महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पद्मकोशविचित्राढ्या सर्वर्तुकुसुमोत्कटा ॥ १९ ॥
ज्वलनार्केन्दुवर्णाभा पावकोज्ज्वलपल्लवा ।
तया पद्मपलाशिन्या वातकम्पितपत्रया ॥ २० ॥
शुशुभेऽभ्यधिकं शौरिरतसीपुष्पसंनिभः ।
(केशवः केशिमथनः शार्ङ्गधन्वारिमर्दनः ।
संध्याभ्रैरिव संछन्नः प्रावृट्काले नगोत्तमः ॥)
भगवान् श्रीकृष्णकी छातीपर आकर वह अस्त्र वैजयन्ती मालाके रूपमें परिणत हो गया। वह माला कमलकोशकी विचित्र शोभासे युक्त तथा सभी ऋतुओंके पुष्पोंसे सम्पन्न थी। उससे अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके समान प्रभा फैल रही थी। उसका एक-एक दल अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था। कमलदलोंसे सुशोभित तथा हवासे हिलते हुए दलोंवाली उस वैजयन्ती मालासे तीसीके फूलोंके समान श्यामवर्णवाले केशिहन्ता, शूरसेननन्दन, शार्ङ्गधन्वा, शत्रुसूदन भगवान् केशव अधिकाधिक शोभा पाने लगे, मानो वर्षाकालमें संध्याके मेघोंसे आच्छादित श्रेष्ठ पर्वत सुशोभित हो रहा हो ॥ १९-२० १/२ ॥
ततोऽर्जुनः क्लान्तमनाः केशवं प्रत्यभाषत ॥ २१ ॥
अयुध्यमानस्तुरगान् संयन्तास्मीति चानघ ।
इत्युक्त्वा पुण्डरीकाक्ष प्रतिज्ञां स्वां न रक्षसि ॥ २२ ॥
यद्यहं व्यसनी वा स्यामशक्तो वा निवारणे ।
ततस्त्वयैवं कार्यं स्यान्न तत्कार्यं मयि स्थिते ॥ २३ ॥
उस समय अर्जुनके मनमें बड़ा क्लेश हुआ। उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा—'अनघ! आपने तो प्रतिज्ञा की है कि मैं युद्ध न करके घोड़ोंको काबूमें रखूँगा—केवल सारथिका काम करूँगा; किंतु कमलनयन! आप वैसी बात कहकर भी अपनी प्रतिज्ञाका पालन नहीं कर रहे हैं। यदि मैं संकटमें पड़ जाता अथवा अस्त्रका निवारण करनेमें असमर्थ हो जाता तो उस समय आपका ऐसा करना उचित होता। जब मैं युद्धके लिये तैयार खड़ा हूँ, तब आपको ऐसा नहीं करना चाहिये ॥ २१—२३ ॥
सबाणः सधनुश्चाहं ससुरासुरमानुषान् ।
शक्तो लोकानिमाञ्जेतुं तच्चापि विदितं तव ॥ २४ ॥
'आपको तो यह भी विदित है कि यदि मेरे हाथमें धनुष और बाण हो तो मैं देवता, असुर और मनुष्योंसहित इन सम्पूर्ण लोकोंपर विजय पा सकता हूँ' ॥ २४ ॥
ततोऽर्जुनं वासुदेवः प्रत्युवाचार्थवद् वचः ।
शृणु गुह्यमिदं पार्थ पुरा वृत्तं यथानघ ॥ २५ ॥
तब वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे ये रहस्यपूर्ण वचन कहे—'अनघ! कुन्तीनन्दन! इस विषयमें यह गोपनीय रहस्यकी बात सुनो, जो पूर्वकालमें घटित हो चुकी है ॥ २५ ॥
चतुर्मूर्तिरहं शश्वल्लोकत्राणार्थमुद्यतः ।
आत्मानं प्रविभज्येह लोकानां हितमादधे ॥ २६ ॥
‘मैं चार स्वरूप धारण करके सदा सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षाके लिये उद्यत रहता हूँ। अपनेको ही यहाँ अनेक रूपोंमें विभक्त करके समस्त संसारका हित-साधन करता हूँ॥ २६ ॥
एका मूर्तिस्तपश्चर्यां कुरुते मे भुवि स्थिता ।
अपरा पश्यति जगत् कुर्वाणं साध्वसाधुनी ॥ २७ ॥
‘मेरी एक मूर्ति इस भूमण्डलपर (बदरिकाश्रममें नर-नारायणके रूपमें) स्थित हो तपश्चर्या करती है। दूसरी (परमात्मस्वरूपा) मूर्ति शुभाशुभकर्म करनेवाले जगत्को साक्षीरूपसे देखती रहती है॥ २७ ॥
अपरा कुरुते कर्म मानुषं लोकमाश्रिता ।
शेते चतुर्थी त्वपरा निद्रां वर्षसहस्रिकम् ॥ २८ ॥
‘तीसरी मूर्ति (मैं स्वयं जो) मनुष्यलोकका आश्रय ले नाना प्रकारके कर्म करती है और चौथी मूर्ति वह है, जो सहस्र युगोंतक एकार्णवके जलमें शयन करती है॥ २८ ॥
यासौ वर्षसहस्रान्ते मूर्तिरुत्तिष्ठते मम ।
वरार्हेभ्यो वरान् श्रेष्ठांस्तस्मिन् काले ददाति सा ॥ २९ ॥
‘सहस्रयुगके पश्चात् मेरा वह चौथा स्वरूप जब योगनिद्रासे उठता है, उस समय वर पानेके योग्य श्रेष्ठ भक्तोंको उत्तम वर प्रदान करता है॥ २९ ॥
तं तु कालमनुप्राप्तं विदित्वा पृथिवी तदा ।
अयाचत वरं यन्मां नरकार्थाय तच्छृणु ॥ ३० ॥
‘एक बार जब कि वही समय प्राप्त था, पृथिवीदेवीने अपने पुत्र नरकासुरके लिये मुझसे जो वर माँगा, उसे सुनो॥ ३० ॥
देवानां दानवानां च अवध्यस्तनयोऽस्तु मे ।
उपेतो वैष्णवास्त्रेण तन्मे त्वं दातुमर्हसि ॥ ३१ ॥
‘मेरा पुत्र वैष्णवास्त्रसे सम्पन्न होकर देवताओं और दानवोंके लिये अवध्य हो जाय, इसलिये आप कृपापूर्वक मुझे वह अपना अस्त्र प्रदान करें’ ॥ ३१ ॥
एवं वरमहं श्रुत्वा जगत्यास्तनये तदा ।
अमोघमस्त्रं प्रायच्छं वैष्णवं परमं पुरा ॥ ३२ ॥
‘उस समय पृथिवीके मुँहसे अपने पुत्रके लिये इस प्रकार याचना सुनकर मैंने पूर्वकालमें अपना परम उत्तम अमोघ वैष्णव-अस्त्र उसे दे दिया॥ ३२ ॥
अवोचं चैतदस्त्रं वै ह्यमोघं भवतु क्षमे ।
नरकस्याभिरक्षार्थं नैनं कश्चिद् वधिष्यति ॥ ३३ ॥
