महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
म्लेच्छानशातयत् सर्वान् समेतानस्त्रतेजसा ।
बाणोंद्वारा उस विशाल सेनापर बादलोंकी छाया-सी करके अर्जुनने अपने अस्त्रके तेजसे मुण्डित, अर्धमुण्डित, जटाधारी, अपवित्र तथा दाढ़ीभरे मुखवाले उन समस्त म्लेच्छोंका, जो वहाँ एकत्र थे, संहार कर डाला ॥ ४७ १/२ ॥
शरैश्च शतशो विद्धास्ते संघा गिरिचारिणः ।
प्राद्रवन्त रणे भीता गिरिगह्वरवासिनः ॥ ४८ ॥
उस समय पर्वतोंपर विचरने और पर्वतीय कन्दराओंमें निवास करनेवाले सैकड़ों म्लेच्छ-संघ अर्जुनके बाणोंसे विद्ध एवं भयभीत हो रणभूमिसे भागने लगे ॥ ४८ ॥
गजाश्वसादिम्लेच्छानां पतितानां शितैः शरैः ।
बलाः कंका वृका भूमावपिबन् रुधिरं मुदा ॥ ४९ ॥
अर्जुनके तीखे बाणोंसे मरकर पृथ्वीपर गिरे हुए उन हाथीसवार और घुड़सवार म्लेच्छोंका रक्त कौए, बगुले और भेड़िये बड़ी प्रसन्नताके साथ पी रहे थे ॥ ४९ ॥
पत्त्यश्वरथनागैश्च प्रच्छन्नकृतसंक्रमाम् ।
शरवर्षप्लवां घोरां केशशैवलशाद्वलाम् ।
प्रावर्तयन्नदीमुग्रां शोणितौघतरङ्गिणीम् ॥ ५० ॥
छिन्नाङ्गुलीक्षुद्रमत्स्यां युगान्ते कालसंनिभाम् ।
प्राकरोद् गजसम्बाधां नदीमुत्तरशोणिताम् ॥ ५१ ॥
देहेभ्यो राजपुत्राणां नागाश्वरथसादिनाम् ।
उस समय अर्जुनने वहाँ रक्तकी एक भयंकर नदी बहा दी, जो प्रलयकालकी नदीके समान डरावनी प्रतीत होती थी। उसमें पैदल मनुष्य, घोड़े, रथ और हाथियोंको बिछाकर मानो पुल तैयार किया गया था, बाणोंकी वर्षा ही नौकाके समान जान पड़ती थी। केश सेवार और घासके समान जान पड़ते थे। उस भयंकर नदीसे रक्त-प्रवाहकी ही तरंगें उठ रही थीं। कटी हुई अँगुलियाँ छोटी-छोटी मछलियोंके समान जान पड़ती थीं। हाथी, घोड़े और रथोंकी सवारी करनेवाले राजकुमारोंके शरीरोंसे बहनेवाले रक्तसे लबालब भरी हुई उस नदीको अर्जुनने स्वयं प्रकट किया था। उसमें हाथियोंकी लाशें व्याप्त हो रही थीं ॥ ५०-५१ १/२ ॥
यथास्थलं च निम्नं च न स्याद् वर्षति वासवे ॥ ५२ ॥
तथासीत् पृथिवी सर्वा शोणितेन परिप्लुता ।
जैसे इन्द्रके वर्षा करते समय ऊँचे-नीचे स्थलका भान नहीं होता है, उसी प्रकार वहाँकी सारी पृथिवी रक्तकी धारामें डूबकर समतल-सी जान पड़ती थी ॥ ५२ १/२ ॥
षट् सहस्रान् हयान् वीरान् पुनर्द्दशशतान् वरान् ॥ ५३ ॥
प्राहिणोन्मृत्युलोकाय क्षत्रियान् क्षत्रियर्षभः ।
क्षत्रियशिरोमणि अर्जुनने वहाँ छः हजार घुड़सवारों तथा एक हजार श्रेष्ठ शूरवीर क्षत्रियोंको मृत्युके लोकमें भेज दिया॥ ५३ १/२ ॥
शरैः सहस्रशो विद्धा विधिवत्कल्पिता द्विपाः ॥ ५४ ॥
शेरते भूमिमासाद्य शैला वज्रहता इव ।
विधिपूर्वक सुसज्जित किये गये हाथी सहस्रों बाणोंसे बिंधकर वज्रके मारे हुए पर्वतोंके समान धराशायी हो रहे थे ॥ ५४ १/२ ॥
सवाजिरथमातङ्गान् निघ्नन् व्यचरदर्जुनः ॥ ५५ ॥
प्रभिन्न इव मातङ्गो मृद्नन् नलवनं यथा ।
जैसे मदकी धारा बहानेवाला मतवाला हाथी नरकुलके जंगलोंको रौंदता चलता है, उसी प्रकार अर्जुन घोड़े, रथ और हाथियोंसहित सम्पूर्ण शत्रुओंका संहार करते हुए रणभूमिमें विचर रहे थे ॥ ५५ १/२ ॥
भूरिद्रुमलतागुल्मं शुष्केन्धनतृणोलपम् ॥ ५६ ॥
निर्दहेदनलोऽरण्यं यथा वायुसमीरितः ।
सेनारण्यं तव तथा कृष्णानिलसमीरितः ॥ ५७ ॥
शरार्चिर्दहत् क्रुद्धः पाण्डवाग्निर्धनंजयः ।
जैसे वायुप्रेरित अग्नि सूखे ईंधन, तृण और लताओंसे युक्त तथा बहुसंख्यक वृक्षों और लतागुल्मोंसे भरे हुए जंगलको जलाकर भस्म कर देती है, उसी प्रकार श्रीकृष्णरूपी वायुसे प्रेरित हो बाणरूपी ज्वालाओंसे युक्त पाण्डुपुत्र अर्जुनरूपी अग्निने कुपित होकर आपकी सेनारूप वनको दग्ध कर दिया ॥ ५६-५७ १/२ ॥
शून्यान् कुर्वन् रथोपस्थान् मानवैः संस्तरन् महीम् ॥ ५८ ॥
प्रानृत्यदिव सम्बाधे चापहस्तो धनंजयः ।
रथकी बैठकोंको सूनी करके धरतीपर मनुष्योंकी लाशोंका बिछौना करते हुए चापधारी धनंजय उस युद्धके मैदानमें नृत्य-सा कर रहे थे ॥ ५८ १/२ ॥
वज्रकल्पैः शरैर्भूमिं कुर्वन्नुत्तरशोणिताम् ॥ ५९ ॥
प्राविशद् भारतीं सेनां संक्रुद्धो वै धनंजयः ।
तं श्रुतायुस्तथाम्बष्ठो व्रजमानं न्यवारयत् ॥ ६० ॥
क्रोधमें भरे हुए धनंजयने वज्रोपम बाणोंद्वारा पृथ्वीको रक्तसे आप्लावित करते हुए कौरवी सेनामें प्रवेश किया। उस समय सेनाके भीतर जाते हुए अर्जुनको श्रुतायु तथा अम्बष्ठने रोका ॥ ५९-६० ॥
तस्यार्जुनः शरैस्तीक्ष्णैः कङ्कपत्रपरिच्छदैः ।
न्यपातयद्ध्वजान् शीघ्रं यतमानस्य मारिष ॥ ६१ ॥
