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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

नान्यथा प्रकरिष्यन्ति धर्मात्मानो हि पाण्डवाः ॥ ३७ ॥
‘मेरे कहनेपर भी वे मेरे धर्मयुक्त वचनकी अवहेलना नहीं करेंगे; क्योंकि वीर पाण्डव धर्मात्मा हैं’ ॥ ३७ ॥
इत्यहं विलपन् सूत बहुशः पुत्रमुक्तवान् ।
न च मे श्रुतवान् मूढो मन्ये कालस्य पर्ययम् ॥ ३८ ॥
सूत! इस प्रकार विलाप करते हुए मैंने अपने पुत्र दुर्योधनसे बहुत कुछ कहा, परंतु उस मूर्खने मेरी एक नहीं सुनी। अतः मैं समझता हूँ कि कालचक्रने पलटा खाया है ॥ ३८ ॥
वृकोदरार्जुनौ यत्र वृष्णिवीरश्च सात्यकिः ।
उत्तमौजाश्च पाञ्चाल्यो युधामन्युश्च दुर्जयः ॥ ३९ ॥
धृष्टद्युम्नश्च दुर्धर्षः शिखण्डी चापराजितः ।
अश्मकाः केकयाश्चैव क्षत्रधर्मा च सौमकिः ॥ ४० ॥
चैद्यश्च चेकितानश्च पुत्रः काश्यस्य चाभिभूः ।
द्रौपदेया विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥ ४१ ॥
यमौ च पुरुषव्याघ्रौ मन्त्री च मधुसूदनः ।
क एताञ्जातु युध्येत लोकेऽस्मिन् वै जिजीविषुः ॥ ४२ ॥
जिस पक्षमें भीमसेन, अर्जुन, वृष्णिवीर सात्यकि, पांचालवीर उत्तमौजा, दुर्जय युधामन्यु, दुर्धर्ष धृष्टद्युम्न, अपराजित वीर शिखण्डी, अश्मक, केकयराजकुमार, सोमकपुत्र क्षत्रधर्मा, चेदिराज धृष्टकेतु, चेकितान, काशिराजके पुत्र अभिभू, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, राजा विराट और महारथी द्रुपद हैं, जहाँ पुरुषसिंह नकुल, सहदेव और मन्त्रदाता मधुसूदन हैं, वहाँ इस संसारमें कौन ऐसा वीर है, जो जीवित रहनेकी इच्छा रखकर इन वीरोंके साथ कभी युद्ध करेगा ॥ ३९—४२ ॥
दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणान् प्रसहेद् वा परान् मम ।
अन्यो दुर्योधनात् कर्णाच्छकुनेश्चापि सौबलात् ॥ ४३ ॥
दुःशासनचतुर्थानां नान्यं पश्यामि पञ्चमम् ।
अथवा दुर्योधन, कर्ण, सुबलपुत्र शकुनि तथा चौथे दुःशासनके सिवा मैं पाँचवें किसी ऐसे वीरको नहीं देखता, जो दिव्यास्त्र प्रकट करनेवाले मेरे इन शत्रुओंका वेग सह सके ॥ ४३ १/२ ॥
येषामभीषुहस्तः स्याद् विष्वक्सेनो रथे स्थितः ॥ ४४ ॥
संनद्धश्चार्जुनो योद्धा तेषां नास्ति पराजयः ।
रथपर बैठे हुए भगवान् श्रीकृष्ण हाथोंमें बागडोर लेकर जितना सारथ्य करते हैं तथा जिनकी ओरसे कवचधारी अर्जुन युद्ध करनेवाले हैं, उनकी कभी पराजय नहीं हो सकती ॥ ४४ १/२ ॥
तेषामथ विलापानां नायं दुर्योधनः स्मरेत् ॥ ४५ ॥

हतौ हि पुरुषव्याघ्रौ भीष्मद्रोणौ त्वमात्थ वै ।
संजय! यह दुर्योधन मेरे उन विलापोंको कभी याद नहीं करेगा। तुम कहते हो कि 'पुरुषसिंह भीष्म और द्रोणाचार्य मारे गये' ।। ४५ १/२ ।।
तेषां विदुरवाक्यानामुक्तानां दीर्घदर्शनात् ।। ४६ ।।
दृष्ट्वेमां फलनिर्वृत्तिं मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।
सेनां दृष्ट्वाभिभूतां मे शैनेयेनार्जुनेन च ।। ४७ ।।
विदुरने भविष्यमें होनेवाली दूरतककी घटनाओंको ध्यानमें रखकर जो बातें कही थीं, उन्हींके अनुसार इस समय हमें यह फल मिल रहा है। इसे देखकर मैं यह समझता हूँ कि मेरे पुत्र सात्यकि और अर्जुनके द्वारा अपनी सेनाका संहार देखते हुए शोक कर रहे होंगे ।। ४६-४७ ।।
शून्यान् दृष्ट्वा रथोपस्थान् मन्ये शोचन्ति पुत्रकाः ।
हिमात्यये यथा कक्षं शुष्कं वातेरितो महान् ।। ४८ ।।
अग्निर्दहेत् तथा सेनां मामिकां स धनंजयः ।
आचक्ष्व मम तत् सर्वं कुशलो ह्यसि संजयः ।। ४९ ।।
बहुत-से रथोंकी बैठकोंको रथियोंसे शून्य देखकर मेरे पुत्र शोकमें डूब गये होंगे; ऐसा मेरा विश्वास है। जैसे ग्रीष्म-ऋतुमें वायुका सहारा पाकर बढ़ी हुई अग्नि सूखे घासको जला डालती है, उसी प्रकार अर्जुन मेरी सेनाको दग्ध कर डालेंगे। संजय! तुम कथा कहनेमें कुशल हो; अतः युद्धका सारा समाचार मुझसे कहो ।। ४८-४९ ।।
यदुपयात सायाह्ने कृत्वा पार्थस्य किल्बिषम् ।
अभिमन्यौ हते तात कथमासीन्मनो हि वः ।। ५० ।।
तात! जब तुमलोग अभिमन्युके मारे जानेपर अर्जुनका महान् अपराध करके सायंकालमें शिविरको लौटे थे, उस समय तुम्हारे मनकी क्या अवस्था थी? ।। ५० ।।
न जातु तस्य कर्माणि युधि गाण्डीवधन्वनः ।
अपकृत्य महत् तात सोढुं शक्ष्यन्ति मामकाः ।। ५१ ।।
तात! गाण्डीवधारी अर्जुनका महान् अपकार करके मेरे पुत्र युद्धमें उनके पराक्रमको कभी नहीं सह सकेंगे ।।
किन्नु दुर्योधनः कृत्यं कर्णः कृत्यं किमब्रवीत् ।
दुःशासनः सौबलश्च तेषामेवं गतेष्वपि ।। ५२ ।।
उस समय उनकी ऐसी अवस्था होनेपर भी दुर्योधनने कौन-सा कर्तव्य निश्चित किया? कर्ण, दुःशासन तथा शकुनिने क्या करनेकी सलाह दी? ।। ५२ ।।
सर्वेषां समवेतानां पुत्राणां मम संजय ।
यद् वृत्तं तात संग्रामे मन्दस्यापनयैर्भृशम् ।। ५३ ।।
लोभानुगस्य दुर्बुद्धेः क्रोधेन विकृतात्मनः ।