‘उसे देते समय मैंने कहा—‘वसुधे! यह अमोघ वैष्णवास्त्र नरकासुरकी रक्षाके लिये उसके पास रहे। फिर उसे कोई भी नष्ट नहीं कर सकेगा॥ ३३॥ अनेनास्त्रेण ते गुप्तः सुतः परबलार्दनः । भविष्यति दुराधर्षः सर्वलोकेषु सर्वदा ॥ ३४ ॥ ‘इस अस्त्रसे सुरक्षित रहकर तुम्हारा पुत्र शत्रुओंकी सेनाको पीड़ित करनेवाला और सदा सम्पूर्ण लोकोंमें दुर्धर्ष बना रहेगा’॥ ३४॥ तथेत्युक्त्वा गता देवी कृतकामा मनस्विनी । स चाप्यासीद् दुराधर्षो नरकः शत्रुतापनः ॥ ३५ ॥ ‘तब ‘जो आज्ञा’ कहकर मनस्विनी पृथ्वीदेवी कृतार्थ होकर चली गयी। वह नरकासुर भी (उस अस्त्रको पाकर) शत्रुओंको संताप देनेवाला तथा अत्यन्त दुर्जय हो गया॥ ३५॥ तस्मात् प्राग्ज्योतिषं प्राप्तं तदस्त्रं पार्थ मामकम् । नास्यावध्योऽस्ति लोकेषु सेन्द्ररुद्रेषु मारिष ॥ ३६ ॥ ‘पार्थ! नरकासुरसे वह मेरा अस्त्र इस प्राग्ज्योतिषनरेश भगदत्तको प्राप्त हुआ। आर्य! इन्द्र तथा रुद्रसहित तीनों लोकोंमें कोई भी ऐसा वीर नहीं है, जो इस अस्त्रके लिये अवध्य हो॥ ३६॥ तन्मया त्वत्कृते चैतदन्यथा व्यपनामितम् । विमुक्तं परमास्त्रेण जहि पार्थ महासुरम् ॥ ३७ ॥ ‘अतः मैंने तुम्हारी रक्षाके लिये उस अस्त्रको दूसरे प्रकारसे उसके पाससे हटा दिया है। पार्थ! अब वह महान् असुर उस उत्कृष्ट अस्त्रसे वंचित हो गया है। अतः तुम उसे मार डालो॥ ३७॥ वैरिणं जहि दुर्धर्षं भगदत्तं सुरद्विषम् । यथाहं जघ्निवान् पूर्वं हितार्थं नरकं तथा ॥ ३८ ॥ ‘दुर्जय वीर भगदत्त तुम्हारा वैरी और देवताओंका द्रोही है। अतः तुम उसका वध कर डालो; जैसे कि मैंने पूर्वकालमें लोकहितके लिये नरकासुरका संहार किया था’॥ ३८॥ एवमुक्तस्तदा पार्थः केशवेन महात्मना । भगदत्तं शितैर्बाणैः सहसा समवाकिरत् ॥ ३९ ॥ महात्मा केशवके ऐसा कहनेपर कुन्तीकुमार अर्जुन उसी समय भगदत्तपर सहसा पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे॥ ३९॥ ततः पार्थो महाबाहुरसम्भ्रान्तो महामनाः । कुम्भयोरन्तरे नागं नाराचेन समर्पयत् ॥ ४० ॥ तत्पश्चात् महाबाहु महामना पार्थने बिना किसी घबराहटके हाथीके कुम्भस्थलमें एक नाराचका प्रहार किया॥ ४०॥ स समासाद्य तं नागं बाणो वज्र इवाचलम् ।
अभ्यगात् सह पुङ्खेन वल्मीकमिव पन्नगः ॥ ४१ ॥ वह नाराच उस हाथीके मस्तकपर पहुँचकर उसी प्रकार लगा, जैसे वज्र पर्वतपर चोट करता है। जैसे सर्प बाँबीमें समा जाता है, उसी प्रकार वह बाण हाथीके कुम्भस्थलमें पंखसहित घुस गया ॥ ४१ ॥
स करी भगदत्तेन प्रेर्यमाणो मुहुर्मुहुः । न करोति वचस्तस्य दरिद्रस्येव योषिता ॥ ४२ ॥ वह हाथी बारंबार भगदत्तके हाँकनेपर भी उनकी आज्ञाका पालन नहीं करता था, जैसे दुष्टा स्त्री अपने दरिद्र स्वामीकी बात नहीं मानती है ॥ ४२ ॥
स तु विष्टभ्य गात्राणि दन्ताभ्यामवनिं ययौ । नदन्नार्तस्वनं प्राणानुत्ससर्ज महाद्विपः ॥ ४३ ॥ उस महान् गजराजने अपने अंगोंको निश्चेष्ट करके दोनों दाँत धरतीपर टेक दिये और आर्तस्वरसे चीत्कार करके प्राण त्याग दिये ॥ ४३ ॥
ततो गाण्डीवधन्वानमभ्यभाषत केशवः । अयं महत्तरः पार्थ पलितेन समावृतः ॥ ४४ ॥ वलीसंच्छन्ननयनः शूरः परमदुर्जयः । अक्ष्णोरुन्मीलनार्थाय बद्धपट्टो ह्यसौ नृपः ॥ ४५ ॥ तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्णने गाण्डीवधारी अर्जुनसे कहा—'कुन्तीनन्दन! यह भगदत्त बहुत बड़ी अवस्थाका है। इसके सारे बाल पक गये हैं और ललाट आदि अंगोंमें झुर्रियाँ पड़ जानेके कारण पलकें झपी रहनेसे इसके नेत्र प्रायः बंद-से रहते हैं। यह शूरवीर तथा अत्यन्त दुर्जय है। इस राजाने अपने दोनों नेत्रोंको खुले रखनेके लिये पलकोंको कपड़ेकी पट्टीसे ललाटमें बाँध रखा है' ॥ ४४-४५ ॥
देववाक्यात् प्रचिच्छेद शरेण भृशमर्जुनः । छिन्नमात्रेंऽशुके तस्मिन् रुद्धनेत्रो बभूव सः ॥ ४६ ॥ भगवान् श्रीकृष्णके कहनेसे अर्जुनने बाण मारकर भगदत्तके सिरकी पट्टी अत्यन्त छिन्न-भिन्न कर दी। उस पट्टीके कटते ही भगदत्तकी आँखें बंद हो गयीं ॥
तमोमयं जगन्मेने भगदत्तः प्रतापवान् । ततश्चन्द्रार्धबिम्बेन बाणेन नतपर्वणा ॥ ४७ ॥ बिभेद हृदयं राज्ञो भगदत्तस्य पाण्डवः । फिर तो प्रतापी भगदत्तको सारा जगत् अन्धकारमय प्रतीत होने लगा। उस समय झुकी हुई गाँठवाले एक अर्धचन्द्राकार बाणके द्वारा पाण्डुनन्दन अर्जुनने राजा भगदत्तके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर दिया ॥ ४७ १/२ ॥
स भिन्नहृदयो राजा भगदत्तः किरीटिना ॥ ४८ ॥ शरासनं शरांश्चैव गतासुः प्रमुमोच ह ।
शिरसस्तस्य विभ्रष्टं पपात च वरांशुकम् ।
नालताडनविभ्रष्टं पलाशं नलिनादिव ॥ ४९ ॥
किरीटधारी अर्जुनके द्वारा हृदय विदीर्ण कर दिये जानेपर राजा भगदत्तने प्राणशून्य हो अपने धनुष-बाण त्याग दिये। उनके सिरसे पगड़ी और पट्टीका वह सुन्दर वस्त्र खिसककर गिर गया, जैसे कमलनालके ताडनसे उसका पत्ता टूटकर गिर जाता है ॥ ४८-४९ ॥
स हेममाली तपनीयभाण्डात्
पपात नागाद् गिरिसंनिकाशात् ।
सुपुष्पितो मारुतवेगरुग्णो
महीधराग्रादिव कर्णिकारः ॥ ५० ॥
