महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अच्छा, यह तो बताओ, तुम शोक करके क्या कर लोगे? क्या इसे जिला दोगे? फिर इस मृतकके लिये क्यों शोक करते हो? काल ही सबका शासक और स्वामी है, जो धर्मतः सबके ऊपर समान दृष्टि रखता है ।। ४४ ।।
यौवनस्थांश्च बालांश्च वृद्धान् गर्भगतानपि ।
सर्वानविशते मृत्युरेवंभूतमिदं जगत् ।। ४५ ।।
यह कराल काल युवा, बालक, वृद्ध और गर्भस्थ शिशु—सबमें प्रवेश करता है। इस संसारकी ऐसी ही दशा है ।। ४५ ।।
जम्बुक उवाच
अहो मन्दीकृतः स्नेहो गृध्रेणाल्पबुद्धिना ।
पुत्रस्नेहाभिभूतानां युष्माकं शोचतां भृशम् ।। ४६ ।।
इसपर गीदड़ने कहा—अहो! क्या इस मन्दबुद्धि गीधने तुम्हारे स्नेहको शिथिल कर दिया? तुम तो पुत्रस्नेहसे अभिभूत होकर उसके लिये बड़ा शोक कर रहे थे ।। ४६ ।।
समैः सम्यक्प्रयुक्तैश्च वचनैः प्रत्ययोत्तरैः ।
यद् गच्छति जनश्चायं स्नेहमुत्सृज्य दुस्त्यजम् ।। ४७ ।।
गीधके अच्छी युक्तियोंसे युक्त न्यायसंगत और विश्वासोत्पादक प्रतीत होनेवाले वचनोंसे प्रभावित हो ये सब लोग जो दुस्त्यज स्नेहका परित्याग करके चले जा रहे हैं, यह कितने आश्चर्यकी बात है! ।। ४७ ।।
अहो पुत्रवियोगेन मृतशून्योपसेवनात् ।
क्रोशतं सुभृशं दुःखं विवत्सानां गवामिव ।। ४८ ।।
अद्य शोकं विजानामि मानुषाणां महीतले ।
स्नेहं हि कारणं कृत्वा ममाप्यश्रूण्यथापतन् ।। ४९ ।।
अहो! पुत्रके वियोगसे पीड़ित हो मृतकोंके इस शून्य स्थानमें आकर अत्यन्त दुःखसे रोने-बिलखनेवाले इन भूतलावासी मनुष्योंके हृदयमें बछड़ोंसे रहित हुई गायोंकी भाँति कितना शोक होता है? इसका अनुभव मुझे आज हुआ है; क्योंकि इनके स्नेहको निमित्त बनाकर मेरी आँखोंसे भी आँसू बहने लगे हैं ।।
यत्नो हि सततं कार्यस्ततो दैवेन सिद्ध्यति ।
दैवं पुरुषकारश्च कृतान्तेनोपपद्यते ।। ५० ।।
अपने अभीष्टकी सिद्धिके लिये सदा प्रयत्न करते रहना चाहिये, तब दैवयोगसे उसकी सिद्धि होती है। दैव और पुरुषार्थ—दोनों कालसे ही सम्पन्न होते हैं ।। ५० ।।
अनिर्वेदः सदा कार्यो निर्वेदाद्धि कुतः सुखम् ।
प्रयत्नात् प्राप्यते ह्यर्थः कस्माद् गच्छथ निर्दयम् ।। ५१ ।।
खेद और शिथिलताको कभी अपने मनमें स्थान नहीं देना चाहिये। खेद होनेपर कहाँसे सुख प्राप्त हो सकता है। प्रयत्नसे ही अभिलषित अर्थकी प्राप्ति होती है; अतः तुमलोग इस बालककी रक्षाका प्रयत्न छोड़कर निर्दयतापूर्वक कहाँ चले जा रहे हो? ।। ५१ ।। आत्ममांसोपवृत्तं च शरीरार्धमयीं तनुम् । पितॄणां वंशकर्तारं वने त्यक्त्वा क्व यास्यथ ।। ५२ ।। यह बालक तुम्हारे अपने ही रक्त-मांसका बना हुआ है, आधे शरीरके समान है और पितरोंके वंशकी वृद्धि करनेवाला है, इसे वनमें छोड़कर तुम कहाँ जाओगे? ।। ५२ ।। अथवास्तंगते सूर्ये संध्याकाल उपस्थिते । ततो नेष्यथ वा पुत्रमिहस्था वा भविष्यथ ।। ५३ ।। अच्छा, इतना ही करो कि जबतक सूर्य अस्त न हो और संध्याकाल उपस्थित न हो जाय, तबतक यहाँ रुके रहो; फिर अपने इस पुत्रको साथ ले जाना अथवा यहीं बैठे रहना ।। ५३ ।।
गृध्र उवाच
अद्य वर्षसहस्रं मे साग्रं जातस्य मानुषाः । न च पश्यामि जीवन्तं मृतं स्त्रीपुंनपुंसकम् ।। ५४ ।। **गीधने कहा—**मनुष्यो! मुझे जन्म लिये आज एक हजार वर्षसे अधिक हो गये; परंतु मैंने कभी किसी स्त्री-पुरुष या नपुंसकको मरनेके बाद फिर जीवित होते नहीं देखा ।। ५४ ।। मृता गर्भेपु जायन्ते जातमात्रा म्रियन्ति च । चङ्क्रमन्तो म्रियन्ते च यौवनस्थास्तथा परे ।। ५५ ।। कुछ लोग गर्भोंमें ही मरकर जन्म लेते हैं, कुछ जन्म लेते ही मर जाते हैं, कुछ चलने-फिरने लायक होकर मरते हैं और कुछ लोग भरी जवानीमें ही चल बसते हैं ।। ५५ ।। अनित्यानीह भाग्यानि चतुष्पात्पक्षिणामपि । जङ्गमानां नगानां वाप्यायुरग्रेऽवतिष्ठते ।। ५६ ।। इस संसारमें पशुओं और पक्षियोंके भी भाग्यफल अनित्य हैं। स्थावरों और जंगमोंके जीवन में भी आयुकी ही प्रधानता है ।। ५६ ।। इष्टदारवियुक्ताश्च पुत्रशोकान्वितास्तथा । दह्यमानाः स्म शोकेन गृहं गच्छन्ति नित्यशः ।। ५७ ।। प्रिय पत्नीके वियोग और पुत्रशोकसे संतप्त हो कितने ही प्राणी प्रतिदिन शोककी आगमें जलते हुए इस मरघटसे अपने घरको लौटते हैं ।। ५७ ।। अनिष्टानां सहस्राणि तथेष्टानां शतानि च । उत्सृज्येह प्रयाता वै बान्धवा भृशदुःखिताः ।। ५८ ।।
कितने ही भाई-बन्धु अत्यन्त दुखी हो यहाँ हजारों अप्रिय त था सैकड़ों प्रिय व्यक्तियोंको छोड़कर चले गये हैं॥ ५८॥
