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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पतद् रक्षः स्वेन कायेन तूर्ण- मतिप्रमाणेन विवर्धता च । प्रियं कुर्वन् पाण्डवानां गतासु- रक्षौहिणीं तव तूर्णं जघान ॥ ६२ ॥ पाण्डवोंका प्रिय करनेवाले उस राक्षसने प्राणशून्य हो जानेपर भी अपने बढ़ते हुए अत्यन्त विशाल शरीरसे गिरकर आपकी एक अक्षौहिणी सेनाको तुरंत नष्ट कर दिया ॥

ततो मिश्राः प्राणदन् सिंहनादै- र्भैर्यः शङ्खा मुरजाश्चानकाश्च । दग्धां मायां निहतं राक्षसं च दृष्ट्वा हृष्टाः प्राणदन् कौरवेयाः ॥ ६३ ॥ तदनन्तर सिंहनादोंके साथ-साथ भेरी, शंख, नगाड़े और आनक आदि बाजे बजने लगे। माया भस्म हुई और राक्षस मारा गया—यह देखकर हर्षमें भरे हुए कौरव-सैनिक जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ६३ ॥ ततः कर्णः कुरुभिः पूज्यमानो यथा शक्रो वृत्रवधे मरुद्भिः । अन्वारूढस्तव पुत्रस्य यानं

हृष्टश्चापि प्राविशत् तत् स्वसैन्यम् ॥ ६४ ॥

तत्पश्चात् जैसे वृत्रासुरका वध होनेपर देवताओंने इन्द्रका सत्कार किया था, उसी प्रकार कौरवोंसे पूजित होते हुए कर्णने आपके पुत्रके रथपर आरूढ़ हो बड़े हर्षके साथ अपनी उस सेनामें प्रवेश किया ॥ ६४ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे घटोत्कचवधे
एकोनाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय घटोत्कचका वधविषयक एक सौ उन्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७९ ॥


* खंभेके समान आकृतिवाले।

हैडिम्बं निहतं दृष्ट्वा विशीर्णमिव पर्वतम् ।

⬅ विषय-सूची (TOC)

अशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

घटोत्कचके वधसे पाण्डवोंका शोक तथा श्रीकृष्णकी प्रसन्नता और उसका कारण

संजय उवाच

हैडिम्बं निहतं दृष्ट्वा विशीर्णमिव पर्वतम् ।
बभूवुः पाण्डवाः सर्वे शोकबाष्पाकुलेक्षणाः ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! जैसे पर्वत ढह गया हो, उसी प्रकार हिडिम्बाकुमार घटोत्कचको मारा गया देख समस्त पाण्डवोंके नेत्रोंमें शोकके आँसू भर आये ॥ १ ॥

वासुदेवस्तु हर्षेण महताभिपरिप्लुतः ।
ननाद सिंहनादं वै पर्यष्वजत फाल्गुनम् ॥ २ ॥
परंतु वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण बड़े हर्षमें मग्न होकर सिंहनाद करने लगे। उन्होंने अर्जुनको छातीसे लगा लिया ॥ २ ॥

स विनद्य महानादमभीषून् संनियम्य च ।
ननर्त हर्षसंवीतो वातोद्धूत इव द्रुमः ॥ ३ ॥
वे बड़े जोरसे गर्जना करके घोड़ोंकी रास रोककर हवाके हिलाये हुए वृक्षके समान हर्षसे झूमकर नाचने लगे ॥ ३ ॥

ततः परिष्वज्य पुनः पार्थमास्फोट्य चासकृत् ।
रथोपस्थगतो धीमान् प्राणदत् पुनरच्युतः ॥ ४ ॥
तत्पश्चात् पुनः अर्जुनको हृदयसे लगाकर बारंबार उनकी पीठ ठोंककर रथके पिछले भागमें बैठे हुए बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्ण फिर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे ॥ ४ ॥

प्रहृष्टमनसं ज्ञात्वा वासुदेवं महाबलः ।
अर्जुनोऽथाब्रवीद् राजन्नातिहृष्टमना इव ॥ ५ ॥
राजन्! भगवान् श्रीकृष्णके मनमें अधिक प्रसन्नता हुई जानकर महाबली अर्जुन कुछ अप्रसन्न-से होकर बोले— ॥ ५ ॥

अतिहर्षोऽयमस्थाने तवाद्य मधुसूदन ।
शोकस्थाने तु सम्प्राप्ते हैडिम्बस्य वधेन तु ॥ ६ ॥
‘मधुसूदन! हिडिम्बाकुमार घटोत्कचके वधसे आज हमारे लिये तो शोकका अवसर प्राप्त हुआ है, परंतु आपको यह बेमौके अधिक हर्ष हो रहा है ॥ ६ ॥

विमुखानीह सैन्यानि हतं दृष्ट्वा घटोत्कचम् ।
वयं च भृशमुद्विग्ना हैडिम्बेस्तु निपातनात् ॥ ७ ॥

'घटोत्कचको मारा गया देख हमारी सेनाएँ यहाँ युद्धसे विमुख होकर भागी जा रही हैं। हिडिम्बाकुमारके धराशायी होनेसे हमलोग भी अत्यन्त उद्विग्न हो उठे हैं ॥ ७ ॥ नैतत्कारणमल्पं हि भविष्यति जनार्दन । तदद्य शंस मे पृष्टः सत्यं सत्यवतां वर ॥ ८ ॥ 'परंतु जनार्दन! आपको जो इतनी खुशी हो रही है उसका कोई छोटा-मोटा कारण न होगा। वही मैं आपसे पूछता हूँ। सत्यवक्ताओंमें श्रेष्ठ प्रभो! आप इसका मुझे यथार्थ कारण बताइये ॥ ८ ॥ यद्येतन्न रहस्यं ते वक्तुमर्हस्यरिंदम । धैर्यस्य वैकृतं ब्रूहि त्वमद्य मधुसूदन ॥ ९ ॥ 'शत्रुदमन! यदि कोई गोपनीय बात न हो तो मुझे अवश्य बतावें। मधुसूदन! आपके इस हर्ष-प्रदर्शनसे आज हमारा धैर्य छूटा जा रहा है, अतः आप इसका कारण अवश्य बतावें ॥ ९ ॥ समुद्रस्येव संशोषं मेरोरिव विसर्पणम् । तथैतदद्य मन्येऽहं तव कर्म जनार्दन ॥ १० ॥ 'जनार्दन! जैसे समुद्रका सूखना और मेरु पर्वतका विचलित होना आश्चर्यकी बात है, उसी प्रकार आज मैं आपके इस हर्षप्रकाशनरूपी कर्मको आश्चर्यजनक मानता हूँ' ॥ १० ॥

