भारतकोश
संग्रह पर लौटें

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 2844)

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

इन्द्रतीर्थ, रामतीर्थ, यमुनातीर्थ और आदित्यतीर्थकी महिमा

वैशम्पायन उवाच

इन्द्रतीर्थं ततो गत्वा यदूनां प्रवरो बलः ।
विप्रेभ्यो धनरत्नानि ददौ स्नात्वा यथाविधि ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! वहाँसे इन्द्र-तीर्थमें जाकर स्नान करके यदुकुलतिलक बलरामजीने ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक धन और रत्नोंका दान किया ॥ १ ॥

तत्र ह्यमरराजोऽसावीजे क्रतुशतेन च ।
बृहस्पतेश्च देवेशः प्रददौ विपुलं धनम् ॥ २ ॥
उस तीर्थमें देवेश्वर देवराज इन्द्रने सौ यज्ञोंका अनुष्ठान किया था और बृहस्पतिजीको प्रचुर धन दिया था ॥

निरर्गलान् सजारूथ्यान् सर्वान् विविधदक्षिणान् ।
आजहार क्रतूंस्तत्र यथोक्तान् वेदपारगैः ॥ ३ ॥
नाना प्रकारकी दक्षिणाओंसे युक्त एवं पुष्ट उन सभी शास्त्रोक्त यज्ञोंको इन्द्रने वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मणोंके साथ बिना किसी विघ्न-बाधाके वहाँ पूर्ण कर लिया ॥ ३ ॥

तान् क्रतून् भरतश्रेष्ठ शतकृत्वो महाद्युतिः ।
पूरयामास विधिवत् ततः ख्यातः शतक्रतुः ॥ ४ ॥
भरतश्रेष्ठ! महातेजस्वी इन्द्रने उन यज्ञोंको सौ बार विधिपूर्वक पूर्ण किया, इसलिये इन्द्र शतक्रतु नामसे विख्यात हो गये ॥ ४ ॥

तस्य नाम्ना च तत् तीर्थं शिवं पुण्यं सनातनम् ।
इन्द्रतीर्थमिति ख्यातं सर्वपापप्रमोचनम् ॥ ५ ॥
उन्हींके नामसे वह सर्वपापापहारी, कल्याणकारी एवं सनातन पुण्य तीर्थ ‘इन्द्रतीर्थ’ कहलाने लगा ॥ ५ ॥

उपस्पृश्य च तत्रापि विधिवन्मुसलायुधः ।
ब्राह्मणान् पूजयित्वा च सदाच्छादनभोजनैः ॥ ६ ॥
शुभं तीर्थवरं तस्माद् रामतीर्थं जगाम ह ।
मुसलधारी बलरामजी वहाँ भी विधिपूर्वक स्नान तथा उत्तम भोजन-वस्त्रद्वारा ब्राह्मणोंका पूजन करके वहाँसे शुभ तीर्थप्रवर रामतीर्थमें चले गये ॥ ६½ ॥

यत्र रामो महाभागो भार्गवः सुमहातपाः ॥ ७ ॥
असकृत् पृथिवीं जित्वा हतक्षत्रियपुङ्गवाम् ।
उपाध्यायं पुरस्कृत्य कश्यपं मुनिसत्तमम् ॥ ८ ॥

अयजद् वाजपेयेन सोऽश्वमेधशतेन च । प्रददौ दक्षिणां चैव पृथिवीं वै ससागराम् ॥ ९ ॥ जहाँ महातपस्वी भृगुवंशी महाभाग परशुरामजीने बारंबार क्षत्रियनरेशोंका संहार करके इस पृथिवीको जीतनेके पश्चात् मुनिश्रेष्ठ कश्यपको आचार्यरूपसे आगे रखकर वाजपेय तथा एक सौ अश्वमेध-यज्ञद्वारा भगवान्‌का पूजन किया और दक्षिणारूपमें समुद्रोंसहित यह सारी पृथिवी दे दी ॥ ७—९ ॥

दत्त्वा च दानं विविधं नानारत्नसमन्वितम् । सगोहस्तिकदासीकं साजावि गतवान् वनम् ॥ १० ॥ नाना प्रकारके रत्न, गौ, हाथी, दास, दासी और भेड़-बकरोंसहित अनेक प्रकारके दान देकर वे वनमें चले गये ॥ १० ॥

पुण्ये तीर्थवरे तत्र देवब्रह्मर्षिसेविते । मुनींश्चैवाभिवाद्याथ यमुनातीर्थमागमत् ॥ ११ ॥ यत्रानयामास तदा राजसूयं महीपते । पुत्रोऽदितेर्महाभागो वरुणो वै सितप्रभः ॥ १२ ॥ पृथिवीनाथ! देवताओं और ब्रह्मर्षियोंसे सेवित उस उत्तम पुण्यमय तीर्थमें मुनियोंको प्रणाम करके बलरामजी यमुनातीर्थमें आये, जहाँ अदितिके महाभाग पुत्र गौरकान्ति वरुणजीने राजसूय यज्ञका अनुष्ठान किया था ॥ ११-१२ ॥

तत्र निर्जित्य संग्रामे मानुषान् देवतास्तथा । वरं क्रतुं समाजह्रे वरुणः परवीरहा ॥ १३ ॥ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले वरुणने संग्राममें मनुष्यों और देवताओंको जीतकर उस श्रेष्ठ यज्ञका आयोजन किया था ॥ १३ ॥

तस्मिन् क्रतुवरे वृत्ते संग्रामः समजायत । देवानां दानवानां च त्रैलोक्यस्य भयावहः ॥ १४ ॥ राजन्! वह श्रेष्ठ यज्ञ समाप्त होनेपर देवताओं और दानवोंमें घोर संग्राम हुआ था, जो तीनों लोकोंके लिये भयंकर था ॥ १४ ॥

राजसूये क्रतुश्रेष्ठे निवृत्ते जनमेजय । जायते सुमहाघोरः संग्रामः क्षत्रियान् प्रति ॥ १५ ॥ जनमेजय! क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान पूर्ण हो जानेपर उस देशके क्षत्रियोंमें महाभयंकर संग्राम हुआ करता है ॥ १५ ॥

तत्रापि लाङ्गली देव ऋषीनभ्यर्च्य पूजया । इतरेभ्योऽप्यदाद् दानमर्थिभ्यः कामदो विभुः ॥ १६ ॥ सबकी इच्छा पूर्ण करनेवाले भगवान् हलधरने उस तीर्थमें भी स्नान एवं ऋषियोंका पूजन करके अन्य याचकोंको भी धन दान किया ॥ १६ ॥

वनमाली ततो हृष्टः स्तूयमानो महर्षिभिः । तस्मादादित्यतीर्थं च जगाम कमलेक्षणः ॥ १७ ॥

तदनन्तर महर्षियोंके मुखसे अपनी स्तुति सुनकर प्रसन्न हुए वनमालाधारी कमलनयन बलराम वहाँसे आदित्यतीर्थमें गये ॥ १७ ॥

यत्रेष्ट्वा भगवान् ज्योतिर्भास्करो राजसत्तम । ज्योतिषामाधिपत्यं च प्रभावं चाभ्यपद्यत ॥ १८ ॥

नृपश्रेष्ठ! वहीं यज्ञ करके ज्योतिर्मय भगवान् भास्करने ज्योतियोंका आधिपत्य एवं प्रभुत्व प्राप्त किया था ॥ १८ ॥

