महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें धृतराष्ट्रका विलापविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ २ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2448)
तृतीयोऽध्यायः
कर्णके मारे जानेपर पाण्डवोंके भयसे कौरव-सेनाका पलायन, सामना करनेवाले पचीस हजार पैदलोंका भीमसेनद्वारा वध तथा दुर्योधनका अपने सैनिकोंको समझा-बुझाकर पुनः पाण्डवोंके साथ युद्धमें लगाना
संजय उवाच
शृणु राजन्नवहितो यथावृत्तो महान् क्षयः ।
कुरुणां पाण्डवानां च समासाद्य परस्परम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! कौरवों और पाण्डवोंके आपसमें भिड़नेसे जिस प्रकार महान् जनसंहार हुआ है, वह सब सावधान होकर सुनिये ॥ १ ॥
निहते सूतपुत्रे तु पाण्डवेन महात्मना ।
विद्रुतेषु च सैन्येषु समानीतेषु चासकृत् ॥ २ ॥
घोरे मनुष्यदेहानामाजौ नरवर क्षये ।
यत्तत् कर्णे हते पार्थः सिंहनादमथाकरोत् ॥ ३ ॥
तदा तव सुतान् राजन् प्राविशत् सुमहद् भयम् ।
नरश्रेष्ठ! महात्मा पाण्डुकुमार अर्जुनके द्वारा सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर जब आपकी सेनाएँ बार-बार भागने और लौटायी जाने लगीं एवं रणभूमिमें मानवशरीरोंका भयानक संहार होने लगा, उस समय कर्णवधके पश्चात् कुन्तीकुमार अर्जुनने बड़े जोरसे सिंहनाद किया। राजन्! उसे सुनकर आपके पुत्रोंके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ॥ २-३ १/२ ॥
न संधातुमनीकानि न चैवाथ पराक्रमे ॥ ४ ॥
आसीद् बुद्धिर्हते कर्णे तव योधस्य कस्यचित् ।
कर्णके मारे जानेपर आपके किसी भी योद्धाके मनमें न तो सेनाओंको एकत्र संगठित रखनेका उत्साह रह गया और न पराक्रममें ही वे मन लगा सके ॥ ४ १/२ ॥
वणिजो नावि भिन्नायामगाधे विप्लवा इव ॥ ५ ॥
अपारे पारमिच्छन्तो हते द्वीपे किरीटिना ।
सूतपुत्रे हते राजन् वित्रस्ताः शरविक्षताः ॥ ६ ॥
राजन्! जैसे अगाध महासागरमें नाव फट जानेपर नौकारहित व्यापारी उस अपार समुद्रसे पार जानेकी इच्छा रखते हुए घबरा उठते हैं, उसी प्रकार किरीटधारी अर्जुनके द्वारा द्वीपस्वरूप सूतपुत्रके मारे जानेपर बाणोंसे क्षत-विक्षत हो हम सब लोग भयभीत हो गये थे ॥ ५-६ ॥
अनाथा नाथमिच्छन्तो मृगाः सिंहार्दिता इव ।
भग्नशृङ्गा इव वृषाः शीर्णदंष्ट्रा इवोरगाः ॥ ७ ॥
हम अनाथ होकर कोई रक्षक चाहते थे। हमारी दशा सिंहके सताये हुए मृगों, टूटे सींगवाले बैलों तथा जिनके दाँत तोड़ लिये गये हों उन सर्पोंकी तरह हो रही थी ॥ ७ ॥
प्रत्युपायम सायाह्ने निर्जिताः सव्यसाचिना ।
हतप्रवीरा विध्वस्ता निकृत्ता निशितैः शरैः ॥ ८ ॥
सायंकालमें सव्यसाची अर्जुनसे परास्त होकर हम सब लोग शिबिरकी ओर लौटे। हमारी सेनाके प्रमुख वीर मारे गये थे। हम सब लोग पैने बाणोंसे घायल होकर विध्वंसके निकट पहुँच गये थे ॥ ८ ॥
सूतपुत्रे हते राजन् पुत्रास्ते प्राद्रवंस्ततः ।
विध्वस्तकवचाः सर्वे कांदिशीका विचेतसः ॥ ९ ॥
राजन्! सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके सब पुत्र अचेत हो वहाँसे भागने लगे। उन सबके कवच नष्ट हो गये थे। उन्हें इतनी भी सुध नहीं रह गयी थी कि हम कहाँ और किस दिशामें जायँ ॥ ९ ॥
अन्योन्यमभिनिघ्नन्तो वीक्षमाणा भयाद् दिशः ।
मामेव नूनं बीभत्सुर्मामेव च वृकोदरः ॥ १० ॥
अभियातीति मन्वानाः पेतुर्मम्लुश्च भारत ।
वे सब लोग एक-दूसरेपर चोट करते और भयसे सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखते हुए ऐसा समझते थे कि अर्जुन और भीमसेन मेरे ही पीछे लगे हुए हैं। भारत! ऐसा सोचकर वे हर्ष और उत्साह खो बैठते तथा लड़खड़ाकर गिर पड़ते थे ॥ १० ½ ॥
अश्वानन्ये गजानन्ये रथानन्ये महारथाः ॥ ११ ॥
आरुह्य जवसम्पन्नाः पादातान् प्रजहुर्भयात् ।
कुछ महारथी भयके मारे घोड़ोंपर, दूसरे लोग हाथियोंपर और कुछ लोग रथोंपर आरूढ़ हो पैदलोंको वहीं छोड़ बड़े वेगसे भागे ॥ ११ ½ ॥
कुञ्जरैः स्यन्दना भग्नाः सादिनश्च महारथैः ॥ १२ ॥
पदातिसंघाश्चाश्वौघैः पलायद्भिर्भृशं हताः ।
भागते हुए हाथियोंने बहुत-से रथ तोड़ डाले, बड़े-बड़े रथोंने घुड़सवारोंको कुचल दिया और दौड़ते हुए अश्वसमूहोंने पैदल सैनिकोंको अत्यन्त घायल कर दिया ॥
व्यालयतस्करसंकीर्णे सार्थहीना यथा वने ॥ १३ ॥
तथा त्वदीया निहते सूतपुत्रे तदाभवन् ।
जैसे सर्पों और लुटेरोंसे भरे हुए जंगलमें अपने साथियोंसे बिछुड़े हुए लोग अनाथके समान भटकते हैं, वही दशा उस समय सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर आपके सैनिकोंकी हुई ॥ १३ ½ ॥
हतारोहास्तथा नागाश्छिन्नहस्तास्तथापरे ॥ १४ ॥
सर्वं पार्थमयं लोकमपश्यन् वै भयार्दिताः ।
कितने ही हाथियोंके सवार मारे गये, बहुत-से गजराजोंकी सूँडें काट डाली गयीं, सब लोग भयसे पीड़ित होकर सम्पूर्ण जगत्को अर्जुनमय देख रहे थे ॥
तान् प्रेक्ष्य द्रवतः सर्वान् भीमसेनभयार्दितान् ॥ १५ ॥
दुर्योधनोऽथ स्वं सूतं हा हा कृत्वैवमब्रवीत् ।
भीमसेनके भयसे पीड़ित हुए समस्त सैनिकोंको भागते देख दुर्योधनने ‘हाय-हाय!’ करके अपने सारथिसे इस प्रकार कहा— ॥ १५ १/२ ॥
