महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
महाराज! राक्षस, पिशाच और गुह्यक—ये गिरिराज हिमालय तथा गन्धमादन पर्वतकी रक्षा करते हैं और अविनाशी एवं सर्वव्यापी भगवान् जनार्दन समस्त प्राणियोंका पालन करते हैं (परंतु बाहीक देशपर किसी भी देवताका विशेष अनुग्रह नहीं है) ॥ ३३ १/२ ॥
इङ्गितज्ञाश्च मगधाः प्रेक्षितज्ञाश्च कोसलाः ॥ ३४ ॥
अर्धोक्ताः कुरुपञ्चालाः शाल्वाः कृत्स्नानुशासनाः ।
पर्वतीयाश्च विषमा यथैव शिबयस्तथा ॥ ३५ ॥
मगधदेशके लोग इशारेसे ही सब बात समझ लेते हैं, कोसलनिवासी नेत्रोंकी भावभंगीसे मनका भाव जान लेते हैं, कुरु तथा पांचालदेशके लोग आधी बात कहनेपर ही पूरी बात समझ लेते हैं, शाल्वदेशके निवासी पूरी बात कह देनेपर उसे समझ पाते हैं, परंतु शिबिदेशके लोगोंकी भाँति पर्वतीय प्रान्तोंके निवासी इन सबसे विलक्षण होते हैं। वे पूरी बात कहनेपर भी नहीं समझ पाते ॥ ३४-३५ ॥
सर्वज्ञा यवना राजन् शूराश्चैव विशेषतः ।
म्लेच्छाः स्वसंज्ञानियता नानुक्तमितरे जनाः ॥ ३६ ॥
प्रतिरब्धास्तु वाहीका न च केचन मद्रकाः ।
राजन्! यद्यपि यवनजातीय म्लेच्छ सभी उपायोंसे बात समझ लेनेवाले और विशेषतः शूर होते हैं, तथापि अपने द्वारा कल्पित संज्ञाओंपर ही अधिक आग्रह रखते हैं (वैदिक धर्मको नहीं मानते)। अन्य देशोंके लोग बिना कहे हुए कोई बात नहीं समझते हैं, परंतु बाहीक देशके लोग सब काम उलटे ही करते हैं (उनकी समझ उलटी ही होती है) और मद्रदेशके कुछ निवासी तो ऐसे होते हैं कि कुछ भी नहीं समझ पाते ॥ ३६ १/२ ॥
स त्वमेतादृशः शल्य नोत्तरं वक्तुमर्हसि ।
पृथिव्यां सर्वदेशानां मद्रको मलमूच्यते ॥ ३७ ॥
शल्य! ऐसे ही तुम हो। अब मेरी बातका जवाब नहीं दोगे। मद्रदेशके निवासीको पृथ्वीके सम्पूर्ण देशोंका मल बताया जाता है ॥ ३७ ॥
सीधोः पानं गुरुतल्पावमर्दो
भ्रूणहत्या परवित्तापहारः ।
येषां धर्मस्तान् प्रति नास्त्यधर्म
आरट्टजान् पञ्चनदान् धिगस्तु ॥ ३८ ॥
मदिरापान, गुरुकी शय्याका उपभोग, भ्रूणहत्या और दूसरोंके धनका अपहरण—ये जिनके लिये धर्म हैं, उनके लिये अधर्म नामकी कोई वस्तु है ही नहीं। ऐसे आरट्ट और पंचनददेशके लोगोंको धिक्कार है! ॥
एतज्ज्ञात्वा जोषमास्व प्रतीपं मा स्म वै कृथाः ।
मा त्वां पूर्वमहं हत्वा हनिष्ये केशवार्जुनौ ॥ ३९ ॥
यह जानकर तुम चुपचाप बैठे रहो। फिर कोई प्रतिकूल बात मुँहसे न निकालो। अन्यथा पहले तुम्हींको मारकर पीछे श्रीकृष्ण और अर्जुनका वध करूँगा ॥ ३९ ॥
शल्य उवाच
आतुराणां परित्यागः स्वदारसुतविक्रयः ।
अङ्गे प्रवर्तते कर्ण येषामधिपतिर्भवान् ॥ ४० ॥
**शल्य बोले—**कर्ण! तुम जहाँके राजा बनाये गये हो, उस अंगदेशमें क्या होता है? अपने सगे-सम्बन्धी जब रोगसे पीड़ित हो जाते हैं तो उनका परित्याग कर दिया जाता है। अपनी ही स्त्री और बच्चोंको वहाँके लोग सरे बाजार बेचते हैं ॥ ४० ॥
रथातिरथसंख्यायां यत् त्वां भीष्मस्तदाब्रवीत् ।
तान् विदित्वाऽऽत्मनो दोषान् निर्मन्युर्भव मा क्रुधः ॥ ४१ ॥
उस दिन रथी और अतिरथियोंकी गणना करते समय भीष्मजीने तुमसे जो कुछ कहा था, उसके अनुसार अपने उन दोषोंको जानकर क्रोधरहित हो शान्त हो जाओ ॥ ४१ ॥
सर्वत्र ब्राह्मणाः सन्ति सन्ति सर्वत्र क्षत्रियाः ।
वैश्याः शूद्रास्तथा कर्ण स्त्रियः साध्व्यश्च सुव्रताः ॥ ४२ ॥
कर्ण! सर्वत्र ब्राह्मण हैं। सब जगह क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं तथा सभी देशोंमें उत्तम व्रतका पालन करनेवाली साध्वी स्त्रियाँ होती हैं ॥ ४२ ॥
रमन्ते चोपहासेन पुरुषाः पुरुषैः सह ।
अन्योन्यमवतक्षन्तो देशे देशे समैथुनाः ॥ ४३ ॥
सभी देशोंके पुरुष दूसरे पुरुषोंके साथ बात करते समय उपहासके द्वारा एक-दूसरेको चोट पहुँचाते हैं और स्त्रियोंके साथ रमण करते हैं ॥ ४३ ॥
परवाच्येषु निपुणः सर्वो भवति सर्वदा ।
आत्मवाच्यं न जानीते जानन्नपि च मुह्यति ॥ ४४ ॥
दूसरोंके दोष बतानेमें सभी लोग सदा ही निपुण होते हैं; परंतु अपने दोषोंका उन्हें पता नहीं रहता, अथवा जानकर भी अनजान बने रहते हैं ॥ ४४ ॥
सर्वत्र सन्ति राजानः स्वं स्वं धर्ममनुव्रताः ।
दुर्मनुष्यान् निगृह्णन्ति सन्ति सर्वत्र धार्मिकाः ॥ ४५ ॥
सभी देशोंमें अपने-अपने धर्मका पालन करनेवाले राजा रहते हैं, जो दुष्टोंका दमन करते हैं तथा सर्वत्र ही धर्मात्मा मनुष्य निवास करते हैं ॥ ४५ ॥
न कर्ण देशसामान्यात् सर्वः पापं निषेवते ।
यादृशाः स्वस्वभावेन देवा अपि न तादृशाः ॥ ४६ ॥
कर्ण! एक देशमें रहनेमात्रसे सब लोग पापका ही सेवन नहीं करते हैं। उसी देशमें मनुष्य अपने श्रेष्ठ शील-स्वभावके कारण ऐसे महापुरुष हो जाते हैं कि देवता भी उनकी
बराबरी नहीं कर सकते ।। ४६ ।।
संजय उवाच
ततो दुर्योधनो राजा कर्णशल्याववारयत् ।
सखिभावेन राधेयं शल्यं स्वाञ्जल्यकेन च ।। ४७ ।।
संजय कहते हैं— राजन्! तब राजा दुर्योधनने कर्ण तथा शल्य दोनोंको रोक दिया। उसने कर्णको तो मित्रभावसे समझाकर मना किया और शल्यको हाथ जोड़कर रोका ।। ४७ ।।
