महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अद्य तेऽहं विनेष्यामि युद्धश्रद्धां वृकोदर ॥ ५२ ॥ **दुर्योधन बोला—**वृकोदर! बहुत बढ़-बढ़कर बातें बनानेसे क्या लाभ? आज मेरे साथ भिड़ तो सही। मैं युद्धका तेरा सारा हौसला मिटा दूँगा ॥ ५२ ॥ किं न पश्यसि मां पाप गदायुद्धे व्यवस्थितम् । हिमवच्छिखराकारां प्रगृह्य महतीं गदाम् ॥ ५३ ॥ पापी! क्या तू देखता नहीं कि मैं हिमालयके शिखरकी भाँति विशाल गदा हाथमें लेकर युद्धके लिये खड़ा हूँ ॥ ५३ ॥ गदिनं कोऽद्य मां पाप हन्तुमुत्सहते रिपुः । न्यायतो युध्यमानश्च देवेष्वपि पुरन्दरः ॥ ५४ ॥ ओ पापी! आज कौन ऐसा शत्रु है, जो मेरे हाथमें गदा रहते हुए भी मुझे मार सके। न्यायपूर्वक युद्ध करते हुए देवताओंके राजा इन्द्र भी मुझे परास्त नहीं कर सकते ॥ ५४ ॥ मा वृथा गर्ज कौन्तेय शारदाभ्रमिवाजलम् । दर्शयस्व बलं युद्धे यावत् तत् तेऽद्य विद्यते ॥ ५५ ॥ कुन्तीपुत्र! शरद्-ऋतुके निर्जल मेघकी भाँति व्यर्थ गर्जना न कर। आज तेरे पास जितना बल हो, वह सब युद्धमें दिखा ॥ ५५ ॥ तस्य तद् वचनं श्रुत्वा पाण्डवाः सहसृञ्जयाः । सर्वे सम्पूजयामासुस्तद्वचो विजिगीषवः ॥ ५६ ॥ दुर्योधनका यह वचन सुनकर विजयकी इच्छा रखनेवाले समस्त पाण्डवों और सृञ्जयोंने भी उसकी बड़ी सराहना की ॥ ५६ ॥ उन्मत्तमिव मातङ्गं तलशब्देन मानवाः । भूयः संहर्षयामासू राजन् दुर्योधनं नृपम् ॥ ५७ ॥ राजन्! जैसे मतवाले हाथीको मनुष्य ताली बजाकर कुपित कर देते हैं, उसी प्रकार उन्होंने बारंबार ताल ठोककर राजा दुर्योधनके युद्धविषयक हर्ष और उत्साहको बढ़ाया ॥ ५७ ॥ बृंहन्ति कुञ्जरास्तत्र हया हेषन्ति चासकृत् । शस्त्राणि सम्प्रदीप्यन्ते पाण्डवानां जयैषिणाम् ॥ ५८ ॥ उस समय वहाँ विजयाभिलाषी पाण्डवोंके हाथी बारंबार चिग्घाड़ने और घोड़े हिनहिनाने लगे। साथ ही उनके अस्त्र-शस्त्र दीप्तिसे प्रकाशित हो उठे ॥ ५८ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि भीमसेनदुर्योधनसंवादे त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें भीमसेन और दुर्योधनका संवादविषयक तैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३ ॥
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अध्याय (पृष्ठ 2719)
चतुस्त्रिंशोऽध्यायः
बलरामजीका आगमन और स्वागत तथा भीमसेन और दुर्योधनके युद्धका आरम्भ
संजय उवाच
तस्मिन् युद्धे महाराज सुसंवृत्ते सुदारुणे ।
उपविष्टेषु सर्वेषु पाण्डवेषु महात्मसु ॥ १ ॥
ततस्तालध्वजो रामस्तयोर्युद्ध उपस्थिते ।
श्रुत्वा तच्छिष्ययो राजन्नाजगाम हलायुधः ॥ २ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! वह अत्यन्त भयंकर युद्ध जब आरम्भ होने लगा और समस्त महात्मा पाण्डव उसे देखनेके लिये बैठ गये, उस समय अपने दोनों शिष्योंका संग्राम उपस्थित होनेपर उसका समाचार सुन तालचिह्नित ध्वजवाले हलधारी बलरामजी वहाँ आ पहुँचे ॥ १-२ ॥
तं दृष्ट्वा परमप्रीताः पाण्डवाः सहकेशवाः ।
उपगम्योपसंगृह्य विधिवत् प्रत्यपूजयन् ॥ ३ ॥
उन्हें देखकर श्रीकृष्णसहित पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने निकट जाकर उनका चरणस्पर्श किया और विधिपूर्वक उनकी पूजा की ॥ ३ ॥
पूजयित्वा ततः पश्चादिदं वचनमब्रुवन् ।
शिष्ययोः कौशलं युद्धे पश्य रामेति पार्थिव ॥ ४ ॥
राजन्! पूजनके पश्चात् उन्होंने इस प्रकार कहा—'बलरामजी! अपने दोनों शिष्योंका युद्धकौशल देखिये' ॥ ४ ॥
अब्रवीच्च तदा रामो दृष्ट्वा कृष्णं सपाण्डवम् ।
दुर्योधनं च कौरव्यं गदापाणिमवस्थितम् ॥ ५ ॥
चत्वारिंशदहान्यद्य द्वे च मे निःसृतस्य वै ।
पुष्येण सम्प्रयातोऽस्मि श्रवणे पुनरागतः ॥ ६ ॥
शिष्ययोर्वै गदायुद्धं द्रष्टुकामोऽस्मि माधव ।
उस समय बलरामजीने श्रीकृष्ण, पाण्डव तथा हाथमें गदा लेकर खड़े हुए कुरुवंशी दुर्योधनकी ओर देखकर कहा—'माधव! तीर्थयात्राके लिये निकले हुए आज मुझे बयालीस दिन हो गये। पुष्य नक्षत्रमें चला था और श्रवण नक्षत्रमें पुनः वापस आया हूँ। मैं अपने दोनों शिष्योंका गदायुद्ध देखना चाहता हूँ' ॥ ५-६½ ॥
ततस्तदा गदाहस्तौ दुर्योधनवृकोदरौ ॥ ७ ॥
