महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
सुनीतैरिह सर्वार्थैर्देवमप्यनुलोम्यते ।
ते वयं प्रवरं नृणां सर्वैर्गुणगणैर्युतम् ॥ १५ ॥
कर्णमेवाभिषेक्ष्यामः सैनापत्येन भारत ।
कर्णं सेनापतिं कृत्वा प्रमथिष्यामहे रिपून् ॥ १६ ॥
‘यदि सारे कार्य उत्तम नीतिके अनुसार किये जायँ तो उनके द्वारा दैवको भी अनुकूल किया जा सकता है; अतः भारत! हमलोग सर्वगुणसम्पन्न नरश्रेष्ठ कर्णका ही सेनापतिके पदपर अभिषेक करेंगे और इन्हें सेनापति बनाकर हमलोग शत्रुओंको मथ डालेंगे ॥ १५-१६ ॥
एष ह्यतिबलः शूरः कृतास्त्रो युद्धदुर्मदः ।
वैवस्वत इवासह्यः शक्तो जेतुं रणे रिपून् ॥ १७ ॥
‘ये अत्यन्त बलवान्, शूरवीर, अस्त्रोंके ज्ञाता, रणदुर्मद और सूर्यपुत्र यमराजके समान शत्रुओंके लिये असह्य हैं। इसलिये ये रणभूमिमें हमारे विपक्षियोंपर विजय पा सकते हैं' ॥ १७ ॥
एतदाचार्यतनयाच्छ्रुत्वा राजंस्तवात्मजः ।
आशां बहुमतीं चक्रे कर्णं प्रति स वै तदा ॥ १८ ॥
राजन्! उस समय आचार्यपुत्र अश्वत्थामाके मुखसे यह बात सुनकर आपके पुत्र दुर्योधनने कर्णके प्रति विशेष आशा बाँध ली ॥ १८ ॥
हते भीष्मे च द्रोणे च कर्णो जेष्यति पाण्डवान् ।
तामाशां हृदये कृत्वा समाश्वस्य च भारत ॥ १९ ॥
ततो दुर्योधनः प्रीतः प्रियं श्रुत्वास्य तद् वचः ।
प्रीतिसत्कारसंयुक्तं तथ्यमात्महितं शुभम् ॥ २० ॥
स्वं मनः समवस्थाप्य बाहुवीर्यमुपाश्रितः ।
दुर्योधनो महाराज राधेयमिदमब्रवीत् ॥ २१ ॥
भरतनन्दन! भीष्म और द्रोणाचार्यके मारे जानेपर कर्ण पाण्डवोंको जीत लेगा, इस आशाको हृदयमें रखकर दुर्योधनको बड़ी सान्त्वना मिली। महाराज! वह अश्वत्थामाके उस प्रिय वचनको सुनकर बड़ा प्रसन्न हुआ। तत्पश्चात् अपने बाहुबलका आश्रय ले मनको सुस्थिर करके दुर्योधनने राधापुत्र कर्णसे बड़े प्रेम और सत्कारके साथ अपने लिये हितकर यथार्थ और मंगलकारक वचन इस प्रकार कहा— ॥ १९—२१ ॥
कर्ण जानामि ते वीर्यं सौहृदं परमं मयि ।
तथापि त्वां महाबाहो प्रवक्ष्यामि हितं वचः ॥ २२ ॥
‘कर्ण! मैं तुम्हारे पराक्रमको जानता हूँ और यह भी अनुभव करता हूँ कि मेरे प्रति तुम्हारा स्नेह बहुत अधिक है। महाबाहो! तथापि मैं तुमसे अपने हितकी बात कहना चाहता हूँ ॥ २२ ॥
श्रुत्वा यथेष्टं च कुरु वीर यत् तव रोचते । भवान् प्राज्ञतमो नित्यं मम चैव परा गतिः ॥ २३ ॥ ‘वीर! मेरी यह बात सुनकर तुम अपनी इच्छाके अनुसार जो तुम्हें अच्छा लगे, वह करो। तुम बहुत बड़े बुद्धिमान् तो हो ही, सदाके लिये मेरे सबसे बड़े सहारे भी हो ॥ २३ ॥
भीष्मद्रोणावतिरथौ हतौ सेनापती मम । सेनापतिर्भवानस्तु ताभ्यां द्रविणवत्तरः ॥ २४ ॥ ‘मेरे दो सेनापति पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण, जो अतिरथी वीर थे, युद्धमें मारे गये। अब तुम मेरे सेनानायक बनो; क्योंकि तुम उन दोनोंसे भी अधिक शक्तिशाली हो ॥ २४ ॥
वृद्धौ च तौ महेष्वासौ सापेक्षौ च धनंजये । मानितौ च मया वीरौ राधेय वचनात् तव ॥ २५ ॥ ‘वे दोनों महाधनुर्धर होते हुए भी बूढ़े थे और अर्जुनके प्रति उनके मनमें पक्षपात था। राधानन्दन! मैंने तुम्हारे कहनेसे ही उन दोनों वीरोंको सेनापति बनाकर सम्मानित किया था ॥ २५ ॥
पितामहत्वं सम्प्रेक्ष्य पाण्डुपुत्रा महारणे । रक्षितास्तात भीष्मेण दिवसानि दशैव तु ॥ २६ ॥ ‘तात! भीष्मने पितामहके नातेकी ओर दृष्टिपात करके उस महासमरमें दस दिनोंतक पाण्डवोंकी रक्षा की है ॥ २६ ॥
न्यस्तशस्त्रे च भवति हतो भीष्मः पितामहः । शिखण्डिनं पुरस्कृत्य फाल्गुनेन महाहवे ॥ २७ ॥ ‘उन दिनों तुमने हथियार रख दिया था; इसलिये महासमरमें अर्जुनने शिखण्डीको आगे करके पितामह भीष्मको मार डाला था ॥ २७ ॥
हते तस्मिन् महेष्वासे शरतल्पगते तथा । त्वयोक्ते पुरुषव्याघ्र द्रोणो ह्वासीत् पुरःसरः ॥ २८ ॥ ‘पुरुषसिंह! उन महाधनुर्धर भीष्मके घायल होकर बाण-शय्यापर सो जानेके बाद तुम्हारे कहनेसे ही द्रोणाचार्य हमारी सेनाके अगुआ बनाये गये थे ॥ २८ ॥
तेनापि रक्षिताः पार्थाः शिष्यत्वादिति मे मतिः । स चापि निहतो वृद्धो धृष्टद्युम्नेन सत्वरम् ॥ २९ ॥ ‘मेरा विश्वास है कि उन्होंने भी अपना शिष्य समझकर कुन्तीके पुत्रोंकी रक्षा की है। वे बूढ़े आचार्य भी शीघ्र ही धृष्टद्युम्नके हाथसे मारे गये ॥ २९ ॥
निहताभ्यां प्रधानाभ्यां ताभ्याममितविक्रम । त्वत्समं समरे योधं नान्यं पश्यामि चिन्तयन् ॥ ३० ॥
‘अमितपराक्रमी वीर! उन प्रधान सेनापतियोंके मारे जानेके पश्चात् मैं बहुत सोचनेपर भी समरांगणमें तुम्हारे समान दूसरे किसी योद्धाको नहीं देखता ।। ३० ।।
भवानेव तु नः शक्तो विजयाय न संशयः ।
पूर्वं मध्ये च पश्चाच्च तथैव विहितं हितम् ।। ३१ ।।
‘हमलोगोंमेंसे तुम्हीं शत्रुओंपर विजय पानेमें समर्थ हो, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। तुमने पहले, बीचमें और पीछे भी हमारा हित ही किया है ।। ३१ ।।
स भवान् धुर्यवत् संख्ये धुरमुद्वोढुमर्हति ।