ततो निवारितः कर्णो धार्तराष्ट्रेण मारिष ।
कर्णोऽपि नोत्तरं प्राह शल्योऽप्यभिमुखः परान् ।
ततः प्रहस्य राधेयः पुनर्याहीत्यचोदयत् ।। ४८ ।।
मान्यवर! दुर्योधनके मना करनेपर कर्णने कोई उत्तर नहीं दिया और शल्यने भी शत्रुओंकी ओर मुँह फेर लिया। तब राधापुत्र कर्णने हँसकर शल्यको रथ बढ़ानेकी आज्ञा देते हुए कहा—'चलो, चलो' ।। ४८ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक पैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४५ ।।
* विभिन्न जातियोंके कर्मको अपनानेके कारण वह उन जातियोंके नामसे निर्दिष्ट होने लगता है।
कौरव-सेनाकी व्यूह-रचना, युधिष्ठिरके आदेशसे अर्जुनका आक्रमण, शल्यके द्वारा पाण्डव-सेनाके प्रमुख वीरोंका वर्णन तथा अर्जुनकी प्रशंसा
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः
कौरव-सेनाकी व्यूह-रचना, युधिष्ठिरके आदेशसे अर्जुनका आक्रमण, शल्यके द्वारा पाण्डव-सेनाके प्रमुख वीरोंका वर्णन तथा अर्जुनकी प्रशंसा
संजय उवाच
ततः परानीकसहं व्यूहमप्रतिमं कृतम् ।
समीक्ष्य कर्णः पार्थानां धृष्टद्युम्नाभिरक्षितम् ॥ १ ॥
प्रययौ रथघोषेण सिंहनादरवेण च ।
वादित्राणां च निनदैः कम्पयन्निव मेदिनीम् ॥ २ ॥
वेपमान इव क्रोधाद् युद्धशौण्डः परंतपः ।
प्रतिव्यूह्य महातेजा यथावद् भरतर्षभ ॥ ३ ॥
व्यधमत् पाण्डवीं सेनामासुरीं मघवानिव ।
युधिष्ठिरं चाभ्यहनदपसव्यं चकार ह ॥ ४ ॥
**संजय कहते हैं—**भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर यह देखकर कि कुन्तीकुमारोंकी सेनाका अनुपम व्यूह बनाया गया है, जो शत्रुदलके आक्रमणको सह सकनेमें समर्थ और धृष्टद्युम्नद्वारा सुरक्षित है, शत्रुओंको संताप देनेवाला युद्धकुशल कर्ण रथकी घर्घराहट, सिंहकी-सी गर्जना तथा वाद्योंकी गम्भीर ध्वनिसे पृथ्वीको कँपाता और स्वयं भी क्रोधसे काँपता हुआ-सा आगे बढ़ा। उस महातेजस्वी वीरने शत्रुओंके मुकाबलेमें अपनी सेनाकी यथोचित व्यूह-रचना करके, जैसे इन्द्र आसुरी सेनाका संहार करते हैं, उसी प्रकार पाण्डव-सेनाका विनाश आरम्भ कर दिया और युधिष्ठिरको भी घायल करके दाहिने कर दिया ॥ १—४ ॥
(तानि सर्वाणि सैन्यानि कर्णं दृष्ट्वा विशाम्पते ।
बभूवुः सम्प्रहृष्टानि तावकानि युयुत्सया ॥
अश्रूयन्त ततो वाचस्तावकानां विशाम्पते ।
प्रजानाथ! (उस समय) आपके सभी सैनिक कर्णको देखकर युद्धकी इच्छासे हर्ष और उत्साहमें भर गये। राजन्! उस समय आपके योद्धाओंकी कही हुई ये बातें सुनायी देने लगीं।
सैनिका ऊचुः
कर्णार्जुनमहायुद्धमेतदद्य भविष्यति ।
अद्य दुर्योधनो राजा हतामित्रो भविष्यति ॥
सैनिक बोले— आज यह कर्ण और अर्जुनका महान् युद्ध होगा। आज राजा दुर्योधनके सारे शत्रु मार डाले जायँगे। अद्य कर्णं रणे दृष्ट्वा फाल्गुनो विद्रविष्यति । अद्य तावद् वयं युद्धे कर्णस्यैवानुगामिनः ॥ कर्णबाणमयं भीमं युद्धं द्रक्ष्याम संयुगे । आज अर्जुन रणभूमिमें कर्णको देखते ही भाग खड़े होंगे। आज युद्धमें हमलोग कर्णके ही अनुगामी होकर समरांगणमें कर्णके बाणोंसे भरा हुआ भीषण संग्राम देखेंगे। चिरकालागतमिदमद्येदानीं भविष्यति ॥ अद्य द्रक्ष्याम संग्रामं घोरं देवासुरोपमम् । दीर्घकालसे जिसकी सम्भावना की जाती थी, वह आज इसी समय उपस्थित होगा। आज हमलोग देवासुर-संग्रामके समान भयंकर युद्ध देखेंगे। अद्येदानीं महद् युद्धं भविष्यति भयानकम् ॥ अद्येदानीं जयो नित्यमेकस्यैकस्य वा रणे । आज अभी बड़ा भयानक युद्ध छिड़नेवाला है। आज रणभूमिमें इन दोनोंमेंसे एक-न-एककी विजय अवश्य होगी। अर्जुनं किल राधेयो वधिष्यति महारणे ॥ अथवा कं नरं लोके न स्पृशन्ति मनोरथाः । निश्चय ही राधापुत्र कर्ण इस महायुद्धमें अर्जुनका वध कर डालेगा अथवा इस जगत्में किस मनुष्यके अंदर बड़े-बड़े मनसूबे नहीं उठते हैं।
संजय उवाच
इत्युक्त्वा विविधा वाचः कुरवः कुरुनन्दन । आजघ्नुः पटहांश्चैव तूर्यांश्चैव सहस्रशः ॥ संजय कहते हैं— कुरुनन्दन! इस तरह नाना प्रकारकी बातें कहकर कौरवोंने सहस्रों नगाड़े पीटे और दूसरे-दूसरे बाजे भी बजवाये। भेरीनादांश्च विविधान् सिंहनादांश्च पुष्कलान् । मुरजानां महाशब्दानानाकानां महारवान् ॥ भाँति-भाँतिकी भेरी-ध्वनि हुई और बारंबार सैनिकोंद्वारा सिंहनाद किये गये। गम्भीर ध्वनि करनेवाले ढोल और मृदंगके महान् शब्द वहाँ सब ओर गूँजने लगे। नृत्यमानाश्च बहवस्तर्जमानाश्च मारिष । अन्योन्यमभ्ययुर्युद्धे युद्धरङ्गगता नराः ॥ मान्यवर नरेश! युद्धके रंगभूमिमें उतरे हुए बहुसंख्यक मनुष्य नृत्य तथा गर्जन-तर्जन करते हुए एक-दूसरेका सामना करनेके लिये आगे बढ़े।
तेषां पदाता नागानां पादरक्षाः समन्ततः । पट्टिशासिधराः शूराश्चापबाणभुशुण्डिनः ॥ भिन्दिपालधराश्चैव शूलहस्ताः सुचक्रिणः । तेषां समागमो घोरो देवासुररणोपमः ॥) उनमें शूरवीर पैदल सैनिक चारों ओरसे पट्टिश, खड्ग, धनुष-बाण, भुशुण्डी, भिन्दिपाल, त्रिशूल और चक्र हाथमें लेकर हाथियोंके पैरोंकी रक्षा कर रहे थे। उनमें देवासुर-संग्रामके समान भयंकर युद्ध छिड़ गया।