युद्धभूमिं गतौ वीरावुभावेव रराजतुः । तदनन्तर गदा हाथमें लेकर दुर्योधन और भीमसेन युद्ध-भूमिमें उतरे। वे दोनों ही वीर वहाँ बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ७ १/२ ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा परिष्वज्य हलायुधम् ।। ८ ।। स्वागतं कुशलं चास्मै पर्यपृच्छद् यथातथम् । उस समय राजा युधिष्ठिरने बलरामजीको हृदयसे लगाकर उनका स्वागत किया और यथोचितरूपसे उनका कुशल-समाचार पूछा ॥ ८ १/२ ॥
कृष्णौ चापि महेष्वासावभिवाद्य हलायुधम् ।। ९ ।। सस्वजाते परिप्रीतौ प्रीयमाणौ यशस्विनौ । यशस्वी महाधनुर्धर श्रीकृष्ण और अर्जुन भी बलरामजीको प्रणाम करके अत्यन्त प्रसन्न हो प्रेमपूर्वक उनके हृदयसे लग गये ॥ ९ १/२ ॥
माद्रीपुत्रौ तथा शूरौ द्रौपद्याः पञ्च चात्मजाः ।। १० ।। अभिवाद्य स्थिता राजन् रौहिणेयं महाबलम् । राजन्! माद्रीके दोनों शूरवीर पुत्र नकुल-सहदेव और द्रौपदीके पाँचों पुत्र भी रोहिणीनन्दन महाबली बलरामजीको प्रणाम करके उनके पास विनीतभावसे खड़े हो गये ।।
भीमसेनोऽथ बलवान् पुत्रस्तव जनाधिप ।। ११ ।। तथैव चोद्यतगदौ पूजयामासुर्बलम् । नरेश्वर! भीमसेन और आपका बलवान् पुत्र दुर्योधन इन दोनोंने गदाको ऊँचे उठाकर बलरामजीके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया ॥ ११ १/२ ॥
स्वागतेन च ते तत्र प्रतिपूज्य समन्ततः ।। १२ ।। पश्य युद्धं महाबाहो इति ते राममब्रुवन् । एवमूचुर्महात्मानं रौहिणेयं नराधिपाः ।। १३ ।। वे सब नरेश सब ओरसे स्वागतपूर्वक समादर करके वहाँ महात्मा रोहिणीपुत्र बलरामजीसे बोले—‘महाबाहो! युद्ध देखिये’ ॥ १२-१३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2721)
पाण्डवोंद्वारा बलरामजीकी पूजा
परिष्वज्य तदा रामः पाण्डवान् सहसृञ्जयान् । अपृच्छत् कुशलं सर्वान् पार्थिवांश्चामितौजसः ॥ १४ ॥ उस समय बलरामजीने पाण्डवों, सृंजयों तथा अमित बलशाली सम्पूर्ण भूपालोंको हृदयसे लगाकर उनका कुशल-मंगल पूछा ॥ १४ ॥
तथैव ते समासाद्य पप्रच्छुस्तमनामयम् । प्रत्यभ्यर्च्य हली सर्वान् क्षत्रियांश्च महात्मनः ॥ १५ ॥ कृत्वा कुशलसंयुक्तां संविदं च यथावयः । जनार्दनं सात्यकिं च प्रेम्णा स परिषस्वजे ॥ १६ ॥ उसी प्रकार वे राजा भी उनसे मिलकर उनके आरोग्यका समाचार पूछने लगे। हलधरने सम्पूर्ण महामनस्वी क्षत्रियोंका समादर करके अवस्थाके अनुसार क्रमशः उनसे कुशल-मंगलकी जिज्ञासा की और श्रीकृष्ण तथा सात्यकिको प्रेमपूर्वक छातीसे लगा लिया ॥
मूर्ध्नि चैतावुपाघ्राय कुशलं पर्यपृच्छत । तौ च तं विधिवद् राजन् पूजयामासतुर्गुरुम् ॥ १७ ॥ ब्रह्माणमिव देवेशमिन्द्रोपेन्द्रौ मुदान्वितौ । राजन्! इन दोनोंका मस्तक सूंघकर उन्होंने कुशल-समाचार पूछा और उन दोनोंने भी अपने गुरुजन बलरामजीका विधिपूर्वक पूजन किया। ठीक उसी तरह, जैसे इन्द्र और उपेन्द्रने प्रसन्नतापूर्वक देवेश्वर ब्रह्माजीकी पूजा की थी ॥ १७ १/२ ॥
ततोऽब्रवीद् धर्मसुतो रौहिणेयमरिंदमम् ॥ १८ ॥ इदं भ्रात्रोर्महायुद्धं पश्य रामेति भारत । भारत! तत्पश्चात् धर्मपुत्र युधिष्ठिरने शत्रुदमन रोहिणीकुमारसे कहा—'बलरामजी! दोनों भाइयोंका यह महान् युद्ध देखिये' ॥ १८ १/२ ॥
तेषां मध्ये महाबाहुः श्रीमान् केशवपूर्वजः ॥ १९ ॥ न्यविशत् परमप्रीतः पूज्यमानो महारथैः । उनके ऐसा कहनेपर श्रीकृष्णके बड़े भ्राता महाबाहु बलवान् श्रीबलरामजी उन महारथियोंसे पूजित हो उनके बीचमें अत्यन्त प्रसन्न होकर बैठे ॥ १९ १/२ ॥
स बभौ राजमध्यस्थो नीलवासाः सितप्रभः ॥ २० ॥ दिवीव नक्षत्रगणैः परिकीर्णो निशाकरः । राजाओंके मध्यभागमें बैठे हुए नीलाम्बरधारी गौरकान्ति बलरामजी आकाशमें नक्षत्रोंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे ॥ २० १/२ ॥
ततस्तयोः संनिपातस्तुमुलो लोमहर्षणः ॥ २१ ॥ आसीदन्तकरो राजन् वैरस्य तव पुत्रयोः ॥ २२ ॥ राजन्! तदनन्तर आपके उन दोनों पुत्रोंमें वैरका अन्त कर देनेवाला भयंकर एवं रोमांचकारी संग्राम होने लगा ॥ २१-२२ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवागमने चतुस्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलरामजीका आगमनविषयक
चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३४ ।।
बलदेवजीकी तीर्थयात्रा तथा प्रभास-क्षेत्रके प्रभावका वर्णनके प्रसंगमें चन्द्रमाके शापमोचनकी कथा
पञ्चत्रिंशोऽध्यायः