राज्यकामस्य मूढस्य रागोपहतचेतसः ।
दुर्णीतं वा सुनीतं वा तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ५४ ॥
तात संजय! युद्धमें मेरे मूर्ख पुत्र दुर्योधनके अत्यन्त अन्यायसे एकत्र हुए मेरे अन्य सभी पुत्रोंपर जो कुछ बीता था तथा लोभका अनुसरण करनेवाले, क्रोधसे विकृत चित्तवाले, रागसे दूषित हृदयवाले, राज्यकामी मूढ़ और दुर्बुद्धि दुर्योधनने जो न्याय अथवा अन्याय किया हो, वह सब मुझसे कहो ॥ ५३-५४ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि धृतराष्ट्रवाक्ये
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें धृतराष्ट्रवाक्यविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 564)

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षडशीतितमोऽध्यायः

संजयका धृतराष्ट्रको उपालम्भ

संजय उवाच

हन्त ते सम्प्रवक्ष्यामि सर्वं प्रत्यक्षदर्शिवान् ।
शुश्रूषस्व स्थिरो भूत्वा तव ह्यपनयो महान् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! मैंने सब कुछ प्रत्यक्ष देखा है, वह सब आपको अभी बताऊँगा। स्थिर होकर सुननेकी इच्छा कीजिये। इस परिस्थितिमें आपका महान् अन्याय ही कारण है ॥ १ ॥

गतोदके सेतुबन्धो यादृक् तादृगयं तव ।
विलापो निष्फलो राजन् मा शुचो भरतर्षभ ॥ २ ॥
भरतश्रेष्ठ राजन्! जैसे पानी निकल जानेपर वहाँ पुल बाँधना व्यर्थ है, उसी प्रकार इस समय आपका यह विलाप भी निष्फल है। आप शोक न कीजिये ॥ २ ॥

अनतिक्रमणीयोऽयं कृतान्तस्याद्भुतो विधिः ।
मा शुचो भरतश्रेष्ठ दिष्टमेतत् पुरातनम् ॥ ३ ॥
कालके इस अद्भुत विधानका उल्लंघन करना असम्भव है। भरतभूषण! शोक त्याग दीजिये। यह सब पुरातन प्रारब्धका फल है ॥ ३ ॥

यदि त्वं हि पुरा द्यूतात् कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
निवर्तयेथाः पुत्रांश्च न त्वां व्यसनमाव्रजेत् ॥ ४ ॥
यदि आप कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर तथा अपने पुत्रोंको पहले ही जूएसे रोक देते तो आपपर यह संकट नहीं आता ॥ ४ ॥

युद्धकाले पुनः प्राप्ते तदैव भवता यदि ।
निवर्तिताः स्युः संरब्धा न त्वां व्यसनमाव्रजेत् ॥ ५ ॥
फिर जब युद्धका अवसर आया, उसी समय यदि आपने क्रोधमें भरे हुए अपने पुत्रोंको बलपूर्वक रोक दिया होता तो आपपर यह संकट नहीं आ सकता था ॥

दुर्योधनं चाविधेयं बध्नीतेति पुरा यदि ।
कुरूनचोदयिष्यस्त्वं न त्वां व्यसनमाव्रजेत् ॥ ६ ॥
यदि आप पहले ही कौरवोंको यह आज्ञा दे देते कि इस दुर्विनीत दुर्योधनको कैद कर लो तो आपपर यह संकट नहीं आता ॥ ६ ॥

तत् ते बुद्धिव्यभीचारमुपलप्स्यन्ति पाण्डवाः ।
पञ्चाला वृष्णयः सर्वे ये चान्येऽपि नराधिपाः ॥ ७ ॥

आपकी बुद्धिके वैपरीत्यका फल पाण्डव, पांचाल, समस्त वृष्णिवंशी तथा अन्य जो-जो नरेश हैं, वे सभी भोगेंगे ॥ ७ ॥
स कृत्वा पितृकर्म त्वं पुत्रं संस्थाप्य सत्पथे ।
वर्तेथा यदि धर्मेण न त्वां व्यसनमाव्रजेत् ॥ ८ ॥
यदि आपने अपने पुत्रको सन्मार्गमें स्थापित करके पिताके कर्तव्यका पालन करते हुए धर्मके अनुसार बर्ताव किया होता तो आपपर यह संकट नहीं आता ॥ ८ ॥
त्वं तु प्राज्ञतमो लोके हित्वा धर्मं सनातनम् ।
दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्चान्वगा मतम् ॥ ९ ॥
आप संसारमें बड़े बुद्धिमान् समझे जाते हैं तो भी आपने सनातनधर्मका परित्याग करके दुर्योधन, कर्ण और शकुनिके मतका अनुसरण किया है ॥ ९ ॥
तत् तं विलपितं सर्वं मया राजन् निशामितम् ।
अर्थे निविशमानस्य विषमिश्रं यथा मधु ॥ १० ॥
राजन्! आप स्वार्थमें सने हुए हैं। आपका यह सारा विलाप-कलाप मैंने सुन लिया। यह विषमिश्रित मधुके समान ऊपरसे ही मीठा है (इसके भीतर घातक कटुता भरी हुई है) ॥ १० ॥
नामन्यत तदा कृष्णो राजानं पाण्डवं पुरा ।
न भीष्मं नैव च द्रोणं यथा त्वां मन्यतेऽच्युतः ॥ ११ ॥
अपनी महिमासे च्युत न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण पहले आपका जैसा सम्मान करते थे, वैसा उन्होंने पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिर, भीष्म तथा द्रोणाचार्यका भी समादर नहीं किया है ॥ ११ ॥
अजानात् स यदा तु त्वां राजधर्मादधश्च्युतम् ।
तदाप्रभृति कृष्णस्त्वां न तथा बहु मन्यते ॥ १२ ॥
परंतु जबसे श्रीकृष्णने यह जान लिया है कि आप राजोचित धर्मसे नीचे गिर गये हैं, तबसे वे आपका उस तरह अधिक आदर नहीं करते हैं ॥ १२ ॥
परुषाण्युच्यमानांश्च यथा पार्थानुपेक्षसे ।
तस्यानुबन्धः प्राप्तस्त्वां पुत्राणां राज्यकामुक ॥ १३ ॥
पुत्रोंको राज्य दिलानेकी अभिलाषा रखनेवाले महाराज! कुन्तीके पुत्रोंको कठोर बातें (गालियाँ) सुनायी जाती थीं और आप उनकी उपेक्षा करते थे। आज उसी अन्यायका फल आपको प्राप्त हुआ है ॥ १३ ॥
पितृपैतामहं राज्यमपवृत्तं तदानघ ।
अथ पार्थैर्जितां कृत्स्नां पृथिवीं प्रत्यपद्यथाः ॥ १४ ॥
निष्पाप नरेश! आपने उन दिनों बाप-दादोंके राज्यको तो अपने अधिकारमें कर ही लिया था; फिर कुन्तीके पुत्रोंद्वारा जीती हुई सम्पूर्ण पृथ्वीका विशाल साम्राज्य भी हड़प

