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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

तदनन्तर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न आपके अमर्षशील पुत्रने पैंसठ बाणोंसे धृष्टद्युम्नको घायल करके बड़े जोरसे गर्जना की ॥ २१ ½ ॥ तथास्य सशरं चापं हस्तावापं च मारिष ॥ २२ ॥ क्षुरप्रेण सुतीक्ष्णेन राजा चिच्छेद संयुगे । आर्य! फिर राजा दुर्योधनने युद्धस्थलमें एक तीखे क्षुरप्रसे धृष्टद्युम्नके बाणसहित धनुष और दस्तानेको भी काट दिया ॥ २२ ½ ॥ तदपास्य धनुश्छिन्नं पाञ्चाल्यः शत्रुकर्शनः ॥ २३ ॥ अन्यदादत्त वेगेन धनुर्भारसहं नवम् । शत्रुसूदन धृष्टद्युम्नने उस कटे हुए धनुषको फेंककर वेगपूर्वक दूसरा धनुष हाथमें ले लिया, जो भार सहनेमें समर्थ और नवीन था ॥ २३ ½ ॥ प्रज्वलन्निव वेगेन संरम्भाद् रुधिरेक्षणः ॥ २४ ॥ अशोभत महेष्वासो धृष्टद्युम्नः कृतव्रणः । उस समय उनकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं। सारे शरीरमें घाव हो रहे थे; अतः वे महाधनुर्धर धृष्टद्युम्न वेगसे जलते हुए अग्निदेवके समान शोभा पा रहे थे ॥ स पञ्चदश नाराचाञ्श्वसतः पन्नगानिव ॥ २५ ॥ जिघांसुर्भरतश्रेष्ठं धृष्टद्युम्नो व्यपासृजत् । धृष्टद्युम्नने भरतश्रेष्ठ दुर्योधनको मार डालनेकी इच्छासे उसके ऊपर फुफकारते हुए सर्पोंके समान पंद्रह नाराच छोड़े ॥ २५ ½ ॥ ते वर्म हेमविकृतं भित्त्वा राज्ञः शिलाशिताः ॥ २६ ॥ विविशुर्वसुधां वेगात् कङ्कबर्हिणवाससः । शिलापर तेज किये हुए कंक और मयूरके पंखोंसे युक्त वे बाण राजा दुर्योधनके सुवर्णमय कवचको छेदकर बड़े वेगसे पृथ्वीमें समा गये ॥ २६ ½ ॥ सोऽतिविद्धो महाराज पुत्रस्तेऽतिव्यराजत ॥ २७ ॥ वसन्तकाले सुमहान् प्रफुल्ल इव किंशुकः । महाराज! उस समय अत्यन्त घायल हुआ आपका पुत्र वसन्त-ऋतुमें खिले हुए महान् पलाश वृक्षके समान अत्यन्त सुशोभित हो रहा था ॥ २७ ½ ॥ सच्छिन्नवर्मा नाराचप्रहारैर्जर्जरीकृतः ॥ २८ ॥ धृष्टद्युम्नस्य भल्लेन क्रुद्धश्चिच्छेद कार्मुकम् । उसका कवच कट गया था और शरीर नाराचोंके प्रहारसे जर्जर कर दिया गया था। उस अवस्थामें उसने कुपित होकर एक भल्लसे धृष्टद्युम्नके धनुषको काट डाला ॥ २८ ½ ॥ अथैनं छिन्नधन्वानं त्वरमाणो महीपतिः ॥ २९ ॥ सायकैर्दशभी राजन् भ्रुवोर्मध्ये समर्पयत् ।

राजन्! धनुष कट जानेपर धृष्टद्युम्नकी दोनों भौंहोंके मध्यभागमें राजा दुर्योधनने तुरंत ही दस बाणोंका प्रहार किया ॥ २९ १/२ ॥
तस्य तेऽशोभयन् वक्त्रं कर्मारपरिमार्जिताः ॥ ३० ॥
प्रफुल्लं पङ्कजं यद्वद् भ्रमरा मधुलिप्सवः ।
कारीगरके द्वारा साफ किये गये वे बाण धृष्टद्युम्नके मुखकी ऐसी शोभा बढ़ाने लगे, मानो मधुलोभी भ्रमर प्रफुल्ल कमल-पुष्पका रसास्वादन कर रहे हों ॥ ३० १/२ ॥
तदपास्य धनुश्छिन्नं धृष्टद्युम्नो महामनाः ॥ ३१ ॥
अन्यदादत्त वेगेन धनुर्भल्लांश्च षोडश ।
महामना धृष्टद्युम्नने उस कटे हुए धनुषको फेंककर बड़े वेगसे दूसरा धनुष और सोलह भल्ल हाथमें ले लिये ॥ ३१ १/२ ॥
ततो दुर्योधनस्याश्वान् हत्वा सूतं च पञ्चभिः ॥ ३२ ॥
धनुश्चिच्छेद भल्लेन जातरूपपरिष्कृतम् ।
उनमेंसे पाँच भल्लोंद्वारा दुर्योधनके सारथि और घोड़ोंको मारकर एक भल्लसे उसके सुवर्णभूषित धनुषको काट डाला ॥ ३२ १/२ ॥
रथं सोपस्करं छत्रं शक्तिं खड्गं गदां ध्वजम् ॥ ३३ ॥
भल्लैश्चिच्छेद दशभिः पुत्रस्य तव पार्वतः ।
तत्पश्चात् दस भल्लोंसे द्रुपदकुमारने आपके पुत्रके सब सामग्रियोंसहित रथ, छत्र, शक्ति, खड्ग, गदा और ध्वज काट दिये ॥ ३३ १/२ ॥
तपनीयाङ्गदं चित्रं नागं मणिमयं शुभम् ॥ ३४ ॥
ध्वजं कुरुपतेश्छिन्नं ददृशुः सर्वपार्थिवाः ।
समस्त राजाओंने देखा कि कुरुराज दुर्योधनका सोनेके अंगदोंसे विभूषित नाग-चिह्नयुक्त विचित्र, मणिमय एवं सुन्दर ध्वज कटकर धराशायी हो गया है ॥ ३४ १/२ ॥
दुर्योधनं तु विरथं छिन्नवर्मायुधं रणे ॥ ३५ ॥
भ्रातरं पर्यरक्षन्त सोदरा भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! रणभूमिमें जिसके कवच और आयुध छिन्न-भिन्न हो गये थे, उस रथहीन दुर्योधनकी उसके सगे भाई सब ओरसे रक्षा करने लगे ॥ ३५ १/२ ॥
तमारोप्य रथे राजन् दण्डधारो नराधिपम् ॥ ३६ ॥
अपाहरदसम्भ्रान्तो धृष्टद्युम्नस्य पश्यतः ।
राजन्! इसी समय दण्डधार धृष्टद्युम्नके देखते-देखते राजा दुर्योधनको अपने रथपर बिठाकर बिना किसी घबराहटके रणभूमिसे दूर हटा ले गया ॥ ३६ १/२ ॥
कर्णस्तु सात्यकिं जित्वा राजगृद्धी महाबलः ॥ ३७ ॥
द्रोणहन्तारमुग्रेषुं ससाराभिमुखो रणे ।