अभिषेचय सैनान्ये स्वयमात्मानमात्मना ।। ३२ ।।
‘तुम धुरन्धर पुरुषकी भाँति युद्धस्थलमें सेना-संचालनका भार वहन करनेके योग्य हो; इसलिये स्वयं ही अपने-आपको सेनापतिके पदपर अभिषिक्त कराओ ।। ३२ ।।
देवतानां यथा स्कन्दः सेनानीः प्रभुरव्ययः ।
तथा भवानिमां सेनां धार्तराष्ट्रीं बिभर्तु वै ।। ३३ ।।
‘जैसे अविनाशी भगवान् स्कन्द देवताओंकी सेनाका संचालन करते हैं, उसी प्रकार तुम भी धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेनाको अपनी अध्यक्षतामें ले लो ।। ३३ ।।
जहि शत्रुगणान् सर्वान् महेन्द्रो दानवानिव ।
अवस्थितं रणे दृष्ट्वा पाण्डवास्त्वां महारथाः ।। ३४ ।।
द्रविष्यन्ति च पाञ्चाला विष्णुं दृष्ट्वेव दानवाः ।
तस्मात् त्वं पुरुषव्याघ्र प्रकर्षैतां महाचमूम् ।। ३५ ।।
‘जैसे देवराज इन्द्रने दानवोंका संहार किया था, उसी प्रकार तुम भी समस्त शत्रुओंका वध करो। जैसे दानव भगवान् विष्णुको देखते ही भाग जाते हैं, उसी प्रकार पाण्डव तथा पांचाल महारथी तुम्हें रणभूमिमें सेनापतिके रूपमें उपस्थित देखकर भाग खड़े होंगे; अतः पुरुषसिंह! तुम इस विशाल सेनाका संचालन करो ।। ३४-३५ ।।
भवत्यवस्थिते यत्ते पाण्डवा मन्दचेतसः ।
द्रविष्यन्ति सहामात्याः पाञ्चालाः सृंजयाश्च ह ।। ३६ ।।
‘तुम्हारे सावधानीके साथ खड़े होते ही मूर्ख पाण्डव, पांचाल और सृंजय अपने मन्त्रियोंसहित भाग जायँगे ।। ३६ ।।
यथा ह्यभ्युदितः सूर्यः प्रतपन् स्वेन तेजसा ।
व्यपोहति तमस्तीव्रं तथा शत्रून् प्रतापय ।। ३७ ।।
‘जैसे उदित हुआ सूर्य अपने तेजसे तपकर घोर अन्धकारको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार तुम भी शत्रुओंको संतप्त एवं नष्ट करो’ ।। ३७ ।।
संजय उवाच
आशा बलवती राजन् पुत्रस्य तव याभवत् ।
हते भीष्मे च द्रोणे च कर्णो जेष्यति पाण्डवान् ।। ३८ ।। तामाशां हृदये कृत्वा कर्णमेवं तदाब्रवीत् । सूतपुत्र न ते पार्थः स्थित्वाग्रे संयुयुत्सति ।। ३९ ।। **संजय कहते हैं—**राजन्! आपके पुत्रके मनमें जो यह प्रबल आशा हो गयी थी कि भीष्म और द्रोणके मारे जानेपर कर्ण पाण्डवोंको जीत लेगा, वही आशा मनमें लेकर उस समय उसने कर्णसे इस प्रकार कहा—‘सूतपुत्र! अर्जुन तुम्हारे सामने खड़े होकर कभी युद्ध करना नहीं चाहते हैं’ ।। ३८-३९ ।।
कर्ण उवाच
उक्तमेतन्मया पूर्वं गान्धारे तव संनिधौ । जेष्यामि पाण्डवान् सर्वान् सपुत्रान् सजनार्दनान् ।। ४० ।। **कर्णने कहा—**गान्धारीनन्दन! मैंने तुम्हारे समीप पहले ही यह बात कह दी है कि मैं पाण्डवोंको, उनके पुत्रों और श्रीकृष्णके साथ ही परास्त कर दूँगा ।। ४० ।। सेनापतिर्भविष्यामि तवाहं नात्र संशयः । स्थिरो भव महाराज जितान् विद्धि च पाण्डवान् ।। ४१ ।। महाराज! तुम धैर्य धारण करो। मैं तुम्हारा सेनापति बनूँगा, इसमें कोई संदेह नहीं है। अब पाण्डवोंको पराजित हुआ ही समझो ।। ४१ ।।
संजय उवाच
एवमुक्तो महाराज ततो दुर्योधनो नृपः । उत्तस्थौ राजभिः सार्धं देवैरिव शतक्रतुः ।। ४२ ।। **संजय कहते हैं—**महाराज! कर्णके ऐसा कहनेपर राजा दुर्योधन अन्य सामन्त नरेशोंके साथ उसी प्रकार उठकर खड़ा हो गया, जैसे देवताओंके साथ इन्द्र खड़े होते हैं ।। ४२ ।। सैनापत्येन सत्कर्तुं कर्णं स्कन्दमिवामराः । ततोऽभिषिषिचुः कर्णं विधिदृष्टेन कर्मणा ।। ४३ ।। दुर्योधनमुखा राजन् राजानो विजयैषिणः । जैसे देवताओंने स्कन्दको सेनापति बनाकर उनका सत्कार किया था, उसी प्रकार समस्त कौरव कर्णको सेनापति बनाकर उसका सत्कार करनेके लिये उद्यत हुए। राजन्! विजयाभिलाषी दुर्योधन आदि राजाओंने शास्त्रोक्त विधिके द्वारा कर्णका अभिषेक किया ।। ४३ १/२ ।।
शातकुम्भमयैः कुम्भैर्माद्तिकैश्चाभिमन्त्रितैः ॥ ४४ ॥
तोयपूर्णविषाणैश्च द्विपखड्गमहर्षभैः ।
मणिमुक्तायुतैश्चान्यैः पुण्यगन्धैस्तथौषधैः ॥ ४५ ॥
औदुम्बरे सुखासीनमासने क्षौमसंवृते ।
शास्त्रदृष्टेन विधिना सम्भारैश्च सुसम्भृतैः ॥ ४६ ॥
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्यास्तथा शूद्राश्च सम्मताः ।
तुष्टुवुस्तं महात्मानमभिषिक्तं वरासने ॥ ४७ ॥
अभिषेकके लिये सोने तथा मिट्टीके घड़ोंमें अभिमन्त्रित जल रखे गये थे। हाथीके दाँत तथा गैंडे और बैलके सींगोंके बने हुए पात्रोंमें भी पृथक्-पृथक् जल रखा गया था। उन पात्रोंमें मणि और मोती भी थे। अन्यान्य पवित्र गन्धशाली पदार्थ और औषध भी डाले गये थे। कर्ण गूलरकाठकी बनी हुई चौकीपर, जिसके ऊपर रेशमी कपड़ा बिछा हुआ था, सुखपूर्वक बैठा था। उस अवस्थामें शास्त्रीय विधिके अनुसार पूर्वोक्त सुसंचित सामग्रियोंद्वारा ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा सम्मानित शूद्रोंने उसका अभिषेक किया और अभिषेक हो जानेपर श्रेष्ठ आसनपर बैठे हुए महामना कर्णकी उन सब लोगोंने स्तुति की ।। ४४—४७ ।।
ततोऽभिषिक्ते राजेन्द्र निष्कैर्गोभिर्धनेन च ।