लिया ।। १४ ।। पाण्डुना निर्जितं राज्यं कौरवाणां यशस्तथा । ततश्चाप्यधिकं भूयः पाण्डवैर्धर्मचारिभिः ।। १५ ।। राजा पाण्डुने भूमण्डलका राज्य जीता और कौरवोंके यशका विस्तार किया था। फिर धर्मपरायण पाण्डवोंने अपने पितासे भी बढ़-चढ़कर राज्य और सुयशका प्रसार किया है ।। १५ ।।

तेषां तत् तादृशं कर्म त्वामासाद्य सुनिष्फलम् । यत् पित्र्याद् भ्रंशिता राज्यात् त्वयेहामिषगृद्धिना ।। १६ ।। परंतु उनका वैसा महान् कर्म भी आपको पाकर अत्यन्त निष्फल हो गया; क्योंकि आपने राज्यके लोभमें पड़कर उन्हें अपने पैतृक राज्यसे भी वंचित कर दिया ।। १६ ।।

यत् पुनर्युद्धकाले त्वं पुत्रान् गर्हयसे नृप । बहुधा व्याहरन् दोषान् न तदद्योपपद्यते ।। १७ ।। नरेश्वर! आज जब युद्धका अवसर उपस्थित है, ऐसे समयमें जो आप अपने पुत्रोंके नाना प्रकारके दोष बताते हुए उनकी निन्दा कर रहे हैं यह इस समय आपको शोभा नहीं देता है ।। १७ ।।

न हि रक्षन्ति राजानो युध्यन्तो जीवितं रणे । चमूं विगाह्य पार्थानां युध्यन्ते क्षत्रियर्षभाः ।। १८ ।। राजालोग रणक्षेत्रमें युद्ध करते हुए अपने जीवनकी रक्षा नहीं कर रहे हैं। वे क्षत्रियशिरोमणि नरेश पाण्डवोंकी सेनामें घुसकर युद्ध करते हैं ।। १८ ।।

यां तु कृष्णार्जुनौ सेनां यां सात्यकिवृकोदरौ । रक्षेयुन् को नु तां युध्येच्चमूमन्यत्र कौरवैः ।। १९ ।। श्रीकृष्ण, अर्जुन, सात्यकि तथा भीमसेन जिस सेनाकी रक्षा करते हों, उसके साथ कौरवोंके सिवा दूसरा कौन युद्ध कर सकता है? ।। १९ ।।

येषां योद्धा गुडाकेशो येषां मन्त्री जनार्दनः । येषां च सात्यकिर्योद्धा येषां योद्धा वृकोदरः ।। २० ।। को हि तान् विषहेद् योद्धुं मर्त्यधर्मा धनुर्धरः । अन्यत्र कौरवेयेभ्यो ये वा तेषां पदानुगाः ।। २१ ।। जिनके योद्धा गुडाकेश अर्जुन हैं, जिनके मन्त्री भगवान् श्रीकृष्ण हैं तथा जिनकी ओरसे युद्ध करनेवाले योद्धा सात्यकि और भीमसेन हैं, उनके साथ कौरवों तथा उनके चरण-चिह्नोंपर चलनेवाले अन्य नरेशोंको छोड़कर दूसरा कौन मरणधर्मा धनुर्धर युद्ध करनेका साहस कर सकता है? ।। २०-२१ ।।

यावत् तु शक्यते कर्तुमन्तरङ्गैर्जनाधिपैः । क्षत्रधर्मरतैः शूरैस्तावत् कुर्वन्ति कौरवाः ।। २२ ।।

अवसरको जाननेवाले, क्षत्रिय-धर्मपरायण, शूरवीर राजालोग जितना कर सकते हैं, कौरवपक्षी नरेश उतना पराक्रम करते हैं ॥ २२ ॥ यथा तु पुरुषव्याघ्रैर्युद्धं परमसंकटम् ।
कुरूणां पाण्डवैः सार्धं तत् सर्वं शृणु तत्त्वतः ॥ २३ ॥
पुरुषसिंह पाण्डवोंके साथ कौरवोंका जिस प्रकार अत्यन्त संकटपूर्ण युद्ध हुआ है, वह सब आप ठीक-ठीक सुनिये ॥ २३ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि संजयवाक्ये षडशीतितमोऽध्यायः ॥ ८६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें संजयवाक्यविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 568)

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सप्ताशीतितमोऽध्यायः

कौरव-सैनिकोंका उत्साह तथा आचार्य द्रोणके द्वारा चक्रशकटव्यूहका निर्माण

संजय उवाच

तस्यां निशायां व्युष्टायां द्रोणः शस्त्रभृतां वरः।
स्वान्यनीकानि सर्वाणि प्राक्रामद् व्यूहितुं ततः॥ १॥
संजय कहते हैं— राजन्! वह रात बीतनेपर प्रातःकाल शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यने अपनी सारी सेनाओंका व्यूह बनाना आरम्भ किया॥ १॥

शूराणां गर्जतां राजन् संक्रुद्धानाममर्षिणाम्।
श्रूयन्ते स्म गिरश्चित्राः परस्परवधैषिणाम्॥ २॥
राजन्! उस समय अत्यन्त क्रोधमें भरकर एक-दूसरेके वधकी इच्छासे गर्जना करनेवाले अमर्षशील शूरवीरोंकी विचित्र बातें सुनायी देती थीं॥ २॥

विस्फार्य च धनूंष्यन्ये ज्याः परे परिमृज्य च।
विनिःश्वसन्तः प्राक्रोशन् क्वेदानीं स धनंजयः॥ ३॥
कोई धनुष खींचकर और कोई प्रत्यंचापर हाथ फेरकर रोषपूर्ण उच्छ्वास लेते हुए चिल्ला-चिल्लाकर कहते थे कि इस समय वह अर्जुन कहाँ है?॥ ३॥

विकोशान् सुत्सरूनन्ये कृतधारान् समाहितान्।
पीतानाकाशसंकाशानसीन् केचिच्च चिक्षिपुः॥ ४॥
कितने ही योद्धा आकाशके समान निर्मल पानीदार, सँभालकर रखी हुई, सुन्दर मूठ और तेजधारवाली तलवारोंको म्यानसे निकालकर चलाने लगे॥ ४॥

चरन्तस्त्वसिमार्गांश्च धनुर्मागांश्च शिक्षया।
संग्राममनसः शूरा दृश्यन्ते स्म सहस्रशः॥ ५॥
मनमें संग्रामके लिये पूर्ण उत्साह रखनेवाले सहस्रों शूरवीर अपनी शिक्षाके अनुसार खड्गयुद्ध और धनुर्युद्धके मार्गों (पैतरों)-का प्रदर्शन करते दिखायी देते थे॥ ५॥

