भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

वसुदान भी युद्धस्थलमें बड़ा भारी संहार मचा रहा था। परंतु भरद्वाजनन्दन द्रोणने पराक्रम करके उसे यमलोक पहुँचा दिया ।। ३८ ।।
(पाण्ड्यराजश्च विक्रान्तो बलवान् बाहुशालिना ।
अश्वत्थाम्ना हतस्तत्र गमितो वै यमक्षयम् ॥)
अपने बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले अश्वत्थामाने बलवान् एवं पराक्रमी पाण्ड्यराजको मारकर यमलोक पहुँचा दिया ।
एते चान्ये च बहवः पाण्डवानां महारथाः ।
हता द्रोणेन विक्रम्य यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ ३९ ॥
ये तथा और भी बहुत-से पाण्डव महारथी, जिनके बारेमें आप मुझसे पूछ रहे थे, द्रोणाचार्यके द्वारा बलपूर्वक मार डाले गये ।। ३९ ।।

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संजयवाक्ये षष्ठोऽध्यायः ।। ६ ।।
इस प्रकार श्रीमद्महाभारत कर्णपर्वमें संजय-वाक्यविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ ।। ६ ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ४० श्लोक हैं।)

कौरवपक्षके जीवित योद्धाओंका वर्णन और धृतराष्ट्रकी मूर्च्छा

⬅ विषय-सूची (TOC)

सप्तमोऽध्यायः

कौरवपक्षके जीवित योद्धाओंका वर्णन और धृतराष्ट्रकी मूर्च्छा

धृतराष्ट्र उवाच

मामकस्यास्य सैन्यस्य हृतोत्सेकस्य संजय ।
अवशेषं न पश्यामि ककुदे मृदिते सति ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने कहा—संजय! प्रधान पुरुष भीष्म, द्रोण और कर्ण आदिके मारे जानेसे मेरी सेनाका घमंड चूर-चूर हो गया है। मैं देखता हूँ, अब यह बच नहीं सकेगी ॥ १ ॥

तौ हि वीरौ महेष्वासौ मदर्थे कुरुसत्तमौ ।
भीष्मद्रोणौ हतौ श्रुत्वा नार्थो वै जीवितेऽसति ॥ २ ॥
वे दोनों कुरुश्रेष्ठ महाधनुर्धर वीर भीष्म और द्रोणाचार्य मेरे लिये मारे गये; यह सुन लेनेपर इस अधम जीवनको रखनेका अब कोई प्रयोजन नहीं है ॥ २ ॥

न च मृष्यामि राधेयं हतमाहवशोभनम् ।
यस्य बाह्वोर्बलं तुल्यं कुञ्जराणां शतं शतम् ॥ ३ ॥
जिसकी दोनों भुजाओंमें समानरूपसे दस-दस हजार हाथियोंका बल था, युद्धमें शोभा पानेवाले उस राधापुत्र कर्णके मारे जानेका समाचार सुनकर मैं इस शोकको सहन नहीं कर पाता हूँ ॥ ३ ॥

हतप्रवरसैन्यं मे यथा शंससि संजय ।
अहतानपि मे शंस येऽत्र जीवन्ति केचन ॥ ४ ॥
संजय! जैसा कि तुम कह रहे हो कि मेरी सेनाके प्रमुख वीर मारे जा चुके हैं, उसी प्रकार यह भी बताओ कि कौन-कौन वीर नहीं मारे गये हैं। इस सेनामें जो कोई भी श्रेष्ठ वीर जीवित हैं, उनका परिचय दो ॥ ४ ॥

एतेषु हि मृतेष्वद्य ये त्वया परिकीर्तिताः ।
येऽपि जीवन्ति ते सर्वे मृता इति मतिर्मम ॥ ५ ॥
आज तुमने जिन लोगोंके नाम लिये हैं, उनकी मृत्यु हो जानेपर तो जो भी अब जीवित हैं वे सभी मरे हुएके ही समान हैं, ऐसा मेरा विश्वास है ॥ ५ ॥

संजय उवाच

यस्मिन् महास्त्राणि समर्पितानि
चित्राणि शुभ्राणि चतुर्विधानि ।
दिव्यानि राजन् विहितानि चैव

द्रोणेन वीरे द्विजसत्तमेन ॥ ६ ॥
महारथः कृतिमान् क्षिप्रहस्तो
दृढायुधो दृढमुष्टिर्दृढेषुः ।
स वीर्यवान् द्रोणपुत्रस्तरस्वी
व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ ७ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! द्विजश्रेष्ठ द्रोणाचार्यने जिस वीरको चित्र (अद्भुत), शुभ्र (प्रकाशमान), दिव्य तथा धनुर्वेदोक्त चार प्रकारके महान् अस्त्र समर्पित किये थे, जो सफल प्रयत्न करनेवाला महारथी वीर है, जिसके हाथ बड़ी शीघ्रतासे चलते हैं, जिसका धनुष, जिसकी मुट्ठी और जिसके बाण सभी सुदृढ़ हैं, वह वेगशाली तथा पराक्रमी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा आपके लिये युद्धकी इच्छा रखकर समरभूमिमें डटा हुआ है ॥
आनर्तवासी हृदिकात्मजोऽसौ
महारथः सात्वतानां वरिष्ठः ।
स्वयं भोजः कृतवर्मा कृतास्त्रो
व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ ८ ॥
सात्वतकुलका श्रेष्ठ महारथी, आनर्तनिवासी, भोजवंशी अस्त्रवेत्ता, हृदिकपुत्र कृतवर्मा भी आपके लिये युद्ध करनेको दृढ़ निश्चयके साथ डटा हुआ है ॥ ८ ॥
आर्तायनिः समरे दुष्प्रकम्प्यः
सेनाग्रणीः प्रथमस्तावकानाम् ।
यः स्वस्रीयान् पाण्डवेयान् विसृज्य
सत्यां वाचं स्वां चिकीर्षुस्तरस्वी ॥ ९ ॥
तेजोवधं सूतपुत्रस्य संख्ये
प्रतिश्रुत्याजातशत्रोः पुरस्तात् ।
दुराधर्षः शक्रसमानवीर्यः
शल्यः स्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ १० ॥
जिन्हें युद्धमें विचलित करना अत्यन्त कठिन है, जो आपके सैनिकोंके प्रथम सेनापति एवं वेगशाली वीर हैं, जो अपनी बात सच्ची कर दिखानेके लिये अपने सगे भानजे पाण्डवोंको छोड़कर तथा अजातशत्रु युधिष्ठिरके सामने युद्धस्थलमें सूतपुत्र कर्णके तेज और उत्साहको नष्ट करनेकी प्रतिज्ञा करके आपके पक्षमें चले आये थे, वे बलवान् दुर्धर्ष तथा इन्द्रके समान पराक्रमी ऋतायनपुत्र शल्य आपके लिये युद्ध करनेको तैयार हैं ॥ ९-१० ॥
आजानेयैः सैन्धवैः पर्वतीयै-
र्नदीजकाम्बोजवनायुजैश्च ।
गान्धारराजः स्वबलेन युक्तो

व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ ११ ॥ अच्छी नस्लके सिंधी, पहाड़ी, दरियाई, काबुली और वनायुदेशके बहुसंख्यक घोड़ों तथा अपनी सेनाके साथ गान्धारराज शकुनि आपके लिये युद्ध करनेको डटा हुआ है ॥ ११ ॥