तस्या नद्यास्तु तीरे वै सर्वे देवाः सवासवाः । विश्वेदेवाः समरुतो गन्धर्वाप्सरसश्च ह ॥ १९ ॥ द्वैपायनः शुकश्चैव कृष्णश्च मधुसूदनः । यक्षाश्च राक्षसाश्चैव पिशाचाश्च विशाम्पते ॥ २० ॥ एते चान्ये च बहवो योगसिद्धाः सहस्रशः ।

प्रजानाथ! उसी नदीके तटपर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता, विश्वेदेव, मरुद्गण, गन्धर्व, अप्सराएँ, द्वैपायन व्यास, शुकदेव, मधुसूदन श्रीकृष्ण, यक्ष, राक्षस एवं पिशाच—ये तथा और भी बहुत-से पुरुष सहस्रोंकी संख्यामें योगसिद्ध हो गये हैं ॥ १९-२० १/२ ॥

तस्मिंस्तीर्थे सरस्वत्याः शिवे पुण्ये परंतप ॥ २१ ॥ तत्र हत्वा पुरा विष्णुरसुरौ मधुकैटभौ । आप्लुत्य भरतश्रेष्ठ तीर्थप्रवर उत्तमे ॥ २२ ॥ द्वैपायनश्च धर्मात्मा तत्रैवाप्लुत्य भारत । सम्प्राप्य परमं योगं सिद्धिं च परमां गतः ॥ २३ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले भरतश्रेष्ठ! सरस्वतीके उस परम उत्तम कल्याणकारी पुण्यतीर्थमें पहले मधु और कैटभ नामक असुरोंका वध करके भगवान् विष्णुने स्नान किया था। भारत! इसी प्रकार धर्मात्मा द्वैपायन व्यासने भी उसी तीर्थमें गोता लगाया था। इससे उन्होंने परम योगको पाकर उत्तम सिद्धि प्राप्त कर ली ॥

असितो देवलश्चैव तस्मिन्नेव महातपाः । परमं योगमास्थाय ऋषियोगमवाप्तवान् ॥ २४ ॥

महातपस्वी असित देवल ऋषिने उसी तीर्थमें परम योगका आश्रय ले योगसिद्धि पायी थी ॥ २४ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने एकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४९ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2848)

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चाशत्तमोऽध्यायः

आदित्यतीर्थकी महिमाके प्रसंगमें असित देवल तथा जैगीषव्य मुनिका चरित्र

वैशम्पायन उवाच

तस्मिन्नेव तु धर्मात्मा वसति स्म तपोधनः ।
गार्हस्थ्यं धर्ममास्थाय ह्यसितो देवलः पुरा ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! प्राचीन कालकी बात है, उसी तीर्थमें तपस्याके धनी धर्मात्मा असित देवल मुनि गृहस्थधर्मका आश्रय लेकर निवास करते थे ॥ १ ॥
धर्मनित्यः शुचिर्दान्तो न्यस्तदण्डो महातपाः ।
कर्मणा मनसा वाचा समः सर्वेषु जन्तुषु ॥ २ ॥
वे सदा धर्मपरायण, पवित्र, जितेन्द्रिय, किसीको भी दण्ड न देनेवाले, महातपस्वी तथा मन, वाणी और क्रियाद्वारा सभी जीवोंके प्रति समानभाव रखनेवाले थे ॥ २ ॥
अक्रोधनो महाराज तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ।
प्रियाप्रिये तुल्यवृत्तिर्यमवत्समदर्शनः ॥ ३ ॥
महाराज! उनमें क्रोध नहीं था। वे अपनी निन्दा और स्तुतिको समान समझते थे। प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिमें उनकी चित्तवृत्ति एक-सी रहती थी। वे यमराजकी भाँति सबके प्रति सम दृष्टि रखते थे ॥ ३ ॥
काञ्चने लोष्ठभावे च समदर्शी महातपाः ।
देवान्पूजयन्नित्यमतिथींश्च द्विजैः सह ॥ ४ ॥
सोना हो या मिट्टीका ढेला, महातपस्वी देवल दोनोंको समान दृष्टिसे देखते थे और प्रतिदिन देवताओं तथा ब्राह्मणोंसहित अतिथियोंका पूजन एवं आदर-सत्कार करते थे ॥ ४ ॥
ब्रह्मचर्यरतो नित्यं सदा धर्मपरायणः ।
ततोऽभ्येत्य महाभाग योगमास्थाय भिक्षुकः ॥ ५ ॥
जैगीषव्यो मुनिर्धीमांस्तस्मिंस्तीर्थे समाहितः ।
वे मुनि सदा ब्रह्मचर्यपालनमें तत्पर रहते थे। उन्हें सब समय धर्मका ही सबसे बड़ा सहारा था। महाभाग! एक दिन बुद्धिमान् जैगीषव्य मुनि जो संन्यासी थे, योगका आश्रय लेकर उस तीर्थमें आये और एकाग्रचित्त होकर वहीं रहने लगे ॥ ५½ ॥
देवलस्याश्रमे राजन्यवसत् स महाद्युतिः ॥ ६ ॥
योगनित्यो महाराज सिद्धिं प्राप्तो महातपाः ।

राजन्! महाराज! वे महातेजस्वी और महातपस्वी जैगीषव्य सदा योगपरायण रहकर सिद्धि प्राप्त कर चुके थे तथा देवलके ही आश्रममें रहते थे ॥ ६१/२ ॥

तं तत्र वसमानं तु जैगीषव्यं महामुनिम् ॥ ७ ॥
देवलो दर्शयन्नेव नैवायुञ्जत धर्मतः।
एवं तयोर्महाराज दीर्घकालो व्यतिक्रमत् ॥ ८ ॥
यद्यपि महामुनि जैगीषव्य उस आश्रममें ही रहते थे तथापि देवल मुनि उन्हें दिखाकर धर्मतः योग-साधना नहीं करते थे। इस तरह दोनोंको वहाँ रहते हुए बहुत समय बीत गया ॥ ७-८ ॥

जैगीषव्यं मुनिवरं न ददर्शाथ देवलः।
आहारकाले मतिमान् परिव्राड् जनमेजय ॥ ९ ॥
उपातिष्ठत धर्मज्ञो भैक्षकाले स देवलम्।
जनमेजय! तदनन्तर कुछ कालतक ऐसा हुआ कि देवल मुनिवर जैगीषव्यको हर समय नहीं देख पाते थे। धर्मके ज्ञाता बुद्धिमान् संन्यासी जैगीषव्य केवल भोजन या भिक्षा लेनेके समय देवलके पास आते थे ॥ ९१/२ ॥

स दृष्ट्वा भिक्षुरूपेण प्राप्तं तत्र महामुनिम् ॥ १० ॥
गौरवं परमं चक्रे प्रीतिं च विपुलां तथा।
देवलस्तु यथाशक्ति पूजयामास भारत ॥ ११ ॥
ऋषिदृष्टेन विधिना समा बह्वीः समाहितः।
भारत! संन्यासीके रूपमें वहाँ आये हुए महामुनि जैगीषव्यको देखकर देवल उनके प्रति अत्यन्त गौरव और महान् प्रेम प्रकट करते तथा यथाशक्ति शास्त्रीय विधिसे एकाग्रचित्त हो उनका पूजन (आदर-सत्कार) किया करते थे। बहुत वर्षोंतक उन्होंने ऐसा ही किया ॥