वाचयामास विप्राग्र्यान् राधेयः परवीरहा ॥ ४८ ॥
राजेन्द्र! इस प्रकार अभिषेक-कार्य सम्पन्न हो जानेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले राधापुत्र कर्णने स्वर्णमुद्राएँ, गौएँ तथा धन देकर श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराया ।।
(स व्यरोचत राधेयः सूतमागधवन्दिभिः ।
स्तूयमानो यथा भानुरुदये ब्रह्मवादिभिः ।।
उस समय सूत, मागध और वन्दीजनोंद्वारा की हुई अपनी स्तुति सुनता हुआ राधापुत्र कर्ण वेदवादी ब्राह्मणोंद्वारा अभिमन्त्रित उदयकालीन सूर्यके समान सुशोभित हो रहा था।
ततः पुण्याहघोषेण वादित्रनिनदेन च।
जयशब्देन शूराणां तुमुलः सर्वतोऽभवत् ॥
जयेत्यूचुर्नृपाः सर्वे राधेयं तत्र संगताः ॥)
तत्पश्चात् पुण्याहवाचनके शब्दसे, वाद्योंकी गंभीर ध्वनिसे तथा शूरवीरोंके जय-जयकारसे मिली-जुली हुई भयंकर आवाज वहाँ सब ओर गूँज उठी। उस स्थानपर एकत्र हुए सभी राजाओंने 'राधापुत्र कर्णकी जय' के नारे लगाये।
जय पार्थान् सगोविन्दान् सानुगांस्तान् महामृधे ।
इति तं वन्दिनः प्राहुर्द्विजाश्च पुरुषर्षभम् ॥ ४९ ॥
जहि पार्थान् सपाञ्चालान् राधेय विजयाय नः ।
उद्यन्निव सदा भानुस्तमांम्युग्रैर्गभस्तिभिः ॥ ५० ॥
वन्दीजनों तथा ब्राह्मणोंने उस समय पुरुषशिरोमणि कर्णको आशीर्वाद देते हुए कहा—'राधापुत्र! तुम कुन्तीके पुत्रोंको, उनके सेवकों तथा श्रीकृष्णके साथ महासमरमें जीत लो और हमारी विजयके लिये कुन्तीकुमारोंको पांचालोंसहित मार डालो। ठीक उसी तरह, जैसे सूर्य अपनी उग्र किरणोंद्वारा सदा उदय होते ही अन्धकारका विनाश कर देता है ॥ ४९-५० ॥
न ह्यलं त्वद्विसृष्टानां शराणां वै सकेशवाः ।
उलूकाः सूर्यरश्मीनां ज्वलतामिव दर्शने ॥ ५१ ॥
'जैसे उल्लू सूर्यकी प्रज्वलित किरणोंकी ओर देखनेमें असमर्थ होते हैं, उसी प्रकार तुम्हारे छोड़े हुए बाणोंकी ओर श्रीकृष्णसहित समस्त पाण्डव नहीं देख सकते ॥ ५१ ॥
न हि पार्थाः सपाञ्चालाः स्थातुं शक्तास्तवाग्रतः ।
आत्तशस्त्रस्य समरे महेन्द्रस्येव दानवाः ॥ ५२ ॥
'जैसे हाथमें वज्र लिये हुए इन्द्रके सामने दानव नहीं खड़े हो सकते, उसी प्रकार समरांगणमें तुम्हारे सामने पांचाल और पाण्डव नहीं ठहर सकते हैं' ॥ ५२ ॥
अभषिक्तस्तु राधेयः प्रभया सोऽमितप्रभः ।
अत्यरिच्यत रूपेण दिवाकर इवापरः ॥ ५३ ॥
राजन्! इस प्रकार अभिषेक सम्पन्न हो जानेपर अमिततेजस्वी राधापुत्र कर्ण अपनी प्रभा तथा रूपसे दूसरे सूर्यके समान अधिक प्रकाशित होने लगा ॥ ५३ ॥
सैनापत्ये तु राधेयमभिषिच्य सुतस्तव ।
अमन्यत तदाऽऽत्मानं कृतार्थं कालचोदितः ॥ ५४ ॥
कालसे प्रेरित हुआ आपका पुत्र दुर्योधन राधाकुमार कर्णको सेनापतिके पदपर अभिषिक्त करके अपने-आपको कृतकृत्य मानने लगा ॥ ५४ ॥
कर्णोऽपि राजन् सम्प्राप्य सैनापत्यमरिंदमः ।
योगमाज्ञापयामास सूर्यस्योदयनं प्रति ॥ ५५ ॥
राजन्! शत्रुदमन कर्णने भी सेनापतिका पद प्राप्त करके सूर्योदयके समय सेनाको युद्धके लिये तैयार होनेकी आज्ञा दे दी ॥ ५५ ॥
तव पुत्रैर्वृतः कर्णः शुशुभे तत्र भारत ।
देवैरिव यथा स्कन्दः संग्रामे तारकामये ॥ ५६ ॥
भारत! वहाँ आपके पुत्रोंसे घिरा हुआ कर्ण तारकामय संग्राममें देवताओंसे घिरे हुए स्कन्दके समान सुशोभित हो रहा था ॥ ५६ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णाभिषेके दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्णका अभिषेकविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १० ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ५८ १/२ श्लोक हैं।)
अध्याय (पृष्ठ 1648)
एकादशोऽध्यायः
कर्णके सेनापतित्वमें कौरव-सेनाका युद्धके लिये प्रस्थान और मकरव्यूहका निर्माण तथा पाण्डव-सेनाके अर्धचन्द्राकार व्यूहकी रचना और युद्धका आरम्भ
धृतराष्ट्र उवाच
सेनापत्यं तु सम्प्राप्य कर्णो वैकर्तनस्तदा ।
तथोक्तश्च स्वयं राज्ञा स्निग्धं भ्रातृसमं वचः ॥ १ ॥
योगमाज्ञाप्य सेनानामादित्येऽभ्युदिते तदा ।
अकरोत् किं महाप्राज्ञस्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ २ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! सेनापतिका पद पाकर जब परम बुद्धिमान् वैकर्तन कर्ण युद्धके लिये तैयार हुआ और जब स्वयं राजा दुर्योधनने उससे भाईके समान स्नेहपूर्ण वचन कहा, उस समय सूर्योदयकालमें सेनाको युद्धके लिये तैयार होनेकी आज्ञा देकर उसने क्या किया? यह मुझे बताओ ॥ १-२ ॥
संजय उवाच
कर्णस्य मतमाज्ञाय पुत्रास्ते भरतर्षभ ।
योगमाज्ञापयामासुर्नन्दितूर्यपुरःसरम् ॥ ३ ॥
**संजयने कहा—**भरतश्रेष्ठ! कर्णका मत जानकर आपके पुत्रोंने आनन्दमय वाद्योंके साथ सेनाको तैयार होनेका आदेश दिया ॥ ३ ॥
महत्यपररात्रे च तव सैन्यस्य मारिष ।
योगो योगेति सहसा प्रादुरासीन्महास्वनः ॥ ४ ॥
माननीय नरेश! अत्यन्त प्रातःकालसे ही आपकी सेनामें सहसा 'तैयार हो जाओ, तैयार हो जाओ' का शब्द गूँज उठा ॥ ४ ॥