शारद्वतो गौतमश्चापि राजन् महाबाहुर्बहुचित्रास्त्रयोधी । धनुश्चित्रं सुमहद् भारसाहं व्यवस्थितो योद्धुकामः प्रगृह्य ॥ १२ ॥ राजन्! अनेक प्रकारके विचित्र अस्त्रोंद्वारा युद्ध करनेवाले, गौतमवंशीय शरद्वान्के पुत्र महाबाहु कृपाचार्य भी महान् भार सहन करनेमें समर्थ विचित्र धनुष हाथमें लेकर आपके लिये युद्ध करनेको तैयार हैं ॥ १२ ॥

महारथः केकयराजपुत्रः सदश्वयुक्तं च पताकिनं च । रथं समारुह्य कुरुप्रवीर व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे ॥ १३ ॥ कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर! महारथी केकयराजकुमार भी सुन्दर घोड़ोंसे जुते हुए, ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित रथपर आरूढ़ हो आपके लिये युद्ध करनेकी इच्छासे डटा हुआ है ॥ १३ ॥

तथा सुतस्ते ज्वलनार्कवर्णं रथं समास्थाय कुरुप्रवीरः । व्यवस्थितः पुरुमित्रो नरेन्द्र व्यभ्रे सूर्यो भ्राजमानो यथा खे ॥ १४ ॥ नरेन्द्र! कुरुकुलका प्रमुख वीर आपका पुत्र पुरुमित्र अग्नि और सूर्यके समान कान्तिमान् रथपर आरूढ़ हो बिना बादलोंके आकाशमें सूर्यके समान प्रकाशित होता हुआ युद्धके लिये खड़ा है ॥ १४ ॥

दुर्योधनो नागकुलस्य मध्ये व्यवस्थितः सिंह इवाबभासे । रथेन जाम्बूनदभूषणेन व्यवस्थितः समरे योत्स्यमानः ॥ १५ ॥ हाथियोंकी सेनाके बीच जो अपने सुवर्णभूषित रथके द्वारा उपस्थित हो सिंहके समान सुशोभित होता है, वह राजा दुर्योधन भी समरांगणमें जूझनेके लिये खड़ा है ॥ १५ ॥

स राजमध्ये पुरुषप्रवीरो रराज जाम्बूनदचित्रवर्मा ।

पद्मप्रभो वह्निरिवाल्पधूमो मेघान्तरे सूर्य इव प्रकाशः ॥ १६ ॥ पुरुषोंमें प्रधान वीर और कमलके समान कान्तिमान् दुर्योधन सोनेका बना हुआ विचित्र कवच धारण करके राजाओंके समुदायमें अल्प धूमवाली अग्नि एवं बादलोंके बीचमें सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा है ॥ १६ ॥

तथा सुषेणोऽप्यसिचर्मपाणि- स्तवात्मजः सत्यसेनश्च वीरः । व्यवस्थितौ चित्रसेनेन सार्धं हृष्टात्मानौ समरे योद्धुकामौ ॥ १७ ॥ हाथमें ढाल-तलवार लिये हुए आपके वीर पुत्र सुषेण और सत्यसेन मनमें हर्ष और उत्साह लिये समरमें जूझनेकी इच्छा रखकर चित्रसेनके साथ खड़े हैं ॥

ह्रीनिषेवो भारत राजपुत्र उग्रायुधः क्षणभोजी सुदर्शः । जारासंधिः प्रथमश्चादृढश्च चित्रायुधः श्रुतवर्मा जयश्च ॥ १८ ॥ शलश्च सत्यव्रतदुःशलौ च व्यवस्थिताः सहसैन्या नराग्रयाः । भारत! लज्जाशील भयंकर आयुधोंवाला शीघ्रभोजी और देखनेमें सुन्दर जरासंधका प्रथम पुत्र राजकुमार अदृढ, चित्रायुध, श्रुतवर्मा, जय, शल, सत्यव्रत और दुःशल—ये सभी श्रेष्ठ पुरुष युद्धके लिये अपनी सेनाओंके साथ खड़े हैं ॥ १८ १/२ ॥

कैतव्यानामधिपः शूरमानी रणे रणे शत्रुहा राजपुत्रः ॥ १९ ॥ रथी हयी नागपत्तिप्रयायी व्यवस्थितो योद्धुकामस्त्वदर्थे । प्रत्येक युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेवाला और अपनेको शूरवीर माननेवाला एक राजकुमार, जो जुआरियोंका सरदार है तथा रथ, घोड़े, हाथी और पैदलोंकी चतुरंगिणीसेना साथ लेकर चलता है, आपके लिये युद्ध करनेको तैयार खड़ा है ॥ १९ १/२ ॥

वीरः श्रुतायुश्च धृतायुधश्च चित्राङ्गदश्चित्रसेनश्च वीरः ॥ २० ॥ व्यवस्थिता योद्धुकामा नराग्रयाः प्रहारिणो मानिनः सत्यसंधाः । वीर श्रुतायु, धृतायुध, चित्रांगद और वीर चित्रसेन—ये सभी प्रहारकुशल स्वाभिमानी और सत्यप्रतिज्ञ नरश्रेष्ठ आपके लिये युद्ध करनेको तैयार खड़े हैं ॥ २० १/२ ॥

कर्णात्मजः सत्यसंधो महात्मा व्यवस्थितः समरे योद्धुकामः ॥ २१ ॥ अथापरौ कर्णसुतौ वरास्त्रौ व्यवस्थितौ लघुहस्तौ नरेन्द्र । बलं महद् दुर्भिदमल्पधैर्यैः समाश्रितौ योत्स्यमानौ त्वदर्थे ॥ २२ ॥ नरेन्द्र! कर्णका महामना एवं सत्यप्रतिज्ञ पुत्र समरांगणमें युद्धकी इच्छासे डटा हुआ है। इसके सिवा कर्णके दो पुत्र और हैं, जो उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता और शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले हैं, वे भी आपकी ओरसे युद्धके लिये तैयार खड़े हैं। इन दोनोंने ऐसी विशाल सेनाको अपने साथ ले रखा है, जिसका अल्प धैर्यवाले वीरोंके लिये भेदन करना कठिन है ॥ २१-२२ ॥

एतैश्च मुख्यैरपरैश्च राजन् योधप्रवीरैरमितप्रभावैः । व्यवस्थितो नागकुलस्य मध्ये यथा महेन्द्रः कुरुराजो जयाय ॥ २३ ॥ राजन्! इनसे तथा अन्य अनन्त प्रभावशाली श्रेष्ठ एवं प्रधान योद्धाओंसे घिरा हुआ कुरुराज दुर्योधन हाथियोंके समूहमें देवराज इन्द्रके समान विजयके लिये खड़ा है ॥ २३ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