बलदेवजीकी तीर्थयात्रा तथा प्रभास-क्षेत्रके प्रभावका वर्णनके प्रसंगमें चन्द्रमाके शापमोचनकी कथा
जनमेजय उवाच
पूर्वमेव यदा रामस्तस्मिन् युद्ध उपस्थिते ।
आमन्त्र्य केशवं यातो वृष्णिभिः सहितः प्रभुः ॥ १ ॥
साहाय्यं धार्तराष्ट्रस्य न च कर्तास्मि केशव ।
न चैव पाण्डुपुत्राणां गमिष्यामि यथागतम् ॥ २ ॥
जनमेजयने कहा—ब्रह्मन्! जब महाभारतयुद्ध आरम्भ होनेका समय निकट आ गया, उस समय युद्ध प्रारम्भ होनेसे पहले ही भगवान् बलराम श्रीकृष्णकी सम्मति ले, अन्य वृष्णिवंशियोंके साथ तीर्थयात्राके लिये चले गये और जाते समय यह कह गये कि 'केशव! मैं न तो धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनकी सहायता करूँगा और न पाण्डवोंकी ही' ॥ १-२ ॥
एवमुक्त्वा तदा रामो यातः क्षत्रनिबर्हणः ।
तस्य चागमनं भूयो ब्रह्मन् शंसितुमर्हसि ॥ ३ ॥
विप्रवर! उन दिनों ऐसी बात कहकर जब क्षत्रियसंहारक बलरामजी चले गये, तब उनका पुनः आगमन कैसे हुआ, यह बतानेकी कृपा करें ॥ ३ ॥
आख्याहि मे विस्तरशः कथं राम उपस्थितः ।
कथं च दृष्टवान् युद्धं कुशलो ह्यसि सत्तम ॥ ४ ॥
साधुशिरोमणे! आप कथा कहनेमें कुशल हैं; अतः मुझे विस्तारपूर्वक बताइये कि बलरामजी कैसे वहाँ उपस्थित हुए और किस प्रकार उन्होंने युद्ध देखा? ॥ ४ ॥
वैशम्पायन उवाच
उपप्लव्ये निविष्टेषु पाण्डवेषु महात्मसु ।
प्रेषितो धृतराष्ट्रस्य समीपं मधुसूदनः ॥ ५ ॥
शमं प्रति महाबाहो हितार्थं सर्वदेहिनाम् ।
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! जिन दिनों महामनस्वी पाण्डव उपप्लव्य नामक स्थानमें छावनी डालकर ठहरे हुए थे, उन्हीं दिनोंकी बात है। महाबाहो! पाण्डवोंने समस्त प्राणियोंके हितके लिये सन्धिके उद्देश्यसे भगवान् श्रीकृष्णको धृतराष्ट्रके पास भेजा ॥ ५ १/२ ॥
स गत्वा हास्तिनपुरं धृतराष्ट्रं समेत्य च ॥ ६ ॥
उक्तवान् वचनं तथ्यं हितं चैव विशेषतः ।
भगवान्ने हस्तिनापुर जाकर धृतराष्ट्रसे भेंट की और उनसे सबके लिये विशेष हितकारक एवं यथार्थ बातें कहीं॥ ६ १/२ ॥
न च तत् कृतवान् राजा यथा ख्यातं हि तत् पुरा ॥ ७ ॥
अनवाप्य शमं तत्र कृष्णः पुरुषसत्तमः ।
आगच्छत महाबाहुरुपप्लव्यं जनाधिप ॥ ८ ॥
नरेश्वर! किंतु राजा धृतराष्ट्रने भगवान्का कहना नहीं माना। यह सब बात पहले यथार्थरूपसे बतायी गयी है। महाबाहु पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण वहाँ संधि करानेमें सफलता न मिलनेपर पुनः उपप्लव्यमें ही लौट आये ॥ ७-८ ॥
ततः प्रत्यागतः कृष्णो धार्तराष्ट्रविसर्जितः ।
अक्रियायां नरव्याघ्र पाण्डवानिदमब्रवीत् ॥ ९ ॥
नरव्याघ्र! कार्य न होनेपर धृतराष्ट्रसे विदा ले वहाँसे लौटे हुए श्रीकृष्णने पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा— ॥ ९ ॥
न कुर्वन्ति वचो मह्यं कुरवः कालनोदिताः ।
निर्गच्छध्वं पाण्डवेयाः पुष्येण सहिता मया ॥ १० ॥
‘कौरव कालके अधीन हो रहे हैं, इसलिये वे मेरा कहना नहीं मानते हैं। पाण्डवो! अब तुमलोग मेरे साथ पुष्य नक्षत्रमें युद्धके लिये निकल पड़ो, ॥ १० ॥
ततो विभज्यमानेषु बलेषु बलिनां वरः ।
प्रोवाच भ्रातरं कृष्णं रौहिणेयो महामनाः ॥ ११ ॥
इसके बाद जब सेनाका बँटवारा होने लगा, तब बलवानोंमें श्रेष्ठ महामना बलदेवजीने अपने भाई श्रीकृष्णसे कहा— ॥ ११ ॥
तेषामपि महाबाहो साहाय्यं मधुसूदन ।
क्रियतामिति तत् कृष्णो नास्य चक्रे वचस्तदा ॥ १२ ॥
‘महाबाहु मधुसूदन! उन कौरवोंकी भी सहायता करना। परंतु श्रीकृष्णने उस समय उनकी यह बात नहीं मानी’ ॥ १२ ॥
ततो मन्युपरीतात्मा जगाम यदुनन्दनः ।
तीर्थयात्रां हलधरः सरस्वत्यां महायशाः ॥ १३ ॥
इससे मन-ही-मन कुपित और खिन्न होकर महायशस्वी यदुनन्दन हलधर सरस्वतीके तटपर तीर्थयात्राके लिये चल दिये ॥ १३ ॥
मैत्रनक्षत्रयोगे स्म सहितः सर्वयादवैः ।
आश्रयामास भोजस्तु दुर्योधनमरिंदमः ॥ १४ ॥
इसके बाद शत्रुओंका दमन करनेवाले कृतवर्माने सम्पूर्ण यादवोंके साथ अनुराधानक्षत्रमें दुर्योधनका पक्ष ग्रहण किया ॥ १४ ॥
युयुधानेन सहितो वासुदेवस्तु पाण्डवान् ।
रौहिणेये गते शूरे पुष्येण मधुसूदनः ।। १५ ।।
पाण्डवेयान् पुरस्कृत्य ययावभिमुखः कुरून् ।
सात्यकिसहित भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंका पक्ष लिया। रोहिणीनन्दन शूरवीर बलरामजीके चले जानेपर मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने पाण्डवोंको आगे करके पुष्यनक्षत्रमें कुरुक्षेत्रकी ओर प्रस्थान किया ।। १५ १/२ ।।