सघण्टाश्चन्दनादिग्धाः स्वर्णवज्रविभूषिताः।
समुत्क्षिप्य गदाश्चान्ये पर्यपृच्छन्त पाण्डवम्॥ ६॥
दूसरे बहुत-से योद्धा घण्टानादसे युक्त, चन्दनचर्चित तथा सुवर्ण एवं हीरोंसे विभूषित गदाएँ ऊपर उठाकर पूछते थे कि पाण्डुपुत्र अर्जुन कहाँ है?॥ ६॥

अन्ये बलमदोन्मत्ताः परिघैर्बाहुशालिनः।
चक्रुः सम्बाधमाकाशमुच्छ्रितेन्द्रध्वजोपमैः॥ ७॥

अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले कितने ही योद्धा अपने बलके मदसे उन्मत्त हो ऊँचे फहराते हुए इन्द्र-ध्वजके समान उठे हुए परिघोंसे सम्पूर्ण आकाशको व्याप्त कर रहे थे॥ ७॥

नानाप्रहरणैश्चान्ये विचित्रस्रगलङ्कृताः ।
संग्राममनसः शूरास्तत्र तत्र व्यवस्थिताः ॥ ८ ॥
दूसरे शूरवीर योद्धा विचित्र मालाओंसे अलंकृत हो नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लिये मनमें युद्धके लिये उत्साहित होकर जहाँ-तहाँ खड़े थे॥ ८॥

क्वार्जुनः क्व स गोविन्दः क्व च मानी वृकोदरः ।
क्व च ते सुहृदस्तेषामान्हयन्ते रणे तदा ॥ ९ ॥
वे उस समय रणक्षेत्रमें शत्रुओंको ललकारते हुए इस प्रकार कहते थे, कहाँ है अर्जुन? कहाँ हैं श्रीकृष्ण? कहाँ है घमंडी भीमसेन? और कहाँ हैं उनके सारे सुहृद् ॥ ९ ॥

ततः शङ्खमुपाध्माय त्वरयन् वाजिनः स्वयम् ।
इतस्ततस्तान् रचयन् द्रोणश्चरति वेगितः ॥ १० ॥
तदनन्तर द्रोणाचार्य शंख बजाकर स्वयं ही अपने घोड़ोंको उतावलीके साथ हाँकते और उन सैनिकोंका व्यूह-निर्माण करते हुए इधर-उधर बड़े वेगसे विचर रहे थे॥ १० ॥

तेष्वनीकेषु सर्वेषु स्थितेष्वाहवनन्दिषु ।
भारद्वाजो महाराज जयद्रथमथाब्रवीत् ॥ ११ ॥
महाराज! युद्धसे प्रसन्न होनेवाले उन समस्त सैनिकोंके व्यूहबद्ध हो जानेपर द्रोणाचार्यने जयद्रथसे कहा— ॥ ११ ॥

त्वं चैव सौमदत्तिश्च कर्णश्चैव महारथः ।
अश्वत्थामा च शल्यश्च वृषसेनः कृपस्तथा ॥ १२ ॥
शतं चाश्वसहस्राणां रथानामयुतानि षट् ।
द्विरदानां प्रभिन्नानां सहस्राणि चतुर्दश ॥ १३ ॥
पदातीनां सहस्राणि दंशितान्येकविंशतिः ।
गव्यूतिषु त्रिमात्रासु मामनासाद्य तिष्ठत ॥ १४ ॥
'राजन्! तुम, भूरिश्रवा, महारथी कर्ण, अश्वत्थामा, शल्य, वृषसेन तथा कृपाचार्य, एक लाख घुड़सवार, साठ हजार रथ, चौदह हजार मदस्रावी गजराज तथा इक्कीस हजार कवचधारी पैदल सैनिकोंको साथ लेकर मुझसे छः कोसकी दूरीपर जाकर डटे रहो ॥ १२—१४ ॥

तत्रस्थं त्वां न संसोढुं शक्ता देवाः सवासवाः ।
किं पुनः पाण्डवाः सर्वे समाश्वसिहि सैन्धव ॥ १५ ॥
'सिंधुराज! वहाँ रहनेपर इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता भी तुम्हारा सामना नहीं कर सकते; फिर समस्त पाण्डव तो कर ही कैसे सकते हैं? अतः तुम धैर्य धारण करो' ॥ १५ ॥

एवमुक्तः समाश्वस्तः सिन्धुराजो जयद्रथः । सम्प्रायात् सह गान्धारैर्वृतस्तैश्च महारथैः ॥ १६ ॥ वर्मिभिः सादिभिर्यत्तैः प्रासपाणिभिरास्थितैः । उनके ऐसा कहनेपर सिंधुराज जयद्रथको बड़ा आश्वासन मिला। वह गान्धार महारथियोंसे घिरा हुआ युद्धके लिये चल दिया। कवचधारी घुड़सवार हाथोंमें प्रास लिये पूरी सावधानीके साथ उन्हें घेरे हुए चल रहे थे ॥ १६ १/२ ॥ चामरापीडिनः सर्वे जाम्बूनदविभूषिताः ॥ १७ ॥ जयद्रथस्य राजेन्द्र हयाः साधुप्रवाहिनः । ते चैव सप्तसाहस्रास्त्रिसाहस्राश्च सैन्धवाः ॥ १८ ॥ राजेन्द्र! जयद्रथके घोड़े सवारीमें बहुत अच्छा काम देते थे। वे सब-के-सब चवँरकी कलँगीसे सुशोभित और सुवर्णमय आभूषणोंसे विभूषित थे। उन सिंधुदेशीय अश्वोंकी संख्या दस हजार थी ॥ १७-१८ ॥ मत्तानां सुविरूढानां हस्त्यारोहैर्विशारदैः । नागानां भीमरूपाणां वर्मिणां रौद्रकर्मणाम् ॥ १९ ॥ अध्यर्धेन सहस्रेण पुत्रो दुर्मर्षणस्तव । अग्रतः सर्वसैन्यानां युध्यमानो व्यवस्थितः ॥ २० ॥ जिनपर युद्धकुशल हाथीसवार आरूढ थे, ऐसे भयंकर रूप तथा पराक्रमवाले डेढ़ हजार कवचधारी मतवाले गजराजोंके साथ आकर आपका पुत्र दुर्मर्षण युद्धके लिये उद्यत हो सम्पूर्ण सेनाओंके आगे खड़ा हुआ ॥ १९-२० ॥ ततो दुःशासनश्चैव विकर्णश्च तवात्मजौ । सिन्धुराजार्थसिद्धयर्थमग्रानीके व्यवस्थितौ ॥ २१ ॥ तत्पश्चात् आपके दो पुत्र दुःशासन और विकर्ण सिन्धुराज जयद्रथके अभीष्ट अर्थकी सिद्धिके लिये सेनाके अग्रभागमें खड़े हुए ॥ २१ ॥ दीर्घो द्वादश गव्यूतिः पश्चार्धे पञ्च विस्तृतः । व्यूहस्तु चक्रशकटो भारद्वाजेन निर्मितः ॥ २२ ॥ आचार्य द्रोणने चक्रगर्भ शकटव्यूहका निर्माण किया था, जिसकी लम्बाई बारह गव्यूति (चौबीस कोस) थी और पिछले भागकी चौड़ाई पाँच गव्यूति (दस कोस) थी ॥ नानानृपतिभिर्वीरैस्तत्र तत्र व्यवस्थितैः । रथाश्वगजपत्त्योधैर्द्रोणेन विहितः स्वयम् ॥ २३ ॥ यत्र-तत्र खड़े हुए अनेक नरपतियों तथा हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल सैनिकोंद्वारा द्रोणाचार्यने स्वयं उस व्यूहकी रचना की थी ॥ २३ ॥ पश्चार्धे तस्य पद्मस्तु गर्भव्यूहः सुदुर्भिदः । सूची पद्मस्य गर्भस्थो गूढो व्यूहः कृतः पुनः ॥ २४ ॥