श्रीवासुदेव उवाच

अतिहर्षमिमं प्राप्तं शृणु मे त्वं धनंजय । अतीव मनसः सद्यः प्रसादकरमुत्तमम् ॥ ११ ॥ **भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**धनंजय! आज वास्तवमें मुझे यह अत्यन्त हर्षका अवसर प्राप्त हुआ है, इसका क्या कारण है, यह तुम मुझसे सुनो। मेरे मनको तत्काल अत्यन्त प्रसन्नता प्रदान करनेवाला वह उत्तम कारण इस प्रकार है ॥ ११ ॥ शक्तिं घटोत्कचेनेमां व्यंसयित्वा महाद्युते । कर्णं निहतमेवाजौ विद्धि सद्यो धनंजय ॥ १२ ॥ महातेजस्वी धनंजय! इन्द्रकी दी हुई शक्तिको घटोत्कचके द्वारा कर्णके हाथसे दूर कराकर अब तुम युद्धमें कर्णको शीघ्र मरा हुआ ही समझो ॥ १२ ॥ शक्तिहस्तं पुनः कर्णं को लोकेऽस्ति पुमानिह । य एनमभितस्तिष्ठेत् कार्तिकेयमिवाहवे ॥ १३ ॥ इस संसारमें कौन ऐसा पुरुष है, जो युद्धस्थलमें कार्तिकेयके समान शक्तिशाली कर्णके सामने खड़ा हो सके ॥ १३ ॥ दिष्ट्यापनीतकवचो दिष्ट्यापहृतकुण्डलः ।

दिष्ट्या सा व्यंसिता शक्तिरमोघास्य घटोत्कचे ॥ १४ ॥
सौभाग्यकी बात है कि कर्णका दिव्य कवच उतर गया, सौभाग्यसे ही उसके कुण्डल छीने गये तथा सौभाग्यसे ही उसकी वह अमोघशक्ति घटोत्कचपर गिरकर उसके हाथसे निकल गयी ॥ १४ ॥
यदि हि स्यात् सकवचस्तथैव स्यात् सकुण्डलः ।
सामरानपि लोकांस्त्रीनेकः कर्णो जयेद् रणे ॥ १५ ॥
यदि कर्ण कवच और कुण्डलोंसे सम्पन्न होता तो वह अकेला ही रणभूमिमें देवताओंसहित तीनों लोकोंको जीत सकता था ॥ १५ ॥
वासवो वा कुबेरो वा वरुणो वा जलेश्वरः ।
यमो वा नोत्सहेत् कर्णं रणे प्रतिसमासितुम् ॥ १६ ॥
उस अवस्थामें इन्द्र, कुबेर, जलेश्वर वरुण अथवा यमराज भी रणभूमिमें कर्णका सामना नहीं कर सकते थे ॥ १६ ॥
गाण्डीवमुद्यम्य भवांश्चक्रं चाहं सुदर्शनम् ।
न शक्तौ स्वो रणे जेतुं तथायुक्तं नरर्षभम् ॥ १७ ॥
तुम गाण्डीव उठाकर और मैं सुदर्शनचक्र लेकर दोनों एक साथ जाते तो भी समरांगणमें कवच-कुण्डलोंसे युक्त नरश्रेष्ठ कर्णको नहीं जीत सकते थे ॥ १७ ॥
त्वद्धितार्थं तु शक्रेण मायापहृतकुण्डलः ।
विहीनकवचश्चायं कृतः परपुरंजयः ॥ १८ ॥
तुम्हारे हितके लिये इन्द्रने शत्रु-नगरीपर विजय पानेवाले कर्णके दोनों कुण्डल मायासे हर लिये और उसे कवचसे भी वंचित कर दिया ॥ १८ ॥
उत्कृत्य कवचं यस्मात् कुण्डले विमले च ते ।
प्रादाच्छक्राय कर्णो वै तेन वैकर्तनः स्मृतः ॥ १९ ॥
कर्णने कवच तथा उन निर्मल कुण्डलोंको स्वयं ही अपने शरीरसे कुतरकर इन्द्रको दे दिया था; इसीलिये उसका नाम वैकर्तन हुआ ॥ १९ ॥
आशीविष इव क्रुद्धो जृम्भितो मन्त्रतेजसा ।
तथाद्य भाति कर्णो मे शान्तज्वाल इवानलः ॥ २० ॥
जैसे क्रोधमें भरे हुए सर्पको मन्त्रके तेजसे स्तब्ध कर दिया जाय तथा प्रज्वलित आगकी ज्वालाको बुझा दिया जाय, शक्तिसे वंचित हुआ कर्ण भी आज मुझे वैसा ही प्रतीत होता है ॥ २० ॥
यदाप्रभृति कर्णाय शक्तिर्दत्ता महात्मना ।
वासवेन महाबाहो क्षिप्ता यासौ घटोत्कचे ॥ २१ ॥
कुण्डलाभ्यां निमायाथ दिव्येन कवचेन च ।
तां प्राप्यामन्यत वृषः सततं त्वां हतं रणे ॥ २२ ॥

महाबाहो! जबसे महात्मा इन्द्रने कर्णको उसके दिव्य कवच और कुण्डलोंके बदलेमें

अपनी शक्ति दी थी, जिसे उसने घटोत्कचपर चला दिया है, उस शक्तिको पाकर धर्मात्मा

कर्ण सदा तुम्हें रणभूमिमें मारा गया ही मानता था ।। २१-२२ ।।

एवंगतोऽपि शक्योऽयं हन्तुं नान्येन केनचित् ।

ऋते त्वां पुरुषव्याघ्र शपे सत्येन चानघ ।। २३ ।।

पुरुषसिंह! आज ऐसी अवस्थामें आकर भी कर्ण तुम्हारे सिवा किसी दूसरे योद्धासे

नहीं मारा जा सकता। अनघ! मैं सत्यकी शपथ खाकर यह बात कहता हूँ ।। २३ ।।

ब्रह्मण्यः सत्यवादी च तपस्वी नियतव्रतः ।

रिपुष्वपि दयावांश्च तस्मात् कर्णो वृषः स्मृतः ।। २४ ।।

कर्ण ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, तपस्वी, नियम और व्रतका पालक तथा शत्रुओंपर भी

दया करनेवाला है; इसीलिये उसे वृष (धर्मात्मा) कहा गया है ।। २४ ।।

युद्धशौण्डो महाबाहुर्नित्योद्यतशरासनः ।

केसरीव वने नर्दन् मातङ्ग इव यूथपान् ।। २५ ।।

विमदान् रथशार्दूलान् कुरुते रणमूर्धनि ।

महाबाहु कर्ण युद्धमें कुशल है। उसका धनुष सदा उठा ही रहता है। वनमें दहाड़नेवाले

सिंहके समान वह सदा गर्जता रहता है। जैसे मतवाला हाथी कितने ही यूथपतियोंको

मदरहित कर देता है, उसी प्रकार कर्ण युद्धके मुहानेपर सिंहके समान पराक्रमी

महारथियोंका भी घमंड चूर कर देता है ।। २५ १/२ ।।

मध्यं गत इवादित्यो यो न शक्यो निरीक्षितुम् ।। २६ ।।

त्वदीयैः पुरुषव्याघ्र योधमुख्यैर्महात्मभिः ।

शरजालसहस्रांशुः शरदीव दिवाकरः ।। २७ ।।

पुरुषसिंह! तुम्हारे महामनस्वी श्रेष्ठ योद्धा दोपहरके तपते हुए सूर्यकी भाँति कर्णकी

