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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पक्षी और गाय आदि पशु भी चीत्कार करने लगे। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले शुद्धचित्त साधु पुरुष भी अत्यन्त अशान्त हो उठे ॥ २२ ॥
भ्रान्तसर्वमहाभूतमावर्तितदिवाकरम् ।
त्रैलोक्यमभिसंतप्तं ज्वराविष्टमिवाभवत् ॥ २३ ॥
सम्पूर्ण महाभूत मानो चक्कर काट रहे थे। सूर्य भी घूमता-सा प्रतीत होता था। तीनों लोकोंके प्राणी ज्वरग्रस्तके समान संतप्त हो उठे थे ॥ २३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1544)

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अश्वत्थामाके द्वारा अर्जुनपर आग्नेयास्त्रका प्रयोग एवं उसके द्वारा पाण्डव-सेनाका संहार

अस्त्रतेजोऽभिसंतप्ता नागा भूमिशयास्तथा ।
निःश्वसन्तः समुत्पेतुस्तेजो घोरं मुमुक्षवः ॥ २४ ॥
पृथ्वीपर पड़े रहनेवाले नाग भी उस अस्त्रके तेजसे संतप्त हो भयंकर आगसे छुटकारा पानेके लिये फुफकारते हुए ऊपर उछलने लगे ॥ २४ ॥

जलजानि च सत्त्वानि दह्यमानानि भारत ।
न शान्तिमुपजग्मुर्हि तप्यमानैर्जलाशयैः ॥ २५ ॥
भारत! जलाशय भी तप गये थे, जिससे दग्ध होनेवाले जलचर प्राणियोंको भी शान्ति नहीं मिल पाती थी ॥ २५ ॥

दिग्भ्यः प्रदिग्भ्यः खाद् भूमेः सर्वतः शरवृष्टयः ।
उच्चावचा निपेतुर्वै गरुडानिलरंहसः ॥ २६ ॥
दिशा, विदिशा, आकाश और पृथ्वी सब ओरसे छोटे-बड़े नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा होने लगी, वे सभी बाण गरुड़ और वायुके समान वेगशाली थे ॥ २६ ॥

तैः शरैर्द्रोणपुत्रस्य वज्रवेगैः समाहताः ।
प्रदग्धा रिपवः पेतुरग्निदग्धा इव द्रुमाः ॥ २७ ॥
द्रोणपुत्रके चलाये हुए उन वज्रके समान वेगशाली बाणोंसे घायल हुए शत्रुसैनिक आगके जलाये हुए वृक्षोंके समान दग्ध होकर गिरने लगे ॥ २७ ॥

दह्यमाना महानागाः पेतुरुर्व्यां समन्ततः ।
नदन्तो भैरवान् नादाञ्जलदोपमनिःस्वनान् ॥ २८ ॥
विशालकाय गजराज दग्ध हो-होकर मेघकी गर्जनाके समान भयंकर चीत्कार करते हुए सब ओर धराशायी होने लगे ॥ २८ ॥

अपरे प्रद्रुता नागा भयत्रस्ता विशाम्पते । भ्रेमुर्दिशो यथा पूर्वं वने दावाग्निसंवृताः ॥ २९ ॥ प्रजानाथ! भयभीत होकर भागे हुए दूसरे बहुत-से हाथी सम्पूर्ण दिशाओंमें उसी प्रकार चक्कर काटने लगे, जैसे पहले वनमें दावानलसे घिर जानेपर वे चारों ओर चक्कर लगाते थे ॥ २९ ॥

द्रुमाणां शिखराणीव दावदग्धानि मारिष । अश्ववृन्दान्यदृश्यन्त रथवृन्दानि भारत ॥ ३० ॥ अपतन्त रथौघाश्च तत्र तत्र सहस्रशः । माननीय नरेश! भारत! अश्वसमूह तथा रथवृन्द दावानलसे दग्ध हुए वृक्षोंके अग्रभागके समान दिखायी दे रहे थे और जहाँ-तहाँ सहस्रों रथसमूह गिरे पड़े थे ॥ ३० १/२ ॥

तत् सैन्यं भयसंविग्नं ददाह युधि भारत ॥ ३१ ॥ युगान्ते सर्वभूतानि संवर्तक इवानलः । भरतनन्दन! जैसे प्रलयकालमें संवर्तक अग्नि सब प्राणियोंको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार उस आग्नेयास्त्रने पाण्डवोंकी उस भयभीत सेनाको युद्धस्थलमें जलाना आरम्भ कर दिया ॥ ३१ १/२ ॥

दृष्ट्वा तु पाण्डवीं सेनां दह्यमानां महाहवे ॥ ३२ ॥ प्रहृष्टास्तावका राजन् सिंहनादान् विनेदिरे । राजन्! उस महासमरमें पाण्डव-सेनाको दग्ध होती देख आपके सैनिक अत्यन्त प्रसन्न हो जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ३२ १/२ ॥

ततस्तूर्यसहस्राणि नानालिङ्गानि भारत ॥ ३३ ॥ तूर्णमाजघ्निरे हृष्टास्तावका जितकाशिनः । भारत! तदनन्तर हर्षसे उल्लसित और विजयसे सुशोभित होनेवाले आपके सैनिक नाना प्रकारके सहस्रों बाजे बजाने लगे ॥ ३३ १/२ ॥

कृत्स्ना ह्यक्षौहिणी राजन् सव्यसाची च पाण्डवः ॥ ३४ ॥ तमसा संवृते लोके नादृश्यन्त महाहवे । नरेश्वर! उस महासमरमें सब लोग अन्धकारसे आच्छन्न हो गये थे। पाण्डवोंकी सारी अक्षौहिणी सेना और सव्यसाची अर्जुन भी नहीं दिखायी देते थे ॥ ३४ १/२ ॥