त्यज्यतामेष निस्तेजाः शून्यः काष्ठत्वमागतः ।
अन्यदेहविषक्तं हि शावं काष्ठत्वमागतम् ॥ ५९ ॥
त्यक्तजीवस्य चैवास्य कस्माद्धित्वा न गच्छत ।
निरर्थको ह्ययं स्नेहो निष्फलश्च परिश्रमः ॥ ६० ॥
यह मृत बालक तेजोहीन होकर थोथे काठके समान हो गया है। इसे छोड़ दो। इसका जीव दूसरे शरीरमें आसक्त है। इस निष्प्राण बालकका यह शव काठके समान हो गया है तुमलोग इसे छोड़कर चले क्यों नहीं जाते? तुम्हारा यह स्नेह निरर्थक है और इस परिश्रमका भी कोई फल नहीं है॥ ५९-६०॥
चक्षुर्भ्यां न च कर्णाभ्यां संशृणोति समीक्षते ।
कस्मादेनं समुत्सृज्य न गृहान् गच्छताशु वै ॥ ६१ ॥
यह न तो आँखोंसे देखता है और न कानोंसे कुछ सुनता ही है। फिर इसे त्यागकर तुमलोग जल्दी अपने घर क्यों नहीं चले जाते ॥ ६१ ॥
मोक्षधर्माश्रितैर्वाक्यैर्हेतुमद्भिः सुनिष्ठुरैः ।
मयोक्ता गच्छत क्षिप्रं स्वं स्वमेव निवेशनम् ॥ ६२ ॥
मेरी ये बातें बड़ी निष्ठुर जान पड़ती हैं; परंतु हेतुगर्भित और मोक्ष-धर्मसे सम्बन्ध रखनेवाली हैं; अतः इन्हें मानकर मेरे कहनेसे तुमलोग शीघ्र अपने-अपने घर पधारो ॥ ६२ ॥
प्रज्ञाविज्ञानयुक्तेन बुद्धिसंज्ञाप्रदायिना ।
वचनं श्राविता नूनं मानुषाः संनिवर्तत ।
शोको द्विगुणतां याति दृष्ट्वा स्मृत्वा च चेष्टितम् ॥ ६३ ॥
मनुष्यो! मैं बुद्धि और विज्ञानसे युक्त तथा दूसरोंको भी ज्ञान प्रदान करनेवाला हूँ। मैंने तुम्हें विवेक उत्पन्न करनेवाली बहुत-सी बातें सुनायी हैं। अब तुमलोग लौट जाओ। अपने मरे हुए स्वजनका शव देखकर तथा उसकी चेष्टाओंको स्मरण करके दूना शोक होता है॥ ६३॥
इत्येतद् वचनं श्रुत्वा संनिवृत्तास्तु मानुषाः ।
अपश्यत् तं तदा सुप्तं द्रुतमागत्य जम्बुकः ॥ ६४ ॥
गीधकी यह बात सुनकर वे सब मनुष्य घरकी ओर लौट पड़े। तब सियारने तुरंत आकर उस सोते हुए बालकको देखा ॥ ६४ ॥
जम्बुक उवाच
इमं कनकवर्णाभं भूषणैः समलंकृतम् ।
गृध्रवाक्यात् कथं पुत्रं त्यजध्वं पितृपिण्डदम् ॥ ६५ ॥ **सियार बोला—**बन्धुओ! देखो तो सही, इस बालकका रंग कैसा सोनेके समान चमक रहा है। आभूषणोंसे भूषित होकर यह कैसी शोभा पाता है। पितरोंको पिण्ड प्रदान करनेवाले अपने इस पुत्रको तुम गीधकी बातोंमें आकर कैसे छोड़ रहे हो? ॥ ६५ ॥ न स्नेहस्य च विच्छेदो विलापरुदितस्य च । मृतस्यास्य परित्यागात् तापो वै भविता ध्रुवम् ॥ ६६ ॥ इस मृत बालकको छोड़कर जानेसे न तो तुम्हारे स्नेहमें कमी आयेगी और न तुम्हारा रोना-धोना एवं विलाप ही बंद होगा। उलटे तुम्हारा संताप और बढ़ जायगा, यह निश्चित है ॥ ६६ ॥ श्रूयते शम्बुके शूद्रे हते ब्राह्मणदारकः । जीवितो धर्ममासाद्य रामात् सत्यपराक्रमात् ॥ ६७ ॥ सुना जाता है कि सत्यपराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीसे शम्बूक नामक शूद्रके मारे जानेपर उस धर्मके प्रभावसे एक मरा हुआ ब्राह्मण बालक जीवित हो उठा था ॥ तथा श्वेतस्य राजर्षेर्बालो दृष्टान्तमागतः । श्वेतेन धर्मनिष्ठेन मृतः संजीवितः पुनः ॥ ६८ ॥ इसीप्रकार राजर्षि श्वेतका भी बालक मर गया था, परंतु धर्मनिष्ठ श्वेतने उसे पुनः जीवित कर दिया था ॥ तथा कश्चिल्लभेत् सिद्धो मुनिुर्वा देवतापि वा । कृपणानामनुक्रोशं कुर्याद् वो रुदतामिह ॥ ६९ ॥ इसी प्रकार सम्भव है कोई सिद्ध मुनि या देवता मिल जायँ और यहाँ रोते हुए तुम दीन-दुखियोंपर दया कर दें ॥ ६९ ॥ इत्युक्तास्ते न्यवर्तन्त शोकार्ताः पुत्रवत्सलाः । अङ्के शिरः समाधाय रुरुदुर्बहुविस्तरम् । तेषां रुदितशब्देन गृध्रोऽभ्येत्य वचोऽब्रवीत् ॥ ७० ॥ सियारके ऐसा कहनेपर वे पुत्रवत्सल बान्धव शोकसे पीड़ित हो लौट पड़े और बालकका मस्तक अपनी गोदमें रखकर जोर-जोरसे रोने लगे। उनके रोनेकी आवाज सुनकर गीध पास आ गया और इस प्रकार बोला ॥ ७० ॥
गृध्र उवाच
अश्रुपातपरिक्लिन्नः पाणिस्पर्शप्रपीडितः । धर्मराजप्रयोगाच्च दीर्घनिद्रां प्रवेशितः ॥ ७१ ॥ **गीधने कहा—**तुमलोगोंके आँसू बहानेसे जिसका शरीर गीला हो गया है और जो तुम्हारे हाथोंसे बार-बार दबाया गया है, ऐसा यह बालक धर्मराजकी आज्ञासे चिरनिद्रामें
प्रविष्ट हो गया है ।। ७१ ।।
तपसापि हि संयुक्ता धनवन्तो महाधियः ।
सर्वे मृत्युवशं यान्ति तदिदं प्रेतपत्तनम् ।। ७२ ।।
बड़े-बड़े तपस्वी, धनवान् और महा बुद्धिमान् सभी यहाँ मृत्युके अधीन हो जाते हैं। यह प्रेतोंका नगर है ।।
बालवृद्धसहस्राणि सदा संत्यज्य बान्धवाः ।
दिनानि चैव रात्रीश्च दुःखं तिष्ठन्ति भूतले ।। ७३ ।।