ओर देख भी नहीं सकते। जैसे शरद्-ऋतुके निर्मल आकाशमें सूर्य अपनी सहस्रों किरणें

बिखेरता है, उसी प्रकार कर्ण युद्धमें अपने बाणोंका जाल-सा बिछा देता है ।। २६-२७ ।।

तपान्ते जलदो यद्वच्छरधाराः क्षरन् मुहुः ।

दिव्यास्त्रजलदः कर्णः पर्जन्य इव वृष्टिमान् ।। २८ ।।

जैसे वर्षाकालमें बरसनेवाला मेघ पानीकी धारा गिराता है, उसी प्रकार दिव्यास्त्ररूपी

जल प्रदान करनेवाला कर्णरूपी मेघ बारंबार बाणधाराकी वर्षा करता रहता है ।। २८ ।।

त्रिदशैरपि चास्याद्भिः शरवर्षं समन्ततः ।

अशक्यस्तदयं जेतुं स्रवद्भिर्मांसशोणितम् ।। २९ ।।

चारों ओर बाणोंकी वृष्टि करके शत्रुओंके शरीरोंसे रक्त और मांस बहानेवाले देवता भी

कर्णको परास्त नहीं कर सकते ।। २९ ।।

कवचेन विहीनश्च कुण्डलाभ्यां च पाण्डव ।

सोऽद्य मानुषतां प्राप्तो विमुक्तः शक्रदत्तया ॥ ३० ॥
पाण्डुनन्दन! कर्ण कवच और कुण्डलसे हीन तथा इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे शून्य होकर अब साधारण मनुष्यके समान हो गया है ॥ ३० ॥
एको हि योगोऽस्य भवेद् वधाय
च्छिद्रे ह्येनं स्वप्रमत्तः प्रमत्तम् ।
कृच्छ्रं प्राप्तं रथचक्रे विमग्ने
हन्याः पूर्वं त्वं तु संज्ञां विचार्य ॥ ३१ ॥
इतनेपर भी इसके वधका एक ही उपाय है। कोई छिद्र प्राप्त होनेपर जब वह असावधान हो, तुम्हारे साथ युद्ध होते समय जब कर्णके रथका पहिया (शापवश) धरतीमें धँस जाय और वह संकटमें पड़ जाय, उस समय तुम पूर्ण सावधान हो मेरे संकेतपर ध्यान देकर उसे पहले ही मार डालना ॥ ३१ ॥
न ह्युद्यतास्त्रं युधि हन्यादजय्य-
मप्येकवीरो बलभित् सवज्रः ।
जरासंधश्चेदिराजो महात्मा
महाबाहुश्चैकलव्यो निषादः ॥ ३२ ॥
एकैकशो निहताः सर्व एते
योगैस्तैस्तैस्त्वद्धितार्थं मयैव ।
अन्यथा जब वह युद्धके लिये अस्त्र उठा लेगा, उस समय उस अजेय वीर कर्णको त्रिलोकीके एकमात्र शूरवीर वज्रधारी इन्द्र भी नहीं मार सकेंगे। मगधराज जरासंध, महामनस्वी चेदिराज शिशुपाल और निषादजातीय महाबाहु एकलव्य—इन सबको मैंने ही तुम्हारे हितके लिये विभिन्न उपायोंद्वारा एक-एक करके मार डाला है ॥ ३२ १/२ ॥
अथापरे निहता राक्षसेन्द्रा
हिडिम्बकिर्मीरबकप्रधानाः ।
अलायुधः परचक्रावमर्दी
घटोत्कचश्चोग्रकर्मा तरस्वी ॥ ३३ ॥
इनके सिवा हिडिम्ब, किर्मीर और बक आदि दूसरे-दूसरे राक्षसराज, शत्रुदलका संहार करनेवाला अलायुध और भयंकर कर्म करनेवाला वेगशाली घटोत्कच भी तुम्हारे हितके लिये ही मारे और मरवाये गये हैं ॥ ३३ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे घटोत्कचवधे
श्रीकृष्णहर्षेऽशीत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय घटोत्कचका वध होनेपर श्रीकृष्णका हर्षविषयक एक सौ अस्सीवाँ अध्याय पूरा

हुआ ।। १८० ।।

१८१-

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

भगवान् श्रीकृष्णका अर्जुनको जरासंध आदि धर्मद्रोहियोंके वध करनेका कारण बताना

अर्जुन उवाच

कथमस्मद्धितार्थं ते कैश्च योगैर्जनार्दन ।
जरासंधप्रभृतयो घातिताः पृथिवीश्वराः ॥ १ ॥

**अर्जुनने पूछा—**जनार्दन! आपने हमलोगोंके हितके लिये कैसे किन-किन उपायोंसे जरासंध आदि राजाओंका वध कराया है? ॥ १ ॥

श्रीवासुदेव उवाच

जरासंधश्चेदिराजो नैषादिश्च महाबलः ।
यदि स्युर्न हताः पूर्वमिदानीं स्युर्भयंकराः ॥ २ ॥

**भगवान् श्रीकृष्णने कहा—**अर्जुन! जरासंध, शिशुपाल और महाबली एकलव्य यदि ये पहले ही मारे न गये होते तो इस समय बड़े भयंकर सिद्ध होते ॥ २ ॥

दुर्योधनस्तानवश्यं वृणुयाद् रथसत्तमान् ।
तेऽस्मासु नित्यविद्विष्टाः संश्रयेयुश्च कौरवान् ॥ ३ ॥

दुर्योधन उन श्रेष्ठ रथियोंसे अपनी सहायताके लिये अवश्य प्रार्थना करता और वे हमसे सर्वदा द्वेष रखनेके कारण निश्चय ही कौरवोंका पक्ष लेते ॥ ३ ॥

ते हि वीरा महेष्वासाः कृतास्त्रा दृढयोधिनः ।
धार्तराष्ट्रां चमूं कृत्स्नां रक्षेयुरमरा इव ॥ ४ ॥

वे वीर महाधनुर्धर, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा दृढ़तापूर्वक युद्ध करनेवाले थे; अतः दुर्योधनकी सारी सेनाकी देवताओंके समान रक्षा कर सकते थे ॥ ४ ॥

सूतपुत्रो जरासंधश्चेदिराजो निषादजः ।
सुयोधनं समाश्रित्य जयेयुः पृथिवीमिमाम् ॥ ५ ॥

सूतपुत्र कर्ण, जरासंध, चेदिराज शिशुपाल और निषादनन्दन एकलव्य—ये चारों मिलकर यदि दुर्योधनका पक्ष लेते तो इस पृथ्वीको अवश्य ही जीत लेते ॥ ५ ॥