आख्याता जीवमाना येऽपरे सैन्या यथायथम् । इतीदमवगच्छामि व्यक्तमर्थाभिपत्तितः ॥ २४ ॥ **धृतराष्ट्रने कहा—**संजय! अपने पक्षके जो जीवित योद्धा हैं एवं उनसे भिन्न जो मारे जा चुके हैं, उनका तुमने यथार्थरूपसे वर्णन कर दिया। इससे जो परिणाम होनेवाला है, उसे अर्थापत्ति प्रमाणके द्वारा मैं स्पष्टरूपसे समझ रहा हूँ (मेरे पक्षकी हार सुनिश्चित है) ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवं ब्रुवन्नेव तदा धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः । हतप्रवीरं विश्वस्तं किंचिच्छेषं स्वकं बलम् ॥ २५ ॥ श्रुत्वा व्यामोहमागच्छच्छोकव्याकुलेन्द्रियः । **वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! यह कहते हुए ही अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र उस समय यह सुनकर कि अपनी सेनाके प्रमुख वीर मारे गये, अधिकांश सेना नष्ट हो गयी और बहुत थोड़ी शेष रह गयी है, मूर्च्छित हो गये। उनकी इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हो उठीं ॥ २५ १/२ ॥ मुह्यमानोऽब्रवीच्चापि मुहूर्तं तिष्ठ संजय ॥ २६ ॥

व्याकुलं मे मनस्तात श्रुत्वा सुमहदप्रियम् ।
मनो मुह्यति चाङ्गानि न च शक्नोमि धारितुम् ॥ २७ ॥
वे अचेत होते-होते बोले—'संजय! दो घड़ी ठहर जाओ। तात! यह महान् अप्रिय संवाद सुनकर मेरा मन व्याकुल हो गया है, चेतना लुप्त-सी हो रही है और मैं अपने अंगोंको धारण करनेमें असमर्थ हो रहा हूँ' ॥

इत्येवमुक्त्वा वचनं धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ।
भ्रान्तचित्तस्ततः सोऽथ बभूव जगतीपतिः ॥ २८ ॥
ऐसा कहकर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्र भ्रान्तचित्त (मूर्च्छित) हो गये ॥ २८ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संजयवाक्यं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥ ७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संजयवाक्यविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1621)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका विलाप

जनमेजय उवाच

श्रुत्वा कर्णं हतं युद्धे पुत्रांश्चैव निपातितान् ।
नरेन्द्रः किंचिदाश्वस्तो द्विजश्रेष्ठ किमब्रवीत् ॥ १ ॥
**जनमेजय बोले—**द्विजश्रेष्ठ! युद्धमें कर्ण मारा गया और पुत्र भी धराशायी हो गये, यह सुनकर अचेत हुए राजा धृतराष्ट्रको जब पुनः कुछ चेत हुआ, तब उन्होंने क्या कहा? ॥ १ ॥

प्राप्तवान् परमं दुःखं पुत्रव्यसनजं महत् ।
तस्मिन् यदुक्तवान् काले तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ॥ २ ॥
धृतराष्ट्रको अपने पुत्रोंके मारे जानेके कारण बड़ा भारी दुःख प्राप्त हुआ था, उस समय उन्होंने जो कुछ कह, उसे मैं पूछ रहा हूँ; आप मुझे बताइये ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा कर्णस्य निधनमश्रद्धेयमिवाद्भुतम् ।
भूतसम्मोहनं भीमं मेरोः संसर्पणं यथा ॥ ३ ॥
चित्तमोहमिवायुक्तं भार्गवस्य महामतेः ।
पराजयमिवेन्द्रस्य द्विषद्भ्यो भीमकर्मणः ॥ ४ ॥
दिवः प्रपतनं भानोरुर्व्यामिव महाद्युतेः ।
संशोषणमिवाचिन्त्यं समुद्रस्याक्षयाम्भसः ॥ ५ ॥
महीवियद्दिगम्बूनां सर्वनाशमिवाद्भुतम् ।
कर्मणोरिव वैफल्यमुभयोः पुण्यपापयोः ॥ ६ ॥
संचिन्त्य निपुणं बुद्ध्या धृतराष्ट्रो जनेश्वरः ।
नेदमस्तीति संचिन्त्य कर्णस्य समरे वधम् ॥ ७ ॥
प्राणिनामेवमन्येषां स्यादपीति विनाशनम् ।
शोकाग्निना दह्यमानो धम्यमान इवाशये ॥ ८ ॥
विस्रस्ताङ्गः श्वसन् दीनो हाहेत्युक्त्वा सुदुःखितः ।
विललाप महाराज धृतराष्ट्रोऽम्बिकासुतः ॥ ९ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! कर्णका मारा जाना अद्भुत और अविश्वसनीय-सा लग रहा था। वह भयंकर कर्म उसी प्रकार समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाला था, जैसे मेरु पर्वतका अपने स्थानसे हटकर अन्यत्र चला जाना। परम बुद्धिमान् भृगुनन्दन

परशुरामजीके चित्तमें मोह उत्पन्न होना जैसे सम्भव नहीं है, जैसे भयंकर कर्म करनेवाले देवराज इन्द्रका अपने शत्रुओंसे पराजित होना असम्भव है, जैसे महातेजस्वी सूर्यके आकाशसे पृथ्वीपर गिरने और अक्षय जलवाले समुद्रके सूख जानेकी बात मनमें सोचीतक नहीं जा सकती; पृथ्वी, आकाश, दिशा और जलका सर्वनाश होना एवं पाप तथा पुण्य—दोनों प्रकारके कर्मोंका निष्फल हो जाना जैसे आश्चर्यजनक घटना है; उसी प्रकार समरमें कर्ण-वधरूपी असम्भव कर्मको भी सम्भव हुआ सुनकर और उसपर बुद्धिद्वारा अच्छी तरह विचार करके राजा धृतराष्ट्र यह सोचने लगे कि 'अब यह कौरवदल बच नहीं सकता। कर्णकी ही भाँति अन्य प्राणियोंका भी विनाश हो सकता है।' यह सब सोचते ही उनके हृदयमें शोककी आग प्रज्वलित हो उठी और वे उससे तपने एवं दग्ध-से होने लगे। उनके सारे अंग शिथिल हो गये। महाराज! वे अम्बिकानन्दन धृतराष्ट्र दीनभावसे लंबी साँस खींचने और अत्यन्त दुःखी हो 'हाय! हाय!' कहकर विलाप करने लगे ॥ ३—९ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

संजयाधिरथिर्वीरः सिंहद्विरदविक्रमः ।
वृषभप्रतिमस्कन्धो वृषभाक्षगतिश्चरन् ॥ १० ॥
वृषभो वृषभस्येव यो युद्धे न निवर्तते ।
शत्रोरपि महेन्द्रस्य वज्रसंहननो युवा ॥ ११ ॥

**धृतराष्ट्र बोले—**संजय! अधिरथका वीर पुत्र कर्ण सिंह और हाथीके समान पराक्रमी था। उसके कंधे साँड़के कंधोंके समान हृष्टपुष्ट थे। उसकी आँखें और चाल-ढाल भी साँड़के ही सदृश थीं। वह स्वयं भी दानकी वर्षा करनेके कारण वृषभस्वरूप था। रणभूमिमें विचरता हुआ कर्ण इन्द्र-जैसे शत्रुसे पाला पड़नेपर भी साँड़के समान कभी युद्धसे पीछे नहीं हटता था। उसकी युवा-अवस्था थी। उसका शरीर इतना सुदृढ़ था, मानो वज्रसे गढ़ा गया हो ॥ १०-११ ॥