मान्यवर! तब अर्जुनने कंककी पाँखोंवाले तीखे बाणोंद्वारा विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले अम्बष्ठके घोड़ोंको शीघ्र ही मार गिराया ।। ६१ ।। धनुश्चास्यापरैश्छित्त्वा शरैः पार्थो विचक्रमे । अम्बष्ठस्तु गदां गृह्य कोपपर्याकुलेक्षणः ।। ६२ ।। आससाद रणे पार्थं केशवं च महारथम् । फिर दूसरे बाणोंसे उसके धनुषको भी काटकर पार्थने विशेष बल-विक्रमका परिचय दिया। तब अम्बष्ठकी आँखें क्रोधसे व्याप्त हो गयीं। उसने गदा लेकर रणक्षेत्रमें महारथी श्रीकृष्ण और अर्जुनपर आक्रमण किया ।। ६२ ½ ।। ततः सम्प्रहरन् वीरो गदामुद्यम्य भारत ।। ६३ ।। रथमावार्य गदया केशवं समताडयत् । भारत! तदनन्तर वीर अम्बष्ठने प्रहार करनेके लिये उद्यत हो गदा उठाये आगे बढ़कर अर्जुनके रथको रोक दिया और भगवान् श्रीकृष्णपर गदासे आघात किया ।। ६३ ½ ।। गदया ताडितं दृष्ट्वा केशवं परवीरहा ।। ६४ ।। अर्जुनोऽथ भृशं क्रुद्धः सोऽम्बष्ठं प्रति भारत । भरतनन्दन! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुन भगवान् श्रीकृष्णको गदासे आहत हुआ देख अम्बष्ठके प्रति अत्यन्त कुपित हो उठे ।। ६४ ½ ।। ततः शरैर्हेमपुङ्खैः सगदं रथिनां वरम् ।। ६५ ।। छादयामास समरे मेघः सूर्यमिवोदितम् । फिर तो जैसे बादल उदित हुए सूर्यको ढक लेता है, उसी प्रकार अर्जुनने समरांगणमें सोनेके पंखवाले बाणोंद्वारा गदासहित रथियोंमें श्रेष्ठ अम्बष्ठको आच्छादित कर दिया ।। ६५ ½ ।। अथापरैः शरैश्चापि गदां तस्य महात्मनः ।। ६६ ।। अचूर्णयत् तदा पार्थस्तदद्भुतमिवाभवत् । तत्पश्चात् दूसरे बहुत-से बाण मारकर अर्जुनने महामना अम्बष्ठकी उस गदाको उसी समय चूर-चूर कर दिया। वह अद्भुत-सी घटना हुई ।। ६६ ½ ।। अथ तां पतितां दृष्ट्वा गृह्यान्यां च महागदाम् ।। ६७ ।। अर्जुनं वासुदेवं च पुनः पुनरताडयत् । उस गदाको गिरी हुई देख अम्बष्ठने दूसरी विशाल गदा ले ली और श्रीकृष्ण तथा अर्जुनपर बारंबार प्रहार किया ।। ६७ ½ ।। तस्यार्जुनः क्षुरप्राभ्यां सगदावुद्यतौ भुजौ ।। ६८ ।। चिच्छेदेन्द्रध्वजाकारौ शिरश्चान्येन पत्रिणा ।
तब अर्जुनने उसकी गदासहित, इन्द्रध्वजके समान उठी हुई दोनों भुजाओंको दो क्षुरप्रोंसे काट डाला और पंखयुक्त दूसरे बाणसे उसके मस्तकको भी काट गिराया ।। स पपात हतो राजन् वसुधामनुनादयन् ।। ६९ ।। इन्द्रध्वज इवोत्सृष्टो यन्त्रनिर्मुक्तबन्धनः । राजन्! यन्त्रद्वारा बन्धनमुक्त होकर गिरे हुए इन्द्रध्वजके समान वह मरकर पृथ्वीपर धमाकेकी आवाज करता हुआ गिर पड़ा ।। ६९१/२ ।। रथानीकावगाढश्च वारणाश्वशतैर्वृतः । अदृश्यत तदा पार्थो घनैः सूर्य इवावृतः ।। ७० ।। उस समय रथियोंकी सेनामें घुसकर सैकड़ों हाथियों और घोड़ोंसे घिरे हुए कुन्तीकुमार अर्जुन बादलोंमें छिपे हुए सूर्यके समान दिखायी देते थे ।। ७० ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि अम्बष्ठवधे त्रिनवतितमोऽध्यायः ।। ९३ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें अम्बष्ठवधविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९३ ।।
अध्याय (पृष्ठ 618)
चतुर्नवतितमोऽध्यायः
दुर्योधनका उपालम्भ सुनकर द्रोणाचार्यका उसके शरीरमें दिव्य कवच बाँधकर उसीको अर्जुनके साथ युद्धके लिये भेजना
संजय उवाच
ततः प्रविष्टे कौन्तेये सिंधुराजजिघांसया ।
द्रोणानीकं विनिर्भिद्य भोजानीकं च दुस्तरम् ॥ १ ॥
काम्बोजस्य च दायादे हते राजन् सुदक्षिणे ।
श्रुतायुधे च विक्रान्ते निहते सव्यसाचिना ॥ २ ॥
विप्रद्रुतेष्वनीकेषु विध्वस्तेषु समन्ततः ।
प्रभग्नं स्वबलं दृष्ट्वा पुत्रस्ते द्रोणमभ्ययात् ॥ ३ ॥
त्वरन्नेकरथेनैव समेत्य द्रोणमब्रवीत् ।
संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर जब कुन्तीकुमार अर्जुन सिन्धुराज जयद्रथका वध करनेकी इच्छासे द्रोणाचार्य और कृतवर्माका दुस्तर सेना-व्यूह भेदन करके आपकी सेनामें प्रविष्ट हो गये और सव्यसाची अर्जुनके हाथसे जब काम्बोजराजकुमार सुदक्षिण तथा पराक्रमी श्रुतायुध मार दिये गये तथा जब सारी सेनाएँ नष्ट-भ्रष्ट होकर चारों ओर भाग खड़ी हुईं, उस समय अपनी सम्पूर्ण सेनामें भगदड़ मची देख आपका पुत्र दुर्योधन बड़ी उतावलीके साथ एकमात्र रथके द्वारा द्रोणाचार्यके पास गया और उनसे मिलकर इस प्रकार बोला— ॥ १—३ १/२ ॥
गतः स पुरुषव्याघ्रः प्रमथ्यैतां महाचमूम् ॥ ४ ॥
अथ बुद्ध्या समीक्षस्व किन्नु कार्यमनन्तरम् ।
अर्जुनस्य विघाताय दारुणेऽस्मिन् जनक्षये ॥ ५ ॥
यथा स पुरुषव्याघ्रो न हन्येत जयद्रथः ।
तथा विधत्स्व भद्रं ते त्वं हि नः परमा गतिः ॥ ६ ॥
‘गुरुदेव! पुरुषसिंह अर्जुन हमारी इस विशाल सेनाको मथकर व्यूहके भीतर चला गया। अब आप अपनी बुद्धिसे यह विचार कीजिये कि इसके बाद अर्जुनके विनाशके लिये क्या करना चाहिये? इस भयंकर नरसंहारमें जिस प्रकार भी पुरुषसिंह जयद्रथ न मारे जायें, वैसा उपाय कीजिये। आपका कल्याण हो। हमारा सबसे बड़ा सहारा आप ही हैं॥ ४—६ ॥
असौ धनंजयाग्निर्हि कोपमारुतचोदितः । सेनाकक्षं दहति मे वह्निः कक्षमि्वोत्थितः ॥ ७ ॥ ‘जैसे सहसा उठा हुआ दावानल सूखे घास-फूँस अथवा जंगलको जलाकर भस्म कर देता है, उसी प्रकार यह धनंजयरूपी अग्नि कोपरूपी प्रचण्ड वायुसे प्रेरित हो मेरे सैन्यरूपी सूखे वनको दग्ध किये देती है ॥ ७ ॥’
अतिक्रान्ते हि कौन्तेये भित्त्वा सैन्यं परंतप । जयद्रथस्य गोप्तारः संशयं परमं गताः ॥ ८ ॥ ‘शत्रुओंको संताप देनेवाले आचार्य! जबसे कुन्तीकुमार अर्जुन आपकी सेनाका व्यूह भेदकर आपको भी लाँघकर आगे चले गये हैं, तबसे जयद्रथकी रक्षा करनेवाले योद्धा महान् संशयमें पड़ गये हैं ॥ ८ ॥’
स्थिरा बुद्धिनरेन्द्राणामासीद् ब्रह्मविदां वर । नातिक्रमिष्यति द्रोणं जातु जीवं धनंजयः ॥ ९ ॥ ‘ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ गुरुदेव! हमारे पक्षके नरेशोंको यह दृढ़ विश्वास था कि अर्जुन द्रोणाचार्यके जीते-जी उन्हें लाँघकर सेनाके भीतर नहीं घुस सकेगा ॥ ९ ॥’
