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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

‘संजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे। जब वे भी मृत्युसे बच न सके, तब तुम्हारे पुत्रके लिये क्या कहा जाय? अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ११० ॥
गयं चामूर्तरयसं मृतं शुश्रुम संजय ।
यः स वर्षशतं राजा हुतशिष्टाशनोऽभवत् ॥ १११ ॥
‘संजय! सुननेमें आया है कि अमूर्तरयाके पुत्र राजा गयकी भी मृत्यु हुई थी। उन्होंने सौ वर्षोंतक होमसे अवशिष्ट अन्नका ही भोजन किया ॥ १११ ॥
यस्मै वह्निर्वरं प्रादात् ततो वव्रे वरान् गयः ।
ददतो योऽक्षयं वित्तं धर्मे श्रद्धा च वर्धताम् ॥ ११२ ॥
मनो मे रमतां सत्ये त्वत्प्रसादाद् हुताशन ।
‘एक समय अग्निदेवने उन्हें वर माँगनेके लिये कहा, तब राजा गयने ये वर माँगे, ‘अग्निदेव! आपकी कृपासे दान करते हुए मेरे पास अक्षय धनका भंडार भरा रहे। धर्ममें मेरी श्रद्धा बढ़ती रहे और मेरा मन सदा सत्यमें ही अनुरक्त रहे’ ॥ ११२½ ॥
लेभे च कामांस्तान् सर्वान् पावकादिति नः श्रुतम् ॥ ११३ ॥
दर्शैश्च पूर्णमासैश्च चातुर्मास्यैः पुनः पुनः ।
अयजद्धयमेधेन सहस्रं परिवत्सरान् ॥ ११४ ॥
‘सुना है कि उन्हें अग्निदेवसे वे सभी मनोवाञ्छित फल प्राप्त हो गये थे। उन्होंने एक हजार वर्षोंतक बारंबार दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य तथा अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ ११३-११४ ॥
शतं गवां सहस्राणि शतमश्वतराणि च ।
उत्थायोत्थाय वै प्रादात् सहस्रं परिवत्सरान् ॥ ११५ ॥
‘वे हजार वर्षोंतक प्रतिदिन सबेरे उठ-उठकर एक-एक लाख गौओं और सौ-सौ खच्चरोंका दान करते थे ॥ ११५ ॥
तर्पयामास सोमेन देवान् वित्तैर्द्विजानपि ।
पितॄन् स्वधाभिः कामैश्च स्त्रियः स पुरुषर्षभ ॥ ११६ ॥
‘पुरुषप्रवर! इन्होंने सोमरसके द्वारा देवताओंको, धनके द्वारा ब्राह्मणोंको, श्राद्धकर्मसे पितरोंको और कामभोगद्वारा स्त्रियोंको तृप्त किया था ॥ ११६ ॥
सौवर्णीं पृथिवीं कृत्वा दशव्यामां द्विरायताम् ।
दक्षिणामददद् राजा वाजिमेधे महाक्रतौ ॥ ११७ ॥
‘राजा गयने महायज्ञ अश्वमेधमें दस व्याम (पचास हाथ) चौड़ी और इससे दूनी लंबी सोनेकी पृथिवी बनवाकर दक्षिणारूपसे दान की थी ॥ ११७ ॥
यावत्यः सिकता राजन् गङ्गायां पुरुषर्षभ ।
तावतीरेव गाः प्रादादामूर्तरयसो गयः ॥ ११८ ॥

'पुरुषप्रवर नरेश! गंगाजीमें जितने बालूके कण हैं, अमूर्तरयाके पुत्र गयने उतनी ही गौओंका दान किया था।। स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। ११९ ।। 'संजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे। जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ।। ११९ ।। रन्तिदेवं च सांकृत्यं मृतं संजय शुश्रुम । सम्यगाराध्य यः शक्राद् वरं लेभे महातपाः ।। १२० ।। अन्नं च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि । श्रद्धा च नो मा व्यगमन्मा च याचिष्म कंचन ।। १२१ ।। 'संजय! संकृतिके पुत्र राज रन्तिदेव भी कालके गालमें चले गये, यह हमारे सुननेमें आया है। उन महातपस्वी नरेशने इन्द्रकी अच्छी तरह आराधना करके उनसे यह वर माँगा कि 'हमारे पास अन्न बहुत हो, हम सदा अतिथियोंकी सेवाका अवसर प्राप्त करें, हमारी श्रद्धा दूर न हो और हम किसीसे कुछ भी न माँगें' ।। उपातिष्ठन्त पशवः स्वयं तं संशितव्रतम् । ग्राम्यारण्या महात्मानं रन्तिदेवं यशस्विनम् ।। १२२ ।। 'कठोर व्रतका पालन करनेवाले, यशस्वी महात्मा राजा रन्तिदेवके पास गाँवों और जंगलोंके पशु अपने-आप यज्ञके लिये उपस्थित हो जाते थे ।। १२२ ।। महानदी चर्मराशेरुत्क्लेदात् ससृजे यतः । ततश्चर्मण्वतीत्येवं विख्याता सा महानदी ।। १२३ ।। 'वहाँ भीगी चर्मराशिसे जो जल बहता था, उससे एक विशाल नदी प्रकट हो गयी, जो चर्मण्वती (चम्बल) के नामसे विख्यात हुई ।। १२३ ।। ब्राह्मणेभ्यो ददौ निष्कान् सदसि प्रतते नृपः । तुभ्यं निष्कं तुभ्यं निष्कमिति क्रोशन्ति वै द्विजाः ।। १२४ ।। सहस्रं तुभ्यमित्युक्त्वा ब्राह्मणान् सम्प्रपद्यते । 'राजा अपने विशाल यज्ञमें ब्राह्मणोंको सोनेके निष्क दिया करते थे। वहाँ द्विजलोग पुकार-पुकारकर कहते कि 'ब्राह्मणो! यह तुम्हारे लिये निष्क है, यह तुम्हारे लिये निष्क है' परंतु कोई लेनेवाला आगे नहीं बढ़ता था। फिर वे यह कहकर कि 'तुम्हारे लिये एक सहस्र निष्क है', लेनेवाले ब्राह्मणोंको उपलब्ध कर पाते थे ।। १२४ १/२ ।। अन्वाहार्योपकरणं द्रव्योपकरणं च यत् ।। १२५ ।। घटाः पात्र्यः कटाहानि स्थाल्यश्च पिठराणि च । नासीत् किंचिदसौवर्णं रन्तिदेवस्य धीमतः ।। १२६ ।।