यहाँ लोगोंके भाई बन्धु सदा सहस्रों बालकों और वृद्धोंको त्यागकर दिन-रात दुखी रहते हैं ।। ७३ ।।
अलं निर्बन्धमागत्य शोकस्य परिधारणे ।
अप्रत्ययं कुतो ह्यस्य पुनरद्येह जीवितम् ।। ७४ ।।
दुराग्रहवश बारंबार लौटकर शोकका बोझ धारण करनेसे कोई लाभ नहीं है। अब इसके जीनेका कोई भरोसा नहीं है। भला, आज यहाँ इसका पुनर्जीवन कैसे हो सकता है? ।। ७४ ।।
मृतस्योत्सृष्टदेहस्य पुनर्देहो न विद्यते ।
नैव मूर्तिप्रदानेन जम्बुकस्य शतैरपि ।। ७५ ।।
शक्यं जीवयितुं ह्येष बालो वर्षशतैरपि ।
जो व्यक्ति एक बार इस देहसे नाता तोड़कर मर जाता है, उसके लिये फिर इस शरीरमें लौटना सम्भव नहीं है सैकड़ों सियार अपना शरीर बलिदान कर दें तो भी सैकड़ों वर्षोंमें इस बालकको जिलाया नहीं जा सकता ।। ७५ १/२ ।।
अथ रुद्रः कुमारो वा ब्रह्मा वा विष्णुरेव च ।। ७६ ।।
वरमस्मै प्रयच्छेयुस्ततो जीवेदयं शिशुः ।
यदि भगवान् शिव, कुमार कार्तिकेय, ब्रह्माजी और भगवान् विष्णु इसे वर दें तो यह बालक जी सकता है ।। ७६ १/२ ।।
नैव बाष्पविमोक्षेण न वा श्वासकृते न च ।। ७७ ।।
न दीर्घरुदितेनायं पुनर्जीवं गमिष्यति ।
न तो आँसू बहानेसे, न लंबी-लंबी सांस खींचनेसे और न दीर्घकालतक रोनेसे ही यह फिर जी सकेगा ।। ७७ १/२ ।।
अहं च क्रोष्टुकश्चैव यूयं ये चास्य बान्धवाः ।। ७८ ।।
धर्माधर्मौ गृहीत्वेह सर्वे वर्तामहेऽध्वनि ।
मैं, यह सियार और तुम सब लोग जो इसके भाई बन्धु हो—ये सभी धर्म और अधर्मको लेकर यहाँ अपनी-अपनी राहपर चल रहे हैं ।। ७८ १/२ ।।
अप्रियं परुषं चापि परद्रोहं परस्त्रियम् ।। ७९ ।।
अधर्ममनृतं चैव दूरात् प्राज्ञो विवर्जयेत् । बुद्धिमान् पुरुषको अप्रिय आचरण, कठोर वचन दूसरोंके साथ द्रोह, परायी स्त्री, अधर्म और असत्य-भाषणका दूरसे ही परित्याग कर देना चाहिये ।। ७९ १/२ ।। धर्मं सत्यं श्रुतं न्याय्यं महतीं प्राणिनां दयाम् ।। ८० ।। अजिह्मत्वमशाठ्यं च यत्नतः परिमार्गत । तुम सब लोग धर्म, सत्य, शास्त्रज्ञान, न्यायपूर्ण बर्ताव समस्त प्राणियोंपर बड़ी भारी दया, कुटिलताका अभाव तथा शठताका त्याग—इन्हीं सद्गुणोंका यत्नपूर्वक अनुसरण करे ।। ८० १/२ ।। मातरं पितरं वापि बान्धवान् सुहृदस्तथा ।। ८१ ।। जीवतो ये न पश्यन्ति तेषां धर्मविपर्ययः । जो लोग जीवित माता-पिता, सुहृदों और भाई-बन्धुओंकी देखभाल नहीं करते हैं, उनके धर्मकी हानि होती है ।। ८१ १/२ ।। यो न पश्यति चक्षुर्भ्यां नेङ्गते च कथञ्चन ।। ८२ ।। तस्य निष्ठावसानान्ते रुदन्तः किं करिष्यथ । जो न आँखोंसे देखता है, न शरीरसे कोई चेष्टा ही करता है, उसके जीवनका अन्त हो जानेपर अब तुमलोग रोकर क्या करोगे ।। ८२ १/२ ।। इत्युक्तास्ते सुतं त्यक्त्वा भूमौ शोकपरिप्लुताः । दह्यमानाः सुतस्नेहात् प्रययुर्बान्धवा गृहम् ।। ८३ ।। गीधके ऐसा कहनेपर वे शोकमें डूबे हुए भाई-बन्धु अपने उस पुत्रको धरतीपर सुलाकर उसके स्नेहसे दग्ध होते हुए अपने घरकी ओर लौटे ।। ८३ ।।
जम्बुक उवाच
दारुणो मर्त्यलोकोऽयं सर्वप्राणिविनाशनः । इष्टबन्धुवियोगश्च तथेहाल्पं च जीवितम् ।। ८४ ।। तब सियारने कहा—यह मर्त्यलोक अत्यन्त दुःखद है। यहाँ समस्त प्राणियोंका नाश ही होता है। प्रिय बन्धुजनोंके वियोगका कष्ट भी प्राप्त होता रहता है। यहाँका जीवन बहुत थोड़ा है ।। ८४ ।। बह्वलीकमसत्यं चाप्यतिवादाप्रियंवदम् । इमं प्रेक्ष्य पुनर्भावं दुःखशोकविवर्धनम् ।। ८५ ।। न मे मानुषलोकोऽयं मुहूर्तमपि रोचते ।
इस संसारमें सब कुछ असत्य एवं बहुत अरुचिकर है। यहाँ अनाप-शनाप बकनेवाले तो बहुत हैं, परंतु प्रिय वचन बोलनेवाले विरले ही हैं। यहाँ का भाव दुःख और शोककी वृद्धि करनेवाला है। इसे देखकर मुझे यह मनुष्यलोक दो घड़ी भी अच्छा नहीं लगता ।। ८५ १/२ ।।
अहो धिगृ गृध्रवाक्येन यथैवाबुद्धयस्तथा ।। ८६ ।।
कथं गच्छत निःस्नेहाः सुतस्नेहं विसृज्य च ।
अहो! धिक्कार है। तुमलोग गीधकी बातोंमें आकर मूर्खोंके समान पुत्रस्नेहसे रहित हुए प्रेमशून्य होकर कैसे घरको लौटे जा रहे हो? ।। ८६ १/२ ।।
प्रदीप्ताः पुत्रशोकेन संनिवर्तत मानुषाः ।। ८७ ।।
श्रुत्वा गृध्रस्य वचनं पापस्येहाकृतात्मनः ।
मनुष्यो! यह गीध तो बड़ा पापी और अपवित्र हृदयवाला है। इसकी बात सुनकर तुमलोग पुत्रशोकसे जलते हुए भी क्यों लौटे जा रहे हो? ।। ८७ १/२ ।।
सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ।। ८८ ।।
सुखदुःखावृते लोके नेहास्त्येकमनन्तरम् ।
सुखके बाद दुःख और दुःखके बाद सुख आता है। सुख और दुःखसे घिरे हुए इस जगत्में निरन्तर (सुख या दुःख) अकेला नहीं बना रहता है ।। ८८ १/२ ।।