नैव नस्तादृशं राजन् दृष्टपूर्वं न च श्रुतम् ॥ ३५ ॥ यादृशं द्रोणपुत्रेण सृष्टमस्त्रममर्षिणा । राजन्! अमर्षमें भरे हुए द्रोणपुत्रने जैसे अस्त्रकी सृष्टि की थी, वैसा हमलोगोंने पहले न तो कभी देखा था और न सुना ही था ॥ ३५ १/२ ॥

अर्जुनस्तु महाराज ब्राह्ममस्त्रमुदैरयत् ॥ ३६ ॥ सर्वास्त्रप्रतिघातार्थं विहितं पद्मयोनिना । महाराज! उस समय अर्जुनने ब्रह्मास्त्रको प्रकट किया; जिसे ब्रह्माजीने सम्पूर्ण अस्त्रोंके विनाशके लिये बनाया है ॥

ततो मुहूर्तादिव तत् तमो व्युपशशाम ह ॥ ३७ ॥ प्रववौ चानिलः शीतो दिशश्च विमला बभुः । फिर तो दो घड़ीमें वह सारा अन्धकार दूर हो गया, शीतल वायु बहने लगी और सारी दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं ॥ ३७ १/२ ॥

तत्राद्भुतमपश्याम कृत्स्नामक्षौहिणीं हताम् ॥ ३८ ॥ अनभिज्ञेयरूपां च प्रदग्धामस्त्रतेजसा । वहाँ हमलोगोंने अद्भुत दृश्य देखा। पाण्डवोंकी वह सारी अक्षौहिणी उस अस्त्रके तेजसे इस प्रकार दग्ध एवं नष्ट हो गयी थी कि उसे पहचानना असम्भव हो गया ॥ ३८ १/२ ॥

ततो वीरौ महेष्वासौ विमुक्तौ केशवार्जुनौ ॥ ३९ ॥ सहितौ प्रत्यदृश्येतां नभसीव तमोनुदौ । तदनन्तर उस अस्त्रसे मुक्त हुए महाधनुर्धर वीर श्रीकृष्ण और अर्जुन एक साथ दिखायी दिये, मानो आकाशमें चन्द्रमा और सूर्य प्रकट हो गये हों ॥ ३९ १/२ ॥

ततो गाण्डीवधन्वा च केशवश्चाक्षतावुभौ ॥ ४० ॥ सपताकध्वजहयः सानुकर्षवरायुधः । प्रबभौ स रथो मुक्तस्तावकानां भयंकरः ॥ ४१ ॥ उस समय गाण्डीवधारी अर्जुन और भगवान् श्रीकृष्ण दोनोंके शरीरपर आँच नहीं आने पायी थी। पताका, ध्वज, अश्व, अनुकर्ष और श्रेष्ठ आयुधोंसहित मुक्त हुआ उनका वह रथ आपके सैनिकोंको भयभीत करता हुआ चमक उठा ॥ ४०-४१ ॥

ततः किलकिलाशब्दः शङ्खभेरीस्वनैः सह । पाण्डवानां प्रहृष्टानां क्षणेन समजायत ॥ ४२ ॥ तब पाण्डव हर्षसे खिल उठे और क्षणभरमें शंख तथा भेरियोंकी ध्वनिके साथ उनका आनन्दमय कोलाहल गूँज उठा ॥ ४२ ॥ हताविति तयोरासीत् सेनयोरुभयोर्मतिः । तरसाभ्यागतौ दृष्ट्वा सहितौ केशवार्जुनौ ॥ ४३ ॥ श्रीकृष्ण और अर्जुनके सम्बन्धमें उन दोनों ही सेनाओंको यह विश्वास हो गया था कि वे मारे गये। फिर उन दोनोंको एक साथ वेगपूर्वक निकट आया देख सबको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४३ ॥

तावक्षतौ प्रमुदितौ दध्यतुर्वारिजोत्तमौ । दृष्ट्वा प्रमुदितान् पार्थांस्त्वदीया व्यथिता भृशम् ॥ ४४ ॥ उन दोनोंके शरीरमें क्षति नहीं पहुँची थी। वे दोनों वीर आनन्दमग्न हो अपने उत्तम शंख बजाने लगे। कुन्तीके पुत्रोंको प्रसन्न देखकर आपके पुत्रोंके मनमें बड़ी व्यथा हुई ॥ ४४ ॥

विमुक्तौ च महात्मानौ दृष्ट्वा द्रौणिः सुदुःखितः । मुहूर्तं चिन्तयामास किं त्वेतदिति मारिष ॥ ४५ ॥ माननीय नरेश! महात्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनको आग्नेयास्त्रसे मुक्त देख अश्वत्थामाको बड़ा दुःख हुआ। वह दो घड़ीतक इसी चिन्तामें डूबा रहा कि ‘यह क्या हो गया?’ ॥ ४५ ॥

चिन्तयित्वा तु राजेन्द्र ध्यानशोकपरायणः । निःश्वसन् दीर्घमुष्णं च विमनाश्चाभवत् ततः ॥ ४६ ॥ राजेन्द्र! चिन्ता और शोकमें मग्न होकर कुछ देरतक विचार करनेके पश्चात् अश्वत्थामा गरम-गरम दीर्घ उच्छ्वास लेने लगा और मन-ही-मन उदास हो गया ॥

