसे विशिष्ट गुरुजनोंके साथ युद्ध करनेवाले राजाओंका यही धर्म है ॥ १५ ॥
शपेयं त्वां न चेदेवमागच्छेथा विशाम्पते ।
युध्यस्व त्वं रणे यत्तो धैर्यमालम्ब्य कौरव ॥ १६ ॥
प्रजानाथ! यदि तुम इस प्रकार मेरे समीप नहीं आते तो मैं तुम्हें शाप दे देता। कुरुनन्दन! तुम धैर्य धारण करके इस रणक्षेत्रमें प्रयत्नपूर्वक युद्ध करो ॥ १६ ॥
न तु ते जयमाशासे त्वां विजेतुमहं स्थितः ।
गच्छ युध्यस्व धर्मेण प्रीतोऽस्मि चरितेन ते ॥ १७ ॥
मैं तो तुम्हें विजयसूचक आशीर्वाद नहीं दे सकता; क्योंकि इस समय मैं तुम्हें पराजित करनेके लिये खड़ा हूँ। जाओ, धर्मपूर्वक युद्ध करो। तुम्हारे इस शिष्टाचारसे मैं बहुत प्रसन्न हूँ ॥ १७ ॥
ततोऽहं तं नमस्कृत्य रथमारुह्य सत्वरः ।
प्राध्मापयं रणे शङ्खं पुनर्हेमपरिष्कृतम् ॥ १८ ॥
तब मैं उन्हें नमस्कार करके शीघ्र ही रथपर जा बैठा और उस युद्धभूमिमें मैंने पुनः अपने सुवर्णजटित शंखको बजाया ॥ १८ ॥
ततो युद्धं समभवन्मम तस्य च भारत ।
दिवसान् सुबहून् राजन् परस्परजिगीषया ॥ १९ ॥
राजन्! भरतनन्दन! तदनन्तर एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे मेरा तथा परशुरामजीका युद्ध बहुत दिनोंतक चलता रहा ॥ १९ ॥
स मे तस्मिन् रणे पूर्वं प्राहरत् कङ्कपत्रिभिः ।
षष्ट्या शतैश्च नवभिः शराणां नतपर्वणाम् ॥ २० ॥
उस रणभूमिमें उन्होंने ही पहले मेरे ऊपर गीधकी पाँखोंसे सुशोभित तथा मुड़े हुए पर्ववाले नौ सौ साठ बाणोंद्वारा प्रहार किया ॥ २० ॥
चत्वारस्तेन मे वाहाः सूतश्चैव विशाम्पते ।
प्रतिरुद्धास्तथैवाहं समरे दंशितः स्थितः ॥ २१ ॥
राजन्! उन्होंने मेरे चारों घोड़ों तथा सारथिको भी अवरुद्ध कर दिया तो भी मैं पूर्ववत् कवच धारण किये उस समरभूमिमें डटा रहा ॥ २१ ॥
नमस्कृत्य च देवेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः ।
तमहं स्मयन्निव रणे प्रत्यभाषं व्यवस्थितम् ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् देवताओं और विशेषतः ब्राह्मणोंको नमस्कार कर मैं रणभूमिमें खड़े हुए परशुरामजीसे मुसकराता हुआ-सा बोला— ॥ २२ ॥
आचार्यता मानिता मे निर्मर्यादे ह्यपि त्वयि ।
भूयश्च शृणु मे ब्रह्मन् सम्पदं धर्मसंग्रहे ॥ २३ ॥
‘ब्रह्मन्! यद्यपि आप अपनी मर्यादा छोड़े बैठे हैं तो भी मैंने सदा आपके आचार्यत्वका सम्मान किया है। धर्मसंग्रहके विषयमें मेरा जो दृढ़ विचार है, उसे आप पुनः सुन लीजिये ॥ २३ ॥
ये ते वेदाः शरीरस्था ब्राह्मण्यं यच्च ते महत् ।
तपश्च ते महत् तप्तं न तेभ्यः प्रहराम्यहम् ॥ २४ ॥
‘विप्रवर! आपके शरीरमें जो वेद हैं, जो आपका महान् ब्राह्मणत्व है तथा आपने जो बड़ी भारी तपस्या की है, उन सबके ऊपर मैं बाणोंका प्रहार नहीं करता हूँ ॥ २४ ॥
प्रहरे क्षत्रधर्मस्य यं राम त्वं समाश्रितः ।
ब्राह्मणः क्षत्रियत्वं हि याति शस्त्रसमुद्यमात् ॥ २५ ॥
‘राम! आपने जिस क्षत्रियधर्मका आश्रय लिया है, मैं उसीपर प्रहार करूँगा; क्योंकि ब्राह्मण हथियार उठाते ही क्षत्रियभावको प्राप्त कर लेता है ॥ २५ ॥
पश्य मे धनुषो वीर्यं पश्य बाह्वोर्बलं मम ।
एष ते कार्मुकं वीर छिनद्मि निशितेषुणा ॥ २६ ॥
‘अब आप मेरे धनुषकी शक्ति और मेरी भुजाओंका बल देखिये। वीर! मैं अपने बाणसे आपके धनुषको अभी काट देता हूँ' ॥ २६ ॥
तस्याहं निशितं भल्लं चिक्षेप भरतर्षभ ।
तेनास्य धनुषः कोटिं छित्त्वा भूमावपातयम् ॥ २७ ॥
भरतश्रेष्ठ! ऐसा कहकर मैंने उनके ऊपर तेज धारवाले एक भल्ल नामक बाणका प्रहार किया और उसके द्वारा उनके धनुषकी कोटि (अग्रभाग)-को काटकर पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ २७ ॥