उस चक्रशकटव्यूहके पिछले भागमें पद्म नामक एक गर्भव्यूह बनाया गया था, जो अत्यन्त दुर्भेद्य था। उस पद्मव्यूहके मध्यभागमें सूची नामक एक गूढ़ व्यूह और बनाया गया था॥ २४ ॥ एवमेतं महाव्यूहं व्यूह्य द्रोणो व्यवस्थितः। सूचीमुखे महेष्वासः कृतवर्मा व्यवस्थितः॥ २५ ॥ इस प्रकार इस महाव्यूहकी रचना करके द्रोणाचार्य युद्धके लिये तैयार खड़े थे। सूचीमुख व्यूहके प्रमुख भागमें महाधनुर्धर कृतवर्मा खड़ा किया गया था॥ २५ ॥ अनन्तरं च काम्बोजो जलसंधश्च मारिष। दुर्योधनश्च कर्णश्च तदनन्तरमेव च॥ २६ ॥ आर्य! कृतवर्माके पीछे काम्बोजराज और जलसंध खड़े हुए, तदनन्तर दुर्योधन और कर्ण स्थित हुए॥ २६ ॥ ततः शतसहस्राणि योधानामनिवर्तिनाम्। व्यवस्थितानि सर्वाणि शकटे मुखरक्षिणाम्॥ २७ ॥ तत्पश्चात् युद्धमें पीठ न दिखानेवाले एक लाख योद्धा खड़े हुए थे। वे सबके सब शकटव्यूहके प्रमुख भागकी रक्षाके लिये नियुक्त थे॥ २७ ॥ तेषां च पृष्ठतो राजा बलेन महता वृतः। जयद्रथस्ततो राजा सूचीपार्श्वे व्यवस्थितः॥ २८ ॥ उनके पीछे विशाल सेनाके साथ स्वयं राजा जयद्रथ सूचीव्यूहके पार्श्वभागमें खड़ा था॥ २८ ॥ शकटस्य तु राजेन्द्र भारद्वाजो मुखे स्थितः। अनु तस्याभवद् भोजो जुगोपैनं ततः स्वयम्॥ २९ ॥ राजेन्द्र! उस शकटव्यूहके मुहानेपर भारद्वाजनन्दन द्रोणाचार्य थे और उनके पीछे भोज था, जो स्वयं आचार्यकी रक्षा करता था॥ २९ ॥ श्वेतवर्माम्बरोष्णीषो व्यूढोरस्को महाभुजः। धनुर्विस्फारयन् द्रोणस्तस्थौ क्रुद्ध इवान्तकः॥ ३० ॥ द्रोणाचार्यका कवच श्वेत रंगका था। उनके वस्त्र और उष्णीष (पगड़ी) भी श्वेत ही थे। छाती चौड़ी और भुजाएँ विशाल थीं। उस समय धनुष खींचते हुए द्रोणाचार्य वहाँ क्रोधमें भरे हुए यमराजके समान खड़े थे॥ ३० ॥ पताकिनं शोणहयं वेदिकृष्णाजिनध्वजम्। द्रोणस्य रथमालोक्य प्रहृष्टाः कुरवोऽभवन्॥ ३१ ॥ उस समय वेदी और काले मृगचर्मके चिह्नसे युक्त ध्वजवाले, पताकासे सुशोभित और लाल घोड़ोंसे जुते हुए द्रोणाचार्यके रथको देखकर समस्त कौरव बड़े प्रसन्न हुए॥ ३१ ॥ सिद्धचारणसंघानां विस्मयः सुमहानभूत्।

द्रोणेन विहितं दृष्ट्वा व्यूहं क्षुब्धार्णवोपमम् ॥ ३२ ॥ द्रोणाचार्यद्वारा रचित वह महाव्यूह क्षुब्ध महासागरके समान जान पड़ता था। उसे देखकर सिद्धों और चारणोंके समुदायोंको महान् विस्मय हुआ ॥ ३२ ॥ सशैलसागरवनां नानाजनपदाकुलाम् । ग्रसेद् व्यूहः क्षितिं सर्वामिति भूतानि मेनिरे ॥ ३३ ॥ उस समय समस्त प्राणी ऐसा मानने लगे कि वह व्यूह पर्वत, समुद्र और काननोंसहित अनेकानेक जनपदोंसे भरी हुई इस सारी पृथ्वीको अपना ग्रास बना लेगा ॥ ३३ ॥ बहुरथमनुजाश्वपत्तिनागं प्रतिभयनिःस्वनमद्भुतानुरूपम् । अहितहृदयभेदनं महद् वै शकटमवेक्ष्य कृतं ननन्द राजा ॥ ३४ ॥ बहुत-से रथ, पैदल मनुष्य, घोड़े और हाथियोंसे परिपूर्ण, भयंकर कोलाहलसे युक्त एवं शत्रुओंके हृदयको विदीर्ण करनेमें समर्थ, अद्भुत और समयके अनुरूप बने हुए उस महान् शकटव्यूहको देखकर राजा दुर्योधन बहुत प्रसन्न हुआ ॥ ३४ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि कौरवव्यूहनिर्माणे सप्ताशीतितमोऽध्यायः ॥ ८७ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें कौरव-सेनाके व्यूहका निर्माणविषयक सतासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८७ ॥

अध्याय (पृष्ठ 573)

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अष्टाशीतितमोऽध्यायः

कौरव-सेनाके लिये अपशकुन, दुर्मर्षणका अर्जुनसे लड़नेका उत्साह तथा अर्जुनका रणभूमिमें प्रवेश एवं शंखनाद

संजय उवाच

ततो व्यूढेष्वनीकेषु समुत्कृष्टेषु मारिष ।
ताड्यमानासु भेरीषु मृदङ्गेषु नदत्सु च ॥ १ ॥
अनीकानां च संह्रादे वादित्राणां च निःस्वने ।
प्रध्मापितेषु शङ्खेषु संनादे लोमहर्षणे ॥ २ ॥
अभिहारयत्सु शनकैर्भरतेषु युयुत्सुषु ।
रौद्रे मुहूर्ते सम्प्राप्ते सव्यसाची व्यदृश्यत ॥ ३ ॥