इमं क्षितितले त्यक्त्वा बालं रूपसमन्वितम् ।। ८९ ।।
कुलशोभाकरं मूढाः पुत्रं त्यक्त्वा क्व यास्यथ ।
रूपयौवनसम्पन्नं द्योतमानमिव श्रिया ।। ९० ।।
यह सुन्दर बालक तुम्हारे कुलकी शोभा बढ़ानेवाला है। यह रूप और यौवनसे सम्पन्न है तथा अपनी कान्तिसे प्रकाशित हो रहा है। मूर्खों! इस पुत्रको पृथ्वीपर डालकर तुम कहाँ जाओगे? ।। ८९-९० ।।
जीवन्तमेव पश्यामि मनसा नात्र संशयः ।
विनाशो नास्य न हि वै सुखं प्राप्स्यथ मानुषाः ।। ९१ ।।
मनुष्यो! मैं तो अपने मनसे इस बालकको जीवित ही देख रहा हूँ, इसमें संशय नहीं है। इसका नाश नहीं होगा, तुम्हें अवश्य ही सुख मिलेगा ।। ९१ ।।
पुत्रशोकाभितप्तानां मृतानामद्य वः क्षमम् ।
सुखसम्भावनं कृत्वा धारयित्वा सुखं स्वयं ।
त्यक्त्वा गमिष्यथ क्वाद्य समुत्सृज्याल्पबुद्धिवत् ।। ९२ ।।
पुत्रशोकसे संतप्त होकर तुमलोग स्वयं ही मृतक-तुल्य हो रहे हो; अतः तुम्हारे लिये इस तरह लौट जाना उचित नहीं है। इस बालकसे सुखकी सम्भावना करके सुख पानेकी सुदृढ़ आशा धारण कर तुम सब लोग अल्पबुद्धि मनुष्यके समान स्वयं ही इसे त्यागकर अब कहाँ जाओगे? ।। ९२ ।।
भीष्म उवाच
तथा धर्मविरोधेन प्रियमिथ्याभिधायिना । श्मशानवासिना नित्यं रात्रिं मृगयता नृप ॥ ९३ ॥ ततो मध्यस्थतां नीता वचनैरमृतोपमैः । जम्बुकेन स्वकार्यार्थं बान्धवास्तस्य धिष्ठिताः ॥ ९४ ॥ भीष्मजीने कहा—राजन्! वह सियार सदा श्मशान भूमिमें ही निवास करता था और अपना काम बनानेके लिये रात्रिकालकी प्रतीक्षा कर रहा था; अतः उसने धर्मविरोधी, मिथ्या तथा अमृततुल्य वचन कहकर उस बालकके बन्धु-बान्धवोंको बीचमें ही अटका दिया। वे न जा पाते थे और न रह पाते थे, अन्तमें उन्हें ठहर जाना पड़ा ॥ ९३-९४ ॥
गृध्र उवाच
अयं प्रेतसमाकीर्णो यक्षराक्षससेवितः । दारुणः काननोद्देशः कौशिकैरभिनादितः ॥ ९५ ॥ तब गीधने कहा—मनुष्यो! यह वन्य प्रदेश प्रेतोंसे भरा हुआ है। इसमें बहुत-से यक्ष और राक्षस निवास करते हैं तथा कितने ही उल्लू हू-हू की आवाज कर रहे हैं; अतः यह स्थान बड़ा भयंकर है ॥ ९५ ॥ भीमः सुघोरश्च तथा नीलमेघसमप्रभः । अस्मिन् शवं परित्यज्य प्रेतकार्याण्युपासत ॥ ९६ ॥ यह अत्यन्त घोर, भयानक तथा नीलमेघके समान काला अन्धकारपूर्ण है। इस मुर्देको यहीं छोड़कर तुमलोग प्रेतकर्म करो ॥ ९६ ॥ भानुर्यावत् प्रयात्यस्तं यावच्च विमला दिशः । तावदेनं परित्यज्य प्रेतकार्याण्युपासत ॥ ९७ ॥ जबतक सूर्य डूब नहीं जाते हैं और जबतक दिशाएँ निर्मल हैं, तभीतक इसे यहाँ छोड़कर तुमलोग इसके प्रेतकार्यमें लग जाओ ॥ ९७ ॥ नदन्ति परुषं श्येनाः शिवाः क्रोशन्ति दारुणम् । मृगेन्द्राः प्रतिनन्दन्ति रविरस्तं च गच्छति ॥ ९८ ॥ इस वनमें बाज अपनी कठोर बोली बोलते हैं, सियार भयंकर आवाजमें हुआँ-हुआँ कर रहे हैं, सिंह दहाड़ रहे हैं और सूर्य अस्ताचलको जा रहे हैं ॥ ९८ ॥ चिताधूमेन नीलेन संरज्यन्ते च पादपाः । श्मशाने च निराहाराः प्रतिनर्दन्ति देहिनः ॥ ९९ ॥ चिताके काले धुएँसे यहाँके सारे वृक्ष उसी रंगमें रंग गये हैं। श्मशानभूमिमें यहाँके निराहार प्राणी (प्रेत-पिशाच आदि) गरज रहे हैं ॥ ९९ ॥ सर्वे विकृतदेहाश्चाप्यस्मिन् देशे सुदारुणे ।
युष्मान् प्रधर्षयिष्यन्ति विकृता मांसभोजिनः ॥ १०० ॥ इस भयंकर प्रदेशमें रहनेवाले सभी प्राणी विकराल शरीरके हैं। ये सबके सब मांस खानेवाले और विकृत अंगवाले हैं। वे तुमलोगोंको धर दबायेंगे ॥ १०० ॥ क्रूरश्वायं वनोद्देशो भयमद्य भविष्यति । त्यज्यतां काष्ठभूतोऽयं मृष्यतां जाम्बुकं वचः ॥ १०१ ॥ जंगलका यह भाग क्रूर प्राणियोंसे भरा हुआ है। अब तुम्हें यहाँ बहुत बड़े भयका सामना करना पड़ेगा। यह बालक तो अब काठके समान निष्प्राण हो गया है। इसे छोड़ो और सियारकी बातोंके लोभमें न पड़ो ॥ १०१ ॥ यदि जम्बुकवाक्यानि निष्फलान्यनृतानि च । श्रोष्यथ भ्रष्टविज्ञानास्ततः सर्वे विनङ्क्ष्यथ ॥ १०२ ॥ यदि तुमलोग विवेकभ्रष्ट होकर सियारकी झूठी और निष्फल बातें सुनते रहोगे तो सबके सब नष्ट हो जाओगे ॥ १०२ ॥