तथैव च पृषत्कानां शतानि नतपर्वणाम् ।
चिक्षेप कङ्कपत्राणां जामदग्न्यरथं प्रति ॥ २८ ॥
इसी प्रकार परशुरामजीके रथकी ओर मैंने गीधकी पाँख और झुकी हुई गाँठवाले सौ बाण चलाये ॥ २८ ॥
काये विषक्तास्तु तदा वायुना समुदीरिताः ।
चेलुः क्षरन्तो रुधिरं नागा इव च ते शराः ॥ २९ ॥ वे बाण वायुद्वारा उड़ाये हुए सर्पोंकी भाँति परशुरामजीके शरीरमें धँसकर खून बहाते हुए चल दिये ॥
क्षतजोक्षितसर्वाङ्गः क्षरन् स रुधिरं रणे । बभौ रामस्तदा राजन् मेरुर्धातुमिवोत्सृजन् ॥ ३० ॥ राजन्! उस समय उनके सारे अंग लहूलुहान हो गये। जैसे मेरु पर्वत वर्षाकालमें गेरु आदि धातुओंसे मिश्रित जलकी धार बहाता है, उसी प्रकार उस रणभूमिमें अपने अंगोंसे रक्तकी धारा बहाते हुए परशुरामजी शोभा पाने लगे ॥ ३० ॥
हेमन्तान्तेऽशोक इव रक्तस्तबकमण्डितः । बभौ रामस्तथा राजन् प्रफुल्ल इव किंशुकः ॥ ३१ ॥ राजन्! जैसे वसन्त-ऋतुमें लाल फूलोंके गुच्छोंसे अलंकृत अशोक और खिला हुआ पलाश सुशोभित होता है, परशुरामजीकी भी वैसी ही शोभा हुई ॥ ३१ ॥
ततोऽन्यद् धनुरादाय रामः क्रोधसमन्वितः । हेमपुङ्खान् सुनिशिताञ्शरांस्तान् हि ववर्ष सः ॥ ३२ ॥ तब क्रोधमें भरे हुए परशुरामजीने दूसरा धनुष लेकर सोनेकी पाँखोंसे सुशोभित अत्यन्त तीखे बाणोंकी वर्षा आरम्भ की ॥ ३२ ॥
ते समासाद्य मां रौद्रा बहुधा मर्मभेदिनः । अकम्पयन् महावेगाः सर्पानलविषोपमाः ॥ ३३ ॥ वे नाना प्रकारके भयंकर बाण मुझपर चोट करके मेरे मर्मस्थानोंका भेदन करने लगे। उनका वेग महान् था। वे सर्प, अग्नि और विषके समान जान पड़ते थे। उन्होंने मुझे कम्पित कर दिया ॥ ३३ ॥
तमहं समवष्टभ्य पुनरात्मानमाहवे । शतसंख्यैः शरैः क्रुद्धस्तदा राममवाकिरम् ॥ ३४ ॥ तब मैंने पुनः अपने-आपको स्थिर करके कुपित हो उस युद्धमें परशुरामजीपर सैकड़ों बाण बरसाये ॥
स तैरग्न्यर्कसंकाशैः शरैराशीविषोपमैः । शितैरभ्यर्दितो रामो मन्दचेता इवाभवत् ॥ ३५ ॥ वे बाण अग्नि, सूर्य तथा विषधर सर्पोंके समान भयंकर एवं तीक्ष्ण थे। उनसे पीड़ित होकर परशुरामजी अचेत-से हो गये ॥ ३५ ॥
ततोऽहं कृपयाऽऽविष्टो विष्टभ्यात्मानमात्मना । धिग्धिगित्यब्रुवं युद्धं क्षत्रधर्मं च भारत ॥ ३६ ॥ भारत! तब मैं दयासे द्रवित हो स्वयं ही अपने-आपमें धैर्य लाकर युद्ध और क्षत्रियधर्मको धिक्कार देने लगा ॥ ३६ ॥
असकृच्चाब्रुवं राजन् शोकवेगपरिप्लुतः । अहो बत कृतं पापं मयेदं क्षत्रधर्मणा ॥ ३७ ॥ गुरुर्द्विजातिर्धर्मात्मा यदेवं पीडितः शरैः । राजन्! उस समय शोकके वेगसे व्याकुल हो मैं बार-बार इस प्रकार कहने लगा—'अहो! मुझ क्षत्रियने यह बड़ा भारी पाप कर डाला, जो कि धर्मात्मा एवं ब्राह्मण गुरुको इस प्रकार बाणोंसे पीड़ित किया' ॥ ३७ १/२ ॥ ततो न प्राहरं भूयो जामदग्न्याय भारत ॥ ३८ ॥ अथावताप्य पृथिवीं पूषा दिवससंक्षये । जगामास्तं सहस्रांशुस्ततो युद्धमुपारमत् ॥ ३९ ॥ भारत! उसके बादसे मैंने परशुरामजीपर फिर प्रहार नहीं किया। इधर सहस्र किरणोंवाले भगवान् सूर्य इस पृथ्वीको तपाकर दिनका अन्त होनेपर अस्त हो गये; इसलिये वह युद्ध बंद हो गया ॥ ३८-३९ ॥
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि अम्बोपाख्यानपर्वणि रामभीष्मयुद्धे एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत अम्बोपाख्यानपर्वमें परशुराम और भीष्मका युद्धविषयक एक सौ उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७९ ॥