धृतराष्ट्र उवाच
कथं संजय राधेयः प्रत्यव्यूहत पाण्डवान् । धृष्टद्युम्नमुखान् सर्वान् भीमसेनाभिरक्षितान् ॥ ५ ॥ सर्वानैव महेष्वासानजय्यानमरैरपि । के च प्रपक्षौ पक्षौ वा मम सैन्यस्य संजय ॥ ६ ॥ धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! राधापुत्र कर्णने देवताओंके लिये भी अजेय तथा भीमसेनद्वारा सुरक्षित धृष्टद्युम्न आदि सम्पूर्ण महाधनुर्धर पाण्डव-वीरोंके जवाबमें किस प्रकार व्यूहका निर्माण किया? संजय! मेरी सेनाके दोनों पक्ष और प्रपक्षके रूपमें कौन-कौनसे वीर थे? ॥ ५-६ ॥ प्रविभज्य यथान्यायं कथं वा समवस्थिताः । कथं पाण्डुसुताश्चापि प्रत्यव्यूहन्त मामकान् ॥ ७ ॥ वे किस प्रकार यथोचित रूपसे योद्धाओंका विभाजन करके खड़े हुए थे? पाण्डवोंने भी मेरे पुत्रोंके मुकाबलेमें कैसे व्यूहका निर्माण किया था? ॥ ७ ॥ कथं चैव महद् युद्धं प्रावर्तत सुदारुणम् । क्व च बीभत्सुरभवद् यत् कर्णोऽयाद् युधिष्ठिरम् ॥ ८ ॥ यह अत्यन्त भयंकर महायुद्ध किस प्रकार आरम्भ हुआ? अर्जुन कहाँ थे कि कर्णने युधिष्ठिरपर आक्रमण कर दिया? ॥ ८ ॥ को ह्यर्जुनस्य सान्निध्ये शक्तोऽभ्येतुं युधिष्ठिरम् । सर्वभूतानि यो ह्येकः खाण्डवे जितवान् पुरा । कस्तमन्यस्तु राधेयात् प्रतियुध्येज्जिजीविषुः ॥ ९ ॥ जिन्होंने पूर्वकालमें अकेले ही खाण्डववनमें समस्त प्राणियोंको परास्त कर दिया था, उन अर्जुनके समीप रहते हुए युधिष्ठिरपर कौन आक्रमण कर सकता था? राधापुत्र कर्णके सिवा दूसरा कौन है जो जीवित रहनेकी इच्छा रखते हुए भी अर्जुनके सामने युद्ध कर सके ॥ ९ ॥
संजय उवाच
शृणु व्यूहस्य रचनामर्जुनश्च यथा गतः ।
परिवार्य नृपं स्वं स्वं संग्रामश्चाभवद् यथा ॥ १० ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! व्यूहकी रचना किस प्रकार हुई थी, अर्जुन कैसे और कहाँ चले गये थे और अपने-अपने राजाको सब ओरसे घेरकर दोनों दलोंके योद्धाओंने किस प्रकार संग्राम किया था? यह सब बताता हूँ, सुनिये ॥ १० ॥
कृपः शारद्वतो राजन् मागधाश्च तरस्विनः ।
सात्वतः कृतवर्मा च दक्षिणं पक्षमाश्रिताः ॥ ११ ॥
तेषां प्रपक्षे शकुनिरुलूकश्च महारथः ।
सादिभिर्विमलप्रासैस्त्वानीकमरक्षताम् ॥ १२ ॥
नरेश्वर! शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य, वेगशाली मागध वीर और सात्वतवंशी कृतवर्मा—ये व्यूहके दाहिने पक्षका आश्रय लेकर खड़े थे। महारथी शकुनि और उलूक चमचमाते हुए प्रासोंसे सुशोभित घुड़सवारोंके साथ उनके प्रपक्षमें स्थित हो आपके व्यूहकी रक्षा कर रहे थे ॥ ११-१२ ॥
गान्धारिभिरसम्भ्रान्तैः पर्वतीयैश्च दुर्जयैः ।
शलभानामिव व्रातैः पिशाचैरिव दुर्द्दशैः ॥ १३ ॥
उनके साथ कभी घबराहटमें न पड़नेवाले गान्धारदेशीय सैनिक और दुर्जय पर्वतीय वीर भी थे। पिशाचोंके समान उन योद्धाओंकी ओर देखना कठिन हो रहा था और वे टिड्डीदलोंके समान यूथ बनाकर चलते थे ॥ १३ ॥
चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि रथानामनिवर्तिनाम् ।
संशप्तका युद्धशौण्डा वामं पार्श्वमपालयन् ॥ १४ ॥
समन्वितास्तव सुतैः कृष्णार्जुनजिघांसवः ।
श्रीकृष्ण और अर्जुनको मार डालनेकी इच्छावाले युद्ध-निपुण संशप्तक योद्धा युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले रथी वीर थे। उनकी संख्या चौंतीस हजार थी। वे आपके पुत्रोंके साथ रहकर व्यूहके वाम पार्श्वकी रक्षा करते थे ॥ १४ १/२ ॥
तेषां प्रपक्षाः काम्बोजाः शकाश्च यवनैः सह ॥ १५ ॥
निदेशात् सूतपुत्रस्य सरथाः साश्वपत्तयः ।
आह्वयन्तोऽर्जुनं तस्थुः केशवं च महाबलम् ॥ १६ ॥
उनके प्रपक्षस्थानमें सूतपुत्रकी आज्ञासे रथों, घुड़सवारों और पैदलोंसहित काम्बोज, शक तथा यवन महाबली श्रीकृष्ण और अर्जुनको ललकारते हुए खड़े थे ॥ १५-१६ ॥
मध्ये सेनामुखे कर्णोऽप्यवातिष्ठत दंशितः ।
चित्रवर्माङ्गदः स्रग्वी पालयन् वाहिनीमुखम् ॥ १७ ॥
कर्ण भी विचित्र कवच, अंगद और हार धारण करके सेनाके मुखभागकी रक्षा करता हुआ व्यूहके मुहानेपर ठीक बीचो-बीचमें खड़ा था ॥ १७ ॥
रक्षमाणैः सुसंरब्धैः पुत्रैः शस्त्रभृतां वरः ।
वाहिनीं प्रमुखे वीरः सम्प्रकर्षन्नशोभत ॥ १८ ॥
अभ्यवर्त्तन्महाबाहुः सूर्यवैश्वानरप्रभः ।
सूर्य और अग्निके समान तेजस्वी और शस्त्र-धारियोंमें श्रेष्ठ महाबाहु कर्ण रोष और जोशमें भरकर सेनापतिकी रक्षामें तत्पर हुए आपके पुत्रोंके साथ प्रमुख भागमें स्थित हो कौरव-सेनाको अपने साथ खींचता हुआ बड़ी शोभा पा रहा था, वह शत्रुओंके सामने डटा हुआ था ॥ १८ १/२ ॥
महाद्विपस्कन्धगतः पिङ्गाक्षः प्रियदर्शनः ॥ १९ ॥
दुःशासनो वृतः सैन्यैः स्थितो व्यूहस्य पृष्ठतः ।
व्यूहके पृष्ठभागमें पिंगल नेत्रोंवाला प्रियदर्शन दुःशासन सेनाओंसे घिरा हुआ खड़ा था। वह एक विशाल गजराजकी पीठपर विराजमान था ॥ १९ १/२ ॥
तमन्वयान्महाराज स्वयं दुर्योधनो नृपः ॥ २० ॥
चित्रास्त्रैश्चित्रसंनाहैः सोदर्यैरभिरक्षितः ।
रक्ष्यमाणो महावीर्यैः सहितैर्मद्रकेकयैः ॥ २१ ॥