कदाचित् तस्य नृपते देवलस्य महात्मनः ॥ १२ ॥
चिन्ता सुमहती जाता मुनिं दृष्ट्वा महाद्युतिम्।
नरेश्वर! एक दिन महातेजस्वी जैगीषव्य मुनिको देखकर महात्मा देवलके मनमें बड़ी भारी चिन्ता हुई ॥

समास्तु समतिक्रान्ता बह्व्यः पूजयतो मम ॥ १३ ॥
न चायमलसो भिक्षुरभ्यभाषत किंचन।
उन्होंने सोचा, 'इनकी पूजा करते हुए मुझे बहुत वर्ष बीत गये; परंतु वे आलसी भिक्षु आजतक एक बात भी नहीं बोले' ॥ १३१/२ ॥

एवं विगणयन्नेव स जगाम महोदधिम् ॥ १४ ॥
अन्तरिक्षचरः श्रीमान् कलशं गृह्य देवलः।
यही सोचते हुए श्रीमान् देवलमुनि कलश हाथमें लेकर आकाशमार्गसे समुद्रतटकी ओर चल दिये ॥ १४१/२ ॥

गच्छन्नेव स धर्मात्मा समुद्रं सरितां पतिम् ॥ १५ ॥
जैगीषव्यं ततोऽपश्यद् गतं प्रागेव भारत ।
भारत! नदीपति समुद्रके पास पहुँचते ही धर्मात्मा देवलने देखा कि जैगीषव्य वहाँ पहलेसे ही गये हैं ॥

ततः सविस्मयश्चिन्तां जगामाथामितप्रभः ॥ १६ ॥
कथं भिक्षुरयं प्राप्तः समुद्रे स्नात एव च ।
इत्येवं चिन्तयामास महर्षिरसितस्तदा ॥ १७ ॥
तब तो अमित तेजस्वी महर्षि असित देवलको चिन्ताके साथ-साथ आश्चर्य भी हुआ। वे सोचने लगे, ‘ये भिक्षु यहाँ पहले ही कैसे आ पहुँचे? इन्होंने तो समुद्रमें स्नानका कार्य भी पूर्ण कर लिया’ ॥ १६-१७ ॥

स्नात्वा समुद्रे विधिवच्छुचिर्जप्यं जजाप सः ।
कृतजप्याह्निकः श्रीमाना श्रमं च जगाम ह ॥ १८ ॥
कलशं जलपूर्णं वै गृहीत्वा जनमेजय ।
जनमेजय! फिर उन्होंने समुद्रमें विधिपूर्वक स्नान करके पवित्र हो जपनेयोग्य मन्त्रका जप किया। जप आदि नित्यकर्म पूर्ण करके श्रीमान् देवल जलसे भरा हुआ कलश लेकर अपने आश्रमपर आये ॥ १८½ ॥

ततः स प्रविशन्नेव स्वमाश्रमपदं मुनिः ॥ १९ ॥
आसीनमाश्रमे तत्र जैगीषव्यमपश्यत ।
न व्याहरति चैवेनं जैगीषव्यः कथंचन ॥ २० ॥
काष्ठभूतोऽश्रमपदे वसति स्म महातपाः ।
आश्रममें प्रवेश करते ही देवलमुनिने वहाँ बैठे हुए जैगीषव्यको देखा, परंतु जैगीषव्यने उस समय भी किसी तरह उनसे बात नहीं की। वे महातपस्वी मुनि आश्रमपर काष्ठमौन होकर बैठे हुए थे ॥ १९-२०½ ॥

तं दृष्ट्वा चाप्लुतं तोये सागरे सागरोपमम् ॥ २१ ॥
प्रविष्टमाश्रमं चापि पूर्वमेव ददर्श सः ।
असितो देवलो राजंश्चिन्तयामास बुद्धिमान् ॥ २२ ॥
राजन्! समुद्रके समान अत्यन्त प्रभावशाली मुनिको समुद्रके जलमें स्नान करके अपनेसे पहले ही आश्रममें प्रविष्ट हुआ देख बुद्धिमान् असित देवलको पुनः बड़ी चिन्ता हुई ॥ २१-२२ ॥

दृष्ट्वा प्रभावं तपसो जैगीषव्यस्य योगजम् ।
चिन्तयामास राजेन्द्र तदा स मुनिसत्तमः ॥ २३ ॥
मया दृष्टः समुद्रे च आश्रमे च कथं त्वयम् ।

राजेन्द्र! जैगीषव्यकी तपस्याका वह योगजनित प्रभाव देखकर ये मुनिश्रेष्ठ देवल फिर सोचने लगे—'मैंने इन्हें अभी-अभी समुद्रतटपर देखा है, फिर ये आश्रममें कैसे उपस्थित हैं?' ॥ २३ १/२ ॥ एवं विगणयन्नेव स मुनिर्मन्त्रपारगः ॥ २४ ॥ उत्पपाताश्रमात् तस्मादन्तरिक्षं विशाम्पते । जिज्ञासार्थं तदा भिक्षोर्जैगीषव्यस्य देवलः ॥ २५ ॥ प्रजानाथ! ऐसा विचार करते हुए वे मन्त्रशास्त्रके पारंगत विद्वान् मुनि उस आश्रमसे आकाशकी ओर उड़ चले। उस समय भिक्षु जैगीषव्यकी परीक्षा लेनेके लिये उन्होंने ऐसा किया ॥ २४-२५ ॥ सोऽन्तरिक्षचरान् सिद्धान् समपश्यत् समाहितान् । जैगीषव्यं च तैः सिद्धैः पूज्यमानमपश्यत ॥ २६ ॥ ऊपर जाकर उन्होंने बहुत-से अन्तरिक्षचारी एकाग्रचित्तवाले सिद्धोंको देखा। साथ ही उन सिद्धोंके द्वारा पूजे जाते हुए जैगीषव्य मुनिका भी उन्हें दर्शन हुआ ॥ ततोऽसितः सुसंरब्धो व्यवसायी दृढव्रतः । अपश्यद् वै दिवं यान्तं जैगीषव्यं स देवलः ॥ २७ ॥ तदनन्तर दृढ़तापूर्वक व्रतका पालन करनेवाले दृढ़निश्चयी असित देवल मुनि रोषावेशमें भर गये। फिर उन्होंने जैगीषव्यको स्वर्गलोकमें जाते देखा ॥ २७ ॥ तस्मात् तु पितृलोकं तं व्रजन्तं सोऽन्वपश्यत । पितृलोकाच्च तं यान्तं याम्यं लोकमपश्यत ॥ २८ ॥ स्वर्गलोकसे उन्हें पितृलोकमें और पितृलोकसे यमलोकमें जाते देखा ॥ २८ ॥ तस्मादपि समुत्पत्य सोमलोकमभिप्लुतम् । व्रजन्तमन्वपश्यत् स जैगीषव्यं महामुनिम् ॥ २९ ॥ वहाँसे भी ऊपर उठकर महामुनि जैगीषव्य जलमय चन्द्रलोकमें जाते दिखायी दिये ॥ २९ ॥ लोकान् समुत्पतन्तं तु शुभानेकान्तयाजिनाम् । ततोऽग्निहोत्रिणां लोकांस्ततश्चाप्युत्पपात ह ॥ ३० ॥ फिर वे एकान्ततः यज्ञ करनेवाले पुरुषोंके उत्तम लोकोंकी ओर उड़ते दिखायी दिये। वहाँसे वे अग्निहोत्रियोंके लोकोंमें गये ॥ ३० ॥ दर्शं च पौर्णमासं च ये यजन्ति तपोधनाः । तेभ्यः स ददृशे धीमाँल्लोकेभ्यः पशुयाजिनाम् ॥ ३१ ॥ उन लोकोंसे ऊपर उठकर वे बुद्धिमान् मुनि उन तपोधनोंके लोकमें गये, जो दर्श और पौर्णमास यज्ञ करते हैं। वहाँसे वे पशुयाग करनेवालोंके लोकोंमें जाते दिखायी दिये ॥ ३१ ॥

