महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
हाथियोंके चिग्घाड़नेकी आवाज सुनो। सहस्रों पैदल सिपाहियों तथा पृथ्वीको कम्पित करते हुए दौड़ लगानेवाले घुड़सवारोंके शब्द सुन लो॥ ७८॥ पुरस्तात् सैन्धवानीकं द्रोणानीकं च पृष्ठतः। बहुत्वाद्धि नरव्याघ्र देवेन्द्रमपि पीडयेत्॥ ७९॥ नरव्याघ्र! अर्जुनके सामने सिन्धुराजकी सेना है और पीछे द्रोणाचार्यकी। इसकी संख्या इतनी अधिक है कि यह देवराज इन्द्रको भी पीड़ित कर सकती है॥ ७९॥ अपर्यन्ते बले मग्नो जह्यादपि च जीवितम्। तस्मिंश्च निहते युद्धे कथं जीवेत् मादृशः॥ ८०॥ सर्वथाहमनुप्राप्तः सुकृच्छ्रं त्वयि जीवति। इस अनन्त सैन्यसमुद्रमें डूबकर अर्जुन अपने प्राणोंका भी परित्याग कर देगा। युद्धमें उसके मारे जानेपर मेरे-जैसा मनुष्य कैसे जीवित रह सकता है? युयुधान! तुम्हारे जीते-जी मैं सब प्रकारसे बड़े भारी संकटमें पड़ गया हूँ॥ ८० १/२॥ श्यामो युवा गुडाकेशो दर्शनीयश्च पाण्डवः॥ ८१॥ लघ्वस्त्रश्चित्रयोधी च प्रविष्टस्तात भारतीम्। सूर्योदये महाबाहुर्दिवसश्चातिवर्तते॥ ८२॥ निद्राविजयी पाण्डुकुमार अर्जुन श्यामवर्णवाला दर्शनीय तरुण है। वह शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाता और विचित्र रीतिसे युद्ध करता है। तात! उस महाबाहु वीरने सूर्योदयके समय अकेले ही कौरवी-सेनामें प्रवेश किया था और अब दिन बीतता चला जा रहा है॥ ८१-८२॥ तन्न जानामि वार्ष्णेय यदि जीवति वा न वा। कुरूणां चापि तत् सैन्यं सागरप्रतिमं महत्॥ ८३॥ एक एव च बीभत्सुः प्रविष्टस्तात भारतीम्। अविषह्यां महाबाहुः सुरैरपि महाहवे॥ ८४॥ वार्ष्णेय! पता नहीं, इस समयतक अर्जुन जीवित है या नहीं। महासमरमें जिसके वेगको सहन करना देवताओंके लिये भी असम्भव है, कौरवोंकी वह सेना समुद्रके समान विशाल है, तात! उस कौरवी-सेनामें महाबाहु अर्जुनने अकेले ही प्रवेश किया है॥ ८३-८४॥ न हि मे वर्तते बुद्धिरद्य युद्धे कथंचन। द्रोणोऽपि रभसो युद्धे मम पीडयते बलम्॥ ८५॥ आज किसी प्रकार मेरी बुद्धि युद्धमें नहीं लग रही है। इधर द्रोणाचार्य भी युद्धस्थलमें बड़े वेगसे आक्रमण करके मेरी सेनाको पीड़ित कर रहे हैं॥ ८५॥ प्रत्यक्षं ते महाबाहो यथासौ चरति द्विजः। युगपच्च समेतानां कार्याणां त्वं विचक्षणः॥ ८६॥
महाबाहो! विप्रवर द्रोणाचार्य जैसा कार्य कर रहे हैं, वह सब तुम्हारी आँखोंके सामने है। एक ही समय प्राप्त हुए अनेक कार्योंमेंसे किसका पालन आवश्यक है, इसका निर्णय करनेमें तुम कुशल हो॥ ८६॥ महार्थं लघुसंयुक्तं कर्तुमर्हसि मानद। तस्य मे सर्वकार्येषु कार्यमेतन्मतं महत्॥ ८७॥ अर्जुनस्य परित्राणं कर्तव्यमिति संयुगे। मानद! सबसे महान् प्रयोजनको तुम्हें शीघ्रतापूर्वक सम्पन्न करना चाहिये। मुझे तो सब कार्योंमें सबसे महान् कार्य यही जान पड़ता है कि युद्धस्थलमें अर्जुनकी रक्षा की जाय॥ ८७ १/२॥ नाहं शोचामि दाशार्हं गोप्तारं जगतः पतिम्॥ ८८॥ स हि शक्तो रणे तात त्रींल्लोकानपि संगतान्। विजेतुं पुरुषव्याघ्रः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते॥ ८९॥ किं पुनर्धार्तराष्ट्रस्य बलमेतत् सुदुर्बलम्। तात! मैं दशार्हनन्दन भगवान् श्रीकृष्णके लिये शोक नहीं करता। वे तो सम्पूर्ण जगत्के संरक्षक और स्वामी हैं। युद्धस्थलमें तीनों लोक संगठित होकर आ जायँ तो भी वे पुरुषसिंह श्रीकृष्ण उन सबको परास्त कर सकते हैं, यह तुमसे सच्ची बात कहता हूँ। फिर दुर्योधनकी इस अत्यन्त दुर्बल सेनाको जीतना उनके लिये कौन बड़ी बात है? ॥ ८८-८९ १/२॥ अर्जुनस्त्वेष वार्ष्णेय पीडितो बहुभिर्युधि॥ ९०॥ प्रजह्यात् समरे प्राणांस्तस्माद् विन्दामि कश्मलम्। परंतु वार्ष्णेय! यह अर्जुन तो युद्धस्थलमें बहुसंख्यक सैनिकोंद्वारा पीड़ित होनेपर समरांगणमें अपने प्राणोंका परित्याग कर देगा। इसीलिये मैं शोक और दुःखमें डूबा जा रहा हूँ॥ ९० १/२॥ तस्य त्वं पदवीं गच्छ गच्छेयुस्त्वादृशा यथा॥ ९१॥ तादृशस्येदृशे काले मादृशेनाभिनोदितः। अतः तुम मेरे-जैसे मनुष्यसे प्रेरित हो ऐसे संकटके समय अर्जुन-जैसे प्रिय सखाके पथका अनुसरण करो, जैसा कि तुम्हारे-जैसे वीर पुरुष किया करते हैं॥ ९१ १/२॥ रणे वृष्णिप्रवीराणां द्वावेवातिरथी स्मृतौ॥ ९२॥ प्रद्युम्नश्च महाबाहुस्त्वं च सात्वत विश्रुतः। सात्वत! वृष्णिवंशी प्रमुख वीरोंमें रणक्षेत्रके लिये दो ही व्यक्ति अतिरथी माने गये हैं—एक तो महाबाहु प्रद्युम्न और दूसरे सुविख्यात वीर तुम॥ ९२ १/२॥ अस्त्रे नारायणसमः संकर्षणसमो बले॥ ९३॥ वीरतायां नरव्याघ्र धनंजयसमो ह्यसि।
नरव्याघ्र! तुम अस्त्रविद्याके ज्ञानमें भगवान् श्रीकृष्णके समान, बलमें बलरामजीके तुल्य और वीरतामें धनंजयके समान हो ॥ ९३ १/२ ॥
भीष्मद्रोणावतिक्रम्य सर्वयुद्धविशारदम् ॥ ९४ ॥
त्वामेव पुरुषव्याघ्रं लोके सन्तः प्रचक्षते ।
इस जगत्में भीष्म और द्रोणके बाद तुझ पुरुषसिंह सात्यकिको ही श्रेष्ठ पुरुष सम्पूर्ण युद्धकलामें निपुण बताते हैं ॥ ९४ १/२ ॥
(सदेवासुरगन्धर्वान् सकिन्नरमहोरगान् ।
योधयेत् स जगत् सर्वं विजयेत रिपून् बहून् ॥
इति ब्रुवन्ति लोकेषु जनास्तव गुणान् सदा ।
समागमेषु जल्पन्ति पृथगेव च सर्वदा ॥)