ततो द्रौणिर्धनुस्त्यक्त्वा रथात् प्रस्कन्द्य वेगितः । धिग् धिक् सर्वमिदं मिथ्येत्युक्त्वा सम्प्राद्रवद् रणात् ॥ ४७ ॥ तत्पश्चात् द्रोणकुमार धनुष त्यागकर रथसे कूद पड़ा और ‘धिक्कार है! धिक्कार है!! यह सब मिथ्या है’ ऐसा कहकर वह रणभूमिसे वेगपूर्वक भाग चला ॥

ततः स्निग्धाम्बुदाभासं वेदावासमकल्मषम् । वेदव्यासं सरस्वत्यावासं व्यासं ददर्श ह ॥ ४८ ॥ इतनेमेंही उसे स्निग्ध मेघके समान श्याम कान्तिवाले, वेद और सरस्वतीके आवास-स्थान तथा वेदोंका विस्तार करनेवाले, पापशून्य महर्षि व्यास वहाँ दिखायी दिये ॥ ४८ ॥

तं द्रौणिरग्रतो दृष्ट्वा स्थितं कुरुकुलोद्वह । सन्नकण्ठोऽब्रवीद् वाक्यमभिवाद्य सुदीनवत् ॥ ४९ ॥ कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष! महर्षि व्यासको सामने खड़ा देख द्रोणकुमारका गला आँसुओंसे भर आया। उसने अत्यन्त दीनभावसे प्रणाम करके उनसे इस प्रकार पूछा — ॥ ४९ ॥

भो भो माया यदृच्छा वा न विद्मः किमिदं भवेत् । अस्त्रं त्विदं कथं मिथ्या मम कश्च व्यतिक्रमः ॥ ५० ॥ 'महर्षे! यह माया है या दैवेच्छा। मेरी समझमें नहीं आता कि यह क्या है? यह अस्त्र झूठा कैसे हो गया? मुझसे कौन-सी गलती हो गयी? ।। ५० ।।

अधरोत्तरमेतद् वा लोकानां वा पराभवः । यदिमौ जीवतः कृष्णौ कालो हि दुरतिक्रमः ॥ ५१ ॥ 'इस (आग्नेय) अस्त्रके प्रभावमें कोई उलट-फेर तो नहीं हो गया अथवा सम्पूर्ण लोकोंका पराभव होनेवाला है, जिससे ये दोनों कृष्ण जीवित बच गये। निश्चय ही कालका उल्लंघन करना अत्यन्त कठिन है ।। ५१ ।।

नासुरा न च गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसाः । न सर्पा यक्षपतगा न मनुष्याः कथंचन ॥ ५२ ॥ उत्सहन्तेऽन्यथा कर्तुमेतदस्त्रं मयेरितम् । तदिदं केवलं हत्वा शान्तमक्षौहिणीं ज्वलत् ॥ ५३ ॥ 'मेरे द्वारा प्रयोग किये हुए इस अस्त्रको असुर, गन्धर्व, पिशाच, राक्षस, सर्प, यक्ष, पक्षी और मनुष्य किसी तरह भी व्यर्थ नहीं कर सकते थे, तो भी यह प्रज्वलित अस्त्र केवल एक

अक्षौहिणी सेनाको जलाकर शान्त हो गया ।। ५२-५३ ।। सर्वघाति मया मुक्तमस्त्रं परमदारुणम् । केनेमौ मर्त्यधर्माणौ नावधीत् केशवार्जुनौ ।। ५४ ।। 'मैंने तो अत्यन्त भयंकर एवं सर्वसंहारक अस्त्रका प्रयोग किया था; फिर उसने किस कारणसे इन मर्त्यधर्मा श्रीकृष्ण और अर्जुनका वध नहीं किया? ।। एतत् प्रब्रूहि भगवन् मया पृष्टो यथातथम् । श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन सर्वमेतन्महामुने ।। ५५ ।। 'भगवन्! महामुने! मैंने जो आपसे यह प्रश्न किया है, इसका मुझे यथार्थ उत्तर दीजिये। मैं यह सब कुछ ठीक-ठीक सुनना चाहता हूँ' ।। ५५ ।।

व्यास उवाच

महान्तमेवमथ मां यं त्वं पृच्छसि विस्मयात् । तं प्रवक्ष्यामि ते सर्वं समाधाय मनः शृणु ।। ५६ ।। **व्यासजी बोले—**तू जिसके सम्बन्धमें आश्चर्यके साथ प्रश्न कर रहा है, उस महत्त्वपूर्ण विषयको मैं तुझसे बता रहा हूँ। तू अपने मनको एकाग्र करके सब कुछ सुन ।। योऽसौ नारायणो नाम पूर्वेषामपि पूर्वजः । (आदिदेवो जगन्नाथो लोककर्ता स्वयं प्रभुः । आद्यः सर्वस्य लोकस्य अनादिनिधनोऽच्युतः ।। जो हमारे पूर्वजोंके भी पूर्वज भगवान् नारायण हैं, वे ही आदिदेव, जगन्नाथ, लोककर्ता और स्वयं ही सब कुछ करनेमें समर्थ हैं। वे सम्पूर्ण जगत्के आदिकारण तथा स्वयं आदि-अन्तसे रहित हैं। अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेके कारण वे अच्युत कहलाते हैं। व्याकुर्वते यस्य तत्त्वं श्रुतयो मुनयश्च ह । अतोऽजय्यः सर्वभूतैर्मनसापि जगत्पतिः ।।) श्रुतियाँ और महर्षिगण उन्हींके तत्त्वका विवेचन करते हैं। अतः उन जगदीश्वरको समस्त प्राणी मनसे भी जीतनेमें असमर्थ हैं। अजायत च कार्यार्थं पुत्रो धर्मस्य विश्वकृत् ।। ५७ ।। वे विश्वविधाता भगवान् एक समय किसी विशेष कार्यके लिये धर्मके पुत्ररूपमें अवतीर्ण हुए थे ।। ५७ ।। स तपस्तीव्रमातस्थे शिशिरं गिरिमास्थितः । ऊर्ध्वबाहुर्महातेजा ज्वलनादित्यसंनिभः ।। ५८ ।। अग्नि और सूर्यके समान महातेजस्वी उन भगवान् नारायणने हिमालय पर्वतपर रहकर अपनी दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये हुए बड़ी कठोर तपस्या की थी ।। ५८ ।। षष्टिं वर्षसहस्राणि तावन्त्येव शतानि च ।