**संजय कहते हैं—**आर्य! जब इस प्रकार कौरव-सेनाओंकी व्यूह-रचना हो गयी, युद्धके लिये उत्सुक सैनिक कोलाहल करने लगे, नगाड़े पीटे जाने लगे, मृदंग बजने लगे, सैनिकोंकी गर्जनाके साथ-साथ रणवाद्योंकी तुमुल ध्वनि फैलने लगी, शंख फूँके जाने लगे, रोमांचकारी शब्द गूँजने लगा और युद्धके इच्छुक भरतवंशी वीर जब कवच धारण करके धीरे-धीरे प्रहारके लिये उद्यत होने लगे, उस समय उग्र मुहूर्त आनेपर युद्धभूमिमें सव्यसाची अर्जुन दिखायी दिये ॥ १—३ ॥

बलानां वायसानां च पुरस्तात् सव्यसाचिनः ।
बहुलानि सहस्राणि प्राक्रीडंस्तत्र भारत ॥ ४ ॥

भारत! वहाँ सव्यसाची अर्जुनके सम्मुख आकाशमें कई हजार कौए और वायस क्रीडा करते हुए उड़ रहे थे ॥ ४ ॥

मृगाश्च घोरसंनादाः शिवाश्चाशिवदर्शनाः ।
दक्षिणेन प्रयातानामस्माकं प्राणदंस्तथा ॥ ५ ॥

और जब हमलोग आगे बढ़ने लगे, तब भयंकर शब्द करनेवाले पशु और अशुभ दर्शनवाले सियार हमारे दाहिने आकर कोलाहल करने लगे ॥ ५ ॥

(लोकक्षये महाराज यादृशास्तादृशा हि ते ।
अशिवा धार्तराष्ट्राणां शिवाः पार्थस्य संयुगे ॥)

महाराज! उस लोक-संहारकारी युद्धमें जैसे-तैसे अपशकुन प्रकट होने लगे, जो आपके पुत्रोंके लिये अमंगलकारी और अर्जुनके लिये मंगलकारी थे।

सनिर्घाता ज्वलन्त्यश्च पेतुरुल्काः सहस्रशः ।

चचाल च मही कृत्स्ना भये घोरे समुत्थिते ॥ ६ ॥ महान् भय उपस्थित होनेके कारण आकाशसे भयंकर गर्जनाके साथ सहस्रों जलती हुई उल्काएँ गिरने लगीं और सारी पृथ्वी काँपने लगी ॥ ६ ॥

विष्वग्वाताः सनिर्घाता रूक्षाः शर्करवर्षिणः । ववुर्रायाति कौन्तेये संग्रामे समुपस्थिते ॥ ७ ॥ अर्जुनके आने और संग्रामका अवसर उपस्थित होनेपर रेतकी वर्षा करनेवाली विकट गर्जन-तर्जनके साथ रूखी एवं चौवाई हवा चलने लगी ॥ ७ ॥

नाकुलिश्च शतानीको धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः । पाण्डवानामनीकानि प्राज्ञौ तौ व्यूहतुस्तदा ॥ ८ ॥ उस समय नकुलपुत्र शतानीक और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न—इन दोनों बुद्धिमान् वीरोंने पाण्डव सैनिकोंके व्यूहका निर्माण किया ॥ ८ ॥

ततो रथसहस्रेण द्विरदानां शतेन च । त्रिभिश्चश्वसहस्रैश्च पदातीनां शतैः शतैः ॥ ९ ॥ अध्यर्धमात्रे धनुषां सहस्रे तनयस्तव । अग्रतः सर्वसैन्यानां स्थित्वा दुर्मर्षणोऽब्रवीत् ॥ १० ॥ तदनन्तर एक हजार रथी, सौ हाथीसवार, तीन हजार घुड़सवार और दस हजार पैदल सैनिकोंके साथ आकर अर्जुनसे डेढ़ हजार धनुषकी दूरीपर स्थित हो समस्त कौरव सैनिकोंके आगे होकर आपके पुत्र दुर्मर्षणने इस प्रकार कहा— ॥ ९-१० ॥

अद्य गाण्डीवधन्वानं तपन्तं युद्धदुर्मदम् । अहमावारयिष्यामि वेलेव मकरालयम् ॥ ११ ॥ 'जिस प्रकार तटभूमि समुद्रको आगे बढ़नेसे रोकती है, उसी प्रकार आज मैं युद्धमें उन्मत्त होकर लड़नेवाले शत्रु-संतापी गाण्डीवधारी अर्जुनको रोक दूँगा ॥ ११ ॥

अद्य पश्यन्तु संग्रामे धनंजयममर्षणम् । विषक्तं मयि दुर्धर्षमश्मकूटमिवाश्मनि ॥ १२ ॥ 'आज सब लोग देखें, जैसे पत्थर दूसरे प्रस्तरसमूहसे टकराकर रह जाता है, उसी प्रकार अमर्षशील दुर्धर्ष अर्जुन युद्धस्थलमें मुझसे भिड़कर अवरुद्ध हो जायँगे ॥ १२ ॥

तिष्ठध्वं रथिनो यूयं संग्राममभिकाङ्क्षिणः । युध्यामि संहतानेतान् यशो मानं च वर्धयन् ॥ १३ ॥ 'संग्रामकी इच्छा रखनेवाले रथियो! आपलोग चुपचाप खड़े रहें। मैं कौरवकुलके यश और मानकी वृद्धि करता हुआ आज इन संगठित होकर आये हुए शत्रुओंके साथ युद्ध करूँगा' ॥ १३ ॥

एवं ब्रुवन्महाराज महात्मा स महामतिः । महेष्वासैर्वृतो राजन् महेष्वासो व्यवस्थितः ॥ १४ ॥

राजन्! महाराज! ऐसा कहता हुआ वह महामनस्वी महाबुद्धिमान् एवं महाधनुर्धर दुर्मर्षण बड़े-बड़े धनुर्धरोंसे घिरकर युद्धके लिये खड़ा हो गया ॥ १४ ॥

ततोऽन्तक इव क्रुद्धः सवज्र इव वासवः । दण्डपाणिरिवासह्यो मृत्युः कालेन चोदितः ॥ १५ ॥ शूलपाणिरिवाक्षोभ्यो वरुणः पाशवानिव । युगान्ताग्निरिवार्चिष्मान् प्रधक्ष्यन् वै पुनः प्रजाः ॥ १६ ॥ क्रोधामर्षबलोद्धूतो निवातकवचान्तकः । जयो जेता स्थितः सत्ये पारयिष्यन् महाव्रतम् ॥ १७ ॥ आमुक्तकवचः खड्गी जाम्बूनदकिरीटभृत् । शुभ्रमाल्याम्बरधरः स्वङ्गदश्चारुकुण्डलः ॥ १८ ॥ रथप्रवरमास्थाय नरो नारायणानुगः । विधुन्वन् गाण्डिवं संख्ये बभौ सूर्य इवोदितः ॥ १९ ॥