राजा दुर्योधनका हित चाहनेवाला महाबली कर्ण सात्यकिको परास्त करके रणभूमिमें भयंकर बाण धारण करनेवाले द्रोणहन्ता धृष्टद्युम्नके सामने गया ॥ ३७ १/२ ॥
तं पृष्ठतोऽभ्ययात् तूर्णं शैनेयो वितुदञ्छरैः ॥ ३८ ॥
वारणं जघनोपान्ते विषाणाभ्यामिव द्विपः ।
उस समय शिनिपौत्र सात्यकि अपने बाणोंसे कर्णको पीड़ा देते हुए तुरंत उसके पीछे-पीछे गये, मानो कोई गजराज अपने दोनों दाँतोंसे दूसरे गजराजकी जाँघोंमें चोट पहुँचाता हुआ उसका पीछा कर रहा हो ॥ ३८ १/२ ॥
स भारत महानासीद् योधानां सुमहात्मनाम् ॥ ३९ ॥
कर्णपार्षतयोर्मध्ये त्वदीयानां महारणः ।
भारत! कर्ण और धृष्टद्युम्नके बीचमें खड़े हुए आपके महामनस्वी योद्धाओंका पाण्डव-सैनिकोंके साथ महान् संग्राम हुआ ॥ ३९ १/२ ॥
न पाण्डवानां नास्माकं योधः कश्चित् पराङ्मुखः ॥ ४० ॥
प्रत्यदृश्यत् ततः कर्णः पञ्चालांस्त्वरितो ययौ ।
उस समय पाण्डवों तथा हमलोगोंमेंसे कोई भी योद्धा युद्धसे मुँह फेरकर पीछे हटता नहीं दिखायी दिया। तब कर्णने तुरंत ही पांचालोंपर आक्रमण किया ॥ ४० १/२ ॥
तस्मिन् क्षणे नरश्रेष्ठ गजवाजिजनक्षयः ॥ ४१ ॥
प्रादुरासीदुभयतो राजन् मध्यगतेऽहनि ।
नरश्रेष्ठ नरेश्वर! मध्याह्नकी उस बेलामें दोनों पक्षोंके हाथी, घोड़ों और मनुष्योंका संहार होने लगा ॥
पञ्चालास्तु महाराज त्वरिता विजिगीषवः ॥ ४२ ॥
ते सर्वेऽभ्यद्रवन् कर्णं पतत्रिण इव द्रुमम् ।
महाराज! विजयकी इच्छा रखनेवाले समस्त पांचाल योद्धा कर्णपर उसी प्रकार टूट पड़े, जैसे पक्षी वृक्षकी ओर उड़े जाते हैं ॥ ४२ १/२ ॥
तांस्तथाधिरथिः क्रुद्धो यतमानान् मनस्विनः ॥ ४३ ॥
विचिन्वन्निव बाणौघैः समासादयदग्रगान् ।
अधिरथपुत्र कर्ण कुपित हो विजयके लिये प्रयत्नशील, मनस्वी एवं अग्रगामी वीरोंको मानो चुन-चुनकर बाणसमूहोंद्वारा मारने लगा ॥ ४३ १/२ ॥
व्याघ्रकेतुं सुशर्माणं चित्रं चोग्रायुधं जयम् ॥ ४४ ॥
शुक्लं च रोचमानं च सिंहसेनं च दुर्जयम् ।
वह व्याघ्रकेतु, सुशर्मा*, चित्र, उग्रायुध, जय, शुक्ल, रोचमान और दुर्जय वीर सिंहसेनपर जा चढ़ा ॥ ४४ १/२ ॥
ते वीरा रथमार्गेण परिवव्रुर्नरोत्तमम् ॥ ४५ ॥

सृजन्तं सायकान् क्रुद्धं कर्णमाहवशॊभिनम् ।
उन सभी वीरोंने रथ-मार्गसे आकर युद्धभूमिमें शोभा पाने तथा कुपित होकर बाणोंकी वर्षा करनेवाले नरश्रेष्ठ कर्णको चारों ओरसे घेर लिया ।। ४५ १/२ ।।
युध्यमानांस्तु तान् दूरान्मनुजेन्द्र प्रतापवान् ।। ४६ ।।
अष्टाभिरशौ राधेयोऽभ्यर्दयन्निशितैः शरैः ।
नरेन्द्र! प्रतापी राधापुत्र कर्णने दूरसे युद्ध करनेवाले उन आठों वीरोंको आठ पैने बाणोंसे घायल कर दिया ।। ४६ १/२ ।।
अथापरान् महाराज सूतपुत्रः प्रतापवान् ।। ४७ ।।
जघान बहुसाहस्रान् यॊधान् युद्धविशारदान् ।
महाराज! तदनन्तर प्रतापी सूतपुत्रने कई हजार युद्धकुशल योद्धाओंको मार डाला ।। ४७ १/२ ।।
जिष्णुं च जिष्णुकर्माणं देवापिं भद्रमेव च ।। ४८ ।।
दण्डं च राजन् समरे चित्रं चित्रायुधं हरिम् ।
सिंहकेतुं रोचमानं शलभं च महारथम् ।। ४९ ।।
निजघान सुसंक्रुद्धश्चेदीनां च महारथान् ।
राजन्! तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए कर्णने समरांगणमें जिष्णु, जिष्णुकर्मा, देवापि, भद्र, दण्ड, चित्र, चित्रायुध, हरि, सिंहकेतु, रोचमान तथा महारथी शलभ—इन चेदिदेशीय महारथियोंका संहार कर डाला ।। ४८-४९ १/२ ।।
तेषामाददतः प्राणानासीदाधिरथेर्वपुः ।। ५० ।।
शोणिताभ्युक्षिताङ्गस्य रुद्रस्येवोर्जितं महत् ।
इन वीरोंके प्राण लेते समय रक्तसे भीगे अंगोंवाले सूतपुत्र कर्णका शरीर प्राणियोंका संहार करनेवाले भगवान् रुद्रके विशाल शरीरकी भाँति देदीप्यमान हो रहा था ।। ५० १/२ ।।
तत्र भारत कर्णेन मातङ्गास्ताडिताः शरैः ।। ५१ ।।
सर्वतोऽभ्यद्रवन् भीताः कुर्वन्तो महदाकुलम् ।
भारत! वहाँ कर्णके बाणोंसे घायल हुए हाथी विशाल सेनाको व्याकुल करते हुए भयभीत हो चारों ओर भागने लगे ।। ५१ १/२ ।।
निपेतुरुर्व्यां समरे कर्णसायकताडिताः ।। ५२ ।।
कुर्वन्तो विविधान् नादान् वज्रनुन्ना इवाचलाः ।
कर्णके बाणोंसे आहत होकर समरांगणमें नाना प्रकारके आर्तनाद करते हुए वज्रके मारे हुए पर्वतोंके समान धराशायी हो रहे थे ।। ५२ १/२ ।।
गजवाजिमनुष्यैश्च निपतद्भिः समन्ततः ।। ५३ ।।
रथैश्चाधिरथेर्मार्गे समास्तीर्यत मेदिनी ।