अशोषयत् तदाऽऽत्मानं वायुभक्षोऽम्बुजेक्षणः ॥ ५९ ॥ उन कमलनयन श्रीहरिने छाछठ हजार वर्षोंतक केवल वायु पीकर उन दिनों अपने शरीरको सुखाया ।।

अथापरं तपस्तप्त्वा द्विस्ततोऽन्यत् पुनर्महत् । द्यावापृथिव्योर्विवरं तेजसा समपूरयत् ॥ ६० ॥ तदनन्तर उससे दुगुने कालतक फिर भारी तपस्या करके उन्होंने अपने तेजसे पृथ्वी और आकाशके मध्यवर्ती आकाशको भर दिया ।। ६० ।।

अध्याय (पृष्ठ 1553)

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वेदव्यासजीका अश्वत्थामाको आश्वासन

स तेन तपसा तात ब्रह्मभूतो यदाभवत् । ततो विश्वेश्वरं योनिं विश्वस्य जगतः पतिम् ॥ ६१ ॥ ददर्श भृशदुर्धर्षं सर्वदेवैरभिष्टुतम् । अणीयांसमणुभ्यश्च बृहद्भ्यश्च बृहत्तमम् ॥ ६२ ॥ तात! उस तपस्यासे जब वे साक्षात् ब्रह्मस्वरूपमें स्थित हो गये, तब उन्हें उन भगवान् विश्वेश्वरका दर्शन हुआ जो सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्ति-स्थान और जगत्के पालक हैं, जिन्हें पराजित करना अत्यन्त कठिन (असम्भव) है। सम्पूर्ण देवता जिनकी स्तुति करते हैं तथा जो सूक्ष्मसे भी अत्यन्त सूक्ष्म और महान्‌से भी परम महान् हैं ॥ ६१-६२ ॥

रुद्रमीशानवृषभं हरं शम्भुं कपर्दिनम् । चेकितानं परां योनिं तिष्ठतो गच्छतश्च ह ॥ ६३ ॥ वे 'रु' अर्थात् दुःखको दूर करनेके कारण रुद्र कहलाते हैं। ब्रह्मा आदि लोकपालोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। पापहारी, कल्याणकी प्राप्ति करानेवाले तथा जटाजूटधारी हैं। वे ही सबको चेतना प्रदान करते हैं और वे ही स्थावर-जंगम प्राणियोंके परम कारण हैं ॥ ६३ ॥

दुर्वारणं दुर्द्दशं तिग्ममन्युं महात्मानं सर्वहरं प्रचेतसम् । दिव्यं चापमिषुधी चाददानं हिरण्यवर्म्माणमनन्तवीर्यम् ॥ ६४ ॥ उन्हें कहीं कोई रोक नहीं सकता, उनका दर्शन बड़ी कठिनाईसे होता है, वे दुष्टोंपर प्रचण्ड कोप करनेवाले हैं, उनका हृदय विशाल है, वे सारे क्लेशोंको हर लेनेवाले अथवा सर्वसंहारी हैं, साधु पुरुषोंके प्रति उनका हृदय अत्यन्त उदार है, वे दिव्य धनुष और दो तरकश धारण करते हैं, उनका कवच सोनेका बना हुआ है तथा वे अनन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं ॥ ६४ ॥

पिनाकिनं वज्रिणं दीप्तशूलं परश्वधिं गदिनं चायतासिम् । शुभ्रं जटिलं मुसलिनं चन्द्रमौलिं व्याघ्राजिनं परिघिणं दण्डपाणिम् ॥ ६५ ॥ वे अपने हाथोंमें पिनाक और वज्र धारण करते हैं, उनके एक हाथमें त्रिशूल चमकता रहता है, वे फरसा, गदा और लंबी तलवार लिये रहते हैं, मुसल, परिघ और दण्ड भी उनके हाथोंकी शोभा बढ़ाते हैं, उनकी अंगकान्ति उज्ज्वल है, वे मस्तकपर जटा और उसके ऊपर चन्द्रमाका मुकुट धारण करते हैं, उनके श्रीअंगमें बाघम्बर शोभा देता है ॥ ६५ ॥

शुभाङ्गदं नागयज्ञोपवीतं विश्वैर्गणैः शोभितं भूतसंघैः । एकीभूतं तपसां संनिधानं

वयोऽतिगैः सुष्टुतमिष्टवाग्भिः ॥ ६६ ॥ उनकी भुजाओंमें सुन्दर अंगद (बाजूबंद) और गलेमें नागमय यज्ञोपवीत शोभा पाते हैं, वे अपने पार्षदस्वरूप सम्पूर्ण भूतसमुदायोंसे सुशोभित हैं, उन्हें एकमात्र अद्वितीय परमेश्वर समझना चाहिये, वे तपस्याकी निधि हैं और वृद्ध पुरुष प्रिय वचनोंद्वारा उनकी स्तुति करते हैं ॥ ६६ ॥