अशोभत महाराज देवैरिव शतक्रतुः ।
महाराज! विचित्र अस्त्र और कवच धारण करनेवाले सहोदर भाइयों तथा एक साथ आये हुए मद्र और केकयदेशके महापराक्रमी योद्धाओंद्वारा सुरक्षित साक्षात् राजा दुर्योधन दुःशासनके पीछे-पीछे चल रहा था। महाराज! उस समय देवताओंसे घिरे हुए देवराज इन्द्रके समान उसकी शोभा हो रही थी ॥ २०-२१ १/२ ॥
अश्वत्थामा कुरूणां च ये प्रवीरा महारथाः ॥ २२ ॥
नित्यमत्ताश्च मातङ्गाः शूरैर्म्लेच्छैः समन्विताः ।
अन्वयुस्तद् रथानीकं क्षरन्त इव तोयदाः ॥ २३ ॥
अश्वत्थामा, कौरवपक्षके प्रमुख महारथी वीर, शौर्यसम्पन्न म्लेच्छ सैनिकोंसे युक्त नित्य मतवाले हाथी वर्षा करनेवाले मेघोंके समान मदकी धारा बहाते हुए उस रथसेनाके पीछे-पीछे चल रहे थे ॥ २२-२३ ॥
ते ध्वजैर्वैजयन्तीभिर्ज्वलद्भिः परमायुधैः ।
सादिभिश्चास्थिता रेजुर्द्रुमवन्त इवाचलाः ॥ २४ ॥
वे हाथी ध्वजों, वैजयन्ती पताकाओं, प्रकाशमान अस्त्र-शस्त्रों तथा सवारोंसे सुशोभित हो वृक्षसमूहोंसे युक्त पर्वतोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ २४ ॥
तेषां पदातिनागानां पादरक्षाः सहस्रशः ।
पट्टिशासिधराः शूरा बभूवुरनिवर्तिनः ॥ २५ ॥
पट्टिश और खड्ग धारण किये तथा युद्धसे कभी पीछे न हटनेवाले सहस्रों शूर सैनिक उन पैदलों एवं हाथियोंके पादरक्षक थे ॥ २५ ॥
सादिभिः स्यन्दनैर्नागैरधिकं समलङ्कृतैः ।
स व्यूहराजो विबभौ देवासुरचमूपमः ॥ २६ ॥
अधिकाधिक सुसज्जित हाथियों, रथों और घुड़सवारोंसे सम्पन्न वह व्यूहराज देवताओं और असुरोंकी सेनाके समान सुशोभित हो रहा था ॥ २६ ॥
बार्हस्पत्यः सुविहितो नायकेन विपश्चिता ।
नृत्यतीव महाव्यूहः परेषां भयमादधत् ॥ २७ ॥
विद्वान् सेनापति कर्णके द्वारा बृहस्पतिकी बतायी हुई रीतिके अनुसार भलीभाँति रचा गया वह महान् व्यूह शत्रुओंके मनमें भय उत्पन्न करता हुआ नृत्य-सा कर रहा था ॥ २७ ॥
तस्य पक्षप्रपक्षेभ्यो निष्पतन्ति युयुत्सवः ।
पत्त्यश्वरथमातङ्गाः प्रावृषीव बलाहकाः ॥ २८ ॥
उसके पक्ष और प्रपक्षोंसे युद्धके इच्छुक पैदल, घुड़सवार, रथी और गजारोही योद्धा उसी प्रकार निकल पड़ते थे, जैसे वर्षाकालमें मेघ प्रकट होते हैं ॥ २८ ॥
ततः सेनामुखे कर्णं दृष्ट्वा राजा युधिष्ठिरः ।
धनंजयममित्रघ्नमेकवीरमुवाच ह ॥ २९ ॥
तदनन्तर सेनाके मुहानेपर कर्णको खड़ा देख राजा युधिष्ठिरने शत्रुओंका संहार करनेवाले अद्वितीय वीर धनंजयसे इस प्रकार कहा— ॥ २९ ॥
पश्यार्जुन महाव्यूहं कर्णेन विहितं रणे ।
युक्तं पक्षैः प्रपक्षैश्च परानीकं प्रकाशते ॥ ३० ॥
‘अर्जुन! रणभूमिमें कर्णद्वारा रचित उस महाव्यूहको देखो। पक्षों और प्रपक्षोंसे युक्त शत्रुकि वह व्यूहबद्ध सेना कैसी प्रकाशित हो रही है! ॥ ३० ॥
तदेतद् वै समालोक्य प्रत्यमित्रं महत् बलम् ।
यथा नाभिभवत्यस्मांस्तथा नीतिर्विधीयताम् ॥ ३१ ॥
‘अतः इस विशाल शत्रुसेनाकी ओर देखकर तुम ऐसी नीतिका निर्माण करो, जिससे वह हमें परास्त न कर सके’ ॥ ३१ ॥
एवमुक्तोऽर्जुनो राज्ञा प्राञ्जलिर्नृपमब्रवीत् ।
यथा भवानाह तथा तत् सर्वं न तदन्यथा ॥ ३२ ॥
राजा युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर अर्जुन हाथ जोड़कर उनसे बोले—‘भारत! आप जैसा कहते हैं वह सब वैसा ही है। उसमें थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं है ॥ ३२ ॥
यस्त्वस्य विहितो घातस्तं करिष्यामि भारत ।
प्रधानवध एवास्य विनाशस्तं करोम्यहम् ॥ ३३ ॥
‘युद्धशास्त्रमें इस व्यूहके विनाशके लिये जो उपाय बताया गया है, उसीका सम्पादन करूँगा। प्रधान सेनापतिका वध होनेपर ही इसका विनाश हो सकता है; अतः मैं वही करूँगा’ ॥ ३३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
तस्मात् त्वमेव राधेयं भीमसेनः सुयोधनम् ।
वृषेसेनं च नकुलः सहदेवोऽपि सौबलम् ॥ ३४ ॥ दुःशासनं शतानीको हार्दिक्यं शिनिपुङ्गवः । धृष्टद्युम्नो द्रोणसुतं स्वयं योत्स्याम्यहं कृपम् ॥ ३५ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**अर्जुन! तब तुम्हीं राधापुत्र कर्णके साथ भिड़ जाओ! भीमसेन दुर्योधनसे, नकुल वृषसेनसे, सहदेव शकुनिसे, शतानीक दुःशासनसे, सात्यकि कृतवर्मासे और धृष्टद्युम्न अश्वत्थामासे युद्ध करे तथा स्वयं मैं कृपाचार्यके साथ युद्ध करूँगा ॥ द्रौपदेया धार्तराष्ट्रान् शिष्टान् सह शिखण्डिना । ते ते च तांस्तानहितानस्माकं घ्नन्तु मामकाः ॥ ३६ ॥ द्रौपदीके पुत्र शिखण्डीके साथ रहकर धृतराष्ट्रके शेष बचे हुए पुत्रोंपर धावा करें। इसी प्रकार हमारे विभिन्न सैनिक हमलोगोंके उन-उन शत्रुओंका विनाश करें ॥ ३६ ॥
संजय उवाच