सूतपुत्र कर्णके रथके मार्गमें सब ओर गिरते हुए हाथियों, घोड़ों, मनुष्यों और रथोंके द्वारा वहाँ सारी पृथ्वी पट गयी थी ।। ५३ १/२ ।।
नैवं भीष्मो न च द्रोणो नान्ये युधि च तावकाः ।। ५४ ।।
चक्रुः स्म तादृशं कर्म यादृशं वै कृतं रणे ।
कर्णने उस समय रणभूमिमें जैसा पराक्रम किया था, वैसा न तो भीष्म, न द्रोणाचार्य और न आपके दूसरे कोई योद्धा ही कर सके थे ।। ५४ १/२ ।।
सूतपुत्रेण नागेषु हयेषु च रथेषु च ।। ५५ ।।
नरेषु च महाराज कृतं स्म कदनं महत् ।
महाराज! सूतपुत्रने हाथियों, घोड़ों, रथों और पैदल मनुष्योंके दलमें घुसकर बड़ा भारी संहार मचा दिया था ।। ५५ १/२ ।।
मृगमध्ये यथा सिंहो दृश्यते निर्भयश्चरन् ।। ५६ ।।
पञ्चालानां तथा मध्ये कर्णोऽचरदभीतवत् ।
जैसे सिंह मृगोंके झुंडमें निर्भय विचरता दिखायी देता है, उसी प्रकार कर्ण पांचालोंकी सेनामें निर्भीकके समान विचरण करता था ।। ५६ १/२ ।।
यथा मृगगणांस्त्रस्तान् सिंहो द्रावयते दिशः ।। ५७ ।।
पञ्चालानां रथव्रातान् कर्णो व्यद्रावयत् तथा ।
जैसे भयभीत हुए मृगसमूहोंको सिंह सब ओर खदेड़ता है, उसी प्रकार कर्ण पांचालोंके रथसमूहोंको भगा रहा था ।। ५७ १/२ ।।
सिंहास्यं च यथा प्राप्य न जीवन्ति मृगाः क्वचित् ।। ५८ ।।
तथा कर्णमनुप्राप्य न जिजीवुर्महारथाः ।
जैसे मृग सिंहके मुखके समीप पहुँचकर जीवित नहीं बचते, उसी प्रकार पांचाल महारथी कर्णके निकट पहुँचकर जीवित नहीं रह पाते थे ।। ५८ १/२ ।।
वैश्वानरं यथा प्राप्य प्रतिदह्यन्ति वै जनाः ।। ५९ ।।
कर्णाग्निना रणे तद्वद् दग्धा भारत सृञ्जयाः ।
भरतनन्दन! जैसे जलती आगमें पड़ जानेपर सभी मनुष्य दग्ध हो जाते हैं, उसी प्रकार सृंजय-सैनिक रणभूमिमें कर्णरूपी अग्निसे जलकर भस्म हो गये ।।
कर्णेन चेदिकैकेयपाञ्चालेषु च भारत ।। ६० ।।
विश्राव्य नाम निहता बहवः शूरसम्मताः ।
भारत! कर्णने चेदि, केकय और पांचाल योद्धाओंमेंसे बहुत-से शूरसम्मत रथियोंको नाम सुनाकर मार डाला ।।
मम चासीन्मती राजन् दृष्ट्वा कर्णस्य विक्रमम् ।। ६१ ।।
नैकोऽप्याधिरथेर्जीवन् पाञ्चाल्यो मोक्ष्यते युधि ।

पञ्चालान् व्यधमत् संख्ये सूतपुत्रः पुनः पुनः ॥ ६२ ॥ राजन्! कर्णका पराक्रम देखकर मेरे मनमें यही निश्चय हुआ कि युद्धस्थलमें एक भी पांचाल योद्धा सूतपुत्रके हाथसे जीवित नहीं छूट सकता; क्योंकि सूतपुत्र बारंबार युद्धस्थलमें पांचालोंका ही विनाश कर रहा था ॥ ६१-६२ ॥

पञ्चालानथ निघ्नन्तं कर्णं दृष्ट्वा महारणे । अभ्यधावत् सुसंक्रुद्धो धर्मराजो युधिष्ठिरः ॥ ६३ ॥ उस महासमरमें कर्णको पांचालोंका संहार करते देख धर्मराज युधिष्ठिरने अत्यन्त कुपित होकर उसपर धावा बोल दिया ॥ ६३ ॥

धृष्टद्युम्नश्च राधेयं द्रौपदेयाश्च मारिष । परिवव्रुरमित्रघ्नं शतशश्चापरे जनाः ॥ ६४ ॥ आर्य! धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पुत्र तथा दूसरे सैकड़ों मनुष्य शत्रुनाशक राधापुत्र कर्णको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ ६४ ॥

शिखण्डी सहदेवश्च नकुलो नाकुलिस्तथा । जनमेजयः शिनेर्नप्ता बहवश्च प्रभद्रकाः ॥ ६५ ॥ एते पुरोगमा भूत्वा धृष्टद्युम्नस्य संयुगे । कर्णमस्यन्तमिश्वस्त्रैर्विचेरुरमितौजसः ॥ ६६ ॥ शिखण्डी, सहदेव, नकुल, शतानीक, जनमेजय, सात्यकि तथा बहुत-से प्रभद्रकगण—ये सभी अमिततेजस्वी वीर युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नके आगे होकर बाण बरसानेवाले कर्णपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंका प्रहार करते हुए विचरने लगे ॥ ६५-६६ ॥

तांस्तत्राधिरथिः संख्ये चेदिपाञ्चालपाण्डवान् । एको बहूनभ्यपतद् गरुत्मान् पन्नगानिव ॥ ६७ ॥ सूतपुत्रने समरांगणमें अकेला होनेपर भी जैसे गरुड़ अनेक सर्पोंपर एक साथ आक्रमण करते हैं, उसी प्रकार बहुसंख्यक चेदि, पांचाल और पाण्डवोंपर आक्रमण किया ॥ ६७ ॥

तैः कर्णस्याभवद् युद्धं घोररूपं विशाम्पते । तादृग् यादृक् पुरा वृत्तं देवानां दानवैः सह ॥ ६८ ॥ प्रजानाथ! उन सबके साथ कर्णका वैसा ही भयानक युद्ध हुआ, जैसा पूर्वकालमें देवताओंका दानवोंके साथ हुआ था ॥ ६८ ॥

तान् समेतान् महेष्वासान् शरवर्षौघवर्षिणः । एको व्यधमदव्यग्रस्तमांसीव दिवाकरः ॥ ६९ ॥ जैसे एक ही सूर्य सम्पूर्ण अन्धकार-राशिको नष्ट कर देते हैं, उसी प्रकार एक ही कर्णने ढेर-के-ढेर बाण-वर्षा करनेवाले उन समस्त महाधनुर्धरोंको बिना किसी व्यग्रताके नष्ट कर दिया ॥ ६९ ॥

भीमसेनस्तु संसक्ते राधेये पाण्डवैः सह ।
सर्वतोऽभ्यहनत् क्रुद्धो यमदण्डनिभैः शरैः ।
वाह्लीकान् केकयान् मत्स्यान् वासात्यान् मद्रसैन्धवान् ।। ७० ।।
एकः संख्ये महेष्वासो योधयन् बहुशोभत ।
जिस समय राधापुत्र कर्ण पाण्डवोंके साथ उलझा हुआ था, उसी समय महाधनुर्धर भीमसेन क्रोधमें भरकर यमदण्डके समान भयंकर बाणोंद्वारा बाह्लीक, केकय, मत्स्य, वसातीय, मद्र तथा सिंधुदेशीय सैनिकोंका सब ओरसे संहार कर रहे थे। वे युद्धभूमिमें अकेले ही इन सबके साथ युद्ध करते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ।।
तत्र मर्मसु भीमेन नाराचैस्ताडिता गजाः ।। ७१ ।।
प्रपतन्तो हतारोहाः कम्पयन्ति स्म मेदिनीम् ।
वहाँ भीमसेनके नाराचोंद्वारा मर्मस्थानोंमें घायल हुए हाथी सवारोंसहित धराशायी हो इस पृथ्वीको कम्पित कर देते थे ।। ७१ १/२ ।।
वाजिनश्च हतारोहाः पत्तयश्च गतासवः ।। ७२ ।।
शेरते युधि निर्भिन्ना वमन्तो रुधिरं बहु ।
जिनके सवार मारे गये थे, वे घोड़े और पैदल सैनिक भी युद्धस्थलमें छिन्न-भिन्न हो मुँहसे बहुत-सा रक्त वमन करते हुए प्राणशून्य होकर पड़े थे ।। ७२ १/२ ।।
सहस्रशश्च रथिनः पातिताः पतितायुधाः ।। ७३ ।।
ते क्षताः समदृश्यन्त भीतभीता गतासवः ।
सहस्रों रथी रथसे नीचे गिरा दिये गये थे। उनके अस्त्र-शस्त्र भी गिर चुके थे। वे सब-के-सब क्षत-विक्षत हो भीमसेनके भयसे भीत एवं प्राणहीन दिखायी दे रहे थे ।। ७३ १/२ ।।
रथिभिः सादिभिः सूतैः पादातैर्वाजिभिर्गजैः ।। ७४ ।।
भीमसेन शरैश्छिन्नैराच्छन्ना वसुधाभवत् ।
भीमसेनके बाणोंसे छिन्न-भिन्न हुए रथियों, घुड़सवारों, सारथियों, पैदलों, घोड़ों और हाथियोंकी लाशोंसे वहाँकी धरती आच्छादित हो गयी थी ।। ७४ १/२ ।।
तत् स्तम्भितमिवातिष्ठद् भीमसेनभयार्दितम् ।। ७५ ।।
दुर्योधनबलं सर्वं निरुत्साहं कृतव्रणम् ।
निश्चेष्टं तुमुलं दीनं बभौ तस्मिन् महारण् ।। ७६ ।।
उस महासमरमें दुर्योधनकी सारी सेना भीमसेनके भयसे पीड़ित हो स्तब्ध-सी खड़ी थी। उत्साहशून्य, घायल, निश्चेष्ट, भयंकर और अत्यन्त दीन-सी प्रतीत होती थी ।। ७५-७६ ।।
प्रसन्नसलिले काले यथा स्यात् सागरो नृप ।
तद्वत् तव बलं तद् वै निश्चलं समवस्थितम् ।। ७७ ।।

