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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,450 पृष्ठ

‘उन्होंने उस यज्ञमें एक करोड़ सुवर्णमालाधारी गाय, बैल और उनके सहस्रों सेवक दक्षिणारूपमें दिये थे॥

अङ्गस्य यजमानस्य तदा विष्णुपदे गिरौ ॥ ३५ ॥
अमाद्यदिन्द्रः सोमेन दक्षिणाभिर्द्विजातयः ।
‘यजमान अंग जब विष्णुपद पर्वतपर यज्ञ कर रहे थे, उस समय इन्द्र वहाँ सोमरस पीकर मतवाले हो उठे थे और दक्षिणाओंसे ब्राह्मणोंपर भी आनन्दोन्माद छा गया था॥ ३५ ½॥

यस्य यज्ञेषु राजेन्द्र शतसंख्येषु वै पुरा ॥ ३६ ॥
देवान् मनुष्यान् गन्धर्वानत्यरिच्यन्त दक्षिणाः ।
‘राजेन्द्र! प्राचीन कालमें अंगराजने ऐसे-ऐसे सौ यज्ञ किये थे और उन सबमें जो दक्षिणाएँ दी गयी थीं, वे देवताओं, गन्धर्वों और मनुष्योंके यज्ञोंसे बढ़ गयी थीं॥

न जातो जनिता नान्यः पुमान् यः सम्प्रदास्यति ॥ ३७ ॥
यदङ्गः प्रददौ वित्तं सोमसंस्थासु सप्तसु ।
‘अंगराजने सातों सोम-संस्थाओंमें १ जो धन दिया था, उतना जो दे सके, ऐसा दूसरा न तो कोई मनुष्य पैदा हुआ है और न पैदा होगा॥ ३७ ½॥

स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ॥ ३८ ॥
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।
‘सृंजय! पूर्वोक्त चारों कल्याणकारी गुणोंमें वे बृहद्रथ तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये तो दूसरोंकी क्या बात है? अतः तुम अपने पुत्रके लिये संतप्त न होओ॥ ३८ ½॥

शिबिर्मौशीनरं चैव मृतं सृंजय शुश्रुम ॥ ३९ ॥
य इमां पृथिवीं सर्वां चर्मवत्समवेष्टयत् ।
‘सृंजय! जिन्होंने इस सम्पूर्ण पृथिवीको चमड़ेकी भाँति लपेट लिया था (सर्वथा अपने अधीन कर लिया था), वे उशीनरपुत्र राजा शिबि भी मरे थे, यह हमने सुना है॥ ३९ ½॥

महता रथघोषेण पृथिवीमनुनादयन् ॥ ४० ॥
एकच्छत्रां महीं चक्रे जैत्रेणैकरथेन यः ।
‘वे अपने रथकी गम्भीर ध्वनिसे पृथिवीको प्रतिध्वनित करते हुए एकमात्र विजयशील रथके द्वारा इस भूमण्डलका एकछत्र शासन करते थे॥ ४० ½॥

यावदद्य गवाश्वं स्यादारण्यैः पशुभिः सह ॥ ४१ ॥
तावतीः प्रददौ गाः स शिबिरौशीनरोऽध्वरे ।
‘आज संसारमें जंगली पशुओंसहित जितने गाय-बैल और घोड़े हैं, उतनी संख्यामें उशीनरपुत्र शिबिने अपने यज्ञमें केवल गौओंका दान किया॥ ४१ ½॥

न वोढारं धुरं तस्य कश्चिन्मेने प्रजापतिः ॥ ४२ ॥ न भूतं न भविष्यं च सर्वराजसु संजय । अन्यत्रौशीनराच्छैब्याद् राजर्षेरिन्द्रविक्रमात् ॥ ४३ ॥ ‘संजय! प्रजापति ब्रह्माने इन्द्रके तुल्य पराक्रमी उशीनरपुत्र राजा शिबिके सिवा सम्पूर्ण राजाओंमें भूत या भविष्यकालके दूसरे किसी राजाको ऐसा नहीं माना, जो शिबिका कार्यभार वहन कर सकता हो ॥ ४२-४३ ॥ अदक्षिणमयज्वानं मा पुत्रमनुतप्यथाः । स चेन्ममार संजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ४४ ॥ ‘संजय! राजा शिबि पूर्वोक्त चारों कल्याणकारी बातोंमें तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे। तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये तब दूसरेकी क्या बात है, अतः तुम अपने पुत्रके लिये शोक मत करो। उसने न तो कोई यज्ञ किया था, न दक्षिणा ही दी थी; अतः उस पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ४४ ॥ भरतं चैव दौष्यन्तिं मृतं संजय शुश्रुम । शाकुन्तलं महात्मानं भूरिद्रविणसंचयम् ॥ ४५ ॥ ‘संजय! दुष्यन्त और शकुन्तलाके पुत्र महाधनी महामनस्वी भरत भी मृत्युके अधीन हो गये, यह हमने सुना था ॥ ४५ ॥ यो बद्ध्वा त्रिशतं चाश्वान् देवेभ्यो यमुनामनु । सरस्वतीं विंशतिं च गङ्गामनु चतुर्दश ॥ ४६ ॥ अश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च । इष्टवान् स महातेजा दौष्यन्तिर्भरतः पुरा ॥ ४७ ॥ ‘उन महातेजस्वी दुष्यन्तकुमार भरतने पूर्वकालमें देवताओंकी प्रसन्नताके लिये यमुनाके तटपर तीन सौ, सरस्वतीके तटपर बीस और गंगाके तटपर चौदह घोड़े बाँधकर उतने-उतने अश्वमेध यज्ञ किये थे।३ उन्होंने अपने जीवनमें एक सहस्र अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञ सम्पन्न किये थे ॥ ४६-४७ ॥ भरतस्य महत् कर्म सर्वराजसु पार्थिवाः । खं मर्त्या इव बाहुभ्यां नानुगन्तुमशक्नुवन् ॥ ४८ ॥ ‘जैसे मनुष्य दोनों भुजाओंसे आकाशको तैर नहीं सकते, उसी प्रकार सम्पूर्ण राजाओंमें भरतका जो महान् कर्म है, उसका दूसरे राजा अनुकरण न कर सके ॥ ४८ ॥ परं सहस्राद् यो बद्ध्वान् हयान् वेदीर्वितत्य च । सहस्रं यत्र पद्मानां कण्व्याय भरतो ददौ ॥ ४९ ॥ ‘उन्होंने सहस्रसे भी अधिक घोड़े बाँधे और यज्ञ-वेदियोंका विस्तार करके अश्वमेध यज्ञ किये। उसमें भरतने आचार्य कण्वको एक हजार सुवर्णके बने हुए कमल भेंट

किये ।। ४९ ।। स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। ५० ।। ‘संजय! वे साम, दान, दण्ड और भेद—इन चार कल्याणमयी नीतियों अथवा धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य—इन चार मंगलकारी गुणोंमें तुमसे बहुत बढ़े हुए थे। तुम्हारे पुत्रकी अपेक्षा भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तब दूसरा कौन जीवित रह सकता है। अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ।। ५० ।।

रामं दाशरथिं चैव मृतं सृंजय शुश्रुम । योऽन्वकम्पत वै नित्यं प्रजाः पुत्रानिवौरसान् ।। ५१ ।। ‘संजय! सुननेमें आया है कि दशरथनन्दन भगवान् श्रीरामजी भी यहाँसे परम धामको चले गये थे, जो सदा अपनी प्रजापर वैसी ही कृपा रखते थे, जैसे-पिता अपने औरस पुत्रोंपर रखता है ।। ५१ ।।

विधवा यस्य विषये नानाथाः काश्चनाभवन् । सदैवासीत् पितृसमो रामो राज्यं यदन्वशात् ।। ५२ ।। ‘उनके राज्यमें कोई भी स्त्री अनाथ-विधवा नहीं हुई। श्रीरामचन्द्रजीने जबतक राज्यका शासन किया, तबतक वे अपनी प्रजाके लिये सदा ही पिताके समान कृपालु बने रहे ।। ५२ ।।