योगैरपि हता यैस्ते तन्मे शृणु धनंजय ।
अजय्या हि विना योगैर्मृधे ते दैवतैरपि ॥ ६ ॥

धनंजय! वे जिन उपायोंसे मारे गये हैं, उन्हें बतलाता हूँ, मुझसे सुनो। बिना उपाय किये तो उन्हें युद्धमें देवता भी नहीं जीत सकते थे ॥ ६ ॥

एकैको हि पृथक् तेषां समस्तां सुरवाहिनीम् ।

योध्येत् समरे पार्थ लोकपालाभिरक्षिताम् ।। ७ ।। कुन्तीनन्दन! उनमेंसे अलग-अलग एक-एक वीर ऐसा था, जो लोकपालोंसे सुरक्षित समस्त देवसेनाके साथ समरांगणमें अकेला ही युद्ध कर सकता था ।। ७ ।।
जरासंधो हि रुषितो रौहिणेयप्रधर्षितः ।
अस्मद्वधार्थं चिक्षेप गदां वै सर्वघातिनीम् ।। ८ ।।
एक समयकी बात है, रोहिणीनन्दन बलरामजीने युद्धमें जरासंधको पछाड़ दिया था। इससे कुपित होकर जरासंधने हमलोगोंके वधके लिये अपनी सर्वघातिनी गदाका प्रहार किया ।। ८ ।।
सीमन्तमिव कुर्वाणा नभसः पावकप्रभा ।
अदृश्यतापतन्ती सा शक्रमुक्ता यथाशनिः ।। ९ ।।
अग्निके समान प्रज्वलित वह गदा इन्द्रके चलाये हुए वज्रकी भाँति आकाशमें सीमान्त-रेखा-सी बनाती हुई वहाँ गिरती दिखायी दी ।। ९ ।।
तामापतन्तीं दृष्ट्वैव गदां रोहिणिनन्दनः ।
प्रतिघातार्थमस्त्रं वै स्थूणाकर्णमवासृजत् ।। १० ।।
वहाँ गिरती हुई उस गदाको देखते ही उसके प्रतिघात (निवारण)-के लिये रोहिणीनन्दन बलरामजीने स्थूणाकर्ण नामक अस्त्रका प्रयोग किया ।। १० ।।
अस्त्रवेगप्रतिहता सा गदा प्रापतद् भुवि ।
दारयन्ती धरां देवीं कम्पयन्तीव पर्वतान् ।। ११ ।।
उस अस्त्रके वेगसे प्रतिहत होकर वह गदा पृथिवीदेवीको विदीर्ण करती और पर्वतोंको कँपाती हुई-सी भूतलपर गिर पड़ी ।। ११ ।।
तत्र सा राक्षसी घोरा जरानाम्नी सुविक्रमा ।
संदधे सा हि संजातं जरासंधमरिंदमम् ।। १२ ।।
जिस स्थानपर गदा गिरी, वहाँ उत्तम बल-पराक्रमसे सम्पन्न जरा नामक एक भयंकर राक्षसी रहती थी। उसीने जन्मके पश्चात् शत्रुदमन जरासंधके शरीरको जोड़ा था ।। १२ ।।
द्वाभ्यां जातो हि मातृभ्यामर्धदेहः पृथक् पृथक् ।
जरया संधितो यस्माज्जरासंधस्ततोऽभवत् ।। १३ ।।
उसका आधा-आधा शरीर अलग-अलग दो माताओंके पेटसे पैदा हुआ था। जराने उसे जोड़ा था; इसीलिये उसका नाम जरासंध हुआ ।। १३ ।।
सा तु भूमिं गता पार्थ हता ससुतबान्धवा ।
गदया तेन चास्त्रेण स्थूणाकर्णेन राक्षसी ।। १४ ।।
पार्थ! भूमिके भीतर रहनेवाली वह राक्षसी उस गदासे तथा स्थूणाकर्ण नामक अस्त्रके आघातसे पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित मारी गयी ।। १४ ।।
विनाभूतः स गदया जरासंधो महामृधे ।

निहतो भीमसेनेन पश्यतस्ते धनंजय ॥ १५ ॥
धनंजय! उस महासमरमें जरासंध बिना गदाके हो गया था; इसीलिये तुम्हारे देखते-देखते भीमसेनेने उसे मार डाला ॥ १५ ॥

यदि हि स्याद् गदापाणिर्जरासंधः प्रतापवान् ।
सेन्द्रा देवा न तं हन्तुं रणे शक्ता नरोत्तम ॥ १६ ॥
नरश्रेष्ठ! यदि प्रतापी जरासंधके हाथमें वह गदा होती तो इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवता भी उसे युद्धमें मार नहीं सकते थे ॥ १६ ॥

त्वद्धितार्थं च नैषादिरङ्गुष्ठेन वियोजितः ।
द्रोणेनाचार्यकं कृत्वा छद्मना सत्यविक्रमः ॥ १७ ॥
तुम्हारे हितके लिये ही द्रोणाचार्यने सत्यपराक्रमी एकलव्यका आचार्यत्व करके छलपूर्वक उसका अँगूठा कटवा दिया था ॥ १७ ॥

स तु बद्धाङ्गुलित्राणो नैषादिर्दृढविक्रमः ।
अतिमानी वनचरो बभौ राम इवापरः ॥ १८ ॥
सुदृढ़ पराक्रमसे सम्पन्न अत्यन्त अभिमानी एकलव्य जब हाथोंमें दस्ताने पहनकर वनमें विचरता, उस समय दूसरे परशुरामके समान जान पड़ता था ॥ १८ ॥

एकलव्यं हि साङ्गुष्ठमशक्ता देवदानवाः ।
सराक्षसोरगाः पार्थ विजेतुं युधि कर्हिचित् ॥ १९ ॥
कुन्तीकुमार! यदि एकलव्यका अँगूठा सुरक्षित होता तो देवता, दानव, राक्षस और नाग—ये सब मिलकर भी युद्धमें उसे कभी परास्त नहीं कर सकते थे ॥ १९ ॥

किमु मानुषमात्रेण शक्यः स्यात् प्रतीक्षितुम् ।
दृढमुष्टिः कृती नित्यमस्यमानो दिवानिशम् ॥ २० ॥
फिर कोई मनुष्यमात्र तो उसकी ओर देख ही कैसे सकता था? उसकी मुट्ठी मजबूत थी। वह अस्त्र-विद्याका विद्वान् था और सदा दिन-रात बाण चलानेका अभ्यास करता था ॥ २० ॥

त्वद्धितार्थं तु स मया हतः संग्राममूर्धनि ।
चेदिराजश्च विक्रान्तः प्रत्यक्षं निहतस्तव ॥ २१ ॥
तुम्हारे हितके लिये मैंने ही युद्धके मुहानेपर उसे मार डाला था। पराक्रमी चेदिराज शिशुपाल तो तुम्हारी आँखोंके सामने ही मारा गया था ॥ २१ ॥