योऽसौ पार्थो व्यतिक्रान्तो मिषतस्ते महाद्युते । सर्वं ह्यद्यातुरं मन्ये नेदमस्ति बलं मम ॥ १० ॥ ‘परंतु महातेजस्वी वीर! आपके देखते-देखते वह कुन्तीकुमार अर्जुन आपको लाँघकर जो व्यूहमें घुस गया है, इससे मैं अपनी इस सारी सेनाको व्याकुल और विनष्ट हुई-सी मानता हूँ। अब मेरी इस सेनाका अस्तित्व नहीं रहेगा ॥ १० ॥’
जानामि त्वां महाभाग पाण्डवानां हिते रतम् । तथा मुह्यामि च ब्रह्मन् कार्यवत्तां विचिन्तयन् ॥ ११ ॥ ‘ब्रह्मन्! महाभाग! मैं यह जानता हूँ कि आप पाण्डवोंके हितमें तत्पर रहनेवाले हैं; इसीलिये अपने कार्यकी गुरुताका विचार करके मोहित हो रहा हूँ ॥ ११ ॥’
यथाशक्ति च ते ब्रह्मन् वर्तये वृत्तिमुत्तमाम् । प्रीणामि च यथाशक्ति तच्च त्वं नावबुध्यसे ॥ १२ ॥ ‘विप्रवर! मैं यथाशक्ति आपके लिये उत्तम जीविकावृत्तिकी व्यवस्था करता रहता हूँ और अपनी शक्तिभर आपको प्रसन्न रखनेकी चेष्टा करता रहता हूँ; परंतु इन सब बातोंको आप याद नहीं रखते हैं ॥ १२ ॥’
अस्मान्न त्वं सदा भक्तानिच्छस्यमितविक्रम । पाण्डवान् सततं प्रीणास्यस्माकं विप्रिये रतान् ॥ १३ ॥ ‘अमितपराक्रमी आचार्य! हम आपके चरणोंमें सदा भक्ति रखते हैं तो भी आप हमें नहीं चाहते हैं और जो सदा हमलोगोंका अप्रिय करनेमें तत्पर रहते हैं, उन पाण्डवोंको आप निरन्तर प्रसन्न रखते हैं ॥ १३ ॥’
अस्मानेवोपजीवंस्त्वमस्माकं विप्रिये रतः। न ह्यहं त्वां विजानामि मधुदिग्धमिव क्षुरम्॥ १४॥ 'हमसे ही आपकी जीविका चलती है तो भी आप हमारा ही अप्रिय करनेमें संलग्न रहते हैं। मैं नहीं जानता था कि आप शहदमें डुबोये हुए छुरेके समान हैं॥ १४॥ नादास्यच्चेद् वरं मह्यं भवान् पाण्डवनिग्रहे। नावारयिष्यं गच्छन्तमहं सिन्धुपतिं गृहान्॥ १५॥ 'यदि आप मुझे अर्जुनको रोके रखनेका वर न देते तो मैं अपने घरको जाते हुए सिन्धुराज जयद्रथको कभी मना नहीं करता॥ १५॥ मया त्वाशंसमानेन त्वत्तस्त्राणमबुद्धिना। आश्वासितः सिन्धुपतिर्मोहाद् दत्तश्च मृत्यवे॥ १६॥ 'मुझ मूर्खने आपसे संरक्षण पानेका भरोसा करके सिन्धुराज जयद्रथको समझा-बुझाकर यहीं रोक लिया और इस प्रकार मोहवश मैंने उन्हें मौतके हाथमें सौंप दिया॥ १६॥ यमदंष्ट्रान्तरं प्राप्तो मुच्येतापि हि मानवः। नार्जुनस्य वशं प्राप्तो मुच्येताजौ जयद्रथः॥ १७॥ 'मनुष्य यमराजकी दाढ़ोंमें पड़कर भले ही बच जाय, परंतु रणभूमिमें अर्जुनके वशमें पड़े हुए जयद्रथके प्राण नहीं बच सकते॥ १७॥ स तथा कुरु शोणाश्व यथा मुच्येत सैन्धवः। मम चार्तप्रलापानां मा क्रुधः पाहि सैन्धवम्॥ १८॥ 'लाल घोड़ोंवाले आचार्य! आप कोई ऐसा प्रयत्न कीजिये, जिससे सिन्धुराज जयद्रथ मृत्युसे छुटकारा पा सके। मैंने आर्त होनेके कारण जो प्रलाप किये हैं, उनके लिये क्रोध न कीजियेगा; जैसे भी हो, सिन्धुराजकी रक्षा कीजिये'॥ १८॥
द्रोण उवाच
नाभ्यासूयामि ते वाक्यमश्वत्थाम्नासि मे समः। सत्यं तु ते प्रवक्ष्यामि तज्जुषस्व विशाम्पते॥ १९॥ द्रोणाचार्यने कहा—राजन्! तुमने जो बात कही है, उसके लिये मैं बुरा नहीं मानता; क्योंकि तुम मेरे लिये अश्वत्थामाके समान हो। परंतु जो सच्ची बात है, वह तुम्हें बता रहा हूँ; उसे ध्यान देकर सुनो—॥ १९॥ सारथिः प्रवरः कृष्णः शीघ्राश्चास्य हयोत्तमाः। अल्पं च विवरं कृत्वा तूर्णं याति धनंजयः॥ २०॥ श्रीकृष्ण अर्जुनके श्रेष्ठ सारथि हैं तथा उनके उत्तम घोड़े भी तेज चलनेवाले हैं। इसलिये थोड़ा-सा भी अवकाश बनाकर अर्जुन तत्काल सेनामें घुस जाते हैं॥
किं न पश्यसि बाणौघान् क्रोशमात्रे किरीटिनः । पश्चाद् रथस्य पतितान् क्षिप्तान् शीघ्रं हि गच्छतः ॥ २१ ॥ क्या तुम देखते नहीं हो कि मेरे चलाये हुए बाणसमूह शीघ्रगामी अर्जुनके रथके एक कोस पीछे पड़े हैं ॥ २१ ॥
न चाहं शीघ्रयानेऽद्य समर्थो वयसान्वितः । सेनामुखे च पार्थानामेतद् बलमुपस्थितम् ॥ २२ ॥ मैं बूढ़ा हो गया। अतः अब मैं शीघ्रतापूर्वक रथ चलानेमें असमर्थ हूँ। इधर मेरी सेनाके सामने यह कुन्तीकुमारोंकी भारी सेना उपस्थित है ॥ २२ ॥
युधिष्ठिरश्च मे ग्राह्यो मिषतां सर्वधन्विनाम् । एवं मया प्रतिज्ञातं क्षत्रमध्ये महाभुज ॥ २३ ॥ महाबाहो! मैंने क्षत्रियोंके बीचमें यह प्रतिज्ञा की है कि समस्त धनुर्धरोंके देखते-देखते युधिष्ठिरको कैद कर लूँगा ॥ २३ ॥
धनंजयेन चोत्सृष्टो वर्तते प्रमुखे नृप । तस्माद् व्यूहमुखं हित्वा नाहं योत्स्यामि फाल्गुनम् ॥ २४ ॥ नरेश्वर! इस समय युधिष्ठिर अर्जुनसे रहित होकर मेरे सामने खड़े हैं। ऐसी अवस्थामें मैं व्यूहका द्वार छोड़कर अर्जुनके साथ युद्ध करनेके लिये नहीं जाऊँगा ॥ २४ ॥
तुल्याभिजनकर्म्माणं शत्रुमेकं सहायवान् । गत्वा योधय मा भैस्त्वं त्वं ह्यस्य जगतः पतिः ॥ २५ ॥ तुम्हारे शत्रु अर्जुन भी तो तुम्हारे-जैसे ही कुल और पराक्रमसे युक्त हैं। इस समय वे अकेले हैं और तुम सहायकोंसे सम्पन्न हो। (वे राज्यसे च्युत हो गये हैं और तुम) इस सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हो। अतः डरो मत। जाकर अर्जुनसे युद्ध करो ॥ २५ ॥
राजा शूरः कृती दक्षो वैरमुत्पाद्य पाण्डवैः । वीर स्वयं प्रयाह्यात्र यत्र पार्थो धनंजयः ॥ २६ ॥ तुम राजा, शूरवीर, विद्वान् और युद्धकुशल हो। वीर! तुमने ही पाण्डवोंके साथ वैर बाँधा है। अतः जहाँ कुन्तीकुमार अर्जुन गये हैं, वहाँ उनसे युद्ध करनेके लिये स्वयं ही शीघ्रतापूर्वक जाओ ॥ २६ ॥