इत्युक्तो धर्मराजेन तथेत्युक्त्वा धनंजयः । व्यादिदेश स्वसैन्यानि स्वयं चागाच्चमूमुखम् ॥ ३७ ॥ **संजय कहते हैं—**धर्मराजके ऐसा कहनेपर अर्जुनने 'तथास्तु' कहकर अपनी सेनाओंको युद्धके लिये आदेश दे दिया और स्वयं वे सेनाके मुहानेपर जा पहुँचे ॥ ३७ ॥ (धनंजयो महाराज दक्षिणं पक्षमास्थितः । भीमसेनो महाबाहुर्वामं पक्षमुपाश्रितः ॥ सात्यकिर्द्रौपदेयाश्च स्वयं राजा च पाण्डवः । व्यूहस्य प्रमुखे तस्थुः स्वेनानीकेन संवृताः ॥ स्वबलेनारिसैन्यं तत् प्रत्यवस्थाप्य पाण्डवः । प्रत्यव्यूहत् पुरस्कृत्य धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ॥ तत् सादिनागकलिलं पदातिरथसंकुलम् । धृष्टद्युम्नमुखं व्यूहमशोभत महाबलम् ॥) महाराज! अर्जुन दाहिने पक्षमें खड़े हुए और महाबाहु भीमसेनने बायें पक्षका आश्रय लिया। सात्यकि, द्रौपदीके पुत्र तथा स्वयं राजा युधिष्ठिर अपनी सेनासे घिरकर व्यूहके मुहानेपर खड़े हुए। युधिष्ठिरने अपनी सेना द्वारा प्रतिरोध करके शत्रुको उस सेनाको ठहर जानेके लिये विवश कर दिया और धृष्टद्युम्न तथा शिखण्डीको आगे करके उसके मुकाबलेमें अपनी सेनाका व्यूह बनाया। घुड़सवारों, हाथियों, पैदलों और रथोंसे भरा हुआ वह प्रबल व्यूह, जिसके प्रमुख भागमें धृष्टद्युम्न थे, बड़ी शोभा पा रहा था। अग्निर्वैश्वानरः पूर्वो ब्रह्मोद्भवः सप्तितां गतः । तस्माद् यः प्रथमं जातस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ ३८ ॥
वेद-मन्त्रोंद्वारा प्रज्वलित और सबसे पहले प्रकट हुए सम्पूर्ण विश्वके नेता अग्निदेव, जो ब्रह्माजीके मुखसे सर्वप्रथम उत्पन्न हैं और इसी कारण देवता जिन्हें ब्राह्मण मानते हैं, अर्जुनके उस दिव्य रथके अश्व बने हुए थे ॥ ३८ ॥
ब्रह्मेशानेन्द्रवरुणान् क्रमशॊ योऽवहत् पुरा ।
तमाद्यं रथमास्थाय प्रयातौ केशवार्जुनौ ॥ ३९ ॥
जो प्राचीन कालमें क्रमशः ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र और वरुणकी सवारीमें आ चुका था, उसी आदि रथपर बैठकर श्रीकृष्ण और अर्जुन शत्रुओंकी ओर बढ़े चले जा रहे थे ॥
अथ तं रथमायान्तं दृष्ट्वात्यद्भुतदर्शनम् ।
उवाचाधिरथिं शल्यः पुनस्तं युद्धदुर्मदम् ॥ ४० ॥
अत्यन्त अद्भुत दिखायी देनेवाले उस रथको आते देख शल्यने रणदुर्मद सूतपुत्र कर्णसे पुनः इस प्रकार कहा— ॥ ४० ॥
अयं सरथ आयात: श्वेताश्वः कृष्णसारथिः ।
दुर्वारः सर्वसैन्यानां विपाकः कर्मणामिव ॥ ४१ ॥
निघ्नन्नमित्रान् कौन्तेयो यं कर्ण परिपृच्छसि ।
‘कर्ण! तुम जिन्हें बारंबार पूछ रहे थे, वे ही ये कुन्तीकुमार अर्जुन शत्रुओंका संहार करते हुए रथके साथ आ पहुँचे। उनके घोड़े श्वेत रंगके हैं, श्रीकृष्ण उनके सारथि हैं और वे कर्मोंके फलकी भाँति तुम्हारी सम्पूर्ण सेनाओंके लिये दुर्निवार्य हैं ॥ ४१ ½ ॥
श्रूयते तुमुलः शब्दो यथा मेघस्वनो महान् ॥ ४२ ॥
ध्रुवमेतौ महात्मानौ वासुदेवधनंजयौ ।
‘उनके रथका भयंकर शब्द ऐसा सुनायी दे रहा है, मानो महान् मेघकी गर्जना हो रही हो। निश्चय ही वे महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुन ही आ रहे हैं ॥ ४२ ½ ॥
एष रेणुः समुद्भूतो दिवमावृत्य तिष्ठति ॥ ४३ ॥
चक्रनेमिप्रणुन्नेव कम्पते कर्ण मेदिनी ।
‘कर्ण! यह ऊपर उठी हुई धूल आकाशको आच्छादित करके स्थित हो रही है और यह पृथ्वी अर्जुनके रथके पहियोंद्वारा संचालित-सी होकर काँपने लगी है ॥ ४३ ½ ॥
प्रवात्येष महावायुरभितस्तव वाहिनीम् ॥ ४४ ॥
क्रव्यादा व्याहरन्त्येते मृगाः क्रन्दन्ति भैरवम् ।
‘तुम्हारी सेनाके सब ओर यह प्रचण्ड वायु बह रही है, ये मांसभक्षी पशु-पक्षी बोल रहे हैं और मृगगण भयंकर क्रन्दन कर रहे हैं ॥ ४४ ½ ॥
पश्य कर्ण महाघोरं भयदं लोमहर्षणम् ॥ ४५ ॥
कबन्धं मेघसंकाशं भानुमावृत्य संस्थितम् ।
‘कर्ण! वह देखो, रोंगटे खड़े कर देनेवाला भयदायक मेघसदृश महाघोर कबन्धाकार केतु नामक ग्रह सूर्यमण्डलको घेरकर खड़ा है ।। ४५ १/२ ।। पश्य यूथैर्बहुविधैर्मृगाणां सर्वतोदिशम् ।। ४६ ।। बलिभिर्दृप्तशार्दूलैरादित्योऽभिनिरीक्ष्यते । ‘देखो, चारों दिशाओंमें नाना प्रकारके पशुसमुदाय तथा बलवान् एवं स्वाभिमानी सिंह सूर्यकी ओर देख रहे हैं ।। ४६ १/२ ।। पश्य कङ्कांश्च गृध्रांश्च समवेतान् सहस्रशः ।। ४७ ।। स्थितानभिमुखान् घोरानन्योन्यमभिभाषतः । ‘देखो, सहस्रों घोर कंक और गीध एकत्र होकर सामने खड़े हैं और आपसमें कुछ बोल भी रहे हैं ।। रज्जिताश्चामरा युक्तास्तव कर्ण महारथे ।। ४८ ।। प्रवराः प्रज्वलन्त्येते ध्वजश्चैव प्रकम्पते । ‘कर्ण! तुम्हारे विशाल रथमें बँधे हुए ये रंगीन और श्रेष्ठ चँवर सहसा प्रज्वलित हो उठे हैं और तुम्हारी ध्वजा भी जोर-जोरसे हिलने लगी है ।। ४८ १/२ ।। सवेपथून् हयान् पश्य महाकायान् महाजवान् ।। ४९ ।। प्लवमानान् दर्शनीयानाकाशे गरुडानिव । ‘देखो, ये तुम्हारे विशालकाय, महान् वेगशाली, दर्शनीय तथा आकाशमें गरुडके समान उड़नेवाले घोड़े थरथर काँप रहे हैं ।। ४९ १/२ ।। ध्रुवमेषु निमित्तेषु भूमिमाश्रित्य पार्थिवाः ।। ५० ।। स्वप्स्यन्ति निहताः कर्ण शतशोऽथ सहस्रशः । ‘कर्ण! जब ऐसे अपशकुन प्रकट हो रहे हैं तो निश्चय ही आज सैकड़ों और हजारों नरेश मारे जाकर रणभूमिमें शयन करेंगे ।। ५० १/२ ।। शङ्खानां तुमुलः शब्दः श्रूयते लोमहर्षणः ।। ५१ ।। आनकानां च राधेय मृदङ्गानां च सर्वशः । ‘राधानन्दन! सब ओर शंखों, ढोलों और मृदंगोंकी रोमांचकारी तुमुल ध्वनि सुनायी दे रही है ।। ५१ १/२ ।। बाणशब्दान् बहुविधान् नराश्वरथनिस्वनान् ।। ५२ ।। ज्यातलत्रेषुशब्दांश्च शृणु कर्ण महात्मनाम् । ‘कर्ण! बाणोंके भाँति-भाँतिके शब्द, मनुष्यों, घोड़ों और रथोंके कोलाहल तथा महामनस्वी वीरोंकी प्रत्यंचा और दस्तानोंके शब्द सुनो ।। ५२ १/२ ।। हेमरूप्यप्रसृष्टानां वाससां शिल्पिनिर्मिताः ।। ५३ ।। नानावर्णा रथे भान्ति श्वसनेन प्रकम्पिताः ।