नरेश्वर! जिस समय ज्वार न उठनेसे जल स्वच्छ एवं शान्त हो, उस समय जैसे समुद्र निश्चल दिखायी देता है, उसी प्रकार आपकी सारी सेना निश्चेष्ट खड़ी थी॥
मन्युवीर्यबलोपेतं दर्पात् प्रत्यवरोपितम् ।
अभवत् तव पुत्रस्य तत् सैन्यं निष्प्रभं तदा ॥ ७८ ॥
यद्यपि आपके सैनिकोंमें क्रोध, पराक्रम और बलकी कमी नहीं थी तो भी उनका घमंड चूर-चूर हो गया था; इसलिये उस समय आपके पुत्रकी वह सारी सेना तेजोहीन-सी प्रतीत होती थी ॥ ७८ ॥
तद् बलं भरतश्रेष्ठ वध्यमानं परस्परम् ।
रुधिरौघपरिक्लिन्नं रुधिरार्द्रं बभूव ह ॥ ७९ ॥
जगाम भरतश्रेष्ठ वध्यमानं परस्परम् ।
भरतश्रेष्ठ! परस्पर मार खाती हुई वह सेना रक्तके प्रवाहमें डूबकर खूनसे लथपथ हो गयी थी और एक-दूसरेकी चोट खाकर विनाशको प्राप्त हो रही थी ॥ ७९ ½ ॥
सूतपुत्रो रणे क्रुद्धः पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ ८० ॥
भीमसेनः कुरूंश्चापि द्रावयन्तौ विरेजतुः ।
सूतपुत्र कर्ण रणभूमिमें कुपित हो पाण्डव-सेनाको और भीमसेन कौरव-सैनिकोंको खदेड़ते हुए बड़ी शोभा पा रहे थे ॥ ८० ½ ॥
वर्तमाने तथा रौद्रे संग्रामेऽद्भुतदर्शने ॥ ८१ ॥
निहत्य पृतनामध्ये संशप्तकगणान् बहून् ।
अर्जुनो जयतां श्रेष्ठो वासुदेवमथाब्रवीत् ॥ ८२ ॥
जब इस प्रकार अद्भुत दिखायी देनेवाला वह भयंकर संग्राम चल ही रहा था, उस समय दूसरी ओर विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुन सेनाके मध्यभागमें बहुत-से संशप्तकोंका संहार करके भगवान् श्रीकृष्णसे बोले— ॥ ८१-८२ ॥
प्रभग्नं बलमेतद्धि योत्स्यमानं जनार्दन ।
एते द्रवन्ति सगणाः संशप्तकमहारथाः ॥ ८३ ॥
अपारयन्तो मद्बाणान् सिंहशब्दं मृगा इव ।
'जनार्दन! युद्ध करती हुई इस संशप्तक-सेनाके पाँव उखड़ गये हैं। ये संशप्तक महारथी अपने-अपने दलके साथ भागे जा रहे हैं। जैसे मृग सिंहकी गर्जना सुनकर हतोत्साह हो जाते हैं, उसी प्रकार ये लोग मेरे बाणोंकी चोट सहन करनेमें असमर्थ हो गये हैं ॥ ८३ ½ ॥
दीर्यते च महत् सैन्यं सृञ्जयानां महारणे ॥ ८४ ॥
हस्तिकक्षो ह्यसौ कृष्ण केतुः कर्णस्य धीमतः ।
दृश्यते राजसैन्यस्य मध्ये विचरतो मुदा ॥ ८५ ॥

‘उधर वह संजयोंकी विशाल सेना भी महासमरमें विदीर्ण हो रही है। श्रीकृष्ण! वह हाथीकी रस्सीके चिह्नसे युक्त बुद्धिमान् कर्णका ध्वज दिखायी दे रहा है। वह राजाओंकी सेनाके बीच सानन्द विचरण कर रहा है ।। ८४-८५ ।।

न च कर्णं रणे शक्ता जेतुमन्ये महारथाः ।
जानीते हि भवान् कर्णं वीर्यवन्तं पराक्रमे ।। ८६ ।।
‘जनार्दन! आप तो जानते ही हैं कि कर्ण कितना बलवान् तथा पराक्रम प्रकट करनेमें समर्थ है। अतः रणभूमिमें दूसरे महारथी उसे जीत नहीं सकते हैं ।। ८६ ।।

तत्र याहि यतः कर्णो द्रावयत्येष नो बलम् ।
वर्जयित्वा रणे याहि सूतपुत्रं महारथम् ।। ८७ ।।
एतन्मे रोचते कृष्ण यथा वा तव रोचते ।
‘श्रीकृष्ण! जहाँ यह कर्ण हमारी सेनाको खदेड़ रहा है, वहीं चलिये। रणभूमिमें संशप्तकोंको छोड़कर अब महारथी सूतपुत्रके ही पास रथ ले चलिये। ‘मुझे यही ठीक जान पड़ता है अथवा आपको जैसा जँचे, वैसा कीजिये’ ।।

एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य गोविन्दः प्रहसन्निव ।। ८८ ।।
अब्रवीदर्जुनं तूर्णं कौरवाञ्जहि पाण्डव ।
अर्जुनकी यह बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्णने उनसे हँसते हुए-से कहा—‘पाण्डुनन्दन! तुम शीघ्र ही कौरव-सैनिकोंका संहार करो’ ।। ८८ १/२ ।।

ततस्तव महासैन्यं गोविन्दप्रेरिता हयाः ।। ८९ ।।
हंसवर्णाः प्रविविशुर्वहन्तः कृष्णपाण्डवौ ।
राजन्! तदनन्तर श्रीकृष्णके द्वारा हाँके गये हंसके समान श्वेत रंगवाले घोड़े श्रीकृष्ण और अर्जुनको लेकर आपकी विशाल सेनामें घुस गये ।। ८९ १/२ ।।

केशवप्रेरितैरश्वैः श्वेतैः काञ्चनभूषणैः ।। ९० ।।
प्रविशद्भिस्तव बलं चतुर्दिशमभिद्यत ।
श्रीकृष्णद्वारा संचालित हुए उन सुवर्णभूषित श्वेत अश्वोंके प्रवेश करते ही आपकी सेनामें चारों ओर भगदड़ मच गयी ।। ९० १/२ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2030)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अर्जुनके द्वारा संशप्तकोंका संहार