गच्छन्नेव पथिस्थस्तु रामः प्रेष्यानुवाच ह ।। १६ ।।
सम्भारांस्तीर्थयात्रायां सर्वोपकरणानि च ।
आनयध्वं द्वारकायामग्नीन् वै याजकांस्तथा ।। १७ ।।
यात्रा करते हुए बलरामजीने स्वयं मार्गमें ही रहकर अपने सेवकोंसे कहा—'तुमलोग शीघ्र ही द्वारका जाकर वहाँसे तीर्थयात्रामें काम आनेवाली सब सामग्री, समस्त आवश्यक उपकरण, अग्निहोत्रकी अग्नि तथा पुरोहितोंको ले आओ ।। १६-१७ ।।
सुवर्णं रजतं चैव धेनूर्वासांसि वाजिनः ।
कुञ्जरांश्च रथांश्चैव खरोष्ट्रं वाहनानि च ।। १८ ।।
क्षिप्रमानीयतां सर्वं तीर्थहेतोः परिच्छदम् ।
'सोना, चाँदी, दूध देनेवाली गायें, वस्त्र, घोड़े, हाथी, रथ, गदहा और ऊँट आदि वाहन एवं तीर्थोपयोगी सब सामान शीघ्र ले आओ ।। १८ १/२ ।।
प्रतिस्रोतः सरस्वत्या गच्छध्वं शीघ्रगामिनः ।। १९ ।।
ऋत्विजश्चानयध्वं वै शतशश्च द्विजर्षभान् ।
'शीघ्रगामी सेवको! तुम सरस्वतीके स्रोतकी ओर चलो और सैकड़ों श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा ऋत्विजोंको ले आओ' ।।
एवं संदिश्य तु प्रेष्यान् बलदेवो महाबलः ।। २० ।।
तीर्थयात्रां ययौ राजन् कुरूणां वैशसे तदा ।
सरस्वतीं प्रतिस्रोतः समन्तादभिजग्मिवान् ।। २१ ।।
ऋत्विग्भिश्च सुहृद्भिश्च तथान्यैर्द्विजसत्तमैः ।
रथैर्गजैस्तथाश्वैश्च प्रेष्यैश्च भरतर्षभ ।। २२ ।।
गोखरोष्ट्रप्रयुक्तैश्च यानैश्च बहुभिर्वृतः ।
राजन्! महाबली बलदेवजीने सेवकोंको ऐसी आज्ञा देकर उस समय कुरुक्षेत्रमें ही तीर्थयात्रा आरम्भ कर दी। भरतश्रेष्ठ! वे सरस्वतीके स्रोतकी ओर चलकर उसके दोनों तटोंपर गये। उनके साथ ऋत्विज, सुहृद्, अन्यान्य श्रेष्ठ ब्राह्मण, रथ, हाथी, घोड़े और सेवक भी थे। बैल, गदहा और ऊँटोंसे जुते हुए बहुसंख्यक रथोंसे बलरामजी घिरे हुए थे ।। २०—२२ १/२ ।।
श्रान्तानां क्लान्तवपुषां शिशूनां विपुलायुषाम् ।। २३ ।।
देशे देशे तु देयानि दानानि विविधानि च ।
अर्चायै चार्थिनां राजन् कॢप्तानि बहुशस्तथा ॥ २४ ॥ राजन्! उस समय उन्होंने देश-देशमें थके-माँदे रोगी, बालक और वृद्धोंका सत्कार करनेके लिये नाना प्रकारकी देनेयोग्य वस्तुएँ प्रचुर मात्रामें तैयार करा रखी थीं॥ तानि यानीह देशेषु प्रतीक्षन्ति स्म भारत । बुभुक्षितानामर्थाय कॢप्तमन्नं समन्ततः ॥ २५ ॥ भारत! विभिन्न देशोंमें लोग जिन वस्तुओंकी इच्छा रखते थे, उन्हें वे ही दी जाती थीं। भूखोंको भोजन करानेके लिये सर्वत्र अन्नका प्रबन्ध किया गया था॥ यो यो यत्र द्विजो भोज्यं भोक्तुं कामयते तदा । तस्य तस्य तु तत्रैवमुपजहुस्तदा नृप ॥ २६ ॥ नरेश्वर! जिस किसी देशमें जो-जो ब्राह्मण जब कभी भोजनकी इच्छा प्रकट करता, बलरामजीके सेवक उसे वहीं तत्काल खाने-पीनेकी वस्तुएँ अर्पित करते थे॥ २६॥ तत्र तत्र स्थिता राजन् रौहिणेयस्य शासनात् । भक्ष्यपेयस्य कुर्वन्ति राशींस्तत्र समन्ततः ॥ २७ ॥ राजन्! रोहिणीकुमार बलरामजीकी आज्ञासे उनके सेवक विभिन्न तीर्थस्थानोंमें खाने-पीनेकी वस्तुओंके ढेर लगाये रखते थे॥ २७॥ वासांसि च महार्हाणि पर्यङ्कास्तरणानि च । पूजार्थं तत्र कॢप्तानि विप्राणां सुखमिच्छताम् ॥ २८ ॥ सुख चाहनेवाले ब्राह्मणोंके सत्कारके लिये बहुमूल्य वस्त्र, पलंग और बिछौने तैयार रखे जाते थे॥ २८॥ यत्र यः स्वपते विप्रो यो वा जागर्ति भारत । तत्र तत्र तु तस्यैव सर्वं कॢप्तमदृश्यत ॥ २९ ॥ भारत! जो ब्राह्मण जहाँ भी सोता या जागता था, वहाँ-वहाँ उसके लिये सारी आवश्यक वस्तुएँ सदा प्रस्तुत दिखायी देती थीं॥ २९॥ यथासुखं जनः सर्वो याति तिष्ठति वै तदा । यातुकामस्य यानानि पानानि तृषितस्य च ॥ ३० ॥ बुभुक्षितस्य चान्नानि स्वादूनि भरतर्षभ । उपजहुर्नरास्तत्र वस्त्राण्याभरणानि च ॥ ३१ ॥ भरतश्रेष्ठ! इस यात्रामें सब लोग सुखपूर्वक चलते और विश्राम करते थे। यात्रीकी इच्छा हो तो उसे सवारियाँ दी जाती थीं, प्यासेको पानी और भूखेको स्वादिष्ट अन्न दिये जाते थे। साथ ही वहाँ बलरामजीके सेवक वस्त्र और आभूषण भी भेंट करते थे॥ ३०-३१॥ स पन्थाः प्रभभौ राजन् सर्वस्यैव सुखावहः । स्वर्गोपमस्तदा वीर नराणां तत्र गच्छताम् ।
नित्यप्रमुदितोपेतः स्वादुभक्ष्यः शुभान्वितः ॥ ३२ ॥
