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महाभारत (खंड ३) - विराट, उद्योग व भीष्म पर्व

Mahabharata (Vol 3) - Virata, Udyoga and Bhishma Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,343 पृष्ठ

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एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

कौरवपक्षके प्रमुख महारथियोंद्वारा सुरक्षित होनेपर भी अर्जुनका भीष्मको रथसे गिराना, शरशय्यापर स्थित भीष्मके समीप हंसरूपधारी ऋषियोंका आगमन एवं उनके कथनसे भीष्मका उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए प्राण धारण करना

संजय उवाच

एवं ते पाण्डवाः सर्वे पुरस्कृत्य शिखण्डिनम् ।
विव्यधुः समरे भीष्मं परिवार्य समन्ततः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार शिखण्डीको आगे करके सभी पाण्डवोंने समरभूमिमें भीष्मको सब ओरसे घेरकर बींधना आरम्भ किया ॥ १ ॥
शतघ्नीभिः सुघोराभिः परिघैश्च परश्वधैः ।
मुद्गरैर्मुसलैः प्रासैः क्षेपणीयैश्च सर्वशः ॥ २ ॥
शरैः कनकपुङ्खैश्च शक्तितोमरकम्पनैः ।
नाराचैर्वत्ससन्तैश्च भुशुण्डीभिश्च सर्वशः ॥ ३ ॥
अताडयन् रणे भीष्मं सहिताः सर्वसृञ्जयाः ।
समस्त सृंजय वीर एक साथ संगठित हो भयंकर शतघ्नी, परिघ, फरसे, मुद्गर, मुसल, प्रास, गोफन, स्वर्णमय पंखवाले बाण, शक्ति, तोमर, कम्पन, नाराच, वत्ससन्त और भुशुण्डी आदि अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा रणभूमिमें भीष्मको सब ओरसे पीड़ा देने लगे ॥ २-३ ½ ॥
स विशीर्णतनुत्राणः पीडितो बहुभिस्तदा ॥ ४ ॥
न विव्यथे तदा भीष्मो भिद्यमानेषु मर्मसु ।
उस समय बहुसंख्यक योद्धाओंके द्वारा अनेक प्रकारके अस्त्रोंसे पीड़ित होनेके कारण भीष्मका कवच छिन्न-भिन्न हो गया। उनके मर्मस्थान विदीर्ण होने लगे, तो भी उनके मनमें व्यथा नहीं हुई ॥ ४ ½ ॥
संदीप्तशरचापाग्निरस्त्रप्रसृतमारुतः ॥ ५ ॥
नेमिनिर्ह्रादसंतापो महास्त्रोदयपावकः ।
चित्रचापमहाज्वालो वीरक्षयमहेन्धनः ॥ ६ ॥
युगान्ताग्निसमप्रख्यः परेषां समपद्यत ।
वे शत्रुओंके लिये प्रलयकालकी अग्निके समान अद्भुत तेजसे प्रज्वलित हो उठे। धनुष और बाण ही धधकती हुई आग थे। अस्त्रोंका प्रसार ही वायुका सहारा था। रथोंके

पहियोंकी घरघराहट उस आगकी आँच थी। बड़े-बड़े अस्त्रोंका प्राकट्य अंगारके समान था। विचित्र चाप ही उस आगकी प्रचण्ड ज्वालाओंके समान था। बड़े-बड़े वीर ही ईंधनके समान उसमें गिरकर भस्म हो रहे थे ॥ विवृत्य रथसङ्घानामन्तरेण विनिःसृतः ॥ ७ ॥ दृश्यते स्म नरेन्द्रणां पुनर्मध्यगतश्चरन् । पितामह भीष्म एक ही क्षणमें रथकी पंक्ति तोड़कर घेरेसे बाहर निकल आते और पुनः राजाओंकी सेनाके मध्यभागमें प्रवेश करके वहाँ विचरते दिखायी देते थे ॥ ततः पञ्चालराजं च धृष्टकेतुमचिन्त्य च ॥ ८ ॥ पाण्डवानीकिनीमध्यमाससाद विशाम्पते । प्रजानाथ! तत्पश्चात् पांचालराज द्रुपद तथा धृष्टकेतुकी कुछ भी परवा न करके वे पाण्डव-सेनाके भीतर घुस आये ॥ ८ ½ ॥ ततः सात्यकिभीमौ च पाण्डवं च धनंजयम् ॥ ९ ॥ द्रुपदं च विराटं च धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् । भीमघोषैर्महावेगैर्मर्मावरणभेदिभिः ॥ १० ॥ षडेतान् निशितैर्भीष्मः प्रविव्याधोत्तमैः शरैः । फिर भयंकर शब्द करनेवाले, महान् वेगशाली, मर्मस्थानों और कवचोंको भी विदीर्ण कर देनेवाले, तीखे एवं उत्तम बाणोंद्वारा उन्होंने सात्यकि, भीमसेन, पाण्डुपुत्र अर्जुन, विराट, द्रुपद तथा उनके पुत्र धृष्टद्युम्न—इन छः महारथियोंको अत्यन्त घायल कर दिया ॥ ९-१० ½ ॥ तस्य ते निशितान् बाणान् संनिवार्य महारथाः ॥ ११ ॥ दशभिर्दशभिर्भीष्ममर्दयामासुरोजसा । तब उन महारथी वीरोंने भीष्मके उन तीखे बाणोंका निवारण करके पुनः दस-दस बाणोंद्वारा भीष्मको बलपूर्वक पीड़ित किया ॥ ११ ½ ॥ शिखण्डी तु महाबाणान् यान् मुमोच महारथः ॥ १२ ॥ न चक्रुस्ते रुजं तस्य स्वर्णपुङ्खाः शिलाशिताः । महारथी शिखण्डीने जिन महान् बाणोंका प्रयोग किया था, वे सब सुवर्णमय पंखसे युक्त और शिलापर रगड़कर तेज किये गये थे, तो भी भीष्मजीके शरीरमें घाव या पीड़ा नहीं उत्पन्न कर सके ॥ १२ ½ ॥ ततः किरीटी संरब्धो भीष्ममेवाभ्यधावत ॥ १३ ॥ शिखण्डिनं पुरस्कृत्य धनुश्चास्य समाच्छिनत् । तब किरीटधारी अर्जुनने कुपित हो शिखण्डीको आगे किये हुए ही भीष्मपर धावा किया और उनके धनुषको काट डाला ॥ १३ ½ ॥ भीष्मस्य धनुषश्छेदं नामृष्यन्त महारथाः ॥ १४ ॥

द्रोणश्च कृतवर्मा च सैन्धवश्च जयद्रथः । भूरिश्रवाः शलः शल्यो भगदत्तस्तथैव च ।। १५ ।। सप्तैते परमक्रुद्धाः किरीटिनमभिद्रुताः । तत्र शस्त्राणि दिव्यानि दर्शयन्तो महारथाः ।। १६ ।। अभिपेतुर्भृशं क्रुद्धाश्छादयन्तश्च पाण्डवम् । भीष्मके धनुषका काटा जाना कौरव महारथियोंको सहन नहीं हुआ। द्रोण, कृतवर्मा, सिन्धुराज जयद्रथ, भूरिश्रवा, शल, शल्य और भगदत्त—ये सात महारथी अत्यन्त क्रुद्ध हो किरीटधारी अर्जुनकी ओर दौड़े तथा अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रोंका प्रदर्शन करते हुए पाण्डुनन्दन अर्जुनको अत्यन्त क्रोधपूर्वक बाणोंसे आच्छादित करने लगे ।। १४—१६ १/२ ।। तेषामापततां शब्दः शुश्रुवे फाल्गुनं प्रति ।। १७ ।। उद्वृत्तानां यथा शब्दः समुद्राणां युगक्षये । अर्जुनके प्रति आक्रमण करते हुए उन वीरोंका सिंहनाद उसी प्रकार सुनायी पड़ा, जैसे प्रलयकालमें अपनी मर्यादा छोड़कर बढ़नेवाले समुद्रोंकी भीषण गर्जना सुनायी पड़ती है ।। १७ १/२ ।। घ्नतानयत गृह्णीत विद्ध्यध्वमवकर्तत ।। १८ ।। इत्यासीत् तुमुलः शब्दः फाल्गुनस्य रथं प्रति । अर्जुनके रथके समीप ‘मार डालो, ले आओ, पकड़ लो, बींध डालो, टुकड़े-टुकड़े कर दो’ इस प्रकार भयंकर शब्द गूँजने लगा ।। १८ १/२ ।। तं शब्दं तुमुलं श्रुत्वा पाण्डवानां महारथाः ।। १९ ।। अभ्यधावन् परीप्सन्तः फाल्गुनं भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! उस भयानक शब्दको सुनकर पाण्डव महारथी अर्जुनकी रक्षाके लिये दौड़े ।। १९ १/२ ।। सात्यकिर्भीमसेनश्च धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ।। २० ।। विराटद्रुपदौ चोभौ राक्षसश्च घटोत्कचः । अभिमन्युश्च संक्रुद्धः सप्तैते क्रोधमूर्च्छिताः ।। २१ ।। समभ्यधावंस्त्वरिताश्चित्रकार्मुकधारिणः । सात्यकि, भीमसेन, द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, विराट, द्रुपद, राक्षस घटोत्कच और अभिमन्यु—ये सात वीर क्रोधसे मूर्च्छित हो तुरंत ही विचित्र धनुष धारण किये वहाँ दौड़े आये ।। २०-२१ १/२ ।। तेषां समभवद् युद्धं तुमुलं लोमहर्षणम् ।। २२ ।। संग्रामे भरतश्रेष्ठ देवानां दानवैरिव । भरतभूषण! उनका वह भयंकर युद्ध देवासुरसंग्रामके समान रोंगटे खड़े कर देनेवाला था ।। २२ १/२ ।।