यस्य ज्यातलशब्देन शरवृष्टिरवेण च ।
रथाश्वनरमातङ्गा नावतिष्ठन्ति संयुगे ॥ १२ ॥

जिसकी प्रत्यंचाकी टंकार तथा बाण-वर्षाके भयंकर शब्दसे भयभीत हो रथी, घुड़सवार, गजारोही और पैदल सैनिक युद्धमें सामने नहीं ठहर पाते थे ॥ १२ ॥

यमाश्रित्य महाबाहुं विद्विषां जयकाङ्क्षया ।
दुर्योधनोऽकरोद् वैरं पाण्डुपुत्रैर्महारथैः ॥ १३ ॥

जिस महाबाहुका भरोसा करके शत्रुओंपर विजय पानेकी इच्छा रखते हुए दुर्योधनने महारथी पाण्डवोंके साथ वैर बाँध रखा था ॥ १३ ॥

स कथं रथिनां श्रेष्ठः कर्णः पार्थेन संयुगे ।
निहतः पुरुषव्याघ्रः प्रसह्यासह्यविक्रमः ॥ १४ ॥

जिसका पराक्रम शत्रुओंके लिये असह्य था, वह रथियोंमें श्रेष्ठ पुरुषसिंह कर्ण युद्धस्थलमें कुन्तीपुत्र अर्जुनके द्वारा बलपूर्वक कैसे मारा गया? ।। १४ ।। यो नामन्यत वै नित्यमच्युतं च धनंजयम् । न वृष्णीन् सहितानन्यान् स्वबाहुबलदर्पितः ।। १५ ।। जो अपने बाहुबलके घमंडमें भरकर श्रीकृष्णको, अर्जुनको तथा एक साथ आये हुए अन्यान्य वृष्णिवंशियोंको भी कभी कुछ नहीं समझता था ।। १५ ।। शार्ङ्गगाण्डीवधन्वानौ सहितावपराजितौ । अहं दिव्याद् रथादेकः पातयिष्यामि संयुगे ।। १६ ।। इति यः सततं मन्दमवोचल्लोभमोहितम् । दुर्योधनमवाचीनं राज्यकामुकमातुरम् ।। १७ ।। जो राज्यकी इच्छा रखनेवाले तथा चिन्तासे आतुर हो मुँह लटकाये बैठे हुए मेरे लोभमोहित मूर्ख पुत्र दुर्योधनसे सदा यही कहा करता था कि 'मैं अकेला ही युद्धस्थलमें शार्ङ्ग और गाण्डीव धनुष धारण करनेवाले दोनों अपराजित वीर श्रीकृष्ण और अर्जुनको उनके दिव्यरथसे एक साथ ही मार गिराऊँगा' ।। १६-१७ ।। योऽजयत् सर्वकाम्बोजानावन्त्यान् केकयैः सह । गान्धारान् मद्रकान् मत्स्यांस्त्रिगर्तांस्तङ्गणाञ्शकान् ।। १८ ।। पञ्चालांश्च विदेहांश्च कुलिन्दान् काशिकोसलान् । सुह्मानङ्गांश्च वङ्गांश्च निषादान् पुण्ड्रचीरकान् ।। १९ ।। वत्सान् कलिङ्गांस्तरलानश्मकानृषिकानपि । (शबरान् परहूणांश्च प्रहूणान् सरलानपि । म्लेच्छराष्ट्राधिपांश्चैव दुर्गनाटविकांस्तथा ।।) जित्वैतान् समरे वीरश्चक्रे बलिभृतः पुरा ।। २० ।। जिस वीरने पहले समस्त काम्बोज, आवन्त्य, केकय, गान्धार, मद्र, मत्स्य, त्रिगर्त, तंगण, शक, पांचाल, विदेह, कुलिन्द, काशी, कोसल, सुह्म, अंग, वंग, निषाद, पुण्ड्र, चीरक, वत्स, कलिंग, तरल, अश्मक तथा ऋषिक—इन सभी देशों तथा शबर, परहूण, प्रहूण और सरल जातिके लोगों, म्लेच्छराज्यके अधिपतियों तथा दुर्ग एवं वनोंमें रहनेवाले योद्धाओं-को समरभूमिमें जीतकर कर देनेवाला बना दिया था ।। १८—२० ।। शरव्रातैः सुनिशितैः सुतीक्ष्णैः कङ्कपत्रिभिः । (करमाहारयामास जित्वा सर्वानरींस्तथा ।) दुर्योधनस्य वृद्ध्यर्थं राधेयो रथिनां वरः ।। २१ ।। दिव्यास्त्रविन्महातेजाः कर्णो वैकर्तनो वृषः । सेनागोपश्च स कथं शत्रुभिः परमास्त्रवित् ।। २२ ।। घातितः पाण्डवैः शूरैः समरे वीर्यशालिभिः ।

रथियोंमें श्रेष्ठ जिस राधापुत्रने दुर्योधनकी वृद्धिके लिये कंकपत्रयुक्त, तीखी धारवाले पैने बाण-समूहोंद्वारा समस्त शत्रुओंको परास्त करके उनसे कर वसूल किया था, जो दिव्यास्त्रोंका ज्ञाता, उत्तम अस्त्रोंका जानकार और हमारी सेनाओंका रक्षक था, वह महातेजस्वी धर्मात्मा वैकर्तन कर्ण अपने शूरवीर एवं बलशाली शत्रु पाण्डवोंद्वारा कैसे मारा गया? ।। २१-२२ १/२ ।।

वृषो महेन्द्रो देवेषु वृषः कर्णो नरेष्वपि ।। २३ ।। तृतीयमन्यं लोकेषु वृषं नैवानुशुश्रुम । देवताओंमें देवराज इन्द्रको वृष कहा गया है (क्योंकि वे जलकी वर्षा करते हैं), इसी प्रकार मनुष्योंमें भी कर्णको वृष कहा जाता था (क्योंकि वह याचकोंके लिये धनकी वर्षा करता था); इन दोके सिवा किसी तीसरे पुरुषको तीनों लोकोंमें वृष नाम दिया गया हो, वह मैंने नहीं सुना ।। २३ १/२ ।।

उच्चैःश्रवा वरोऽश्वानां राज्ञां वैश्रवणो वरः ।। २४ ।। वरो महेन्द्रो देवानां कर्णः प्रहरतां वरः । जैसे घोड़ोंमें उच्चैःश्रवा, राजाओंमें कुबेर और देवताओंमें महेन्द्र श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार कर्ण योद्धाओंमें ऊँचा स्थान रखता था ।। २४ १/२ ।।

योऽजितः पार्थिवैः शूरैः समर्थैर्वीर्यशालिभिः ।। २५ ।। दुर्योधनस्य वृद्धयर्थं कृत्स्नामुर्वीमथाजयत् । यं लब्ध्वा मागधो राजा सान्त्वमानोऽथ सौहृदैः ।। २६ ।। अरौत्सीत् पार्थिवं क्षत्रमृते यादवकौरवान् । तं श्रुत्वा निहतं कर्णं द्वैरथे सव्यसाचिना ।। २७ ।। शोकार्णवे निमग्नोऽहं भिन्ना नौरिव सागरे । जो पराक्रमशाली, समर्थ एवं शूरवीर नरेशोंद्वारा भी कभी जीता न जा सका, जिसने दुर्योधनकी वृद्धिके लिये समस्त भूमण्डलपर विजय पायी थी, जिसे अपना सहायक पाकर मगधनरेश जरासंधने भी सौहार्दवश शान्त हो यादवों और कौरवोंको छोड़कर भूतलके अन्य नरेशोंको ही अपने कारागारमें कैद किया था; उसी कर्णको सव्यसाची अर्जुनने द्वैरथयुद्धमें मार डाला, यह सुनकर मैं शोकके समुद्रमें डूब गया हूँ, मानो मेरी नाव बीच समुद्रमें जाकर टूट गयी हो ।। २५—२७ १/२ ।।