मेघस्तनितनिर्ह्रादः स रथो वानरध्वजः ।। ९१ ।।
चलत्पताकस्तां सेनां विमानं द्यामिवाविशत् ।
जैसे कोई विमान स्वर्गलोकमें प्रवेश कर रहा हो, उसी प्रकार चंचल पताकाओंसे युक्त वह कपिध्वज रथ मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर घोष करता हुआ उस सेनामें जा घुसा ।। ९१ १/२ ।।
तौ विदार्य महासेनां प्रविष्टौ केशवार्जुनौ ।। ९२ ।।
क्रुद्धौ संरम्भरक्ताक्षौ व्यभ्राजेतां महाद्युती ।
उस विशाल सेनाको विदीर्ण करके उसके भीतर प्रविष्ट हुए वे दोनों श्रीकृष्ण और अर्जुन अपने महान् तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उनके मनमें शत्रुओंके प्रति क्रोध भरा हुआ था और उनकी आँखें रोषसे लाल हो रही थीं ।। ९२ १/२ ।।
युद्धशौण्डौ समाहूतावागतौ तौ रणाध्वरम् ।। ९३ ।।
यज्वभिर्विधिनाहूतौ मखे देवाविवाश्विनौ ।

जैसे यज्ञमें ऋत्विजोंद्वारा विधिपूर्वक आवाहन किये जानेपर दोनों अश्विनीकुमार नामक देवता पदार्पण करते हैं, उसी प्रकार युद्धनिपुण वे श्रीकृष्ण और अर्जुन भी मानो आह्वान किये जानेपर उस रणयज्ञमें पधारे थे ।। ९३ १/२ ।।
क्रुद्धौ तौ तु नरव्याघ्रौ वेगवन्तौ बभूवतुः ।। ९४ ।।
तलशब्देन रुषितौ यथा नागौ महावने ।
जैसे विशाल वनमें तालीकी आवाजसे कुपित हुए दो हाथी दौड़े आ रहे हों, उसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए वे दोनों पुरुषसिंह बड़े वेगसे बढ़े आ रहे थे ।। ९४ १/२ ।।
विगाह्य तु रथानीकमश्वसंघांश्च फाल्गुनः ।। ९५ ।।
व्यचरत् पृतनामध्ये पाशहस्त इवान्तकः ।
अर्जुन रथसेना और घुड़सवारोंके समूहमें घुसकर पाशधारी यमराजके समान कौरव-सेनाके मध्यभागमें विचरने लगे ।। ९५ १/२ ।।
तं दृष्ट्वा युधि विक्रान्तं सेनायां तव भारत ।। ९६ ।।
संशप्तकगणान् भूयः पुत्रस्ते समचूचुदत् ।
भारत! युद्धमें पराक्रम प्रकट करनेवाले अर्जुनको आपकी सेनामें घुसा हुआ देख आपके पुत्र दुर्योधनने पुनः संशप्तकगणोंको उनपर आक्रमण करनेके लिये प्रेरित किया ।। ९६ १/२ ।।
ततो रथसहस्रेण द्विरदानां त्रिभिः शतैः ।। ९७ ।।
चतुर्दशसहस्रैस्तु तुरगाणां महाहवे ।
द्वाभ्यां शतसहस्राभ्यां पदातीनां च धन्विनाम् ।। ९८ ।।
शूराणां लब्धलक्ष्याणां विदितानां समन्ततः ।
अभ्यवर्तन्त कौन्तेयं छादयन्तो महारथाः ।। ९९ ।।
शरवर्षैर्महाराज सर्वतः पाण्डुनन्दनम् ।
महाराज! तब एक हजार रथ, तीन सौ हाथी, चौदह हजार घोड़े और लक्ष्य वेधनेमें निपुण, सर्वत्र विख्यात एवं शौर्यसम्पन्न दो लाख पैदल सैनिक साथ लेकर संशप्तक महारथी कुन्तीकुमार पाण्डुनन्दन अर्जुनको अपने बाणोंकी वर्षासे आच्छादित करते हुए उनपर चढ़ आये ।। ९७—९९ १/२ ।।
स च्छाद्यमानः समरे शरैः परबलार्दनः ।। १०० ।।
दर्शयन् रौद्रमात्मानं पाशहस्त इवान्तकः ।
निघ्नन् संशप्तकान् पार्थः प्रेक्षणीयतरोऽभवत् ।। १०१ ।।
उस समय समरांगणमें उनके बाणोंसे आच्छादित होते हुए शत्रुसैन्यसंहारक कुन्तीकुमार अर्जुन पाशधारी यमराजके समान अपना भयंकर रूप दिखाते और संशप्तकोंका वध करते हुए अत्यन्त दर्शनीय हो रहे थे ।।

ततो विद्युतप्रभैर्बाणैः कार्तस्वरविभूषितैः । निरन्तरमिवाकाशमासीच्छन्नं किरीटिना ॥ १०२ ॥ तदनन्तर किरीटधारी अर्जुनके चलाये हुए विद्युत्के समान प्रकाशमान सुवर्णभूषित बाणोंद्वारा आच्छादित हो आकाश ठसाठस भर गया ॥ १०२ ॥

किरीटिभुजनिर्मुक्तैः सम्पतद्भिर्महाशरैः । समाच्छन्नं बभौ सर्वं काद्रवेयैरिव प्रभो ॥ १०३ ॥ प्रभो! किरीटधारी अर्जुनकी भुजाओंसे छूटकर सब ओर गिरनेवाले बड़े-बड़े बाणोंसे आवृत होकर वहाँका सारा प्रदेश सर्पोंसे व्याप्त-सा प्रतीत हो रहा था ॥ १०३ ॥

रुक्मपुङ्खान् प्रसन्नाग्रान् शरान् संनतपर्वणः । अवासृजदमेयात्मा दिक्षु सर्वासु पाण्डवः ॥ १०४ ॥ अमेय आत्मबलसे सम्पन्न पाण्डुनन्दन अर्जुन सम्पूर्ण दिशाओंमें सुवर्णमय पंख, स्वच्छ धार और झुकी हुई गाँठवाले बाणोंकी वर्षा कर रहे थे ॥ १०४ ॥

मही वियद् दिशः सर्वाः समुद्रा गिरयोऽपि वा । स्फुटन्तीति जना जज्ञुः पार्थस्य तलनिःस्वनात् ॥ १०५ ॥ वहाँ सब लोग यही समझने लगे कि 'अर्जुनके तलशब्द (हथेलीकी आवाज)-से पृथ्वी, आकाश, सम्पूर्ण दिशाएँ, समुद्र और पर्वत भी फटे जा रहे हैं' ॥ १०५ ॥

हत्वा दशसहस्राणि पार्थिवानां महारथः । संशप्तकानां कौन्तेयः प्रत्यक्षं त्वरितोऽभ्ययात् ॥ १०६ ॥ महारथी कुन्तीकुमार अर्जुन सबके देखते-देखते दस हजार संशप्तक नरेशोंका वध करके तुरंत आगे बढ़ गये ॥ १०६ ॥

प्रत्यक्षं च समासाद्य पार्थः काम्बोजरक्षितम् । प्रममाथ बलं बाणैर्दानवानिव वासवः ॥ १०७ ॥ जैसे इन्द्रने दानवोंका विनाश किया था, उसी प्रकार अर्जुनने हमारी आँखोंके सामने काम्बोजराजके द्वारा सुरक्षित सेनाके पास पहुँचकर अपने बाणोंद्वारा उसका संहार कर डाला ॥ १०७ ॥

प्रचिच्छेदाशु भल्लेन द्विषतामाततायिनाम् । शस्त्रं पाणिं तथा बाहुं तथापि च शिरांस्युत ॥ १०८ ॥ वे अपने भल्लके द्वारा आततायी शत्रुओंके शस्त्र, हाथ, भुजा तथा मस्तकोंको बड़ी फुर्तीसे काट रहे थे ॥ १०८ ॥

अङ्गाङ्गावयवैश्छिन्नैर्व्यायुधास्तेऽपतन् भुवि । विष्वग्वाताभिसम्भग्ना बहुशाखा इव द्रुमाः ॥ १०९ ॥ जैसे सब ओरसे उठी हुई आँधीके उखाड़े हुए अनेक शाखाओंवाले वृक्ष धराशायी हो जाते हैं, उसी प्रकार अपने शरीरका एक-एक अवयव कट जानेसे वे शस्त्रहीन शत्रु भूतलपर