सोनेके आभूषणोंसे विभूषित उस पर्वताकार हाथीसे सुवर्णमालाधारी भगदत्त पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो सुन्दर पुष्पोंसे सुशोभित कनेरका वृक्ष हवाके वेगसे टूटकर पर्वतके शिखरसे नीचे गिर पड़ा हो ॥ ५० ॥
निहत्य तं नरपतिमिन्द्रविक्रमं
सखायमिन्द्रस्य तदैन्द्रिराहवे ।
ततोऽपरांस्तव जयकाङ्क्षिणो नरान्
बभञ्ज वायुर्बलवान् द्रुमानिव ॥ ५१ ॥
राजन्! इस प्रकार इन्द्रकुमार अर्जुनने इन्द्रके सखा तथा इन्द्रके समान ही पराक्रमी राजा भगदत्तको युद्धमें मारकर आपकी सेनाके अन्य विजयाभिलाषी वीर पुरुषोंको भी उसी प्रकार मार गिराया, जैसे प्रबल वायु वृक्षोंको उखाड़ फेंकती है ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि भगदत्तवधे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें भगदत्तवधविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५२ श्लोक हैं।)
अर्जुनके द्वारा भगदत्तका वध
त्रिंशोऽध्यायः
अर्जुनके द्वारा वृषक और अचलका वध, शकुनिकी माया और उसकी पराजय तथा कौरव-सेनाका पलायन
संजय उवाच
प्रियमिन्द्रस्य सततं सखायममितौजसम् ।
हत्वा प्राग्ज्योतिषं पार्थः प्रदक्षिणमवर्तत ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! जो सदा इन्द्रके प्रिय सखा रहे हैं, उन अमित तेजस्वी प्राग्ज्योतिषपुरनरेश भगदत्तको मारकर अर्जुन दाहिनी ओर घूमे ॥ १ ॥
ततो गान्धारराजस्य सुतौ परपुरंजयौ ।
अर्दतामर्जुनं संख्ये भ्रातरौ वृषकाचलौ ॥ २ ॥
उधरसे गान्धारराज सुबलके दो पुत्र शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले वृषक और अचल दोनों भाई आ पहुँचे और युद्धमें अर्जुनको पीड़ित करने लगे ॥ २ ॥
तौ समेत्यार्जुनं वीरौ पुरः पश्चाच्च धन्विनौ ।
अविध्येतां महावेगैर्निशितैराशुगैर्भृशम् ॥ ३ ॥
उन दोनों धनुर्धर वीरोंने अर्जुनपर आगे और पीछेसे भी आक्रमण करके अत्यन्त वेगशाली पैने बाणोंद्वारा उन्हें बहुत घायल कर दिया ॥ ३ ॥
वृषकस्य हयान् सूतं धनुश्छत्रं रथं ध्वजम् ।
तिलशो व्यधमत् पार्थः सौबलस्य शितैः शरैः ॥ ४ ॥
तब कुन्तीकुमार अर्जुनने अपने तीखे बाणोंद्वारा सुबलपुत्र वृषकके घोड़ों, सारथि, रथ, धनुष, छत्र और ध्वजाको तिल-तिल करके काट डाला ॥ ४ ॥
ततोऽर्जुनः शरव्रातैर्नानाप्रहरणैरपि ।
गान्धारानाकुलांश्चक्रे सौबलप्रमुखान् पुनः ॥ ५ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनने अपने बाणसमूहों तथा नाना प्रकारके आयुधोंद्वारा सुबलपुत्र आदि समस्त गान्धारोंको पुनः व्याकुल कर दिया ॥ ५ ॥
ततः पञ्चशतान् वीरान् गान्धारानुद्यतायुधान् ।
प्राहिणोन्मृत्युलोकाय क्रुद्धो बाणैर्धनंजयः ॥ ६ ॥
फिर क्रोधमें भरे हुए धनंजयने हथियार उठाये हुए पाँच सौ गान्धारदेशीय वीरोंको अपने बाणोंसे मारकर यमलोक भेज दिया ॥ ६ ॥
हताश्वात् तु रथात् तूर्णमवतीर्य महाभुजः ।
आरुरोह रथं भ्रातुरन्यच्च धनुरददे ॥ ७ ॥
महाबाहु वृषक उस अश्वहीन रथसे शीघ्र उतरकर अपने भाई अचलके रथपर जा चढ़ा। फिर उसने अपने हाथमें दूसरा धनुष ले लिया ॥ ७ ॥
तावेकरथमारूढौ भ्रातरौ वृषकाचलौ ।
शरवर्षेण बीभत्सुमविध्येतां मुहुर्मुहुः ॥ ८ ॥
इस प्रकार एक रथपर बैठे हुए वे दोनों भाई वृषक और अचल बारंबार बाणोंकी वर्षासे अर्जुनको घायल करने लगे ॥ ८ ॥
श्यालौ तव महात्मानौ राजानौ वृषकाचलौ ।
भृशं विजघ्नतुः पार्थमिन्द्रं वृत्रबलाविव ॥ ९ ॥
महाराज! आपके दोनों साले महामनस्वी राजकुमार वृषक और अचल, इन्द्रको वृत्रासुर तथा बलासुरके समान, अर्जुनको अत्यन्त घायल करने लगे ॥ ९ ॥
लब्धलक्ष्यौ तु गान्धारावहतां पाण्डवं पुनः ।
निदाघवार्षिकौ मासौ लोकं घर्मांशुभिर्यथा ॥ १० ॥
जैसे गर्मीके दो महीने सूर्यकी उष्ण किरणोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंको संतप्त करते रहते हैं, उसी प्रकार वे दोनों भाई गान्धारराजकुमार लक्ष्य वेधनेमें सफल होकर पाण्डुपुत्र अर्जुनपर बारंबार आघात करने लगे ॥ १० ॥
तौ रथस्थौ नरव्याघ्रौ सजानौ वृषकाचलौ ।
संश्लिष्टाङ्गौ स्थितौ राजन् जघानेकेषुणाऽर्जुनः ॥ ११ ॥
राजन्! वे नरश्रेष्ठ राजकुमार वृषक और अचल रथपर एक-दूसरेसे सटकर खड़े थे। उसी अवस्थामें अर्जुनने एक ही बाणसे उन दोनोंको मार डाला ॥ ११ ॥
तौ रथात् सिंहसंकाशौ लोहिताक्षौ महाभुजौ ।
राजन् सम्पेततुर्वीरौ सोदर्यावेकलक्षणौ ॥ १२ ॥
महाराज! वे दोनों वीर परस्पर सगे भाई होनेके कारण एक-जैसे लक्षणोंसे युक्त थे। दोनों ही सिंहके समान पराक्रमी, लाल नेत्रोंवाले तथा विशाल भुजाओंसे सुशोभित थे। वे दोनों एक ही साथ रथसे पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ १२ ॥
तयोर्भूमिं गतौ देहौ रथाद् बन्धुजनप्रियौ ।
यशो दश दिशः पुण्यं गमयित्वा व्यवस्थितौ ॥ १३ ॥
उन दोनों भाइयोंके शरीर उनके बन्धुजनोंके लिये अत्यन्त प्रिय थे। वे अपने पवित्र यशको दसों दिशाओंमें फैलाकर रथसे भूतलपर गिरे और वहीं स्थिर हो गये ॥ १३ ॥