तं वृषं निहतं श्रुत्वा द्वैरथे रथिनां वरम् ।। २८ ।। शोकार्णवे निमग्नोऽहमप्लवः सागरे यथा । रथियोंमें श्रेष्ठ उस धर्मात्मा कर्णको द्वैरथयुद्धमें मारा गया सुनकर मैं समुद्रमें नौकारहित पुरुषकी भाँति शोक-सागरमें निमग्न हो गया हूँ ।। २८ १/२ ।।

ईदृशैर्द्यद्यहं दुःखैर्न विनश्यामि संजय ।। २९ ।।

वज्राद् दृढतरं मन्ये हृदयं मम दुर्भिदम् ।
संजय! यदि ऐसे दुःखोंसे भी मेरी मृत्यु नहीं हो रही है तो मैं ऐसा समझता हूँ कि मेरा यह हृदय वज्रसे भी अधिक सुदृढ़ और दुर्भेद्य है ॥ २९ १/३ ॥
ज्ञातिसम्बन्धिमित्राणामिमं श्रुत्वा पराभवम् ॥ ३० ॥
को मदन्यः पुमाँल्लोके न जह्यात् सूत जीवितम् ।
सूत! कुटुम्बीजनों, सगे-सम्बन्धियों और मित्रोंके पराभवका यह समाचार सुनकर संसारमें मेरे सिवा दूसरा कौन पुरुष होगा, जो अपने जीवनका परित्याग न कर दे ॥
विषमग्निं प्रपातं च पर्वताग्रादहं वृणे ।
न हि शक्ष्यामि दुःखानि सोढुं कष्टानि संजय ॥ ३१ ॥
संजय! मैं विष खाकर, अग्निमें प्रविष्ट होकर तथा पर्वतके शिखरसे नीचे गिरकर भी मृत्युका वरण कर लूँगा। परंतु अब ये कष्टदायक दुःख नहीं सह सकूँगा ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्येऽष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १ १/३ श्लोक मिलाकर कुल ३२ १/३ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 1626)

⬅ विषय-सूची (TOC)

नवमोऽध्यायः

धृतराष्ट्रका संजयसे विलाप करते हुए कर्णवधका विस्तारपूर्वक वृत्तान्त पूछना

संजय उवाच

श्रिया कुलेन यशसा तपसा च श्रुतेन च ।
त्वामद्य सन्तो मन्यन्ते ययातिमिव नाहुषम् ॥ १ ॥

संजयने कहा— महाराज! साधु पुरुष इस समय आपको धन-सम्पत्ति, कुल-मर्यादा, सुयश, तपस्या और शास्त्रज्ञानमें नहुषनन्दन ययातिके समान मानते हैं ॥ १ ॥

श्रुते महर्षिप्रतिमः कृतकृत्योऽसि पार्थिव ।
पर्यवस्थापयात्मानं मा विषादे मनः कृथाः ॥ २ ॥

राजन्! वेद-शास्त्रोंके ज्ञानमें आप महर्षियोंके तुल्य हैं। आपने अपने जीवनके सम्पूर्ण कर्तव्योंका पालन कर लिया है; अतः अपने मनको स्थिर कीजिये, उसे विषादमें न डुबाइये ॥ २ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

दैवमेव परं मन्ये धिक् पौरुषमनर्थकम् ।
यत्र शालप्रतीकाशः कर्णोऽहन्यत संयुगे ॥ ३ ॥

धृतराष्ट्रने कहा— मैं तो दैवको ही प्रधान मानता हूँ। पुरुषार्थ व्यर्थ है, उसे धिक्कार है, जिसका आश्रय लेकर शालवृक्षके समान ऊँचे शरीरवाला कर्ण भी युद्धमें मारा गया ॥ ३ ॥

हत्वा युधिष्ठिरानीकं पञ्चालानां रथव्रजान् ।
प्रताप्य शरवर्षेण दिशः सर्वा महारथः ॥ ४ ॥
मोहयित्वा रणे पार्थान् वज्रहस्त इवासुरान् ।
स कथं निहतः शेते वायुरुग्ण इव द्रुमः ॥ ५ ॥

युधिष्ठिरकी सेना तथा पांचाल रथियोंके समुदायका संहार करके जिस महारथी वीरने अपने बाणोंकी वर्षासे सम्पूर्ण दिशाओंको संतप्त कर दिया और वज्रधारी इन्द्र जैसे असुरोंको अचेत कर देते हैं, उसी प्रकार जिसने रणभूमिमें कुन्तीकुमारोंको मोहमें डाल दिया था, वही किस तरह मारा जाकर आँधीके उखाड़े हुए वृक्षके समान धरतीपर पड़ा है? ॥ ४-५ ॥

शोकस्यान्तं न पश्यामि पारं जलनिधेरिव ।
चिन्ता मे वर्धतेऽतीव मुमूर्षा चापि जायते ॥ ६ ॥

जैसे समुद्रका पार नहीं दिखायी देता, उसी प्रकार मैं इस शोकका अन्त नहीं देख पाता हूँ। मेरी चिन्ता अधिकाधिक बढ़ती जाती है और मरनेकी इच्छा प्रबल हो उठी है ॥ ६ ॥

कर्णस्य निधनं श्रुत्वा विजयं फाल्गुनस्य च ।
अश्रद्धेयमहं मन्ये वधं कर्णस्य संजय ॥ ७ ॥
संजय! मैं कर्णकी मृत्यु और अर्जुनकी विजयका समाचार सुनकर भी कर्णके वधको विश्वासके योग्य नहीं मानता ॥ ७ ॥

वज्रसारमयं नूनं हृदयं दुर्भिदं मम ।
यच्छ्रुत्वा पुरुषव्याघ्रं हतं कर्णं न दीर्यते ॥ ८ ॥
निश्चय ही मेरा हृदय वज्रके सारतत्त्वका बना हुआ है, अतः दुर्भेद्य है; तभी तो पुरुषसिंह कर्णको मारा गया सुनकर भी यह विदीर्ण नहीं हो रहा है ॥ ८ ॥

आयुर्नूनं सुदीर्घं मे विहितं दैवतैः पुरा ।
यत्र कर्णं हतं श्रुत्वा जीवामीह सुदुःखितः ॥ ९ ॥
अवश्य ही पूर्वकालमें देवताओंने मेरी आयु बहुत बड़ी बना दी थी, जिसके अधीन होनेके कारण मैं कर्ण-वधका समाचार सुनकर अत्यन्त दुःखी होनेपर भी यहाँ जी रहा हूँ ॥ ९ ॥

धिग्जीवितमिदं चैव सुहृद्धीनश्च संजय ।
अद्य चाहं दशामेतां गतः संजय गर्हिताम् ॥ १० ॥
संजय! मेरे इस जीवनको धिक्कार है। आज मैं सुहृदोंसे हीन होकर इस घृणित दशाको पहुँच गया हूँ ॥