कालवर्षी च पर्जन्यः सस्यानि समपादयत् । नित्यं सुभिक्षमेवासीद् रामे राज्यं प्रशासति ।। ५३ ।। ‘मेघ समयपर वर्षा करके खेतीको अच्छे ढंगसे सम्पन्न करता था—उसे बढ़ने और फूलने-फलनेका अवसर देता था। रामके राज्य-शासनकालमें सदा सुकाल ही रहता था (कभी अकाल नहीं पड़ता था) ।।

प्राणिनो नाप्सु मज्जन्ति नान्यथा पावकोऽदहत् । रुजाभयं न तत्रासीद् रामे राज्यं प्रशासति ।। ५४ ।। ‘रामके राज्यका शासन करते समय कभी कोई प्राणी जलमें नहीं डूबते थे, आग अनुचितरूपसे कभी किसीको नहीं जलाती थी तथा किसीको रोगका भय नहीं होता था ।। ५४ ।।

आसन् वर्षसहस्रिण्यस्तथा वर्षसहस्रकाः । अरोगाः सर्वसिद्धार्था रामे राज्यं प्रशासति ।। ५५ ।। ‘श्रीरामचन्द्रजी जब राज्यका शासन करते थे, उन दिनों हजार वर्षतक जीनेवाली स्त्रियाँ और सहस्रों वर्षतक जीवित रहनेवाले पुरुष थे। किसीको कोई रोग नहीं सताता था, सभीके सारे मनोरथ सिद्ध होते थे ।।

नान्योऽन्येन विवादोऽभूत् स्त्रीणामपि कुतो नृणाम् ।

धर्मनित्याः प्रजाश्चासन् रामे राज्यं प्रशासति ॥ ५६ ॥
‘स्त्रियोंमें भी परस्पर विवाद नहीं होता था; फिर पुरुषोंकी तो बात ही क्या? श्रीरामके राज्य-शासनकालमें समस्त प्रजा सदा धर्ममें तत्पर रहती थी ॥

संतुष्टाः सर्वसिद्धार्था निर्भयाः स्वैरचारिणः ।
नराः सत्यव्रताश्चासन् रामे राज्यं प्रशासति ॥ ५७ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी जब राज्य करते थे, उस समय सभी मनुष्य संतुष्ट, पूर्णकाम, निर्भय, स्वाधीन और सत्यव्रती थे ॥ ५७ ॥

नित्यपुष्पफलाश्चैव पादपा निरुपद्रवाः ।
सर्वा द्रोणदुघा गावो रामे राज्यं प्रशासति ॥ ५८ ॥

‘श्रीरामके राज्यशासनकालमें सभी वृक्ष बिना किसी विघ्न-बाधाके सदा फले-फूले रहते थे और समस्त गौएँ एक-एक दोन दूध देती थीं ॥ ५८ ॥

स चतुर्दशवर्षाणि वने प्रोष्य महातपाः ।
दशाश्वमेधान् जारूथ्यानाजहार निरर्गलान् ॥ ५९ ॥

‘महातपस्वी श्रीरामने चौदह वर्षोंतक वनमें निवास करके राज्य पानेके अनन्तर दस ऐसे अश्वमेध यज्ञ किये, जो सर्वथा स्तुतिके योग्य थे तथा जहाँ किसी भी याचकके लिये दरवाजा बंद नहीं होता था ॥ ५९ ॥

युवा श्यामो लोहिताक्षो मातङ्ग इव यूथपः ।
आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः ॥ ६० ॥

‘श्रीरामचन्द्रजी नवयुवक और श्याम वर्णवाले थे। उनकी आँखोंमें कुछ-कुछ लालिमा शोभा देती थी। वे यूथपति गजराजके समान शक्तिशाली थे। उनकी बड़ी-बड़ी भुजाएँ घुटनोंतक लंबी थीं। उनका मुख सुन्दर और कंधे सिंहके समान थे ॥ ६० ॥

दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।
अयोध्याधिपतिर्भूत्वा रामो राज्यमकारयत् ॥ ६१ ॥

‘श्रीरामने अयोध्याके अधिपति होकर ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया था ॥ ६१ ॥

स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ६२ ॥

‘संजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी यहाँ रह न सके, तब दूसरोंकी क्या बात है? अतः तुम्हें अपने पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ६२ ॥

भगीरथं च राजानं मृतं सृंजय शुश्रुम ।
यस्येन्द्रो वितते यज्ञे सोमं पीत्वा मदोत्कटः ॥ ६३ ॥

असुराणां सहस्राणि बहूनि सुरसत्तमः ।
अजयद् बाहुवीर्येण भगवान् पाकशासनः ॥ ६४ ॥

‘संजय! राजा भगीरथ भी कालके गालमें चले गये, ऐसा हमने सुना है। जिनके विस्तृत यज्ञमें सोम पीकर मदोन्मत्त हुए सुरश्रेष्ठ भगवान् पाकशासन इन्द्रने अपने बाहुबलसे कई सहस्र असुरोंको पराजित किया ।। यः सहस्रं सहस्राणां कन्या हेमविभूषिताः । ईजानो वितते यज्ञे दक्षिणामत्यकालयत् ।। ६५ ।। ‘जिन्होंने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञमें सोनेके आभूषणोंसे विभूषित दस लाख कन्याओंका दक्षिणारूपमें दान किया था ।। ६५ ।। सर्वा रथगताः कन्या रथाः सर्वे चतुर्युजः । शतं शतं रथे नागाः पद्मिनो हेममालिनः ।। ६६ ।। ‘वे सभी कन्याएँ अलग-अलग रथमें बैठी हुई थीं। प्रत्येक रथमें चार-चार घोड़े जुते हुए थे। हर एक रथके पीछे सोनेकी मालाओंसे विभूषित तथा मस्तकपर कमलके चिह्नोंसे अलंकृत सौ-सौ हाथी थे ।। ६६ ।। सहस्रमश्वा एकैकं हस्तिनं पृष्ठतोऽन्वयुः । गवां सहस्रमश्वेऽश्वे सहस्रं गव्यजाविकम् ।। ६७ ।। ‘प्रत्येक हाथीके पीछे एक-एक हजार घोड़े, हर एक घोड़ेके पीछे हजार-हजार गायें और एक-एक गायके साथ हजार-हजार भेड़-बकरियाँ चल रही थीं ।। ६७ ।। उपह्वरे निवसतो यस्याङ्के निषसाद ह । गङ्गा भागीरथी तस्मादुर्वशी चाभवत् पुरा ।। ६८ ।। ‘तटके निकट निवास करते समय गंगाजी राजा भगीरथकी गोदमें आ बैठी थीं। इसलिये वे पूर्वकालमें भागीरथी और उर्वशी नामसे प्रसिद्ध हुईं ।। ६८ ।। भूरिदक्षिणमिक्ष्वाकुं यजमानं भगीरथम् । त्रिलोकपथगा गङ्गा दुहितृत्वमुपेयुषी ।। ६९ ।। ‘त्रिपथगामिनी गंगाने पुत्रीभावको प्राप्त होकर पर्याप्त दक्षिणा देनेवाले इक्ष्वाकुवंशी यजमान भगीरथको अपना पिता माना ।। ६९ ।। स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। ७० ।। संजय! वे पूर्वोक्त चारों बातोंमें तुमसे बहुत बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे अधिक पुण्यात्मा थे, जब वे भी कालसे न बच सके तो दूसरोंके लिये क्या कहा जा सकता है? अतः तुम अपने पुत्रके लिये शोक न करो ।। दिलीपं च महात्मानं मृतं सृंजय शुश्रुम । यस्य कर्माणि भूरीणि कथयन्ति द्विजातयः ।। ७१ ।। ‘संजय! महामना राजा दिलीप भी मरे थे, यह सुननेमें आया है। उनके महान् कर्मोंका आज भी ब्राह्मणलोग वर्णन करते हैं ।। ७१ ।।