स चाप्यशक्यः संग्रामे जेतुं सर्वसुरासुरैः ।
वधार्थं तस्य जातोऽहमन्येषां च सुरद्विषाम् ॥ २२ ॥
त्वत्सहायो नरव्याघ्र लोकानां हितकाम्यया ।

वह भी संग्राममें सम्पूर्ण देवताओं और असुरोंद्वारा जीता नहीं जा सकता था। नरव्याघ्र! मैं सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये और शिशुपाल एवं अन्य देवद्रोहियोंका वध करनेके लिये ही तुम्हारे साथ इस जगत्में अवतीर्ण हुआ हूँ॥ २२ १/२ ॥
हिडिम्बवककिर्मीरा भीमसेनेन पातिताः ॥ २३ ॥
रावणेन समप्राणा ब्रह्मयज्ञविनाशनाः ।
हिडिम्ब, वक और किर्मीर—ये रावणके समान बलवान् थे और ब्राह्मणों तथा यज्ञोंका विनाश किया करते थे। इन तीनोंको भीमसेनेने मार गिराया है॥ २३ १/२ ॥
हतस्तथैव मायावी हैडिम्बेनाप्यलायुधः ॥ २४ ॥
हैडिम्बश्चाप्युपायेन शक्त्या कर्णेन घातितः ।
मायावी अलायुध घटोत्कचके हाथसे मारा गया है और घटोत्कचको भी मैंने ही युक्ति लगाकर कर्णकी चलायी हुई शक्तिसे मरवा दिया है॥ २४ १/२ ॥
यदि ह्येनं नाहनिष्यत् कर्णः शक्त्या महामृधे ॥ २५ ॥
मया वध्योऽभविष्यत् स भैमसैनिर्घटोत्कचः ।
यदि महासमरमें कर्ण अपनी शक्तिद्वारा भीमसेनपुत्र घटोत्कचको नहीं मारता तो एक दिन मुझे उसका वध करना पड़ता॥ २५ १/२ ॥
मया न निहतः पूर्वमेष युष्मत्प्रियेप्सया ॥ २६ ॥
एष हि ब्राह्मणद्वेषी यज्ञद्वेषी च राक्षसः ।
धर्मस्य लोप्ता पापात्मा तस्मादेष निपातितः ॥ २७ ॥
तुमलोगोंका प्रिय करनेकी इच्छासे ही मैंने इसे पहले नहीं मारा था। यह ब्राह्मणों और यज्ञोंसे द्वेष रखनेवाला तथा धर्मका लोप करनेवाला पापात्मा राक्षस था; इसीलिये इसे मरवा दिया है॥ २६-२७॥
व्यंसिता चाप्युपायेन शक्रदत्ता मयानघ ।
ये हि धर्मस्य लोप्तारो वध्यास्ते मम पाण्डव ॥ २८ ॥
निष्पाप पाण्डुनन्दन! इसी उपायसे मैंने इन्द्रकी दी हुई शक्ति भी कर्णके हाथसे दूर कर दी है। धर्मका लोप करनेवाले सभी प्राणी मेरे वध्य हैं॥ २८॥
धर्मसंस्थापनार्थं हि प्रतिज्ञैषा ममाव्यया ।
ब्रह्म सत्यं दमः शौचं धर्मो ह्रीः श्रीर्धृतिः क्षमा ॥ २९ ॥
यत्र तत्र रमे नित्यमहं सत्येन ते शपे ।
धर्मकी स्थापनाके लिये ही मैंने यह अटल प्रतिज्ञा कर रखी है, मैं तुमसे सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, जहाँ वेद, सत्य, दम, शौच, धर्म, लज्जा, श्री, धृति और क्षमाका निवास है, वहीं मैं सदा सुखपूर्वक रहता हूँ॥
न विषादस्त्वया कार्यः कर्णं वैकर्तनं प्रति ॥ ३० ॥
उपदेक्ष्याम्युपायं ते येन तं प्रसहिष्यसि ।

तुम्हें वैकर्तन कर्णके विषयमें चिन्ता करनेकी आवश्यकता नहीं है। मैं तुम्हें ऐसा उपाय बताऊँगा, जिससे तुम उसका सामना कर सकोगे॥ ३० १/२॥
सुयोधनं चापि रणे हनिष्यति वृकोदरः॥ ३१॥
तस्यापि च वधोपायं वक्ष्यामि तव पाण्डव।
पाण्डुनन्दन! युद्धमें दुर्योधनका भी वध भीमसेन करेंगे। उसके वधका उपाय भी मैं तुम्हें बताऊँगा॥
वर्धते तुमुलस्त्वेष शब्दः परचमूं प्रति॥ ३२॥
विद्रवन्ति च सैन्यानि त्वदीयानि दिशो दश।
शत्रुओंकी सेनामें यह भयंकर गर्जनाका शब्द बढ़ता जा रहा है और तुम्हारे सैनिक दसों दिशाओंमें भाग रहे हैं॥ ३२ १/२॥
लब्धलक्ष्या हि कौरव्या विधमन्ति चमूं तव।
दहत्येष च वः सैन्यं द्रोणः प्रहरतां वरः॥ ३३॥
कौरवोंका निशाना अचूक हो रहा है। वे तुम्हारी सेनाका विनाश कर रहे हैं। इधर ये योद्धाओंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य तुम्हारे सैनिकोंको दग्ध किये देते हैं॥ ३३॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे कृष्णवाक्ये एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रि-युद्धके समय श्रीकृष्णका कथनविषयक एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८१॥

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द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

कर्णने अर्जुनपर शक्ति क्यों नहीं छोड़ी, इसके उत्तरमें संजयका धृतराष्ट्रसे और श्रीकृष्णका सात्यकिसे रहस्ययुक्त कथन

धृतराष्ट्र उवाच

एकवीरवधे मोघा शक्तिः सूतात्मजे यदा ।
कस्मात् सर्वान् समुत्सृज्य स तां पार्थे न मुक्तवान् ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! कर्णके पास जो शक्ति थी, वह यदि एक ही वीरका वध करके निष्फल हो जानेवाली थी तो उसने सबको छोड़कर अर्जुनपर ही उसका प्रहार क्यों नहीं किया? ॥ १ ॥

तस्मिन् हते हता हि स्युः सर्वे पाण्डवसृञ्जयाः ।
एकवीरवधे कस्माद् युद्धे न जयमादधे ॥ २ ॥
अर्जुनके मारे जानेपर समस्त सृंजय और पाण्डव अपने-आप नष्ट हो जाते। अतः एक वीर अर्जुनका ही वध करके उसने युद्धमें क्यों नहीं विजय प्राप्त की? ॥ २ ॥

आहूतो न निवर्तेयमिति तस्य महाव्रतम् ।
स्वयं मार्गयितव्यः स सूतपुत्रेण फाल्गुनः ॥ ३ ॥
अर्जुनका तो यह महान् व्रत ही है कि युद्धमें किसीके बुलानेपर मैं पीछे नहीं लौट सकता; ऐसी दशामें सूतपुत्र कर्णको स्वयं ही अर्जुनकी खोज करनी चाहिये थी ॥ ३ ॥