जम्बुक उवाच स्थीयतां नेह भेतव्यं यावत् तपति भास्करः । तावदस्मिन् सुते स्नेहादनिर्वेदेन वर्तत ॥ १०३ ॥ स्वैरं रुदन्तो विश्रब्धाश्चिरं स्नेहेन पश्यत । (दारुणेऽस्मिन् वनोद्देशे भयं वो न भविष्यति । अयं सौम्यो वनोद्देशः पितॄणां निधनाकरः ॥) स्थीयतां यावदादित्यः किं च क्रव्यादाभाषितैः ॥ १०४ ॥ **सियार बोला—**ठहरो, ठहरो। जबतक यहाँ सूर्यका प्रकाश है, तबतक तुम्हें बिल्कुल नहीं डरना चाहिये। उस समयतक इस बालकपर स्नेह करके इसके प्रति ममतापूर्ण बर्ताव करो। निर्भय होकर दीर्घकालतक इसे स्नेहदृष्टिसे देखो और जी भरकर रो लो। यद्यपि यह वन्यप्रदेश भयंकर है तो भी यहाँ तुम्हें कोई भय नहीं होगा; क्योंकि यह भू-भाग पितरोंका निवास-स्थान होनेके कारण श्मशान होता हुआ भी सौम्य है। जबतक सूर्य दिखायी देते हैं, तबतक यहीं ठहरो। इस मांसभक्षी गीधके कहनेसे क्या होगा? ॥ यदि गृध्रस्य वाक्यानि तीव्राणि रभसानि च । गृह्णीत मोहितात्मानः सुतो वो न भविष्यति ॥ १०५ ॥ यदि तुम मोहितचित्त होकर इस गीधकी घोर एवं घबराहटमें डालनेवाली बातोंमें आ जाओगे तो इस बालकसे हाथ धो बैठोगे ॥ १०५ ॥
भीष्म उवाच गृध्रोऽस्तमित्याह गतो गतो नेति च जम्बुकः । मृतस्य तं परिजनमूचतुस्तौ क्षुधान्वितौ ॥ १०६ ॥
भीष्मजी कहते हैं— राजन्! वे गीध और गीदड़ दोनों ही भूखे थे और अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये मृतकके बन्धु-बान्धवोंसे बातें करते थे। गीध कहता था कि सूर्य अस्त हो गये और सियार कहता था नहीं ।।
स्वकार्यबद्धकक्षौ तौ राजन् गृध्रोऽथ जम्बुकः ।
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ शास्त्रमालम्ब्य जल्पतः ।। १०७ ।।
राजन्! गीध और गीदड़ अपना-अपना काम बनानेके लिये कमर कसे हुए थे। दोनोंको ही भूख और प्यास सता रही थी और दोनों ही शास्त्रका आधार लेकर बात करते थे ।। १०७ ।।
तयोर्विज्ञानविदुषोर्द्वयोर्मृगपतत्रिणोः ।
वाक्यैरमृतकल्पैस्तैः प्रतिष्ठन्ति व्रजन्ति च ।। १०८ ।।
उनमेंसे एक पशु था और दूसरा पक्षी। दोनों ही ज्ञानकी बातें जानते थे। उन दोनोंके अमृतरूपी वचनोंसे प्रभावित हो वे मृतकके सम्बन्धी कभी ठहर जाते और कभी आगे बढ़ते थे ।। १०८ ।।
शोकदैन्यसमाविष्टा रुदन्तस्तस्थिरे तदा ।
स्वकार्यकुशलाभ्यां ते सम्भ्राम्यन्ते ह नैपुणात् ।। १०९ ।।
शोक और दीनतासे आविष्ट होकर वे उस समय रोते हुए वहाँ खड़े ही रह गये। अपना-अपना कार्य सिद्ध करनेमें कुशल गीध और गीदड़ने चालाकीसे उन्हें चक्करमें डाल रक्खा था ।। १०९ ।।
तथा तयोर्विवदतोर्विज्ञानविदुषोर्द्वयोः ।
बान्धवानां स्थितानां चाप्युपातिष्ठत शङ्करः ।। ११० ।।
देव्या प्रणोदितो देवः कारुण्यार्दीकृतेक्षणः ।
ततस्तानाह मनुजान् वरदोऽस्मीति शङ्करः ।। १११ ।।
ज्ञान-विज्ञानकी बातें जाननेवाले उन दोनों जन्तुओंमें इस प्रकार वाद-विवाद चल रहा था और मृतकके भाई-बन्धु वहीं खड़े थे। इतनेहीमें भगवती श्रीपार्वतीदेवीकी प्रेरणासे भगवान् शंकर उनके सामने प्रकट हो गये। उस समय उनके नेत्र करुणारससे आर्द्र हो रहे थे। वरदायक भगवान् शिवने उन मनुष्योंसे कहा—'मैं तुम्हें वर दे रहा हूँ' ।। ११०-१११ ।।
ते प्रत्यूचुरिदं वाक्यं दुःखिताः प्रणताः स्थिताः ।
एकपुत्रविहीनानां सर्वेषां जीवितार्थिनाम् ।। ११२ ।।
पुत्रस्य नो जीवदानाज्जीवितं दातुमर्हसि ।
तब वे दुखी मनुष्य भगवान्को प्रणाम करके खड़े हो गये और इस प्रकार बोले—'प्रभो! इस इकलौते पुत्रसे हीन होकर हम मृतकतुल्य हो रहे हैं। आप हमारे इस पुत्रको जीवित करके हम समस्त जीवनार्थियोंको जीवनदान देनेकी कृपा करें' ।। ११२ १/२ ।।
एवमुक्तः स भगवान् वारिपूर्णेन चक्षुषा ।। ११३ ।।
जीवितं स्म कुमाराय प्रादाद् वर्षशतानि वै । उन्होंने जब नेत्रोंमें आँसू भरकर भगवान् शंकरसे इस प्रकार प्रार्थना की, तब उन्होंने उस बालकको जीवित कर दिया और उसे सौ वर्षोंकी आयु प्रदान की ।। ११३ १/२ ।। तथा गोमायुगृध्राभ्यां प्राददत् क्षुद्विनाशनम् ।। ११४ ।। वरं पिनाकी भगवान् सर्वभूतहिते रतः । इतना ही नहीं, सर्वभूतहितकारी पिनाकपाणि भगवान् शिवने गीध और गीदड़को भी उनकी भूख मिट जानेका वरदान दे दिया ।। ११४ १/२ ।। ततः प्रणम्य ते देवं प्रायो हर्षसमन्विताः ।। ११५ ।। कृतकृत्याः सुखं हृष्टाः प्रातिष्ठन्त तदा विभो । राजन्! तब वे सब लोग हर्षसे उल्लसित एवं कृतकार्य हो महादेवजीको प्रणाम करके सुख और प्रसन्नताके साथ वहाँसे चले गये ।। ११५ १/२ ।। अनिर्वेदेन दीर्घेण निश्चयेन ध्रुवेण च ।। ११६ ।। देवदेवप्रसादाच्च क्षिप्रं फलमवाप्यते । यदि मनुष्य उकताहटमें न पड़कर दृढ़ एवं प्रबल निश्चयके साथ प्रयत्न करता रहे तो देवाधिदेव भगवान् शिवके प्रसादसे शीघ्र ही मनोवांछित फल पा लेता है ।। ११६ १/२ ।। पश्य दैवस्य संयोगं बान्धवानां च निश्चयम् ।। ११७ ।। कृपणानां तु रुदतां कृतमश्रुप्रमार्जनम् । पश्य