व्रजन्तं लोकममलपश्यद् देवपूजितम् ।
चातुर्मास्यैर्बहुविधैर्यजन्ते ये तपोधनाः ॥ ३२ ॥
जो तपस्वी नाना प्रकारके चातुर्मास यज्ञ करते हैं, उनके निर्मल लोकोंमें जाते हुए जैगीषव्यको देवल मुनिने देखा। वे वहाँ देवताओंसे पूजित हो रहे थे ॥ ३२ ॥
तेषां स्थानं ततो यातं तथाग्निष्टोमयाजिनाम् ।
अग्निष्टुतेन च तथा ये यजन्ति तपोधनाः ॥ ३३ ॥
तत् स्थानमनुसम्प्राप्तमन्वपश्यत देवलः ।
वहाँसे अग्निष्टोमयाजी तथा अग्निष्टुत् यज्ञके द्वारा यज्ञ करनेवाले तपोधनोंके लोकमें पहुँचे हुए जैगीषव्यको देवल मुनिने देखा ॥ ३३ १/२ ॥
वाजपेयं क्रतुवरं तथा बहुसुवर्णकम् ॥ ३४ ॥
आहरन्ति महाप्राज्ञास्तेषां लोकेष्वपश्यत ।
जो महाप्राज्ञ पुरुष बहुत-सी सुवर्णमयी दक्षिणाओंसे युक्त क्रतुश्रेष्ठ वाजपेय यज्ञका अनुष्ठान करते हैं, उनके लोकोंमें भी उन्होंने जैगीषव्यका दर्शन किया ॥ ३४ १/२ ॥
यजन्ते राजसूयेन पुण्डरीकेण चैव ये ॥ ३५ ॥
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः ।
जो राजसूय और पुण्डरीक यज्ञके द्वारा यजन करते हैं, उनके लोकोंमें भी देवलने जैगीषव्यको देखा ॥ ३५ १/२ ॥
अश्वमेधं क्रतुवरं नरमेधं तथैव च ॥ ३६ ॥
आहरन्ति नरश्रेष्ठास्तेषां लोकेष्वपश्यत ।
जो नरश्रेष्ठ क्रतुओंमें उत्तम अश्वमेध तथा नरमेधका अनुष्ठान करते हैं, उनके लोकोंमें भी उनका दर्शन किया ॥ ३६ १/२ ॥
सर्वमेधं च दुष्प्रापं तथा सौत्रामणिं च ये ॥ ३७ ॥
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः ।
जो लोग दुर्लभ सर्वमेध तथा सौत्रामणि यज्ञ करते हैं, उनके लोकोंमें भी देवलने जैगीषव्यको देखा ॥
द्वादशाहैश्च सत्रैश्च यजन्ते विविधैर्नृप ॥ ३८ ॥
तेषां लोकेष्वपश्यच्च जैगीषव्यं स देवलः ।
नरेश्वर! जो नाना प्रकारके द्वादशाह यज्ञोंका अनुष्ठान करते हैं, उनके लोकोंमें भी देवलने जैगीषव्यका दर्शन किया ॥
मैत्रावरुणयोर्लोकानादित्यानां तथैव च ॥ ३९ ॥
सलोकतामनुप्राप्तमपश्यत ततोऽसितः ।

तत्पश्चात् असितने मित्र, वरुण और आदित्योंके लोकोंमें पहुँचे हुए जैगीषव्यको देखा ।। ३९ १/२ ।।

रुद्राणां च वसूनां च स्थानं यच्च बृहस्पतेः ।। ४० ।।
तानि सर्वाण्यतीतानि समपश्यत् ततोऽसितः ।
तदनन्तर रुद्र, वसु और बृहस्पतिके जो स्थान हैं, उन सबको लाँघकर ऊपर उठे हुए जैगीषव्यका असित देवलने दर्शन किया ।। ४० १/२ ।।

आरुह्य च गवां लोकं प्रयातो ब्रह्मसत्रिणाम् ।। ४१ ।।
लोकानपश्यद् गच्छन्तं जैगीषव्यं ततोऽसितः ।
इसके बाद असितने गौओंके लोकमें जाकर जैगीषव्यको ब्रह्मसत्र करनेवालोंके लोकोंमें जाते देखा ।।

त्रींल्लोकानपरान् विप्रमुत्पतन्तं स्वतेजसा ।। ४२ ।।
पतिव्रतानां लोकांश्च व्रजन्तं सोऽन्वपश्यत ।
तत्पश्चात् देवलने देखा कि विप्रवर जैगीषव्य मुनि अपने तेजसे ऊपर-ऊपरके तीन लोकोंको लाँघकर पतिव्रताओंके लोकमें जा रहे हैं ।। ४२ १/२ ।।

ततो मुनिवरं भूयो जैगीषव्यमथासितः ।। ४३ ।।
नान्वपश्यत लोकस्थमन्तर्हितमरिंदम ।
शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश! इसके बाद असितने मुनिवर जैगीषव्यको पुनः किसी लोकमें स्थित नहीं देखा। वे अदृश्य हो गये थे ।। ४३ १/२ ।।

सोऽचिन्तयन्महाभागो जैगीषव्यस्य देवलः ।। ४४ ।।
प्रभावं सुव्रतत्वं च सिद्धिं योगस्य चातुलाम् ।
तत्पश्चात् महाभाग देवलने जैगीषव्यके प्रभाव, उत्तम व्रत और अनुपम योगसिद्धिके विषयमें विचार किया ।।

असितोऽपृच्छत तदा सिद्धाँल्लोकेषु सत्तमान् ।। ४५ ।।
प्रयतः प्राञ्जलिर्भूत्वा धीरस्तान् ब्रह्मसत्रिणः ।
जैगीषव्यं न पश्यामि तं शंसध्वं महौजसम् ।। ४६ ।।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं परं कौतूहलं हि मे ।
इसके बाद धैर्यवान् असितने उन लोकोंमें रहनेवाले ब्रह्मयाजी सिद्धों और साधु पुरुषोंसे हाथ जोड़कर विनीतभावसे पूछा—'महात्माओ! मैं महातेजस्वी जैगीषव्यको अब देख नहीं रहा हूँ। आप उनका पता बतावें। मैं उनके विषयमें सुनना चाहता हूँ। इसके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है' ।। ४५-४६ १/२ ।।

सिद्धा ऊचुः
शृणु देवल भूतार्थं शंसतां नो दृढव्रत ।। ४७ ।।

जैगीषव्यः स वै लोकं शाश्वतं ब्रह्मणो गतः ।
**सिद्धोंने कहा—**दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाले देवल! सुनो। हम तुम्हें वह बात बता रहे हैं, जो हो चुकी है। जैगीषव्य मुनि सनातन ब्रह्मलोकमें जा पहुँचे हैं ॥ ४७ १/२ ॥