'बुद्धिमान् राजा रन्तिदेवके उस यज्ञमें अन्वाहार्य अग्निमें आहुति देनेके लिये जो उपकरण थे तथा द्रव्य-संग्रहके लिये जो उपकरण—घड़े, पात्र, कड़ाहे, बटलोई और कठौते आदि सामान थे, उनमेंसे कोई भी ऐसा नहीं था, जो सोनेका बना हुआ न हो ॥ १२५-१२६ ॥
सांकृते रन्तिदेवस्य यां रात्रिमवसन् गृहे ।
आलभ्यन्त शतं गावः सहस्राणि च विंशतिः ॥ १२७ ॥
'संकृतिके पुत्र राजा रन्तिदेवके घरमें जिस रातको अतिथियोंका समुदाय निवास करता था, उस समय उन्हें बीस हजार एक सौ गौएँ छूकर दी जाती थीं ॥ १२७ ॥
तत्र स्म सूदाः क्रोशन्ति सुमृष्टमणिकुण्डलाः ।
सूपं भूयिष्ठमश्रीध्वं नाद्य भोज्यं यथा पुरा ॥ १२८ ॥
'वहाँ विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण किये रसोइये पुकार-पुकारकर कहते थे कि 'आपलोग खूब दाल-भात खाइये। आजका भोजन पहले जैसा नहीं है, अर्थात् पहलेकी अपेक्षा बहुत अच्छा है' ॥ १२८ ॥
स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ १२९ ॥
'सृंजय! रन्तिदेव तुमसे पूर्वोक्त चारों गुणोंमें बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ॥ १२९ ॥
सगरं च महात्मानं मृतं शुश्रुम सृंजय ।
ऐक्ष्वाकं पुरुषव्याघ्रमतिमानुषविक्रमम् ॥ १३० ॥
'सृंजय! इक्ष्वाकुवंशी पुरुषसिंह महामना सगर भी मरे थे, ऐसा सुननेमें आया है। उनका पराक्रम अलौकिक था ॥
षष्टिः पुत्रसहस्राणि यं यान्तमनुजग्मिरे ।
नक्षत्रराजं वर्षान्ते व्यभ्रे ज्योतिर्गणा इव ॥ १३१ ॥
'जैसे वर्षाके अन्त (शरद्) में बादलोंसे रहित आकाशके भीतर तारे नक्षत्रराज चन्द्रमाका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार राजा सगर जब युद्ध आदिके लिये कहीं यात्रा करते थे, तब उनके साठ हजार पुत्र उन नरेशके पीछे-पीछे चलते थे ॥ १३१ ॥
एकच्छत्रा मही यस्य प्रतापादभवत् पुरा ।
योऽश्वमेधसहस्रेण तर्पयामास देवताः ॥ १३२ ॥
'पूर्वकालमें राजाके प्रतापसे एकछत्र पृथ्वी उनके अधिकारमें आ गयी थी। उन्होंने एक सहस्र अश्वमेध यज्ञ करके देवताओंको तृप्त किया था ॥ १३२ ॥
यः प्रादात् कनकस्तम्भं प्रासादं सर्वकाञ्चनम् ।
पूर्णं पद्मदलाक्षीणां स्त्रीणां शयनसंकुलम् ॥ १३३ ॥

द्विजातिभ्योऽनुरूपेभ्यः कामांश्च विविधान् बहून्। यस्यादेशेन तद् वित्तं व्यभजन्त द्विजातयः॥ १३४ ॥ ‘राजाने सोनेके खंभोंसे युक्त पूर्णतः सोनेका बना हुआ महल, जो कमलके समान नेत्रोंवाली सुन्दरी स्त्रियोंकी शय्याओंसे सुशोभित था, तैयार कराकर योग्य ब्राह्मणोंको दान किया। साथ ही नाना प्रकारकी भोगसामग्रियाँ भी प्रचुरमात्रामें उन्हें दी थीं। उनके आदेशसे ब्राह्मणोंने उनका सारा धन आपसमें बाँट लिया था॥ १३३-१३४॥

खानयामास यः कोपात् पृथिवीं सागराङ्किताम्। यस्य नाम्ना समुद्रश्च सागरत्वमुपागतः॥ १३५ ॥ ‘एक समय क्रोधमें आकर उन्होंने समुद्रसे चिह्नित सारी पृथ्वी खुदवा डाली थी। उन्हींके नामपर समुद्रकी ‘सागर' संज्ञा हो गयी॥ १३५॥

स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया। पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः॥ १३६ ॥ ‘सृंजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े हुए थे। तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तब तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो॥ १३६॥

राजानं च पृथुं वैन्यं मृतं शुश्रुम संजय। यमभ्यषिञ्चन् सम्भूय महारण्ये महर्षयः॥ १३७ ॥ ‘सृंजय! वेनके पुत्र महाराज पृथुको भी अपने शरीरका त्याग करना पड़ा था, ऐसा हमने सुना है। महर्षियोंने महान् वनमें एकत्र होकर उनका राज्याभिषेक किया था॥ १३७॥

प्रथयिष्यति वै लोकान् पृथुरित्येव शब्दितः। क्षताद् यो वै त्रायतीति स तस्मात् क्षत्रियः स्मृतः॥ १३८ ॥ ‘ऋषियोंने यह सोचकर कि सब लोकोंमें धर्मकी मर्यादा प्रथित (स्थापित) करेंगे, उनका नाम पृथु रखा था। वे क्षत अर्थात् दुःखसे सबका त्राण करते थे, इसलिये क्षत्रिय कहलाये॥ १३८॥

पृथुं वैन्यं प्रजा दृष्ट्वा रक्ताः स्मेति यदब्रुवन्। ततो राजेति नामास्य अनुरागादजायत॥ १३९ ॥ ‘वेननन्दन पृथुको देखकर समस्त प्रजाओंने एक साथ कहा कि 'हम इनमें अनुरक्त हैं' इस प्रकार प्रजाका रञ्जन करनेके कारण ही उनका नाम ‘राजा' हुआ॥ १३९॥

अकृष्टपच्या पृथिवी पुटके पुटके मधु। सर्वा द्रोणदुघा गावो वैन्यस्यासन् प्रशासतः॥ १४० ॥ ‘पृथुके शासनकालमें पृथिवी बिना जोते ही धान्य उत्पन्न करती थी, वृक्षोंके पुट-पुटमें मधु (रस) भरा था और सारी गौएँ एक-एक द्रोण दूध देती थीं॥ १४०॥

अरोगाः सर्वसिद्धार्था मनुष्या अकुतोभयाः ।
यथाभिकाममवसन् क्षेत्रेषु च गृहेषु च ॥ १४१ ॥
‘मनुष्य नीरोग थे। उनकी सारी कामनाएँ सर्वथा परिपूर्ण थीं और उन्हें कभी किसी चीजसे भय नहीं होता था। सब लोग इच्छानुसार घरों या खेतोंमें रह लेते थे ।।

आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः ।
सरितश्चानुदीर्यन्त ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ १४२ ॥
‘जब वे समुद्रकी ओर यात्रा करते, उस समय उसका जल स्थिर हो जाता था। नदियोंकी बाढ़ शान्त हो जाती थी। उनके रथकी ध्वजा कभी भग्न नहीं होती थी ।।

हैरण्यांस्त्रिनलोत्सेधान् पर्वतानेकविंशतिम् ।
ब्राह्मणेभ्यो ददौ राजा योऽश्वमेधे महामखे ॥ १४३ ॥
‘राजा पृथुने अश्वमेध नामक महायज्ञमें चार सौ हाथ ऊँचे इक्कीस सुवर्णमय पर्वत ब्राह्मणोंको दान किये थे ॥ १४३ ।।

स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ १४४ ॥
‘सृंजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रकी अपेक्षा बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे। जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक न करो ।। १४४ ।।