य इमां वसुसम्पूर्णां वसुधां वसुधाधिपः । ददौ तस्मिन् महायज्ञे ब्राह्मणेभ्यः समाहितः ॥ ७२ ॥ 'एकाग्रचित्त हुए उन नरेशने अपने उस महायज्ञमें रत्न और धनसे परिपूर्ण इस सारी पृथ्वीका ब्राह्मणोंके लिये दान कर दिया था ॥ ७२ ॥ यस्येह यजमानस्य यज्ञे यज्ञे पुरोहितः । सहस्रं वारणान् हैमान् दक्षिणामत्यकालयत् ॥ ७३ ॥ 'यजमान दिलीपके प्रत्येक यज्ञमें पुरोहितजी सोनेके बने हुए एक हजार हाथी दक्षिणारूपमें पाकर उन्हें अपने घर ले जाते थे ॥ ७३ ॥ यस्य यज्ञे महानासीद् यूपः श्रीमान् हिरण्मयः । तं देवाः कर्म कुर्वाणाः शक्रज्येष्ठा उपाश्रयन् ॥ ७४ ॥ 'उनके यज्ञमें सोनेका बना हुआ कालियुक्त बहुत बड़ा यूप शोभा पाता था। यज्ञकर्म करते हुए इन्द्र आदि देवता सदा उसी यूपका आश्रय लेकर रहते थे ॥ ७४ ॥ चषाले यस्य सौवर्णे तस्मिन् यूपे हिरण्मये । ननृतुर्देवगन्धर्वाः षट् सहस्राणि सप्तधा ॥ ७५ ॥ अवादयत् तत्र वीणां मध्ये विश्वावसुः स्वयम् । सर्वभूतान्यमन्यन्त मम वादयतीत्ययम् ॥ ७६ ॥ 'उनके उस सुवर्णमय यूपमें जो सोनेका चषाल (घेरा) बना था, उसके ऊपर छः हजार देवगन्धर्व नृत्य किया करते थे। वहाँ साक्षात् विश्वावसु बीचमें बैठकर सात स्वरोंके अनुसार वीणा बजाया करते थे। उस समय सब प्राणी यही समझते थे कि ये मेरे ही आगे बाजा बजा रहे हैं ॥ ७५-७६ ॥ एतद् राज्ञो दिलीपस्य राजानो नानुचक्रिरे । यस्येभा हेमसंछन्नाः पथि मत्ताः स्म शेरते ॥ ७७ ॥ राजानं शतधन्वानं दिलीपं सत्यवादिनम् । येऽपश्यन् सुमहात्मानं तेऽपि स्वर्गजितो नराः ॥ ७८ ॥ 'राजा दिलीपके इस महान् कर्मका अनुसरण दूसरे राजा नहीं कर सके। उनके सुनहरे साज-बाज और सोनेके आभूषणोंसे सजे हुए मतवाले हाथी रास्तेपर सोये रहते थे। सत्यवादी शतधन्वा महामनस्वी राजा दिलीपका जिन लोगोंने दर्शन किया था, उन्होंने भी स्वर्गलोकको जीत लिया ॥ ७७-७८ ॥ त्रयः शब्दा न जीर्यन्ते दिलीपस्य निवेशने । स्वाध्यायघोषो ज्याघोषो दीयतामिति वै त्रयः ॥ ७९ ॥ 'महाराज दिलीपके भवनमें वेदोंके स्वाध्यायका गम्भीर घोष, शूरवीरोंके धनुषकी टंकार तथा 'दान दो' की पुकार—ये तीन प्रकारके शब्द कभी बंद नहीं होते थे ॥ ७९ ॥ स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।

पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ ८० ॥ ‘संजय! वे राजा दिलीप चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़कर थे। तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये तो दूसरोंकी क्या बात है? अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ८० ॥

मान्धातारं यौवनाश्वं मृतं संजय शुश्रुम ।
यं देवा मरुतो गर्भं पितुः पार्श्वदपाहरन् ॥ ८१ ॥
‘संजय! जिन्हें मरुत् नामक देवताओंने गर्भावस्थामें पिताके पार्श्वभागको फाड़कर निकाला था, वे युवनाश्वके पुत्र मान्धाता भी मृत्युके अधीन हो गये, यह हमारे सुननेमें आया है ॥ ८१ ॥

समृद्धो युवनाश्वस्य जठरे यो महात्मनः ।
पृषदाज्योद्भवः श्रीमांस्त्रिलोकविजयी नृपः ॥ ८२ ॥
‘त्रिलोकविजयी श्रीमान् राजा मान्धाता पृषदाज्य (दधिमिश्रित घी जो पुत्रोत्पत्तिके लिये तैयार करके रखा गया था) से उत्पन्न हुए थे। वे अपने पिता महामना युवनाश्वके पेटमें ही पले थे ॥ ८२ ॥

यं दृष्ट्वा पितुरुत्सङ्गे शयानं देवरूपिणम् ।
अन्योन्यमब्रुवन् देवाः कमयं धास्यतीति वै ॥ ८३ ॥
‘जब वे शिशु-अवस्थामें पिताके पेटसे पैदा हो उनकी गोदमें सो रहे थे, उस समय उनका रूप देवताओंके बालकोंके समान दिखायी देता था। उस अवस्थामें उन्हें देखकर देवता आपसमें बात करने लगे ‘यह मातृहीन बालक किसका दूध पीयेगा’ ॥ ८३ ॥

मामेव धास्यतीत्येवमिन्द्रोऽथाभ्युपपद्यत ।
मान्धातेति ततस्तस्य नाम चक्रे शतक्रतुः ॥ ८४ ॥
‘यह सुनकर इन्द्र बोल उठे ‘मां धाता—मेरा दूध पीयेगा।’ जब इन्द्रने इस प्रकार उसे पिलाना स्वीकार कर लिया, तबसे उन्होंने ही उस बालकका नाम ‘मान्धाता’ रख दिया ॥ ८४ ॥

ततस्तु पयसो धारां पुष्टिहेतोर्महात्मनः ।
तस्यास्ये यौवनाश्वस्य पाणिरिन्द्रस्य चास्रवत् ॥ ८५ ॥
‘तदनन्तर उस महामनस्वी बालक युवनाश्वकुमारकी पुष्टिके लिये उसके मुखमें इन्द्रके हाथसे दूधकी धारा झरने लगी ॥ ८५ ॥

तं पिबन् पाणिमिन्द्रस्य शतमह्ना व्यवर्धत ।
स आसीद् द्वादशसमो द्वादशाहेन पार्थिवः ॥ ८६ ॥
‘इन्द्रके उस हाथको पीता हुआ वह बालक एक ही दिनमें सौ दिनके बराबर बढ़ गया। बारह दिनोंमें राजकुमार मान्धाता बारह वर्षकी अवस्थावाले बालकके समान हो गये ॥ ८६ ॥

तमिमं पृथिवी सर्वा एकाह्ना समपद्यत । धर्मात्मानं महात्मानं शूरमिन्द्रसमं युधि ॥ ८७ ॥ 'राजा मान्धाता बड़े धर्मात्मा और महामनस्वी थे। युद्धमें इन्द्रके समान शौर्य प्रकट करते थे। यह सारी पृथ्‍वी एक ही दिनमें उनके अधिकारमें आ गयी थी।।

यश्चाङ्गारं तु नृपतिं मरुत्तमसितं गयम् । अङ्गं बृहद्रथं चैव मान्धाता समरेऽजयत् ॥ ८८ ॥ 'मान्धाताने समरांगणमें राजा अंगार, मरुत्त, असित, गय तथा अंगराज बृहद्रथको भी पराजित कर दिया था ।।