वैशम्पायन उवाच

स श्रुत्वा वचनं तेषां सिद्धानां ब्रह्मसत्रिणाम् ॥ ४८ ॥
असितो देवलस्तूर्णमुत्पपात पपात च ।
ततः सिद्धास्त ऊचुर्हि देवलं पुनरेव ह ॥ ४९ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! उन ब्रह्मयाजी सिद्धोंकी बात सुनकर देवलमुनि तुरंत ऊपरकी ओर उछले, परंतु नीचे गिर पड़े। तब उन सिद्धोंने पुनः देवलसे कहा —॥ ४८-४९ ॥

न देवलगतिस्तत्र तव गन्तुं तपोधन ।
ब्रह्मणः सदने विप्र जैगीषव्यो यदाप्तवान् ॥ ५० ॥
‘तपोधन देवल! विप्रवर! जहाँ जैगीषव्य गये हैं, उस ब्रह्मलोकमें जानेकी शक्ति तुममें नहीं है’ ॥ ५० ॥

वैशम्पायन उवाच

तेषां तद् वचनं श्रुत्वा सिद्धानां देवलः पुनः ।
आनुपूर्व्येण लोकांस्तान् सर्वानवततार ह ॥ ५१ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! उन सिद्धोंकी बात सुनकर देवलमुनि पुनः क्रमशः उन सभी लोकोंमें होते हुए नीचे उतर आये ॥ ५१ ॥

स्वमाश्रमपदं पुण्यमाजगाम पतत्त्रिवत् ।
प्रविशन्नेव चापश्यज्जैगीषव्यं स देवलः ॥ ५२ ॥
पक्षीकी तरह उड़ते हुए वे अपने पुण्यमय आश्रमपर आ पहुँचे। आश्रमके भीतर प्रवेश करते ही देवलने जैगीषव्य मुनिको वहाँ बैठा देखा ॥ ५२ ॥

ततो बुद्ध्या व्यगणयद् देवलो धर्मयुक्तया ।
दृष्ट्वा प्रभावं तपसो जैगीषव्यस्य योगजम् ॥ ५३ ॥
तब देवलने जैगीषव्यकी तपस्याका वह योगजनित प्रभाव देखकर धर्मयुक्त बुद्धिसे उसपर विचार किया ॥ ५३ ॥

ततोऽब्रवीन्महात्मानं जैगीषव्यं स देवलः ।
विनयावनतो राजन्नुपसर्प्य महामुनिम् ॥ ५४ ॥
राजन्! इसके बाद महामुनि महात्मा जैगीषव्यके पास जाकर देवलने विनीतभावसे कहा— ॥ ५४ ॥

मोक्षधर्मं समास्थातुमिच्छेयं भगवन्नहम् ।
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा उपदेशं चकार सः ॥ ५५ ॥
विधिं च योगस्य परं कार्याकार्यस्य शास्त्रतः ।
संन्यासकृतबुद्धिं तं ततो दृष्ट्वा महातपाः ॥ ५६ ॥
सर्वाश्चास्य क्रियाश्चक्रे विधिदृष्टेन कर्मणा ।
‘भगवन्! मैं मोक्षधर्मका आश्रय लेना चाहता हूँ।’ उनकी वह बात सुनकर महातपस्वी जैगीषव्यने उनका संन्यास लेनेका विचार जानकर उन्हें ज्ञानका उपदेश किया। साथ ही योगकी उत्तम विधि बताकर शास्त्रके अनुसार कर्तव्य-अकर्तव्यका भी उपदेश दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने शास्त्रीय विधिके अनुसार उनके संन्यासग्रहणसम्बन्धी समस्त कार्य (दीक्षा और संस्कार आदि) किये ॥ ५५-५६ ½ ॥

संन्यासकृतबुद्धिं तं भूतानि पितृभिः सह ॥ ५७ ॥
ततो दृष्ट्वा प्ररुरुदुः कोऽस्मान् संविभजिष्यति ।
उनका संन्यास लेनेका विचार जानकर पितरोंसहित समस्त प्राणी यह कहते हुए रोने लगे ‘कि अब हमें कौन विभागपूर्वक अन्नदान करेगा’ ॥ ५७ ½ ॥

देवलस्तु वचः श्रुत्वा भूतानां करुणं तथा ॥ ५८ ॥
दिशो दश व्याहरतां मोक्षं त्यक्तुं मनो दधे ।
दसों दिशाओंमें विलाप करते हुए उन प्राणियोंका करुणायुक्त वचन सुनकर देवलने मोक्षधर्म (संन्यास)-को त्याग देनेका विचार किया ॥ ५८ ½ ॥

ततस्तु फलमूलानि पवित्राणि च भारत ॥ ५९ ॥
पुष्पाण्योषधयश्चैव रोरूयन्ति सहस्रशः ।
पुनर्नो देवलः क्षुद्रो नूनं छेत्स्यति दुर्मतिः ॥ ६० ॥
अभयं सर्वभूतेभ्यो यो दत्त्वा नावबुध्यते ।
भारत! यह देख फल-मूल, पवित्री (कुश), पुष्प और ओषधियाँ—ये सहस्रों पदार्थ यह कहकर बारंबार रोने लगे कि ‘यह खोटी बुद्धिवाला क्षुद्र देवल निश्चय ही फिर हमारा उच्छेद करेगा। तभी तो यह सम्पूर्ण भूतोंको अभयदान देकर भी अब अपनी प्रतिज्ञाको स्मरण नहीं करता है’ ॥ ५९-६० ½ ॥

ततो भूयो व्यगणयत् स्वबुद्ध्या मुनिसत्तमः ॥ ६१ ॥
मोक्षे गार्हस्थ्यधर्मे वा किं नु श्रेयस्करं भवेत् ।
तब मुनिश्रेष्ठ देवल पुनः अपनी बुद्धिसे विचार करने लगे, मोक्ष और गार्हस्थ्यधर्म इनमेंसे कौन-सा मेरे लिये श्रेयस्कर होगा ॥ ६१ ½ ॥

इति निश्चित्य मनसा देवलो राजसत्तम ॥ ६२ ॥
त्यक्त्वा गार्हस्थ्यधर्मं स मोक्षधर्ममरोचयत् ।