किं वा तूष्णीं ध्यायसे सृंजय त्वं
न मे राजन् वाचमिमां शृणोषि ।
न चेन्मोघं विप्रलप्तं ममेदं
पथ्यं मुमूर्षोरिव सुप्रयुक्तम् ॥ १४५ ॥
‘सृंजय! तुम चुपचाप क्या सोच रहे हो। राजन्! मेरी इस बातको क्यों नहीं सुनते हो? जैसे मरणासन्न पुरुषके ऊपर अच्छी तरह प्रयोगमें लायी हुई ओषधि व्यर्थ जाती है, उसी प्रकार मेरा यह सारा प्रवचन निष्फल तो नहीं हो गया?’ ।। १४५ ।।

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संजय उवाच

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शृणोमि ते नारद वाचमेनां
विचित्रार्थां स्रजमिव पुण्यगन्धाम् ।
राजर्षीणां पुण्यकृतां महात्मनां
कीर्त्या युक्तानां शोकनिर्णाशनार्थाम् ॥ १४६ ॥
संजयने कहा— नारद! पवित्र गन्धवाली मालाके समान विचित्र अर्थसे भरी हुई आपकी इस वाणीको मैं सुन रहा हूँ। पुण्यात्मा महामनस्वी और कीर्तिशाली राजर्षियोंके चरित्रसे युक्त आपका यह वचन सम्पूर्ण शोकोंका विनाश करनेवाला है ॥ १४६ ॥

न ते मोघं विप्रलप्तं महर्षे दृष्ट्वैवाहं नारद त्वां विशोकः । शुश्रूषे ते वचनं ब्रह्मवादिन् न ते तृप्याम्पमृतस्येव पानात् ॥ १४७ ॥ महर्षि नारद! आपने जो कुछ कहा है, आपका यह उपदेश व्यर्थ नहीं गया है। आपका दर्शन करके ही मैं शोकरहित हो गया हूँ। ब्रह्मवादी मुने! मैं आपका यह प्रवचन सुनना चाहता हूँ और अमृतपानके समान उससे तृप्त नहीं हो रहा हूँ ॥ १४७ ॥

अमोघदर्शिन् मम चेत् प्रसादं संतापदग्धस्य विभो प्रकुर्याः । सुतस्य सञ्जीवनमद्य मे स्यात् तव प्रसादात् सुतसङ्गमश्च ॥ १४८ ॥ प्रभो! आपका दर्शन अमोघ है। मैं पुत्रशोकके संतापसे दग्ध हो रहा हूँ। यदि आप मुझपर कृपा करें तो मेरा पुत्र फिर जीवित हो सकता है और आपके प्रसादसे मुझे पुनः पुत्र-मिलनका सुख सुलभ हो जायगा ॥ १४८ ॥

नारद उवाच

यस्ते पुत्रो गमितोऽयं विजातः स्वर्णष्ठीवी यमदात् पर्वतस्ते । पुनस्तु ते पुत्रमहं ददामि हिरण्यनाभं वर्षसहस्रिणं च ॥ १४९ ॥ **नारदजी कहते हैं—**राजन्! तुम्हारे यहाँ जो यह सुवर्णष्ठीवी नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था और जिसे पर्वत मुनिने तुम्हें दिया था, वह तो चला गया। अब मैं पुनः हिरण्यनाभ नामक एक पुत्र दे रहा हूँ, जिसकी आयु एक हजार वर्षोंकी होगी ॥ १४९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि षोडशराजोपाख्याने एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सोलह राजाओंका उपाख्यानविषयक* उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥


१-अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम—ये सात सोम-संस्थाएँ हैं।
२-पहले द्रोणपर्वमें जो सोलह राजाओंके प्रसंग आये हैं, उनमें और यहाँके प्रसंगमें पाठभेदोंके कारण बहुत अन्तर देखा जाता है। वहाँ भरतके द्वारा यमुनातटपर सौ, सरस्वतीतटपर तीन सौ और गंगातटपर चार सौ अश्वमेध यज्ञ किये गये थे—यह उल्लेख है।

* ‘शम्या’ एक ऐसे काठके डंडेको कहते हैं, जिसका निचला भाग मोटा होता है। उसे जब कोई बलवान् पुरुष उठाकर जोरसे फेंके, तब जितनी दूरीपर जाकर वह गिरे, उतने भूभागको एक ‘शम्यापात’ कहते हैं। इस तरह एक-एक शम्यापातमें एक-एक यज्ञवेदी बनाते और यज्ञ करते हुए राजा ययाति आगे बढ़ते गये। इस प्रकार चलकर उन्होंने भारतभूमिकी परिक्रमा की थी।

* यह षोडश राजाओंका उपाख्यान द्रोणपर्वके पचपनवें अध्यायसे लेकर इकहत्तरवें अध्यायतक पहले आ चुका है। उसीको कुछ संक्षिप्त करके पुनः यहाँ लिया गया है। पहलेका परशुरामचरित्र इसमें संगृहीत नहीं हुआ है और पहले जो राजा पौरवका चरित्र आया था, उसके स्थानमें यहाँ अंगराज बृहद्रथके चरित्रका वर्णन है। कथाओंके क्रममें भी उलटा-पलटी हो गयी है। श्लोकोंके पाठोंमें भी कई जगह भेद दिखायी देता है।

महर्षि नारद और पर्वतका उपाख्यान

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त्रिंशोऽध्यायः

महर्षि नारद और पर्वतका उपाख्यान

युधिष्ठिर उवाच

स कथं कांचनष्ठीवी सृंजयस्य सुतोऽभवत् ।
पर्वतेन किमर्थं वा दत्तस्तेन ममार च ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! पर्वत मुनिने राजा सृंजयको सुवर्णष्ठीवी नामक पुत्र किसलिये दिया और वह क्यों मर गया? ॥ १ ॥

यदा वर्षसहस्रायुस्तदा भवति मानवः ।
कथमप्राप्तकौमारः सृंजयस्य सुतो मृतः ॥ २ ॥
जब उस समय मनुष्यकी एक हजार वर्षकी आयु होती थी, तब सृंजयका पुत्र कुमारावस्था आनेसे पहले ही क्यों मर गया? ॥ २ ॥

उताहो नाममात्रं वै सुवर्णष्ठीविनोऽभवत् ।
कथं वा काञ्चनष्ठीवीत्येतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
उस बालकका नाममात्र ही सुवर्णष्ठीवी था या उसमें वैसा ही गुण भी था। सुवर्णष्ठीवी नाम पड़नेका कारण क्या था? यह सब मैं जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

अत्र ते वर्णयिष्यामि यथावृत्तं जनेश्वर ।
नारदः पर्वतश्चैव द्वावृषी लोकसत्तमौ ॥ ४ ॥
श्रीकृष्ण बोले— जनेश्वर! इस विषयमें जो बात है, वह यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, सुनिये। नारद और पर्वत—ये दोनों ऋषि सम्पूर्ण लोकोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ ४ ॥

मातुलो भागिनेयश्च देवलोकादिहागतौ ।
विहर्तुकामौ सम्प्रीत्या मानुषेषु पुरा विभो ॥ ५ ॥
ये दोनों परस्पर मामा और भानजे लगते हैं! प्रभो! पहलेकी बात है ये दोनों महर्षि मनुष्यलोकमें भ्रमण करनेके लिये प्रेमपूर्वक देवलोकसे यहाँ आये थे ॥ ५ ॥