यौवनाश्वो यदाङ्गारं समरे प्रत्ययुध्यत । विस्फारैर्धनुषो देवा द्यौरभेदीति मेनिरे ॥ ८९ ॥ 'जिस समय युवनाश्वपुत्र मान्धाताने रणभूमिमें राजा अङ्गारके साथ युद्ध किया था, उस समय देवताओंने ऐसा समझा कि 'उनके धनुषकी टंकारसे सारा आकाश ही फट पड़ा है' ।। ८९ ।।

यत्र सूर्य उदेति स्म यत्र च प्रतितिष्ठति । सर्वं तद् यौवनाश्वस्य मान्धातुः क्षेत्रमुच्यते ॥ ९० ॥ 'जहाँ सूर्य उदय होते हैं वहाँसे लेकर जहाँ अस्त होते हैं वहाँतकका सारा देश युवनाश्वपुत्र मान्धाताका ही राज्य कहलाता था ।। ९० ।।

अश्वमेधशतेनेष्ट्वा राजसूयशतेन च । अददाद् रोहितान् मत्स्यान् ब्राह्मणेभ्यो विशाम्पते ॥ ९१ ॥ हैरण्यान् योजनोत्सेधानायतान् दशयोजनम् । अतिरिक्तान् द्विजातिभ्यो व्यभजंस्त्वितरे जनाः ॥ ९२ ॥ 'प्रजानाथ! उन्होंने सौ अश्वमेध तथा सौ राजसूय यज्ञ करके दस योजन लंबे तथा एक योजन ऊँचे बहुत-से सोनेके रोहित नामक मत्स्य बनवाकर ब्राह्मणोंको दान किये थे। ब्राह्मणोंके ले जानेसे जो बच गये, उन्हें दूसरे लोगोंने बाँट लिया ।। ९१-९२ ।।

स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रनुतप्यथाः ॥ ९३ ॥ 'सृंजय! राजा मान्धाता चारों कल्याणमय गुणोंमें तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मारे गये, तब तुम्हारे पुत्रकी क्या बिसात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ।।

ययातिं नाहुषं चैव मृतं सृंजय शुश्रुम । य इमां पृथिवीं कृत्स्नां विजित्य सहसागराम् ॥ ९४ ॥ शम्यापातेनाभ्यतीयाद् वेदीभिश्चित्रयन् महीम् । ईजानः क्रतुभिर्मुख्यैः पर्यगच्छद् वसुन्धराम् ॥ ९५ ॥

‘संजय! नहुषपुत्र राजा ययाति भी जीवित न रह सके—यह हमने सुना है। उन्होंने समुद्रोंसहित इस सारी पृथ्वीको जीतकर शम्यापातके* द्वारा पृथ्वीको नाप-नापकर यज्ञकी वेदियाँ बनायीं, जिनसे भूतलकी विचित्र शोभा होने लगी। उन्हीं वेदियोंपर मुख्य-मुख्य यज्ञोंका अनुष्ठान करते हुए उन्होंने सारी भारतभूमिकी परिक्रमा कर डाली ।। ९४-९५ ।।

इष्ट्वा क्रतुसहस्रेण वाजपेयशतेन च । तर्पयामास विप्रेन्द्रांस्त्रिभिः काञ्चनपर्वतैः ।। ९६ ।।

‘उन्होंने एक हजार श्रौतयज्ञों और सौ वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान किया तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको सोनेके तीन पर्वत दान करके पूर्णतः संतुष्ट किया ।। ९६ ।।

व्यूढेनासुरयुद्धेन हत्वा दैतेयदानवान् । व्यभजत् पृथिवीं कृत्स्नां ययातिर्नहुषात्मजः ।। ९७ ।।

‘नहुषपुत्र ययातिने व्यूह-रचनायुक्त आसुर युद्धके द्वारा दैत्यों और दानवोंका संहार करके यह सारी पृथ्वी अपने पुत्रोंको बाँट दी थी ।। ९७ ।।

अन्त्येषु पुत्रान् निक्षिप्य यदुद्रुह्युपुरोगमान् । पुरुं राज्येऽभिषिच्याथ सदारः प्राविशद् वनम् ।। ९८ ।।

‘उन्होंने किनारेके प्रदेशोंपर अपने तीन पुत्र यदु, द्रुह्यु तथा अनुको स्थापित करके मध्य भारतके राज्यपर पूरुको अभिषिक्त किया; फिर अपनी स्त्रियोंके साथ वे वनमें चले गये ।। ९८ ।।

स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। ९९ ।।

‘संजय! वे तुम्हारी अपेक्षा चारों कल्याणमय गुणोंमें बढ़े हुए थे और तुम्हारे पुत्रसे भी अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये तो तुम्हारा पुत्र किस गिनतीमें है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ।। ९९ ।।

अम्बरीषं च नाभागं मृतं संजय शुश्रुम । यं प्रजा वव्रिरे पुण्यं गोप्तारं नृपसत्तमम् ।। १०० ।।

‘संजय! हमने सुना है कि नाभागके पुत्र अम्बरीष भी मृत्युके अधीन हो गये थे। उन नृपश्रेष्ठ अम्बरीषको सारी प्रजाने अपना पुण्यमय रक्षक माना था ।। १०० ।।

यः सहस्रं सहस्राणां राज्ञामयुतयाजिनाम् । ईजानो वितते यज्ञे ब्राह्मणेभ्यः सुसंहितः ।। १०१ ।।

‘ब्राह्मणोंके प्रति अनुराग रखनेवाले राजा अम्बरीषने यज्ञ करते समय अपने विशाल यज्ञमण्डपमें दस लाख ऐसे राजाओंको उन ब्राह्मणोंकी सेवामें नियुक्त किया था, जो स्वयं भी दस-दस हजार यज्ञ कर चुके थे ।। १०१ ।।

नैतत् पूर्वे जनाश्चक्रुर्न करिष्यन्ति चापरे । इत्यम्बरीषं नाभागिमन्वमोदन्त दक्षिणाः ।। १०२ ।।

‘उन यज्ञकुशल ब्राह्मणोंने नाभागपुत्र अम्बरीषकी सराहना करते हुए कहा था कि ‘ऐसा यज्ञ न तो पहलेके राजाओंने किया है और न भविष्यमें होनेवाले ही करेंगे’ ।। शतं राजसहस्राणि शतं राजशतानि च । सर्वेऽश्वमेधैरीजानास्तेऽन्वयुर्दक्षिणायनम् ।। १०३ ।। ‘उनके यज्ञमें एक लाख दस हजार राजा सेवाकार्य करते थे। वे सभी अश्वमेधयज्ञका फल पाकर दक्षिणायनके पश्चात् आनेवाले उत्तरायणमार्गसे ब्रह्मलोकमें चले गये थे ।। स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। १०४ ।। ‘सृंजय! राजा अम्बरीष चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़कर थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे। जब वे भी जीवित न रह सके तो दूसरेके लिये क्या कहा जा सकता है? अतः तुम अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक न करो ।। १०४ ।। शशबिन्दुं चैत्ररथं मृतं शुश्रुम सृंजय । यस्य भार्यासहस्राणां शतमासीन्महात्मनः ।। १०५ ।। सहस्रं तु सहस्राणां यस्यासन् शाशबिन्दवाः । ‘सृंजय! हम सुनते हैं कि चित्ररथके पुत्र शशबिन्दु भी मृत्युसे अपनी रक्षा न कर सके। उन महामना नरेशके एक लाख रानियाँ थीं और उनके गर्भसे राजाके दस लाख पुत्र उत्पन्न हुए थे ।। १०५ १/२ ।। हिरण्यकवचाः सर्वे सर्वे चोत्तमधन्विनः ।। १०६ ।। शतं कन्या राजपुत्रमेकैकं पृथगन्वयुः । कन्यां कन्यां शतं नागा नागं नागं शतं रथाः ।। १०७ ।। ‘वे सभी राजकुमार सुवर्णमय कवच धारण करनेवाले और उत्तम धनुर्धर थे। एक-एक राजकुमारको अलग-अलग सौ-सौ कन्याएँ ब्याही गयी थीं। प्रत्येक कन्याके साथ सौ-सौ हाथी प्राप्त हुए थे। हर एक हाथीके पीछे सौ-सौ रथ मिले थे ।। १०६-१०७ ।। रथे रथे शतं चाश्वा देशजा हेममालिनः । अश्वे अश्वे शतं गावो गवां तद्वदजाविकम् ।। १०८ ।। ‘प्रत्येक रथके साथ सुवर्णमालाधारी सौ-सौ देशीय घोड़े थे। हर एक अश्वके साथ सौ गायें और एक-एक गायके साथ सौ-सौ भेड़-बकरियाँ प्राप्त हुई थीं ।। १०८ ।। एतद् धनमपर्यन्तमश्वमेधे महामखे । शशबिन्दुर्महाराज ब्राह्मणेभ्यः समर्पयत् ।। १०९ ।। ‘महाराज! राजा शशबिन्दुने यह अनन्त धनराशि अश्वमेध नामक महायज्ञमें ब्राह्मणोंको दान कर दी थी ।। स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। ११० ।।