कृपणं वर्तयिष्यामि शोच्यः सर्वस्य मन्दधीः ।
अहमेव पुरा भूत्वा सर्वलोकस्य सत्कृतः ॥ ११ ॥
परिभूतः कथं सूत परैः शक्ष्यामि जीवितुम् ।
अब मैं मन्दबुद्धि मानव सबके लिये शोचनीय होकर दीन-दुःखी मनुष्योंके समान जीवन बिताऊँगा। सूत! मैं ही पहले सब लोगोंके सम्मानका पात्र था; किंतु अब शत्रुओंसे अपमानित होकर कैसे जीवित रह सकूँगा? ॥ ११ ½ ॥

दुःखात् सुदुःखव्यसनं प्राप्तवानस्मि संजय ॥ १२ ॥
भीष्मद्रोणवधेनैव कर्णस्य च महात्मनः ।
संजय! भीष्म, द्रोण और महामना कर्णके वधसे मुझपर लगातार एक-से-एक बढ़कर अत्यन्त दुःख तथा संकट आता गया है ॥ १२ ½ ॥

नावशेषं प्रपश्यामि सूतपुत्रे हते युधि ॥ १३ ॥
स हि पारो महानासीत् पुत्राणां मम संजय ।

युद्धमें सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर मैं अपने पक्षके किसी भी वीरको ऐसा नहीं देखता, जो जीवित रह सके। संजय! कर्ण ही मेरे पुत्रोंको पार उतारनेवाला महान् अवलम्ब था।। १३ १/२ ।।

युद्धे हि निहतः शूरो विसृजन् सायकान् बहून् ।। १४ ।।
को हि मे जीवितेनार्थस्तमृते पुरुषर्षभम् ।
शत्रुओंपर असंख्य बाणोंकी वर्षा करनेवाला वह शूरवीर युद्धमें मार डाला गया। उस पुरुषशिरोमणिके बिना मेरे इस जीवनसे क्या प्रयोजन है? ।। १४ १/२ ।।

रथादाधिरथिर्नूनं न्यपतत् सायकार्दितः ।। १५ ।।
पर्वतस्येव शिखरं वज्रपाताद् विदारितम् ।
जैसे वज्रके आघातसे विदीर्ण किया हुआ पर्वतशिखर धराशायी हो जाता है, उसी प्रकार बाणोंसे पीड़ित हुआ अधिरथपुत्र कर्ण निश्चय ही रथसे नीचे गिर पड़ा होगा ।।

स शेते पृथिवीं नूनं शोभयन् रुधिरोक्षितः ।। १६ ।।
मातङ्ग इव मत्तेन द्विपेन्द्रेण निपातितः ।
जैसे मतवाले गजराजद्वारा गिराया हुआ हाथी पड़ा हो, उसी प्रकार कर्ण खूनसे लथपथ होकर अवश्य इस पृथ्वीकी शोभा बढ़ाता हुआ सो रहा है ।। १६ १/२ ।।

यो बलं धार्तराष्ट्राणां पाण्डवानां यतो भयम् ।। १७ ।।
सोऽर्जुनेन हतः कर्णः प्रतिमानं धनुष्मताम् ।
जो मेरे पुत्रोंका बल था, पाण्डवोंको जिससे सदा भय बना रहता था तथा जो धनुर्धर वीरोंके लिये आदर्श था, वह कर्ण अर्जुनके हाथसे मारा गया ।। १७ १/२ ।।

स हि वीरो महेष्वासो मित्राणामभयंकरः ।। १८ ।।
शेते विनिहतो वीरो देवेन्द्रेण इवाचलः ।
जैसे देवराज इन्द्रके द्वारा वज्रसे मारा गया पर्वत पृथ्वीपर पड़ा हो, उसी प्रकार मित्रोंको अभय-दान देनेवाला वह महाधनुर्धर वीर कर्ण अर्जुनके हाथसे मारा जाकर रणभूमिमें सो रहा है ।। १८ १/२ ।।

पङ्गोरिवाध्वगमनं दरिद्रस्येव कामितम् ।। १९ ।।
दुर्योधनस्य चाकूतं तृषितस्येव विप्रुषः ।
जैसे पंगु मनुष्यके लिये रास्ता चलना कठिन है, दरिद्रका मनोरथ पूर्ण होना असम्भव है तथा जलकी कुछ ही बूँदें जैसे प्यासेकी प्यास बुझानेमें असमर्थ हैं, उसी प्रकार दुर्योधनका अभिप्राय असम्भव अथवा सफलतासे कोसों दूर है ।।

अन्यथा चिन्तितं कार्यमन्यथा तत् तु जायते ।। २० ।।
अहो नु बलवद् दैवं कालश्च दुरतिक्रमः ।

किसी कार्यको अन्य प्रकारसे सोचा जाता है, किंतु वह दैववश और ही प्रकारका हो जाता है। अहो! निश्चय ही दैव प्रबल और काल दुर्लङ्घ्य है ॥ २०१/२ ॥ पलायमानः कृपणो दीनात्मा दीनपौरुषः ॥ २१ ॥ कच्चिद् विनिहतः सूत पुत्रो दुःशासनो मम । कच्चिन्न दीनाचरितं कृतवांस्तात संयुगे ॥ २२ ॥ कच्चिन्न निहतः शूरो यथान्ये क्षत्रियर्षभाः । सूत! क्या मेरा पुत्र दुःशासन दीनचित्त और पुरुषार्थशून्य होकर कायरके समान भागता हुआ मारा गया। तात! उसने युद्धस्थलमें कोई दीनतापूर्ण बर्ताव तो नहीं किया था। जैसे अन्य क्षत्रियशिरोमणि मारे गये हैं, क्या उसी प्रकार शूरवीर दुःशासन नहीं मारा गया? ॥ २१-२२१/२ ॥ युधिष्ठिरस्य वचनं मा युध्यस्वेति सर्वदा ॥ २३ ॥ दुर्योधनो नाभ्यगृह्णान्मूढः पथ्यमौषधम् । युधिष्ठिर सदा यही कहते रहे कि ‘युद्ध न करो।’ परंतु मूर्ख दुर्योधनने हितकारक औषधके समान उनके उस वचनको ग्रहण नहीं किया ॥ २३१/२ ॥ शरतल्पे शयानेन भीष्मेण सुमहात्मना ॥ २४ ॥ पानीयं याचितः पार्थः सोऽविध्यन्मेदिनीतलम् । जलस्य धारां जनितां दृष्ट्वा पाण्डुसुतेन च ॥ २५ ॥ अब्रवीत् स महाबाहुस्तात संशाम्य पाण्डवैः । प्रशमाद्धि भवेच्छान्तिर्मदन्तं युद्धमस्तु वः ॥ २६ ॥ भ्रातृभावेन पृथिवीं भुङ्क्ष्व पाण्डुसुतैः सह । बाण-शय्यापर सोये हुए महात्मा भीष्मने अर्जुनसे पानी माँगा और उन्होंने इसके लिये पृथ्वीको छेद दिया। इस प्रकार पाण्डुपुत्र अर्जुनके द्वारा प्रकट की हुई उस जलधाराको देखकर महाबाहु भीष्मने दुर्योधनसे कहा—‘तात! पाण्डवोंके साथ संधि कर लो। संधिसे वैरकी शान्ति हो जायगी, तुमलोगोंका यह युद्ध मेरे जीवनके साथ ही समाप्त हो जाय। तुम पाण्डवोंके साथ भ्रातृभाव बनाये रखकर पृथ्वीका उपभोग करो’ ॥ २४—२६१/२ ॥ अकुर्वन् वचनं तस्य नूनं शोचति पुत्रकः ॥ २७ ॥ तदिदं समनुप्राप्तं वचनं दीर्घदर्शिनः । उनकी इस बातको न माननेके कारण अवश्य ही मेरा पुत्र शोक कर रहा है। दूरदर्शी भीष्मजीकी वह बात आज सफल होकर सामने आयी है ॥ २७१/२ ॥ अहं तु निहतामात्यो हतपुत्रश्च संजय ॥ २८ ॥ द्यूततः कृच्छ्रमापन्नो लूनपक्ष इव द्विजः ।