तत्पश्चात् क्रोधमें भरे हुए यमराज, वज्रधारी इन्द्र, दण्डधारी असह्य अन्तक, कालप्रेरक मृत्यु, किसीसे भी क्षुब्ध न होनेवाले त्रिशूलधारी रुद्र, पाशधारी वरुण तथा पुनः समस्त प्रजाको दग्ध करनेके लिये उठे हुए ज्वालाओंसे युक्त प्रलयकालीन अग्निदेवके समान दुर्धर्ष वीर अर्जुन युद्धस्थलमें अपने श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो गाण्डीव धनुषकी टंकार करते हुए नवोदित सूर्यके समान प्रकाशित होने लगे। वे क्रोध, अमर्ष और बलसे प्रेरित होकर आगे बढ़ रहे थे। उन्होंने ही पूर्वकालमें निवातकवच नामक दानवोंका संहार किया था। वे जय नामके अनुसार ही विजयी होते थे। सत्यमें स्थित होकर अपने महान् व्रतको पूर्ण करनेके लिये उद्यत थे। उन्होंने कवच बाँध रखा था। मस्तकपर जाम्बूनद सुवर्णका बना हुआ किरीट धारण किया था। उनके कमरमें तलवार लटक रही थी। वे नरस्वरूप अर्जुन नारायणस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णका अनुसरण करते हुए सुन्दर अंगदों (बाजूबन्द) और मनोहर कुण्डलोंसे सुशोभित हो रहे थे। उन्होंने श्वेत माला और श्वेत वस्त्र पहन रखे थे ॥ १५—१९ ॥

सोऽग्रानीकस्य महत इषुपाते धनंजयः । व्यवस्थाप्य रथं राजन् शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ॥ २० ॥

राजन्! प्रतापी अर्जुनने अपने सामने खड़ी हुई विशाल शत्रुसेनाके सम्मुख, जितनी दूरसे बाण मारा जा सके उतनी ही दूरीपर अपने रथको खड़ा करके शंख बजाया ॥ २० ॥

अथ कृष्णोऽप्यसम्भ्रान्तः पार्थेन सह मारिष । प्राध्मापयत् पाञ्चजन्यं शङ्खं प्रवरमोजसा ॥ २१ ॥ आर्य! तब श्रीकृष्णने भी अर्जुनके साथ बिना किसी घबराहटके अपने श्रेष्ठ शंख पांचजन्यको बलपूर्वक बजाया ॥ २१ ॥ तयोः शङ्खप्रणादेन तव सैन्ये विशाम्पते । आसन् संहृष्टरोमाणः कम्पिता गतचेतसः ॥ २२ ॥ प्रजानाथ! उन दोनोंके शंखनादसे आपकी सेनाके समस्त योद्धाओंके रोंगटे खड़े हो गये, सब लोग काँपते हुए अचेत-से हो गये ॥ २२ ॥ यथा त्रस्यन्ति भूतानि सर्वाण्यशनिनिःस्वनात् । तथा शङ्खप्रणादेन वित्रेसुस्तव सैनिकाः ॥ २३ ॥ जैसे वज्रकी गड़गड़ाहटसे सारे प्राणी थर्रा उठते हैं, उसी प्रकार उन दोनों वीरोंकी शंखध्वनिसे आपके समस्त सैनिक संत्रस्त हो उठे ॥ २३ ॥ प्रसुस्रुवुः शकृन्मूत्रं वाहनानि च सर्वशः । एवं सवाहनं सर्वमाविग्नमभवद् बलम् ॥ २४ ॥ सेनाके सभी वाहन भयके मारे मल-मूत्र करने लगे। इस प्रकार सवारियोंसहित सारी सेना उद्विग्न हो गयी ॥

सीदन्ति स्म नरा राजन् शङ्खशब्देन मारिष ।
विसंज्ञाश्चाभवन् केचित् केचिद् राजन् वितत्रसुः ॥ २५ ॥
आदरणीय महाराज! अपनी सेनाके सब मनुष्य वह शंखनाद सुनकर शिथिल हो गये। नरेश्वर! कितने ही तो मूर्च्छित हो गये और कितने ही भयसे थर्रा उठे ॥

ततः कपिर्महानादं सह भूतैर्ध्वजालयैः ।
अकरोद् व्यादितास्यश्च भीषयंस्तव सैनिकान् ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनकी ध्वजामें निवास करनेवाले भूतगणोंके साथ वहाँ बैठे हुए हनुमान्जीने मुँह बाकर आपके सैनिकोंको भयभीत करते हुए बड़े जोरसे गर्जना की ॥

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्चानकैः सह ।
पुनरेवाभ्यहन्यन्त तव सैन्यप्रहर्षणाः ॥ २७ ॥
तब आपकी सेनामें भी पुनः मृदंग और ढोलके साथ शंख तथा नगाड़े बज उठे, जो आपके सैनिकोंके हर्ष और उत्साहको बढ़ानेवाले थे ॥ २७ ॥

नानावादित्रसंह्नादैः क्ष्वेडितास्फोटिताकुलैः ।
सिंहनादैः समुत्कृष्टैः समाधूतैर्महारथैः ॥ २८ ॥
तस्मिंस्तु तुमुले शब्दे भीरूणां भयवर्धने ।
अतीव हृष्टो दाशार्हमब्रवीत् पाकशासनिः ॥ २९ ॥
नाना प्रकारके रणवाद्योंकी ध्वनिसे, गर्जन-तर्जन करनेसे, ताल ठोंकनेसे, सिंहनादसे और महारथियोंके ललकारनेसे जो शब्द होते थे, वे सब मिलकर भयंकर हो उठे और भीरु पुरुषोंके हृदयमें भय उत्पन्न करने लगे। उस समय अत्यन्त हर्षमें भरे हुए इन्द्रपुत्र अर्जुनने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा ॥ २८-२९ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि अर्जुनरणप्रवेशे
अष्टाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें अर्जुनका रणभूमिमें प्रवेशविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं।)

अध्याय (पृष्ठ 578)

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एकोननवतितमोऽध्यायः

अर्जुनके द्वारा दुर्मर्षणकी गजसेनाका संहार और समस्त सैनिकोंका पलायन

अर्जुन उवाच

चोदयाश्वान् हृषीकेश यत्र दुर्मर्षणः स्थितः ।
एतद् भित्त्वा गजानीकं प्रवेक्ष्याम्यरिवाहिनीम् ॥ १ ॥
**अर्जुन बोले—**हृषीकेश! जहाँ दुर्मर्षण खड़ा है, उसी ओर घोड़ोंको बढ़ाइये। मैं उसकी इस गजसेनाका भेदन करके शत्रुओंकी विशाल वाहिनीमें प्रवेश करूँगा ॥ १ ॥

संजय उवाच

एवमुक्तो महाबाहुः केशवः सव्यसाचिना ।
अचोदयद्धयांस्तत्र यत्र दुर्मर्षणः स्थितः ॥ २ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! सव्यसाची अर्जुनके ऐसा कहनेपर महाबाहु श्रीकृष्णने, जहाँ दुर्मर्षण खड़ा था, उसी ओर घोड़ोंको हाँका ॥ २ ॥