नातिक्रमिष्यते पार्थो धनुष्पाणिमवस्थितम् ॥ १६ ॥
जघने युद्ध्यमानं मां तूर्णमश्वान् प्रचोदय ।
‘जब मैं सेनाके पिछले भागमें खड़ा हो हाथमें धनुष ले युद्ध करूँगा, उस समय कुन्तीकुमार अर्जुन मुझे लाँघकर आगे नहीं बढ़ सकेंगे; अतः तुम घोड़ोंको आगे बढ़ाओ ॥ १६ १/२ ॥
समरे युद्ध्यमानं हि कौन्तेयो मां धनंजयः ॥ १७ ॥
नोत्सहेताप्यतिक्रान्तुं वेलामिव महार्णवः ।
‘जैसे महासागर तटको नहीं लाँघ सकता, उसी प्रकार कुन्तीकुमार अर्जुन समरांगणमें युद्ध करते हुए मुझ दुर्योधनको लाँघकर आगे जानेकी हिम्मत नहीं कर सकते ॥
अद्यार्जुनं सगोविन्दं मानिनं च वृकोदरम् ॥ १८ ॥
निहत्य शिष्टान् शत्रूंश्च कर्णस्यानृण्यमाप्नुयाम् ।
‘आज मैं श्रीकृष्ण, अर्जुन, मानी भीमसेन तथा शेष बचे हुए अन्य शत्रुओंका संहार करके कर्णके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा’ ॥ १८ १/२ ॥
तच्छ्रुत्वा कुरुराजस्य शूरार्यसदृशं वचः ॥ १९ ॥
सूतो हेमपरिच्छन्नान् शनैरश्वानचोदयत् ।
कुरुराज दुर्योधनके इस श्रेष्ठ वीरोचित वचनको सुनकर सारथिने सोनेके साज-बाजसे ढके हुए अश्वोंको धीरेसे आगे बढ़ाया ॥ १९ १/२ ॥
गजाश्वरथहीनास्तु पादाताश्चैव मारिष ॥ २० ॥
पञ्चविंशतिसाहस्राः प्राद्रवन् शनकैरिव ।
माननीय नरेश! उस समय हाथी, घोड़े और रथोंसे रहित पचीस हजार पैदल सैनिक धीरे-ही-धीरे पाण्डवोंपर चढ़ाई करने लगे ॥ २० १/२ ॥
तान् भीमसेनः संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ २१ ॥
बलेन चतुरङ्गेन परिक्षिप्याहनच्छरैः ।
तब क्रोधमें भरे हुए भीमसेन और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नने अपनी चतुरंगिणी सेनाके द्वारा उन्हें तितर-बितर करके बाणोंद्वारा अत्यन्त घायल कर दिया॥ २१ १/२॥
प्रत्ययुध्यंस्तु ते सर्वे भीमसेनं सपार्षतम्॥ २२॥
पार्थपार्षतयोश्चान्ये जगृहुस्तत्र नामनी।
वे समस्त सैनिक भी भीमसेन और धृष्टद्युम्नका डटकर सामना करने लगे। दूसरे बहुत-से योद्धा वहाँ उन दोनोंके नाम ले-लेकर ललकारने लगे॥ २२ १/२॥
अक्रुध्यत रणे भीमस्तैर्मृधे प्रत्यवस्थितैः॥ २३॥
सोऽवतीर्य रथात्तूर्णं गदापाणिरयुध्यत।
युद्धस्थलमें सामने खड़े हुए उन योद्धाओंके साथ जूझते समय भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ। वे तुरंत ही रथसे उतरकर हाथमें गदा ले उन सबके साथ युद्ध करने लगे॥ २३ १/२॥
न तान् रथस्थो भूमिष्ठान् धर्मापेक्षी वृकोदरः॥ २४॥
योधयामास कौन्तेयो भुजवीर्यमुपाश्रितः।
युद्धधर्मके पालनकी इच्छा रखनेवाले कुन्तीकुमार भीमसेनने स्वयं रथपर बैठकर भूमिपर खड़े हुए पैदल सैनिकोंके साथ युद्ध करना उचित नहीं समझा। वे अपने बाहुबलका भरोसा करके उन सबके साथ पैदल ही जूझने लगे॥ २४ १/२॥
जातरूपपरिच्छन्नां प्रगृह्य महतीं गदाम्॥ २५॥
न्यवधीत् तावकान् सर्वान् दण्डपाणिरिवान्तकः।
उन्होंने दण्डपाणि यमराजके समान सुवर्णपत्रसे जटित विशाल गदा लेकर उसके द्वारा आपके समस्त सैनिकोंका संहार आरम्भ किया॥ २५ १/२॥
पदातयो हि संरब्धास्त्यक्तजीवितबान्धवाः॥ २६॥
भीममभ्यद्रवन् संख्ये पतङ्गा इव पावकम्।
उस समय अपने प्राणों और बन्धु-बान्धवोंका मोह छोड़कर रोष और आवेशमें भरे हुए पैदल सैनिक युद्धस्थलमें भीमसेनकी ओर उसी प्रकार दौड़े, जैसे पतंग जलती हुई आगपर टूट पड़ते हैं॥ २६ १/२॥
आसाद्य भीमसेनं ते संरब्धा युद्धदुर्मदाः॥ २७॥
विनेदुः सहसा दृष्ट्वा भूतग्रामा इवान्तकम्।
क्रोधमें भरे हुए वे रणदुर्मद योद्धा भीमसेनसे भिड़कर सहसा उसी प्रकार आर्तनाद करने लगे, जैसे प्राणियोंके समुदाय यमराजको देखकर चीख उठते हैं॥ २७ १/२॥
श्येनवद् व्यचरद् भीमः खड्गेन गदया तथा॥ २८॥
पञ्चविंशतिसाहस्रांस्तावकानां व्यपोथयत्।
उस समय भीमसेन रणभूमिमें बाजकी तरह विचर रहे थे। उन्होंने तलवार और गदाके द्वारा आपके उन पचीस हजार योद्धाओंको मार गिराया॥ २८ १/२॥
हत्वा तत् पुरुषानीकं भीमः सत्यपराक्रमः ॥ २९ ॥ धृष्टद्युम्नं पुरस्कृत्य पुनस्तस्थौ महाबलः । सत्यपराक्रमी महाबली भीमसेन उस पैदल-सेनाका संहार करके धृष्टद्युम्नको आगे किये पुनः युद्धके लिये डट गये ॥ २९ १/२ ॥ धनंजयो रथानीकमन्वपद्यत वीर्यवान् ॥ ३० ॥ माद्रीपुत्रौ च शकुनिं सात्यकिश्च महाबलः । जवेनाभ्यपतन् हृष्टा घ्नन्तो दौर्योधनं बलम् ॥ ३१ ॥ दूसरी ओर पराक्रमी अर्जुनने रथसेनापर आक्रमण किया। माद्रीकुमार नकुल-सहदेव तथा महाबली सात्यकि दुर्योधनकी सेनाका विनाश करते हुए बड़े वेगसे शकुनिपर टूट पड़े ॥ ३०-३१ ॥ तस्याश्ववाहान् सुबहूंस्ते निहत्य शितैः शरैः । तमन्वधावंस्त्वरितास्तत्र युद्धमवर्तत ॥ ३२ ॥ उन सबने शकुनिके बहुत-से घुड़सवारोंको अपने पैने बाणोंसे मारकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँ शकुनिपर धावा किया। फिर तो उनमें भारी युद्ध छिड़ गया ॥ ३२ ॥ ततो धनंजयो राजन् रथानीकमगाहत । विश्रुतं त्रिषु लोकेषु गाण्डीवं व्याक्षिपन् धनुः ॥ ३३ ॥ राजन्! तदनन्तर अर्जुनने अपने त्रिभुवनविख्यात गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए आपके रथियोंकी सेनामें प्रवेश किया ॥ ३३ ॥ कृष्णसारथिमायान्तं दृष्ट्वा श्वेतहयं रथम् । अर्जुनं चापि योद्धारं त्वदीयाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ३४ ॥ श्रीकृष्ण जिसके सारथि हैं, उस श्वेत घोड़ोंसे जुते हुए रथको और रथी योद्धा अर्जुनको आते देखकर आपके सारे रथी भयसे भाग चले ॥ ३४ ॥ विप्रहीनरथाश्वाश्च शरैश्च परिवारिताः । पञ्चविंशतिसाहस्राः पार्थमार्च्छन् पदातयः ॥ ३५ ॥ तब रथों और घोड़ोंसे रहित तथा बाणोंसे आच्छादित हुए पचीस हजार पैदल योद्धाओंने कुन्तीकुमार अर्जुनपर चढ़ाई की ॥ ३५ ॥ हत्वा तत् पुरुषानीकं पञ्चालानां महारथः । भीमसेनं पुरस्कृत्य नचिरात् प्रत्यदृश्यत ॥ ३६ ॥ उस पैदल सेनाका वध करके पांचाल महारथी धृष्टद्युम्न भीमसेनको आगे किये शीघ्र ही वहाँ दृष्टिगोचर हुए ॥ ३६ ॥ महाधनुर्धरः श्रीमानमित्रगणमर्दनः । पुत्रः पञ्चालराजस्य धृष्टद्युम्नो महायशाः ॥ ३७ ॥
पाञ्चालराजके पुत्र धृष्टद्युम्न महाधनुर्धर, महायशस्वी, तेजस्वी तथा शत्रुसमूहका संहार करनेमें समर्थ थे ॥ ३७ ॥
पारावतसवर्णाश्वं कोविदारवरध्वजम् ।
धृष्टद्युम्नं रणे दृष्ट्वा त्वदीयाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ३८ ॥
जिनके रथमें कबूतरके समान रंगवाले घोड़े जुते हुए थे तथा रथकी श्रेष्ठ ध्वजापर कचनारवृक्षका चिह्न बना हुआ था, उन धृष्टद्युम्नको रणभूमिमें उपस्थित देख आपके सैनिक भयसे भाग खड़े हुए ॥ ३८ ॥
गान्धारराजं शीघ्रास्त्रमनुसृत्य यशस्विनौ ।
अचिरात् प्रत्यदृश्येतां माद्रीपुत्रौ ससात्यकी ॥ ३९ ॥
सात्यकिसहित यशस्वी माद्रीकुमार नकुल और सहदेव शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले गान्धारराज शकुनिका तुरंत पीछा करते हुए दिखायी दिये ॥ ३९ ॥
चेकितानः शिखण्डी च द्रौपदेयाश्च मारिष ।
हत्वा त्वदीयं सुमहत् सैन्यं शङ्खानथाधमन् ॥ ४० ॥
माननीय नरेश! चेकितान, शिखण्डी और द्रौपदीके पाँचों पुत्र—आपकी विशाल सेनाका संहार करके शंख बजाने लगे ॥
ते सर्वे तावकान् प्रेक्ष्य द्रवतो वै पराङ्मुखान् ।
अभ्यधावन्त निघ्नन्तो वृषाञ्जित्वा वृषा इव ॥ ४१ ॥
जैसे साँड़ साँड़ोंको परास्त करके उन्हें बहुत दूरतक खदेड़ते रहते हैं, उसी प्रकार उन सब पाण्डववीरोंने आपके समस्त सैनिकोंको युद्धसे विमुख होकर भागते देख बाणोंका प्रहार करते हुए दूरतक उनका पीछा किया ॥
सेनावशेषं तं दृष्ट्वा तव पुत्रस्य पाण्डवः ।
अवस्थितं सव्यसाची चुक्रोध बलवन्नृप ॥ ४२ ॥
नरेश्वर! पाण्डुकुमार सव्यसाची अर्जुन आपके पुत्रकी सेनाके उस एक भागको अवशिष्ट एवं सामने उपस्थित देख अत्यन्त कुपित हो उठे ॥ ४२ ॥
तत एनं शरै राजन् सहसा समवाकिरत् ।
रजसा चोद्गतेनाथ न स्म किंचन दृश्यते ॥ ४३ ॥
राजन्! तदनन्तर उन्होंने सहसा बाणोंद्वारा उस सेनाको आच्छादित कर दिया। उस समय इतनी धूल ऊपर उठी कि कुछ भी दिखायी नहीं देता था ॥ ४३ ॥
अन्धकारीकृते लोके शरीभूते महीतले ।
दिशः सर्वा महाराज तावकाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ४४ ॥
महाराज! जब जगत्में उस धूलसे अन्धकार छा गया और पृथ्वीपर बाण-ही-बाण बिछ गया, उस समय आपके सैनिक भयके मारे सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥
भज्यमानेषु सर्वेषु कुरुराजो विशाम्पते ।
परेषामात्मनश्चैव सैन्ये ते समुपाद्रवत् ॥ ४५ ॥ प्रजानाथ! उन सबके भाग जानेपर कुरुराज दुर्योधनने शत्रुपक्षकी और अपनी दोनों ही सेनाओंपर आक्रमण किया ॥
ततो दुर्योधनः सर्वानजुहावाथ पाण्डवान् । युद्धाय भरतश्रेष्ठ देवानिव पुरा बलिः ॥ ४६ ॥ भरतश्रेष्ठ! जैसे पूर्वकालमें राजा बलिने देवताओंको युद्धके लिये ललकारा था, उसी प्रकार दुर्योधनने समस्त पाण्डवोंका आह्वान किया ॥ ४६ ॥
त एनमभिगर्जन्तं सहिताः समुपाद्रवन् । नानाशस्त्रसृजः क्रुद्धा भर्त्सयन्तो मुहुर्मुहुः ॥ ४७ ॥ तब वे पाण्डवयोध्दा अत्यन्त कुपित हो गर्जना करनेवाले दुर्योधनको बारंबार फटकारते और क्रोधपूर्वक नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए एक साथ ही उसपर टूट पड़े ॥
दुर्योधनोऽप्यसम्भ्रान्तस्तानरीन् व्यधमच्छरैः । तत्राद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य पौरुषम् ॥ ४८ ॥ यदेनं पाण्डवाः सर्वे न शेकुरतिवर्तितुम् । दुर्योधन भी बिना किसी घबराहटके अपने बाणोंद्वारा उन शत्रुओंको छिन्न-भिन्न करने लगा। वहाँ हमलोगोंने आपके पुत्रका अद्भुत पराक्रम देखा कि समस्त पाण्डव मिलकर भी उसे लाँघकर आगे न बढ़ सके ॥ ४८ १/२ ॥
नातिदूरापयातं च कृतबुद्धिः पलायने ॥ ४९ ॥ दुर्योधनः स्वकं सैन्यमपश्यद् भृशविक्षतम् । दुर्योधनने देखा कि मेरी सेना अत्यन्त घायल हो रणभूमिसे पलायन करनेका विचार रखकर भाग रही है, परंतु अधिक दूर नहीं गयी है ॥ ४९ १/२ ॥
ततोऽवस्थाप्य राजेन्द्र कृतबुद्धिस्तवात्मजः ॥ ५० ॥ हर्षयन्निव तान् योधांस्ततो वचनमब्रवीत् । राजेन्द्र! तब युद्धका ही दृढ़ निश्चय रखनेवाले आपके पुत्रने उन समस्त सैनिकोंको खड़ा करके उनका हर्ष बढ़ाते हुए कहा— ॥ ५० १/२ ॥