संजय! मेरे मन्त्री और पुत्र मारे गये। मैं तो पंख कटे हुए पक्षीके समान जूएके कारण भारी संकटमें पड़ गया हूँ॥ २८ ½ ॥
यथा हि शकुनिं गृह्य छित्त्वा पक्षौ च संजय ॥ २९ ॥
विसर्जयन्ति संहृष्टाः क्रीडमानाः कुमारकाः ।
लूनपक्षतया तस्य गमनं नोपपद्यते ॥ ३० ॥
तथाहमपि सम्प्राप्तो लूनपक्ष इव द्विजः ।
सूत! जैसे खेलते हुए बालक किसी पक्षीको पकड़कर उसकी दोनों पाँखें काट लेते और प्रसन्नतापूर्वक उसे छोड़ देते हैं। फिर पंख कट जानेके कारण उसका उड़कर कहीं जाना सम्भव नहीं हो पाता। उसी कटे हुए पंखवाले पक्षीके समान मैं भी भारी दुर्दशामें पड़ गया हूँ॥ २९-३० ½ ॥
क्षीणः सर्वार्थहीनश्च निर्ज्ञातिर्बन्धुवर्जितः ।
कां दिशं प्रतिपत्स्यामि दीनः शत्रुवशं गतः ॥ ३१ ॥
मैं शरीरसे दुर्बल, सारी धन-सम्पत्तिसे वंचित तथा कुटुम्बीजनों और बन्धु-बान्धवोंसे रहित हो शत्रुके वशमें पड़कर दीनभावसे किस दिशाको जाऊँगा? ॥ ३१ ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्येवं धृतराष्ट्रोऽथ विलप्य बहु दुःखितः ।
प्रोवाच संजयं भूयः शोकव्याकुलमानसः ॥ ३२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—इस प्रकार विलाप करके अत्यन्त दुःखी और शोकसे व्याकुलचित्त हो धृतराष्ट्रने पुनः संजयसे इस प्रकार कहा॥ ३२ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

योऽजयत् सर्वकाम्बोजानम्बष्ठान् केकयैः सह ।
गान्धारांश्च विदेहांश्च जित्वा कार्यार्थमाहवे ॥ ३३ ॥
दुर्योधनस्य वृद्ध्यर्थं योऽजयत् पृथिवीं प्रभुः ।
स जितः पाण्डवैः शूरैः समरे बाहुशालिभिः ॥ ३४ ॥
धृतराष्ट्र बोले—संजय! जिसने हमारे कार्यके लिये युद्धस्थलमें सम्पूर्ण काम्बोज-निवासियों, अम्बष्ठों, केकयों, गान्धारों और विदेहोंपर विजय पायी। इन सबको जीतकर जिसने दुर्योधनकी वृद्धिके लिये समस्त भूमण्डलको जीत लिया था। वही सामर्थ्यशाली कर्ण अपने बाहुबलसे सुशोभित होनेवाले शूरवीर पाण्डवोंद्वारा समरांगणमें परास्त हो गया॥ ३३-३४ ॥
तस्मिन् हते महेष्वासे कर्णे युधि किरीटिना ।
के वीराः पर्यतिष्ठन्त तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ३५ ॥

संजय! युद्धस्थलमें किरीटधारी अर्जुनके द्वारा उस महाधनुर्धर कर्णके मारे जानेपर कौन-कौन-से वीर ठहर सके; यह मुझे बताओ ॥ ३५ ॥
कच्चिन्नैकः परित्यक्तः पाण्डवैर्निहतो रणे ।
उक्तं त्वया पुरा तात यथा वीरो निपातितः ॥ ३६ ॥
तात! कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि कर्णको अकेला छोड़ दिया गया हो और समस्त पाण्डवोंने मिलकर उसे मार डाला हो; क्योंकि तुम पहले बता चुके हो कि वीर कर्ण मारा गया ॥ ३६ ॥
भीष्ममप्रतियुद्ध्यन्तं शिखण्डी सायकोत्तमैः ।
पातयामास समरे सर्वशस्त्रभृतां वरम् ॥ ३७ ॥
समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ भीष्म जब युद्ध नहीं कर रहे थे, उस दशामें शिखण्डीने अपने उत्तम बाणोंद्वारा उन्हें समरांगणमें मार गिराया ॥ ३७ ॥
तथा द्रौपदिना द्रोणो न्यस्तसर्वायुधो युधि ।
युक्तयोगो महेष्वासः शरैर्बहुभिराचितः ॥ ३८ ॥
निहतः खड्गमुद्यम्य धृष्टद्युम्नेन संजय ।
अन्तरेण हतावेतौ छलेन च विशेषतः ॥ ३९ ॥
इसी प्रकार जब महाधनुर्धर द्रोणाचार्य युद्धस्थलमें अपने सारे अस्त्र-शस्त्रोंको नीचे डालकर ब्रह्मका ध्यान लगाये हुए बैठे थे, उस अवस्थामें द्रुपद-पुत्र धृष्टद्युम्नने उन्हें बहुसंख्यक बाणोंसे ढक दिया और तलवार उठाकर उनका सिर काट लिया। संजय! इस प्रकार ये दोनों वीर छिद्र मिल जानेसे विशेषतः छलपूर्वक मारे गये ॥
अश्रौषमहमेतद् वै भीष्मद्रोणौ निपातितौ ।
भीष्मद्रोणौ हि समरे न हन्याद् वज्रभृत् स्वयम् ॥ ४० ॥
न्यायेन युध्यमानौ हि तद् वै सत्यं ब्रवीमि ते ।
मैंने यह समाचार भी सुना था कि भीष्म और द्रोणाचार्य मार गिराये गये, परंतु मैं तुमसे यह सच्ची बात कहता हूँ कि ये भीष्म और द्रोण यदि समरभूमिमें न्यायपूर्वक युद्ध करते होते तो इन्हें साक्षात् वज्रधारी इन्द्र भी नहीं मार सकते थे ॥ ४० १/२ ॥
कर्णं त्वस्यन्तमस्त्राणि दिव्यानि च बहूनि च ॥ ४१ ॥
कथमिन्द्रोपमं वीरं मृत्युर्युद्धे समस्पृशत् ।
मैं पूछता हूँ कि युद्धमें बहुत-से दिव्यास्त्रोंकी वर्षा करते हुए इन्द्रके समान पराक्रमी वीर कर्णको मृत्यु कैसे छू सकी? ॥ ४१ १/२ ॥
यस्य विद्युत्प्रभां शक्तिं दिव्यां कनकभूषणाम् ॥ ४२ ॥
प्रायच्छद् द्विषतां हन्त्रीं कुण्डलाभ्यां पुरंदरः ।
यस्य सर्पमुखो दिव्यः शरः काञ्चनभूषणः ॥ ४३ ॥
अशेत निशितः पत्री समरेष्वरिसूदनः ।