दृष्ट्वा विनिहतौ संख्ये मातुलावपलायिनौ ।
भृशं मुमुचुरश्रूणि पुत्रास्तव विशाम्पते ॥ १४ ॥
प्रजानाथ! युद्धसे पीठ न दिखानेवाले अपने दोनों मामाओंको युद्धमें मारा गया देख आपके सभी पुत्र अपने नेत्रोंसे आँसुओंकी अत्यन्त वर्षा करने लगे ॥ १४ ॥
निहतौ भ्रातरौ दृष्ट्वा मायाशतविशारदः ।
कृष्णौ सम्मोहयन् मायां विदधे शकुनिस्ततः ॥ १५ ॥ अपने दोनों भाइयोंको मारा गया देख सैकड़ों मायाओंके प्रयोगमें निपुण शकुनिने श्रीकृष्ण और अर्जुनको मोहित करते हुए उनके प्रति मायाका प्रयोग किया ॥ १५ ॥ लगुडायोगुडाश्मानः शतघ्न्यश्च सशक्तयः । गदापरिघनिस्त्रिंशशूलमुद्गरपट्टिशाः ॥ १६ ॥ सकम्पनर्ष्टिनखरा मुसलानि परश्वधाः । क्षुराः क्षुरप्रनालीका वत्सदन्तास्थिसन्धयः ॥ १७ ॥ चक्राणि विशिखाः प्रासा विविधान्यायुधानि च । प्रपेतुः शतशो दिग्भ्यः प्रदिग्भ्यश्चार्जुनं प्रति ॥ १८ ॥ फिर तो अर्जुनके ऊपर डंडे, लोहेके गोले, पत्थर, शतघ्नी, शक्ति, गदा, परिघ, खड्ग, शूल, मुद्गर, पट्टिश, कम्पन, ऋष्टि, नखर, मुसल, फरसे, छूरे, क्षुरप्र, नालीक, वत्सदन्त, अस्थिसंधि, चक्र, बाण, प्रास तथा अन्य नाना प्रकारके सैकड़ों अस्त्र-शस्त्र सम्पूर्ण दिशाओं और विदिशाओंसे आ-आकर पड़ने लगे ॥ १६—१८ ॥ खरोष्ट्रमहिषाः सिंहा व्याघ्राः सृमरचित्रकाः । ऋक्षाः शालावृका गृध्राः कपयश्च सरीसृपाः ॥ १९ ॥ विविधानि च रक्षांसि क्षुधितान्यर्जुनं प्रति । संक्रुद्धान्यभ्यधावन्त विविधानि वयांसि च ॥ २० ॥ गदहे, ऊँट, भैंसे, सिंह, व्याघ्र, रोज़, चीते, रीक्ष, कुत्ते, गीध, बन्दर, साँप तथा नाना प्रकारके भूखे राक्षस एवं भाँति-भाँतिके पक्षी अत्यन्त कुपित हो अर्जुनपर धावा करने लगे ॥ १९-२० ॥ ततो दिव्यास्त्रविच्छूरः कुन्तीपुत्रो धनंजयः । विसृजन्निषुजालानि सहसा तान्यताडयत् ॥ २१ ॥ तदनन्तर दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता शूरवीर कुन्तीपुत्र धनंजय सहसा बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उन सबको मारने लगे ॥ २१ ॥ ते हन्यमानाः शूरेण प्रवरैः सायकैर्दृढैः । विरुवन्तो महारावान् विनेशुः सर्वतो हताः ॥ २२ ॥ शूरवीर अर्जुनके सुदृढ़ एवं श्रेष्ठ सायकोंद्वारा मारे जाते हुए वे समस्त हिंसक पशु सब ओरसे घायल हो घोर चीत्कार करते हुए वहीं नष्ट हो गये ॥ २२ ॥ ततस्तमः प्रादुरभूदर्जुनस्य रथं प्रति । तस्माच्च तमसो वाचः क्रूराः पार्थमभर्त्सयन् ॥ २३ ॥ तदनन्तर अर्जुनके रथके समीप अन्धकार प्रकट हुआ और उस अंधकारसे क्रूरतापूर्ण बातें कानोंमें, पड़कर अर्जुनको डाँट बताने लगीं ॥ २३ ॥ तत् तमो भैरवं घोरं भयकर्तृ महाहवे ।
उत्तमास्त्रेण महता ज्यौतिषेणार्जुनोऽवधीत् ॥ २४ ॥ उस महासमरमें प्रकट हुए उस भयदायक घोर एवं भयानक अंधकारको अर्जुनने अपने विशाल उत्तम ज्योतिर्मय अस्त्रद्वारा नष्ट कर दिया ॥ २४ ॥ हते तस्मिञ्जलौघास्तु प्रादुरासन् भयानकाः । अम्भसस्तस्य नाशार्थमादित्यास्त्रमथार्जुनः ॥ २५ ॥ प्रायुङ्क्ताम्भस्ततस्तेन प्रायशोऽस्त्रेण शोषितम् । उस अंधकारका निवारण हो जानेपर बड़े भयंकर जलप्रवाह प्रकट होने लगे। तब अर्जुनने उस जलके निवारणके लिये आदित्यास्त्रका प्रयोग किया। उस अस्त्रने वहाँका सारा जल सोख लिया ॥ २५ १/२ ॥ एवं बहुविधा मायाः सौबलस्य कृताः कृताः ॥ २६ ॥ जघानास्त्रबलेनाशु प्रहसन्नर्जुनस्तदा । इस प्रकार सुबलपुत्र शकुनिके द्वारा बारंबार प्रयुक्त हुई नाना प्रकारकी मायाओंको उस समय अर्जुनने अपने अस्त्रबलसे हँसते-हँसते शीघ्र ही नष्ट कर दिया ॥ २६ १/२ ॥ तदा हतासु मायासु त्रस्तोऽर्जुनशराहतः ॥ २७ ॥ अपायाज्जवनैरश्वैः शकुनिः प्राकृतो यथा । तब मायाओंका नाश हो जानेपर अर्जुनके बाणोंसे आहत एवं भयभीत होकर शकुनि अधम मनुष्योंकी भाँति तेज चलनेवाले घोड़ोंके द्वारा भाग खड़ा हुआ ॥ २७ १/२ ॥ ततोऽर्जुनोऽस्त्रविच्छैघ्यं दर्शयन्नात्मनोऽरिषु ॥ २८ ॥ अभ्यवर्षच्छरौघेन कौरवाणामनीकिनीम् । तदनन्तर अस्त्रोंके ज्ञाता अर्जुन शत्रुओंको अपनी फुर्ती दिखाते हुए कौरव-सेनापर बाणसमूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ २८ १/२ ॥ सा हन्यमाना पार्थेन तव पुत्रस्य वाहिनी ॥ २९ ॥ द्वैधीभूता महाराज गङ्गेवासाद्य पर्वतम् । महाराज! अर्जुनके द्वारा मारी जाती हुई आपके पुत्रकी विशाल सेना उसी प्रकार दो भागोंमें बट गयी, मानो गंगा किसी विशाल पर्वतके पास पहुँचकर दो धाराओंमें विभक्त हो गयी हों ॥ २९ १/२ ॥ द्रोणमेवान्वपद्यन्त केचित् तत्र नरर्षभाः ॥ ३० ॥ केचिद् दुर्योधनं राजन्नर्द्यमानाः किरीटिना । राजन्! किरीटधारी अर्जुनसे पीड़ित हो आपकी सेनाके कितने ही नरश्रेष्ठ द्रोणाचार्यके पीछे जा छिपे और कितने ही सैनिक राजा दुर्योधनके पास भाग गये ॥ ३० १/२ ॥ नापश्याम ततस्त्वेनं सैन्ये वै रजसावृते ॥ ३१ ॥ गाण्डीवस्य च निर्घोषः श्रुतो दक्षिणतो मया ।