न तं देशं प्रपश्यामि पृथिव्यां पर्वतेषु च ॥ ५१ ॥ यत्र यातान्न वो हन्युः पाण्डवाः किं सृतेन वः । ‘वीरो! मैं भूतलपर और पर्वतोंमें भी कोई ऐसा स्थान नहीं देखता, जहाँ चले जानेपर तुमलोगोंको पाण्डव मार न सकें; फिर तुम्हारे भागनेसे क्या लाभ है? ॥ ५१ १/२ ॥
स्वल्पं चैव बलं तेषां कृष्णौ च भृशविक्षतौ ॥ ५२ ॥ यदि सर्वेऽत्र तिष्ठामो ध्रुवं नो विजयो भवेत् ।
'पाण्डवोंके पास थोड़ी-सी ही सेना शेष रह गयी है और श्रीकृष्ण तथा अर्जुन भी बहुत घायल हो चुके हैं। यदि हम सब लोग यहाँ डटे रहें तो निश्चय ही हमारी विजय होगी॥ ५२ १/२॥
विप्रयातांस्तु वो भिन्नान् पाण्डवाः कृतकिल्बिषान्॥ ५३ ॥ अनुसृत्य हनिष्यन्ति श्रेयो नः समरे वधः। 'यदि तुमलोग पृथक्-पृथक् होकर भागोगे तो पाण्डव तुम सभी अपराधियोंका पीछा करके तुम्हें मार डालेंगे, अतः युद्धमें ही मारा जाना हमारे लिये श्रेयस्कर होगा॥ ५३ १/२॥
सुखः सांग्रामिको मृत्युः क्षत्रधर्मेण युध्यताम्॥ ५४ ॥ मृतो दुःखं न जानीते प्रेत्य चानन्त्यमश्नुते। 'क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करनेवाले वीरोंके लिये संग्रामभूमिमें होनेवाली मृत्यु ही सुखद है; क्योंकि वहाँ मरा हुआ मनुष्य मृत्युके दुःखको नहीं जानता और मृत्युके पश्चात् अक्षय सुखका भागी होता है॥ ५४ १/२॥
शृण्वन्तु क्षत्रियाः सर्वे यावन्तोऽत्र समागताः॥ ५५ ॥ द्विषतो भीमसेनस्य वशमेष्यथ विद्रुताः। 'जितने क्षत्रिय यहाँ आये हैं वे सब सुनें—'तुमलोग भागनेपर अपने शत्रु भीमसेनके अधीन हो जाओगे॥ ५५ १/२॥
पितामहैराचरितं न धर्मं हातुमर्हथ॥ ५६ ॥ नान्यत् कर्मास्ति पापीयः क्षत्रियस्य पलायनात्। 'इसलिये अपने बाप-दादोंके द्वारा आचरणमें लाये हुए धर्मका परित्याग न करो। क्षत्रियके लिये युद्ध छोड़कर भागनेसे बढ़कर दूसरा कोई अत्यन्त पापपूर्ण कर्म नहीं है॥ ५६ १/२॥
न युद्धधर्माच्छ्रेयान् हि पन्थाः स्वर्गस्य कौरवाः॥ ५७ ॥ सुचिरेणार्जिताँल्लोकान् सद्यो युद्धात् समश्रुते। 'कौरवो! युद्धधर्मसे बढ़कर दूसरा कोई स्वर्गका श्रेष्ठ मार्ग नहीं है। दीर्घकालतक पुण्यकर्म करनेसे प्राप्त होनेवाले पुण्यलोकोंको वीर क्षत्रिय युद्धसे तत्काल प्राप्त कर लेता है'॥ ५७ १/२॥
तस्य तद् वचनं राज्ञः पूजयित्वा महारथाः॥ ५८ ॥ पुनरेवाभ्यवर्तन्त क्षत्रियाः पाण्डवान् प्रति। पराजयममृष्यन्तः कृतचित्ताश्च विक्रमे॥ ५९ ॥ राजा दुर्योधनकी उस बातका आदर करके वे महारथी क्षत्रिय पुनः युद्ध करनेके लिये पाण्डवोंके सामने आये। उन्हें पराजय असह्य हो उठी थी; इसलिये उन्होंने पराक्रम करनेमें ही मन लगाया था॥ ५८-५९॥
ततः प्रवृत्ते युद्धं पुनरेव सुदारुणम्।
तावकानां परेषां च देवासुररणोपमम् ॥ ६० ॥
तदनन्तर आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमें पुनः देवासुर-संग्रामके समान अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ६० ॥
युधिष्ठिरपुरोगांश्च सर्वसैन्येन पाण्डवान् ।
अन्वधावन्महाराज पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥ ६१ ॥
महाराज! उस समय आपके पुत्र दुर्योधनने अपनी सारी सेनाके साथ युधिष्ठिर आदि सभी पाण्डवोंपर धावा किया था ॥ ६१ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि कौरवसैन्यापयाने तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें कौरवसेनाका पलायनविषयक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2457)
चतुर्थोऽध्यायः
कृपाचार्यका दुर्योधनको संधिके लिये समझाना
संजय उवाच
पतितान् रथनीडांश्च रथांश्चापि महात्मनाम् ।
रणे च निहतान् नागान् दृष्ट्वा पत्तींश्च मारिष ॥ १ ॥
आयोधनं चातिघोरं रुद्रस्याक्रीड संनिभम् ।
अप्रख्यातिं गतानां तु राज्ञां शतसहस्रशः ॥ २ ॥
विमुखे तव पुत्रे तु शोकोपहतचेतसि ।
भृशोद्विग्नेषु सैन्येषु दृष्ट्वा पार्थस्य विक्रमम् ॥ ३ ॥
ध्यायमानेषु सैन्येषु दुःखं प्राप्तेषु भारत ।
बलानां मथ्यमानानां श्रुत्वा निनदमुत्तमम् ॥ ४ ॥
अभिज्ञानं नरेन्द्राणां विक्षतं प्रेक्ष्य संयुगे ।
कृपाविष्टः कृपो राजन् वयःशीलसमन्वितः ॥ ५ ॥
अब्रवीत् तत्र तेजस्वी सोऽभिसृत्य जनाधिपम् ।
दुर्योधनं मन्युवशाद् वाक्यं वाक्यविशारदः ॥ ६ ॥
**संजय कहते हैं—**माननीय नरेश! उस समय रणभूमिमें महामनस्वी वीरोंके रथ और उनकी बैठकें टूटी पड़ी थीं। सवारोंसहित हाथी और पैदल सैनिक मार डाले गये थे। वह युद्धस्थल रुद्रदेवकी क्रीडाभूमि श्मशानके समान अत्यन्त भयानक जान पड़ता था और वहाँ लाखों नरेशोंका नामोनिशान मिट गया था। यह सब देखकर जब आपके पुत्र दुर्योधनका मन शोकमें डूब गया और उसने युद्धसे मुँह मोड़ लिया, कुन्तीपुत्र अर्जुनका पराक्रम देखकर समस्त सेनाएँ जब भयसे अत्यन्त व्याकुल हो उठीं और भारी दुःखमें पड़कर चिन्तामग्न हो गयीं, उस समय मथे जाते हुए सैनिकोंका जोर-जोरसे आर्तनाद सुनकर तथा राजाओंके चिह्नस्वरूप ध्वज आदिको युद्धस्थलमें क्षत-विक्षत हुआ देखकर प्रौढ़ अवस्था और उत्तम स्वभावसे युक्त तेजस्वी कृपाचार्यके मनमें बड़ी दया आयी। भरतवंशी नरेश! वे बातचीत करनेमें अत्यन्त कुशल थे। उन्होंने राजा दुर्योधनके निकट जाकर उसकी दीनता देखकर इस प्रकार कहा— ॥ १—६ ॥
दुर्योधन निबोधेदं यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव ।