जब अच्छे पुरुषोंका समाज जुटता है, उस समय उसमें आये हुए सब लोग संसारमें तुम्हारे गुणोंको सदा-सर्वदा सबसे विलक्षण ही बतलाते हैं। उनका कहना है कि सात्यकि देवता, असुर, गन्धर्व, किन्नर तथा बड़े-बड़े नागोंसहित बहुसंख्यक शत्रुओंपर विजय पा सकते हैं। सम्पूर्ण जगत्से अकेले ही युद्ध कर सकते हैं।
नाशक्यं विद्यते लोके सात्यकेरिति माधव ॥ ९५ ॥
तत् त्वां यदभिवक्ष्यामि तत् कुरुष्व महाबल ।
सम्भावना हि लोकस्य मम पार्थस्य चोभयोः ॥ ९६ ॥
नान्यथा तां महाबाहो सम्प्रकर्तुमर्हसि ।
परित्यज्य प्रियान् प्राणान् रणे चर विभीतवत् ॥ ९७ ॥
माधव! लोग कहते हैं कि संसारमें सात्यकिके लिये कोई कार्य असाध्य नहीं है। महाबली वीर! सब लोगोंकी तथा मेरी और अर्जुनकी—दोनों भाइयोंकी तुम्हारे विषयमें बड़ी उत्तम भावना है। अतः मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसका पालन करो। महाबाहो! तुम हमारी पूर्वोक्त धारणाको बदल न देना। समरांगणमें प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर निर्भयके समान विचरो ॥ ९५—९७ ॥
न हि शैनेय दाशार्हा रणे रक्षन्ति जीवितम् ।
अयुद्धमनवस्थानं संग्रामे च पलायनम् ॥ ९८ ॥
भीरूणामसतां मार्गो नैष दाशार्हसेवितः ।
शैनेय! दशार्हकुलके वीर पुरुष रणक्षेत्रमें अपने प्राण बचानेकी चेष्टा नहीं करते हैं। युद्धसे मुँह मोड़ना, युद्धस्थलमें डटे न रहना और संग्रामभूमिमें पीठ दिखाकर भागना यह कायरों और अधम पुरुषोंका मार्ग है। दशार्हकुलके वीर पुरुष इससे दूर रहते हैं ॥ ९८ १/२ ॥
तवार्जुनो गुरुस्तात धर्मात्मा शिनिपुङ्गव ॥ ९९ ॥
वासुदेवो गुरुश्चापि तव पार्थस्य धीमतः ।
तात! शिनिप्रवर! धर्मात्मा अर्जुन तुम्हारा गुरु है तथा भगवान् श्रीकृष्ण तुम्हारे और बुद्धिमान् अर्जुनके भी गुरु हैं ।। ९९ १/२ ।।
कारणद्वयमेतद्धि जानंस्वामहमनुब्रुवम् ।। १०० ।।
मावमंस्था वचो मह्यं गुरुस्तव गुरोर्ह्यहम् ।
इन दोनों कारणोंको जानकर मैं तुमसे इस कार्यके लिये कह रहा हूँ। तुम मेरी बातकी अवहेलना न करो; क्योंकि मैं तुम्हारे गुरुका भी गुरु हूँ ।। १०० १/२ ।।
वासुदेवमतं चैव मम चैवार्जुनस्य च ।। १०१ ।।
सत्यमेतन्मयोक्तं ते याहि यत्र धनंजयः ।
तुम्हारा वहाँ जाना भगवान् श्रीकृष्णको, मुझको तथा अर्जुनको भी प्रिय है। यह मैंने तुमसे सच्ची बात कही है। अतः जहाँ अर्जुन है, वहाँ जाओ ।। १०१ १/२ ।।
एतद् वचनमाज्ञाय मम सत्यपराक्रम ।। १०२ ।।
प्रविशैतद् बलं तात धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ।
सत्यपराक्रमी वत्स! तुम मेरी इस बातको मानकर दुर्बुद्धि दुर्योधनकी इस सेनामें प्रवेश करो ।। १०२ १/२ ।।
प्रविश्य च यथान्यायं संगम्य च महारथैः ।
यथार्हमात्मनः कर्म रणे सात्वत दर्शय ।। १०३ ।।
सात्वत! इसमें प्रवेश करके यथायोग्य सब महारथियोंसे मिलकर युद्धमें अपने अनुरूप पराक्रम दिखाओ ।। १०३ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि युधिष्ठिरवाक्ये दशाधिकशततमोऽध्यायः ।। ११० ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्ठिरवाक्यविषयक एक सौ दसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ११० ।।
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १०५ श्लोक हैं)
सात्यकि और युधिष्ठिरका संवाद
एकादशाधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकि और युधिष्ठिरका संवाद
संजय उवाच
प्रीतियुक्तं च हृद्यं च मधुराक्षरमेव च ।
कालयुक्तं च चित्रं च न्याय्यं यच्चापि भाषितुम् ॥ १ ॥
धर्मराजस्य तद् वाक्यं निशम्य शिनिपुङ्गवः ।
सात्यकिर्भरतश्रेष्ठ प्रत्युवाच युधिष्ठिरम् ॥ २ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! धर्मराजका वह वचन प्रेमपूर्ण, मनको प्रिय लगनेवाला, मधुर अक्षरोंसे युक्त, सामयिक, विचित्र, कहनेयोग्य तथा न्यायसंगत था। भरतश्रेष्ठ! उसे सुनकर शिनिप्रवर सात्यकिने युधिष्ठिरको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ १-२ ॥
श्रुतं ते गदतो वाक्यं सर्वमेतन्मयाच्युत ।
न्याययुक्तं च चित्रं च फाल्गुनार्थे यशस्करम् ॥ ३ ॥
‘अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले नरेश! आपने अर्जुनकी सहायताके लिये जो-जो बातें कही हैं, वह सब मैंने सुन लीं। आपका कथन अद्भुत, न्यायसंगत और यशकी वृद्धि करनेवाला है ॥ ३ ॥
एवंविधे तथा काले मादृशं प्रेक्ष्य सम्मतम् ।
वक्तुमर्हसि राजेन्द्र यथा पार्थं तथैव माम् ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! ऐसे समयमें मेरे-जैसे प्रिय व्यक्तिको देखकर आप जैसी बात कह सकते हैं, वैसी ही कही है। आप अर्जुनसे जो कुछ कह सकते हैं, वही आपने मुझसे भी कहा है ॥ ४ ॥
न मे धनंजयस्यार्थे प्राणा रक्ष्याः कथंचन ।
त्वत्प्रयुक्तः पुनरहं किं न कुर्यां महाहवे ॥ ५ ॥
‘महाराज! अर्जुनके हितके लिये मुझे किसी प्रकार भी अपने प्राणोंकी रक्षाकी चिन्ता नहीं करनी है; फिर आपका आदेश मिलनेपर मैं इस महायुद्धमें क्या नहीं कर सकता हूँ? ॥ ५ ॥
लोकत्रयं योधयेयं सदेवासुरमानुषम् ।
त्वत्प्रयुक्तो नरेन्द्रह किमुतैतत् सुदुर्बलम् ॥ ६ ॥
‘नरेन्द्र! आपकी आज्ञा हो तो देवताओं, असुरों तथा मनुष्योंसहित तीनों लोकोंके साथ मैं युद्ध कर सकता हूँ। फिर यहाँ इस अत्यन्त दुर्बल कौरवी सेनाका सामना करना कौन बड़ी बात है? ॥ ६ ॥
सुयोधनबलं त्वद्य योधयिष्ये समन्ततः ।