हविःपवित्रभोज्येन देवभोज्येन चैव हि ।
नारदो मातुलश्चैव भागिनेयश्च पर्वतः ॥ ६ ॥
वे यहाँ पवित्र हविष्य तथा देवताओंके भोजन करनेयोग्य पदार्थ खाकर रहते थे। नारदजी मामा हैं और पर्वत इनके भानजे हैं ॥ ६ ॥

तावुभौ तपसोपेताववनीतलचारिणौ ।
भुञ्जानौ मानुषान् भोगान् यथावत् पर्यधावताम् ॥ ७ ॥

वे दोनों तपस्वी पृथवीतलपर विचरते और मानवीय भोगोंका उपभोग करते हुए यहाँ यथावत्रूपसे परिभ्रमण करने लगे ॥ ७ ॥

प्रीतिमन्तौ मुदा युक्तौ समयं चैव चक्रतुः ।
यो भवेद्धृदि संकल्पः शुभो वा यदि वाशुभः ॥ ८ ॥
अन्योन्यस्य स आख्येयो मृषा शापोऽन्यथा भवेत् ।
उन दोनोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ प्रेमपूर्वक यह शर्त कर रखी थी कि हमलोगोंके मनमें शुभ या अशुभ जो भी संकल्प प्रकट हो, उसे हम एक दूसरेसे कह दें; अन्यथा झूठे ही शापका भागी होना पड़ेगा ॥ ८ १/२ ॥

तौ तथेति प्रतिज्ञाय महर्षी लोकपूजितौ ॥ ९ ॥
सृंजयं शैत्यमभेत्य राजानमिदमूचतुः ।
वे दोनों लोकपूजित महर्षि 'तथास्तु' कहकर पूर्वोक्त प्रतिज्ञा करनेके पश्चात् श्वेतपुत्र राजा सृंजयके पास जाकर इस प्रकार बोले— ॥ ९ १/२ ॥

आवां भवति वत्स्यावः कञ्चित् कालं हिताय ते ॥ १० ॥
यथावत् पृथिवीपाल आवयोः प्रगुणीभव ।
'भूपाल! हम दोनों तुम्हारे हितके लिये कुछ कालतक तुम्हारे पास ठहरेंगे। तुम हमारे अनुकूल होकर रहो' ॥ १० १/२ ॥

तथेति कृत्वा राजा तौ सत्कृत्योपचचार ह ॥ ११ ॥
ततः कदाचित्तौ राजा महात्मानौ तपोधनौ ।
अब्रवीत् परमप्रीतः सुतेयं वरवर्णिनी ॥ १२ ॥
एकैव मम कन्यैषा युवां परिचरिष्यसि ।
दर्शनीयानवद्याङ्गी शीलवृत्तसमाहिता ॥ १३ ॥
सुकुमारी कुमारी च पद्मकिञ्जल्कसुप्रभा ।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर राजाने उन दोनोंका सत्कारपूर्वक पूजन किया। तदनन्तर एक दिन राजा सृंजयने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन दोनों तपस्वी महात्माओंसे कहा—'महर्षियो! यह मेरी एक ही कन्या है, जो परम सुन्दरी, दर्शनीय, निर्दोष अङ्गोंवाली तथा शील और सदाचारसे सम्पन्न है। कमल-केसरके समान कान्तिवाली यह सुकुमारी कुमारी आजसे आप दोनोंकी सेवा करेगी' ॥ ११—१३ १/२ ॥

परमं सौम्यमित्युक्तं ताभ्यां राजा शशास ताम् ॥ १४ ॥
कन्ये विप्रावुपचर देववत् पितृवच्च ह ।
तब उन दोनोंने कहा—'बहुत अच्छा।' इसके बाद राजाने उस कन्याको आदेश दिया—'बेटी! तुम इन दोनों महर्षियोंकी देवता और पितरोंके समान सेवा किया करो'।

सा तु कन्या तथेत्युक्त्वा पितरं धर्मचारिणी ॥ १५ ॥
यथानिदेशं राज्ञस्तौ सत्कृत्योपचचार ह ।

धर्माचरणमें तत्पर रहनेवाली उस कन्याने पितासे 'ऐसा ही होगा' यों कहकर राजाकी आज्ञाके अनुसार उन दोनोंकी सत्कारपूर्वक सेवा आरम्भ कर दी ॥ १५१/२ ॥ तस्यास्तेनोपचारेण रूपेणाप्रतिमेन च ॥ १६ ॥ नारदं हृच्छयस्तूर्णं सहसैवाभ्यपद्यत । उसकी उस सेवा तथा अनुपम रूप-सौन्दर्यसे नारदके हृदयमें सहसा कामभावका संचार हो गया ॥ १६१/२ ॥ ववृधे हि ततस्तस्य हृदि कामो महात्मनः ॥ १७ ॥ यथा शुक्लस्य पक्षस्य प्रवृत्तौ चन्द्रमाः शनैः । उन महामनस्वी नारदके हृदयमें काम उसी प्रकार धीरे-धीरे बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्ष आरम्भ होनेपर शनैः-शनैः चन्द्रमाकी वृद्धि होती है ॥ १७१/२ ॥ न च तं भागिनेयाय पर्वताय महात्मने ॥ १८ ॥ शशंस हृच्छयं तीव्रं व्रीडमानः स धर्मवित् । धर्मज्ञ नारदने लज्जावश भानजे महात्मा पर्वतको अपने बढ़े हुए दुःसह कामकी बात नहीं बतायी ॥ तपसा चेङ्गितैश्चैव पर्वतोऽथ बुबोध तम् ॥ १९ ॥ कामार्तं नारदं क्रुद्धः शशापैनं ततो भृशम् । परंतु पर्वतने अपनी तपस्या और नारदजीकी चेष्टाओंसे जान लिया कि नारद कामवेदनासे पीड़ित हैं; फिर तो उन्होंने अत्यन्त कुपित हो उन्हें शाप देते हुए कहा—॥ १९१/२ ॥ कृत्वा समयमव्यग्रो भवान् वै सहितो मया ॥ २० ॥ यो भवेद्धृदि संकल्पः शुभो वा यदि वाशुभः । अन्योन्यस्य स आख्येय इति तद् वै मृषा कृतम् ॥ २१ ॥ भवता वचनं ब्रह्मंस्तस्मादेष शपाम्यहम् । 'आपने मेरे साथ स्वस्थचित्तसे यह शर्त की थी कि 'हम दोनोंके हृदयमें जो भी शुभ या अशुभ संकल्प हो, उसे हम दोनों एक दूसरेसे कह दें।' परंतु ब्रह्मन्! आपने अपने उस वचनको मिथ्या कर दिया; इसलिये मैं शाप देनेको उद्यत हुआ हूँ ॥ २०-२११/२ ॥ न हि कामं प्रवर्तन्तं भवानाचष्ट मे पुरा ॥ २२ ॥ सुकुमार्यां कुमार्यां ते तस्मादेष शपाम्यहम् । 'जब आपके मनमें पहले इस सुकुमारी कुमारीके प्रति कामभावका उदय हुआ तो आपने मुझे नहीं बताया; इसलिये यह मैं आपको शाप दे रहा हूँ ॥ २२१/२ ॥ ब्रह्मचारी गुरुर्यस्मात् तपस्वी ब्राह्मणश्च सन् ॥ २३ ॥ अकार्षीः समयभ्रंशमावाभ्यां यः कृतो मिथः ।