महाराज! उस समय हमलोग उड़ती हुई धूलराशिसे व्याप्त हुई सेनामें कहीं अर्जुनको देख नहीं पाते थे। मुझे तो दक्षिण दिशाकी ओर केवल उनके धनुषकी टंकार सुनायी देती थी ।। ३१ १/२ ।।
शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषं वादित्राणां च निःस्वनम् ।। ३२ ।।
गाण्डीवस्य तु निर्घोषो व्यतिक्रम्यास्पृशद् दिवम् ।
शंख और दुन्दुभियोंकी ध्वनि, वाद्योंके शब्द तथा गाण्डीव धनुषके गम्भीर घोष आकाशको लाँघकर स्वर्गतक जा पहुँचे ।। ३२ १/२ ।।
ततः पुनर्दक्षिणतः संग्रामश्चित्रयोधिनाम् ।। ३३ ।।
सुयुद्धं चार्जुनस्यासीदहं तु द्रोणमन्वियाम् ।
तत्पश्चात् पुनः दक्षिण दिशामें विचित्र युद्ध करनेवाले योद्धाओंका अर्जुनके साथ बड़ा भारी युद्ध होने लगा और मैं द्रोणाचार्यके पास चला गया ।। ३३ १/२ ।।
यौधिष्ठिराभ्यनीकानि प्रहरन्ति ततस्ततः ।। ३४ ।।
नानाविधान्यनीकानि पुत्राणां तव भारत ।
अर्जुनो व्यधमत् काले दिवीवाभ्राणि मारुतः ।। ३५ ।।
भरतनन्दन! युधिष्ठिरकी सेनाके सैनिक इधर-उधरसे घातक प्रहार कर रहे थे। जैसे वायु आकाशमें बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार उस समय अर्जुन आपके पुत्रोंकी विभिन्न सेनाओंका विनाश करने लगे ।। ३४-३५ ।।
तं वासवमिवायान्तं भूरिवर्षं शरौघिणम् ।
महेष्वासा नरव्याघ्रा नोग्रं केचिदवारयन् ।। ३६ ।।
इन्द्रकी भाँति बाणरूपी जलराशिकी अत्यन्त वर्षा करनेवाले भयंकर वीर अर्जुनको आते देख कोई भी महाधनुर्धर पुरुषसिंह कौरव योद्धा उन्हें रोक न सके ।। ३६ ।।
ते हन्यमानाः पार्थेन त्वदीया व्यथिता भृशम् ।
स्वानेव बहवो जघ्नुर्विद्रवन्तस्ततस्ततः ।। ३७ ।।
अर्जुनकी मार खाकर आपके सैनिक अत्यन्त पीड़ित हो रहे थे। उनमेंसे बहुतेरे जो इधर-उधर भागते समय अपने ही पक्षके योद्धाओंको मार डालते थे ।। ३७ ।।
तेऽर्जुनेन शरा मुक्ताः कङ्कपत्रास्तनुच्छिदः ।
शलभा इव सम्पेतुः संवृण्वाना दिशो दश ।। ३८ ।।
अर्जुनके द्वारा छोड़े हुए कंकपक्षसे युक्त बाण विपक्षी वीरोंके शरीरोंको छेद डालनेवाले थे। वे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करते हुए टिड्डीदलके समान वहाँ सब ओर गिरने लगे ।। ३८ ।।
तुरगं रथिनं नागं पदातिमपि मारिष ।
विनिर्भिद्य क्षितिं जग्मुर्वल्मीकमिव पन्नगाः ।। ३९ ।।
आर्य! वे बाण घोड़े, रथी, हाथी और पैदल सैनिकोंको भी विदीर्ण करके उसी प्रकार धरतीमें समा जाते थे, जैसे सर्प बाँबीमें प्रवेश कर जाते हैं ॥ ३९ ॥
न च द्वितीयं व्यसृजत् कुञ्जराश्वनरेषु सः ।
पृथगेकशरारुग्णा निपेतस्ते गतासवः ॥ ४० ॥
हाथी, घोड़े और मनुष्योंपर अर्जुन दूसरा बाण नहीं छोड़ते थे। वे सब-के-सब पृथक्-पृथक् एक ही बाणसे घायल हो प्राणशून्य होकर धरतीपर गिर पड़ते थे ॥ ४० ॥
हतैर्मनुष्यैर्द्विरदैश्च सर्वतः
शराभिमृष्टैश्च हयैर्निपातितैः ।
तदा श्वगोमायुबलाभिनादितं
विचित्रमायोधशिरो बभूव तत् ॥ ४१ ॥
बाणोंके आघातसे घायल होकर ढेर-के-ढेर मनुष्य मरे पड़े थे। चारों ओर हाथी धराशायी हो रहे थे और बहुत-से घोड़े मार डाले गये थे। उस समय कुत्तों और गीदड़ोंके समूहसे कोलाहलपूर्ण होकर वह युद्धका प्रमुख भाग अद्भुत प्रतीत हो रहा था ॥ ४१ ॥
पिता सुतं त्यजति सुहृद्वरं सुहृत्
तथैव पुत्रः पितरं शरातुरः ।
स्वरक्षणे कृतमतयस्तदा जना-
स्त्यजन्ति वाहानपि पार्थपीडिताः ॥ ४२ ॥
वहाँ पिता पुत्रको त्याग देता था, सुहृद् अपने श्रेष्ठ सुहृद्को छोड़ देता था तथा पुत्र बाणोंके आघातसे आतुर होकर अपने पिताको भी छोड़कर चल देता था। उस समय अर्जुनके बाणोंसे पीड़ित हुए सब लोग अपने-अपने प्राण बचानेकी ओर ध्यान देकर सवारियोंको भी छोड़कर भाग जाते थे ॥ ४२ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि शकुनिपलायने त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें शकुनिका पलायनविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥
एकत्रिशोऽध्यायः
कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध तथा अश्वत्थामाके द्वारा राजा नीलका वध
धृतराष्ट्र उवाच
तेष्वनीकेषु भग्नेषु पाण्डुपुत्रेण संजय ।
चलितानां द्रुतानां च कथमासीन्मनो हि वः ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! पाण्डुपुत्र अर्जुनके द्वारा पराजित हो जब सारी सेनाएँ भाग खड़ी हुईं, उस समय विचलित हो पलायन करते हुए तुमलोगोंके मनकी कैसी अवस्था हो रही थी? ॥ १ ॥
अनीकानां प्रभग्नानामवस्थानमपश्यताम् ।
दुष्करं प्रतिसंधानं तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ २ ॥
भागती हुई सेनाओंको जब अपने ठहरनेके लिये कोई स्थान नहीं दिखायी देता हो, उस समय उन सबको संगठित करके एक स्थानपर ले आना बड़ा कठिन काम होता है। अतः संजय! तुम मुझे वह सब समाचार ठीक-ठीक बताओ ॥ २ ॥
संजय उवाच
तथापि तव पुत्रस्य प्रियकामा विशाम्पते ।