नृपश्रेष्ठ! देवलने मन-ही-मन इस बातपर निश्चित विचार करके गार्हस्थ्यधर्मको त्यागकर अपने लिये मोक्षधर्मको पसंद किया ॥ ६२१/२ ॥
एवमादीनि संचिन्त्य देवलो निश्चयात् ततः ॥ ६३ ॥
प्राप्तवान् परमां सिद्धिं परं योगं च भारत ।
भारत! इन सब बातोंको सोच-विचारकर देवलने जो संन्यास लेनेका ही निश्चय किया, उससे उन्होंने परमसिद्धि और उत्तम योगको प्राप्त कर लिया ॥ ६३१/२ ॥
ततो देवाः समागम्य बृहस्पतिपुरोगमाः ॥ ६४ ॥
जैगीषव्ये तपश्चास्य प्रशंसन्ति तपस्विनः ।
तब बृहस्पति आदि सब देवता और तपस्वी वहाँ आकर जैगीषव्य मुनिके तपकी प्रशंसा करने लगे ॥ ६४१/२ ॥
अथाब्रवीदृषिवरो देवान् वै नारदस्तथा ॥ ६५ ॥
जैगीषव्ये तपो नास्ति विस्मापयति योऽसितम् ।
तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ नारदने देवताओंसे कहा—'जैगीषव्यमें तपस्या नहीं है; क्योंकि ये असित मुनिको अपना प्रभाव दिखाकर आश्चर्यमें डाल रहे हैं' ॥ ६५१/२ ॥
तमेवंवादिनं धीरं प्रत्यूचुस्ते दिवौकसः ॥ ६६ ॥
नैवमित्येव शंसन्तो जैगीषव्यं महामुनिम् ।
नातः परतरं किंचित् तुल्यमस्ति प्रभावतः ॥ ६७ ॥
तेजसस्तपसश्चास्य योगस्य च महात्मनः ।
ऐसा कहनेवाले ज्ञानी नारदमुनिको देवताओंने महामुनि जैगीषव्यकी प्रशंसा करते हुए इस प्रकार उत्तर दिया—'आपको ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये; क्योंकि प्रभाव, तेज, तपस्या और योगकी दृष्टिसे इन महात्मासे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है' ॥ ६६-६७१/२ ॥
एवं प्रभावो धर्मात्मा जैगीषव्यस्तथासितः ।
तयोरिदं स्थानवरं तीर्थं चैव महात्मनोः ॥ ६८ ॥
धर्मात्मा जैगीषव्य तथा असितमुनिका ऐसा ही प्रभाव था। उन दोनों महात्माओंका यह श्रेष्ठ स्थान ही तीर्थ है ॥
तत्राप्युपस्पृश्य ततो महात्मा
दत्त्वा च वित्तं हलभृद् द्विजेभ्यः ।
अवाप्य धर्मं परमार्थकर्मा
जगाम सोमस्य महत् सुतीर्थम् ॥ ६९ ॥
पारमार्थिक कर्म करनेवाले महात्मा हलधर वहाँ भी स्नान करके ब्राह्मणोंको धन-दान दे धर्मका फल पाकर सोमके महान् एवं उत्तम तीर्थमें गये ॥ ६९ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५० ॥

सारस्वततीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दधीच ऋषि और सारस्वत मुनिके चरित्रका वर्णन

⬅ विषय-सूची (TOC)

एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

सारस्वततीर्थकी महिमाके प्रसंगमें दधीच ऋषि और सारस्वत मुनिके चरित्रका वर्णन

वैशम्पायन उवाच

यत्रेजिवानुडुपती राजसूयेन भारत ।
तस्मिंस्तीर्थे महानासीत् संग्रामस्तारकामयः ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—भरतनन्दन! वही सोम-तीर्थ है, जहाँ नक्षत्रोंके स्वामी चन्द्रमाने राजसूययज्ञ किया था। उसी तीर्थमें महान् तारकामय संग्राम हुआ था ।। १ ।।

तत्राप्युपस्पृश्य बले दत्त्वा दानानि चात्मवान् ।
सारस्वतस्य धर्मात्मा मुनेस्तीर्थं जगाम ह ।। २ ।।
धर्मात्मा एवं मनस्वी बलरामजी उस तीर्थमें भी स्नान एवं दान करके सारस्वत मुनिके तीर्थमें गये ।। २ ।।

तत्र द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजोत्तमान् ।
वेदानध्यापयामास पुरा सारस्वतो मुनिः ।। ३ ।।
प्राचीनकालमें जब बारह वर्षोंतक अनावृष्टि हो गयी थी, सारस्वत मुनिने वहीं उत्तम ब्राह्मणोंको वेदाध्ययन कराया था ।। ३ ।।

जनमेजय उवाच

कथं द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजोत्तमान् ।
ऋषीनध्यापयामास पुरा सारस्वतो मुनिः ।। ४ ।।
जनमेजयने पूछा—मुने! प्राचीनकालमें सारस्वत मुनिने बारह वर्षोंकी अनावृष्टिके समय उत्तम ब्राह्मणोंको किस प्रकार वेदोंका अध्ययन कराया था? ।। ४ ।।

वैशम्पायन उवाच

आसीत् पूर्वं महाराज मुनिर्धीमान् महातपाः ।
दधीच इति विख्यातो ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।। ५ ।।
वैशम्पायनजीने कहा—महाराज! पूर्वकालमें एक बुद्धिमान् महातपस्वी मुनि रहते थे, जो ब्रह्मचारी और जितेन्द्रिय थे। उनका नाम था दधीच ।। ५ ।।

तस्यातितपसः शक्रो बिभेति सततं विभो ।
न स लोभयितुं शक्यः फलैर्बहुविधैरपि ।। ६ ।।
प्रभो! उनकी भारी तपस्यासे इन्द्र सदा डरते रहते थे। नाना प्रकारके फलोंका प्रलोभन देनेपर भी उन्हें लुभाया नहीं जा सकता था ।। ६ ।।

प्रलोभनार्थं तस्याथ प्राहिणोत् पाकशासनः । दिव्यामप्सरसं पुण्यां दर्शनीयामलम्बुषाम् ॥ ७ ॥ तब इन्द्रने मुनिको लुभानेके लिये एक पवित्र दर्शनीय एवं दिव्य अप्सरा भेजी, जिसका नाम था अलम्बुषा ॥ ७ ॥ तस्य तर्पयतो देवान् सरस्वत्यां महात्मनः । समीपतो महाराज सोपातिष्ठत भाविनी ॥ ८ ॥ महाराज! एक दिन, जब महात्मा दधीच सरस्वती नदीमें देवताओंका तर्पण कर रहे थे, वह माननीय अप्सरा उनके पास जाकर खड़ी हो गयी ॥ ८ ॥ तां दिव्यवपुषं दृष्ट्वा तस्यर्षेर्भावितात्मनः । रेतः स्कन्नं सरस्वत्यां तत् सा जग्राह निम्नगा ॥ ९ ॥ उस दिव्यरूपधारिणी अप्सराको देखकर उन विशुद्ध अन्तःकरणवाले महर्षिका वीर्य सरस्वतीके जलमें गिर पड़ा। उस वीर्यको सरस्वती नदीने स्वयं ग्रहण कर लिया ॥ ९ ॥ कुक्षौ चाप्यदधाद् हृष्टा तद् रेतः पुरुषर्षभ । सा दधार च तं गर्भं पुत्रहेतोर्महानदी ॥ १० ॥ पुरुषप्रवर! उस महानदीने हर्षमें भरकर पुत्रके लिये उस वीर्यको अपनी कुक्षिमें रख लिया और इस प्रकार वह गर्भवती हो गयी ॥ १० ॥ सुषुवे चापि समये पुत्रं सा सरितां वरा । जगाम पुत्रमादाय तमृषिं प्रति च प्रभो ॥ ११ ॥ प्रभो! समय आनेपर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीने एक पुत्रको जन्म दिया और उसे लेकर वह ऋषिके पास गयी ॥ ११ ॥ ऋषिसंसदि तं दृष्ट्वा सा नदी मुनिसत्तमम् । ततः प्रोवाच राजेन्द्र ददती पुत्रमस्य तम् ॥ १२ ॥ राजेन्द्र! ऋषियोंकी सभामें बैठे हुए मुनिश्रेष्ठ दधीचको देखकर उन्हें उनका वह पुत्र सौंपती हुई सरस्वती नदी इस प्रकार बोली— ॥ १२ ॥ ब्रह्मर्षे तव पुत्रोऽयं त्वद्भक्त्या धारितो मया । दृष्ट्वा तेऽप्सरसं रेतो यत् स्कन्नं प्रागलम्बुषाम् ॥ १३ ॥ तत् कुक्षिणा वै ब्रह्मर्षे त्वद्भक्त्या धृतवत्यहम् । न विनाशमिदं गच्छेत् त्वत्तेज इति निश्चयात् ॥ १४ ॥ प्रतिगृहीष्व पुत्रं स्वं मया दत्तमनिन्दितम् ।