जलं दिशं खं क्षितिं चन्द्रसूर्यौ तथा वाय्वग्नी प्रमिमाणं जगच्च । नालं द्रष्टुं यं जना भिन्नवृत्ता ब्रह्मद्विषघ्नममृतस्य योनिम् ॥ ६७ ॥ जल, दिशा, आकाश, पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य, वायु, अग्नि तथा जगत्‌को माप लेनेवाला काल—ये सब उन्हींके स्वरूप हैं। वे ब्रह्मद्रोहियोंके नाशक और मोक्षके परम कारण हैं, दुराचारी मनुष्य उनका दर्शन पानेमें असमर्थ हैं ॥ ६७ ॥

यं पश्यन्ति ब्राह्मणाः साधुवृत्ताः क्षीणे पापे मनसा वीतशोकाः । तं निष्पतन्तं तपसा धर्ममीड्यं तद्भक्त्या वै विश्वरूपं ददर्श । दृष्ट्वा चैनं वाङ्मनोबुद्धिदेहः संहृष्टात्मा मुमुदे वासुदेवः ॥ ६८ ॥ जिन्होंने मनसे शोक-संतापको सर्वथा दूर कर दिया है, वे सदाचारी ब्राह्मण पापोंका क्षय हो जानेपर जिनका दर्शन कर पाते हैं, यह सम्पूर्ण विश्व जिनका स्वरूप है, जो साक्षात् धर्म तथा स्तवन करनेयोग्य परमेश्वर हैं, वे ही महेश्वर वहाँ उनकी तपस्या और भक्तिके प्रभावसे प्रकट हो गये तथा तपस्वी नारायणने उनका दर्शन किया। उनका दर्शन करके मन, वाणी, बुद्धि और शरीरके साथ ही उनकी अन्तरात्मा हर्षसे खिल उठी। उन भगवान् वासुदेवने बड़े आनन्दका अनुभव किया ॥ ६८ ॥

अक्षमालापरिक्षिप्तं ज्योतिषां परमं निधिम् । ततो नारायणो दृष्ट्वा ववन्दे विश्वसम्भवम् ॥ ६९ ॥ रुद्राक्षकी मालासे विभूषित तथा तेजकी परम निधिरूप उन विश्व-विधाताका दर्शन करके भगवान् नारायणने उनकी वन्दना की ॥ ६९ ॥

वरदं पृथुचार्वङ्ग्या पार्वत्या सहितं प्रभुम् । क्रीडमानं महात्मानं भूतसङ्घगणैर्वृतम् ॥ ७० ॥ अजमीशानमव्यक्तं कारणात्मानमच्युतम् ।

वे वरदायक प्रभु हृष्ट-पुष्ट एवं मनोहर अंगोंवाली पार्वतीदेवीके साथ क्रीड़ा करते हुए पधारे थे। उन अजन्मा, ईशान, अव्यक्त, कारणस्वरूप और अपनी महिमासे कभी च्युत न होनेवाले परमात्माको उनके पार्षदस्वरूप भूतगणोंने घेर रखा था ।। ७० १/२ ।।
(स्वजानुभ्यां महीं गत्वा कृत्वा शिरसि चाञ्जलिम् ।)
अभिवाद्याथ रुद्राय सद्योऽन्धकनिपातिने ।
पद्माक्षस्तं विरूपाक्षमभितुष्टाव भक्तिमान् ।। ७१ ।।
कमलनयन भगवान् श्रीहरिने पृथ्वीपर दोनों घुटने टेककर और मस्तकपर हाथ जोड़कर अन्धकासुरका विनाश करनेवाले उन रुद्रदेवको प्रणाम किया और भक्तिभावसे युक्त हो उन भगवान् विरूपाक्षकी वे इस प्रकार स्तुति करने लगे ।। ७१ ।।

श्रीनारायण उवाच

त्वत्सम्भूता भूतकृतो वरेण्य
गोप्तारोऽस्य भुवनस्यादिदेव ।
आविश्येमां धरणीं येऽभ्यरक्षन्
पुरा पुराणीं तव देवसृष्टिम् ।। ७२ ।।
**श्रीनारायण बोले—**सर्वश्रेष्ठ आदिदेव! जिन्होंने इस पृथ्वीमें समाकर आपकी पुरातन दिव्य सृष्टिकी रक्षा की थी तथा जो इस विश्वकी भी रक्षा करनेवाले हैं, वे सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि करनेवाले प्रजापतिगण भी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं ।। ७२ ।।

सुरासुरान् नागरक्षःपिशाचान्
नरान् सुपर्णानथ गन्धर्वयक्षान् ।
पृथग्विधान् भूतसंघांश्च विश्वां-
स्त्वत्सम्भूतान् विद्म सर्वांस्तथैव ।
ऐन्द्रं याम्यं वारुणं वैत्तपाल्यं
पैत्रं त्वाष्ट्रं कर्म सौम्यं च तुभ्यम् ।। ७३ ।।
देवता, असुर, नाग, राक्षस, पिशाच, मनुष्य, गरुड़ आदि पक्षी, गन्धर्व तथा यक्ष आदि जो पृथक्-पृथक् प्राणियोंके अखिल समुदाय हैं, उन सबको हम आपसे ही उत्पन्न हुआ मानते हैं। इसी प्रकार इन्द्र, यम, वरुण और कुबेरका पद, पितरोंका लोक तथा विश्वकर्माकी सुन्दर शिल्पकला आदिका आविर्भाव भी आपसे ही हुआ है ।। ७३ ।।

