महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व
Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
रथोत्तमं काञ्चनभूषिताङ्गम् ।
मसारगल्वर्कमयैर्विभङ्गैर-
विभूषितं हेमनिबद्धचक्रम् ॥ ३३ ॥
दिवाकरांशुप्रभमाशुगामिनं
विचित्रनानामणिभूषितान्तरम् ।
नवोदितं सूर्यमिव प्रतापिनं
विचित्रतार्क्ष्यध्वजिनं पताकिनम् ॥ ३४ ॥
सुग्रीवशैब्यप्रमुखैर्वराश्वै-
र्मनोजवैः काञ्चनभूषिताङ्गैः ।
संयुक्तमावेदयदच्युताय
कृताञ्जलिर्दारुको राजसिंह ॥ ३५ ॥
राजसिंह! सात्यकिका यह वचन सुनकर दारुकने मरकत, चन्द्रकान्त तथा सूर्यकान्त मणियोंकी ज्योतिर्मयी तरंगोंसे विभूषित उस उत्तम रथको, जिसका एक-एक अंग सुनहरे साजोंसे सजाया गया था तथा जिसके पहियोंपर सोनेके पत्र जड़े गये थे, जोतकर तैयार किया और हाथ जोड़कर भगवान् श्रीकृष्णको इसकी सूचना दी। वह शीघ्रगामी रथ सूर्यकी किरणोंके पड़नेसे उद्भासित हो तुरंतके उगे हुए सूर्यके समान प्रकाशित होता था, उसके भीतरी भागको नाना प्रकारकी विचित्र मणियोंसे विभूषित किया गया था। वह प्रतापी रथ विचित्र गरुड़चिह्नित ध्वजा और पताकासे सुशोभित था। उसमें सोनेके साजबाजसे सजे हुए अंगोंवाले, मनके समान वेगशाली, सुग्रीव और शैब्य आदि सुन्दर घोड़े जुते हुए थे ॥ ३३—३५ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि महापुरुषस्तवे
षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्वमें महापुरुषस्तुतिविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥
अध्याय (पृष्ठ 300)
सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः
भीष्मद्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति—भीष्मस्तवराज
जनमेजय उवाच
शरत्तल्पे शयानस्तु भरतानां पितामहः ।
कथमुत्सृष्टवान् देहं कं च योगमधारयत् ॥ १ ॥
जनमेजयने पूछा— बाणशय्यापर सोये हुए भरतवंशियोंके पितामह भीष्मजीने किस प्रकार अपने शरीरका त्याग किया और उस समय उन्होंने किस योगकी धारणा की? ॥ १ ॥
वैशम्पायन उवाच
शृणुष्वावहितो राजन् शुचिर्भूत्वा समाहितः ।
भीष्मस्य कुरुशार्दूल देहोत्सर्गं महात्मनः ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— राजन्! कुरुश्रेष्ठ! तुम सावधान, पवित्र और एकाग्रचित्त होकर महात्मा भीष्मके देहत्यागका वृत्तान्त सुनो ॥ २ ॥
(शुक्लपक्षस्य चाष्टम्यां माघमासस्य पार्थिव ।
प्राजापत्ये च नक्षत्रे मध्यं प्राप्ते दिवाकरे ॥)
निवृत्तमात्रे त्वयन उत्तरे वै दिवाकरे ।
समावेशयदात्मानमात्मन्येव समाहितः ॥ ३ ॥
राजन्! जब दक्षिणायन समाप्त हुआ और सूर्य उत्तरायणमें आ गये, तब माघमासके शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको रोहिणीनक्षत्रमें मध्याह्नके समय भीष्मजीने ध्यान-मग्न होकर अपने मनको परमात्मामें लगा दिया ॥ ३ ॥
विकीर्णांशुरादित्यो भीष्मः शरशतैश्चितः ।
शुशुभे परया लक्ष्म्या वृतो ब्राह्मणसत्तमैः ॥ ४ ॥
चारों ओर अपनी किरणें बिखेरनेवाले सूर्यके समान सैकड़ों बाणोंसे छिदे हुए भीष्म उत्तम शोभासे सुशोभित होने लगे, अनेकानेक श्रेष्ठ ब्राह्मण उन्हें घेरकर बैठे थे ॥ ४ ॥
व्यासेन वेदविदुषा नारदेन सुरर्षिणा ।
देवस्थानेन वात्स्येन तथाश्मकसुमन्तुना ॥ ५ ॥
तथा जैमिनिना चैव पैलेन च महात्मना ।
शाण्डिल्यदेवलाभ्यां च मैत्रेयेण च धीमता ॥ ६ ॥
असितेन वसिष्ठेन कौशिकेन महात्मना ।
हारीतलोमशाभ्यां च तथाऽऽत्रेयेण धीमता ॥ ७ ॥
बृहस्पतिश्च शुक्रश्च च्यवनश्च महामुनिः ।
सनत्कुमारः कपिलो वाल्मीकिस्तुम्बुरुः कुरुः ॥ ८ ॥
मौद्गल्यो भार्गवो रामस्तृणबिन्दुर्महामुनिः ।
पिप्पलादोऽथ वायुश्च संवर्तः पुलहः कचः ॥ ९ ॥
काश्यपश्च पुलस्त्यश्च क्रतुर्दक्षः पराशरः ।
मरीचिरंगिराः काश्यो गौतमो गालवो मुनिः ॥ १० ॥
धौम्यो विभाण्डो माण्डव्यो धौम्रः कृष्णानुभौतिकः ।
उलूकः परमो विप्रो मार्कण्डेयो महामुनिः ॥ ११ ॥
भास्करिः पूरणः कृष्णः सूतः परमधार्मिकः ।
एतैश्चान्यैर्मुनिगणैर्महाभागैर्महात्मभिः ॥ १२ ॥
श्रद्धादमशमोपेतैर्वृतश्चन्द्र इव ग्रहैः ।
वेदोंके ज्ञाता व्यास, देवर्षि नारद, देवस्थान, वात्स्य, अश्मक, सुमन्तु, जैमिनि, महात्मा पैल, शाण्डिल्य, देवल, बुद्धिमान् मैत्रेय, असित, वसिष्ठ, महात्मा कौशिक (विश्वामित्र), हारीत, लोमश, बुद्धिमान् दत्तात्रेय, बृहस्पति, शुक्र, महामुनि च्यवन, सनत्कुमार, कपिल, वाल्मीकि, तुम्बुरु, कुरु, मौद्गल्य, भृगुवंशी परशुराम, महामुनि तृणबिन्दु, पिप्पलाद, वायु, संवर्त, पुलह, कच, कश्यप, पुलस्त्य, क्रतु, दक्ष, पराशर, मरीचि, अंगिरा, काश्य, गौतम, गालव मुनि, धौम्य, विभाण्ड, माण्डव्य, धौम्र, कृष्णानुभौतिक, श्रेष्ठ ब्राह्मण उलूक, महामुनि मार्कण्डेय, भास्करि, पूरण, कृष्ण और परम धार्मिक सूत—ये तथा और भी बहुत-से सौभाग्यशाली महात्मा मुनि, जो श्रद्धा, शम, दम आदि गुणोंसे सम्पन्न थे, भीष्मजीको घेरे हुए थे। इन ऋषियोंके बीचमें भीष्मजी ग्रहोंसे घिरे हुए चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे॥ ५—१२ १/२ ॥
भीष्मस्तु पुरुषव्याघ्रः कर्मणा मनसा गिरा ॥ १३ ॥
शरतल्पगतः कृष्णं प्रदध्यौ प्राञ्जलिः शुचिः ।
पुरुषसिंह भीष्म शरशय्यापर ही पड़े-पड़े हाथ जोड़ पवित्र भावसे मन, वाणी और क्रियाद्वारा भगवान् श्रीकृष्णका ध्यान करने लगे ॥ १३ १/२ ॥
स्वरेण हृष्टपुष्टेन तुष्टाव मधुसूदनम् ॥ १४ ॥
योगेश्वरं पद्मनाभं विष्णुं जिष्णुं जगत्पतिम् ।
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा वाग्विदां प्रवरः प्रभुः ॥ १५ ॥
भीष्मः परमधर्मात्मा वासुदेवमथास्तुवत् ।