वीर नरेश! वहाँ यात्रा करनेवाले सब लोगोंको वह मार्ग स्वर्गके समान सुखदायक प्रतीत होता था। उस मार्गमें सदा आनन्द रहता, स्वादिष्ट भोजन मिलता और शुभकी ही प्राप्ति होती थी ॥ ३२ ॥
विपण्यापणपण्यानां नानाजनशतैर्वृतः ।
नानाद्रुमलतोपेतो नानारत्नविभूषितः ॥ ३३ ॥
उस पथपर खरीदने-बेचनेकी वस्तुओंका बाजार भी साथ-साथ चलता था, जिसमें नाना प्रकारके सैकड़ों मनुष्य भरे रहते थे। वह हाट भाँति-भाँतिके वृक्षों और लताओंसे सुशोभित तथा अनेकानेक रत्नोंसे विभूषित दिखायी देता था ॥ ३३ ॥
ततो महात्मा नियमे स्थितात्मा
पुण्येषु तीर्थेषु वसूनि राजन् ।
ददौ द्विजेभ्यः क्रतुदक्षिणाश्च
यदुप्रवीरो हलभृत् प्रतीतः ॥ ३४ ॥
राजन्! यदुकुलके प्रमुख वीर हलधारी महात्मा बलराम नियमपूर्वक रहकर प्रसन्नताके साथ पुण्यतीर्थोंमें ब्राह्मणोंको धन और यज्ञकी दक्षिणाएँ देते थे ॥ ३४ ॥
दोग्ध्रीश्च धेनूश्च सहस्रशो वै
सुवाससः काञ्चनबद्धशृङ्गीः ।
हयांश्च नानाविधदेशजातान्
यानानि दासांश्च शुभान् द्विजेभ्यः ॥ ३५ ॥
रत्नानि मुक्तामणिविद्रुमं चा-
प्यग्र्यं सुवर्णं रजतं सुशुद्धम् ।
अयस्मयं ताम्रमयं च भाण्डं
ददौ द्विजातिप्रवरेषु रामः ॥ ३६ ॥
बलरामने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सहस्रों दूध देनेवाली गौएँ दान कीं, जिन्हें सुन्दर वस्त्रोंसे सुसज्जित करके उनके सींगोंमें सोनेके पत्र जड़े गये थे। साथ ही उन्होंने अनेक देशोंमें उत्पन्न घोड़े, रथ और सुन्दर वेश-भूषावाले दास भी ब्राह्मणोंकी सेवामें अर्पित किये। इतना ही नहीं, बलरामने भाँति-भाँतिके रत्न, मोती, मणि, मूँगा, उत्तम सुवर्ण, विशुद्ध चाँदी तथा लोहे और ताँबेके बर्तन भी बाँटे थे ॥ ३५-३६ ॥
एवं स वित्तं प्रददौ महात्मा
सरस्वतीतीर्थवरेषु भूरि ।
ययौ क्रमेणाप्रतिमप्रभाव-
स्ततः कुरुक्षेत्रमुदारवृत्तिः ॥ ३७ ॥
इस प्रकार उदार वृत्तिवाले अनुपम प्रभावशाली महात्मा बलरामने सरस्वतीके श्रेष्ठ
तीर्थोंमें बहुत धन दान किया और क्रमशः यात्रा करते हुए वे कुरुक्षेत्रमें आये ।।
जनमेजय उवाच
सारस्वतानां तीर्थानां गुणोत्पत्तिं वदस्व मे ।
फलं च द्विपदां श्रेष्ठ कर्मनिर्वृत्तिमेव च ।। ३८ ।।
यथाक्रमेण भगवंस्तीर्थानामनुपूर्वशः ।
ब्रह्मन् ब्रह्मविदां श्रेष्ठ परं कौतूहलं हि मे ।। ३९ ।।
जनमेजय बोले—ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ और मनुष्योंमें उत्तम ब्राह्मणदेव! अब आप मुझे
सरस्वती-तटवर्ती तीर्थोंके गुण, प्रभाव और उत्पत्तिकी कथा सुनाइये। भगवन्! क्रमशः उन
तीर्थोंके सेवनका फल और जिस कर्मसे वहाँ सिद्धि प्राप्त होती है, उसका अनुष्ठान भी
बताइये, मेरे मनमें यह सब सुननेके लिये बड़ी उत्कण्ठा हो रही है ।। ३८-३९ ।।
वैशम्पायन उवाच
तीर्थानां च फलं राजन् गुणोत्पत्तिं च सर्वशः ।
मयोच्यमानं वै पुण्यं शृणु राजेन्द्र कृत्स्नशः ।। ४० ।।
वैशम्पायनजीने कहा—राजेन्द्र! मैं तुम्हें तीर्थोंके गुण, प्रभाव, उत्पत्ति तथा उनके
सेवनका पुण्य-फल बता रहा हूँ। वह सब तुम ध्यानसे सुनो ।। ४० ।।
पूर्वं महाराज यदुप्रवीर
ऋत्विक्सुहृद्विप्रगणैश्च सार्धम् ।
पुण्यं प्रभासं समुपाजगाम
यत्रोडुराड् यक्ष्मणा क्लिश्यमानः ।। ४१ ।।
विमुक्तशापः पुनराप्य तेजः
सर्वं जगद् भासयते नरेन्द्र ।
एवं तु तीर्थप्रवरं पृथिव्यां
प्रभासनात् तस्य ततः प्रभासः ।। ४२ ।।
महाराज! यदुकुलके प्रमुख वीर बलरामजी सबसे पहले ऋत्विजों, सुहृदों और
ब्राह्मणोंके साथ पुण्यमय प्रभासक्षेत्रमें गये, जहाँ राजयक्ष्मासे कष्ट पाते हुए चन्द्रमाको
शापसे छुटकारा मिला था। नरेन्द्र! वे वहीं पुनः अपना तेज प्राप्त करके सम्पूर्ण जगत्को
प्रकाशित करते हैं। इस प्रकार चन्द्रमाको प्रभासित करनेके कारण ही वह प्रधान तीर्थ इस
पृथ्वीपर प्रभास नामसे विख्यात हुआ ।। ४१-४२ ।।
जनमेजय उवाच
कथं तु भगवन् सोमो यक्ष्मणा समगृह्यत ।
कथं च तीर्थप्रवरे तस्मिंश्चन्द्रो न्यमज्जत ॥ ४३ ॥
जनमेजयने पूछा— भगवन्! चन्द्रमा कैसे राजयक्ष्मासे ग्रस्त हो गये और उस उत्तम तीर्थमें किस प्रकार उन्होंने स्नान किया? ॥ ४३ ॥
कथमाप्लुत्य तस्मिंस्तु पुनराप्यायितः शशी ।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व विस्तरेण महामुने ॥ ४४ ॥