रूपं ज्योतिः शब्द आकाशवायुः
स्पर्शः स्वाद्यं सलिलं गन्ध उर्वी ।
कालो ब्रह्मा ब्रह्म च ब्राह्मणाश्च
त्वत्सम्भूतं स्थास्नु चरिष्णु चेदम् ।। ७४ ।।

शब्द और आकाश, स्पर्श और वायु, रूप और तेज, रस और जल तथा गन्ध और पृथ्‍वीकी उत्पत्ति भी आपसे ही हुई है। काल, ब्रह्मा, वेद, ब्राह्मण तथा यह सम्पूर्ण चराचर जगत् भी आपसे ही उत्पन्न हुआ है ॥ ७४ ॥

अद्भ्यः स्तोका यान्ति यथा पृथक्त्वं ताभिश्चैक्यं संक्षये यान्ति भूयः । एवं विद्वान् प्रभवं चाप्ययं च मत्वा भूतानां तव सायुज्यमेति ॥ ७५ ॥

जैसे जलसे उसकी बूँदें बिलग हो जाती हैं और क्षीण होनेपर कालक्रमसे वे पुनः जलमें मिलकर उसके साथ एकरूप हो जाती हैं, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूत आपसे ही उत्पन्न होते और आपमें ही लीन होते हैं। ऐसा जाननेवाला विद्वान् पुरुष आपका सायुज्य प्राप्त कर लेता है ॥ ७५ ॥

दिव्यामृतौ मानसौ द्वौ सुपर्णौ वाचा शाखाः पिप्पलाः सप्त गोपाः । दशाप्यन्ये ये पुरं धारयन्ति त्वया सृष्टास्त्वं हि तेभ्यः परो हि ॥ ७६ ॥

अन्तःकरणमें निवास करनेवाले दो दिव्य एवं अमृतस्वरूप पक्षी (ईश्वर और जीव) हैं। सात धातुरूप सात पीपल हैं, जो उनकी रक्षा करनेवाले हैं। वेदवाणी ही उन वृक्षोंकी विविध शाखाएँ हैं। दूसरी भी दस वस्तुएँ (इन्द्रियाँ) हैं, जो पांचभौतिक शरीररूपी नगरको धारण करती हैं। ये सारे पदार्थ आपके ही रचे हुए हैं, तथापि आप इन सबसे परे हैं ॥ ७६ ॥

भूतं भव्यं भविता चाप्यधृष्यं त्वत्सम्भूता भुवनानीह विश्वा । भक्तं च मां भजमानं भजस्व मा रीरिषो मामहिताहितेन ॥ ७७ ॥

भूत, वर्तमान, भविष्य तथा अजेय काल—ये सब आपके ही स्वरूप हैं। यहाँ सम्पूर्ण लोक आपसे ही उत्पन्न हुए हैं। मैं आपका भजन करनेवाला भक्त हूँ, आप मुझे अपनाइये। अहित करनेवालोंको रखकर मेरी हिंसा न कराइये ॥ ७७ ॥

आत्मानं त्वामात्मनोऽनन्यबोधं विद्वानेवं गच्छति ब्रह्म शुक्रम् । अस्तौषं त्वां तव सम्मानमिच्छन् विचिन्वन् वै सदृशं देववर्य । सुदुर्लभान् देहि वरान् ममेश- नभिष्टुतः प्रविकार्षींश्च मायाम् ॥ ७८ ॥

आप जीवात्मासे अभिन्न अनुभव किये जानेवाले सबके आत्मा हैं, ऐसा जाननेवाला विद्वान् पुरुष विशुद्ध ब्रह्मभावको प्राप्त होता है। देववर्य! मैंने आपके सत्कारकी शुभ इच्छा लेकर यह स्तवन किया है। स्तुतिके सर्वथा योग्य आप परमेश्वरका मैं चिरकालसे अन्वेषण कर रहा था। जिनकी भलीभाँति स्तुति की गयी है ऐसे आप अपनी मायाको दूर कीजिये और मुझे अभीष्ट दुर्लभ वर प्रदान कीजिये ।। ७८ ।।

व्यास उवाच

तस्मै वरानचिन्त्यात्मा नीलकण्ठः पिनाकधृत् । अर्हते देवमुख्याय प्रायच्छदृषिसंस्तुतः ॥ ७९ ॥

व्यासजी कहते हैं—द्रोणकुमार! नारायण ऋषिके इस प्रकार स्तुति करनेपर अचिन्त्यस्वरूप, पिनाकधारी, नीलकण्ठ भगवान् शिवने वर पानेके सर्वथा योग्य उन देवप्रधान नारायणको बहुत-से वर दिये ।। ७९ ।।

श्रीभगवानुवाच

मत्प्रसादान्मनुष्येषु देवगन्धर्वयोनिषु । अप्रमेयबलात्मा त्वं नारायण भविष्यसि ॥ ८० ॥

श्रीभगवान् बोले—नारायण! तुम मेरे कृपा-प्रसादसे मनुष्यों, देवताओं तथा गन्धर्वोंमें भी असीम बल-पराक्रमसे सम्पन्न होओगे ।। ८० ।।

न च त्वां प्रसहिष्यन्ति देवासुरमहोरगाः । न पिशाचा न गन्धर्वा न यक्षा न च राक्षसाः ॥ ८१ ॥ न सुपर्णास्तथा नागा न च विश्वे वियोनिजाः । न कश्चित् त्वां च देवोऽपि समरेषु विजेष्यति ॥ ८२ ॥

देवता, असुर, बड़े-बड़े सर्प, पिशाच, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सुपर्ण, नाग तथा समस्त पशुयोनिके (सिंह, व्याघ्र आदि) प्राणी भी तुम्हारा वेग नहीं सह सकेंगे। युद्धस्थलोंमें कोई देवता भी तुम्हें जीत नहीं सकेगा ।। ८१-८२ ।।