ध्यान करते-करते वे हृष्ट-पुष्ट स्वरसे भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करने लगे। वाग्वेत्ताओंमें श्रेष्ठ, शक्तिशाली, परम धर्मात्मा भीष्मने हाथ जोड़कर योगेश्वर, पद्मनाभ, सर्वव्यापी, विजयशील जगदीश्वर वासुदेवकी इस प्रकार स्तुति आरम्भ की ॥ १४-१५ १/२ ॥
भीष्म उवाच
आरिराधयिषुः कृष्णं वाचं जिगदिषामि याम् ॥ १६ ॥
तया व्याससमासिन्या प्रीयतां पुरुषोत्तमः ।
**भीष्मजी बोले—**मैं श्रीकृष्णके आराधनकी इच्छा मनमें लेकर जिस वाणीका प्रयोग करना चाहता हूँ, वह विस्तृत हो या संक्षिप्त, उसके द्वारा वे पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर प्रसन्न हों ॥ १६ १/२ ॥
शुचिं शुचिपदं हंसं तत्पदं परमेष्ठिनम् ॥ १७ ॥
युक्त्या सर्वात्मनाऽऽत्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ।
जो स्वयं शुद्ध हैं, जिनकी प्राप्तिका मार्ग भी शुद्ध है, जो हंसस्वरूप, तत् पदके लक्ष्यार्थ परमात्मा और प्रजापालक परमेष्ठी हैं, मैं सब ओरसे सम्बन्ध तोड़ केवल उन्हींसे नाता जोड़कर सब प्रकारसे उन्हीं सर्वात्मा श्रीकृष्णकी शरण लेता हूँ ॥ १७ १/२ ॥
अनाद्यन्तं परं ब्रह्म न देवा नर्षयो विदुः ॥ १८ ॥
एको यं वेद भगवान् धाता नारायणो हरिः ।
उनका न आदि है न अन्त। वे ही परब्रह्म परमात्मा हैं। उनको न देवता जानते हैं न ऋषि। एकमात्र सबका धारण-पोषण करनेवाले ये भगवान् श्रीनारायण हरि ही उन्हें जानते हैं ॥ १८ १/२ ॥
नारायणादृषिगणास्तथा सिद्धमहोरगाः ॥ १९ ॥
देवा देवर्षयश्चैव यं विदुः परमव्ययम् ।
नारायणसे ही ऋषिगण, सिद्ध, बड़े-बड़े नाग, देवता तथा देवर्षि भी उन्हें अविनाशी परमात्माके रूपमें जानने लगे हैं ॥ १९ १/२ ॥
देवदानवगन्धर्वा यक्षराक्षसपन्नगाः ॥ २० ॥
यं न जानन्ति को ह्येष कुतो वा भगवानिति ।
देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस और नाग भी जिनके विषयमें यह नहीं जानते हैं कि ‘ये भगवान् कौन हैं तथा कहाँसे आये हैं?’ ॥ २० १/२ ॥
यस्मिन् विश्वानि भूतानि तिष्ठन्ति च विशन्ति च ॥ २१ ॥
गुणभूतानि भूतेशे सूत्रे मणिगणा इव ।
उन्हींमें सम्पूर्ण प्राणी स्थित हैं और उन्हींमें उनका लय होता है। जैसे डोरेमें मनके पिरोये होते हैं, उसी प्रकार उन भूतेश्वर परमात्मामें समस्त त्रिगुणात्मक भूत पिरोये हुए हैं ॥ २१ १/२ ॥
यस्मिन् नित्ये तते तन्तौ दृढे स्रगिव तिष्ठति ॥ २२ ॥
सदसद्ग्रथितं विश्वं विश्वाङ्गे विश्वकर्मणि ।
भगवान् सदा नित्य विद्यमान (कभी नष्ट न होनेवाले) और तने हुए एक सुदृढ़ सूतके समान हैं। उनमें यह कार्य-कारणरूप जगत् उसी प्रकार गुँथा हुआ है, जैसे सूतमें फूलकी माला। यह सम्पूर्ण विश्व उनके ही श्रीअंगमें स्थित है; उन्होंने ही इस विश्वकी सृष्टि की है ।। २२½ ।।
हरिं सहस्रशिरसं सहस्रचरणेक्षणम् ।। २३ ।। सहस्रबाहुमुकुटं सहस्रवदनोज्ज्वलम् । उन श्रीहरिके सहस्रों सिर, सहस्रों चरण और सहस्रों नेत्र हैं, वे सहस्रों भुजाओं, सहस्रों मुकुटों तथा सहस्रों मुखोंसे देदीप्यमान रहते हैं ।। २३½ ।।
प्राहुर्नारायणं देवं यं विश्वस्य परायणम् ।। २४ ।। अणीयसामणीयांसं स्थविष्ठं च स्थवीयसाम् । गरीयसां गरिष्ठं च श्रेष्ठं च श्रेयसामपि ।। २५ ।। वे ही इस विश्वके परम आधार हैं। इन्हींको नारायणदेव कहते हैं। वे सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म और स्थूलसे भी स्थूल हैं। वे भारी-से-भारी और उत्तमसे भी उत्तम हैं ।।
यं वाकेष्वनुवाकेषु निषत्सूपनिषत्सु च । गृणन्ति सत्यकर्माणं सत्यं सत्येषु सामसु ।। २६ ।। वाकों¹, और अनुवाकोंमें², निषदों³, और उपनिषदोंमें⁴ तथा सच्ची बात बतानेवाले साममन्त्रोंमें उन्हींको सत्य और सत्यकर्मा कहते हैं ।। २६ ।।
चतुर्भिश्चतुरात्मानं सत्त्वस्थं सात्वतां पतिम् । यं दिव्यैर्देवमर्चन्ति गुह्यैः परमनामभिः ।। २७ ।। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार दिव्य गोपनीय और उत्तम नामोंद्वारा ब्रह्म, जीव, मन और अहंकार—इन चार स्वरूपोंमें प्रकट हुए उन्हीं भक्तप्रतिपालक भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा की जाती है, जो सबके अन्तःकरणमें विद्यमान हैं ।। २७ ।।
यस्मिन् नित्यं तपस्तप्तं यदङ्गेष्वनुतिष्ठति । सर्वात्मा सर्ववित् सर्वः सर्वज्ञः सर्वभावनः ।। २८ ।। भगवान् वासुदेवकी प्रसन्नताके लिये ही नित्य तपका अनुष्ठान किया जाता है; क्योंकि वे सबके हृदयोंमें विराजमान हैं। वे सबके आत्मा, सबको जाननेवाले, सर्वस्वरूप, सर्वज्ञ और सबको उत्पन्न करनेवाले हैं ।।
यं देवं देवकी देवी वसुदेवादजीजनत् । भौमस्य ब्रह्मणो गुप्त्यै दीप्तमग्निमिवारणिः ।। २९ ।। जैसे अरणि प्रज्वलित अग्निको प्रकट करती है, उसी प्रकार देवकीदेवीने इस भूतलपर रहनेवाले ब्राह्मणों, वेदों और यज्ञोंकी रक्षाके लिये उन भगवान्को वसुदेवजीके तेजसे प्रकट
किया था॥ २९॥ यमनन्यो व्यपेताशीरात्मानं वीतकल्मषम् । दृष्ट्यानन्त्याय गोविन्दं पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ ३० ॥ अतिवाग्विन्द्रकर्माणमतिसूर्यातितेजसम् । अतिबुद्धीन्द्रियात्मानं तं प्रपद्ये प्रजापतिम् ॥ ३१ ॥ सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके अनन्यभावसे स्थित रहनेवाला साधक मोक्षके उद्देश्यसे अपने विशुद्ध अन्तःकरणमें जिन पापरहित शुद्ध-बुद्ध परमात्मा गोविन्दका ज्ञानदृष्टिसे साक्षात्कार करता है, जिनका पराक्रम वायु और इन्द्रसे बहुत बढ़कर है, जो अपने तेजसे सूर्यको भी तिरस्कृत कर देते हैं तथा जिनके स्वरूपतक इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी भी पहुँच नहीं हो पाती, उन प्रजापालक परमेश्वरकी मैं शरण लेता हूँ॥ ३०-३१॥ पुराणे पुरुषं प्रोक्तं ब्रह्म प्रोक्तं युगादिषु । क्षये संकर्षणं प्रोक्तं तमुपास्यमुपास्महे ॥ ३२ ॥ पुराणोंमें जिनका 'पुरुष' नामसे वर्णन किया गया है, जो युगोंके आरम्भमें 'ब्रह्म' और युगान्तमें 'संकर्षण' कहे गये हैं, उन उपास्य परमेश्वरकी हम उपासना करते हैं॥ ३२॥ यमेकं बहुधाऽऽत्मानं प्रादुर्भूतमधोक्षजम् । नान्यभक्ताः क्रियावन्तो यजन्ते सर्वकामदम् ॥ ३३ ॥ यमाहुर्जगतः कोशं यस्मिन् संनिहिताः प्रजाः । यस्मिँल्लोकाः स्फुरन्तीमे जले शकुनयो यथा ॥ ३४ ॥ ऋतमेकाक्षरं ब्रह्म यत् तत् सदसतः परम् । अनादिमध्यपर्यन्तं न देवा नर्षयो विदुः ॥ ३५ ॥ यं सुरासुरगन्धर्वाः सिद्धा ऋषिमहोरगाः । प्रयता नित्यमर्चन्ति परमं दुःखभेषजम् ॥ ३६ ॥ अनादिनिधनं देवमात्मयोनिं सनातनम् । अप्रेक्ष्यमनभिज्ञेयं हरिं नारायणं प्रभुम् ॥ ३७ ॥ जो एक होकर भी अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हैं, जो इन्द्रियों और उनके विषयोंसे ऊपर उठे होनेके कारण 'अधोक्षज' कहलाते हैं, उपासकोंकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हैं, यज्ञादि कर्म और पूजनमें लगे हुए अनन्य भक्त जिनका यजन करते हैं, जिन्हें जगत्का कोषागार कहा जाता है, जिनमें सम्पूर्ण प्रजाएँ स्थित हैं, पानीके ऊपर तैरनेवाले जलपक्षियोंकी तरह जिनके ही ऊपर इस सम्पूर्ण जगत्की चेष्टाएँ हो रही हैं, जो परमार्थ सत्यस्वरूप और एकाक्षर ब्रह्म (प्रणव) हैं, सत् और असत्से विलक्षण हैं, जिनका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, जिन्हें न देवता ठीक-ठीक जानते हैं और न ऋषि, अपने मन और इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए सम्पूर्ण देवता, असुर, गन्धर्व, सिद्ध, ऋषि, बड़े-बड़े नागगण जिनकी सदा पूजा किया करते हैं, जो दुःखरूपी रोगकी सबसे बड़ी ओषधि हैं, जन्म-
मरणसे रहित, स्वयम्भू एवं सनातन देवता हैं, जिन्हें इन चर्म-चक्षुओंसे देखना और बुद्धिके द्वारा सम्पूर्णरूपसे जानना असम्भव है, उन भगवान् श्रीहरि नारायण देवकी मैं शरण लेता हूँ।। ३३—३७।। यं वै विश्वस्य कर्तारं जगतस्तस्थुषां पतिम्। वदन्ति जगतोऽध्यक्षमक्षरं परमं पदम् ।। ३८ ।। जो इस विश्वके विधाता और चराचर जगत्के स्वामी हैं, जिन्हें संसारका साक्षी और अविनाशी परमपद कहते हैं, उन परमात्माकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ।। हिरण्यवर्णं यं गर्भमदितेर्दैत्यनाशनम् । एकं द्वादशधा जज्ञे तस्मै सूर्यात्मने नमः ।। ३९ ।। जो सुवर्णके समान कान्तिमान्, अदितिके गर्भसे उत्पन्न, दैत्योंके नाशक तथा एक होकर भी बारह रूपोंमें प्रकट हुए हैं, उन सूर्यस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है ।। ३९ ।। शुक्ले देवान् पितॄन् कृष्णे तर्पयत्यमृतेन यः । यश्च राजा द्विजातीनां तस्मै सोमात्मने नमः ।। ४० ।। जो अपनी अमृतमयी कलाओंसे शुक्लपक्षमें देवताओंको और कृष्णपक्षमें पितरोंको तृप्त करते हैं तथा जो सम्पूर्ण द्विजोंके राजा हैं, उन सोमस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ।। ४० ।। (हुताशनमुखैर्देवैर्धार्यते सकलं जगत् । हविःप्रथमभोक्ता यस्तस्मै होत्रात्मने नमः ॥) अग्नि जिनके मुख हैं, वे देवता सम्पूर्ण जगत्को धारण करते हैं, जो हविष्यके सबसे पहले भोक्ता हैं, उन अग्निहोत्रस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है ।। महत्तस्तमसः पारे पुरुषं ह्यतितेजसम् । यं ज्ञात्वा मृत्युमत्येति तस्मै ज्ञेयात्मने नमः ।। ४१ ।। जो अज्ञानमय महान् अन्धकारसे परे और ज्ञानालोकसे अत्यन्त प्रकाशित होनेवाले आत्मा हैं, जिन्हें जान लेनेपर मनुष्य मृत्युसे सदाके लिये छूट जाता है, उन ज्ञेयरूप परमेश्वरको नमस्कार है ।। ४१ ।। यं बृहन्तं बृहत्युक्थे यमग्नौ यं महाध्वरे । यं विप्रसंघा गायन्ति तस्मै वेदात्मने नमः ।। ४२ ।। उक्थनामक बृहत् यज्ञके समय, अग्न्याधानकालमें तथा महायागमें ब्राह्मणवृन्द जिनका ब्रह्मके रूपमें स्तवन करते हैं, उन वेदस्वरूप भगवान्को नमस्कार है ।। ४२ ।। ऋग्यजुःसामधामानं दशार्धहविरात्मकम् । यं सप्ततन्तुं तन्वन्ति तस्मै यज्ञात्मने नमः ।। ४३ ।। ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद जिसके आश्रय हैं, पाँच प्रकारका हविष्य जिसका स्वरूप है, गायत्री आदि सात छन्द ही जिसके सात तन्तु हैं, उस यज्ञके रूपमें प्रकट हुए
परमात्माको प्रणाम है ॥ ४३ ॥ चतुर्भिborder चतुर्भिborder द्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । हूयते च पुनर्द्वाभ्यां तस्मै होमात्मने नमः ॥ ४४ ॥ चार¹, चार², दो³, पाँच⁴ और दो⁵—इन सत्रह अक्षरोंवाले मन्त्रोंसे जिन्हें हविष्य अर्पण किया जाता है, उन होमस्वरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ४४ ॥ यः सुपर्णा यजुर्नामच्छन्दोगात्रस्त्रिवृच्छिराः । रथन्तरं बृहत् साम तस्मै स्तोत्रात्मने नमः ॥ ४५ ॥ जो 'यजुः' नाम धारण करनेवाले वेदरूपी पुरुष हैं, गायत्री आदि छन्द जिनके हाथ-पैर आदि अवयव हैं, यज्ञ ही जिनका मस्तक है तथा 'रथन्तर' और 'बृहत्' नामक साम ही जिनकी सान्त्वनाभरी वाणी है, उन स्तोत्ररूपी भगवान्को प्रणाम है ॥ ४५ ॥ यः सहस्रसमे सत्रे जज्ञे विश्वसृजामृषिः । हिरण्यपक्षः शकुनिस्तस्मै हंसात्मने नमः ॥ ४६ ॥ जो ऋषि हजार वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले प्रजापतियोंके यज्ञमें सोनेकी पाँखोंवाले पक्षीके रूपमें प्रकट हुए थे, उन हंसरूपधारी परमेश्वरको प्रणाम है ॥ ४६ ॥ पादाङ्गं संधिपर्वाणं स्वरव्यञ्जनभूषणम् । यमाहुरक्षरं दिव्यं तस्मै वागात्मने नमः ॥ ४७ ॥ पदोंके समूह जिनके अंग हैं, सन्धि जिनके शरीरकी जोड़ हैं, स्वर और व्यंजन जिनके लिये आभूषणका काम देते हैं तथा जिन्हें दिव्य अक्षर कहते हैं, उन परमेश्वरको वाणीके रूपमें नमस्कार है ॥ ४७ ॥ यज्ञाङ्गो यो वराहो वै भूत्वा गामुज्जहार ह । लोकत्रयहितार्थाय तस्मै वीर्यात्मने नमः ॥ ४८ ॥ जिन्होंने तीनों लोकोंका हित करनेके लिये यज्ञमय वराहका स्वरूप धारण करके इस पृथ्वीको रसातलसे ऊपर उठाया था, उन वीर्यस्वरूप भगवान्को प्रणाम है ॥ यः शेते योगमास्थाय पर्यङ्के नागभूषिते । फणासहस्ररचिते तस्मै निद्रात्मने नमः ॥ ४९ ॥ जो अपनी योगमायाका आश्रय लेकर शेषनागके हजार फनोंसे बने हुए पलंगपर शयन करते हैं, उन निद्रास्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ ४९ ॥ (विश्वे च मरुतश्चैव रुद्रादित्याश्विनावपि । वसवः सिद्धसाध्याश्च तस्मै देवात्मने नमः ॥ विश्वेदेव, मरुद्गण, रुद्र, आदित्य, अश्विनीकुमार, वसु, सिद्ध और साध्य—ये सब जिनकी विभूतियाँ हैं, उन देवस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ अव्यक्तबुद्ध्यहंकारमनोबुद्धीन्द्रियाणि च । तन्मात्राणि विशेषाश्च तस्मै तत्त्वात्मने नमः ॥
अव्यक्त प्रकृति, बुद्धि (महत्तत्त्व), अहंकार, मन, ज्ञानेन्द्रियाँ, तन्मात्राएँ और उनका कार्य—वे सब जिनके ही स्वरूप हैं, उन तत्त्वमय परमात्माको नमस्कार है ।।
भूतं भव्यं भविष्यच्च भूतादिप्रभवाप्ययः ।
योऽग्रजः सर्वभूतानां तस्मै भूतात्मने नमः ।।
जो भूत, वर्तमान और भविष्य—कालरूप हैं, जो भूत आदिकी उत्पत्ति और प्रलयके कारण हैं, जिन्हें सम्पूर्ण प्राणियोंका अग्रज बताया गया है, उन भूतात्मा परमेश्वरको नमस्कार है ।।
यं हि सूक्ष्मं विचिन्वन्ति परं सूक्ष्मविदो जनाः ।
सूक्ष्मात् सूक्ष्मं च यद् ब्रह्म तस्मै सूक्ष्मात्मने नमः ।।
सूक्ष्म तत्त्वको जाननेवाले ज्ञानी पुरुष जिस परम सूक्ष्म तत्त्वका अनुसंधान करते रहते हैं, जो सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है, वह ब्रह्म जिनका स्वरूप है, उन सूक्ष्मात्माको नमस्कार है ।।
मत्स्यो भूत्वा विरिञ्चाय येन वेदाः समाहृताः ।
रसातलगतः शीघ्रं तस्मै मत्स्यात्मने नमः ।।
जिन्होंने मत्स्य-शरीर धारण करके रसातलमें जाकर नष्ट हुए सम्पूर्ण वेदोंको ब्रह्माजीके लिये शीघ्र ला दिया था, उन मत्स्यरूपधारी भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है ।।
मन्दराद्रिर्धृतो येन प्राप्ते ह्यमृतमन्थने ।
अतिकर्कशदेहाय तस्मै कूर्मात्मने नमः ।।
जिन्होंने अमृतके लिये समुद्रमन्थनके समय अपनी पीठपर मन्दराचल पर्वतको धारण किया था, उन अत्यन्त कठोर देहधारी कच्छपरूप भगवान् श्रीकृष्णको नमस्कार है ।।
वाराहं रूपमास्थाय महीं सवनपर्वताम् ।
उद्धृत्यैकदंष्ट्रेण तस्मै क्रोडात्मने नमः ।।
जिन्होंने वाराहरूप धारण करके अपने एक दाँतसे वन और पर्वतोंसहित समूची पृथ्वीका उद्धार किया था, उन वाराहरूपधारी भगवान्को नमस्कार है ।।
नारसिंहवपुः कृत्वा सर्वलोकभयंकरम् ।
हिरण्यकशिपुं जघ्ने तस्मै सिंहात्मने नमः ।।
जिन्होंने नृसिंहरूप धारण करके सम्पूर्ण जगत्के लिये भयंकर हिरण्यकशिपु नामक राक्षसका वध किया था, उन नृसिंहस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ।।
वामनं रूपमास्थाय बलिं संयम्य मायया ।
त्रैलोक्यं क्रान्तवान् यस्तु तस्मै क्रान्तात्मने नमः ।।
जिन्होंने वामनरूप धारण करके मायाद्वारा बलिको बाँधकर सारी त्रिलोकीको अपने पैरोंसे नाप लिया था, उन क्रान्तिकारी वामनरूपधारी भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम है ।।
जमदग्निसुतो भूत्वा रामः शस्त्रभृतां वरः ।
महीं निःक्षत्रियां चक्रे तस्मै रामात्मने नमः ।।
जिन्होंने शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ जमदग्निकुमार परशुरामका रूप धारण करके इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे हीन कर दिया, उन परशुरामस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ।। त्रिःसप्तकृत्वो यश्चैको धर्मे व्युत्क्रान्तगौरवान् । जघान क्षत्रियान् संख्ये तस्मै क्रोधात्मने नमः ॥ जिन्होंने अकेले ही धर्मके प्रति गौरवका उल्लंघन करनेवाले क्षत्रियोंका युद्धमें इक्कीस बार संहार किया, उन क्रोधात्मा परशुरामको नमस्कार है ।। रामो दाशरथिर्भूत्वा पुलस्त्यकुलनन्दनम् । जघान रावणं संख्ये तस्मै क्षत्रात्मने नमः ॥ जिन्होंने दशरथनन्दन श्रीरामका रूप धारण करके युद्धमें पुलस्त्यकुलनन्दन रावणका वध किया था, उन क्षत्रियात्मा श्रीरामस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ।। यो हली मुसली श्रीमान् नीलाम्बरधरः स्थितः । रामाय रौहिणेयाय तस्मै भोगात्मने नमः ॥ जो सदा हल, मूसल धारण किये अद्भुत शोभासे सम्पन्न हो रहे हैं, जिनके श्रीअंगोंपर नील वस्त्र शोभा पाता है, उन शेषावतार रोहिणीनन्दन रामको नमस्कार है ।। शङ्खिने चक्रिणे नित्यं शार्ङ्गिणे पीतवाससे । वनमालाधरायैव तस्मै कृष्णात्मने नमः ॥ जो शंख, चक्र, शार्ङ्गधनुष, पीताम्बर और वनमाला धारण करते हैं, उन श्रीकृष्णस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ।। वसुदेवसुतः श्रीमान् क्रीडितो नन्दगोकुले । कंसस्य निधनार्थाय तस्मै क्रीडात्मने नमः ॥ जो कंसवधके लिये वसुदेवके शोभाशाली पुत्रके रूपमें प्रकट हुए और नन्दके गोकुलमें भाँति-भाँतिकी लीलाएँ करते रहे, उन लीलामय श्रीकृष्णको नमस्कार है ।। वासुदेवत्वमागम्य यदोर्वंशसमुद्भवः । भूभारहरणं चक्रे तस्मै कृष्णात्मने नमः ॥ जिन्होंने यदुवंशमें प्रकट हो वासुदेवके रूपमें आकर पृथ्वीका भार उतारा है, उन श्रीकृष्णात्मा श्रीहरिको नमस्कार है ।। सारथ्यमर्जुनस्याजौ कुर्वन् गीतामृतं ददौ । लोकत्रयोपकाराय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥ जिन्होंने अर्जुनका सारथित्व करते समय तीनों लोकोंके उपकारके लिये गीता-ज्ञानमय अमृत प्रदान किया था, उन ब्रह्मात्मा श्रीकृष्णको नमस्कार है ।। दानवांस्तु वशे कृत्वा पुनर्बुद्धत्वमागतः । सर्गस्य रक्षणार्थाय तस्मै बुद्धात्मने नमः ॥