दुर्योधन उवाच
कथं त्वामप्यतिक्रान्तः सर्वशस्त्रभृतां वरम् । धनंजयो मया शक्य आचार्य प्रतिबाधितुम् ॥ २७ ॥ दुर्योधन बोला—आचार्य! आप सम्पूर्ण शस्त्र-धारियोंमें श्रेष्ठ हैं। जो आपको भी लाँघकर आगे बढ़ गया, वह अर्जुन मेरे द्वारा कैसे रोका जा सकता है? ॥
अपि शक्यो रणे जेतुं वज्रहस्तः पुरंदरः ।
नार्जुनः समरे शक्यो जेतुं परपुरंजयः ॥ २८ ॥ युद्धमें वज्रधारी इन्द्रको भी जीता जा सकता है; परंतु समरांगणमें शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाले अर्जुनको जीतना असम्भव है ॥ २८ ॥ येन भोजश्च हार्दिक्यो भवांश्च त्रिदशोपमः । अस्त्रप्रतापेन जितौ श्रुतायुश्च निबर्हितः ॥ २९ ॥ सुदक्षिणश्च निहतः स च राजा श्रुतायुधः । श्रुतायुश्चाच्युतायुश्च म्लेच्छाश्चायुतशो हताः ॥ ३० ॥ तं कथं पाण्डवं युद्धे दहन्तमिव पावकम् । प्रतियोत्स्यामि दुर्धर्षं तमहं शस्त्रकोविदम् ॥ ३१ ॥ जिसने भोजवंशी कृतवर्मा तथा देवताओंके समान तेजस्वी आपको भी अपने अस्त्रके प्रतापसे पराजित कर दिया, श्रुतायुका संहार कर डाला, काम्बोजराज सुदक्षिण तथा राजा श्रुतायुधको भी मार डाला, श्रुतायु, अच्युतायु तथा सहस्रों म्लेच्छ सैनिकोंके भी प्राण ले लिये, युद्धमें अग्निके समान शत्रुओंको दग्ध करनेवाले और अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता उस दुर्धर्ष वीर पाण्डुपुत्र अर्जुनके साथ मैं कैसे युद्ध कर सकूँगा? ॥ २९–३१ ॥ क्षमं च मन्यसे युद्धं मम तेनाद्य संयुगे । परवानस्मि भवति प्रेष्यवद् रक्ष मद्यशः ॥ ३२ ॥ यदि आज युद्धस्थलमें आप अर्जुनके साथ मेरा युद्ध करना उचित मानते हैं तो मैं एक सेवककी भाँति आपकी आज्ञाके अधीन हूँ। आप मेरे यशकी रक्षा कीजिये ॥ ३२ ॥
द्रोण उवाच
सत्यं वदसि कौरव्य दुराधर्षो धनंजयः । अहं तु तत् करिष्यामि यथैनं प्रसहिष्यसि ॥ ३३ ॥ **द्रोणाचार्यने कहा—**कुरुनन्दन! तुम ठीक कहते हो। अर्जुन अवश्य दुर्जय वीर हैं। परंतु मैं एक ऐसा उपाय कर दूँगा, जिससे तुम उनका वेग सह सकोगे ॥ ३३ ॥ अद्भुतं चाद्य पश्यन्तु लोके सर्वधनुर्धराः । विषक्तं त्वयि कौन्तेयं वासुदेवस्य पश्यतः ॥ ३४ ॥ आज संसारके सम्पूर्ण धनुर्धर भगवान् श्रीकृष्णके सामने ही कुन्तीकुमार अर्जुनको तुम्हारे साथ युद्धमें उलझे रहनेकी अद्भुत घटना देखें ॥ ३४ ॥ एष ते कवचं राजंस्तथा बध्नामि काञ्चनम् । यथा न बाणा नास्त्राणि प्रहरिष्यन्ति ते रणे ॥ ३५ ॥ राजन्! मैं यह सुवर्णमय कवच तुम्हारे शरीरमें इस प्रकार बाँध देता हूँ, जिससे युद्धस्थलमें छूटनेवाले बाण और अन्य अस्त्र तुम्हें चोट नहीं पहुँचा सकेंगे ॥ ३५ ॥ यदि त्वां सासुरसुराः सयक्षोरगराक्षसाः ।
योध्यन्ति त्रयो लोकाः सनरा नास्ति ते भयम् ॥ ३६ ॥ यदि मनुष्योंसहित देवता, असुर, यक्ष, नाग, राक्षस तथा तीनों लोकके प्राणी तुमसे युद्ध करते हों तो भी आज तुम्हें कोई भय नहीं होगा ॥ ३६ ॥ न कृष्णो न च कौन्तेयो न चान्यः शस्त्रभृद् रणे । शरानर्पयितुं कश्चित् कवचे तव शक्ष्यति ॥ ३७ ॥ इस कवचके रहते हुए श्रीकृष्ण, अर्जुन तथा दूसरे कोई शस्त्रधारी योद्धा भी तुम्हें बाणोंद्वारा चोट पहुँचानेमें समर्थ न हो सकेंगे ॥ ३७ ॥ स त्वं कवचमास्थाय क्रुद्धमद्य रणेऽर्जुनम् । त्वरमाणः स्वयं याहि न त्वासौ विसहिष्यति ॥ ३८ ॥ अतः तुम यह कवच धारण करके शीघ्रतापूर्वक रणक्षेत्रमें कुपित हुए अर्जुनका सामना करनेके लिये स्वयं ही जाओ। वे तुम्हारा वेग नहीं सह सकेंगे ॥ ३८ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा त्वरन् द्रोणः स्पृष्ट्वाम्भा वर्म भास्वरम् । आबबन्धाद्भुततमं जपन् मन्त्रं यथाविधि ॥ ३९ ॥ रणे तस्मिन् सुमहति विजयाय सुतस्य ते । विसिस्मापयिषुल्लोकान् विद्यया ब्रह्मवित्तमः ॥ ४० ॥ संजय कहते हैं— राजन्! ऐसा कहकर वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यने अपनी विद्याके प्रभावसे सब लोगोंको आश्चर्यमें डालनेकी इच्छा रखते हुए तुरंत आचमन करके उस महायुद्धमें आपके पुत्र दुर्योधनकी विजयके लिये उसके शरीरमें विधिपूर्वक मन्त्रजपके साथ-साथ वह अत्यन्त तेजस्वी अद्भुत कवच बाँध दिया ॥ ३९-४० ॥
द्रोण उवाच
करोतु स्वस्ति ते ब्रह्म ब्रह्मा चापि द्विजातयः । सरीसृपाश्च ये श्रेष्ठास्तेभ्यस्ते स्वस्ति भारत ॥ ४१ ॥ द्रोणाचार्य बोले— भरतनन्दन! परब्रह्म परमात्मा तुम्हारा कल्याण करें। ब्रह्माजी तथा ब्राह्मण तुम्हारा मंगल करें। जो श्रेष्ठ सर्प हैं, उनसे भी तुम्हारा कल्याण हो ॥ ४१ ॥ ययातिर्नाहुषश्चैव धुन्धुमारो भगीरथः । तुभ्यं राजर्षयः सर्वे स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा ॥ ४२ ॥ नहुषपुत्र ययाति, धुन्धुमार और भगीरथ आदि सभी राजर्षि सदा तुम्हारी भलाई करें ॥ ४२ ॥ स्वस्ति तेऽस्त्वेकपादेभ्यो बहुपादेभ्य एव च । स्वस्त्यस्त्वपादकेभ्यश्च नित्यं तव महारणे ॥ ४३ ॥
इस महायुद्धमें एक पैरवाले, अनेक पैरवाले तथा पैरोंसे रहित प्राणियोंसे तुम्हारा नित्य मंगल हो ॥ ४३ ॥
स्वाहा स्वधा शची चैव स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा ।