विजेष्ये च रणे राजन् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ७ ॥
'राजन्! मैं रणक्षेत्रमें आज चारों ओर घूमकर दुर्योधनकी सेनाके साथ युद्ध करूँगा और उसपर विजय पाऊँगा; यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ७ ॥
कुशल्यहं कुशलिनं समासाद्य धनंजयम् ।
हते जयद्रथे राजन् पुनरेष्यामि तेऽन्तिकम् ॥ ८ ॥
'राजन्! मैं कुशलपूर्वक रहकर सकुशल अर्जुनके पास पहुँच जाऊँगा और जयद्रथके मारे जानेपर उनके साथ ही आपके पास लौट आऊँगा ॥ ८ ॥
अवश्यं तु मया सर्वं विज्ञाप्यस्त्वं नराधिप ।
वासुदेवस्य यद् वाक्यं फाल्गुनस्य च धीमतः ॥ ९ ॥
'परंतु नरेश्वर! भगवान् श्रीकृष्ण तथा बुद्धिमान् अर्जुनने युद्धके लिये जाते समय मुझसे जो कुछ कहा था, वह सब आपको सूचित कर देना मेरे लिये अत्यन्त आवश्यक है ॥ ९ ॥
दृढं त्वभिपरीतोऽहमर्जुनेन पुनः पुनः ।
मध्ये सर्वस्य सैन्यस्य वासुदेवस्य शृण्वतः ॥ १० ॥
'अर्जुनने सारी सेनाके बीचमें भगवान् श्रीकृष्णके सुनते हुए मुझे बारंबार कहकर दृढ़तापूर्वक बाँध लिया है ॥
अद्य माधव राजानमप्रमत्तोऽनुपालय ।
आर्यां युद्धे मतिं कृत्वा यावद्धन्मि जयद्रथम् ॥ ११ ॥
'उन्होंने कहा था—'माधव! आज मैं जबतक जयद्रथका वध करता हूँ, तबतक युद्धमें तुम श्रेष्ठ बुद्धिका आश्रय लेकर पूरी सावधानीके साथ राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करो ॥ ११ ॥
त्वयि चाहं महाबाहो प्रद्युम्ने वा महारथे ।
नृपं निक्षिप्य गच्छेयं निरपेक्षो जयद्रथम् ॥ १२ ॥
'महाबाहो! मैं तुमपर अथवा महारथी प्रद्युम्नपर ही भरोसा करके राजाको धरोहरकी भाँति सौंपकर निरपेक्षभावसे जयद्रथके पास जा सकता हूँ ॥ १२ ॥
जानीषे हि रणे द्रोणं रभसं श्रेष्ठसम्मतम् ।
प्रतिज्ञा चापि ते नित्यं श्रुता द्रोणस्य माधव ॥ १३ ॥
'माधव! तुम जानते ही हो कि रणक्षेत्रमें श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा सम्मानित आचार्य द्रोण कितने वेगशाली हैं। उन्होंने जो प्रतिज्ञा कर रखी है, उसे भी तुम प्रतिदिन सुनते ही होगे ॥ १३ ॥
ग्रहणे धर्मराजस्य भारद्वाजोऽपि गृध्यति ।
शक्तश्चापि रणे द्रोणो निग्रहीतुं युधिष्ठिरम् ॥ १४ ॥
'द्रोणाचार्य भी धर्मराजको बंदी बनाना चाहते हैं और वे समरांगणमें राजा युधिष्ठिरको कैद करनेमें समर्थ भी हैं ॥ १४ ॥
एवं त्वयि समाधाय धर्मराजं नरोत्तमम् ।
अहमद्य गमिष्यामि सैन्धवस्य वधाय हि ॥ १५ ॥
'ऐसी अवस्थामें नरश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिरकी रक्षाका सारा भार तुमपर ही रखकर आज मैं सिन्धुराजके वधके लिये जाऊँगा ।। १५ ।। जयद्रथं च हत्वाहं द्रुतमेष्यामि माधव । धर्मराजं न चेद् द्रोणो निगृह्णीयाद् रणे बलात् ।। १६ ।। 'माधव! यदि द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें धर्मराजको बलपूर्वक बंदी न बना सकें तो मैं जयद्रथका वध करके शीघ्र ही लौट आऊँगा ।। १६ ।। निगृहीते नरश्रेष्ठे भारद्वाजेन माधव । सैन्धवस्य वधो न स्यान्ममाप्रीतिस्तथा भवेत् ।। १७ ।। 'मधुवंशी वीर! यदि द्रोणाचार्यने नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरको कैद कर लिया तो सिन्धुराजका वध नहीं हो सकेगा और मुझे भी महान् दुःख होगा ।। १७ ।। एवंगते नरश्रेष्ठे पाण्डवे सत्यवादिनि । अस्माकं गमनं व्यक्तं वनं प्रति भवेत् पुनः ।। १८ ।। 'यदि सत्यवादी नरश्रेष्ठ पाण्डुकुमार युधिष्ठिर इस प्रकार बंदी बनाये गये तो निश्चय ही हमें पुनः वनमें जाना पड़ेगा ।। १८ ।। सोऽयं मम जयो व्यक्तं व्यर्थ एव भविष्यति । यदि द्रोणो रणे क्रुद्धो निगृह्णीयाद् युधिष्ठिरम् ।। १९ ।। 'यदि द्रोणाचार्य रणक्षेत्रमें कुपित होकर युधिष्ठिरको कैद कर लेंगे तो मेरी यह विजय अवश्य ही व्यर्थ हो जायगी ।। १९ ।। स त्वमद्य महाबाहो प्रियार्थं मम माधव । जयार्थं च यशोऽर्थं च रक्ष राजानमाहवे ।। २० ।। 'महाबाहु माधव! इसलिये तुम आज मेरा प्रिय करने, मुझे विजय दिलाने और मेरे यशकी वृद्धि करनेके लिये युद्धस्थलमें राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करो' ।। २० ।। स भवान् मयि निक्षेपो निक्षिप्तः सव्यसाचिना । भारद्वाजाद् भयं नित्यं मन्यमानेन वै प्रभो ।। २१ ।। 'प्रभो! इस प्रकार द्रोणाचार्यसे निरन्तर भय मानते हुए सव्यसाची अर्जुनने आपको मेरे पास धरोहरके रूपमें रख छोड़ा है ।। २१ ।। तस्यापि च महाबाहो नित्यं पश्यामि संयुगे । नान्यं हि प्रतियोद्धारं रौक्मिणेयादृते प्रभो ।। २२ ।। 'महाबाहो! प्रभो! मैं प्रतिदिन युद्धस्थलमें रुक्मिणी-नन्दन प्रद्युम्नके सिवा दूसरे किसी वीरको ऐसा नहीं देखता जो द्रोणाचार्यके सामने खड़ा होकर उनसे युद्ध कर सके ।। २२ ।। मां चापि मन्यते युद्धे भारद्वाजस्य धीमतः । सोऽहं सम्भावनां चैतामाचार्यवचनं च तत् ।। २३ ।। पृष्ठतो नोत्सहे कर्तुं त्वां वा त्यक्तुं महीपते ।
‘अर्जुन मुझे भी बुद्धिमान् द्रोणाचार्यका सामना करनेमें समर्थ योद्धा मानते हैं। महीपते! मैं अपने आचार्यकी इस सम्भावनाको तथा उनके उस आदेशको न तो पीछे ढकेल सकता हूँ और न आपको ही त्याग सकता हूँ ।। २३ १/२ ।।
आचार्यो लघुहस्तत्वादभेद्यकवचावृतः ।। २४ ।। उपलभ्य रणे क्रीडेद् यथा शकुनिना शिशुः ।