रथोंकी ध्वजाओंपर सोने और चाँदीके तारोंसे खचित वस्त्रोंकी बनी हुई शिल्पियोंद्वारा निर्मित बहुरंगी पताकाएँ हवाके झोंकेसे हिलती हुई कैसी शोभा पा रही हैं॥ ५३ १/२ ॥ सहेमचन्द्रताराकाः पताकाः किङ्किणीयुताः ॥ ५४ ॥ पश्य कर्णार्जुनस्यैताः सौदामन्य इवाम्बुदे । ‘कर्ण! देखो, अर्जुनके रथकी इन पताकाओंमें सुवर्णमय चन्द्रमा, सूर्य और तारोंके चिह्न बने हुए हैं और छोटी-छोटी घंटियाँ लगी हुई हैं। रथपर फहराती हुई ये पताकाएँ मेघोंकी घटामें बिजलीके समान प्रकाशित हो रही हैं॥ ५४ १/२ ॥ ध्वजाः कणकणायन्ते वातेनाभिसमीरिताः ॥ ५५ ॥ विभ्राजन्ति रथे कर्ण विमाने दैवते यथा । ‘कर्ण! देवताओंके विमान-जैसे रथपर ये ध्वज हवाके झोंके खा-खाकर कड़कड़ शब्द करते हुए शोभा पा रहे हैं॥ ५५ १/२ ॥ सपताका रथाश्चैते पञ्चालानां महात्मनाम् ॥ ५६ ॥ पश्य कुन्तीसुतं वीरं बीभत्सुमपराजितम् । प्रधर्षयितुमायान्तं कपिप्रवरकेतनम् ॥ ५७ ॥ ‘ये महामनस्वी पांचाल वीरोंके रथ हैं, जिनपर पताकाएँ फहरा रही हैं। यह देखो, श्रेष्ठ वानरयुक्त ध्वजावाले अपराजित वीर कुन्तीकुमार अर्जुन आक्रमण करनेके लिये इधर ही आ रहे हैं॥ ५६-५७॥ एष ध्वजाग्रे पार्थस्य प्रेक्षणीयः समन्ततः । दृश्यते वानरो भीमो द्विषतामघवर्धनः ॥ ५८ ॥ ‘अर्जुनके ध्वजके अग्रभागपर यह सब ओरसे देखनेयोग्य भयंकर वानर दृष्टिगोचर होता है, जो शत्रुओंका दुःख बढ़ानेवाला है॥ ५८॥ एतच्चक्रं गदा शार्ङ्गं शङ्खः कृष्णस्य धीमतः । अत्यर्थं भ्राजते कृष्णे कौस्तुभस्तु मणिस्ततः ॥ ५९ ॥ ‘ये बुद्धिमान् श्रीकृष्णके शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्ग-धनुष अत्यन्त शोभा पा रहे हैं। उनके वक्षःस्थलपर कौस्तुभमणि सबसे अधिक प्रकाशित हो रही है॥ ५९॥ एष शङ्खगदापाणिर्वासुदेवोऽतिवीर्यवान् । वाहयन्नेति तुरगान् पाण्डुरान् वातरंहसः ॥ ६० ॥ ‘हाथोंमें शंख और गदा धारण करनेवाले ये अत्यन्त पराक्रमी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण वायुके समान वेगशाली श्वेत घोड़ोंको हाँकते हुए इधर ही आ रहे हैं॥ एतत् कूजति गाण्डीवं विकृष्टं सव्यसाचिना । एते हस्तवता मुक्ता घ्नन्त्यमित्रान्शिताः शराः ॥ ६१ ॥ ‘सव्यसाची अर्जुनके हाथसे खींचे गये गाण्डीव धनुषकी यह टंकार होने लगी। उनके कुशल हाथोंसे छोड़े गये ये पैने बाण शत्रुओंके प्राण ले रहे हैं॥ ६१॥
विशालायतताम्राक्षैः पूर्णचन्द्रनिभाननैः ।
एषा भूः कीर्यते राज्ञां शिरोभिरपलायिनाम् ॥ ६२ ॥
‘युद्ध छोड़कर पीछे न हटनेवाले राजाओंके मस्तकोंसे रणभूमि पटती जा रही है। वे मस्तक पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुख और लाल-लाल विशाल नेत्रोंसे सुशोभित हैं।। ६२ ।।
एते सुपरिघाकाराः पुण्यगन्धानुलेपनाः ।
उद्यतायुधशौण्डानां पात्यन्ते सायुधा भुजाः ॥ ६३ ॥
‘अस्त्र उठाये हुए युद्ध-कुशल वीरोंकी ये परिघ-जैसी मोटी और पवित्र सुगन्धयुक्त चन्दनसे चर्चित भुजाएँ आयुधोंसहित काटकर गिरायी जाने लगी हैं ।। ६३ ।।
निरस्तनेत्रजिह्वान्त्रा वाजिनः सह सादिभिः ।
पतिताः पात्यमानाश्च क्षितौ क्षीणाश्च शेरते ॥ ६४ ॥
‘जिनके नेत्र, जीभ और आँतें बाहर निकल आयी हैं, वे गिरे और गिराये जाते हुए घुड़सवारोंसहित घोड़े क्षत-विक्षत होकर पृथ्वीपर सो रहे हैं ।। ६४ ।।
एते पर्वतशृङ्गाणां तुल्यरूपा हता द्विपाः ।
संछिन्नभिन्नाः पार्थेन प्रपतन्त्यद्रयो यथा ॥ ६५ ॥
‘ये पर्वतशिखरोंके समान विशालकाय हाथी अर्जुनके द्वारा मारे जाकर छिन्न-भिन्न हो पर्वतोंके समान धराशायी हो रहे हैं ।। ६५ ।।
गन्धर्वनगराकारा रथा हतनरेश्वराः ।
विमानानीव पुण्यानि स्वर्गिणां निपतन्त्यमी ॥ ६६ ॥
‘जिनके नरेश मारे गये हैं, वे गन्धर्वनगरके समान विशाल रथ स्वर्गवासियोंके पुण्यमय विमानोंके समान नीचे गिर रहे हैं ।। ६६ ।।
व्याकुलीकृतमत्यर्थं पश्य सैन्यं किरीटिना ।
नानामृगसहस्राणां यूथं केसरिणा यथा ॥ ६७ ॥
‘देखो, किरीटधारी अर्जुनने कौरव-सेनाको उसी प्रकार अत्यन्त व्याकुल कर दिया है, जैसे सिंह नाना जातिके सहस्रों मृगोंको भयभीत कर देता है ।। ६७ ।।
घ्नन्त्येते पार्थिवान् वीराः पाण्डवाः समभिद्रुताः ।
नागाश्वरथपत्त्योघांस्तावकान् समभिघ्नतः ॥ ६८ ॥
‘तुम्हारे सैनिकोंके आक्रमण करनेपर ये वीर पाण्डवयोद्धा अपने ऊपर प्रहार करनेवाले राजाओं तथा हाथी, घोड़े, रथ और पैदलसमूहोंको मार रहे हैं ।। ६८ ।।
एष सूर्य इवाम्भोदैश्छन्नः पार्थो न दृश्यते ।
ध्वजाग्रं दृश्यते त्वस्य ज्याशब्दश्चापि श्रूयते ॥ ६९ ॥