‘संजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे। जब वे भी मृत्युसे बच न सके, तब तुम्हारे पुत्रके लिये क्या कहा जाय? अतः तुम्हें अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक नहीं करना चाहिये ॥ ११० ॥
गयं चामूर्तरयसं मृतं शुश्रुम संजय ।
यः स वर्षशतं राजा हुतशिष्टाशनोऽभवत् ॥ १११ ॥
‘संजय! सुननेमें आया है कि अमूर्तरयाके पुत्र राजा गयकी भी मृत्यु हुई थी। उन्होंने सौ वर्षोंतक होमसे अवशिष्ट अन्नका ही भोजन किया ॥ १११ ॥
यस्मै वह्निर्वरं प्रादात् ततो वव्रे वरान् गयः ।
ददतो योऽक्षयं वित्तं धर्मे श्रद्धा च वर्धताम् ॥ ११२ ॥
मनो मे रमतां सत्ये त्वत्प्रसादाद् हुताशन ।
‘एक समय अग्निदेवने उन्हें वर माँगनेके लिये कहा, तब राजा गयने ये वर माँगे, ‘अग्निदेव! आपकी कृपासे दान करते हुए मेरे पास अक्षय धनका भंडार भरा रहे। धर्ममें मेरी श्रद्धा बढ़ती रहे और मेरा मन सदा सत्यमें ही अनुरक्त रहे’ ॥ ११२½ ॥
लेभे च कामांस्तान् सर्वान् पावकादिति नः श्रुतम् ॥ ११३ ॥
दर्शैश्च पूर्णमासैश्च चातुर्मास्यैः पुनः पुनः ।
अयजद्धयमेधेन सहस्रं परिवत्सरान् ॥ ११४ ॥
‘सुना है कि उन्हें अग्निदेवसे वे सभी मनोवाञ्छित फल प्राप्त हो गये थे। उन्होंने एक हजार वर्षोंतक बारंबार दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य तथा अश्वमेध यज्ञोंका अनुष्ठान किया था ॥ ११३-११४ ॥
शतं गवां सहस्राणि शतमश्वतराणि च ।
उत्थायोत्थाय वै प्रादात् सहस्रं परिवत्सरान् ॥ ११५ ॥
‘वे हजार वर्षोंतक प्रतिदिन सबेरे उठ-उठकर एक-एक लाख गौओं और सौ-सौ खच्चरोंका दान करते थे ॥ ११५ ॥
तर्पयामास सोमेन देवान् वित्तैर्द्विजानपि ।
पितॄन् स्वधाभिः कामैश्च स्त्रियः स पुरुषर्षभ ॥ ११६ ॥
‘पुरुषप्रवर! इन्होंने सोमरसके द्वारा देवताओंको, धनके द्वारा ब्राह्मणोंको, श्राद्धकर्मसे पितरोंको और कामभोगद्वारा स्त्रियोंको तृप्त किया था ॥ ११६ ॥
सौवर्णीं पृथिवीं कृत्वा दशव्यामां द्विरायताम् ।
दक्षिणामददद् राजा वाजिमेधे महाक्रतौ ॥ ११७ ॥
‘राजा गयने महायज्ञ अश्वमेधमें दस व्याम (पचास हाथ) चौड़ी और इससे दूनी लंबी सोनेकी पृथिवी बनवाकर दक्षिणारूपसे दान की थी ॥ ११७ ॥
यावत्यः सिकता राजन् गङ्गायां पुरुषर्षभ ।
तावतीरेव गाः प्रादादामूर्तरयसो गयः ॥ ११८ ॥

'पुरुषप्रवर नरेश! गंगाजीमें जितने बालूके कण हैं, अमूर्तरयाके पुत्र गयने उतनी ही गौओंका दान किया था।। स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया । पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ।। ११९ ।। 'संजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे। जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ।। ११९ ।। रन्तिदेवं च सांकृत्यं मृतं संजय शुश्रुम । सम्यगाराध्य यः शक्राद् वरं लेभे महातपाः ।। १२० ।। अन्नं च नो बहु भवेदतिथींश्च लभेमहि । श्रद्धा च नो मा व्यगमन्मा च याचिष्म कंचन ।। १२१ ।। 'संजय! संकृतिके पुत्र राज रन्तिदेव भी कालके गालमें चले गये, यह हमारे सुननेमें आया है। उन महातपस्वी नरेशने इन्द्रकी अच्छी तरह आराधना करके उनसे यह वर माँगा कि 'हमारे पास अन्न बहुत हो, हम सदा अतिथियोंकी सेवाका अवसर प्राप्त करें, हमारी श्रद्धा दूर न हो और हम किसीसे कुछ भी न माँगें' ।। उपातिष्ठन्त पशवः स्वयं तं संशितव्रतम् । ग्राम्यारण्या महात्मानं रन्तिदेवं यशस्विनम् ।। १२२ ।। 'कठोर व्रतका पालन करनेवाले, यशस्वी महात्मा राजा रन्तिदेवके पास गाँवों और जंगलोंके पशु अपने-आप यज्ञके लिये उपस्थित हो जाते थे ।। १२२ ।। महानदी चर्मराशेरुत्क्लेदात् ससृजे यतः । ततश्चर्मण्वतीत्येवं विख्याता सा महानदी ।। १२३ ।। 'वहाँ भीगी चर्मराशिसे जो जल बहता था, उससे एक विशाल नदी प्रकट हो गयी, जो चर्मण्वती (चम्बल) के नामसे विख्यात हुई ।। १२३ ।। ब्राह्मणेभ्यो ददौ निष्कान् सदसि प्रतते नृपः । तुभ्यं निष्कं तुभ्यं निष्कमिति क्रोशन्ति वै द्विजाः ।। १२४ ।। सहस्रं तुभ्यमित्युक्त्वा ब्राह्मणान् सम्प्रपद्यते । 'राजा अपने विशाल यज्ञमें ब्राह्मणोंको सोनेके निष्क दिया करते थे। वहाँ द्विजलोग पुकार-पुकारकर कहते कि 'ब्राह्मणो! यह तुम्हारे लिये निष्क है, यह तुम्हारे लिये निष्क है' परंतु कोई लेनेवाला आगे नहीं बढ़ता था। फिर वे यह कहकर कि 'तुम्हारे लिये एक सहस्र निष्क है', लेनेवाले ब्राह्मणोंको उपलब्ध कर पाते थे ।। १२४ १/२ ।। अन्वाहार्योपकरणं द्रव्योपकरणं च यत् ।। १२५ ।। घटाः पात्र्यः कटाहानि स्थाल्यश्च पिठराणि च । नासीत् किंचिदसौवर्णं रन्तिदेवस्य धीमतः ।। १२६ ।।