यशः प्रवीरा लोकेषु रक्षन्तो द्रोणमन्वयुः ॥ ३ ॥
**संजयने कहा—**प्रजानाथ! यद्यपि सेनाओंमें भगदड़ पड़ गयी थी, तथापि बहुत-से विश्वविख्यात वीरोंने आपके पुत्रका प्रिय करनेकी इच्छा रखकर अपने यशकी रक्षा करते हुए उस समय द्रोणाचार्यका साथ दिया ॥ ३ ॥
समुद्यतेषु चास्त्रेषु सम्प्राप्ते च युधिष्ठिरे ।
अकुर्वन्नार्यकर्माणि भैरवे सत्यभीतवत् ॥ ४ ॥
अन्तरं भीमसेनस्य प्रापतन्नमितौजसः ।
सात्यकेश्चैव वीरस्य धृष्टद्युम्नस्य वा विभो ॥ ५ ॥
प्रभो! वह भयंकर संग्राम छिड़ जानेपर समस्त योद्धा निर्भय-से होकर आर्यजनोचित पुरुषार्थ प्रकट करने लगे। जब सब ओरसे हथियार उठे हुए थे और राजा युधिष्ठिर सामने आ पहुँचे थे, उस दशामें भीमसेन, सात्यकि अथवा वीर धृष्टद्युम्नकी असावधानीका लाभ उठाकर अमिततेजस्वी कौरवयोद्धा पाण्डव-सेनापर टूट पड़े ॥ ४-५ ॥
द्रोणं द्रोणमिति क्रूराः पञ्चालाः समचोदयन् ।
मा द्रोणमिति पुत्रास्ते कुरून् सर्वानचोदयन् ॥ ६ ॥
क्रूर स्वभाववाले पांचालसैनिक एक-दूसरेको प्रेरित करने लगे, अरे! द्रोणाचार्यको पकड़ लो, द्रोणाचार्यको बंदी बना लो और आपके पुत्र समस्त कौरवोंको आदेश दे रहे थे कि देखना, द्रोणाचार्यको शत्रु पकड़ न पावें ॥ ६ ॥
द्रोणं द्रोणमिति ह्येके मा द्रोणमिति चापरे ।
कुरूणां पाण्डवानां च द्रोणद्यूतमवर्तत ॥ ७ ॥
एक ओरसे आवाज आती थी 'द्रोणको पकड़ो, द्रोणको पकड़ो।' दूसरी ओरसे उत्तर मिलता, 'द्रोणाचार्यको कोई नहीं पकड़ सकता।' इस प्रकार द्रोणाचार्यको दाँवपर रखकर कौरव और पाण्डवोंमें युद्धका जूआ आरम्भ हो गया था ॥ ७ ॥
यं यं प्रमथते द्रोणः पञ्चालानां रथव्रजम् ।
तत्र तत्र तु पाञ्चाल्यो धृष्टद्युम्नोऽभ्यवर्तत ॥ ८ ॥
पांचालोंके जिस-जिस रथसमुदायको द्रोणाचार्य मथ डालनेका प्रयत्न करते, वहाँ-वहाँ पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न उनका सामना करनेके लिये आ जाता था ॥ ८ ॥
तथा भागविपर्यासैः संग्रामे भैरवे सति ।
वीराः समासदन् वीरान् कुर्वन्तो भैरवं रवम् ॥ ९ ॥
इस प्रकार भागविपर्ययद्वारा भयंकर संग्राम आरम्भ होनेपर भैरव-गर्जना करते हुए उभय पक्षके वीरोंने विपक्षी वीरोंपर आक्रमण किया ॥ ९ ॥
अकम्पनीयाः शत्रूणां बभूवुस्तत्र पाण्डवाः ।
अकम्पयन्ननीकानि स्मरन्तः क्लेशमात्मनः ॥ १० ॥
उस समय पाण्डवोंको शत्रुदलके लोग विचलित न कर सके। वे अपनेको दिये गये क्लेशोंको याद करके आपके सैनिकोंको कँपा रहे थे ॥ १० ॥
ते त्वमर्षवशं प्राप्ता ह्रीमन्तः सत्त्वचोदिताः ।
त्यक्त्वा प्राणान् न्यवर्तन्त घ्नन्तो द्रोणं महाहवे ॥ ११ ॥
पाण्डव लज्जाशील, सत्त्वगुणसे प्रेरित और अमर्षके अधीन हो रहे थे। वे प्राणोंकी परवा न करके उस महान् समरमें द्रोणाचार्यका वध करनेके लिये लौट रहे थे ॥ ११ ॥
अयसामिव सम्पातः शिलानामिव चाभवत् ।
दीव्यतां तुमुले युद्धे प्राणैरमिततेजसाम् ॥ १२ ॥
उस भयंकर युद्धमें प्राणोंकी बाजी लगाकर खेलनेवाले अमिततेजस्वी वीरोंका संघर्ष लोहों तथा पत्थरोंके परस्पर टकरानेके समान भयंकर शब्द करता था ॥ १२ ॥
न तु स्मरन्ति संग्राममपि वृद्धास्तथाविधम् ।
दृष्टपूर्वं महाराज श्रुतपूर्वमथापि वा ॥ १३ ॥
महाराज! बड़े-बूढ़े लोग भी पहलेके देखे अथवा सुने हुए किसी भी वैसे संग्रामका स्मरण नहीं करते हैं ॥ १३ ॥
प्राकम्पतेव पृथिवी तस्मिन् वीरावसादने ।
निवर्तता बलौघेन महता भारपीडिता ॥ १४ ॥
वीरोंका विनाश करनेवाले उस युद्धमें लौटते हुए विशाल सैनिकसमूहके महान् भारसे पीड़ित हो यह पृथ्वी काँपने-सी लगी ॥ १४ ॥
घूर्णतोऽपि बलौघस्य दिवं स्तब्ध्वेव निःस्वनः ।
अजातशत्रोस्तत्सैन्यमाविवेश सुभैरवः ॥ १५ ॥
वहाँ सब ओर चक्कर काटते हुए सैन्यसमूहका अत्यन्त भयंकर कोलाहल आकाशको स्तब्ध-सा करके अजातशत्रु युधिष्ठिरकी सेनामें व्याप्त हो गया ॥ १५ ॥
समासाद्य तु पाण्डूनामनीकानि सहस्रशः ।
द्रोणेन चरता संख्ये प्रभग्नानि शितैः शरैः ॥ १६ ॥
रणभूमिमें विचरते हुए द्रोणाचार्यने पाण्डव-सेनामें प्रवेश करके अपने तीखे बाणोंद्वारा सहस्रों सैनिकोंके पाँव उखाड़ दिये ॥ १६ ॥
तेषु प्रमथ्यमानेषु द्रोणेनाद्भुतकर्मणा ।
पर्यवारयदासाद्य द्रोणं सेनापतिः स्वयम् ॥ १७ ॥
अद्भुत पराक्रम करनेवाले द्रोणाचार्यके द्वारा जब उन सेनाओंका मन्थन होने लगा, उस समय स्वयं सेनापति धृष्टद्युम्नने द्रोणके पास पहुँचकर उन्हें रोका ॥ १७ ॥
तदद्भुतमभूद् युद्धं द्रोणपाञ्चालयोस्तथा ।
नैव तस्योपमा काचिदिति मे निश्चिता मतिः ॥ १८ ॥
वहाँ द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नमें अद्भुत युद्ध होने लगा, जिसकी कहीं कोई तुलना नहीं थी, यह मेरा निश्चित मत है ॥ १८ ॥
ततो नीलोऽनलप्रख्यो ददाह कुरुवाहिनीम् ।
शरस्फुलिङ्गश्चापार्चिर्दहन् कक्षमिवानलः ॥ १९ ॥
तदनन्तर अग्निके समान कान्तिमान् नील बाणरूपी चिनगारियों तथा धनूषरूपी लपटोंका विस्तार करते हुए कौरव-सेनाको दग्ध करने लगे, मानो आग घास-फूसके ढेरको जला रही हो ॥ १९ ॥