श्रुत्वा कुरु महाराज यदि ते रोचतेऽनघ ॥ ७ ॥
‘कुरुवंशी महाराज दुर्योधन! मैं इस समय तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। अनघ! मेरी बात सुनकर यदि तुम्हें रुचे तो उसके अनुसार कार्य करो ॥ ७ ॥
न युद्धधर्माच्छ्रेयान् वै पन्था राजेन्द्र विद्यते ।
यं समाश्रित्य युद्ध्यन्ते क्षत्रियाः क्षत्रियर्षभ ।। ८ ।। 'राजेन्द्र! क्षत्रियशिरोमणे! युद्धधर्मसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं है, जिसका आश्रय लेकर क्षत्रिय लोग युद्धमें तत्पर रहते हैं।। ८ ।। पुत्रो भ्राता पिता चैव स्वस्त्रीयो मातुलस्तथा । सम्बन्धिबान्धवाश्चैव योद्धव्या वै क्षत्रजीविना ।। ९ ।। 'क्षत्रियधर्मसे जीवन-निर्वाह करनेवाले पुरुषके लिये पुत्र, भ्राता, पिता, भानजा, मामा, सम्बन्धी तथा बन्धु-बान्धव—इन सबके साथ युद्ध करना कर्तव्य है ।। ९ ।। वधे चैव परो धर्मस्तथाधर्मः पलायने । ते स्म घोरां समापन्ना जीविकां जीवितार्थिनः ।। १० ।। 'युद्धमें शत्रुको मारना या उसके हाथसे मारा जाना दोनों ही उत्तम धर्म है और युद्धसे भागनेपर महान् पाप होता है। सभी क्षत्रिय जीवन-निर्वाहकी इच्छा रखते हुए उसी घोर जीविकाका आश्रय लेते हैं ।। १० ।। तदत्र प्रतिवक्ष्यामि किंचिदेव हितं वचः । हते भीष्मे च द्रोणे च कर्णे चैव महारथे ।। ११ ।। जयद्रथे च निहते तव भ्रातृषु चानघ । लक्ष्मणे तव पुत्रे च किं शेषं पर्युपास्महे ।। १२ ।। 'ऐसी दशामें मैं यहाँ तुम्हारे लिये कुछ हितकी बात बताऊँगा। अनघ! पितामह भीष्म, आचार्य द्रोण, महारथी कर्ण, जयद्रथ तथा तुम्हारे सभी भाई मारे जा चुके हैं। तुम्हारा पुत्र लक्ष्मण भी जीवित नहीं है। अब दूसरा कौन बच गया है, जिसका हमलोग आश्रय ग्रहण करें ।। ११-१२ ।। येषु भारं समासाद्य राज्ये मतिमकुर्महि । ते संत्यज्य तनूर्याताः शूरा ब्रह्मविदां गतिम् ।। १३ ।। 'जिनपर युद्धका भार रखकर हम राज्य पानेकी आशा करते थे, वे शूरवीर तो शरीर छोड़कर ब्रह्मवेत्ताओंकी गतिको प्राप्त हो गये ।। १३ ।। वयं त्विह विना भूता गुणवद्भिर्महारथैः । कृपणं वर्तयिष्याम पातयित्वा नृपान् बहून् ।। १४ ।। 'इस समय हमलोग यहाँ भीष्म आदि गुणवान् महारथियोंके सहयोगसे वंचित हो गये हैं और बहुत-से नरेशोंको मरवाकर दयनीय स्थितिमें आ गये हैं ।। १४ ।। सर्वैरथ च जीवद्भिर्बीभत्सुरपराजितः । कृष्णनेत्रो महाबाहुर्देवैरपि दुरासदः ।। १५ ।। 'जब सब लोग जीवित थे, तब भी अर्जुन किसीके द्वारा पराजित नहीं हुए। श्रीकृष्ण-जैसे नेताके रहते हुए महाबाहु अर्जुन देवताओंके लिये भी दुर्जय हैं ।। १५ ।। इन्द्रकार्मुकतुल्याभमिन्द्रकेतुमिवोच्छ्रितम् ।
वानरं केतुमासाद्य संचचाल महाचमूः ॥ १६ ॥ 'उनका वानरध्वज इन्द्रधनुषके तुल्य बहुरंगा और इन्द्रध्वजके समान अत्यन्त ऊँचा है। उसके पास पहुँचकर हमारी विशाल सेना भयसे विचलित हो उठती है ॥ १६ ॥
सिंहनादाच्च भीमस्य पाञ्चजन्यस्वनेन च। गाण्डीवस्य च निर्घोषात् सम्मुह्यन्ते मनांसि नः ॥ १७ ॥ 'भीमसेनके सिंहनाद, पांचजन्य शंखकी ध्वनि और गाण्डीव धनुषकी टंकारसे हमारा दिल दहल उठता है ॥ १७ ॥
चरन्तीव महाविद्युन्मुष्णन्ती नयनप्रभाम् । अलातमिव चाविद्धं गाण्डीवं समदृश्यत ॥ १८ ॥ 'जैसे चमकती हुई महाविद्युत् नेत्रोंकी प्रभाको छीनती-सी दिखायी देती है तथा जैसे अलातचक्र घूमता देखा जाता है, उसी प्रकार अर्जुनके हाथमें गाण्डीव धनुष भी दृष्टिगोचर होता है ॥ १८ ॥
जाम्बूनदविचित्रं च धूयमानं महत् धनुः । दृश्यते दिक्षु सर्वासु विद्युदभ्रघनेष्विव ॥ १९ ॥ 'अर्जुनके हाथमें डोलता हुआ उनका सुवर्णजटित महान् धनुष सम्पूर्ण दिशाओंमें वैसा ही दिखायी देता है, जैसे मेघोंकी घटामें बिजली ॥ १९ ॥
श्वेताश्च वेगसम्पन्नाः शशिकाशसमप्रभाः । पिबन्त इव चाकाशं रथे युक्तास्तु वाजिनः ॥ २० ॥ 'उनके रथमें जुते हुए घोड़े श्वेत वर्णवाले, वेगशाली तथा चन्द्रमा और कासके समान उज्ज्वल कान्तिसे सुशोभित हैं। वे ऐसी तीव्र गतिसे चलते हैं, मानो आकाशको पी जायेंगे ॥ २० ॥
उह्यमानांश्च कृष्णेन वायुनेव बलाहकाः । जाम्बूनदविचित्राङ्गा वहन्ते चार्जुनं रणे ॥ २१ ॥ 'जैसे वायुकी प्रेरणासे बादल उड़ते फिरते हैं, वैसे ही भगवान् श्रीकृष्णद्वारा हाँके जाते हुए घोड़े, जो सुनहरे साजोंसे सजे होनेके कारण अंगोंमें विचित्र शोभा धारण करते हैं, रणभूमिमें अर्जुनकी सवारी ढोते हैं ॥ २१ ॥
तावकं तद् बलं राजन्नर्जुनोऽस्त्रविशारदः । गहनं शिशिरापाये ददाहाग्निरिवोल्बणः ॥ २२ ॥ 'राजन्! अर्जुन अस्त्रविद्यामें कुशल हैं, उन्होंने तुम्हारी सेनाको उसी प्रकार भस्म किया है, जैसे भयंकर आग ग्रीष्म-ऋतुमें बहुत बड़े जंगलको जला डालती है ॥ २२ ॥
गाहमानमनीकानि महेन्द्रसदृशप्रभम् । धनंजयम्पश्याम चतुर्दंष्ट्रमिव द्विपम् ॥ २३ ॥