महामुने! उस तीर्थमें गोता लगाकर चन्द्रमा पुनः किस प्रकार हृष्ट-पुष्ट हुए? यह सब प्रसंग मुझे विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ४४ ॥
वैशम्पायन उवाच
दक्षस्य तनयास्तात प्रादुरासन् विशाम्पते ।
स सप्तविंशतिं कन्या दक्षः सोमाय वै ददौ ॥ ४५ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— तात! प्रजानाथ! प्रजापति दक्षके बहुत-सी संतानें उत्पन्न हुई थीं। उनमेंसे अपनी सत्ताईस कन्याओंका विवाह उन्होंने चन्द्रमाके साथ कर दिया था ॥ ४५ ॥
नक्षत्रयोगनिरताः संख्यानार्थं च ताभवन् ।
पत्न्यो वै तस्य राजेन्द्र सोमस्य शुभकर्मणः ॥ ४६ ॥
राजेन्द्र! शुभ कर्म करनेवाले सोमकी वे पत्नियाँ समयकी गणनाके लिये नक्षत्रोंसे सम्बन्ध रखनेके कारण उसी नामसे विख्यात हुईं ॥ ४६ ॥
तास्तु सर्वा विशालाक्ष्यो रूपेणाप्रतिमा भुवि ।
अत्यरिच्यत तासां तु रोहिणी रूपसम्पदा ॥ ४७ ॥
वे सब-की-सब विशाल नेत्रोंसे सुशोभित होती थीं। इस भूतलपर उनके रूपकी समानता करनेवाली कोई स्त्री नहीं थी। उनमें भी रोहिणी अपने रूप-वैभवकी दृष्टिसे सबकी अपेक्षा बढ़ी-चढ़ी थी ॥ ४७ ॥
ततस्तस्यां स भगवान् प्रीतिं चक्रे निशाकरः ।
सास्य हृद्या बभूवाथ तस्मात् तां बुभुजे सदा ॥ ४८ ॥
इसलिये भगवान् चन्द्रमा उससे अधिक प्रेम करने लगे, वही उनकी हृदयवल्लभा हुई; अतः वे सदा उसीका उपभोग करते थे ॥ ४८ ॥
पुरा हि सोमो राजेन्द्र रोहिण्यामवसत् परम् ।
ततस्ताः कुपिताः सर्वा नक्षत्राख्या महात्मनः ॥ ४९ ॥
राजेन्द्र! पूर्वकालमें चन्द्रमा सदा रोहिणीके ही समीप रहते थे; अतः नक्षत्रनामसे प्रसिद्ध हुई महात्मा सोमकी वे सारी पत्नियाँ उनपर कुपित हो उठीं ॥ ४९ ॥
ता गत्वा पितरं प्राहुः प्रजापतिमतन्द्रिताः ।
सोमो वसति नास्मासु रोहिणीं भजते सदा ॥ ५० ॥
और आलस्य छोड़कर अपने पिताके पास जाकर बोलीं—‘प्रभो! चन्द्रमा हमारे पास नहीं आते। वे सदा रोहिणीका ही सेवन करते हैं ॥ ५० ॥ ता वयं सहिताः सर्वास्त्वत्सकाशे प्रजेश्वर । वत्स्यामो नियताहारास्तपश्चरणतत्पराः ॥ ५१ ॥ ‘अतः प्रजेश्वर! हम सब बहिनें एक साथ नियमित आहार करके तपस्यामें संलग्न हो आपके ही पास रहेंगी’ ॥ श्रुत्वा तासां तु वचनं दक्षः सोममथाब्रवीत् । समं वर्तस्व भार्यासु मा त्वाधर्मो महान् स्पृशेत् ॥ ५२ ॥ उनकी यह बात सुनकर प्रजापति दक्षने चन्द्रमासे कहा—‘सोम! तुम अपनी सभी पत्नियोंके साथ समानतापूर्ण बर्ताव करो, जिससे तुम्हें महान् पाप न लगे’ ॥ ५२ ॥ तास्तु सर्वाब्रवीद् दक्षो गच्छध्वं शशिनोऽन्तिकम् । समं वत्स्यति सर्वासु चन्द्रमा मम शासनात् ॥ ५३ ॥ फिर दक्षने उन सभी कन्याओंसे कहा—‘अब तुमलोग चन्द्रमाके पास ही जाओ। वे मेरी आज्ञासे तुम सब लोगोंके प्रति समानभाव रखेंगे’ ॥ ५३ ॥ विसृष्टास्तास्तथा जग्मुः शीतांशुभवनं तदा । तथापि सोमो भगवान् पुनरेव महीपते ॥ ५४ ॥ रोहिणीं निवसत्येव प्रीयमाणो मुहुर्मुहुः । पृथ्वीनाथ! पिताके विदा करनेपर वे पुनः चन्द्रमाके घरमें लौट गयीं, तथापि भगवान् सोम फिर रोहिणीके पास ही अधिकाधिक प्रेमपूर्वक रहने लगे ॥ ५४ १/२ ॥ ततस्ताः सहिताः सर्वा भूयः पितरमब्रुवन् ॥ ५५ ॥ तव शुश्रूषणे युक्ता वत्स्यामो हि तवान्तिके । सोमो वसति नास्मासु नाकरोद् वचनं तव ॥ ५६ ॥ तब वे सब कन्याएँ पुनः एक साथ अपने पिताके पास जाकर बोलीं—‘हम सब लोग आपकी सेवामें तत्पर रहकर आपके ही समीप रहेंगी। चन्द्रमा हमारे साथ नहीं रहते। उन्होंने आपकी बात नहीं मानी’ ॥ ५५-५६ ॥ तासां तद् वचनं श्रुत्वा दक्षः सोममथाब्रवीत् । समं वर्तस्व भार्यासु मा त्वां शप्स्ये विरोचन ॥ ५७ ॥ उनकी बात सुनकर दक्षने पुनः सोमसे कहा—‘प्रकाशमान चन्द्रदेव! तुम अपनी सभी पत्नियोंके साथ समान बर्ताव करो, नहीं तो तुम्हें शाप दे दूँगा’ ॥ ५७ ॥ अनादृत्य तु तद् वाक्यं दक्षस्य भगवान् शशी । रोहिण्या सार्धमवसत् ततस्ताः कुपिताः पुनः ॥ ५८ ॥ गत्वा च पितरं प्राहुः प्रणम्य शिरसा तदा । सोमो वसति नास्मासु तस्मान्नः शरणं भव ॥ ५९ ॥
दक्षके इतना कहनेपर भी भगवान् चन्द्रमा उनकी बातकी अवहेलना करके केवल रोहिणीके ही साथ रहने लगे। यह देख दूसरी स्त्रियाँ पुनः क्रोधसे जल उठीं और पिताके पास जा उनके चरणोंमें मस्तक नवाकर प्रणाम करनेके अनन्तर बोलीं—'भगवन्! सोम हमारे पास नहीं रहते। अतः आप हमें शरण दें।।