तं दहन्तमनीकानि द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ।
पूर्वाभिभाषी सुश्लक्ष्णं स्मयमानोऽभ्यभाषत ॥ २० ॥
राजा नीलको कौरव-सेनाका दहन करते देख प्रतापी द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने, जो पहले स्वयं ही वार्तालाप आरम्भ करनेवाला था, मुसकराते हुए मधुर वचनोंमें कहा— ॥ २० ॥
नील किं बहुभिर्दग्धैस्तव योधैः शरार्चिषा ।
मयैकेन हि युध्यस्व क्रुद्धः प्रहर चाशु माम् ॥ २१ ॥
‘नील! तुमको बाणोंकी ज्वालासे इन बहुत-से योद्धाओंको दग्ध करनेसे क्या लाभ? तुम अकेले मुझसे ही युद्ध करो और कुपित होकर मेरे ऊपर शीघ्र प्रहार करो’ ॥ २१ ॥
तं पद्मनिकराकारं पद्मपत्रनिभेक्षणम् ।
व्याकोशपद्माभमुखो नीलो विव्याध सायकैः ॥ २२ ॥ नीलका मुख विकसित कमलके समान कान्तिमान् था। उन्होंने पद्मसमूहकी-सी आकृति तथा कमल-दलके सदृश नेत्रोंवाले अश्वत्थामाको अपने बाणोंसे बींध डाला ॥ २२ ॥
तेनापि विद्धः सहसा दौणिर्भल्लैः शितैस्त्रिभिः । धनुर्ध्वजं च छत्रं च द्विषतः स न्यकृन्तत ॥ २३ ॥ उनके द्वारा घायल होकर अश्वत्थामाने सहसा तीन तीखे भल्लोंद्वारा अपने शत्रु नीलके धनुष, ध्वज तथा छत्रको काट डाला ॥ २३ ॥
स प्लुतः स्यन्दनात्तस्मान्नीलश्चर्मवरासिभृत् । द्रौणायनेः शिरः कायाद्धर्तुमैच्छत् पतत्रिवत् ॥ २४ ॥ तब नील ढाल और सुन्दर तलवार हाथमें लेकर उस रथसे कूद पड़े। जैसे पक्षी किसी मनचाही वस्तुको लेनेके लिये झपट्टा मारता है, उसी प्रकार नीलने भी अश्वत्थामाके धड़से उसका सिर उतार लेनेका विचार किया ॥ २४ ॥
तस्योन्नतांसं सुनसं शिरः कायात् सकुण्डलम् । भल्लेनापाहरद् द्रौणिः स्मयमान इवानघ ॥ २५ ॥ निष्पाप नरेश! उस समय अश्वत्थामाने मुसकराते हुए-से भल्ल मारकर उसके द्वारा नीलके ऊँचे कंधों, सुन्दर नासिकाओं तथा कुण्डलोंसहित मस्तकको धड़से काट गिराया ॥ २५ ॥
सम्पूर्णचन्द्राभमुखः पद्मपत्रनिभेक्षणः । प्रांशुरुत्पलपत्राभो निहतो न्यपतद् भुवि ॥ २६ ॥ पूर्णचन्द्रमाके समान कान्तिमान् मुख और कमलदलके समान सुन्दर नेत्रवाले राजा नील बड़े ऊँचे कदके थे। उनकी अंगकान्ति नीलकमल-दलके समान श्याम थी। वे अश्वत्थामाद्वारा मारे जाकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ २६ ॥
ततः प्रविव्यथे सेना पाण्डवी भृशमाकुला । आचार्यपुत्रेण हते नीले ज्वलिततेजसि ॥ २७ ॥ आचार्यपुत्रके द्वारा प्रज्वलित तेजवाले राजा नीलके मारे जानेपर पाण्डव-सेना अत्यन्त व्याकुल और व्यथित हो उठी ॥ २७ ॥
अचिन्तयंश्च ते सर्वे पाण्डवानां महारथाः । कथं नो वासविस्त्रायाच्छत्रुभ्य इति मारिष ॥ २८ ॥ आर्य! उस समय समस्त पाण्डव महारथी यह सोचने लगे कि इन्द्रकुमार अर्जुन शत्रुओंके हाथसे हमारी रक्षा कैसे कर सकते हैं? ॥ २८ ॥
दक्षिणेन तु सेनायाः कुरुते कदनं बली । संशप्तकावशेषस्य नारायणबलस्य च ॥ २९ ॥
वे बलवान् अर्जुन तो इस सेनाके दक्षिण भागमें बचे-खुचे संशप्तकों और नारायणी सेनाके सैनिकोंका संहार कर रहे हैं॥ २९॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि संशप्तकवधपर्वणि नीलवधे एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत संशप्तकवधपर्वमें नीलवधविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१॥
द्वात्रिंशोऽध्यायः
कौरव-पाण्डव-सेनाओंका घमासान युद्ध, भीमसेनका कौरव महारथियोंके साथ संग्राम, भयंकर संहार, पाण्डवोंका द्रोणाचार्यपर आक्रमण, अर्जुन और कर्णका युद्ध, कर्णके भाइयोंका वध तथा कर्ण और सात्यकिका संग्राम
संजय उवाच
प्रतिघातं तु सैन्यस्य नामृष्यत वृकोदरः ।
सोऽभ्याहनद् गुरुं षष्ट्या कर्णं च दशभिः शरैः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— महाराज! अपनी सेनाका वह विनाश भीमसेनसे नहीं सहा गया। उन्होंने गुरुदेवको साठ और कर्णको दस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ १ ॥
तस्य द्रोणः शितैर्बाणैस्तीक्ष्णधारैरजिह्मगैः ।
जीवितान्तमभिप्रेप्सुर्मर्माण्याशु जघान ह ॥ २ ॥
तब द्रोणाचार्यने सीधे जानेवाले, तीखी धारसे युक्त पैने बाणोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक भीमसेनके मर्मस्थानोंपर आघात किया। वे भीमसेनके प्राणोंका अन्त कर देना चाहते थे ॥ २ ॥
आनन्तर्यमभिप्रेप्सुः षड्विंशत्या समर्पयत् ।
कर्णो द्वादशभिर्बाणैरश्वत्थामा च सप्तभिः ॥ ३ ॥
इस आघात-प्रतिघातको निरन्तर जारी रखनेकी इच्छासे द्रोणाचार्यने भीमसेनको छब्बीस, कर्णने बारह और अश्वत्थामाने सात बाण मारे ॥ ३ ॥
षड्भिर्दुर्योधनो राजा तत एनमथाकिरत् ।
भीमसेनोऽपि तान् सर्वान् प्रत्यविध्यन्महाबलः ॥ ४ ॥
तदनन्तर राजा दुर्योधनने उनके ऊपर छः बाणोंद्वारा प्रहार किया। फिर महाबली भीमसेनने उन सबको अपने बाणोंद्वारा घायल कर दिया ॥ ४ ॥