‘देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी अर्जुनको हम चार दाँतवाले गजराजके समान अपनी सेनामें प्रवेश करते देखते हैं ॥ २३ ॥ विक्षोभयन्तं सेनां ते त्रासयन्तं च पार्थिवान् । धनंजयम्पश्याम नलिनीमिव कुञ्जरम् ॥ २४ ॥ ‘जैसे मतवाला हाथी तालाबमें घुसकर उसे मथ डालता है, उसी प्रकार हमने अर्जुनको तुम्हारी सेनाको मथते और राजाओंको भयभीत करते देखा है ॥ २४ ॥ त्रासयन्तं तथा योधान् धनुर्घोषेण पाण्डवम् । भूय एनमपश्याम सिंहं मृगगणानिव ॥ २५ ॥ ‘जैसे सिंह मृगोंके झुंडको भयभीत कर देता है, उसी प्रकार पाण्डुकुमार अर्जुन अपने धनुषकी टंकारसे तुम्हारे समस्त योद्धाओंको बारंबार भयभीत करते दिखायी दिये हैं ॥ २५ ॥ सर्वलोकमहेष्वासौ वृषभौ सर्वधन्विनाम् । आमुक्तकवचौ कृष्णौ लोकमध्ये विचेरतुः ॥ २६ ॥ ‘अपने अंगोंमें कवच धारण किये श्रीकृष्ण और अर्जुन, जो सम्पूर्ण विश्वके महाधनुर्धर और सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ हैं, योद्धाओंके समूहमें निर्भय विचरते हैं ॥ २६ ॥ अद्य सप्तदशाहानि वर्तमानस्य भारत । संग्रामस्यातिघोरस्य वध्यतां चाभितो युधि ॥ २७ ॥ ‘भारत! परस्पर मार-काट मचाते हुए दोनों ओरसे योद्धाओंके इस अत्यन्त भयंकर संग्रामको आरम्भ हुए आज सत्रह दिन हो गये ॥ २७ ॥ वायुनेव विधूतानि तव सैन्यानि सर्वतः । शरदम्भोदजालानि व्यशीर्यन्त समन्ततः ॥ २८ ॥ ‘जैसे हवा शरद्-ऋतुके बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनकी मारसे तुम्हारी सेनाएँ सब ओर तितर-बितर हो गयी हैं ॥ २८ ॥ तां नावमिव पर्यस्तां वातधूतां महार्णवे । तव सेनां महाराज सव्यसाची व्यकम्पयत् ॥ २९ ॥ ‘महाराज! जैसे महासागरमें हवाके थपेड़े खाकर नाव डगमगाने लगती है, उसी प्रकार सव्यसाची अर्जुनने तुम्हारी सेनाको कँपा डाला है ॥ २९ ॥ क्व नु ते सूतपुत्रोऽभूत् क्व नु द्रोणः सहानुगः । अहं क्व च क्व चात्मा ते हार्दिक्यश्च तथा क्व नु ॥ ३० ॥ दुःशासनश्च ते भ्राता भ्रातृभिः सहितः क्व नु । बाणगोचरसम्प्राप्तं प्रेक्ष्य चैव जयद्रथम् ॥ ३१ ॥ ‘उस दिन जयद्रथको अर्जुनके बाणोंका निशाना बनते देखकर भी तुम्हारा कर्ण कहाँ चला गया था? अपने अनुयायियोंके साथ आचार्य द्रोण कहाँ थे? मैं कहाँ था? तुम कहाँ थे?
कृतवर्मा कहाँ चले गये थे और भाइयोंसहित तुम्हारा भ्राता दुःशासन भी कहाँ था? ॥ ३०-३१ ॥ सम्बन्धिनस्ते भ्रातूंश्च सहायान् मातुलांस्तथा । सर्वान् विक्रम्य मिषतो लोकमाक्रम्य मूर्धनि ॥ ३२ ॥ जयद्रथो हतो राजन् किं नु शेषमुपास्महे । को हीह स पुमानस्ति यो विजेष्यति पाण्डवम् ॥ ३३ ॥ ‘राजन्! तुम्हारे सम्बन्धी, भाई, सहायक और मामा सब-के-सब देख रहे थे तो भी अर्जुनने उन सबको अपने पराक्रमद्वारा परास्त करके सब लोगोंके मस्तकपर पैर रखकर जयद्रथको मार डाला। अब और कौन बचा है जिसका हम भरोसा करें? यहाँ कौन ऐसा पुरुष है जो पाण्डुपुत्र अर्जुनपर विजय पायेगा? ॥ ३२-३३ ॥ तस्य चास्त्राणि दिव्यानि विविधानि महात्मनः । गाण्डीवस्य च निर्घोषो धैर्याणि हरते हि नः ॥ ३४ ॥ ‘महात्मा अर्जुनके पास नाना प्रकारके दिव्यास्त्र हैं। उनके गाण्डीव धनुषका गम्भीर घोष हमारा धैर्य छीन लेता है ॥ ३४ ॥ नष्टचन्द्रा यथा रात्रिः सेनेयं हतनायका । नागभग्नद्रुमा शुष्का नदीवाकुलतां गता ॥ ३५ ॥ ‘जैसे चन्द्रमाके उदित न होनेपर रात्रि अन्धकारमयी दिखायी देती है, उसी प्रकार हमारी यह सेना सेनापतिके मारे जानेसे श्रीहीन हो रही है। हाथीने जिसके किनारेके वृक्षोंको तोड़ डाला हो, उस सूखी नदीके समान यह व्याकुल हो उठी है ॥ ३५ ॥ ध्वजिन्यां हतनेत्रायां यथेष्टं श्वेतवाहनः । चरिष्यति महाबाहुः कक्षेष्वाग्निरिव ज्वलन् ॥ ३६ ॥ ‘हमारी इस विशाल वाहिनीका नेता नष्ट हो गया है। ऐसी दशामें घास-फूसके ढेरमें प्रज्वलित होनेवाली आगके समान श्वेत घोड़ोंवाले महाबाहु अर्जुन इस सेनाके भीतर इच्छानुसार विचरेंगे ॥ ३६ ॥ सात्यकेश्चैव यो वेगो भीमसेनस्य चोभयोः । दारयेच्च गिरीन् सर्वान् शोषयेच्चैव सागरान् ॥ ३७ ॥ ‘उधर सात्यकि और भीमसेन दोनों वीरोंका जो वेग है, वह सारे पर्वतोंको विदीर्ण कर सकता है। समुद्रोंको भी सुखा सकता है ॥ ३७ ॥ उवाच वाक्यं यद् भीमः सभामध्ये विशाम्पते । कृतं तत् सफलं तेन भूयश्चैव करिष्यति ॥ ३८ ॥ ‘प्रजानाथ! द्यूतसभामें भीमसेनने जो बात कही थी, उसे उन्होंने सत्य कर दिखाया और जो शेष है, उसे भी वे अवश्य ही पूर्ण करेंगे ॥ ३८ ॥ प्रमुखस्थे तदा कर्णे बलं पाण्डवरक्षितम् ।
दुरासदं तदा गुप्तं व्यूढं गाण्डीवधन्वना ॥ ३९ ॥ 'जब कर्णके साथ युद्ध चल रहा था, उस समय कर्ण सामने ही था तो भी पाण्डवोंद्वारा रक्षित सेना उसके लिये दुर्जय हो गयी; क्योंकि गाण्डीवधारी अर्जुन व्यूहरचनापूर्वक उसकी रक्षा कर रहे थे ॥ ३९ ॥
युष्माभिस्तानी चीर्णानि यान्यसाधूनि साधुषु । अकारणकृतान्येव तेषां वः फलमागतम् ॥ ४० ॥ 'पाण्डव साधुपुरुष हैं तो भी तुमलोगोंने अकारण ही उनके साथ जो बहुत-से अनुचित बर्ताव किये हैं, उन्हींका यह फल तुम्हें मिला है ॥ ४० ॥
आत्मनोऽर्थे त्वया लोको यत्नतः सर्व आहृतः । स ते संशयितस्तात आत्मा वै भरतर्षभ ॥ ४१ ॥ 'भरतश्रेष्ठ! तुमने अपनी रक्षाके लिये ही प्रयत्नपूर्वक सारे जगत्के लोगोंको एकत्र किया था, किंतु तुम्हारा ही जीवन संशयमें पड़ गया है ॥ ४१ ॥