न शस्त्रेण न वज्रेण नाग्निना न च वायुना । न चार्द्रेण न शुष्केण त्रसेन स्थावरेण च ॥ ८३ ॥ कश्चित् तव रुजां कर्ता मत्प्रसादात् कथंचन । अपि वै समरं गत्वा भविष्यसि ममाधिकः ॥ ८४ ॥

शस्त्र, वज्र, अग्नि, वायु, गीले-सूखे पदार्थ और स्थावर एवं जंगम प्राणीके द्वारा भी कोई मेरी कृपासे किसी प्रकार तुम्हें चोट नहीं पहुँचा सकता। तुम समरभूमिमें पहुँचनेपर मुझसे भी अधिक बलवान् हो जाओगे ।। ८३-८४ ।।

एवमेते वरा लब्धाः पुरस्ताद् विद्धि शौरिणा । स एष देवश्चरति मायया मोहयज्जगत् ॥ ८५ ॥

तुझे मालूम होना चाहिये, इस प्रकार श्रीकृष्णने पहले ही भगवान् शंकरसे ये अनेक वरदान पा लिये हैं। वे ही भगवान् नारायण श्रीकृष्णके रूपमें अपनी मायासे इस संसारको मोहित करते हुए विचर रहे हैं ।। ८५ ।।

तस्यैव तपसा जातं नरं नाम महामुनिम् ।
तुल्यमेतेन देवेन तं जानीह्यर्जुनं सदा ।। ८६ ।।
नारायणके ही तपसे महामुनि नर प्रकट हुए हैं, जो इन भगवान्‌के ही समान शक्तिशाली हैं। तू अर्जुनको सदा उन्हीं भगवान् नरका अवतार समझ ।। ८६ ।।

तावेतौ पूर्वदेवानां परमोपचितावृषी ।
लोकयात्राविधानार्थं संजायेते युगे युगे ।। ८७ ।।
ये दोनों ऋषि प्रमुख देवता, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रमेंसे विष्णुस्वरूप हैं और तपस्यामें बहुत बढ़े-चढ़े हैं। ये लोगोंको धर्म-मर्यादामें रखकर उनकी रक्षाके लिये युग-युगमें अवतार ग्रहण करते हैं ।। ८७ ।।

तथैव कर्मणा कृत्स्नं महत्तपसोऽपि च ।
तेजो मन्युं च बिभ्रत्त्वं जातो रौद्रो महामते ।। ८८ ।।
स भवान् देववत् प्राज्ञो ज्ञात्वा भवमयं जगत् ।
अवाकर्षस्त्वमात्मानं नियमैस्तत्प्रियेप्सया ।। ८९ ।।
महामते! तू भी (अपने पूर्वजन्ममें) भगवान् नारायणके ही समान ज्ञानवान् होकर उनके ही जैसे सत्कर्म तथा बड़ी भारी तपस्या करके उसके प्रभावसे पूर्ण तेज और क्रोध धारण करनेवाला रुद्रभक्त हुआ था और सम्पूर्ण जगत्‌को शंकरमय जानकर उन्हें प्रसन्न करनेकी इच्छासे तूने नाना प्रकारके कठोर नियमोंका पालन करते हुए अपने शरीरको दुर्बल कर डाला था ।। ८८-८९ ।।

शुभ्रमत्र भवान् कृत्वा महापुरुषविग्रहम् ।
ईजिवांस्त्वं जपैर्होमैरुपहारैश्च मानद ।। ९० ।।
मानद! तूने यहाँ परम पुरुष भगवान् शंकरके उज्ज्वल विग्रहकी स्थापना करके होम, जप और उपहारोंद्वारा उनकी आराधना की थी ।। ९० ।।

स तथा पूज्यमानस्ते पूर्वदेहेऽप्यतूतृषत् ।
पुष्कलांश्च वरान् प्रादात् तव विद्वन् हृदि स्थितान् ।। ९१ ।।
विद्वन्! इस प्रकार पूर्वजन्मके शरीरमें तुझसे पूजित होकर भगवान् शंकर बड़े प्रसन्न हुए थे और उन्होंने तुझे बहुत-से मनोवांछित वर प्रदान किये थे ।। ९१ ।।

जन्मकर्मतपोयोगास्तयोस्तव च पुष्कलाः ।
ताभ्यां लिङ्गेऽर्चितो देवस्त्वयार्चायां युगे युगे ।। ९२ ।।
इस प्रकार तेरे और नर-नारायणके जन्म, कर्म, तप और योग पर्याप्त हैं। नर-नारायणने शिवलिंगमें तथा तूने प्रतिमामें प्रत्येक युगमें महादेवजीकी आराधना की है ।।

सर्वरूपं भवं ज्ञात्वा लिङ्गे योऽर्चयति प्रभुम् । आत्मयोगाश्च तस्मिन् वै शास्त्रयोगाश्च शाश्वताः ॥ ९३ ॥ जो भगवान् शंकरको सर्वस्वरूप जानकर शिवलिंगमें उनकी पूजा करता है, उसमें सनातन आत्मयोग (आत्मा-परमात्माके तत्त्वका ज्ञान) तथा शास्त्रयोग (स्वाध्यायजनित ज्ञान) प्रतिष्ठित होते हैं ॥ ९३ ॥