‘द्रोणाचार्य अभेद्य कवचसे सुरक्षित हैं। वे शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेके कारण रणक्षेत्रमें अपने विपक्षीको पाकर उसी प्रकार क्रीड़ा करते हैं, जैसे कोई बालक पक्षीके साथ खेल रहा हो ।। २४ १/२ ।।
यदि कार्ष्णिर्धनुष्पाणिर्हि स्यान्मकरध्वजः ।। २५ ।। तस्मै त्वां विसृजेयं वै स त्वां रक्षेद् यथार्जुनः ।
‘यदि कामदेवके अवतार श्रीकृष्णकुमार प्रद्युम्न यहाँ हाथमें धनुष लेकर खड़े होते तो उन्हें मैं आपको सौंप देता। वे अर्जुनके समान ही आपकी रक्षा कर सकते थे ।। २५ १/२ ।।
कुरु त्मात्मनो गुप्तिं कस्ते गोप्ता गते मयि ।। २६ ।। यः प्रतीयाद् रणे द्रोणं यावद् गच्छामि पाण्डवम् ।
‘आप पहले अपनी रक्षाकी व्यवस्था कीजिये। मेरे चले जानेपर कौन आपका संरक्षण करनेवाला है, जो रणक्षेत्रमें तबतक द्रोणाचार्यका सामना करता रहे जबतक कि मैं अर्जुनके पास जाता (और लौटता) हूँ ।। २६ १/२ ।।
मा च ते भयमद्यास्तु राजन्नर्जुनसम्भवम् ।। २७ ।। न स जातु महाबाहुर्भारमुद्यम्य सीदति ।
‘महाराज! आज आपके मनमें अर्जुनके लिये भय नहीं होना चाहिये। वे महाबाहु किसी कार्यभारको उठा लेनेपर कभी शिथिल नहीं होते हैं ।। २७ १/२ ।।
ये च सौवीरका योधास्तथा सैन्धवपौरवाः ।। २८ ।। उदीच्या दाक्षिणात्याश्च ये चान्येऽपि महारथाः । ये च कर्णमुखा राजन् रथोदाराः प्रकीर्तिताः ।। २९ ।। एतेऽर्जुनस्य क्रुद्धस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम् ।
‘राजन्! जो सौवीर, सिन्धु तथा पुरुदेशके योद्धा हैं, जो उत्तर और दक्षिणके निवासी एवं अन्य महारथी हैं तथा जो कर्ण आदि श्रेष्ठ रथी बताये गये हैं वे कुपित हुए अर्जुनकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हैं ।।
उद्युक्ता पृथिवी सर्वा ससुरासुरमानुषा ।। ३० ।। सराक्षसगणा राजन् सकिन्नरमहोरगा । जङ्गमाः स्थावराः सर्वे नालं पार्थस्य संयुगे ।। ३१ ।।
‘नरेश्वर! देवता, असुर, मनुष्य, राक्षस, किन्नर तथा महान् सर्पगणोंसहित यह समूची पृथ्वी और सभी स्थावर-जंगम प्राणी युद्धके लिये उद्यत हो जायँ तो भी सब मिलकर भी युद्धस्थलमें अर्जुनका सामना नहीं कर सकते ॥ ३०-३१ ॥
एवं ज्ञात्वा महाराज व्येतु ते धीर्धनंजये ।
यत्र वीरौ महेष्वासौ कृष्णौ सत्यपराक्रमौ ॥ ३२ ॥
न तत्र कर्मणो व्यापत् कथञ्चिदपि विद्यते ।
‘महाराज! ऐसा जानकर अर्जुनके विषयमें आपका भय दूर हो जाना चाहिये। जहाँ सत्यपराक्रमी और महाधनुर्धर वीर श्रीकृष्ण एवं अर्जुन विद्यमान हैं वहाँ किसी प्रकार भी कार्यमें व्याघात नहीं हो सकता ॥ ३२ १/२ ॥
दैवं कृतास्त्रतां योगममर्षमपि चाहवे ॥ ३३ ॥
कृतज्ञतां दयां चैव भ्रातुस्त्वमनुचिन्तय ।
‘आपके भाई अर्जुनमें जो दैवीशक्ति, अस्त्रविद्याकी निपुणता, योग, युद्धस्थलमें अमर्ष, कृतज्ञता और दया आदि सद्गुण हैं उनका आप बारंबार चिन्तन कीजिये ॥ ३३ १/२ ॥
मयि चापि सहाये ते गच्छमानेऽर्जुनं प्रति ॥ ३४ ॥
द्रोणे चित्रास्त्रतां संख्ये राजंस्त्वमनुचिन्तय ।
‘राजन्! मैं आपका सहायक रहा हूँ, यदि मैं भी अर्जुनके पास चला जाता हूँ तो युद्धमें द्रोणाचार्य जिन विचित्र अस्त्रोंका प्रयोग करेंगे उनपर भी आप अच्छी तरह विचार कर लीजिये ॥ ३४ १/२ ॥
आचार्यो हि भृशं राजन् निग्रहे तव गृध्यति ॥ ३५ ॥
प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन् सत्यां कर्तुं च भारत ।
‘भरतवंशी नरेश! द्रोणाचार्य आपको कैद करनेकी बड़ी इच्छा रखते हैं। वे अपनी प्रतिज्ञाकी रक्षा करते हुए उसे सत्य कर दिखाना चाहते हैं ॥ ३५ १/२ ॥
कुरुष्वाद्यात्मनो गुप्तिं कस्ते गोप्ता गते मयि ॥ ३६ ॥
यस्याहं प्रत्ययात् पार्थ गच्छेयं फाल्गुनं प्रति ।
‘अब आप अपनी रक्षाका प्रबन्ध कीजिये। पार्थ! मेरे चले जानेपर कौन आपका रक्षक होगा, जिसपर विश्वास करके मैं अर्जुनके पास चला जाऊँ ॥ ३६ १/२ ॥
न ह्यहं त्वां महाराज अनिक्षिप्य महाहवे ॥ ३७ ॥
क्वचिद् यास्यामि कौरव्य सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।
‘महाराज! कुरुनन्दन! मैं आपको इस महासमरमें किसी वीरके संरक्षणमें रखे बिना कहीं नहीं जाऊँगा; यह मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ ॥ ३७ १/२ ॥
एतद्विचार्य बहुशो बुद्ध्या बुद्धिमतां वर ॥ ३८ ॥
दृष्ट्वा श्रेयः परं बुद्ध्या ततो राजन् प्रशाधि माम् ॥ ३९ ॥
'बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ महाराज! अपनी बुद्धिसे इस विषयमें बहुत सोच-विचार करके आपको जो परम मंगलकारक कृत्य जान पड़े, उसके लिये मुझे आज्ञा दें' ।। ३८-३९ ।।
युधिष्ठिर उवाच
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि माधव ।
न तु मे शुद्ध्यते भावः श्वेताश्वं प्रति मारिष ।। ४० ।।
**युधिष्ठिर बोले—**महाबाहु माधव! तुम जैसा कहते हो, वही ठीक है। आर्य! श्वेतवाहन द्रोणाचार्यकी ओरसे मेरा हृदय शुद्ध (निश्चिन्त) नहीं हो रहा है ।।
करिष्ये परमं यत्नमात्मनो रक्षणे ह्यहम् ।
गच्छ त्वं समनुज्ञातो यत्र यातो धनंजयः ।। ४१ ।।
मैं अपनी रक्षाके लिये महान् प्रयत्न करूँगा। तुम मेरी आज्ञासे वहीं जाओ, जहाँ अर्जुन गया है ।। ४१ ।।
आत्मसंरक्षणं संख्ये गमनं चार्जुनं प्रति ।
विचार्यैतत् स्वयं बुद्ध्या गमनं तत्र रोचय ।। ४२ ।।
मुझे युद्धमें अपनी रक्षा करनी चाहिये या अर्जुनके पास तुम्हें भेजना चाहिये। इन दोनों बातोंपर तुम स्वयं ही अपनी बुद्धिसे विचार करके वहाँ जाना ही पसंद करो ।।