शिखण्डी तु रणे श्रेष्ठो रक्ष्यमाणः किरीटिना ॥ २३ ॥ अविध्यद् दशभिर्भीष्मं छिन्नधन्वानमाहवे । सारथिं दशभिश्चास्य ध्वजं चैकेन चिच्छिदे ॥ २४ ॥ सोऽन्यत् कार्मुकमादाय गाङ्गेयो वेगवत्तरम् । (जघान निशितैर्बाणैरर्जुनं परवीरहा ।) तदप्यस्य शितैर्बाणैस्त्रिभिश्चिच्छेद फाल्गुनः ॥ २५ ॥ भीष्मजीका धनुष कट गया था। उसी अवस्थामें अर्जुनसे सुरक्षित शिखण्डीने दस बाणोंसे उन्हें और दस बाणोंसे उनके सारथिको भी घायल कर दिया। तत्पश्चात् एक बाणसे ध्वजको काट गिराया। तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले गंगानन्दन भीष्मने दूसरा अत्यन्त वेगशाली धनुष लेकर तीखे बाणोंसे अर्जुनको घायल करना आरम्भ किया। यह देख अर्जुनने उस धनुषको भी तीन पैने बाणोंद्वारा काट डाला ॥ २३—२५ ॥

एवं स पाण्डवः क्रुद्ध आत्तमात्तं पुनः पुनः । धनुश्चिच्छेद भीष्मस्य सव्यसाची परंतपः ॥ २६ ॥ इस प्रकार क्रोधमें भरे हुए शत्रुसंतापी, सव्यसाची पाण्डुनन्दन अर्जुन जो-जो धनुष भीष्म लेते, उसी-उसीको काट डालते थे ॥ २६ ॥

स छिन्नधन्वा संक्रुद्धः सृक्किणी परिसंलिहन् । शक्तिं जग्राह तरसा गिरीणामपि दारणीम् ॥ २७ ॥ धनुष कट जानेपर क्रोधपूर्वक अपने मुँहके दोनों कोनोंको चाटते हुए भीष्मने बलपूर्वक एक शक्ति हाथमें ली, जो पर्वतोंको भी विदीर्ण करनेवाली थी ॥ २७ ॥

तां च चिक्षेप संक्रुद्धः फाल्गुनस्य रथं प्रति । तामापतन्तीं सम्प्रेक्ष्य ज्वलन्तीमशनीमिव ॥ २८ ॥ समादत्त शितान् भल्लान् पञ्च पाण्डवनन्दनः । तस्य चिच्छेद तां शक्तिं पञ्चधा पञ्चभिः शरैः ॥ २९ ॥ संक्रुद्धो भरतश्रेष्ठ भीष्मबाहुप्रवेरिताम् । भरतश्रेष्ठ! फिर उसे क्रोधपूर्वक उन्होंने अर्जुनके रथकी ओर चला दिया। प्रज्वलित वज्रके समान उस शक्तिको आती देख पाण्डवोंको आनन्दित करनेवाले अर्जुनने अपने हाथमें भल्ल नामक पाँच तीखे बाण लिये और कुपित हो उन पाँच बाणोंद्वारा भीष्मकी भुजाओंसे प्रेषित हुई उस शक्तिके पाँच टुकड़े कर दिये ॥ २८-२९ १/२ ॥

सा पपात तथा छिन्ना संक्रुद्धेन किरीटिना ॥ ३० ॥ मेघवृन्दपरिभ्रष्टा विच्छिन्नेव शतह्रदा । क्रोधमें भरे हुए अर्जुनद्वारा काटी हुई वह शक्ति मेघोंके समूहसे निर्मुक्त होकर गिरी हुई बिजलीके समान पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ ३० १/२ ॥

छिन्नां तां शक्तिमालोक्य भीष्मः क्रोधसमन्वितः ॥ ३१ ॥

अचिन्तयद् रणे वीरो बुद्ध्या परपुरंजयः । अपनी उस शक्तिको छिन्न-भिन्न हुई देख भीष्मजी क्रोधमें निमग्न हो गये और शत्रुनगरविजयी उन वीर-शिरोमणिने रणक्षेत्रमें अपनी बुद्धिके द्वारा इस प्रकार विचार किया—॥ ३११/२ ॥

शक्तोऽहं धनुषैकेन निहन्तुं सर्वपाण्डवान् ॥ ३२ ॥ यद्येषां न भवेद् गोप्ता विष्वक्सेनो महाबलः । 'यदि महाबली भगवान् श्रीकृष्ण उन पाण्डवोंकी रक्षा न करते तो मैं इन सबको केवल एक धनुषके ही द्वारा मार सकता था ॥ ३२१/२ ॥

(अजय्यश्चैव लोकानां सर्वेषामिति मे मतिः ।) कारणद्वयमास्थाय नाहं योत्स्यामि पाण्डवान् ॥ ३३ ॥ अवध्यत्वाच्च पाण्डूनां स्त्रीभावाच्च शिखण्डिनः । 'भगवान् सम्पूर्ण लोकोंके लिये अजेय हैं; ऐसा मेरा विश्वास है। इस समय मैं दो कारणोंका आश्रय लेकर पाण्डवोंसे युद्ध नहीं करूँगा। एक तो ये पाण्डुकी संतान होनेके कारण मेरे लिये अवध्य हैं और दूसरे मेरे सामने शिखण्डी आ गया है, जो पहले स्त्री था ॥ ३३१/२ ॥

पित्रा तुष्टेन मे पूर्वं यदा कालीमुदावहम् ॥ ३४ ॥ स्वच्छन्दमरणं दत्तमवध्यत्वं रणे तथा । तस्मान्मृत्युमहं मन्ये प्राप्तकालमिवात्मनः ॥ ३५ ॥ 'पूर्वकालमें जब मैंने माता सत्यवतीका विवाह पिताजीके साथ कराया था, उस समय मेरे पिताने संतुष्ट होकर मुझे दो वर दिये थे—'जब तुम्हारी इच्छा होगी, तभी तुम मरोगे तथा युद्धमें कोई भी तुम्हें मार न सकेगा।' ऐसी दशामें मुझे स्वेच्छासे ही मृत्यु स्वीकार कर लेनी चाहिये। मैं समझता हूँ कि अब उसका अवसर आ गया है' ॥ ३४-३५ ॥

एवं ज्ञात्वा व्यवसितं भीष्मस्यामिततेजसः । ऋषयो वसवश्चैव वियत्स्था भीष्ममब्रुवन् ॥ ३६ ॥ अमिततेजस्वी भीष्मके इस निश्चयको जानकर आकाशमें खड़े हुए ऋषियों और वसुओंने उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३६ ॥

यत् ते व्यवसितं तात तदस्माकमपि प्रियम् । तत् कुरुष्व महाराज युद्धे बुद्धिं निवर्तय ॥ ३७ ॥ 'तात! तुमने जो निश्चय किया है, वह हमलोगोंको भी बहुत प्रिय है। महाराज! अब तुम वही करो। युद्धकी ओरसे अपनी चित्तवृत्ति हटा लो' ॥ ३७ ॥

अस्य वाक्यस्य निधने प्रादुरासीच्छिवोऽनिलः । अनुलोमः सुगन्धी च पृषतैश्च समन्वितः ॥ ३८ ॥