चाल्पेन कालेन निश्चयान्वेषणेन च ।। ११८ ।। देखो, दैवका संयोग और उन बन्धु-बान्धवोंका दृढ़ निश्चय; जिससे दीनतापूर्वक रोते हुए उन मनुष्योंका आँसू थोड़े ही समयमें पोंछा गया। यह उनके निश्चयपूर्वक किये हुए अनुसंधान एवं प्रयत्नका फल है ।। ११७-११८ ।। प्रसादं शङ्करात् प्राप्य दुःखिताः सुखमाप्नुवन् । ते विस्मिताः प्रहृष्टाश्च पुत्रसंजीवनात् पुनः ।। ११९ ।। भगवान् शंकरकी कृपासे उन दुखी मनुष्योंने सुख प्राप्त कर लिया। पुत्रके पुनर्जीवनसे वे आश्चर्यचकित एवं प्रसन्न हो उठे ।। ११९ ।। बभूवुर्भरतश्रेष्ठ प्रसादाच्छङ्करस्य वै । ततस्ते त्वरिता राजंस्त्यक्त्वा शोकं शिशुद्भवम् ।। १२० ।। विविशुः पुत्रमादाय नगरं हृष्टमानसाः । राजन्! भरतश्रेष्ठ! भगवान् शंकरकी कृपासे वे सब लोग तुरंत ही पुत्रशोक त्यागकर प्रसन्नचित्त हो पुत्रको साथ ले अपने नगरको चले गये ।। १२० १/२ ।। एषा बुद्धिः समस्तानां चातुर्वर्ण्ये निदर्शिता ।। १२१ ।। धर्मार्थमोक्षसंयुक्तमितिहासमिमं शुभम् ।
श्रुत्वा मनुष्यः सततमिहामुत्र च मोदते ॥ १२२ ॥
चारों वर्णोंमें उत्पन्न हुए सभी लोगोंके लिये यह बुद्धि प्रदर्शित की गयी है। धर्म, अर्थ और मोक्षसे युक्त इस शुभ इतिहासको सदा सुननेसे मनुष्य इहलोक और परलोकमें आनन्दका अनुभव करता है ॥ १२१-१२२ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि गृध्रगोमायुसंवादे कुमारसंजीवने त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें गीदड़-गोमायुका संवाद एवं मरे हुए बालकका पुनर्जीवनविषयक एक सौ तिरपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १२३ श्लोक हैं)
१५४-
चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः नारदजीका सेमल-वृक्षसे प्रशंसापूर्वक प्रश्न
युधिष्ठिर उवाच
बलिनः प्रत्यमित्रस्य नित्यमासन्नवर्तिनः । उपकारापकाराभ्यां समर्थस्योद्यतस्य च ॥ १ ॥ मोहाद् विकत्थनामात्रैरसारोऽल्पबलो लघुः । वाग्भिरप्रतिरूपाभिरभिद्रुह्य पितामह ॥ २ ॥ आत्मनो बलमास्थाय कथं वर्तेत मानवः । आगच्छतोऽतिक्रुद्धस्य तस्योद्धरणकाम्यया ॥ ३ ॥
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! जो बलवान्, नित्य निकटवर्ती, उपकार और अपकार करनेमें समर्थ तथा नित्य उद्योगशील है, ऐसे शत्रुके साथ यदि कोई अल्प बलवान्, असार एवं सभी बातोंमें छोटी हैसियत रखनेवाला मनुष्य मोहवश शेखी बघारते हुए अयोग्य बातें कहकर वैर बाँध ले और वह बलवान् शत्रु अत्यन्त कुपित हो उस दुर्बल मनुष्यको उखाड़ फेंकनेके लिये आक्रमण कर दे, तब वह आक्रान्त मनुष्य अपने ही बलका भरोसा करके उस आक्रमणकारीके साथ कैसा बर्ताव करे? (जिससे उसकी रक्षा हो सके) ॥ १—३ ॥
भीष्म उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । संवादं भरतश्रेष्ठ शाल्मलेः पवनस्य च ॥ ४ ॥
भीष्मजीने कहा—भरतश्रेष्ठ! इस विषयमें विज्ञ पुरुष वायु और सेमलवृक्षके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं ॥ ४ ॥
हिमवन्तं समासाद्य महानासीद् वनस्पतिः । वर्षपूगाभिसंवृद्धः शाखी स्कन्धी पलाशवान् ॥ ५ ॥
हिमालय पर्वतपर एक बहुत बड़ा वनस्पति था, जो बहुत वर्षोंसे बढ़कर प्रबल हो गया था। वह स्कन्ध, शाखा और पत्तोंसे खूब हरा-भरा था ॥ ५ ॥
तत्र स्म मत्तमातङ्गा घर्मार्ताः श्रमकर्शिताः । विश्राम्यन्ति महाबाहो तथान्या मृगजातयः ॥ ६ ॥
महाबाहो! उसके नीचे बहुत-से मतवाले हाथी तथा दूसरे-दूसरे पशु धूपसे पीड़ित और परिश्रमसे थकित होकर विश्राम करते थे ॥ ६ ॥
नल्वमात्रपरीणाहो घनच्छायो वनस्पतिः । सारिकाशुकसंजुष्टः पुष्पवान् फलवानपि ॥ ७ ॥
उस वृक्षकी लंबाई चार सौ हाथकी थी। छाया बड़ी सघन थी। उसपर तोते और मैनाओंके समूह बसेरा लेते थे। वह वृक्ष फल और फूल दोनोंसे ही भरा था ॥ ७ ॥ सार्थिका वणिजश्चापि तापसाश्च वनौकसः । वसन्ति तत्र मार्गस्थाः सुरम्ये नगसत्तमे ॥ ८ ॥ दल बाँधकर यात्रा करनेवाले वणिक्, वनवासी तपस्वी तथा दूसरे राहगीर भी उस रमणीय एवं श्रेष्ठ वृक्षके नीचे निवास किया करते थे ॥ ८ ॥ तस्य ता विपुलाः शाखा दृष्ट्वा स्कन्धं च सर्वशः । अभिगम्याब्रवीदेनं नारदो भरतर्षभ ॥ ९ ॥ भरतश्रेष्ठ! उस वृक्षकी बड़ी-बड़ी शाखाओं तथा मोटे तनोंको देखकर देवर्षि नारद उसके पास गये और इस प्रकार बोले— ॥ ९ ॥ अहो नु रमणीयस्त्वमहो चासि मनोहरः । प्रीयामहे त्वया नित्यं तरुप्रवर शाल्मले ॥ १० ॥ अहो! शाल्मले! तुम बड़े रमणीय और मनोहर हो। तरुप्रवर! तुमसे हमें सदा प्रसन्नता प्राप्त होती है ॥ १० ॥