जो सृष्टिकी रक्षाके लिये दानवोंको अपने अधीन करके पुनः बुद्धभावको प्राप्त हो गये, उन बुद्धस्वरूप श्रीहरिको नमस्कार है ॥
हनिष्यति कलौ प्राप्ते म्लेच्छांस्तुरगवाहनः ।
धर्मसंस्थापको यस्तु तस्मै कल्क्यात्मने नमः ॥
जो कलियुग आनेपर घोड़ेपर सवार हो धर्मकी स्थापनाके लिये म्लेच्छोंका वध करेंगे, उन कल्किरूप श्रीहरिको नमस्कार है ॥
तारामये कालनेमिं हत्वा दानवपुङ्गवम् ।
ददौ राज्यं महेन्द्राय तस्मै मुख्यात्मने नमः ॥
जिन्होंने तारामय संग्राममें दानवराज कालनेमिका वध करके देवराज इन्द्रको सारा राज्य दे दिया था, उन मुख्यात्मा श्रीहरिको नमस्कार है ॥
यः सर्वप्राणिनां देहे साक्षिभूतो ह्यवस्थितः ।
अक्षरः क्षरमाणानां तस्मै साक्ष्यात्मने नमः ॥
जो समस्त प्राणियोंके शरीरमें साक्षीरूपसे स्थित हैं तथा सम्पूर्ण क्षर (नाशवान्) भूतोंमें अक्षर (अविनाशी) स्वरूपसे विराजमान हैं, उन साक्षी परमात्माको नमस्कार है ॥
नमोऽस्तु ते महादेव नमस्ते भक्तवत्सल ।
सुब्रह्मण्य नमस्तेऽस्तु प्रसीद परमेश्वर ॥
अव्यक्तव्यक्तरूपेण व्याप्तं सर्वं त्वया विभो ।
महादेव! आपको नमस्कार है। भक्तवत्सल! आपको नमस्कार है। सुब्रह्मण्य (विष्णु)! आपको नमस्कार है। परमेश्वर! आप मुझपर प्रसन्न हों। प्रभो! आपने अव्यक्त और व्यक्तरूपसे सम्पूर्ण विश्वको व्याप्त कर रखा है ॥
नारायणं सहस्राक्षं सर्वलोकमहेश्वरम् ॥
हिरण्यनाभं यज्ञाङ्गममृतं विश्वतोमुखम् ।
प्रपद्ये पुण्डरीकाक्षं प्रपद्ये पुरुषोत्तमम् ॥
मैं सहस्रों नेत्र धारण करनेवाले, सर्वलोकमहेश्वर, हिरण्यनाभ, यज्ञाङ्गस्वरूप, अमृतमय, सब ओर मुखवाले और कमलनयन पुरुषोत्तम श्रीनारायणदेवकी शरण लेता हूँ ॥
सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममङ्गलम् ।
येषां हृदिस्थो देवेशो मङ्गलायतनं हरिः ॥
जिनके हृदयमें मंगलभवन देवेश्वर श्रीहरि विराजमान हैं, उनका सभी कार्योंमें सदा मंगल ही होता है—कभी किसी भी कार्यमें अमंगल नहीं होता ॥
मङ्गलं भगवान् विष्णुर्मङ्गलं मधुसूदनः ।
मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो मङ्गलं गरुडध्वजः ॥)
भगवान् विष्णु मंगलमय हैं, मधुसूदन मंगलमय हैं, कमलनयन मंगलमय हैं और गरुडध्वज मंगलमय हैं ।।
यस्तनोति सतां सेतुमृतेनामृतयोनिना ।
धर्मार्थव्यवहाराङ्गैस्तस्मै सत्यात्मने नमः ।। ५० ।।
जिनका सारा व्यवहार केवल धर्मके ही लिये है, उन वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा जो मोक्षके साधनभूत वैदिक उपायोंसे काम लेकर संतोंकी धर्म-मर्यादाका प्रसार करते हैं, उन सत्यस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ।।
यं पृथग्धर्मचरणाः पृथग्धर्मफलैषिणः ।
पृथग्धर्मैः समर्चन्ति तस्मै धर्मात्मने नमः ।। ५१ ।।
जो भिन्न-भिन्न धर्मोंका आचरण करके अलग-अलग उनके फलोंकी इच्छा रखते हैं, ऐसे पुरुष पृथक् धर्मोंके द्वारा जिनकी पूजा करते हैं, उन धर्मस्वरूप भगवान्को प्रणाम है ।। ५१ ।।
यतः सर्वे प्रसूयन्ते ह्यनङ्गात्माङ्गदेहिनः ।
उन्मादः सर्वभूतानां तस्मै कामात्मने नमः ।। ५२ ।।
जिस अनङ्गकी प्रेरणासे सम्पूर्ण अंगधारी प्राणियोंका जन्म होता है, जिससे समस्त जीव उन्मत्त हो उठते हैं, उस कामके रूपमें प्रकट हुए परमेश्वरको नमस्कार है ।। ५२ ।।
यं च व्यक्तस्थमव्यक्तं विचिन्वन्ति महर्षयः ।
क्षेत्रे क्षेत्रज्ञमासीनं तस्मै क्षेत्रात्मने नमः ।। ५३ ।।
जो स्थूल जगत्में अव्यक्त रूपसे विराजमान है, बड़े-बड़े महर्षि जिसके तत्त्वका अनुसंधान करते रहते हैं, जो सम्पूर्ण क्षेत्रोंमें क्षेत्रज्ञके रूपमें बैठा हुआ है, उस क्षेत्ररूपी परमात्माको प्रणाम है ।। ५३ ।।
यं त्रिधाऽऽत्मानमात्मस्थं वृतं षोडशभिर्गुणैः ।
प्राहुः सप्तदशं सांख्यास्तस्मै सांख्यात्मने नमः ।। ५४ ।।
जो सत्, रज और तम—इन तीन गुणोंके भेदसे त्रिविध प्रतीत होते हैं, गुणोंके कार्यभूत सोलह विकारोंसे आवृत्त होनेपर भी अपने स्वरूपमें ही स्थित हैं, सांख्यमतके अनुयायी जिन्हें सत्रहवाँ तत्त्व (पुरुष) मानते हैं, उन सांख्यरूप परमात्माको नमस्कार है ।। ५४ ।।
यं विनिद्रा जितश्वासाः सत्त्वस्थाः संयतेन्द्रियाः ।
ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः ।। ५५ ।।
जो नींदको जीतकर प्राणोंपर विजय पा चुके हैं और इन्द्रियोंको अपने वशमें करके शुद्ध सत्त्वमें स्थित हो गये हैं, वे निरन्तर योगाभ्यासमें लगे हुए योगिजन जिनके ज्योतिर्मय स्वरूपका साक्षात्कार करते हैं, उन योगरूप परमात्माको प्रणाम है ।। ५५ ।।
अपुण्यपुण्योपरमे यं पुनर्भवनिर्भयाः ।
शान्ताः संन्यासिनो यान्ति तस्मै मोक्षात्मने नमः ।। ५६ ।।
पाप और पुण्यका क्षय हो जानेपर पुनर्जन्मके भयसे मुक्त हुए शान्तचित्त संन्यासी जिन्हें प्राप्त करते हैं, उन मोक्षरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ५६ ॥ योऽसौ युगसहस्रान्ते प्रदीप्तार्चिर्विभावसुः । सम्भक्षयति भूतानि तस्मै घोरात्मने नमः ॥ ५७ ॥ सृष्टिके एक हजार युग बीतनेपर प्रचण्ड ज्वालाओंसे युक्त प्रलयकालीन अग्निका रूप धारण कर जो सम्पूर्ण प्राणियोंका संहार करते हैं, उन घोररूपधारी परमात्माको प्रणाम है ॥ ५७ ॥ सम्भक्ष्य सर्वभूतानि कृत्वा चैकार्णवं जगत् । बालः स्वपिति यश्चैकस्तस्मै मायात्मने नमः ॥ ५८ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण भूतोंका भक्षण करके जो इस जगत्के जलमय कर देते हैं और स्वयं बालकका रूप धारण कर अक्षयवटके पत्तेपर शयन करते हैं, उन मायामय बालमुकुन्दको नमस्कार है ॥ ५८ ॥ तद् यस्य नाभ्यां सम्भूतं यस्मिन् विश्वं प्रतिष्ठितम् । पुष्करे पुष्कराक्षस्य तस्मै पद्मात्मने नमः ॥ ५९ ॥ जिसपर यह विश्व टिका हुआ है, वह ब्रह्माण्ड-कमल जिन पुण्डरीकाक्ष भगवान्की नाभिसे प्रकट हुआ है, उन कमलरूपधारी परमेश्वरको प्रणाम है ॥ ५९ ॥ सहस्रशिरसे चैव पुरुषायामितात्मने । चतुःसमुद्रपर्य्याययोगनिद्रात्मने नमः ॥ ६० ॥ जिनके हजारों मस्तक हैं, जो अन्तर्यामीरूपसे सबके भीतर विराजमान हैं, जिनका स्वरूप किसी सीमामें आबद्ध नहीं है, जो चारों समुद्रोंके मिलनेसे एकार्णव हो जानेपर योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करते हैं, उन योगनिद्रारूप भगवान्को नमस्कार है ॥ ६० ॥ यस्य केशेषु जीमूता नद्यः सर्वाङ्गसंधिषु । कुक्षौ समुद्राश्चत्वारस्तस्मै तोयात्मने नमः ॥ ६१ ॥ जिनके मस्तकके बालोंकी जगह मेघ हैं, शरीरकी सन्धियोंमें नदियाँ हैं और उदरमें चारों समुद्र हैं, उन जलरूपी परमात्माको प्रणाम है ॥ ६१ ॥ यस्मात् सर्वाः प्रसूयन्ते सर्गप्रलयविक्रियाः । यस्मिंश्चैव प्रलीयन्ते तस्मै हेत्वात्मने नमः ॥ ६२ ॥ सृष्टि और प्रलयरूप समस्त विकार जिनसे उत्पन्न होते हैं और जिनमें ही सबका लय होता है, उन कारणरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ६२ ॥ यो निषण्णो भवेद् रात्रौ दिवा भवति विष्ठितः । इष्टानिष्टस्य च द्रष्टा तस्मै द्रष्ट्रात्मने नमः ॥ ६३ ॥
जो रातमें भी जागते रहते हैं और दिनके समय साक्षीरूपमें स्थित रहते हैं तथा जो सदा ही सबके भले-बुरेको देखते रहते हैं, उन द्रष्टारूपी परमात्माको प्रणाम है ॥ ६३ ॥
अकुण्ठं सर्वकार्येषु धर्मकार्यार्थमुद्यतम् । वैकुण्ठस्य च तद् रूपं तस्मै कार्यात्मने नमः ॥ ६४ ॥ जिन्हें कोई भी काम करनेमें रुकावट नहीं होती, जो धर्मका काम करनेको सर्वदा उद्यत रहते हैं तथा जो वैकुण्ठधामके स्वरूप हैं, उन कार्यरूप भगवान्को नमस्कार है ॥ ६४ ॥
त्रिःसप्तकृत्वो यः क्षत्रं धर्मव्युत्क्रान्तगौरवम् । क्रुद्धो निजघ्ने समरे तस्मै क्रौर्यात्मने नमः ॥ ६५ ॥ जिन्होंने धर्मात्मा होकर भी क्रोधमें भरकर धर्मके गौरवका उल्लंघन करनेवाले क्षत्रिय-समाजका युद्धमें इक्कीस बार संहार किया, कठोरताका अभिनय करनेवाले उन भगवान् परशुरामको प्रणाम है ॥ ६५ ॥
विभज्य पञ्चधाऽऽत्मानं वायुर्भूत्वा शरीरगः । यश्चेष्टयति भूतानि तस्मै वाय्वात्मने नमः ॥ ६६ ॥ जो प्रत्येक शरीरके भीतर वायुरूपमें स्थित हो अपनेको प्राण-अपान आदि पाँच स्वरूपोंमें विभक्त करके सम्पूर्ण प्राणियोंको क्रियाशील बनाते हैं, उन वायुरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ६६ ॥
युगेष्वावर्तते योगैर्मासर्त्वयनहायनैः । सर्गप्रलययोः कर्ता तस्मै कालात्मने नमः ॥ ६७ ॥ जो प्रत्येक युगमें योगमायाके बलसे अवतार धारण करते हैं और मास, ऋतु, अयन तथा वर्षोंके द्वारा सृष्टि और प्रलय करते रहते हैं, उन कालरूप परमात्माको प्रणाम है ॥ ६७ ॥
ब्रह्म वक्त्रं भुजौ क्षत्रं कृत्स्नमूरूदरं विशः । पादौ यस्याश्रिताः शूद्रास्तस्मै वर्णात्मने नमः ॥ ६८ ॥ ब्राह्मण जिनके मुख हैं, सम्पूर्ण क्षत्रिय-जाति भुजा है, वैश्य जंघा एवं उदर हैं और शूद्र जिनके चरणोंके आश्रित हैं, उन चातुर्वर्ण्यरूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥
यस्याग्निरास्यं द्यौर्मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः । सूर्यश्चक्षुर्दिशः श्रोत्रे तस्मै लोकात्मने नमः ॥ ६९ ॥ अग्नि जिनका मुख है, स्वर्ग मस्तक है, आकाश नाभि है, पृथ्वी पैर है, सूर्य नेत्र हैं और दिशाएँ कान हैं, उन लोकरूप परमात्माको प्रणाम है ॥ ६९ ॥
परः कालात् परो यज्ञात् परात् परतरश्च यः । अनादिरादिर्विश्वस्य तस्मै विश्वात्मने नमः ॥ ७० ॥ जो कालसे परे हैं, यज्ञसे भी परे हैं और परेसे भी अत्यन्त परे हैं, जो सम्पूर्ण विश्वके आदि हैं; किंतु जिनका आदि कोई भी नहीं है, उन विश्वात्मा परमेश्वरको नमस्कार
है ॥ ७० ॥
(वैद्युतो जाठरश्चैव पावकः शुचिरेव च ।
दहनः सर्वभक्षाणां तस्मै वह्नयात्मने नमः ॥)
जो मेघमें विद्युत् और उदरमें जठरानलके रूपमें स्थित हैं, जो सबको पवित्र करनेके कारण पावक तथा स्वरूपतः शुद्ध होनेसे ‘शुचि’ कहलाते हैं, समस्त भक्ष्य पदार्थोंको दग्ध करनेवाले वे अग्निदेव जिनके ही स्वरूप हैं, उन अग्निमय परमात्माको नमस्कार है ॥
विषये वर्तमानानां यं ते वैशेषिकैर्गुणैः ।
प्राहुर्विषयगोप्तारं तस्मै गोप्त्रात्मने नमः ॥ ७१ ॥
वैशेषिक दर्शनमें बताये हुए रूप, रस आदि गुणोंके द्वारा आकृष्ट हो जो लोग विषयोंके सेवनमें प्रवृत्त हो रहे हैं, उनकी उन विषयोंकी आसक्तिसे जो रक्षा करनेवाले हैं, उन रक्षकस्वरूप परमात्माको प्रणाम है ॥ ७१ ॥
अन्नपानेन्धनमयो रसप्राणविवर्धनः ।
यो धारयति भूतानि तस्मै प्राणात्मने नमः ॥ ७२ ॥
जो अन्न-जलरूपी ईंधनको पाकर शरीरके भीतर रस और प्राणशक्तिको बढ़ाते तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको धारण करते हैं, उन प्राणात्मा परमेश्वरको नमस्कार है ॥
प्राणानां धारणार्थाय योऽन्नं भुङ्क्ते चतुर्विधम् ।
अन्तर्भूतः पचत्यग्निस्तस्मै पाकात्मने नमः ॥ ७३ ॥
प्राणोंकी रक्षाके लिये जो भक्ष्य, भोज्य, चोष्य, लेह्य—चार प्रकारके अन्नोंका भोग लगाते हैं और स्वयं ही पेटके भीतर अग्निरूपमें स्थित भोजनको पचाते हैं, उन पाकरूप परमेश्वरको प्रणाम है ॥ ७३ ॥
पिङ्गेक्षणसटं यस्य रूपं दंष्ट्रानखायुधम् ।
दानवेन्द्रान्तकरणं तस्मै दृप्तात्मने नमः ॥ ७४ ॥
जिनका नरसिंहरूप दानवराज हिरण्यकशिपुका अन्त करनेवाला था, उस समय जिनके नेत्र और कंधेके बाल पीले दिखायी पड़ते थे, बड़ी-बड़ी दाढ़ें और नख ही जिनके आयुध थे, उन दर्परूपधारी भगवान् नरसिंहको प्रणाम है ॥ ७४ ॥
यं न देवा न गन्धर्वा न दैत्या न च दानवाः ।
तत्त्वतो हि विजानन्ति तस्मै सूक्ष्मात्मने नमः ॥ ७५ ॥