शप्स्ये तस्मात् सुसंक्रुद्धो भवन्तं तं निबोध मे ।। २४ ।। 'आप ब्रह्मचारी, मेरे गुरुजन, तपस्वी और ब्राह्मण हैं तो भी आपने हमलोगोंमें जो शर्त हुई थी, उसे तोड़ दिया है; इसलिये मैं अत्यन्त कुपित होकर आपको जो शाप दे रहा हूँ उसे सुनिये— ।। २३-२४ ।। सुकुमारी च ते भार्या भविष्यति न संशयः । वानरं चैव ते रूपं विवाहात् प्रभृति प्रभो ।। २५ ।। संद्रेक्ष्यन्ति नराश्चान्ये स्वरूपेण विनाकृतम् । 'प्रभो! यह सुकुमारी आपकी भार्या होगी, इसमें संशय नहीं है, परंतु विवाहके बादसे ही कन्या तथा अन्य सब लोग आपका रूप (मुख) वानरके समान देखने लगेंगे। बंदर जैसा-मुँह आपके स्वरूपको छिपा देगा' ।। २५ १/२ ।। स तद् वाक्यं तु विज्ञाय नारदः पर्वतं तथा ।। २६ ।। अशपत्तमापि क्रोधाद् भागिनेयं स मातुलः । तपसा ब्रह्मचर्येण सत्येन च दमेन च ।। २७ ।। युक्तोऽपि नित्यधर्मज्ञ न वै स्वर्गमवाप्स्यसि । उस बातको समझकर मामा नारदजी भी कुपित हो उठे और उन्होंने अपने भानजे पर्वतको शाप देते हुए कहा—'अरे! तू तपस्या, ब्रह्मचर्य, सत्य और इन्द्रिय-संयमसे युक्त एवं नित्य धर्मपरायण होनेपर भी स्वर्गलोकमें नहीं जा सकेगा' ।। २६-२७ १/२ ।। तौ तु शप्त्वा भृशं क्रुद्धौ परस्परममर्षणौ ।। २८ ।। प्रतिजग्मतुरन्योन्यं क्रुद्धाविव गजोत्तमौ । इस प्रकार अत्यन्त कुपित हो एक दूसरेको शाप दे वे दोनों क्रोधमें भरे हुए दो हाथियोंके समान अमर्षपूर्वक प्रतिकूल दिशाओंमें चल दिये ।। २८ १/२ ।। पर्वतः पृथिवीं कृत्स्नां विचचार महामतिः ।। २९ ।। पूज्यमानो यथान्यायं तेजसा स्वेन भारत । भारत! परम बुद्धिमान् पर्वत अपने तेजसे यथोचित सम्मान पाते हुए सारी पृथ्वीपर विचरने लगे ।। २९ १/२ ।। अथ तामलभत् कन्यां नारदः सृंजयात्मजाम् ।। ३० ।। धर्मेण विप्रप्रवरः सुकुमारीमनिन्दिताम् । इधर विप्रवर नारदजीने उस अनिन्द्य सुन्दरी सृंजय-कुमारी सुकुमारीको धर्मके अनुसार पत्नीरूपमें प्राप्त किया ।। सा तु कन्या यथाशापं नारदं तं ददर्श ह ।। ३१ ।। पाणिग्रहणमन्त्राणां नियोगादेव नारदम् ।

वैवाहिक मन्त्रोंका प्रयोग होते ही वह राजकन्या शापके अनुसार नारद मुनिको वानराकार मुखसे युक्त देखने लगी ॥ ३१ १/२ ॥
सुकुमारी च देवर्षिं वानरप्रतिमाननम् ॥ ३२ ॥
नैवावामन्यत तदा प्रीतिमत्येव चाभवत् ।
देवर्षिका मुँह वानरके समान देखकर भी सुकुमारीने उनकी अवहेलना नहीं की। वह उनके प्रति अपना प्रेम बढ़ाती ही गयी ॥ ३२ १/२ ॥
उपतस्थे च भर्तारं न चान्यं मनसाप्यगात् ॥ ३३ ॥
देवं मुनिं वा यक्षं वा पतित्वे पतिवत्सला ।
पतिपर स्नेह रखनेवाली सुकुमारी अपने स्वामीकी सेवामें सदा उपस्थित रहती और दूसरे किसी पुरुषका, वह यक्ष, मुनि अथवा देवता ही क्यों न हो, मनके द्वारा भी पतिरूपसे चिन्तन नहीं करती थी ॥ ३३ १/२ ॥
ततः कदाचिद् भगवान् पर्वतोऽनुचचार ह ॥ ३४ ॥
वनं विरहितं किंचित् तत्रापश्यत् स नारदम् ।
तदनन्तर किसी समय भगवान् पर्वत घूमते हुए किसी एकान्त वनमें आ गये। वहाँ उन्होंने नारदजीको देखा ॥
ततोऽभिवाद्य प्रोवाच नारदं पर्वतस्तदा ॥ ३५ ॥
भगवान् प्रसादं कुरुतात् स्वर्गदिशाय मे प्रभो ।
तब पर्वतने नारदजीको प्रणाम करके कहा—'प्रभो! आप मुझे स्वर्गमें जानेके लिये आज्ञा देनेकी कृपा करें' ॥ ३५ १/२ ॥ ॥
तमुवाच ततो दृष्ट्वा पर्वतं नारदस्तथा ॥ ३६ ॥
कृताञ्जलिमुपासीनं दीनं दीनतरः स्वयम् ।
नारदजीने देखा, पर्वत दीनभावसे हाथ जोड़कर मेरे पास खड़ा है; फिर तो वे स्वयं भी अत्यन्त दीन होकर उनसे बोले— ॥ ३६ १/२ ॥
त्वयाहं प्रथमं शप्तो वानरस्त्वं भविष्यसि ॥ ३७ ॥
इत्युक्तेन मया पश्चाच्छप्तस्त्वमपि मत्सरात् ।
अद्यप्रभृति वै वासं स्वर्गे नावाप्स्यसीति ह ॥ ३८ ॥
तव नैतद्धि विसदृशं पुत्रस्थाने हि मे भवान् ।
'वत्स! पहले तुमने मुझे यह शाप दिया था कि 'तुम वानर हो जाओ।' तुम्हारे ऐसा कहनेके बाद मैंने भी मत्सरतावश तुम्हें शाप दे दिया, जिससे आजतक तुम स्वर्गमें नहीं जा सके। यह तुम्हारे योग्य कार्य नहीं था; क्योंकि तुम मेरे पुत्रकी जगहपर हो' ॥ ३७-३८ १/२ ॥
न्यवर्तयेतां तौ शापावन्योन्येन तदा मुनी ॥ ३९ ॥
श्रीसमृद्धं तदा दृष्ट्वा नारदं देवरूपिणम् ।