अध्याय (पृष्ठ 1022)
मरे हुए ब्राह्मण-बालकपर तथा गीध एवं गीदड़पर शङ्करजीकी कृपा
सदैव शकुनास्तात मृगाश्चाथ तथा गजाः । वसन्ति तव संहृष्टा मनोहर मनोहराः ॥ ११ ॥ ‘तात! मनोहर वृक्षराज! तुम्हारी शाखाओंपर सदा ही बहुत-से पक्षी तथा नीचे अनेकानेक मृग एवं हाथी प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं ॥ ११ ॥
तव शाखा महाशाख स्कन्धांश्च विपुलांस्तथा । न वै प्रभग्नान् पश्यामि मारुतेन कथंचन ॥ १२ ॥ ‘महान् शाखाओंसे सुशोभित वनस्पते! मैं देखता हूँ कि तुम्हारी शाखाओं और मोटे तनोंको वायुदेव भी किसी तरह तोड़ नहीं सके हैं ॥ १२ ॥
किं नु ते पवनस्तात प्रीतिमानथवा सुहृत् । त्वां रक्षति सदा येन वनेऽत्र पवनो ध्रुवम् ॥ १३ ॥ ‘तात! क्या पवनदेव तुमसे किसी कारणवश विशेष प्रसन्न रहते हैं अथवा वे तुम्हारे सुहृद् हैं, जिससे इस वनमें सदा तुम्हारी निश्चितरूपसे रक्षा करते हैं ॥
भगवान् पवनः स्थानाद् वृक्षानुच्चावचानपि । पर्वतानां च शिखराण्याचालयति वेगवान् ॥ १४ ॥ ‘भगवान् वायु इतने वेगशाली हैं कि छोटे-बड़े वृक्षोंको कौन कहे, पर्वतोंके शिखरोंको भी अपने स्थानसे हिला देते हैं ॥ १४ ॥
शोषयत्येव पातालं बहन् गन्धवहः शुचिः । सरांसि सरितश्चैव सागरांश्च तथैव च ॥ १५ ॥ ‘गन्धवाही पवित्र पवन पाताल, सरोवर, सरिताओं और समुद्रोंको भी सुखा सकता है ॥ १५ ॥
संरक्षति त्वां पवनः सखित्वेन न संशयः । तस्मात् त्वं बहुशाखोऽपि पर्णवान् पुष्पवानपि ॥ १६ ॥ ‘इसमें संदेह नहीं कि वायुदेव तुम्हें अपना मित्र माननेके कारण ही तुम्हारी रक्षा करते हैं; इसीलिये तुम अनेक शाखाओंसे सम्पन्न तथा पत्ते और पुष्पोंसे हरे-भरे हो ॥ १६ ॥
इदं च रमणीयं ते प्रतिभाति वनस्पते । यदिमे विहगास्तात रमन्ते मुदितास्त्वयि ॥ १७ ॥ ‘तात वनस्पते! तुम्हारे पास यह बड़ा ही रमणीय दृश्य जान पड़ता है कि ये पक्षी तुम्हारी शाखाओंपर बड़े प्रसन्न रहकर रमण कर रहे हैं ॥ १७ ॥
एषां पृथक् समस्तानां श्रूयते मधुरस्वरः । पुष्पसम्मोदने काले वाशतां सुमनोहरम् ॥ १८ ॥ ‘वसन्त ऋतुमें अत्यन्त मनोरम बोली बोलनेवाले इन पक्षियोंका अलग-अलग तथा सबका एक साथ बड़ा मधुर स्वर सुनायी पड़ता है ॥ १८ ॥
तथेमे गर्जिता नागाः स्वयूथकुलशोभिताः ।
घर्मार्तास्त्वां समासाद्य सुखं विन्दन्ति शाल्मले ।। १९ ।।
‘शाल्मले! अपने यूथकुलसे सुशोभित ये गर्जना करते हुए गजराज धूपसे पीड़ित हो तुम्हारे पास आकर सुख पाते हैं ।। १९ ।।
तथैव मृगजातीभिरन्याभिरभिशोभसे ।
तथा सर्वाधिवासैश्च शोभसे मेरुवद्द्रुम ।। २० ।।
‘वृक्षप्रवर! इसी प्रकार दूसरी-दूसरी जातिके पशु भी तुम्हारी शोभा बढ़ा रहे हैं। तुम सबके निवास-स्थान होनेके कारण मेरुपर्वतके समान सुशोभित होते हो ।। २० ।।
ब्राह्मणैश्च तपःसिद्धैस्तापसैः श्रमणैस्तथा ।
त्रिविष्टपसमं मन्ये तवायतनमेव हि ।। २१ ।।
‘तपस्यासे शुद्ध हुए तापसों, ब्राह्मणों तथा श्रमणोंसे संयुक्त हो तुम्हारा यह स्थान मुझे स्वर्गके समान जान पड़ता है’ ।। २१ ।।
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे चतुष्पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ।। १५४ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें वायु और शाल्मलिसंवादके प्रसंगमें एक सौ चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १५४ ।।
१५५-
पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः
नारदजीका सेमल-वृक्षको उसका अहंकार देखकर फटकारना
नारद उवाच
बन्धुत्वादथवा सख्याच्छाल्मले नात्र संशयः ।
पालयत्येव सततं भीमः सर्वत्रगोऽनिलः ॥ १ ॥
**नारदजीने कहा—**शाल्मले! इसमें संशय नहीं कि तुम्हें अपना बन्धु अथवा मित्र माननेके कारण ही सर्वत्रगामी भयानक वायुदेव सदा तुम्हारी रक्षा करते हैं ॥ १ ॥
न्यग्भावं परमं वायोः शाल्मले त्वमुपागतः ।
तवाह्मस्मीति सदा येन रक्षति मारुतः ॥ २ ॥
शाल्मले! मालूम होता है, तुम वायुके सामने अत्यन्त विनम्र होकर कहते हो कि 'मैं तो आपका ही हूँ' इसीसे वह सदा तुम्हारी रक्षा करता है ॥ २ ॥
न तं पश्याम्यहं वृक्षं पर्वतं वेश्म चेदृशम् ।
यं न वायुबलाद् भग्नं पृथिव्यामिति मे मतिः ॥ ३ ॥
मैं इस भूतलपर ऐसे किसी वृक्ष, पर्वत या घरको नहीं देखता, जो वायुके बलसे भग्न न हो जाय। मेरा यही विश्वास है कि वायुदेव सबको तोड़कर गिरा सकते हैं ॥ ३ ॥
त्वं पुनः कारणैर्नूनं रक्ष्यसे शाल्मले यथा ।
वायुना सपरीवारस्तेन तिष्ठस्यसंशयम् ॥ ४ ॥