स त्वमातिष्ठ यानाय यत्र यातो धनंजयः ।
ममापि रक्षणं भीमः करिष्यति महाबलः ।। ४३ ।।
अतः जहाँ अर्जुन गया है वहाँ जानेके लिये तुम तैयार हो जाओ। महाबली भीमसेन मेरी भी रक्षा कर लेंगे ।। ४३ ।।
पार्षतश्च ससोदर्यः पार्थिवाश्च महाबलाः ।
द्रौपदेयाश्च मां तात रक्षिष्यन्ति न संशयः ।। ४४ ।।
तात! भाइयोंसहित धृष्टद्युम्न, महाबली भूपालगण तथा द्रौपदीके पाँचों पुत्र मेरी रक्षा कर लेंगे; इसमें संशय नहीं है ।। ४४ ।।
केकया भ्रातरः पञ्च राक्षसश्च घटोत्कचः ।
विराटो द्रुपदश्चैव शिखण्डी च महारथः ।। ४५ ।।
धृष्टकेतुश्च बलवान् कुन्तिभोजश्च मातुलः ।
नकुलः सहदेवश्च पञ्चालाः सृञ्जयास्तथा ।। ४६ ।।
एते समाहितास्तात रक्षिष्यन्ति न संशयः ।
तात! पाँच भाई केकयराजकुमार, राक्षस घटोत्कच, विराट, द्रुपद, महारथी शिखण्डी, धृष्टकेतु, बलवान् मामा कुन्तिभोज (पुरुजित्), नकुल, सहदेव, पांचाल तथा सृंजय-वीरगण—ये सभी सावधान होकर निःसंदेह मेरी रक्षा करेंगे ।। ४५-४६ १/२ ।।
न द्रोणः सह सैन्येन कृतवर्मा च संयुगे ।। ४७ ।।
समासादयितुं शक्तो न च मां धर्षयिष्यति । सेनासहित द्रोणाचार्य तथा कृतवर्मा—ये युद्धस्थलमें मेरे पास नहीं पहुँच सकते और न मुझे परास्त ही कर सकेंगे ॥ ४७ १/२ ॥ धृष्टद्युम्नश्च समरे द्रोणं क्रुद्धं परंतपः ॥ ४८ ॥ वारयिष्यति विक्रम्य वेलेव मकरालयम् । शत्रुओंको संताप देनेवाला धृष्टद्युम्न समरांगणमें कुपित हुए द्रोणाचार्यको पराक्रम करके रोक लेगा। ठीक वैसे ही, जैसे तटकी भूमि समुद्रको आगे बढ़नेसे रोक देती है ॥ ४८ १/२ ॥ यत्र स्थास्यति संग्रामे पार्षतः परवीरहा ॥ ४९ ॥ द्रोणो न सैन्यं बलवत् क्रामेत् तत्र कथंचन । जहाँ शत्रुवीरोंका संहार करनेवाला द्रुपदकुमार संग्रामभूमिमें खड़ा होगा, वहाँ मेरी प्रबल सेनापर द्रोणाचार्य किसी तरह आक्रमण नहीं कर सकते ॥ एष द्रोणविनाशाय समुत्पन्नो हुताशनात् ॥ ५० ॥ कवची स शरी खड्गी धन्वी च वरभूषणः । यह धृष्टद्युम्न, द्रोणाचार्यका नाश करनेके लिये कवच, धनुष, बाण, खड्ग और श्रेष्ठ आभूषणोंके साथ अग्निसे प्रकट हुआ है ॥ ५० १/२ ॥ विश्रब्धं गच्छ शैनेय मा कार्षीर्मयि सम्भ्रमम् । धृष्टद्युम्नो रणे क्रुद्धं द्रोणमावारयिष्यति ॥ ५१ ॥ अतः शिनिनन्दन! तुम निश्चिन्त होकर जाओ। मेरे लिये संदेह मत करो। धृष्टद्युम्न रणक्षेत्रमें कुपित हुए द्रोणाचार्यको सर्वथा रोक देगा ॥ ५१ ॥
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि युधिष्ठिरसात्यकिवाक्ये एकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ १११ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें युधिष्ठिर और सात्यकिका संवादविषयक एक सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १११ ॥
११२-
द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिकी अर्जुनके पास जानेकी तैयारी और सम्मानपूर्वक विदा होकर उनका प्रस्थान तथा साथ आते हुए भीमको युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये लौटा देना
संजय उवाच
धर्मराजस्य तद् वाक्यं निशम्य शिनिपुङ्गवः ।
स पार्थाद् भयमाशंसन् परित्यागान्महीपतेः ॥ १ ॥
अपवादं ह्यात्मनश्च लोकात् पश्यन् विशेषतः ।
ते मां भीतमिति ब्रूयुरायान्तं फाल्गुनं प्रति ॥ २ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! धर्मराजका वह कथन सुनकर शिनिप्रवर सात्यकिके मनमें राजाको छोड़कर जानेसे अर्जुनके अप्रसन्न होनेकी आशंका उत्पन्न हुई। विशेषतः उन्हें अपने लिये लोकापवादका भय दिखायी देने लगा। वे सोचने लगे—मुझे अर्जुनकी ओर आते देख सब लोग यही कहेंगे कि यह डरकर भाग आया है ॥ १-२ ॥
निश्चित्य बहुधैवं स सात्यकिर्युद्धदुर्मदः ।
धर्मराजमिदं वाक्यमब्रवीत् पुरुषर्षभः ॥ ३ ॥
युद्धमें दुर्जय वीर पुरुषरत्न सात्यकिने इस प्रकार भाँति-भाँतिसे विचार करके धर्मराजसे यह बात कही— ॥ ३ ॥
कृतां चेन्मन्यसे रक्षां स्वस्ति तेऽस्तु विशाम्पते ।
अनुयास्यामि बीभत्सुं करिष्ये वचनं तव ॥ ४ ॥
'प्रजानाथ! यदि आप अपनी रक्षाकी व्यवस्था की हुई मानते हैं तो आपका कल्याण हो। मैं अर्जुनके पास जाऊँगा और आपकी आज्ञाका पालन करूँगा ॥ ४ ॥
न हि मे पाण्डवात् कश्चित् त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
यो मे प्रियतरो राजन् सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ ५ ॥
'राजन्! मैं आपसे सच कहता हूँ कि तीनों लोकोंमें कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो मुझे पाण्डुनन्दन अर्जुनसे अधिक प्रिय हो ॥ ५ ॥
तस्याहं पदवीं यास्ये संदेशात् तव मानद ।
त्वत्कृते न च मे किंचिदकर्तव्यं कथंचन ॥ ६ ॥ ‘मानद! मैं आपके आदेश और संदेशसे अर्जुनके पथका अनुसरण करूँगा। आपके लिये कोई ऐसा कार्य नहीं है जिसे मैं किसी प्रकार न कर सकूँ ॥ ६ ॥
यथा हि मे गुरोर्वाक्यं विशिष्टं द्विपदां वर । तथा तवापि वचनं विशिष्टतरमेव मे ॥ ७ ॥ ‘नरश्रेष्ठ! मेरे गुरु अर्जुनका वचन मेरे लिये जैसा महत्त्व रखता है, आपका वचन भी वैसा ही है, बल्कि उससे भी बढ़कर है ॥ ७ ॥
प्रिये हि तव वर्तेते भ्रातरौ कृष्णपाण्डवौ । तयोः प्रिये स्थितं चैव विद्धि मां राजपुङ्गव ॥ ८ ॥ ‘नृपश्रेष्ठ! दोनों भाई श्रीकृष्ण और अर्जुन आपके प्रिय साधनमें लगे हुए हैं और उन दोनोंके प्रिय कार्यमें आप मुझे तत्पर जानिये ॥ ८ ॥