गिर पड़ते थे ॥ १०९ ॥
हस्त्यश्वरथपत्तीनां व्रातान् निघ्नन्तमर्जुनम् ।
सुदक्षिणावरजः शरवृष्ट्याभ्यवीवृषत् ॥ ११० ॥
तब हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंके समूहोंका संहार करनेवाले अर्जुनपर काम्बोजराज सुदक्षिणका छोटा भाई अपने बाणोंकी वर्षा करने लगा ॥ ११० ॥
तस्यास्यतोऽर्धचन्द्राभ्यां बाहू परिघसंनिभौ ।
पूर्णचन्द्राभवक्त्रं च क्षुरेणाभ्यहरच्छिरः ॥ १११ ॥
उस समय अर्जुनने बाण-वर्षा करनेवाले उस वीरकी परिघके समान मोटी और सुदृढ़ भुजाओंको दो अर्धचन्द्राकार बाणोंसे काट डाला और एक छुरेके द्वारा पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले उसके मस्तकको भी धड़से अलग कर दिया ॥ १११ ॥
स पपात ततो वाहात् सुलोहितपरिस्रवः ।
मनःशिलागिरेः शृङ्गं वज्रेणेवावदारितम् ॥ ११२ ॥
फिर तो वह रक्तका झरना-सा बहाता हुआ अपने वाहनसे नीचे गिर पड़ा, मानो मैनसिलके पहाड़का शिखर वज्रसे विदीर्ण होकर भूतलपर आ गिरा हो ॥ ११२ ॥
सुदक्षिणावरजं काम्बोजं ददृशुर्हतम् ।
प्रांशुं कमलपत्राक्षमत्यर्थं प्रियदर्शनम् ॥ ११३ ॥
काञ्चनस्तम्भसदृशं भिन्नं हेमगिरिं यथा ।
उस समय सब लोगोंने देखा कि सुदक्षिणका छोटा भाई काम्बोजदेशीय वीर जो देखनेमें अत्यन्त प्रिय, कमल-दलके समान नेत्रोंसे सुशोभित तथा सोनेके खम्भेके समान ऊँचा कदका था, मारा जाकर विदीर्ण हुए सुवर्णमय पर्वतके समान धरतीपर पड़ा है ॥ ११३ १/२ ॥
ततोऽभवत् पुनर्युद्धं घोरमत्यर्थमद्भुतम् ॥ ११४ ॥
नानावस्थाश्च योधानां बभूवुस्तत्र युद्ध्यताम् ।
तदनन्तर पुनः अत्यन्त घोर एवं अद्भुत युद्ध होने लगा। वहाँ युद्ध करते हुए योद्धाओंकी विभिन्न अवस्थाएँ प्रकट होने लगीं ॥ ११४ १/२ ॥
एकेषुनिहतैरश्वैः काम्बोजैर्यवनैः शकैः ॥ ११५ ॥
शोणिताक्तैस्तदा रक्तं सर्वमासीद् विशाम्पते ।
प्रजानाथ! एक-एक बाणसे मारे गये रक्तरंजित काबुली घोड़ों, यवनों और शकोंके खूनसे वह सारा युद्धस्थल लाल हो गया था ॥ ११५ १/२ ॥
रथैर्हताश्वसूतैश्च हतारोहैश्च वाजिभिः ॥ ११६ ॥
द्विरदैश्च हतारोहैर्महामात्रैर्हतद्विपैः ।
अन्योन्येन महाराज कृतो घोरो जनक्षयः ॥ ११७ ॥

रथोंके घोड़े और सारथि, घोड़ोंके सवार, हाथियोंके आरोही, महावत और स्वयं हाथी भी मारे गये थे। महाराज! इन सबने परस्पर प्रहार करके घोर जनसंहार मचा दिया था॥ ११६-११७॥

तस्मिन् प्रपक्षे पक्षे च निहते सव्यसाचिना। अर्जुनं जयतां श्रेष्ठं त्वरितो द्रौणिरभ्ययात्॥ ११८॥ विधुन्वानो महच्चापं कार्तस्वरविभूषितम्। आददानः शरान् घोरान् स्वरश्मीनिव भास्करः॥ ११९॥ उस युद्धमें जब सव्यसाची अर्जुनने शत्रुओंके पक्ष और प्रपक्ष दोनोंको मार गिराया, तब द्रोणपुत्र अश्वत्थामा अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुषको हिलाता और अपनी किरणोंको धारण करनेवाले सूर्यदेवके समान भयंकर बाण हाथमें लेता हुआ तुरंत विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनके सामने आ पहुँचा॥ ११८-११९॥

क्रोधामर्षविवृत्तास्यो लोहिताक्षो बभौ बली। अन्तकाले यथा क्रुद्धो मृत्युः किङ्करदण्डभृत्॥ १२०॥ उस समय क्रोध और अमर्षसे उसका मुँह खुला हुआ था, नेत्र रक्तवर्ण हो रहे थे तथा वह बलवान् अश्वत्थामा अन्तकालमें किंकर नामक दण्ड धारण करनेवाले कुपित यमराजके समान जान पड़ता था॥ १२०॥

ततः प्रासृजदुग्राणि शरवर्षाणि संघशः। तैर्विसृष्टैर्महाराज व्यद्रवत् पाण्डवी चमूः॥ १२१॥ महाराज! तत्पश्चात् वह समूह-के-समूह भयंकर बाणोंकी वर्षा करने लगा। उसके छोड़े हुए बाणोंसे व्यथित हो पाण्डव-सेना भागने लगी॥ १२१॥

स दृष्ट्वैव तु दाशार्हं स्यन्दनस्थं विशाम्पते। पुनः प्रासृजदुग्राणि शरवर्षाणि मारिष॥ १२२॥ माननीय प्रजानाथ! वह रथपर बैठे हुए श्रीकृष्णकी ओर देखकर ही पुनः उनके ऊपर भयानक बाणोंकी वृष्टि करने लगा॥ १२२॥

तैः पतद्भिर्महाराज द्रौणिमुक्तैः समन्ततः। संछादितौ रथस्थौ तावुभौ कृष्णधनंजयौ॥ १२३॥ महाराज! अश्वत्थामाके हाथोंसे छूटकर सब ओर गिरनेवाले उन बाणोंसे रथपर बैठे हुए श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों ही ढक गये॥ १२३॥

ततः शरशतैस्तीक्ष्णैरश्वत्थामा प्रतापवान्। निश्चेष्टौ तावुभौ युद्धे चक्रे माधवपाण्डवौ॥ १२४॥ तत्पश्चात् प्रतापी अश्वत्थामाने सैकड़ों तीखे बाणोंद्वारा श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंको युद्धस्थलमें निश्चेष्ट कर दिया॥ १२४॥