'बुद्धिमान् राजा रन्तिदेवके उस यज्ञमें अन्वाहार्य अग्निमें आहुति देनेके लिये जो उपकरण थे तथा द्रव्य-संग्रहके लिये जो उपकरण—घड़े, पात्र, कड़ाहे, बटलोई और कठौते आदि सामान थे, उनमेंसे कोई भी ऐसा नहीं था, जो सोनेका बना हुआ न हो ॥ १२५-१२६ ॥
सांकृते रन्तिदेवस्य यां रात्रिमवसन् गृहे ।
आलभ्यन्त शतं गावः सहस्राणि च विंशतिः ॥ १२७ ॥
'संकृतिके पुत्र राजा रन्तिदेवके घरमें जिस रातको अतिथियोंका समुदाय निवास करता था, उस समय उन्हें बीस हजार एक सौ गौएँ छूकर दी जाती थीं ॥ १२७ ॥
तत्र स्म सूदाः क्रोशन्ति सुमृष्टमणिकुण्डलाः ।
सूपं भूयिष्ठमश्रीध्वं नाद्य भोज्यं यथा पुरा ॥ १२८ ॥
'वहाँ विशुद्ध मणिमय कुण्डल धारण किये रसोइये पुकार-पुकारकर कहते थे कि 'आपलोग खूब दाल-भात खाइये। आजका भोजन पहले जैसा नहीं है, अर्थात् पहलेकी अपेक्षा बहुत अच्छा है' ॥ १२८ ॥
स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ १२९ ॥
'सृंजय! रन्तिदेव तुमसे पूर्वोक्त चारों गुणोंमें बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो ॥ १२९ ॥
सगरं च महात्मानं मृतं शुश्रुम सृंजय ।
ऐक्ष्वाकं पुरुषव्याघ्रमतिमानुषविक्रमम् ॥ १३० ॥
'सृंजय! इक्ष्वाकुवंशी पुरुषसिंह महामना सगर भी मरे थे, ऐसा सुननेमें आया है। उनका पराक्रम अलौकिक था ॥
षष्टिः पुत्रसहस्राणि यं यान्तमनुजग्मिरे ।
नक्षत्रराजं वर्षान्ते व्यभ्रे ज्योतिर्गणा इव ॥ १३१ ॥
'जैसे वर्षाके अन्त (शरद्) में बादलोंसे रहित आकाशके भीतर तारे नक्षत्रराज चन्द्रमाका अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार राजा सगर जब युद्ध आदिके लिये कहीं यात्रा करते थे, तब उनके साठ हजार पुत्र उन नरेशके पीछे-पीछे चलते थे ॥ १३१ ॥
एकच्छत्रा मही यस्य प्रतापादभवत् पुरा ।
योऽश्वमेधसहस्रेण तर्पयामास देवताः ॥ १३२ ॥
'पूर्वकालमें राजाके प्रतापसे एकछत्र पृथ्वी उनके अधिकारमें आ गयी थी। उन्होंने एक सहस्र अश्वमेध यज्ञ करके देवताओंको तृप्त किया था ॥ १३२ ॥
यः प्रादात् कनकस्तम्भं प्रासादं सर्वकाञ्चनम् ।
पूर्णं पद्मदलाक्षीणां स्त्रीणां शयनसंकुलम् ॥ १३३ ॥

द्विजातिभ्योऽनुरूपेभ्यः कामांश्च विविधान् बहून्। यस्यादेशेन तद् वित्तं व्यभजन्त द्विजातयः॥ १३४ ॥ ‘राजाने सोनेके खंभोंसे युक्त पूर्णतः सोनेका बना हुआ महल, जो कमलके समान नेत्रोंवाली सुन्दरी स्त्रियोंकी शय्याओंसे सुशोभित था, तैयार कराकर योग्य ब्राह्मणोंको दान किया। साथ ही नाना प्रकारकी भोगसामग्रियाँ भी प्रचुरमात्रामें उन्हें दी थीं। उनके आदेशसे ब्राह्मणोंने उनका सारा धन आपसमें बाँट लिया था॥ १३३-१३४॥

खानयामास यः कोपात् पृथिवीं सागराङ्किताम्। यस्य नाम्ना समुद्रश्च सागरत्वमुपागतः॥ १३५ ॥ ‘एक समय क्रोधमें आकर उन्होंने समुद्रसे चिह्नित सारी पृथ्वी खुदवा डाली थी। उन्हींके नामपर समुद्रकी ‘सागर' संज्ञा हो गयी॥ १३५॥

स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया। पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः॥ १३६ ॥ ‘सृंजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े हुए थे। तुम्हारे पुत्रसे बहुत अधिक पुण्यात्मा थे। जब वे भी मर गये, तब तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम उसके लिये शोक न करो॥ १३६॥

राजानं च पृथुं वैन्यं मृतं शुश्रुम संजय। यमभ्यषिञ्चन् सम्भूय महारण्ये महर्षयः॥ १३७ ॥ ‘सृंजय! वेनके पुत्र महाराज पृथुको भी अपने शरीरका त्याग करना पड़ा था, ऐसा हमने सुना है। महर्षियोंने महान् वनमें एकत्र होकर उनका राज्याभिषेक किया था॥ १३७॥

प्रथयिष्यति वै लोकान् पृथुरित्येव शब्दितः। क्षताद् यो वै त्रायतीति स तस्मात् क्षत्रियः स्मृतः॥ १३८ ॥ ‘ऋषियोंने यह सोचकर कि सब लोकोंमें धर्मकी मर्यादा प्रथित (स्थापित) करेंगे, उनका नाम पृथु रखा था। वे क्षत अर्थात् दुःखसे सबका त्राण करते थे, इसलिये क्षत्रिय कहलाये॥ १३८॥

पृथुं वैन्यं प्रजा दृष्ट्वा रक्ताः स्मेति यदब्रुवन्। ततो राजेति नामास्य अनुरागादजायत॥ १३९ ॥ ‘वेननन्दन पृथुको देखकर समस्त प्रजाओंने एक साथ कहा कि 'हम इनमें अनुरक्त हैं' इस प्रकार प्रजाका रञ्जन करनेके कारण ही उनका नाम ‘राजा' हुआ॥ १३९॥

अकृष्टपच्या पृथिवी पुटके पुटके मधु। सर्वा द्रोणदुघा गावो वैन्यस्यासन् प्रशासतः॥ १४० ॥ ‘पृथुके शासनकालमें पृथिवी बिना जोते ही धान्य उत्पन्न करती थी, वृक्षोंके पुट-पुटमें मधु (रस) भरा था और सारी गौएँ एक-एक द्रोण दूध देती थीं॥ १४०॥

अरोगाः सर्वसिद्धार्था मनुष्या अकुतोभयाः ।
यथाभिकाममवसन् क्षेत्रेषु च गृहेषु च ॥ १४१ ॥
‘मनुष्य नीरोग थे। उनकी सारी कामनाएँ सर्वथा परिपूर्ण थीं और उन्हें कभी किसी चीजसे भय नहीं होता था। सब लोग इच्छानुसार घरों या खेतोंमें रह लेते थे ।।

आपस्तस्तम्भिरे चास्य समुद्रमभियास्यतः ।
सरितश्चानुदीर्यन्त ध्वजभङ्गश्च नाभवत् ॥ १४२ ॥
‘जब वे समुद्रकी ओर यात्रा करते, उस समय उसका जल स्थिर हो जाता था। नदियोंकी बाढ़ शान्त हो जाती थी। उनके रथकी ध्वजा कभी भग्न नहीं होती थी ।।

हैरण्यांस्त्रिनलोत्सेधान् पर्वतानेकविंशतिम् ।
ब्राह्मणेभ्यो ददौ राजा योऽश्वमेधे महामखे ॥ १४३ ॥
‘राजा पृथुने अश्वमेध नामक महायज्ञमें चार सौ हाथ ऊँचे इक्कीस सुवर्णमय पर्वत ब्राह्मणोंको दान किये थे ॥ १४३ ।।