सुकुमारी प्रदुद्राव परपत्यभिशङ्कया ॥ ४० ॥
इस प्रकार बातचीत करके उन दोनों ऋषियोंने एक दूसरेके शापको निवृत्त कर दिया। तब नारदजीको देवताके समान तेजस्वी रूपमें देखकर सुकुमारी पराये पतिकी आशङ्कासे भाग चली ॥ ३९-४० ॥
तां पर्वतस्ततो दृष्ट्वा प्रद्रवन्तीमनिन्दिताम् ।
अब्रवीत् तव भर्तेष नात्र कार्या विचारणा ॥ ४१ ॥
उस सती साध्वी राजकन्याको भागती देख पर्वतने इससे कहा—‘देवि! ये तुम्हारे पति ही हैं। इसमें अन्यथा विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है’ ॥ ४१ ॥
ऋषिः परमधर्मात्मा नारदो भगवान् प्रभुः ।
तवैवाभेद्यहृदयो मा तेऽभूदत्र संशयः ॥ ४२ ॥
‘ये तुम्हारे पति अभेद्य हृदयवाले परम धर्मात्मा प्रभु भगवान् नारद मुनि ही हैं। इस विषयमें तुम्हें संदेह नहीं होना चाहिये’ ॥ ४२ ॥
सानुनीता बहुविधं पर्वतेन महात्मना ।
शापदोषं च तं भर्तुः श्रुत्वा प्रकृतिमागता ॥ ४३ ॥
पर्वतोऽथ ययौ स्वर्गं नारदोऽभ्यगमद् गृहान् ।
महात्मा पर्वतके बहुत समझाने-बुझानेपर पतिके शाप-दोषकी बात सुनकर सुकुमारीका मन स्वस्थ हुआ। तत्पश्चात् पर्वतमुनि स्वर्गमें लौट गये और नारदजी सुकुमारीके घर आये ॥ ४३ १/२ ॥

वासुदेव उवाच

प्रत्यक्षकर्ता सर्वस्य नारदो भगवानृषिः ।
एष वक्ष्यति ते पृष्टो यथावृत्तं नरोत्तम ॥ ४४ ॥
**श्रीकृष्ण कहते हैं—**नरश्रेष्ठ! भगवान् नारद ऋषि इन सब घटनाओंके प्रत्यक्षदर्शी हैं। तुम्हारे पूछनेपर ये सारी बातें बता देंगे ॥ ४४ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि नारदपर्वतोपाख्याने त्रिंशोऽध्यायः ॥ ३० ॥
इस प्रकार महाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें नारद और पर्वतका उपाख्यानविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३० ॥

अध्याय (पृष्ठ 216)

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एकत्रिंशोऽध्यायः

सुवर्णष्ठीवीके जन्म, मृत्यु और पुनर्जीवनका वृत्तान्त

वैशम्पायन उवाच

ततो राजा पाण्डुसुतो नारदं प्रत्यभाषत ।
भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि सुवर्णष्ठीविसम्भवम् ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने नारदजीसे कहा—'भगवन्! मैं सुवर्णष्ठीवीके जन्मका वृत्तान्त सुनना चाहता हूँ' ॥ १ ॥

एवमुक्तस्तु स मुनिर्धर्मराजेन नारदः ।
आचचक्षे यथावृत्तं सुवर्णष्ठीविनं प्रति ॥ २ ॥
धर्मराजके ऐसा कहनेपर नारदमुनिने सुवर्णष्ठीवीके जन्मका यथावत् वृत्तान्त कहना आरम्भ किया ॥ २ ॥

नारद उवाच

एवमेतन्महाबाहो यथायं केशवोऽब्रवीत् ।
कार्यस्यास्य तु यच्छेषं तत् ते वक्ष्यामि पृच्छतः ॥ ३ ॥
**नारदजी बोले—**महाबाहो! भगवान् श्रीकृष्णने इस विषयमें जैसा कहा है, वह सब सत्य है। इस प्रसङ्गमें जो कुछ शेष है, वह तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैं बता रहा हूँ ॥ ३ ॥

अहं च पर्वतश्चैव स्वस्रीयो मे महामुनिः ।
वस्तुकामावभिगतौ सृञ्जयं जयतां वरम् ॥ ४ ॥
मैं और मेरे भानजे महामुनि पर्वत दोनों विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ राजा सृंजयके यहाँ निवास करनेके लिये गये ॥

तत्रावां पूजितौ तेन विधिदृष्टेन कर्मणा ।
सर्वकामैः सुविहितौ निवसावोऽस्य वेश्मनि ॥ ५ ॥
वहाँ राजाने हम दोनोंका शास्त्रीय विधिके अनुसार पूजन किया और हमारे लिये सभी मनोवाञ्छित वस्तुओंके प्राप्त होनेकी सुव्यवस्था कर दी। हम दोनों उनके महलमें रहने लगे ॥ ५ ॥

व्यतिक्रान्तासु वर्षासु समये गमनस्य च ।
पर्वतो मामुवाचेदं काले वचनमर्थवत् ॥ ६ ॥
जब वर्षाके चार महीने बीत गये और हमलोगोंके वहाँसे चलनेका समय आया, तब पर्वतने मुझसे समयोचित एवं सार्थक वचन कहा— ॥ ६ ॥

आवामस्य नरेन्द्रस्य गृहे परमपूजितौ ।

उषितौ समये ब्रह्मंस्तद् विचिन्तय साम्प्रतम् ॥ ७ ॥ 'मामा! हमलोग राजा सृंजयके घरमें बड़े आदर-सत्कारके साथ रहे हैं, अतः ब्रह्मन्! इस समय इनका कुछ उपकार करनेकी बात सोचिये' ॥ ७ ॥

ततोऽहमब्रुवं राजन् पर्वतं शुभदर्शनम् । सर्वमेतत् त्वयि विभो भागिनेयोपपद्यते ॥ ८ ॥ राजन्! तब मैंने शुभदर्शी पर्वत मुनिसे कहा—'भगिनीपुत्र! यह सब तुम्हें ही शोभा देता है ॥ ८ ॥

वरेण च्छन्द्यतां राजा लभतां यद् यदिच्छति । आवयोस्तपसा सिद्धिं प्राप्नोतु यदि मन्यसे ॥ ९ ॥ 'राजाको मनोवाञ्छित वर देकर संतुष्ट करो। वे जो-जो चाहते हैं, वह सब उन्हें मिले। तुम्हारी राय हो तो हम दोनोंकी तपस्यासे उनके मनोरथकी सिद्धि हो' ॥

तत आहूय राजानं संजयं जयतां वरम् । पर्वतोऽनुमतो वाक्यमुवाच कुरुपुङ्गव ॥ १० ॥ कुरुश्रेष्ठ! तब मेरी अनुमति ले पर्वतने विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ राजा सृंजयको बुलाकर कहा— ॥ १० ॥

प्रीतौ स्वो नृप सत्कारैर्भवदार्जवसम्भृतैः । आवाभ्यामभ्यनुज्ञातो वरं नृवर चिन्तय ॥ ११ ॥ 'नरेश्वर! हम दोनों तुम्हारे द्वारा सरलतापूर्वक किये गये सत्कारसे बहुत प्रसन्न हैं। हम तुम्हें आज्ञा देते हैं कि तुम इच्छानुसार कोई वर सोचकर माँग लो ॥ ११ ॥

देवानांमविहिंसायां न भवेन्मानुषक्षयम् । तद् गृहाण महाराज पूजार्हो नौ मतो भवान् ॥ १२ ॥ महाराज! कोई ऐसा वर माँग लो, जिससे न तो देवताओंकी हिंसा हो और न मनुष्योंका संहार ही हो सके। तुम हमारी दृष्टिमें आदरके योग्य हो' ॥ १२ ॥