भीष्मद्रोणमुखान् वीरान् योऽवमन्ये महारथान् ॥ ४४ ॥
जामदग्न्यान्महाघोरं ब्राह्ममस्त्रमशिक्षत ।
यश्च द्रोणमुखान् दृष्ट्वा विमुखानर्दिताञ्शरैः ॥ ४५ ॥
सौभद्रस्य महाबाहुर्व्यधमत् कार्मुकं शितैः ।
यश्च नागायुतप्राणं वज्ररंहसमच्युतम् ॥ ४६ ॥
विरथं सहसा कृत्वा भीमसेनमथाहसत् ।
सहदेवं च निर्जित्य शरैः संनतपर्वभिः ॥ ४७ ॥
कृपया विरथं कृत्वा नाहनद् धर्मचिन्तया ।
यश्च मायासहस्राणि विकुर्वाणं जयैषिणम् ॥ ४८ ॥
घटोत्कचं राक्षसेन्द्रं शक्रशक्त्या निजघ्निवान् ।
एतांश्च दिवसान् यस्य युद्धे भीतो धनंजयः ॥ ४९ ॥
नागमद् द्वैरथं वीरः स कथं निहतो रणे ।

जिसे देवराज इन्द्रने दो कुण्डलोंके बदलेमें विद्युत्‌के समान प्रकाशित होनेवाली तथा शत्रुओंका नाश करनेमें समर्थ सुवर्णभूषित दिव्य शक्ति प्रदान की थी, जिसके तूणीरमें सर्पके समान मुखवाला दिव्य, सुवर्णभूषित, कंकपत्रयुक्त एवं युद्धमें शत्रुसंहारक तीखा बाण सदा शयन करता था, जो भीष्म-द्रोण आदि महारथी वीरोंकी भी अवहेलना करता था, जिसने जमदग्निनन्दन परशुरामजीसे अत्यन्त घोर ब्रह्मास्त्रकी शिक्षा पायी थी और जिस महाबाहु वीरने सुभद्राकुमारके बाणोंसे पीड़ित हुए द्रोणाचार्य आदिको युद्धसे विमुख हुआ देख अपने तीखे बाणोंसे उसका धनुष काट डाला था, जिसने दस हजार हाथियोंके समान बलशाली, वज्रके समान तीव्र वेगवाले, अपराजित वीर भीमसेनको सहसा रथहीन करके उनकी हँसी उड़ायी थी, जिसने सहदेवको जीतकर झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उन्हें रथहीन करके भी धर्मके विचारसे दयावश उनके प्राण नहीं लिये; जिसने सहस्रों मायाओंकी सृष्टि करनेवाले विजयाभिलाषी राक्षसराज घटोत्कचको इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे मार डाला तथा इतने दिनोंतक अर्जुन जिससे भयभीत होकर उसके साथ द्वैरथ-युद्धमें सम्मिलित नहीं हो सके, वही वीर कर्ण रणभूमिमें मारा कैसे गया? ।।

संशप्तकानां योधा ये आह्वयन्त सदान्यतः ॥ ५० ॥
एतान् हत्वा हनिष्यामि पश्चाद् वैकर्तनं रणे ।
इति व्यपदिशन् पार्थो वर्जयन् सूतजं रणे ॥ ५१ ॥
स कथं निहतो वीरः पार्थेन परवीरहा ।

'संशप्तकोंमेंसे जो योद्धा सदा मुझे दूसरी ओर युद्धके लिये बुलाया करते हैं, इन्हें पहले मारकर पीछे वैकर्तन कर्णका रणभूमिमें वध करूँगा।' ऐसा बहाना बनाकर अर्जुन जिस सूतपुत्रको युद्धस्थलमें छोड़ दिया करते थे, उसी शत्रुवीरोंके संहारक वीरवर कर्णको अर्जुनने किस प्रकार मारा? ।। ५०-५१ १/२ ।।

रथभङ्गो न चेत् तस्य धनुर्वा न व्यशीर्यत ॥ ५२ ॥ न चेदस्त्राणि निर्णेगुः स कथं निहतः परैः । यदि उसका रथ नहीं टूट गया था, धनुषके टुकड़े-टुकड़े नहीं हो गये थे और अस्त्र नहीं नष्ट हुए थे, तब शत्रुओंने उसे किस प्रकार मार दिया? ।। ५२ १/२ ।। को हि शक्तो रणे कर्णं विधुन्वानं महद् धनुः ॥ ५३ ॥ विमुञ्चन्तं शरान् घोरान् दिव्यान्द्यस्त्राणि चाहवे । जेतुं पुरुषशार्दूलं शार्दूलमिव वेगिनम् ॥ ५४ ॥ सिंहके समान वेगशाली पुरुषसिंह कर्ण जब अपना विशाल धनुष कँपाता हुआ युद्धस्थलमें दिव्यास्त्र तथा भयंकर बाण छोड़ रहा हो, उस समय उसे कौन जीत सकता था? ।। ५३-५४ ।। ध्रुवं तस्य धनुश्छिन्नं रथो वापि महीं गतः । अस्त्राणि वा प्रणष्टानि यथा शंससि मे हतम् ॥ ५५ ॥ निश्चय ही उसका धनुष कट गया होगा या रथ धरतीमें धँस गया होगा अथवा उसके अस्त्र नष्ट हो गये होंगे, तभी जैसा कि तुम मुझे बता रहे हो, वह मारा गया होगा ।। ५५ ।। न ह्यन्यदपि पश्यामि कारणं तस्य नाशने । न हन्मि फाल्गुनं यावत् तावत् पादौ न धावये ॥ ५६ ॥ इति यस्य महाघोरं व्रतमासीन्महात्मनः । उसके नष्ट होनेमें और कोई कारण मुझे नहीं दिखायी देता है, जिस महामना वीरका यह भयंकर व्रत था कि 'मैं जबतक अर्जुनको मार नहीं लूँगा, तबतक दूसरोंसे अपने पैर नहीं धुलाऊँगा' ।। ५६ १/२ ।। यस्य भीतो रणे निद्रां धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ५७ ॥ त्रयोदश समा नित्यं नाभजत् पुरुषर्षभः । यस्य वीर्यवतो वीर्यमुपाश्रित्य महात्मनः ॥ ५८ ॥ मम पुत्रः सभां भार्यां पाण्डूनां नीतवान् बलात् । तत्रापि च सभामध्ये पाण्डवानां च पश्यताम् ॥ ५९ ॥ दासभार्येति पाञ्चालीमब्रवीत् कुरुसंनिधौ । न सन्ति पतयः कृष्णे सर्वे षण्ढतिलैः समाः ॥ ६० ॥ उपतिष्ठस्व भर्तारमन्यं वा वरवर्णिनि । इत्येवं यः पुरा वाचो रूक्षाश्चाश्रावयद् रुषा ॥ ६१ ॥ सभायां सूतजः कृष्णां स कथं निहतः परैः ।