रक्ष दुर्योधनात्मानमात्मा सर्वस्य भाजनम् । भिन्ने हि भाजने तात दिशो गच्छति तद्गतम् ॥ ४२ ॥ 'दुर्योधन! अब तुम अपने शरीरकी रक्षा करो; क्योंकि आत्मा (शरीर) ही समस्त सुखोंका भाजन है। जैसे पात्रके फूट जानेपर उसमें रखा हुआ जल चारों ओर बह जाता है, उसी प्रकार शरीरके नष्ट होनेसे उसपर अवलम्बित सुखोंका भी अन्त हो जाता है ॥ ४२ ॥
हीयमानेन वै सन्धिः पर्येष्टव्यः समेन वा । विग्रहो वर्धमानेन मतिरेषा बृहस्पतेः ॥ ४३ ॥ 'बृहस्पतिकी यह नीति है कि जब अपना बल कम या बराबर जान पड़े तो शत्रुके साथ संधि कर लेनी चाहिये। लड़ाई तो उसी वक्त छेड़नी चाहिये, जब अपनी शक्ति शत्रुसे बढ़ी-चढ़ी हो ॥ ४३ ॥
ते वयं पाण्डुपुत्रेभ्यो हीना स्म बलशक्तितः । तदत्र पाण्डवैः सार्धं सन्धिं मन्ये क्षमं प्रभो ॥ ४४ ॥ 'हमलोग बल और शक्तिमें पाण्डवोंसे हीन हो गये हैं। अतः प्रभो! इस अवस्थामें पाण्डवोंके साथ संधि कर लेना ही उचित समझता हूँ ॥ ४४ ॥
न जानीते हि यः श्रेयः श्रेयसश्चावमन्यते । स क्षिप्रं भ्रश्यते राज्यान्न च श्रेयोऽनुविन्दते ॥ ४५ ॥ 'जो राजा अपनी भलाईकी बात नहीं समझता और श्रेष्ठ पुरुषोंका अपमान करता है, वह शीघ्र ही राज्यसे भ्रष्ट हो जाता है। उसे कभी कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती ॥ ४५ ॥
प्रणिपत्य हि राजानं राज्यं यदि लभेमहि । श्रेयः स्यान्न तु मौढ्येन राजन् गन्तुः पराभवम् ॥ ४६ ॥
'राजन्! यदि राजा युधिष्ठिरके सामने नतमस्तक होकर हम अपना राज्य प्राप्त कर लें तो यही श्रेयस्कर होगा। मूर्खतावश पराजय स्वीकार करनेवालेका कभी भला नहीं हो सकता।। ४६ ।।
वैचित्रवीर्यवचनात् कृपाशीलो युधिष्ठिरः ।
विनियुञ्जीत राज्ये त्वां गोविन्दवचनेन च ॥ ४७ ॥
'युधिष्ठिर दयालु हैं। वे राजा धृतराष्ट्र और भगवान् श्रीकृष्णके कहनेसे तुम्हें राज्यपर प्रतिष्ठित कर सकते हैं।। ४७ ।।'
यद् ब्रूयाद्धि हृषीकेशो राजानमपराजितम् ।
अर्जुनं भीमसेनं च सर्वे कुर्युंरसंशयम् ॥ ४८ ॥
'भगवान् श्रीकृष्ण किसीसे पराजित न होनेवाले राजा युधिष्ठिर, अर्जुन और भीमसेनसे जो कुछ भी कहेंगे, वे सब लोग उसे निःसंदेह स्वीकार कर लेंगे ।।'
नातिक्रमिष्यते कृष्णो वचनं कौरवस्य तु ।
धृतराष्ट्रस्य मन्येऽहं नापि कृष्णस्य पाण्डवः ॥ ४९ ॥
'कुरुराज धृतराष्ट्रकी बात श्रीकृष्ण नहीं टालेंगे और श्रीकृष्णकी आज्ञाका उल्लंघन युधिष्ठिर नहीं कर सकेंगे, ऐसा मेरा विश्वास है ।। ४९ ।।'
एतत् क्षेममहं मन्ये न च पार्थैश्च विग्रहम् ।
न त्वां ब्रवीमि कार्पण्यान्न प्राणपरिरक्षणात् ॥ ५० ॥
पथ्यं राजन् ब्रवीमि त्वां तत्परासुः स्मरिष्यसि ।
'राजन्! मैं इस संधिको ही तुम्हारे लिये कल्याणकारी मानता हूँ। पाण्डवोंके साथ किये जानेवाले युद्धको नहीं। मैं कायरता या प्राण-रक्षाकी भावनासे यह सब नहीं कहता हूँ। तुम्हारे हितकी बात बता रहा हूँ। तुम मरणासन्न अवस्थामें मेरी यह बात याद करोगे ।। ५० १/२ ।।'
इति वृद्धो विलप्यैतत् कृपः शारद्वतो वचः ।
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य शुशोच च मुमोह च ॥ ५१ ॥
शरद्वान्के पुत्र वृद्ध कृपाचार्य इस प्रकार विलाप करके गरम-गरम लंबी साँस खींचते हुए शोक और मोहके वशीभूत हो गये ।। ५१ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि कृपवाक्ये चतुर्थोऽध्यायः ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें कृपाचार्यका वचनविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ ॥ ४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2464)
पञ्चमोऽध्यायः
दुर्योधनका कृपाचार्यको उत्तर देते हुए सन्धि स्वीकार न करके युद्धका ही निश्चय करना
संजय उवाच
एवमुक्तस्ततो राजा गौतमेन तपस्विना ।
निःश्वस्य दीर्घमुष्णं च तूष्णीमासीद् विशाम्पते ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**प्रजानाथ! तपस्वी कृपाचार्यके ऐसा कहनेपर दुर्योधन जोर-जोरसे गरम साँस खींचता हुआ कुछ देरतक चुपचाप बैठा रहा ॥ १ ॥
ततो मुहूर्तं स ध्यात्वा धार्तराष्ट्रो महामनाः ।
कृपं शारद्वतं वाक्यमित्युवाच परंतपः ॥ २ ॥
दो घड़ीतक सोच-विचार करनेके पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले आपके उस महामनस्वी पुत्रने शरदद्वान्के पुत्र कृपाचार्यको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ २ ॥
यत् किंचित् सुहृदा वाच्यं तत् सर्वं श्रावितो ह्यहम् ।
कृतं च भवता सर्वं प्राणान् संत्यज्य युध्यता ॥ ३ ॥
‘विप्रवर! एक हितैषी सुहृद्को जो कुछ कहना चाहिये, वह सब आपने कह सुनाया। इतना ही नहीं, आपने प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध करते हुए मेरी भलाईके लिये सब कुछ किया है ॥ ३ ॥
गाहमानमनीकानि युध्यमानं महारथैः ।
पाण्डवैरतितेजोभिर्लोकस्त्वामनुदृष्टवान् ॥ ४ ॥
‘सब लोगोंने आपको शत्रुओंकी सेनाओंमें घुसते और अत्यन्त तेजस्वी महारथी पाण्डवोंके साथ युद्ध करते हुए बारंबार देखा है ॥ ४ ॥
सुहृदा यदिदं वाक्यं भवता श्रावितो ह्यहम् ।
न मां प्रीणाति तत् सर्वं मुमूर्षोरिव भेषजम् ॥ ५ ॥