द्रोणं पञ्चाशतेषूणां कर्णं च दशभिः शरैः ।
दुर्योधनं द्वादशभिर्द्रौणिमष्टाभिराशुगैः ॥ ५ ॥
उन्होंने द्रोणको पचास, कर्णको दस, दुर्योधनको बारह और अश्वत्थामाको आठ बाण मारे ॥ ५ ॥
आरावं तुमुलं कुर्वन्नभ्यवर्तत तान् रणे ।
तस्मिन् संत्यजति प्राणान् मृत्युसाधारणीकृते ॥ ६ ॥
अजातशत्रुस्तान् योधान् भीमं त्रातेत्यचोदयत् । ते ययुर्भीमसेनस्य समीपममितौजसः ॥ ७ ॥ तत्पश्चात् भयंकर गर्जना करते हुए भीमने रणक्षेत्रमें उन सबका सामना किया। भीमसेन मृत्युके तुल्य अवस्थामें पहुँच गये थे और अपने प्राणोंका परित्याग करना चाहते थे। उसी समय अजातशत्रु युधिष्ठिरने अपने योद्धाओंको यह कहकर आगे बढ़नेकी आज्ञा दी कि 'तुम सब लोग भीमसेनकी रक्षा करो।' यह सुनकर वे अमित तेजस्वी वीर भीमसेनके समीप चले ॥ ६-७ ॥
युयुधानप्रभृतयो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । ते समेत्य सुसंरब्धाः सहिताः पुरुषर्षभाः ॥ ८ ॥ महेष्वासवरैर्गुप्ता द्रोणानीकं बिभित्सवः । समापेतुर्महावीर्या भीमप्रभृतयो रथाः ॥ ९ ॥ सात्यकि आदि महारथी तथा पाण्डुकुमार माद्रीपुत्र नकुल-सहदेव—ये सभी पुरुषश्रेष्ठ वीर परस्पर मिलकर एक साथ अत्यन्त क्रोधमें भरकर बड़े-बड़े धनुर्धरोंसे सुरक्षित हो द्रोणाचार्यकी सेनाको विदीर्ण कर डालनेकी इच्छासे उसपर टूट पड़े। वे भीम आदि सभी महारथी अत्यन्त पराक्रमी थे ॥ ८-९ ॥
तान् प्रत्यगृह्णादव्यग्रो द्रोणोऽपि रथिनां वरः । महारथानतिबलान् वीरान् समरयोधिनः ॥ १० ॥ उस समय रथियोंमें श्रेष्ठ आचार्य द्रोणने घबराहट छोड़कर उन अत्यन्त बलवान् समरभूमिमें युद्ध करनेवाले महारथी वीरोंको रोक दिया ॥ १० ॥
बाह्यं मृत्युभयं कृत्वा तावकान् पाण्डवा ययुः । सादिनः सादिनोऽभ्यघ्नंस्तथैव रथिनो रथान् ॥ ११ ॥ परंतु पाण्डववीर मौतके भयको बाहर छोड़कर आपके सैनिकोंपर चढ़ आये। घुड़सवार घुड़सवारोंको तथा रथारोही योद्धा रथियोंको मारने लगे ॥ ११ ॥
आसीच्छक्त्यासिसम्पातो युद्धमासीत् परश्वधैः । प्रकृष्टमसियुद्धं च बभूव कटुकोदयम् ॥ १२ ॥ उस युद्धमें शक्ति और खड्गोंके घातक प्रहार हो रहे थे। फरसोंसे मार-काट हो रही थी। तलवार खींचकर उसके द्वारा ऐसा भयंकर युद्ध हो रहा था कि उसका कटु परिणाम प्रत्यक्ष सामने आ रहा था ॥ १२ ॥
कुञ्जराणां च सम्पाते युद्धमासीत् सुदारुणम् । अपतत् कुञ्जरादन्यो हयादन्यस्त्ववाक्शिराः ॥ १३ ॥ हाथियोंके संघर्षमें अत्यन्त दारुण संग्राम होने लगा। कोई हाथीसे गिरता था तो कोई घोड़ेसे ही औंधे सिर धराशायी हो रहा था ॥ १३ ॥
नरो बाणविनिर्भिन्नो रथादन्यश्च मारिष ।
तत्रान्यस्य च सम्मर्दे पतितस्य विवर्मणः ।। १४ ।। शिरः प्रध्वंसयामास वक्षस्याक्रम्य कुञ्जरः । आर्य! उस युद्धमें कितने मनुष्य बाणोंसे विदीर्ण होकर रथसे नीचे गिर जाते थे। कितने ही योद्धा कवचशून्य हो धरतीपर गिर पड़ते थे और सहसा कोई हाथी उनकी छातीपर पैर रखकर उनके मस्तकको भी कुचल देता था ।। १४ १/२ ।। अपरांश्चापरेऽमृद्नन् वारणाः पतितान् नरान् ।। १५ ।। विषाणैश्चावनिं गत्वा व्यभिन्दन् रथिनो बहून् । दूसरे हाथियोंने भी दूसरे बहुत-से गिरे हुए मनुष्यों-को अपने पैरोंसे रौंद डाला। अपने दाँतोंसे धरतीपर आघात करके बहुत-से रथियोंको चीर डाला ।। १५ १/२ ।। नरान्त्रैः केचिदपरे विषाणालग्नसंश्रयैः ।। १६ ।। बभ्रमुः समरे नागा मृद्नन्तः शतशो नरान् । कितने ही गजराज अपने दाँतोंमें लगी हुई मनुष्योंकी आँतें लिये समरभूमिमें सैकड़ों योद्धाओंको कुचलते हुए चक्कर लगा रहे थे ।। १६ १/२ ।। कार्ष्णायसतनुत्राणान् नरांश्चरथकुञ्जरान् ।। १७ ।। पतितान् पोथयाञ्चक्रुर्द्विपाः स्थूलनलानिव । काले रंगके लोहमय कवच धारण करके रणभूमिमें गिरे हुए कितने ही मनुष्यों, रथों, घोड़ों और हाथियोंको बड़े-बड़े गजराजोंने मोटे नरकुलोंके समान रौंद डाला ।। १७ १/२ ।। गृध्रपत्राधिवासांसि शयनानि नराधिपाः ।। १८ ।। ह्रीमन्तः कालसम्पर्कात् सुदुःखान्यनुशेरते । बड़े-बड़े राजा कालसंयोगसे अत्यन्त दुःखदायिनी तथा गीधकी पाँखरूपी बिछौनोंसे युक्त शय्याओंपर लज्जापूर्वक सो रहे थे ।। १८ १/२ ।। हन्ति स्मात्र पिता पुत्रं रथेनाभ्येत्य संयुगे ।। १९ ।। पुत्रश्च पितरं मोहान्निर्मर्यादमवर्तत । वहाँ पिता रथके द्वारा युद्धके मैदानमें आकर पुत्रका ही वध कर डालता था और पुत्र भी मोहवश पिताके प्राण ले रहा था। इस प्रकार वहाँ मर्यादाशून्य युद्ध हो रहा था ।। १९ १/२ ।। रथो भग्नो ध्वजश्छिन्नश्छत्रमुर्व्यां निपातितम् ।। २० ।। युगार्धं छिन्नमादाय प्रदुद्राव तथा हयः । कितने ही रथ टूट गये, ध्वज कट गये, छत्र पृथ्वीपर गिरा दिये गये और जूए खण्डित हो गये। उन खण्डित हुए आधे जूओंको ही लेकर घोड़े तेजीसे भाग रहे थे ।। २० १/२ ।। सासिर्बाहुर्निपतितः शिरश्छिन्नं सकुण्डलम् ।। २१ ।। गजेनाक्षिप्य बलिना रथः संचूर्णितः क्षितौ ।