लक्ष्मीरुन्धती चैव कुरुतां स्वस्ति तेऽनघ ॥ ४४ ॥
निष्पाप नरेश! स्वाहा, स्वधा और शची आदि देवियाँ तुम्हारा सदा कल्याण करें। लक्ष्मी और अरुन्धती भी तुम्हारा मंगल करें ॥ ४४ ॥
असितो देवलश्चैव विश्वामित्रस्तथाङ्गिराः ।
वसिष्ठः कश्यपश्चैव स्वस्ति कुर्वन्तु ते नृप ॥ ४५ ॥
नरेश्वर! असित, देवल, विश्वामित्र, अंगिरा, वसिष्ठ तथा कश्यप तुम्हारा भला करें ॥ ४५ ॥
धाता विधाता लोकेशो दिशश्च सदिगीश्वराः ।
स्वस्ति तेऽद्य प्रयच्छन्तु कार्तिकेयश्च षण्मुखः ॥ ४६ ॥
धाता, विधाता, लोकनाथ ब्रह्मा, दिशाएँ, दिक्पाल तथा षडानन कार्तिकेय भी आज तुम्हें कल्याण प्रदान करें ॥ ४६ ॥
विवस्वान् भगवान् स्वस्ति करोतु तव सर्वशः ।
दिग्गजाश्चैव चत्वारः क्षितिश्च गगनं ग्रहाः ॥ ४७ ॥
भगवान् सूर्य सब प्रकारसे तुम्हारा मंगल करें। चारों दिग्गज, पृथ्वी, आकाश और ग्रह तुम्हारा भला करें ॥
अधस्ताद् धरणीं योऽसौ सदा धारयते नृप ।
शेषश्च पन्नगश्रेष्ठः स्वस्ति तुभ्यं प्रयच्छतु ॥ ४८ ॥
राजन्! जो सदा इस पृथ्वीके नीचे रहकर इसे अपने मस्तकपर धारण करते हैं, वे पन्नगश्रेष्ठ भगवान् शेषनाग तुम्हें कल्याण प्रदान करें ॥ ४८ ॥
गान्धारे युधि विक्रम्य निर्जिताः सुरसत्तमाः ।
पुरा वृत्रेण दैत्येन भिन्नदेहाः सहस्रशः ॥ ४९ ॥
गान्धारीनन्दन! प्राचीन कालकी बात है, वृत्रासुरने युद्धमें पराक्रमपूर्वक सहस्रों श्रेष्ठ देवताओंके शरीरको विदीर्ण करके उन्हें परास्त कर दिया था ॥ ४९ ॥
हृततेजोबलाः सर्वे तदा सेन्द्रा दिवौकसः ।
ब्रह्माणं शरणं जग्मुर्वृत्राद् भीता महासुरात् ॥ ५० ॥
उस समय तेज और बलसे हीन हुए इन्द्र आदि सम्पूर्ण देवता महान् असुर वृत्रसे भयभीत हो ब्रह्माजीकी शरणमें गये ॥ ५० ॥
देवा ऊचुः
प्रमर्दितानां वृत्रेण देवानां देवसत्तम ।
गतिर्भव सुरश्रेष्ठ त्राहि नो महतो भयात् ॥ ५१ ॥ **देवता बोले—**देवप्रवर! सुरश्रेष्ठ! वृत्रासुरने जिन्हें सब प्रकारसे कुचल दिया है, उन देवताओंके लिये आप आश्रयदाता हों। महान् भयसे हमारी रक्षा करें ॥ अथ पार्श्वे स्थितं विष्णुं शक्रादींश्च सुरोत्तमान् । प्राह तथ्यमिदं वाक्यं विषण्णान् सुरसत्तमान् ॥ ५२ ॥ तब अपने पास खड़े हुए भगवान् विष्णु तथा विषादमें भरे हुए इन्द्र आदि श्रेष्ठ देवताओंसे ब्रह्माजीने यह यथार्थ बात कही— ॥ ५२ ॥ रक्ष्या मे सततं देवाः सहेन्द्राः सद्द्विजातयः । त्वष्टुः सुदुर्धरं तेजो येन वृत्रो विनिर्मितः ॥ ५३ ॥ ‘देवताओ! इन्द्र आदि देवता और ब्राह्मण सदा ही मेरे रक्षणीय हैं। परंतु वृत्रासुरका जिससे निर्माण हुआ है, वह त्वष्टा प्रजापतिका अत्यन्त दुर्धर्ष तेज है ॥ ५३ ॥ त्वष्ट्रा पुरा तपस्तप्त्वा वर्षायुतशतं तदा । वृत्रो विनिर्मितो देवाः प्राप्यानुज्ञां महेश्वरात् ॥ ५४ ॥ ‘देवगण! प्राचीन कालमें त्वष्टा प्रजापतिने दस लाख वर्षोंतक तपस्या करके भगवान् शंकरसे वरदान पाकर वृत्रासुरको उत्पन्न किया था ॥ ५४ ॥ स तस्यैव प्रसादाद् वो हन्यादेव रिपुर्बली । नागत्वा शंकरस्थानं भगवान् दृश्यते हरः ॥ ५५ ॥ ‘वह बलवान् शत्रु भगवान् शंकरके ही प्रसादसे निश्चय ही तुम सब लोगोंको मार सकता है। अतः भगवान् शंकरके निवासस्थानपर गये बिना उनका दर्शन नहीं हो सकता ॥ ५५ ॥ दृष्ट्वा जेष्यथ वृत्रं तं क्षिप्रं गच्छत मन्दरम् । यत्रास्ते तपसां योनिर्दक्षयज्ञविनाशनः ॥ ५६ ॥ पिनाकी सर्वभूतेशो भगनेत्रनिपातनः । ‘उनका दर्शन पाकर तुमलोग वृत्रासुरको जीत सकोगे। अतः शीघ्र ही मन्दराचलको चलो, जहाँ तपस्याके उत्पत्तिस्थान, दक्षयज्ञविनाशक तथा भगदेवताके नेत्रोंका नाश करनेवाले सर्वभूतेश्वर पिनाकधारी भगवान् शिव विराजमान हैं’ ॥ ५६ १/२ ॥ ते गत्वा सहिता देवा ब्रह्मणा सह मन्दरम् ॥ ५७ ॥ अपश्यंस्तेजसां राशिं सूर्यकोटिसमप्रभम् । ‘तब एकत्र हुए उन सब देवताओंने ब्रह्माजीके साथ मन्दराचलपर जाकर करोड़ों सूर्योंके समान कान्तिमान् तेजोरराशि भगवान् शिवका दर्शन किया ॥ ५७ १/२ ॥ सोऽब्रवीत् स्वागतं देवा ब्रुत किं करवाण्यहम् ॥ ५८ ॥ अमोघं दर्शनं मह्यं कामप्राप्तिरतोऽस्तु वः ।
उस समय भगवान् शिवने कहा—‘देवताओ! तुम्हारा स्वागत है। बोलो, मैं तुम्हारे लिये
क्या करूँ? मेरा दर्शन अमोघ है। अतः तुम्हें अपने अभीष्ट मनोरथोंकी प्राप्ति हो' ।।
एवमुक्तास्तु ते सर्वे प्रत्यूचुस्तं दिवौकसः ।। ५९ ।।
तेजो हृतं नो वृत्रेण गतिर्भव दिवौकसाम् ।
मूर्तीरीक्षस्व नो देव प्रहारैर्जर्जरीकृताः ।
शरणं त्वां प्रपन्नाः स्म गतिर्भव महेश्वर ।। ६० ।।
उनके ऐसा कहनेपर सम्पूर्ण देवता इस प्रकार बोले—‘देव! वृत्रासुरने हमारा तेज हर
लिया है। आप देवताओंके आश्रयदाता हों। महेश्वर! आप हमारे शरीरोंकी दशा देखिये। हम
वृत्रासुरके प्रहारोंसे जर्जर हो गये हैं, इसलिये आपकी शरणमें आये हैं। आप हमें आश्रय
दीजिये' ।। ५९-६० ।।
शर्व उवाच
विदितं वो यथा देवाः कृत्येयं सुमहाबला ।
त्वष्टुस्तेजोभवा घोरा दुर्निवार्याकृतात्मभिः ।। ६१ ।।
भगवान् शिव बोले—देवताओ! तुम्हें विदित हो कि यह प्रजापति त्वष्टाके तेजसे
उत्पन्न हुई अत्यन्त प्रबल एवं भयंकर कृत्या है। जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें
नहीं किया है, ऐसे लोगोंके लिये इस कृत्याका निवारण करना अत्यन्त कठिन है ।। ६१ ।।