‘जैसे सूर्य बादलोंसे ढक जाते हैं, उसी प्रकार आड़में पड़ जानेके कारण ये अर्जुन नहीं दिखायी देते हैं; परंतु इनके ध्वजका अग्रभाग दीख रहा है और प्रत्यंचाकी टंकार भी सुनायी
पड़ती है ।। ६९ ।। अद्य द्रक्ष्यसि तं वीरं श्वेताश्वं कृष्णसारथिम् । निघ्नन्तं शात्रवान् संख्ये यं कर्ण परिपृच्छसि ।। ७० ।। ‘कर्ण! तुम जिन्हें पूछ रहे थे, युद्धस्थलमें शत्रुओंका संहार करते हुए उन कृष्णसारथि श्वेतवाहन वीर अर्जुनको अभी देखोगे ।। ७० ।। अद्य तौ पुरुषव्याघ्रौ लोहिताक्षौ परंतपौ । वासुदेवार्जुनौ कर्ण द्रष्टास्येकरथे स्थितौ ।। ७१ ।। ‘कर्ण! लाल नेत्रोंवाले उन शत्रुसंतापी पुरुषसिंह श्रीकृष्ण और अर्जुनको आज तुम एक रथपर बैठे हुए देखोगे ।। सारथिर्यस्य वार्ष्णेयो गाण्डीवं यस्य कार्मुकम् । तं चेद्धन्तासि राधेय त्वं नो राजा भविष्यसि ।। ७२ ।। ‘राधापुत्र! श्रीकृष्ण जिनके सारथि हैं और गाण्डीव जिनका धनुष है, उन अर्जुनको यदि तुमने मार लिया तो तुम हमारे राजा हो जाओगे ।। ७२ ।। एष संशप्तकाहूतस्तानेवाभिमुखो गतः । करोति कदनं चैषां संग्रामे द्विषतां बली ।। ७३ ।। ‘यह देखो, संशप्तकोंकी ललकार सुनकर महाबली अर्जुन उन्हींकी ओर चल पड़े और अब संग्राममें उन शत्रुओंका संहार कर रहे हैं’ ।। ७३ ।। इति ब्रुवाणं मद्रेशं कर्णः प्राहातिमन्युना । पश्य संशप्तकैः क्रुद्धैः सर्वतः समभिद्रुतः ।। ७४ ।। ऐसी बातें कहते हुए मद्रराज शल्यसे कर्णने अत्यन्त क्रोधपूर्वक कहा—‘तुम्हीं देखो न, रोषमें भरे हुए संशप्तकोंने उनपर चारों ओरसे आक्रमण कर दिया है ।। एष सूर्य इवाम्भोदैश्छन्नः पार्थो न दृश्यते । एतदन्तोऽर्जुनः शल्य निमग्नो योधसागरे ।। ७५ ।। ‘यह लो, बादलोंसे ढके हुए सूर्यके समान अर्जुन अब नहीं दिखायी देते हैं। शल्य! अब अर्जुनका यहीं अन्त हुआ समझो। वे योद्धाओंके समुद्रमें डूब गये’ ।। ७५ ।।
शल्य उवाच
वरुणं कोऽम्भसा हन्यादिन्धनेन च पावकम् । को वानिलं निगृह्णीयात् पिबेद् वा को महार्णवम् ।। ७६ ।। **शल्यने कहा—**कर्ण! कौन ऐसा वीर है जो जलसे वरुणको और ईंधनसे अग्निको मार सके? वायुको कौन कैद कर सकता है अथवा महासागरको कौन पी सकता है? ।। ७६ ।। ईदृग्रूपमहं मन्ये पार्थस्य युधि विग्रहम् । न हि शक्योऽर्जुनो जेतुं युधि सेन्द्रैः सुरासुरैः ।। ७७ ।।
मैं युद्धमें अर्जुनके स्वरूपको ऐसा ही समझता हूँ। संग्रामभूमिमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं तथा असुरोंके द्वारा भी अर्जुन नहीं जीते जा सकते ॥ ७७ ॥ अथवा परितोषस्ते वाचोक्त्वा सुमना भव । न स शक्यो युधा जेतुमन्यं कुरु मनोरथम् ॥ ७८ ॥ अथवा यदि तुम्हें इसीसे संतोष होता है तो वाणीमात्रसे अर्जुनके वधकी चर्चा करके मन-ही-मन प्रसन्न हो लो। परंतु वास्तवमें युद्धके द्वारा कोई भी अर्जुनको जीत नहीं सकता। अतः अब तुम कोई और ही मनसूबा बाँधो ॥ ७८ ॥ बाहुभ्यामुद्धरेद् भूमिं दहेत् क्रुद्ध इमाः प्रजाः । पातयेत् त्रिदिवाद् देवान् योऽर्जुनं समरे जयेत् ॥ ७९ ॥ जो समरांगणमें अर्जुनको जीत ले, वह मानो अपनी दोनों भुजाओंसे पृथ्वीको उठा सकता है, कुपित होनेपर इस सारी प्रजाको दग्ध कर सकता है तथा देवताओंको भी स्वर्गसे नीचे गिरा सकता है ॥ ७९ ॥ पश्य कुन्तीसुतं वीरं भीममक्लिष्टकारिणम् । प्रभासन्तं महाबाहुं स्थितं मेरुमिवापरम् ॥ ८० ॥ लो देख लो, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले भयंकर वीर महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुन दूसरे मेरुपर्वतके समान अविचल भावसे खड़े हुए प्रकाशित हो रहे हैं ॥ अमर्षी नित्यसंरब्धश्चिरं वैरमनुस्मरन् । एष भीमो जयप्रेप्सुर्युधि तिष्ठति वीर्यवान् ॥ ८१ ॥ सदा क्रोधमें भरे रहकर दीर्घकालतक वैरको याद रखनेवाले ये अमर्षशील पराक्रमी भीमसेन विजयकी अभिलाषा लेकर युद्धके लिये खड़े हैं ॥ ८१ ॥ एष धर्मभृतां श्रेष्ठो धर्मराजो युधिष्ठिरः । तिष्ठत्यसुकरः संख्ये परैः परपुरञ्जयः ॥ ८२ ॥ शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले, ये धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर भी युद्धभूमिमें खड़े हैं। शत्रुओंके लिये इन्हें पराजित करना आसान नहीं है ॥ ८२ ॥ एतौ च पुरुषव्याघ्रावश्विनाविव सोदरौ । नकुलः सहदेवश्च तिष्ठतो युधि दुर्जयौ ॥ ८३ ॥ ये अश्विनीकुमारोंके समान सुन्दर दोनों भाई पुरुषप्रवर नकुल और सहदेव भी युद्धस्थलमें खड़े हैं। इन्हें पराजित करना अत्यन्त कठिन है ॥ ८३ ॥ अमी स्थिता द्रौपदेयाः पञ्च पञ्चाचला इव । व्यवस्थिता योद्धुकामाः सर्वेऽर्जुनसमा युधि ॥ ८४ ॥ ये द्रौपदीके पाँचों पुत्र पाँच पर्वतोंके समान अविचल भावसे युद्धके लिये खड़े हैं। रणभूमिमें ये सब-के-सब अर्जुनके समान पराक्रमी हैं ॥ ८४ ॥ एते द्रुपदपुत्राश्च धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।
स्फीताः सत्यजितो वीरास्तिष्ठन्ति परमौजसः ॥ ८५ ॥
ये समृद्धिशाली, सत्यविजयी तथा परम बलवान् द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न आदि वीर युद्धके लिये डटे हुए हैं ॥