तवाज्ञां शिरसा गृह्य पाण्डवार्थमहं प्रभो । भित्त्वेदं दुर्भिदं सैन्यं प्रयास्ये नरपुङ्गव ॥ ९ ॥ ‘प्रभो! नरश्रेष्ठ! मैं आपकी आज्ञा शिरोधार्य करके पाण्डुनन्दन अर्जुनके लिये इस दुर्भेद्य सैन्यव्यूहका भेदनकर उनके पास जाऊँगा ॥ ९ ॥
द्रोणानीकं विशाम्येष क्रुद्धो झष इवार्णवम् । तत्र यास्यामि यत्रासौ राजन् राजा जयद्रथः ॥ १० ॥ ‘राजन्! जैसे महामत्स्य महासागरमें प्रवेश करता है, उसी प्रकार मैं भी कुपित होकर द्रोणाचार्यकी सेनामें घुसता हूँ। मैं वहीं जाऊँगा जहाँ राजा जयद्रथ है ॥ १० ॥
यत्र सेनां समाश्रित्य भीतस्तिष्ठति पाण्डवात् । गुप्तो रथवरश्रेष्ठैर्द्रौणिकर्णकृपादिभिः ॥ ११ ॥ ‘पाण्डुनन्दन अर्जुनसे भयभीत हो अपनी सेनाका आश्रय लेकर जयद्रथ जहाँ अश्वत्थामा, कर्ण और कृपाचार्य आदि श्रेष्ठ महारथियोंसे सुरक्षित होकर खड़ा है वहीं मुझे पहुँचना है ॥ ११ ॥
इतस्त्रियोजनं मन्ये तमध्वानं विशाम्पते । यत्र तिष्ठति पार्थोऽसौ जयद्रथवधोद्यतः ॥ १२ ॥ ‘प्रजापालक नरेश! इस समय जहाँ जयद्रथ-वधके लिये उद्यत हुए अर्जुन खड़े हैं, उस स्थानको मैं यहाँसे तीन योजन दूर मानता हूँ ॥ १२ ॥
त्रियोजनगतस्यापि तस्य यास्याम्यहं पदम् । आसैन्धववधाद् राजन् सुदृढेनान्तरात्मना ॥ १३ ॥ ‘राजन्! अर्जुनके तीन योजन दूर चले जानेपर भी मैं जयद्रथ-वधके पहले ही सुदृढ़ हृदयसे अर्जुनके स्थानपर पहुँच जाऊँगा ॥ १३ ॥
अनादिष्टस्तु गुरुणा को नु युध्येत मानवः ।
आदिष्टस्तु यथा राजन् को न युध्येत मादृशः ॥ १४ ॥
‘नरेश्वर! गुरुकी आज्ञा प्राप्त हुए बिना कौन मनुष्य युद्ध करेगा और गुरुकी आज्ञा मिल जानेपर मेरे-जैसा कौन वीर युद्ध नहीं करेगा? ॥ १४ ॥
अभिजानामि तं देशं यत्र यास्याम्यहं प्रभो ।
हलशक्तिगदाप्रासचर्मखड्गर्षितोमरम् ॥ १५ ॥
इष्वस्त्रवरसम्बाधं क्षोभयिष्ये बलार्णवम् ।
‘प्रभो! मुझे जहाँ जाना है, उस स्थानको मैं जानता हूँ। वह हल, शक्ति, गदा, प्रास, ढाल, तलवार, ऋष्टि और तोमरोंसे भरा है। श्रेष्ठ धनुष-बाणोंसे परिपूर्ण शत्रु-सैन्यरूपी महासागरको मैं मथ डालूँगा ॥ १५ १/२ ॥
यदेतत् कुञ्जरानीकं साहस्रमनुपश्यसि ॥ १६ ॥
कुलमाञ्जनकं नाम यत्रैते वीर्यशालिनः ।
आस्थिता बहुभिर्म्लेच्छैर्यद्धशौण्डैः प्रहारिभिः ॥ १७ ॥
‘महाराज! यह जो आप हजारों हाथियोंकी सेना देखते हैं, इसका नाम है आंजनककुल। इसमें पराक्रमशाली गजराज खड़े हैं, जिनके ऊपर प्रहारकुशल और युद्धनिपुण बहुत-से म्लेच्छ योद्धा सवार हैं ॥ १६-१७ ॥
नागा मेघनिभा राजन् क्षरन्त इव तोयदाः ।
नैते जातु निवर्तेरन् प्रेषिता हस्तिसादिभिः ॥ १८ ॥
अन्यत्र हि वधादेषां नास्ति राजन् पराजयः ।
‘राजन्! ये हाथी मेघोंकी घटाके समान दिखायी देते हैं और पानी बरसानेवाले बादलोंके समान मदकी वर्षा करते हैं। हाथीसवारोंके हाँकनेपर ये कभी युद्धसे पीछे नहीं हटते हैं। महाराज! वधके अतिरिक्त और किसी उपायसे इनकी पराजय नहीं हो सकती ॥ १८ १/२ ॥
अथ यान् रथिनो राजन् सहस्रमनुपश्यसि ॥ १९ ॥
एते रुक्मरथा नाम राजपुत्रा महारथाः ।
रथेष्वस्त्रेषु निपुणा नागेषु च विशाम्पते ॥ २० ॥
‘राजन्! आप जिन सहस्रों रथियोंको देख रहे हैं, ये रुक्मरथ नामवाले महारथी राजकुमार हैं। प्रजानाथ! ये रथों, अस्त्रों और हाथियोंके संचालनमें भी निपुण हैं ।।
धनुर्वेदे गताः पारं मुष्टियुद्धे च कोविदाः ।
गदायुद्धविशेषज्ञा नियुद्धकुशलास्तथा ॥ २१ ॥
‘ये सब-के-सब धनुर्वेदके पारंगत विद्वान् हैं। मुष्टियुद्धमें भी निपुण हैं, गदायुद्धके विशेषज्ञ हैं और मल्लयुद्धमें भी कुशल हैं ॥ २१ ॥
खड्गप्रहरणे युक्ताः सम्पाते चासिचर्मणोः । शूराश्च कृतविद्याश्च स्पर्धन्ते च परस्परम् ॥ २२ ॥ 'तलवार चलानेका भी इन्हें अच्छा अभ्यास है। ये ढाल, तलवार लेकर विचरनेमें समर्थ हैं। शूर और अस्त्र-शस्त्रोंके विद्वान् होनेके साथ ही परस्पर स्पर्धा रखते हैं ॥ २२ ॥
नित्यं हि समरे राजन् विजिगीषन्ति मानवान् । कर्णेन विहिता राजन् दुःशासनमनुव्रताः ॥ २३ ॥ 'नरेश्वर! ये सदा समरभूमिमें मनुष्योंको जीतनेकी इच्छा रखते हैं। महाराज! कर्णने इन्हें दुःशासनका अनुगामी बना रखा है ॥ २३ ॥
एतांस्तु वासुदेवोऽपि रथोदारान् प्रशंसति । सततं प्रियकामाश्च कर्णस्यैते वशे स्थिताः ॥ २४ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण भी इन श्रेष्ठ महारथियोंकी प्रशंसा करते हैं, ये सब-के-सब कर्णके वशमें स्थित हैं और सदा उसका प्रिय करनेकी अभिलाषा रखते हैं ॥ २४ ॥
तस्यैव वचनाद् राजन् निवृत्ताः श्वेतवाहनात् । ते न क्लान्ता न च श्रान्ता दृढावरणकार्मुकाः ॥ २५ ॥ 'राजन्! कर्णके ही कहनेसे ये अर्जुनकी ओरसे इधर लौट आये हैं। इनके कवच और धनुष अत्यन्त सुदृढ़ हैं। वे न तो थके हैं और न पीड़ित ही हुए हैं ॥ २५ ॥
मदर्थेऽधिष्ठिता नूनं धार्तराष्ट्रस्य शासनात् । एतान् प्रमथ्य संग्रामे प्रियार्थं तव कौरव ॥ २६ ॥ प्रयास्यामि ततः पश्चात् पदवीं सव्यसाचिनः । 'दुर्योधनके आदेशसे ये निश्चय ही मुझसे युद्ध करनेके लिये खड़े हैं। कुरुनन्दन! मैं आपका प्रिय करनेके लिये इन सबको संग्राममें मथकर सव्यसाची अर्जुनके मार्गपर जाऊँगा ॥ २६ १/२ ॥