अवश्यं तु मया कार्यं साह्यं सर्वदिवौकसाम् ।
ममेदं गात्रजं शक्र कवचं गृह्य भास्वरम् ।। ६२ ।।
तथापि मुझे सम्पूर्ण देवताओंकी सहायता अवश्य करनी चाहिये। अतः इन्द्र! मेरे
शरीरसे उत्पन्न हुए इस तेजस्वी कवचको ग्रहण करो ।। ६२ ।।
बधानानेन मन्त्रेण मानसेन सुरेश्वर ।
वधायासुरमुख्यस्य वृत्रस्य सुरघातिनः ।। ६३ ।।
सुरेश्वर! मेरे बताये हुए इस मन्त्रका मानसिक जप करके असुरमुख्य देवशत्रु वृत्रका
वध करनेके लिये इसे अपने शरीरमें बाँध लो ।। ६३ ।।
द्रोण उवाच
इत्युक्त्वा वरदः प्रादाद् वर्म तन्मन्त्रमेव च ।
स तेन वर्मणा गुप्तः प्रायाद् वृत्रचमूं प्रति ।। ६४ ।।
द्रोणाचार्य कहते हैं—राजन्! ऐसा कहकर वरदायक भगवान् शंकरने वह कवच और
उसका मन्त्र उन्हें दे दिया। उस कवचसे सुरक्षित हो इन्द्र वृत्रासुरकी सेनाका सामना करनेके
लिये गये ।। ६४ ।।
नानाविधैश्च शस्त्रौघैः पात्यमानैर्महारणे ।
न संधिः शक्यते भेत्तुं वर्मबन्धस्य तस्य तु ।। ६५ ।।
उस महान् युद्धमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंके समुदाय उनके ऊपर चलाये गये; परंतु उनके द्वारा इन्द्रके उस कवच-बन्धनकी सन्धि भी नहीं काटी जा सकी॥
ततो जघान समरे वृत्रं देवपतिः स्वयम् ।
तं च मन्त्रमयं बन्धं वर्म चाङ्गिरसे ददौ ॥ ६६ ॥
तदनन्तर देवराज इन्द्रने स्वयं ही समरांगणमें वृत्रासुरको मार डाला। इसके बाद उन्होंने वह कवच तथा उसे बाँधनेकी मन्त्रयुक्त विधि अंगिराको दे दी ॥ ६६ ॥
अङ्गिराः प्राह पुत्रस्य मन्त्रज्ञस्य बृहस्पतेः ।
बृहस्पतिरथोवाच आग्निवेश्याय धीमते ॥ ६७ ॥
अंगिराने अपने मन्त्रज्ञ पुत्र बृहस्पतिको उसका उपदेश दिया और बृहस्पतिने परम बुद्धिमान् आग्निवेश्यको यह विद्या प्रदान की॥ ६७ ॥
आग्निवेश्यो मम प्रादात् तेन बध्नामि वर्म ते ।
तवाद्य देहरक्षार्थं मन्त्रेण नृपसत्तम ॥ ६८ ॥
आग्निवेश्यने मुझे उसका उपदेश किया था। नृपश्रेष्ठ! उसी मन्त्रसे आज तुम्हारे शरीरकी रक्षाके लिये मैं यह कवच बाँध रहा हूँ॥ ६८॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा ततो द्रोणस्तव पुत्रं महाद्युतिम् ।
पुनरेव वचः प्राह शनैराचार्यपुङ्गवः ॥ ६९ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! वहाँ आपके महातेजस्वी पुत्रसे यह प्रसंग सुनाकर आचार्यशिरोमणि द्रोणने पुनः धीरेसे यह बात कही— ॥ ६९ ॥
ब्रह्मसूत्रेण बध्नामि कवचं तव भारत ।
हिरण्यगर्भेण यथा बद्धं विष्णोः पुरा रणे ॥ ७० ॥
‘भारत! जैसे पूर्वकालमें रणक्षेत्रमें भगवान् ब्रह्माने श्रीविष्णुके शरीरमें कवच बाँधा था, उसी प्रकार मैं भी ब्रह्मसूत्रसे तुम्हारे इस कवचको बाँधता हूँ ॥ ७० ॥
यथा च ब्रह्मणा बद्धं संग्रामे तारकामये ।
शक्रस्य कवचं दिव्यं तथा बध्नाम्यहं तव ॥ ७१ ॥
‘तारकामय संग्राममें ब्रह्माजीने इन्द्रके शरीरमें जिस प्रकार दिव्य कवच बाँधा था, उसी प्रकार मैं भी तुम्हारे शरीरमें बाँध रहा हूँ ॥ ७१ ॥
बद्ध्वा तु कवचं तस्य मन्त्रेण विधिपूर्वकम् ।
प्रेषयामास राजानं युद्धाय महते द्विजः ॥ ७२ ॥
इस प्रकार मन्त्रके द्वारा राजा दुर्योधनके शरीरमें विधिपूर्वक कवच बाँधकर विप्रवर द्रोणाचार्यने उसे महान् युद्धके लिये भेजा ॥ ७२ ॥
स संनद्धो महाबाहुराचार्येण महात्मना ।
रथानां च सहस्रेण त्रिगर्तानां प्रहारिणाम् ॥ ७३ ॥ तथा दन्तिसहस्रेण मत्तानां वीर्यशालिनाम् । अश्वानां नियुतेनैव तथान्यैश्च महारथैः ॥ ७४ ॥ वृतः प्रायान्महाबाहुरर्जुनस्य रथं प्रति । नानावादित्रघोषेण यथा वैरोचनिस्तथा ॥ ७५ ॥ महामना आचार्यके द्वारा अपने शरीरमें कवच बँध जानेपर महाबाहु दुर्योधन प्रहार करनेमें कुशल एक सहस्र त्रिगर्तदेशीय रथियों, एक सहस्र पराक्रमशाली मतवाले हाथीसवारों, एक लाख घुड़सवारों तथा अन्य महारथियोंसे घिरकर नाना प्रकारके रणवाद्योंकी ध्वनिके साथ अर्जुनके रथकी ओर चला। ठीक उसी तरह, जैसे राजा बलि (इन्द्रके साथ युद्धके लिये) यात्रा करते हैं ॥ ७३—७४ ॥
ततः शब्दो महानासीत् सैन्यानां तव भारत । अगाधं प्रस्थितं दृष्ट्वा समुद्रमिव कौरवम् ॥ ७६ ॥ भारत! उस समय अगाध समुद्रके समान कुरुनन्दन दुर्योधनको युद्धके लिये प्रस्थान करते देख आपकी सेनामें बड़े जोरसे कोलाहल होने लगा ॥ ७६ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि दुर्योधनकवचबन्धने चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥ ९४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें दुर्योधनका कवच-बन्धनविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९४ ॥
अध्याय (पृष्ठ 629)
पञ्चनवतितमोऽध्यायः
द्रोण और धृष्टद्युम्नका भीषण संग्राम तथा उभय पक्षके प्रमुख वीरोंका परस्पर संकुल युद्ध
संजय उवाच
प्रविष्टयोर्महाराज पार्थवार्ष्णेययो रणे ।
दुर्योधने प्रयाते च पृष्ठतः पुरुषर्षभे ॥ १ ॥
जवेनाभ्यद्रवन् द्रोणं महता निःस्वनेन च ।
पाण्डवाः सोमकैः सार्धं ततो युद्धमवर्तत ॥ २ ॥
संजय कहते हैं—महाराज! उस रणक्षेत्रमें जब श्रीकृष्ण और अर्जुन कौरव-सेनाके भीतर प्रवेश कर गये तथा पुरुषप्रवर दुर्योधन उनका पीछा करता हुआ आगे बढ़ गया, तब सोमकोंसहित पाण्डवोंने बड़ी भारी गर्जनाके साथ द्रोणाचार्यपर वेगपूर्वक धावा किया। फिर तो वहाँ बड़े जोरसे युद्ध होने लगा ॥ १-२ ॥