ततो द्वैरथमानीय फाल्गुनं शक्रदत्तया ।
जघान न वृषः कस्मात् तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ४ ॥
संजय! इस प्रकार अर्जुनको द्वैरथयुद्धमें लाकर धर्मात्मा कर्णने इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे उन्हें क्यों नहीं मार डाला? यह मुझे बताओ ॥ ४ ॥

नूनं बुद्धिविहीनश्चाप्यसहायश्च मे सुतः ।
शत्रुभिर्व्यंसितः पापः कथं नु स जयेदरीन् ॥ ५ ॥
निश्चय ही मेरा पुत्र दुर्योधन बुद्धिहीन और असहाय है। शत्रुओंने उसे ठग लिया। अब वह पापी अपने शत्रुओंपर कैसे विजय पा सकता है? ॥ ५ ॥

या ह्यस्य परमा शक्तिर्जयस्य च परायणम् ।
सा शक्तिर्वासुदेवेन व्यंसिता च घटोत्कचे ॥ ६ ॥
जो इसकी सबसे बड़ी शक्ति और विजयका आधार-स्तम्भ थी, उस दिव्य शक्तिको घटोत्कचपर चलवाकर श्रीकृष्णने व्यर्थ कर दिया ॥ ६ ॥

कुणेर्यथा हस्तगतं ह्रियेत् फलं बलीयसा । तथा शक्तिरमोघा सा मोघीभूता घटोत्कचे ॥ ७ ॥ जैसे कोई बलवान् पुरुष लुंजे (टूंँटे)-के हाथका फल छीन ले, उसी प्रकार श्रीकृष्णने उस अमोघ शक्तिको घटोत्कचपर चलवाकर अन्यत्रके लिये निष्फल कर दिया ॥ ७ ॥

यथा वराहस्य शुनश्च युध्यतो- स्तयोरभावे श्वपचस्य लाभः । मन्ये विद्वन् वासुदेवस्य तद्वद् युद्धे लाभः कर्णहैडिम्बयोर्वे ॥ ८ ॥ विद्वन्! जैसे सूअर और कुत्तेके आपसमें लड़नेपर उन दोनोंमेंसे किसीकी भी मृत्यु हो जाय तो चाण्डालको लाभ ही होता है, उसी प्रकार कर्ण और घटोत्कचके युद्धमें मैं वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णका ही लाभ हुआ मानता हूँ ॥ ८ ॥

घटोत्कचो यदि हन्याद्धि कर्णं परो लाभः स भवेत् पाण्डवानाम् । वैकर्तनो वा यदि तं निहन्यात् तथापि कृत्यं शक्तिनाशात् कृतं स्यात् ॥ ९ ॥ घटोत्कच यदि कर्णको मार देगा तो पाण्डवोंको बहुत बड़ा लाभ होगा और यदि वैकर्तन कर्ण घटोत्कचको मार डालेगा तो भी इन्द्रकी दी हुई शक्तिका नाश हो जानेसे उनका ही प्रयोजन सिद्ध होगा ॥ ९ ॥

इति प्राज्ञः प्रज्ञयैतद् विचिन्त्य घटोत्कचं सूतपुत्रेण युद्धे । अघातयद् वासुदेवो नृसिंहः प्रियं कुर्वन् पाण्डवानां हितं च ॥ १० ॥ मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी बुद्धिमान् वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने अपनी बुद्धिसे यही सोचकर पाण्डवोंका प्रिय तथा हित करते हुए युद्धमें सूतपुत्र कर्णके द्वारा घटोत्कचको मरवा दिया ॥ १० ॥

संजय उवाच

एतच्चिकीर्षितं ज्ञात्वा कर्णस्य मधुसूदनः । नियोजयामास तदा द्वैरथे राक्षसेश्वरम् ॥ ११ ॥ घटोत्कचं महावीर्यं महाबुद्धिर्जनार्दनः । अमोघाया विघातार्थं राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ १२ ॥ संजयने कहा— राजन्! कर्ण भी उस शक्तिसे अर्जुनका ही वध करना चाहता था। उसके इस अभिप्रायको जानकर परम बुद्धिमान् मधुसूदन भगवान् श्रीकृष्णने उस अमोघ

शक्तिको नष्ट करनेके लिये ही कर्णके साथ द्वैरथ युद्धमें उस समय महापराक्रमी राक्षसराज घटोत्कचको लगाया। महाराज! यह सब आपकी कुमन्त्रणाका ही फल है ।। ११-१२ ।।
तदैव कृतकार्या हि वयं स्याम कुरूद्वह ।
न रक्षेद् यदि कृष्णस्तं पार्थं कर्णान्महारथात् ।। १३ ।।
कुरुश्रेष्ठ! यदि श्रीकृष्ण महारथी कर्णसे कुन्तीकुमार अर्जुनकी रक्षा न करते तो हमलोग उसी समय कृतकार्य हो गये होते ।। १३ ।।
साश्वध्वजरथः संख्ये धृतराष्ट्र पतेद् भुवि ।
विना जनार्दनं पार्थो योगानामीश्वरं प्रभुम् ।। १४ ।।
महाराज धृतराष्ट्र! यदि योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण न हों तो अर्जुन घोड़े, ध्वज और रथसहित निश्चय ही युद्धमें धराशायी हो जायँ ।। १४ ।।
तैस्तैरुपायैर्बहुभी रक्ष्यमाणः स पार्थिव ।
जयत्यभिमुखः शत्रून् पार्थः कृष्णेन पालितः ।। १५ ।।
राजन्! नाना प्रकारके विभिन्न उपायोंसे श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित रहकर ही अर्जुन सम्मुख युद्धमें शत्रुओंपर विजय पाते हैं ।। १५ ।।
स विशेषात् त्वमोघायाः कृष्णोऽरक्षत पाण्डवम् ।
हन्यात् क्षिप्रं हि कौन्तेयं शक्तिर्वृक्षमिवाशनिः ।। १६ ।।
श्रीकृष्णने विशेष प्रयत्न करके उस अमोघ शक्तिसे पाण्डुपुत्र अर्जुनकी रक्षा की है, नहीं तो जैसे वज्र गिरकर वृक्षको भस्म कर देता है, उसी प्रकार वह शक्ति कुन्तीकुमार अर्जुनको शीघ्र ही नष्ट कर देती ।। १६ ।।