कल्प्यतां नागमुख्यानां रथानां च वरूथिनाम् ।
संनह्यतां नराणां च वाजिनां च विशाम्पते ॥ ५ ॥
क्रोशतां चैव योधानां त्वरितानां परस्परम् ।
बभूव तुमुलः शब्दो दिवस्पृक् सुमहांस्ततः ॥ ६ ॥
प्रजानाथ! सजाये जाते हुए बड़े-बड़े गजराजों, आवरणयुक्त रथों, कवच धारण करते हुए मनुष्यों, कसे जाते हुए घोड़ों तथा उतावलीपूर्वक एक-दूसरेको पुकारते हुए योद्धाओंका महान् तुमुल-नाद आकाशमें बहुत ऊँचेतक गूँज रहा था ॥ ५-६ ॥
ततः श्वेतपताकेन बलाकावर्णवाजिना ।
हेमपृष्ठेन धनुषा नागकक्ष्येण केतुना ।। ७ ।। तूणीरशतपूर्णेन सगदेन वरूथिना । शतघ्नीकिंकिणीशक्तिशूलतोमरधारिणा ।। ८ ।। कार्मुकैरुपपन्नेन विमलादित्यवर्चसा । रथेनाभिपताकेन सूतपुत्रोऽभ्यदृश्यत ।। ९ ।। तदनन्तर सूतपुत्र कर्ण निर्मल सूर्यके समान तेजस्वी और सब ओरसे पताकाओंद्वारा सुशोभित रथके द्वारा रणयात्राके लिये उद्यत दिखायी दिया। उस रथमें श्वेत पताका फहरा रही थी। बगुलोंके समान सफेद रंगके घोड़े जुते हुए थे। उसपर एक ऐसा धनुष रखा हुआ था, जिसके पृष्ठभागपर सोना मढ़ा गया था। उस रथकी पताकापर हाथीके रस्सेका चिह्न बना हुआ था। उसमें गदाके साथ ही सैकड़ों तरकस रखे गये थे। रथकी रक्षाके लिये ऊपरसे आवरण लगाया गया था। उसमें शतघ्नी, किंकिणी, शक्ति, शूल और तोमर संचित करके रखे गये थे तथा वह रथ अनेक धनुषोंसे सम्पन्न था ।। ७—९ ।।
ध्मापयन् वारिजं राजन् हेमजालविभूषितम् । विधुन्वानो महच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् ।। १० ।। राजन्! कर्ण सोनेकी जालियोंसे विभूषित शंखको बजाता हुआ अपने सुवर्णसज्जित विशाल धनुषकी टंकार कर रहा था ।। १० ।।
दृष्ट्वा कर्णं महेष्वासं रथस्थं रथिनां वरम् । भानुमन्तमिवोद्यन्तं तमो घ्नन्तं दुरासदम् ।। ११ ।। न भीष्मव्यसनं केचिन्नापि द्रोणस्य मारिष । नान्येषां पुरुषव्याघ्र मेनिरे तत्र कौरवाः ।। १२ ।। पुरुषसिंह! माननीय नरेश! रथियोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर दुर्जय वीर कर्ण रथपर बैठकर उदयकालीन सूर्यके समान तम (दुःख या अन्धकार)-का निवारण कर रहा था। उसे देखकर कोई भी कौरव भीष्म, द्रोण तथा दूसरे महारथियोंके मारे जानेके दुःखको कुछ नहीं समझते थे ।। ११-१२ ।।
ततस्तु त्वरयन् योधान् शङ्खशब्देन मारिष । कर्णो निष्कर्षयामास कौरवाणां महद् बलम् ।। १३ ।। मान्यवर! तदनन्तर शंखध्वनिके द्वारा योद्धाओंको जल्दी करनेका आदेश देते हुए कर्णने कौरवोंकी विशाल वाहिनीको शिविरोंसे बाहर निकाला ।। १३ ।।
व्यूहं व्यूह्य महेष्वासो मकरं शत्रुतापनः । प्रत्युद्ययौ तथा कर्णः पाण्डवान् विजिगीषया ।। १४ ।। तत्पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाला महाधनुर्धर कर्ण पाण्डवोंको जीत लेनेकी इच्छासे अपनी सेनाका मकर-व्यूह बनाकर आगे बढ़ा ।। १४ ।।
मकरस्य तु तुण्डे वै कर्णो राजन् व्यवस्थितः ।
नेत्राभ्यां शकुनिः शूर उलूकश्च महारथः ॥ १५ ॥
राजन्! उस मकर-व्यूहके मुखभागमें स्वयं कर्ण खड़ा हुआ, नेत्रोंके स्थानमें शूरवीर शकुनि तथा महारथी उलूक खड़े किये गये ॥ १५ ॥
द्रोणपुत्रस्तु शिरसि ग्रीवायां सर्वसोदराः ।
मध्ये दुर्योधनो राजा बलेन महता वृतः ॥ १६ ॥
शीर्षस्थानमें द्रोणकुमार अश्वत्थामा और ग्रीवा-भागमें दुर्योधनके समस्त भाई स्थित हुए। मध्यस्थान (कटिप्रदेश)-में विशाल सेनासे घिरा हुआ राजा दुर्योधन खड़ा हुआ ॥ १६ ॥
वामपादे तु राजेन्द्र कृतवर्मा व्यवस्थितः ।
नारायणबलैर्युक्तो गोपालैर्युद्धदुर्मदैः ॥ १७ ॥
राजेन्द्र! उस मकरव्यूहके बायें पैरकी जगह नारायणी-सेनाके रणदुर्मद गोपालोंके साथ कृतवर्मा खड़ा किया गया था ॥ १७ ॥
पादे तु दक्षिणे राजन् गौतमः सत्यविक्रमः ।
त्रिगर्तैः सुमहेश्वासैर्दाक्षिणात्यैश्च संवृतः ॥ १८ ॥
राजन्! व्यूहके दाहिने पैरके स्थानमें महाधनुर्धर त्रिगर्तों और दाक्षिणात्योंसे घिरे हुए सत्यपराक्रमी कृपाचार्य खड़े थे ॥ १८ ॥
अनुपादे तु यो वामस्तत्र शल्यो व्यवस्थितः ।
महत्या सेनया सार्धं मद्रदेशसमुत्थया ॥ १९ ॥
बायें पैरके पिछले भागमें मद्रदेशकी विशाल सेनाके साथ स्वयं राजा शल्य उपस्थित थे ॥ १९ ॥
दक्षिणे तु महाराज सुषेणः सत्यसंगरः ।
वृतो रथसहस्रेण दन्तिनां च त्रिभिः शतैः ॥ २० ॥
महाराज! दाहिने पैरके पिछले भागमें एक सहस्र रथियों और तीन सौ हाथियोंसे घिरे हुए सत्यप्रतिज्ञ सुषेण खड़े किये गये ॥ २० ॥
पुच्छे ह्यास्तां महावीर्यौ भ्रातरौ पार्थिवौ तदा ।
चित्रश्च चित्रसेनश्च महत्या सेनया वृतौ ॥ २१ ॥
व्यूहके पुच्छभागमें महापराक्रमी दोनों भाई राजा चित्र और चित्रसेन अपनी विशाल सेनाके साथ उपस्थित हुए ॥ २१ ॥
तथा प्रयाते राजेन्द्र कर्णे नरवरोत्तमे ।
धनंजयमभिप्रेक्ष्य धर्मराजोऽब्रवीदिदम् ॥ २२ ॥
राजेन्द्र! मनुष्योंमें श्रेष्ठ कर्णके इस प्रकार यात्रा करनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने अर्जुनकी ओर देखकर इस प्रकार कहा— ॥ २२ ॥