हाहाकृतमभूत् सर्वं स्थावरं जङ्गमं तथा।

चराचरस्य गोप्तारौ दृष्ट्वा संछादितौ शरैः ॥ १२५ ॥ चराचर जगत्‌की रक्षा करनेवाले उन दोनों वीरोंको बाणोंसे आच्छादित हुआ देख स्थावर-जंगम समस्त प्राणी हाहाकार कर उठे ॥ १२५ ॥ सिद्धचारणसंघाश्च सम्पेतुस्ते समन्ततः । चिन्तयन्तो भवेद्य लोकानां स्वस्त्यपीति च ॥ १२६ ॥ सिद्धों और चारणोंके समुदाय सब ओरसे वहाँ आ पहुँचे और यह चिन्तन करने लगे कि ‘आज सम्पूर्ण जगत्‌का कल्याण हो’ ॥ १२६ ॥ न मया तादृशो राजन् दृष्टपूर्वः पराक्रमः । संग्रामे यादृशो द्रौणेः कृष्णौ संछादयिष्यतः ॥ १२७ ॥ राजन्! समरांगणमें श्रीकृष्ण और अर्जुनको बाणोंद्वारा आच्छादित करनेवाले अश्वत्थामाका जैसा पराक्रम उस दिन देखा गया, वैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा था ॥ १२७ ॥ द्रौणेस्तु धनुषः शब्दमहित्रासनं रणे । अश्रौषं बहुशो राजन् सिंहस्य निनदो यथा ॥ १२८ ॥ महाराज! मैंने रणभूमिमें अश्वत्थामाके धनुषकी शत्रुओंको भयभीत कर देनेवाली टंकार बारंबार सुनी, मानो किसी सिंहके दहाड़नेकी आवाज हो रही हो ॥ ज्या चास्य चरतो युद्धे सव्यदक्षिणमस्यतः । विद्युदम्बुदमध्यस्था भ्राजमानेव साभवत् ॥ १२९ ॥ जैसे मेघोंकी घटाके बीचमें बिजली चमकती है, उसी प्रकार युद्धमें दायें-बायें बाण-वर्षापूर्वक विचरते हुए अश्वत्थामाके धनुषकी प्रत्यंचा भी प्रकाशित हो रही थी ॥ १२९ ॥ स तथा क्षिप्रकारी च दृढहस्तश्च पाण्डवः । प्रमोहं परमं गत्वा प्रेक्ष्य तं द्रोणजं ततः ॥ १३० ॥ विक्रमं विहतं मेन आत्मनः स महायशाः । तस्यास्य समरे राजन् वपुरासीत् सुदुर्द्दशम् ॥ १३१ ॥ युद्धमें फुर्ती करने और दृढ़तापूर्वक हाथ चलानेवाले महायशस्वी पाण्डुनन्दन अर्जुन द्रोणकुमारकी ओर देखकर भारी मोहमें पड़ गये और अपने पराक्रमको प्रतिहत हुआ मानने लगे। राजन्! उस समरांगणमें अश्वत्थामाके शरीरकी ओर देखना भी अत्यन्त कठिन हो रहा था ॥ १३०-१३१ ॥ द्रौणिपाण्डवयोरेवं वर्तमाने महारणे । वर्धमाने च राजेन्द्र द्रोणपुत्रे महाबले ॥ १३२ ॥ हीयमाने च कौन्तेये कृष्णे रोषः समाविशत् ।

राजेन्द्र! इस प्रकार अश्वत्थामा और अर्जुनमें महान् युद्ध आरम्भ होनेपर जब महाबली द्रोणपुत्र बढ़ने लगा और कुन्तीकुमार अर्जुनका पराक्रम मन्द पड़ने लगा, तब भगवान् श्रीकृष्णको बड़ा क्रोध हुआ ॥ १३२ १/२ ॥

स रोषान्निःश्वसन् राजन् निर्दहन्निव चक्षुषा ॥ १३३ ॥
द्रौणिं ह्यपश्यत् संग्रामे फाल्गुनं च मुहुर्मुहुः ।
राजन्! वे रोषसे लंबी साँस खींचते और अपने नेत्रोंद्वारा दग्ध-सा करते हुए युद्धस्थलमें अश्वत्थामा और अर्जुनकी ओर बारंबार देखने लगे ॥ १३३ १/२ ॥

ततः क्रुद्धोऽब्रवीत् कृष्णः पार्थं सप्रणयं तदा ॥ १३४ ॥
अत्यद्भुतमिदं पार्थ तव पश्यामि संयुगे ।
अतिशेते हि यत्र त्वां द्रोणपुत्रोऽद्य भारत ॥ १३५ ॥
तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए श्रीकृष्ण उस समय अर्जुनसे प्रेमपूर्वक बोले—'पार्थ! युद्धस्थलमें तुम्हारा यह उपेक्षायुक्त अद्भुत बर्ताव देख रहा हूँ। भारत! आज द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तुमसे सर्वथा बढ़ता जा रहा है ॥ १३४-१३५ ॥

कच्चिद् वीर्यं यथापूर्वं भुजयोर्वा बलं तव ।
कच्चित् ते गाण्डिवं हस्ते रथे तिष्ठसि चार्जुन ॥ १३६ ॥
'अर्जुन! तुम्हारी शारीरिक शक्ति पहलेके समान ही ठीक है न? अथवा तुम्हारी भुजाओंमें पूर्ववत् बल तो है न? तुम्हारे हाथमें गाण्डीव धनुष तो है न? और तुम रथपर ही खड़े हो न? ॥ १३६ ॥

कच्चित् कुशलिनौ बाहू मुष्टिर्वा न व्यशीर्यत ।
उदीर्यमाणं हि रणे पश्यामि द्रौणिमाहवे ॥ १३७ ॥
'क्या तुम्हारी दोनों भुजाएँ सकुशल हैं? तुम्हारी मुट्ठी तो ढीली नहीं हो गयी है? अर्जुन! मैं देखता हूँ कि युद्धस्थलमें अश्वत्थामा तुमसे बढ़ा जा रहा है ॥ १३७ ॥

गुरुपुत्र इति ह्येनं मानयन् भरतर्षभ ।
उपेक्षां कुरु मा पार्थ नायं काल उपेक्षितुम् ॥ १३८ ॥
'भरतश्रेष्ठ! कुन्तीनन्दन! यह मेरे गुरुका पुत्र है, ऐसा मानकर तुम इसके प्रति उपेक्षाभाव न करो। यह समय उपेक्षा करनेका नहीं है' ॥ १३८ ॥

एवमुक्तस्तु कृष्णेन गृह्य भल्लांश्चतुर्दश ।
त्वरमाणस्त्वराकाले द्रौणेर्धनुरथच्छिनत् ॥ १३९ ॥
ध्वजं छत्रं पताकाश्च खड्गं शक्तिं गदां तथा ।
जत्रुदेशे च सुभृशं वत्सदन्तैरताडयत् ॥ १४० ॥
भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर अर्जुनने चौदह भल्ल हाथमें लेकर शीघ्रता करनेके अवसरपर फुर्ती दिखायी और अश्वत्थामाके धनुषको काट डाला। साथ ही उसके ध्वज,

छत्र, पताका, खड्ग, शक्ति और गदाके भी टुकड़े-टुकड़े कर दिये। तदनन्तर अश्वत्थामाके गलेकी हँसलीपर 'वत्सदन्त' नामक बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी॥ १३९-१४०॥

स मूर्च्छां परमां गत्वा ध्वजयष्टिं समाश्रितः।
तं विसंज्ञं महाराज शत्रुगा भृशपीडितम्॥ १४१॥
अपोवाह रणात् सूतो रक्षमाणो धनंजयात्।
महाराज! उस आघातसे भारी मूर्च्छामें पड़कर अश्वत्थामा ध्वजदण्डके सहारे लुढ़क गया। शत्रुसे अत्यन्त पीड़ित एवं अचेत हुए अश्वत्थामाको उसका सारथि अर्जुनसे उसकी रक्षा करता हुआ रणभूमिसे दूर हटा ले गया॥ १४११/२॥

एतस्मिन्नेव काले च विजयः शत्रुतापनः॥ १४२॥
व्यहनत् तावकं सैन्यं शतशोऽथ सहस्रशः।
पश्यतस्तस्य वीरस्य तव पुत्रस्य भारत॥ १४३॥
भारत! इसी समय शत्रुओंको संताप देनेवाले अर्जुनने आपकी सेनाके सैकड़ों और हजारों योद्धाओंको आपके वीर पुत्रके देखते-देखते मार डाला॥ १४२-१४३॥

एवमेष क्षयो वृत्तस्तावकानां परैः सह।
क्रूरो विशसनो घोरो राजन् दुर्मन्त्रिते तव॥ १४४॥
राजन्! इस प्रकार आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप शत्रुओंके साथ आपके योद्धाओंका यह विनाशकारी, भयंकर एवं क्रूरतापूर्ण संग्राम हुआ॥ १४४॥