एवं देवा यजन्तो हि सिद्धाश्च परमर्षयः । प्रार्थयन्ते परं लोके स्थाणुमेकं स सर्वकृत् ॥ ९४ ॥ इस प्रकार आराधना करते हुए देवता, सिद्ध और महर्षिगण लोकमें एकमात्र सर्वोत्कृष्ट भगवान् शंकरसे ही अभीष्ट वस्तुकी प्रार्थना करते हैं; क्योंकि वे ही सब कुछ करनेवाले हैं ॥ ९४ ॥

स एष रुद्रभक्तश्च केशवो रुद्रसम्भवः । कृष्ण एव हि यष्टव्यो यज्ञैश्चैव सनातनः ॥ ९५ ॥ ये श्रीकृष्ण भगवान् शंकरके भक्त हैं और उन्हींसे प्रकट हुए हैं; अतः यज्ञोंद्वारा सनातनपुरुष श्रीकृष्णकी ही आराधना करनी चाहिये ॥ ९५ ॥

सर्वभूतभवं ज्ञात्वा लिङ्गमर्चति यः प्रभोः । तस्मिन्नभ्यधिकां प्रीतिं करोति वृषभध्वजः ॥ ९६ ॥ जो भगवान् शिवके लिंगको सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्तिका स्थान जानकर उसकी पूजा करता है, उसपर भगवान् शंकर अधिक प्रेम करते हैं ॥ ९६ ॥

<div align="center">संजय उवाच</div>

तस्य तद् वचनं श्रुत्वा द्रोणपुत्रो महारथः । नमश्चकार रुद्राय बहु मेने च केशवम् ॥ ९७ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! व्यासजीकी यह बात सुनकर द्रोणपुत्र महारथी अश्वत्थामाने मन-ही-मन भगवान् शंकरको प्रणाम किया और श्रीकृष्णकी भी महत्ता स्वीकार कर ली ॥

हृष्टरोमा च वश्यात्मा सोऽभिवाद्य महर्षये । वरूथिनीमभिप्रेक्ष्य ह्यावहारमकारयत् ॥ ९८ ॥ उसके शरीरमें रोमांच हो आया। उसने विनीतभावसे महर्षिको प्रणाम किया और अपनी सेनाकी ओर देखकर उसे छावनीमें लौटनेकी आज्ञा दे दी ॥ ९८ ॥

ततः प्रत्यवहारोऽभूत् पाण्डवानां विशाम्पते । कौरवाणां च दीनानां द्रोणे युधि निपातिते ॥ ९९ ॥ प्रजानाथ! तदनन्तर युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यके मारे जानेके बाद पाण्डवों तथा दीन कौरवोंकी सेनाएँ अपने-अपने शिविरकी ओर चल दीं ॥ ९९ ॥

युद्धं कृत्वा दिनान् पञ्च द्रोणो हत्वा वरूथिनीम् ।

ब्रह्मलोकं गतो राजन् ब्राह्मणो वेदपारगः ॥ १०० ॥
राजन्! इस प्रकार वेदोंके पारंगत विद्वान् द्रोणाचार्य पाँच दिनोंतक युद्ध तथा शत्रुसेनाका संहार करके ब्रह्मलोकको चले गये ॥ १०० ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि नारायणास्त्रमोक्षपर्वणि व्यासवाक्ये शतरुद्रिये एकाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत नारायणास्त्रमोक्षपर्वमें व्यासवाक्य तथा शतरुद्रिय स्तुतिविषयक दो सौ एकवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ १/३ श्लोक मिलाकर कुल १०२ १/३ श्लोक हैं।)

व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल

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द्व्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

व्यासजीका अर्जुनसे भगवान् शिवकी महिमा बताना तथा द्रोणपर्वके पाठ और श्रवणका फल

धृतराष्ट्र उवाच

तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते पार्षतेन वै ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वन्वतः परम् ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! धृष्टद्युम्नके द्वारा अतिरथी वीर द्रोणाचार्यके मारे जानेपर मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने आगे कौन-सा कार्य किया? ॥ १ ॥

संजय उवाच

तस्मिन्नतिरथे द्रोणे निहते पार्षतेन वै ।
कौरवेषु च भग्नेषु कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ २ ॥
दृष्ट्वा सुमहदाश्चर्यमात्मनो विजयावहम् ।
यदृच्छयाऽऽगतं व्यासं पप्रच्छ भरतर्षभ ॥ ३ ॥
**संजयने कहा—**भरतश्रेष्ठ! धृष्टद्युम्नद्वारा अतिरथी वीर द्रोणाचार्यके मारे जानेपर जब समस्त कौरव भाग खड़े हुए, उस समय अपनेको विजय दिलानेवाली एक अत्यन्त आश्चर्यमयी घटना देखकर कुन्तीपुत्र अर्जुनने अकस्मात् वहाँ आये हुए वेदव्यासजीसे उसके सम्बन्धमें इस प्रकार पूछा ॥ २-३ ॥

अर्जुन उवाच

संग्रामे न्यहनं शत्रून् शरौघैर्विमलैरहम् ।
अग्रतो लक्षये यान्तं पुरुषं पावकप्रभम् ॥ ४ ॥
**अर्जुन बोले—**महर्षे! जब मैं अपने निर्मल बाणोंद्वारा शत्रु-सेनाका संहार कर रहा था, उस समय मुझे दिखायी दिया कि एक अग्निके समान तेजस्वी पुरुष मेरे आगे-आगे चल रहे हैं ॥ ४ ॥

ज्वलन्तं शूलमुद्यम्य यां दिशं प्रतिपद्यते ।
तस्यां दिशि विदीर्यन्ते शत्रवो मे महामुने ॥ ५ ॥
महामुने! वे जलता हुआ शूल हाथमें लेकर जिस ओर जाते उसी दिशामें मेरे शत्रु विदीर्ण हो जाते थे ॥ ५ ॥