संजय उवाच

प्रीतौ भवन्तौ यदि मे कृतमेतावता मम । एष एव परो लाभो निर्वृत्तौ मे महाफलः ॥ १३ ॥ **संजयने कहा—**ब्रह्मन्! यदि आप दोनों प्रसन्न हैं तो मैं इतनेसे ही कृतकृत्य हो गया। यही हमारे लिये महान् फलदायक परम लाभ सिद्ध हो गया ॥ १३ ॥

तमेवंवादिनं भूयः पर्वतः प्रत्यभाषत । वृणीष्व राजन् संकल्पं यत् ते हृदि चिरं स्थितम् ॥ १४ ॥ राजन्! ऐसी बात कहनेवाले राजा सृंजयसे पर्वतमुनिने फिर कहा—'राजन्! तुम्हारे हृदयमें जो चिरकालसे संकल्प हो, वही माँग लो' ॥ १४ ॥

संजय उवाच

अभीप्सामि सुतं वीरं वीरवन्तं दृढव्रतम् । आयुष्मन्तं महाभागं देवराजसमद्युतिम् ॥ १५ ॥ संजय बोले— भगवन्! मैं एक ऐसा पुत्र पाना चाहता हूँ, जो वीर, बलवान्, दृढ़तापूर्वक उत्तम व्रतका पालन करनेवाला, आयुष्मान्, परम सौभाग्यशाली और देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी हो ॥ १५ ॥

पर्वत उवाच

भविष्यत्येष ते कामो न त्वायुष्मान् भविष्यति । देवराजाभिभूत्यर्थं संकल्पो ह्येष ते हृदि ॥ १६ ॥ पर्वतने कहा— राजन्! तुम्हारा यह मनोरथ पूर्ण होगा, परंतु वह पुत्र दीर्घायु नहीं हो सकेगा; क्योंकि देवराज इन्द्रको पराजित करनेके लिये तुम्हारे हृदयमें यह संकल्प उठा है ॥ १६ ॥

ख्यातः सुवर्णष्ठीवीति पुत्रस्तव भविष्यति । रक्ष्यश्च देवराजात् स देवराजसमद्युतिः ॥ १७ ॥ तुम्हारा वह पुत्र सुवर्णष्ठीवीके नामसे विख्यात तथा देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी होगा। तुम्हें देवराजसे सदा उसकी रक्षा करनी चाहिये ॥ १७ ॥

तच्छ्रुत्वा संजयो वाक्यं पर्वतस्य महात्मनः । प्रसादयामास तदा नैतदेवं भवेदिति ॥ १८ ॥ आयुष्मान् मे भवेत् पुत्रो भवतस्तपसा मुने । न च तं पर्वतः किंचिदुवाचेन्द्रव्यपेक्षया ॥ १९ ॥ महात्मा पर्वतका यह वचन सुनकर संजयने उन्हें प्रसन्न करनेकी चेष्टा करते हुए कहा—‘ऐसा न हो। मुने! आपकी तपस्यासे मेरा पुत्र दीर्घजीवी होना चाहिये।’ परंतु इन्द्रका ख्याल करके पर्वत मुनि कुछ नहीं बोले ॥ १८-१९ ॥

तमहं नृपतिं दीनमब्रुवं पुनरेव च । स्मर्त्तव्योऽस्मि महाराज दर्शयिष्यामि ते सुतम् ॥ २० ॥ अहं ते दयितं पुत्रं प्रेतराजवशं गतम् । पुनर्दास्यामि तद्रूपं मा शुचः पृथिवीपते ॥ २१ ॥ तब मैंने दीन हुए उस नरेशसे कहा—‘महाराज! संकटके समय मुझे याद करना। मैं तुम्हारे पुत्रको तुमसे मिला दूँगा। पृथ्वीनाथ! चिन्ता न करो। यमराजके वशमें पड़े हुए तुम्हारे उस प्रिय पुत्रको मैं पुनः उस रूपमें लाकर तुम्हें दे दूँगा’ ॥ २०-२१ ॥

एवमुक्त्वा तु नृपतिं प्रयातौ स्वो यथेप्सितम् । संजयश्च यथाकामं प्रविवेश स्वमन्दिरम् ॥ २२ ॥

राजासे ऐसा कहकर हम दोनों अपने अभीष्ट स्थानको चल दिये और राजा सृंजयने अपने इच्छानुसार महलमें प्रवेश किया ॥ २२ ॥ संजयस्याथ राजर्षेः कस्मिंश्चित् कालपर्यये । जज्ञे पुत्रो महावीर्यस्तेजसा प्रज्वलन्निव ॥ २३ ॥ तदनन्तर किसी समय राजर्षि सृंजयके एक पुत्र हुआ, जो अपने तेजसे प्रज्वलित-सा हो रहा था। वह महान् बलशाली था ॥ २३ ॥ ववृधे स यथाकालं सरसीव महोत्पलम् । बभूव काञ्चनष्ठीवी यथार्थं नाम तस्य तत् ॥ २४ ॥ जैसे सरोवरमें कमल बढ़ता है, उसी प्रकार वह राजकुमार यथासमय बढ़ने लगा। वह मुखसे स्वर्ण उगलनेके कारण सुवर्णष्ठीवी नामसे प्रसिद्ध हुआ। उसका वह नाम सार्थक था ॥ २४ ॥ तदद्भुततमं लोके पप्रथे कुरुसत्तम । बुबुधे तच्च देवेन्द्रो वरदानं महर्षितः ॥ २५ ॥ कुरुश्रेष्ठ! उसका वह अत्यन्त अद्भुत वृत्तान्त सारे जगत्में फैल गया। देवराज इन्द्रको भी यह मालूम हो गया कि वह बालक महर्षि पर्वतके वरदानका फल है ॥ ततः स्वाभिभवाद् भीतो बृहस्पतिमते स्थितः । कुमारस्यान्तरप्रेक्षी बभूव बलवृत्रहा ॥ २६ ॥ तदनन्तर अपनी पराजयसे डरकर बृहस्पतिकी सम्मतिके अनुसार चलते हुए बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र उस राजकुमारके वधका अवसर देखने लगे ॥ २६ ॥ चोदयामास तद् वज्रं दिव्यास्त्रं मूर्तिमत् स्थितम् । व्याघ्रो भूत्वा जहीमं त्वं राजपुत्रमिति प्रभो ॥ २७ ॥ प्रवृद्धः किल वीर्येण मामेषोऽभिभविष्यति । संजयस्य सुतो वज्र यथैनं पर्वतोऽब्रवीत् ॥ २८ ॥ प्रभो! इन्द्रने मूर्तिमान् होकर सामने खड़े हुए अपने दिव्य अस्त्र वज्रसे कहा—'वज्र! तुम बाघ बनकर इस राजकुमारको मार डालो। जैसा कि इसके विषयमें पर्वतने बताया है, बड़ा होनेपर सृंजयका यह पुत्र अपने पराक्रमसे मुझे परास्त कर देगा' ॥ २७-२८ ॥ एवमुक्तस्तु शक्रेण वज्रः परपुरञ्जयः । कुमारमन्तरप्रेक्षी नित्यमेवान्वपद्यत ॥ २९ ॥ इन्द्रके ऐसा कहनेपर शत्रुओंकी नगरीपर विजय पानेवाला वज्र मौका देखता हुआ सदा उस राजकुमारके आस-पास ही रहने लगा ॥ २९ ॥ संजयोऽपि सुतं प्राप्य देवराजसमद्युतिम् । हृष्टः सान्तःपुरो राजा वननित्यो बभूव ह ॥ ३० ॥