यांस्त्वेतानपरान् राजन् नागान् सप्त शतानिमान् ॥ २७ ॥ प्रेक्षसे वर्मसंछन्नान् किरातैः समधिष्ठितान् । किरातराजो यान् प्रादाद् द्विरदान् सव्यसाचिनः ॥ २८ ॥ स्वलंकृतांस्तदा प्रेष्यानिच्छन् जीवितमात्मनः ।
'महाराज! जिन दूसरे इन सात सौ हाथियोंको आप देख रहे हैं, जो कवचसे आच्छादित हैं और जिनपर किरात योद्धा चढ़े हुए हैं, ये वे ही हाथी हैं, जिन्हें दिग्विजयके समय अपने प्राण बचानेकी इच्छा रखकर किरातराजने सव्यसाची अर्जुनको भेंट किया था। ये सजे-सजाये हाथी उन दिनों आपके सेवक थे ।। २७-२८ १/२ ।। आसन्नेते पुरा राजंस्तव कर्मकरा दृढम् ।। २९ ।। त्वामेवाद्य युयुत्सन्ते पश्य कालस्य पर्ययम् । 'महाराज! यह कालचक्रका परिवर्तन तो देखिये—जो पूर्वकालमें दृढ़तापूर्वक आपकी सेवा करनेवाले थे, वे आज आपसे ही युद्ध करना चाहते हैं ।। २९ १/२ ।। एषामेते महामात्राः किराता युद्धदुर्मदाः ।। ३० ।। हस्तिशिक्षाविदश्चैव सर्वे चैवाग्नियोनयः । एते विनिर्जिताः संख्ये संग्रामे सव्यसाचिना ।। ३१ ।। 'ये रणदुर्मद किरात इन हाथियोंके महावत और इन्हें शिक्षा देनेमें कुशल हैं। ये सब-के-सब अग्निसे उत्पन्न हुए हैं। सव्यसाची अर्जुनने इन सबको संग्रामभूमिमें पराजित कर दिया था ।। ३०-३१ ।। मदर्थमद्य संयत्ता दुर्योधनवशानुगाः । एतान् हत्वा शरै राजन् किरातान् युद्धदुर्मदान् ।। ३२ ।। सैन्धवस्य वधे यत्तमनुयास्यामि पाण्डवम् । 'राजन्! आज दुर्योधनके वशीभूत होकर ये मेरे साथ युद्ध करनेको तैयार खड़े हैं। इन रणदुर्मद किरातोंका अपने बाणोंद्वारा संहार करके मैं सिंधुराजके वधके प्रयत्नमें लगे हुए पाण्डुनन्दन अर्जुनके पास जाऊँगा ।। ३२ १/२ ।। ये त्वेते सुमहानागा अञ्जनस्य कुलोद्भवाः ।। ३३ ।। कर्कशाश्च विनीताश्च प्रभिन्नकरटामुखाः । जाम्बूनदमयैः सर्वै वर्मभिः सुविभूषिताः ।। ३४ ।। लब्धलक्ष्या रणे राजन्नैरावणसमा युधि । उत्तरात् पर्वतादेते तीक्ष्णैर्दस्युभिरास्थिताः ।। ३५ ।। 'ये जो बड़े-बड़े गजराज दृष्टिगोचर हो रहे हैं, ये अंजन नामक दिग्गजके कुलमें उत्पन्न हुए हैं*-। इनका स्वभाव बड़ा ही कठोर है। इन्हें युद्धकी अच्छी शिक्षा मिली है। इनके गण्डस्थल और मुखसे मदकी धारा बहती रहती है। वे सब-के-सब सुवर्णमय कवचोंसे विभूषित हैं। राजन्! ये पहले भी युद्धस्थलमें अपने लक्ष्यपर विजय पा चुके हैं और समरांगणमें ऐरावतके समान पराक्रम
प्रकट करते हैं। उत्तर पर्वत (हिमालय-प्रदेश)-से आये हुए तीखे स्वभाववाले लुटेरे और डाकू इन हाथियोंपर सवार हैं॥ ३३—३५॥
कर्कशैः प्रवरैर्योधैः कार्ष्णायसतनुच्छदैः।
सन्ति गोयोनयश्चात्र सन्ति वानरयोनयः॥ ३६॥
अनेकयोनयश्चान्ये तथा मानुषयोनयः।
'वे कर्कश स्वभाववाले तथा श्रेष्ठ योद्धा हैं। उन्होंने काले लोहेके बने हुए कवच धारण कर रखे हैं। उनमेंसे बहुत-से दस्यु गायोंके पेटसे उत्पन्न हुए हैं। कितने ही बंदरियोंकी संतानें हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जिनमें अनेक योनियोंका सम्मिश्रण है तथा कितने ही मानव-संतान भी हैं॥ ३६ १/२॥
अनीकं समवेतानां धूम्रवर्णमुदीर्यते॥ ३७॥
म्लेच्छानां पापकर्तृणां हिमदुर्गनिवासिनाम्।
'यहाँ एकत्र हुए हिमदुर्गनिवासी पापाचारी म्लेच्छोंकी यह सेना धूएँके समान काली प्रतीत होती है॥ ३७ १/२॥
एतद् दुर्योधनो लब्ध्वा समग्रं राजमण्डलम्॥ ३८॥
कृपं च सौमदत्तिं च द्रोणं च रथिनां वरम्।
सिन्धुराजं तथा कर्णमवमन्यत पाण्डवान्॥ ३९॥
कृतार्थमथ चात्मानं मन्यते कालचोदितः।
'कालसे प्रेरित हुआ दुर्योधन इन समस्त राजाओंके समुदायको तथा रथियोंमें श्रेष्ठ द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भूरिश्रवा, जयद्रथ और कर्णको पाकर पाण्डवोंका अपमान करता है तथा अपने-आपको कृतार्थ मान रहा है॥ ३८-३९ १/२॥
ते तु सर्वेऽद्य सम्प्राप्ता मम नाराचगोचरम्॥ ४०॥
न विमोक्ष्यन्ति कौन्तेय यद्यपि स्युर्मनोजवाः।
'कुन्तीनन्दन! वे सब लोग आज मेरे नाराचोंके लक्ष्य बने हुए हैं। वे मनके समान वेगशाली हों तो भी मेरे हाथोंसे छूट नहीं सकेंगे॥ ४० १/२॥
तेन सम्भाविता नित्यं परवीर्योपजीविना॥ ४१॥
विनाशमुपयास्यन्ति मच्छ्रौघनिपीडिताः।
'दूसरोंके बलपर जीनेवाले दुर्योधनने इन सब लोगोंका सदा आदरपूर्वक भरण-पोषण किया है; परंतु ये मेरे बाणसमूहोंसे पीड़ित होकर आज विनष्ट हो जायँगे॥ ४१ १/२॥
ये त्वेते रथिनो राजन् दृश्यन्ते काञ्चनध्वजाः॥ ४२॥
एते दुर्वारणा नाम काम्बोजा यदि ते श्रुताः।
'राजन्! ये जो सोनेकी ध्वजावाले रथी दिखायी देते हैं, ये दुर्वारण नामवाले काम्बोज सैनिक हैं। आपने इनका नाम सुना होगा ॥ ४२ १/२ ॥
शूराश्च कृतविद्याश्च धनुर्वेदे च निष्ठिताः ॥ ४३ ॥
संहताश्च भृशं ह्येते अन्योन्यस्य हितैषिणः ।
'ये शूर, विद्वान् तथा धनुर्वेदमें परिनिष्ठित हैं। इनमें परस्पर बड़ा संगठन है। ये एक-दूसरेका हित चाहनेवाले हैं ॥ ४३ १/२ ॥
अक्षौहिण्यश्च संरब्धा धार्तराष्ट्रस्य भारत ॥ ४४ ॥
यत्ता मदर्थे तिष्ठन्ति कुरुवीराभिरक्षिताः ।
अप्रमत्ता महाराज मामेव प्रत्युपस्थिताः ॥ ४५ ॥
'भरतनन्दन! दुर्योधनकी क्रोधमें भरी हुई ये कई अक्षौहिणी सेनाएँ कौरववीरोंसे सुरक्षित हो मेरे लिये तैयार खड़ी हैं। महाराज! ये सब सावधान होकर मुझपर ही आक्रमण करनेवाली हैं ॥ ४४-४५ ॥
तानहं प्रमथिष्यामि तृणानीव हुताशनः ।