‘ब्रह्मर्षे! यह आपका पुत्र है। इसे आपके प्रति भक्ति होनेके कारण मैंने अपने गर्भमें धारण किया था। ब्रह्मर्षे! पहले अलम्बुषा नामक अप्सराको देखकर जो आपका वीर्य स्खलित हुआ था, उसे आपके प्रति भक्ति होनेके कारण मैंने अपने गर्भमें धारण कर लिया था; क्योंकि मेरे मनमें यह विचार हुआ था कि आपका यह तेज नष्ट न होने पावे। अतः आप मेरे दिये हुए अपने इस अनिन्दनीय पुत्रको ग्रहण कीजिये’ ।। १३-१४ १/२ ।।

इत्युक्तः प्रतिजग्राह प्रीतिं चावाप पुष्कलाम् ।। १५ ।।
स्वसुतं चाप्यजिघ्रत् तं मूर्ध्नि प्रेम्णा द्विजोत्तमः ।
परिष्वज्य चिरं कालं तदा भरतसत्तम ।। १६ ।।
सरस्वत्यै वरं प्रादात् प्रीयमाणो महामुनिः ।
विश्वेदेवाः सपितरो गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।। १७ ।।
तृप्तिं यास्यन्ति सुभगे तर्प्यमाणास्तवाम्भसा ।
उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उस पुत्रको ग्रहण कर लिया और वे बड़े प्रसन्न हुए। भरतभूषण! उन द्विजश्रेष्ठने बड़े प्रेमसे अपने उस पुत्रका मस्तक सूँघा और दीर्घ-कालतक छातीसे लगाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए महामुनिने सरस्वतीको वर दिया—‘सुभगे! तुम्हारे जलसे तर्पण करनेपर विश्वेदेव, पितृगण तथा गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदाय सभी तृप्ति-लाभ करेंगे’ ।। १५-१७ १/२ ।।

इत्युक्त्वा स तु तुष्टाव वचोभिर्वै महानदीम् ।। १८ ।।
प्रीतः परमहृष्टात्मा यथावच्छृणु पार्थिव ।
राजन्! ऐसा कहकर अत्यन्त हर्षोत्फुल्ल हृदयसे मुनिने प्रेमपूर्वक उत्तम वाणीद्वारा सरस्वती देवीका स्तवन किया। उस स्तुतिको तुम यथार्थरूपसे सुनो ।। १८ १/२ ।।

प्रसुतासि महाभागे सरसो ब्रह्मणः पुरा ।। १९ ।।
जानन्ति त्वां सरिच्छ्रेष्ठे मुनयः संशितव्रताः ।
मम प्रियकरी चापि सततं प्रियदर्शने ।। २० ।।
तस्मात् सारस्वतः पुत्रो महांस्ते वरवर्णिनि ।
तवैव नाम्ना प्रथितः पुत्रस्ते लोकभावनः ।। २१ ।।
‘महाभागे! तुम पूर्वकालमें ब्रह्माजीके सरोवरसे प्रकट हुई हो। सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती! कठोर व्रतका पालन करनेवाले मुनि तुम्हारी महिमाको जानते हैं। प्रियदर्शने! तुम सदा मेरा भी प्रिय करती रही हो; अतः वरवर्णिनि! तुम्हारा यह लोकभावन महान् पुत्र तुम्हारे ही नामपर ‘सारस्वत’ कहलायेगा ।। १९—२१ ।।

सारस्वत इति ख्यातो भविष्यति महातपाः ।
एष द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां द्विजर्षभान् ।। २२ ।।
सारस्वतो महाभागे वेदानध्यापयिष्यति ।

'यह सारस्वत नामसे विख्यात महातपस्वी होगा। महाभागे! इस संसारमें बारह वर्षोंतक जब वर्षा बंद हो जायगी, उस समय यह सारस्वत ही श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको वेद पढ़ायेगा ।। २२ १/२ ।। पुण्याभ्यश्च सरिद्भ्यस्त्वं सदा पुण्यतमा शुभे ।। २३ ।। भविष्यसि महाभागे मत्प्रसादात् सरस्वति । 'शुभे! महासौभाग्यशालिनी सरस्वति! तुम मेरे प्रसादसे अन्य पवित्र सरिताओंकी अपेक्षा सदा ही अधिक पवित्र बनी रहोगी' ।। २३ १/२ ।। एवं सा संस्तुतानेन वरं लब्ध्वा महानदी ।। २४ ।। पुत्रमादाय मुदिता जगाम भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार उनके द्वारा प्रशंसित हो वर पाकर वह महानदी पुत्रको लेकर प्रसन्नतापूर्वक चली गयी ।। २४ १/२ ।। एतस्मिन्नेव काले तु विरोधे देवदानवैः ।। २५ ।। शक्रः प्रहरणान्वेषी लोकांस्त्रीन् विचचार ह । इसी समय देवताओं और दानवोंमें विरोध होने-पर इन्द्र अस्त्र-शस्त्रोंकी खोजके लिये तीनों लोकोंमें विचरण करने लगे ।। २५ १/२ ।। न चोपलेभे भगवान् शक्रः प्रहरणं तदा ।। २६ ।। यद्धैतेषां भवेद् योग्यं वधाय विबुधद्विषाम् । परंतु भगवान् शक्र उस समय ऐसा कोई हथियार न पा सके, जो उन देवद्रोहियोंके वधके लिये उपयोगी हो सके ।। २६ १/२ ।। ततोऽब्रवीत् सुरान् शक्रो न मे शक्या महासुराः ।। २७ ।। ऋतेऽस्थिभिर्दधीचस्य निहन्तुं त्रिदशद्विषः । तदनन्तर इन्द्रने देवताओंसे कहा—'दधीच मुनिकी अस्थियोंके सिवा और किसी अस्त्र-शस्त्रसे मेरे द्वारा देवद्रोही महान् असुर नहीं मारे जा सकते ।। २७ १/२ ।। तस्माद् गत्वा ऋषिश्रेष्ठो याच्यतां सुरसत्तमाः ।। २८ ।। दधीचास्थीनि देहीति तैर्वधिष्यामहे रिपून् । 'अतः सुरश्रेष्ठगण! तुमलोग जाकर मुनिवर दधीचसे याचना करो कि आप अपनी हड्डियाँ हमें दे दें। हम उन्हींके द्वारा अपने शत्रुओंका वध करेंगे' ।। २८ १/२ ।। स च तैर्याचितोऽस्थीनि यत्नादृषिवरस्तदा ।। २९ ।। प्राणत्यागं कुरुश्रेष्ठ चकारैवाविचारयन् । स लोकानक्षयान् प्राप्तो देवप्रियकरस्तदा ।। ३० ।। कुरुश्रेष्ठ! देवताओंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक अस्थियोंके लिये याचना की जानेपर मुनिवर दधीचने बिना कोई विचार किये अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया। उस समय देवताओंका