धृतराष्ट्र उवाच

विरोधी च कुमन्त्री च प्राज्ञमानी ममात्मजः ।
यस्यैव समतिक्रान्तो वधोपायो जयं प्रति ।। १७ ।।
धृतराष्ट्रने कहा—संजय! मेरा पुत्र दुर्योधन सबका विरोधी और अपनेको ही सबसे अधिक बुद्धिमान् समझनेवाला है। उसके मन्त्री भी अच्छे नहीं हैं; इसीलिये अर्जुनके वध और विजय-लाभका यह अमोघ उपाय उसके हाथसे निकल गया है ।। १७ ।।
स वा कर्णो महाबुद्धिः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
न मुक्तवान् कथं सूत ताममोघां धनंजये ।। १८ ।।
सूत! समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ कर्ण तो बड़ा बुद्धिमान् है; उसने स्वयं ही उस अमोघ शक्तिको अर्जुनपर कैसे नहीं छोड़ा? ।। १८ ।।
तवापि समतिक्रान्तमेतद् गावलगणे कथम् ।
एतमर्थं महाबुद्धे यत् त्वया नावबोधितः ।। १९ ।।

परम बुद्धिमान् गवलगणकुमार! तुम्हारे ध्यानसे यह बात कैसे निकल गयी कि तुमने कर्णको इसके विषयमें कुछ नहीं समझाया ॥ १९ ॥

संजय उवाच

दुर्योधनस्य शकुनेर्मम दुःशासनस्य च ।
रात्रौ रात्रौ भवत्येषा नित्यमेव समर्थना ॥ २० ॥
श्वः सर्वसैन्यान्युत्सृज्य जहि कर्ण धनंजयम् ।
प्रेष्यवत् पाण्डुपाञ्चालानुपभोक्ष्यामहे ततः ॥ २१ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! प्रतिदिन रातको दुर्योधन, शकुनि और दुःशासनका तथा मेरा भी कर्णसे यही आग्रह रहता था कि 'कर्ण! कल सबेरे तुम सारी सेनाओंको छोड़कर अर्जुनको मार डालो। फिर तो पाण्डवों और पांचालोंका हम भृत्योंके समान उपभोग करेंगे ॥ २०-२१ ॥

अथवा निहते पार्थे पाण्डवान्यतमं ततः ।
स्थापयेद् यदि वार्ष्णेयस्तस्मात्कृष्णो हि हन्यताम् ॥ २२ ॥
'यदि ऐसा सोचो कि अर्जुनके मारे जानेपर श्रीकृष्ण दूसरे किसी पाण्डवको युद्धके लिये खड़ा कर लेंगे तो श्रीकृष्णको ही मार डालो ॥ २२ ॥

कृष्णो हि मूलं पाण्डूनां पार्थः स्कन्ध इवोद्गतः ।
शाखा इवेतरे पार्थाः पञ्चालाः पत्रसंज्ञिताः ॥ २३ ॥
'श्रीकृष्ण ही पाण्डवोंकी जड़ हैं, अर्जुन ऊपरके तनेके समान हैं, अन्य कुन्तीपुत्र शाखाएँ हैं तथा पांचाल सैनिक पत्तोंके समान हैं ॥ २३ ॥

कृष्णाश्रयाः कृष्णबलाः कृष्णनाथाश्च पाण्डवाः ।
कृष्णः परायणं चैषां ज्योतिषामिव चन्द्रमाः ॥ २४ ॥
'श्रीकृष्ण ही पाण्डवोंके आश्रय, बल और रक्षक हैं। जैसे नक्षत्रोंके परम आश्रय चन्द्रमा हैं, उसी प्रकार इन पाण्डवोंका सबसे बड़ा सहारा श्रीकृष्ण हैं ॥ २४ ॥

तस्मात् पर्णानि शाखाश्च स्कन्धं चोत्सृज्य सूतज ।
कृष्णं हि विद्धि पाण्डूनां मूलं सर्वत्र सर्वदा ॥ २५ ॥
'अतः सूतनन्दन! तुम पत्तों, डालियों और तनेको छोड़कर जड़को ही काट दो। सर्वत्र और सदा श्रीकृष्णको ही पाण्डवोंकी जड़ समझो' ॥ २५ ॥

हन्याद् यदि हि दाशार्हं कर्णो यादवनन्दनम् ।
कृत्स्ना वसुमती राजन् वशे तस्य न संशयः ॥ २६ ॥
राजन्! यदि कर्ण यादवनन्दन श्रीकृष्णको मार डालता, तो यह सारी पृथ्वी उसके वशमें हो जाती, इसमें संशय नहीं है ॥ २६ ॥

यदि हि स निहतः शयीत भूमौ

यदुकुलपाण्डवनन्दनो महात्मा । ननु तव वसुधा नरेन्द्र सर्वा सगिरिसमुद्रवना वशं व्रजेत ॥ २७ ॥ नरेन्द्र! यदि यदुकुल और पाण्डवोंको आनन्दित करनेवाले महात्मा श्रीकृष्ण उस शक्तिसे मारे जाकर रणभूमिमें सो जाते, तो पर्वत, समुद्र और वनोंसहित यह सारी पृथ्वी आपके वशमें आ जाती ॥ २७ ॥

सा तु बुद्धिः कृताप्येवं जाग्रति त्रिदशेश्वरे । अप्रमेये हृषीकेशे युद्धकालेऽप्यमुह्यत ॥ २८ ॥ ऐसा निश्चय कर लेनेके बाद भी जब वह युद्धके समय सदा सजग रहनेवाले अप्रमेयस्वरूप देवेश्वर भगवान् श्रीकृष्णके समीप जाता तो उसपर मोह छा जाता था ॥ २८ ॥

अर्जुनं चापि राधेयात् सदा रक्षति केशवः । न ह्येनमैच्छत् प्रमुखे सौतेः स्थापयितुं रणे ॥ २९ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनको सदा राधानन्दन कर्णसे बचाये रखते थे। उन्होंने रणभूमिमें अर्जुनको सूतपुत्र कर्णके सम्मुख खड़ा करनेकी कभी इच्छा नहीं की ॥ २९ ॥

अन्यांश्चास्मै रथोदारानुपास्थापयदच्युतः । अमोघां तां कथं शक्तिं मोघां कुर्यामिति प्रभो ॥ ३० ॥ प्रभो! अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अन्यान्य महारथियोंको कर्णके पास इसलिये भेजा करते थे कि किसी प्रकार उस अमोघ शक्तिको व्यर्थ कर दूँ ॥ ३० ॥

यश्चैवं रक्षते पार्थं कर्णात् कृष्णो महामनाः । आत्मानं स कथं राजन् न रक्षेत् पुरुषोत्तमः ॥ ३१ ॥ राजन्! जो महामनस्वी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण कर्णसे अर्जुनकी इस प्रकार रक्षा करते हैं, वे अपनी रक्षा कैसे नहीं करेंगे? ॥ ३१ ॥

परिचिन्त्य तु पश्यामि चक्रायुधमरिंदमम् । न सोऽस्ति त्रिषु लोकेषु यो जयेत जनार्दनम् ॥ ३२ ॥ मैं भलीभाँति सोच-विचारकर देखता हूँ तो तीनों लोकोंमें कोई ऐसा वीर उपलब्ध नहीं होता, जो शत्रुओंका दमन करनेवाले चक्रधारी भगवान् श्रीकृष्णको जीत सके ॥ ३२ ॥