शाल्मले! कुछ ऐसे कारण अवश्य हैं, जिनसे प्रेरित होकर वायुदेव निश्चितरूपसे सपरिवार तुम्हारी रक्षा करते हैं। निस्सन्देह इसीसे यों ही खड़े रहते हो ॥
शाल्मलिरुवाच
न मे वायुः सखा ब्रह्मन् न बन्धुर्न च मे सुहृत् ।
परमेष्ठी तथा नैव येन रक्षति वानिलः ॥ ५ ॥
**सेमलने कहा—**ब्रह्मन्! वायु न तो मेरा मित्र है, न बन्धु है, न सुहृद् ही है। वह ब्रह्मा भी नहीं है, जो मेरी रक्षा करेगा ॥ ५ ॥
मम तेजो बलं भीमं वायोरपि हि नारद ।
कलामष्टादशीं प्राणैर्न मे प्राप्नोति मारुतः ॥ ६ ॥
नारद! मेरा तेज और बल वायुसे भी भयंकर है। वायु अपनी प्राणशक्तिके द्वारा मेरी अठारहवीं कलाको भी नहीं पा सकता ॥ ६ ॥
आगच्छन् परुषो वायुर्मया विष्टम्भितो बलात् ।
भञ्जन् द्रुमान् पर्वतांश्च यच्चान्यदपि किंचन ॥ ७ ॥ जिस समय वायुदेवता वृक्ष, पर्वत तथा दूसरी वस्तुओंको तोड़ता-फोड़ता हुआ मेरे पास पहुँचता है, उस समय मैं बलसे उसकी गतिको रोक देता हूँ ॥ ७ ॥ स मया बहुशो भग्नः प्रभञ्जन् वै प्रभञ्जनः । तस्मान्न बिभ्ये देवर्षे क्रुद्धादपि समीरणात् ॥ ८ ॥ देवर्षे! इस प्रकार मैंने तोड़-फोड़ करनेवाले वायुकी गतिको अनेक बार रोक दिया है; अतः वह कुपित हो जाय तो भी मुझे उससे भय नहीं है ॥ ८ ॥
नारद उवाच
शाल्मले विपरीतं ते दर्शनं नात्र संशयः । न हि वायोर्बलेनास्ति भूतं तुल्यबलं क्वचित् ॥ ९ ॥ नारदजीने कहा— शाल्मले! इस विषयमें तुम्हारी दृष्टि विपरीत है—समझ उलटी हो गयी है, इसमें संशय नहीं है; क्योंकि वायुके बलके समान किसी भी प्राणीका बल नहीं है ॥ ९ ॥ इन्द्रो यमो वैश्रवणो वरुणश्च जलेश्वरः । नैतेऽपि तुल्या मरुतः किं पुनस्त्वं वनस्पते ॥ १० ॥ वनस्पते! इन्द्र, यम, कुबेर तथा जलके स्वामी वरुण—ये भी वायुके तुल्य बलशाली नहीं हैं; फिर तुम जैसे साधारण वृक्षकी तो बात ही क्या है? ॥ १० ॥ यच्च किंचिदिह प्राणी चेष्टते शाल्मले भुवि । सर्वत्र भगवान् वायुश्चेष्टाप्राणकरः प्रभुः ॥ ११ ॥ शाल्मले! प्राणी इस पृथ्वीपर जो कुछ भी चेष्टा करता है, उस चेष्टाकी शक्ति तथा जीवन देनेवाले सर्वत्र सामर्थ्यशाली भगवान् वायु ही हैं ॥ ११ ॥ एष चेष्टयते सम्यक् प्राणिनः सम्यगायातः । असम्यगायतो भूयश्चेष्टते विकृतं नृषु ॥ १२ ॥ ये जब शरीरमें ठीक ढंगसे प्राण आदिके रूपमें विस्तारको प्राप्त होते हैं, तब समस्त प्राणियोंको चेष्टाशील बनाते हैं और जब ये ठीक ढंगसे काम नहीं करते हैं, तब प्राणियोंके शरीरमें विकृति आने लगती है ॥ १२ ॥ स त्वमेवंविधं वायुं सर्वसत्त्वभृतां वरम् । न पूजयसि पूज्यं तं किमन्यद् बुद्धिलाघवात् ॥ १३ ॥ इस प्रकार समस्त बलवानोंमें श्रेष्ठ एवं पूजनीय वायुदेवकी जो तुम पूजा नहीं करते हो, यह तुम्हारी बुद्धिकी लघुताके सिवा और क्या है ॥ १३ ॥ असारश्चापि दुर्मेधाः केवलं बहु भाषसे । क्रोधादिभिरवच्छन्नो मिथ्या वदसि शाल्मले ॥ १४ ॥
शाल्मले! तुम सारहीन और दुर्बुद्धि हो, केवल बहुत बातें बनाते हो तथा क्रोध आदि दुर्गुणोंसे प्रेरित होकर झूठ बोलते हो ॥ १४ ॥
मम रोषः समुत्पन्नस्त्वय्येवं सम्प्रभाषति ।
ब्रवीम्येष स्वयं वायोस्तव दुर्भाषितं बहु ॥ १५ ॥
तुम्हारे इस तरह बातचीत करनेसे मेरे मनमें रोष उत्पन्न हुआ है; अतः मैं स्वयं वायुके सामने तुम्हारे इन दुर्वचनोंको सुनाऊँगा ॥ १५ ॥
चन्दनैः स्यन्दनैः शालैः सरलैर्देवदारुभिः ।
वेतसैर्धन्वनाँश्चापि ये चान्ये बलवत्तराः ॥ १६ ॥
तैश्चापि नैवं दुर्बुद्धे क्षिप्तो वायुः कृतात्मभिः ।
तेऽपि जानन्ति वायोश्च बलमात्मन एव च ॥ १७ ॥
तस्मात् तं वै नमस्यन्ति श्वसनं तरुसत्तमाः ।
चन्दन, स्यन्दन (तिनिश), शाल, सरल, देवदारु, वेतस (बेत), धामिन तथा अन्य जो बलवान् वृक्ष हैं, उन जितात्मा वृक्षोंने भी कभी इस प्रकार वायु-देवपर आक्षेप नहीं किया है। दुर्बुद्धे! वे भी अपने और वायुके बलको अच्छी तरह जानते हैं; इसीलिये वे श्रेष्ठ वृक्ष वायुदेवके सामने मस्तक झुका देते हैं ॥ १६-१७ १/२ ॥
त्वं तु मोहान्न जानीषे वायोर्बलमनन्तकम् ।
एवं तस्माद् गमिष्यामि सकाशं मातरिश्वनः ॥ १८ ॥
तुम तो मोहवश वायुके अनन्त बलको कुछ समझते ही नहीं हो; अतः अब मैं यहाँसे सीधे वायुदेवके ही पास जाऊँगा ॥ १८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि पवनशाल्मलिसंवादे
पञ्चपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत आपद्धर्मपर्वमें पवन-शाल्मलिसंवादविषयक एक सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५५ ॥