जिन्हें न देवता, न गन्धर्व, न दैत्य और न दानव ही ठीक-ठीक जान पाते हैं, उन सूक्ष्मस्वरूप परमात्माको नमस्कार है ॥ ७५ ॥
रसातलगतः श्रीमाननन्तो भगवान् विभुः ।
जगद् धारयते कृत्स्नं तस्मै वीर्यात्मने नमः ॥ ७६ ॥
जो सर्वव्यापक भगवान् श्रीमान् अनन्त नामक शेषनागके रूपमें रसातलमें रहकर सम्पूर्ण जगत्के अपने मस्तकपर धारण करते हैं, उन वीर्यरूप परमेश्वरको प्रणाम
है ॥ ७६ ॥
यो मोहयति भूतानि स्नेहपाशानुबन्धनैः ।
सर्गस्य रक्षणार्थाय तस्मै मोहात्मने नमः ॥ ७७ ॥
जो इस सृष्टि-परम्पराकी रक्षाके लिये सम्पूर्ण प्राणियोंको स्नेहपाशमें बाँधकर मोहमें डाले रखते हैं, उन मोहरूप भगवान्को नमस्कार है ॥ ७७ ॥
आत्मज्ञानमिदं ज्ञानं ज्ञात्वा पञ्चस्ववस्थितम् ।
यं ज्ञानेनाभिगच्छन्ति तस्मै ज्ञानात्मने नमः ॥ ७८ ॥
अन्नमयादि पाँच कोषोंमें स्थित आन्तरतम आत्माका ज्ञान होनेके पश्चात् विशुद्ध बोधके द्वारा विद्वान् पुरुष जिन्हें प्राप्त करते हैं, उन ज्ञानस्वरूप परब्रह्मको प्रणाम है ॥ ७८ ॥
अप्रमेयशरीराय सर्वतोबुद्धिचक्षुषे ।
अनन्तपरिमेयाय तस्मै दिव्यात्मने नमः ॥ ७९ ॥
जिनका स्वरूप किसी प्रमाणका विषय नहीं है, जिनके बुद्धिरूपी नेत्र सब ओर व्याप्त हो रहे हैं तथा जिनके भीतर अनन्त विषयोंका समावेश है, उन दिव्यात्मा परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ७९ ॥
जटिने दण्डिने नित्यं लम्बोदरशरीरिणे ।
कमण्डलूनिषङ्गाय तस्मै ब्रह्मात्मने नमः ॥ ८० ॥
जो जटा और दण्ड धारण करते हैं, लम्बोदर शरीरवाले हैं तथा जिनका कमण्डलु ही तूणीरका काम देता है, उन ब्रह्माजीके रूपमें भगवान्को प्रणाम है ॥
शूलिने त्रिदशेशाय त्र्यम्बकाय महात्मने ।
भस्मदिग्धाङ्गलिङ्गाय तस्मै रुद्रात्मने नमः ॥ ८१ ॥
जो त्रिशूल धारण करनेवाले और देवताओंके स्वामी हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जो महात्मा हैं तथा जिन्होंने अपने शरीरपर विभूति रमा रखी है, उन रुद्ररूप परमेश्वरको नमस्कार है ॥ ८१ ॥
चन्द्रार्धकृतशीर्षाय व्यालयज्ञोपवीतिने ।
पिनाकशूलहस्ताय तस्मा उग्रात्मने नमः ॥ ८२ ॥
जिनके मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट और शरीरपर सर्पका यज्ञोपवीत शोभा दे रहा है, जो अपने हाथमें पिनाक और त्रिशूल धारण करते हैं, उन उग्ररूपधारी भगवान् शंकरको प्रणाम है ॥ ८२ ॥
सर्वभूतात्मभूताय भूतादिनिधनाय च ।
अक्रोधद्रोहमोहाय तस्मै शान्तात्मने नमः ॥ ८३ ॥
जो सम्पूर्ण प्राणियोंके आत्मा और उनकी जन्म-मृत्युके कारण हैं, जिनमें क्रोध, द्रोह और मोहका सर्वथा अभाव है, उन शान्तात्मा परमेश्वरको नमस्कार है ॥
यस्मिन् सर्वं यतः सर्वं यः सर्वं सर्वतश्च यः ।
यश्च सर्वमयो नित्यं तस्मै सर्वात्मने नमः ॥ ८४ ॥ जिनके भीतर सब कुछ रहता है, जिनसे सब उत्पन्न होता है, जो स्वयं ही सर्वस्वरूप हैं, सदा ही सब ओर व्यापक हो रहे हैं और सर्वमय हैं, उन सर्वात्माको प्रणाम है ॥ ८४ ॥ विश्वकर्मन् नमस्तेऽस्तु विश्वात्मन् विश्वसम्भव । अपवर्गोऽसि भूतानां पञ्चानां परतः स्थितः ॥ ८५ ॥ इस विश्वकी रचना करनेवाले परमेश्वर! आपको प्रणाम है। विश्वके आत्मा और विश्वकी उत्पत्तिके स्थानभूत जगदीश्वर! आपको नमस्कार है। आप पाँचों भूतोंसे परे हैं और सम्पूर्ण प्राणियोंके मोक्षस्वरूप ब्रह्म हैं ॥ नमस्ते त्रिषु लोकेषु नमस्ते परतस्त्रिषु । नमस्ते दिक्षु सर्वासु त्वं हि सर्वमयो निधिः ॥ ८६ ॥ तीनों लोकोंमें व्याप्त हुए आपको नमस्कार है, त्रिभुवनसे परे रहनेवाले आपको प्रणाम है, सम्पूर्ण दिशाओंमें व्यापक आप प्रभुको नमस्कार है; क्योंकि आप सब पदार्थोंसे पूर्ण भण्डार हैं ॥ ८६ ॥ नमस्ते भगवन् विष्णो लोकानां प्रभवाप्यय । त्वं हि कर्ता हृषीकेश संहर्ता चापराजितः ॥ ८७ ॥ संसारकी उत्पत्ति करनेवाले अविनाशी भगवान् विष्णु! आपको नमस्कार है। हृषीकेश! आप सबके जन्मदाता और संहारकर्ता हैं। आप किसीसे पराजित नहीं होते ॥ ८७ ॥ न हि पश्यामि ते भावं दिव्यं हि त्रिषु वर्त्मसु । त्वां तु पश्यामि तत्त्वेन यत् ते रूपं सनातनम् ॥ ८८ ॥ मैं तीनों लोकोंमें आपके दिव्य जन्म-कर्मका रहस्य नहीं जान पाता; मैं तो तत्त्वदृष्टिसे आपका जो सनातन रूप है, उसीकी ओर लक्ष्य रखता हूँ ॥ ८८ ॥ दिवं ते शिरसा व्याप्तं पद्भ्यां देवी वसुन्धरा । विक्रमेण त्रयो लोकाः पुरुषोऽसि सनातनः ॥ ८९ ॥ स्वर्गलोक आपके मस्तकसे, पृथ्वीदेवी आपके पैरोंसे और तीनों लोक आपके तीन पगोंसे व्याप्त हैं, आप सनातन पुरुष हैं ॥ ८९ ॥ दिशो भुजा रविश्चक्षुर्वीर्यं शुक्रः प्रतिष्ठितः । सप्त मार्गा निरुद्धास्ते वायोरमिततेजसः ॥ ९० ॥ दिशाएँ आपकी भुजाएँ, सूर्य आपके नेत्र और प्रजापति शुक्राचार्य आपके वीर्य हैं। आपने ही अत्यन्त तेजस्वी वायुके रूपमें ऊपरके सातों मार्गोंको रोक रखा है ॥ अतसीपुष्पसंकाशं पीतवाससमच्युतम् । ये नमस्यन्ति गोविन्दं न तेषां विद्यते भयम् ॥ ९१ ॥ जिनकी कान्ति अलसीके फूलकी तरह साँवली है, शरीरपर पीताम्बर शोभा देता है, जो अपने स्वरूपसे कभी च्युत नहीं होते, उन भगवान् गोविन्दको जो लोग नमस्कार करते हैं,