रोहिण्यामेव भगवान् सदा वसति चन्द्रमाः ।
न त्वद्वचो गणयति नास्मासु स्नेहमिच्छति ॥ ६० ॥
तस्मान्नस्त्राहि सर्वा वै यथा नः सोम आविशेत् ।
'भगवान् चन्द्रमा सदा रोहिणीके ही समीप रहते हैं। वे आपकी बातको कुछ गिनते ही नहीं हैं। हमलोगोंपर स्नेह रखना नहीं चाहते हैं, अतः आप हम सब लोगोंकी रक्षा करें, जिससे चन्द्रमा हमारे साथ भी सम्बन्ध रखें' ।। ६० १/२ ।।
तच्छ्रुत्वा भगवान् क्रुद्धो यक्ष्माणं पृथिवीपते ॥ ६१ ॥
ससर्ज रोषात् सोमाय स चोडुपतिमाविशत् ।
पृथिवीनाथ! यह सुनकर भगवान् दक्ष कुपित हो उठे। उन्होंने चन्द्रमाके लिये रोषपूर्वक राजयक्ष्माकी सृष्टि की। वह चन्द्रमाके भीतर प्रविष्ट हो गया ।। ६१ १/२ ।।
स यक्ष्मणाभिभूतात्माक्षीयताहरहः शशी ॥ ६२ ॥
यत्नं चाप्यकरोद् राजन् मोक्षार्थं तस्य यक्ष्मणः ।
यक्ष्मासे शरीर ग्रस्त हो जानेके कारण चन्द्रमा प्रतिदिन क्षीण होने लगे। राजन्! उस यक्ष्मासे छूटनेके लिये उन्होंने बड़ा यत्न किया ।। ६२ १/२ ।।
इष्ट्वेष्टिभिर्महाराज विविधाभिर्निशाकरः ॥ ६३ ॥
न चामुच्यत शापाद् वै क्षयं चैवाभ्यगच्छत ।
महाराज! नाना प्रकारके यज्ञ-यागोंका अनुष्ठान करके भी चन्द्रमा उस शापसे मुक्त न हो सके और धीरे-धीरे क्षीण होते चले गये ।। ६३ १/२ ।।
क्षीयमाणे ततः सोमे ओषध्यो न प्रजज्ञिरे ॥ ६४ ॥
निरास्वादरसाः सर्वा हतवीर्याश्च सर्वशः ।
चन्द्रमाके क्षीण होनेसे अन्न आदि ओषधियाँ उत्पन्न नहीं होती थीं। उन सबके स्वाद, रस और प्रभाव नष्ट हो गये ।। ६४ १/२ ।।
ओषधीनां क्षये जाते प्राणिनामपि संक्षयः ॥ ६५ ॥
कृशाश्चासन् प्रजाः सर्वाः क्षीयमाणे निशाकरे ।
ओषधियोंके क्षीण होनेसे समस्त प्राणियोंका भी क्षय होने लगा। इस प्रकार चन्द्रमाके क्षयके साथ-साथ सारी प्रजा अत्यन्त दुर्बल हो गयी ।। ६५ १/२ ।।
ततो देवाः समागम्य सोममूचुर्महीपते ॥ ६६ ॥
किमिदं भवतो रूपमीदृशं न प्रकाशते ।
कारणं ब्रूहि नः सर्वं येनेदं ते महत् भयम् ॥ ६७ ॥ श्रुत्वा तु वचनं त्वत्तो विधास्यामस्ततो वयम्। पृथ्वीनाथ! उस समय देवताओंने चन्द्रमासे मिलकर पूछा—‘आपका रूप ऐसा कैसे हो गया? यह प्रकाशित क्यों नहीं होता है? हमलोगोंसे सारा कारण बताइये, जिससे आपको महान् भय प्राप्त हुआ। आपकी बात सुनकर हमलोग इस संकटके निवारणका कोई उपाय करेंगे’ ॥ ६६-६७ १/२ ॥ एवमुक्तः प्रत्युवाच सर्वांस्तान् शशलक्षणः ॥ ६८ ॥ शापस्य लक्षणं चैव यक्ष्माणं च तथाऽऽत्मनः। उनके इस प्रकार पूछनेपर चन्द्रमाने उन सबको उत्तर देते हुए अपनेको प्राप्त हुए शापके कारण राजयक्ष्माकी उत्पत्ति बतलायी ॥ ६८ १/२ ॥ देवास्तथा वचः श्रुत्वा गत्वा दक्षमथाब्रुवन् ॥ ६९ ॥ प्रसीद भगवन् सोमे शापोऽयं विनिवर्त्यताम्। उनका वचन सुनकर देवता दक्षके पास जाकर बोले—‘भगवन्! आप चन्द्रमापर प्रसन्न होइये और यह शाप हटा लीजिये ॥ ६९ १/२ ॥ असौ हि चन्द्रमाः क्षीणः किञ्चिच्छेषो हि लक्ष्यते ॥ ७० ॥ क्षयाच्चैवास्य देवेश प्रजाश्चैव गताः क्षयम्। वीरुदोषधयश्चैव बीजानि विविधानि च ॥ ७१ ॥ ‘चन्द्रमा क्षीण हो चुके हैं और उनका कुछ ही अंश शेष दिखायी देता है। देवेश्वर! उनके क्षयसे लता, वीरुत्, ओषधियाँ भाँति-भाँतिके बीज और सम्पूर्ण प्रजा भी क्षीण हो गयी है ॥ ७०-७१ ॥ तेषां क्षये क्षयोऽस्माकं विनास्माभिर्जगच्च किम्। इति ज्ञात्वा लोकगुरो प्रसादं कर्तुमर्हसि ॥ ७२ ॥ ‘उन सबके क्षीण होनेपर हमारा भी क्षय हो जायगा। फिर हमारे बिना संसार कैसे रह सकता है? लोकगुरो! ऐसा जानकर आपको चन्द्रदेवपर अवश्य कृपा करनी चाहिये’ ॥ ७२ ॥ एवमुक्तस्ततो देवान् प्राह वाक्यं प्रजापतिः। नैतच्छक्यं मम वचो व्यावर्तयितुमन्यथा ॥ ७३ ॥ हेतुना तु महाभागा निवर्तिष्यति केनचित्। उनके ऐसा कहनेपर प्रजापति दक्ष देवताओंसे इस प्रकार बोले—‘महाभाग देवगण! मेरी बात पलटी नहीं जा सकती। किसी विशेष कारणसे वह स्वतः निवृत्त हो जायगी ॥ ७३ १/२ ॥ समं वर्ततु सर्वासु शशी भार्यासु नित्यशः ॥ ७४ ॥ सरस्वत्या वरे तीर्थे उन्मज्जन् शशलक्षणः।
पुनर्वर्धिष्यते देवास्तद् वै सत्यं वचो मम ॥ ७५ ॥
‘यदि चन्द्रमा अपनी सभी पत्नियोंके प्रति सदा समान बर्ताव करें और सरस्वतीके श्रेष्ठ तीर्थमें गोता लगायें तो वे पुनः बढ़कर पुष्ट हो जायेंगे। देवताओ! मेरी यह बात अवश्य सच होगी’ ॥ ७४-७५ ॥