तस्मात् सर्वानुपासंगान् सर्वोपकरणानि च ॥ ४६ ॥
रथे कुर्वन्तु मे राजन् यथावद् रथकल्पकाः ।
'परंतु जैसे आग तिनकोंको जला डालती है, उसी प्रकार मैं उन समस्त कौरव-सैनिकोंको मथ डालूँगा। अतः राजन्! रथको सुसज्जित करनेवाले लोग आज मेरे रथपर यथावत् रूपसे भरे हुए तरकसों तथा अन्य सब आवश्यक उपकरणोंको रख दें ॥ ४६ १/२ ॥
अस्मिंस्तु किल सम्मर्दे ग्राह्यं विविधमायुधम् ॥ ४७ ॥
यथोपदिष्टमाचार्यैः कार्यः पञ्चगुणो रथः ।
'इस संग्राममें नाना प्रकारके आयुधोंका उसी प्रकार संग्रह कर लेना चाहिये, जैसा कि आचार्योंने उपदेश किया है। रथपर रखी जानेवाली युद्धसामग्री पहलेसे पाँचगुनी कर देनी चाहिये ॥ ४७ १/२ ॥
काम्बोजैर्हि समेष्यामि तीक्ष्णैराशीविषोपमैः ॥ ४८ ॥
नानाशस्त्रसमावायैर्विविधायुधयोधिभिः ।
'आज मैं विषधर सर्पके समान क्रूर स्वभाववाले उन काम्बोज-सैनिकोंके साथ युद्ध करूँगा, जो नाना प्रकारके शस्त्रसमुदायोंसे सम्पन्न और भाँति-भाँतिके आयुधोंद्वारा युद्ध करनेमें कुशल हैं ॥ ४८ १/२ ॥
किरातैश्च समेष्यामि विषकल्पैः प्रहारिभिः ॥ ४९ ॥
लालितैः सततं राज्ञा दुर्योधनहितैषिभिः ।
'दुर्योधनका हित चाहनेवाले और विषके समान घातक उन प्रहारकुशल किरात-योद्धाओंके साथ भी संग्राम करूँगा, जिनका राजा दुर्योधनने सदा ही लालन-पालन किया है ।। ४९ १/२ ।। शकैश्चापि समेष्यामि शक्रतुल्यपराक्रमैः ।। ५० ।। अग्निकल्पैर्दुराधर्षैः प्रदीप्तैरिव पावकैः । 'प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी, दुर्धर्ष एवं इन्द्रके समान पराक्रमी शकोंके साथ भी आज मैं भिड़ जाऊँगा ।। ५० १/२ ।। तथान्यैर्विविधैर्योधैः कालकल्पैर्दुरासदैः ।। ५१ ।। समेष्यामि रणे राजन् बहुभिर्युद्धदुर्मदैः । 'राजन्! इनके सिवा और भी जो नाना प्रकारके बहुसंख्यक युद्धदुर्मद, कालके तुल्य भयंकर तथा दुर्जय योद्धा हैं, रणक्षेत्रमें उन सबका सामना करूँगा ।। ५१ १/२ ।। तस्माद् वै वाजिनो मुख्या विश्रान्ताः शुभलक्षणाः ।। ५२ ।। उपावृत्ताश्च पीताश्च पुनर्युज्यन्तु मे रथे । 'इसलिये उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न श्रेष्ठ घोड़े, जो विश्राम कर चुके हों, जिन्हें टहलाया गया हो और पानी भी पिला दिया गया हो, पुनः मेरे रथमें जोते जायँ' ।। ५२ १/२ ।।
संजय उवाच
तस्य सर्वानुपासांगान् सर्वोपकरणानि च ।। ५३ ।। रथे चास्थापयद् राजा शस्त्राणि विविधानि च । **संजय कहते हैं—**महाराज! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने सात्यकिके रथपर भरे हुए तरकसों, समस्त उपकरणों तथा भाँति-भाँतिके शस्त्रोंको रखवा दिया ।। ५३ १/२ ।। ततस्तान् सर्वतो युक्तान् सदश्वांश्चतुरो जनाः ।। ५४ ।। रसवत् पाययामासुः पानं मदसमीरणम् । तदनन्तर सब प्रकारसे सुशिक्षित उन चारों उत्तम घोड़ोंको सेवकोंने मदमत्त बना देनेवाला रसीला पेय पदार्थ पिलाया ।। ५४ १/२ ।। पीतोपवृत्तान् स्नातांश्च जग्धान्नान् समलंकृतान् ।। ५५ ।। विनीतशल्यांस्तुरगांश्चतुरो हेममालिनः । तान् युक्तान् रुक्मवर्णाभान् विनीतान् शीघ्रगामिनः ।। ५६ ।। संहृष्टमनसोऽव्यग्रान् विधिवत्कल्पितान् रथे । महाध्वजेन सिंहेन हेमकेसरमालिना ।। ५७ ।।
संवृते केतकैर्हैमैर्मणिविद्रुमचित्रितैः । पाण्डुराभ्रप्रकाशाभिः पताकाभिरलंकृते ॥ ५८ ॥ हेमदण्डोच्छ्रितच्छत्रे बहुशस्त्रपरिच्छदे । योजयामास विधिवद्धेमभाण्डविभूषितान् ॥ ५९ ॥ जब वे पी चुके तो उन्हें टहलाया और नहलाया गया। उसके बाद दाना और चारा खिलाया गया। फिर उन्हें सब प्रकारसे सुसज्जित किया गया। उनके अंगोंमें गड़े हुए बाण पहले ही निकाल दिये गये थे। वे चारों घोड़े सोनेकी मालाओंसे विभूषित थे। उन योग्य अश्वोंकी कान्ति सुवर्णके समान थी। वे सुशिक्षित और शीघ्रगामी थे। उनके मनमें हर्ष और उत्साह था। तनिक भी व्यग्रता नहीं थी। उन्हें विधिपूर्वक सजाया गया था। स्वर्णमय अलंकारोंसे अलंकृत उन अश्वोंको सारथिने विधिपूर्वक रथमें जोता। वह रथ सुवर्णमय केशरोंसे सुशोभित सिंहके चिह्नवाले विशाल ध्वजसे सम्पन्न था। मणियों और मूँगोंसे चित्रित सोनेकी शलाकाओंसे शोभायमान एवं श्वेत पताकाओंसे अलंकृत था। उस रथके ऊपर स्वर्णमय दण्डसे विभूषित छत्र तना हुआ था तथा रथके भीतर नाना प्रकारके शस्त्र तथा अन्य आवश्यक सामान रखे गये थे ॥ ५५—५९ ॥
दारुकस्यानुजो भ्राता सूतस्तस्य प्रियः सखा । न्यवेदयद् रथं युक्तं वासवस्येव मातलिः ॥ ६० ॥ जैसे मातलि इन्द्रका सारथि और सखा भी है, उसी प्रकार दारुकका छोटा भाई सात्यकिका सारथि और प्रिय सखा था। उसने सात्यकिको यह सूचना दी कि रथ जोतकर तैयार है ॥ ६० ॥
ततः स्नातः शुचिर्भूत्वा कृतकौतुकमङ्गलः । स्नातकानां सहस्रस्य स्वर्णनिष्कानथो ददौ ॥ ६१ ॥ तदनन्तर सात्यकिने स्नान करके पवित्र हो यात्राकालिक मंगलकृत्य सम्पन्न करनेके पश्चात् एक सहस्र स्नातकोंको सोनेकी मुद्राएँ दान कीं ॥ ६१ ॥
आशीर्वादैः परिष्वक्तः सात्यकिः श्रीमतां वरः । ततः स मधुपर्कार्हः पीत्वा कैलातकं मधु ॥ ६२ ॥ लोहिताक्षो बभौ तत्र मदविह्वललोचनः । आलभ्य वीरकांस्यं च हर्षेण महतान्वितः ॥ ६३ ॥ द्विगुणीकृततेजा हि प्रज्वलन्निव पावकः । उत्सङ्गे धनुरादाय सशरं रथिनां वरः ॥ ६४ ॥ कृतस्वस्त्ययनो विप्रैः कवची समलंकृतः । लाजैर्गन्धैस्तथा माल्यैः कन्याभिश्चाभिनन्दितः ॥ ६५ ॥