उन्हें कभी भय नहीं होता ।। ९१ ।। एकोऽपि कृष्णस्य कृतः प्रणामो दशाश्वमेधावभृथेन तुल्यः । दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म कृष्णप्रणामी न पुनर्भावाय ।। ९२ ।। भगवान् श्रीकृष्णको एक बार भी प्रणाम किया जाय तो वह दस अश्वमेध यज्ञोंके अन्तमें किये गये स्नानके समान फल देनेवाला होता है। इसके सिवा प्रणाममें एक विशेषता है—दस अश्वमेध करनेवालेका तो पुनः इस संसारमें जन्म होता है, किंतु श्रीकृष्णको प्रणाम करनेवाला मनुष्य फिर भव-बन्धनमें नहीं पड़ता ।। ९२ ।। कृष्णव्रताः कृष्णमनुस्मरन्तो रात्रौ च कृष्णं पुनरुत्थिता ये । ते कृष्णदेहाः प्रविशन्ति कृष्ण- माज्यं यथा मन्त्रहुतं हुताशे ।। ९३ ।। जिन्होंने श्रीकृष्ण-भजनका ही व्रत ले रखा है, जो श्रीकृष्णका निरन्तर स्मरण करते हुए ही रातको सोते हैं और उन्हींका स्मरण करते हुए सबेरे उठते हैं, वे श्रीकृष्णस्वरूप होकर उनमें इस तरह मिल जाते हैं, जैसे मन्त्र पढ़कर हवन किया हुआ घी अग्निमें मिल जाता है ।। नमो नरकसंत्रासरक्षामण्डलकारिणे । संसारनिम्नगावर्ततरिकाष्ठाय विष्णवे ।। ९४ ।। जो नरकके भयसे बचानेके लिये रक्षामण्डलका निर्माण करनेवाले और संसाररूपी सरिताकी भँवरसे पार उतारनेके लिये काठकी नावके समान हैं, उन भगवान् विष्णुको नमस्कार है ।। ९४ ।। नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ।। ९५ ।। जो ब्राह्मणोंके प्रेमी तथा गौ और ब्राह्मणोंके हितकारी हैं, जिनसे समस्त विश्वका कल्याण होता है, उन सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् गोविन्दको प्रणाम है ।। प्राणकान्तारपाथेयं संसारोच्छेदभेषजम् । दुःखशोकपरित्राणं हरिरित्यक्षरद्वयम् ।। ९६ ।। 'हरि' ये दो अक्षर दुर्गम पथमें संकटके समय प्राणोंके लिये राह-खर्चके समान हैं, संसाररूपी रोगसे छुटकारा दिलानेके लिये औषधके तुल्य हैं तथा सब प्रकारके दुःख-शोकसे उद्धार करनेवाले हैं ।। ९६ ।। यथा विष्णुमयं सत्यं यथा विष्णुमयं जगत् । यथा विष्णुमयं सर्वं पाप्मा मे नश्यतां तथा ।। ९७ ।।
जैसे सत्य विष्णुमय है, जैसे सारा संसार विष्णुमय है, जिस प्रकार सब कुछ विष्णुमय है, उस प्रकार इस सत्यके प्रभावसे मेरे सारे पाप नष्ट हो जायँ ।। ९७ ।। त्वां प्रपन्नाय भक्ताय गतिमिष्टां जिगीषवे । यच्छ्रेयः पुण्डरीकाक्ष तद् ध्यायस्व सुरोत्तम ।। ९८ ।। देवताओंमें श्रेष्ठ कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण! मैं आपका शरणागत भक्त हूँ और अभीष्ट गतिको प्राप्त करना चाहता हूँ; जिसमें मेरा कल्याण हो, वह आप ही सोचिये ।। ९८ ।। इति विद्यातपोयोनिरयोनिर्विष्णुरीडितः । वाग्यज्ञेनार्चितो देवः प्रीयतां मे जनार्दनः ।। ९९ ।। जो विद्या और तपके जन्मस्थान हैं, जिनको दूसरा कोई जन्म देनेवाला नहीं है, उन भगवान् विष्णुका मैंने इस प्रकार वाणीरूप यज्ञसे पूजन किया है। इससे वे भगवान् जनार्दन मुझपर प्रसन्न हों ।। ९९ ।। नारायणः परं ब्रह्म नारायणपरं तपः । नारायणः परो देवः सर्वं नारायणः सदा ।। १०० ।। नारायण ही परब्रह्म हैं, नारायण ही परम तप हैं। नारायण ही सबसे बड़े देवता हैं और भगवान् नारायण ही सदा सब कुछ हैं ।। १०० ।।
वैशम्पायन उवाच
एतावदुक्त्वा वचनं भीष्मस्तद्गतमानसः । नम इत्येव कृष्णाय प्रणाममकरोत् तदा ।। १०१ ।। **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उस समय भीष्मजीका मन भगवान् श्रीकृष्णमें लगा हुआ था, उन्होंने ऊपर बतायी हुई स्तुति करनेके पश्चात् ‘नमः श्रीकृष्णाय’ कहकर उन्हें प्रणाम किया ।। १०१ ।। अभिगम्य तु योगेन भक्तिं भीष्मस्य माधवः । त्रैलोक्यदर्शनं ज्ञानं दिव्यं दत्त्वा ययौ हरिः ।। १०२ ।। भगवान् भी अपने योगबलसे भीष्मजीकी भक्तिको जानकर उनके निकट गये और उन्हें तीनों लोकोंकी बातोंका बोध करानेवाला दिव्य ज्ञान देकर लौट आये ।। १०२ ।। (यं योगिनः प्राप्तवियोगकाले यत्नेन चित्ते विनिवेशयन्ति । स तं पुरस्ताद्धरिमीक्षमाणः प्राणाञ्जहौ प्राप्तफलो हि भीष्मः ॥) योगी पुरुष प्राणत्यागके समय जिन्हें बड़े यत्नसे अपने हृदयमें स्थापित करते हैं, उन्हीं श्रीहरिको अपने सामने देखते हुए भीष्मजीने जीवनका फल प्राप्त करके अपने प्राणोंका
परित्याग किया था ।। तस्मिन्नुपरते शब्दे ततस्ते ब्रह्मवादिनः । भीष्मं वाग्भिर्बाष्पकण्ठास्तमानर्चुर्महामतिम् ॥ १०३ ॥ जब भीष्मजीका बोलना बंद हो गया, तब वहाँ बैठे हुए ब्रह्मवादी महर्षियोंने आँखोंमें आँसू भरकर गद्गद कण्ठसे परम बुद्धिमान् भीष्मजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की ॥ १०३ ॥
ते स्तुवन्तश्च विप्राग्र्याः केशवं पुरुषोत्तमम् । भीष्मं च शनकैः सर्वे प्रशंसुः पुनः पुनः ॥ १०४ ॥ वे ब्राह्मणशिरोमणि सभी महर्षि पुरुषोत्तम भगवान् केशवकी स्तुति करते हुए धीरे-धीरे भीष्मजीकी बारंबार सराहना करने लगे ॥ १०४ ॥
विदित्वा भक्तियोगं तु भीष्मस्य पुरुषोत्तमः । सहसोत्थाय संहृष्टो यानमेवान्वपद्यत ॥ १०५ ॥ इधर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण भीष्मजीके भक्तियोगको जानकर सहसा उठे और बड़े हर्षके साथ रथपर जा बैठे ॥ १०५ ॥
केशवः सात्यकिश्चापि रथेनैकेन जग्मतुः । अपरेण महात्मानौ युधिष्ठिरधनंजयौ ॥ १०६ ॥ एक रथसे सात्यकि और श्रीकृष्ण चले तथा दूसरे रथसे महामना युधिष्ठिर और अर्जुन ॥ १०६ ॥
भीमसेनो यमौ चोभौ रथमेकं समाश्रिताः । कृपो युयुत्सुः सूतश्च संजयश्च परंतपः ॥ १०७ ॥ भीमसेन और नकुल-सहदेव तीसरे रथपर सवार हुए। चौथे रथसे कृपाचार्य, युयुत्सु और शत्रुओंको तपानेवाला सारथि संजय—ये तीनों चल दिये ॥ १०७ ॥
ते रथैर्नगराकारैः प्रयाताः पुरुषर्षभाः । नेमिघोषेण महता कम्पयन्तो वसुन्धराम् ॥ १०८ ॥ वे पुरुषप्रवर पाण्डव और श्रीकृष्ण नगराकार रथोंद्वारा उनके पहियोंके गम्भीर घोषसे पृथ्वीको कँपाते हुए बड़े वेगसे गये ॥ १०८ ॥
ततो गिरः पुरुषवरस्तवन्विता द्विजेरिताः पथि सुमनाः स शुश्रुवे । कृताञ्जलिं प्रणतमथापरं जनं स केशिहा मुदितमनाभ्यनन्दत ॥ १०९ ॥ उस समय बहुत-से ब्राह्मण मार्गमें पुरुषोत्तम श्रीकृष्णकी स्तुति करते और भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्न-मनसे उसे सुनते थे। दूसरे बहुत-से लोग हाथ जोड़कर उनके चरणोंमें प्रणाम करते और केशिहन्ता केशव मन ही-मन आनन्दित हो उन लोगोंका अभिनन्दन करते थे ॥ १०९ ॥