पश्य पार्थ यथा सेना धार्तराष्ट्रीह संयुगे ।
कर्णेन विहिता वीर गुप्ता वीरैर्महारथैः ॥ २३ ॥
‘वीर पार्थ! देखो, इस समय युद्धस्थलमें धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेना कैसी स्थितिमें है? कर्णने वीर महारथियोंद्वारा इसे किस प्रकार सुरक्षित कर दिया है? ॥ २३ ॥
हतवीरतमा ह्येषा धार्तराष्ट्री महाचमूः ।
फल्गुशेषा महाबाहो तृणैस्तुल्या मता मम ॥ २४ ॥
‘महाबाहो! कौरवोंकी इस विशाल सेनाके प्रमुख वीर तो मारे जा चुके हैं। अब इसके तुच्छ सैनिक ही शेष रह गये हैं। इस समय तो यह मुझे तिनकोंके समान जान पड़ती है ॥ २४ ॥
एको ह्यत्र महेष्वासः सूतपुत्रो विराजते ।
सदेवासुरगन्धर्वैः सकिन्नरमहोरगैः ॥ २५ ॥
चराचरैस्त्रिभिर्लोकैर्योऽजय्यो रथिनां वरः ।
तं हत्वाद्य महाबाहो विजयस्तव फाल्गुन ॥ २६ ॥
उद्धृतश्च भवेच्छल्यो मम द्वादशवार्षिकः ।
एवं ज्ञात्वा महाबाहो व्यूहं व्यूह यथेच्छसि ॥ २७ ॥
‘इस सेनामें एकमात्र महाधनुर्धर सूतपुत्र कर्ण विराजमान है, जो रथियोंमें श्रेष्ठ है तथा जिसे देवता, असुर, गन्धर्व, किन्नर, बड़े-बड़े नाग एवं चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंके लोग मिलकर भी नहीं जीत सकते। महाबाहु फाल्गुन! आज उसी कर्णको मारकर तुम्हारी विजय होगी और मेरे हृदयमें बारह वर्षोंसे जो सेल कसक रहा है, वह निकल जायगा। महाबाहो! ऐसा जानकर तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वैसे व्यूहकी रचना करो' ॥ २५—२७ ॥
भ्रातुरेत्तद् वचः श्रुत्वा पाण्डवः श्वेतवाहनः ।
अर्धचन्द्रेण व्यूहेन प्रत्यव्यूहत तां चमूम् ॥ २८ ॥
भाईकी यह बात सुनकर श्वेतवाहन पाण्डुपुत्र अर्जुनने इस कौरव-सेनाके मुकाबलेमें अपनी सेनाके अर्द्धचन्द्राकार व्यूहकी रचना की ॥ २८ ॥
वामपार्श्वे तु तस्याथ भीमसेनो व्यवस्थितः ।
दक्षिणे च महेष्वासो धृष्टद्युम्नो व्यवस्थितः ॥ २९ ॥
मध्ये व्यूहस्य राजा तु पाण्डवश्च धनंजयः ।
नकुलः सहदेवश्च धर्मराजस्य पृष्ठतः ॥ ३० ॥
उस व्यूहके वाम पार्श्वमें भीमसेन और दाहिने पार्श्वमें महाधनुर्धर धृष्टद्युम्न खड़े हुए। उसके मध्यभागमें राजा युधिष्ठिर और पाण्डुपुत्र धनंजय खड़े थे। धर्मराजके पृष्ठभागमें नकुल और सहदेव थे ॥ २९-३० ॥
चक्ररक्षौ तु पाञ्चाल्यौ युधामन्यूत्तमौजसौ ।
नार्जुनं जहतुर्युद्धे पाल्यमानौ किरीटिना ॥ ३१ ॥
पांचाल महारथी युधामन्यु और उत्तमौजा अर्जुनके चक्ररक्षक थे। किरीटधारी अर्जुनसे सुरक्षित होकर उन दोनोंने युद्धमें कभी उनका साथ नहीं छोड़ा॥ ३१॥
शेषा नृपतयो वीराः स्थिता व्यूहस्य दंशिताः।
यथाभागं यथोत्साहं यथायत्नं च भारत॥ ३२॥
भारत! शेष वीर नरेश कवच धारण करके व्यूहके विभिन्न भागोंमें अपने उत्साह और प्रयत्नके अनुसार खड़े हुए थे॥ ३२॥
एवमेतन्महाव्यूहं व्यूह्य भारत पाण्डवाः।
तावकाश्च महेष्वासा युद्धायैव मनो दधुः॥ ३३॥
भरतनन्दन! इस प्रकार इस महाव्यूहकी रचना करके पाण्डवों तथा आपके महाधनुर्धरोंने युद्धमें ही मन लगाया॥ ३३॥
दृष्ट्वा व्यूढां तव चमूं सूतपुत्रेण संयुगे।
निहतान् पाण्डवान् मेने धार्तराष्ट्रः सबान्धवः॥ ३४॥
युद्धस्थलमें सूतपुत्र कर्णके द्वारा व्यूह-रचनापूर्वक खड़ी की गयी आपकी सेनाको देखकर भाइयोंसहित दुर्योधनने यह मान लिया कि 'अब तो पाण्डव मारे गये'॥
तथैव पाण्डवीं सेनां व्यूढां दृष्ट्वा युधिष्ठिरः।
धार्तराष्ट्रान् हतान् मेने सकर्णान् वै जनाधिपः॥ ३५॥
उसी प्रकार पाण्डव-सेनाका व्यूह देखकर राजा युधिष्ठिरने भी कर्णसहित आपके सभी पुत्रोंको मारा गया ही समझ लिया॥ ३५॥
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकदुन्दुभिः।
डिण्डिमाश्चाप्यहन्यन्त झर्झराश्च समन्ततः॥ ३६॥
सेनयोरुभयो राजन् प्रावाद्यन्त महास्वनाः।
सिंहनादश्च संजज्ञे शूराणां जयगृद्धिनाम्॥ ३७॥
राजन्! तदनन्तर दोनों सेनाओंमें चारों ओर महान् शब्द करनेवाले शंख, भेरी, पणव, आनक, दुन्दुभि और झाँझ आदि बाजे बज उठे। नगाड़े पीटे जाने लगे। साथ ही विजयकी अभिलाषा रखनेवाले शूरवीरोंका सिंहनाद भी होने लगा॥ ३६-३७॥
हयहेषितशब्दाश्च वारणानां च बृंहताम्।
रथनेमिस्वनाश्चोग्राः सम्बभूवुर्जनाधिप॥ ३८॥
जनेश्वर! घोड़ोंके हींसने, हाथियोंके चिग्घाड़ने तथा रथके पहियोंके घरघरानेके भयंकर शब्द प्रकट होने लगे॥ ३८॥
न द्रोणव्यसनं कश्चिज्जानीते तत्र भारत।
दृष्ट्वा कर्णं महेष्वासं मुखे व्यूहस्य दंशितम्॥ ३९॥
भारत! व्यूहके मुख्य द्वारपर कवच धारण किये महाधनुर्धर कर्णको खड़ा देख कोई भी सैनिक द्रोणाचार्यके मारे जानेके दुःखका अनुभव न कर सका॥
उभे सैन्ये महाराज प्रहृष्टनरसंकुले । योद्धुकामे स्थिते राजन् हन्तुमन्योन्यमोजसा ॥ ४० ॥ महाराज! वे दोनों सेनाएँ हर्षोत्फुल्ल मनुष्योंसे भरी थीं। राजन्! वे बलपूर्वक परस्पर चोट करने और जूझनेकी इच्छासे मैदानमें आकर खड़ी हो गयीं ॥ ४० ॥