संशप्तकांश्च कौन्तेयः कुरूंश्चापि वृकोदरः।
वसुषेणश्च पञ्चालान् क्षणेन व्यधमद् रणे॥ १४५॥
उस समय रणभूमिमें कुन्तीकुमार अर्जुनने संशप्तकोंका, भीमसेनने कौरवोंका और कर्णने पांचाल-सैनिकोंका क्षणभरमें संहार कर डाला॥ १४५॥

वर्तमाने तथा रौद्रे राजन् वीरवरक्षये।
उत्थितान्यगणेयानि कबन्धानि समन्ततः॥ १४६॥
राजन्! जब बड़े-बड़े वीरोंका विनाश करनेवाला वह भीषण संग्राम हो रहा था, उस समय चारों ओर असंख्य कबन्ध खड़े दिखायी देते थे॥ १४६॥

युधिष्ठिरोऽपि संग्रामे प्रहारैर्गाढवेदनः।
क्रोशमात्रमपक्रम्य तस्थौ भरतसत्तम॥ १४७॥
भरतश्रेष्ठ! संग्राममें युधिष्ठिरपर बहुत अधिक प्रहार किये गये थे, जिससे उन्हें गहरी वेदना हो रही थी। वे रणभूमिसे एक कोस दूर हटकर खड़े थे॥ १४७॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ५६॥

* संशप्तकोंके सेनापति त्रिगर्तराज सुशर्मा कौरवोंके पक्षमें था। यह सुशर्मा उससे भिन्न पाण्डव-पक्षका योद्धा था।

अध्याय (पृष्ठ 2039)

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सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

दुर्योधनका सैनिकोंको प्रोत्साहन देना और अश्वत्थामाकी प्रतिज्ञा

संजय उवाच

दुर्योधनस्ततः कर्णमुपेत्य भरतर्षभ ।
अब्रवीन्मद्रराजं च तथैवान्यांश्च पार्थिवान् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर दुर्योधन कर्णके पास जाकर मद्रराज शल्य तथा अन्य राजाओंसे बोला— ॥ १ ॥

यदृच्छयैतत् सम्प्राप्तं स्वर्गद्वारमपावृतम् ।
सुखिनः क्षत्रियाः कर्ण लभन्ते युद्धमीदृशम् ॥ २ ॥
‘कर्ण! यह स्वर्गका खुला हुआ द्वाररूप युद्ध बिना इच्छाके अपने-आप प्राप्त हुआ है। ऐसे युद्धको सुखी क्षत्रियगण ही पाते हैं’ ॥ २ ॥

सदृशैः क्षत्रियैः शूरैः शूराणां युध्यतां युधि ।
इष्टं भवति राधेय तदिदं समुपस्थितम् ॥ ३ ॥
‘राधानन्दन! अपने समान बलवाले शूरवीर क्षत्रियोंके साथ रणभूमिमें जूझनेवाले शूरवीरोंको जो अभीष्ट होता है, वही यह संग्राम हमारे सामने उपस्थित है’ ॥ ३ ॥

हत्वा च पाण्डवान् युद्धे स्फीतामुर्वीमवाप्स्यथ ।
निहता वा परैर्युद्धे वीरलोकमवाप्स्यथ ॥ ४ ॥
‘तुम सब लोग युद्धस्थलमें पाण्डवोंका वध करके भूतलका समृद्धिशाली राज्य प्राप्त करोगे अथवा शत्रुओंद्वारा युद्धमें मारे जाकर वीरगति पाओगे’ ॥ ४ ॥

दुर्योधनस्य तच्छ्रुत्वा वचनं क्षत्रियर्षभाः ।
हृष्टा नादानुदक्रोशन् वादित्राणि च सर्वशः ॥ ५ ॥
दुर्योधनकी वह बात सुनकर क्षत्रियशिरोमणि वीर हर्षमें भरकर सिंहनाद करने और सब प्रकारके बाजे बजाने लगे ॥ ५ ॥

ततः प्रमुदिते तस्मिन् दुर्योधनबले तदा ।
हर्षयंस्तावकान् योधान् द्रौणिर्वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥
तदनन्तर आनन्दमग्न हुई दुर्योधनकी उस सेनामें अश्वत्थामाने आपके योद्धाओंका हर्ष बढ़ाते हुए कहा— ॥ ६ ॥

प्रत्यक्षं सर्वसैन्यानां भवतां चापि पश्यताम् ।
न्यस्तशस्त्रो मम पिता धृष्टद्युम्नेन पातितः ॥ ७ ॥

'समस्त सैनिकोंके सामने आपलोगोंके देखते-देखते जिन्होंने हथियार डाल दिया था, उन मेरे पिताको धृष्टद्युम्नने मार गिराया था ॥ ७ ॥ स तेनाहममर्षेण मित्रार्थे चापि पार्थिवाः । सत्यं वः प्रतिजानामि तद् वाक्यं मे निबोधत ॥ ८ ॥ 'राजाओ! उससे होनेवाले अमर्षके कारण तथा मित्र दुर्योधनके कार्यकी सिद्धिके लिये मैं आपलोगोंसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ, आपलोग मेरी यह बात सुनिये ॥ ८ ॥ धृष्टद्युम्नमहत्वांहं न विमोक्ष्यामि दंशनम् । अनृतायां प्रतिज्ञायां नाहं स्वर्गमवाप्नुयाम् ॥ ९ ॥ 'मैं धृष्टद्युम्नको मारे बिना अपना कवच नहीं उतारूँगा।' यदि यह मेरी प्रतिज्ञा झूठी हो जाय तो मुझे स्वर्गलोककी प्राप्ति न हो ॥ ९ ॥ अर्जुनो भीमसेनश्च योधो यो रक्षिता रणे । धृष्टद्युम्नस्य तं संख्ये निहनिष्यामि सायकैः ॥ १० ॥ 'अर्जुन और भीमसेन आदि जो योद्धा रणभूमिमें धृष्टद्युम्नकी रक्षा करेगा, उसे मैं युद्धस्थलमें अपने बाणोंद्वारा मार डालूँगा' ॥ १० ॥ एवमुक्ते ततः सर्वा सहिता भारतीचमूः । अभ्यद्रवत कौन्तेयांस्तथा ते चापि पाण्डवाः ॥ ११ ॥ अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर सारी कौरव-सेना एक साथ होकर कुन्तीपुत्रोंके सैनिकोंपर टूट पड़ी तथा पाण्डवोंने भी कौरवोंपर धावा बोल दिया ॥ ११ ॥ स संनिपातो रथयूथपानां बभूव राजन्नतिभीमरूपः । जनक्षयः कालयुगान्तकल्पः प्रावर्तताग्रे कुरुसृञ्जयानाम् ॥ १२ ॥ राजन्! रथयूथपतियोंका वह संघर्ष बड़ा भयंकर था। कौरवों और सृञ्जयोंके आगे प्रलयकालके समान जनसंहार आरम्भ हो गया था ॥ १२ ॥ ततः प्रवृत्ते युधि सम्प्रहारे भूतानि सर्वाणि सदैवतानि । आसन् समेतानि सहाप्सरोभि- र्दिदृक्षमाणानि नरप्रवीरान् ॥ १३ ॥ तदनन्तर युद्धस्थलमें जब भीषण मार-काट होने लगी, उस समय देवताओं तथा अप्सराओंसहित समस्त प्राणी उन नरवीरोंको देखनेकी इच्छासे एकत्र हो गये थे ॥ १३ ॥ दिव्यैश्च माल्यैर्विविधैश्च गन्धै- र्दिव्यैश्च रत्नैर्विविधैर्नराग्र्यान् । रणे स्वकर्मोद्वहतः प्रवीरा-