स चेन्ममार सृंजय चतुर्भद्रतरस्त्वया ।
पुत्रात् पुण्यतरश्चैव मा पुत्रमनुतप्यथाः ॥ १४४ ॥
‘सृंजय! वे चारों कल्याणकारी गुणोंमें तुमसे बढ़े-चढ़े थे और तुम्हारे पुत्रकी अपेक्षा बहुत अधिक पुण्यात्मा भी थे। जब वे भी मर गये तो तुम्हारे पुत्रकी क्या बात है? अतः तुम अपने मरे हुए पुत्रके लिये शोक न करो ।। १४४ ।।

किं वा तूष्णीं ध्यायसे सृंजय त्वं
न मे राजन् वाचमिमां शृणोषि ।
न चेन्मोघं विप्रलप्तं ममेदं
पथ्यं मुमूर्षोरिव सुप्रयुक्तम् ॥ १४५ ॥
‘सृंजय! तुम चुपचाप क्या सोच रहे हो। राजन्! मेरी इस बातको क्यों नहीं सुनते हो? जैसे मरणासन्न पुरुषके ऊपर अच्छी तरह प्रयोगमें लायी हुई ओषधि व्यर्थ जाती है, उसी प्रकार मेरा यह सारा प्रवचन निष्फल तो नहीं हो गया?’ ।। १४५ ।।

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संजय उवाच

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शृणोमि ते नारद वाचमेनां
विचित्रार्थां स्रजमिव पुण्यगन्धाम् ।
राजर्षीणां पुण्यकृतां महात्मनां
कीर्त्या युक्तानां शोकनिर्णाशनार्थाम् ॥ १४६ ॥
संजयने कहा— नारद! पवित्र गन्धवाली मालाके समान विचित्र अर्थसे भरी हुई आपकी इस वाणीको मैं सुन रहा हूँ। पुण्यात्मा महामनस्वी और कीर्तिशाली राजर्षियोंके चरित्रसे युक्त आपका यह वचन सम्पूर्ण शोकोंका विनाश करनेवाला है ॥ १४६ ॥

न ते मोघं विप्रलप्तं महर्षे दृष्ट्वैवाहं नारद त्वां विशोकः । शुश्रूषे ते वचनं ब्रह्मवादिन् न ते तृप्याम्पमृतस्येव पानात् ॥ १४७ ॥ महर्षि नारद! आपने जो कुछ कहा है, आपका यह उपदेश व्यर्थ नहीं गया है। आपका दर्शन करके ही मैं शोकरहित हो गया हूँ। ब्रह्मवादी मुने! मैं आपका यह प्रवचन सुनना चाहता हूँ और अमृतपानके समान उससे तृप्त नहीं हो रहा हूँ ॥ १४७ ॥

अमोघदर्शिन् मम चेत् प्रसादं संतापदग्धस्य विभो प्रकुर्याः । सुतस्य सञ्जीवनमद्य मे स्यात् तव प्रसादात् सुतसङ्गमश्च ॥ १४८ ॥ प्रभो! आपका दर्शन अमोघ है। मैं पुत्रशोकके संतापसे दग्ध हो रहा हूँ। यदि आप मुझपर कृपा करें तो मेरा पुत्र फिर जीवित हो सकता है और आपके प्रसादसे मुझे पुनः पुत्र-मिलनका सुख सुलभ हो जायगा ॥ १४८ ॥

नारद उवाच

यस्ते पुत्रो गमितोऽयं विजातः स्वर्णष्ठीवी यमदात् पर्वतस्ते । पुनस्तु ते पुत्रमहं ददामि हिरण्यनाभं वर्षसहस्रिणं च ॥ १४९ ॥ **नारदजी कहते हैं—**राजन्! तुम्हारे यहाँ जो यह सुवर्णष्ठीवी नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था और जिसे पर्वत मुनिने तुम्हें दिया था, वह तो चला गया। अब मैं पुनः हिरण्यनाभ नामक एक पुत्र दे रहा हूँ, जिसकी आयु एक हजार वर्षोंकी होगी ॥ १४९ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि षोडशराजोपाख्याने एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें सोलह राजाओंका उपाख्यानविषयक* उन्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥


१-अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम—ये सात सोम-संस्थाएँ हैं।
२-पहले द्रोणपर्वमें जो सोलह राजाओंके प्रसंग आये हैं, उनमें और यहाँके प्रसंगमें पाठभेदोंके कारण बहुत अन्तर देखा जाता है। वहाँ भरतके द्वारा यमुनातटपर सौ, सरस्वतीतटपर तीन सौ और गंगातटपर चार सौ अश्वमेध यज्ञ किये गये थे—यह उल्लेख है।

* ‘शम्या’ एक ऐसे काठके डंडेको कहते हैं, जिसका निचला भाग मोटा होता है। उसे जब कोई बलवान् पुरुष उठाकर जोरसे फेंके, तब जितनी दूरीपर जाकर वह गिरे, उतने भूभागको एक ‘शम्यापात’ कहते हैं। इस तरह एक-एक शम्यापातमें एक-एक यज्ञवेदी बनाते और यज्ञ करते हुए राजा ययाति आगे बढ़ते गये। इस प्रकार चलकर उन्होंने भारतभूमिकी परिक्रमा की थी।

* यह षोडश राजाओंका उपाख्यान द्रोणपर्वके पचपनवें अध्यायसे लेकर इकहत्तरवें अध्यायतक पहले आ चुका है। उसीको कुछ संक्षिप्त करके पुनः यहाँ लिया गया है। पहलेका परशुरामचरित्र इसमें संगृहीत नहीं हुआ है और पहले जो राजा पौरवका चरित्र आया था, उसके स्थानमें यहाँ अंगराज बृहद्रथके चरित्रका वर्णन है। कथाओंके क्रममें भी उलटा-पलटी हो गयी है। श्लोकोंके पाठोंमें भी कई जगह भेद दिखायी देता है।

महर्षि नारद और पर्वतका उपाख्यान

⬅ विषय-सूची (TOC)

त्रिंशोऽध्यायः

महर्षि नारद और पर्वतका उपाख्यान

युधिष्ठिर उवाच

स कथं कांचनष्ठीवी सृंजयस्य सुतोऽभवत् ।
पर्वतेन किमर्थं वा दत्तस्तेन ममार च ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! पर्वत मुनिने राजा सृंजयको सुवर्णष्ठीवी नामक पुत्र किसलिये दिया और वह क्यों मर गया? ॥ १ ॥

यदा वर्षसहस्रायुस्तदा भवति मानवः ।
कथमप्राप्तकौमारः सृंजयस्य सुतो मृतः ॥ २ ॥
जब उस समय मनुष्यकी एक हजार वर्षकी आयु होती थी, तब सृंजयका पुत्र कुमारावस्था आनेसे पहले ही क्यों मर गया? ॥ २ ॥

उताहो नाममात्रं वै सुवर्णष्ठीविनोऽभवत् ।
कथं वा काञ्चनष्ठीवीत्येतदिच्छामि वेदितुम् ॥ ३ ॥
उस बालकका नाममात्र ही सुवर्णष्ठीवी था या उसमें वैसा ही गुण भी था। सुवर्णष्ठीवी नाम पड़नेका कारण क्या था? यह सब मैं जानना चाहता हूँ ॥ ३ ॥

श्रीकृष्ण उवाच

अत्र ते वर्णयिष्यामि यथावृत्तं जनेश्वर ।
नारदः पर्वतश्चैव द्वावृषी लोकसत्तमौ ॥ ४ ॥
श्रीकृष्ण बोले— जनेश्वर! इस विषयमें जो बात है, वह यथार्थरूपसे बता रहा हूँ, सुनिये। नारद और पर्वत—ये दोनों ऋषि सम्पूर्ण लोकोंमें श्रेष्ठ हैं ॥ ४ ॥