तत्र यत्तौ सुसंरब्धौ दृष्ट्वान्योऽन्यं व्यवस्थितौ । अनीकमध्ये राजेन्द्र चेरतुः कर्णपाण्डवौ ॥ ४१ ॥ राजेन्द्र! वहाँ रोषमें भरकर सावधानीके साथ खड़े हुए कर्ण और पाण्डव अपनी-अपनी सेनामें विचरने लगे ॥ ४१ ॥
नृत्यमाने च ते सेने समेयातां परस्परम् । तयोः पक्षप्रपक्षेभ्यो निर्जग्मुस्ते युयुत्सवः ॥ ४२ ॥ वे दोनों सेनाएँ परस्पर नृत्य करती हुई-सी भिड़ गयीं। युद्धकी अभिलाषा रखनेवाले वीर उन दोनों व्यूहोंके पक्ष और प्रपक्षसे निकलने लगे ॥ ४२ ॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं नरवारणवाजिनाम् । रथानां च महाराज अन्योन्यमभिनिघ्नताम् ॥ ४३ ॥ महाराज! तदनन्तर एक-दूसरेपर आघात करनेवाले मनुष्य, हाथी, घोड़ों और रथोंका वह महान् युद्ध आरम्भ हो गया ॥ ४३ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि व्यूहनिर्माणे एकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें व्यूहनिर्माणविषयक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
अध्याय (पृष्ठ 1654)
द्वादशोऽध्यायः
दोनों सेनाओंका घोर युद्ध और भीमसेनके द्वारा क्षेमधूर्तिका वध
संजय उवाच
ते सेनेऽन्योन्यमासाद्य प्रहृष्टाश्वनरद्विपे ।
बृहत्यौ सम्प्रजहाते देवासुरसमप्रभे ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! उन दोनों सेनाओंके हाथी, घोड़े और मनुष्य बहुत प्रसन्न थे। देवताओं तथा असुरोंके समान प्रकाशित होनेवाली वे दोनों विशाल सेनाएँ परस्पर भिड़कर अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करने लगीं ॥ १ ॥
ततो नररथाश्वेभाः पत्तयश्चोग्रविक्रमाः ।
सम्पहारान् भृशं चक्रुर्देहपाप्मासुनाशनान् ॥ २ ॥
तत्पश्चात् भयंकर पराक्रमी रथी, हाथीसवार, घुड़सवार और पैदल सैनिक शरीर, प्राण और पापोंका विनाश करनेवाले घोर प्रहार बड़े जोर-जोरसे करने लगे ॥ २ ॥
पूर्णचन्द्रार्कपद्मानां कान्तिभिर्गन्धतः समैः ।
उत्तमाङ्गैर्नृसिंहानां नृसिंहास्तस्तरूर्महीम् ॥ ३ ॥
मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी वीरोंने विपक्षी पुरुषसिंहोंके मस्तकोंको काट-काटकर उनके द्वारा धरतीको पाटने लगे। उनके वे मस्तक पूर्ण चन्द्रमा और सूर्यके समान कान्तिमान् तथा कमलोंके समान सुगन्धित थे ॥ ३ ॥
अर्धचन्द्रैस्तथा भल्लैः क्षुरप्रैरसिपट्टिशैः ।
परश्वधैश्चाप्यकृन्तन्नुत्तमाङ्गानि युध्यताम् ॥ ४ ॥
अर्द्धचन्द्र, भल्ल, क्षुरप्र, खड्ग, पट्टिश और फरसोंद्वारा वे योद्धाओंके मस्तक काटने लगे ॥ ४ ॥
व्यायतायतबाहूनां व्यायतायतबाहुभिः ।
बाहवः पातिता रेजुर्धरण्यां सायुधाङ्गदाः ॥ ५ ॥
हृष्ट-पुष्ट और लंबी भुजाओंवाले वीरोंने, हृष्ट-पुष्ट और लंबी बाँहोंवाले योद्धाओंकी बाँहें पृथ्वीपर काट गिरायौं। वे भुजाएँ आयुधों और अंगदोंसहित शोभा पा रही थीं ॥ ५ ॥
तैः स्फुरद्भिर्मही भाति रक्ताङ्गुलितलैस्तथा ।
गरुडप्रहितैरुग्रैः पञ्चास्यैरुरगैरिव ॥ ६ ॥
जिनके तलवे और अंगुलियाँ लाल रंगकी थीं, उन तड़पती हुई भुजाओंसे रणभूमिकी वैसी ही शोभा हो रही थी, मानो वहाँ गरुड़के गिराये हुए भयंकर पंचमुख सर्प छटपटा रहे
हों ॥ ६ ॥
द्विरदस्यन्दनाश्वेभ्यः पेतुर्वीरा द्विषद्धताः । विमानेभ्यो यथा क्षीणे पुण्ये स्वर्गसदस्तथा ॥ ७ ॥ शत्रुओंद्वारा मारे गये वीर हाथी, रथ और घोड़ोंसे उसी प्रकार गिर रहे थे, जैसे स्वर्गवासी जीव पुण्य क्षीण होनेपर वहाँके विमानोंसे नीचे गिर पड़ते हैं ॥ ७ ॥
गदाभिरन्ये गुर्वीभिः परिघैर्मुसलैरपि । पोथिताः शतशः पेतुर्वीरा वीरतरै रणे ॥ ८ ॥ अन्य सैकड़ों वीर बड़े-बड़े वीरोंद्वारा भारी गदाओं, परिघों और मुसलोंसे कुचले जाकर रणभूमिमें गिर रहे थे ॥ ८ ॥
रथा रथैर्विमथिता मत्ता मत्तैर्द्विपा द्विपैः । सादिनः सादिभिश्चैव तस्मिन् परमसंकुले ॥ ९ ॥ उस भारी घमासान युद्धमें रथोंने रथोंको मथ डाला, मतवाले हाथियोंने मदमत्त गजराजोंको धराशायी कर दिया और घुड़सवारोंने घुड़सवारोंको कुचल डाला ॥ ९ ॥
रथैर्नरा रथा नागैरश्वारोहाश्च पत्तिभिः । अश्वारोहैः पदाताश्च निहता युधि शेरते ॥ १० ॥ रथियोंद्वारा मारे गये पैदल मनुष्य, हाथियोंद्वारा कुचले गये रथ और रथी, पैदलोंद्वारा मारे गये घुड़सवार और घुड़सवारोंद्वारा कालके गालमें भेजे गये पैदल सिपाही उस युद्धभूमिमें सो रहे थे ॥ १० ॥
रथाश्वपत्तयो नागै रथाश्वेभाश्च पत्तिभिः । रथपत्तिद्विपाश्चाश्वै रथैश्चापि नरद्विपाः ॥ ११ ॥ गजों और गजारोहियोंने रथियों, घुड़सवारों और पैदलोंको मार गिराया, पैदलोंने रथियों, घुड़सवारों और हाथीसवारोंको धराशायी कर दिया, घुड़सवारोंने रथियों, पैदलों और गजारोहियोंको मार डाला तथा रथियोंने भी पैदल मनुष्यों और गजारोहियोंको मार गिराया ॥ ११ ॥
रथाश्वेभनराणां तु नराश्वेभरथैः कृतम् । पाणिपादैश्च शस्त्रैश्च रथैश्च कदनं महत् ॥ १२ ॥ पैदल, घुड़सवार, हाथीसवार तथा रथियोंने रथियों, घुड़सवारों, हाथीसवारों और पैदलोंका हाथों, पैरों, अस्त्र-शस्त्रों एवं रथोंद्वारा महान् संहार कर डाला ॥ १२ ॥