तद् युद्धमभवत् तीव्रं तुमुलं लोमहर्षणम् ।
कुरूणां पाण्डवानां च व्यूहस्य पुरतोऽद्भुतम् ॥ ३ ॥
व्यूहके द्वारपर होनेवाला कौरवों तथा पाण्डवोंका वह अद्भुत युद्ध अत्यन्त तीव्र एवं भयंकर था। उसे देखकर लोगोंके रोंगटे खड़े हो जाते थे ॥ ३ ॥
राजन् कदाचिन्नास्माभिर्दृष्टं तादृङ् न च श्रुतम् ।
यादृङ् मध्यगते सूर्ये युद्धमासीद् विशाम्पते ॥ ४ ॥
राजन्! प्रजानाथ! वहाँ मध्याह्नकालमें जैसा वह युद्ध हुआ था, वैसा न तो मैंने कभी देखा था और न सुना ही था ॥ ४ ॥
धृष्टद्युम्नमुखाः पार्था व्यूढानीकाः प्रहारिणः ।
द्रोणस्य सैन्यं ते सर्वे शरवर्षैरवाकिरन् ॥ ५ ॥
धृष्टद्युम्न आदि पाण्डवपक्षीय सब प्रहारकुशल योद्धा अपनी सेनाका व्यूह बनाकर द्रोणाचार्यकी सेनापर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ५ ॥
वयं द्रोणं पुरस्कृत्य सर्वशस्त्रभृतां वरम् ।
पार्षतप्रमुखान् पार्थानभ्यवर्षाम सायकैः ॥ ६ ॥
उस समय हमलोग सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्यको आगे करके धृष्टद्युम्न आदि पाण्डव-सैनिकोंपर बाण-वर्षा कर रहे थे ॥ ६ ॥
महामेघाविवोदीर्णौ मिश्रवातौ हिमात्यये ।
सेनाग्रे प्रचकाशेते रुचिरे रथभूषिते ॥ ७ ॥
रथोंसे विभूषित हुई वे दोनों प्रधान एवं सुन्दर सेनाएँ हेमन्तके अन्त (शिशिर)-में उठे हुए वायुयुक्त दो महामेघोंके समान प्रकाशित हो रही थीं ॥ ७ ॥ समेत्य तु महासेने चक्रतुर्वेगमुत्तमम् । जाह्नवीयमुने नद्यौ प्रावृषीवोल्बणोदके ॥ ८ ॥ वे दोनों विशाल सेनाएँ परस्पर भिड़कर विजयके लिये बड़े वेगसे आगे बढ़नेका प्रयत्न करने लगीं; मानो वर्षा-ऋतुमें जलकी बाढ़ आनेसे बड़ी हुई गंगा और यमुना दोनों नदियाँ बड़े वेगसे मिल रही हों ॥ ८ ॥ नानाशस्त्रपुरोवातो द्विपाश्वरथसंवृतः । गदाविद्युन्महारौद्रः संग्रामजलदो महान् ॥ ९ ॥ भारद्वाजानिलोद्धूतः शरधारासहस्रवान् । अभ्यवर्षन्महासैन्यः पाण्डुसेनाग्निमुद्धतम् ॥ १० ॥ उस समय महान् सैन्यदलसे संयुक्त एवं हाथी, घोड़े और रथोंसे भरा हुआ वह संग्राम महान् मेघके समान जान पड़ता था। नाना प्रकारके शस्त्र पूर्ववात (पुरवैया)-के तुल्य चल रहे थे। गदाएँ विद्युत्के समान प्रकाशित होती थीं। देखनेमें वह संग्राम-मेघ बड़ा भयंकर जान पड़ता था। द्रोणाचार्य वायुके समान उसे संचालित कर रहे थे तथा उससे बाणरूपी जलकी सहस्रों धाराएँ गिर रही थीं और इस प्रकार वह अग्निके समान उठी हुई पाण्डव-सेनापर सब ओरसे वर्षा कर रहा था ॥ ९-१० ॥ समुद्रमिव घर्मान्ते विशन् घोरो महानिलः । व्यक्षोभयदनीकानि पाण्डवानां द्विजोत्तमः ॥ ११ ॥ जैसे ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें बड़े जोरसे उठी हुई भयंकर वायु महासागरमें क्षोभ उत्पन्न करके वहाँ ज्वारका दृश्य उपस्थित कर देती है, उसी प्रकार विप्रवर द्रोणाचार्यने पाण्डव-सेनामें हलचल मचा दी ॥ ११ ॥ तेऽपि सर्वप्रयत्नेन द्रोणमेव समाद्रवन् । बिभित्सन्तो महासेतुं वार्योघाः प्रबला इव ॥ १२ ॥ पाण्डव-योद्धाओंने भी सारी शक्ति लगाकर द्रोणपर ही धावा किया था; मानो पानीके प्रखर प्रवाह किसी महान् पुलको तोड़ डालना चाहते हों ॥ १२ ॥ वारयामास तान् द्रोणो जलौघमचलो यथा । पाण्डवान् समरे क्रुद्धान् पञ्चालांश्च सकेकयान् ॥ १३ ॥ जैसे सामने खड़ा हुआ पर्वत आती हुई जलराशिको रोक देता है, उसी प्रकार समरांगणमें द्रोणाचार्यने कुपित हुए पाण्डवों, पांचालों तथा केकयोंको रोक दिया था ॥ १३ ॥ अथापरे च राजानः परिवृत्य समन्ततः । महाबला रणे शूराः पञ्चालानन्ववारयन् ॥ १४ ॥
इसी प्रकार दूसरे महाबली शूरवीर नरेश भी उस युद्धस्थलमें सब ओरसे लौटकर पांचालोंका ही प्रतिरोध करने लगे ।। १४ ।।
ततो रणे नरव्याघ्रः पार्षतः पाण्डवैः सह । संजघानासकृद् द्रोणं बिभित्सुररिवाहिनीम् ।। १५ ।। तदनन्तर रणक्षेत्रमें पाण्डवोंसहित नरश्रेष्ठ धृष्टद्युम्नने शत्रुसेनाके व्यूहका भेदन करनेकी इच्छासे द्रोणाचार्यपर बारंबार प्रहार किया ।। १५ ।।
यथैव शरवर्षाणि द्रोणो वर्षति पार्षते । तथैव शरवर्षाणि धृष्टद्युम्नोऽप्यवर्षत ।। १६ ।। आचार्य द्रोण धृष्टद्युम्नपर जैसे बाणोंकी वर्षा करते थे, धृष्टद्युम्न भी द्रोणपर वैसे ही बाण बरसाते थे ।। १६ ।।
सनिस्त्रिंशपुरोवातः शक्तिप्रासर्ष्टिसंवृतः । ज्याविद्युच्चापसंह्लादो धृष्टद्युम्नबलाहकः ।। १७ ।। शरधाराश्मवर्षाणि व्यसृजत् सर्वतो दिशम् । निघ्नन् रथवराश्वौघान् प्लावयामास वाहिनीम् ।। १८ ।। उस समय धृष्टद्युम्न एक महामेघके समान जान पड़ते थे। उनकी तलवार पुरवैया हवाके समान चल रही थी। वे शक्ति, प्रास एवं ऋष्टि आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे। उनकी प्रत्यंचा विद्युत्के समान प्रकाशित होती थी। धनुषकी टंकार मेघगर्जनाके समान जान पड़ती थी। उस धृष्टद्युम्नरूपी मेघने श्रेष्ठ रथी और घुड़सवारोंके समूहरूपी खेतीको नष्ट करनेके लिये सम्पूर्ण दिशाओंमें बाणरूपी जलकी धारा और अस्त्र-शस्त्ररूपी पत्थर बरसाते हुए शत्रु-सेनाको आप्लावित कर दिया ।। १७-१८ ।।