स सम्प्रहारस्तुमुलः सम्प्रवृत्तः सुदारुणः ।
एकस्य च बहूनां च रथनागनरक्षयः ॥ ३ ॥
उस समय एक वीरका बहुत-से योद्धाओंके साथ बड़ा भयंकर घमासान युद्ध छिड़ गया, जो रथों, हाथियों और मनुष्योंका संहार करनेवाला था ॥ ३ ॥

ततः सायकवर्षेण पर्जन्य इव वृष्टिमान् ।
परानवाकिरत् पार्थः पर्वतानिव नीरदः ॥ ४ ॥
तदनन्तर अर्जुन बाणोंकी वर्षा करते हुए जल बरसानेवाले मेघके समान प्रतीत होने लगे। जैसे मेघ पानीकी वर्षा करके पर्वतोंको आच्छादित कर देता है, उसी प्रकार अर्जुनने अपनी बाण-वर्षासे शत्रुओंको ढक दिया ॥ ४ ॥

ते चापि रथिनः सर्वे त्वरिताः कृतहस्तवत् ।
अवाकिरन् बाणजालैस्तत्र कृष्णधनंजयौ ॥ ५ ॥
उधर उन समस्त कौरव रथियोंने भी सिद्धहस्त पुरुषोंकी भाँति शीघ्रतापूर्वक अपने बाणसमूहोंद्वारा वहाँ श्रीकृष्ण और अर्जुनको आच्छादित कर दिया ॥ ५ ॥

ततः क्रुद्धो महाबाहुर्वार्यमाणः परैर्युधि ।
शिरांसि रथिनां पार्थः कायेभ्योऽपाहरच्छरैः ॥ ६ ॥
उस समय युद्धस्थलमें शत्रुओंके द्वारा रोके जानेपर महाबाहु अर्जुन कुपित हो उठे और अपने बाणोंद्वारा रथियोंके मस्तकोंको उनके शरीरोंसे काटकर गिराने लगे ॥ ६ ॥

उद्भ्रान्तनयनैर्वक्त्रैः संदष्टौष्ठपुटैः शुभैः । सकुण्डलशिरस्त्राणैर्वसुधा समकीर्यत ॥ ७ ॥ कुण्डल और टोपोंसहित उन रथियोंके घूमते हुए नेत्रों तथा दाँतोंद्वारा चबाये जाते हुए ओठोंवाले सुन्दर मुखोंसे सारी रणभूमि पट गयी ॥ ७ ॥

पुण्डरीकवनानीव विध्वस्तानि समन्ततः । विनिकीर्णानि योधानां वदनानि चकाशिरे ॥ ८ ॥ सब ओर बिखरे हुए योद्धाओंके मुख कटकर गिरे हुए कमल-समूहोंके समान सुशोभित होने लगे ॥ ८ ॥

तपनीयतनुत्राणाः संसिक्ता रुधिरेण च । संसक्ता इव दृश्यन्ते मेघसंघाः सविद्युतः ॥ ९ ॥ सुवर्णमय कवच धारण किये और खूनसे लथपथ हो एक-दूसरेसे सटे हुए हताहत योद्धाओंके शरीर विद्युत्सहित मेघसमूहोंके समान दिखायी देते थे ॥ ९ ॥

शिरसां पततां राजन् शब्दोऽभूद् वसुधातले । कालेन परिपक्वानां तालानां पततामिव ॥ १० ॥ राजन्! कालसे परिपक्व हुए ताड़के फलोंके पृथ्वीपर गिरनेसे जैसा शब्द होता है, उसी प्रकार रणभूमिमें कटकर गिरते हुए योद्धाओंके मस्तकोंका शब्द होता था ॥ १० ॥

ततः कबन्धं किंचित् तु धनुरलम्ब्य तिष्ठति । किंचित् खड्गं विनिष्कृष्य भुजेनोद्यम्य तिष्ठति ॥ ११ ॥ कोई-कोई कबन्ध (बिना सिरका धड़) धनुष लेकर खड़ा था और कोई तलवार खींचकर उसे हाथमें उठाये खड़ा हुआ था ॥ ११ ॥

पतितानि न जानन्ति शिरांसि पुरुषर्षभाः । अमृष्यमाणाः संग्रामे कौन्तेयं जयगृद्धिनः ॥ १२ ॥ संग्राममें विजयकी अभिलाषा रखनेवाले कितने ही श्रेष्ठ पुरुष कुन्तीपुत्र अर्जुनके प्रति अमर्षशील होकर यह भी न जान पाये कि उनके मस्तक कब कटकर गिर गये ॥ १२ ॥

हयानामुत्तमाङ्गैश्च हस्तेहस्तैश्च मेदिनी । बाहुभिश्च शिरोभिश्च वीराणां समकीर्यत ॥ १३ ॥ घोड़ोंके मस्तकों, हाथियोंकी सूँड़ों और वीरोंकी भुजाओं तथा सिरोंसे सारी रणभूमि आच्छादित हो गयी थी ॥ १३ ॥

अयं पार्थः कुतः पार्थ एष पार्थ इति प्रभो । तव सैन्येषु योधानां पार्थभूतमिवाभवत् ॥ १४ ॥ प्रभो! आपकी सेनाओंके समस्त योद्धाओंकी दृष्टिमें सब ओर अर्जुनमय-सा हो रहा था। वे बार-बार ‘यह अर्जुन है, कहाँ अर्जुन है? यह अर्जुन है’ इस प्रकार चिल्ला उठते थे ॥ १४ ॥

अध्याय (पृष्ठ 580)

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अन्योन्यमपि चाजघ्नुरात्मानमपि चापरे ।
पार्थभूतममन्यन्त जगत् कालेन मोहिताः ॥ १५ ॥
बहुत-से दूसरे सैनिक आपसमें ही एक-दूसरेपर तथा अपने ऊपर भी प्रहार कर बैठते थे। वे कालसे मोहित होकर सारे संसारको अर्जुनमय ही मानने लगे ।।
निष्टनन्तः सरुधिरा विसंज्ञा गाढवेदनाः ।
शयाना बहवो वीराः कीर्तयन्तः स्वबान्धवान् ॥ १६ ॥
बहुत-से वीर रक्तसे भीगे शरीरसे धराशायी होकर गहरी वेदनाके कारण कराहते हुए अपनी चेतना खो बैठते थे और कितने ही योद्धा धरतीपर पड़े-पड़े अपने बन्धु-बान्धवोंको पुकार रहे थे ।। १६ ।।

श्रीकृष्ण और अर्जुनका दुर्मर्षणकी गजसेनामें प्रवेश

सभिन्दिपालाः सप्रासाः सशक्त्यृष्टिपरश्वधाः ।
सनिव्यूहाः सनिस्त्रिंशाः सशरासनतोमराः ॥ १७ ॥
सबाणवर्माभरणाः सगदाः साङ्गदा रणे ।