मातुलो भागिनेयश्च देवलोकादिहागतौ ।
विहर्तुकामौ सम्प्रीत्या मानुषेषु पुरा विभो ॥ ५ ॥
ये दोनों परस्पर मामा और भानजे लगते हैं! प्रभो! पहलेकी बात है ये दोनों महर्षि मनुष्यलोकमें भ्रमण करनेके लिये प्रेमपूर्वक देवलोकसे यहाँ आये थे ॥ ५ ॥

हविःपवित्रभोज्येन देवभोज्येन चैव हि ।
नारदो मातुलश्चैव भागिनेयश्च पर्वतः ॥ ६ ॥
वे यहाँ पवित्र हविष्य तथा देवताओंके भोजन करनेयोग्य पदार्थ खाकर रहते थे। नारदजी मामा हैं और पर्वत इनके भानजे हैं ॥ ६ ॥

तावुभौ तपसोपेताववनीतलचारिणौ ।
भुञ्जानौ मानुषान् भोगान् यथावत् पर्यधावताम् ॥ ७ ॥

वे दोनों तपस्वी पृथवीतलपर विचरते और मानवीय भोगोंका उपभोग करते हुए यहाँ यथावत्रूपसे परिभ्रमण करने लगे ॥ ७ ॥

प्रीतिमन्तौ मुदा युक्तौ समयं चैव चक्रतुः ।
यो भवेद्धृदि संकल्पः शुभो वा यदि वाशुभः ॥ ८ ॥
अन्योन्यस्य स आख्येयो मृषा शापोऽन्यथा भवेत् ।
उन दोनोंने बड़ी प्रसन्नताके साथ प्रेमपूर्वक यह शर्त कर रखी थी कि हमलोगोंके मनमें शुभ या अशुभ जो भी संकल्प प्रकट हो, उसे हम एक दूसरेसे कह दें; अन्यथा झूठे ही शापका भागी होना पड़ेगा ॥ ८ १/२ ॥

तौ तथेति प्रतिज्ञाय महर्षी लोकपूजितौ ॥ ९ ॥
सृंजयं शैत्यमभेत्य राजानमिदमूचतुः ।
वे दोनों लोकपूजित महर्षि 'तथास्तु' कहकर पूर्वोक्त प्रतिज्ञा करनेके पश्चात् श्वेतपुत्र राजा सृंजयके पास जाकर इस प्रकार बोले— ॥ ९ १/२ ॥

आवां भवति वत्स्यावः कञ्चित् कालं हिताय ते ॥ १० ॥
यथावत् पृथिवीपाल आवयोः प्रगुणीभव ।
'भूपाल! हम दोनों तुम्हारे हितके लिये कुछ कालतक तुम्हारे पास ठहरेंगे। तुम हमारे अनुकूल होकर रहो' ॥ १० १/२ ॥

तथेति कृत्वा राजा तौ सत्कृत्योपचचार ह ॥ ११ ॥
ततः कदाचित्तौ राजा महात्मानौ तपोधनौ ।
अब्रवीत् परमप्रीतः सुतेयं वरवर्णिनी ॥ १२ ॥
एकैव मम कन्यैषा युवां परिचरिष्यसि ।
दर्शनीयानवद्याङ्गी शीलवृत्तसमाहिता ॥ १३ ॥
सुकुमारी कुमारी च पद्मकिञ्जल्कसुप्रभा ।
तब 'बहुत अच्छा' कहकर राजाने उन दोनोंका सत्कारपूर्वक पूजन किया। तदनन्तर एक दिन राजा सृंजयने अत्यन्त प्रसन्न होकर उन दोनों तपस्वी महात्माओंसे कहा—'महर्षियो! यह मेरी एक ही कन्या है, जो परम सुन्दरी, दर्शनीय, निर्दोष अङ्गोंवाली तथा शील और सदाचारसे सम्पन्न है। कमल-केसरके समान कान्तिवाली यह सुकुमारी कुमारी आजसे आप दोनोंकी सेवा करेगी' ॥ ११—१३ १/२ ॥

परमं सौम्यमित्युक्तं ताभ्यां राजा शशास ताम् ॥ १४ ॥
कन्ये विप्रावुपचर देववत् पितृवच्च ह ।
तब उन दोनोंने कहा—'बहुत अच्छा।' इसके बाद राजाने उस कन्याको आदेश दिया—'बेटी! तुम इन दोनों महर्षियोंकी देवता और पितरोंके समान सेवा किया करो'।

सा तु कन्या तथेत्युक्त्वा पितरं धर्मचारिणी ॥ १५ ॥
यथानिदेशं राज्ञस्तौ सत्कृत्योपचचार ह ।

धर्माचरणमें तत्पर रहनेवाली उस कन्याने पितासे 'ऐसा ही होगा' यों कहकर राजाकी आज्ञाके अनुसार उन दोनोंकी सत्कारपूर्वक सेवा आरम्भ कर दी ॥ १५१/२ ॥ तस्यास्तेनोपचारेण रूपेणाप्रतिमेन च ॥ १६ ॥ नारदं हृच्छयस्तूर्णं सहसैवाभ्यपद्यत । उसकी उस सेवा तथा अनुपम रूप-सौन्दर्यसे नारदके हृदयमें सहसा कामभावका संचार हो गया ॥ १६१/२ ॥ ववृधे हि ततस्तस्य हृदि कामो महात्मनः ॥ १७ ॥ यथा शुक्लस्य पक्षस्य प्रवृत्तौ चन्द्रमाः शनैः । उन महामनस्वी नारदके हृदयमें काम उसी प्रकार धीरे-धीरे बढ़ने लगा, जैसे शुक्लपक्ष आरम्भ होनेपर शनैः-शनैः चन्द्रमाकी वृद्धि होती है ॥ १७१/२ ॥ न च तं भागिनेयाय पर्वताय महात्मने ॥ १८ ॥ शशंस हृच्छयं तीव्रं व्रीडमानः स धर्मवित् । धर्मज्ञ नारदने लज्जावश भानजे महात्मा पर्वतको अपने बढ़े हुए दुःसह कामकी बात नहीं बतायी ॥ तपसा चेङ्गितैश्चैव पर्वतोऽथ बुबोध तम् ॥ १९ ॥ कामार्तं नारदं क्रुद्धः शशापैनं ततो भृशम् । परंतु पर्वतने अपनी तपस्या और नारदजीकी चेष्टाओंसे जान लिया कि नारद कामवेदनासे पीड़ित हैं; फिर तो उन्होंने अत्यन्त कुपित हो उन्हें शाप देते हुए कहा—॥ १९१/२ ॥ कृत्वा समयमव्यग्रो भवान् वै सहितो मया ॥ २० ॥ यो भवेद्धृदि संकल्पः शुभो वा यदि वाशुभः । अन्योन्यस्य स आख्येय इति तद् वै मृषा कृतम् ॥ २१ ॥ भवता वचनं ब्रह्मंस्तस्मादेष शपाम्यहम् । 'आपने मेरे साथ स्वस्थचित्तसे यह शर्त की थी कि 'हम दोनोंके हृदयमें जो भी शुभ या अशुभ संकल्प हो, उसे हम दोनों एक दूसरेसे कह दें।' परंतु ब्रह्मन्! आपने अपने उस वचनको मिथ्या कर दिया; इसलिये मैं शाप देनेको उद्यत हुआ हूँ ॥ २०-२११/२ ॥ न हि कामं प्रवर्तन्तं भवानाचष्ट मे पुरा ॥ २२ ॥ सुकुमार्यां कुमार्यां ते तस्मादेष शपाम्यहम् । 'जब आपके मनमें पहले इस सुकुमारी कुमारीके प्रति कामभावका उदय हुआ तो आपने मुझे नहीं बताया; इसलिये यह मैं आपको शाप दे रहा हूँ ॥ २२१/२ ॥ ब्रह्मचारी गुरुर्यस्मात् तपस्वी ब्राह्मणश्च सन् ॥ २३ ॥ अकार्षीः समयभ्रंशमावाभ्यां यः कृतो मिथः ।