प्रिय करनेके कारण वे अक्षय लोकोंमें चले गये ॥ २९-३० ॥ तस्यास्थिभिरथो शक्रः सम्प्रहृष्टमनास्तदा । कारयामास दिव्यानि नानाप्रहरणानि च ॥ ३१ ॥ गदावज्राणि चक्राणि गुरून् दण्डांश्च पुष्कलान् । तब इन्द्रने प्रसन्नचित्त होकर दधीचकी हड्डियोंसे गदा, वज्र, चक्र और बहुसंख्यक भारी दण्ड आदि नाना प्रकारके दिव्य आयुध तैयार कराये ॥ ३१ १/२ ॥ स हि तीव्रेण तपसा सम्भृतः परमर्षिणा ॥ ३२ ॥ प्रजापतिसुतेनाथ भृगुणा लोकभावनः । अतिकायः स तेजस्वी लोकसारो विनिर्मितः ॥ ३३ ॥ ब्रह्माजीके पुत्र महर्षि भृगुने तीव्र तपस्यासे भरे हुए लोकमंगलकारी विशालकाय एवं तेजस्वी दधीचको उत्पन्न किया था। ऐसा जान पड़ता था, मानो सम्पूर्ण जगत्के सारतत्त्वसे उनका निर्माण किया गया हो ॥ ३२-३३ ॥ जज्ञे शैलगुरुः प्रांशुर्महिम्ना प्रथितः प्रभुः । नित्यमुद्विजते चास्य तेजसः पाकशासनः ॥ ३४ ॥ वे पर्वतके समान भारी और ऊँचे थे। अपनी महत्ताके लिये वे सामर्थ्यशाली मुनि सर्वत्र विख्यात थे। पाकशासन इन्द्र उनके तेजसे सदा उद्विग्न रहते थे ॥ ३४ ॥ तेन वज्रेण भगवान् मन्त्रयुक्तेन भारत । भृशं क्रोधविसृष्टेन ब्रह्मतेजोद्भवेन च ॥ ३५ ॥ दैत्यदानववीराणां जघान नवतीर्नव । भरतनन्दन! ब्रह्मतेजसे प्रकट हुए उस वज्रको मन्त्रोच्चारणके साथ अत्यन्त क्रोधपूर्वक छोड़कर भगवान् इन्द्रने आठ सौ दस दैत्य-दानव वीरोंका वध कर डाला ॥ ३५ १/२ ॥ अथ काले व्यतिक्रान्ते महत्यतिभयंकरे ॥ ३६ ॥ अनावृष्टिरनुप्राप्ता राजन् द्वादशवार्षिकी । राजन्! तदनन्तर सुदीर्घ काल व्यतीत होनेपर जगत्में बारह वर्षोंतक स्थिर रहनेवाली अत्यन्त भयंकर अनावृष्टि प्राप्त हुई ॥ ३६ १/२ ॥ तस्यां द्वादशवार्षिक्यामनावृष्ट्यां महर्षयः ॥ ३७ ॥ वृत्त्यर्थं प्राद्रवन् राजन् क्षुधार्ताः सर्वतोदिशम् । नरेश्वर! बारह वर्षोंकी उस अनावृष्टिमें सब महर्षि भूखसे पीड़ित हो जीविकाके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें दौड़ने लगे ॥ ३७ १/२ ॥ दिग्भ्यस्तान् प्रद्रुतान् दृष्ट्वा मुनिः सारस्वतस्तदा ॥ ३८ ॥ गमनाय मतिं चक्रे तं प्रोवाच सरस्वती । सम्पूर्ण दिशाओंसे भागकर इधर-उधर जाते हुए उन महर्षियोंको देखकर सारस्वत मुनिने भी वहाँसे अन्यत्र जानेका विचार किया। तब सरस्वतीदेवीने उनसे कहा ।।

न गन्तव्यमितः पुत्र तवाहारमहं सदा ॥ ३९ ॥ दास्यामि मत्स्यप्रवरानुष्यतामिह भारत। भरतनन्दन! सरस्वती इस प्रकार बोलीं—‘बेटा! तुम्हें यहाँसे कहीं नहीं जाना चाहिये। मैं सदा तुम्हें भोजनके लिये उत्तमोत्तम मछलियाँ दूँगी; अतः तुम यहीं रहो’॥

इत्युक्तस्तर्पयामास स पितॄन् देवतास्तथा ॥ ४० ॥ आहारमकरोन्नित्यं प्राणान् वेदांश्च धारयन्। सरस्वतीके ऐसा कहनेपर सारस्वत मुनि वहीं रहकर देवताओं और पितरोंको तृप्त करने लगे। वे प्रतिदिन भोजन करते और अपने प्राणों तथा वेदोंकी रक्षा करते थे॥ ४० १/२ ॥

अथ तस्यामनावृष्ट्यामतीतायां महर्षयः ॥ ४१ ॥ अन्योन्यं परिपप्रच्छुः पुनः स्वाध्यायकारणात्। जब बारह वर्षोंकी वह अनावृष्टि प्रायः बीत गयी, तब महर्षि पुनः स्वाध्यायके लिये एक-दूसरेसे पूछने लगे॥ ४१ १/२ ॥

तेषां क्षुधापरीतानां नष्टा वेदाभिधावताम् ॥ ४२ ॥ सर्वेषामेव राजेन्द्र न कश्चित् प्रतिभानवान्। राजेन्द्र! उस समय भूखसे पीड़ित होकर इधर-उधर दौड़नेवाले सभी महर्षि वेद भूल गये थे। कोई भी ऐसा प्रतिभाशाली नहीं था, जिसे वेदोंका स्मरण रह गया हो॥ ४२ १/२ ॥

अथ कश्चिदृषिस्तेषां सारस्वतमुपेयिवान् ॥ ४३ ॥ कुर्वाणं संशितात्मानं स्वाध्यायमृषिसत्तमम्। तदनन्तर उनमेंसे कोई ऋषि प्रतिदिन स्वाध्याय करनेवाले शुद्धात्मा मुनिवर सारस्वतके पास आये॥

स गत्वाऽऽचष्ट तेभ्यश्च सारस्वतमतिप्रभम् ॥ ४४ ॥ स्वाध्यायममरप्रख्यं कुर्वाणं विजने वने। फिर वहाँसे जाकर उन्होंने सब महर्षियोंको बताया कि ‘देवताओंके समान अत्यन्त कान्तिमान् एक सारस्वत मुनि हैं, जो निर्जन वनमें रहकर सदा स्वाध्याय करते हैं’॥

ततः सर्वे समाजग्मुस्तत्र राजन् महर्षयः ॥ ४५ ॥ सारस्वतं मुनिश्रेष्ठमिदमूचुः समागताः। अस्मानध्यापयस्वेति तानुवाच ततो मुनिः ॥ ४६ ॥ शिष्यत्वमुपगच्छध्वं विधिवद्द्वि ममेत्युत। राजन्! यह सुनकर वे सब महर्षि वहाँ आये और आकर मुनिश्रेष्ठ सारस्वतसे इस प्रकार बोले—‘मुने! आप हम लोगोंको वेद पढ़ाइये।’ तब सारस्वतने उनसे कहा—‘आपलोग विधिपूर्वक मेरी शिष्यता ग्रहण करें’॥

तत्राब्रुवन् मुनिगणा बालस्त्वमसि पुत्रक ॥ ४७ ॥