यह बात समाप्त होते ही जलकी बूँदोंके साथ सुखद, शीतल, सुगन्धित एवं मनके अनुकूल वायु चलने लगी ॥ ३८ ॥ देवदुन्दुभयश्चैव सम्प्रणेदुर्महास्वनाः । पपात पुष्पवृष्टिश्च भीष्मस्योपरि मारिष ॥ ३९ ॥ आर्य! देवताओंकी दुन्दुभियाँ जोर-जोरसे बज उठीं। भीष्मके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ३९ ॥ न च तच्छुश्रुवे कश्चित् तेषां संवदतां नृप । ऋते भीष्मं महाबाहुं मां चापि मुनितेजसा ॥ ४० ॥ राजन्! उस समय उपर्युक्त बातें कहनेवाले ऋषियोंका शब्द महाबाहु भीष्म तथा मुझको छोड़कर और कोई नहीं सुन सका। मुझे तो महर्षि व्यासके प्रभावसे ही वह बात सुनायी पड़ी ॥ ४० ॥ सम्भ्रमश्च महानासीत् त्रिदशानां विशाम्पते । पतिष्यति रथाद् भीष्मे सर्वलोकप्रिये तदा ॥ ४१ ॥ प्रजानाथ! सम्पूर्ण लोकोंके प्रिय भीष्म रथसे गिरना चाहते हैं, यह जानकर उस समय सम्पूर्ण देवताओंको भी महान् आश्चर्य हुआ ॥ ४१ ॥ इति देवगणानां च वाक्यं श्रुत्वा महातपाः । ततः शान्तनवो भीष्मो बीभत्सुं नात्यवर्तत ॥ ४२ ॥ भिद्यमानः शितैर्बाणैः सर्वावरणभेदिभिः । देवताओंकी वह बात सुनकर महातपस्वी शान्तनुनन्दन भीष्म समस्त आवरणोंका भेदन करनेवाले तीखे बाणोंद्वारा विदीर्ण होनेपर भी अर्जुनको जीतनेका प्रयत्न न कर सके ॥ ४२ १/२ ॥ शिखण्डी तु महाराज भरतानां पितामहम् ॥ ४३ ॥ आजघानोरसि क्रुद्धो नवभिर्निशितैः शरैः । महाराज! उस समय शिखण्डीने कुपित होकर भरतवंशियोंके पितामह भीष्मजीकी छातीमें नौ पैने बाण मारे ॥ ४३ १/२ ॥ स तेनाभिहतः संख्ये भीष्मः कुरुपितामहः ॥ ४४ ॥ नाकम्पत महाराज क्षितिकम्पे यथाचलः । नरेश्वर! युद्धमें शिखण्डीके द्वारा आहत होकर भी कुरुवंशियोंके पितामह भीष्म उसी प्रकार कम्पित नहीं हुए, जैसे भूकम्प होनेपर भी पर्वत नहीं हिलता ॥ ४४ १/२ ॥ ततः प्रहस्य बीभत्सुर्व्याक्षिपन् गाण्डिवं धनुः ॥ ४५ ॥ गाङ्गेयं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पयत् । तदनन्तर अर्जुनने हँसकर गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए गंगानन्दन भीष्मको पचीस बाण मारे ॥ ४५ १/२ ॥

पुनः पुनः शतैरेनं त्वरमाणो धनंजयः ।। ४६ ।।
सर्वगात्रेषु संक्रुद्धः सर्वमर्मस्वताडयत् ।
तत्पश्चात् पुनः उन्होंने अत्यन्त कुपित हो शीघ्रतापूर्वक सौ बाणोंद्वारा भीष्मके सम्पूर्ण अंगों और सभी मर्मस्थानोंमें आघात किया ।। ४६ १/२ ।।
एवमन्यैरपि भृशं विद्धयमानः सहस्रशः ।। ४७ ।।
तानप्याशु शरैर्भीष्मः प्रविव्याध महारथः ।
इसी प्रकार दूसरे लोगोंने भी सहस्रों बाणोंद्वारा भीष्मजीको घायल किया। तब महारथी भीष्मने भी तुरंत ही अपने बाणोंद्वारा उन सबको बींध डाला ।। ४७ १/२ ।।
तैश्च मुक्ताञ्छरान् भीष्मो युधि सत्यपराक्रमः ।। ४८ ।।
निवारयामास शरैः समं संनतपर्वभिः ।
सत्यपराक्रमी भीष्म युद्धस्थलमें अन्य सब राजाओं-द्वारा छोड़े हुए बाणोंका झुकी हुई गाँठवाले अपने बाणोंद्वारा तुरंत ही निवारण कर देते थे ।। ४८ १/२ ।।
शिखण्डी तु रणे बाणान् यान् मुमोच महारथः ।। ४९ ।।
न चक्रुस्ते रुजं तस्य रुक्मपुङ्खाः शिलाशिताः ।
महारथी शिखण्डीने रणक्षेत्रमें जिनका प्रयोग किया था, वे शानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखयुक्त बाण भीष्मजीके शरीरमें कोई घाव या पीड़ा नहीं उत्पन्न कर सके ।। ४९ १/२ ।।
ततः किरीटी संक्रुद्धो भीष्ममेवाभ्यवर्तत ।। ५० ।।
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य धनुश्चास्य समाच्छिनत् ।
तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए अर्जुन शिखण्डीको आगे रखकर पुनः भीष्मकी ही ओर बढ़े। उन्होंने भीष्मजीके धनुषको काट दिया ।। ५० १/२ ।।
अथैनं नवभिर्विद्ध्वा ध्वजमेकेन चिच्छिदे ।। ५१ ।।
सारथिं विशिखैश्चास्य दशभिः समकम्पयत् ।
तदनन्तर नौ बाणोंसे उन्हें घायल करके एक बाणसे उनके ध्वजको भी काट डाला। फिर दस बाणोंद्वारा उनके सारथिको कम्पित कर दिया ।। ५१ १/२ ।।
सोऽन्यत् कार्मुकमादाय गाङ्गेयो बलवत्तरम् ।। ५२ ।।
तदप्यस्य शितैर्भल्लैस्त्रिधा त्रिभिरघातयत् ।
तब गंगानन्दन भीष्मने दूसरा अत्यन्त प्रबल धनुष हाथमें लिया; परंतु अर्जुनने तीन तीखे भल्लोंद्वारा मारकर उसे भी तीन जगहसे खण्डित कर दिया ।। ५२ १/२ ।।
निमेषार्धेन कौन्तेय आत्तमात्तं महारणे ।। ५३ ।।
एवमस्य धनूंष्याजौ चिच्छेद सुबहून्यथ ।

उस महायुद्धमें भीष्म जो-जो धनुष हाथमें लेते थे कुन्तीकुमार अर्जुन उसे आधे निमेषमें काट डालते थे। इस प्रकार उन्होंने रणक्षेत्रमें उनके बहुत-से धनुष खण्डित कर दिये॥ ५३ १/२ ॥

ततः शान्तनवो भीष्मो बीभत्सुं नात्यवर्तत ॥ ५४ ॥
अथैनं पञ्चविंशत्या क्षुद्रकाणां समर्पयत् ।
तब शान्तनुनन्दन भीष्मने अर्जुनपर हाथ उठाना बंद कर दिया। फिर भी अर्जुनने उन्हें पचीस बाण मारे॥ ५४ १/२ ॥

सोऽतिविद्धो महेष्वासो दुःशासनमभाषत ॥ ५५ ॥
एष पार्थो रणे क्रुद्धः पाण्डवानां महारथः ।
शरैरनेकसाहस्रैर्मर्मेवाभ्यहनद् रणे ॥ ५६ ॥
इस प्रकार अत्यन्त घायल होनेपर महाधनुर्धर भीष्मने दुःशासनसे कहा—'ये पाण्डव महारथी अर्जुन युद्धमें क्रुद्ध होकर अनेक सहस्र बाणोंद्वारा मुझे घायल कर चुके हैं॥ ५५-५६॥

न चैष समरे शक्यो जेतुं वज्रभृता अपि ।
न चापि सहिता वीरा देवदानवराक्षसाः ॥ ५७ ॥
मां चापि शक्ता निर्जेतुं किमु मर्त्या महारथाः ।
‘इन्हें वज्रधारी इन्द्र भी युद्धमें जीत नहीं सकते। इसी प्रकार समस्त देवता, दानव तथा राक्षस वीर एक साथ आ जायँ तो मुझे भी वे युद्धमें परास्त नहीं कर सकते; फिर दूसरे मानव महारथियोंकी तो बात ही क्या है?'॥ ५७ १/२ ॥