‘आप मेरे हितचिन्तक सुहृद् हैं तो भी आपने मुझे जो बात सुनायी है, वह सब मेरे मनको उसी तरह पसंद नहीं आती, जैसे मरणासन्न रोगीको दवा अच्छी नहीं लगती है ॥ ५ ॥
हेतुकारणसंयुक्तं हितं वचनमुत्तमम् ।
उच्यमानं महाबाहो न मे विप्राग्र्य रोचते ॥ ६ ॥
‘महाबाहो! विप्रवर! आपने युक्ति और कारणोंसे सुसंगत, हितकारक एवं उत्तम बात कही है तो भी वह मुझे अच्छी नहीं लग रही है ॥ ६ ॥
राज्याद् विनिकृतोऽस्माभिः कथं सोऽस्मासु विश्वसेत् ।
अक्षद्यूते च नृपतिर्जितोऽस्माभिर्महाधनः ॥ ७ ॥
स कथं मम वाक्यानि श्रद्दध्याद् भूय एव तु ।
‘हमलोगोंने राजा युधिष्ठिरके साथ छल किया है। वे महाधनी थे, हमने उन्हें जूएमं जीतकर निर्धन बना दिया। ऐसी दशामें वे हमलोगोंपर विश्वास कैसे कर सकते हैं? हमारी बातोंपर उन्हें फिर श्रद्धा कैसे हो सकती है? ॥
तथा दौत्येन सम्प्राप्तः कृष्णः पार्थहिते रतः ॥ ८ ॥
प्रलब्धश्च हृषीकेशस्तच्च कर्माविचारितम् ।
स च मे वचनं ब्रह्मन् कथमेवाभिमन्यते ॥ ९ ॥
‘ब्रह्मन्! पाण्डवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले श्रीकृष्ण मेरे यहाँ दूत बनकर आये थे, किंतु मैंने उन हृषीकेशके साथ धोखा किया। मेरा वह कर्म अविचारपूर्ण था। भला, अब वे मेरी बात कैसे मानेंगे? ॥ ८-९ ॥
विललाप च यत् कृष्णा सभामध्ये समेयुषी ।
न तन्मर्षयते कृष्णो न राज्यहरणं तथा ॥ १० ॥
‘सभामें बलात् लायी हुई द्रौपदीने जो विलाप किया था तथा पाण्डवोंका जो राज्य छीन लिया गया था, वह बर्ताव श्रीकृष्ण सहन नहीं कर सकते ॥ १० ॥
एकप्राणावुभौ कृष्णावन्योन्यमभिसंश्रितौ ।
पुरा यच्छ्रुतमेवासीदद्य पश्यामि तत् प्रभो ॥ ११ ॥
‘प्रभो! श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों दो शरीर और एक प्राण हैं। वे दोनों एक-दूसरेके आश्रित हैं। पहले जो बात मैंने केवल सुन रखी थी, उसे अब प्रत्यक्ष देख रहा हूँ ॥
स्वस्त्रीयं निहतं श्रुत्वा दुःखं स्वपिति केशवः ।
कृतागसो वयं तस्य स मदर्थं कथं क्षमेत् ॥ १२ ॥
‘अपने भानजे अभिमन्युके मारे जानेका समाचार सुनकर श्रीकृष्ण सुखकी नींद नहीं सोते हैं। हम सब लोग उनके अपराधी हैं, फिर वे हमें कैसे क्षमा कर सकते हैं? ॥
अभिमन्योर्विनाशेन न शर्म लभतेऽर्जुनः ।
स कथं मद्विते यत्नं प्रकरिष्यति याचितः ॥ १३ ॥
‘अभिमन्युके मारे जानेसे अर्जुनको भी चैन नहीं है, फिर वे प्रार्थना करनेपर भी मेरे हितके लिये कैसे यत्न करेंगे? ॥ १३ ॥
मध्यमः पाण्डवस्तीक्ष्णो भीमसेनो महाबलः ।
प्रतिज्ञातं च तेनोग्रं भज्येतापि न संनमेत् ॥ १४ ॥
‘मझले पाण्डव महाबली भीमसेनका स्वभाव बड़ा ही कठोर है। उन्होंने बड़ी भयंकर प्रतिज्ञा की है। सूखे काठकी तरह वे टूट भले ही जायें, झुक नहीं सकते ॥ १४ ॥
उभौ तौ बद्धनिस्त्रिंशावुभौ चाबद्धकङ्कटौ ।
कृतवैरावुभौ वीरौ यमावपि यमोपमौ ॥ १५ ॥
‘दोनों भाई नकुल और सहदेव तलवार बाँधे और कवच धारण किये हुए यमराजके समान भयंकर जान पड़ते हैं। वे दोनों वीर मुझसे वैर मानते हैं ॥ १५ ॥
धृष्टद्युम्नः शिखण्डी च कृतवैरौ मया सह ।
तौ कथं मद्धिते यत्नं कुर्यातां द्विजसत्तम ॥ १६ ॥
‘द्विजश्रेष्ठ! धृष्टद्युम्न और शिखण्डीने भी मेरे साथ वैर बाँध रखा है, फिर वे दोनों मेरे हितके लिये कैसे यत्न कर सकते हैं? ॥ १६ ॥
दुःशासनेन यत् कृष्णा एकवस्त्रा रजस्वला ।
परिक्लिष्टा सभामध्ये सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ १७ ॥
तथा विवसनां दीनां स्मरन्त्यद्यापि पाण्डवाः ।
‘द्रौपदी एक वस्त्र पहने हुए थी, रजस्वला थी। उस अवस्थामें जो वह भरी सभामें लायी गयी और दुःशासनने सब लोगोंके सामने जो उसे महान् क्लेश पहुँचाया, उसका जो वस्त्र उतारा गया और उसे जो दयनीय दशाको पहुँचा दिया गया, उन सब बातोंको पाण्डव आज भी याद रखते हैं ॥ १७१/२ ॥
न निवारयितुं शक्याः संग्रामात्ते परंतपाः ॥ १८ ॥
यदा च द्रौपदी क्लिष्टा मद्विनाशाय दुःखिता ।
स्थण्डिले नित्यदा शेते यावद् वैरस्य यातनम् ॥ १९ ॥
‘इसलिये अब उन शत्रुसंतापी वीरोंको युद्धसे रोका नहीं जा सकता। जबसे द्रौपदीको क्लेश दिया गया, तबसे वह दुःखी हो मेरे विनाशका संकल्प लेकर प्रतिदिन मिट्टीकी वेदीपर सोया करती है। जबतक वैरका पूरा बदला न चुका लिया जाय, तबतकके लिये उसने यह व्रत ले रखा है ॥ १८-१९ ॥
उग्रं तेपे तपः कृष्णा भर्तॄणामर्थसिद्धये ।
निक्षिप्य मानं दर्पं च वासुदेवसहोदरा ॥ २० ॥
कृष्णायाः प्रेष्यवद् भूत्वा शुश्रूषां कुरुते सदा ।
इति सर्वं समुन्नद्धं न निर्वाति कथञ्चन ॥ २१ ॥
‘द्रौपदी अपने पतियोंके अभीष्ट मनोरथकी सिद्धिके लिये बड़ी कठोर तपस्या करती है और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी सगी बहन सुभद्रा मान और अभिमानको दूर फेंककर सदा दासीकी भाँति द्रौपदीकी सेवा करती है। इस प्रकार इन सारे कार्योंके रूपमें वैरकी आग प्रज्वलित हो उठी है, जो किसी प्रकार बुझ नहीं सकती ॥
अभिमन्योर्विनाशेन स संधेयः कथं मया ।
कथं च राजा भुक्त्वेमां पृथिवीं सागराम्बराम् ॥ २२ ॥
पाण्डवानां प्रसादेन भोक्ष्ये राज्यमहं कथम् ।