तथा तस्मिन् बले शूरैर्वध्यमाने हतेऽपि च । अस्मानभ्याययुः पार्था वृकोदरपुरोगमाः ॥ १३ ॥ इस प्रकार जब शूरवीरोंद्वारा वह सेना मारी जाने लगी और मारी गयी, तब कुन्तीके पुत्रोंने भीमसेनको आगे रखकर हमलोगोंपर आक्रमण किया ॥ १३ ॥
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च द्रौपदेयाः प्रभद्रकाः ।
सात्यकिश्चेकितानश्च द्राविडैः सैनिकैः सह ॥ १४ ॥
वृता व्यूहेन महता पाण्ड्याश्चोलाः सकेरलाः ।
धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदीके पुत्र, प्रभद्रक, सात्यकि, चेकितान, द्राविड़ सैनिकोंसहित महान् व्यूहसे घिरे हुए पाण्ड्य, चोल तथा केरल योद्धाओंने धावा किया ॥
व्यूढोरस्का दीर्घभुजाः प्रांशवः पृथुलोचनाः ॥ १५ ॥
आपीडिनो रक्तदन्ता मत्तमातङ्गविक्रमाः ।
इन सबकी छाती चौड़ी और भुजाएँ तथा आँखें बड़ी थीं। वे सब-के-सब ऊँचे कदके थे। उन्होंने भाँति-भाँतिके शिरोभूषण एवं हार धारण किये थे। उनके दाँत लाल थे और वे मतवाले हाथीके समान पराक्रमी थे ॥
नानाविरागवसना गन्धचूर्णावचूर्णिताः ॥ १६ ॥
बद्धासयः पाशहस्ता वारणप्रतिवारणाः ।
उन्होंने अनेक प्रकारके रंगीन वस्त्र पहन रखे थे और अपने अंगोंमें सुगन्धित चूर्ण लगा रखा था। उनकी कमरमें तलवार बँधी थी, वे हाथमें पाश लिये हुए थे और हाथियोंको भी रोक देनेकी शक्ति रखते थे ॥ १६½ ॥
समानमृत्यवो राजन् नात्यजन्त परस्परम् ॥ १७ ॥
कलापिनश्चापहस्ता दीर्घकेशाः प्रियंवदाः ।
पत्तयः सादिनश्चान्ये घोररूपपराक्रमाः ॥ १८ ॥
राजन्! वे सभी सैनिक समानरूपसे मृत्युको वरण करनेकी प्रतिज्ञा करके एक-दूसरेका साथ नहीं छोड़ते थे। वे मस्तकपर मोरपंख धारण किये हुए थे। उनके हाथोंमें धनुष शोभा पाता था। उनके केश बहुत बड़े थे और वे प्रिय वचन बोलते थे। अन्यान्य पैदल और घुड़सवार भी बड़े भयंकर पराक्रमी थे ॥ १७-१८ ॥
अथापरे पुनः शूराश्चेदिपञ्चालकेकयाः ।
कारूषाः कोसलाः काञ्च्या मागधाश्चापि दुद्रुवुः ॥ १९ ॥
तदनन्तर पुनः दूसरे शूरवीर चेदि, पांचाल, केकय, कारूष, कोसल, कांचीनिवासी और मागध सैनिक भी हमी लोगोंपर चढ़ आये ॥ १९ ॥
तेषां रथाश्वनागाश्च प्रवराश्चोग्रपत्तयः ।
नानावाद्यधरैर्हृष्टा नृत्यन्ति च हसन्ति च ॥ २० ॥
उनके रथ, घोड़े और हाथी उत्तम कोटिके थे। पैदल सैनिक भी बड़े भयंकर थे। वे नाना प्रकारके बाजे बजाने-वालोंके साथ हर्षमें भरकर नाचते-कूदते और हँसते थे ॥
तस्य सैन्यस्य महतो महामात्रवरैर्वृतः ।
मध्ये वृकोदरोऽभ्यायात् त्वदीयान् नागधुर्गतः ॥ २१ ॥
उस विशाल सेनाके मध्यभागमें हाथीकी पीठपर बड़े-बड़े महावतोंसे घिरकर बैठे हुए भीमसेन आपके सैनिकोंकी ओर बढ़े आ रहे थे ॥ २१ ॥
स नागप्रवरोऽत्युग्रो विधिवत् कल्पितो बभौ । उदयाद्र्यग्रयभवनं यथाभ्युदितभास्करम् ॥ २२ ॥ उस अत्यन्त भयंकर गजराजको विधिपूर्वक सजाया गया था, वह सूर्योदयसे युक्त उदयाचलके उच्चतम शिखरके समान सुशोभित होता था ॥ २२ ॥
तस्यायसं वर्म वरं वररत्नविभूषितम् । ताराव्याप्तस्य नभसः शारदस्य समत्विषम् ॥ २३ ॥ उसका लोहेका बना हुआ उत्तम कवच श्रेष्ठ रत्नोंसे विभूषित होकर ताराओंसे भरे हुए शरत्कालीन आकाशके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ २३ ॥
स तोमरव्यग्रकरश्चारुमौलिः स्वलंकृतः । शरन्मध्यंदिनार्काभस्तेजसा व्यदहद् रिपून् ॥ २४ ॥ उस समय सुन्दर मुकुट और आभूषणोंसे विभूषित हो हाथमें तोमर लेकर शरत्कालके मध्याह्न सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाले भीमसेन अपने तेजसे शत्रुओंको दग्ध करने लगे ॥ २४ ॥
तं दृष्ट्वा द्विरदं दूरात् क्षेमधूर्तिर्द्विपस्थितः । आह्वयन्नभिदुद्राव प्रमनाः प्रमनस्तरम् ॥ २५ ॥ उनके उस हाथीको दूरसे ही देखकर हाथीपर ही बैठे हुए महामना क्षेमधूर्तिने महामनस्वी भीमसेनको ललकारते हुए उनपर धावा किया ॥ २५ ॥
तयोः समभवद् युद्धं द्विपयोरुग्ररूपयोः । यदृच्छया द्रुमवतोर्महापर्वतयोरिव ॥ २६ ॥ जैसे वृक्षोंसे भरे हुए दो महान् पर्वत दैवेच्छासे परस्पर टकरा रहे हों, उसी प्रकार उन भयानक रूपधारी दोनों गजराजोंमें भारी युद्ध छिड़ गया ॥ २६ ॥
संसक्तनागौ तौ वीरौ तोमरैरितरेतरम् । बलवत् सूर्यरश्म्याभैर्भित्त्वान्योन्यं विनेदतुः ॥ २७ ॥ जिनके हाथी एक-दूसरेसे उलझे हुए थे, वे दोनों वीर क्षेमधूर्ति और भीमसेन सूर्यकी किरणोंके समान चमकीले तोमरोंद्वारा एक-दूसरेको बलपूर्वक विदीर्ण करते हुए जोर-जोरसे गर्जने लगे ॥ २७ ॥
व्यपसृत्य तु नागाभ्यां मण्डलानि विचेरतुः । प्रगृह्य चोभौ धनुषी जघ्नतुर्वै परस्परम् ॥ २८ ॥ फिर हाथियोंद्वारा ही पीछे हटकर वे दोनों मण्डलाकार विचरने और धनुष लेकर एक-दूसरेपर बाणोंका प्रहार करने लगे ॥ २८ ॥
क्ष्वेडितास्फोटितरवैर्बाणशब्दैस्तु सर्वतः । तौ जनं हर्षयन्तौ च सिंहनादं प्रचक्रतुः ॥ २९ ॥
वे गर्जने, ताल ठोंकने और बाणोंके शब्दसे चारों ओरके योद्धाओंको हर्ष प्रदान करते हुए सिंहनाद कर रहे थे ॥