यं यमार्ज्छच्छरैर्द्रोणः पाण्डवानां रथव्रजम् । ततस्ततः शरैर्द्रोणमपाकर्षत पार्षतः ।। १९ ।। द्रोणाचार्य बाणोंद्वारा पाण्डवोंकी जिस-जिस रथसेनापर आक्रमण करते थे, धृष्टद्युम्न तत्काल बाणोंकी वर्षा करके उस-उस ओरसे उन्हें लौटा देते थे ।। १९ ।।
तथा तु यतमानस्य द्रोणस्य युधि भारत । धृष्टद्युम्नं समासाद्य त्रिधा सैन्यमभिद्यत ।। २० ।। भारत! युद्धमें इस प्रकार विजयके लिये प्रयत्नशील हुए द्रोणाचार्यकी सेना धृष्टद्युम्नके पास पहुँचकर तीन भागोंमें बँट गयी ।। २० ।।
भोजमेकेऽभ्यवर्तन्त जलसंधं तथापरे । पाण्डवैर्हन्यमानाश्च द्रोणमेवापरे ययुः ।। २१ ।। पाण्डव-योद्धाओंकी मार खाकर कुछ सैनिक कृतवर्माके पास चले गये, दूसरे जलसंधके पास भाग गये और शेष सभी योद्धा द्रोणाचार्यका ही अनुसरण करने लगे ।। २१ ।।
संघट्टयति सैन्यानि द्रोणस्तु रथिनां वरः ।
व्यधमच्चापि तान्यस्य धृष्टद्युम्नो महारथः ॥ २२ ॥
रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोण बारंबार अपनी सेनाओंको संगठित करते और महारथी धृष्टद्युम्न उनकी सब सेनाओंको छिन्न-भिन्न कर देते थे ॥ २२ ॥
धार्तराष्ट्रास्तथाभूता वध्यन्ते पाण्डुसृञ्जयैः ।
अगोपाः पशवोऽरण्ये बहुभिः श्वापदैरिव ॥ २३ ॥
जैसे वनमें बिना रक्षकके पशुओंको बहुत-से हिंसक जन्तु मार डालते हैं, उसी प्रकार पाण्डव और सृंजय आपके सैनिकोंका वध कर रहे थे ॥ २३ ॥
कालः स्म ग्रसते योधन् धृष्टद्युम्नेन मोहितान् ।
संग्रामे तुमुले तस्मिन्निति सम्मेनिरे जनाः ॥ २४ ॥
उस भयंकर संग्राममें सब लोग ऐसा मानने लगे कि काल ही धृष्टद्युम्नके द्वारा कौरवयोध्दाओंको मोहित करके उन्हें अपना ग्रास बना रहा है ॥ २४ ॥
कुनृपस्य यथा राष्ट्रं दुर्भिक्षव्याधितस्करैः ।
द्राव्यते तद्वदापन्ना पाण्डवैस्तव वाहिनी ॥ २५ ॥
जैसे दुष्ट राजाका राज्य दुर्भिक्ष, भाँति-भाँतिकी बीमारी और चोर-डाकुओंके उपद्रवके कारण उजाड़ हो जाता है, उसी प्रकार पाण्डव-सैनिकोंद्वारा विपत्तिमें पड़ी हुई आपकी सेना इधर-उधर खदेड़ी जा रही थी ॥ २५ ॥
अर्करश्मिविमिश्रेषु शस्त्रेषु कवचेषु च ।
चक्षूंषि प्रत्यहन्यन्त सैन्येन रजसा तथा ॥ २६ ॥
योद्धाओंके अस्त्र-शस्त्रों और कवचोंपर सूर्यकी किरणें पड़नेसे वहाँ आँखें चौंधिया जाती थीं और सेनासे इतनी धूल उठती थी कि उससे सबके नेत्र बंद हो जाते थे ॥ २६ ॥
त्रिधाभूतेषु सैन्येषु वध्यमानेषु पाण्डवैः ।
अमर्षितस्ततो द्रोणः पञ्चालान् व्यधमच्छरैः ॥ २७ ॥
जब पाण्डवोंके द्वारा मारी जाती हुई कौरव-सेना तीन भागोंमें बँट गयी, तब द्रोणाचार्यने अत्यन्त कुपित होकर अपने बाणोंद्वारा पांचालोंका विनाश आरम्भ किया ॥ २७ ॥
मृद्नतस्तान्यनीकानि निघ्नतश्चापि सायकैः ।
बभूव रूपं द्रोणस्य कालाग्नेरिव दीप्यतः ॥ २८ ॥
पांचालोंकी उन सेनाओंको रौंदते और बाणोंद्वारा उनका संहार करते हुए द्रोणाचार्यका स्वरूप प्रलयकालकी प्रज्वलित अग्निके समान जान पड़ता था ॥ २८ ॥
रथं नागं हयं चापि पत्तिंश्च विशाम्पते ।
एकैकेनेषुणा संख्ये निर्बिभेद महारथः ॥ २९ ॥
प्रजानाथ! महारथी द्रोणने उस युद्धस्थलमें शत्रुसेनाके प्रत्येक रथ, हाथी, अश्व और पैदल सैनिकको एक-एक बाणसे घायल कर दिया ।। २९ ।। पाण्डवानां तु सैन्येषु नास्ति कश्चित् स भारत । दधार यो रणे बाणान् द्रोणचापच्युतान् प्रभो ।। ३० ।। भारत! प्रभो! उस समय पाण्डवोंकी सेनामें कोई ऐसा वीर नहीं था, जो रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यके धनुषसे छूटे हुए बाणोंको धैर्यपूर्वक सह सका हो ।। ३० ।। तत् पच्यमानमर्केण द्रोणसायकतापितम् । बभ्राम पार्षतं सैन्यं तत्र तत्रैव भारत ।। ३१ ।। भरतनन्दन! सूर्यके द्वारा अपनी किरणोंसे पकायी जाती हुई-सी धृष्टद्युम्नकी सेना द्रोणाचार्यके बाणोंसे संतप्त हो जहाँ-तहाँ चक्कर काटने लगी ।। ३१ ।। तथैव पार्षतेनापि काल्यमानं बलं तव । अभवत् सर्वतो दीप्तं शुष्कं वनमिवाग्निना ।। ३२ ।। इसी प्रकार धृष्टद्युम्नके द्वारा खदेड़ी जाती हुई आपकी सेना भी सब ओरसे आग लग जानेके कारण प्रज्वलित हुए सूखे वनकी भाँति दग्ध हो रही थी ।। ३२ ।। बाध्यमानेषु सैन्येषु द्रोणपार्षतसायकैः । त्यक्त्वा प्राणान् परं शक्त्या युध्यन्ते सर्वतोमुखाः ।। ३३ ।। द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नके बाणोंद्वारा सेनाओंके पीड़ित होनेपर भी सब लोग प्राणोंका मोह छोड़कर पूरी शक्तिसे सब ओर युद्ध कर रहे थे ।। ३३ ।। तावकानां परेषां च युध्यतां भरतर्षभ । नासीत् कश्चिन्महाराज योऽत्याक्षीत् संयुगं भयात् ।। ३४ ।। भरतभूषण! महाराज! वहाँ युद्ध करते हुए आपके और शत्रुओंके योद्धाओंमें कोई ऐसा नहीं था, जिसने भयके कारण युद्धका मैदान छोड़ दिया हो ।। ३४ ।। भीमसेनं तु कौन्तेयं सोदर्याः पर्यवारयन् । विविंशतिश्चित्रसेनो विकर्णश्च महारथः ।। ३५ ।। उस समय विविंशति, चित्रसेन तथा महारथी विकर्ण—इन तीनों भाइयोंने कुन्तीपुत्र भीमसेनको घेर लिया ।। ३५ ।। विन्दानुविन्दावावन्त्यौ क्षेमधूर्तिश्च वीर्यवान् । त्रयाणां तव पुत्राणां त्रय एवानुयायिनः ।। ३६ ।। अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द तथा पराक्रमी क्षेमधूर्ति—ये तीनों ही आपके पूर्वोक्त तीनों पुत्रोंके अनुयायी थे ।। ३६ ।। बाह्लीकराजस्तेजस्वी कुलपुत्रो महारथः । सहसेनः सहामात्यो द्रौपदेयानवारयत् ।। ३७ ।।