असाविन्द्र इवासह्यः सात्यकिः सात्वतां वरः ।
युयुत्सुरुपयात्यस्मान् क्रुद्धान्तकसमः पुरः ॥ ८६ ॥
वह सामने सात्वतवंशके श्रेष्ठ वीर सात्यकि, जो शत्रुओंके लिये इन्द्रके समान असह्य हैं, क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान युद्धकी इच्छा लेकर सामनेसे हमलोगोंकी ओर आ रहे हैं ॥ ८६ ॥
इति संवदतोरेव तयोः पुरुषसिंहयोः ।
ते सेने समसज्जेतां गङ्गायमुनवद् भृशम् ॥ ८७ ॥
राजन्! वे दोनों पुरुषसिंह शल्य और कर्ण इस प्रकार बातें कर ही रहे थे कि कौरव और पाण्डवकी दोनों सेनाएँ गंगा और यमुनाके समान एक-दूसरेसे वेगपूर्वक जा मिलीं ॥ ८७ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ श्लोक मिलाकर कुल १०३ श्लोक हैं)
अध्याय (पृष्ठ 1939)
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
कौरवों और पाण्डवोंकी सेनाओंका भयंकर युद्ध तथा अर्जुन और कर्णका पराक्रम
धृतराष्ट्र उवाच
तथा व्यूढेष्वनीकेषु संसक्तेषु च संजय ।
संशप्तकान् कथं पार्थो गतः कर्णश्च पाण्डवान् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा— संजय! इस प्रकार जब सारी सेनाओंकी व्यूह-रचना हो गयी और दोनों दलोंके योद्धा परस्पर युद्ध करने लगे, तब कुन्तीपुत्र अर्जुनने संशप्तकोंपर और कर्णने पाण्डव-योद्धाओंपर कैसे धावा किया? ॥ १ ॥
एतद् विस्तरशो युद्धं प्रब्रूहि कुशलो ह्यसि ।
न हि तृप्यामि वीराणां शृण्वानो विक्रमान् रणे ॥ २ ॥
सूत! तुम युद्धसम्बन्धी इस समाचारका विस्तार-पूर्वक वर्णन करो, क्योंकि इस कार्यमें कुशल हो। रणभूमिमें वीरोंके पराक्रमका वर्णन सुनकर मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ २ ॥
संजय उवाच
तदास्थितमवज्ञाय प्रत्यमित्रबलं महत् ।
अव्यूहतार्जुनो व्यूहं पुत्रस्य तव दुर्नये ॥ ३ ॥
संजयने कहा— महाराज! आपके पुत्रकी दुर्नीतिके कारण शत्रुओंकी उस विशाल सेनाको युद्धमें उपस्थित जानकर अर्जुनने अपनी सेनाका भी व्यूह बनाया ॥ ३ ॥
तत् सादिनागकलिलं पदातिरथसंकुलम् ।
धृष्टद्युम्नमुखं व्यूहमशोभत महद् बलम् ॥ ४ ॥
घुड़सवारों, हाथियों, रथों तथा पैदलोंसे भरे हुए उस व्यूहके मुखभागमें धृष्टद्युम्न खड़े थे, जिससे उस विशाल सेनाकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४ ॥
पारावतसवर्णाश्वश्चन्द्रादित्यसमद्युतिः ।
पार्षतः प्रबभौ धन्वी कालो विग्रहवानिव ॥ ५ ॥
कबूतरके समान रंगवाले घोड़ोंसे युक्त और चन्द्रमा तथा सूर्यके समान तेजस्वी धनुर्धर वीर द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न वहाँ मूर्तिमान् कालके समान जान पड़ते थे ॥
पार्षतं जुगुपुः सर्वे द्रौपदेया युयुत्सवः ।
दिव्यवर्मायुधधराः शार्दूलसमविक्रमाः ॥ ६ ॥
सानुगा दीप्तवपुषश्चन्द्रं तारागणा इव ।
दिव्य कवच और आयुध धारण किये, सिंहके समान पराक्रमी सेवकोंसहित समस्त द्रौपदीपुत्र युद्धके लिये उत्सुक हो धृष्टद्युम्नकी रक्षा करने लगे, मानो तेजस्वी शरीरवाले नक्षत्र चन्द्रमाका संरक्षण कर रहे हों॥
अथ व्यूढेष्वनीकेषु प्रेक्ष्य संशप्तकान् रणे ॥ ७ ॥
क्रुद्धोऽर्जुनोऽभिदुद्राव व्याक्षिपन् गाण्डिवं धनुः ।
इस प्रकार सेनाओंकी व्यूह-रचना हो जानेपर रणभूमिमें संशप्तकोंकी ओर देखकर क्रोधमें भरे हुए अर्जुनने गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए उनपर आक्रमण किया॥ ७ १/२ ॥
अथ संशप्तकाः पार्थमभ्यधावन् वधैषिणः ॥ ८ ॥
विजये धृतसंकल्पा मृत्युं कृत्वा निवर्तनम् ।
तब विजयका दृढ़ संकल्प लेकर मृत्युको ही युद्धसे निवृत्त होनेका निमित्त बनाकर अर्जुनके वधकी इच्छावाले संशप्तकोंने भी उनपर धावा बोल दिया॥ ८ १/२ ॥
तन्नराश्वौघबहुलं मत्तनागरथाकुलम् ॥ ९ ॥
पत्तिमच्छूरवीरौघं द्रुतमर्जुनमार्दयत् ।
संशप्तकोंकी सेनामें पैदल मनुष्यों और घुड़सवारोंकी संख्या बहुत अधिक थी। मतवाले हाथी और रथ भी भरे हुए थे। पैदलोंसहित शूरवीरोंके उस समुदायने तुरंत ही अर्जुनको पीड़ा देना आरम्भ किया॥ ९ १/२ ॥
स सम्प्रहारस्तुमुलस्तेषामासीत् किरीटिना ॥ १० ॥
तस्यैव नः श्रुतो यादृङ्निवातकवचैः सह ।
किरीटधारी अर्जुनके साथ संशप्तकोंका वह संग्राम वैसा ही भयानक था, जैसा कि निवातकवच नामक दानवोंके साथ अर्जुनका युद्ध हमने सुन रखा है॥ १० १/२ ॥
रथानश्वान् ध्वजान् नागान् पतीन् रणगतानपि ॥ ११ ॥
इषून् धनूंषि खड्गांश्च चक्राणि च परश्वधान् ।
सायुधानुद्यतान् बाहून् विविधान्यायुधानि च ॥ १२ ॥
चिच्छेद द्विषतां पार्थः शिरांसि च सहस्रशः ।
तदनन्तर कुन्तीकुमार अर्जुनने रणस्थलमें आये हुए शत्रुपक्षके रथों, घोड़ों, ध्वजों, हाथियों और पैदलोंको भी काट डाला, उन्होंने शत्रुओंके धनुष, बाण, खड्ग, चक्र, फरसे, आयुधोंसहित उठी हुई भुजा, नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र तथा सहस्रों मस्तक काट गिराये॥ ११-१२ १/२ ॥
तस्मिन् सैन्यमहावर्ते पातालतलसंनिभे ॥ १३ ॥
निमग्नं तं रथं मत्वा नेदुः संशप्तका मुदा ।