एवं तयोः संवदतोः फाल्गुनो निशितैः शरैः ॥ ५८ ॥
शिखण्डिनं पुरस्कृत्य भीष्मं विव्याध संयुगे ।
इस प्रकार दुःशासन और भीष्ममें जब बातचीत हो रही थी, उसी समय अर्जुनने अपने तीखे बाणोंद्वारा युद्धस्थलमें शिखण्डीको आगे करके भीष्मको क्षत-विक्षत कर दिया॥ ५८ १/२ ॥

ततो दुःशासनं भूयः स्मयमान इवाब्रवीत् ॥ ५९ ॥
अतिविद्धः शितैर्बाणैर्भृशं गाण्डीवधन्वना ।
वज्राशनिसमस्पर्शा अर्जुनेन शरा युधि ॥ ६० ॥
मुक्ताः सर्वेऽव्यवच्छिन्ना नेमे बाणाः शिखण्डिनः ।
तब वे पुनः दुःशासनसे मुसकराते हुए-से बोले—'गाण्डीवधारी अर्जुनने युद्धस्थलमें ऐसे बाण छोड़े हैं, जिनका स्पर्श वज्र और विद्युत्‌के समान असह्य है। उनके तीखे बाणोंसे मैं अत्यन्त घायल हो गया हूँ। ये अविच्छिन्न रूपसे छूटनेवाले समस्त बाण शिखण्डीके नहीं हो सकते; ॥ ५९-६० १/२ ॥

निकृन्तमाना मर्माणि दृढावरणभेदिनः ॥ ६१ ॥

मुसला इव मे घ्नन्ति नेमे बाणाः शिखण्डिनः । वज्रदण्डसमस्पर्शा वज्रवेगदुरासदाः ॥ ६२ ॥ ‘क्योंकि ये मेरे सुदृढ़ कवचको छेदकर मर्मस्थानोंमें आघात कर रहे हैं, ये बाण मेरे शरीरपर मुसलके समान चोट करते हैं। इनका स्पर्श वज्र और यमदण्डके समान असह्य है। इनका वेग वज्रके समान होनेके कारण निवारण करना कठिन है। ये शिखण्डीके बाण कदापि नहीं ॥ ६१-६२ ॥ मम प्राणानारुजन्ति नेमे बाणाः शिखण्डिनः । नाशयन्तीव मे प्राणान् यमदूता इवाहिताः ॥ ६३ ॥ ‘ये मेरे प्राणोंमें व्यथा उत्पन्न कर देते हैं। अहितकारी यमदूतोंके समान मेरे प्राणोंका विनाश-सा कर रहे हैं। ये शिखण्डीके बाण कदापि नहीं हो सकते ॥ गदापरिघसंस्पर्शा नेमे बाणाः शिखण्डिनः । भुजगा इव संक्रुद्धा लेलिहाना विषोल्बणाः ॥ ६४ ॥ ‘इनका स्पर्श गदा और परिघकी चोटके समान प्रतीत होता है, ये क्रोधमें भरे हुए प्रचण्ड विषवाले सर्पोंके समान डसे लेते हैं। ये शिखण्डीके बाण नहीं हैं ॥ ६४ ॥ समाविशन्ति मर्माणि नेमे बाणाः शिखण्डिनः । अर्जुनस्य इमे बाणा नेमे बाणाः शिखण्डिनः ॥ ६५ ॥ कृन्तन्ति मम गात्राणि माघमां सेगवा इव । ‘ये बाण मेरे मर्मस्थानोंमें प्रवेश कर रहे हैं, अतः शिखण्डीके नहीं हैं। ये अर्जुनके बाण हैं। ये शिखण्डीके बाण नहीं हैं। जैसे केंकड़ीके बच्चे अपनी माताका उदर विदीर्ण करके बाहर निकलते हैं, उसी प्रकार ये बाण मेरे सम्पूर्ण अंगोंको छेदे डालते हैं ॥ ६५ १/२ ॥ सर्वे ह्यपि न मे दुःखं कुर्युुरन्ये नराधिपाः ॥ ६६ ॥ वीरं गाण्डीवधन्वानमृते जिष्णुं कपिध्वजम् । ‘गाण्डीवधारी वीर कपिध्वज अर्जुनको छोड़कर अन्य सभी नरेश अपने प्रहारोंद्वारा मुझे इतनी पीड़ा नहीं दे सकते’ ॥ ६६ १/२ ॥ इति ब्रुवञ्छान्तनवो दिधक्षुरिव पाण्डवान् ॥ ६७ ॥ शक्तिं भीष्मः स पार्थाय ततश्चिक्षेप भारत । तामस्य विशिखैश्छित्त्वा त्रिधा त्रिभिरपातयत् ॥ ६८ ॥ भारत! ऐसा कहते हुए शान्तनुनन्दन भीष्मने पाण्डवोंकी ओर इस प्रकार देखा, मानो उन्हें भस्म कर डालेंगे। फिर उन्होंने अर्जुनपर एक शक्ति चलायी; परंतु अर्जुनने तीन बाणोंद्वारा उनकी उस शक्तिको तीन जगहसे काट गिराया ॥ ६७-६८ ॥ पश्यतां कुरुवीराणां सर्वेषां तव भारत । चर्माथादत्त गाङ्गेयो जातरूपपरिष्कृतम् ॥ ६९ ॥ खड्गं चान्यतरप्रेप्सुर्मृत्योरग्रे जयाय वा ।

भरतनन्दन! समस्त कौरव वीरोंके देखते-देखते गंगानन्दन भीष्मने मृत्यु अथवा विजय इन दोमेंसे किसी एकका वरण करनेके लिये अपने हाथमें सुवर्णभूषित ढाल और तलवार ले ली॥ ६९ १/२॥ तस्य तच्छतधा चर्म व्यधमत् सायकैस्तथा ॥ ७० ॥ रथादनवरूढस्य तदद्भुतमिवाभवत् । परंतु वे अभी अपने रथसे उतर भी नहीं पाये थे कि अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा उनकी ढालके सौ टुकड़े कर दिये, वह एक अद्भुत-सी बात हुई॥ ७० १/२॥ ततो युधिष्ठिरो राजा स्वान्यनीकान्यचोदयत् ॥ ७१ ॥ अभिद्रवत गाङ्गेयं मा वोऽस्तु भयमण्वपि । इसी समय राजा युधिष्ठिरने अपने सैनिकोंको आज्ञा दी—'वीरो! गंगानन्दन भीष्मपर आक्रमण करो। उनकी ओरसे तुम्हारे मनमें तनिक भी भय नहीं होना चाहिये'॥ ७१ १/२॥ अथ ते तोमरैः प्रासैर्बाणौघैश्च समन्ततः ॥ ७२ ॥ पट्टिशैश्च सुनिस्त्रिंशैर्नाराचैश्च तथा शितैः । वत्सदनैश्च भल्लैश्च तमेकमभिदुद्रुवुः ॥ ७३ ॥ तदनन्तर वे पाण्डव-सैनिक सब ओरसे तोमर, प्रास, बाणसमुदाय, पट्टिश, खड्ग, तीखे नाराच, वत्सदन्त तथा भल्लोंका प्रहार करते हुए एकमात्र भीष्मकी ओर दौड़े॥ ७२-७३॥ सिंहनादस्ततो घोरः पाण्डवानामभूत् तदा । तथैव तव पुत्राश्च नेदुर्भीष्मजयैषिणः ॥ ७४ ॥ तदनन्तर पाण्डवोंकी सेनामें घोर सिंहनाद हुआ। इसी प्रकार भीष्मकी विजय चाहनेवाले आपके पुत्र भी उस समय गर्जना करने लगे॥ ७४॥ तमेकमभ्यरक्षन्त सिंहनादांश्च चक्रिरे । तत्रासीत् तुमुलं युद्धं तावकानां परैः सह ॥ ७५ ॥ आपके सैनिक एकमात्र भीष्मकी रक्षा और सिंहनाद करने लगे। वहाँ आपके योद्धाओंका शत्रुओंके साथ भयंकर युद्ध हुआ॥ ७५॥ दशमेऽहनि राजेन्द्र भीष्मार्जुनसमागमे । आसीद् गाङ्ग इवावर्तो मुहूर्तमुदधेरिव ॥ ७६ ॥ राजेन्द्र! दसवें दिन भीष्म और अर्जुनके संघर्षमें दो घड़ीतक ऐसा दृश्य दिखायी दिया, मानो समुद्रमें गंगाजीके गिरते समय उनके जलमें भारी भँवर उठ रही हो॥ ७६॥ सैन्यानां युध्यमानानां निघ्नतामितरेतरम् । असौम्यरूपा पृथिवी शोणिताक्ताभवत् तदा ॥ ७७ ॥ उस समय एक-दूसरेको मारनेवाले युद्धपरायण सैनिकोंके रक्तसे रंजित हो वहाँकी सारी पृथ्वी भयानक हो गयी थी॥ ७७॥