समुद्यतकराभ्यां तौ द्विपाभ्यां कृतिनावुभौ ।
वातोद्धूतपताकाभ्यां युयुधाते महाबलौ ॥ ३० ॥
वे दोनों महाबली और विद्वान् योद्धा उन सूँड उठाये हुए दोनों हाथियोंद्वारा युद्ध कर रहे थे। उस समय उन हाथियोंके ऊपर लगी हुई पताकाएँ हवाके वेगसे फहरा रही थीं ॥ ३० ॥
तावन्योन्यस्य धनुषी छित्त्वान्योन्यं विनेदतुः ।
शक्तितोमरवर्षेण प्रावृण्मेघाविवाम्बुभिः ॥ ३१ ॥
जैसे वर्षाकालके दो मेघ पानी बरसा रहे हों, उसी प्रकार शक्ति और तोमरोंकी वर्षासे एक-दूसरेके धनुषको काटकर वे दोनों ही परस्पर गर्जन-तर्जन करने लगे ॥ ३१ ॥
क्षेमधूर्तिस्तदा भीमं तोमरेण स्तनान्तरे ।
निर्बिभेदातिवेगेन षड्भिश्चाप्यपरैर्नदन् ॥ ३२ ॥
उस समय क्षेमधूर्तिने भीमसेनकी छातीमें बड़े वेगसे एक तोमर धँसा दिया। फिर गर्जना करते हुए उसने उन्हें छः तोमर और मारे ॥ ३२ ॥
स भीमसेनः शुशुभे तोमरै रङ्गमाश्रितैः ।
क्रोधदीप्तवपुर्मेघैः सप्तसप्तिरिवांशुमान् ॥ ३३ ॥
अपने शरीरमें धँसे हुए उन तोमरोंद्वारा क्रोधसे उद्दीप्त शरीरवाले भीमसेन मेघोंद्वारा सात घोड़ोंवाले सूर्यके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ३३ ॥
ततो भास्करवर्णाभमृजोगतिमयस्मयम् ।
ससर्ज तोमरं भीमः प्रत्यमित्राय यत्नवान् ॥ ३४ ॥
तब भीमसेनने सूर्यके समान प्रकाशमान तथा सीधी गतिसे जानेवाले एक लोहमय तोमरको अपने शत्रुपर प्रयत्नपूर्वक छोड़ा ॥ ३४ ॥
ततः कुलूताधिपतिश्चापमानम्य सायकैः ।
दशभिस्तोमरं भित्त्वा षष्ट्या विव्याध पाण्डवम् ॥ ३५ ॥
यह देख कुलूतदेशके राजा क्षेमधूर्तिने अपने धनुषको नवाकर दस सायकोंसे उस तोमरको काट डाला और साठ बाण मारकर भीमसेनको भी घायल कर दिया ॥ ३५ ॥
अथ कार्मुकमादाय भीमो जलदनिःस्वनम् ।
रिपोरभ्यर्दयन्नागमुन्नदन् पाण्डवः शरैः ॥ ३६ ॥
तत्पश्चात् गर्जते हुए पाण्डुपुत्र भीमसेनने मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर घोष करनेवाले धनुषको लेकर अपने बाणोंद्वारा शत्रुके हाथीको पीड़ित कर दिया ॥ ३६ ॥
स शरौघार्दितो नागो भीमसेनेन संयुगे ।
गृह्यमाणोऽपि नातिष्ठद् वातोद्धूत इवाम्बुदः ॥ ३७ ॥
युद्धस्थलमें भीमसेनके बाणसमूहोंसे पीड़ित हुआ वह गजराज हवाके उड़ाये हुए बादलोंके समान रोकनेपर भी वहाँ रुक न सका ॥ ३७ ॥ तमभ्यधावद् द्विरदं भीमो भीमस्य नागराट् । महावातेरितं मेघं वातोद्धूत इवाम्बुदः ॥ ३८ ॥ जैसे आँधीके उड़ाये हुए मेघके पीछे वायुप्रेरित दूसरा मेघ जा रहा हो, उसी प्रकार भीमसेनका भयंकर गजराज क्षेमधूर्तिके उस हाथीका पीछा करने लगा ॥ ३८ ॥ संनिवार्यात्मनो नागं क्षेमधूर्तिः प्रतापवान् । विव्याधाभिद्रुतं बाणैर्भीमसेनस्य कुञ्जरम् ॥ ३९ ॥ उस समय प्रतापी क्षेमधूर्तिने अपने हाथीको किसी प्रकार रोककर सामने आते हुए भीमसेनके हाथीको बाणोंसे बींध डाला ॥ ३९ ॥ ततः साधुविसृष्टेन क्षुरेणानतपर्वणा । छित्त्वा शरासनं शत्रोर्नागमामित्रमर्दयत् ॥ ४० ॥ इसके बाद अच्छी तरह छोड़े हुए झुकी हुई गाँठवाले क्षुर नामक बाणसे भीमसेनने शत्रुके धनुषको काटकर उसके हाथीको पुनः अच्छी तरह पीड़ित किया ॥ ४० ॥ ततः क्रुद्धो रणे भीमं क्षेमधूर्तिः पराभिनत् । जघान चास्य द्विरदं नाराचैः सर्वमर्मसु ॥ ४१ ॥ तब क्षेमधूर्तिने कुपित हो रणभूमिमें भीमसेनको गहरी चोट पहुँचायी और अनेक नाराचोंद्वारा उनके हाथीके सम्पूर्ण मर्मस्थानोंमें आघात किया ॥ ४१ ॥ स पपात महानागो भीमसेनस्य भारत । पुरा नागस्य पतनादवप्लुत्य स्थितो महीम् ॥ ४२ ॥ भारत! इससे भीमसेनका महान् गजराज पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके गिरनेसे पहले ही भीमसेन कूदकर भूमिपर खड़े हो गये ॥ ४२ ॥ तस्य भीमोऽपि द्विरदं गदया समपोथयत् । तस्मात् प्रमथितान्नागात् क्षेमधूर्तिमवप्लुतम् ॥ ४३ ॥ उद्यतायुधमायान्तं गदयाहन् वृकोदरः । स पपात हतः सासिर्व्यसुस्तमभितो द्विपम् ॥ ४४ ॥ तदनन्तर भीमने भी अपनी गदासे क्षेमधूर्तिके हाथीको मार डाला। फिर जब उस मरे हुए हाथीसे कूदकर क्षेमधूर्ति तलवार उठाये सामने आने लगा, उस समय भीमसेनने उसपर भी गदासे प्रहार किया। गदाकी चोट खाकर उसके प्राणपखेरू उड़ गये और वह तलवार लिये हुए अपने हाथीके पास ही गिर पड़ा ॥ ४३-४४ ॥ वज्रप्रभग्नमचलं सिंहो वज्रहतो यथा । तं हतं नृपतिं दृष्ट्वा कुलूतानां यशस्करम् । प्राद्रवद् व्यथिता सेना त्वदीया भरतर्षभ ॥ ४५ ॥
भरतश्रेष्ठ! जैसे वज्रके आघातसे टूट-फूटकर गिरे हुए पर्वतके समीप वज्रका मारा हुआ सिंह गिरा हो, उसी प्रकार उस हाथीके समीप क्षेमधूर्ति धराशायी हो रहे थे। कुलूतोंका यश बढ़ानेवाले राजा क्षेमधूर्तिको मारा गया देख आपकी सेना व्यथित होकर भागने लगी ।। ४५ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि क्षेमधूर्तिवधे द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें क्षेमधूर्तिका वधविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२ ॥