सृंजय भी देवराजके समान पराक्रमी पुत्र पाकर रानी-सहित बड़े प्रसन्न हुए और निरन्तर वनमें ही रहने लगे।

ततो भागीरथीतीरे कदाचिन्निर्जने वने ।
धात्रीद्वितीयो बालः स क्रीडार्थं पर्यधावत ॥ ३१ ॥
तदनन्तर एक दिन निर्जन वनमें गङ्गाजीके तटपर वह बालक धायको साथ लेकर खेलनेके लिये गया और इधर-उधर दौड़ने लगा ॥ ३१ ॥

पञ्चवर्षकदेशीयो बालो नागेन्द्रविक्रमः ।
सहसोत्पतितं व्याघ्रमाससाद महाबलम् ॥ ३२ ॥
उस बालककी अवस्था अभी पाँच वर्षकी थी तो भी वह गजराजके समान पराक्रमी था। वह सहसा उछलकर आये हुए एक महाबली बाघके पास जा पहुँचा ॥ ३२ ॥

स बालस्तेन निष्पिष्टो वेपमानो नृपात्मजः ।
व्यसुः पपात मेदिन्यां ततो धात्री विचुक्रुशे ॥ ३३ ॥
उस बाघने वहाँ काँपते हुए राजकुमारको गिराकर पीस डाला। वह प्राणशून्य होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। यह देखकर धाय चिल्ला उठी ॥ ३३ ॥

हत्वा तु राजपुत्रं स तत्रैवान्तरधीयत ।
शार्दूलो देवराजस्य माययान्तर्हितस्तदा ॥ ३४ ॥
राजकुमारकी हत्या करके देवराज इन्द्रका भेजा हुआ वह वज्ररूपी बाघ मायासे वहीं अदृश्य हो गया ॥

धात्र्यास्तु निनदं श्रुत्वा रुदत्याः परमार्तवत् ।
अभ्यधावत तं देशं स्वयमेव महीपतिः ॥ ३५ ॥
रोती हुई धायका वह आर्तनाद सुनकर राजा सृंजय स्वयं ही उस स्थानपर दौड़े हुए आये ॥ ३५ ॥

स ददर्श शयानं तं गतासुं पीतशोणितम् ।
कुमारं विगतानन्दं निशाकरमिव च्युतम् ॥ ३६ ॥
उन्होंने देखा, राजकुमार प्राणशून्य होकर आकाशसे गिरे हुए चन्द्रमाकी भाँति पड़ा है। उसका सारा रक्त बाघके द्वारा पी लिया गया है और वह आनन्दहीन हो गया है ॥ ३६ ॥

स तमुत्सङ्गमारोप्य परिपीडितमानसः ।
पुत्रं रुधिरसंसिक्तं पर्यदेवयदातुरः ॥ ३७ ॥
खूनसे लथपथ हुए उस बालकको गोदमें लेकर व्यथितचित्त हुए राजा सृंजय व्याकुल होकर विलाप करने लगे ॥

ततस्ता मातरस्तस्य रुदत्यः शोककर्शिताः ।
अभ्यधावन्त तं देशं यत्र राजा स सृंजयः ॥ ३८ ॥

तदनन्तर शोकसे पड़ित हो उसकी माताएँ रोती हुई उस स्थानकी ओर दौड़ीं, जहाँ राजा सृंजय विलाप करते थे ।। ततः स राजा सस्मार मामेव गतमानसः । तदाहं चिन्तनं ज्ञात्वा गतवांस्तस्य दर्शनम् ।। ३९ ।। उस समय अचेत-से होकर राजाने मेरा ही स्मरण किया। तब मैंने उनका चिन्तन जानकर उन्हें दर्शन दिया ।।

मयैतानि च वाक्यानि श्रावितः शोकलालसः । यानि ते यदुवीरेण कथितानि महीपते ।। ४० ।। पृथ्वीनाथ! यदुवीर श्रीकृष्णने जो बातें तुम्हारे सामने कही हैं, उन्हींको मैंने उस शोकाकुल राजाको सुनाया ।। संजीवितश्चापि पुनर्वासवानुमते तदा । भवितव्यं तथा तच्च न तच्छक्यमतोऽन्यथा ।। ४१ ।।

फिर इन्द्रकी अनुमतिसे उस बालकको जीवित भी कर दिया। उसकी वैसी ही होनहार थी। उसे कोई पलट नहीं सकता था ॥ ४१ ॥ तत ऊर्ध्वं कुमारस्तु सुवर्णष्ठीवी महायशाः ।
चित्तं प्रसादयामास पितुर्मातुश्च वीर्यवान् ॥ ४२ ॥
तदनन्तर महायशस्वी और शक्तिशाली कुमार सुवर्णष्ठीवीने जीवित होकर पिता और माताके चित्तको प्रसन्न किया ॥ ४२ ॥
कारयामास राज्यं च पितरि स्वर्गते नृप ।
वर्षाणां शतमेकं च सहस्रं भीमविक्रमः ॥ ४३ ॥
नरेश्वर! उस भयानक पराक्रमी कुमारने पिताके स्वर्ग-वासी हो जानेपर ग्यारह सौ वर्षोंतक राज्य किया ॥ ४३ ॥
तत ईजे महायज्ञैर्बहुभिर्भूरिदक्षिणैः ।
तर्पयामास देवांश्च पितूंश्चैव महाद्युतिः ॥ ४४ ॥
तदनन्तर उस महातेजस्वी राजकुमारने बहुत-सी दक्षिणावाले अनेक महायज्ञोंका अनुष्ठान किया और उनके द्वारा देवताओं तथा पितरोंकी तृप्ति की ॥ ४४ ॥
उत्पाद्य च बहून् पुत्रान् कुलसंतानकारिणः ।
कालेन महता राजन् कालधर्ममुपेयिवान् ॥ ४५ ॥
राजन्! इसके बाद उसने बहुत-से वंशप्रवर्तक पुत्र उत्पन्न किये और दीर्घकालके पश्चात् वह काल-धर्मको प्राप्त हुआ ॥ ४५ ॥
स त्वं राजेन्द्र संजातं शोकमेनं निवर्तय ।
यथा त्वां केशवः प्राह व्यासश्च सुमहातपाः ॥ ४६ ॥
पितृपैतामहं राज्यमास्थाय धुरमुद्वह ।
इष्ट्वा पुण्यैर्महायज्ञैरिष्टं लोकमवाप्स्यसि ॥ ४७ ॥
राजेन्द्र! तुम भी अपने हृदयमें उत्पन्न हुए इस शोकको दूर करो तथा भगवान् श्रीकृष्ण और महातपस्वी व्यासजी जैसा कह रहे हैं, उसके अनुसार अपने बाप-दादोंके राज्यपर आरूढ़ हो इसका भार वहन करो; फिर पुण्यदायक महायज्ञोंका अनुष्ठान करके तुम अभीष्ट लोकमें चले जाओगे ॥ ४६-४७ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि सुवर्णष्ठीविसम्भवोपाख्याने एकत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सुवर्णष्ठीवीके जन्मका उपाख्यानविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३१ ॥