समं च विषमं चैव न प्राज्ञायत किंचन । योधानामयुतं हत्वा तस्मिन् स दशमेऽहनि ।। ७८ ।। अतिष्ठदाहवे भीष्मो भिद्यमानेषु मर्मसु । वहाँ ऊँची और नीची भूमिका भी कुछ ज्ञान नहीं हो पाता था, दसवें दिनके उस युद्धमें अपने मर्मस्थानोंके विदीर्ण होते रहनेपर भी भीष्मजी दस हजार योद्धाओंको मारकर वहाँ खड़े हुए थे ।। ७८ १/२ ।। ततः सेनामुखे तस्मिन् स्थितः पार्थो धनुर्धरः ।। ७९ ।। मध्येन कुरुसैन्यानां द्रावयामास वाहिनीम् । उस समय सेनाके अग्रभागमें खड़े हुए धनुर्धर अर्जुनने कौरव-सेनाके भीतर प्रवेश करके आपके सैनिकोंको खदेड़ना आरम्भ किया ।। ७९ १/२ ।। (तथा च तव सैन्यानि तापयामासुरोजसा । शरैरशनिसंकाशैः पाण्डवाश्चेतरे नृपाः ।। तत्राद्भुतमपश्याम पाण्डवानां पराक्रमम् । द्रावयामासुरिषुभिः सर्वान् भीष्मपदानुगान् ।।) पाण्डवों तथा अन्य राजाओंने वज्रके समान बाणोंद्वारा आपकी सेनाओंको बलपूर्वक पीड़ित किया। वहाँ हमने पाण्डवोंका यह अद्भुत पराक्रम देखा कि उन्होंने अपने बाणोंकी वर्षासे भीष्मका अनुगमन करनेवाले समस्त योद्धाओंको मार भगाया। वयं श्वेतहयाद् भीताः कुन्तीपुत्राद् धनंजयात् ।। ८० ।। पीड्यमानाः शितैः शस्त्रैः प्राद्रवाम रणे तदा । राजन्! उस समय श्वेतवाहन कुन्तीपुत्र धनंजयसे डरकर उनके तीखे अस्त्र-शस्त्रोंसे पीड़ित हो हम सभी लोग रणभूमिसे भागने लगे थे ।। ८० १/२ ।। सौवीराः कितवाः प्राच्याः प्रतीच्योदीच्यमालवाः ।। ८१ ।। अभीषाहाः शूरसेनाः शिबयोऽथ वसातयः । शाल्वाश्रयास्त्रिगर्ताश्च अम्बष्ठाः केकयैः सह ।। ८२ ।। सर्व एते महात्मानः शरार्ता व्रणपीडिताः । संग्रामे न जहुर्भीष्मं युध्यमानं किरीटिना ।। ८३ ।। सौवीर, कितव, प्राच्य, प्रतीच्य, उदीच्य, मालव, अभीषाह, शूरसेन, शिबि, वसाति, शाल्वाश्रय, त्रिगर्त, अम्बष्ठ और केकय—इन सभी देशोंके ये सारे महामनस्वी वीर बाणोंसे घायल और घावोंसे पीड़ित होनेपर भी अर्जुनके साथ युद्ध करनेवाले भीष्मको संग्रामभूमिमें छोड़ न सके ।। ८१—८३ ।। ततस्तमेकं बहवः परिवार्य समन्ततः । परिकाल्य कुरून् सर्वान् शरवर्षैरवाकिरन् ।। ८४ ।।

तदनन्तर एकमात्र भीष्मको पाण्डव-पक्षीय बहुत-से योद्धाओंने चारों ओरसे घेर लिया और समस्त कौरवोंको सब ओर खदेड़कर उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ८४ ॥

निपातयत गृह्णीत युध्यध्वमवकृन्तत ।
इत्यासीत् तुमुलः शब्दो राजन् भीष्मरथं प्रति ॥ ८५ ॥
राजन्! उस समय भीष्मके रथके समीप ‘मार गिराओ, पकड़ लो, युद्ध करो, टुकड़े-टुकड़े कर डालो’ इत्यादि भयंकर शब्द गूँज रहे थे ॥ ८५ ॥

निहत्य समरे राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ।
न तस्यासीदनिर्भिन्नं गात्रे द्व्यङ्गुलमन्तरम् ॥ ८६ ॥
महाराज! समरमें भीष्म सैकड़ों और हजारों वीरोंका वध करके स्वयं इस स्थितिमें पहुँच गये थे कि उनके शरीरमें दो अंगुल भी ऐसा स्थान नहीं रह गया था, जो बाणोंसे विद्ध न हुआ हो ॥ ८६ ॥

एवंभूतस्तव पिता शरैर्विशकलीकृतः ।
शिताग्रैः फाल्गुनेनाजौ प्राक्शिराः प्रापतद् रथात् ॥ ८७ ॥
किंचिच्छेषे दिनकरे पुत्राणां तव पश्यताम् ।
इस प्रकार आपके ताऊ भीष्म युद्धस्थलमें अर्जुनके तीखे बाणोंसे अत्यन्त विद्ध हो गये थे—उनका शरीर छिदकर छलनी हो रहा था। वे उसी अवस्थामें, जब कि दिन थोड़ा ही शेष था, आपके पुत्रोंके देखते-देखते पूर्व दिशाकी ओर मस्तक किये रथसे नीचे गिर पड़े ॥ ८७ ½ ॥

हाहेति दिवि देवानां पार्थिवानां च भारत ॥ ८८ ॥
पतमाने रथाद् भीष्मे बभूव सुमहान्स्वनः ।
भारत! रथसे भीष्मके गिरते समय आकाशमें खड़े हुए देवताओं तथा भूतलवर्ती राजाओंमें बड़े जोरसे हाहाकार मच गया ॥ ८८ ½ ॥

सम्पतन्तमभिप्रेक्ष्य महात्मानं पितामहम् ॥ ८९ ॥
सह भीष्मेण सर्वेषां प्रापतन् हृदयानि नः ।
महाराज! महात्मा पितामह भीष्मको रथसे नीचे गिरते देखकर हम सब लोगोंके हृदय भी उनके साथ ही गिर पड़े ॥ ८९ ½ ॥

स पपात महाबाहुर्वसुधामनुनादयन् ॥ ९० ॥
इन्द्रध्वज इवोत्सृष्टः केतुः सर्वधनुष्मताम् ।
धरणीं न स पस्पर्श शरसंघैः समावृतः ॥ ९१ ॥
वे महाबाहु भीष्म सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ थे। वे कटी हुई इन्द्रकी ध्वजाके समान पृथ्वीको शब्दायमान करते हुए गिर पड़े। उनके सारे अंगोंमें सब ओर बाण बिंधे हुए थे। इसलिये गिरनेपर भी उनका धरतीसे स्पर्श नहीं हुआ ॥ ९०-९१ ॥

शरत्तल्पे महेष्वासं शयानं पुरुषर्षभम् । रथात् प्रपतितं चैनं दिव्यो भावः समाविशत् ॥ ९२ ॥ रथसे गिरकर बाणशय्यापर सोये हुए पुरुषप्रवर महाधनुर्धर भीष्मके भीतर दिव्यभावका आवेश हुआ ॥ ९२ ॥

अभ्यवर्षच्च पर्जन्यः प्राकम्पत च मेदिनी । पतन् स ददृशे चापि दक्षिणेन दिवाकरम् ॥ ९३ ॥ आकाशसे मेघ वर्षा करने लगा, धरती काँपने लगी, गिरते-गिरते उन्होंने देखा, अभी सूर्य दक्षिणायनमें हैं (यह मृत्युके लिये उत्तम समय नहीं है) ॥ ९३ ॥

संज्ञां चोपालभद् वीरः कालं संचिन्त्य भारत । अन्तरिक्षे च शुश्राव दिव्या वाचः समन्ततः ॥ ९४ ॥ भारत! समयका विचार करके वीरवर भीष्मने अपने होश-हवाशको ठीक रखा। उस समय आकाशमें सब ओरसे दिव्य वाणी सुनायी दी ॥ ९४ ॥