ततः कृष्णं महाबाहुं सात्यकिः सत्यविक्रमः । पप्रच्छ रथशार्दूलः कर्णं प्रति महारथः ॥ ३३ ॥ तदनन्तर रथियोंमें सिंहके समान शूरवीर सत्यपराक्रमी महारथी सात्यकिने महाबाहु श्रीकृष्णसे कर्णके विषयमें इस प्रकार प्रश्न किया— ॥ ३३ ॥

अयं च प्रत्ययः कर्णे शक्तिश्चामितविक्रमा ।

किमर्थं सूतपुत्रेण न मुक्ता फाल्गुने तु सा ॥ ३४ ॥
‘प्रभो! कर्णको उस शक्तिके प्रभावपर विश्वास तो था ही। वह अमित पराक्रम कर दिखानेवाली दिव्य शक्ति उसके हाथमें मौजूद भी थी, तथापि सूतपुत्रने अर्जुनपर उसका प्रयोग कैसे नहीं किया?’ ॥ ३४ ॥

श्रीवासुदेव उवाच

दुःशासनश्च कर्णश्च शकुनिश्च ससैन्धवः ।
सततं मन्त्रयन्ति स्म दुर्योधनपुरोगमाः ॥ ३५ ॥
कर्ण कर्ण महेष्वास रणेऽमितपराक्रम ।
नान्यस्य शक्तिरेषा ते मोक्तव्या जयतां वर ॥ ३६ ॥
ऋते महारथात् कर्ण कुन्तीपुत्राद् धनंजयात् ।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—सात्यके! दुःशासन, कर्ण, शकुनि और जयद्रथ—ये दुर्योधनको आगे रखकर सदा गुप्त मन्त्रणा करते और कर्णको यह सलाह देते थे कि ‘रणभूमिमें अनन्त पराक्रम प्रकट करनेवाले, विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर कर्ण! तुम कुन्तीपुत्र महारथी अर्जुनको छोड़कर दूसरे किसीपर इस शक्तिको न छोड़ना ॥ ३५-३६½ ॥

स हि तेषामतियशा देवानामिव वासवः ॥ ३७ ॥
तस्मिन् विनिहते पार्थे पाण्डवाः सृञ्जयैः सह ।
भविष्यन्ति गतात्मानः सुरा इव निरग्नयः ॥ ३८ ॥
‘क्योंकि देवताओंमें इन्द्रके समान उन पाण्डवोंमें अर्जुन ही सबसे अधिक यशस्वी हैं। अर्जुनके मारे जानेपर सृञ्जयोंसहित पाण्डव मुखस्वरूप अग्निसे हीन देवताओंके समान मृतप्राय हो जायेंगे। ॥ ३७-३८ ॥

तथेति च प्रतिज्ञातं कर्णेन शिनिपुङ्गव ।
हृदि नित्यं च कर्णस्य वधो गाण्डीवधन्वनः ॥ ३९ ॥
शिनिप्रवर! कर्णने वैसा ही करनेकी उनके सामने प्रतिज्ञा भी की थी। कर्णके हृदयमें नित्य-निरन्तर गाण्डीवधारी अर्जुनके वधका संकल्प उठता रहता था ॥

अहमेव तु राधेयं मोहयामि युधां वर ।
ततो नावासृजच्छक्तिं पाण्डवे श्वेतवाहने ॥ ४० ॥
योद्धाओंमें श्रेष्ठ सात्यके! परंतु मैं ही राधापुत्र कर्णको मोहित किये रहता था; इसीलिये श्वेतवाहन अर्जुनपर उसने वह शक्ति नहीं छोड़ी ॥ ४० ॥

फाल्गुनस्य हि सा मृत्युरिति चिन्तयतोऽनिशम् ।
न निद्रा न च मे हर्षो मनसोऽस्ति युधां वर ॥ ४१ ॥

वीरवर! वह शक्ति अर्जुनके लिये मृत्युस्वरूप है, इस चिन्तामें निरन्तर डूबे रहनेके कारण न तो मुझे नींद आती थी और न मेरे मनमें कभी हर्षका उदय होता था॥
घटोत्कचे व्यंसितां तु दृष्ट्वा तां शिनिपुङ्गव।
मृत्योरास्यान्तरान्मुक्तं पश्याम्यद्य धनंजयम्॥ ४२॥
शिनिवंशशिरोमणे! वह शक्ति घटोत्कचपर छोड़ दी गयी, यह देखकर आज मैं यह समझता हूँ कि अर्जुन मौतके मुखसे निकल आये हैं॥ ४२॥
न पिता न च मे माता न यूयं भ्रातरस्तथा।
न च प्राणास्तथा रक्ष्या यथा बीभत्सुराहवे॥ ४३॥
मुझे युद्धमें अर्जुनकी रक्षा जितनी आवश्यक प्रतीत होती है, उतनी पिता, माता, तुम-जैसे भाइयों तथा अपने प्राणोंकी रक्षा भी नहीं प्रतीत होती॥ ४३॥
त्रैलोक्यराज्याद् यत् किंचिद् भवेदन्यत् सुदुर्लभम्।
नेच्छेयं सात्वताहं तद् विना पार्थं धनंजयम्॥ ४४॥
सात्यके! तीनों लोकोंके राज्यसे भी बढ़कर यदि कोई अत्यन्त दुर्लभ वस्तु हो तो उसे भी मैं कुन्तीनन्दन अर्जुनके बिना नहीं पाना चाहता॥ ४४॥
अतः प्रहर्षः सुमहान् युयुधानाद्य मेऽभवत्।
मृतं प्रत्यागतमिव दृष्ट्वा पार्थं धनंजयम्॥ ४५॥
युयुधान! इसीलिये जैसे कोई मरकर लौट आया हो उसी प्रकार कुन्तीपुत्र अर्जुनको देखकर आज मुझे बड़ा भारी हर्ष हुआ था॥ ४५॥
अतश्च प्रहितो युद्धे मया कर्णाय राक्षसः।
न ह्यन्यः समरे रात्रौ शक्तः कर्णं प्रबाधितुम्॥ ४६॥
इसी उद्देश्यसे मैंने युद्धमें कर्णका सामना करनेके लिये उस राक्षसको भेजा था। उसके सिवा दूसरा कोई रात्रिके समय समरांगणमें कर्णको पीड़ित नहीं कर सकता था॥

संजय उवाच

इति सात्यकये प्राह तदा देवकिनन्दनः।
धनंजयहिते युक्तस्तत्प्रिये सततं रतः॥ ४७॥
संजय कहते हैं— महाराज! इस प्रकार अर्जुनके हितमें संलग्न और उनके प्रिय साधनमें निरन्तर तत्पर रहनेवाले भगवान् देवकीनन्दनने उस समय सात्यकिसे यह बात कही थी॥ ४७॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे कृष्णवाक्ये द्व्यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १८२॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके समय श्रीकृष्णवाक्यविषयक एक सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १८२॥