मासार्धं च क्षयं सोमो नित्यमेव गमिष्यति ।
मासार्धं तु सदा वृद्धिं सत्यमेतद् वचो मम ॥ ७६ ॥
‘सोम आधे मासतक प्रतिदिन क्षीण होंगे और आधे मासतक निरन्तर बढ़ते रहेंगे। मेरी यह बात अवश्य सत्य होगी’ ॥ ७६ ॥
समुद्रं पश्चिमं गत्वा सरस्वत्यब्धिसङ्गमम् ।
आराधयतु देवेशं ततः कान्तिमवाप्स्यति ॥ ७७ ॥
‘पश्चिमी समुद्रके तटपर जहाँ सरस्वती और समुद्रका संगम हुआ है, वहाँ जाकर चन्द्रमा देवेश्वर महादेवजीकी आराधना करें तो पुनः वे अपनी कान्ति प्राप्त कर लेंगे’ ॥ ७७ ॥
सरस्वतीं ततः सोमः स जगामर्षिशासनात् ।
प्रभासं प्रथमं तीर्थं सरस्वत्या जगाम ह ॥ ७८ ॥
ऋषि (दक्ष प्रजापति)-के इस आदेशसे सोम सरस्वतीके प्रथम तीर्थ प्रभासक्षेत्रमें गये ॥ ७८ ॥
अमावास्यां महातेजास्तत्रोन्मज्जन् महाद्युतिः ।
लोकान् प्रभासयामास शीतांशुत्वमवाप च ॥ ७९ ॥
महातेजस्वी महाकान्तिमान् चन्द्रमाने अमावास्याको उस तीर्थमें गोता लगाया। इससे उन्हें शीतल किरणें प्राप्त हुईं और वे सम्पूर्ण जगत्को प्रकाशित करने लगे ॥ ७९ ॥
देवास्तु सर्वे राजेन्द्र प्रभासं प्राप्य पुष्कलम् ।
सोमेन सहिता भूत्वा दक्षस्य प्रमुखेऽभवन् ॥ ८० ॥
राजेन्द्र! फिर सम्पूर्ण देवता सोमके साथ महान् प्रकाश प्राप्त करके पुनः दक्षप्रजापतिके सामने उपस्थित हुए ॥ ८० ॥
ततः प्रजापतिः सर्वा विससर्जाथ देवताः ।
सोमं च भगवान् प्रीतो भूयो वचनमब्रवीत् ॥ ८१ ॥
तब भगवान् प्रजापतिने समस्त देवताओंको विदा कर दिया और सोमसे पुनः प्रसन्नतापूर्वक कहा— ॥ ८१ ॥
मावमंस्थाः स्त्रियः पुत्र मा च विप्रान् कदाचन ।
गच्छ युक्तः सदा भूत्वा कुरु वै शासनं मम ॥ ८२ ॥
‘बेटा! अपनी स्त्रियों तथा ब्राह्मणोंकी कभी अवहेलना न करना। जाओ, सदा सावधान रहकर मेरी आज्ञाका पालन करते रहो’ ॥ ८२ ॥
स विसृष्टो महाराज जगामाथ स्वमालयम् । प्रजाश्च मुदिता भूत्वा पुनस्तस्थुर्यथा पुरा ॥ ८३ ॥ महाराज! ऐसा कहकर प्रजापतिने उन्हें विदा कर दिया। चन्द्रमा अपने स्थानको चले गये और सारी प्रजा पूर्ववत् प्रसन्न रहने लगी ॥ ८३ ॥ एवं ते सर्वमाख्यातं यथा शप्तो निशाकरः । प्रभासं च यथा तीर्थं तीर्थानां प्रवरं महत् ॥ ८४ ॥ इस प्रकार चन्द्रमाको जैसे शाप प्राप्त हुआ था और महान् प्रभासतीर्थ जिस प्रकार सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ माना गया, वह सारा प्रसंग मैंने तुमसे कह सुनाया ॥ ८४ ॥ अमावास्यां महाराज नित्यशः शशलक्षणः । स्नात्वा ह्याप्यायते श्रीमान् प्रभासे तीर्थ उत्तमे ॥ ८५ ॥ महाराज! चन्द्रमा उत्तम प्रभासतीर्थमें प्रत्येक अमावास्याको स्नान करके कान्तिमान् एवं पुष्ट होते हैं ॥ अतश्चैतत् प्रजानन्ति प्रभासमिति भूमिप । प्रभां हि परमां लेभे तस्मिन्निमज्ज्य चन्द्रमाः ॥ ८६ ॥ भूमिपाल! इसीलिये सब लोग इसे प्रभासतीर्थके नामसे जानते हैं; क्योंकि उसमें गोता लगाकर चन्द्रमाने उत्कृष्ट प्रभा प्राप्त की थी ॥ ८६ ॥ ततस्तु चमसोद्भेदमच्युतस्त्वगमद् बली । चमसोद्भेद इत्येवं यं जनाः कथयन्त्युत ॥ ८७ ॥ तदनन्तर भगवान् बलराम चमसोद्भेद नामक तीर्थमें गये। उस तीर्थको सब लोग चमसोद्भेदके नामसे ही पुकारते हैं ॥ ८७ ॥ तत्र दत्त्वा च दानानि विशिष्टानि हलायुधः । उषित्वा रजनीमेकां स्नात्वा च विधिवत्तदा ॥ ८८ ॥ उदपानमथागच्छत्त्वरावान् केशवाग्रजः । आद्यं स्वस्त्ययनं चैव यत्रावाप्य महत् फलम् ॥ ८९ ॥ स्निग्धत्वादोषधीनां च भूमेश्च जनमेजय । जानन्ति सिद्धा राजेन्द्र नष्टामपि सरस्वतीम् ॥ ९० ॥ श्रीकृष्णके बड़े भाई हलधारी बलरामने वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके उत्तम दान दे एक रात रहकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँसे उदपानतीर्थको प्रस्थान किया, जो मंगलकारी आदि तीर्थ है। राजेन्द्र जनमेजय! उदपान वह तीर्थ है, जहाँ उपस्थित होनेमात्रसे महान् फलकी प्राप्ति होती है। सिद्ध पुरुष वहाँ ओषधियों (वृक्षों और लताओं)-की स्निग्धता और भूमिकी आर्द्रता देखकर अदृश्य हुई सरस्वतीको भी जान लेते हैं ॥ ८८—९० ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां प्रभासोत्पत्तिकथने पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें प्रभासतीर्थका वर्णनविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