कथं महात्मा गाङ्गेयः सर्वशस्त्रभृतां वरः । कालकर्ता नरव्याघ्रः सम्प्राप्ते दक्षिणायने ॥ ९५ ॥ महात्मा गंगानन्दन भीष्म सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ, मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी तथा कालपर भी प्रभुत्व रखनेवाले थे। इन्होंने दक्षिणायनमें मृत्यु क्यों स्वीकार की? ॥ ९५ ॥

स्थितोऽस्मीति च गाङ्गेयस्तच्छ्रुत्वा वाक्यमब्रवीत् । धारयामास च प्राणान् पतितोऽपि महीतले ॥ ९६ ॥ उत्तरायणमन्विच्छन् भीष्मः कुरुपितामहः । तस्य तन्मतमाज्ञाय गंगा हिमवतः सुता ॥ ९७ ॥ महर्षीन् हंसरूपेण प्रेषयामास तत्र वै । उनकी वह बात सुनकर गंगानन्दन भीष्मने कहा—'मैं अभी जीवित हूँ।' कुरुकुलके वृद्ध पितामह भीष्म पृथ्वीपर गिरकर भी उत्तरायणकी प्रतीक्षा करते हुए अपने प्राणोंको रोके हुए हैं। उनके इस अभिप्रायको जानकर हिमालयनन्दिनी गंगादेवीने महर्षियोंको हंसरूपसे वहाँ भेजा ॥ ९६-९७ १/२ ॥

ततः सम्पातिनो हंसास्त्वरिता मानसौकसः ॥ ९८ ॥ आजग्मुः सहिता द्रष्टुं भीष्मं कुरुपितामहम् । यत्र शेते नरश्रेष्ठः शरतल्पे पितामहः ॥ ९९ ॥ वे मानसरोवरमें निवास करनेवाले हंसरूपधारी महर्षि एक साथ उड़ते हुए बड़ी उतावलीके साथ कुरुकुलके वृद्धपितामह भीष्मका दर्शन करनेके लिये उस स्थानपर आये, जहाँ वे नरश्रेष्ठ बाणशय्यापर सो रहे थे ॥

ते तु भीष्मं समासाद्य ऋषयो हंसरूपिणः ।

अपश्यञ्छरतल्पस्थं भीष्मं कुरुकुलोद्वहम् ॥ १०० ॥
उन हंसरूपधारी ऋषियोंने वहाँ पहुँचकर कुरुकुल-धुरन्धर वीर भीष्मको बाणशय्यापर सोये हुए देखा ॥ १०० ॥
ते तं दृष्ट्वा महात्मानं कृत्वा चापि प्रदक्षिणम् ।
गाङ्गेयं भरतश्रेष्ठं दक्षिणेन च भास्करम् ॥ १०१ ॥
इतरेतरमामन्त्र्य प्राहुस्तत्र मनीषिणः ।
उन भरतश्रेष्ठ महात्मा गंगानन्दन भीष्मका दर्शन करके ऋषियोंने उनकी प्रदक्षिणा की। फिर दक्षिणायन-युक्त सूर्यके सम्बन्धमें परस्पर सलाह करके वे मनीषी मुनि इस प्रकार बोले— ॥ १०१ १/२ ॥
भीष्मः कथं महात्मा सन् संस्थाता दक्षिणायने ॥ १०२ ॥
इत्युक्त्वा प्रस्थिता हंसा दक्षिणामभितो दिशम् ।
‘भीष्मजी महात्मा होकर दक्षिणायनमें कैसे अपनी मृत्यु स्वीकार करेंगे’ ऐसा कहकर वे हंसगण दक्षिणदिशाकी ओर चले गये ॥ १०२ १/२ ॥
सम्प्रेक्ष्य वै महाबुद्धिश्चिन्तयित्वा च भारत ॥ १०३ ॥
तानब्रवीच्छान्तनवो नाहं गन्ता कथंचन ।
दक्षिणावर्त आदित्ये एतन्मे मनसि स्थितम् ॥ १०४ ॥
भारत! हंसोंके जाते समय उन्हें देखकर परम बुद्धिमान् भीष्मने कुछ चिन्तन करके उनसे कहा—‘मैं सूर्यके दक्षिणायन रहते किसी प्रकार यहाँसे प्रस्थान नहीं करूँगा। यह मेरे मनका निश्चित विचार है ॥ १०३-१०४ ॥
गमिष्यामि स्वकं स्थानमासीद् यन्मे पुरातनम् ।
उदगायन आदित्ये हंसाः सत्यं ब्रवीमि वः ॥ १०५ ॥
‘हंसो! सूर्यके उत्तरायण होनेपर ही मैं उस लोककी यात्रा करूँगा, जो मेरा पुरातन स्थान है। यह मैं आपलोगोंसे सच्ची बात कह रहा हूँ ॥ १०५ ॥
धारयिष्याम्यहं प्राणानुत्तरायणकाङ्क्षया ।
ऐश्वर्यभूतः प्राणानामुत्सर्गो हि यतो मम ॥ १०६ ॥
‘मैं उत्तरायणकी प्रतीक्षामें अपने प्राणोंको धारण किये रहूँगा; क्योंकि मैं जब इच्छा करूँ, तभी अपने प्राणोंको छोड़ूँ, यह शक्ति मुझे प्राप्त है ॥ १०६ ॥
तस्मात् प्राणान् धारयिष्ये मुमूर्षुरुदगायने ।
यश्च दत्तो वरो मह्यं पित्रा तेन महात्मना ॥ १०७ ॥
छन्दतो मृत्युरित्येवं तस्य चास्तु वरस्तथा ।
धारयिष्ये ततः प्राणानुत्सर्गे नियते सति ॥ १०८ ॥
‘अतः उत्तरायणमें मृत्यु प्राप्त करनेकी इच्छासे मैं अपने प्राणोंको धारण करूँगा। मेरे महात्मा पिताने मुझे जो वर दिया था कि तुम्हें अपनी इच्छा होनेपर ही मृत्यु प्राप्त होगी,

उनका वह वरदान सफल हो। मैं प्राणत्यागका नियत समय आनेतक अवश्य इन प्राणोंको रोक रखूँगा' ।। १०७-१०८ ।।

इत्युक्त्वा तांस्तदा हंसान् स शेते शरतल्पगः ।
एवं कुरूणां पतिते शृङ्गे भीष्मे महौजसि ।। १०९ ।।
पाण्डवाः सृञ्जयाश्चैव सिंहनादं प्रचक्रिरे ।
उस समय उन हंसोंसे ऐसा कहकर वे बाण-शय्यापर पूर्ववत् सोये रहे। इस प्रकार कुरुकुलशिरोमणि महापराक्रमी भीष्मके गिर जानेपर पाण्डव और सृंजय हर्षसे सिंहनाद करने लगे ।। १०९ १/३ ।।

तस्मिन् हते महासत्त्वे भरतानां पितामहे ।। ११० ।।
न किंचित् प्रत्यपद्यन्त पुत्रास्ते भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! उन महान् शक्तिशाली एवं भरत-वंशियोंके पितामह भीष्मके मारे जानेपर आपके पुत्रोंको कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ।। ११० १/३ ।।

सम्मोहश्चैव तुमुलः कुरूणामभवत् तदा ।। १११ ।।
कृपदुर्योधनमुखा निःश्वस्य रुरुदुस्ततः ।
उस समय कौरवोंपर बड़ा भयंकर मोह छा गया। कृपाचार्य और दुर्योधन आदि सब लोग सिसक-सिसककर रोने लगे ।। १११ १/३ ।।

विषादाच्च चिरं कालमतिष्ठन् विगतेन्द्रियाः ।। ११२ ।।
दध्युश्चैव महाराज न युद्धे दधिरे मनः ।
ऊरुग्राहगृहीताश्च नाभ्यधावन्त पाण्डवान् ।। ११३ ।।
वे सब लोग विषादके कारण दीर्घकालतक ऐसी अवस्थामें पड़े रहे, मानो उनकी सारी इन्द्रियाँ नष्ट हो गयी हों। महाराज! वे भारी चिन्तामें डूब गये। युद्धमें उनका मन नहीं लगता था। वे पाण्डवोंपर धावा न कर सके, मानो किसी महान् ग्राहने उन्हें पकड़ लिया हो ।। ११२-११३ ।।

अवध्ये शन्तनोः पुत्रे हते भीष्मे महौजसि ।
अभावः सहसा राजन् कुरुराजस्य तर्कितः ।। ११४ ।।
राजन्! महातेजस्वी शान्तनुपुत्र भीष्म अवध्य थे, तो भी मारे गये। इससे सहसा सब लोगोंने यही अनुमान किया कि कुरुराज दुर्योधनका विनाश भी अवश्यम्भावी है ।। ११४ ।।

हतप्रवीरास्तु वयं निकृत्ताश्च शितैः शरैः ।
कर्तव्यं नाभिजानीमो निर्जिताः सव्यसाचिना ।। ११५ ।।
सव्यसाची अर्जुनने हम सब लोगोंपर विजय पायी। उनके तीखे बाणोंसे हमलोग क्षत-विक्षत हो रहे थे और हमारे प्रमुख वीर उनके हाथों मारे गये थे। उस अवस्थामें हमें अपना कर्तव्य नहीं सूझता था ।। ११५ ।।

पाण्डवाश्च जयं लब्ध्वा परत्र च परां गतिम् ।

सर्वे दध्मुर्महाशङ्खान् शूराः परिघबाहवः ॥ ११६ ॥ परिघके समान मोटी भुजाओंवाले शूरवीर पाण्डवोंने इहलोकमें विजय पाकर परलोकमें भी उत्तम गति निश्चित कर ली। वे सब-के-सब बड़े-बड़े शंख बजाने लगे ॥

सोमकाश्च सपञ्चालाः प्राहृष्यन्त जनेश्वर । ततस्तूर्यसहस्रेषु नदत्सु स महाबलः ॥ ११७ ॥ आस्फोटयामास भृशं भीमसेनो ननाद च । जनेश्वर! पांचालों और सोमकोंके तो हर्षकी सीमा न रही। सहस्रों रणवाद्य बजने लगे। उस समय महाबली भीमसेन जोर-जोरसे ताल ठोकने और सिंहके समान दहाड़ने लगे ॥ ११७ ½ ॥

सेनयोरुभयोश्चापि गाङ्गेये निहते विभौ ॥ ११८ ॥ संन्यस्य वीराः शस्त्राणि प्राध्यायन्त समन्ततः । शक्तिशाली गंगानन्दन भीष्मके मारे जानेपर सब ओर दोनों सेनाओंके सब वीर अपने अस्त्र-शस्त्र नीचे डालकर भारी चिन्तामें निमग्न हो गये ॥ ११८ ½ ॥

प्राक्रोशन् प्राद्रवंश्चान्ये जग्मुर्मोहं तथापरे ॥ ११९ ॥ कुछ फूट-फूटकर रोने-चिल्लाने लगे, कुछ इधर-उधर भागने लगे और कुछ वीर मोहको प्राप्त (मूर्च्छित) हो गये ॥ ११९ ॥

क्षात्रं चान्येऽभ्यनिन्दन्त भीष्मं चान्येऽभ्यपूजयन् । ऋषयः पितरश्चैव प्रशशंसुर्महाव्रतम् ॥ १२० ॥ कुछ लोग क्षात्रधर्मकी निन्दा कर रहे थे और कुछ भीष्मजीकी प्रशंसा कर रहे थे। ऋषियों और पितरोंने महान् व्रतधारी भीष्मकी बड़ी प्रशंसा की ॥ १२० ॥

भरतानां च ये पूर्वे ते चैनं प्रशंसिरे । महोपनिषदं चैव योगमास्थाय वीर्यवान् ॥ १२१ ॥ जपञ्शान्तनवो धीमान् कालाकाङ्क्षी स्थितोऽभवत् ॥ १२२ ॥ भरतवंशके पूर्वजोंने भी भीष्मजीकी बड़ी बड़ाई की। परम पराक्रमी एवं बुद्धिमान् शान्तनुनन्दन भीष्म महान् उपनिषदोंके सारभूत योगका आश्रय ले प्रणवका जप करते हुए उत्तरायणकालकी प्रतीक्षामें बाणशय्यापर सोये रहे ॥ १२१-१२२ ॥

इति श्रीमहाभारते भीष्मपर्वणि भीष्मवधपर्वणि भीष्मनिपातने एकोनविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत भीष्मपर्वके अन्तर्गत भीष्मवधपर्वमें भीष्मजीके रथसे गिरनेसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११९ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल १२५ श्लोक हैं।]

भीष्मजीकी महत्ता तथा अर्जुनके द्वारा भीष्मको तकिया देना एवं उभय पक्षकी सेनाओंका अपने शिविरमें जाना और श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर-संवाद

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विंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

भीष्मजीकी महत्ता तथा अर्जुनके द्वारा भीष्मको तकिया देना एवं उभय पक्षकी सेनाओंका अपने शिविरमें जाना और श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर-संवाद

धृतराष्ट्र उवाच

कथमासंस्तदा योधा हीना भीष्मेण संजय । बलिना देवकल्पेन गुर्वर्थे ब्रह्मचारिणा ॥ १ ॥ धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! भीष्मजी बलवान् और देवताके समान थे। उन्होंने अपने पिताके लिये आजीवन ब्रह्मचर्यका पालन किया था। उस दिन उनके रथसे गिर जानेके कारण उनके सहयोगसे वंचित हुए मेरे पक्षके योद्धाओंकी क्या दशा हुई? ॥ १ ॥

तदैव निहतान् मन्ये कुरूनन्यांश्च पाण्डवैः । न प्राहरद् यदा भीष्मो घृणित्वाद् द्रुपदात्मजम् ॥ २ ॥ भीष्मजीने अपनी दयालुताके कारण जब द्रुपदकुमार शिखण्डीपर प्रहार करनेसे हाथ खींच लिया, तभी मैंने यह समझ लिया था कि अब पाण्डवोंके हाथसे अन्य कौरव भी अवश्य मारे जायँगे ॥ २ ॥

ततो दुःखतरं मन्ये किमन्यत् प्रभविष्यति । अद्याहं पितरं श्रुत्वा निहतं स्म सुदुर्मतिः ॥ ३ ॥ मेरी समझमें इससे बढ़कर महान् दुःखकी बात और क्या होगी कि आज अपने ताऊ भीष्मके मारे जानेका समाचार सुनकर भी जीवित हूँ। मेरी बुद्धि बहुत ही खोटी है ॥ ३ ॥

अश्मसारमयं नूनं हृदयं मम संजय । श्रुत्वा विनिहतं भीष्मं शतधा यन्न दीर्यते ॥ ४ ॥ संजय! निश्चय ही मेरा हृदय लोहेका बना हुआ है; क्योंकि आज भीष्मजीके मारे जानेका समाचार सुनकर भी यह सैकड़ों टुकड़ोंमें विदीर्ण नहीं हो रहा है ॥ ४ ॥

यदन्यन्निहतेनाजौ भीष्मेण जयमिच्छता । चेष्टितं कुरुसिंहेन तन्मे कथय सुव्रत ॥ ५ ॥ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले संजय! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले कुरुकुलसिंह भीष्म जब युद्धमें मारे गये, उस समय उन्होंने दूसरी कौन-कौन-सी चेष्टाएँ की थीं? वह सब मुझसे कहो ॥ ५ ॥

पुनःपुनर्न मृष्यामि हतं देवव्रतं रणे । न हतो जामदग्न्येन दिव्यैरस्त्रैरयं पुरा ॥ ६ ॥

स हतो द्रौपदेयेन पाञ्चाल्येन शिखण्डिना।
रणभूमिमें देवव्रत भीष्मका मारा जाना मुझे बारंबार असह्य हो उठता है। जो भीष्म पूर्वकालमें जमदग्निनन्दन परशुरामके दिव्यास्त्रोंद्वारा भी नहीं मारे जा सके, वे ही द्रुपदकुमार पांचालदेशीय शिखण्डीके हाथसे मारे गये; यह कितने दुःखकी बात है॥ ६ १/२॥

संजय उवाच

सायाह्ने निहतो भूमौ धार्तराष्ट्रान् विषादयन् ॥ ७ ॥
पञ्चालानां ददौ हर्षं भीष्मः कुरुपितामहः।
**संजयने कहा—**महाराज! कुरुकुलवृद्ध पितामह भीष्म सायंकालमें जब रणभूमिमें गिरे, उस समय उन्होंने आपके पुत्रोंको बड़े विषादमें डाल दिया और पांचालोंको हर्ष मनानेका अवसर दे दिया॥ ७ १/२॥

स शेते शरतल्पस्थो मेदिनीमस्पृशंस्तदा ॥ ८ ॥
भीष्मे रथात् प्रपतिते प्रच्युते धरणीतले।
हाहेति तुमुलः शब्दो भूतानां समपद्यत ॥ ९ ॥
वे पृथ्वीका स्पर्श किये बिना ही उस समय बाणशय्यापर सो रहे थे। भीष्मके रथसे गिरकर धरतीपर पड़ जानेपर समस्त प्राणियोंमें भयंकर हाहाकार मच गया॥ ८-९॥

सीमावृक्षे निपतिते कुरूणां समितिजये।
सैनयोरुभयो राजन् क्षत्रियान् भयमाविशत् ॥ १० ॥
राजन्! कुरुकुलके युद्धविजयी वीर भीष्म दोनों दलोंके लिये सीमावर्ती वृक्षके समान थे। उनके गिर जानेसे उभय पक्षकी सेनाओंमें जो क्षत्रिय थे, उनके मनमें भारी भय समा गया॥ १०॥

भीष्मं शान्तनवं दृष्ट्वा विशीर्णकवचध्वजम्।
कुरवः पर्यवर्तन्त पाण्डवाश्च विशाम्पते ॥ ११ ॥
प्रजानाथ! जिनके कवच और ध्वज छिन्न-भिन्न हो गये थे, उन शान्तनुनन्दन भीष्मजीको उस अवस्थामें देखकर कौरव और पाण्डव दोनों ही उन्हें घेरकर खड़े हो गये॥ ११॥

खं तमःसंवृतमभूदासीद् भानुर्गतप्रभः।
ररास पृथिवी चैव भीष्मे शान्तनवे हते ॥ १२ ॥
उस समय आकाशमें अन्धकार छा गया। सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी। शान्तनुनन्दन भीष्मके मारे जानेपर यह सारी पृथ्वी भयानक शब्द करने लगी॥ १२॥

अयं ब्रह्मविदां श्रेष्ठो ह्ययं ब्रह्मविदां वरः।
इत्यभाषन्त भूतानि शयानं पुरुषर्षभम् ॥ १३ ॥

वहाँ सोये हुए पुरुषप्रवर भीष्मको देखकर कुछ दिव्य प्राणी कहने लगे, 'ये ब्रह्मज्ञानियोंके शिरोमणि हैं, ये ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं ॥ १३ ॥

अयं पितरमाज्ञाय कामार्तं शान्तनुं पुरा ।
ऊर्ध्वरेतसमात्मानं चकार पुरुषर्षभः ॥ १४ ॥
'इन्हीं पुरुषसिंहने पूर्वकालमें अपने पिता शान्तनुको कामासक्त जानकर अपने-आपको ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) बना लिया' ॥ १४ ॥

इति स्म शरतल्पस्थं भरतानां महत्तम् ।
ऋषयस्त्वभ्यभाषन्त सहिताः सिद्धचारणैः ॥ १५ ॥
इस प्रकार सिद्धों और चारणोंसहित ऋषिगण भरतकुलके महापुरुष भीष्मको बाणशय्यापर स्थित देख पूर्वोक्त बातें कहते थे ॥ १५ ॥

हते शान्तनवे भीष्मे भरतानां पितामहे ।
न किंचित् प्रत्यपद्यन्त पुत्रास्तव हि मारिष ॥ १६ ॥
आर्य! भरतवंशियोंके पितामह शान्तनुनन्दन भीष्मके मारे जानेपर आपके पुत्रोंको कुछ भी नहीं सूझता था ॥ १६ ॥

विषण्णवदनाश्चासन् हतश्रीकाश्च भारत ।
अतिष्ठन् व्रीडिताश्चैव ह्रिया युक्ता ह्यधोमुखाः ॥ १७ ॥
भारत! उनके मुखपर विषाद छा गया था। वे श्रीहीन और लज्जित हो नीचेकी ओर मुँह लटकाये खड़े थे ॥ १७ ॥

पाण्डवाश्च जयं लब्ध्वा संग्रामशिरसि स्थिताः ।
सर्वे दध्मुर्महाशङ्खान् हेमजालपरिष्कृतान् ॥ १८ ॥
पाण्डव विजय पाकर युद्धके मुहानेपर खड़े थे और सब-के-सब सोनेकी जालियोंसे विभूषित बड़े-बड़े शंखोंको बजा रहे थे ॥ १८ ॥

हर्षात् तूर्यसहस्रेषु वाद्यमानेषु चानघ ।
अपश्याम महाराज भीमसेनं महाबलम् ॥ १९ ॥
विक्रीडमानं कौन्तेयं हर्षेण महता युतम् ।
निहत्य तरसा शत्रुं महाबलसमन्वितम् ॥ २० ॥
निष्पाप महाराज! जब हर्षातिरेकसे सहस्रों बाजे बज रहे थे, उस समय हमने कुन्तीकुमार महाबली भीमसेनको देखा। वे महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न शत्रुको वेगपूर्वक मार देनेके कारण अत्यन्त हर्षके साथ नाच रहे थे ॥ १९-२० ॥

सम्मोहश्चापि तुमुलः कुरूणामभवत् ततः ।
कर्णदुर्योधनौ चापि निःश्वसेतां मुहुर्मुहुः ॥ २१ ॥
उस समय कौरवोंपर भयंकर मोह छा गया था। कर्ण और दुर्योधन भी बारंबार लंबी साँसें खींच रहे थे ॥

तथा निपतिते भीष्मे कौरवाणां पितामहे ।
हाहाभूतमभूत् सर्वं निर्मर्यादमवर्तत ॥ २२ ॥
कौरवपितामह भीष्मके इस प्रकार रथसे गिर जानेपर सर्वत्र हाहाकार मच गया। कहीं कोई मर्यादा नहीं रह गयी ॥ २२ ॥

दृष्ट्वा च पतितं भीष्मं पुत्रो दुःशासनस्तव ।
उत्तमं जवमास्थाय द्रोणानीकमुपाद्रवत् ॥ २३ ॥
भ्रात्रा प्रस्थापितो वीरः स्वेनानीकेन दंशितः ।
प्रययौ पुरुषव्याघ्रः स्वसैन्यं स विषादयन् ॥ २४ ॥
भीष्मजीको रणभूमिमें गिरा देख आपका वीर पुत्र पुरुषसिंह दुःशासन अपने भाईके भेजनेपर अपनी ही सेनासे घिरा हुआ बड़े वेगसे द्रोणाचार्यकी सेनाकी ओर दौड़ा गया। उस समय वह कौरव-सेनाको विषादमें डाल रहा था ॥ २३-२४ ॥

तमायान्तमभिप्रेक्ष्य कुरवः पर्यवारयन् ।
दुःशासनं महाराज किमयं वक्ष्यतीति च ॥ २५ ॥
महाराज! दुःशासनको आते देख समस्त कौरव-सैनिक उसे चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये कि देखें, यह क्या कहता है ॥ २५ ॥

ततो द्रोणाय निहतं भीष्ममाचष्ट कौरवः ।
द्रोणस्तत्राप्रियं श्रुत्वा मुमोह भरतर्षभ ॥ २६ ॥
भरतश्रेष्ठ! दुःशासनने द्रोणाचार्यसे भीष्मके मारे जानेका समाचार बताया। वह अप्रिय बात सुनते ही द्रोणाचार्य मूर्च्छित हो गये ॥ २६ ॥

स संज्ञामुपलब्ध्याशु भारद्वाजः प्रतापवान् ।
निवारयामास तदा स्वान्यनीकानि मारिष ॥ २७ ॥
आर्य! सचेत होनेपर प्रतापी द्रोणाचार्यने शीघ्र ही अपनी सेनाओंको युद्धसे रोक दिया ॥ २७ ॥

विनिवृत्तान् कुरून् दृष्ट्वा पाण्डवाऽपि स्वसैनिकान् ।
दूतैः शीघ्राश्वसंयुक्तैः समन्तात् पर्यवारयन् ॥ २८ ॥
कौरवोंको युद्धसे लौटते देख पाण्डवोंने भी शीघ्रगामी अश्वोंपर चढ़े हुए दूतोंद्वारा सब ओर आदेश भेजकर अपने सैनिकोंका भी युद्ध बंद करा दिया ॥ २८ ॥

निवृत्तेषु च सैन्येषु पारम्पर्येण सर्वशः ।
निर्मुक्तकवचाः सर्वे भीष्ममीयुर्नराधिपाः ॥ २९ ॥
बारी-बारीसे सब सेनाओंके युद्धसे निवृत्त हो जाने-पर सब राजा कवच खोलकर भीष्मके पास आये ॥ २९ ॥

व्युपरम्य ततो युद्धाद् योधाः शतसहस्रशः ।
उपतस्थुर्महात्मानं प्रजापतिमिवामराः ॥ ३० ॥